Archive for the ‘Social Issues’ Category

The people of Pakistan are going to play a big role to re-unite India

In view of the situation prevailing in Pakistan, created by the Pakistani leaders in the politics of Pakistan, the time is not very far for the people of Pakistan to launch an agitation that could re-form undivided India.


Anything which is FALSE footed is going to end up. It is a matter of time.

The formation of Pakistan was a joint venture of Radical Muslim leaders and British. Due to enmity between Jinna and Nehru for the reason of Nehru’s bad and insulting attitude toward Jinna, Jinna supported radical Muslim leaders for the separate country.

The basic ground for the formation of Pakistan was false. British knew this, but they had specific political interest in dividing India into many pieces. This was their old strategy.

Somehow radical Muslim gang and the British were successful in getting away a portion out of India, named  it Pakistan.

Now everybody must know that whenever Pakistan had become tolerant towards Hindus or its Government tried to have good relation with India, the western world had become active to weaken one of them if not both.

In 1954, Suharavardi Noon, tried to establish good relation between these two countries. Then we saw the army of Pakistan took over the rein of Pakistan. The US administration knew that to handle a single person (e.g. Army Chief of Pakistan) is easier than to handle multiple political leaders.

Nehru had no sense of foresight. He failed to understand the game of the US. He started abusing Pakistan when at that time Iskandar Mirza had come up with a proposal of Federal Union. Actually it was most favourable time to have a federal union.


“A democratic country cannot have union with an autocratic country”. He was continuously used to condemn the imposition of martial law in Pakistan.

This was quite contradictory of Nehru’s own policy with China and J&K. China was undemocratic country by every means. But Nehru had a treaty with China. Nehru had introduced article 370 and 35A in Indian constitution for J&K. Article 370 and 35A are absolutely do not carry any democratic value.


In 1965, Pakistan attacked India under the impression that India might have become weak due to its recent war with the China, and further due to death of Nehru. The western people possesses false impression that the people of India are led by a single political leader like Bal Gangadhar Tilak, MK Gandhi, and then Nehru… Because Nehru died, Indians would have become weak and must have been divided. The Western lobby failed to understand that the Indian peoples’ think tank and morals are quite high. This is because of their democratic sense. This sense is highly deep rooted due to their glorified history of the time immemorial. The same case was with the Indian army.

Because of the false footing of Pakistan, Bangladesh was separated from Pakistan. US wanted division of Pakistan, i.e. liberty of Bangladesh. It was difficult for the USA to handle the Pakistan if the Pakistan is associated with Bangladesh. The USA wanted the credit for liberating Bangladesh. But the USA was not eligible for that credit. The sacrifice was being given by the people of India and its army. India took the credit for the liberation of Bangladesh. However the USA had occupied control on strategic location of near North Pakistan.


India had an excellent opportunity to have a best advantageous treaty to execute with Pakistan and Bangladesh. But Indira Gandhi miserably failed to do that. She was proved a below average politician in foreign affairs like her father Nehru.

After 2014 India has changed the world scenario of politics. The same is getting further changes with moderate speed. Narendra Modi is playing excellent cards in the world politics. Off course he can do this fairly good, when he has strong foot in home affairs. Yes, after 3 decades BJP India is getting clear majority in the parliament. It is also ruling in many states excellently.

Some local analysists are trying very hard (with the help of media and the parties which are defeated on corruption and bad performance), to degrade NaMo Team/BJP. But the people of India knows very well that who is on the right path and who are telling lies.

Now we come to the point, as to how the people of Pakistan are going to play a big role to re-unite India.


Shirish Mohanlal Dave

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धर्म परिवर्तन के लिये प्रतिज्ञा लेनी पडती है क्या? – १

सनातन धर्म, प्रणालीके रुपसे “हिंदुधर्म” माना जाता है. यदि सुचारु रुपसे देखा जाय तो सनातन धर्म सर्वधर्म  समावेशी धर्म है.

सामान्यतः धर्मका अर्थ पूजा पध्धतिसे किया जाता है. किंतु यह भी सत्य नहीं है. धर्ममें केवल पूजा पध्धति ही नहीं होती है, उसमें समाजको अर्थपूर्ण रुपसे चलानेके लिये कुछ नियम भी होते है. ऐसे नियम कि जिससे मनुष्य एवं समाजमें सुख शांति एवं उन्नति हो.

सर्वोच्च न्यायालयने हिंदुधर्मके विषयमें ऐसा निष्कर्ष निकाला कि हिंदुधर्म कोई धर्म है ही नहीं. हिंदुधर्म एक जीवनप्रणाली है.

कुछ लोग इससे आनंदित हुए … कुछ लोग दुःखी हुए. जिनको आनंदित होना था उनमेंसे कुछ लोग दुःखी हुए. जिनको दुःखी होना था वे खुश हुए.

सर्वोच्च न्यायालयके कथनके दो खंड थे.

(१) हिंदुधर्म कोई धर्म है ही नहीं,

(२) हिंदु धर्म एक जीवन प्रणाली है.

हम इनको भीन्न करके अध्ययन करें

(१) हिंदु धर्म कोई धर्म नहीं है. इसका अर्थ है धर्म वह है जिसमें एक पुस्तक एक पुरस्कर्ता होता है. जैसे कि इस्लाम एक धर्म है. ख्रीस्ती एक धर्म है, यहुदी एक धर्म है …

जो इस्लाम धर्मको माननेवाले थे वे आनंदित हुए. ईसाई धर्मको मानने वाले थे वे भी अनंदित हुए. … ये लोग क्यूँ आनंदित हुए?

वे लोग इसलिये आनंदित हुए कि उनको सर्वोच्च न्यायालयका प्रमाण पत्र मिल गया कि उनका धर्म तो अब प्रमाणित धर्म है किंतु “हिंदु धर्म” तो धर्म ही नहीं है.

भारतमें इस्लाम और ख्रीस्ती धर्मवाले, हिंदु धर्मको अपना प्रथम भक्ष्य. खास करके उनका विधर्मीयोंका धर्मपरिवर्तन करनेका निशान, हिंदु-धर्मके अनुयायी ही होते है.

तात्पर्य यह है कि हिंदु-धर्म यदि धर्म ही नहीं है, और ऐसा जब सर्वोच्च न्यायालय जैसी विवेकशील एवं प्रज्ञाशील संस्थाने घोषित कर दिया है, अब तो कहेना ही क्या? उनको तो एक महान शस्त्र मिल गया. उनको लगा कि अब तो हिंदुओंका आसानीसे धर्मपरिवर्तन किया जा सकेगा क्यों कि हम तो “धर्म”- वाले है और ये “हिंदु”-धर्म वाले तो धर्मवाले है ही नहीं, क्योंकि “हिंदु-धर्म” तो धर्म है ही नहीं. और हम जो कहेते है उसके उपर तो सर्वोच्च न्यायालयका थप्पा भी लग गया है.

(२) हिंदुधर्म एक जीवनप्रणाली है.

इस कथन का तात्पर्य यह भी है कि अन्य धर्म, जीवनप्रणाली नहीं है. विस्तारसे कहे तो इस्लाम धर्ममें जीवन प्रणाली नहीं है, इसाई धर्ममें जीवनप्रणाली नहीं है, बौध्ध धर्ममें जीवन प्राणाली नहीं है, सिखधर्ममें जीवनप्रणाली नहीं है, यहुदी धर्ममें जीवन प्रणाली नहीं है. …

हिंदु-धर्म तो धर्म ही नहीं है, इस कथनको सुनकर जो उपरोक्त धर्मवाले आनंदित हुए थे उनको यह दुसरा कथन भी तो लागु पडता है. क्या इन आनंदित लोगोंमें इस कथनके ह्रार्दको समज़नेकी प्रज्ञा नहीं है? नहीं है खचीत ही नहीं है.

हिंदु धर्मः

हिंदु-धर्म एक सामाजिक व्यवस्था है. इसके अतिरिक्त विश्वको समज़नेकी भी व्यवस्था है. ये दोनों परिवर्तन शील है. प्रत्येक समाजमें समयानुसार परिवर्तनकी संभावनाएं पडी हुई होती है. हिंदु धर्मने तो इस कथनकी स्विकृति कर ही ली है. किंतु  परिवर्तन का निर्णय करनेवालोंकी योग्यता सुनिश्चित होना आवश्यक है. यदि यह बात नहीं है तो आप फल भुगतनेके लिये तयार रहो.

न्याय करनेवाला, न्यायशास्त्रके नियमोंका अभ्यासी एवं ज्ञाता होना आवश्यक है. शिक्षा देनेवाला, अपने विषयमें एवं शिक्षा-तकनिक़ीमें प्रवीण होना आवश्यक है, … ऐसे मानव-विश्वमें अनेक क्षेत्र है. हरेक क्षेत्रका कोई न कोई अपनी प्रकृतिके अनुसार ज्ञाता बनता है और वह मानव समाजको उन्नतिकी दिशामें ले जाता है. यही तो सनातन नियम है. और यही सनातन–धर्म है. धर्मका अर्थ है नियम एवं उनका पालन एवं कर्तव्य.

नियम … पालन … कर्तव्य. 

भारतका सनातन धर्म ब्रह्माण्ड कौनसे नियमोंसे चलता है वह समज़नेका प्रयत्न करता है.

ब्रह्माण्डमें क्या है?

ब्रह्माण्डमें आकाश है, वायु है, प्रवाही है, घनत्व है, उर्जा है, सभी वस्तुएं इनमेंसे बनी है. मनुष्य और अन्य कैसे बने यह भौतिकशास्त्रका (विज्ञानका) विषय है. इन विषयोंपर संशोधन करनेका काम शास्त्रीयोंका है.

जैसे विज्ञानके विषयोंमें संशोधन होता रहेता है, उसी प्रकार मनुष्य समाज व्यवस्थामें भी संशोधन होता रहेता है. समाजको कैसे चलना चाहिये वह समाजशास्त्रीयोंका काम है. और समाजको गतिशील उन्नतिशील रखनेके लिये समाजशास्त्र है. ये सभी शास्त्र परिवर्तनशील है. इनको परिवर्तनशील रखनेके लिये जनतंत्र है.

भौतिकशास्त्र एवं जनतंत्रमें सत्यका आदर और सत्यका स्विकार होता है. शास्त्रमें अंतीम निर्णय कभी भी होता नहीं है. व्यक्ति प्रधान नहीं है, किंतु विचार, तर्क, अधितर्क, प्रयोग-सिध्धता प्रधान है. किसी भी निष्कर्ष व्यक्तिके आधिन नहीं होता है. नियम या निर्णय प्रयोगके परिणामके आधिन होता है. समाजशास्त्रमें यदि पार्श्व प्रभाव (बाय प्रोडक्ट – साईड ईफेक्ट) हानिकारक तो वह स्विकार्य नहीं बनता.

भौतिक शास्त्र और समाजशास्त्रमें भेद यह है कि भौतिकशास्त्रमें नियम, मूल्य एवं प्रयोगके उपकरणोपर निर्भर करता है और आवश्यकता पडने पर उनमें संशोधन करना पडता है. समाजशास्त्रमें मनुष्य स्वयं उपकरणोमें सामिल है. और मनुष्य अहंकारके आधिन है. इसलिये समाजशास्त्रको समज़नेके लिये “थर्ड पार्टी” बनके सोचना पडता है.

सामान्यतः प्रत्येक मनुष्यको कभी न कभी लगता है कि “स्वयंको अब ब्रह्म ज्ञान हो गया है यानी कि उसने अब सबकुछ समज़ लिया है”. ऐसे मनुष्योंमे महान लोग भी सामिल है. जैसे कि, कृष्ण, महावीर, बुध्ध, असोजरथुस्ट्र , जीसस, महम्मद साहेब पेगंबर ही नहीं, …  शंकराचार्य, माध्वाचार्य, ज्ञानेश्वर … ही नहीं … कबीर, चैतन्य महाप्रभु, गुरुनानक, सहजानंद स्वामी, … ही नहीं …. लेकिन रजनीश आसाराम, राधेमा, जैसे भी सामेल है.

इन सब बावालोग अपने अपने गुटके सदस्योंकी संख्या अधिकाधिक करनेमें लगे हुए होते है.

अभी अभी केज्रीवालके एक मंत्रीने ऐसे ही एक गुटके गोपाल, जो अपने तथा कथित धर्ममें आगंतुक सदस्योंसे प्रतिज्ञा करवा रहे थे कि मैं फलां व्यक्तिको भगवान नहीं मानुंगा, मैं फलां व्यक्तिको विष्णुका अवतार नहीं मानुंगा, मैं फलां फलां फलां की पूजा नहीं करुंगा, मैं फलां पुस्तकोंकी बातोंको नहीं मानुंगा …

अरे भैयाजी, बुध्ध भगवान अपने धर्ममें आनेवालोंसे ऐसी प्रतिज्ञा करवा रहे थे क्या?

बाबा साहेबने किस आधार पर, कैसे ऐसा कौनसा संशोधन किया कि उन्होने ऐसी प्रतिज्ञाका प्रावधान  करवाया?

भगवान बुध्धने तो ऐसी प्रणाली स्थापित नहीं की थी. बुध्ध भगवान तो ऐसा नहीं मानते थे कि ऐसी प्रतिज्ञा करवानेसे ही ये सब लोग बौध्ध धर्म में प्रवेश करनेकी योग्यता प्राप्त कर सकते है?

