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Archive for September, 2013

Rama has been lost who had walked on this earth in flesh and blood Part-9

खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग)

रामको कौन समझ पाया?

एक मात्र महात्मा गांधी है जो रामको सही अर्थोमें समझ पाये.

प्रणालीयोंको बदलना है? तो आदर्श प्रणाली क्या है वह सर्व प्रथम निश्चित करो.

आपको अगर ऐसा लगा कि आप आदर्श प्रणालीको समझ सके हो तो पहेले उसको मनमें बुद्धिद्वारा आत्मसात करो, और वैसी ही मानसिकता बनावो. फिर उसके अनुसार विचार करो और फिर आचार करो. इसके बाद ही आप उसका प्रचार कर सकते हो.

लेकिन यह बात आपको याद रखने की है कि, प्रचार करने के समय आपके पास कोई सत्ता होनी नहीं चाहिये. सत्ता इसलिये नहीं होनी चाहिये कि आप जिस बातका प्रचार करना चाहते है उसमें शक्ति प्रदर्शन होना वर्ज्य है. सत्ता, शक्ति और लालच ये सब एक आवरण है, और यह आवरण सत्यको ढक देता है. (हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्‌.).

गांधीजीको जब लगा कि वे अब सामाजिक क्रांति लाना चाहते है तो उन्होने कोंग्रेसके पदोंसे ही नहीं लेकिन कोंग्रेसके प्राथमिक सभ्यपदसे भी त्यागपत्र दे दिया. इसकी वजह यह थी कि उनकी कोई भी बातोंका किसीके उपर उनके पदके कारण प्रभाव न पडे और जिनको शंका है वे संवादके द्वारा अपना समाधान कर सके.

कुछ लोग कहेंगे कि उनके उपवास, और कानूनभंग भी तो एक प्रकारका दबाव था! लेकिन उनका कानून भंग पारदर्शी और संवादशील और सजाके लिये आत्मसमर्पणवाला था. उसमें कोई हिंसात्मक सत्ता और शक्ति संमिलित नहीं थी. उसमें कोई कडवाहट भी नहीं थी. सामने वाले को सिर्फ यह ही कहेनेका था कि, उसके हदयमें भी मानवता है और “रुल ऑफ लॉ” के प्रति आदर है.

महात्मा गांधीने रामको ही क्यों आदर्श के लिये चूना?

भारत, प्राचीन समयमें जगत्‌गुरु था. गुरुकी शक्ति शस्त्र शक्ति नहीं है. गुरुको शस्त्र विद्या आती है लेकिन वह केवल शासकोंको सीखानेके लिये थी. गुरुका धर्म था विद्या और ज्ञानका प्रचार, ताकि जनता अपने सामाजिक धर्मका आचरण कर सके.

शासकका धर्म था आदर्श प्रणाली के अनुसार “रुल ऑफ लॉ” चलाना. शासकका काम और धर्म, यह कतई नहीं था कि वह सामाजीक क्रांति करें और प्रणालीयोंमें परिवर्तन या बदलाव लावें. यह काम ऋषियोंका था. राजाके उपर दबाव लानेका काम, ऋषियोंकी सलाह के अनुसार जनता का था.

वायु पुराणमें एक कथा है.

ब्राह्मणोंको मांस भक्षण करना चाहिये या नहीं? ऋषिगण मनुके पास गये. मनुने कहा ऋषि लोग यज्ञमें आहुत की हुई चीजें खाते है. इस लिये अगर मांस यज्ञमें आहुत किया हुआ द्रव्य बनता है तो वह आहुतद्रव्य खा सकते है. तबसे उन ब्राह्मणोंने यज्ञमें आहुत मांस खाना चालु किया. फिर जब ईश्वरने (शिवने) यह सूना तो उसने मनु और ब्राह्मणोंको डांटा. मनुसे कहाकि मनु, तुम तो राजा हो. राजाका ऐसा प्रणाली स्थापनेका और अर्थघटन करनेका अधिकार नहीं है. उसी प्रकार, ऋषियोंको भी ईश्वरने डांटा कि, उन्होने अनधिकृत व्यक्तिसे सलाह क्यों ली? तो मनु और ये ऋषिलोग पाप भूगतते रहेंगें. उस समयसे कुछ ब्राह्मण लोग मांस खाते रहे.

आचार्य मतलब है कि, आचार और विचारों पर शासन करें. मतलब कि, जिनके पास विद्या और ज्ञान है, उनके पास जो शासन रहेगा वह कहलायेगा अनुशासन. समस्याओंका समाधान ये लोग करेंगे. आचार्योंके शासन को अनुशासन कहा जायेगा. और शासकका काम है, सिर्फ “नियमों”का पालन करना और करवानेका. ऐसा होनेसे जनतंत्र कायम रहेगा.

अब देखो नहेरुवीयन कोंग्रेसने जो भी नियम बनायें वे सब अपने वॉट बेंक के लिये मतलबकी अपना शासन कायम रहे उसके लिये बनाया. वास्तवमें नियम बनानेका मुसद्दा जनताकी समस्याओंके समाधान के लिये ऋषियोंकी तरफसे मतलब कि,  ज्ञानी लोगोंकी तरफसे बनना चाहिये. जैसे कि लोकपालका मुसद्दा अन्ना हजारे की टीमने “जनलोकपाल” के बील के नामसे बनवाया था. उसके खिलाफ नहेरुवीयन कोंग्रेसके शासकोंने एक मायावी-लोकपाल बील बनाया जिससे कुछ भी निष्पन्न होनेवाला नहीं था.

शासक पक्षः

नहेरुवीयन कोंग्रेस एक शासक पक्ष है. वह प्रजाका प्रतिनिधित्व करती है. लेकिन उसने चूनाव अभियानमें अपना लोकपाल बीलका मुसद्दा जनताके सामने रखकर चूनाव जीता नहीं था. उतना ही नहीं वह खुद एक बहुमत वाला और सत्ताहीन पक्ष नहीं था. उसके पास सत्ता थी और वह एक पक्षोंके समूह के कारण सत्तामें आया था. अगर उसके पास सत्ता है तो भी वह कोई नियम बनानेका अधिकार नहीं रख सकता.

शासक पक्षके पास कानून बनानेकी सत्ता नहीः

उसका मतलब यह हुआ कि जनताके प्रतिनिधिके पास नये नियम और पूराने नियमोंमें परिवर्तन करनेकी सत्ता नहीं हो सकती.

जो लोग समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और मानसाशास्त्रमें निपूण है वे लोग ही हेतुपूर्ण मुसद्दा बनायेंगे और न्यायविद्वानोंसे मुसद्देका आखरी स्वरुप, नियम की भाषामें बद्ध करेंगे. फिर उसकी जनता और लोक प्रतिनिधियों के बीचमें और प्रसार माध्यमोंमें एक मंच पर चर्चा होगी, और उसमें फिरसे जो लोग समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और मानसाशास्त्रमें निपूण है वे लोग हेतुपूर्ण मुसद्दा बनायेंगे और न्यायविद्वानोंसे फिरसे मुसद्देका आखरी स्वरुप नियमकी भाषामें बद्ध करेंगे और फिर उसके उपर मतदान होगा. यह मतदान संसदमें नहीं परंतु चूनाव आयोग करवायेगा. संसदसदस्योंके पास शासन प्रक्रीया पर नीगरानी रखनेकी सत्ता है. जो बात जनताके सामने पारदर्शितरुपमें रख्खी गई नहीं है, उसको मंजुर करने की सत्ता उनके पास नहीं है.

महात्मा गांधीने कोंग्रेसका विलय करनेको क्यों कहा?

महात्मा गांधी चाहते थे कि जो लोग अपनेको समाज सेवक मानते है और समाजमें क्रांति लाना चाहते है, वे अगर सत्तामें रहेंगे तो क्रांतिके बारे में सोचनेके स्थान पर वे खुद सत्तामें बने रहे उसके बारेमें ही सोचते रहेंगे. अगर उनको क्रांति करनी है तो सत्ताके बाहर रह कर जनजागृतिका काम करना पडेगा. और अगर जनता इन महानुभावोंसे विचार विमर्श करके शासक पक्षों पर दबाव बनायेगी कि, ऐसा क्रांतिकारी मुसद्दा तैयार करो और चूनाव आयोगसे मत गणना करवाओ.

महात्मा गांधीको मालुम था

महात्मा गांधीको मालुम था कि कोंग्रेसमें अनगिनत लोग सत्ताकांक्षी और भ्रष्ट है. और जनताको यह बातका पता चल ही जायेगा. “लोग इन कोंग्रेसीयोंको चून चून कर मारेंगे”. और उनकी यह बात १९७३में सच्ची साबित हुई.

गुजरातके नवनिर्माण आंदोलनमें गुजरातकी जनताने कोंग्रेसीयोंको चूनचून कर मारा और उनका विधानसभाकी सदस्यतासे इस्तिफा लिया. विधानसभाका विसर्जन करवाया. बादमें जयप्रकाश नारायणके नेतृत्वमें पूरे देशमें कोंग्रेस हटावोका आंदोलन फैल गया. जिस नहेरुवीयन कोंग्रेसने “हम गरीबी हटायेंगे… हम इसबातके लिये कृत संकल्प है” ऐसे वादे देकर, निरपेक्ष बहुमतसे १९७०में सत्ता हांसिल की थी, वह चाहती तो देशमें अदभूत क्रांति कर सकती थी. तो भी, नहेरुवीयन फरजंद ईन्दीरा गांधीको सिर्फ सत्ता और संपत्ति ही पसंद था. वह देशके हितके हरेक क्षेत्रमें संपूर्ण विफल रही और जैसा महात्मा गांधीने भविष्य उच्चारा था वैसा ही ईन्दीरा गांधीने किया. उसने अपने हरेक जाने अनजाने विरोधीयोंको जेलके हवाले किया और समाचार पत्रोंका गला घोंट दिया. उसने आपतकाल घोषित किया और मानवीय अधिकारोंका भी हनन किया. उसके कायदाविदने कहा कि, आपतकालमें शासक, आम आदमीका प्राण तक ले सकता है तो वह भी शासकका अधिकार है.

