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Archive for February, 2016

 जे.एन.यु. जीन्ना नहेरु युनीवर्सीटी, मार दिया जाय, न कि, छोड दिया जाय. पार्ट – ४

यह कोई योगानुयोग घटना या छूटपूट घटना नहीं है.
कुछ समाचार माध्यम जेनएनयु की घटनाको एक “छूटपूट घटना”, या “बीजेपी और एन्टी-बीजेपी पक्षोंके बीचकी” घटना और “बीजेपीका उल्टा पासा पडा”, या बीजेपी विपक्षके साथ नीपटनेकी विफलता, आदि तारतम्य स्वयंसिद्ध है ऐसा समज़के इस घटनाका विश्लेषण करते है.
इसमें कोई शक नहीं कि नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके कुछ सांस्कृतिक पक्ष खास करके साम्यवादी (साम्यवादी पक्षको लेफ्टीस्ट माना जाता है और इस लेफ्टीस्टमें कुछ और जुथोंका भी समावेश होता है) पक्षोंका सुनियोजित एजन्डा हो सकता है.

गद्दार मीडीया

जेएल नहेरुसे तो ये लोग अभिभूत थे इसलिये उस नहेरुके जो फ्रोड थे उसको ब्लन्डर समज़के अपना पल्ला छूडा लेते थे या तो वितंडावादसे वे स्वयं गलत नहीं थे ऐसा सिद्ध करने की कोशिस करते थे. ये ही लोग जेएल नहेरुकी फरजंद इन्दिरा गांधीकी वाहवाह (१९७३-१९७५ को छोडकर) किया करते थे. इन्दिरागांधी द्वारा घोषित आपातकालमें तो इन्दिरा गांधीने ईनको नमन करनेका बोला तो ये लोग साष्टांग दंडवत प्रणाम करने लगे. जनता पार्टीको गिरानेमें भी इन लोगोंका हिस्सा कम नहीं था. वैसे तो इनको पता होने चाहिये था कि देशको कितना नुकशान हो रहा था. राजिव गांधी जो बिना कुछ प्रभावशाली काम किये प्रधान मंत्रीका शपथ लेने लगे तो ये ही लोग उनको मीस्टर क्लीनकी उपाधि देने लगे थे.

दिव्यभास्कर नामका एक अखबार है.

उसके समाचार पत्रोंके अधिकतर कोलमीस्ट भी जे. एन. यु. की घटनाका ऐसा ही विश्लेषण करते है. पता नहीं चलता है कि एन्टी-बीजेपीयोंकी जालके नेटवर्कने कितने मूर्धन्योंको फसाया है?
हो सकता है कि कई सारे मूर्धन्य स्वयं ही फंसनेके लिये तयार हो. आप कहोगे कि ऐसा थोडा हो सकता है? हां जि ऐसा हो सकता है. स्वयंके ताटस्थ्यकी और ख्यातिकी धून जब मनके उपर सवार हो जाती है तब कई लोग पथ भ्रष्ट हो जाते है. जे. एन. यु. की घटना पर हो रहा विवरण इसका एक श्रेष्ठ उदाहरण है.

दिव्यभास्करके अनेक कटारीया लेखकोंमेंसे प्रकाशभाई कोठारी एक कटारीया लेखक है.
उनके हिसाबसे जे. एन. यु. की घटना के एक विवादास्पद विषय पर आक्षेप-प्रतिआक्षेपोंकी स्पर्धा है.

साम्यवादी मीडीया का चरित्र

साम्यवादी मीडीया का एक चरित्र है कि विरोधीकी बातको न्यूनतम महत्व देना और स्वयंकी बातको अधिक महत्व देना. सामने वालेको नीचा दिखाना.

एक रनींग रेस थी. उसमें दो ही हिस्सेदर थे. एक यु.एस.ए. और दुसरा रशिया. यु.एस.ए. रेसमें प्रथम आया. और रुस सेकंड आया. तो रुस के समाचारपत्रमें यह समाचार कैसे छपा?

“रुसने रेसमें द्वितीय स्थान हांसिल कर दिया. युएसएका प्रतिस्पर्धी अंतिम दौडनेवाले से थोडासा ही आगे रहा.”

कुछ ऐसा ही मेसेज प्रकाशभाईने दिया है. शब्द और विशेषण सिर्फ अलग है.

निर्दोष कन्हैया

कन्हैया कुमारको चूंकि कन्हैयाकुमारने स्वयंने कोई देशविरोधी सूत्रोच्चार नहीं किया, इसलिये उनको निर्दोष दिखाने की चेष्टा की गई. वैसे तो शुरुसे अंततककी वीडियो क्लीप टीवी चेनलो पर किसीने नहीं दिखाया, इस लिये उन्होने अपनको पसंद तारतम्य को उद्धृत कर दिया.
और देखो कटारीया भैयाने छुपाया क्या?

इनका पूरा लेख करीब १००० शब्दोंका है. कन्हैया कुमार जो कटारीया भाईकी दृष्टिसे निर्दोष है. तो भी उसको गिरफ्तार किया गया है, इस बातका वर्णन आपको इस लेखमें मिलेगा. लेकिन जिसने नारे लगाये और जो भगौडा है उस उमर खालिदका नाम पूरे लेखमें नहीं मिलेगा. उसका प्रच्छन्न या अप्रच्छन्न कारण क्या हो सकता है? या तो उमर खालिदने देश विरोधी सूत्रोच्चार किये ही नहीं ऐसा कटारीयाभाईका मानना है या तो वे इस बातको छूपाना चाहते है. इतना ही नहीं पूरे समाचार पत्रमें उमर खालिदके नाम मात्रका उल्लेख नहीं है. १००० शब्दोंमें उमर खालिदका नाम तक नहीं.

दर्शकोंने २२ तारिख रातको कुछ चेनलोंपर उमर खालिदको जो अबतक भगौडा था उसको जे.एन.यु. में कल (२२-०२-२०१६), देखा था.

यह उमर खालिद, जे.एन. यु. में अपने छात्र समूहके सामने भाषणबाजी करते दिखाई देता है. लेकिन हमारे इस अखबारमें तारिख २२को घटी इस घटना का तारिख २३-०२-२०१६के प्रकाशनमें नाममात्रका भी उल्लेख नहीं है. इस घटना पर पूरा अंधार पट है. हमारे समाचारपत्रके हिसाबसे उमर खालिद की उपरोक्त घटना घटी ही नहीं है.

ओमर खालिदने क्या कहा उस बातका विवरण हम आगे चलके करेंगे.

कटारिया भाईने खूलकर कहा है कि पूलिस किसीके (सरकारको खुश रखने के लिये) इशारे पर काम कर रही है. चौपट राजाकी तरह पूलिसने, जिसने सूत्रोच्चार नहीं किया उस तंदुरस्त मोटे नरको पकडा है, पूलिसने नारेवाले किसीको भी पकडा नहीं है. (हो सकता है कि पूलिस आये तब तक वे भाग गये हो, लेकिन ऐसी धारणा करना शायद कटारीया भाईके लिये अक्षम्य है).
वह जो कुछ भी हो, इस बातमें आंशिक सत्य हो सकता है और नहीं भी हो सकता है. पूलिसकी कोई व्यूहरचना हो सकती है. लेकिन उमर खालिदने भारतके विरुद्ध नारे लगाये ही नहीं और कन्हैया बिलकुल निर्दोष है ऐसा प्रदर्शित करना ठीक नहीं है.

उमर खालिदने और उसकी गेन्गने जो नारे लगाये उसकी वीडीयो क्लीप तो है ही. कुछ समाचार माध्यमवाले इस क्लीपको फर्जी दिखाने की कोशिस कर रहे है. किन्तु सिर्फ कहेनेसे कोई क्लीप फर्जी नहीं हो जाती. यदि आप उसको फर्जी मानते है तो मौन रहीये और धैर्य रक्खे. अपने आपको अविश्वसनीय मत बनाईये.

कन्हैया कुमार किस आधार पर बेगुनाह नहीं है

कन्हैया कुमार किस आधार पर बेगुनाह नहीं है वह हमने इसी ब्लोगके पार्ट-२ में देखा है. कन्हैया खुद उमर खालिदके पास खडा है. उमर खालिद देशविरोधी सुत्रोच्चार करता रहता है. कन्हैया उसको सून रहा है. आरामसे सुन रहा है और तालियां भी बजाता है. कन्हैया न तो उसको पीटता है, न तो वह उसके उपर गुस्सा होता है, न तो वह उसको धक्के मारके दूर करता है, न तो वह उसके उपर नाराजगी व्यक्त करता है, न तो वह उसे रोकता है, न तो वह असंजस है, न तो उस समय वह कोई टीका करता है, न तो वह बादमें युनीवर्सीटीके एडमीनीस्ट्रेशनको जा कर फरियाद करता है. वयस्क लडका इतना बेसमज़ तो नहीं हो सकता. किन्तु कुछ मूर्धन्योंने अपना उलु सीधा करने के लिये उसके विरुद्ध जानेवाली इस बातको उपेक्षित की. वास्तवमें जब कन्हैयाको लगा कि पूलिस एक्सन होने वाला है और वह गिरफ्तार हो सकता है तब उसने ११ तारिखको नारोंके खिलाफ बोला. वह भी अर्ध सत्य. जब उसकी पूछताछ करने लगे तभी उसने अपनेको बचाने के लिये ऐसे नारे उसको पसंद नहीं है ऐसा कहा है. यह उसकी “आफ्टर थॉट” है. “अन आईडॅन्टीफाईड लोगों”का शब्द प्रयोग जूठ है. इस बातको मूर्धन्योंको समज़ना चाहिये. कुछ मूर्धन्य मुस्लिम तूष्टिकरणकी मानसिकता क्यूँ रखते है?

उमर खालिदका सफेद जूठ

उमर खालिद अपने गुटके लोगोंको कहेता है कि मैं कैसे पाकिस्तान जा सकता हूँ!! मेरे पास तो पासपोर्ट ही नहीं है. अरे भाई, भूपत क्या कोई पासपोर्ट लेके पाकिस्तान गया था? पाकिस्तानमे आर्मी, आएसआई और आतंकी गुटोंका क्या प्रभाव है वह मुस्लिमोंको और उसमें भी पाकपरस्त मुस्लिमोंको मालुम है. पासपोर्ट विसाकी आवश्यकता नहीं.

उमर खालिद कहता है कि मैं मुस्लिम हूँ इसलिये देशद्रोही माना जाता हूँ. (उसके आठ साथी गैर-मुस्लिम और शायद हिन्दु है तो भी वह ऐसा जूठ बोल सकता है क्यूँ कि वह मुस्लिम है?) खालिद आगे चलकर कहता है, हिन्दुस्तानमें जो गरीब है उनके उपर माओवादीका लेबल लगता है. या नक्षलवादीका लेबल लगता है… जो मुस्लिम है उसके उपर टेरेरीस्टका लेबल लगता है … आदि … खालिद कहेता है मैंने कोई नारे नहीं लगाये.

यदि वह अपने आपको सही बताता है तो वह पूलिसके सामने अपनेको प्रस्तूत क्यों नहीं करता? यदि बाहरके लोगोंने नारे लगायें तो उनको किसने बुलाया था? वे लोग कहां ठहेरे थे? वह स्वयं क्यों भाग गया? वह कहां कहां भागा था? कहां कहां ठहेरा था? दूसरे साथी कहां है? आदिका पूरा विवरण जनताके सामने वह क्यों प्रस्तूत करता नहीं है?

इस उमर खालिदके पिता कहेते है कि उसका (क्रांतिकारी) बेटा डरा हुआ है. उसको यदि सुरक्षाका अहेसास दिलाया जाय तो वह उसको संदेश भेज सकता है.

शायद उमर खालिदके पिता और कई अखबारी मूर्धन्य एक आंखसे (“अकबर” जो हिन्दु और मुस्लिम को एक आंखसे देखता था) नहीं लेकिन एकांगी नजरसे देखना चाहते है और वे डीडी, झी-टीवी आदि कुछ देखना पसंद नहीं करते है और लुझ टोंकींग करना ही पसंद करते है.

जे. एन. यु. किसका अड्डा है?

२०१० के दांतीवाडामें नक्षली हमलेमें ७५ भारतीय सुरक्षा जवानोंकी मौतको जे. एन. यु. ने विजय दिवसके जश्नके तौर पर मनाया था.

दुर्गा पूजाके दिवस पर महिषासुर दिवस मनाया जाता है,

बिफ पार्टीका आयोजन किया जिस पर उच्च अदालतने रॉक लगाई,

यौन पीडनके मामले १०१ जिनमें ५० प्रतिशत जे एनयु से संबंधित, जे एनयु में यौन उत्पिडनके हर वर्ष १७ मामले दर्ज होते है,

जनता इस कारणसे भी परेशान है

हर छात्र पर वर्षमें ३ लाख जनताकी जेबसे जाता है, सरकार हर वर्ष २४४ करोड रुपये खर्च होते है,

दुनियाकी टोप २०० युनीवर्सीटीयोंमें जे एनयु का नामोनिशान नहीं.

एक लंबी कहानी है….

मामला बीजेपी और एन्टी-बीजेपीका है ऐसा  बकवास चलाना

जे एन यु की घटना सिर्फ बीजेपी और एन्टी-बीजेपी के परिपेक्ष्यमें मर्यादित करके नहीं सोचना चाहिये.

नरेन्द्र मोदीका शासनका प्रारंभ और उसके बाद उठाये गये और उछाला गये बनावटी असहिष्णुताका विवाद, संसदका न चलना, बिहारके चूनावमें जातिवादी और कोमवादी किस्सोंको उछालना और उनको बढावा देना, उसमें बीजेपी की भर्त्सना करना, गुजरातमें पाटीदारोंके आंदोलनको बढावा देना, उनकी हिंसाकी भर्त्सना न करना, जाट आंदोलन की हिंसाकी भर्त्सना न करना, इन जातिवादी आंदोलनोंको बढावा देना, नरेन्द्र मोदीने विदेशोंके साथ भारतके संबंध अच्छे बनाये और भारतका नाम रोशन किया इसके उपर कभी समाचार माध्यम द्वारा शैक्षणिक चर्चा नहीं करना, ये सब एक पूर्वनियोजित एजंडे के अनुसार हो सकता है. इसकी संभावना न कारी नहीं जा सकती.

एक और बकवास “ये तो बच्चे हैं या युवान है उनके जोश दोषको नजर अंदाज करो”

कुछ मूर्धन्य लोग ऐसा मानते है कि इस नारोंवाली घटनाको जरुरतसे ज्यादा ही महत्व दिया जा रहा है. इन तथा कथित बच्चोंमें युवानोंमें जवानीका जोश है गलती कर बैठते है. तो कुछ मूर्धन्य लोग, इन देशविरोधी नारोंको समज़ते हैं कि पाकिस्तान जिन्दाबाद के नारे लगाते है तो शायद वह देशद्रोहकी बाते बनती नहीं है.