ये बावाजी कहेते है कि “ब्राह्मणोंने हजारो सालोंसे इनको दलित रक्खा और उनका शोषण किया इस लिये दलितोंसे ऐसी प्रतिज्ञा करवाना आवश्यक है. और देखो आज इन दश हजार दलित लोगोंके, बौध्ध धर्ममें प्रवेश करनेसे, मोहन भागवत जैसे नेता घूटनों पर आ गये और बोलने लगे कि ‘हमने दलितोंके उपर अत्याचार किये है और हमें उनकी क्षमा याचना करना चाहिये, एवं ज्ञातिप्रथाको नष्ट कर देना चाहिये.’ यह है १० हजार दलितोंके एक साथ बौध्ध धर्ममें प्रवेश का असर. हम अभी १० लाख दलितोंको बौध्ध धर्ममें प्रवेश करायेंगे. तत् पश्चात दश करोड दलितोंको बौध्ध धर्ममें प्रवेश करवायेंगे. …  ” हो सकता है कि वे यह संख्या १० अरब पहूँचानेकी घषणा करें. जब राहुल गांधी ऐसी घोषणा कर सकता है कि नरेंद्र मोदीने कच्छकी ५००० करोड एकड भूमि अंबाणीको दान कर दी. कुछभी बोल दो, हमारा क्या जाता है? वचनेषु किम् दरिद्रता?

ये महानुभाव बावा-भैया ऐसा कहेते है कि “हमे हिंदुओंके आराध्योंको भूलना ही पडेगा तभी तो ये बौध्ध धर्ममें प्रवेश कर सकते है. बौध्ध धर्म एक संस्कृति है.”

इनमेंसे निष्कर्ष ये निकालते है कि ये बावाजीके हिसाबसे ;

(१) बौध्धीज़म एक कल्चर है.

(२) २२ प्रतिज्ञा बौध्धधर्ममें प्रवेश करने किये अनिवार्य है, जिनमें हिंदुओंके फलां फलांको भगवान न मानो ऐसा कहेना ऐसा कहेलवाना अनिवार्य है. यह बात, हिंदुधर्मके आराध्योंकी निंदा नहीं है,

(३) प्रतिज्ञा स्थल पर उपस्थित होना अपराध नहीं है, बीजेपीके नेताओंने बाबा साहेब के सिध्धांतो की प्रशंसा की है. यदि क्षमा मांगनी है तो नरेंद्र मोदी, नीतिन गडकरी, देवेंद्र फडनवीस … आदि को भी क्षमा मांगनी चाहिये और उनका भी त्यागपत्र मांगना चाहिये.


शिरीष मोहनलाल दवे

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Which one is the real Shiv Sena? – 1

What is party?

Leave aside the meaning “Sena” and then discussing on “Who is real Shiv Sena”, if the party has been registered with the EC (Election Commission), then the party is supposed to have its Constitution and aim.

The aim of a political party is generally to act for the welfare of the people. The constitution of a party indicates as to how it would execute its action.

A political party is composed of its registered members and the office bears elected by the registered members under the procedure prescribed in its constitution. These office bears will act in accordance to the party’s constitution.

To incorporate any change in the policy matter, the president of the party has to call a General Body Meeting. Otherwise also to make the changes in the office bearers it has to call for General Body meeting in a regular interval as prescribed in the constitution. If the registered membership is very large, the members of every region, would elect their delegates in proportion (e.g. one delegate per 100 members) to send to the General Body meeting with its suggestions and views.

In a democratic country, all the parties are supposed to have to meet with the democratic requirements, including transparency.

By naming a party as “Sena”, the office bearers cannot function and treat the members as their soldiers. Sena does not carry a specific dictionary meaning. It is just a part to a proper noun.

What is the position of Shiv Sena?

The Shiv Sena had alliance with BJP. This was a part of its policy since long. The last election was fought by Shiv Sena as a partner of the BJP. i.e. the Shiv Sena and the BJP had not put their Candidate against each other. Further it was agreed by the Shiv Sena and BJP both to fight 50% seats of total seats of the Assembly. As a general principle and also as a natural principle, whichever party wins more seats, that party’s leader should be the CM. Here in this case, it was decided that the BJP’s leader viz. Mr. Devendra Fadanvish will be the CM of the alliance (NDA) in Maharashtra. The canvassing also done with the posters prepared on this line. This was as usual.

The Inside Story of Shiv Sena

Most leaders of Shiv Sena, by its nature, used to collect protection money (hapta Vasuli). But BJP is not with this nature. Shiv Sena leaders were not able to act with “Free Will” so far kick-back-s and protection money is concern. This was visible from the statements made by Shiv Sena leaders till Ram Mandir issue was not settled. The Shiv Sena leaders used to blame BJP by saying “BJP says ‘We will construct the temple at the same place (Babri Mosq place) but we will not tell you the date’.” This was the politics of Shiv Sena leaders, with a view to defame BJP indirectly. BJP knew this. But BJP had taken it, as political liberty of Shiv Sena.

Sharad Pawar did know this. He could see that the bonding of Shiv Sena and BJP is not very strong.

Sharad Pawar instigated Shiv Sena’s Uddhav Thakare to have post-election-alliance with his party. However Shiv Sena should not break the alliance with BJP before assembly election, so that Shiv Sena can take benefit of the alliance with BJP.

Shiv Sena might have asked to what to answer, in case a questions is raised on the Shiv Sena’s betrayal towards BJP. Sharad Pawar would have explained the whole plan to Uddhav Thakare. Otherwise also Uddhav Thakare personally was fed up with the alliance with BJP. 

As soon as the Maharashtra Assembly results were out, Uddhav Thakare as per pre-prepared fabricated story, asked BJP, that it was a pre-poll agreement in the alliance that for 2 ½ years the CM should be from Shiv Sena and for 2 ½ years it would be from the BJP. Uddhav Thakare insisted his son Aditya Thakare should be made the CM.

It was natural, that such proposal was certainly to be rejected from the end of BJP. Because the main weapon of BJP is to fight against the rule of dynasty. Hence BJP rejected it. Sharad Pawar also tempted the BJP, to have alliance with NCP. Sharad Pawar instigated Ajit Pawar of his own party to woo BJP to form the government. BJP fell in the net of Sharad Pawar. Ultimately the BJP was fooled.

After failing to form the Government, BJP has no scope to woo with Sharad Pawar again for asking his support, because Ajit Pawar of NCP had betrayed the BJP already.

We will keep all these stories aside.

What should be the position in a democratic country?

Most important point has been neglected by every learned person including the judiciary.

To change the alliance partner is a policy matter or not?

Off course, to Change the pre-poll alliance Partner, after the results are out,  is definitely a policy matter. To discuss the matter related with party’s policy in the General Body meeting is mandatory. Executive body of the party is not authorized to take decision on making the enemy as an ally and vice versa. Hence the post-election alliance, itself is undemocratic.

Judiciary should have taken SUO MOTTO. Why the judiciary has kept silence is a matter of research. The same is with the Election Commission. Because this is a betrayal with the people who gave their verdict as to who should form the Government.

(continued …)

Shirish Mohanlal Dave

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अस्पतालोमें नवजात शिशुओंकी बदल जानेकी शक्यता कितनी है? – 2

श्रीमति नवनीत राणा को गिरफ्तार किया.

ध्वनिप्रदुषण और उद्धवः

आम बातचित ध्वनिका स्तर शून्य डेसीबल होता है. ऊंची आवाज़से बोलो तो ५ डेसीबल  हो जाता है. चार दिवालके अंदर १० डेसीबलके उपरकी आवाज़ स्वास्थ्यके लिये हानि कारक है. खुलेमें ७५ डेसीबल से कम होना चाहिये. ये १० – ७५ के लिये सरकारकी समयबद्ध और १५ दिनसे अधिक न हो ऐसी अनुमति लेनी पडती है. रात्रीके १० बजेसे सुबह ०६ बजेके अंतरालमें कोई लाउडस्पीकर ध्वनि की अनुमति है ही नहीं.

उत्तर प्रेदेशकी सरकारने ध्वनि प्रदुषण नियंत्रित करने पर कार्यवाही की. मंदिरसे भी लाउडस्पीकर हटवाये और मस्जिदसे भी लाउड स्पीकर हटवाये.

लेकिन (हिंदुओके हृदय सम्राट बाला ठाकरे)की संतान(उद्धव)की सरकारने न तो मस्जिद परसे लाउडस्पीकर हटवानेको सोचा न तो उन लाऊड स्पीकरोंकी आवाज़को नियंत्रित करने को सोचा. उद्धव ठकरे वैसे तो कहेंगे की मैंने तो सोचा था. मैंने उसके लिये कदम नहीं उठाये इसका मतलब यह नहीं कि मैं सोचता नहीं हूँ! मेरे साथी कौन है मालुम है? मेरे साथी शरद और रा.गा. है. समज़े न समज़े?

श्रीमति नवनीत राणाने क्या किया था?

सरकारकी इस निष्क्रियता के प्रति सरकारका ध्यानाकर्षित करनेके लिये श्रीमति नवनीत राणाने “मातोश्री” के सामने हनुमान चालिसाका पाठ करनेका एलान किया. हिंदुओंके हृदय सम्राट बाला ठाकरेके संतानकी सरकारको पता भी तो चलना चाहिये न!! “मातोश्री” निवासस्थान हिंदु-हृदयका प्रतिक था, है और रहेगा भी (!!).

हम ऐसा माननेवालोंमेंसे है. और आप हमको मना नहीं कर सकते, चाहे वह हम (नवनीत राणा) ही क्यों न हो?

मातोश्री के सामने हम हनुमान चालिसाका पाठ करके, आपकी सरकारकी एक और निष्क्रीयताके प्रति ध्यान्याकर्षण करते है. वह है ध्वनि प्रदुषणको रोकनेकी निष्क्रीयता है. आपकी यह निष्क्रीयता  पूर्वग्रहयुक्त कार्यशैलीके कारण है. हम इसके उपर आपका ध्यानाकर्षण करना चाहते है.

श्रीमति नवनीत राणाने लिखित रुपसे इस अघाडी सरकारको सूचित भी किया. सरकारको पूर्वरुपसे सूचित करना “महात्मागांधीवादी विरोध/आंदोलनकारी करनेकी प्रणालीका” एक अभीन्न अंग है.

इससे यह भी सूचित होता है कि, सरकारसे विरोध करनेवाला/वाली संवाद करनेके लिये तयार है. क्यों कि सूचित करनेमें संवाद निहित है.    

हनुमान रामायणका एक पात्र है. रामायण एक ऐतिहासिक ग्रंथ है. हनुमान एक ऐतिहासिक पात्र है. राम भी एक ऐतिहासिक पात्र है. भारतके लोग रामको सूर्य (विष्णुका) अवतार मानते है. सूर्य है जो पृथ्विका आधार है और पालक है. भारतके लोग सूर्य/विष्णुको भगवान मानते है. यह परंपरा जापानसे लेकर ईजिप्त तक प्रचलित थी. भारत और जापानमें आज भी प्रचलित है. हनुमान, रामके दूत और सहायक है. हनुमानको रुद्रका अवतार भी माना जाता है. इससे राम और हनुमानकी ऐतिहासिकता नष्ट नहीं हो जाती. इसको धर्मसे जोडो या न जोडो, ऐतिहासिक पात्रोंका गुणगान करना गुनाह नहीं हो सकता.

श्रीमति नवनीत राणा, संवादके लिये तयार थी. उद्धवजीने सोचा होगा कि यदि संवाद करेंगे तो “आजा फसा जा” जैसा हो सकता है. जब हमारे तो दोनों हाथमें लड्डु है तो डर काहेका!! दोनों लड्डु दाउदके दिये हुए है. यदि दाउदजी भारतमें अनुपस्थित होते हुए भी और बिना पदभार भी चाहे वह कर सकते है तो हम तो यहां विद्यमान है … हमारे पास सत्ता भी है … और लड्डु भी है.

तो उद्धवजीने श्रीमति नवनीत राणा पर देशद्रोहका आरोप लगाके, उनको अनुपनिहित (नोनबेलेबल) बंधक (एरेस्ट) बनाके कारावास में ठोक दिया. यदि हम विरांगना कंगना रणौतको दिनमें तारे दिखा सकते है, मीडीया दिग्गज अर्णव गोस्वामीको कारावासकी हवा खिला सकते है और पीटवा भी सकते है तो यह नवनीत राणा क्या चीज़ है!! हम तो उसको, भूमिके नीचे २०फीट गाड सकते है.

जिसका कोई नहीं होता उसका ईश्वर होता है.

ईश्वरने भारतके लिये कई बार यह सिध्द किया है.

भारतमें ईश्वरका पात्र कौन लेगा? न्यायालय!!

न्यायालयका काम क्या है?

न्याय करना!!

“न्याय करना” मतलब?

अन्याय दूर करना!!

श्रीमति नवनीत राणा पर अन्याय हुआ है?

हाँ जी.

कैसे अन्याय हुआ है?


शिरीष मोहनलाल महाशंकर दवे

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अस्पतालोमें नवजात शिशुओंकी बदल जानेकी शक्यता कितनी है? – १

हम देखते हैं कि कभी कभी संतानकी प्रकृति माता-पितासे, किसी भी प्रकारसे मिलती जुलती नहीं है. तब इस बातके उपर अन्वेषण करना आवश्यक बन जाता है.

