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Archive for the ‘Social Issues’ Category

२०२४में गद्दारोंको हरानेकी व्यूह रचना – १

गद्दरोंको हराना है तो गद्दारोंको पहेचानना पडेगा.

गद्दार (देश द्रोही) को कैसे पहेचाना जाय?

गद्दारकी एततकालिन प्रवर्तमान परिभाषा तो यही होना चाहिये कि जो अपने स्वार्थके लिये भारतवर्षका अहित करने पर काया और वाचासे प्रत्यक्ष या परोक्ष रुपसे प्रवृत्त है, वह गद्दार है.

गद्दारका परोक्ष रुप क्या है?

हिंदुओंको कैसे भी करके विभाजित करना जैसे कि, विचार, ज्ञाति, क्षेत्र, भाषा, लिपि, जूठ, वितंडावाद (कुतर्क) , फर्जी वर्णन (false and prejudicial narratives), … ब्लोगका हिन्दु विरोधी, बीजेपी नेता विरोधी अयोग्य और विवादास्पद शिर्षक बनाना …

किंतु पता कैसे चले कि फलां फलां शिर्षक या विषय अयोग्य है?

जी हांँ … सही विषय, सही वर्णन, सही शिर्षक, आदि का चयन करना सरल नहीं है . लेकिन एक बार विचार कर लेना कि हमारे कथनका क्या असर पडनेवाला है. हमारे कथनसे हिंदुओंका कोई एक वर्ग अपमानित तो नहीं होनेवाला है न!!

कौन हिंदु है?

जो व्यक्ति समज़ता है कि मेरा धर्म (कर्तव्य) “मेरा देश भारतका हित सर्व प्रथम” है वह हिंदु है. भारतवर्ष से प्रथम अर्थ है प्रवर्तमान १९४७का सीमा-चिन्हित भारत. मेरा भारत वह भी है जो वायु-पुराण (वायुपुराण क्यों? क्यों कि वह पुराणोमें सबसे प्राचीन है) में भूवनविन्यासके अध्यायोंमें उसका वर्णन किया हुआ है. वह है भारतीय संस्कृतिका विस्तार. अर्थात जंबुद्वीप.

भारतीय संस्कृतिसे क्या अर्थ है?

मानव समाजको उन्नति की दीशामें ले जानेवाली विचारधाराका आदर और ऋषियों द्वारा पुरस्कृत या प्रमाणित आचारधारा का कार्यान्वयन (Execution).

सनातन धर्ममें वर्णित विचार धाराएं प्रति आदर, वेद उपनिषद, गीता, जैन, बौद्ध, ब्राह्मण (ब्रह्मसे उत्पन्न ब्रह्म स्वरुप ब्राह्मण यानी महः देवः यानी अग्नि यानी रुद्र यानी विश्वदेव यानी विश्वमूर्त्ति यानी उसका प्रतिकात्मक रुप शिव और शक्ति यानी पुरुष-प्रकृति यानी तात्त्विक रुपसे वैश्विक परिबलोंके साथ ऐक्यकी साधना. शक्ति – सूर्य- पंचमहाभूत … अद्वैतवाद.

ज्ञान, शौर्य, कर्म और कला मेंसे किसी एकके प्रति अभिरुचि द्वारा आनंद प्राप्ति. अपनी खुशीके लिये किसीको कष्ट न पहोंचे उसका खयाल रखना. और इस तरह समाजको समयानुरुपसे उत्तरोत्तर विकसित करना. कटूता विहीन तर्कशुद्ध संवाद, यह है सनातन धर्म जो प्रकृतिको साथमें रखके अहिंसक (कमसे कम हिंसक) समाज के प्रति गति करता है. कायरता और हिंसाके बीचमें यदि चयन करना है तो हिंसाका चयन करना है.

वेद और पुराण के दो श्लोक हमे कहेते हैं कि,

मा नः स्त्येनः ईशतः (हम पर चोरोंका शासन न ह. ऋगवेद).

इससे स्पष्ट होता है कि जो अगणित कौभांडकारी कोंगी, माफिया मुल्लायम, चाराचोर लालु, रीलीफ फंडमें कौभांड, शारधा, नारदा … आदि कौभांडमें सहभागी एवं आतंकवादी ममता, उद्धव सेना, शरद सेना, … के शासनका हमें विरोध करना है और नष्ट करना है.

आत्मनः प्रतिकुलानि परेषां न समाचरेत. (जो हमारे लिये प्रतिकुल है वह दुसरोंके उपर न थोपें. कूर्म पुराण)

ममताने हजारों हिंदुओंकी ह्त्या की, और एक लाख हिंदुओंको उनके घर जलाके भगा दिया. कारण केवल यही था कि उन हिंदुओंने ममताके पक्षको मत नहीं दिया था. इसके लिये ममताको जितना भी दंडित किया जाय, वह कम ही है.

आम जनता यानी कि, हम, जो स्वयंको राष्ट्रवादीमानती है उनका क्या धर्म है?