यदि पाकिस्तान एक मित्र देश होता, यदि पाकिस्तानके दिलमें और व्यावहारमें भारतके प्रति मैत्रीपूर्ण संबंध होते, यदि पाकिस्तान जिन्दाबादके नारे आइसोलेशनमें लगे होते. लेकिन यह पाकिस्तान एक ऐसा देश है जिसने हिन्दुस्तानके टूकडे करवाये. इस बातको आप भूल भी सकते हैं. लेकिन जिस पाकिस्तानने भारतसे चार युद्ध किये, और लगातार भारतको आतंकित करनेके लिये आतंकीयोंको सशस्त्र भेज रहा है और कई बार सफलता पूर्वक आतंकी हमले किये, हाजारोंका कत्ल किया, उस पाकिस्तानके जिन्दाबाद नारोंके साथ साथ हिन्दुस्तान मुर्दाबादके नारे भी लगाता है और भारतके टूकडे टूकडेके नारे भी लगते है तो ऐसे नारे लगानेवाला देशद्रोही ही बन जाता है. कोई नारा कभी आईसोलेशनमें अर्थघटित नहीं किया जाता. याद करो ये लोग १८ सालसे उपरके है भारतके ईन्टेलीजन्सका रेकोर्ड ये बोलता है कि इनकी पाकिस्तानसे आवन जावन है. खास करके उमर खालिदकी. इस उमर खालिदके साथ किसी भी तरहकी सहानुभूति और चेष्टा गद्दारीके दायरेमें आती है.

अमेरिकाने क्या किया?

याद करो एक अमेरिकी बच्चेने “पिस्तोल” शब्द मात्र अपनी कोपी बुकमें लिख दिया तो अमेरिकाने उसकी घनीष्ठ पूछताछ शृंखला चलायी थी.

अमेरिका सतर्क है और अपने देशके हितके विषयमें कभी “दया माया”का अवलंबन नहीं लेता. इसीकारण ९/११ के बाद अमेरिकामें आतंकवादकी घटना घटती नहीं है. हमारे देशमें जो मूर्धन्य लोग “दया माया” और “वाणीस्वातंत्र्य”की बातें करते हैं वे या तो बेवकुफ है या तो गद्दार है.

मोदी फोबीयासे पीडीत मूर्धन्य लोगोंसे सावधान

यदि कोई नरेन्द्र मोदीके सरकारके पक्षमें बोले तो उसको “मोदी भक्त” मान लेना यह कोई तार्किक बात नहीं है. भक्त कभी चर्चाके लिये नहीं होता है. किन्तु यहां पर दुसरोंको भक्त कहेनेवाले लोग स्वयंको अफज़ल गुरुके और गदारोंके भक्त सिद्ध कर रहे है उसका क्या?

शैक्षणिक संस्थाका कार्य क्षेत्र

शैक्षणिक संस्थाका अपना कार्य क्षेत्र है, और उसकी सीमा है. जे. एन. यु. भारतकी सीमासे बाहर नहीं है. न तो उसके शिक्षकगण भारतकी सीमासे बाहर है. भारतका संविधान जे. एन. यु. सहित पूरे भारत पर लागु पडता है. यदि कोई अपराधी उसके अंदर है तो पूलिसको जे. एन. यु. एडमीनीस्ट्रेशनकी परमीशन लेना जरुरी नहीं. आपराधिक मामलएकी जांच करना पूलिसका कर्तव्य है और अपराधीको सज़ा देना न्यायालयका काम है. इसमें जे.एन.यु. हस्तक्षेप नहीं कर सकती. बेशक जो कोई व्यक्ति चाहे वह राजकीय पक्षका हो, मूर्धन्य हो या शिक्षा-संस्थाका हो, यदि वितंडावाद करता है और नर्मीकी बात करता है उसके उपर सख्तिसे ही आना चाहिये.

शिरीष मोहनलाल दवे

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My blood is boiling on the episode of Jinna Nehru University (JNU), and the reaction of Pseudo-s which includes Nehruvian Congress and its culturally associates gangs inclusive of some of the media. These people are trying to present this case to make it political and as a conflict between two parties viz. BJP and Anti-BJPs. These people are illogical and talks without material or they talk with misinterpreted material. Expose these traitors. Hit them back very hard. Ask the Government to arrest them and to prosecute them.

जे.एन.यु. जीन्ना नहेरु युनीवर्सीटी, मार दिया जाय, न कि, छोड दिया जाय. पार्ट – ३

मेरा रक्त उबल जाता है, जब जीन्ना नहेरु विश्वविद्यालय की घटना पर दंभी और ठग लोगोंकी प्रतिक्रिया और चापलुसी देखता हूँ.
ये सब लोग कुछ वकीलोंके लॉ हाथमें लेनेकी घटना पर अत्याधिक कवरेज देते हैं. और देश विरोधी सुत्रोंको न्यायलयके अर्थघटनके हवाले छोड देते हैं.

क्या उनका शाश्वत ऐसा चरित्र रहा है?

वे कहेते हैं कि वकीलोंका काम न्यायालय के द्वारा न्याय दिलाना है, और यहां पर वकील स्वयं न्याय देने बैठ गये.

तथा कथित महानुभावोंका यह तर्क आंशिक रुपसे सही है.

लेकिन सभी वकीलोंको आप मात्र ही मात्र वकीलके रुपमें नहीं देख सकतें. वकील भी शाश्वत वकील नहीं होता है. वह भी आवेशमें आ जाता है. देशप्रेम एक ऐसी संवेदनशील अभिव्यक्ति है कि, कोई भी देशप्रेमी आवेशमें आजा सकता है. याद करो, सुभाषचंद्र बोस, अपनी बिमार मां को छोडके देशप्रेमके कारण निकल पडे थे.

एक और जो कदाचित कुछ लोगोंको अप्रस्तूत लगे तो भी इसको समज़े.

वकीलोंको कभी आपने स्ट्राईक जाते देखा है?

हाँ अवश्य देखा है.

वकीलोंका काम न्यायालय के द्वारा न्याय दिलाना है, और यहां पर वकील स्वयं न्याय देने बैठ गये. क्या वे स्वयंको न्याय दिला नहीं सकते हैं? यदि ऐसा ही है तो वे वकील बने ही क्यों? लिकिन मैंने देखा है कि कोई वर्तमान पत्रने वकीलोंकी ट्राईकके बारेमें ऐसी टीका की नहीं.
तब ये उपरोक्त महानुभावोंका तर्क “वकीलोंका काम न्यायालय के द्वारा न्याय दिलाना है” कहां गायब हो जाता है?
याद रक्खो, इसमें आक्रमक वकीलका कोई स्वार्थ नहीं था.
वकीलकी पतियाला कॉर्टकी घटनाको उसके परिपेक्ष्यमें लेनी चाहिये और सीमा के बाहर जाके महत्व देना नहीं चाहिये. क्राउडकी आवेशकी अभिव्यक्ति और प्रतिक्रिया भीन्न होती है इस बातको बहुश्रुत विद्वानोंको समज़ना चाहिये.

आप कहोगे कि यह तर्क जे.एन.यु. के छात्र समूहको क्यों लागु करना नहीं चाहिये?

आप घटनाक्रम देखिये और प्रमाणभानकी प्रज्ञा और प्राथमिकता की प्रज्ञाका उपयोग किजीये.

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रमाणित एक आतंकवादीको सज़ा दी.
आप कहोगे कि क्या सर्वोच्च न्यायालयके दिये हुए न्याय के विरुद्ध बोलनेकी आज़ादी नहीं है?

हां न्यायालयके दिये हुए न्याय के विरुद्ध बोलनेकी आज़ादी है.

लेकिन सभी आज़ादी असीमित नहीं है. न्याय मात्र, माहिति, तर्क और घटनाचक्रसे संलग्न होता है. यदि आतंकीको न्याय दिलाने के लिये कन्हैया और उसके साथीयोंके पास कुछ और, माहिति थी तो आतंकीको बचाने के लिये उन्होंने उस माहितिको, न्यायालयके सामने प्रस्तूत क्यूँ नहीं किया?

कन्हैया और उसके साथीयोंका उत्तरदायित्व

कन्हैया और उसके साथीयोंका सर्वप्रथम यह उत्तरदायित्व बनता है कि इस बातको समज़ाएं. दुसरी बात यह है कि यदि उनके पास जो माहिति और तर्क है उससे वे जनता को समज़ावें कि कैसे वह आतंकी निर्दोष था. सुत्रोच्चार करनेसे सत्य सिद्ध नहीं हो जाता है.

विश्वविद्यालय एक शिक्षण संस्था है. शिक्षण संस्था और न्यायालय दोनोंका क्षेत्र भीन्न भीन्न है. शिक्षण संस्थाका उपयोग कन्हैया और उसके साथीयोंने जो किया इससे शिक्षण संस्थाके कार्यमें बाधा पडती है. शिक्षाका अधिकार भी मानव अधिकार है. इसका हनन करना मानव अधिकारका हनन है. यदि यह शिक्षा संस्था सरकारी है तो सरकारी सेवामें बाधा डाली है ऐसा अर्थघटन भी अवश्य हो सकता है. उतना ही नहीं एक संस्था जिस कार्यके लिये है उसके बदले उसका उपयोग जबरदस्तीसे दूसरे कार्यमें किया गया वह भी गुनाह बनता है.

जनतंत्र संवादसे चलाता है

बिना तर्क, और वह भी देशके विरुद्ध और देशका विभाजन, देशके समाजका विभाजन और विघातक बातोंको फैलाके जनताको गुमराह करना जघन्य अपराध ही बनता है. बिना तर्क, बिना तथ्य और देशके विरुद्ध बात करनेकी आज़ादी किसीको नहीं दी जा सकती. जनतंत्र संवादसे चलाता है, सूत्रोंसे और महाध्वनिसे नहीं.
न्यायके लिये न्यायालय है. न्यायालयके सुनिश्चित प्रणालीयोंके द्वारा ही न्याय लेना तर्कसंगत है. यदि ऐसा नहीं हुआ तो अराजकता फैल जायेगी. यदि कोई अराजकता फैलानेकी दिशामें प्रयत्न करता है तो उसको देशद्रोह ही समज़ना पडेगा.

Coterie Dance of Nehruvian Congress of India Private Limited(Curtsy of the Cartoonists)

वितंडावादी पत्रकारित्व और अफवाहें

एक समाचार पत्रके कटारीयाभाईने (केतन भगतभाईने) जे.एन.यु. की घटनाकी प्रतिक्रियाको बीजेपी और एन्टी-बीजेपीका मामला बताया. कुछ समाचार पत्रोंने इस प्रतिक्रियाको “बीजेपीका दांव निस्फळ” ऐसा सिद्ध करने की कोशिस की.

एक समाचार पत्रने एक ऐसा तर्क दिया कि “गांधीवादी साहित्य यदि किसीके पाससे मिले तो वह गांधीवादी नहीं हो जाता है, उसी तरह यदि किसीके पाससे आतंकवादी साहित्य मिले तो वह आतंकवादी नहीं बन जाता”.

आमकक्षाके व्यक्तिको इसमें तथ्य दिखाई दे यह संभव है.

किन्तु सूत्रोंका अर्थघटन, उनको अलिप्त (आईसोलेटेड) रखकर, घटनाका अर्थघटन, घटनाको अलिप्त रखकर, वास्तविक सत्यको समज़ा नहीं जा सकता.

निम्न लिखित एक घटनाको समज़ो.

एक अश्वेत अपने घरमें बैठा था. इतनेमें खीडकी खूली और एक श्वेत शक्ख्स दिखाई दिया. तो अश्वेतने उसको गोली मार दी.
अब अश्वेत पर मुकद्दमा चला. न्यायाधीशने पूरी बातें सूनके अश्वेतको निर्दोष बताया. यदि न्यायाधीश इस घटनाको आईसोलेशनमें देखता तो?

किन्तु न्यायाधीशने इस घटनाका संदर्भ और माहोल देखा. वह जो माहोल था उसके आधार पर न्यायाधीशने उसको छोड दिया. वह क्या माहोल था? उस देशमें श्वेत और अश्वेत आमने सामने आगये थे. श्वेत लोगोंने हाहाकार मचा दिया था. श्वेत लोग, अश्वेतको देखते ही गोली मारने लगे थे. इसमें अफवाहें भी हो सकती है.

माहोल ऐसा था. वह अश्वेत अपने घरमें बैठा था. खीडकी खूली और एक श्वेत शक्ख्स दिखाई दिया. तो अश्वेत बहूत गभरा गया. अश्वेतको लगा कि वह श्वेत उसको गोली मार देगा. अश्वेतके पास बंदूक थी उसने गोली मार दी. वास्त्वमें वह श्वेत तो एक सीधा सादा निर्दोष श्वेत था.

कश्मिरमें हिन्दुओंके साथ क्या हुआ?

नहेरुवीयन कोंग्रेसके नहेरुवीयन फरजंद राजीव गांधीकी केन्द्रमें सरकार थी. उसकी सहयोगी सरकार कश्मिरमें थी. हिन्दुओं पर यातनाएं बढ रही थीं. १९८७से मुस्लिमोंने आतंककी सभी सीमाए पार कर दी. मस्जीदोंसे लाउड स्पीकर बोलने लगे. दिवारोंपर पोस्टर चिपकने लगे, समाचार पत्रोंमे चेतावनी छपने लगी, लाउड स्पीकरके साथ घुमने वाले वाहनोंमेसे लगातार आवाज़ निकलने लगी कि ऑ! हिन्दुओ ईस्लाम कबुल करो या तो कश्मिर छोडके भाग जाओ. यदि ऐसा नहीं किया तो मौतके लिये तैयार रहो. कश्मिर सिर्फ मुस्लिमोंका है. मुस्लिम लोग इश्तिहारमें कट-ऑफ डेट भी बताते थे.

नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके सांस्कृतिक साथी पक्षोंने भारतकी जनताको अनभिज्ञ रक्खा.

समाचार माध्यम मौन रहे.

कश्मिरकी सरकार निस्क्रीय रही.

सुरक्षा दल निस्क्रीय रहा. ३०००+ हिन्दुओंकी खुल्ले आम कत्ल हुई. ५०००००+ हिन्दुओंको भगाया.

अपने ही देशमें हिन्दु निर्वासित हो गये वे भी आज तक २५ साल तक.

न कोई गिरफ्तारी हुई,

न कोई एफ.आई.आर. दर्ज हुई,

न कोई जांच एजन्सी बैठी,

न कोई मानव अधिकारकी बात हुई,

न कोई इस्तिफा मांगा गया,

न तो हिन्दुओंकी तरफसे कोई प्रतिकार हुआ.