रामराज्यकी गहराई समझना नहेरुवीयन संस्कारके बसकी बात नहीं

और देखो यह ईन्दीरा गांधी जिसने हाजारोंसाल पूराना भारतीय जनतंत्रीय मानस जो महात्मा गांधीने जागृत किया था उसका ध्वंस किया. और वह ईन्दीरा गांधी आज भी यह नहेरुवीयन कोंग्रेसमें एक पूजनीया मानी जाती है. ऐसी मानसिकता वाला पक्ष रामचंद्रजीके जनतंत्र की गहराई कैसे समझ सकता है?

राम मंदिरका होना चाहिये या नहीं?

रामकी महानताको समझनेसे भारतीय जनताने रामको भगवान बना दिया. भगवान का मतलब है तेजस्वी. आकाशमें सबसे तेजस्वी सूर्य है. सूर्यसे पृथ्वी स्थापित है. सूर्यसे पृथ्वी की जिंदगी है. सूर्य भगवान वास्तवमें जीवन मात्रका आधार है. जब भी कोई अतिमहान व्यक्ति पृथ्वी पर पैदा होता है तो वह सूर्य भगवान की देन माना जाता है. सूर्यका एक नाम विष्णु है. इसलिये अतिमहान व्यक्ति जिसने समाजको उन्नत बनाया उसको विष्णुका अवतार माना जाता है. ऐसी प्रणाली सिर्फ भारतमें ही है ऐसा नहीं है. यह प्रणाली जापानसे ले कर मीस्र और मेक्सीको तक है या थी.

लेकिन नहेरुवीयन कोंग्रेसको महात्मा गांधीका नाम लेके और महात्मा गांधीकी कोंग्रेसकी धरोहर पर गर्व लेके वोट बटोरना अच्छा लगता है, लेकिन महात्मा गांधीके रामराज्यकी बात तो दूर रही, लेकिन रामको भारत माता का ऐतिहासिक सपूत मानने से भी वह इन्कार करती है. यह नहेरुवीयन कोंग्रेसको भारतीय संस्कृतिकी परंपरा पर जरा भी विश्वास नहीं है. उसके लिये सब जूठ है. राम भी जूठ है क्योंकि वह धार्मिक व्यक्ति है.

नहेरुवीयन कोंग्रेसने रामको केवल धार्मिक व्यक्ति बनाके भारतीय जनतांत्रिक परंपराकी धज्जीयां उडा देनेकी भरपूर कोशिस की. नहेरुवीयन कोंग्रेसने रामका ऐतिहासिक अस्तित्व न्यायालयके सामने शपथ पूर्वक नकार दिया.

पूजन किनका होता है

अस्तित्व वाले तत्वोंका ही पूजन होता है. या तो वे प्राकृतिक शक्तियां होती है या तो वे देहधारी होते है. जिनका अस्तित्व सिर्फ साहित्यिक हो उनकी कभी पूजा और मंदिर बनाये जाते नहीं है. विश्वमें ऐसी प्रणाली नहीं है. लेकिन मनुष्यको और प्राकृतिक तत्वोंको पूजनेकी प्रणाली प्रचलित है, क्यों कि उनका अस्तित्व होता है.

महामानवके बारेमें एकसे ज्यादा लोग कथाएं लिखते है. महात्मागांधीके बारेमें हजारों लेखकोंने पुस्तकें लिखी होगी और लिखते रहेंगे. लेकिन “जया और जयंत”की या “भद्रंभद्र” की जीवनीके बारेमें लोग लिखेंगे नहीं क्यों कि वे सब काल्पनिक पात्र है.

भद्रंभद्रने माधवबागमें जो भाषण दिया उसकी चर्चा नहीं होगी, लेकिन विवेकानंदने विश्व धर्मपरिषदमें क्या भाषण दिया उसकी चर्चा होगी. विवेकानंदकी जन्म जयंति लोग मनायेंगे लेकिन भद्रंभद्रकी जन्म जयंति लोगे मनायेंगे नहीं.

राम धर्मके संलग्न हो य न हो, इससे रामके ऐतिहासिक सत्य पर कोई भी प्रभाव पडना नहीं चाहिये.

मान लिजीये चाणक्यको हमने भगवान मान लिया.

चाणक्यके नामसे एक धर्म फैला दिया. काल चक्रमें उसका जन्म स्थल ध्वस्त हो गया. नहेरुवीयनोंने भी एक धर्म बना लिया और एक जगह जो चाणक्यका जन्म स्थल था उसके उपर एक चर्च बना दिया. जनताने उसका उपयोग उनको करने नहीं दिया. तो अब क्या किया जाय? जे. एल. नहेरुका महत्व ज्यादा है या चाणक्य का? चाणक्य नहेरुसे २४०० मील सीनीयर है. चाणक्यका ही पहेला अधिकार बनेगा.

हिन्दु प्रणाली के अनुसार मृतदेहको अग्निदेवको अर्पण किया जाता है. वह मनुष्यका अंतिम यज्ञ है जिसमें ईश्वरका दिया हुआ देह ईश्वरको वापस दिया जाता है. यह विसर्जनका यज्ञ स्मशान भूमिमें होता है. इसलिये भारतीयोंमें कब्र नहीं होती. लेकिन महामानवों की याद के रुपमें उनकी जन्मभूमि या कर्म भूमि होती है. या तो वह उसकी जन्मभूमि होती है या तो उनसे स्थापित मंदिर होते हैं. ईश्वर का प्रार्थनास्थल यानी की मंदिर एक जगहसे दुसरी जगह स्थापित किया जा सकता है. लेकिन जन्म भूमि बदल नहीं सकती.

एक बात लघुमतीयोंको समझनी चाहिये कि, ईसाई और मुस्लिम धर्ममें शासकोंमें यह प्रणाली रही है कि जहां वे गये वहां उन्होने वहांका स्थानिक धर्म नष्ट करने की कोशिस की, और स्थानिक प्रजाके धर्मस्थानोंको नष्ट करके उनके उपर ही अपने धर्मस्थान बनाये है. यह सीलसीला २०वीं सदीके आरंभ तक चालु था. जिनको इसमें शक है वे मेक्सीको और दक्षिण अमेरिकाके स्थानिक लोगोंको पूछ सकते हैं.

जनतंत्रमें राम मंदिर किस तरहसे बन सकता है?

श्रेष्ठ उपाय आपसी सहमती है, और दूसरा उपाय न्यायालय है.

I RECOMMEND RAMA-RAJYA

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः राम वचन, प्रतिज्ञा, नहेरुवीयन, नहेरु, ईन्दीरा, महात्मा गांधी, राम राज्य, राजा राम, अर्थघटन, नियम, परिवर्तन, प्रणाली, शासक, अधिकार, रुल ऑफ लॉ, निगरानी, सत्ता, ऋषि, ईश्वर, मनु, अधिकारी, जनतंत्र, हिन्दु, धर्म 

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Rama has been lost who had walked on this earth in flesh and blood Part-8

खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग)

सीता धरतीमें समा गई. एक पाठ ऐसा है कि वाल्मिकी खुद, सीताकी शुद्धता शपथसे कहे और वशिष्ठ उसको प्रमाण माने . लेकिन राम का मानना है कि, ऐसी कोई प्रणाली नहीं है. प्रणाली सिर्फ अग्नि परीक्षाकी ही है. सीताको पहेलेकी तरह अग्निपरीक्षा देनी चाहिये.

सीताने पहेलेकी तरह अग्नि परीक्षा क्युं न दी? सीताको लगा कि, ऐसी बार बार परीक्षा देना उसका अपमान है. इस लिये योग्य यह ही है कि वह अपना जीवन समाप्त करें.

इस बातका जनताके उपर अत्यंत प्रभाव पडता है. और जनता के हृदयमें राम के साथ साथ सीताका स्थान भी उतनाही महत्व पूर्ण बन जाता है.

राम और नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेता गण

राम की सत्य और प्रणालीयोंके उपरकी निष्ठा इतनी कठोर थी, कि अगर उसको हमारे नहेरुसे लेकर आजके नहेरुवीयन कोंग्रेसके वंशज अगर रामके प्रण और सिद्धांकोके बारेमें सोचने की और तर्क द्वारा समझने की कोशिस करें, तो उनके लिये आत्महत्याके सिवा और कोई मार्ग बचता नहीं है.

राजाज्ञा और राजाज्ञाके शब्दोंका अर्थघटन

रामने तो अजेय हो गये थे. राज्य का कारोबार भी स्थापित और आदर्श परंपरा अनुसार हो रहा था.

एक ऋषि आते है. वे रामके साथ अकेलेमें और संपूर्णतः गुप्त बातचीत करना चाहते है. वह यह भी चाहते है कि जबतक बातचीत समाप्त न हो तब तक किसीको भी संवादखंडके अंदर आने न दिया जाय. राम, लक्ष्मणको बुलाते है. और संवादखंड के द्वारके आगे लक्ष्मणको चौकसी रखने को कहते है. और यह भी कहते है कि यह एक राजाज्ञा है. जिसका अनादर देहांत दंड होता है.

राम और ऋषि संवाद खंडके अंदर जाते है. लक्ष्मण द्वारपाल बन जाता है. संवादखंडके अंदर राम और ऋषि है और बातचीत चल रही है.

कुछ समयके बाद दुर्वासा ऋषि आते है. वे लक्ष्मणको कहेते है कि रामको जल्दसे जल्द बुलाओ. लक्ष्मण उनको बताते है कि राम तो गुप्त मंत्रणा कर रहे है, और किसीको भी जानेकी अनुमति नहीं है. दुर्वासा आग्रह जारी रखते है और शीघ्राति शीघ्र ही नहीं लेकिन तत्काल मिलनेकी हठ पर अड जाते है. और लक्ष्मणके मना करने पर वे गुस्सा हो जाते है. और पूरे अयोध्याको भष्म कर देनेकी धमकी देते है. तब लक्ष्मण संवाद खंड का द्वार खोलता है. ठीक उसी समय राम और ऋषिकी बातचीत खत्म हो जाती है और दोनों उठकर खडे हो जाते है.

“संवादका अंत” की परिभाषा क्या?