(१) लोकतत्र वाले देशमें जनताको जागृत करना और राष्ट्रवादी नेताओंके लिये हकारात्मक वातावरण तयार करना,

(२) राष्ट्रविरोधी तत्त्वोके उपर सातत्य पूर्वक उनकी क्षतियोंके उपर और दुराचारोंके उपर आक्रमण करना,

(३) राष्ट्रवादी नेताओंकी तथा कथित क्षतियोंको गुह्य रखना. या उन चर्चाओंमे मोड ला देना यानी कि विषयांतर कर देना,

(४) अप्रासंगिक और मृत विषयों पर चर्चा नहीं करना,

(५) हमारे ध्येयमें हमें स्पष्ट होना, और हमारा हर कदम हमारे ध्येय की दिशामें होना आवश्यक है.

सबसे बडी हमारी समस्या यह ही है कि हम राष्ट्रवादी लोग अधिकतर यह नहीं सोचते कि हमारी चर्चा मीथ्या की दिशामें जा रही है. और हममेंसे कई लोग इस परिस्थिति समज़ नहीं पाते हैँ. और अपनी शक्तिको और समयको बरबाद करते है.

चलो इसको समज़ें

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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नकलीको असली कहो और ध्वस्त करो – ४

(१) हमने पहेले ही देख लिया है कि कुछ लोग “एम. के. गांधीजीकी बुराई करनेमें क्यों सक्रीय है?

अधिकतर किस्सोंमे जो वीडीयो-लेख प्रस्तूत करनेवाले होते हैं उनको यह देखाना है कि वे किस सीमा तक निडर राष्ट्रवादी है कि वे, अपना राष्ट्रवादत्त्व दिखानेके लिये गांधीजी तकको छोडते नहीं है. इन लोगोंके अनुयायी लोग, गांधीजी के लिये जो भी गाली याद आयी उस गालीको कोमेंटमें लिख देते है.

(२) गांधीजीकी बुराई करनेमें बुराई क्या है?

गांधीजीकी निंदा करनेमें कोई बुराई नहीं है, यदि यह चर्चा तर्कशुद्ध और ज्ञानवर्धक हो. लेकिन ऐसा कभी भी होता नहीं है. एक फर्जी बात करो, वाणी विलासवाला विवरण दो, जूठ को ही सच मानके चलो, और उस फरेबी सचसे गांधीजीके व्यक्तित्त्वको ध्वस्त कर दो.

जैसे कि; गांधीजीके रामको पुतला वाला राम कहेना , गांधीजीका भगत सिंह के प्रति द्वेष था ऐसा मान लेना, गांधीजीका सुभाष के प्रति द्वेष था ऐसा मान लेना, गांधीजीकी मुस्लिमोंके प्रति तुष्टिकरणकी नीति थी ऐसा मान लेना, … गांधीजीकी अहिंसा फरेबी थी ऐसा मानना, गांधीजीने देशको तोडा ऐसा मानना, गांधीजी तो अंग्रेजोंके पालतु कुत्ते थे ऐसा मानना, एकाधिकारवादी गांधीजीने नहेरुको कोंग्रेसका प्रमुख बनाया …. ऐसी तो कई बातें है, जिनसे गांधीजीको मरणोत्तर गालीयां मिलती रहेतीं हैं.

लेकिन यदि कोई गांधीजी प्रति आदर करनेवाला, प्रश्न करें और चर्चाका आहवाहन करें, तो ये लोग उसके उपर गाली प्रहार करेंगे, यदि चर्चामें उतरे तो मुद्दे बदलते रहेते हैं, असंबद्ध बातें करेंगे, … एक वीडीयो या/और पुस्तककी लींक देके चर्चासे भाग जायेंगे. यदि उनकी तबियत गुदगुदाई तो दो तीन गालीयां भी दे देंगे.

(३) गांधीजीकी बुराई करने वाले है कौन?

गांधीजीकी बुराई करनेवाले लोग कोंगी और उसके सांस्कृतिक साथी है.

कोंगीयोंने पहेलेसे ही सत्ताके लिये लोगोंको विभाजित करनेका काम करते रहे हैं.

मुस्लिमोंको तो एक बाजु पर छोड दो.

(३.१) हिंदुओंकोभी विभाजित करनेका काम कोंगीयोंने ही किया है.

सत्ताके लिये कोंगीने शिवसेना की स्थापना की थी.

(३.२) कोंगीयोंने मुस्लिम तुष्टीकरणके लिये साध्वी प्रज्ञाका क्या हाल किया था?

हिंदुओंको भगवा आतंकवादी सिद्ध करनेके लिये बंबई ब्लास्टकी घटनाको, हिंदुओ पर ठोक देनेके लिये, एक कोंगीनेताने एक पुस्तक लिख दी थी.

(३.३) ममता, बीन बंगालीयोंको बाहरी बताती है, वह दलित हिंदु औरतोंपर अत्याचार करवाती है और उनके घर जला देती है, उतना ही नहीं हिंदुओंको राज्यसे बाहर खदेड देती है. ममता फिर मीट्टीका मानुस का गीत गाती है.

(३.४) महाराष्ट्रका नेता मराठाओंको अन्यसे अलग करवाता है, और माराठाओंको आरक्षण दिलानेके लिये आंदोलन करते हैं.