न कोई फिलम बनीं,

न कोई वार्ता लिखी गयी,

न किसीने मुस्लिम असहिष्णुता पर चंद्रक वापिस किये,

वास्तवमें हर कत्ल और हर निर्वासितके पीछे एक बडी दुःखद कहानी है

ऐसे कश्मिरके कुछ लोग जे.एन.यु. में आये और उन्होंने आजादीके सुत्रोच्चार किया. भारतको टूकडे टूकडे करनेकी बात की, और हमारे दंभी मूर्धन्य विश्लेषक महानुभाव इन सुत्रोंको आईसोलेशनमें रखकर अर्थघटन करके बोलते है कि कोई गद्दारीका केस नहीं बनता.

वास्तवमें तो जो आज़ादीकी बाते करते हैं उनको दुसरोंके यानी कि, कश्मिरी हिन्दुओंके मानव अधिकारोंकी रक्षा करना चाहिये. जो दुसरोंके मानव अधिकारोंका हक्क छीन लेते हैं और दशकों तक उनको वंचित रखते हैं. ऐसे लोगोंका आज़ादीकी बात करनेका हक्क बनता नहीं है. और वैसे भी उनको कौनसी आज़ादी चाहिये और किससे आज़ादी चाहिये? कौनसा संविधान चाहिये? कश्मिर तो भारतीय संस्कृतिका अभीन्न अंग है. वहां उनकी ही त सरकार है.

महात्मा गांधी और आतंकी का फर्क समज़ो

“गांधी साहित्य घरमें रखनेसे कोई गांधीवादी माना नहीं जा सकता” इसका हम विश्लेषण करें

गांधीवादी साहित्य एक विचार है. उसमें तर्क है. गांधीवादी बनना एक लंबी प्रक्रिया है.

आतंकवाद एक आवेश है आतंकवाद एक संकूचित आचार है.

आतंकवाद विभाजनवादी है और विघातक है. आतंकवादीका मनोविष्लेषण करना एक शैक्षणिक वृत्ति हो सकती है.

चूंकि गांधी साहित्य और आतंकवादी साहित्य एक दुसरेसे विरुद्ध है, जिनके पास आतंकवादी साहित्य होता है उसको सिद्ध करना होता है कि उसका आतंकवादसे कोई संबंध नहीं है. आतंकवाद प्रस्थापित न्यायप्रणाली और जनतंत्र के विरोधमें है इस लिये वह समाजके लिये घातक भी है. जिन लोगोंके पाससे ऐसा साहित्य मिलता है, उसकी प्रश्नोत्तरी होती है, उसके साथीयोंकी, संबंधीयोंकी, रिस्तेदारोंकी भी प्रश्नोत्तरी होती है. यदि उसमें विरोधाभास मिले तो उसका आतंकवादीयोंसे संबंध सिद्ध हो जाता है.

डरपोक नारेबाज़

एक सूत्रोच्चारी भगौडेके पिताश्रीने कहा कि उसका पुत्र देशद्रोही नहीं है. जब उसके पुत्र द्वारा किये गये देशविरोधी सुत्रोच्चारके बारेमें उससे प्रश्न पूछा गया, तो उसने कहा कि उसका निर्णय अदालत को करने दो. जो दिखाई देता है वह उसको देखना नहीं है. आज़ादीके नारे लगानेवाला खुदके लिये सुरक्षाकी मांग करता है. वह भूल जाता है कि आज़ादीकी लडत तो निडर लोगोंका काम है. क्या गांधीजी और शहिद भगत सिंहने कभी ब्रीटीश सरकारसे सुरक्षाकी मांग की थी?
अराजकताका माहोल बनाना चाहते हैं

कई दंभी समाचार माध्यम समाजके विघातक परिबलोंको उत्तेजित करते है. अनामत उसका उत्तम उदाहरण है. ये समाचार माध्यमके लोग इसकी तात्विक और तार्किक चर्चा कतई नहीं करते. जाटों और पाटीदारोंके अनरेस्टके समाचारोंको बेहद कवरेज देतें हैं ताकि उनका उत्साह बढे. ये लोग ऐसा माहोल बनाते है कि सरकार उनकी समस्यामें बराबर फंसी है. समाचार माध्यम सरकारकी निस्फलता पर तालीयां बजाता है. समाजके इन वर्गोंकी विघातक प्रवृत्तियोंको समाचार माध्यम उजागर नहीं करता और न हि उसकी बुराई करता है. मार्ग यातायात रोक देना, रेलको उखाड देना, रेल रोकना, रेलरुटोंकों रद करनेके कारण रेलको नुकशान होना, बस स्टोपोंको जला देना, पूलिस चौकीको जला देना, आदिकी निंदा ये समाचार माध्यम कभी नहीं करता. लेकिन पूलिस एक्सन पर इन्क्वायरी की मांगको और पूलिस एक्सेसीस की मांगको उजागर करते हैं और उसको ही कवरेज दिया करते है. जाट और पाटीदार के समाचार साथ साथ देते हैं ताकि पाटीदारोंका उत्साह बढे और फिरसे जोरदार आंदोलन करें ताकि समाज जीवन अस्तव्यस्त हो जाय. और वे जनता को बतादें कि देखो बीजेपीके राजमें कैसी अराजकता फैल गयी है.

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्ज़ः जे.एन.यु. , जीन्ना नहेरु युनीवर्सीटी, मेरा रक्त, वकील, न्यायालय, न्याय, सुभास चंद्र बोस, वकीलोंकी स्ट्राईक, पतियाला कॉर्ट, तर्क, माहिति, घटनाचक्र, माहोल, आईसोलेशन, विश्वविद्यालय शिक्षण संस्था, सरकारी सेवामें बाधा, अर्थघटन, आतंकवाद विघातक, वितंडावादी पत्रकारित्व, कश्मिरी हिन्दुओंके मानव अधिकार, ३०००+ कश्मिरी हिन्दुओंकी कत्ल, गांधी साहित्य, आतंकवादी साहित्य, मनोविश्लेषण, समाचार माध्यम, अराजकता

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जे.एन.यु. जीन्ना नहेरु युनीवर्सीटी, मार दिया जाय, नकि, छोड दिया जाय. पार्ट – २

Modi asked by Cong to reply on India - Copy

क्या जीन्ना नहेरु विश्व विद्यालयकी घटनासे कुछ लाभ हुआ है?

एक लाभ अवश्य हुआ है कि कोमवाद ज्ञातिवाद और देशकी जनताको विभाजित करनेवाले महानुभाव कहेजाने वाले बुद्धिजीवी लोग खुला पड गये है. वैसे तो प्रो-बीजेपीवालोंको तो ज्ञात ही था कि ये दंभी और आत्मकेन्द्री लोग की क्या सोच है! किन्तु उनको यह ज्ञात नहीं था कि ये लोग वॉटबेंक के लिये किस सीमा पर्यंत जा सकते है. इन दंभीयोंकी यह सोच कैसे बनी? नहेरुवीयन कोंग्रेसके ६० सालके शासनके अंतर्गत नहेरुवीयनोंने पछात लोगोंको अनपढ रक्खा है और कुछ जग्रत लोगोंको स्वकेन्द्री बनाके ख्यातिके और असीमित धनके भूखे बना दिये है. सत्य आम जनता तक पहूंचने नहीं दिया. इसमें भ्रष्ट समाचार माध्यमका महाभाग रहा है.

इस प्रकार जीन्ना नहेरु विश्व विद्यालय घटनासे माहानुभावोंको पहेचान लेनेका जो लाभ है उसको उपरोक्त महानुभाव लोग अपने वितंडावादसे समग्रतया प्रभावहीन कर देने वाले हैं.
एक महानुभावने (चेतन भगतने) अपने लेखमें विवरण कुछ इस तरह किया.
इन महानुभावको ब्रह्मज्ञान हुआ कि नहेरुवीयन कोंग्रेस वॉट बेंकको समझ पायी है.
मुस्लिम + (तथा कथित) पीछडे लोग >> उच्च वर्ग.
इस वॉटा बेंकको बीजेपी समझ नहीं पायी है.

मतलब कि ये जो “नासमझ” है वह बीजेपी की है. मुस्लिम और तथा कथित पीछडे लोग ६० वर्षके नहेरुवीयन शासनके बाद भी समझ नहीं पाये और ये ना समझके लिये नहेरुवीयन कोंग्रेस स्वयं कितनी उत्तरदेय है उसके उपर यह महानुभाव मौन रहे.

सेतान कहां घुसता है?

जो बेकार है उनमें सेतान घुसता है.
जो भूखे है उनमें सेतान घुसता है.
जो निरक्षर और अज्ञानी है उनमें सेतान घुसता है.
जो येन केन प्रकारेण किर्ती प्राप्त करना चाह्ते है उनमें सेतान घुसता है.
“मेरा कर्तव्य क्या है वह मैं जानता हूं किन्तु मैं उसमें मेरी प्रवृत्ति नहीं होगी. मैं अधर्म क्या है वह जानता हूं, किन्तु उससे मेरी निवृत्ति नहीं होगी” (जानामि धर्मं न च मे प्रवृत्ति, जानामि अधर्मं न च मे निवृत्ति – दुर्योधन). इनमें सेतान घुसता है.

६० वर्ष तक शासन करने वाला नहेरुवीयन पक्ष और उसके सांस्कृतिक साथी पक्ष, इस बातको अवगत करनेमें असफल रहे या तो उन्होंने जानबुझकर जनताके अधिकतर हिस्सेको भूखा रक्खा और अशिक्षित रक्खा है.

एक अतिप्राचीन जिन्दा संस्कृति

एक अतिप्राचीन जिन्दा संस्कृतिको उपर उठाना नहेरुवीयन कोंग्रेसके लिये सरल था. अयोग्य एकाधिकारी पक्षके व्यक्ति/व्यक्तिओंके हाथमें १९४७से शासनकी धूरा होनेसे देश किस हद तक रसाताल होता है, भारत इसकी एक मिसाल है.

१९४७में तो नहेरुने कैसे महात्मा गांधीको ब्लेकमेल करके सत्ता हस्तगत की इस विषय पर हमने इसी ब्लोग साईट पर चर्चा की है. लेकिन हमारे कई वयस्क महानुभाव १९५२में क्यों समझ नहीं पाये यह देशकी विडांबना है. इतना ही नहीं आजतक उनमेंसे कई जिन्दा वयस्क और अवयस्क महानुभाव कैसे जानबुझकर स्वयंको अपने स्वार्थको पोषने के लिये गुमराह करते ही है, किन्तु साथ साथ अशिक्षित जनताको भी गुमराह करते हैं.

कुछ महात्मा गांधीके तथा कथित अनुयायी महानुभाव भी पथभ्रष्ट हो गये है.
“कुछ” शब्द का महत्व है. हम इन “कुछ”के बारेमें ही चर्चा करेंगे.

सर्व प्रथम यह समझ लो कि महात्मा गांधी का नाम लेनेके लिये नहेरुवीयन कोंग्रेस हक्कदार नहीं है. कई लोग इस बातको समझते नहीं है. उनमेंसे कई लोग उस बातको समझना भी नहीं चाहते. किन्तु इसकी हम चर्चा नहीं करेंगे.

महात्मा गांधी विचार है

महात्मा गांधी विचार है. गांधी विचारका खून नहेरुवीयनोंने किया है. ईन्दिरा गांधीने तो उसके टूकडॅ टूकडॅ करके समूद्रमें फैंक दिये है.

यदि इन दोनोंको अपने स्वयंके भीन्न विचार थे तो वे घोषित करते. दंभ करते, उनके नाम पर वॉट मांगते नहीं. किन्तु इन्होंने ऐसा नहीं किया. और स्वयंके भीन्न विचार और आचारसे देशका सांस्कृतिक और आर्थिक विनीपात किया. यदि नहेरुवीयनोंने देशकी दीनता, बेकारी और निरक्षरताको अपने नव्य विचारों और आचारोंसे नष्ट किया होता तो अच्छा होता. देशकी दीनता, बेकारी और निरक्षरता तो कायम रही. नहेरुवीयनोंने तो ठग विद्या आज़मायी.

गुमराह हुए गांधीवादी

गुमराह हुए गांधीवादी मूखपत्र के बारेमें एक कटु ब्लोग इस ब्लोग साईट पर उपलब्ध है. इसलिये इस समय हम जीन्ना नहेरु विश्वविद्यालय में घटी घटनाके परिपेक्ष्यमें ही चर्चा करेंगे.
प्रकाशभाई शाह एक कटारीया लेखक है. दिव्यभास्कर नामका गुजराती भाषाका एक समाचार पत्र है. इस समाचार पत्रका भी अन्य समाचार माध्यमोंकी तरह एक निश्चित एजन्डा है. मोदी-फोबीयासे पीडित भी है.

किन्तु इस समाचार पत्रके कुछ कटारीया महानुभाव जैसे कि गुणवन्त भाई शाह और विनोद भाई भट्ट मोदीफोबीयासे वंचित है. कुछ कटारीया महानुभाव लोग दूध-दही में पैर रखते है. इन सबकी चर्चा हम नहीं करेंगे.

स्वयंको गांधीवादी मानने वाले प्रकाशभाई शाह (जो “निरीक्षक” चलाने वाले और ग्रामस्वराज्य संस्थासे संबंधित है) की चर्चा करेंगे.

लड्डू और दूधपाकः

आपने लड्डू बनाया है. किन्तु उसमें शक्कर के साथ साथ रेत-मीट्टी भी डाल दीया. अरे भाई रेत और मीट्टीसे धरतीका बाह्यस्तर है. इसकी वजहसे तो हम पृथ्विकी गरमीसे बचे रहेते हैं. रेत मीट्टीमें क्या बुराई है? तो भी क्या आप उस लड्डूका आनंद ले पाओगे?

आपने बडा अच्छा दूधपाक बनाया है. लेकिन उसमें नमक भी डाल दिया तो मजा किरकिरा हो जायेगा. अरे भाई नमकमें क्या बुराई है? नमक तो जठरमें ०.४ नोर्मालीटीवाला हाईड्रोक्लोरिक एसीड बनाता है जो भोजनको सूपाच्य बनाता है.

भोजनदूषित हो गया. इनको संस्कृतमें पाक-दोष कहेते हैं.

विचारोंकी प्रस्तूतिमें भी दोष आ जाते हैं. इनकी संभावना अधिक ही होती है. इसका कारण सदर्भकी प्रज्ञाका अभाव या और प्रमाणभानकी प्रज्ञाका अभाव या और प्राथमिकताकी प्रज्ञाका अभाव होता है. कुछ महानुभाव अपना उल्लु सीधा करने के लिये जानबुझकर या अनजानमें दूषित रुपमें अपने विचारोंकी प्रस्तूति करते हैं.

