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Archive for January, 2012

Nehruvian withdraws whole bank

Nehruvian withdraws whole bank

ईन्टरनेट वेबसाईट और सोसीयल नेट वर्कींग पर सरकार क्या कर सकती है और क्या करेगी?

सरकार और वह भी नहेरुवीयन कोंग्रेस सरकार और उसके सहयोगी पक्ष कुछ भी कर सकते है.

आप कहेंगे कि सहयोगी पक्ष क्यों ऐसे काले और जनतंत्र के खिलाफ कार्यवाहीमें कोंग्रेस को समर्थन देगा? तो जवाब है, नहेरुवीयन कोंग्रेसको समर्थन करने वाले तभी उसको समर्थन कर सकते हैं जब उनको नहेरुवीयन कोंग्रेसकी जो आततायी करतूतें इतिहासिके पृष्ठों पर देशके लिये एक कालीमा के रुपमें प्रस्थापित है और उनको ज्ञात भी है तो भी वे यह नहेरुवीय कोंग्रेसका समर्थन करते है, उसका मतलब यही है कि इन पक्षोंको भी ऐसे कर्मोंसे कोई छोछ नहीं है. और आप देख सकते हैं कि मुलायम, माया, ममता करुणा, शरद, लालु, अजितसिंघ और  साम्यवादी जैसे लोंगोका इतिहास और कार्य शैली कैसी है?

मुलायम सिंह वोटबेंक को धर्म के नाम से आगे बढाना चाहते है. मुलायम को मुल्ला मुलायम क्यों कहते थे इसबातके लिये आप कोई भैया जि से ही पूछीये.

मायावतीका संस्कार ईन्दीरा गांधी जैसा है वह सत्ताके लिये कोई भी हद तक जा सकती है.और मायावतीके पास सिद्धांतोका संपूर्ण अभाव है. कल तक वह कहती थी कि “तिलक तराजु और तलवार इसको मारो जूते चार.” अब वह कहती है “ये हाथी नहीं गणेश है” चलो इसको तो हम यह समझकर भूल सकते हैं कि उसको लगा कि सबको साथ लेके चलना है. उसको भी ईन्दीरा गांधी की तरह अपने गुरु-पूर्वजोंकी  प्रतिमाएं स्थापित करके इतिहासमें जनता के पैसोंसे अमर होना है. बाजपाई सरकारको क्षुल्लक बातोंसे अयोग्य दबाव लाके समर्थन वापस लेनेकी बात उठाती थी. मायावतीके दोहरे मापदंड है. खुदके लिये और अन्य लोगोंके लिये.

ममता बेनर्जीने बाजपाई सरकारको समर्थन दिया था. लेकिन उसका वर्तन तो मायावतीसे भी बढकर था. जिसके तडमें लड्डु उसके तडमें हम. कहा जाता है कि उसने माओवादीयोंके साथ और नक्षलवादीयोंके साथ प्रच्छन्न समर्थन गत विधान सभा चूनावमें लिया था. जो लोग बाजपायी को समर्थन करे और जब बीजेपी को बहुमत न मिले तो उसके विरोंधी और लोकशाही मूल्योंका विद्धंश के लिये कुख्यात पार्टी (नहेरुवीयन कोंग्रेस) का समर्थन करें उसका भला कैसे विश्वास किया जा सकता है. जो व्यक्ति सर्वोदय नेता लोकमान्य जयप्रकाश नारायणकी जीप पर खडी होकर नृत्य करती है, और समय आने पर उसी जयप्रकाश नारायण को मृत्युके मूखमें ढकेलने वाली नहेरुवीयन कोंग्रेस सरकारका भी समर्थन कर सकती है, उसके उपर तो दिमागकी बिमारी वाले विश्वास कर सकते है.

करुणानीधिका किस्सा तो जग प्रसिद्ध है.और ईसके वर्णन की कोई आवश्यकता नहीं है.

शरद पवार वैसे तो पहेले कोंग्रेस (ओ) में थे. फिर यशवंतराव चवाण के साथ नहेरुवीय कोंग्रेसमें गये. कटोकटी (इमरजेन्सी) मे वह नहेरुवीयन कोंग्रेसके साथी रहे. १९७७में वे अलग हुए. फिर पता नहीं कितने दलबदल किये. कहा जाता है कि इनके बारेमें दाउदसे अच्छा कोई नहीं जानता. अगर आप के पास फर्जी करेन्सी नोट है और अगर यह बात सिद्ध हो गयी तो वह करेन्सी नोटकी किमत शून्य हो जाती है. अरबों रुपये के फर्जी स्टेम्प पेपर

बने थे और वे बिल्डरोंको और अन्योंको वितरित हुए थे. सरकार पने रिकोर्डसे पता लगवा सकती है कि, ये फर्जी स्टेम्प पेपर कहां कहां उपयोगमें आये. इतनी तो गुंजाइश तो सरकारमें होनी ही चाहिये. लेकिन ऐसा क्यों नहीं होता है? फर्जी स्टेम्प पेपरका मूल्य शून्य क्यों नहीं बनजाता है? यह सब कमाल किसकी है?

लालुजिने अपनी सरकार एसी चलाई जो ढोरोंकी खास भी ढंगसे वितरण न कर पायी. वास्तवमें सरकारी अफसरोंका और खासकरके उत्तरभारतमें तो बांये हाथकी सरकारी अफसरोंकी कमाई एक विशिष्ठ योग्यता मानी जाती है. और जब ये सरकारी अफसरोंको पता चलता है कि उनका मंत्रीवर्य भी अपन जैसा ही है तब तो उनकी सीमा ओर विस्तृत हो जाती है.

अजितसिंघके पिताश्री चरणसिंहको इन्दिरागांधीने विश्वास दिलाया था कि उसकी पार्टी चरण सिंह को सहाकार करेगी और दोनोंने मिलकर मोरारजी देसाई की जनतापार्टीकी सरकारको लघुमतिमें लादी थी. बादमें इन्दीरा गांधीने चरणसिंहका विश्वासघात करके उनको सहाकर नहीं दिया था. और चरण सिंहको मूंहकी खानी पडी थी. तो भी उनका यह पूत्र अजितसिंह इस विश्वास घातको भूल कर सिर्फ सत्तामें भागके लिये उसी ईन्दीराई नहेरुवीयन कोंग्रेसके साथ गठबंधनमें है. इससे ज्यादा पिताजीकी नालेशी क्या हो सकती है? और ऐसे “प्रहारजनिता व्यथाको” गर्दभकी तरह भूल जाने वालेका क्या विश्वास कर सकते है?

अगर नहेरु की पूत्री सीनीयर न होने पर भी भारतकी प्रधानमंत्री बन सकती है तो लालुप्रसाद यादव की पत्नी क्यों मुख्य मंत्री बन न सके? अगर नहेरुवीयन कोंग्रेसके एक प्रधान मंत्री की एक पुत्रवधू कोमन समान मंचपर आके विपक्ष के कोई नेता के साथ चर्चा नहीं कर सकती और समाचार माध्यम पूत्रवधूमें कोइ अपूर्णता और टिकात्मकता देखना नहीं चाहते तो  लालुजिकी पत्नी को भी समान मंचपर गोष्टि करना कैसे जरुरी है? साध्यम इति सिद्धम्‌. समाचारमाध्यमके मालिकोंके लिये और उनके कटार मूर्धन्योंके लिये तो “तेरी बी चूप और मेरी बी चूप हो गई”. मीडीया बिकाउ है इसका इससे उत्कृष्ट उदाहरण क्या हो सकता है?

साम्यवादीयोंका कोई देश और धर्म नहीं होता. जनताको उल्लु बनानेके लिये उसको आघात देते रहो और जनताको गुमराह करते करते अपना शासन करते रहो. पश्चिम बंगालमें तीन दसक तक साम्यवादी शासन रहा. क्या पश्चिम बंगालमेंसे गरीबी हट गई? क्यां वहां पर आदमीसे खिंचीजानेवाली रीक्षाके स्थान पर सीएनजीसे चलने वाली रीक्षा आ गई या दी गई? हरि हरि करो. ऐसा कुछ हुआ नहीं. सीएनजी क्या !! सायकल रीक्षा भी नहीं आयी.

अहमदाबादमें एक सप्ताहमें ही नरेन्द्र मोदीने सभी पेट्रोलकी रीक्षाओंको सीएनजी रीक्षामें परिवर्तित करदीया था. अहमदाबादमें १९५१के बाद सायकल रीक्षा ही खतम हो गई. १९५२से अहमदाबादमें ऑटोरीक्षा ही है. जो नरेन्द्रमोदीने एक सप्ताहमें किया वह नहेरुवीयन कोंग्रेस और साम्यवादी पक्ष साठ सालमें भी नहीं कर पाये.

नहेरुवीयन कोंग्रेस और साम्यवादीयोंमें क्या फर्क है? खास कोई नहीं. जो निघृष्ट कार्य नहेरुवीयन कोंग्रेस खुदके उपर आपत्ति आने पर विरोधीयों और जनताके उपर करती है वह कार्य साम्यवादी लोग हर हालतमें करते है.

Media wants to make a paper tigress

Media wants to make a paper tigress

कोंग्रेसके उपर आपत्ति आयी तो पैसे के लिये बेंकोका राष्ट्रीयकरण किया, नैपूण्य के स्थानपर युनीयनबाजी को प्रोत्साहन दिया. अन्याय और भ्रष्टाचार के विरुद्ध आवाज उठाने वाले विरोधियोंको अनियत कालके लिये कारावासमें डालदिया, समाचार माध्यमोंपर सेन्सरशीप लगा दी, यहां तक कि, अगर कोई केसमें उच्च न्यायालयमें सरकारकी पराजय हूई तो ऐसे सरकारी पराजयके समाचार पर भी सेन्सरशीप रही. अपनवालोंको लूटका अलिखित स्वातंत्र्य दे दिया. ऐसे तो कई कूकर्म इमर्जेन्सीमें हूए. यह साम्यवादी पक्ष तो चाहता था कि, इमर्जेन्सीके अंतर्गत नहेरुवीयन कोंग्रेस साम्यवादी पक्षमें विलिन हो जाय या तो संपूर्ण साम्यवादी तौर तरिके अपनाके एक नये साम्यवाद स्थापनेकी क्रांतिकारी कदम उठावे. लेकिन साम्यवादी लोग यह समझ नहीं पाये के कि भारतमें लोकशाही विचारधारा और सुसुप्त जनशक्ति असाधारण और गहरी थी. नहेरुवीयन कोंग्रेसको अपने सर्वोच्च नेताके कारण मूंहकी खानी पडी तो भी यह नहेरुवीयन कोंग्रेस ने कोई शिख नहीं ली. वह आज भी विरोधियोंको येनकेन प्रकारेण फर्जी किस्से बनानेमें व्यस्त रहेती है. और खुदके सच्चे किस्सेके बारेमें मौन रहेती है और समाचारमाध्यम भी इन पर मौन रहे वैसा कारोबार करती है.

VOTE FOR MOMMY

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ऐसे समाचर माध्यमोंको सेन्सरशीपकी जरुरत भी क्या है? पैसे फेंको और जो करवाना हो वह करवा लो, जो लिखवाना हो, वह लिखवा लो, जो कटवाना हो वह कटवालो. जिनको यह नहेरुवीयन कोंग्रेसवाले झुकवाना चाहते हैं वे तो साष्टांग दंडवत प्रणाम करनेके लिये भी तैयार है.

नहेरुवीयन कोंग्रेस अब क्या कर सकती है? वह विरोधीयों के उपर फर्जी केस बना सकती है. जैसा उसने वी.पी. सिंह के उपर सेन्ट कीट के गैरकानुनी एकाउन्ट केस का किया था.

केजरीवाल, किरन बेदी, प्रशांत भूषण, बाबा रामदेव जैसे लोगपर भी सरसव जैसे दोषोंको पहाड जैसे बताके कार्यवाही कर रही है और समाचारपत्रोमें उनको बदनाम करवा रही है.

लेकिन आमजनताकी आवाज जो ईन्टर्नेटके जरिये चल रही है उसको बंद कैसे करें इस समस्या पर नहेरुवीयन कोंग्रेस अपना ध्यान केंद्रित कर रही है. जनमाहिति अधिकारको तो उसने नष्टप्राय कर दिया है. कैसे? जो भी कोई जनमाहिति अधिकारी होते हैं वे सबके सब तो वही विभागसे संलग्न होते है. जो हमेशा विलंब नीति अपनाके बाद कोई न कोई बहाना बनाके माहितिको टालनेका प्रयास करते है. जब आप माहिति कमिश्नरके पास पहोंचते है तब कमिश्नरोंकी नियुक्ति पर्याप्त और अपूर्ण होने के कारण केसोंका ढेर पडा होता है. जैसे न्यायमें देरी वह न्याय का इन्कार के बराबर है, वैसे भी माहिति देनेमें अपार विलंब भी माहिति न देनेके बराबर ही हो जाता है.

मैं दाउदका नमक खात हूं

मैं दाउदका नमक खात हूं

ऐसा ही अब जनसामान्य जो चर्चाप्रिय है और भ्रष्टाचारके विरुद्धमें अपना स्वर उंचा करते है, और वह भी ईन्टर्नेट माध्यम के द्वारा तो यह नहेरुवंशी कोंग्रेस इनलोंगोंके उपर आक्रमण के लिये तैयार है.

नहेरुवीयन कोंग्रेस कैसे तैयार है?

जो भी भारतीय स्थानिक वेबसाईट है वे सब तो समाचार माध्यमोंकी तरह व्यंढ ही है.

इनके लिये व्यंढ शब्दका उपयोग करना भी व्यंढ लोगोंका अपमान करनेके बराबर है. कारण यह है कि व्यंढ लोग तो  सिर्फ प्रजननके लिये ही व्यंढ है. इन लोगोंमे शूरविरता और देशप्रेमकी कमी होना जरुरी नहीं है.

लेकिन ये भारतस्थ वेबसाइट वाले तो डरपोक और बीना प्रतिकार किये आत्मसमर्पण करनेमें प्रथमकोटीके है. ये लोग समाचार माध्यमोसे कोइ अलग मनोदशा रखनेवाले नहीं है.

तो यह वेब साईट पर आक्रमण करवाना कौन चाहता है? कौन करवायेगा? और कैसे करवायेगा?