(३.५) आपको कोंगीकी लुट्येन गेंगमें अब, काका कालेलकर जैसा सवाई गुजराती नेता ढूंढने पर भी नहीं मिलेगा. सौराष्ट्रके झवेरचंद मेघाणी शिवाजीके गुणगान वाली कविता रचते थे.

(३.६) गुजराती और मराठी जनता हिलमिलकर रहेती थीं. नहेरुने मराठी-गुजरातीमे विभाजन १९५६में किया.

(३.७) कर्नाटकमें कोंगी, “लिंगायत”को (जो शिवके उपासक है) उनको अल्पसंख्यकका दरज्जा देना चाहती है. यदि शिव ही हिंदु धर्ममेंसे निकल गये तो हिंदुधर्ममें बचा क्या?

(३.८) गुजरातका एक कोंगी पटेल नेता पाटीदारोंके आरक्षण के लिये आंदोलन चलाता है.

(३.९) जब कोंगीयोंकी सत्तामें हिस्सेधारी होती है तब वे विपक्षीनेताओं पर बेबुनियाद आरोप और फर्जी केस चलाते थे. रामलीला मैदानमें बाबा रामदेवके अहिंसक आंदोलन पर आधी रातको आक्रमण करवाया. अहिंसक आंदोलनकारी लोगोंको पीटा गया. ऐसे तो अगणित घटनाएं हैं.

(३.१०) भारतमें लोकशाहीमूल्योंका हनन कोंगी शासित राज्योंमें होता है.

(४) दलितोंको वोटके लिये टार्जेट करना, एक नया तरिका ममताने निकाला है.

(४.१) वोट न देनेके कारण, दलितों के प्रति ममताका रुख कैसा रहा? ममता, इन दलितोंको अपने घरमें वापस आने के लिये दलितोंसे पैसे मांगती है.

(४.२) दलित लोग गरीब है और वे प्रतिकार नहीं सकते, न तो वे न्यायालयमें जा सकते है. पूलिस तो ममताके आधिन है. इस लिये ममताने दलितों पर ही आक्रमण करवाया, यह एक ल्युट्येन गेंगकी नयी खतनाक चाल है.

(४.३) सरकारी अफसरोंको और न्यायाधीशोंको धमकी देना कि “आप भी तो निवृत्त होनेवाले है, फिर आपका क्या हाल होगा वह सोच लो.” गवर्नरको बोला जाता है कि “दिल्ली जाते हो तो वापस मत आना”.

जनतंत्रको अवहेलना करने की मनमानी करनेकी इससे अच्छी मिसाल विश्वमें कहीं नहीं मिलेगी.

ग़ांधीजीकी बुराई करनेवालोंको यह सब नहीं दिखाई देता है.

(५) गांधीजीकी निंदा करने वाले प्रच्छन्नरुपसे कोंगीके हितैषी है.

(५.१) जाति-वर्ण के आधार पर भी विभाजित किया आ सकता है. भाषा और क्षेत्रके आधार पर भी विभाजित किया जा सकता है.

(५.२) कोंगी लोग यह भी समज़ते है कि हिंदुओंको गांधीके नाम पर भी विभाजित किया जा सकता है.

(५.३) एक फर्जी नेरेटीव्ज़ चलाया गया है कि गांधीजीने ही नहेरुको गद्दी पर बैठाया और इस नहेरुके कारण देशकी यह दुर्दशा हुई. तो अब नहेरुको और नहेरुवीयनोंको बाजु पर रख दो, और गांधीके उपर ही तूट पडो.

आप पूछोगे लेकिन इससे क्या होगा?

(५.४) कोंगी समज़ती है कि वैसे तो आर. एस. एस. के कुछ अज्ञ लोग उनको गांधीजीकी हत्यासे कुछ भी लेना देना नहीं है, तो भी “आर. एस. एस.”वाले कुछ लोग तो मैदानमें उतर आयेंगे और गांधी-निंदाको सपोर्ट करेंगे. कमसे कम गांधीको एक गाली देके अपना फर्ज निभाया ऐसा मानेंगे.

आप कहोगे कि; “आर. एस. एस.”का गांधीकी हत्यासे लेना देना क्यों नहीं है?

अरे भैया, गांधीजीकी हत्या करनेवाला आर.एस.एस. का सदस्य था ही नहीं. वह तो हिंदु महा सभा का सदस्य था.

“तो फिर “आर.एस.एस.” वाले क्य़ूंँ कूद पडते है?

क्यूंँ कि आर.एस.एस.” पर राहुल गांधी आरोप लगाता है कि “आर.एस.एस.” वाले गोडसे वाले है. यदि जब राहुल गांधी जैसा, महामानव, आरोप लगाता है तो उसका आदर तो करना पडेगा ही न. राहुल गांधी कौई ऐसा वैसा आदमी थोडा ही है?

(६) गांधीजी की निंदा करनेमें कौन कौन प्रकारके लोग है ?