संवाद का प्रारंभ तो राम और ऋषि खंडके अंदर गये और द्वार बंद किया तबसे हो जाता है.

लेकिन संवादका अंत कब हुआ?

जब राम और ऋषिने बोलना बंद किया तबसे?

जब राम और ऋषि आसन परसे उठे तबसे?

जब राम और ऋषि द्वारके पास आये तबसे?

जब राम और ऋषि द्वार के बाहर आये तब?

रामके हिसाबसे जब तक राम और ऋषि द्वारके बाहर न आवे तब तक संवादका अंत मानना नहीं चाहिये.

जब राम और ऋषिने बोलना बंद किया तबसे संवादका अंत मानना नहीं चाहिये. क्यों कि यह तो दो मुद्दोंके बीचका विराम हो सकता है. यह भी हो सकता है वे दोनोंको कोई नया मुद्दा या कोई नयी  बात याद आ जावें?

जब राम और ऋषि आसन परसे उठे तबसे भी संवादका अंत न मानना चाहिये, क्योंकि  वे नयी बात याद आने से फिरसे बैठ भी सकते है. 

जब राम और ऋषि द्वारके पास आये तबसे भी संवादका अंत न मानना चहिये, क्यों कि वे बीना द्वार खोले वापस अपने स्थान पर जा सकते है.

चौकीदारके लिये ही नहीं परंतु राम, ऋषि और सबके लिये भी, जब वे दोनों (राम और ऋषि),  द्वार खोलके बाहर आते है तब ही संवाद का अंत मान सकता है. क्यों कि संवादकी गुप्तता तभी खतम हुई होती है.

तो अब प्रणाली के हिसाबसे राजाज्ञाका अनादर करने के कारण, लक्ष्मणको देहांत दंड देना चाहिये.

लक्ष्मण, जो रामके साथ रहा और दशरथकी आज्ञा न होने पर भी रामके साथ वनवासमें आया और खुदने अनेक दुःख और अपमान झेले. उसका त्याग अनुपम था. इस लक्ष्मणने अयोध्याकी रक्षाके लिये राजाज्ञाका शाब्दिक उल्लंघन किया जो वास्तवमें उल्लंघन था भी नहीं. जो ऋषि रामके साथ संवाद कर रहे थे उनको भी यह लगता नहीं था कि लक्ष्मणने राजाज्ञाका उल्लंघन किया है. लेकिन क्षुरस्य धारा पर चलने वाले रामको और लक्ष्मणको लगा की राजाज्ञाका उल्लंघन हुआ है.

रामने वशिष्ठसे पूछा. उनके अर्थघटनके अनुसार भी राजाज्ञाका उल्लंघन हुआ था. लेकिन देहांत  दंड के बारेमें एक ऐसी भी अर्थघटनकी प्रणाली थी कि अगर देहांत दंड जिस व्यक्ति के उपर लागु करना है वह अगर एक महाजन है तो उसको “स्वदेश त्याग” की सजा दे जा सकती है. रामने लक्ष्मणको वह सजा सूनायी.

लक्ष्मण अयोध्यासे बाहर निकल जाते है और सरयु नदीमें आत्म हत्या कर लेते है.

तो यह थी राम, लक्ष्मण और सीताकी मानसिकता.

इस मानसिकताको भारतकी जनताने मान्य रख्खी. अर्वाचीन समयको छोड कर किसीने रामको कमअक्ल और एक निस्फल पति या कर्तव्य हीन पति, ऐसा बता कर उनकी निंदा नहीं की. सीता और लक्ष्मण की भी निंदा नहीं की.

लेकिन अर्वाचीन युगमें और खास करके नहेरुवीयन युगमें कई मूर्धन्योंने रामकी निंदा की है. रामके त्यागका, रामके उत्कृष्ठ अर्थघटनोंका, रामकी कर्तव्य निष्ठाका, रामकी प्रणालीयोंके प्रति आदरका वास्तविक मूल्यांकन नहीं किया है.

RAMA PROVIDED RULE OF LAW

शिरीष मोहनलाल दवे 

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Rama has been lost who had walked on this earth in flesh and blood Part-7

खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग)

एक बात हमे फिरसे याद रख लेनी चाहिये कि व्यक्ति और समाज प्रणालीके अनुसार चलते है.

समाजमें व्यक्तिओंका व्यवहार प्रणालीयोंके आधार पर है

     प्रणाली के अंतर्गत नीति नियमोंका पालन आता है. अलग अलग जुथोंका व्यक्तिओंका कारोबार भी प्रणालीके अंतर्गत आता है. कर्म कांड और पूजा अर्चना भी प्रणालीके अंतरर्गत आते है.

     मानव समाज प्रणाली के आधार पर चलता है. प्रणालीके पालनसे मानव समाज उपर उठता है. समाज के उपर उठनेसे मतलब है समाजकी सुखाकारीमें और ज्ञानमें वृद्धि. समाजके ज्ञानमें वृद्धि होनेसे समाजको पता चलता है कि, समाजकी प्रणालीयों को कैसे बदला जाय, कैसे नयी प्रणालीयोंको लाया जाय और कैसे प्रणालीयों को सुव्यवस्थित किया जाय.

     शासक का कर्तव्य है कि वह स्थापित प्रणालीयोंका पालन करें और और जनतासे पालन करवायें.

कुछ प्रणालीयां कोई समाजमें विकल्प वाली होती हैं.

     जैसे कि एक स्त्रीसे ही शादी करना या एक से ज्यादा स्त्रीयोंसे शादी करना.

जीवन पर्यंत एक ही स्त्रीसे विवाहित जीवन बीताना या उसके होने से या और कोई प्रयोजनसे दुसरी स्त्रीसे भी शादी करना.

     ऐसे और कई विकल्प वाले बंधन होते है. इनमें जो विकल्प आदर्श माना गया हो उसको स्विकारना सत्पुरुषोंके लिये आवश्यक है.

शासक को भी ऐसी आदर्श प्रणालीयोंका पालन करना ईच्छनीय है.

शासकको हृदयसे प्रणालीयोंका पालन करना है.

     शासक (राजा या कोई भी व्यक्ति या व्यक्ति समूह जिनके उपर शासन की जिम्मेवारी है) तो कभी प्रणालीयों मे संशोधन कर सकता है तो वह नयी प्रणालीयां सूचित कर सकता है. अगर वह ऐसा करता है तो वह जनताकी निंदाके पात्र बनता है और जनता चाहे तो उसको पदभ्रष्ट कर सकती है.

रामने क्या किया?

     रामने एक आदर्श राजाका पात्र निभाया.

     उन्होने एक मात्र सीता से ही शादी की, और एक पत्नीव्रत रखा,

     वनवासके दरम्यान ब्रह्मचर्यका पालन किया,

     रावणको हरानेके बाद, सीताकी पवित्रताकी परीक्षा ली,

(वैसे भी सीता पवित्र ही थी उसका एक कारण यह भी था कि वह अशोकवाटिकामें गर्भवती बनी नहीं थी. अगर रावणने उसके उसके साथ जातीय संबंध रखा होता तो वह गर्भवती भी बन सकती थी.)

     रामने जनताकी निंदासे बोध लिया और सीताका त्याग किया. राम जनताके साथ बहस नहीं किया. रामने सीताका त्याग किया उस समय सीता सगर्भा थी. रामने सीताको वाल्मिकीके आश्रममें रखवाया, ताकि उसकी सुरक्षा भी हो और उसकी संतानकी भी सुरक्षा और संतानका अच्छी तरह लालन पालन हो सके.

     रामने सीताका त्याग करने के बाद कोई दूसरी शादी नहीं की.

     रामने यज्ञके क्रीया कांडमें पत्नी की जरुरत होने पर भी दूसरी शादी नहीं की, और पत्नी की जगह सीताकी ही मूर्तिका उपयोग किया.

 

     इससे साफ प्रतित होता है कि, राम सिर्फ सीताको ही चाहते थे और सिर्फ सीताको ही पत्नी मानते थे.

 

रामने तो ढिंढोरा पीटवाया कि सीता को एक बडा अन्याय हो रहा है,

रामने तो ढिंढोरा पीटवाया कि खुदको एक बडा अन्याय हो रहा है,

रामने तो अपने फायदे के लिये प्रणालीमें बदलाव लानेका ढिंढोरा पीटवाया,

रामने खुद अपने महलमें रहेते हुए भी एक वनवासी जैसा सादगीवाला जीवन जिया और एक शासक का धर्मका श्रेष्ठतासे पालन किया.

क्या रामने ये सब सत्तामें चालु रहने के लिये किया था?

     नहीं जी.

     रामको तो सुविधा का मोह था तो सत्ताका मोह था.

     अगर वे चाहते तो १४ सालका वनवास स्विकारते ही नहीं. अपने पार्शदों द्वारा जनतासे आंदोलन करवाते और अयोध्यामें ही रुक जाते.

     अगर ऐसा नहीं करते तो भी जब भरत वापस आता है और  रामको विनति करता है कि, वे अयोध्या वापस आजाय और राजगद्दी का स्विकार कर लें, तब भी राम भरतकी बात मान सकते थे. लेकिन रामने दशरथके वचनका पालन किया. और अपने निर्णयमें भी अडग रहे.

रामने वचन निभाया.

     रामने अपने पुरखोंका वचन निभाया. अपना वचन भी निभाया. अगर राम चाहते तो वालीका राज्य स्वहस्तगत कर सकते थे. अगर राम चाहते तो रावणकी लंकाका राज्य स्वहस्तगत कर सकते थे. उसके लिये कुछभी बहाना बना सकते थे. लेकिन रामने प्रणालीयां निभायी और एक आदर्श राजा बने रहे.

ईन्दीरा गांधीने क्या किया?

     नहेरुने भारतकी संसदके सामने प्रतिज्ञा ली थी कि, वे और उसका पक्ष, चीनके साथ युद्धमें हारी हुई जमीन को वापस प्राप्त किये बीना आराम नहीं करेगा. नहेरुको तो वार्धक्यके कारण बुलावा गया. लेकिन ईन्दीरा गांधीने तो १६ साल तक शासन किया. परंतु इस प्रतिज्ञाका पालन तो क्या उसको याद तक नहीं किया.