नहेरुवंशवादी कोंग्रेसको वेबसाईटकी स्वतंत्रता और पसंद नहीं है. क्योंकि वेबसाईट के सदस्य नहेरुवीयन कोंग्रेसके तथा कथित कारनामे पर आपसमें चर्चा करते है और इससे नहेरुवीयन कोंग्रेसकी कमीयां बाहर आती है. नहेरुवीयन कोंग्रेसको अपनी कमीयोंको दूरकरना चाहती नहीं है. क्योंकि अगर दूर करेगी तो देशकी उन्नति हो जायेगी और देशकी उन्नति का मतलब है लोग पढे लिखे और समझदार हो जायेंगे तो नहेरुवीयन कोंग्रेसकी असलियतको पहचान जायेंगे तो नहेरुवीयन कोंग्रेसको सत्तासे हटा देंगे. अगर नहेरुवीयन कोंग्रेस सत्तासे हट जायेगी तो जो अन्य सरकार आयेगी वो उसके उपर न्यायिक कार्यवाही करेगी. अगर नयी सरकार, नहेरुवीयन कोंग्रेसके सदस्योंपर  न्यायिक कार्यवाही करेगी तो वे सभी नेतागणकी चूनावके लिये योग्यता नष्ट हो जायेगी अन्तमें उनको जेल जाना पडेगा. इतना ही नहीं लेकिन ये नहेरुवीयन फरजंदोने जनताके पैसोंसे जो बनी इमारतें और योजनाओंका नाम खुदके नामसे जोडा है, वे सब हट जायेगा. उनके बूत हट जायेंगे और उनके सभी अव्वल नंबरके नेताओंका नाम दूर्योधन, शकूनी, शिशुपाल, मंथरा, आदिके क्रममें आजायेगा. यह बात तो छोडो लेकिन उनको अपने रक्त-काला धनसे हाथ धोना पडेगा.

Only left hand drive

Only left hand drive

इसीलिये नहेरुवीयन कोंग्रेस वेबसाईट की स्वतंत्रता पर अपना प्रभाव लाना चाह्ती है. लेकिन इसमें नहेरुवीयन कोंग्रेसको मदद कौन कर सकता है?

नहेरुवीयन कोंग्रेसको उसके साथीपक्ष मदद कर सकते है. क्योंकि नहेरुवीयन कोंग्रेसके साथी पक्षकी मनोवृत्तियां और चरित्र भी नहेरुवीयन कोंग्रेस की मनोवृत्तियां और चरित्रके समकक्ष हि है. अगर नहेरुवीयन कोंग्रेस चूनावमें हार भी गई तो ये पक्ष नहेरुवीयन कोंग्रेसके सदस्योंका रक्षण करनेमें अपना दिलसे योगदान करेंगे क्योंकि नहेरुवीयन कोंग्रेसने भी समय समय पर इन पक्षोंके सदस्योंकी रक्षा की है.

नहेरुवीयन कोंग्रेस वेबसाइट पर अपना प्रभाव डालने के लिये किसका सहारा लेगी?

नहेरुवीयन कोंग्रेस ये काम पुलीस डीपार्टमेन्टके द्वारा करवायेगी. क्योंकि यह डिपार्टमेन्ट हो एक ऐसा डिपार्टमेन्ट है जो हमेशा गलत काम करनेमें प्रथम क्रम में रहेता है. जो डिपार्टमेन्ट फर्जी एनकाउन्टर करता है वह क्या क्या नहीं कर सकता!!

वह आपके पेजको हैक करसकता है. वह आपके पेजपर कुछभी आपत्ति जनक लिखके आपके पेज को और आपको बदनाम करके आपके पेजको सेन्सर करके उसको नष्ट कर सकता है.

ऐसा अगर न भी करें, तो भी आपके पेज को बेवजह ही नष्ट कर किया जा सकता है. वजह यही बतायेगा कि आपने नहेरुवीयन कोंग्रेसके खिलाब बेबुनियाद लिखा है और इसलिये आपका पेज नष्ट किया गया है. और यह पता लगानेके लिये भी आपको महिनों तक वेबसाईट के साथ लिखावट करनी पडेगी तब कहीं यह वेबसाईटवाला आपको बतायेगा कि पूलिसकी सूचना पर उसने आपका पेज नष्ट किया है. फिर आपको पूलिस-डिपार्टमेन्टसे “जन माहिति अधिकार”का उपयोग करके और उसके बाद न्यायालयमें जाके अपने हक्क के लिये लडना होगा. इसमें आपका कमसे कम एक साल चला जायगा. अगर आपके पास पैसे है तो ऐसे वेबसाईटसे और सरकारसे नुकशान वसुली करवा पायेंगे. लेकिन ऐसा करनेमें आपको सिर्फ यह काम के लिये हि हाथ धोके पीछे पडना पडेगा.

नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके साथी पक्ष चाहतें है कि जनता यथावत ही रहे. सबकुछ यथावत ही रहे ताकि वे लोगभी अपना काम यथावत ही कर सके और अपनी बहत्तर पेढीयोंका उद्धार करसके.

वे यह नहीं चाहते हैं कि आप लोग अपने मित्रोंके साथ माहिति और विचारोंका आदानप्रदान करे भ्रष्टाचार और असत्य के सामने आवाज उठानेके लिये कोई योजना बनावे.

ये नहेरुवीयन कोंग्रेसके सदस्य खुद कुछभी अनापसनाप बोलसक्ते हैं. उनके उपर कोइ पाबंदी नहीं. उनके पक्षीय महामंत्री बेबुनियाद आरोप लगा सकते है, और सरकारी प्रसार माध्यमभी उसका खुलकर प्रसारण करेंगे. उसमें इस नहेरुवीयन कोंग्रेसको कोई कठिनाई और आपत्ति या बेइमानी दिखाई नहीं देती. लेकिन अगर आप रामराज्यकी बात करेंगे तो उनको आपत्ति होगी और आपका वेबसाईट परका पेज नष्ट होगा.

वैसे तो लोकतंत्रमें आप आपके मित्रोंके साथ कुछभी विचार विनिमय कर सकते है. लेकिन नहेरुवीयन कोंग्रेस एक दंभी, स्वकेन्द्री और आपखुद चरित्र और संस्कार होने के कारण आपके अधिकार पर कोई भी आघात कर सकती है. और ये कमीना पोलीस तंत्र ये नहेरुवीयन कोंग्रेसके आदेशोंका पालन करने के बारेमें दिमागसे अंध है और अगर नहेरुवीयन कोंग्रेस उसको कहेगी कि “हमारे आगे झुको” तो यह पोलीस तंत्र “साष्टांग दंडवत प्रणाम” करने लगेगा. जो खुद भ्रष्ट और नीतिहीन है उसकी करोडराज्जु होती ही नहीं है.

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ACTION AND PURPOSE BEHIND THE ACTION 

Hello Governor

Hello Governor

Let us go through some of the actions of Nehruvian Congress Private Limited and its purpose behind those actions.

It is very common among Nehruvians in India to act under disguise of public interest or in the interest of poor people but to have some different purpose behind that action.

Jawaharlal Nehru

1948: Case of Kashmir taken to UNO by Nehru and accepted the date of report to UNO as LOC with an intention (purpose) to show his out of proportion respect towards UNO. In fact it was a political blunder because Nehru had no wisdom and foresight.

1950: Founded Non-alliance Movement with an aim to show the First world (NATO countries) that military alliance is not the solution for world peace. But indirectly it was unregistered alliance with Second World (Communist countries Russia and China)

1952: Accepted sovereignty of China on Tibet. To show the Communist countries Russia and China that he was more aligned to socialism than human rights. Internally he wanted backing of Russia and China against the influence of USA and others.

 

1952: Puch-sheel treaty with China, to show the world that he loved peace and has soft corner for Buddhism (the vote-bank of Ambedkar).

 

1953-1962: Non-action on Chinese military infiltration and denial before parliament of India on any Chinese  infiltration in India. To show Russia that he had soft corner towards China and how much faith the people of India had in him despite of his blunders. It cannot be ruled out that he wanted political assistance from Russia in playing political unfair tactics with people of India.

 

1962: Nehru said “enemy has betrayed us on his Defeat against China due to neglecting security of borders. This statement was made to misguide the people of India to show that he was innocent. When Nehru was asked that when the forward movement of China in India would get stopped? Nehru replied “where and when we would stop them by our strength”. But China had captured 30000 square miles additional land more than what it had claimed in Indian land. China made cease fire of his own and gave back the additional seized land of 30000 square miles out of 92000/- square miles of total seized land.

 

1963: Nehru took oath “we will not take rest until we recapture the lost land of mother India”. The purpose was to show his sincerity towards mother India. In fact Nehru was a fraud and he made fraudulent statement. He and his progenies knew very well that the lost land was never going to be recaptured.

 

MORARJI DESAI WAS ICS AND COMPETITOR No One to Nehru

MORARJI DESAI WAS ICS AND COMPETITOR No One to Nehru

1963: Kamraj Plan: Nehru spelled purpose to strengthen the party by utilising services of senior leaders. Internally his purpose was to remove Morarji Desai who was his number one opponent.

 

Indira Gandhi:

Removal of privy-purses of Kings: This was with a view to show that she was socialistic. In fact the privy-purses were in accordance to the agreement signed with them when they handed over their kingdoms to independent India. The annual payment was to getting reduced to end up to zero in due course. However Indira wanted to show her promptness and militancy on establishing socialism to remove poverty.

 

Nationalisation of 14 leading private banks: Morarji Desai had introduced socialisation of banking. The RBI controls the policy of advances. Hence Morarji Desai was on right path. But Indira Gandhi wanted to spoil the bank employees for her political benefit. Nationalisation of Banks spoiled the administration of all these banks. Banks’ money got utilised for granting no-return loan as per the unwritten understanding. Like this the purpose was in no way effective to remove poverty or to uplift poor mass, but to share loan amount among managers (not always), recommending authority of loan (viz. Nehruvian Congress local leaders) and the borrowers. 1968 to 1984 of further rule of Indira Gandhi no poverty had been removed.

 

Remove Poverty was a fraud

Remove Poverty was a fraud

Emergency: Indira declared emergency under the plea that her opponents instigating people to revolt against government and there was bulk indiscipline. But in reality her purpose was to retain her power and PM-ship.

 

Weak deal with Union Carbide: to make India self sufficient on pesticides. In fact under table deal cannot be ruled out as it is a practice of western industrialists to establish such hazardous production units in poor countries so that they can fool the local governments in case of hazard by way of executing defective agreement with purchasable government like Nehruvian Congress of India Private Limited.

 

Indira had no wisdom to see what could happen consequent to Simla Pact

Indira had no wisdom to see what could happen consequent to Simla Pact

Simla Pact: Bhutto said If I would solve all the problems and issues with India and agree to any such pact, I would be killed in Pakistan, and the agreement would not have any meaning. Indira Gandhi agreed to this as reported by Indira and no issue or problem was solved and converted victory into defeat. Further reality was so-called weak pact had also been made useless, as otherwise also Bhutto had been killed by the successive government of Pakistan. It cannot be ruled out that there could be an undertable deal with Bhutto by Indira Gandhi.

Rajiv Gandhi 

Deal with Ceylon: The aim was to have good relation with Ceylon. But it was complete avoidance of the interest of Tamilians in Ceylon. It was a blunder. Can you imagine that Pakistan would send its military in Kashmir to kill Muslim terrorists?

 

Every body has to make Nehruvian Congress comfortable in a deal

Every body has to make Nehruvian Congress comfortable in a deal

Boffors tanks: To make India stronger in military. We know the fact.

 

Anderson of Union Carbide: Rajiv said he would come back whenever we call him under investigation. It was a fraudulent statement. Under table deal cannot be ruled out for giving an easy pass to Anderson.

 

Man Mohan and Sonia Gandhi:

 

Harshad Mehta security scam: Man Mohan the then Finance Minister announced that he would take suitable corrective step such that security scam would not get repeated. The purpose was to show to the public that they were innocent. He said it was the fault of system. In fact the designers of the system were themselves. Man Mohan had made several phones to pressurise the then Income Tax Commissioner Vishvabandhu Gupta not to take action.

 

Though Man Mohan was FM at that time, when he became PM, Satyam scam took place.

 

Ravan Lila at Ram Lila Maidan: Nehruvian Government says law was taking its own course. In fact the police authority said, it was a political decision.

 

Jan Lok Pal Bill: Nehruvian Cong leaders say Parliament is supreme and government wants strong Lokpal. In fact the Civil Society was formed in consultation with government and Nehruvian Congress never wanted a strong Lokpal. Nehruvian Congress never tried to discuss on the merits. Arun Jetley had never been replied to the points.

 

Similar are the cases of Black-red money, Printing of currency notes by RBI, Distribution of Fake currency notes by RBI, Statements related with deportation of Daud, curtailing the scope of RTI act. EVM … there is no end. We can write a bigger book than Maha Bharat on the frauds, scams, scandals and blunders Nehruvians and Nehruvian Congress together with their allies.

 

ONE SHOULD NOT BE IN POLITICS FOR POWER

ONE SHOULD NOT BE IN POLITICS FOR POWER

Governor appoints Lok Pal in Gujarat: Nehruvian Congress says we are sincerely on Lok Pal. Chronology says the issue has been made political by Nehruvian Congress. Governor and opposition party (Nehruvian Congress of India Private Limited) in Gujarat in joint venture rejected the proposal of ruling party (BJP Gujarat), without any merits and convincing reason. The HC has not gone through the political aspect and aims of Nehruvian Congress. Purpose behind the action is important. The purpose cannot be set aside in jurisprudent.

Do they want to scrap the state government? Let us rent out the State Assembly building.

 

Shirish Mohanlal Dave

 

Tags:

Nehruvian, Purpose, Action, Power, Politics, Jawahar, Indira, Man Mohan, FM, PM, Governor, Gujarat, State Assembly, Rent out

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ईशावास्यमीदं सर्वम्‌ यत्किन्चित्‌ जगत्यां जगत्‌
तेन त्यक्तेन भूंजिथा मा गृधः कस्यस्चित्‌ धनम्‌

નિંદારસમાં રહેલો ઈશ્વર

 

એવું લાગે છે કે આપણે ઈશાવાસ્ય વૃત્તિ કેળવવી જોઇએ. ગાંધીજીએ આ વાત કરી છે. જેને વિષે જે સાચુ લાગે તે કહીએ પણ તે વાતને કશી કડવાશ વગર કહીએ.