गांधीजीकी निंदा करनेमें ऐसे लोग है जो अपनेको सुज्ञ मानते है लेकिन वे लोग गांधी-साहित्य को पढनेका कष्ट उठाना चाहते नहीं है.

ये छोटा मोटा पदधारक, विश्लेषक … होने के कारण लिखते रहेना / बोलते रहेना उनका व्यवसाय है. क्या करें ख्याति भी तो कोई चीज़ है!! यदि हम तर्कशुद्ध नहीं बोलते तो क्या हुआ? कौन तर्क शुद्ध बोलता है? बीबीसी ? न्यु योर्क टाईम्स?

वे समज़ते है कि मौका मिला है तो लिख ही दो. अनुपद्रवी लिखनेके बदलेमें उपद्रवी लिखनेेसे अधिक लाईक और कोमेंट मिलती है. आपने देखा नहीं क्या, कि आचार्य रजनीश, अकबरुद्दीन औवैसी, राहुल गांधी, सोनिया गांधी, िप्रयंका वांईदरा, टीकैत, अखिलेश, एमएमएस, नवाब मलिक, ममता, केज्री … आदि लोग उपद्रव कारी नहीं बोलते तो उनकी पहेचान कैसे बनती?

(७) गांधीजीकी निंदा करनेसे फायदा किसको होगा?

(७.१) गांधीजीकी निंदा करनेसे ल्युटेन गेंगोंको (यानी कि, बीजेपीके विरोधीयोंको) फायदा होगा.

क्यूंँ कि  काफि अज्ञ हिंदु  लोग मानते है कि गांधीकी निंदा करना वह नहेरुकी निंदा करना ही है. (वैसे तो नहेरु और गांधीके बीच आकाश पाताल का भेद है. लेकिन पढना किसको है? समज़ना किसको है?).

(७.२) नरेंद्र मोदीने गांधीजीको पढा है. लेकिन ये अज्ञ लोग शुक्र करो कि, नरेंद्र मोदीको गांधीजीके संबंधमें गालीयां देते नहीं है. क्यूंँ कि तब तो वे एक्सपोज़ हो जायेंगे कि वे प्रो-कोंगी है.

(७.३) कुछ सियासत से अज्ञ लोग है, लेकिन वे गांधीको तो जानते है और उनके उपर श्रद्धा रखनेवाले है, ये लोग समज़ेंगे कि गांधी-निंदक (वे इनको आरएसएस वाले) तो जूठ बोलते है और विश्वसनीय नहीं है. इसलिये बीजेपी भी विश्वसनीय नहीं है.

(७.४) आम जनतामें भी ऐसे लोग है, जो लोग द्विधामें पड जाते है. वे ऐसा समज़ने लगते है कि सियासतमें सभी लोग एकसे होते है.

इससे क्या होता है?

(७.५) ये लोग “नोटा” बटन दबाते हैं, या वॉट देनेको ही नहीं जाते है.

(७.६) कई सारे लोग उपरोक्त द्विधाके कारण वॉट देनेको जाते नहीं है.

(८) इस बातको हमेशा याद रक्खो कि;

(८.१) राष्ट्रवादीओं द्वारा वॉटके लिये जाना नहीं, गद्दारोंको वोट देने के बराबर है.

(८.२) राष्ट्रवादीओं द्वारा बीजेपीको वोट नहीं देना या “नोटा” बटन दबाना, गद्दारोंको वॉट देनेके बराबर है.

(९ ) ओ! गांधीजीकी निंदा करनेवाले महानुभाव लोग, यदि तनिक भी समज़दारी भी है तो समज़ जाओ. युद्ध केवल शस्त्रोंसे जिता जाता नहीं है. व्युहरचना भी करना पडता है.

आप कमसे कम गद्दारोंकी व्युह रचनामें मत फंसो.

(९.१) जितना फर्क आर.एस.एस. और आई. एस. आई. एस. में है, उनसे कहीं अधिक फर्क गांधीजी और नहेरुमें है. इस विषय पर एक पुस्तक भी उपलब्ध है.

(९.२) कोंग्रेसका विलय करो यही गांधीका अंतिम आदेश था.

एम. के. गांधीकी निंदा करनेमें और करानेमें कोंगीयोंका ध्येय क्या है?

गांधीजीकी बुराई करने के फलस्वरुप क्या परिणाम आने वाले है?

गांधीजीकी बुराई करनेमें भयंकर बात क्या है?

यदि आप देश प्रेमी और राष्ट्र वादी है तो आपका फर्ज धर्म क्या है.

गांधीजीकी निंदा करना और उसको फैलाना, यह बात कोई व्यूह रचना का भाग हो सकता है क्या?

कोंगीयोंकी लुट्येन गेंगके लिये कोई भी निंदास्पद व्यवहार असंभव नहीं.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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The Editor, “Daily Sabah”

digital@dailysabah.com, letters@dailysabah.com, opinion@dailysabah.com

Dear Sir,

This is in connection with the article of Mr. Fai published in your “Daily Sabah” on 7th September 2021, with a subject line “Fundamental Misconceptions about Kashmir”

It is not difficult to reply on all the points of the topic. But one has to write a very lengthy reply to cover up, his all the points.