     ईन्दीराने खुद जनताको आश्वस्त किया था कि वह एक करोड बंगलादेशी घुसपैठोंको वापस भेज देगी. लेकिन उसने वोंटबेंककी राजनीतिके तहत उनको वापस नहीं भेजा.

     पाकिस्तानने आखिरमें भारत पर हमला किया तब ही ईन्दीरा गांधीने जनताके और लश्करके दबावके कारण युद्धका आदेश दिया. भारतके जवानोंने पाकिस्तानको करारी हार दी.

     याद करो, तब ईन्दीरागांधीने और उसके संरक्षण मंत्रीने एलान किया था कि अबकी बार पाकिस्तानके साथ पेकेजडील किया जायगा और इसके अंतर्गत दंड, नुकशान वसुली, १९४७१९५० अंतर्गत पाकिस्तानसे आये भारतीय निर्वासितों की संपत्तिकी किमत वसुली और उनकी समस्याओंका समाधान, पाकिस्तान स्थित हिन्दु अल्पसंख्यकोंकी सुरक्षा और उनके हितोंकी रक्षा, पाकिस्तानमें भारत विरुद्ध प्रचार अभियान पर कडी पाबंदी, पाकिस्तान की जेलों कैद भारतीय नागरिकोंकी मुक्ति, पाकिस्तानी घुसपैठीयोंकी वापसी, काश्मिरकी लाईन ओफ कन्ट्रोलको कायमी स्विकार और भारतके साथ युद्धनहीं का करार. ऐसा पेकेज डील पर हस्ताक्षर करने पर ही पाकिस्तानी युद्ध कैदीयों की मुक्ति और जमीन वापसी पर डील किया जायेगा.

     लेकिन ईन्दीरा गांधीने इस पेकेज डील किया नहीं और वचन भंग किया. इतना ही नहीं जो कुछ भी जिता था वह सब बीना कोई शर्त वापस कर दिया.

     नहेरु और ईन्दीराने गरीबी हटानेका वचन दिया था वह भी एक जूठ ही था.

     ईंदीरा गांधीका चूनाव संविधान अंतर्गत स्थापित प्रणालीयोंसे विरुद्ध था. न्यायालयने ईन्दीरा गांधीका चूनाव रद किया और उसको संसद सदस्यता के लिये सालके लिये योग्यता हीन घोषित किया.

प्रणालीयोंका अर्थघटन करनेका अंतिम अधिकार उच्चन्यायालय का है. यह भी संविधानसे स्थापित प्रणाली है.

     अगर इन प्रणालीयोंको बदलना है तो शासक का यह अधिकार नहीं है. लेकिन ईन्दीरागांधीने अपनी सत्ता लालसा के कारण, इन प्रणालीयोंको बदला. वह शासनपर चालु रही. और उसने आपतकाल घोषित किया. जनताके अधिकारोंको स्थगित किया. विरोधीयोंको कारावासमें बंद किया. यह सब उसने अपनी सत्ता चालु रखने के लिये किया. ये सब प्रणालीयोंके विरुद्ध था.

प्रणाली बदलनेकी आदर्श प्रक्रिया क्या है?

     प्रजातंत्रमें प्रणालीयोंमे संशोधन प्रजाकी तरफसे ही आना चाहिये. उसका मुसद्दा भी प्रजा ही तयार करेगी.  

     रामने तो सीताको वापस लाने के लिये या तो उसको शुद्ध साबित करने के लिये कुछ भी किया नहीं. तो उन्होने कुछ करवाया. तो रामने अपने विरोधीयोंको जेल भेजा.

तो हुआ क्या?

     सीता जो वाल्मिकीके आश्रममें थी. वाल्मिकीने सीतासे सारी बाते सूनी और वाल्मिकीको लगा की सीताके साथ न्याय नहीं हुआ है. इसलिये उन्होने एक महाकाव्य लिखा. और इस कथाका लव और कुशके द्वारा जनतामें प्रचार करवाया और जनतामें जागृति लायी गई. और जनताने राम पर दबाव बनाया.

     लेकिन जिस आधार पर यानी कि, जिस तर्क पर प्रणालीका आधार था, वह तर्कको कैसे रद कर सकते है? नयी कौनसी प्रणाली स्थापित की जाय की जिससे सीताकी शुद्धता सिद्ध की जाय.

     जैसे राम शुद्ध थे उसी आधार पर सीता भी शुद्ध थी. वाल्मिकी और उनका पूरा आश्रम साक्षी था. और यह प्रक्रियाको वशिष्ठने मान्य किया.

     इस पूरी प्रक्रियामें आप देख सकते हैं कि रामका कोई दबाव नहीं है. रामका कोई आग्रह नहीं है. इसको कहेते हैं आदर्श शासक.

रामका आदर्श अभूत पूर्व और अनुपमेय है.

RAMA KEEPS SITA IN VALMIKI ASHRAM

पत्नीके साथ अन्याय?

     रामने सीताका त्याग किया तो क्या यह बात सीताके लिये अन्याय पूर्ण नहीं थी?

सीता तो रामकी पत्नी भी थी. सीताके पत्नी होनेका अधिकारका हनन हुआ था उसका क्या?

इस बातके लिये कौन दोषित है?

राम ही तो है?

रामने पतिधर्म क्यों नहीं निभाया?

रामको राजगद्दी छोड देनी चाहिये थी. रामने राजगद्दीका स्विकार किया और अपने पतिधर्मका पालन नहीं क्या उसका क्या?

रामका राज धर्म और रामका पतिधर्म

     रामकी प्राथमिकता राजधर्मका पालन करनेमें थी. राम, दशरथराजाके ज्येष्ठपुत्र बने तबसे ही रामके लिये प्राथमिक धर्म निश्चित हो गया था कि, उनको राजधर्मका पालन करना है. यह एक राजाके ज्येष्ठपुत्रके लिये प्रणालीगत प्राथमिकता थी.

     सीता रामकी पत्नी ही नहीं पर प्रणाली के अनुसार रानी भी थी. अगर रानी होनेके कारण उसको राज्यकी सुविधाओंके उपभोगका अधिकार मिलता है तो उसका भी धर्म बनता है कि, राजा अगर प्रणालीयोंके पालन करनेमें रानीका त्याग करें तो रानी भी राजाकी बातको मान्य करें. राजा और रानी प्रणालीयोंके पालनके मामलेमें पलायनवादका आचरण करें.

सीता भी हाडमांसकी बनी हुई थी

      रामायणकी कथा, हाडमांससे बने हुए मानवीय समाजकी एक ऐतिहासिक महाकथा है. सीता भी हाडमांसकी बनी हुई थी. उसने अपने हाडमांसके नातेसे सोचा की यह क्या बात हुई जो शुद्धताकी बात इतनी लंबी चली! यदि ऐसा ही चलते रहेगा तो मुझे क्या बार बार शुद्धताका प्रमाण पत्र लेते रह्ना पडेगा?

     सीता कोई खीणमें पडकर आत्महत्या कर लेती है.

     जनक राजाको यह सीता खेतकी धरती परसे प्राप्त हुई थी. वह सीता धरतीमें समा गयी. कविने उसको काव्यात्मक शैलीमें लिखा की अन्याय के कारण भूकंप हुआ और धरतीमाता सिंहासन लेके आयी और अपनी पुत्रीको ले के चली गई.

     रामने अपनी महानता दिखायी. सीताने भी अपनी महानता दिखाई.

क्या रामके लिये यह एक आखरी अग्निपरीक्षा थी. नहीं जी. और भी कई पडाव आये जिसमें रामके सामने सिद्धांतोकी रक्षाके लिये चूनौतियां आयीं.

(क्रमशः)

 

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः सीता, राम, शासक, राजा, रानी, वचन, शुद्धता, जनता, प्रणाली, परिवर्तन, ईन्दीरा, आपातकाल, अधिकार, योग्यता, अर्थघटन, अयोग्यता, पाबंदी, सत्ता, लालसा, प्राथमिकता, राजधर्म   

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Rama has been lost who had walked on this earth in flesh and blood Part-6

खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग-)

 

राजाराम

रामके लिये हम “राजाराम” ऐसा शब्द प्रयोग करते है. इसका कारण भी है और एक संदेश भी है. राम भी तो एक चक्रवर्ती राजा थे. तो भी हम उनको “चक्रवर्ती” राम ऐसा कहेते नहीं है. जो राज्य को चलाता है वह राजा है. राजकर्ताओमें चक्रवर्ती राजा भी आ जाता है. रामने जिस तरह राज कीया और जो प्रणालीयां चलाई वो उस समय आदर्श मानी जाती थी और बादमें भी मानी जाती होगी इस लिये हरहमेश राम एक आदर्श राजा रहे और इस लिये वे पूजनीय भी बने.

आदर्श राजा की परिभाषा क्या है?

जो राजा प्रस्थापित प्रणालीयोंका पालन करावे और स्वयं भी प्रस्थापित प्रणालीयोंका पालन करे और ऐसा करनेमें वह जरा भी शंकास्पद व्यवहार न करे उसको आदर्श राजा कहा जाता है.

प्रणाली क्या होता है?

समाजमें व्यक्तिओंका व्यवहार प्रणालीयोंके आधार पर है. नीति नियमोंका पालन भी प्रणालीके अंतर्गत आता है. अलग अलग जुथोंका व्यक्तिओंका कारोबार भी प्रणालीके अंतर्गत आता है. कर्म कांड और पूजा अर्चना भी प्रणालीके अंतरर्गत आते है.

 

राजा को भी अपने लिये जो परापूर्वसे जो आदर्श मानी गयी है उन्ही प्रणालीयोंका हृदयसे पालन करना होता है. राजा नयी प्रणाली / प्रणालीयोंकी स्थापना कर सकता नहीं है. यह उसका अधिकार भी नहीं है.