सामान्यतः पिताके गुण और माताके गुण संतानमें आते है. बच्चीयोंमे अधिकतर माताके गुण आते है. और बच्चोंमे पिताके गुण आते है. वैसे तो कई अवयव (फेक्टर) बच्चोंकी प्रकृति पर असर करता. बच्चोंकी प्रकृतिमें उनका अभिगम (टेंडंसी) पिताके डीएनए पर निर्भर है. मतलब कि, कौनसे विषय पर सोचना, कैसे सोचना, तर्क कैसे लगाना, ये सब, बच्चेके पिताके डीएनए पर एवं घटनाओं पर निर्भर है. यदि बालक पिताके साथ ही अपना काल व्यतीत करता है तो घटनाओंका असर एक समान रहेता है. उसी प्रकार बच्चीयोंके उपर माताकी प्रकृतिका प्रभाव अधिक रहता है. बच्चोंको माता-पिता के लिये कितना आदर है, उसका प्रभाव भी बच्चोंकी प्रकृति पर पडता है. यदि बच्चा अपने पिताके उपर अधिक आदर रखता है तो उसकी प्रकृति भी अपने पिताके समान होती है. यदि बच्चा किसी भी कारणसे (कभी कभी माताएं शिशुकी उपस्थितिमें अपने पतिके सामने झगडती है तो शिशु, क्यों कि, वह माता पर अवलंबित है, वह पिताके विरुद्ध हो जाता है. लेकिन जब वह बाल्यावस्थामें या तो किशोरावस्थामें पहोंचता तब उसको पता चलता है कि पिताजी सही है तो वह पिताके प्रति आदर रखता है. बच्चा जब तरुण अवस्थामें आता है तब उसको माताका स्त्री होनेके नाते सोचनेका तरिका भीन्न है इसका पता चल जाता है. वह माताका भी आदर करता है और माताको समज़ाता भी है.

पूराने जमानेमें बच्चेका जन्म दायन (दायी) करती थी. उस जमानेमें बच्चोंका फेरबदल शक्य नहीं था. यदि जानबुझ कर किया जाय वह अलग बात है. अंग्रेजोके शासनकालमें बच्चोंका  अस्पतालमें जन्म होना प्रारंभ हुआ. अंग्रेज सरकार तो कानूनसे चलने वाली सरकार थी, इसलिये वह प्रक्रिया बनानेमें और उसके पालन करनेमें/करवानेमें सक्षम थी.

फिर आयी हमारी कोंगी सरकार. कोंगी कालमें बच्चोंका अस्पतालमें जन्म होना “सामान्य होना” प्रारंभ हुआ. लेकिन कोंगी सरकार के शिर्षनेतागण में ऐसी मानसिकता भी आने लगी कि यदि कानून अपने आप चलता है तो चलने दो. हम “नेता” मतलब कि, “अति-उच्च-शिर्षस्थ” नेताओंके लिये और उनके फरजंदोंके लिये एवं उनकी ईच्छापूर्तिके लिये, यदि, कानून एक अवरोध बनता है तो कानून की ऐसी तैसी.

जब सैयां बने कोतवाल, तो फिर कहेना  क्या? अरे भैया, यह तो एक आम कानून पालनकी बात है. अस्पतालमें बच्चोंको जन्म देने वाले कानून की बात नहीं है. हाँ जी, अस्पतालमें बच्चेका जन्म होता है उसी क्षणसे लेकर, माता और बच्चा अस्पतालसे विदाय (सामान्यतः एक सप्ताह के बाद) लेता है तब तक उसकी एक कानूनी प्रणाली है. इससे बच्चोंका फेरबदल होना असंभव बनता है. लेकिन हम जो ठहरे कोंगी शासनके गुलाम. “हम” से मतलब है सामान्यतः अस्पतालमें कामकरनेवाले. क्षति तो हो भी सकती है. मुलायम सिंहने कहा था न! बच्चें है … गलती हो जाती है… तो अस्पतालका स्टाफ भी किसीके तो बच्चे होते ही है न!! यदि अब बच्चे नहीं है तो क्या हुआ !! उनके माता-पिताके लिये तो अब भी वे बच्चे ही है न!

मोतिलाल की संतान जवाहरलाल नहेरु थी. मोतिलाल नहेरु के पास आपकमाई थी. मोतिलालने सोचा कि मेरे बच्चे को बापकमाई से चल जायेगा. फिर भी प्रमाणपत्र तो चाहिये ही. उसके सिवा बुढा (एम. के. गांधीजी) मानेगा नही. इस लिये इसको बारीस्टरसे आगे कुछ पढाना पडेगा. मोतिलालने जवाहरको आई.सी.एस. की स्पर्धात्मक परीक्षाके लिये पढने को कहा. कई महानुभाव स्पर्धा एवं श्रममें मानते नहीं है. जवाहरलालजी फेल हो गये. मोतिलालने सोचा चलो “आई. सी.एस. फेल” भी तो एक अप्रमाणपत्रित प्रमाणपत्र है. जैसे नोन-मेट्रीक, नोन-ग्रेज्युएट. अब तो बुढा मान जायेगा. और वह मान भी गया. उनको १९२९ एवं १९३०में कोंग्रेसका प्रेसीडेंट भी बना दिया. “सर्वे गुणाः कांचनमाश्रयंते”.

तो क्या जवाहरलाल, मोतिलालकी औरस (सही डी.एन.ए. वाली) संतान थी?

अरे भैया, जब किसीने ऐसा प्रश्न ही नहीं उठाया है तो हमें क्यों “गोबर पर बिच्छू  चढाना”? [गोबर पर बिच्छू चढाना एक “गुजराती” मूँहावरा है. “छाणे वींछी चढाववो”] मतलबकी और आफत पैदा करके बढाना.

बाला ठाकरेको “हिंदुओंका हृदय सम्राट”का खिताब उनके भक्तों द्वारा दिया गया था. इस खिताबका प्रचार इस हदतक हुआ मानो वह समस्त भारतकी जनताने दिया हो.

चलो हमें कोई फर्क नहीं पडता यदि वह सही राह पर है. अलबत्त यह सही राह एक विवादका विषय है. किंतु हम इसमें पडना चाहते नहीं है. और मान लेते है कि बाला ठाकरे हिंदुओंके हृदय साम्राट थे.

बाला साहेब ठाकरेने एक पक्षकी स्थापना की. उसका नाम रक्खा शिव सेना (शिवाजी सेना). इसका नाम शिवसेना क्यूँ रक्खा गया, किस लिये स्थापना हुई और पर्दे के पीछे कौन कौन थे … इसकी चर्चा हम नहीं करेंगे. लेकिन बीसवी शताब्दीके अंतसे बीजेपीके साथ उसका गठ बंधन रहा.

२०१२से जब उद्धव ठाकरे जो बाला साहब ठाकरे के पुत्र थे वे शिवसेनाके प्रमुख यानी कि, उत्तराधिकारी  बने, तो कालांतरमें उनकी भाषा बदलने लगी. वैसे तो शिव सेना और बीजेपीका गठबंधन था फिर भी शिवसेनाके कुछ नेताओंने अनापसनाप बोलना शुरु किया. जैसे कि, “जब चूनाव आता है तो बीजेपीको राममंदिर याद आता है.”

ऐसा क्यूँ? यदि शिवसेना बीजेपीका गठबंधनका साथी था तो उसको तो बीजेपीके मार्गको (जो न्यायालयाधिन था) एक साथी होनेके नाते सराहना चाहिये था. लेकिन यह साथी पक्ष तो कुछ उल्टा ही कर रहा था. २०१४के विधानसभाके चूनावमें बीजेपीको स्वयंको बहुमत मिला, तबसे तेज़ीसे शिवसेनाका रुख बदलने लगा. फिर भी बीजेपीने गठबंधन चालु रक्खा. बीजेपीने २०१९में भी चूनाव के समय भी गठबंधन चालु रक्खा. लेकिन इस समय चूनावके बाद, शिवसेनाने पल्टी मारी और बीजेपीके साथका जो गठ्जबंधन था वह तोड दिया.

ऐसा क्यूँ हुआ? वास्तवमें शिवसेनाकी जन्मदाता कोंगी थी. पहेले से ही, मुंबई भारतकी आर्थिक राजधानी थी. साम्यवादीयोंका लेबर युनीयनका बोलबाला था. दत्ता सामंतको हटाना था. कोंगीयोंको एक ऊंटकी आवश्यकता थी. तो उन्होंने मराठी माणुस की एक पार्टीकी स्थापना की जिसका हेतु दक्षिण भारतीयोंको हटानेका था. बात बहूत लंबी है. लेकिन बादमें शिवसेना ने हिंदुत्त्वका मास्क पहन लिया.    

शिवसेना प्रारंभसे ही वास्तवमें हप्तावसुली पक्ष है.

जब वह बीजेपीके साथ गठबंधनमें आई और बीजेपी छोटे भाउ मेंसे बडा भाउ बन गया तो शिवसेनाकी हप्तावसुलीमें काफी कमी आ गयी. यह परिस्थिति शिवसेनाके लिये असह्य थी. शिवसेनाने मौके का लाभ उठाके शरद पवारकी एन.सी.पी. के साथ चूनावके पश्चात गठबंधन किया. शरद पवारने कोंगीको मना लिया.

आप देखते है कि दाउदके दो हाथ है. दांया हाथ और बायां हाथ. सोनीया सेना कोंगी उसका दायां हाथ है. और बायां हाथ शरद सेना एन.सी.पी. है. ये दोनों “एस.एस.” ही तो है. तो अब एक एस. एस. और ही सही. सीवेज सेना.

कोंगी और एन.सी.पी. पर्देके पीछे रहेकर इस सीवेज सेना (शिवसेना) को नचाते है. शिवसेना अब प्रदूषित पक्षोंके साथ गठबंधन करनेसे, अपने नामसे भी प्रदूषित सेना (सीवेज सेना) बन गयी है. उसने अपना घरवापसीका रास्ता नष्ट कर दिया है. उसको अब नाचनेमें कोई आपत्ति और विरोध नहीं. उसको केवल पैसा ही चाहिये और सत्ता इसलिये कि यदि सत्ता है तो कोई खतरा न आवे. सिद्धांत जाय भाडमें.

आप देखते है कि, ये तीन त्रेखड, जबसे सत्ता पर आये है उसी महीनेसे, उन्होंने बडे पैमाने पर हप्ता वसुली, चाहे वह सुरक्षा-प्रदान हप्ता वसुली, बार-डांस-हप्ता वसुली, पोस्टींग वसुली, अतिक्रमण हप्ता वसुली, असामाजिक कर्मोंके आँख मिचौली हप्ता वसुली, सुविधा वसुली … एवं प्रकीर्ण रकम वसुली (आपने फ्रीज़/एसी/सोफा/स्कुटर/कार लिया है. अच्छा किया. आप थोडा दानपूण्य भी कर दें. जो भी ठीक लगे… ₹ ५०१, ₹ १००१ … ₹ ५००१. हम चाहते है कि आप खूब तरक्की करें. आपने ट्रक/बस लिया है? उसकी सुरक्षाकी जीम्मेवारी लेना हमारा फर्ज बनता है. आप हमें प्रतिमास ₹ १००१ देतें रहे …) इनमेंसे कुछ तो उनकी पैदाशी प्रकृति है.

ये तीनों पक्ष नीपोटीज़मवाले है. नीपोटीज़म अतिआवश्यक है. क्यों कि ये विश्वासका मामला है. अपने पुत्र, पुत्री, भाई, भतीजे, मामा, भानजा … आदिको अपने गुटमें रक्खें तो विश्वास करना आसान बनता है.

बाला ठाकरे हिंदुओंके हृदय सम्राट थे. क्या यह बात एक बनावट थी? या वे भी अपने हृदयसे हिंदुप्रेमी थे? उद्धवजी तो ऐसे नहीं है.

नहेरु अपनेको जनतंत्रवादी मानते थे. उन्होंने १९५४में तत्कालिन पाकिस्तान के प्रमुखका फेडरल युनीयनका प्रस्ताव अपमान पूर्वक ठूकरा दिया था. यह कहकर कि पाकिस्तान एक लश्कर शासित देश है और भारत एक जनतांत्रिक देश है. उनको किसी पत्रकारने पूछा नहीं कि, रुस और चीन कैसे देश है! नहेरुका रुसके प्रति एवं चीन के प्रति जो प्रेम था वह काहेका था? इंदिरा गांधीने १९७५में क्या किया. वह तो पिताके पीछे परछांई कि तरह ही तो घूमा करती थी, ताकि जनतंत्रवादी नहेरु अपने कुकर्मोकों छूपानेके लिये अपनी सुपुत्रीको देशके प्रधानमंत्रीकी पोस्ट दायजेमें नहीं तो विरासतमें दे सकें. नहेरु अवश्य ही अपने दिवानखंडमें लटार मारते मारते बोलते होगे कि ये विपक्षको तो कारावासमें ठोक देना चाहिये, ये सर्वोदयकी बातें करने वाले गांधीवादीयोंकी संस्थाओं पर तो जाँच बैठा देनी चाहिये. …

ऐसा लगता है कि नहेरु दो मुखौटे वाले थे ही. यदि वे सर्वोदयवादी होते तो उनमे और इंदिराके बीच बनती ही नहीं. लेकिन हम जानते है कि इंदिराको अपने पितासे खूब बनती थी. क्यों कि वह अपने पतिको छोडकर अपने पिताके साथ ही सातत्यसे रहेती थी. इसलिये इंदिरा, जवाहरलाल नहेरुकी औरस (बायोलोजीकल – डी.एन.ए. वाली) संतान थी ही.


शिरीष मोहनलाल दवे

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२०२४में गद्दारोंको हरानेकी व्यूह रचना – १

गद्दरोंको हराना है तो गद्दारोंको पहेचानना पडेगा.