यहां पर क्या हुआ?

हेड लाईन है … “अजंपा (अनरेस्ट)की अभिव्यक्तिको राज द्रोह (ठहराया बीजेपीने)

जीन्ना नहेरु विश्वविद्यालय की घटनाकी फलश्रुति का संदेश तो कटारीया महानुभाव यही देना चाहते है.

हरि ॐ. प्रथम भर्त्सना वकीलोंने जो लॉ-ओर्डर हाथमें लिया उसकी करो.

अरे भाई इसमें हरि ॐ कैसे आया?

वैष्णवोंका मानना है कि ब्रह्म स्वरुप अंतिम सत्य तो ॐ है. लेकिन हरि तो उससे भी पहेले हैं इसलिये हरि को ॐ से पहेले बोलो. हरि ही सत्य है. उसी प्रकार यदि बीजेपी जहां अभिप्रेत है वहां गोडसेसे शुरुआत करो, आरएसएस जहां अभिप्रेत है वहां गांधीके खूनसे शुरुआत करो और नरेन्द्र मोदी जहां अभिप्रेत है वहां २००२ के दंगोंसे शुरुआत करो. क्यों कि परम सत्य तो यही है.
इसलिये यदि जीन्ना नहेरु विश्वविद्यालयकी घटनाका प्रारंभ करना है तो प्रो-बीजेपी वकीलोंकी पतियालावाली घटनाका विवरणको प्राथमिकता दो. क्यों कि सत्य तो वकीलोंने जो लॉ-ओर्डर हाथमें लिया यही है. अन्य जो कुछ भी घटा हो, उसका न्याय तो न्यायालय ही करेगा. यदि कोई इव टीझींग करता है या किया है, तब आप शूरवीर बन सकते हैं किन्तु भारत माताके टूकडे करनेकी बात करनेवालोंपर असहिष्णु बननेकी चेष्टा अक्षम्य है. यदि आप ऐसा करोगे तो हमे आपकी इस मनोदशा और हेतु के बारेमें बहूत कुछ कहेना है. और इस कटारीया भाईने कहा भी ….

अब यह कन्हैया कौन था?

अरे भाई इसके उपर सहानुभूति उत्पन्न करनी है. वह तो गरीब मातापिताका लडका था. कन्हैयाको मेधावी घोषित करो. उसने “आज़ादी”की आवाज़ बुलंद की. उसने अपने तरिक़ेसे करवाई भी. यह तो उसका तरिक़ा था. कसुर थोडा था? (गांधीजी तो तरिक़े पर जोर देते थे वह अलग बात है).

“भूखमरेसे आज़ादी” … “संघवाद से आज़ादी” … “सामंतवादसे आज़ादी” … “पूंजीवादसे आज़ादी” … “हक्क हमारा आज़ादी” … “जानसे प्यारी आज़ादी”. (और भी कई सारे नारे लगाये. लेकिन उन नारोंको उद्धृत करनेका हमारे कटारीयाभाईने मुनासिफ नहीं समज़ा. क्यूंकि ऐसा करनेसे वे जो संदेश देना चाहते है वह नहीं दे सकते).

कटारीयाजी आगे चलके कहेते हैं कि, इन आज़ादीको यदि आप राष्ट्रद्रोह समज़ते है तो इसके लिये आपमें घोर अनभिज्ञता चाहिये. यानी कि जिन्होंने इस घटनाको राष्ट्रद्रोह समज़ा वे लोग घोर मूढ है.

कन्हैयाने गद्दारीके जो नारे लगाये लगवाये उसको तो कटारीया भाईने छूपा दिया. यह दंभकी परिसीमा है. महात्मा गांधी अवश्य रोये होगे.

वास्तवमें कटारीया “तथा कथित महानुभाव”को समज़ना चाहिये कि समाचार माध्यमका ध्येय जनताको सही समाचार देना और उसको शिक्षित करना है.

“जो छूपाया जाता है वह समाचार है”. जो नारे छूपाये वे ही तो सत्य था.

आगे चलके कटारीयाजी कुछ असंबद्ध बाते जैसे कि, एबीवीपी, उनके होद्देका त्यागपत्र, सुरजित भल्ला, उनके ट्वीट, राम माधव, युवानोंका कालाघेला (इमेच्योर) प्रोटेस्ट आदिका तत्वहीन बे-मटीरीयल जिक्र करते हैं.

क्या आपने ऐसे बेवकुफ देखे हैं जो तालाबके सामने अपनी शादीकी मांग करें, जिसमें लडकी भी निश्चित न हो और उसके पानेका आयोजन भी निश्चित न हो?

विश्वविद्यालय शिक्षण संस्था है. शिक्षण संस्था कोई मांग रखनेका क्षेत्र नहीं.

९ फेब्रुआरी क्या है? एक गद्दार जिसको भारतकी सर्वोच्च न्यायालय ने प्रमाणित किया था उसकी वर्षीका दिन है ९ फेब्रुआरी. कश्मिरके अलगाववादीयोंको बुलावा भेजा. उन्होंने भारत विरोधी नारे लगाये. हमारे कन्हैयालालने नहीं. लेकिन यह एक सफेद जूठ है. कोई भी अ-गद्दार यदि उसका साथी देशके विरुद्ध नारे बाजी करे तो वह आश्चर्य चकित होता है, उसको रोकनेकी कोशिस करता है, अपनी असंमति प्रकट करता है, वह अस्वस्थ हो जाता है. यदि वह अहिंसाका पूजारी है तो उसको पीटनेके बदले इतना तो अवश्य ही करता है.

यदि एक तथा कथित अ-गद्दार, देशके टूकडे टूकडे करने देनेके नारे लगाने वाले के पास खडा रह कर चूपचाप और सामान्य संमतिसूचक मूद्रासे सून लेता है तो या तो वह पागल है या तो वह खूद ही गद्दार है. याद करो. १९६२के युद्धके समय पश्चिम बंगाल के साम्यवादी साथीयोंने चीनकी सेनाको मूक्ति सेना नामसे नवाज़ा था और उसके स्वागतके लिये साम्यवादीयोंने रोड-शॉ किया था.

कश्मिर क्या है?

कश्मिर भारतका अभीन्न अंग है. उसकी चूनी हुई सरकारने इस अभीन्न अंग होने पर मंजूरीकी मोहर लगाई है. अब इस कश्मिर को कौनसी आज़ादी चाहिये. कश्मिरके मुख्य मंत्री, अन्यमंत्रीगण, स्थानिक लोकस्वराज्यकी संस्थाओंमे भी कश्मिरी लोग है. अब कौनसी आज़ादी उनको चाहिये? यदि उनको सिर्फ मुस्लिम होनेके कारण ही भारतसे अलग होना है तो ऐसा हक्क उनको नहीं मिल सकता. क्यों कि भारतका बटवारा धर्मके नाम पर हुआ होगा लेकिन भारतका बटवारा धर्मसे नहीं हुआ. जिनको यह बात ज्ञात नहीं वे पार्टीशन एग्रीमेन्ट पढ लें. यदि ऐसी मांगोंका आदर किया जाय तो भारतके कई मूढमति राज्य अपने अलग देशकी मांग रखना शुरु करेंगे. जहां नहेरुवीयन कोंग्रेस जैसे विभाजनवादी और पैसे से तरबर पक्ष हों, वहां ऐसी मानसिकता उत्पन्न की जा सकती हैं. इसी एजन्डासे उपरोक्त लोग जिनको हमारे प्रकाशभाई “मेघावी” विशेषणसे पुरस्कृत करते है वे भारतके टूकडे टूकडे करनेके सुत्रोच्चार करते हैं.
कश्मिरीयोंका और सभी मुस्लिमोंका फर्ज क्या बनता है?

सर्व प्रथम इस बातको ध्यानमें रक्खें कि हिन्दु हमेशा सहिष्णु है. यह इतिहासके पन्नोंपर लिखा हुआ है. यदि आपको आज हिन्दुओंकी असहिष्णुता दिखाई देती है तो उसका कारण आप स्वयं और नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके सांस्कृतिक साथीगण है. हिन्दुओंकी असहिष्णुता सिर्फ एक प्रत्याघात है. सभी मुस्लिम आतंकवादी नहीं है, लेकिन प्रच्छन्न और अघोषित रुपसे चलनेवाले ख्रिस्तीयोंके आतंकवादीयोंको छोडके सभी आतंकवादी मुस्लिम है. इसलिये जो मुस्लिम स्वयंको सुज्ञ समज़ते है उनके उपर अमनकी आशाके लिये हिन्दुओंको समज़नेका बोज़ है. इस बोज़को उनको धैर्यसे उठाना पडेगा. इस कार्यमें हिन्दुओंकी मदद भी मिलेगी. लेकिन मुस्लिमोंको खुलकर सामने आना पडेगा.

नरेन्द्र मोदीने एक बार कहा कि आर्टीकल ३७०से कश्मिरको क्या लाभ हुआ उसकी चर्चा की जाय … तो सत्ताके लालचु और कश्मिरके ३०००+ हिन्दुओंकी कत्लेआम, कश्मिरके ५००००० हिन्दुओंको अपने घरसे खदेड देनेके लिये जिम्मेवार और कश्मिरी हिन्दुओंको सातत्य पूर्ण आतंकित करके उनके दुख दर्दकी उपेक्षा करनेवाले ओमर अब्दुल्ला और उसके पिता खुदके पिताके त्याग और बलिदानकी बाते करने लगे. नहेरुवीयन कोंग्रेस ने भी कश्मिर के हिन्दुओंकी समस्याको न तो कभी उजागर किया न तो कभी उसका समाधान किया. भारत और कश्मिरके मुस्लिमोंका मानवीय फर्ज बनता है कि वे सर्व प्रथम कश्मिरके हिन्दुओंकी समस्याओंके समाधान के लिये उत्तेजित बनें.

सभी समस्याओंकी जड अशिक्षा और बेकारी है.

नरेन्द्र मोदी इसबातको खूब समज़ता है. इस लिये वह सर्वशिक्षा अभियान, स्कील डेवलपमेन्ट, ग्रामोद्योग, सखीमंडल, मेक इन ईन्डीया, ईन्फ्रास्ट्रक्टर डेवलपमेन्ट आदि पर जोर देता है. “सबका साथ सबका विकास” में भारतके सब लोग आ जाते हैं. लेकिन कुछ बेशर्म, सियासत करनेवाले है वे ज्ञातिवाद, भाषावाद, धर्मवाद, प्रदेशवाद आदिको उछालके देशकी जनताको विभाजित करना चाह्ते हैं. इस कार्यमें नहेरुवीयन कोंग्रेस मुख्य है. उसकी सांस्कृतिक प्रोडक्ट माया, ममता, एनसीपी, आरजेडी, सीपीआईएम, डीएमके, एडीएमके, मुस्लिम लीग आदि है. इन लोगोंका एजन्डा सिर्फ स्वयंके लिये सत्ता और पैसा है. जैसे अमीरोंसे पैसे वसुल करनेके लिये बाबा और गुन्डे होते हैं, उसी तरह इन लोगोंके पैसेमें अपना भाग वसुलने के लिये मीडीया और कुछ मूर्धन्य भी है. इन सबसे सावधान.

शिरीष मोहनलाल दवे

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जे. एन. यु. जीन्ना नहेरु युनीवर्सीटी. मार दिया जाय, कि, छोड दिया जाय. पार्ट-१

भारतमें दंभी धर्मनिरपेक्षवादियोंने अपनी हर सीमाका उलंघन कर दिया है. ये लोग क्षमाके पात्र नहीं है. ये लोग कमसे कम कारावास के लिये ही योग्य है. क्यों कि ये लोग नरातर कोमवादी, ज्ञातिवादी, हर तरहसे विभाजनवादी, अनीतिमान, असहिष्णु, शठ, वीन्डीक्टीव, और देशद्रोही है. ये सभी विशेषण इतिहासके पृष्ठोंपर उपलब्ध है. यदि इनको क्षमा प्रदान कर दी तो देशको अपार नुकशान होगा.

सर्व प्रथम इनलोगोंको पहेचान लो.

HEDLIEY NAME ISARAT

ये है नहेरुवंशी और उनके सदस्य,

इनके सांस्कृतिक साथीपक्षके नेतागण,

कुछ अधिकारीगण जिन्होंने नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंको आपराधिक कार्य करनेमें सहकार दिया,

कुछ टीवी चेनलवाले,

कुछ समाचारपत्रके संचालक और कोलमीस्ट,

कुछ महानुभाव (सेलीब्रीटी) जो आपराधिक मामलेमें बेतुका निवेदन करते रहते थे और अब भी कर रहे हैं,

देशद्रोहीयोंसे संबंध रखने वाले और सत्यको छिपाने वाले.

इन लोगोंको सर्व प्रथम गिरफ्तार किया जाय और कारावासमें डाल दिया जाय. और उसके बाद न्यायिक कार्यवाही शुरु की जाय. जब तक न्यायालयका अंतिम न्यायिक आदेश मिले तब तक इन सभीको कारावासमें ही रखा जाय. गद्दारोंको किसी भी प्रकारकी दया नहीं की जा सकती. यदि ये लोग सर्वोच्च न्यायालय तक जाते हैं तो जब तक सर्वोच्च न्यायालयका अंतिम आदेश आवे तब तक उनको कारावासमें ही रखना आवश्यक है.

आत्मकेन्द्री, खूनी और लोकतंत्रके हन्ता

BHARATKI BARABADI TAK

नहेरुवीयन कोंग्रेसी असहिष्णुतासे प्लावित है और राष्ट्रवादीयोंका दमन करनेमें इनकी बराबरी कोई नहीं कर सकता. सर्वोदयवादी और महात्मा गांधीवादी नेता जयप्रकाश नारायणकी कारावासमें की गयी आपराधिक चिकीत्सा के फलस्वरुप उनकी मौत के ये नहेरुवीयन कोंग्रेसके लोग जिम्मेवार हैमोरारजी देसाईको और अन्य ६६ सहस्र लोगोंको अकारण ही कारावासकी सजा करना ये सभी आचार इन नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंके अपराधकी मिसाल है. इसके बारेमें इस ब्लोगपोस्टमें कई प्रकरण और विवरण है. इसलिये हम इसकी चर्चा नहीं करेंगे. हम इस लेखमें नहेरुवीयनोंके और उनके सांस्कृतिक और सहयोगी साथीयोंके एतत्कालिन कारनामोंका विवरण करेंगे.

कपट और प्रपंचके आदी

इन देशद्रोहीयोंका ध्येय नरेन्द्र मोदीको और उसके साथीयोंको येनकेन प्रकारेण फंसानेका ही रहा है.