 

रामने रावणको तो हरा दिया और उसके भाई विभिषणको उसका राज्य दे दिया. क्यों कि राजा का धर्म है पुरस्कार देना. यह आदर्श माना गया है. ऐसा भी एक पाठ है कि विभिषण जब रावणको छोड कर राम के पास रामको मदद करनेके लिये आया तो रामने मददके बदलेमें लंकाकी राजगद्दीका आश्वासन दिया था तना ही नहीं, लेकिन उसका राज्याभिषेक भी कर दिया था. इसको रामकी मुत्सदिता कहो या कुछ भी कहो. लेकिन उन्होने विभिषणके पास पूरी पारदर्शिता रखी थी. इस प्रकार दोनो एक दुसरेके लिये वचन बद्ध हो गये थे.

 

सीता मुक्त हो गयी. रामने एक राजा की प्रतिष्ठा पुनः स्थापित की

लेकिन सीता, अपने हरणके बाद, तो लंकामें रावण के अधिकारमें थी. यह बात सही है कि, रावणने सीताको अपने महलमें नहीं रखा था. इसके साक्षी हनुमान थे. लेकिन हनुमान तो रामके दूत और सलाहकार थे और रामसे अभिभूत थे. उनका कहेना कैसे मान लिया जाय? राजा या कोई भी पुरुष कभी पराये पुरुषके घर गई और ठहरी अपनी स्त्री को पवित्र मान सकता नहीं है. पर पुरुषके घर ठहरी स्त्रीको पवित्र कैसे माना जाय? 

तो क्या किया जाय?

सीता को अपनी पवित्रता सिद्ध करनी चाहिये?

तो पवित्रता सिद्ध करनेके लिये क्या प्रणाली थी?

अग्नि परीक्षा.

 

अग्नि परीक्षा क्या है?

चिता-प्रवेष. या अंगारों पर चलना.

चिता-प्रवेश करके बिना जले वापस आना एक चमत्कार है. हम चमत्कारोंमे मानते नहीं है. लेकिन आज भी कई लोग अंगारोंके उपर चलके दिखाते है.

अग्नि परीक्षा का एक विशेष अर्थ यह भी है कि मानसिकता की परीक्षा. जैसे कि “यक्ष प्रश्न” एक ऐसा प्रश्न है कि या तो उसका उत्तर ढूंढो या तो खतम हो जाओ.

“२००१ में भूकंप पीडित गुजरातको बाहर निकालके प्रगतिके पथ पर लाना” या तो “२००२ के गुजरातके दंगेके कारण विचलित गरिमाको पुनःस्थापित करना” नरेन्द्र मोदीके लिये अग्निपरीक्षा थी. और “भ्रष्टाचारको कैसे खतम किया जाय” यह देशका यक्ष प्रश्न है.

 

सीताने तत्कालिन प्रचलित अग्निपरीक्षा पास की. रामने सीताका स्विकार किया.

राम, सीता लक्ष्मण और हनुमान अपने साथीयोंके साथ अयोध्या आये. भरत भी प्रस्थापित प्रणालीयोंमें मानने वाला शासक था, उसने रामको अयोध्या की राजगद्दी दे दी.

 

राम भली भांति राज करने लगे.

एक ऐसा भी पाठ है कि इस रामके अच्छे गुणोंकी और पराक्रमोंकी अतिप्रशंसा तो होती ही थी, लेकिन उसमें एक और बात भी चलती थी कि, परपुरुष के घर रही हुई सीता को रामने कैसे अपनाया?

परपुरुषके घर पर रही हुई स्त्री पवित्र होती है?

आजकी मान्यता क्या है?

 

अगर एक स्त्री और एक पुरुष एक घरमें एक साथ रहते है तो स्त्रीको पवित्र मानी जाती है? ( पवित्रताके बारेमें स्त्री और पुरुष दोनोंको समझ लो).

एक पुरुष और एक स्त्री अगर अकेले एक घरमें रहते है तो उनमें शारीरिक संबंध नहीं हुआ होगा ऐसा न्यायालय मानती नहीं है. न्यायालयका मानना है कि अगर उस स्त्रीका पति, अपनी स्त्रीको दुःचरित्रवाली समझे तो वह मान्य है. क्योंकि पर पुरुष एक परायी स्त्रीको अपने साथ अकेलेमें रखता है तो वह उसको इबादतके (पूजाके) लिये नहीं रखता है. और पतिको इस कारणसे उस स्त्रीसे तलाक मिल सकता है. ठीक उसी प्रकार एक स्त्री को भी एक वैसे ही पुरुषसे तलाक मिल सकता है.

 

अगर यह मान्यता आज भी है तो अगर ऐसी मान्यता आजसे पांच दश हजार साल पहले रखी जाती हो तो इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिये.

 

हम गलती कहां करते है?

 

हम एक मान्यताका स्विकार करके और पूर्ण विश्वाससे सीताकी पवित्रताको मान लेते है और फिर आगे चर्चा करते हैं.

क्यों कि हमने स्विकार कर लिया कि,

सीताको रावणके महलमें नहीं रक्खा गया था,

सीताको अशोकवनमें रक्खा गया था,

सीताके पास दैवी शक्तिथी कि रावण उसके पास आ नहीं सकता था और उसको स्पर्ष नहीं कर सकता था.

रामने लंकामें सीताकी अग्नि परीक्षा ली थी, और उसमें सीता सफल रही थी.

साक्षी कौन थे?

लेकिन इन सभी बातोंमे साक्षी कौन थे? इसका साक्षी कोई त्राहित व्यक्ति (थर्ड पार्टी जिनको रामसे और सीतासे कोई भी सरोकार न हो) नहीं था. अग्नि परीक्षा हुई, वह तो रामकी सेनाकी साक्षीमें हुई. राम की सेनाको कैसे त्राहित माना जाय.?

 

निष्कर्ष यही है कि वह अग्नि-परीक्षा अमान्य (ईनवेलीड) थी.

 

जिस बातको या जिस मान्यताको अगर आप प्रणालीके अंतर्गत सिद्ध न कर सके, तो उसको स्विकारा नहीं जा सकता. सीता की पवित्रता भी सिद्ध नहीं हो सकती थी. और इस बातको उछाला गया.

 

जिस बातको आप नकार नहीं सकते, जनताकी या तो कोई एक व्यक्ति की उस बातका या ऐसी मान्यताका आदर किया जाय, उस व्यवस्थाका नाम है जनतंत्र.

 

जिस सत्यको (बातको) नकारा न जा सके, उस सत्यका (बातका) जहां आदर होता है, चाहे वह सत्य कितने ही निम्न स्तरसे क्यों आया न हो, तो भी अगर उसका आदर होता है, उसको जनतंत्र (डेमोक्रसी) माना जाता है.

 

तो रामने उस सत्यका आदर किया. “आदर किया” मतलब आवश्यक कदम उठाये ताकि प्रणालीको क्षति न हो.

लेकिन राम तो राजा थे. युगपुरुष थे. एक पूर्ण पुरुष थे. क्या वे अपना दिमाग नहीं चला सकते थे?

जरुर चला सकते थे. और उन्होने चलाया भी.

कैसे उन्होने अपना दिमाग चलाया? कहां उन्होने गलती की? उन्होने गलती की थी या नहीं?

(क्रमशः)

 Rama Married Sita none else

शिरीष मोहनलाल दवे

 

टेग्झः राजाराम, सीता, परपुरुष, स्त्री, अपवित्र, पवित्र, अग्नि परीक्षा, थर्ड पार्टी, सत्य, प्रणाली, आदर, जनता, जनतंत्र 

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Rama has been lost who had walked on this earth in flesh and blood

खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग-)

सीताका हरण हो गया.

सीताकी शोधके लिये राम भटकने लगे,

रामको हनुमान और सुग्रीव मिले

हनुमान, सुग्रीव आदि कौन थे?

वे निश्चय ही केराला के थे. जो मल्ल विद्या (मार्शल) आर्टमें उस समय निपूण थे. उस समय ऐसा हो सकता है. वे सब मनुष्य ही थे. अगर वह सचमुच बंदर होते तो उनकी मुंह की रचनाके कारण व्यंजन और स्वरका उच्चारण ही कर नहीं सकते. वानर का मतलब “अपि एतद्‍ नरः वा न वा?”. क्या यह नर (मनुष्य) है या नहीं है? यानी कि वानरः. हनुमानकी माता वानर नहीं थी. न तो उसका पिता (मरुत) वानर था. हनुमान मरुत की तरह यह चपल तीव्र गतिवाले थे है इस लिये उनको मरुतपुत्र कहे गये. वह कुछ भी हो, वे कोई भी बंदर नहीं हो सकते.

सुग्रीवकी स्मस्या

सुग्रीवने अपनी समस्या बताई. वह समस्या यह थी कि, उसका भाई जब किसी दुश्मनसे लडनेको गुफामें गया तो सुग्रीवने यह सोचकर गुफाका द्वार बंद कर दिया कि दुश्मनने वालीको मार दिया होगा क्यों की, गुफासे खून बाहर आने लगा था.

वाली एक महाबलवान राजा था. उसकी लडने की (द्वंद्वयुद्धमें) ऐसी कला थी कि वह अपने   प्रतिस्पर्धीको हतःप्रभ करके उसकी ताकतको आधी कर देता था. उस समयकी इस युद्धकलामें वाली पारंगत था. “ब्रुस ली” को याद करो.  मार्शल आर्ट, ज्युडो, कराटे आदि सब वालीके जमानेकी निस्पत्ति हो सकती है.

द्वंद्व युद्ध

राम वैसे भगवान तो थे नहीं. उनका ध्येय था अपनी पत्नीको खोजना और गर कोई सीताका हरण कर गया है तो हरण करने वाले को हराके, नालेशीका बदला लेना.

अगर किसीसे युद्ध करना है और अगर सामने वाला अतिशक्तिशाली है तो रामके पास राज नीतिका विकल्प था. उनके पास विकल्प था कि वे वालीसे मिले और सुग्रीवके साथ संधि करावे. हो सकता है रामने यह भी सोचा हो कि सुग्रीव का प्रतिभाव कैसा रहेगा? राजाका धर्म है कि, वह आश्रितके हितमें ही काम करें. सुग्रीवने वालीके बारेमें विस्तारसे बात की होगी. इस लिये वे कोई अनिश्चित परिणाम वाला जोखम उठाना नहीं चाहते थे. उन्होंने युद्धके नियमोंसे विपरित निर्णय लिया. और छिपके उनको मारा.