गद्दार (देश द्रोही) को कैसे पहेचाना जाय?

गद्दारकी एततकालिन प्रवर्तमान परिभाषा तो यही होना चाहिये कि जो अपने स्वार्थके लिये भारतवर्षका अहित करने पर काया और वाचासे प्रत्यक्ष या परोक्ष रुपसे प्रवृत्त है, वह गद्दार है.

गद्दारका परोक्ष रुप क्या है?

हिंदुओंको कैसे भी करके विभाजित करना जैसे कि, विचार, ज्ञाति, क्षेत्र, भाषा, लिपि, जूठ, वितंडावाद (कुतर्क) , फर्जी वर्णन (false and prejudicial narratives), … ब्लोगका हिन्दु विरोधी, बीजेपी नेता विरोधी अयोग्य और विवादास्पद शिर्षक बनाना …

किंतु पता कैसे चले कि फलां फलां शिर्षक या विषय अयोग्य है?

जी हांँ … सही विषय, सही वर्णन, सही शिर्षक, आदि का चयन करना सरल नहीं है . लेकिन एक बार विचार कर लेना कि हमारे कथनका क्या असर पडनेवाला है. हमारे कथनसे हिंदुओंका कोई एक वर्ग अपमानित तो नहीं होनेवाला है न!!

कौन हिंदु है?

जो व्यक्ति समज़ता है कि मेरा धर्म (कर्तव्य) “मेरा देश भारतका हित सर्व प्रथम” है वह हिंदु है. भारतवर्ष से प्रथम अर्थ है प्रवर्तमान १९४७का सीमा-चिन्हित भारत. मेरा भारत वह भी है जो वायु-पुराण (वायुपुराण क्यों? क्यों कि वह पुराणोमें सबसे प्राचीन है) में भूवनविन्यासके अध्यायोंमें उसका वर्णन किया हुआ है. वह है भारतीय संस्कृतिका विस्तार. अर्थात जंबुद्वीप.

भारतीय संस्कृतिसे क्या अर्थ है?

मानव समाजको उन्नति की दीशामें ले जानेवाली विचारधाराका आदर और ऋषियों द्वारा पुरस्कृत या प्रमाणित आचारधारा का कार्यान्वयन (Execution).

सनातन धर्ममें वर्णित विचार धाराएं प्रति आदर, वेद उपनिषद, गीता, जैन, बौद्ध, ब्राह्मण (ब्रह्मसे उत्पन्न ब्रह्म स्वरुप ब्राह्मण यानी महः देवः यानी अग्नि यानी रुद्र यानी विश्वदेव यानी विश्वमूर्त्ति यानी उसका प्रतिकात्मक रुप शिव और शक्ति यानी पुरुष-प्रकृति यानी तात्त्विक रुपसे वैश्विक परिबलोंके साथ ऐक्यकी साधना. शक्ति – सूर्य- पंचमहाभूत … अद्वैतवाद.

ज्ञान, शौर्य, कर्म और कला मेंसे किसी एकके प्रति अभिरुचि द्वारा आनंद प्राप्ति. अपनी खुशीके लिये किसीको कष्ट न पहोंचे उसका खयाल रखना. और इस तरह समाजको समयानुरुपसे उत्तरोत्तर विकसित करना. कटूता विहीन तर्कशुद्ध संवाद, यह है सनातन धर्म जो प्रकृतिको साथमें रखके अहिंसक (कमसे कम हिंसक) समाज के प्रति गति करता है. कायरता और हिंसाके बीचमें यदि चयन करना है तो हिंसाका चयन करना है.

वेद और पुराण के दो श्लोक हमे कहेते हैं कि,

मा नः स्त्येनः ईशतः (हम पर चोरोंका शासन न ह. ऋगवेद).

इससे स्पष्ट होता है कि जो अगणित कौभांडकारी कोंगी, माफिया मुल्लायम, चाराचोर लालु, रीलीफ फंडमें कौभांड, शारधा, नारदा … आदि कौभांडमें सहभागी एवं आतंकवादी ममता, उद्धव सेना, शरद सेना, … के शासनका हमें विरोध करना है और नष्ट करना है.

आत्मनः प्रतिकुलानि परेषां न समाचरेत. (जो हमारे लिये प्रतिकुल है वह दुसरोंके उपर न थोपें. कूर्म पुराण)

ममताने हजारों हिंदुओंकी ह्त्या की, और एक लाख हिंदुओंको उनके घर जलाके भगा दिया. कारण केवल यही था कि उन हिंदुओंने ममताके पक्षको मत नहीं दिया था. इसके लिये ममताको जितना भी दंडित किया जाय, वह कम ही है.

आम जनता यानी कि, हम, जो स्वयंको राष्ट्रवादीमानती है उनका क्या धर्म है?

(१) लोकतत्र वाले देशमें जनताको जागृत करना और राष्ट्रवादी नेताओंके लिये हकारात्मक वातावरण तयार करना,

(२) राष्ट्रविरोधी तत्त्वोके उपर सातत्य पूर्वक उनकी क्षतियोंके उपर और दुराचारोंके उपर आक्रमण करना,

(३) राष्ट्रवादी नेताओंकी तथा कथित क्षतियोंको गुह्य रखना. या उन चर्चाओंमे मोड ला देना यानी कि विषयांतर कर देना,

(४) अप्रासंगिक और मृत विषयों पर चर्चा नहीं करना,

(५) हमारे ध्येयमें हमें स्पष्ट होना, और हमारा हर कदम हमारे ध्येय की दिशामें होना आवश्यक है.

सबसे बडी हमारी समस्या यह ही है कि हम राष्ट्रवादी लोग अधिकतर यह नहीं सोचते कि हमारी चर्चा मीथ्या की दिशामें जा रही है. और हममेंसे कई लोग इस परिस्थिति समज़ नहीं पाते हैँ. और अपनी शक्तिको और समयको बरबाद करते है.

चलो इसको समज़ें


शिरीष मोहनलाल दवे

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नकलीको असली कहो और ध्वस्त करो – ४

(१) हमने पहेले ही देख लिया है कि कुछ लोग “एम. के. गांधीजीकी बुराई करनेमें क्यों सक्रीय है?

अधिकतर किस्सोंमे जो वीडीयो-लेख प्रस्तूत करनेवाले होते हैं उनको यह देखाना है कि वे किस सीमा तक निडर राष्ट्रवादी है कि वे, अपना राष्ट्रवादत्त्व दिखानेके लिये गांधीजी तकको छोडते नहीं है. इन लोगोंके अनुयायी लोग, गांधीजी के लिये जो भी गाली याद आयी उस गालीको कोमेंटमें लिख देते है.

(२) गांधीजीकी बुराई करनेमें बुराई क्या है?

गांधीजीकी निंदा करनेमें कोई बुराई नहीं है, यदि यह चर्चा तर्कशुद्ध और ज्ञानवर्धक हो. लेकिन ऐसा कभी भी होता नहीं है. एक फर्जी बात करो, वाणी विलासवाला विवरण दो, जूठ को ही सच मानके चलो, और उस फरेबी सचसे गांधीजीके व्यक्तित्त्वको ध्वस्त कर दो.

जैसे कि; गांधीजीके रामको पुतला वाला राम कहेना , गांधीजीका भगत सिंह के प्रति द्वेष था ऐसा मान लेना, गांधीजीका सुभाष के प्रति द्वेष था ऐसा मान लेना, गांधीजीकी मुस्लिमोंके प्रति तुष्टिकरणकी नीति थी ऐसा मान लेना, … गांधीजीकी अहिंसा फरेबी थी ऐसा मानना, गांधीजीने देशको तोडा ऐसा मानना, गांधीजी तो अंग्रेजोंके पालतु कुत्ते थे ऐसा मानना, एकाधिकारवादी गांधीजीने नहेरुको कोंग्रेसका प्रमुख बनाया …. ऐसी तो कई बातें है, जिनसे गांधीजीको मरणोत्तर गालीयां मिलती रहेतीं हैं.

लेकिन यदि कोई गांधीजी प्रति आदर करनेवाला, प्रश्न करें और चर्चाका आहवाहन करें, तो ये लोग उसके उपर गाली प्रहार करेंगे, यदि चर्चामें उतरे तो मुद्दे बदलते रहेते हैं, असंबद्ध बातें करेंगे, … एक वीडीयो या/और पुस्तककी लींक देके चर्चासे भाग जायेंगे. यदि उनकी तबियत गुदगुदाई तो दो तीन गालीयां भी दे देंगे.

(३) गांधीजीकी बुराई करने वाले है कौन?

गांधीजीकी बुराई करनेवाले लोग कोंगी और उसके सांस्कृतिक साथी है.

कोंगीयोंने पहेलेसे ही सत्ताके लिये लोगोंको विभाजित करनेका काम करते रहे हैं.

मुस्लिमोंको तो एक बाजु पर छोड दो.

(३.१) हिंदुओंकोभी विभाजित करनेका काम कोंगीयोंने ही किया है.

सत्ताके लिये कोंगीने शिवसेना की स्थापना की थी.

(३.२) कोंगीयोंने मुस्लिम तुष्टीकरणके लिये साध्वी प्रज्ञाका क्या हाल किया था?

हिंदुओंको भगवा आतंकवादी सिद्ध करनेके लिये बंबई ब्लास्टकी घटनाको, हिंदुओ पर ठोक देनेके लिये, एक कोंगीनेताने एक पुस्तक लिख दी थी.

(३.३) ममता, बीन बंगालीयोंको बाहरी बताती है, वह दलित हिंदु औरतोंपर अत्याचार करवाती है और उनके घर जला देती है, उतना ही नहीं हिंदुओंको राज्यसे बाहर खदेड देती है. ममता फिर मीट्टीका मानुस का गीत गाती है.

(३.४) महाराष्ट्रका नेता मराठाओंको अन्यसे अलग करवाता है, और माराठाओंको आरक्षण दिलानेके लिये आंदोलन करते हैं.

(३.५) आपको कोंगीकी लुट्येन गेंगमें अब, काका कालेलकर जैसा सवाई गुजराती नेता ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा. सौराष्ट्रके झवेरचंद मेघाणी शिवाजीके गुणगान वाली कविता रचते थे.

(३.६) गुजराती और मराठी जनता हिलमिलकर रहेती थीं. नहेरुने मराठी-गुजरातीमे विभाजन १९५६में किया.

(३.७) कर्नाटकमें कोंगी, “लिंगायत”को (जो शिवके उपासक है) उनको अल्पसंख्यकका दरज्जा देना चाहती है. यदि शिव ही हिंदु धर्ममेंसे निकल गये तो हिंदुधर्ममें बचा क्या?

(३.८) गुजरातका एक कोंगी पटेल नेता पाटीदारोंके आरक्षण के लिये आंदोलन चलाता है.

(३.९) जब कोंगीयोंकी सत्तामें हिस्सेधारी होती है तब वे विपक्षीनेताओं पर बेबुनियाद आरोप और फर्जी केस चलाते थे. रामलीला मैदानमें बाबा रामदेवके अहिंसक आंदोलन पर आधी रातको आक्रमण करवाया. अहिंसक आंदोलनकारी लोगोंको पीटा गया. ऐसे तो अगणित घटनाएं हैं.

(३.१०) भारतमें लोकशाहीमूल्योंका हनन कोंगी शासित राज्योंमें होता है.

(४) दलितोंको वोटके लिये टार्जेट करना, एक नया तरिका ममताने निकाला है.

(४.१) वोट न देनेके कारण, दलितों के प्रति ममताका रुख कैसा रहा? ममता, इन दलितोंको अपने घरमें वापस आने के लिये दलितोंसे पैसे मांगती है.

(४.२) दलित लोग गरीब है और वे प्रतिकार नहीं सकते, न तो वे न्यायालयमें जा सकते है. पूलिस तो ममताके आधिन है. इस लिये ममताने दलितों पर ही आक्रमण करवाया, यह एक ल्युट्येन गेंगकी नयी खतनाक चाल है.

(४.३) सरकारी अफसरोंको और न्यायाधीशोंको धमकी देना कि “आप भी तो निवृत्त होनेवाले है, फिर आपका क्या हाल होगा वह सोच लो.” गवर्नरको बोला जाता है कि “दिल्ली जाते हो तो वापस मत आना”.

जनतंत्रको अवहेलना करने की मनमानी करनेकी इससे अच्छी मिसाल विश्वमें कहीं नहीं मिलेगी.

ग़ांधीजीकी बुराई करनेवालोंको यह सब नहीं दिखाई देता है.

(५) गांधीजीकी निंदा करने वाले प्रच्छन्नरुपसे कोंगीके हितैषी है.

(५.१) जाति-वर्ण के आधार पर भी विभाजित किया आ सकता है. भाषा और क्षेत्रके आधार पर भी विभाजित किया जा सकता है.

(५.२) कोंगी लोग यह भी समज़ते है कि हिंदुओंको गांधीके नाम पर भी विभाजित किया जा सकता है.

(५.३) एक फर्जी नेरेटीव्ज़ चलाया गया है कि गांधीजीने ही नहेरुको गद्दी पर बैठाया और इस नहेरुके कारण देशकी यह दुर्दशा हुई. तो अब नहेरुको और नहेरुवीयनोंको बाजु पर रख दो, और गांधीके उपर ही तूट पडो.

आप पूछोगे लेकिन इससे क्या होगा?