 

ઈશાવાસ્યં ઈદં સર્વં યત્‌ કિંચિત્‌ જગત્યાં જગત્‌,

તેન ત્યક્તેન ભૂંજિથાઃ

 

આ જગતમાં જે કંઈ પણ છે તે સર્વેમાં, “ઈશ્વર (શિવ)”,નો વાસ છે. એટલે કે દરેકમાં તે રહેલો છે. તેથી ત્યાગ પૂર્વક (આપણી પ્રાજ્ઞા રુપી સંપત્તિને) ભોગવીએ.

 

ઈશ્વરે મૂળભૂત તત્વ કે જેની આ દુનિયા બનેલી છે તેનો ગુણધર્મ નક્કી કરેલો છે. તેના અવનવા સમૂચ્ચયોના ગુણો તે મૂળભૂત ગુણના પરિણામી ગુણો છે. દરેક વ્યકિત  તે આવી પડેલા પોતાના ગુણો પ્રમાણે વર્તે છે.

 

આ ગુણોમાં વિચારવાની અને સમજવાની શક્તિ પણ એક ગુણ છે. જે કેટલેક અંશે આનુવંશિક, અવલોકનો અને વિચારોના પરિણામ સ્વરુપ હોય છે. માણસ નિર્ણયો લેવામાં કેટલો સ્વતંત્ર છે તે આપણે જાણતા નથી. અગાઉ મોરારજી દેસાઈએ કહેલું કે બધું નિશ્ચિત છે. પણ ભવિષ્યના ગર્ભમાં કોઇ જોઈ શકતું નથી. આ જ વાત હાલનો આધુનિક વૈજ્ઞાનિક સ્ટીફન હોકીંગ્સ પણ કહે છે.

 

હવે તમે કહેશો કે જો બધું ઈશ્વર જ કરતો હોય તો ગુસ્સો કેમ આવે છે?

તેનું કારણ એ હોઈ શકે કે ઈશ્વરે એવી વ્યવસ્થા ગોઠવી છે કે સમાજ ક્યારેક સરળ રીતે ક્યારેક ખોડંગાતો ખોડંગાતો અને ક્યારેક પાછળ ડગલાં ભરીને પણ ઉન્નતિ માટે જ્ઞાની   બને અને વ્યક્તિગત રીતે મનુષ્યના આનંદમાં વૃદ્ધિ થાય. કારણ કે અન્તે તો ઈશ્વરની ઈચ્છા આનંદ આપવાની છે.

 

 

જ્યારે કોઈની પણ ટીકા થાય ત્યારે તેની પાછળનો હેતુ જેની ટીકા થાય છે તેને સુધારવાની તક મળે  એ હોય છે. પોતાનામાં કેવીરીતનો સુધારો થયો તેનું તેને જ્ઞાન થાય. તે જ્ઞાન થકી તે આનંદ પામે. અને જેણે ટીકા કરી છે તે વ્યક્તિ પોતે પોતાની ફરજ બજાવ્યાનો આનંદ મેળવે, આવીરીતની ગોઠવણ ઈશ્વરે કરી છે.

    

પણ જેઓ પાસે શરીર છે તેઓ જ ટીકાકરનારને સમજીને પોતાના મગજને સુધારી શકે.

 

એટલે ટૂંકમાં જો ઈશાવાસ્ય વૃત્તિ કેળવીએ તો કમસે કમ જેઓ ઈશ્વર પાસે પહોંચી ગયા છે તેમની ટીકા ન કરીએ તો સારું.

 

સૌ કોઈ પોતાની રીતે યોગ્ય હોય છે. તેઓ વિચારોના આદાનપ્રદાન થકી પોતાના જ્ઞાનમાં વૃદ્ધિ કરે છે અથવા નથી પણ કરતા. પણ ઈશ્વર ની ગોઠવણ એવી છે કે સમાજ આગળ વધતો જાય. ક્યારેક બે ડગલા આગળ જવાના મૂળમાં એક ડગલું કે વધુ ડગલાં પાછળ પણ ગયો હોય છે. સંભવ છે કે આપણે ઘણી પીછે હઠ કરી હોય અને તે હાલ ચાલુ પણ હોય પણ ઈશ્વરની ગોઠવણ આપણને પતન વિષે વધુ સમજણ પાડવાની હોય એ વાત આપણે નકારી ન શકીએ.

 

આઠવલેજીના વિચારો અને કાર્યશૈલી વિષે વિચાર ભેદ હોય. પણ આઠવલેજીની પ્રવૃત્તિ નિસ્વાર્થ હતી. જો તેમને કિર્તિની અપેક્ષા હોય તો તે ક્ષમ્ય છે. તેમને દાન આપવું કે ન આપવું તે સ્વૈચ્છિક હતું. હવે તમે જો દાન આપ્યું હોય તો તમે તેમાં તમારી શરતો મુકી ન શકો. તમારે તેમની શુદ્ધબુદ્ધિ પર જ બધું છોડી દેવું જોઇએ. જો દાન ન આપ્યું હોય તો તો તમે તેમની કાર્ય પધ્ધતિની ટીકા કરી જ ન શકો. કારણ કે તેમણે ઉઘરાવેલા પૈસા કંઈ સરકારના લાગાઓની જેમ ફરજીયાત ઉઘરાણું ન હતું. જો આવું હોત તો તમને તેમની ટીકા કરવાનો હક્ક મળત કે જેથી તમે તેમની ટીકા કરી શકો.  

 

પણ એક  વાત સમજવા જેવી છે કે  જ્યારે મિલ્કત અને તેની ઉપર સત્તા ચલાવવાની વાત આવે ત્યારે ભલભલા મહાપુરુષો શિષ્યોને સમજવામાં ગોથાં ખાઈ જાય છે. અને પછી મહાપુરુષોની બદબોઈ કરવાની ઘણાને લાલચ થાય છે.

 

દાખલા તરીકે મહાત્મા ગાંધી. તેમણે કહેલ “જવારહર વડાપ્રધાન થાય.” આ વાત ૧૯૪૭ ની છે. અને ૧૯૪૭ થી ૧૯૫૨ સુધી લાગુ પડે. જવાહરલાલ નહેરુ સત્તાભૂખ્યા હોય તે કદાચ સમજી શકાય. પણ જો તેઓ બંધારણીય માર્ગે સત્તા હાંસલ કરે પછી ગાંધીજીને દોષ ન દઈ શકાય. પણ કેટલાક આરએસએસ બંધુઓ આ વાત ઉપર ગાંધીજી ઉપર પારાવાર માછલાં ધૂએ છે. જાણે કે ૧૯૫૨માં અને તે પછી પણ, આવા આરએસએસ બંધુઓ અને તેમના જેવા વિચારવાળાઓનું કોઈ કર્તવ્ય જ ન હતું. જાણે કે ૧૯૪૭ થી ૧૯૫૨ સુધીના સમયે અને તે પછીના સમય માટે તેમને વ્યંઢ કરી દીધા ન હોય!

 

ભારત જેવી ગરીબ પ્રજા હોય તે ભૂલ કરે તે સમજી શકાય પણ નહેરુવંશનું શાસન છ છ દશકા સુધી દેશ ઉપર ચાલુ રહે તેમાં આરએસએસ જ નહીં પણ જે જે બુદ્ધિજીવીઓએ નહેરુને આવકાર્યા તે સૌ ગુનેગાર છે. કારણ કે તીબેટ ઉપર ચીનનું સાર્વભૌમત્વ સ્વિકારવું, ચીન સાથેની સરહદ રેઢી મૂકવી, સંસદમાં શઠતા પૂર્વકના ઉચ્ચારણો કરવા અને ચીન સામે હારી ગયા પછી વ્યંઢ પ્રતિજ્ઞાઓ લેવી આમાંનું દરેક કાર્ય તેમને હરાવવા માટે વિદ્વાનોએ આમરણાંત પ્રયત્નો કરવા જરુરી હતા. પણ તેમણે તેવું ન કર્યું.

 

ખ્યાતિ અને સત્તા ઘણાને પ્રિય હોય છે. અને યથાયોગ્ય રીતે શુભ્ર રસ્તે મેળવેલી ખ્યાતિ અને સત્તા ક્ષમ્ય છે. પણ નહેરુએ શઠતા પૂર્વક એટલે કે વિરોધીઓને વગોવડાવીને અને કાવાદાવા (કામરાજ પ્લાન)દ્વારા વિરોધીઓને દૂર કરીને પક્ષમાં સર્વેસર્વા રહેલા તે યોગ્ય ન કહેવાય. અને તેમાં પણ પોતાની પુત્રીને તેની કોઈ યોગ્ય્તા વગર આગળ કરવી અને બધો કારભાર સોંપવો અને પોતાની અનુગામી સ્થાપવાની ભલામણ કરવી યોગ્ય ન જ કહેવાય. આ વાતની લાલબહાદુર શાસ્ત્રીએ પૂષ્ટી કરેલી છે.    

 

ઈન્દીરાગાંધીના કુકર્મો વિષે તો મહાભારત લખાય. પણ તેના અનુયાયીઓ જ્યારે તેના જ માર્ગે ચાલે ત્યારે તેમની સાત પેઢીને વગોવવામાં આનંદ મેળવવો તેના યોગ્ય સ્થાને છે.

કારણ કે આપણે તો કંઈ ખ્યાતિ મેળવવી નથી. કે નથી આપણે સત્તા મેળવવી. આપણને પૈસા તો મળે એમ છે જ નહીં. કદાચ સ્વીસબેંકના પૈસા ઉપર નજર બગાડીએ અને નહેરુવંશી કોંગ્રેસના વખાણ કરીએ તો જુદીવાત છે. હાલમાં કેટલાક ગુર્જરભાષાના ખ્યાતનામ મૂર્ધન્ય અને વિશ્લેષકોની જેમ તેના કુકર્મોની ચર્ચાને આડે માર્ગે લઈ જઈએ કે વિસંવાદ ઉભો કરીએ તો ધનપ્રાપ્તિના સંજોગો ઉભા થતા હશે.

 

 

આપણા ઘણા બાવાજીઓ આપાણા ધર્મ અને સાહિત્ય વિષે આપણે સંમત ન થઈએ તેવી વાતો કરે છે. વળી કેટલાક બાવાજીઓ તો પોતાને આધુનિક કહેવડાવવા માટે ભૂતકાલિન મહાપુર્ષોને વગોવીને સમાચાર પત્રોમાં એન્ટ્રી મારે છે.

 

આમાં રજનીશ પ્રથમ સ્થાને આવે છે.

 

મારી જાણ પ્રમાણે ૧૯૬૦ના અરસામાં રજનીશે મહાત્માગાંધીની ટીકાઓ કરીને જાહેર જીવનમાં એન્ટ્રી મારેલ (માથું મારીને પ્રવેશ કરેલ)

 

શું હતી આ વાતો?

 

ગાંધીજીની અહિંસા એ સાચી અહિંસા નથી. ગાંધીજીની અહિંસામાં પણ હિંસા રહેલી છે.

કેવીરીતે?

 

તમે તમારી વાત સમાજાવવા ચર્ચા કરો છો અને ચર્ચામાં દાખલા દલીલ કરો છો. હવે દાખલા અને દલીલ કરવામાં તો એવું છે કે જે વધારે ભણેલું હોય અને વધુ માહિતિ હોય તે દલીલો કરીને પોતાની ખોટી વાતને સાચી સિદ્ધ કરીને સામે વાળાને પરાસ્ત કરી દે.   

સામે વાળાને પરાસ્ત કરવો એ પણ એક હિંસા છે. ખોટી વાતને સાચી કરી બતાવવી એ પણ હિંસા છે. સાચી અહિંસા એ છે કે તમે સામી વ્યક્તિના દિલનું પરિવર્તન કરો.

દા.ત. ફલાણા ફલાણા એક પાદરીએ પોતે એક વ્યક્તિથી સેંકડો માઈલ દૂર હોવા છતાં પણ પોતાની ગુઢશક્તિથી તેના વિચારોનું પરિવર્તન કરી તેને સન્માર્ગે દોરેલ. તો આને સાચી અહિંસા કહેવાય.

 

(હવે આ વાતને ચકાસીએ તો પેલા પાદરી ભાઈને એટલે કે સાધક્ને, પેલા સેંકડો માઇલ દૂર રહેલાને (સાધ્યને) અને ગુઢ શક્તિને (સાધન) ગોતવા જવું પડે. અને તે આપણને હાથવગા ક્યારે થશે તે વિષે આપણે જાણતા નથી અને જાણી શકીશું કે કેમ તે વિષે આપણા રજનીશભાઈ કદીયે ફોડપાડ્યો નથી. તેમના શિષ્યો ફોડ પાડવાનું જરુરી માનશે પણ નહીં (સાહેબ કંઈ થોડું ખોટું બોલતા હોય? હેં?).

 

રજનીશની બીજી વાતઃ

ગાંધીજીનો સત્યાગ્રહ એ પણ એક દબાણ અને દુરાચાર છે અને તેથી એક હિંસા છે.

એક વેશ્યા હતી. તેણે એક ભાઈ પાસે લગ્નની માગણી કરી. પેલા ભાઇએ ના પાડી. ઍટલે પેલી વેશ્યાએ ઉપવાસની ધમકી આપી. અને ઉપવાસ ઉપર બેઠી અને કહ્યું તું જ્યાં સુધી લગ્ન માટે હા નહીં પાડે ત્યાં સુધી હું ઉપવાસ કરીશ.

 

જ્યારે રજનીશભાઈ આવી વાત કરે ત્યારે એમ જ લાગે કે તેમણે કદી ગાંધીજીને વાંચ્યા જ નથી. ગાંધીજીએ ઉપવાસ માટે ના નીતિ નિયમો અને લાયકાતો ઘડી છે. ઉપવાસનું શસ્ત્ર ઉગામીએ તેમાં પોતાનો અંગત સ્વાર્થ તો ત્યાજ્ય જ છે. તે મુખ્ય મુદ્દો જ રજનીશભાઈને ખબર ન હોય તો તેમના શિષ્યોએ તો નાહી નાખવું જ પડે. ગુરુને દાળમાં કોળું જાય તો પછી શિષ્યોની દશા શું થાય?