कई लोग रामके इस कदमकी निंदा करते है

कुछ लोग बचाव भी करते है. लेकिन रामकी स्थिति का विचार करो. एक तो उसकी स्त्री खो गई है या उसका हरण हो गया है. राम अपनी स्त्रीकी क्या दशा होगी उससे चिंतित भी होगे, निराश भी होगे. उनकी मानसिकता उनको अधिर भी बना रही होगी.

अतिबलवान और आपखुद राजा वालीका साथ लेना खतरे से खाली भी नहीं हो सकता है. नहेरुको याद करो. नहेरुने रुससे मैत्री की. क्या पाया हमने? नहेरुने चीनसे मैत्री की. क्या पाया हमने? चीनने एक दुश्मन जैसा वर्तन किया और हमने हमारी जमीन खो दी.  

राजा यानी की राजकार्ता का यानी की शासकका धर्म है कि वह लंबी सोचे और जिससे मित्रता करनी है उसके बारेमें पुरी जानकारी प्राप्त करे. रामको जो ठीक लगा वह रामने किया.

और यह भी देखो कि, सुग्रीवके उपर इतना उपकार करने के बावजुद भी वह सुग्रीव, रंगरागमें पडजाता है. तो रामको अपना गुस्सा बताना पडता है. अगर उस समय सुग्रीवकी जगह वाली होता तो राम ऐसा कर सकते?

सुग्रीव सज्ज हो जाता है. चारों दिशामें अपने आदमीयों को भेज देता है. पता चलता है कि रावणने सीता का हरण किया है. और वह दक्षिणकी और गया है. हनुमान दक्षिणकी और जाते है. सीता का पता लगाते है. सीताको अशोक वन में मिलते है. सीताका संदेश लेके जाते है कि सीता चाहती है कि, राम उसको वापस ले जावें.

हनुमान पकडे जाते है. रावण हनुमानको मारता नहीं है. लेकिन उनकी पूंछको आग लगाता है. कोई कहेगा कि हनुमान अगर बंदर नहीं थे तो उनको पूंछ कैसे हो सकती है. पूंछ एक फेशन हो सकती है. आज भी कोई जगह ऐसी फेशन है. जैसे आज भी कुछ वनवासी सींग का टोपा त्योहारोंमें पहनते है.

हनुमानने उसी अग्निसे कोई जगह लंकामें आग लगाई होगी. लेकिन कविने अतिशयोक्ति अलंकार युक्त भाषामें सारी लंका में आग लगाई ऐसा कहा होगा. यह भी हो सकता है, कि रावण को और उसकी जनताको घरोंके बनानेमें व्यस्त रखने से राम को सेतू बनानेका वक्त मिल जाय. क्यों कि राम को मालुम तो हो गया था कि सीताको रावण उठा गया है.

रामने सेतू बनाया था या नहीं?

भूस्तर शास्त्रके हिसाबसे लंका हि नहीं पूरे विश्वकी धरती मीली हुई थी. धीरे धीरे उसमें दरारें पडने गयीं और अलग अलग खंड बनते गये. समुद्र खिसकता गया. पांच दश हजार साल पहेले हो सकता है लंका और भारतके बीच समुद्र गहरा न हो. बीच बीचमें धरती भी हो. और चलने लायक भी हो. लेकिन शस्त्र सरंजामके लिये और वाहन चलाने के लिये उस के उपर रास्ता बनाने के लिये काम करना जरुरी हो. ऐसी स्थितिमें जो रास्ता बनाया जायेगा वह पुल जैसा ही दिखेगा. मतलब यह है कि, पुलका नीचेका हिस्सा कुदरती हो और उपरका हिस्सा रामने सर्जित किया हो.

एक धारणा यह है कि, लक्का नामका प्रदेश मध्यप्रदेशमें है. एक इतिहासकार कहते है कि राम श्रीलंकामें गये ही नहीं थे. राम तो इस लक्कामें गये थे. इस लक्काके आसपास ऐसी जमीन है जहां पानीके कई खड्डे है. रावण गधे पर बैठके पंचवटी गया था. तो ऐसी जगह पर तो गधा ही चल सकता है. राम, श्रीलंका गये नहीं थे. रामने तो नर्मदाको पार ही नहीं की थी. वह कैसे श्री लंका जा सकते. रावणने शणके कपडे पहेने थे. मध्यप्रदेशके प्रदेशमें शण पैदा होता है. यहां कुछ लोग रावणको पूजते भी है. लेकिन इसमें विरोधाभास है. शण यहां पैदा होता है ऐसा एक जगह बताया है. दूसरी जगह यह भी लिखा है, कि दारुका मीट्टीका जग रोमसे आता था. अगर रोमसे दारु और दारु का जग आ सकता है तो शण भी आ सकता है. मीस्रके ममीके उपरका सूती कपडा भी तो भारतसे जाता था. इस लिये मध्यप्रदेशके लक्का का आधार शण नहीं बन सकता. पंचवटी जानेके लिये या लंका जानेके लिये  न तो सिंधु, सरस्वती न तो साबरमती नदी को क्रोस करना पडता है वैसे ही नर्मदाको भी क्रोस करना पडता नहीं है.

श्री लंकाके की सिंहाली भाषा भी बिहारी हिंदीसे मिलती जुलती है. लेकिन वह कुछ भी हो मध्यप्रदेशमें कोई रामसेतू दिखाई नहीं देता. इन सब बातोंको छोड भी दे. क्यों कि ये सब बातें रामके अस्तित्वको या तो उसके चरित्र पर असर कर्ता नहीं है.

मूल बात पर आते हैं.

राम रावण का युद्ध हुआ

रावण ममत पर गया. और युद्ध किया. रामने रावणको मारा और राम अपनी पत्नी सीतासे मिले.

रामके चरित्र को चार चांद लगाने वाली रामायण यहां से शुरु होती है. कई सारे मूर्धन्य और विवेचक यहां पर ही राजा रामके चरित्र को उजागर करनेमें रास्तेसे भटक जाते है.

रामके ऐसे कौनसे संस्कार है जो उनको अतिमानव बनाते है और हजारों सालोंके बाद आज भी उनका आदर किया जाता है. उनके जीवनका कौनसा हिस्सा है?

क्या रामका राजगद्दीका त्याग करना? पिताकी आज्ञासे वनवास जाना? राक्षसोंको मारना? रावणको हराना? क्या इन सब कारणोंसे राम पूजनीय बनते है?

नहीं जी. राजगद्दीका त्याग तो कई राजाओंने किया है. कई राजा ने वनवास ग्रहण भी किया है. राक्षसोंका संहार भी कई राजाओंने किया है. रावणको भी कईयोंने हराया था.

तो फिर, क्या बात है जो रामको महामानव बनाती है?

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे.

 

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Rama has been lost who had walked on this earth in flesh and blood

 

खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग-)

 

राजगद्दी किसको दिया जाय? राम को या भरतको?

 

कैकेयीके पिताको आश्वस्त किया था कि पट्टराणीको अगर पुत्र हुआ तो भी कैकेयीके पुत्र का ही राज्याभिषेक होगा. अब हुआ ऐसा कि पट्टराणीको ज्येष्ठ पुत्र हुआ और कैकेयीका पुत्र ज्येष्ठ पुत्र नहीं बना. प्रणाली ऐसी थी कि ज्येष्ठपुत्र को राजगद्दी मिले. अगर एकसे ज्यादा राजकुमार है तो जनतामें जो राजकुमार सर्वाधिक लोकप्रिय हो तो उस राजकुमारकी लोकप्रियता भी राजगद्दी पानेकी प्राथमिकता थी. राम सर्वोत्तम लोकप्रिय थे. अब क्या किया जाय?

राजाका कैकेयीको (या उसके पिताको) दिया हुआ वचन और प्रजाकीय प्रणाली, इन दोनोमें किसको महत्व दिया जाय.

अगर प्रणाली को मान लिया जाय तो राजाके वचनकी किमत नहीं रहती. राजाके वचनके मूल्यका ह्रास यह भी एक महाप्रणालीका नाश था.

 

हर लडाई मीकी – माउस की

 

इस समस्यामें जिन दैवी तत्वोंकी और खेल खेलनेकी बाते कहीं है उसकी हम चर्चा नहीं करेंगे. रामको राजा बनते देखते हुए ईन्द्रादि देवों को लगा कि अगर राम राजा बन जायेंगे तो वे राजकाजमें व्यस्त हो जायेंगे तो रावणके त्राससे हमें छूडायेगा कौन? ऐसा समझकर देवोंने मंथराको बलिका बकरा (बकरी) बनाया. और उसके मनमें भरतको राजा बनानेका विचार डाला और मंथराने कैकेयीको उकसाया. वैसे तो कैकेयी का कोई कसुर नहीं था. लेकिन दैवी शक्तियोंके सामने वह बेचारी क्या करे? ऐसा कारस्तान देवताओंने रचा. यह सब बकवास है.

 

कैकेयीने जो ईच्छा प्रगट की, और जो आचरण दिखाया वह उसका हक्क था. लेकिन ज्यादातर पुराण कथाकारोंको  यह असुर, दैत्य, राक्षस, दानवोंका ब्रह्माजी, शिवजी आदिकी तपस्या करके वर पाना फिर देवोंको परेशान करना और आखिर ईन मीकी-माउस समकक्ष युद्धमें विष्णु, शिव, गणेश, शक्तिमाता, कार्तीकेय इत्यादिका देवोंके पक्षमें संमिलित होना और युद्ध करके इन राक्षसी शक्तिओंको हराना ऐसा व्यवहार कायम रहा है. यह एक अलग ही विषय है.

 

संभव है कि दशरथ और मंत्रीमंडल दोनोंने मिलके यह रास्ता निकाला हो कि जिससे प्रणाली, जनताकी ईच्छा और राजाके वचन ये तीनोंको यथा योग्य सन्मान मिले. उस हिसाबसे रामको १४ साल वनवास मिले ताकि भरत निश्चिंत रुपसे राज कर सके.

 

रामको वनवास क्यों?

रामको वनवास इसलिये कि राम लोकप्रिय थे. और अगर जनता रामके लिये सडकपर उतर आवे, तो भरतको राजगद्दी छोडनी न पडे. रामके वनवासके समय दरम्यान, भरत जनताका प्रेम हांसिल कर ले सकता है.