२००२ के दंगे इन नहेरुवीयन कोंग्रेसके सांस्कृतिक साथीयोंकी प्रथम मिसाल है.

साबरमती एक्सप्रेसके रेलके डब्बेको आग लगाना और इनके अंदर के हिन्दु प्रवासीयोंको जिन्दा जलादेनेकी प्रपंच लीला करनेवाला नहेरुवीयन कोंग्रेसका ही नेता था. यह नेता अपना काम करके पाकिस्तान भाग गया. इस नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताके बचावमें दुसरे एक नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताने कहा किनरेन्द्रमोदीने ऐसा कहा था कि बीजेपीके शासनमें गुजरातमें कोमी दंगे समाप्त हो गये है. ऐसा कहकर नरेन्द्र मोदीने मुस्लिमोंको दंगा करनेके लिये उकसाया.” इस लिये मुस्लिमोंको दंगे करनेको उकसानेका काम नरेन्द्र मोदीने किया है.

मुस्लिमोंकी क्रुद्धताको नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंका आदर

SHAMELESS

तात्पर्य यह है कि नहेरुवीयन कोंग्रेस और नहेरुवीयन कोंग्रेसका लगातार दशकोंके शासन की मानसिकता यह है कि बीजेपी द्वारा कायदेका शासन करनेसे नहेरुवीयन कोंग्रेसके मुस्लिम क्रुद्ध हो जाते है. और ऐसे मुस्लिमोंकी क्रुद्धताको नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेता आदर करते है. नहेरुवीयन कोंग्रेसने इसके कारण तो कभी लज्जा आयी तो कभी तो नहेरुवीयन कोंग्रेसने अपने इस भगोडे नेताको पाकिस्तानसे वापस लाने की प्रक्रिया की. यह है नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंकी और उनकी मुस्लिमोंके प्रति अंध आसक्तिकी की मानसिकता. इनको आप देशद्रोही नहीं कहोगे तो और क्या कहोगे?

नहेरुवीयन कोंग्रेसका हेतु सिर्फ हिन्दुओंको मार डालने तक सीमित नहीं था

WHO DID THE CONSPIRACY?

५९ हिंदुप्रवासीयोंका मुस्लिम नेताद्वारा जिंदा जलाना और पांच दशकोंसे जातिवाद द्वारा घृणा फैलाने काम कर रही नहेरुवीयन कोंग्रेसके कारण दंगा होना स्वाभाविक था. किन्तु साबरमती एक्सप्रेसमें हिन्दुओंको जिन्दा जलानेका हेतु सिर्फ हिन्दुओंको मारके बैठे रहेनेका नहेरुवीयन कोंग्रेसका नहीं था. नहेरुवीयन कोंग्रेस दंगा फैलानेको सज्ज थी. और दंगे हुए. दोनों जातिके लोग मरे. नरेन्द्र मोदीने उसको तीन दिनमें कंट्रोलमें भी कर लिया, तो भी नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके साथी पक्षोंने मिलकर नरेन्द्र मोदीको गुनेगार ठहराने के असीम प्रयत्न किया. एक विशिष्ठ अन्वेषण टीम बनायी. और प्रत्येक स्तर पर नरेन्द्र मोदीको बदनाम करनेका प्रयास करते रहे.

इस विशिष्ठ अन्वेषण टीमने नरेन्द्र मोदीको प्रश्नोत्तरीके लिये बुलाया. यह पत्र नरेन्द्र मोदीके पास पहूंचे उसके पहले ही नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंनेनरेन्द्र मोदी परिक्षण टीमके पास क्यूं नहीं जाता है? वह क्यूं डरता है? वह यदि स्वयंको निर्दोष समजता है तो उसको अवश्य जाना ही चाहिये. नरेन्द्र मोदी डरपोक है, वह खुद आतंकवादी है, वह खूद नाझीवादी है, वह कायदेके शासनमें मानता नहीं है इस लिये वह अपने आपको न्यायालयके सामने प्रस्तूत करता नहीं हैनरेन्द्र मोदी न्यायालयका अपमान करता हैआदि आदिकयी सारी अफवाहें फैलाके उसको बदनाम किया. .. और देखो हुआ क्या. नरेन्द्र मोदीको जब वह पत्र मिला तो वह तूरंत उसमें निर्दिष्ट दिनको अन्वेषण टीमके सामने प्रस्तूत भी हुआ और उसके सभी प्रश्नोंके आठ घंटो तक उत्तर दिया.

दूसरी और आप, इन्दिरा गांधीका आचार देखो. आपातकाल दरम्यान उसने और उसके निर्देशन पर किये गये कुकर्मो पर शाह जांच कमिटी के सामने उसने कभी अपने आपको प्रस्तूत नहीं किया. नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंने जो भर्त्सना नरेन्द्र मोदीकी की, वह वास्तवमें इन्दिरा गांधी पर ही सचोट रुपसे लागु पडती है. नहेरुवीयन लोग कायर है और वे लोग हमेशा न्यायालयके सामने प्रस्तूत होनेसे डरते है. हम ये बात लगातार देखते रहे है.

वीन्डीक्टीव, पाखंडी और भ्रष्ट नहेरुवीयन कोंग्रेस

We can do every thing

We can do every thing

राजस्थानका एक गुन्डा खंडणी वसुलीका काम करता था. गुजरातमें भी उसका कारोबार चलता था. उसके सामने कई केस दर्ज थे. गुजरात पूलिसने उसको मुठभैडमें मार गिराया. तो नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंने फर्जी एनकाउन्टरका केस गुजरातके पूलिस अफसरों पर चलाया. गुजारातके अफसरोंको निलंबित करके कारावासमें डाल दिया. गुजरातके बाहर केस चलाया. गुजरातके गृहमंत्रीको भी बेहाल किया और उसके पर भी केस चलाया.

२००८ बंबई ब्लास्टसे पहेले नहेरुवीयन कोंग्रेसने जिसका एनसीपी एक सांस्कृतिक और शासकीय साथी पक्ष था, उसने एक सर्क्युलर इस्यु करवाया था कि, भारतीय समूद्र सीमामें आने वाले जहाजोंका घनिष्ठ परिक्षण किया जाय (ताकि नहेरुवीयन संमिलित तस्करीका कारोबार सुचारु रुपसे चल सके ). ऐसी स्थिति निर्माण करनेसे बंबई ब्लास्टके आतंकवादी बंबईमें घुसपैठ कर सके. उन्होने अपने कारोबारको अंतिम अंजाम तक पहूंचाया.

दंभी सेक्युलरोंकी बेटी कैसी होती है?

NITISH PLAYS VOTE BANK POLITICS.

केन्द्रीय ईन्टेलीजन्स एजन्सीने सूचित किया कि मुस्लिम आतंकियोंकी एक टीम नरेन्द्र मोदीको मारनेकी बना रही है. गुजरातकी स्थानिक ईन्टेलीजन्स सतर्क हो गयी. और उसको पता लगा कि दो लडकोंके स्थान एक युवती आत्मघाती बोंम्बर बनके बंबईसे रही है. पूलिसने उनको रास्तेमें ही रोक लिया. उनके साथ मुठभेड हुई. तीनोंको पूलिसने मार गिराया.

इस घटना पर दंभी सेक्युलरोंने बेसुमार शोर मचाया. उन्होंने कहा कि यह फर्जी एन्काउन्टर था. नरेन्द्र मोदीने निर्दोष लोगों की हत्या की है. गुजरातके पूलिस अफसरों पर केस चलाना चाहिये. और केस चलाया भी.

केन्द्रीय ईन्टेलीजन्स एजन्सीसे बुलवाया कि, हम तो एक आशंकाका समाचार देते हैं. हम जो कहे उसके उपर विश्वास नहीं करना चाहिये. गुजरातको स्वयंको भी हम जो कहे उसके उपर सत्यताके बारेमें अपनी खूदकी तरफसे जांच करनी चाहिये. गुजरातने ऐसा कुछ किये बिना ही हमारी कथाको सत्य मानके निर्दोषीयोंकी हत्या कर दी है.

अब देखो मजेकी बात. तीन व्यक्ति जिसमें एक (युवती) थी. यह युवती बंबईकी थी.

अन्य दो लडके थे. वे आतंकी थे. उनके पास शस्त्र थे.

जो लडकी थी वह उन लडकोंकी नजदीकी रिस्तेदार भी नहीं थी.

इस युवतीके माता पिताको ज्ञात भी नहीं था कि ये दो लडके कौन है और कहां रहते है और क्या करते है?

ऐसे लडकोंके साथ वह लडकी स्वयंके माता पिताको बिना बताये भाग जाती है,

इस लडकीके माता पिता को ज्ञात नहीं है कि अपनी लडकी कहां जाती है?

खुदकी लडकी जब भाग जाती है तो भी वे कभी तलाश नहीं करते है कि हमारी लडकी खो गयी है?

ये कैसे माता पिता है, खुदकी लडकी भाग गयी तो भी पूलिसमें फरियाद भी दर्ज नहीं करवाते हैं?

हर माता पिता अपनी लडकीका खयाल रखते है. किन्तु यहां पर एक ऐसे माता पिता है जो मुस्लिम होते हुए भी अपनी लडकीके बारे में अनभिज्ञ है. खुदकी लडकी किसके साथ घुमती फिरती है इस बातसे भी अज्ञात है ऐसा बताते है. यह बात असंभव है. क्यों कि जब लडकी घरसे भाग जाती है तो भी यह माता पिता उसकी तालाश नहीं करते है इसका मतलब यही होता है कि माता पिता को मालुम था ही की जिन लडकोंके साथ वह भाग गयी वे लडके कौन थे. लडकेनें उस लडकी के माता पिताको क्या बताया इस बात पर भी माता पिता मौन है. हो सकता है कि लडकोंने गलत बताया हो. लेकिन कुछ तो बताया होना ही चाहिये. लेकिन इस लडकीके माता पिता साफ साफ बाताने के बदले मौन ही रहेते है. लडकीके भगौडेके बारेमें केवल ही केवल मौन ही रहते हैं.

इससे यह बात साफ हो जाती है कि माता पिता कुछ तो छिपाते ही है. इससे दो बातें सिद्ध होती है, कि आम मुस्लिमको आतंकीयोंके प्रति हमदर्द है. आम मुस्लिम आतंकीयोंके बारेमें भारतीय पूलिसको बताना नहीं चाहता है. इस तरह ये माता पिता पूरी मुस्लिम कोमको बदनाम करते है या तो मुस्लिम कोम ऐसी ही है. यह नहेरुवीयन शासनका एक और निस्कर्ष है.

किन्तु नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके सांस्कृतिक साथीयोंने इस घटनाका हार्द समझने के बदले इस घटनाको अलग मोड पर घुमा दिया. इस घटनाको फर्जी एन्काउन्टर घोषित कर दिया. चूं कि ये लोग शासनमें थे और चूं कि इनको देशके हितके बदले खूदकी सत्ता कायम रहे इसलिये अपनी वॉटबेंकको बनानेके लिये और कायम रखनेके लिये इन्होने जांच बैठा दी. और गुजरातके संलग्न पूलिस अफसरोंको निलंबित कर दिया. जो राष्ट्र के हितमें अपनी ड्युटी बजाते थे, उनको कारावासमें डाल दिया.

 वैसे तो गुजरातकी पूलिसने सही अंदाजा लगाया था कि, ये तीनो आतंकवादी गुटके ही थे. अमेरिकन खुफीया एजन्सीने भी विश्वस्त सूत्रोंसे भारतीय केन्द्रीय ईन्टेलीजन्सको यह बताया था कि एक टीम गुजरात जा रही है. भारतीय केन्द्रीय इन्टेलीजन्सने भी केन्द्रीय जांच एजन्सीको यह बात बतायी थी. किन्तु चूं कि उस समय केन्द्रीय शासन नहेरुवंशी कोंग्रेसका था, भारतीय केन्द्रीय जांच एजन्सीको नहेरुवीयन कोंग्रेस द्वारा कहा गया कि इस सूचनाको न्यायालयके सामने प्रस्तूत करो और दबा दो क्यूंकि हमारा ध्येय नरेन्द्र मोदीको और उसके पूलिस अफसरोंको त्रस्त करना है, हमारा ध्येय आतंकीयोंको खतम करनेका नहीं है. यह भी हो सकता है कि यह सूचना नहेरुवीयन कोंग्रेसने केन्द्रीय जांच एजन्सी तक पहूंचने ही दी हो.

नहेरुवीयन कोंग्रेसके ऐसे दुराचारसे कई और प्रश्न भी प्रस्तूत बनते है.

WE SPREAD RUMOR

नहेरुवीयन कोंग्रेसके गृह मंत्रीयोंने ये बाते दबा दी है. इस लिये उनको गिरफ्तार करना चाहिये,

उस समयके गृहसचीवोंका उत्तरदायित्व बनता है कि उन्होंने देशके हितमें कदम उठानेके स्थान पर एक राजकीय पक्षकी विभाजन वादी और देशहितके विरुद्ध दिये गये आदेशोंका क्यूं पालन किया? और  सतत क्यूं करते रहे? आतंकवादीयोंका उत्साह बढानेका काम क्यूं करते रहें?

गैर कानुनी आदेशोंको मानने के लिये ब्युरोक्रसी बाध्य नहीं है यह उनकी प्रतिज्ञा होती है. जिन्होंने गैर कानुनी और देशहितके विरुद्ध आदेश दिया उनके नाम क्यूं वे गृहसचीवोंने उजागर नहीं किया? इन गृहसचिवोंका फर्ज बनता था कि कोई भी देश हितके विरुद्ध के आचारको वे उजागर करें.

नहेरुवीयन कोंग्रेसके एजंडाको सफल बनानेके लिये और अपनी वॉटबेंकको जारी रखनेके लिये इस एनकाउन्टर को फर्जी बनाके, नरेन्द्र मोदीको सकंजेमें लेनेमें सभी भी दंभी और गद्दार सीक्युलर गेन्ग कूद पडी थी. उन्होने सोचा कि यह अच्छा मौका है नरेन्द्र मोदीको राजकीय रुपसे मौतके घाट उतारनेका. सभी टीवी चेनलवाले भी इस घटना पर तूट पडे. नीतीशकुमारने बोला, नरेन्द्र मोदीने बिहारकी एक बेटीको बेमौत मार दिया. बिहार की बेटीबिहारकी बेटी….