 

રજનીશભાઈ ની ખાદી વિષે અને સગવડોના ઉપભોગ ના ખ્યાલો વિષે પણ કંઈક આવું જ છે. તે વિષે તો ગાંધીજીને વાંચવા જ જોઇએ. માણસના મૂળભૂત અધિકારો અને માનવીય અધિકારો અને માનવીય મૂલ્યો વિષે રજનીશભાઇ ની સમજણ આત્મવંચના જેવી હતી. ઉપભોગની બાબતમાં ગાંધીજી અને ઔરંગઝેબ સમાન વિચારના હતા. અન્ના હજારે કહે છે તેમ સૌ સૌની મર્યાદામાં રહે અને દેશના ગરીબને હંમેશા નજરમાં રાખે. સૌ કોઇ આપણા ઋષિ-મૂનીઓ, ચાણક્ય, ઔરંગઝેબ, ગાંધીજી, જૈન મહરાજ સાહેબો અને વિનોબાભાવે જેવા  કદાચ ન બની શકે પણ દીશા તો એ જ હોવી જોઇએ.

 

ત્રીજી વાતઃ એક માણસ હતો. તેને કોયલનો ટહૂકો ગમતો એટલે કોયલ બહુ ગમતી હતી. તેણે કોયલના બચ્ચાં જોયાં એટલે તે પકડીને લઈ ગયો. આગળ જતાં તે બોલ્યાં કૉ કૉ કૉ કૉ. એટલે તેને ખબર પડી કે આ તો કાગડા છે. તેણે તેમને મુક્ત કર્યા. શું સમજ્યા તમે? “બોલવાથી મુક્તિ મળે છે.”

 

આત્મનઃ મુખદોષેણ બધ્યન્તે સુખસારિકા, બકાસ્તત્ર ન બધ્યન્તે મૌનં સર્વાર્થ સાધનં

 

પોતાના (સુરીલા) મુખના અપરાધથી પોપટ અને મેના બંધનમાં આવે છે. બગલાને કોઈ પાળતું નથી. માટે મૌન  બધા ફળનું સાધન છે. આ શ્લોકની રજનીશભાઇને ખબર નહીં હોય. શું થાય?

 

ચોથીવાતઃ

 

રજનીશજી બોલ્યાઃ “માણસ જીવતો હોય ત્યારે મરવાના વિચારો કરે છે અને મરતો હોય ત્યારે જીવવાના વિચારો કરે છે.”

 

રાજા શું કે કલમાડી શું? નરેન્દ્ર મોદી પણ જીવે છે અને મરવાના વિચારો કરતા નથી.

અગણિત લોકો છે જેઓ જિંદગીને જીવી જાણે છે. તે પછી ચાર્વકઋષિની જેમ કે ચાણક્ય ઋષિની જેમ. રજનીશભાઈએ કોને જોયા હશે તે આપણે જાણતા નથી.

 

પાંચમી વાતઃ

 

સંભોગથી સમાધિઃ

 

આ વિષય જરા એવો છે કે જે સુરુચિનો ભંગ કરે તેવો છે. પણ ઘણાને ગમે એવો છે. કારણ કે આમ તો આવા વિષયને પ્રણાલિગત રીતે જોઈએ તો તેઓ બિભત્સ ગણાય. પણ વર્તમાન કાળમાં શરીરના અંગોના નામને બિભત્સ માનવા આવે છે તેમ સંસ્કૃત સાહિત્યમાં તેવું ન હતું.

 

રજનીશભાઈની વાત કરતાં પહેલાં આપણે સંસ્કૃતભાષા જ્યારે પ્રચલિત હતી ત્યારે શું હતું? તે જોઇએ.

 

યોનીઃ જ્યાંથી નિકળ્યું તે. બ્રહ્મયોની. અગ્નિ એ બ્રહ્મમાંથી પ્રગટ થયો. તેથી બ્રહ્મ એ બ્ર્હ્મ યોની કહેવાય છે. અને અગ્નિને વેદોમાં બ્રાહ્મણ પણ કહેવાય છે.

 

અણ્ડઃ જેમાંથી સજીવ બને છે. બ્રહ્માણ્ડ. બ્રહ્મે ઈન્ડું મુક્યું અને તે ઈન્ડામાં બધું ઉત્પન્ન થયું. તે આ બ્રહ્માણ્ડ. બ્રહ્મનું અણ્ડ.

 

શિશ્નઃ જે રસ-પ્રવાહી-વિર્ય છોડે છે અને જ્યાં પડે છે ત્યાં ઉગી નિકળે છે. વ્યોમ એ ઈશ્વરનું શિશ્ન છે.

 

સ્તનઃ પર્વતો તે ધરતી માતાના સ્તન છે. તેમાંથી નદી રુપી ધારા થી મીઠું પાણી નિકળે છે અને વનસ્પતિઓ અને પ્રાણીઓ તુષ્ટિ પામે છે.

 

વીર્ય, તેના સ્ખલન વિષે અને સંગ્રહ વિષે સંસ્કૃતના પુરાણોમાં અને વૈદકમાં ઘણી વાતો કરી છે. પુરાણોની વાતો જવા દઈએ. કારણ કે પુરાણોને ભારતીય તત્વજ્ઞાનમાં આધાર માનવામાં આવતા નથી. પણ આયુર્વેદ કહે છે કે તેને વેડફવું ન જોઇએ.

શાસ્ત્ર એમ કહે છે “પરદાર પરદ્રવ્ય પરદ્રોહ પરાંગમુખઃ ગંગા બ્રુતે કદાગત્ય મામયં પાવયિષ્યતિ.

 

ગંગા એ કહ્યું; “પારકાની પત્નિ, પારકાના ધન અને પારકાના દ્રોહ થી મોઢું ફેરવાનાર મારી પાસે આવીને મને ક્યારે પવિત્ર કરશે.”

 

આ વાતને જો આત્મસાત કરવામાં આવે અને તેની શક્તિ જ્યારે અનુભવવામાં આવે ત્યારે જ તમે જાતીય આવેગ ઉપરના તમારા પ્રભૂત્વને સમજી શકો.

 

આ થઈ ભારતીય શાસ્ત્રની વાત. હવે રજનીશ શું કહે છે?

 

રજનીશ એમ કહે છે જેનો તમે ત્યાગ કરવા પ્રયત્ન કરો તેમ તમને તેનું આકર્ષણ વધશે. આવું કહીને તેઓ એક બે ટૂચકા કહી સંભળાવશે. અને વાતે વાતે પ્રાસ મેળવવા માટે શિશકારા બોલાવશે. અને તેમના શ્રોતાઓને સમજાવશે સાધ્યં ઈતિ સિદ્ધં.  

 

કદ્દચ ફ્રૉઈડના દાખલા આપશે.

પણ કૃષ્ણ અને ફ્રોઈડની કોઈ તુલના નથી. જેઓ ફ્રોઈડને વાંચે છે તે કૃષ્ણને વાંચતા નથી. અને જેણે કૃષ્ણને વાંચ્યા છે તેના ઉપર ફ્રોઈડ અસર કરતો નથી. રજનીશે કદાચ ફ્રોઈડને વાંચ્યો હશે. પણ કૃષ્ણને ધૌમ્ય ઋષિ એ કહેલા “વાંચવા”ના અર્થમાં વાંચ્યા નહીં હોય. જો આમ ન હોત તો રજનીશને દાળમાં કોળું ન જાત.

 

જાતીય વૃત્તિ ની બાબતમાં એક વસ્તુ સમજી લેવી જોઇએ કે આપણું શરીર અસંખ્ય અને અસંખ્ય જાતના કોષોનું બનેલું છે. આ કોષો આપણને જેનેટીકલી વારસામાં મળેલા હોય છે. કોષો બધા રસાયણોના બનેલા છે. એટલે આપણા શરીરને આપણે રસાયણોનું બનેલું કહીએ તો ખોટું નથી. આ રસાયણોને આધારે આપણો સ્વભાવ બને છે. આપણો ખોરાક, આપણી પ્રવૃત્તિ અને આપણા વિચારો આ રસાયણો ઉપર વત્તા ઓછા પ્રમાણમાં અસર કરે છે. કોણ કેટલું અસર કરે છે તે આપણે હજુ શોધી શક્યા નથી. સૌ કોઈ પોતાની વૃત્તિઓ ઉપર ખોરાકથી, ક્રિયાઓ થી અને વિચારોથી કેટલો વિજય મેળવશે તે કહી શકાય નહીં.

 

અર્જુને પૂચ્છ્યું કે ” માણસ પોતાની વૃત્તિઓ ઉપર કાબુ કેવી રીતે મેળવી શકે? ત્યારે કૃષ્ણ ભગવાને કહ્યું “અભ્યાસથી માણસ તેની વૃત્તિઓ ઉપર કાબુ મેળવી શકે.” અભ્યાસ એટલે શું? વારંવાર કરવું તે અભ્યાસ. યાદ નથી રહેતું? વારંવાર યાદ કરો એટલે એ વાત યાદ રહી જશે. નાનપણની વાતો શા માટે યાદ છે અને મોટપણની વાતો શામાટે ભૂલાઈ જાય છે? કારણ કે નાનપણની વાતો વારંવાર યાદ કરી હોય છે. અભ્યાસ થી ટેવ પડી શકે છે. બુદ્ધિવડે મનને જીતી શકાય છે. મનની આદતો ટેવ પાડવાથી બદલી શકાય છે. મન ઉપરના તમારા પ્રભૂત્વ ઉપર તમે શ્રદ્ધા રાખો. મન તો તમારું નોકર છે. નોકરે તો તમે કહો તેમ જ કરવું જોઇએ. શું તમે તમારા નોકરના કહેવા પ્રમાણે કરશો? વિનોબાએ કહ્યું.

 

ગાંધીજી વિલાયત ગયા ત્યારે તેમને બાફેલું અને મસાલા વગરનું જમવાનું ફાવતું ન હતું. પણ ધીમે ધીમે આદત પડી એટલે ફાવી ગયું. કોઈપણ બાબતમાં તમે બુદ્ધિથી અને મનથી પ્રયત્ન કરો તો તે સિદ્ધ થઈ શકે છે.       

 

હસ્તદોષ એ ફક્ત ભૌતિક ક્રિયા નથી. દરેક ક્રિયા મન ઉપર અસર કરે છે. હસ્ત દોષથી આત્મવિશ્વાસ ઘટે છે. હસ્તદોષ એ સંભોગનું એક દિવાસ્વપ્ન છે. અને દિવાસ્વપ્ન ખતમ થતાં તમે વાસ્તવિકતા ઉપર પછડાઓ છો. અને પછડાટ એક જાણ્યા અજાણ્યા આઘાતની અસર ઉભી કરે છે. એકથી વધુ સંગી સાથેનો સંભોગ એ પણ તેના જેવો જ બને છે અને તે તમારા નીતિમત્તાના મૂલ્યોને આઘાત પહોંચાડે છે.

 

પણ જાતીય વૃત્તિનું દમન કરવા ઉપર વ્યક્તિનું પોતાનુ પ્રભૂત્વ કેટલું? અને વિચારોનું પ્રભૂત્વ કેટલું? આ વાત તેના રસાયણિક બંધારણ ઉપર આધાર રાખે છે. વિચારો તેને ક્રમશઃ  આગળ કે પાછળ લઈ જાય છે. અને વિચારો તમારી પ્રવૃત્તિ અને અભ્યાસ ઉપર આધાર રાખે છે. જે વાત તમે બુદ્ધિ અને અભ્યાસ વડે આત્મસાત કરી તેની ઉપર ફ્રૉઈડભાઇની અને રજનીશભાઈની ફીલોસોફી અને તારણો કામ કરતા નથી.

 

શું સંભોગ એ યોગ છે?

 

સંભોગથી આનંદ મળે છે. શરીરમાં એક આનંદની લહેર પ્રસરે છે. અને આ આનંદથી કોઈને નુકશાન થતું નથી. તો તેને યોગ શા માટે ન કહેવો. તમારા જીવનસાથી સાથેનો સંભોગ શાસ્ત્રીઓએ બ્ર્હ્મચર્ય સમાન જ ગણ્યો છે. જો પરસ્પરના આનંદ માટે હોય તો કદાચ નુકશાન કારક ન પણ હોય. પણ આને યોગ ન કહેવાય. કારણ કે વ્યસન અને નિદ્રા પણ એમતો આનંદ આપે છે પણ તેનો અતિરેક તમને નુકશાન કરે છે. જો આ બધું યોગ હોય તો કશું નુકશાન થતું ન હોત.

 

જો આમ ન હોય તો?

ખંજ યોગ પણ એક યોગ છે. ખરજવું થાય અને જો તેને ખંજોળીએ તો તેના જેવો આનંદ

ભાગ્યે જ બીજો કોઈ હોય છે. જો આનંદ માત્ર યોગ હોય તો ખંજવાળને પણ યોગ જ ગણાય. ખંજ યોગ. કોઈ આ વાતને નકારશે નહીં.

 

જે સત્ય નથી તેને સત્ય ઠેરવવું અને તેનો પ્રચાર કરવો તેને માન્યતા અપાવવી આ પણ એક પ્રકારની અંધશ્રદ્ધા જ છે. અને ભલભલા મૂર્ધન્યો તેમાં ડૂબેલા છે. 

 

વાસ્તવમાં સૌનું ધ્યેય આનંદ પ્રાપ્ત કરવાનું હોય છે. માર્ગો અનેક છે પણ ધ્યેય તો એક જ છે. પણ સમગ્ર સમાજને આનંદ પ્રાપ્ત થાય તે ઈશ્વરની યોજના છે.

 

મૂર્ધન્યો ભૂલા પડે અને બીજા લોકો તેમાંથી કંઈક શિખે જેથી ભવિષ્યના મૂર્ધન્યો વધુસારું વિચારી શકે અને સમાજને આદર્શ અને સુખી સમાજ તરફ દોરી શકે.

 

ભણેલાઓ આપણે હિસાબે અંધશ્રદ્ધા ફેલાવે છે. પણ અંધશ્રદ્ધા ની વ્યાખ્યા અઘરી છે. ઘણા લોકોને મન રાષ્ટ્રપ્રમુખ અને બીજા મહાનુભાવોને મળતી અને માન્ય રખાતી સગવડો અને વિશેષ અધિકારો પણ એક જાતની અંધશ્રદ્ધા જ હોઈ શકે છે. અને વળી આવી અંધ શ્રદ્ધાનું પાલન તો આપણા ખર્ચે થાય છે.