 

रामके साथ सेना भी नहीं. क्यों कि अगर वही सेनासे राम शुरुआतमें दुसरे मुल्कोंको जितके बादमें राम या उसकी संतान अयोध्या पर भी कबजा कर ले तो!

 

रघुवंश या तो उस समयके राजा मनमानी नहीं कर सकते थे. राजाने अगर वचन दिया तो निभाना पडता था. प्रणालीयोंका पालन करना पडता था. जनताकी बात को मानना पडता. रामने दशरथकी बात कबुल कर ली.

 

लक्ष्मणको तो रामके साथ ही रहेनाका था.

 

सीताने भी सोचा होगा कि, जो पुराने टाईपके और अटपटे धनुषका उपयोग करनेमें भी माहिर है, वह वनवास के समय दरम्यान भी चूप बैठेगा नहीं. तो रामके उपर नजर तो रखना पडेगा. शायद सीता और लक्ष्मणकी पत्नी उर्मिला दोनोंने मिलके निर्णय लिया होगा. सीता जो है वह राम और लक्ष्मण पर नजर रखेगी, कि ये दोनों कहीं दुसरी शादी न कर ले. और उर्मिला अयोध्यामें क्या होता है, उसके उपर नजर रखेगी.

 

वैसे रामायण, कई सारे चमत्कारोंसे, दंतकथाओंसे, भगवानोंसे और प्रक्षेपोंसे भरपूर है. पहेलेसे ही कई सारे राक्षसों की हत्या, आकाशमेंसे पुष्पवृष्टि करना, अह्ल्याका उद्धार, देवताओंका अयोध्यामें आना, विष्णुके अवतार रामके साथ साथ, लक्ष्मी (सीता), शेषनाग (लक्ष्मण), शिव (हनुमान), ईन्द्रादि देवोंका पृथ्वी पर जन्म लेना, इत्यादि… जैसे कि अगर  कोई मंत्री कोई  प्रदेशमें जाता है तो साथमें अपनी मंडळी अथवा और सीक्योरीटी ले जाता है, और यजमान प्रदेशका समकक्ष मंत्री प्रोटोकोल निभाता है. इन सबकी चर्चा करना व्यर्थ है.

 

शुर्पणखा और राम-लक्ष्मण

 

राम लक्ष्मण और सीता, पंचवटीमें रहेते है. राम हमेशा अपनेको साम्राट भरतके प्रतिनिधिके रुपमें प्रस्तुत करते है. और यथा योग्य वनवासीयों कि सुरक्षा करते है.

 

रावणकी बहेन शुर्पणखा

 

एक दिन घुमते घुमते शुर्पणखा पंचवटी आती है और रामके रुपसे मोहित हो जाती है. वह रामको शादीके लिये प्रपोझ करती है. राम तो आदर्श पुरुष है. एक पत्नी रखनेमें ही मानते है. इसलिये राम शुर्पणखाको सूचन करते है कि वह लक्ष्मणसे प्रपोझ करें.

 

शुर्पणखा लक्ष्मण के पास वह जाती है तो लक्ष्मण उसको रामके पास जानेको कहेता है. ऐसा बारबार होता है. इस ईव-टीझींगसे शुर्पणखा गुस्से हो जाती है. इन दोनोंको मारने के लिये आती है. लक्ष्मण उसकी नाक और कान काट लेता है.

 

यह बात सचमुचमें नाक और कान काटनेकी नहीं होगी. शुर्पणखाके नाक कानसे ईजाग्रस्त हुई होगी. नाक और कान को काटलेना तो जघन्य अपराध है. शादी के लिये प्रपोझ करना कोई अपराध नहीं है. और स्त्रीका तो इस तरह टीझींग (परेशान)  करनेसे गुस्सा करना उसका अधिकार है. वह तो रावण की बहेन है. अगर हमारे इस जमानेमें मंत्री महोदयका लडका ट्राफिक पुलिसको मारपीट करने पर उतर आता है, तो शुर्पणखा क्या कुछ नहीं करती? शुर्पणखा, रावणके पास जाके राम लक्ष्मणके खिलाफ फरीयाद करती है.

 

सीता हरण

सीता हरण क्या होगा? एक पाठके अनुसार, सीता खुद लंका चली गई थी. एक पाठ के अनुसार सीता रावणकी पुत्री थी. और कई पाठोंके अनुसार रावण सीताका हरण कर गया था.

सुवर्ण मृगकी बात आती है. मरिची जो रावणका मामा था. वह अपनी मायावी शक्तिसे सुवर्ण मृग बन जाता है. सीताको लुभाता है. बहुरुप धारण करना एक कला है.

सीता रामको वह मृग लानेके लिये कहेती है. मरीची रामको दूर दूर ले जाता है. फिर राम उसको तीर मारते है, तो वह रामकी आवाजमें लक्ष्मण लक्ष्मण ऐसी आवाज देता है.

 

लक्ष्मण एक रेखा खींचके सीताको कहेता है कि इसका उलंघन न करना. लेखकोंने इसको नाटकीय बनाया है. हो सकता है कि वह एक सीमा हो, जिसके अंतर्गत सीता पर नजर रक्खी जा सके. या तो ऐसा कुछ हो ही नहीं. ऐसे ही लक्ष्मण चला गया हो.

रावण साधु के रुपमें आता है और भिक्षा मांगता है. इसमें भी नाट्यकरण है. सीता पैर उठाती है. रावण पैर पकडके खींच के सीताको उठा लेता है.

 

राम तो विष्णु भगवान है. सीता तो साक्षात लक्ष्मी है. सीता वल्कल पहेनी हुई है. रावण इस सीताको उसकी टांग पकडके अपने कंधेपर उठा लेता है. जो रावण, शिवका धनुष उठा भी नहीं पाया था, सीता उस शिवके धनुषके साथ बचपनमें खेलने लगी थी. उस सीताको रावण उठा लेता है. सीता इतनी बेबस और निर्बल कैसे? लक्ष्मी की ऐसी अवमानना कैसे?

 

किसीको भगवान बनानेमें है मुसिबतें

 

जब किसी मनुष्यको भगवान और किसी स्त्रीको देवी या महादेवी बना देते है तो ऐसी मुसबतें पैदा होगी ही.

 

इसको कैसे दुर किया जाय?

हमारे लेखकोंने या धर्मगुरुओंने इसका उपाय खोज रखा है.

 

अरे भाई, ये सब तो भगवानकी लिला है. भगवान तो संकल्प मात्रसे सबकुछ कर सकते है. लेकिन उनको लीला भी करनी है. इसलिये वे ये सब करते है.

 

अरे भाई लीला तो लीला, लेकिन भगवानकी ऐसी कैसी लीला है, कि, लक्ष्मी देवी की इज्जत चली जाय? भगवानने अपनी पत्नी लक्ष्मीकी बेईज्जती क्यों होने दी?

 

इसका भी जवाब है. देखो. जब राम वनवासके लिये निकले तो लक्ष्मीजी वैकुंठ वापस चली गई. रामके साथ जो सीता गई, वह कोई साक्षात लक्ष्मी नहीं थीं. वह तो लक्ष्मी की छाया थी. लक्ष्मीजी तो रामके पास अपनी छाया छोडके गई थीं. वह कोई सचमुच लक्ष्मी थोडी थी! वह तो छाया लक्ष्मी थी. इति सिद्धम्‌.

 

तो फिर हुआ क्या था?

बस ईतना हि समझ लो कि, सीता लंका पहुंच गई

 

रावणको सीतामें कोई चाहना थी? रावण क्या सीतासे शादी करना चाहता था? रावणने सीता पर अत्याचार किया था?

 

ऐसा कुछ नहीं था. रावणको सीतामें कोई रस नहीं था. न तो वह सीतासे शादी करना चाहता था न तो वह सीताको परेशान करना चाहता था. जिस रावणको कौशल्यामें रस नहीं था, उसको सीतामें कैसे रस हो सकता है? जो रावण कैशल्या और दशरथका हरण कर सकता है और बादमें  छोड भी सकता है, उसको सीतामें कोई रस नहीं हो सकता. कई पुरुषोंमें ऐसी प्रकृति होती है कि, वे स्त्री पर दबाव डालना चाहते नहीं है. रावण तो रामका सिर्फ अपमान करना चाहता था. वह उसने कर दिखाया. उसने अपनी बहेन पर किया हुआ “ईवटीझींग” का जवाब दे दिया. रावणने सीताको अशोकवाटिकामें छोड दिया. मजाकका जवाब दुगुनी मजाकसे दे दिया.

 

रामका अपमान तो होई गया.

 

लेकिन राम कोई कम नहीं थे.

(क्रमशः)

 

शिरीष मोहनलाल दवे

 

टेग्झः भगवान, लीला, राम, लक्ष्मण, सीता, सुमित्रा, उर्मिला, दशरथ, शुर्पणखा, रावण, ईव टीझींग, अपमान, छाया, लक्ष्मी, मीकी माउस

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खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग-३)

दशरथ राजा

वैवस्वतः मनु (सूर्यवंश) के बादके ६३ क्रमके राजा दशरथ (दशरथ-२)का प्रथम पुत्र रामचन्द्रजी थे. हम चाहे मनवन्तर-७ को माने या न माने, रामके पिताका नाम दशरथके अस्तित्वको न माननेका कोई कारण नहीं. सभी पुराणोंमे जो क्रम दिया है वह मुख्यतः समान है. कुछ राजाओंके नाम अलग मिलते है, लेकिन फिर पुत्रके नाम सही मिलते है. एक राजा दो नामसे जाना जा सकता है.

अयोध्या को नकारना भी जरुरी नहीं है.

दशरथने कैकेयीसे शादी की. कैकेयी केकेय देशकी थी, इस लिये “कैकेयी” नामसे जानी जाती थी. केकेय प्रदेश अयोध्याकी पश्चिम दीशामें लम्बी मुसाफरी के बाद, कुरुक्षेत्रको पसार करने के बाद भी कई सारी नदीयोंको पार करने के बाद आता है. उस जमानेमें तेज गतिसे दौडने वाले अश्वोंके बावजुद, सात दिन लगते थे. केकेय के बाद गांधार आता था. केकेय हालके पाकिस्तानमें होना चाहिये.