(५.४) कोंगी समज़ती है कि वैसे तो आर. एस. एस. के कुछ अज्ञ लोग उनको गांधीजीकी हत्यासे कुछ भी लेना देना नहीं है, तो भी “आर. एस. एस.”वाले कुछ लोग तो मैदानमें उतर आयेंगे और गांधी-निंदाको सपोर्ट करेंगे. कमसे कम गांधीको एक गाली देके अपना फर्ज निभाया ऐसा मानेंगे.

आप कहोगे कि; “आर. एस. एस.”का गांधीकी हत्यासे लेना देना क्यों नहीं है?

अरे भैया, गांधीजीकी हत्या करनेवाला आर.एस.एस. का सदस्य था ही नहीं. वह तो हिंदु महा सभा का सदस्य था.

“तो फिर “आर.एस.एस.” वाले क्य़ूंँ कूद पडते है?

क्यूंँ कि आर.एस.एस.” पर राहुल गांधी आरोप लगाता है कि “आर.एस.एस.” वाले गोडसे वाले है. यदि जब राहुल गांधी जैसा, महामानव, आरोप लगाता है तो उसका आदर तो करना पडेगा ही न. राहुल गांधी कौई ऐसा वैसा आदमी थोडा ही है?

(६) गांधीजी की निंदा करनेमें कौन कौन प्रकारके लोग है ?

गांधीजीकी निंदा करनेमें ऐसे लोग है जो अपनेको सुज्ञ मानते है लेकिन वे लोग गांधी-साहित्य को पढनेका कष्ट उठाना चाहते नहीं है.

ये छोटा मोटा पदधारक, विश्लेषक … होने के कारण लिखते रहेना / बोलते रहेना उनका व्यवसाय है. क्या करें ख्याति भी तो कोई चीज़ है!! यदि हम तर्कशुद्ध नहीं बोलते तो क्या हुआ? कौन तर्क शुद्ध बोलता है? बीबीसी ? न्यु योर्क टाईम्स?

वे समज़ते है कि मौका मिला है तो लिख ही दो. अनुपद्रवी लिखनेके बदलेमें उपद्रवी लिखनेेसे अधिक लाईक और कोमेंट मिलती है. आपने देखा नहीं क्या, कि आचार्य रजनीश, अकबरुद्दीन औवैसी, राहुल गांधी, सोनिया गांधी, िप्रयंका वांईदरा, टीकैत, अखिलेश, एमएमएस, नवाब मलिक, ममता, केज्री … आदि लोग उपद्रव कारी नहीं बोलते तो उनकी पहेचान कैसे बनती?

(७) गांधीजीकी निंदा करनेसे फायदा किसको होगा?

(७.१) गांधीजीकी निंदा करनेसे ल्युटेन गेंगोंको (यानी कि, बीजेपीके विरोधीयोंको) फायदा होगा.

क्यूंँ कि  काफि अज्ञ हिंदु  लोग मानते है कि गांधीकी निंदा करना वह नहेरुकी निंदा करना ही है. (वैसे तो नहेरु और गांधीके बीच आकाश पाताल का भेद है. लेकिन पढना किसको है? समज़ना किसको है?).

(७.२) नरेंद्र मोदीने गांधीजीको पढा है. लेकिन ये अज्ञ लोग शुक्र करो कि, नरेंद्र मोदीको गांधीजीके संबंधमें गालीयां देते नहीं है. क्यूंँ कि तब तो वे एक्सपोज़ हो जायेंगे कि वे प्रो-कोंगी है.

(७.३) कुछ सियासत से अज्ञ लोग है, लेकिन वे गांधीको तो जानते है और उनके उपर श्रद्धा रखनेवाले है, ये लोग समज़ेंगे कि गांधी-निंदक (वे इनको आरएसएस वाले) तो जूठ बोलते है और विश्वसनीय नहीं है. इसलिये बीजेपी भी विश्वसनीय नहीं है.

(७.४) आम जनतामें भी ऐसे लोग है, जो लोग द्विधामें पड जाते है. वे ऐसा समज़ने लगते है कि सियासतमें सभी लोग एकसे होते है.

इससे क्या होता है?

(७.५) ये लोग “नोटा” बटन दबाते हैं, या वॉट देनेको ही नहीं जाते है.

(७.६) कई सारे लोग उपरोक्त द्विधाके कारण वॉट देनेको जाते नहीं है.

(८) इस बातको हमेशा याद रक्खो कि;

(८.१) राष्ट्रवादीओं द्वारा वॉटके लिये जाना नहीं, गद्दारोंको वोट देने के बराबर है.

(८.२) राष्ट्रवादीओं द्वारा बीजेपीको वोट नहीं देना या “नोटा” बटन दबाना, गद्दारोंको वॉट देनेके बराबर है.

(९ ) ओ! गांधीजीकी निंदा करनेवाले महानुभाव लोग, यदि तनिक भी समज़दारी भी है तो समज़ जाओ. युद्ध केवल शस्त्रोंसे जिता जाता नहीं है. व्युहरचना भी करना पडता है.

आप कमसे कम गद्दारोंकी व्युह रचनामें मत फंसो.

(९.१) जितना फर्क आर.एस.एस. और आई. एस. आई. एस. में है, उनसे कहीं अधिक फर्क गांधीजी और नहेरुमें है. इस विषय पर एक पुस्तक भी उपलब्ध है.

(९.२) कोंग्रेसका विलय करो यही गांधीका अंतिम आदेश था.

एम. के. गांधीकी निंदा करनेमें और करानेमें कोंगीयोंका ध्येय क्या है?

गांधीजीकी बुराई करने के फलस्वरुप क्या परिणाम आने वाले है?

गांधीजीकी बुराई करनेमें भयंकर बात क्या है?

यदि आप देश प्रेमी और राष्ट्र वादी है तो आपका फर्ज धर्म क्या है.

गांधीजीकी निंदा करना और उसको फैलाना, यह बात कोई व्यूह रचना का भाग हो सकता है क्या?

कोंगीयोंकी लुट्येन गेंगके लिये कोई भी निंदास्पद व्यवहार असंभव नहीं.


शिरीष मोहनलाल दवे

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The Editor, “Daily Sabah”

digital@dailysabah.com, letters@dailysabah.com, opinion@dailysabah.com

Dear Sir,

This is in connection with the article of Mr. Fai published in your “Daily Sabah” on 7th September 2021, with a subject line “Fundamental Misconceptions about Kashmir”

It is not difficult to reply on all the points of the topic. But one has to write a very lengthy reply to cover up, his all the points.

In ancient India there was a practice to insert a thin stick in a book, and open that page. Then read that page and give comment/opinion. Here in case of this article of Mr. Fai, the first point is analyzed for correctness. Why first point? Because it is first point. First point has got to be the most significance. I am reproducing the first point as under;

“1. Kashmir acceded to India on Oct. 27, 1947. Wrong.

The maharaja of Kashmir allegedly signed the Instrument of Accession to India while at the same time pleading for its military intervention to prop up his toppling repressive regime on Oct. 27, 1947. A full-scale internal and indigenous revolt was on the verge of success at that time. …. ……..

Moreover, as British scholar Alistair Lamb has convincingly demonstrated in “Kashmir: A Disputed Legacy, 1846-1990,” the Instrument of Accession is probably as bogus as the ugly protocols of the elders of Zion confected by the Russian Tzar’s Okhrana secret police. An original of the document has never been produced by India or anyone else. ……………………………………..”

The paras contains hypothetical conclusions on the status of the Maharaja.

The next is non comparable can not be compared. Such practice of comparison is not permitted by logical science and by judiciary.

J & K IoA (Instrument of Accession) is available on line. There is no need to try to create a charming topic for a particular section of people.

What document had signed by Maharaja Hari Singh himself, similar IOAs were signed by other big kingdoms by even their (Prime) Minister and not by the Maharajas themselves. Here in case of the J&K, The Maharaja had signed because his Prime Minister Justice M.C. Mhajan was in Delhi.

India is a democratic country. The democracy in India works better than it worked in early decades of Independent India. There are people who can exist in India, with an intention to put, Government of India in trouble by way of false assumptions on an issue. e.g. J&K accession.

The current Government which is far more democratic, had changed the category of the document and made it accessible.

Till that time there were people who were spreading rumors under their agenda that such document did not and does not exist at all.

Any way, Mr. Venkatesh Nayak of “The Wire” got it, under Right to Information Act 2005. What Mr. Venkatesh says on this letter of accession which is signed by the Maharaja (King of a big kingdom) Hari Sigh with his own signature, and also accepted it by Lord Mountbatten with his own signature.

Mr. Venkatesh Nayak had publish the document in his article in “The Wire” October 26, 2016 and August 5, 2019. What he says about the authenticity of this document in his article ? “ … Through this article in The Wire, I can confirm that the J&K IoA exists for real, is safe and well preserved in the collection of the National Archives.”

It is well known among political lots of India that “The Wire” is termed as out of proportional “Liberal” and Anti-BJP.

The Pakistan was created by taking out the portion where the Muslims were in majority of British India which was under direct rule of Agency (Viceroy of India). This agreement was signed by Pakistan and Viceroy at midnight of 14th August 1947. After creating Pakistan only, the India was made independent on 15th August 1947.

This was not applicable to Princely states. The princely states have the liberty to come under dominion of India or Pakistan. The princely state had to act as per the desire of their people. i.e. Princely states had to take opinion of their people under democratic way. It must be noted that till that time the princely states were under the dominion of the country to their accession. India got independence on 15 August 1947, the princely states acceded to India fell under control of India as the IoA.

India had conducted elections in J&K too, like every other princely state. The elected members of the state assembly passed the resolution of merger with India. That is all.

Now the dispute remains with Pakistan Occupied Kashmir. The Assembly Seats of POK is till kept vacant. Even if that number been counted in negative, the Assembly of the princely state J&K had passed the resolution of merger unanimously.

The UN had resolved and according asked the Pakistan to vacate the POK and banned it to perform any military activity, so that the Indian Government to which the Maharaja Hari Singh had signed the document of IOA with India, can have control on POK. And this was supposed to be, to conduct, free and fair elections. No body in the world had challenged the election of peoples’ representative in J&K State Assembly 1951-52.

Thanking you,

With regards,

Yours truly,

Shirish M. Dave.

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वे जगतके तात है तो हम जगतके तातके तात है

वे जगतके तात है तो हम जगतके तातके तात है

जगतके पितामहका एवं मातामहका प्रार्थना पत्र

माननीय, प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी तथा माननीय गृहमंत्री अमित शाह,

विषयः ग्राहक सुरक्षा नियम रद कारवाने के लिये आंदोलन करने के लिये प्रार्थना पत्र एवं पूर्व-सूचना.

अनुसंधानः उपभोक्ता संरक्षण नियम, अधिनियम

हम ग्राहक लोग, सरकार द्वारा   पारित ग्राहक सुरक्षा नियम और अधिनियम जो भी हो वो, उसके विरुद्ध आंदोलन करने जा रहे है.

(१) प्रदर्शन स्थलः

आप, हमे प्रदर्शनके लिये दिल्लीमें योग्य स्थल सूचित करें. यह स्थालका क्षेत्रफल १०००० चोरस किलोमीटर का होना अनिवार्य है.

यदि आपके पास इतना विशाल स्थल नहीं है तो यह आपकी समस्या है, हमारी समस्या नहीं. यदि आप हमें कमसे कम १०००० चोरस किलोमीटर का विस्तारवाला स्थल नहीं दोगे तो हम दिल्लीमें बलपूर्वक प्रवेश करेंगे और संसद भवनकी कार्यवाहीको चलने नहीं देंगे.

आप हमे १०००० चोरस किलोमीटर की औचित्य क्या है, ऐसे प्रश्न न करें, तो आपके लिये यह शोभनीय रहेगा.

आपको अवश्य ज्ञात होगा कि जब देशमें १९ कोटी कृषक (किसान) है तो किसानोंके अतिरिक्त जो बचे वे सर्व उपभोक्ता है. तात्पर्य यह है कि यदि हम दिल्लीमें एक लाख चोरस किलोमीटर जगह मांगे तो भी कम है.

आप कहोगे कि पूरे दिल्लीका विस्तार ही १५०० चोरस कीलोमीटर है और इसमें मकान, संकुल, कार्यालय भी संमिलित है.  तो हमें १०००० चोरस किलोमीटरका विस्तार कैसे दे पाओगे?

हमने आपको पहेसे ही कह दिया है कि यह आपकी समस्या है. वैसे तो हमें नहीं कहेना चाहिये कि रा.गा.जी (राहुल गांधीजी)का कथन था कि,आपने अंबाणीको को कच्छमें ५००० करोड एकड भूमि दान कर दी है. वैसे तो समग्र पृथ्वि पर ही ३८०० करोड एकड से कम भूमि है. यदि आप ५००० करोड एकड भूमिदान अंबाणीको कर सकते है तो हमें १०००० चोरस किलोमीटर भूमि अस्थायी उपयोगके लिये क्यूँ नहीं दे सकते?

हम आपसे अपेक्षा रखते है कि आप हमें तर्कशुद्धतासे चर्चा करना नहीं कहोगे. हम तर्कमें मानते नहीं है. आपने जब हमारी संतान यानी कि किसान-प्रतिनिधियोंसे ऐसी ही सहानुभुति रक्खी है तो हमसे भी वैसा ही व्यवहार करोगे. 