 

જેઓ ઉપરવાસી (પરલોકવાસી નહીં કહું કારણ કે પરલોક જેવું કશું છે જ નહીં) થઈ ગયા તેમની નિંદા ન કરીએ. તે વાત પ્રાચીન, મધ્યકાલીન અને અર્વાચીન ઋષિ-મુનીઓની છે. દા.ત.  આઠવલેજીની નિંદા ન કરીએ અને કાર્યશૈલીની ટીકા ન કરીએ. કાર્ય શૈલીની  જો ટીકા કરવી હોય તો આઠવલેજીને અલિપ્ત રાખીને ટીકા કરીએ તો તે ક્ષમ્ય છે. ઋષિ મુનીઓને જે તે સમયે જે યોગ્ય લાગ્યું તે કર્યું. હાલ તેઓ જવાબ આપી શકે તેમ નથી.

 

મોરારીબાપુની પણ નિંદા ન કરીએ. જોકે તેમણે કહ્યું કે મારો રામ વાલીને મારે નહીં. પણ રામ તો મોરારીબાપુ નો હતો જ નહીં. તુલસીદાસનો પણ ન હતો. અને રામ, વાલ્મિકી કે બીજા કોઈનો પણ ન હતો. રામ તો હાડમાંસ નો બનેલો અને દશરથ નો પુત્ર હતો. અને ઐતિહાસિક હતો. એટલે આજના સમયના મૂલ્યો માટે તે ભૂલો કરે તો તેમાં રામનો વાંક નથી. અને રામની ભૂલ પણ નથી. રામની પાસે ઈશ્વરને જે કરાવવું હતું તે કરાવ્યું. રામે કયા કારણસર વાલીને કેવી રીતે માર્યો તે રામ જાણે. હરિ હરિ કરો અને મંજીરા વગાડો. હરહર મહાદેવ કરીને તૂટી પડવાની જરુર નથી.

 

પ્રાચીન ઋષિ-મુનીઓની જે પૌરાણિક વાતોના વર્ણનોમાં અને સંવાદોમાં શું તથ્ય છે તે જાણવું અશક્ય છે. તેથી જે સારુ છે તે માટે તેમને બિરદાવવા અને ખોટું લાગે તે ભૂલી જવું. પણ જે ખોટું લાગે તેમાં તેમના અનુયાયીઓની જો તેઓ તેનો આધાર લઈ શૈક્ષણિક બચાવ કરે તો અનુયાયીની શૈક્ષણિક ટીકા કરવી. ઋષિ-મુનીઓની અને રાજાઓની ઘણી વાતો તો દંત કથાઓ પણ હોઈ શકે.

 

દા.ત. શંકરાચાર્ય મંડનમિશ્ર ના ઘરે ગયા ત્યારે નીચે પ્રમાણેની રમૂજ પ્રચલિત છે.

 

મંડનમિશ્ર ઉવાચઃ “કુતઃ મુણ્ડી”

[મંડનમિશ્ર બોલ્યાઃ આ મુંડ્યો (ટકલુ) ક્યાંથી (આવ્યો)?]

 

શંકરાચાર્યઃ ઉવાચઃ “આગલાત્‌ મુણ્ડી”

[શંકરાચર્ય બોલ્યાઃ ગળાથી શરુ કરીને (માથા ઉપરસુધી મુંડન કરાવ્યું છે)]

 

મંડનમિશ્ર ઉવાચઃ માર્ગં તે પૃચ્છતે મયા. [મંડનમિશ્ર બોલ્યાઃ હું તો તારા રસ્તાને (વિષે) પૂછું છું.

 

શંકરાચાર્ય ઉવાચઃ કિં આહ માર્ગં [શંકરાચાર્ય બોલ્યાઃ (જો તમે રસ્તાને પૂચ્છ્યું તો રસ્તાએ શું કહ્યું?]

 

મંડનમિશ્ર ઉવાચઃ માતા તે મુણ્ડી ઈતિ આહ માર્ગં. [મંડનમિશ્ર બોલ્યાઃ માર્ગે તો કહ્યું તારી (શંકરાચાર્યની) માતા મુંડી.

 

શંકરાચાર્ય ઉવાચઃ સત્યં બૃતે માર્ગં. ત્વયા માર્ગં પૃચ્છિતં, માર્ગં તુભ્યં અબ્રવિત્‌ યત્‌ તે માતા મૂણ્ડી. તસ્માત્ તે માતા મૂણ્ડી ઈતિ સિદ્ધં.

 

શંકરાચાર્ય બોલ્યાઃ તેં માર્ગને પૂચ્છ્યું અને માર્ગે તને કહ્યું કે તારી માતા મુણ્ડી. માર્ગ સાચું જ કહે છે કે તારી માતા મુણ્ડી.

 

…………

 

………….

 

સંવાદ તો આગળ ઘણો લાંબો છે. પણ આ કંઈ સાચી વાત નથી. રમૂજ ખાતર દંત કથાઓ જોડવાની આપણી પ્રણાલી ઘણી જુની છે. અને કટાક્ષ ચિત્રો ઘણી વખત એક પ્રકારની દંતકથા જેવા જ હોય છે.

 

દેવ દાનવ અને માનવ બ્રહ્માજી પાસે ગયા અને કહ્યું અમને બોધ આપો.

બ્રહ્માજીએ કહ્યું; દ દ દ

 

દેવ સમજ્યા આપણે ભોગવિલાસમાં છીએ એટલે આપણે “દ” એટલે કે દમન. આપણી વૃત્તિઓનું દમન કરવું જોઇએ.

 

દાનવો સમજ્યા કે “દ” એટલે દયા. આપણે ક્રૂર ન બનવું અને દયા કરવી.

 

માનવો સમજ્યા (તે વખતના) કે આપણે સંગ્રહ કરવાને બદલે “દ” એટલે દાન કરવું જોઇએ. 

 

સૌએ લાગુ પડતો શ્રેષ્ઠ અર્થ લીધો.

 

ટૂંકમાં એમ કહેવાય કે નિંદારસ આનંદ માટે છે. સારસારકો ગ્રહણ કરે થોથા દે ઉડા. જે

 

સારુ છે તે ગ્રહણ કરવું અને નકામુ છે તેને ભૂલી જવું.

 

પણ જો આપણે આવો નિયમ માન્ય રાખીએ તો દરેક નિયમને અપવાદ પણ હોય છે. તો આમાં અપવાદ શું. નહેરુવંશી કોંગ્રેસ એક અપવાદ છે. આપણે સ્વતંત્રતા મેળવી તે શા માટે? અંગ્રેજો શું ખોટા હતા! હાજી. તેમનો વાંક હતો.

 

૧   આપણો કાચોમાલ બહાર જતો હતો

 

૨   વિદેશથી તૈયાર માલ આપણા દેશમાં વેચાતો હતો.

 

૩   દેશનો પૈસો બહાર જતો હતો.

 

૪   કાયદાઓ અન્યાયકારી હતા અને સરકાર દંભી હતી.

 

૫   જનતા ગરીબ હતી.

 

૬   જનતા બેકાર હતી.

 

૭   ગરીબીથી અંધશ્રદ્ધા હતી.

 

૮   રાજાઓનું વંશપરંપરાગત શાસન હતું.

 

૯   અંગ્રેજો ભારતમાં વેપારી હતા. તેથી પ્રજા ભીખારી હતી.

 

આજે શું છે?

 

૧   આપણો કાચો માલ આજે પણ નિકાસ થાય છે. ખાણોમાં માફીયા રાજ છે.

 

૨   આપણી સરકાર વૈશ્વીકરણના નામે વિદેશથી આયાત કરે છે તેથી રુપીયો ગગડે છે. ડોલર તકલીફમાં હોવા છતાં પણ રુપીયો ગગડે છે.

 

૩   આપણા નહેરુવંશના શાસકો અને તેના મળતીયાના વિદેશી બેંકોમાં ખાતા છે. અને તે પૈસો દેશમાં ન આવે તે માટે આ નહેરુવંશની સરકાર તનતોડ પ્રયત્નો કરી રહી છે.

 

૪   કાયદાઓ અને પ્રણાલીઓ આજે પણ અન્યાય કારી છે. લોકપાલ ને લગતા કાયદાના શા હાલ કર્યા. અન્ના હજારે અને બાબા રામદેવ ના શા હાલ આ સરકારે કર્યા તે આપણે જાણીએ છીએ. અને છતાં પણ છાતી ઠોકીનેઆ સરકાર કહે છે કે “અમે ભ્રષ્ટાચાર સામે પ્રતિબદ્ધ છીએ.” આ સરકાર તો દંભી જ નહીં પણ નીંભર પણ છે. અને તેના શબ્દોના અર્થ શબ્દકોષના અર્થો સાથે મેળખાતા નથી.

 

૫   આજે ૬૦ વર્ષના શાસન બાદ પણ ૮૫ કરોડ જનતા ગરીબ છે. અને સરકારે જનતાને સરકારી ખેરાતોના મોહતાજ રાખ્યા છે.

 

૬   પાયાની સગવડોના અભાવે આજે પણ બેકારી છે. અને મોટાભાગનાનું ભવિષ્ય સુનિશ્ચિત નથી.

 

૭   ભણેલાઓ પણ અંધશ્રદ્ધાવાળા છે.

 

૮   નહેરુવંશનું શાસન ચાલે છે. તેના જેવા બીજા વંશપરંપરાગત શાસનવાળા પક્ષો ઉત્પન્ન થયા છે. અને મૂર્ધન્યો પણ તાટસ્થ્યના દંભ અને ઘેલછામાં જનતાને સચોટ માર્ગદર્શન આપવામાં પારાવાર ઉણા ઉતર્યા છે અને શાસકોના પાપના ભાગીદાર બન્યા છે.

 

૯   આપણી આ સરકાર પણ વેપારી છે અને તેથી પ્રજા ભીખારી છે. સંસદના સભ્યો પ્રજાના પ્રતિનીધિ છે પણ તેઓ જવાબદારી વગરના છે. કોઈ પણ સરકારી સંસદ લોકપાલ બીલની ઉપર ગુણદોષની ચર્ચા માટે તૈયાર નથી. એટલું જ નહીં સરકાર મતદાન કરાવવા પણ તૈયાર નથી. જો સરકારી સંસદો પોતાની જવાબદારી નીભાવતા નથી તો પણ પોતાની આવકો અને સગવડો વધારે જ જાય છે.

 

 

 

માટે ખુલ્લા દીલથી આ નહેરુવંશી સરકાર અને તેના ભૂતપૂર્વ અને વર્તમાન મળતીયાઓની ભરપેટ નિંદા કરો.

 

જય જગત જય હિંદ

 

 

 

શિરીષ મોહનલાલ દવે

 

નથી જાણ્યું અમારે પંથ શી આફત ખડી છે ખબર છે એટલી કે માત ની હાકલ પડી છે

નથી જાણ્યું અમારે પંથ શી આફત ખડી છે ખબર છે એટલી કે માત ની હાકલ પડી છે

ટેગ; ઋષિ મૂનિઓ, પ્ર્રચીન, ભારત, નહેરુવંશ, ચાણક્ય, મહાત્મા ગાંધી, અન્ના, રામદેવ, મોરારજી દેસાઈ, ઈન્દીરા ગાંધી, રજનીશ, આઠવલેજી, મોરારી બાપુ, અંધશ્રદ્ધા, ઈશ્વર

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O!! LEARNED COLUMNIST, HAVE YOU ANY DREAM FOR YOUR NATION?

O!! LEARNED COLUMNIST, HAVE YOU ANY DREAM FOR YOUR NATION?

मूर्धन्योंकी तटस्थताकी घेलछा और देशकी पायमाली

आप भारतीय समाचारपत्रके लेखकों के लेख पढते होंगे. वे लोग राजकीय समस्याओं के उपर भी लिखते है. इसमें कोई शक नहीं कि एतत्‌ कालिन परिस्थिति में यह आवश्यक भी है. और श्रेयकर भी होगा.

सांप्रत समयमें अधिकाधिक  लेखक जब राजकीय सांप्रतसमस्याके विषय पर लिखते हैं तब उनका प्राथमिक ध्येय अपना ताटस्थ्य दिखाने का होता है. वे लोग समझते है कि इसके कारण उनकी विश्वसनीयतामें वृद्धि होती है. लेकिन उनको यह ज्ञात नहीं रह्वता कि, मूर्धन्यों का प्राथमिक ध्येय लोक शिक्षा भी है. और समाजका उत्कर्ष भी है. 

इन ध्येयोंकी अवगणना करनेसे ये मूर्धन्य लोग यत्‌ किंचित लिखते हैं उसमें प्रमाणभान और प्राथमिकता की हीनता दृष्टिगोचर होती है.

आप क्या देखेंगे?

उदाहरणके आधारपर उत्तर प्रदेशका चूनाव प्रचारके संबंधित लेखोंका वाचन करें.

इसमें वर्तमानपत्रके लेखकों को विश्लेषण करनेमें लोक-शिक्षा, प्रमाणभान एवं प्राथमिकताके स्थान पर, भविष्यवेत्ता बननेकी और आप कितने कूट प्रगल्भ और तटस्थ विश्लेषक है ऐसा प्रदर्शित करनेकी घेलछा रहती है.

ये मूर्धन्यलोग सर्व प्रथम तो नहेरुवंशीय एतत्‌ कालिन संतान कैसे प्रचार करता है उसका वर्णन करेंगे. और उसको  श्रवण करने के लिये आने वाले श्रोतागण के समुदाय के बारेमें वर्णन करेंगे. यद्यपि यह संतान बिहारमें संपूर्ण विफल रहा है तथापि ये लोग उस विषय पर कोई उल्लेख नहीं करेंगे. इस नहेरुवीय संतानकी क्या उपलब्धीयां है, क्या पढाई है, क्या सत्य है क्या असत्य है, क्या योग्यता है, ईत्यादि कुछ भी उल्लेख नहीं करेंगे.
क्यूं?
ज्ञात नहीं. संभव है कि उनको स्वयं को भी ज्ञात नहीं. नहेरुवंशीय कोंग्रेसने एतत्‌ कालिन अद्यतन समयमें ही अमाप कद और संख्यामें जो क्षतियां और चौर कर्म किये उसकी चर्चा नहीं होंगी और उसके उपर लगी कालिमाकी भी चर्चा नहीं होगी. लेकिन अन्ना हजारेजी का आंदोलन कैसा विफल हो गया और उसमें क्या क्या अपूर्णता थी और उसके सदस्योंके उपर कैसे आरोप लगे है उसकी चर्चा हो सकती है. लोकपालके विषयपर उनके प्रतिभाव पर चर्चा हो सकती है. किन्तु नहेरुवंशी कोंग्रेसकी निस्क्रीयता और छद्मवृत्ति पर कोई चर्चा नहीं होगी. शक्य है कि नहेरुवंशी पक्षने कैसे सफलता पूर्वक व्यूहरचना करके, विपक्षोंकों परास्त करके उनकी खुदकी ईच्छाकी पूर्ति की इन सबकी वार्ता हो सकती है. इसके उपर शक्य है कि इस नहेरुवंशी कोंग्रेसकी प्रशंसा भी की जाय. 