लेकिन कोईने यह सोचा कि बिहारकी बेटी अनजान युवकोंके साथ क्यूं भाग गई ? …. बिहारकी बेटीके मातापिताने कैसे ये अनजान युवकोंके साथ उनको जाने दिया ? ….  बिहारकी बेटी कई रातों तक घर वापस नहीं आयी तो भी बिहारकी बेटीके माता पिताने क्यूं पूलिसमें रीपोर्ट दर्ज करायी ? … बिहारकी बेटीके माता पिता क्यूं मौन रहे? …. टीवी चैनलके और समाचार पत्रोंके कई सारे दंभी सीक्युलर विद्वान ऐसे प्रश्नों पर क्यूं मौन रहे? नहेरुवीयन कोंग्रेसके एजंडाको सफल बनानेके लिये और अपनी वॉटबेंकको जारी रखनेके लिये इस एनकाउन्टर को फर्जी बनाके, नरेन्द्र मोदीको सकंजेमें लेनेमें सभी  भी दंभी और गद्दार सीक्युलर गेन्ग कूद पडी थी. टीवी चैनलके और समाचार पत्रोंके कई सारे दंभी सीक्युलर विद्वान ऐसे प्रश्नों पर क्यूं मौन रहे?

और आज जब हैडलीने खूद कहा कि इसरत जहां, मोदीको मारनेके लिये तैयार की गयी टीमकी सदस्य थी, तब भी ये दंभी सेक्युलर गेंगके सदस्य अपनी बात पर अडे हुए है. मनीश तीवारी, कपि सिब्बल, नीतीश कुमार और उसका साथी तेजेश्वर यादव हैडलीकी बातको सच माननसे से इन्कार कर रहे हैं.

वे ऐसा क्यूं करते हैं? वे ऐसा यूं करते है क्यों कि उनको अपनी सीक्युलरी वॉटबेंककी दुकान चालु रखनी है. यह गद्दारी काम है. इन लोगोंको कारावासमें ही भेजना चाहिये.

जीन्ना नहेरु युनीवर्सीटी एन्टी सोसीयल एक्टीवीटीका अड्डा

SUPPOSED TO BE SHAMEFUL BUT HE IS SHAMELESS

जे एन यु गद्दारोंका अड्डा बन गया है. वहां पाकिस्तानके सपोर्टमें, भारतके विरुद्ध और अफजल गुरुकी सजाके विरुद्धमें नारे लगाये जाते हैं, भारतको बरबाद करनेके नारे लगाए जाते हैं. नहेरुवीयन कोंग्रेसका शासन था तब भी ऐसा होता था. लेकिन नहेरुवीयन कोंग्रेस इसको अपनी वॉटबेंकके लिये आवश्यक समझती थी. कश्मिरमें ३०००+ हिन्दुंओंकी कत्लेआम और पांचलाख हिन्दुओंको कश्मिरसे भगा देनेवाली नहेरुवीयन कोंग्रेसके लिये जे एन यु गद्दारोंके हवाले कर देना तो आम बात थी. लेकिन जब बीजेपी की सरकार आयी और इसने जीनयु के गद्दारोंके विरुद्ध काम करना शुरु किया तो ये नहेरुवीयन कोंगी नेतागण और उसके सांस्कृतिक साथी बीजेपी सरकारके कदमके विरुद्ध बोलने लगे. और लोकशाहीकी आत्माके खूनकी बात करने लगे है.

नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके सांस्कृतिक साथी पक्ष, मूलतः श्युडो सेक्युलर पक्ष है. इनका सर्व प्रथम लक्ष्य मुस्लिम जनता और ख्रिस्ती जनता हिन्दुओंके साथ हिलमिल जाय और अपनेको अलग महेसुस करें वह देखना है. इसलिये वह जब भी मौका मिले तब मुस्लिम और ख्रिस्ती जनताके अधिकारकी बातें करती रहेती है और उनको हर देशद्रोही गतिविधियोंमें मदद किया करती है.

राहुल और उसके सांस्कृतिक साथीगण ने क्या कहा?

एन्टी नेशनल लोग जे एन यु को के छात्रोंकी आवाजको  दबा दे रहे हैं.

किन छात्रोंकी आवाजको दिल्ली पूलिसने दबाया?

जो छात्र ऐसा बोलते थे किभारत मूर्दाबाद, पाकिस्तान जिन्दाबाद, कितने अफझलको मारोगे? घर घर अफझल गुरु पैदा होगा. जब तक भारत बरबाद नहीं होगा तब तक हमारा आंदोलन जारी रहेगा.” ऐसी आवाज करने वाले छात्रोंको दिल्ली पूलिसने गिरफतार किया. राहुलने कहा कि जिन लोगोंने ये आवाज दबायी वे एन्टीनेशनल है. मतलब कि दिल्ली पूलिस एन्टी नेशनल है.

अफजल गुरु एन्टी नेशनल था इस लिये तो राहुल और उसके सांस्कृतिक साथीगणके पक्षकी सरकारने अफजल गुरुको फांसीकी सजा दिलवायी. अब अफजल गुरुकी सजाका विरोध करनेवाले तो एन्टी सोसीयल है ही, किन्तु इन विरोध करनेवालोंके उपर कार्यवाही करने वाले भी  एन्टी सोसीयल है. मतलब की एक एन्टीसोसीयल व्यक्तिको न्यायालयने फांसी की सजा दी वह भी एन्टीसोसीयल है, इस एन्टीसोसीयलकी सजाके विरोध करनेवाले भी एन्टी सोसीयल है, इस विरोधके सामने कार्यवाही करनेवाले भी एन्टी सोसीयल है, तो फिर एन्टी सोसीयल बननेसे बचा कौन? अफजल गुरुके विरुद्ध केस लडने वाली भी सरकार ही तो थी. और वह सरकार भी तो राहुलऔर उसके सांस्कृतिक साथीगण  जिस पक्षोंके  है उसी पक्षोंकी तो थी. तो राहुल का पक्ष भी तो एन्टी सोसीयल हुआ. अफजल गुरु एन्टीसोसीयल था, राहुल और उसके सांस्कृतिक साथीगणके पक्ष एन्टीसोसीयल है, न्यायालय एन्टी सोसीयल है, न्यायालयके आदेशको विरोध करनेवाले एन्टीसोसीयल है, इन विरोध करनेवालोंको पकडनेवाले एन्टीसोसीयल है …. ऐसा लोजीक तो सिर्फ राहुल जैसा कोई पप्पु ही कर सकता है.

वेमुलाने भी अफजलगुरुकी फांसीकी सजाका विरोध किया था. तो चूं कि पप्पुओंके हिसाबसे वह वेमुला शीड्युल्ड जातिका था, और पप्पुओंके प्रमाणित तर्कसे शीड्युल्ड जातिके लोग कुछ भी गद्दारीका काम कर सकते है, और ऐसे वेमुलोंको रोकने वाला या विरोध करनेवाला भी एन्टीसोशीयल है. ऐसी तर्क हीन बातें तो पप्पु लोग ही कर सकते है.

नहेरुवीयन कोंग्रेसके एक और साथी केज्रीने क्या कहा? उसने आशंका व्यक्त की कि वह वीडीयोक्लीप फर्जी है या नहीं उसकी जांच करवायेगी.

राहुल, येचूरी, कपि सिब्बल, मनीश तिवारी  जैसे पप्पुओंको देशके विरुद्ध और देशकी बरबादी के लिये कीये गये उच्चारण महत्व नहीं हैं. वे कुछ और असंबद्ध बाते हीं करने लगते है.

इतने खूल्लेआम गद्दारी करनेवालोंके लिये तो फांसीकी सजा भी कम है.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः जे एन यु, जीन्ना नहेरु युनीवर्सीटी, शठ, विभाजनवादी, आत्मकेन्द्री, फ्रॉड, असहिष्णु, नहेरुवीयन कोंग्रेस, पप्पु, केन्द्रीय जांच, केन्द्रीय अन्वेषण, महानुभाव, देशद्रोही, गद्दार, एन्टी सोसीयल, न्यायिक, कारावास, जयप्रकाश नारायण, मोरारजी देसाई, नरेन्द्र मोदी, गुजरात पूलिस, बिहारकी बेटी, मुस्लिम कोमकी बदनामी, गद्दारोंका अड्डा, भारतकी बरबादी,

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પ્રેસ્ટીટ્યુટ અને જ્ઞાતી વાદી રાક્ષસો અભણ સમાજમાં શું શું કરી શકે? ભાગ- ૨

હવે તમે કહેશો કે દાખલો તો આપો…

“આનંદી બેનને મોવડી મંડળે અલ્ટીમેટમ આપ્યું કે ૧૫ દિવસમાં પાટીદારોની સમસ્યા દૂર કરો, નહીં તો પદ છોડવા તૈયાર રહો” ન્યુઝ સોર્સ “આધારભૂત”.

કેમ ભાઈ! સમાચારના સોર્સનું નામ નહીં જણાવ્યું? સોર્સ નું નામ જણાવવાની હિંમત નથી? સમાચાર પત્રોએ તો હિંમતવાળા થવું જોઇએ.

કેમ ભાઈ! ખોટા પડવાનો ડર છે? જો આવો ડર છે તો સમાચાર છાપો છો જ શા માટે? આવા સમાચાર નહીં આપો તો શું ધરતીકંપ થવાનો છે?

“અરે ભાઈ, અમે ખોટા તો પડવાના જ છીએ. પણ અમારો એજન્ડા એ છે કે આ પાટીદારોના આંદોલનકારીઓને થોડી ચાનક તો ચડાવી જોઇએ ને! આ આંદોલન જ્યારે પૂરપાટ ચાલતું હતું ત્યારે મોવડી મંડળે આનંદીબેનને અલ્ટીમેટમ આપવું જોઇએ તેવું “આધારભૂત” સ્રોત વાળી વાત અમને યાદ ન આવી. હવે જ્યારે આંદોલન નબળું પડી ગયું હોય ત્યારે તેમને “પાનો” ચડાવવા અમારે આગળ તો આવવું જ પડે કે જેથી પાટીદાર નેતાઓને લાગે કે હમ ભી કુછ કમ નહીં હૈ. સાથે સાથે જનતાને એક સંદેશો જાય કે બીજેપીમાં ગડમથલ છે. અફવા તો અફવા. લાગ્યું તો તીર નહીં તો તુક્કો. જીભ સાબદી તો ઉત્તર ઝાઝા.

દાખલો બીજોઃ

“યશવંત સિંહાના નિવેદનથી હોબાળો. રાજીનામાની માંગ.”

યશવંત સિંહા અસહિષ્ણુતા વિષે કંઈક બોલ્યા. એટલે એની અસર વ્યાપક પડી છે તેવો સંદેશો આપવો જરુરી છે. એટલે “હોબાળો” શબ્દ તો હાથ લાગી ગયો. નહેરુવંશી ઇન્દિરાઈ કટોકટી ફેઈમ કોંગ્રેસ તો નૈતિક રીતે રાજીનામુ માગી ન શકે. જો કે નહેરુવંશી કોંગ્રેસને નીતિમત્તા સાથે સ્નાન સૂતકનો સંબંધ નથી તેથી તે તો રાજીનામું માગે પણ ખરી. પણ ધારો કે નહેરુવીયન કોંગ્રેસના નેતાએ રાજીનામું માગ્યું હોય તો તેને છૂપાવવું જરુરી નથી. કારણ કે કોંગીજનો તો આંદોલનપ્રિય અને ખ્યાતિભૂખ્યા છે. તો પછી રાજીનામું માગ્યું કોણે? અને કોનું રાજીનામું માંગ્યુ? સમાચારના વિવરણમાં કશી માહિતિ મળતી નથી. જો કે ટીવી ચેનલોએ શબ્દસઃ વીડીયો ક્લીપ બતાવી શકી નથી. યશવંત સિંહાએ મોદી વિષે કહ્યાનું નકાર્યું છે. સમાચાર માધ્યમનો એજન્ડા “નો નેગેટીવ” ન્યુઝ, ન્યુઝ માટે લાગુ પડતો નથી.

દાખલો ત્રીજોઃ

હે વાચક ભાઈઓ, પાટીદારભાઈઓના એક વર્નાક્યુલર સમાચાર માધ્યમ જનિત નેતા જેલમાં સબડે છે. જો આ નેતા જેલની બહાર હોત તો તેને “અઘ્યા-પાદ્યાના” સમાચાર (વિષ્ટા ઉત્સર્જન અને તેજ માર્ગે થતા વાયુ-ઉત્સર્જનના સમાચાર) અમે આપતા રહેત. હવે તેઓ જે કંઈ કરે તે સમાચાર મને મળતા નથી તેથી અમે બેચેન છીએ. અમે તેમને અવારનવાર પત્રો લખતા રહેવાની ભલામણ કરી છે. અને તેથી તેઓશ્રી લખતા રહે છે. અમે તેમના લખેલા પત્રોને ભરપુર કવરેજ આપીએ છીએ. સાથે સાથે અફવાઓ પણ ફેલાવીએ છીએ. “પાટીદાર ભાઈઓને જેલમાંથી મૂક્ત કરો, અમે તમારી સાથે છીએ” (જો કે હે વાચક ભાઈઓ અમે એમ નહી લખીએ કે કાયદાને કાયદાનું કામ કરવા દો. જો પાટીદાર ભાઈઓ નિર્દોષ છે તો કાયદો તેમને અડી શકશે નહીં. દૂધનું દૂધ અને પાણીનું પાણી થઈ રહેશે.)  હા વાચકભાઈઓ, અમે એવું જરુર લખીશું કે ફલાણા પાટીદાર નેતાએ આનંદીબેનને અલ્ટીમેટમ આપ્યું છે કે ત્રણ માસમાં પાટીદારોની સમસ્યાનો નીવેડો લાવો નહિં તો પદ છોડો.

દાખલો ચોથોઃ

નરેન્દ્ર મોદી સ્વચ્છતા અભિયાન થી ગદગદ છે.  (નરેન્દ્ર મોદીની “મનકી બાત” ને મજાકીયું હેડીંગ)

દાખલો પાંચમોઃ

દલિત પરિવારોને ફાળવાયેલી હજારો એકર જમીન કાગળ પર. સીએમને પત્ર. ભારત સરકાર પર આરોપ લગાવ્યો. ઉદ્યોગ ગૃહને ફાળવવાનું કવત્રું. દલિત, આદિવાસી, ઓબીસીના જમીન અધિકાર પર તરાપ, સરકારની મેલી મુરાદ બહાર આવી …..

હે વાચકો તમે એ સવાલ ન પૂછશો કે ૧૯૪૭ થી ૧૯૯૩ સુધીમાં  દલિત, આદિવાસી, ઓબીસીને ફાળાવાયેલી જમીન અત્યારે કોના કબજામાં છે.

દાખલો છઠ્ઠોઃ

ભાજપ પ્રદેશપ્રમુખ પદ કેટલે …

પાટીદારો સમાધાન કરે એટલે.

ભાજપ અને આંદોનલ કારીઓ વચ્ચે એવી ગાંઠ પડી છે કે જે કેમેય કરીને છૂટી રહી નથી.