(२) प्रदर्शन और विरोध करना हमारा अधिकारः

यदि आपकी सरकार, हमें आंदोलनके लिये उपरोक्त विस्तारवाला स्थल देनेमें विफल रही तो, हम, दिल्लीमें आनेवाले भूमिगत यातायात मार्ग ही नहीं, रेल और हवाई मार्ग सहित सभी मार्ग बंद कर देंगे. और इन मार्गों पर, हम अपना अस्थायी निवास बनाके, सरकारका  विरोध करेंगे. हम बडी सज्जताके साथ आंदोलन करने वाले है. हमें ज्ञात है कि हमारा आंदोलन सुदीर्घकाल चलनेवाला है.

(३) हमारी मांग है कि सरकार उपभोक्ता कानून रद करें. हम चर्चाके लिये सज्ज है किन्तु जब तक उपभोक्ता कानून रद नहीं होगा तब तक हमारा आंदोलन प्रवर्तमान रहेगा.

(४) जनतंत्रमें विरोध आवश्यक है इसमें वैश्विक संमति है. आपने और आपकी सरकारके आधिकारिक पदस्थ वाले विद्वानोंने भी इस बिन्दुका स्विकार किया है. हम अपना विरोध अहिसक रुपमें करेंगे. हम संविधानकी पुस्तक हाथमें रख कर विरोध करेंगे. हम राष्ट्रध्वज हाथमें लेके विरोध करेंगे. हम “भारतवर्ष अमर रहो” लिखित विशाल पताका दिखाके प्रदर्शन करेंगे. हम किसीके उपर भी, प्रहार नहीं करेंगे. शस्त्र प्रहार या मुष्टी प्रहार या दंड-प्रहार भी नहीं करेंगे. हम देश-विरोधी सूत्रोच्चार भी नहीं करेंगे.

(५) हो सकता है कि हम लोगोंके अंदर, कुछ देश विरोधी व्यक्ति और हिंसक व्यक्ति घुस जाय. हम इस शक्यताको नकार नहीं सकते. कृषि-कानूनके विरोध करनेवालोंके कुछ दलोंमें “मोदी तू मर जा…. इन्दिराको हमने ठोक दिया तो मोदीको भी ठोक देंगे … खालिस्तान जिंदाबाद … “ ऐसे सूत्रोच्चार हो सकते है तो हमारी तो दिल्ली जानेवाले हर मार्गों पर हजारों लाखोंमें विरोधी लोग होगे. उनमें ऐसा होना सहज है.

(६) जैसे आपने कृषि-कानून के (५) में दर्शित देशविरोधीयोंके आचरणकी उपेक्षा (नजर अंदाज किया है) की है, वैसी ही उपेक्षा आप, हममें स्थित उपद्रवी तत्त्वोंकी करें.

(७) “अभिव्यक्तिकी स्वतंत्रता” और “कानूनका विरोध करना”   जनतंत्रका एक आवश्यक अंग है. और हम जनतंत्रवादी होनेके कारण ये सब कर रहे है. और उसके संबंधित प्रबंधन व्यवस्था, यानी कि, बकरा, बैल, भैंस, सुवर, चिकन, मटन, गोस्त, अन्न, फल, कन्द, बिर्यानी, पीत्झा, बर्गर, व्हिस्की, रम, शेम्पेईन, वोडका, श्वेत-व्हाईन, रेड-व्हाईन, चालु-व्हाईन, जीन, टोम कोल्लिन्स, ब्रान्डी, टेलीक्वीला, मार्गारीटा, (ड्रग्ज़की बात नहीं करेंगे किन्तु व्यवस्था अवश्य करेंगे), भीन्न भीन्न प्रकारके व्हीस्कीयोंको उग्र करनेके लिये अश्वका मूत्र  … आदिका संचय करना, यातायातके मार्गों पर इंधन गेस आधारित, लकडी आधारित चूल्हा जलाना, विशाल पात्रोंमें भोजन पकाना, आंदोलनकारीयों के लिये भोजन-पात्रों की व्यवस्था करना, उनकी सफाई करना, पानीकी व्यवस्था करना, मालवाहकोंमें माल लाना, आंदोलनकारीयोंके लिये सोने की व्यवस्था करना, जब सूत्रोच्चार करनेसे उनके मूखारविंद श्रमित हो जाय तो आराम करनेके लिये आराम-कुर्सीयां और सोफा की व्यवस्था करना, ज्ञान ईच्छुक आंदोलनकारीयोंके लिये और ज्ञानी आंदोलनकारीयोंके लिये अधिक ज्ञान प्राप्त करनेके लिये पुस्तकालयोंकी व्यवस्था करना,  शित ऋतुके कारण, आंदोलनकारी लोग सुविधापूर्वक  आंदोलन कर सके उनके लिये उष्मावर्धक यंत्रोकी व्यवस्था करना, और उष्मऋतुमें शित-हवा उत्सर्जित करनेवाले यंत्रोंकी व्यवस्था करना, सभी यंत्रोंको स्वस्थ रखनेके लिये तजज्ञोंको नियुक्ति करना … ये सब तो हमने आपको संक्षिप्तमें बताया. हमारी सूची तो अति अधिक सुदीर्घ (बहुत लंबी) है. वह तो हम हमारी गोदीमें बैठनेवाले समाचार मध्यमोंको, हमारी गोदीमें बैठनेवाले मूर्धन्योंको, हमारी गोदीमें बैठनेवाले विश्लेषकोंको, हमारी गोदीमें बैठनेवाले कोलमीस्टोंको, हमारी गोदीमें बैठनेवाले संवादकोंको, बतायेंगे …         

(८) हम आपके साथ किसीभी चर्चाके विषयमें किसीभी प्रकारकी सूची नहीं देंगे. आप यदि हमें आपकी सूची दोगे तो हम उसका उत्तर नहीं देंगे. हाँ हम चर्चा अवश्य करेंगे. हम चर्चा करनेसे दूर भागते नहीं हैं. हम चर्चा तो करेंगे ही किन्तु आंदोलन चलता रहेगा.

(९) हम तो जगतके तातके तात है.

यानी कि हम किसानके बाप है. यदि किसान जगतका तात है तो हम इस तातका भी बाप है. मान लो कि किसानने हमसे अन्न नहीं लिया तो क्या हुआ?

क्या अन्न ही सर्वस्व है?

जब कृषिका आविष्कार नहीं हुआ था तो क्या मनुष्य जीवित नहीं रहेता था?

क्या किसानको वस्त्र नहीं चाहिये?

क्या किसान नंगा रहेता है?

वैसे तो जैनोंके कुछ साधुलोग नंगा रहेते है, किन्तु वे किसान कहां है?

क्या किसानको निवास नहीं चाहिये?

क्या किसानको चिकित्सक नहीं चाहिये?

क्या किसानको संसाधन नहीं चाहिये?

क्या किसानको यातायातके साधन नहीं चाहिये,

क्या किसानको शिक्षा नहीं चाहिये?

क्या किसानको सहयोगी नहीं चाहिये?

क्या किसानको सुरक्षा नहीं चाहिये?

किसानको ये सब चाहिये.

किसानको ये सब देनेवाले कौन है?

हम ही तो है.

यही तो भीन्नता है मनुष्य और पशुके बीचमें.

और ये सब देनेवाले हम, किसानके भी बाप है.

यदि किसान जगतका तात है,

तो हम जगतेके तातके बाप यानी कि पितामह है.

(९) आप हमें ऐसा मत कहेना कि “आपको यदि अन्याय हुआ है तो आप न्यायालयमें जाओ… कानून आपने बनाया है तो कानून तो आपको ही रद करना पडेगा.

(१०) याद करो न्यायालयने कृषि-कानूनका विरोध कर रहे आंदोलनकारीयोंके प्रति क्या अवलोकन किया था?

(१०.१) क्या उन्होंने तर्ककी चर्चा की थी?

न्यायालयने किसानको तो कुछ भी नहीं कहा है.

(१०.२) न्यायालयने तो सरकारको डांटा कि “यदि आपका संवाद चल रहा है तो क्या उस समयके लिये कानून स्थगित कर दिया जाय?”

जब सरकारने कहा कि “हम सबके साथ संवाद कर रहे है इसलिये कानून स्थगित करना ठीक नहीं होगा.”

(१०.४) तो न्यायालयने तो कहा कि “हम तो सरकारसे निराश है”. न्यायालयने तो सरकारको ही डांटा कि “आप, कैसी कार्यवाही कर रहे है कि आप निस्फल रहेते हो.” न्यायालयने कभी आपसे आपकी और किसान नेताओंके बिचकी चर्चाका विवरण नहीं मांगा. यानी कि किसानोंके क्या बिन्दु थे और आपने उनका क्या उत्तर दिया. और आपने क्या मुद्दे उनके समक्ष रक्खे और उन्होंने क्या उत्तर दिया … इन सबका विवरण न तो आपसे मांगा न तो किसान नेताओंसे मांगा.

(१०.५) जब सरकारने कहा कि “कई सारे किसान संगठन कानूनके समर्थनमें है.”

इस बात पर न्यायालयने क्या कहा मालुम है?

न्यायालयने कहा हमारे सामने तो ऐसा कोई आया नहीं.

(१०.६) क्या आप ये समज़ते है कि न्यायालय अखबार पढे … टीवी चेनल देखें … कृषि-कानूनके समर्थकोंको नोटीस भेजें …?

यह मत पूछना कि न्यायालयने यह कैसे कहा कि आंदोलनकारीयोंमे वृद्ध है, शिशु है, महिलाएं है … बाहर ठंड है … जो आत्म-हत्याएं हूई वे सब नये कानूनके कारण हूई … जो लोग आंदोलनकारीयोंमें थे, या तो उनको आंदोलनकारी मान लिया गया था, वे कौन थे, कहाँसे आये थे,  उनमेंसे जो मरे वे अन्य कारणसे नहीं किन्तु नये किसान-कानूनके कारण ही मरे. न्यायालयने अपना तारतम्य किस/किन आधार पर निकाले? क्यों कि सरकारने या तो न्यायालयने ऐसी कोई जाँच समिति तो बनायी नहीं थी.

(१०.७) जब सरकारने कहा कि “हम कानून स्थगित करनेको तयार है, यदि न्यायालय आंदोलनकारी किसानोंको आदेश दें कि, वे अपना आंदोलन स्थगित कर दे.”

तो इसके उपर न्यायालयने क्या कहा मालुम है? न्यायालयने कहा कि “हम ऐसा आदेश कभी भी नहीं देंगे कि, आंदोलनकारी किसान अपना आंदोलन स्थगित करें. हम वह कह सकते हैं कि वे मार्ग यातायातके लिये साफ करें.”

न्यायालयके इस कथनका संदेश आप समज़े या नहीं समज़े?

नहीं समज़े तो अब समज़ो;

किसान आंदोलन का प्रारंभ ९ अगस्त २०२०से हुआ था. न्यायालय, सुओ मोटो अंतर्गत ही, “रास्ते यातायातके लिये साफ करो और सरकार जो निर्देश दे उस स्थल पर आंदोलन/प्रदर्शन करो” ऐसा आदेश देनेके लिये सक्षम था. किन्तु न्यायालयने ऐसा नहीं किया.

इतना ही नहीं, जब जनहितमें की गयी याचिकाएं न्यायालयके पास है तो भी, न्यायालयने “यातायातके लिये साफ मार्ग” के बारेमें आदेश दिया नहीं. जब ४ जनवरी को न्यायालयने, याचिका सूननेका प्रारंभ किया तब भी, अंतरिम आदेश दिया नहीं. और ११ जनवरीको ऐसा माना भी, कि स्वयं ऐसा आदेश देनेके लिये सक्षम है, तो भी अंतरिम आदेश दिया नहीं, न तो किसीको न्यायिक सूचना (notice) दी.

(१०.८) आपने देखा ही होगा कि दुसरे दिन न्यायालयने, सरकारको ही लताड दी कि, आप एक समिति नहीं बना पाये. न्यायलयने चार सदस्योंकी समिति बनायी.  वास्तवमें तथा-कथित किसान-आंदोलनके नेताओंने तो, आपका, समिति बनानेका प्रस्ताव ही ठूकरा दिया था. किन्तु ये तथ्य, जानते हुए भी न्यायालयने आपको ही लताडा. और मजेकी बात तो यह है, कि, न्यायालयकी बनायी हुई समितिको भी इन्ही नेताओंने अमान्य कर दिया. उन्होंने तो साफ बोल दिया कि, हमे तो कृषि-कानून रद करनेके सिवा, कुछ भी स्विकार्य नहीं. न्यायालयने फिर भी, उनके उपर, न्यायालयकी अवमाननाकी तो बात ही छोडो, न्यायालयने उनको कठोर या नरम शब्दोंमें डांटा तक नहीं. मजेकी बात है न … !, कि न्यायालयका रवैया, उग्र और मालेतुजार आंदोलनकारीयोंके प्रति कैसा “सोफ्ट है”! 

(१०.९) आप समज़ो और अपनी स्मृतिको टटोलो. सर्वोच्च न्यायालयके   एक निवृत्त न्यायाधीशने, एक टीवी चेनलके साक्षात्कारमें क्या कहा था? यह निवृत्त न्यायाधीशने एक प्रश्नके उत्तरमें कहा था कि, जब तक लुट्येन गेंगोंका प्रभाव, न्यायाधीशों परसे दूर नहीं होगा, तब तक न्यायालाय स्वतंत्रता पूर्वक न्याय, नहीं दे पायेका.

(१०.१०) न्यायालयके इस प्रकारके व्यवहारसे आपको एक संदेश लेना है, कि आप हमारे आंदोलनके कार्यकर्ताओंके साथ भी ऐसा ही व्यवहार करेंगे, कि जैसा आपने शाहीन बाग, कृषि-नियम विरोधीयोंके आंदोलनकारीयोंके साथ किया.   