In ancient India there was a practice to insert a thin stick in a book, and open that page. Then read that page and give comment/opinion. Here in case of this article of Mr. Fai, the first point is analyzed for correctness. Why first point? Because it is first point. First point has got to be the most significance. I am reproducing the first point as under;

“1. Kashmir acceded to India on Oct. 27, 1947. Wrong.

The maharaja of Kashmir allegedly signed the Instrument of Accession to India while at the same time pleading for its military intervention to prop up his toppling repressive regime on Oct. 27, 1947. A full-scale internal and indigenous revolt was on the verge of success at that time. …. ……..

Moreover, as British scholar Alistair Lamb has convincingly demonstrated in “Kashmir: A Disputed Legacy, 1846-1990,” the Instrument of Accession is probably as bogus as the ugly protocols of the elders of Zion confected by the Russian Tzar’s Okhrana secret police. An original of the document has never been produced by India or anyone else. ……………………………………..”

The paras contains hypothetical conclusions on the status of the Maharaja.

The next is non comparable can not be compared. Such practice of comparison is not permitted by logical science and by judiciary.

J & K IoA (Instrument of Accession) is available on line. There is no need to try to create a charming topic for a particular section of people.

What document had signed by Maharaja Hari Singh himself, similar IOAs were signed by other big kingdoms by even their (Prime) Minister and not by the Maharajas themselves. Here in case of the J&K, The Maharaja had signed because his Prime Minister Justice M.C. Mhajan was in Delhi.

India is a democratic country. The democracy in India works better than it worked in early decades of Independent India. There are people who can exist in India, with an intention to put, Government of India in trouble by way of false assumptions on an issue. e.g. J&K accession.

The current Government which is far more democratic, had changed the category of the document and made it accessible.

Till that time there were people who were spreading rumors under their agenda that such document did not and does not exist at all.

Any way, Mr. Venkatesh Nayak of “The Wire” got it, under Right to Information Act 2005. What Mr. Venkatesh says on this letter of accession which is signed by the Maharaja (King of a big kingdom) Hari Sigh with his own signature, and also accepted it by Lord Mountbatten with his own signature.

Mr. Venkatesh Nayak had publish the document in his article in “The Wire” October 26, 2016 and August 5, 2019. What he says about the authenticity of this document in his article ? “ … Through this article in The Wire, I can confirm that the J&K IoA exists for real, is safe and well preserved in the collection of the National Archives.”

It is well known among political lots of India that “The Wire” is termed as out of proportional “Liberal” and Anti-BJP.

The Pakistan was created by taking out the portion where the Muslims were in majority of British India which was under direct rule of Agency (Viceroy of India). This agreement was signed by Pakistan and Viceroy at midnight of 14th August 1947. After creating Pakistan only, the India was made independent on 15th August 1947.

This was not applicable to Princely states. The princely states have the liberty to come under dominion of India or Pakistan. The princely state had to act as per the desire of their people. i.e. Princely states had to take opinion of their people under democratic way. It must be noted that till that time the princely states were under the dominion of the country to their accession. India got independence on 15 August 1947, the princely states acceded to India fell under control of India as the IoA.

India had conducted elections in J&K too, like every other princely state. The elected members of the state assembly passed the resolution of merger with India. That is all.

Now the dispute remains with Pakistan Occupied Kashmir. The Assembly Seats of POK is till kept vacant. Even if that number been counted in negative, the Assembly of the princely state J&K had passed the resolution of merger unanimously.

The UN had resolved and according asked the Pakistan to vacate the POK and banned it to perform any military activity, so that the Indian Government to which the Maharaja Hari Singh had signed the document of IOA with India, can have control on POK. And this was supposed to be, to conduct, free and fair elections. No body in the world had challenged the election of peoples’ representative in J&K State Assembly 1951-52.

Thanking you,

With regards,

Yours truly,

Shirish M. Dave.

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वे जगतके तात है तो हम जगतके तातके तात है

वे जगतके तात है तो हम जगतके तातके तात है

जगतके पितामहका एवं मातामहका प्रार्थना पत्र

माननीय, प्रधान मंत्री श्री नरेन्द्र मोदी तथा माननीय गृहमंत्री अमित शाह,

विषयः ग्राहक सुरक्षा नियम रद कारवाने के लिये आंदोलन करने के लिये प्रार्थना पत्र एवं पूर्व-सूचना.

अनुसंधानः उपभोक्ता संरक्षण नियम, अधिनियम

हम ग्राहक लोग, सरकार द्वारा   पारित ग्राहक सुरक्षा नियम और अधिनियम जो भी हो वो, उसके विरुद्ध आंदोलन करने जा रहे है.

(१) प्रदर्शन स्थलः

आप, हमे प्रदर्शनके लिये दिल्लीमें योग्य स्थल सूचित करें. यह स्थालका क्षेत्रफल १०००० चोरस किलोमीटर का होना अनिवार्य है.