દાખલો સાતમોઃ

થરુરના “હિન્દુ” ટ્વીટ પર અનુપમ ખેર ભડક્યા…. જીએલએફમાં હોબાળો થયો. રીયલ લાઈફ એન્ગ્રીમેન…

હે વાચકો અમે છેલ્લા ૨૫ પ્લસ વર્ષોથી આતંકિત પીડિત કશ્મિરી હિન્દુઓ વાત નહીં કરીએ. અમને એમાં રસ નથી. કારણ કે એમાં તો નહેરુવંશી કોંગ્રેસની અને તેના સાથી પક્ષોની સંડોવણી  જે અમારા એજંડાની બહારની વસ્તુ છે. અનુપમ ખેરની તે વિષે શું સ્થિતિ છે તે વિષે અમે કહીશું નહીં. અમે તો ફક્ત યેનકેન પ્રકારેણ બીજેપીને ઉપર કોમવાદ વિષે સાંકળી શકાય તેવી જ વાત કહીશું.

દાખલો આઠમોઃ

તંત્રી મહાશયને “હૈદ્રાબાદના ‘બત્રીસ લક્ષણાના બલીદાન એળે જવાનો ડર લાગે છે. આ બત્રીસ લક્ષણા ભાઈનું એક લક્ષણ યાકુબને આપેલી ફાંસીના વિરોધનું હતું.

પટેલ આગેવાનને મોટોભા બનાવવાનો તો તેમનો ધર્મ જ છે. “હાર્દિક પટેલ કોઈની જાગીર નથી. …” અહો … કેવી સુંદર શોધ અને કેવું પરમ સત્ય.અરે ભાઈ તૂં તારી રોજનિશી લખ અને કોણ કોણ તને મળ્યું અને શી વાત કરી તેની નોંધ રાખ. અપને મૂંહ મિયાં મીઠ્ઠું ક્યોં બનતા હૈ.

“પાટીદારોની બીકે સીએમએ ૧૭ કિલોમીટર દૂરથી બ્રીજ ખૂલ્લો મૂક્યો. વરાછાના સરથાણ આ બ્રિજનું રિમોટથી ઉદ્ઘાટન કર્યું” ડીબીની હેડલાઈન.

” બ્રીજ એક માસથી તૈયાર હતો. અને છતાં ન કર્યો, તો આથી રુડી તક ક્યારે મળશે. બાંધો શિર્ષક મારા વીરા. સાથે લખો …

“ભાજપમાં ભારે રોષ…. વાતાવરણમાં અશાંતિ ફેલાય નહીં તે માટે મુખ્ય મંત્રીએ આવું કર્યું….” સાથે લખો … “… કરોડોના ખર્ચે તૈયાર થયેલો બ્રીજ આ રીતે મહાનુભાવોને બોલાવ્યા વગર રિમોટથી ખૂલ્લો મૂક્યો. (મારા વાલીડા) પાટીદારો અટકચાળો કરે તો… બુધવારની રાતથી સરથાણા, વરાછા અને કપોદ્રા સુધી પોલીસ સ્ટાફને ખડે પગે તહેનાત કરાયો હતો ….” એવું પણ લખો.

વાચક ભાઈઓ આવી તો અમે અપાર વાનગીઓ આપને પીરસીશું.

હવે આપણે અમુક કટારીયા લેખકો મૂર્ધન્યોની માનસિકતાની વાતો કરીશું?

એક કટારીયા લેખકભાઈ

એક કટારીયા લેખકભાઈ પોતે પાટીદાર (!) હોવાથી હમેશા એક દિશાનું જ વિચારે છે. તેઓ શ્રી શું લખે છે?

“છાસ લેવા જવું છે પણ દોણી સંતાડવી છે ભાજપને”…

વાસ્તવમાં લેવા વાળા, એટલેકે માગવાવાળા તો પાટીદાર જ છે. એટલે દોણી તો એમના હાથમાં જ છે. પણ લખો મારા બાપા…. લખવામાં મોળું શા માટે લખવું? હેં ભૈ! હૉવઅ.

“પાટી દારોને મનાવવા પણ છે અને પોતે ઝૂકી નથી ગયા એમ દેખાડવું પણ છે” એવો સંદેશો આપો. કોઈનું નામ ન લઈએ તો બધું બભમ બભમ ચાલે. રાજા ભોજ, વીર વિક્રમ, ગંગુ તેલી બધી જ વાતો કરી શકાય. અરે રામરાજ્ય ની પણ વાત કરી શકાય.  રામ મંદિરને પણ આપણી વાતમાં ઘુસેડી શકાય.

“ભાજપને ગુરુજ્ઞાન લાધ્યું…સ્થાનિક સ્વરાજની ચૂંટાણીઓમાં નિષ્પ્રાણ સૂતેલી કોંગ્રેસને પાટીદારોએ જીતાડી દીધી. … ભાજપના બધા નેતાઓ એકસૂરે કહે છે પાટીદારો અનિવાર્ય છે… બિચારાની હાલ સાપે છછૂંદર ગળ્યા  જેવી થઈ છે. એડી ચોટી નું જોર લગાવી રહ્યા છે… બીજેપી ની નીતિ બેધારી છે…  ભગત સિંહનો માર્ગ …. ગાંધી ચીંધ્યો માર્ગ … બે ચાર પોલીસવાળાને મારીને મરો … દરેક ગામે ગામ પાટીદારો કાર્યક્રમ આપી રહ્યા છે …. સરાકારી કાર્યક્રમોનો વિરોધ એટલું કોમન છે …. વડિલોનો ભાજપ પ્રત્યેનો ભક્તિભાવ આંધળો છે….” આવું અનેક તીકડમ આપણા આ કટારીયાભાઈ તેમની કટારમાં ચલાવ્યા કરે છે. પણ ખાટલે ખોડ એ છે કે બીજેપીને ગુરુજ્ઞાન લાધ્યું પણ આ કટારીયા ભાઈને એ ગુરુજ્ઞાન ન લાધ્યું કે “હિન્દુઓની નંબર-૨ પૈસાદાર કોમને અનામત શા માટે?”.

બીજા એક કટારીયા ભાઈ

બીજા એક કટારીયા ભાઈ એ “ભદ્રંભદ્ર” ને ઉજાગર કર્યા છે. આમ તો આપણ એ જાણીએ છીએ કે ભદ્રંભદ્ર તો રુઢીચૂસ્ત હતા અને યાવની શબ્દોની તેમને સુગ હતી. તેમનું મૂળનામ દોલતશંકર હતું. ભગવાન શિવ તેમને સ્વપ્નમાં આવ્યા અને કહ્યું કે દોલત તો મ્લેચ્છ શબ્દ છે. મારી સાથે તે શોભે નહીં. દોલતશંકરે કહ્યું કે એમાં તેમનો નહીં પણ તેમની ફોઈનો વાંક છે. પણ ભગવાન શિવ દોલતશંકરના તર્કથીતૂષ્ટ ન થતાં ત્રીશુળ હાથમાં લીધું. એટલે દોલતશંકર સ્વપ્નસૃષ્ટિમાં થી આલોક માં આવ્યા અને તેમણે “ભદ્રંભદ્ર” નામાભિધાન કર્યું. આપણા આવા ભદ્રંભદ્રનો કોઠારી ભાઈએ પૂનર્જન્મ આપવાની કોશિસ કરી છે.

આપણો એજન્ડા કે આપણા અન્નદાતા (ડીબી માલિક)નો એજન્ડા આપણે એક સમાન રાખવાનો છે. એટલે આપણા ભદ્રંભદ્રભ્રાતાએ પટેલભ્રાતાઓના સહાયકભ્રાતાના સ્થાને વિદ્યમાન થવાનું છે.

મારું વાલીડું કામ તો જરા અઘરુ છે. કારણ કે ભદ્રંભદ્ર તો રુઢીવાદી હતા. અને રુઢીવાદ પ્રમાણે તો પટેલ એટલે પાટીદાર એટલે બ્રાહ્મણ, ક્ષત્રીય, વાણીયા અને પછી જ પાટીદારોને મૂકી શકાય. અને રુઢી પ્રમાણે તો તેમને અનામત આપવી જ પડે. તો તેનો વિરોધ કેમ થાય?

પણ આપણા ભદ્રંભદ્ર તેમ કરશે. અત્યારે પટેલો ભલે ક્ષત્રીયભાઈઓ થી પણ આગળ અને વાણીયાઓને સમકક્ષ થઈ ગયા હોય અને પટેલો ભલે મોટેલો પોટેલો ધરાવતા હોય, આપણા ભદ્રંભદ્ર તેનો વિરોધ કરશે. તેમની માટેની અનામતની માગણીનો વિરોધ કરશે. એક વખત નક્કી કર્યું કે આપણો એજન્ડા પટેલોને માટેની અનામતનો વિરોધ કરવાનો છે એટલે વાત પૂરી. અષ્ટપંષ્ટં લખ્યા કરીશું. તર્કની વાતમાં કે મુદ્દાની વાતમાં તો આપણે સ્નાનસૂતકનો પણ સંબંધ નથી. એટલે બધું હાલ્યું જાશે.

ત્રીજા કટારીયા ભાઈ

આપણા ત્રીજા કટારીયા ભાઈ છે કાન્તિભાઈ ભટ્ટ. આમ તો તેઓ શ્રી સબબંદરકા વ્યાપારી છે. પ્રભાશંકર પટ્ટણીએ ભાવનગરના મહારાજાના એક ભૂલભર્યા “ડીલ”ને ભવનગર બંદરનો વહીવટ અંગ્રેજ સરકારના હાથમાં જતો “ભાવનગરના બંદર”નો અર્થ “ભાવનગરના મંકી” કરીને અટકાવેલો. આપણા કાંતિભાઈ પણ બધા જ બંદરના જ્ઞાતા છે. મોદીફોબીયાથી પીડિત છે. તેમને મોદી ઘોઘુરો બિલાડો લાગે છે. તેમણે તર્કને નેવે મૂક્યો છે. ૮૫+ પછી આ કદાચ તેમનો હક્ક બનતો હશે. જો કે વ્યક્તિએ ૧૦૦ વર્ષની ઉંમર પછી આવી સ્વતંત્રતા (સ્વચ્છંદતા) ભોગવવી જોઇએ. ૮૫+ કોઈ ઉમર છે?

ચોથા કટારીયા ભાઈ

ચોથા કટારીયા ભાઈ આપણા ગ્રામસ્વરાજવાળા પ્રકાશભાઈ છે. તેઓશ્રી મોદી ફોબીયા અને બીજેપી ફોબીયા બંનેથી પીડિત છે. કોઈ વ્યક્તિને મહત્વવાળો બનાવવો હોય તો તેની જન્મતારીખ, મરણતારીખ કે તેની ડીગ્રી કે સંસ્થાની આડશ લઈ તેને મહાન બનાવવાની કોશિસ કરવી એ સાંપ્રત કહેવાતા સર્વોદયવાદીઓનું લક્ષણ છે. અહો! રોહિત (હૈદરાબાદી ઘટનાવાળો) કેટલો મહાન હતો. દુશ્મનનો દુશ્મન એટલે આપણો મિત્ર એ ન્યાયે હવે સાંપ્રત કહેવાતા સર્વોદયવાદીઓ દેશદ્રોહીઓ અને કટોકટી-ફેમ નહેરુવંશી કોંગ્રેસીઓના ખોળે બેસવામાં કશો છોછ અનુભવતા નથી તે દેશની કમનસીબી છે. કારણ કે “પટેલોને અનામત” ના મુદ્દાની ચર્ચા ત્યાજ્ય છે પણ “આ દિવસોમાં કદાચ પહેલીવાર જ આપણે લેખકો (એવોર્ડ વાપસી લેખકોને જ લેખકો ગણવાના) એક અસરકારક પરિબળ તરીકે ઉભરી રહ્યા છીએ.”

પરંતુ અહો આશ્ચર્યમ્‌!! 

પાટીદારોના આંદોલનમાં જે પાયમાલી થઈ, તે વાત જવા દો, એટલે કે પાટીદાર ભાઈઓએ, જેતે ટ્રેનોના બસોના મુસાફરોને રખડાવ્યા, ચક્કા જામ કરી રસ્તાઓ બંધ કર્યા, બસો બાળી, પોલીસ સ્ટેશનો બાળ્યા, બસસ્ટેન્ડો બાળ્યા, રેલ્વેના પાટા ઉખેડ્યા તે બધું જવા દો. તેની સામેની સંવેદનશીલતા બતાવવાની તમારે જરુર નથી તેવું તમને લાગતું હશે. પણ  જે કાશ્મિરી હિન્દુ માનવીઓની જે હજારોની સંખ્યામાં કત્લેઆમ થઈ અને  જે લાખ્ખોની સંખ્યામાં તડીપાર થયા ત્યારે તમે ક્યાં હતા? તમારી સંવેદનાઓ ક્યાં ઘાસ ચરવા ગઈ હતી?

જે છૂપાવાય છે … તે સમાચાર છે.   

 (ક્રમશઃ)

શિરીષ મોહનલાલ દવે

આનંદીબેન, પાટીદાર, યશવંત સિંહા, નરેન્દ્ર મોદી, ગદગદ, ભાજપ પ્રદેશપ્રમુખ પદ, પાટીદારો સાથે સમાધાન, ભડક્યા, કોમવાદ, અનુપમ ખેર, કાશ્મિરી હિન્દુઓ, હૈદરાબાદના બત્રીશ લક્ષણા, બલીદાન, યાકુબ, મોટાભા, અપનેમૂંહ મિયાં મીઠ્ઠું, પાટીદારોનીબીકે, પાટીદારો અટકચાળો, ભદ્રંભદ્ર,

    

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પ્રેસ્ટીટ્યુટ અને જ્ઞાતી વાદી રાક્ષસો અભણ સમાજમાં શું શું કરી શકે? ભાગ-૧

પ્રેસ્ટીટ્યુટનો અર્થ તો આપણને ખબર જ છે. આપણા વીકે સીંઘે તેનું અર્થ ઘટન કર્યું છે. અને આપણે તે અર્થ ઘટનને માન્ય રાખીશું. વાચકવર્ગ પ્રેસ્ટીટ્યુટના ગ્રાહકો છે. પણ આ ગ્રાહકો અભણ અને સ્વાર્થી હોય ત્યારે તેમનો રોટલો શેકાય છે અને તેઓ પોતાનો ધંધો ધમધોકાર ચલાવે છે.