(११) हमारी मांग है कि आप उपभोक्ता सुरक्षा नियम और अधिनियम रद करें.

हमारी इस मांग के प्रयोजनः

(१२) यह नियम और अधिनियम हमारे लिये नुकशानकारक और त्रासदायक है.

(१२.१) हमें न्याय मिलनेमें तीनसे अधिक स्तर बढ गये है.

(१२.२) हमें कागज दिखाने पडता है, कागज कैसा है वह कौन सुनिश्चित करेगा?

(१२.३) विक्रेताने जो कागज दिया वह सही है या नहीं वह बात अनपढ कैसे सुनिश्चित करेगा?

(१२.४) ग्राहकको वकिल रखना पडेगा, आपने तो कह दिया वकील अनिवार्य नहीं. किन्तु यह शक्य नहीं.

(१२.५) यदि विक्रेताने हमारी या फोरमकी कानूनी सूचना (लीगल नोटीस) लाने वाले को युक्तिसे भगा दिया, तो केस नहीं बनेगा,

(१२.६) यदि विक्रेताने या उत्पादकने अपना नाम नहीं बताया, गलत नाम बताया, नोटीस लिया नही, …  तो केस नहीं बनेगा …

 (१२.७) … यदि सबकुछ सीधा चला और फोरमने दंड भी लगाया, पर उसने दंड नहीं भरा, तो?

(१२.८) … ऐसा हुआ तो हमे “फोरमका अनादर हुआ” उसका केस करना पडेगा …

ऐसे तो हजार प्रश्न और कष्ट है.

संक्षिप्तमें कहें तो, हमे आंदोलन करना है. हमें हर हालतमें आंदोलन करना है.

(१३) न्यायालयकी संवेदनशीलता आपने भीन्न भीन्न समय पर भीन्न भीन्न देखा ही है.

रावणका आक्रमण

(१३.१) बाबा राम देव ने २०१२में सरकारसे कालेधन के उपर जाँच के विषय पर आंदोलन किया ही था. उनका आंदोलन भी शांत और अहिंसक था. किसान आंदोलनसे विपरित, उनका आंदोलन आम जनहितमें था. कानून बनानेके लिये था. सरकारने उनको रामलीला मैदानमें   आंदोलन करने की अनुमति भी दी थी. वे आंदोलनकारीयोंने देश विरोधी, सरकार विरोधी, प्रधान मंत्री विरोधी (नरेन्द्र मोदी तू मर जा … इन्दिराको हमने जैसे ठोक दिया,वैसे मोदी को भी ठोक देंगे, लाशोंका ढेर कर देंगे …) सूत्रोच्चार कभी भी किया नहीं था.

(१३.२) किन्तु २०१२की वह सरकार भीन्न थी. वह सरकार हलाहल, कोमवादी, वंशीय एकाधिकारवादी, भ्रष्टाचारसे लिप्त … ऐसी सेक्युलर, नरम, अनिर्वाचित प्रधानमंत्रीवाली जनतांत्रिक सरकार थी. जिसका नाम कोंगी यानी कि नेशनल इन्दिरा नहेरुगांधी कोंग्रेस (आइ.एन.सी) गठबंधनवाली युपीए सरकार थी.

(१३.३) ऐसी यु.पी.ए. की सरकारके सामने बाबा रामदेवकी नेतागीरीमें जनता रामलीला मैदानमें आंदोलन कर रही थी. उन आंदोलन कारीयोंने तो अपने मुद्दोंकी सूची भी दिया था. इन आंदोलनकारीयोंमें भी महिलाएं थी. वृद्ध भी थे. फिर भी उस सरकारने राम लीलाके मैदानके उपर आधी रातमें आक्रमण करके बलप्रयोगसे (ताडन पूर्वक) आंदोलन कारीयोंको भगा दिया था. तबसे बाबा रामदेव आंदोलन करना भूल गये है.

(१३.४) उस २०१२ वाले आंदोलनमें, न्यायालयकी संवेदनशीलता क्या थी वह जनता को अधिगत नहीं हो पायी थी.

(१३.५) जिन पक्षोंको चूनावमें जनताने पराजित किया ये पक्ष, कृषि-कानूनके विरोधमें प्रवर्तमान किसान आंदोलनके समर्थक है सामिल है. इन्होंने अपने शासन कालमें ही, कृषि-कानूनके समर्थनमें अपार वाणीविलास किया था. न्यायालयने इन सियासती तथ्योंकी अवहेलना करके, आंदोलनकारीयोंके प्रति उनकी उम्र, जाति, लिंग … को लक्ष्यमें लेके अपनी संवेदनशीलता प्रकट की है.

(१३.६) अवश्य एक बिन्दु और भी है. “सरकारी “एफ.आर. एवं एस आर (F.R. & S.R.)” के अनुसार, जो प्राधिकारी, कर्मचारी की नियुक्ति के लिये सक्षम है, वह सक्षम प्राधिकारी ही उसको निलंबित या पदच्युत कर सकता है. (Appointing authority only can suspend or dismiss an employee). यदि यह प्राधिकार उसको संविधानके अनुसार मिले है तो वह प्रात्यायोजित (delegate) कर सकता है, किन्तु यदि वह स्वयं प्रात्यायोजित होनेके कारण सक्षम बना है तो वह अन्यको प्रत्यायोजित नहीं कर सकता.

इससे क्या निष्कर्ष है?

नियम बनानेका काम संविधानने संसदको दिया है. संसद ही उस नियममें संशोधन या निलंबन या रद कर सकती है. संविधानने नियमको लागु करनेका अधिकार सरकारको दिया है.   संविधानने या तो संसदने, न्यायालयको नियम बनानेका, उसको स्थगित करनेका या तो उसको रद करनेका अधिकार नहीं दिया. सरकार न्यायालयसे परामर्श कर सकती है, किन्तु न्यायालयके उपदेशको माननेके लिये बाध्य नहीं है.

ये सर्व प्रावधान न्यायालयको अवगत होने पर भी न्यायालयने कृषि-नियमको अपनी संवेदनशीलताके कारण, निलंबित किया है.

हम भी हमारे पूर्वानुमानसे, न्यायालयकी उसी प्रकारकी मानसिकता की, अपेक्षा रखते है, और आंदोलन करना चाहते है.

(१४) आप समज़ते होगे कि, हमको संसदमें हारे हुए पक्षोंका साम और दामका समर्थन है. इसलिये हम आपको भय और दंड (हप्ता वसुली वाले लोग जो “भय” दिखाते है वह “भय”, और सूपारी लेनेवाले का “कार्य”, यानी कि आपके किसी भी चहितेका अपहरण कर उसकी “हत्या” … ) दिखाते है. अधिक जानकारीके लिये आप बोलीवुडके महानुभावोंका संपर्क करे और लुट्येन गेंग जो न्यायालयके उपर, साम, दाम, भेद और दंड का क्रियान्वयन करता है, उनका संपर्क करें.

 (१५) हम अपना सामर्थ्य दिखाना चाहते है. हम किसीकी निंदा करते नहीं है. हमे जो साफ दिखाई देता है वही हमें सिखाता है, कि, हमें कैसे, आंदोलन करना है, और कैसे आपके विरुद्ध वातावरण तयार करना है.

(१६) इस विषयमें हम भौतिक-शास्त्रके शास्त्री आलबर्ट आईन्स्टाईन वादी है और समाज-शास्त्रके शास्त्री महात्मा गांधीके वादी है.  जैसे पदार्थकी गतिमें परिवर्तन क्षेत्र-बलसे होता है, वैसे ही मनुष्यकी मानसिकता मे परिवर्तन, सामाजिक वातावरणके क्षेत्र-बलसे होता है.

सामाजिक क्षेत्र आपके प्रति ऋणात्मक बने ऐसी कार्यवाही हम करेंगें. ये सब साम, दाम, भेद और दंड से होता है.  आपको भी अनुभूति हो जाय, लुट्येन गेंग संसदको ही स्थगित कर सकती है उतना ही नहीं, संसदके बाहर भी उसके पास विशाल क्षेत्र है. 

हम है किसानके अतिरिक्त आम जनतामें रही लुट्येन गेंग


शिरीष मोहनलाल दवे


आपको इससे अधिक ज्ञानकी यदि आवश्यक है तो श्री संदिप देवका निम्न लिखित लींक पर  वीडीयो देखें.


(India Speaks Daily)

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अबे तुम हो बच्चु, हम है चक्कू

अबे बीजेपी वालों तुम लोग अभी बच्चे हो बच्चेकुछ समज़ते नहीं.

हम तो है जैसे था बाबु चक्कू


क्या बात है? कुछ समज़में नहीं आता है हमें तो …. कुछ ढंगसे तो बताओ … “ भारतीय जनता बोली.


तो सूनो… “बाबु चक्कुपचाससाठके दशकमें, राजकोटका गुन्डा था. हाँ जीवही राजकोट जो सौराष्ट्र राज्यका केपीटल था.

जब शहर बना, तो शहरमें गुन्डा तो होना ही चाहिये. एक, अकेले, गुन्डेसे भी क्या होगा? उसके पास, अपनी टीम भी होना चाहिये. क्यों कि गुन्डा होना ही तो शहरकी पहेचान और शान है.

यदि कोई शहरमें  गुन्डा आदमी नहीं होता है तो पूलिसवाले गली गलीमें गुन्डेको पैदा कर देते थे. अरे भाई, हप्ता वसुली करना है तोऐसा तो कुछ करना तो पडेगा ही !!. 

इन गुन्डोंका काम था फिलमकी टीकटोंका काला बज़ारी करना, किसीकी जेब काटना और आवश्यकता पडने पर चक्कू चलाना. चक्कू से मतलब है चाकु, छूरी.

जेब कतर्रे भी कलाकार होते है, वैसे ही चक्कू चलाने वाले भी कलाकार होते है.

कलाकार से क्या मतलब है?

मान लो कि कोई एक व्यक्ति कलाकार है,

कलाकार व्यक्ति जब, अपने कामका  प्रारंभ करता है तो उस कामको पूरा होनेमें कुछ समय तो लगता ही है. तब तक आपको पता चलता नहीं है कि वह व्यक्ति क्या बना रहा है. फिर धीरे धीरे आपको पता चलता जाता है कि उसने नाव का चित्र बनाया है या चूहेका चित्र.

अरे भैया, मैं वह विश्वकर्माजीने बनाये कलाकारके बारेमें नहीं पूछता हूँ. मैं तो चक्कू चलानेवाले कलाकारके बारेमें पूछ रहा हूँ?

मैं उसी कलाकारके विषय पर आता हूँ. ये विश्वकर्माके कलाकारकी कृतिका तो आप, पूर्वानुमान (अहेसास) लगा सकते है. लेकिन जेबकतरे कलाकार ने तो कब अपनी कला दिखाई, वह आपको पता ही नहीं चलता है. जब आप अपनी जेबमें हाथ डालते है तब ही आपको पता चलता है किपैसेका पर्सआपकी जेबमें नहीं है. … चक्कू चलानेवाला ऐसे चक्कू मारके अदृष्य हो जाता है कि जब आपका पेन्ट लहूसे तर बर हो जाता है और आहिस्ता आहिस्ता दर्द बढने लगता है तब आपको पता चल जाता है कि कोई आपको चक्कू मारके चला गया. इस क्रिया कोस्टेबींगकहा जाता है.

आपको पता होगा कि २००२के दंगेका आरंभ कैसे हुआ था.

“ल्यानत है हम पर” कोंगीयोंने सोचा

बात ऐसी थी कि नरेन्द्र मोदी नये नये मुख्यमंत्री बने थे. उन्होंने बात बातमें कह दिया किबीजेपीके शासन कालसे गुजरातमें दंगा होना बंद हो गया है. … “

यह बात जब कोंगीयोंके कर्णोंमें  (कानमें) पडी तो उनके कर्णयुग्म श्वानके कर्णयुग्मकी तरह ऊचे हो गये. वे अपना दिमाग लगाने लगे. यह क्या बात हुई!! हमारे होते हुए भी कभी क्या ऐसा हो सकता है, कि दंगे हो? ल्यानत है हम पर.

गोधराके स्थानिक कोंगीनेताने बीडा उठाया. और साबरमती एक्सप्रेसके दो डीब्बोंको हिन्दु मुसाफिरों सहित जला दिया.

वजह क्या थी?

वजह यह थी कि वे अयोध्यासे रहे थे जहां दश वर्ष पहेले एक मस्जिदको तोड दिया था.   

लेकिन उसका बदला तो मुस्लिमोंने मुंबईमें अनेक बंब ब्लास्ट करके हजारोंको मारके ले लिया थाअब काहेका बदला …!! “ जनताने पूछा.

अरे भाई हम मुसलमान हैहमारा हर मुसलमान, हर जगह बदला लेगा. हमें क्या सोच रक्खा है तुम लोगोंने? हम पर, इन दशानन कोंगीयोंके बीस हाथोंका आशिर्वाद है…. अयोध्या तो एक बहाना था…  मोदी ऐसा बोल ही कैसे सकता है कि बीजेपीके शासन में दंगा नहीं हो सकता. … चापलुस कहींकाहमने दिखादिया …  !!!” कट्टरवादी कोंगी मुस्लिम  बोला.

अरे भाई कोंगी !! तुम्हे क्या कहेना है?”बीजेपीने पूछा.