दशरथको दो रानीया थी लेकिन कोई पुत्र नहीं था, इसलिये उसने एक और शादी की. दशरथने केकेयकी राजकन्या पसंद की थी. इससे ऐसे निष्कर्ष पर जा सकते है कि, भारतीय संस्कृति उस समय भी गांधार तक विस्तृत थी.

वैसे तो ईशु की पहेली सदी तक हिन्दु राजाएं ईरान तक राज करते थे. रावण का भाई कुबेर पूर्वोत्तर (ईशान) सीमामें राज करता था, मतलब यह हुआ कि, आज हम जिसको अखंड भारत मानते है, उससे भी बडे विस्तारमें भारतीय संस्कृति फैली हुई थी.

कैकेयी के साथ शादी करनेके बाद भी दशरथको कोई संतान नहीं होती है. दशरथ पुत्रेष्टी यज्ञ करता है.

पुत्रेष्टी यज्ञ क्या था?

वास्तवमें यह एक उपचार हो शकता है. आयुर्वेदमें दूध चावल और सर्कराका नीत्य सेवन, पुत्र प्राप्तिका एक उपचार माना गया है. यज्ञ भी हुआ होगा. शायद वह खीरके नीत्य सेवनके उपचारका  आरंभ या पूर्णाहुतिका हो. उपचारकी क्रिया को भी यज्ञ कह सकते है. कोई भी कार्यको यज्ञ कह सकते है.

सभी रानीयां गर्भवती हुई. सुमित्राको लक्ष्मण और शत्रुघ्न हुए. कौशल्याको राम हुए. कैकेयीको भरत हुआ. सबसे बडे राम थे. दुसरे क्रम पर भरत. तीसरे क्रम पर लक्ष्मण और चौथे क्रम पर शत्रुघ्न.

राम-लक्ष्मण और भरत-शत्रुघ्न इस प्रकार जोडी भी बनी थी ऐसा कहा जाता है.

ऐसा क्युं था?

शायद प्रारंभसे ही यह बात निश्चित नहीं थी कि, दशरथका अनुगामी राजा किसको बनने का था?

रामका राज्याभिषेक करनेका था या भरतका राज्याभिषेक करनेका था?

तीनों रानीयोंके मनमें इसमें अनिश्चिंतता थी. कमसे कम सुमित्राके मनमें तो थी ही. क्यों कि सुमित्राने अपने एक पुत्रको रामके साथ लगा दिया था. और दुसरे पुत्रको भरतके साथ लगा दिया था. अगर राम राजा बने तो लक्ष्मणका भावी निश्चिंत बने. और अगर भरत राजा बने तो शत्रुघ्नका भावी निश्चिंत बने. और इससे खुद भी निश्चिंत रहे.

जब दशरथ केकेयके राजाके पास उसकी पुत्रीका हाथ मांगने गये तो हो सकता ही है कि उसने दशरथ से प्रश्न पूछा हो कि तुम्हे दो रानीयां तो है ही, तो तीसरी करने की क्या जरुरत पडी. तो दशरथने कहा होगा कि मुझे कोई संतान नहीं है इसलिये तीसरी शादी करनी है. केकेयके राजाने कहा भी हो, मेरी पुत्रीके पुत्रको तुम्हे राजा बनाना पडेगा. यदि कौशल्या पुत्रको जन्म दे तो भी, मेरी पुत्रीके पुत्रको राज सिंहासन पर बैठाना पडेगा. दशरथने इसका स्विकार किया था. ऐसी भी एक मान्यता है और पाठ भी है.

कैकेयी शूरवीर और मेधावती थी. वह दशरथको ज्यादा प्रिय थी. लेकिन पट्टराणी कौशल्या थी. उस समयकी प्रणालीके अनुसार पट्टराणीका पद एकबार दिया तो उसको विस्थापित किया जा सकता नहीं था.   

चारों पुत्रोंने विश्वामित्र ऋषिसे अस्र शस्त्र की विद्या प्राप्त की. विश्वामित्र कैसे आये और विश्वामित्रका दशरथ और दशरथके, मंत्रीमंडळ से क्या संवाद हुआ इसका विवरण आवश्यक नहीं. क्योंकि यह सब संवाद है. और संवादसे ऐतिहासिकताका निष्कर्ष निकाला नहीं जा सकता. प्रसंगोके क्रमसे ऐतिहासिकता पर अनुमान लगाया जा सकता है.

शिव धनुष और उसके उपर पणछ बांधना और शरसंधान करना

दक्षने एक यज्ञ किया था. जिसके यज्ञका ध्वंश शिवने किया था. शिवने वैसे इस यज्ञका ध्वंश किया नहीं था, परंतु, शिवने वीरभद्रको और भद्रकालीको उत्पन्न किया था और इन दोनोंने दक्षके यज्ञका नाश किया था. वीरभद्र का यह धनुष कालांतरे मिथीला के जनक राजाके पास आया था. ऐसी एक कहानी है. इसका विवरण हम छोड देतें है. लेकिन इतना जरुर कि वह एक बडा अदभूत धनुष था. जिसके बारे यह हो सकता है कि, उसको कैसे उठाना और उसके उपर पणछ की रस्सी कैसे बांधना और शरसंधान कैसे करना वह एक समस्या होगी.

जनकराजाकी कोई शर्त थी या नहीं?  सीता स्वयंवर हुआ था या नहीं? कौन कौन राजा आये थे? रावण आया था या नहीं?

क्या रावण सचमुच मान गया था?

एक बातकी पुष्टि होती है कि, राम एक नीपूण बाणावली थे. और उन्होने वह धनुष उठाके, पणछ बांधके सरसंधान कर दिया. अगर रामने यह काम सीता स्वयंवर के अंतर्गत किया था तो उस समय कई और कई राजा भी आये होगे. तो रावण भी होगा. ऐसे पाठ मिलते है कि रावण भी उस धनुषको उठा न पाया था.क पाठ यह भी है कि रावण जब उठा तो उसको समझाया गया कि तुम तो उम्रमें सीताके पिता समान हो इसलिये तुम न उठो तो बहेतर रहेगा. रावण मान गया था.

यदि इस बात पर शका है तो इस पाठको पढे.

१९५५में बृहद्‍ गुजरात संस्कृत विद्यापीठकी संस्कृतकी “मध्यमा” अभ्यासक्रममें एक पाठ था. “कौशल्याहरणम्‌” या तो “रावणस्य कौशल्याहरणम्‌” जिसमें रावण कौशल्याका ही नहीं लेकिन दशरथकी कौशल्याके साथ शादीके बाद कौशल्या और दशरथ, दोनोंका हरण करता है. और लंका ले जाता है. बादमें ऋषि लोग उसको समझाते है कि, अब तो कौशल्या परिणित स्त्री है, उसका हरण करना और परिणित स्त्रीके साथ लग्न करना तुम्हारे लिये वर्जित है. तो रावण मान जाता है. बादमें रावण, दशरथ और कौशल्याको एक लकडीकी टोकरीमें रखके टोकरीको समूद्रमें छोड देता है. अगर रावण, लग्नके बारेमें कौशल्याको छोड दे सकता है तो वह सीताको भी छोड सकता है.

भरतकी अनुपस्थितिमें रामका युवराज पद समारोह.

“युवराजपद समारोह” ऐसी कोई प्रणाली, दुसरी कोई जगह इतिहासमें सुनाई नहीं दी है. क्या दशरथ मुत्सद्दी था?

हमने अभी थोडे समय पहले देखा था कि भारतीय जनता पक्षने लोकसभाकी आगामी चूनावके लिये एक समितिका गठन किया और, इस चूनाव प्रचार समितिके अध्यक्ष के स्थानपर नरेन्द्र मोदीको नियुक्त किया गया. इस बातका बडा प्रचार भी हुआ. जिसको विरोध करना था उन लोगोंने विरोध किया. जिसको रुसवाना था उन लोगोंने रुसवाई की. इन लोंगोंकी शक्तिका नाप हो गया. जनशक्तिका भी पता लग गया.

दशरथने रामकी युवराजपदकी घोषणाके लिये अपना समय सुनिश्चित किया. जब भरत अपने नानाके यहां गया था तबका समय उसने युवराजपद समारोह के लिये चूना. दशरथकी धारणा थी कि शायद भरत ही विरोध प्रगट करेगा. कैकेयी कुछ विरोध प्रगट नहीं करेगी. जनता भी कोई विरोध नहीं करेगी इसलिये नानाके घरसे वापस आनेके बाद, भरतको भी जनताकी ईच्छाको मानना पडेगा.

कैकेयीको दशरथने दो वर मांगनेको कोई एक समय कहा था. इसमें दो प्रकारके पाठ है. जब दशरथ राजा असुरोंके सामने सुरोंके युद्धके समय सुरोंको मदद करने के लिये गये थे तब कैकेयी दशरथकी सारथी बनी थी. असुरोंने दशरथ पर जमकर आक्रमण किया, तो कैकेयीने इस आक्रमणसे दशरथको बचानेके लिये रथको भगाकर ले गई थी और दशरथ को बचा लिया था.  दुसरी कथा यह है, दशरथके रथका एक पहिया उसके धरीकी ठेसी निकल जानेकी वजहसे धरीसे निकलजानेवाला था, तब कैकेयीने अपनी उंगली रखके पहियेको निकले नहीं दिया. कैकेयीकी उंगली ईजाग्रस्त हो गई या कट गई थी. दशरथने इस कारण कैकेयीको दो वरदान दिये थे.

केकेय एक सीमावर्ती प्रदेश था. विदेशी आक्रमण का प्रथम भक्ष्य सीमावर्ती प्रदेश बनते है. हो सकता है कि, कैकेयी वीरांगना हो. इसलिये उसके पिताने उसके पुत्रको ही राजगद्दी मीले ऐसा दशरथसे वचन लिया हो. लेकिन एक बात यह भी है कि, प्रणाली ज्येष्ठपुत्रको ही राजगद्दी मिले ऐसी थी.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे,

टेग्झः

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