किन्तु जब मायावती जो अपने स्वयं के प्रयत्नोंसे विजय प्राप्त करती हुई आयी है उसका कोई उल्लेख नहीं होगा. उसकी सीमाएं अपूर्ण या दुषित कर्यशैली का जरुर उल्लेख होगा.

मुलायम सिंगको स्पर्धामें प्रथम क्रम या द्वितीय क्रम दें या नदें लेकिन तृतीय क्रम तो नहीं ही देंगे.उसके पक्षकी कार्यशैली और उपलब्धियोंके उपर गुणदोषकी कोई चर्चा नहीं.

ये मूर्धन्य लोग, सबसे बूरा हाल भारतीय जनता पार्टीका करेंगे. वैसे तो नहेरुवंशी पक्षके अतिरिक्त यह एक ही पक्ष है जिसको पांचसालके लिये गठबंधनवाला शासन करनेका अवसर मिला था और उसने श्रेष्ठ शासन करके भी दिखाय था. तथापि उसकी उपलब्धियों का कोई उल्लेख किया नहीं जयेगा. उसके स्थान पर, “लोकपाल” विषय पर उसका प्रतिभाव शंकास्पद था ऐसा प्रतिपादिन करनेका प्रयत्न किया जायेगा. अरुण जेटली ने वक्तव्य दिया और प्रत्येक भ्रमका निःरसन किया उसका कोई उल्लेख नहीं कीया जायेगा. उसके स्थान पर, अडवाणी जी की यात्रा के उपर तथाकथित असाफल्य का वितंडावाद उत्पन्न किया जायेगा. भारतीय जनता पार्टीके नेतागणके अंतर्गत क्या क्या तथाकथित असंवाद अथवा विसंवाद है उसकी चर्चा की जायेगी या हो सकती है. नरेन्द्र मोदीको किस प्रयोजनसे या किस आधार पर चूनाव प्रचारमें आमंत्रण नहीं दिया गया, उसकी चर्चा हो सकती है. अगर आमंत्रण दिया तो सबसे पहेले क्यों नहीं दिया उसका प्रयोजन या रहस्य क्या हो सकता है ऐसी चर्चा उत्पन्न की जायेगी.किन्तु भारतीय जनता पार्टीके शासन वाले अन्य राज्योंमें नहेरुवंशी पक्षके शासनसे श्रेयकर शासन कैसे है उसकी चर्चा नहीं होगी.

ये मूर्धन्य लोग, नीतिहीनता सभी पक्षोंमें है, ऐसी चर्चा जरुर करंगे. इस तरह वे नितिहीनताका सामान्यीकरण करके नहेरुवंशी कोंग्रेस पक्षके कुशासनके उपर प्रहार नहीं करेंगे.
 
इस प्रकार प्रमाणात्मक दोषापरोणकी वार्ता त्याज्य ही रहेगी.

यदि मूर्धन्योंकी ऐसी ही प्रणाली और प्रतिभाव रहे तो प्रमाणभान और प्राथमिकताकी चर्चा कब होगी? अगर ६० वर्षके कुशासनके बाद और देशका सर्व क्षेत्रोंमें विनीपात होनेके बाद भी अगर मूर्धन्य लोग प्रजाजनोंको दीशासूचन नहीं कर सकतें और व्यंढ तत्वज्ञान विश्लेषण और तटस्थाका आडंबर प्रदर्शित करते रहेंगे तो देश कैसे प्रगतिके पंथ पर जायेगा? विनीपात चालु ही रहेगा. ऐसा ही देखा गया है. ऐसा क्यूं होता है? मूर्धन्योंकी क्या विडंबना है?

उपनिषद में कहा गया है, हिरण्मयेन पात्रेण सत्यसापिहितं मुखम्‌””””

हिरण्य का अर्थ सुवर्ण (तृष्णा, धनकी तृष्णा) भी होता है. जब (धनकी) तृष्णा होती है तो सत्य आवृत (अप्रकट रखा जायेगा) रहेगा.

नहेरुवंशी पक्षके उपर असीमित और अवैध साधनोंसे प्राप्त क्या हुआ धन और उसको विदेशी बेंकोमें रखनेके विषयमें अगणित आरोप हैं. यदि, मूर्धन्य लोग  अपना भाग लेनेका प्रयत्न करते हो तो इस शक्यताको कौन नकार सकता है? भाग लेनेके अनेक प्रकार होते है. जरुरी नहीं कि पुरस्कार नकदमें ही ग्रहण करें. 

शिरीष दवे  

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जिस देशमें गंगा बहेती है

जिस देशमें गंगा बहेती है


वोट की राजनीति करने वालोंको करो अलविदा (एक नुक्कड संवाद रुपी नौटंकी)

वॉटकी राजनीति कौन करता है और कौन करवाता है?

वॉटकी राजनीति नहेरुवीयन कोंग्रेस करवाती है.

नहेरुवीयन कोंग्रेस कौन है?

नहेरुवीयन कोंग्रेस वह है जिसका चूनाव चिन्ह पंजा है

इसको नहेरुवीयन कोंग्रेस क्युं कहेते हो?

क्योंकि जवाहरलाल नहेरुने इस पार्टी को अपनी घरेलु और वंशवादी पार्टी बना ली है.

घरेलु पार्टीका मतलब क्याहै?

घरेलु पार्टीका मतलब है जवाहरलाल मोतीलाल नहेरु के वंशसे संबंधित औलाद ही कोंग्रेस पार्टीका नंबरवन होद्देपर रह सकती है. यह स्थान उसके लिये १०० परसेन्ट आ रक्षित है. और वह ही सर्वेसर्वा रहेगी.

नंबरवन होद्दा और सर्वेसर्वा का मतलब क्या है?

नंबरवन मतलब उसके उपर कोई रहेगा नहीं, वह जो कहेगा वह सबको मानना पडेगा. अगर कोई उपलब्धि आ पडी तो इसका श्रेय इस नंबर वन को ही देना पडेगा. और इतना ही नहीं जो कुछ भी विफलता आयी सामान्यतः तो विफलता ही आतीं हैं तो उन सबकी जिम्मेवारी कोई न कोई नेताको अपने सरपर लेनी पडेगी.

इसका मतलब क्याविफलताकी जिम्मेवारी कैसे ठोकी जायेगी?

नंबर वन यानीकी नहेरुवंशकी तत्कालिन औलाद तय करेगी कि बलीका बकरा किसको बनाया जाय.

वह कैसे?

जैसे कि चीनके सामने हमारी युद्धमें घोर पराजय हुई तो जिम्मेवार कृष्ण मेनन को बनाया गया, पहेली तीन पंचवर्षीय योजना अंतर्गत आर्थिक क्षेत्रमें विफलता हुई तो सीन्डीकेटको जिम्मेवार बनाया गया. स्टेटबेंकमें ६० लाखका गफला हुआ तो नगरवाला को बनाया गया. युनीयन कार्बाईडका गेस कांड हुआ तो एन्डरसन को बनाया और उसके साथ कुछ लेनदेन करके उसको देशके बाहर भगा दिया. शिख और मुस्लिम आतंकवाद के लिये पाकिस्तानको जिम्मेवार बनाया गया. शेर बजारमें गफला हुआ तो हर्शद महेता और नरसिन्ह रावको बनाया गया

लेकिन नरसिंह राव तो प्रधान मंत्री थे ?

हां, लेकिन वे नंबरवन सोनिया गांधीका कहेना नहीं मानते थे और जो उपलब्धियां उन्होने की थी वे सबका श्रेय अपने पर ले रहे थे इसलिये उनको हटाना जरुरी था और कोई कुत्ते को मारना है तो उसको पागल ठहेराना नहेरुवंशके फरजंदोका स्वभाव है.

लेकिन अभी अभी जो कौभान्ड हुए उनका क्या?

देखो कोमनवेल्थ गेम के लिये कलमाडी है. टु-जी कौभान्ड के लिये राजा है. आदर्श टावर के लिये महाराष्ट्र के मंत्री है. महंगाइ के लिये शरद पवार है.

लेकिन शरद पवार को तो कहां हटाया है?

हां, ये बात भी सही है. लेकिन याद रखो जिनको भी हटाये है वे सब ऊच्चतम न्यायालयसे जब डांट पडी तब ही हटाये हैं. जबतक उच्चन्यायालयसे डांट न पडे, चूप रहेनाका और अपनेवालों के गुनाहोंपर कोइ कदम नहीं उठानेका.  

लेकिन इससे तो पंजेकी यानी कि, नहेरुवीयन कोंग्रेसकी आबरु जाती है. इसके बारेमें यह पण्जा क्या करता है? क्या उपाय अजमाता है?

इसके तो अनेक उपाय है इसके पास. मिसालके तौर पर नंबरवनकी गलतीयांको के कारण मिली विफलताओंके लिये विपक्षको यातो विरोधीयों को जिम्मेवार ठहेरानेका  और उसके लिये प्रचार माध्यमोंका सहारा लेनेका. ताकि जनताको लगे कि दोष तो नहेरुवीयन कोंग्रेस पक्षके नंबरवनका नहीं, लेकिन उसके विरोधीयोंका है.

लेकिन शासककी विफलताओंको विरोधीयोंकी विफलता कैसे प्रस्थापित कर सकते हैं?

प्रसार मध्यमों द्वारा और वितंडावाद पैदा करके ऐसा काम किया जा सकता है.

लेकिन आम जनता तो ऐसी निरक्षर और अनपढ है वह कैसे शब्दोंके जालवाली विवादकी भाषा समझ पायेगी?

पंजेने और उसके साथीयोंने इसलिये तो आमजनताको निरक्षर और अनपढ रखा है. यह व्यायाम तो पंजा अपने शासनके ६० सालसे लगातार करता आया है ताकि आमजनता कुछ समझ न सके. पंजा आम जनता को भ्रममें रखके और उन सब निरक्षर और अनपढ को हमेशा प्रचार माध्यमों द्वारा गुमराह करता है.

लेकिन यह निरक्षर और अनपढमें फर्क क्या है?

निरक्षर वह है जो गरीब होने के कारण स्कुलमें जा नहीं सकता और इसलिये कुछ भी पढनेके काबिल नहीं है. और अनपढ वह है जो गरीब होनेकी वजहसे मझदुरी करनेमें ही व्यस्त रहेता है और इसलिये वह ग्यानकी पुस्तके पढ नहीं सकता. इसलिये वह सच्ची बात समझनेमें कमजोर रहता है, और पंजा उसे उल्लु बना सकता है.

लेकिन जो लोग पढे लिखे है वह इनको सच्ची बात बता देंगे तो?

क्या तुम बुद्धु हो? तुम्हें मालुम नहीं कि ऐसे पढे लिखे और मध्यम वर्गके भी कइ लोग लालची और भ्रष्ट होते है. उनको ये वोटके सौदागर खरीद सकते है. तुम्हे मालुम तो है कि सबसे ज्यादा धनिक पक्ष यह नहेरुवीयन कोंग्रेस पक्ष तो है.

लेकिन यह पंजे के साथ मतलब कि नहेरुवंशीय कोंग्रेसके साथ और कौन कौन हैऔर वॉटकी राजनीति क्या है?

नहेरुवंशीय कोंग्रेसने देश उपर निरपेक्ष बहुमतसे तीन दशक तक शासन किया. अगर वह चाहतातो देशमें चमत्कार भी कर सकता था. युरोपीय देश तो द्वीतीय विश्वयुद्धमें पायमाल हो गये थे, तो भी उंचा उठ गये. हमारा देश उनसे भी उंचा उठ सकता था. कमसे कम गरीबी हठ सकती थी और रोटी कपडा मकान और काम तो सबको मील सकता ही था. लेकिन इन लोगोंने ऐसा कुछ किया ही नहीं. अपने ही जेब भरे और अपने वालोंको फोरेनकी बेंकोंमें बेकायदा अकाउन्ट में अरबों रुपये जमा किये और सदस्यों की वेतन और पेन्शन बढाने लगे. आज देशमें ४० करोडकी आबादीकी महिनेकी आय ५०० रुपये से कम है और ये संसदके सदस्यका मासिक वेतन एक लाख के करिब है. सब भत्ता मिलाके ढाई लाखके उपर जाता है. और फोरेनकीं जमा राशी और अपने धंधेकी आय तो अलग.

मतलब कि, इनको तो चांदी ही चांदी है. अरे चांदी चंदी क्या. सोना ही सोना…. और प्लेटीनम ही प्लेटीनम है. तो ये वोटकी राजनीति क्या है?

वॉटकी राजनीति आमजनताको एक दूसरेके साथ टकरानेकी और फिसाद करवानेकी है.

ये टकराव कैसे होता है?

ये टकराव धर्मके नाम पर, जातिके नामपर, विस्तारके नाम पर, भाषाके नामपर संप्रदायके नाम पर जनता को आपसमें टकराओ. और अपना उल्लु सीधा करो.

पंजा मतलबकी नहेरुवंशीय कोंग्रेस यह सब कैसे करती है?

यह पंजा, पंजा मतलबकी नहेरुवंशी कोंग्रेस मुसलमानोंको कहती है,  तुम खतरेमें हो. तुम्हारी सभी मस्जीदे खतरेमें हैं. तुम्हारा धर्म खतरेमें है. तुम्हे हम रिययतें देंगे. तुम्हारे धर्म की रक्षा हम ही कर पायेंगे. हम तुम्हें अनेकानेक पत्नी करनेकी छूट देगे. फलां फलां लोग तो कट्टरवादी है. वे तुम्हे अनेकानेक पत्नीयां करनेकी छूट्टी नहीं देंगे. आगे चलकर न जाने क्या क्या तुम पर अत्याचार करेंगे. तुम तो उससे दूर ही रहो.