ગાંધીજીનું ખૂન

ગાંધીજીનું ખૂન ગોડસેએ કર્યું. પણ આતો શરીરનું ખૂન હતું. ગાંધીજીને ૧૨૦ વર્ષ જીવવું હતું. કદાચ તેઓ તેટલું ન પણ જીવી શકત. કારણકે દરેક વ્યક્તિનું આયુષ્ય નિશ્ચિત હોય છે. દરેક વ્યક્તિ તેના માતા પિતાના સરેરાશ આયુષ્ય થી અથવા તો માતાના અને પિતાના કોઈપણ એકના આયુષ્ય થી ૨૦ટકા ઓછાવત્તા આયુષ્ય જેટલું જીવે છે. અલબત્ત આમાં તેમનું મૃત્યુ વૃદ્ધાવસ્થાને કારણે થયું હોવું જોઇએ. અકસ્માત કે ખૂન થી નહીં. ૨૦ટકા ઓછું એટલા માટે કે વ્યક્તિની ખરાબ આદતો તેના આયુષ્યને ઘટાડે છે. આ વાતની ચર્ચા વધુ નહીં કરીએ. પણ ગાંધીજીના મૃત્યુથી દેશને જેટલું નુકશાન થયું તેથી વધુ તેમના વિચારોના ખૂનથી દેશને ક્યાંય વધુ નુકશાન થયું છે. જોકે વિચારોનું આયુષ્ય ઘણું લાબું હોય છે. પણ વિચારોનું ખૂન થયા પછી પણ તે તો જીવતા રહે છે પણ્સ જ્યારે જાહેર જીવનમાં પડેલી વ્યક્તિ કે વ્યક્તિ સમૂહ તેનું ખૂન કરે ત્યારે સમાજને ઘણું નુકશાન થાય છે.

હાલ આપણે ગુજરાત પૂરતી જ વાત કરીશું. અને તે પણ આંદોલનકારીઓ પૂરતી અને સ્થાનિક સમાચાર માધ્યમો સુધી મર્યાદિત રાખીશું.

આમાં કશું નવું નથી. સૌ કોઈ જાણે છે. છતાં પણ તેની વાત કરવી જરુરી બને છે. કોઈ પણ વાત ક્યારે જરુરી બને છે તે આમ તો વ્યક્તિગત અભિપ્રાયનો સવાલ છે. પણ જો નીતિ મત્તા સંકળાયેલી હોય તો અને વિરોધાભાસવાદી વર્તન હોય તો આવું વર્તન સમાજને નુકશાન કરે છે.

અનામતની ગાજરની પિપૂડી

અનામત એ એક સમાજિક સમસ્યા છે અથવા હતી. અને આ સમસ્યાને નહેરુવંશી કોંગ્રેસે રાજકીય મુદ્દો બનાવી દીધો છે. અનામતની જોગવાઈના પુરસ્કર્તા આંબેડકર હતા. સામાજિક રીતે પછત જાતિસમૂહ અને સાથે સાથે અછૂત પણ હોય તેઓ માટે આંબેડકરે અનામતને પુરસ્કૃત કરેલી. જો સરકાર ગરીબોને લક્ષ્યમાં રાખીને પોતાની વિકાસ યોજનાઓ બનાવે તો ગરીબોને તો વાંધો ન આવે. પણ અછૂતોને તો વાંધો આવે જ. કારણકે સામાજિક માનસિકતા એટલી વિકસી ન હતી. જો કે ગાંધીજીએ વિરોધ કરેલ. કારણ કે તેમની માન્યતા હતી કે સમાજની માનસિકતાને સુધાર્યા વગર જે કંઈ કરીશું  હિંસા ગણાશે. માટે સઘળી શક્તિઓ સમાજની માનસિકતાને સુધારવા તરફ કેન્દ્રિત કરો. નેતાઓ જો આવી આચાર સંહિતા અપનાવશે તો તેના તાત્કાલિક પરિણામો મળશે જ. તમે જુઓ છો કે તે વખતની કોંગ્રેસમાં વગર અનામતે ઘણા હરિજન નેતાઓ હતા. આંબેડકરને આ રસ્તો લાંબો લાગ્યો. પણ પચાસના દાયકાના મધ્યમાં નહેરુને આમાં રાજકીય લાભ જણાયો. શરુઆતમાં હરિજનો સુધી જ અનામત સીમિત હતી. આંબેડકરના મરીગયા પછી આ અનામત નું ક્ષેત્ર વિસ્તારવામાં આ અનામતનું ક્ષેત્ર વિસ્તારવામાં આવ્યું. આ ક્ષેત્ર નહેરુની સુપુત્રીના સમયમાં એટલી હદે વિસ્તારવામાં આવ્યું કે એક મંડળ રચવામાં આવ્યું કે જે ફાવે તે કોમ પોતાનો પક્ષ રજુ કરે અને અનામતમાં પોતાની કોમને આવરી લે.

પણ આ કોમ એટલે શું?

આમ તો કોમ, જન્મથી જ મળે છે. ધર્મ પણ જન્મ થી જ મળે છે. પણ તમે ધર્મ બદલી શકો છો. તમે તમારી જન્મથી મળેલ કોમને બદલી શકતા નથી. આ ભારતીય બંધારણની પ્રચ્છન્ન કે અપ્રચ્છન્ન વક્રતા છે. ભારતીય બંધારણ જ્ઞાતિપ્રથામાં માનતું નથી. પણ કોઈ કોમ પોતાને અમુક તમુક કોમમાં માને તો રોકતું પણ નથી. પણ જો તમે બીજાને નુકશાન કરીને પોતાની કોમનું હિત સાધો તો ભારતીય બંધારણ નડે ખરું. પણ આ નડતરને નિરસ્ત્ર કરવા માટે એક મંડળ રચવામાં આવ્યું. બંધારણ આમ તો સૌને સમાન હક્ક આપે છે. પણ જેમ સામ્યવાદમાં સૌ સમાન છે. પણ અમુક વર્ગ ખાસ સમાન છે. એવું જ નહેરુવંશની કોંગ્રેસે મંડળની સ્થાપના કરીને કર્યું.

વીપી સિંઘને થયું કે આ મંડળનો લાભ નહેરુવંશીય કોંગ્રેસ જ લઈ જાય તેતો બરાબર ન કહેવાય.

નેતાનો ધર્મ સમાજને દોરવણી આપવાનો હોય છે. સમાજને દોરવણી આપવી હોય તો અમુક અધિકારો જોઇએ.

સમાજસુધારક નેતાઓ અને ખાસ કરીને નહેરુવીયન કોંગ્રેસીઓ અને તેમના મળતીયાઓને સમાજની માનસિકતા સુધારવાને બદલે તેમને મળતી સત્તા સાચવવામાં જ રસ રાખ્યો છે. અને તેથી તેઓએ અનામતનો ઉપયોગ ગરીબ લોકોને કહેવાતા સવર્ણોથી અલગ કરી દેવાનું કામ કરવા માટે મત બેંકો ઉભી કરવાના ભરપુર પ્રયાસો કર્યા અને તેમાં મહદ અંશે સફળ પણ થયા. બિહારની ચૂંટણીના પરિણામો તાજેતરનો તેનો ઉત્તમ દાખલો છે. સમાજને વિભાજિત કરવાના કામના શ્રીગણેશ સૌ પ્રથમ નહેરુએ કર્યા. તેમણે ભાષાના આધારે લોકોને વિભાજિત કર્યા. જે ગુજરાતી લોકો શિવાજીને “ધણણ ડૂંગરા બોલે શિવાજીને નિદરું નાવે …” એમ કહી શિવાજીની પ્રસંશા કરતા હતા, જે સૂરતના વેપારીઓના મહાજને શિવાજીને બોલાવીને સ્વેચ્છાએ પોતે કરેલા દાનને લૂંટમાં ખપાવવા કહ્યું હતું, જે ગુજરાતીઓ મરાઠી લોકો સાથે હળી મળીને સેંકડો વર્ષોથી રહેતા હતા, નહેરુએ તે ગુજરાતીઓની વિરુદ્ધ મરાઠી લોકોને ભડકાવ્યા અને કહ્યું કે “જો મુંબઈ મહારાષ્ટ્રને મળશે તો મને ખુશી થશે.” આવું કહીને નહેરુએ મરાઠી લોકોને એવો સંદેશો આપ્યો કે મુંબઈ મહારાષ્ટ્રને મળે તે વાતમાં ગુજરાતીઓ આડા આવે છે. (વાસ્તવમાં તો કોંગી મોવડી મંડળનો નિર્ણય હતો કે મુંબઈ, મહારાષ્ટ્ર અને ગુજરાત એમ ત્રણ રાજ્યો બને). આમ કહી નહેરુએ મુંબઈમાં મરાઠી અને ગુજરાતીઓ વચ્ચે દંગા કરાવ્યા હતા અને ગુજરાતીઓએ મહારાષ્ટ્રમાંથી હિજરત કરવી પડેલી. ઇન્દિરા ગાંધીએ સવર્ણ અને અસવર્ણ વચ્ચે વિગ્રહ ફેલાવ્યો અને ખાલિસ્તાની આતંકવાદને પરોક્ષ-પ્રત્યક્ષ રીતે પોષી મુસ્લિમ આતંકવાદનો છોડ રોપ્યો. આમ નહેરુવંશી કોંગ્રેસના આચારો દ્વારા દેશના માનવ સમાજને પારવિનાનું નુકશાન કર્યું છે, એટલે નહેરુવંશની કોંગ્રેસના સુધરવાની અપેક્ષા, સુજ્ઞજનો ન રાખી શકે તે સ્વાભાવિક છે.

પણ આખા દેશની જનતા સુજ્ઞ ન હોઈ શકે. તો પછી દેશની જનતાને સમજાવશે કોણ?

આ કામ સમાચાર માધ્યમોનું છે. આ સમાચાર માધ્યમો કોણ છે અને કોણ ચલાવે છે?

આ સમાચાર માધ્યમો ટીવી ચેનલો છે અને  સમાચાર પત્રો છે.

ટીવી ચેનલોમાં આપણે સમાચારો ઉપરાંત મહાનુભાવોની ચર્ચાઓ અને મહાનુભાવોના સાક્ષાત્કાર (ઈન્ટર્વ્યુઓમાં) હોય છે.

સમાચારોને કેમ કરી સંવેદનશીલ બનાવવા તેની મોટાભાગની ચેનલો સ્પર્ધા કરતી હોય છે. ફક્ત દૂરદર્શન તેમાં બકાત હોય તેમ લાગે છે. મહાનુભાવોની ચર્ચાઓમાં યુ.પી.એ. સંગઠિત પક્ષોના, મહાનુભાવો અને તેમાં પણ ખાસ કરીને નહેરુવંશી પક્ષના મહાનુભાવો બીજા કોઈને બોલવા દેતા નથી અને અસંબદ્ધ રસ્તે ચર્ચાને લઈ જાય છે. આમાં ચેનલના ચાલકનો સહકાર હોય છે. મહાનુભાવો સાથેના સાક્ષાત્કારમાં ચાલતા વાર્તાલાપમાં જો બીજેપીના મહાનુભાવ હોય તો તેમને એવા પ્રશ્નો પૂછવામા આવે છે કે જે પ્રશ્નોમાં ચેનલ ચાલકના પ્રશ્નોનો ઇચ્છિત ઉત્તર પણ સામેલ હોય. દા.ત. “તમને રામ મંદિર, ચૂંટણીના સમયે જ કેમ યાદ આવે છે? તમે મુસ્લિમોની ભાવનાનો ખ્યાલ રાખ્યા વગર કેમ નિર્ણયો લો છો? રામ મંદિર શીલાન્યાસ કરીને તમે શું સિદ્ધ કરવા માગો છો? …”

બાકી રહ્યા સમાચાર પત્રો.

“નો નેગેટીવ” ન્યુઝ

આમાં સમાચારોની હેડ લાઈનો, તેના અક્ષરોની સાઈઝો અને તેની શબ્દ ગોઠવણ એ રીતે રાખવામાં આવે છે કે બીજેપી વિષે નેગેટીવ વાતાવરણ તૈયાર થાય.

એક ગણમાન્ય ગુજરાતી અખબાર કેટલાક વખત થી એવો દાવો કરે છે કે તે અઠવાડિયામાં એક દિવસ (સોમવાર), “નો નેગેટીવ” ન્યુઝ આપશે. એનો અર્થ શું થાય છે તે આપણે જોઇએ.

(૧) અઠવાડીયાના સાત દિવસોમાંથી છ દિવસો, આ સમાચાર પત્ર, નેગેટીવ ન્યુઝ આપવાનો પોતાનો હક્ક અબાધિત રાખશે. એટલે કે આ સમાચર પત્ર છ દિવસ, નેગેટીવ ન્યુઝ આપશે.

(૨) હમેશા “નો નેગેટીવ” ન્યુઝ આપવા શક્ય નથી.

(૩) અરે તમે ભૂલો છો. અમે અઠવાડીના એક દિવસ એવા ન્યુઝ આપીશું જે વાચકોને પ્રેરણા આપે. એટલે કે ફલાણા ભાઈએ કેવું રીસ્ક લીધું અને કેવા આગળ આવી ગયા. માટે હે વાચકો તમે પણ રિસ્ક લો અને તમે આગળ આવી શકશો.

“અરે દિવ્યભાસ્કર ભાઈ, અસાધારણ સફળતા, સંજોગો અને શક્યતાના સિદ્ધાંતો ઉપર આધારિત છે.”

હા એ ખરું. પણ હે વાચકો તમે રિસ્કની જીદ લેશો તો સફળ તો થશો જ. મોટી નહીં તો નાની સફળતા પણ મળશે જ. માટે મચી પડો.

(૪) અરે હે વાચકો, વળી પાછી તમે ભૂલ કરી. અમે “નો નેગેટીવ” ન્યુઝ આપીશું તે તો ફક્ત એવા સમાચારોને લાગુ પડે છે કે જે રાજકારણ સાથે સંબંધિત ન હોય. રાજકારણ સાથે સંબંધિત સમાચારો તો “નો નેગેટીવ” ની શ્રેણીમાં ન જ આવી શકે. ખાસ કરીને બીજેપી ને લગતા સમાચારોને અમારે વક્ર દૃષિથી જ ઘડવા પડે. અને જનતાને બીજેપી વિષે નેગેટીવ સંદેશો મળે એ તો અમારે જોવું જ રહ્યું. હા વંશવાદી પક્ષોની અમે નેગેટીવ ટીકા ન થાય તેનો ખ્યાલ રાખીશું. (કારણ કે વંશવાદી પક્ષો અને ખાસ કરીને નહેરુવંશી પક્ષ અમને સતત સમજાવે છે કે ઇનામ દૂંટી ઉપર મુકાય છે અને દૂંટી તો પેટ સાથે જોડાયેલી હોય છે. સર્વ જનોને પેટ હોય છે. બે વાંસા કોઈને હોતા નથી).

હવે તમે કહેશો કે દાખલો તો આપો…

(ક્રમશઃ)

શિરીષ મોહનલાલ દવે

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