अबे, बीजेपी बच्चु, हम तो मुस्लिमोंकी पार्टी है. हम उनके खाविंद है और वे हमारे आका है. हमारा और उनका गज़बका है रिश्ता !! तुम क्या जानो हमारे रिश्तोंको !!

हम सब एक है. हम दो ही नहीं है. हम अनेक है. हमारे पास गोदीमीडीया है, हमारे पास गोदीअर्थशास्त्री लोग है, हमारे पास गोदीलेखकगण है, हमारे पास गोदी आतंकवादी है, हमारे पास गोदी अर्बन नक्सल है, हमारे पास गोदी पक्षधर भी है. तुमने देखलिया हमने उद्धव को उसके पक्षके साथ कैसे हमारी गोदमें बैठा लिया !!

तुम भी तो किसीकी गोदमें बैठे होउसका क्या …?” बीजेपी बोला.

तो क्या हुआ? हम तो किसीकी भी गोदमें बैठ जाते हैदुश्मनको दोस्त बनाना हमे आता हैचाहे वह देशका दुश्मन ही क्यूँ हो … !!! समज़े समज़े !! … तुम बीजेपी वाले तो बच्चू ही रहोगे. कभी चक्कू नहीं बन पाओगे…” कोंगीने बोला.

इस लिये तो तुम संसदमें ४०० बैठक्मेंसे ४०में सीमट गयेदेश भी तुम्हारे करतूत जान गया है…” बीजेपीने कोंगीको बताया.

अबे बीजेपी … !!! तुम तो बच्चू का बच्चू ही रहोगे. तुम किताबी बातें करते रहो और बच्चू ही बने रहो…” कोंगी बोला.

फिर कोंगी ने अपना पर्दा फास किया ;अबे बीजेपी, तुम तो ढक्कन हो ढक्कन …  तुम हमें क्या समज़ते हो? अबे ढक्कन, यदि हम संसदमें शून्य भी हो गये तो क्या हार मान जायेंगे? अबे बीजेपी बुद्धु, हम संसदके बाहर तो हजारगुना ताकतवर है….

तुम्हारे मोदीने विमुद्रीकरण कर दियालेकिन तुमने देखलियाने हमने, उसको समज़नेमें, जनताको कैसा गुमराह कर दिया

हमने तुम्हारे सी... और सी.आर.सी ही नहीं तुम्हारे सी.आर. पी को भी आंतर्राष्ट्रीय  मुद्दा बनाके तुम्हे बदनाम कर दिया

किसी भी मीडीया कर्मीकी औकात नहीं थी कि वहनहेरुलियाकत अली समज़ौता को याद करके हमे  विरोधाभाषी कहें !!

हमने मुस्लिमोंको बहेकाके, तुम्हारे शिर पर मत्स्य प्रक्षालन कर ही लिया !!! ऐसा तो हम करते ही रहेंगे !

अबे बच्चूहमने मुस्लिमोंको तो, भ्रमित ही नहीं अंधा भी कर दिया है. वे तुमसे हजारो मील दूर हो गये है.

हमारी गोदीमीडीयाकी ताकतको समज़ने की तुम्हारी औकात नहीं है. हमारी गोदमें तो हार्वडमें से पैदा हुए निष्णात बैठे है. वे हमारे पोपट है पोपट …  और यहांके अधिकतम मीडीयामूर्धन्य तो पहेलेसे ही हमारी गोदीमें है !

तुम जरा याद रक्खो  … यदि हम संसदमें शून्य  जाय, तो भी हमारी ताकत तो बनी ही रहेगी. तुम हमें क्या समज़ते हो?

संसद तो हमारे लिये एक बहाना है. हमें संसदकी परवाह ही नहींहमें संविधानके प्रावधानोंकी परवाह नहीं. हमें मानव अधिकारोंकी परवाह ही नहीं.

हमने तो न्यायालयके समक्ष शपथपूर्वक बोला था कि आपात्कालमें हमारी सरकार किसीको भी गोलीसे उडा देनेका अधिकार रखती है. अबे बच्चू, तुमने कभी इस शपथ पूर्वक कहे कथन पर हमारी बुराई की?

तुम क्या हमारी बुराई करोगे!!  तुम तोब्युरीडानके गधे हो. [ब्युरीडान के पास एक गधा था. उसके पास जई के  दो समान ढेर रक्खे गये तो वहकिसको पहेले खाउं यह सोचते सोचते भूखा मर गया”]. तुम तो, हमारे कोंगीयोंकेराक्षसी कर्मोंमेंसे किसकी सबसे पहेले निंदा की जायइस पर सोचते सोचते, बुढे हो जाओगे.


अबे बीजेपी बच्चू !! तुमने कभी सहगान किया है? अबे, तुम्हे तो यह भी मालुम नहीं होगा कि सहगान क्या होता है !

जब तुम २००४ का और २००९का चूनाव हार गये तोहमने और हमारे सांस्कृतिक साथीयोंने क्या कहा था?

हमारा हर वक्ता केवल और केवल यही बोलता था किजनताने बता दिया कि जनता कोमवादी तत्त्वोंके साथ नहीं हैजनताने कोमवादी तत्त्वोंको पराजित कर दियाजनताने दिखा दिया कि वह कोमवादी तत्त्वोंके साथ नहीं है …  जनताने धर्मनिरपेक्षता पर अपनी मोहर लगाईजनताने गोडसेकी भाषा बोलनेवालोंको नकार दियाजनताने नाज़ीवादीयों को उखाडके फैंक दिया

हमारा सहगान ऐसा होता है तुम लोगोंको तोनमस्ते नमस्ते सद वत्सले मातृभूमिके अलावा भी सहगान  होते हैं वह भी मालुम नहीं.

जूठ बोलना हमारी पहेचान

अरे बच्चू बीजेपी, हम तो जूठ बोलनेके आदि है. तुम, हमारे जूठको, मिलजुलकर सहगान से उजागर करो, ऐसे काम करनेकी क्षमता तुम लोगोंमें कहां है?

मुस्लीम लीग नामकी एक पार्टी है. इस पार्टीमें अन्यधर्मी को सदस्यता नहीं मिल सकती. ऐसी कोमवादी पार्टी के साथ गठबंधन करे हम, फिर भी हम कहे, कोमवादी तुमको …  बोलो, है मजेकी बात?

हमारा ही एक स्थानिक मुस्लिम नेता, रेल्वेकोचको हिन्दुओंके साथ जलाकर राख कर दे, और खूनका दलाली करनेवाले सिद्ध हो तुमहमारे ही मुस्लिम गुन्डे स्टेबींग का सीलसीला करके सेंकडो निर्दोष राहादारीयोंकी कत्ल करे, लेकिन मौतके सौदागरका लेबल लगे तुम पर. है हमारी कमाल?

तुम लोगोंने हमे २०१४ और २०१९के चूनावमें पराजित किया. और अब तुम सोच रहे हो कि हम कोंगी नेता लोग निर्माल्य हो जायेंगे क्यों कि हमारी सरकारी पैसा खाने की दुकानें बंद हो गई.

तुम्हारी यही सोच तो गलत है.

हमारा भू माफियाका धंधा चालु है,

हमारा हप्ता वसुलीका धंधा  चालु है,

हमारा अवैध कन्स्ट्रक्सनका धंधा चालु है,

हमारी बोलिवुडकी दुकानोंका धंधा चालु है,

हमारा ड्रग माफियाका धंधा चालु है,

हमारा अवैध शराब बनानेका और बेचनेका धंधा चालु है,

हमारा सूपारी लेनेका धंधा चालु है,

हमारे देशके बाहरके कई धंधे चालु है. तुम देखते हो , कि देशमें ही नहीं, लेकिन  तुम्हारे विदेशी दोस्त और दुश्मन देशोंमें भी हम, तुम्हारे पक्षके विरुद्ध प्रदर्शन करवाते है. हम तो निराधार मुद्दों पर भी  प्रदर्शन करवाते है.

पैसा बनाना हमारे लिये आसान धंधा है. और हमे हमारे सांस्कृतिक साथीयों पर पूरा भरोसा है. उद्धव सेनाने तुमलोगोंको कैसा ठेंगा दिखा दिया? सिखोंके संत भीन्दरानवालेको मारा था हमने, तो भी ये सिख लोग हमारे साथ है.

पैसे से क्या नहीं होता? हमारे पास विदेशोंमें बडे बडे टापु है और तुम लगे रहो स्वीस बेंक और पनामा के पीछे.

अरे हमने तो तुम्हारे पक्षमें और आर.एस.एस.में भी फर्जी आदमी लगाये है. वे सब मीथ्या विषयों पर बकवास करते रहेते है. और कुछ तुम्हारे ही बेवकुफ लोग उसी मीथ्या विषयोंको ट्रोल करके अपना समय बरबाद करते है. हमारा असली कोंग्रेससे कोई नाता नहीं, तो भी बडे बडे मूर्धन्य लोग हमे ही, असली १३५ वर्ष पूरानी कोंग्रेस मानते है. जब ऐसे मूर्धन्य लोगोंको भी, हम गुमराह कर सकते है तो तुम्हारे हितैषी लेकिन बेवकुफ लोगोंको मतिभ्रष्ट करना तो हमारे लिये बांये हाथका खेल है.

 अरे हम कोंगी लोग, यदि राज्यमें सत्ता पर जाते है तो हमारे विरोधीयों पर प्रतिशोधके बेसुमार फर्जी केस कर देते है और उनको गिरफ्तार भी करके कारावास में भेज देते हैं. तुम्हें तो अरण्य रुदन करना भी नहीं आता है. शासन कैसे किया जाता है वह तुम हमसे शिख सकते हो.

हम तो किसीको भी आधीरातको भी गिरफ्तकार कर लेते है, उतना ही उनको पीटते भी है. हमने रामदेवको पीटा था, अर्णव गोस्वामीको पीटा था, उनके स्टाफ को पीटा था. हम तो कंगना रणोतकी कमर तोड देते. शुक्र करो हमने तो केवल उसका घर ही तोडा.

ज्युडीसीयरीने हमारा क्या उखाड लिया?सुओ मोटोका शस्त्र तो ज्युडीसीयरीने तुम्हारे लिये रक्खा है बच्चू …!!! हमारे लिये नहींसमज़े समज़े …?

हम निर्भिकतासे ऐसा कैसे कर सकते है  बोलो?

अरे भैया बीजेपी, हमारे पास ऐसा नेटवर्क है कि हम साम, दाम, भेद और दंड सभीका प्रयोग कर सकते है, चाहे तुम्हारा ही शासन क्यूँ हो.

ज्युडीसीयरी क्या चीज है?

अरे भैया बीजेपी, दंडमें जान भी समाविष्ट है.

जान किसको प्यारी नहीं होती?

न्यायालय भी सोचता है किजान है तो जहाँन है’. आप मर गये फिर तो डूब गई दुनिया.

तुम लोग तो अभी शोर करते हो कि कोम्युनीस्टोंने हमारे इतने बीजेपी सदस्योंको मार डालेममता सरकारने हमारे बीजेपीके इतने सदस्योंको मार डाले ….

अबे बीजेपीतुम तो बच्चे हो बच्चे. हम तो पूलिस हिरासतमें भी हमारे विरोधीयोंको मार डालते है. श्यामाप्रसाद मुखर्जीका हमने क्या किया था?  जयप्रकास नारायण का हमने क्या किया था? जयप्रकाश नारायण तो महात्मागांधीके अनुयायी थे. लेकिन हमें क्या फर्क पडता है? हम तो महात्मा गांधीको मार देते यदि वह जिदा होता तो.

अरे बीजेपी भैया …  हम कितने चालाक है वह तो तुम क्या जान पाओगे!! हमारे सदस्य तो तुम्हारे पक्षमें भी है. हम चाहे महात्मा गांधीवादीयोंको प्रताडित करें और मार भी डाले, तो भी तुम लोग तो महात्मा गाँधीकी विरासत हमें ही देते रहोगे. क्यूँ कि हमने तुम्हारे कुछ मूर्धन्योंको भी ऐसा उलज़ा दिया है, कि वे अपने पूर्वग्रह पर अटल है कि, गांधीने नहेरुको प्रधान मंत्री बना दिया और वह भी यावत्चंद्र दिवाकरौ (जब तक सुरज चांद है तब तक के लिये) के लिये. और गांधीने ही देशका बटवारा करवाया . गांधी ही सब समस्याओंकी जड है …. तुम अपने पूर्वग्रह छोड ही नहीं सकते हो. तुम अपने पूर्वग्रहोंमें ही रममाण रहो यही तो हम चाहते है.

अरे हम तुम्हें तो क्या, सर्वोदय वादीयोंमेंसे भी कुछ लोगोंको, वैचारिक विवेकशीलतामेंसे पथभ्रष्ट कर सकते हो, तो तुम तो क्या चीज़ हो?  

 तुम्हें हमसे शिखना है. लेकिन हम तुम्हे शिखने नहीं देंगे. यदि तुम हमारी तरह प्रतिशोधका तो क्या, यदि नियम अनुसार भी हमारे लोगोंके विरुद्ध कार्यवाही करोगे, तो हमारा गोदीमीडीया और हमारे गोदी कोलमीस्ट्स, तुम बीजेपीवालोंके उपर तूट पडेंगे …  किबीजेपी लोकशाही खून कर रहा है और बेवजह ही प्रतिशोधकी कार्यवाही कर रहा है

शस्त्र होते हुए भी उलज़ा हुआ बीजेपी

शिरीष मोहनलाल दवे

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