लेकिन अगर मुसलमान ये पंजे को पंजा मतलबकी नहेरुवंशीय कोंग्रेसको यह कहेगा कि हम तो पहेले भी गरीब थे और आज भी गरीब है. तुमने हमारे लिये कुछ किया नहीं है.  तो यह पंजा, पंजा मतलबकी नहेरुवंशी कोंग्रेस ये मुसलमान भाईयोंको क्या कहेगी?

 अरे बुद्धु यह पंजापंजा मतलबकी नहेरुवंशीकोंग्रेस इन मुस्लिमभाइओं को कहेगी  किहमारे कारण तो तुम अभी जिन्दा हो. अगर हम नहीं होते तो ये लोग को तुम्हे तलके खा जाते.

लेकिन भैया १९७७ से १९७९ में जनता पार्टीका शासन था. बीचमें दो तीन साल जनतादलका शासन था, १९९९ से २००४ तक भी ये पंजेका,  पंजा मतलबकी नहेरुवंशीय कोंग्रेसका शासन नहीं थाउस समय तो मुस्लिमभाइओंको तो कोइ हानी नहीं हुई. उसका क्या?

अरे भैया मुसलमान भाई भी तो गरीब होते है. उनको भी तो अनपढ और गंवार रखे है. गरीब अनपढ थोडे सवाल कर सकते है?

लेकिन जो पढे लिखे मुस्लिम होते है वे तो ऐसे सवाल कर सकते है ने?

अरे भाइ बुद्धु, जैसे अखबारको खरीदा जाता है, वैसे पैसेवाले को भी लालच दे जा सकती है. ऐसे सवाल अगर करते भी है तो उसको छपा नहीं जाता. ऐसे मुस्लिम नेताओंको, पंजापंजा मतलबकी नहेरुवंशीय कोंग्रेस सम्हाल लेता है. और यह पंजा, पंजा मतलब की नहेरुवंशीय कोंग्रेस उनको कहेती है देखो हम कैसा इन कट्टर वादीयों के खिलाफ बोलते ही रहते है. हम उन्हे क्या क्या नहीं कहते! हम उन्हे सरसे पांव तक भ्रष्ट ऐसा कहते है. हम उनको आतंकवादि कहते हैं, हम उन्हे अलगतावादि कहते है, हम उन्हे मुडीवादीयोंके पीठ्ठु कहेते हैं, हम उन्हे देशको बरबाद करने वाले कहते हैं, हम उन्हे सफ्रोनवादी और सफ्रोनके साथी कहते हैं, हम उन्हें तुम गरीबोंके दुश्मन कहते हैं. हम उनको मौतके सौदागर कहते हैं. ये सब हम तुम्हारे लिये सिर्फ तुम्हारे लिये करते है.

लेकिन यह पंजा, पंजा मतलबकी नहेरुवंशीय कोंग्रेसअन्य जनता को कैसे विभाजीत करता है?

यह पंजा,पंजा मतलबकी नहेरुवंशीय कोंग्रेसग्रामवासीयोंको कहेगी कि ये शहरवाले सब पैसे वाले है. वे तुम्हे लुटते आये है. शहरमें बडे बडे उद्योगपति होते हैवे तुम्हारा उत्पादन सस्तेमें ले लेते है. और खुदका किया हुआ उत्पादन तुम्हे महंगेमे बेचते है. तुम्हारे भाइ लोग जो शहरमें नौकरी के लिये जाते है उनको भी कम वेतन देके शोषण करते हैं. हम उसके उपर कार्यवाही करते है तो वे लोग न्यायालय में चले जाते हैं और तुम्हे मालुम तो है कि, न्यायालयमें जब मामला चला जाता है तो हालत क्या होती है! हम खुद न्यायालयसे परेशान है. लेकिन हमने ठान रखी है कि हम सबको सीधा कर देंगे. तुम हमे वॉट दो. हम सबमें सुधार लायेंगे.

लेकिन न्याय व्यवस्था और सब नीति नियम तो यह पंजेने पंजा मतलबकी नहेरुवंशीयकोंग्रेसने अपने साठ सालके शासन दरम्यान ही बनाये है. तो उन्होने ये साठ साल दरम्यान फेरफार क्यों नहीं किया ऐसा अगर ग्रामीण जनता प्रश्न करेगी तो यह पंजा क्या जवाब देगा?

अरे भाई ऐसा सवाल तो शहरकी गरीब जनता भी कर सकती है !!. लेकिन गरीब जनता सवाल थोडा कर सकती है? सवाल करनेवालेका जेब गरम करके, या लालच देके या कुछ सौगाद देके या तो बाहुबली की उपस्थितिमें कोई सवाल थोडा कर सकता है?

बाहुबली तो सवाल कर सकता है न!!

अरे बुद्धु, बाहु बली तो पंजेका साथी भी तो होता है.

अगर बाहुबलीकी गैर मौजुदगीमें ऐसा सवाल कर दीया तो?

अरे भाई जब जेब गरम करदी हो या थोडी और ज्यादा पीला दी हो तो कोइ भला क्या सवाल कर सकता है!!.

अच्छा तो यह तो बात हुई ग्राम्यजनता और शहरकी जनताका टकराव करवने की. और कौनसे टकराव है?

अरे भाई सबसे बडा टकराव तो जाति भेदका है.

वह क्या है?

ठाकुर, पंडित, लाला और जटको लडाओ.

वह कैसे?

यह पंजा, पंजा मतलबकी नहेरुवंशीय कोंग्रेसठाकुरको बोलेगा कि तुम तो राजा हो. तुम्हारा तो शासन होना ही चाहिये. वो पंडित हुआ तो क्या हुआ. उसको कहो पाठशाला चलावे. देखो हमने तुम्हारी जातिका ही उम्मिदवार रख्खा है. उसको ही वोट देना है. ये पंडित, लाला और जट तो कोई कामके नहीं

यह पंजा, पंजा मतलबकी नहेरुवंशीय कोंग्रेसपंडितको बोलेगा कि, अरे पंडितजी देखो यह नहेरु जी भी तो पंडित है. हमने पंडितोंका हमेशा आदर और खयाल रखा है. उनको हमेशा नंबरवन दिया हुआ है. आप पंडितोंकी तो बनी बनाई पार्टी है. हम पंजे, पंजा मतलबकी नहेरुवंशीय कोंग्रेस वाले तो आपके शरणमें है. आपको ही हमे डूबोना है या तारना है.

यह पंजा, पंजा मतलबकी नहेरुवंशीय कोंग्रेसये लाला मतलब बनीयाको ऐसा बोलेगीअरे भाई लालाजीहमने आपका हमेशा खयाल किया है. हमारे शासनकी वजहसे ही आप दिन दुगुने और रात चौगुने बढे है. हम तो चाहते है आप और ज्यादा कमाओ. आप ही जो है वो दया धरम करम करते है. आपसे तो धरती टीकी हुई है. और देखो महात्मा गांधी तो बनीया ही तो थे. उनका हम कितना आदर करते है. जितना हम जवाहरलाल और ईन्द्रा का नाम नहीं लेते उतना हम महात्मा गांधीका नाम लेते हैं. समय समय पर मौका मिलने पर उनकी तस्विर भी लगाते है. ये पंडित और ठाकुर तो ईतने कामके कहां? लेकिन क्या करे कभी गधेको भी बाप बनाना पडता है.

यह पंजा, यह पंजा, पंजा मतलबकी नहेरुवंशीय कोंग्रेस जाट को ऐसा बोलेगी, अरे भाई जट. तुम तो जगतका बाप हो. तुम जब धान पकाते हो तो यह सारी दुनिया खाना खा सकती है. तुम जगतके तात होते हुए भी आज तुम्हे लालाके सामने हाथ फैलाना पडता है. पहेले के जमानेमें तो ये लाला और ठाकुरने तुम पर क्या क्या अत्याचार नहीं किये? तुम तो ठीक तरहसे याद भी नहीं कर सकते हो. परंतु हमे तो सब कुछ याद है. हम भूलाकर भी नहीं भूला सकते. ये तो तुम्ही हो जो ईतना सहन करने पर भी उन सबको अन्नपूर्णा की तरह खाना खिला रहे हो. देखो, यह वल्लभभाइ पटेल भी तो जट थे. लेकिन अगर वल्लभभाई पटेल न होते तो देशका क्या हाल होता.!!  लेकिन ये पंडित और ठाकुर लोग उनसे कितने जलते थे. अब ये बात तो पूरानी हो गयी. तुम तो भूल भी गये हो .  लेकिन चरण सिंग को भी बादमें लगा कि किसानोंका आदर तो हमारा पंजा पक्ष,  पंजा मतलबकी नहेरुवंशीय कोंग्रेस पक्ष ही कर सकता है. और उनका सुपुत्र आज हम पंजेको, पंजा मतलबकी नहेरुवंशीय कोंग्रेसमें ही शोभायमान है. हमने तुम्हे कितनी रीयायतें दी हैंतुम इसकी गिनती भी नहीं कर सकते. लेकिन तुम्हारी सब रीयायतें ये सब लाला वेपारी लोग और बाबु लोग चाउं कर जाते है. हमारे तुम्हे दुये हुए हर सौ पैसेमेंसे ये लोग ९५ पैसे खा जाते है. हम अब बहुत कडक होने वाले है. हमारा यह द्रढ संकल्प है. और हम हमारे संकल्पमें वचन बद्ध है. हम हमारे सभी संकल्प पूरा करनेमें मानते है. और किया भी है. हमने वादा किया और बैंकोका राष्ट्रीय करण कियाहमने वादा किया ठाकुरोंका सालियाणा बंद किया. ठाकुरोंको मूंहकी खिलाई. 

लेकिन भैया, पंजेने यह पंजा, पंजा मतलबकी नहेरुवंशीय कोंग्रेसने ऐसा तो कोई वादा उस वख्त किया नहीं था  कि, वह बेंकोका राष्ट्रीयकरण करेगी और ठाकुरोंका सालियाणा बंद करेगी. 

अरे बुद्धु उस समयके कई लोग और नेतागण तो मर भी गये. और किसकों सबको सबकुछ याद रहता है. अगर कोई बोलेगा तो हब कहेंगे वह जुठ बोलता है. और सियासत करता है. ऐसे लोग सिर्फ सियासत करनेमें ही माहीर है. उनको जनता की कहां पडी हैये तो हम है कि गरीबोंके लिये मर मीटते हैं. हमने देखो तुम लोगोंको फसलकी अच्छी किमत मिले ईसलिये वॉलमार्ट जैसी कंपनीयांको ला रहे थे लेकिन ये विपक्षी लोगोंने ठान ली थी कि उसको आने देना ही नहीं है. तुम्हे फसल की अच्छी किमत मीले तो ये लोगोंको जलन होती है. तुम उनको पहेचान लो.

और भैयाये पंजे वाले पंजे वाले मतलब कि नहेरुवीयन कोंग्रेस वाले दलित लोंगो को क्या कहेंगे?

अरे बुध्धु दलितोंको बहेकाने नेके लिये तो उनके पास कुबेरका भंडार है. यह पंजा, पंजा मतलब नहेरुवंशी कोंग्रेस पक्ष उनको कहेगा; हे दलित भाइओ, ये आप अति पीडितजनसमाज है. ये तिलक तीराजु और तल्वारने आपके उपर हजारों सालसे अत्याचार गुजारे है. आपके साथ इन्होनें पशुसे भी ज्यादा अत्याचार किया है. ये लोग आपको पशुसे भी तूच्छ समझते थे और अभी भी समझ रहे है. ये लोगका पूरा साहित्य आपके उपर किये अत्याचारोंसे भरपूर है. वह द्रोण जीसको ये लोग आचार्य कहेते है उसने एक लव्यका कैसा हाल किया था? अरे उसको तो जाने दो, राम जैसे राम जो इन लोगोंके भगवान है उसने शंबूक जो आपके जातिका था उसका खामोंखा शिरच्छेद किया था. और सूपर्णखा जिसने सिर्फ मेरेजके लिये राम और लक्ष्मण को प्रपोझ किया तो उसके नाक कान काट दिये थे. ऐसे तो कई अनगिनत अपराध इन लोगोंने किये है. आप ने सब कुछ सह लिया. दूर की बात जाने दो. बाबा साहेब आम्बेडकर जो पढेलिखे थे तो भी उनके उपर घोर अत्याचार किये थे. अगर उनके उपर किये गये अत्याचारोंके बारे में लिखा जाय तो एक महाभारतके समान दलदार पुस्तक बन सकती है. और आप देखो. हमारी इन्दीरागांधीने उनके बोलने पर सेन्सरशीप डाली और कुछ नेताओंको इमर्जेन्सीमें १८मास जेलमें रखा तो मानो कि, आभ तूट पडा ऐसी हवा चलाई. आपके उपर तो इन लोगोंने हजारो सालकी इमर्जेन्सी चलाई थी तो भी कानमें जू तक रेंगी नहीं थी. और हमने जब आपके लिये आरक्षण की बात चलाइ तो ये लोग चील्लाने लगे. हम पंजे वाले,  पंजेवाले मतलब नहेरुवंशी कोंग्रेस पक्ष, आपको उंचा उठानेके लिये वचन बद्ध है. दूनियाकी कोई भी ताकत हमे इसमेंसे रोक नहीं सकती. चाहे हमें अपनी जान भी क्यों न देनी पडे हम आपको उंचा उठाके ही रहेंगे हम तुम्हारी औरतको भी उंचा उठायेंगे.मतलब कि  हें हें हें . और देखो, ये मायवती ने दलित होते हुए भी आपके लिये क्या किया? कुछ नहीं. खुदने पांच सौ रुपयेकी नोटेंका हार पहना और खुदके बूत लगाये. आपको कभी एक भी नोट मीली? नहीं न!! वह तो खुद के लिये और सत्ताके लिये काम करती है. आप तो पहेले भी गरीब और पीछडे हुए थे आज भी वैसे ही है.