यदि आपके पास इतना विशाल स्थल नहीं है तो यह आपकी समस्या है, हमारी समस्या नहीं. यदि आप हमें कमसे कम १०००० चोरस किलोमीटर का विस्तारवाला स्थल नहीं दोगे तो हम दिल्लीमें बलपूर्वक प्रवेश करेंगे और संसद भवनकी कार्यवाहीको चलने नहीं देंगे.

आप हमे १०००० चोरस किलोमीटर की औचित्य क्या है, ऐसे प्रश्न न करें, तो आपके लिये यह शोभनीय रहेगा.

आपको अवश्य ज्ञात होगा कि जब देशमें १९ कोटी कृषक (किसान) है तो किसानोंके अतिरिक्त जो बचे वे सर्व उपभोक्ता है. तात्पर्य यह है कि यदि हम दिल्लीमें एक लाख चोरस किलोमीटर जगह मांगे तो भी कम है.

आप कहोगे कि पूरे दिल्लीका विस्तार ही १५०० चोरस कीलोमीटर है और इसमें मकान, संकुल, कार्यालय भी संमिलित है.  तो हमें १०००० चोरस किलोमीटरका विस्तार कैसे दे पाओगे?

हमने आपको पहेसे ही कह दिया है कि यह आपकी समस्या है. वैसे तो हमें नहीं कहेना चाहिये कि रा.गा.जी (राहुल गांधीजी)का कथन था कि,आपने अंबाणीको को कच्छमें ५००० करोड एकड भूमि दान कर दी है. वैसे तो समग्र पृथ्वि पर ही ३८०० करोड एकड से कम भूमि है. यदि आप ५००० करोड एकड भूमिदान अंबाणीको कर सकते है तो हमें १०००० चोरस किलोमीटर भूमि अस्थायी उपयोगके लिये क्यूँ नहीं दे सकते?

हम आपसे अपेक्षा रखते है कि आप हमें तर्कशुद्धतासे चर्चा करना नहीं कहोगे. हम तर्कमें मानते नहीं है. आपने जब हमारी संतान यानी कि किसान-प्रतिनिधियोंसे ऐसी ही सहानुभुति रक्खी है तो हमसे भी वैसा ही व्यवहार करोगे. 

(२) प्रदर्शन और विरोध करना हमारा अधिकारः

यदि आपकी सरकार, हमें आंदोलनके लिये उपरोक्त विस्तारवाला स्थल देनेमें विफल रही तो, हम, दिल्लीमें आनेवाले भूमिगत यातायात मार्ग ही नहीं, रेल और हवाई मार्ग सहित सभी मार्ग बंद कर देंगे. और इन मार्गों पर, हम अपना अस्थायी निवास बनाके, सरकारका  विरोध करेंगे. हम बडी सज्जताके साथ आंदोलन करने वाले है. हमें ज्ञात है कि हमारा आंदोलन सुदीर्घकाल चलनेवाला है.

(३) हमारी मांग है कि सरकार उपभोक्ता कानून रद करें. हम चर्चाके लिये सज्ज है किन्तु जब तक उपभोक्ता कानून रद नहीं होगा तब तक हमारा आंदोलन प्रवर्तमान रहेगा.

(४) जनतंत्रमें विरोध आवश्यक है इसमें वैश्विक संमति है. आपने और आपकी सरकारके आधिकारिक पदस्थ वाले विद्वानोंने भी इस बिन्दुका स्विकार किया है. हम अपना विरोध अहिसक रुपमें करेंगे. हम संविधानकी पुस्तक हाथमें रख कर विरोध करेंगे. हम राष्ट्रध्वज हाथमें लेके विरोध करेंगे. हम “भारतवर्ष अमर रहो” लिखित विशाल पताका दिखाके प्रदर्शन करेंगे. हम किसीके उपर भी, प्रहार नहीं करेंगे. शस्त्र प्रहार या मुष्टी प्रहार या दंड-प्रहार भी नहीं करेंगे. हम देश-विरोधी सूत्रोच्चार भी नहीं करेंगे.

(५) हो सकता है कि हम लोगोंके अंदर, कुछ देश विरोधी व्यक्ति और हिंसक व्यक्ति घुस जाय. हम इस शक्यताको नकार नहीं सकते. कृषि-कानूनके विरोध करनेवालोंके कुछ दलोंमें “मोदी तू मर जा…. इन्दिराको हमने ठोक दिया तो मोदीको भी ठोक देंगे … खालिस्तान जिंदाबाद … “ ऐसे सूत्रोच्चार हो सकते है तो हमारी तो दिल्ली जानेवाले हर मार्गों पर हजारों लाखोंमें विरोधी लोग होगे. उनमें ऐसा होना सहज है.

(६) जैसे आपने कृषि-कानून के (५) में दर्शित देशविरोधीयोंके आचरणकी उपेक्षा (नजर अंदाज किया है) की है, वैसी ही उपेक्षा आप, हममें स्थित उपद्रवी तत्त्वोंकी करें.

(७) “अभिव्यक्तिकी स्वतंत्रता” और “कानूनका विरोध करना”   जनतंत्रका एक आवश्यक अंग है. और हम जनतंत्रवादी होनेके कारण ये सब कर रहे है. और उसके संबंधित प्रबंधन व्यवस्था, यानी कि, बकरा, बैल, भैंस, सुवर, चिकन, मटन, गोस्त, अन्न, फल, कन्द, बिर्यानी, पीत्झा, बर्गर, व्हिस्की, रम, शेम्पेईन, वोडका, श्वेत-व्हाईन, रेड-व्हाईन, चालु-व्हाईन, जीन, टोम कोल्लिन्स, ब्रान्डी, टेलीक्वीला, मार्गारीटा, (ड्रग्ज़की बात नहीं करेंगे किन्तु व्यवस्था अवश्य करेंगे), भीन्न भीन्न प्रकारके व्हीस्कीयोंको उग्र करनेके लिये अश्वका मूत्र  … आदिका संचय करना, यातायातके मार्गों पर इंधन गेस आधारित, लकडी आधारित चूल्हा जलाना, विशाल पात्रोंमें भोजन पकाना, आंदोलनकारीयों के लिये भोजन-पात्रों की व्यवस्था करना, उनकी सफाई करना, पानीकी व्यवस्था करना, मालवाहकोंमें माल लाना, आंदोलनकारीयोंके लिये सोने की व्यवस्था करना, जब सूत्रोच्चार करनेसे उनके मूखारविंद श्रमित हो जाय तो आराम करनेके लिये आराम-कुर्सीयां और सोफा की व्यवस्था करना, ज्ञान ईच्छुक आंदोलनकारीयोंके लिये और ज्ञानी आंदोलनकारीयोंके लिये अधिक ज्ञान प्राप्त करनेके लिये पुस्तकालयोंकी व्यवस्था करना,  शित ऋतुके कारण, आंदोलनकारी लोग सुविधापूर्वक  आंदोलन कर सके उनके लिये उष्मावर्धक यंत्रोकी व्यवस्था करना, और उष्मऋतुमें शित-हवा उत्सर्जित करनेवाले यंत्रोंकी व्यवस्था करना, सभी यंत्रोंको स्वस्थ रखनेके लिये तजज्ञोंको नियुक्ति करना … ये सब तो हमने आपको संक्षिप्तमें बताया. हमारी सूची तो अति अधिक सुदीर्घ (बहुत लंबी) है. वह तो हम हमारी गोदीमें बैठनेवाले समाचार मध्यमोंको, हमारी गोदीमें बैठनेवाले मूर्धन्योंको, हमारी गोदीमें बैठनेवाले विश्लेषकोंको, हमारी गोदीमें बैठनेवाले कोलमीस्टोंको, हमारी गोदीमें बैठनेवाले संवादकोंको, बतायेंगे …         

(८) हम आपके साथ किसीभी चर्चाके विषयमें किसीभी प्रकारकी सूची नहीं देंगे. आप यदि हमें आपकी सूची दोगे तो हम उसका उत्तर नहीं देंगे. हाँ हम चर्चा अवश्य करेंगे. हम चर्चा करनेसे दूर भागते नहीं हैं. हम चर्चा तो करेंगे ही किन्तु आंदोलन चलता रहेगा.

(९) हम तो जगतके तातके तात है.

यानी कि हम किसानके बाप है. यदि किसान जगतका तात है तो हम इस तातका भी बाप है. मान लो कि किसानने हमसे अन्न नहीं लिया तो क्या हुआ?

क्या अन्न ही सर्वस्व है?

जब कृषिका आविष्कार नहीं हुआ था तो क्या मनुष्य जीवित नहीं रहेता था?

क्या किसानको वस्त्र नहीं चाहिये?

क्या किसान नंगा रहेता है?

वैसे तो जैनोंके कुछ साधुलोग नंगा रहेते है, किन्तु वे किसान कहां है?

क्या किसानको निवास नहीं चाहिये?

क्या किसानको चिकित्सक नहीं चाहिये?

क्या किसानको संसाधन नहीं चाहिये?

क्या किसानको यातायातके साधन नहीं चाहिये,

क्या किसानको शिक्षा नहीं चाहिये?

क्या किसानको सहयोगी नहीं चाहिये?

क्या किसानको सुरक्षा नहीं चाहिये?

किसानको ये सब चाहिये.

किसानको ये सब देनेवाले कौन है?

हम ही तो है.

यही तो भीन्नता है मनुष्य और पशुके बीचमें.

और ये सब देनेवाले हम, किसानके भी बाप है.

यदि किसान जगतका तात है,

तो हम जगतेके तातके बाप यानी कि पितामह है.

(९) आप हमें ऐसा मत कहेना कि “आपको यदि अन्याय हुआ है तो आप न्यायालयमें जाओ… कानून आपने बनाया है तो कानून तो आपको ही रद करना पडेगा.

(१०) याद करो न्यायालयने कृषि-कानूनका विरोध कर रहे आंदोलनकारीयोंके प्रति क्या अवलोकन किया था?

(१०.१) क्या उन्होंने तर्ककी चर्चा की थी?

न्यायालयने किसानको तो कुछ भी नहीं कहा है.

(१०.२) न्यायालयने तो सरकारको डांटा कि “यदि आपका संवाद चल रहा है तो क्या उस समयके लिये कानून स्थगित कर दिया जाय?”