लेकिन भैया, आपने जो कुछभी बूरा बूरा पंडित, ठाकुर लाला और जट के बारेमें कहा वह सब तो ये पंजेको ही लागु पडता है, तो ये सब बाते दलित वर्ग मानेगा कैसे? एक दो प्रधान मंत्री को छोडके सभी प्रधान मंत्री युपीमेंसे ही तो आये थे और वे सभी ये पंजेवाले मतलब कि नहेरुवंशी कोंग्रेसके यातो उनसे मिले हुए पक्ष वाले थे, उन्होने क्या किया? ऐसा अगर कोई सवाल करेगा तो ये पंजा, पंजा यानी कि, नहेरुवंशीय कोंग्रेस पक्ष वाले क्या जवाब देगा और युपीमें इस पक्षने ही तो कमसे कम तीस साल तक एक चक्री शासन किया हैतो भी आज इन्हीका फरजंद युपीकी जनता को भीखमंगी कहेता है ऐसा क्यों?

अरे भाई, यह पंजा, पंजा यानी कि, नहेरुवंशी कोंग्रेस इस सबमें माहिर है. सवाल करनेवाला कैसा है उसके अनुसार ये पंजेकी क्रिया होती है. समाचार प्रसारणवाले तो यानी कि, प्रसार माध्यमवाले तो ऐसा सवाल करेंगे ही नहीं, क्यों कि, वे तो डरपोक है. इमर्जेन्सीमें देखा ही था न कि जब उनको नमन करने का बोला तो वे लोग ये पंजेके पैरमें साष्टांग दंडवत प्रणाम करने लगे थे. और इस समय तो ये लोग बिकनेके काबिल है. इसलिये यह पंजेको उसका तो डर ही नहीं है. जो व्यक्ति या लोकसेवक शूरवीर बनके ये पंजेकी पंजेकी मतलब नहेरुवंशी कोंग्रेस पार्टीकी या उसके नंबरवन को सवाल जवाबमें फंसाने की कोशिस करेगा उनके पीछे गुप्तचर लग जायेंगे और उनके उपर धमकीयों के अलावा जांचपडताल और फरजी मामले दर्ज हो जायेंगे. मालुम नहीं है वीपी सिंग के उपर फर्जी सेंट कीट की बेंकमें एकाउन्ट होनेका मामला दर्ज हुआ था! बाबा रामदेव के उपर भी कई मामले दर्ज हो गये है. रामलिला मैदानमें सोती हुई जनताके उपर लाठीमार हुआ था और एक औरतकी मौत तक इस मारमें हुइ थी. बाबा रामदेवको लगा कि जान बची तो देशके लिये आगे कुछ भी कर सकते है. तो जान बचाने के लिये उनको भागना पडा. ये पंजा जान भी ले सकता है. देशमें ऐसि कई राजकीय मौत हुई है जिसका आजतक पता नहीं. और ये पंजेवाले पक्षने अन्ना हजारेको भी नहीं बक्षा है. उनको भी यह पंजा कहता है कि अन्ना हजारे सरसे लेकर पांव तक भ्रष्टा चारमें डूबे हुए है.

लेकिन भैया ये आरएसएस क्या है. और उसका नाम ये पंजा बारबार क्योंलेता है?

ये आरएसएसवाले लोग वैसे तो देशप्रेमी है. किन्तु उनमेंसे कुछ लोग वैचारिक तरिकेमें अधुरे है. और उनलोंगोंमें अधिरता है. कुछ लोग मंदिर और संस्कृति की रक्षाके बारेमें ना समझीकी बाते करते है. यह पंजा, पंजा यानी कि, नहेरुवंशी कोंग्रेस पार्टी के नेता गुप्त तरिकोंसे इन आरएसएस वाले कुछ नेताओंको बेवकुफ बनानेके लिये उकसाता है और गुप्त व्यवहारसे उनको सूचना करता है कि तुम कुछ बोलो. नहीं तो ये तुम्हारे साथी कोई राजकीय दबाव न होने पर कुछ भी नहीं करेंगे. देखो वैसे तो हम भी तो हिन्दु ही है. और हमारे समयमे ही मंदिर के द्वार खुले थे. और हमारे समयमें ही मस्जीद तोडी गई थी. उसका मतलब तुम लोग समझ सकते हो. ये मुस्लिमों को अगर ऐसा लगेगा कि वे यहा सुरक्षित है तो वे लोग और घुसपैठ करेंगे इसलिये तुम्हे तो मुस्लिम और इस्लामके विरुद्ध लिखते ही रहेना है. अगर तुम लिखते नहीं रहोगे तो तुम और क्या करोगे? जनता को पता कैसे चलेगा कि तुम लोग राष्ट्रभक्त हो? जब तुम मुस्लिम और इस्लामके खिलाफ बोलोगे और लिखोगे तभी तो जनता को पता चलेगा कि तुम लोग राष्ट्र भक्त हो. तुम्हे महात्मा गांधीके खिलाफ भी लिखना ही चाहिये. आखर तुम्ही तो अखंड भारतके दृष्टा हो. हम तो कुछ ऐसा लिख नहीं सकते. तुम लिख सकते हो क्योंकि तुम लोग तो पढे लिखे हो और विद्वान हो. तुम ये भी बात चलाओ कि नहेरु को प्रधान मंत्री किया और वल्लभ भाइ पटेलको नहीं किया ये महात्मा गांधीका घोर अपराध था. और देश उसको कभी माफ नहीं कर सकता. क्योंकि उसका फल देश आज भी भूगत रहा है. मैं वैसे तो पंजे वाला हूं लेकिन मैं क्या करुं मेरी तो मजबुरी है. जब हमारे पक्षके प्रधान मंत्री खुद मजबुर हो सकते है तो मैं और मेरे जैसे तो पहेलेसे ही मजबुर होते है.

लेकिन भैया कोई ऐसा सवाल करेगा कि सरदार पटेलने नहेरुको चीनकी विस्तारवादी नीतिके बारेमें सचेत किया था, और नहेरुने उसकी अनदेखी कि थी, इतना ही तीबेटके उपर चीन के आक्रमण किया तो नहेरुने क्यों तीबेट को मदद नहीं कि? और नहेरु सरकारने तीबेटके उपर चीनका सार्वभौमत्व क्यों मान्य किया था? और चीन की घुसपैठको भी क्यों अनदेखी कि थी? इसके बारेमें संसदको क्यों गुमराह किया था? और चीन के साथ की सरहद को क्यों अरक्षित रखी थी? और इन सब की वजहसे तो चीनने भारतपर आसानीसे विजय पायी थी. आज हमारी ६२००० वर्ग माईल जमीन चीनके कब्जेमें है. नहेरुने तो उस समय प्रण लिया था कि उसका पक्ष मा भारतकी उस धरतीको वापस लिये बीना चैनसे बैठेगा नहीं. उस प्रणको निभानेके लिये पंजेने क्या किया? हमारे जवानोने जो पाकिस्तान पर विजय दिलायी थी उस विजयको इन्दीरा ने भूट्टोके साथ सिमला करार करके पराजयमें पलट दी थी और काश्मिर समस्या सुलझानेका खुबसुरत मौका गवा दीया था जिसके कारण आज तक भारत परेशान है,  ईन्दीराने खालीस्तानी लीडर भींदरानवालेको सन्त घोषित किया और उसने पाकिस्तानका सहारा लेके आतंकवाद फैलाया था और खुल्लेआम स्वर्णमंदिरपर कबजा कर लिया था, खालिस्तानी आतंक वीपी सिंग और चंद्र शेखर तक चला था और इस दरम्यान पाकिस्तानी आतंकवादीयोंको नेटवर्क बीछानेका मौका मील गया.  और हम पाकिस्तानी आतंकसे आज तक परेशान है. ये सब बातें छोड के ये आरएसएसवाले महात्मागांधी पर क्यों उबलेंगे और लिखेंगे?

 अरे बुद्धु ऐसी बाते लिखनेका तो पंजेवाले यानी कि, नहेरुवंशी कोंग्रेस उसे पैसे दिलायेगी. अगर वे ईन्दीरा गांधी और नहेरुके खिलाफ कुछ भी लिखेंगे तो यह पंजा कुछ भी कर सकता है. प्रसारमाध्यमोंसे और पंजेवाले पीठ्ठुओंसे गालीयोंकी भोंछार कर सकता है. महात्मा गांधीके अनुयायी तो बेचारे अहिंसक होते है. वे तो कुछ बोलेंगे भी नहीं.

लेकिन भाई साब इससे पंजेको क्या फायदा होगा?

अरे बुद्धु, जो गांधीजी के उपर आदर रखते है उनको लगेगा कि, ये आरएसेस वाले तो बेवकुफ है तो उसको आदर करने वाला पक्ष भी बेवकुफ ही हो सकता है. चलो किसीको ही वॉट नहीं देंगे. इस प्रकार जो पंजेके विरोधमें है उनकी लो-वोटींग होगी. दूसरी तरफ अल्पजन संख्यकों को डराया है तो उनकी हेवी वोटींग होगी. तो फायदा तो पंजेवाला का यानी कि, नहेरुवंशी कोंग्रेसको ही है न. समझेने तुम अभी?

हां भैया तुम्हारी बात तो सही है. लेकिन दुसरा ये पंजेवाले क्या कर सकते है?

देखो ये जो प्रसारमाध्यमके संचालक और अखबारों के तंत्री और कटार लेखकों उन सबको बोलेगा कि, तुम ऐसे विषय खोज निकालो कि जनताका ध्यान हमारे काले कामोंसे हट कर दूसरे विषयों पर चला जाय.

 

तूम ऐसा करो;

 

अन्ना हजारे गांधीवादी है या नहीं? अगर वे गांधीवादी है तो कितना है? और कितना नहीं है? इन सब पर बुद्धि जीवीयोंकी सरफोडी चलाओ.

 

अन्ना कितना विफल रहे? अन्ना ने तो महाराष्ट्रके बाहर कुछ किया ही नहीं है. उनको देशके प्रश्नोंका क्या पता, वे तो ज्यादा पढे लिखे भी नहीं है,

 

अन्नाके साथी लोग के बारेमें अफवाहें फैलाओ. उनके साथीयों के बारेमें बालकी खाल निकालो. उसमें फूट पाडो. फूट नहीं पडती है तो भी लिखोके फूट पडी है. उनके निवेदनोंको तोड मरोडके लिखो. उनके पीछे सीबीआइ लगा दो.

 

बाबा राम देवके बारेमें और उसके दवाइ और योगके बारेमें अफवाहें फैलाओ. वे रामलीला मैदानसे डरकर भाग गये उसको बढा चढाके बार बार लिखो, बाबा राम देवके साम्राज्य के बारेमें लिखो और उसमें घोटाले ही घोटले ऐसा लिखो. है नहीं है तो भी घोटाले है ऐसी हवा फैलाओ. उसके उपर जांच बैठाओ. जैसे हमने मोरारजी देसाई और वीपी सिंगके बारेमें किया था उससे भी बढकर इनलोंगोंके बारेमें करो.

 

अगर समय है तो राम मंदिर के बारेमें चर्चा करो और चर्चा चलाओ. वीएचपी और बजरंगदल के लिडरोंको उकसाओ और नहीं उकसते है तो उनकी टीका करो. कोई न कोई माई का लाल तो मिल ही जायेगा जो राम मंदिर ही नहीं लेकिन ताजमहालके बारेमें भी मुसलमानोंके खिलाफ लिखने वाला होगा. उतना ही नहीं मुसलमानोंने क्या क्या अत्याचार हिन्दुओंके उपर किये थेऔसके उपर अलगसे लेख लिखवाओ और उसको बहेकाओ. ये आरएसएसवालोंमेंसे कई लोग तो ऐसा लिखने के लिये आतुर होते हैं.

 

लेकिन भैया, इससे क्या होगा?

 

अरे बुद्धु, ऐसा लिखने से मुस्लिमोंको लगेगा कि ये सभी हिन्दु धर्मके बारेमें सोचने वाले ही है. और अगर इनका शासन आया तो हम लोग तो कहींके भी नहीं रहेंगे. ये लोग जरुर बदला लेंगे. हमें तो ये पंजे के शरणमें ही जाना चाहिये.

 

तो भैया, पंजा, पंजा मतलब नहेरुवंशी कोंग्रेस इस तरह, विखवाद और विभाजनकी अफवाहों के जरिये देशकी जनताको विभाजित करनेका कलुशित काम कर रही है और काला-लाल-धन विदेशोंमे जमा करवा रही है, आतंक वादको हवा दे रही है यही ना?

 

हां बुद्धु हां,इसिलिये मैं कहेता हुं कि इस वॉटबैंक की और काला-लाल धनकी राजनीति पैदा करने वाले और चालाने वाले पंजेसे देशको बचाओ.

समझो, आज कोंग्रेस और उसके सहयोगी शासित सभी राज्य सबसे पीछडे हुए है. इसका कारण पंजे की और उनके सहयोगी पक्षोंकी वोट की राजनीति ही है. हमारे देशके पास क्या कुछ नहीं है?

उज्वल इतिहास, विद्वत्ता पूर्ण साहित्य  और मांधाता, राम, कष्ण, चंद्रगुप्त मौर्य, विक्रमादित्य, हर्ष जैसोंकी धरोहर है. अगत्स्य, वशिष्ठ, व्यासकौटिल्य, बुद्ध, शंकराचार्य, विवेकानन्द, दयानन्द सरस्वती, जैसे विद्वानोंकी परंपरा है, विशाल और उच्च हिमालय, विशाल समूद्र तट, अफाट रण प्रदेश, विस्तृत और गाढ वनप्रदेश क्या क्या नहीं है हमारे पास? विशाल मानव साधन को क्या हम उर्जा श्रोत और धरतीको नवसाध्य करनेमें नहीं लगा सकते? लगा सकते हैं जरुर लगा सकते हैं. लेकिन पंजेने साठ सालमें यह सब क्युं नहीं किया? उनके ही सभी प्रधान मंत्री थे तो भी हमारा राज्य और हमारा देश क्यों गरीब, बेकार और पिछडा रहा? इसलिये कि यह पंजा यही चाहता था कि, गरीब गरीब ही रहे और अनपढ अनपढ ही रहे तो वे खुद और उसके अपन वाले विदेशोंमें काला-लाल धन अवैध  तरिकोंसे धन जमा कर सके और चूनाव के समय पर वोटोंकी राजनीति कर सके.    

शिरीष दवे

 

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