जब सरकारने कहा कि “हम सबके साथ संवाद कर रहे है इसलिये कानून स्थगित करना ठीक नहीं होगा.”

(१०.४) तो न्यायालयने तो कहा कि “हम तो सरकारसे निराश है”. न्यायालयने तो सरकारको ही डांटा कि “आप, कैसी कार्यवाही कर रहे है कि आप निस्फल रहेते हो.” न्यायालयने कभी आपसे आपकी और किसान नेताओंके बिचकी चर्चाका विवरण नहीं मांगा. यानी कि किसानोंके क्या बिन्दु थे और आपने उनका क्या उत्तर दिया. और आपने क्या मुद्दे उनके समक्ष रक्खे और उन्होंने क्या उत्तर दिया … इन सबका विवरण न तो आपसे मांगा न तो किसान नेताओंसे मांगा.

(१०.५) जब सरकारने कहा कि “कई सारे किसान संगठन कानूनके समर्थनमें है.”

इस बात पर न्यायालयने क्या कहा मालुम है?

न्यायालयने कहा हमारे सामने तो ऐसा कोई आया नहीं.

(१०.६) क्या आप ये समज़ते है कि न्यायालय अखबार पढे … टीवी चेनल देखें … कृषि-कानूनके समर्थकोंको नोटीस भेजें …?

यह मत पूछना कि न्यायालयने यह कैसे कहा कि आंदोलनकारीयोंमे वृद्ध है, शिशु है, महिलाएं है … बाहर ठंड है … जो आत्म-हत्याएं हूई वे सब नये कानूनके कारण हूई … जो लोग आंदोलनकारीयोंमें थे, या तो उनको आंदोलनकारी मान लिया गया था, वे कौन थे, कहाँसे आये थे,  उनमेंसे जो मरे वे अन्य कारणसे नहीं किन्तु नये किसान-कानूनके कारण ही मरे. न्यायालयने अपना तारतम्य किस/किन आधार पर निकाले? क्यों कि सरकारने या तो न्यायालयने ऐसी कोई जाँच समिति तो बनायी नहीं थी.

(१०.७) जब सरकारने कहा कि “हम कानून स्थगित करनेको तयार है, यदि न्यायालय आंदोलनकारी किसानोंको आदेश दें कि, वे अपना आंदोलन स्थगित कर दे.”

तो इसके उपर न्यायालयने क्या कहा मालुम है? न्यायालयने कहा कि “हम ऐसा आदेश कभी भी नहीं देंगे कि, आंदोलनकारी किसान अपना आंदोलन स्थगित करें. हम वह कह सकते हैं कि वे मार्ग यातायातके लिये साफ करें.”

न्यायालयके इस कथनका संदेश आप समज़े या नहीं समज़े?

नहीं समज़े तो अब समज़ो;

किसान आंदोलन का प्रारंभ ९ अगस्त २०२०से हुआ था. न्यायालय, सुओ मोटो अंतर्गत ही, “रास्ते यातायातके लिये साफ करो और सरकार जो निर्देश दे उस स्थल पर आंदोलन/प्रदर्शन करो” ऐसा आदेश देनेके लिये सक्षम था. किन्तु न्यायालयने ऐसा नहीं किया.

इतना ही नहीं, जब जनहितमें की गयी याचिकाएं न्यायालयके पास है तो भी, न्यायालयने “यातायातके लिये साफ मार्ग” के बारेमें आदेश दिया नहीं. जब ४ जनवरी को न्यायालयने, याचिका सूननेका प्रारंभ किया तब भी, अंतरिम आदेश दिया नहीं. और ११ जनवरीको ऐसा माना भी, कि स्वयं ऐसा आदेश देनेके लिये सक्षम है, तो भी अंतरिम आदेश दिया नहीं, न तो किसीको न्यायिक सूचना (notice) दी.

(१०.८) आपने देखा ही होगा कि दुसरे दिन न्यायालयने, सरकारको ही लताड दी कि, आप एक समिति नहीं बना पाये. न्यायलयने चार सदस्योंकी समिति बनायी.  वास्तवमें तथा-कथित किसान-आंदोलनके नेताओंने तो, आपका, समिति बनानेका प्रस्ताव ही ठूकरा दिया था. किन्तु ये तथ्य, जानते हुए भी न्यायालयने आपको ही लताडा. और मजेकी बात तो यह है, कि, न्यायालयकी बनायी हुई समितिको भी इन्ही नेताओंने अमान्य कर दिया. उन्होंने तो साफ बोल दिया कि, हमे तो कृषि-कानून रद करनेके सिवा, कुछ भी स्विकार्य नहीं. न्यायालयने फिर भी, उनके उपर, न्यायालयकी अवमाननाकी तो बात ही छोडो, न्यायालयने उनको कठोर या नरम शब्दोंमें डांटा तक नहीं. मजेकी बात है न … !, कि न्यायालयका रवैया, उग्र और मालेतुजार आंदोलनकारीयोंके प्रति कैसा “सोफ्ट है”! 

(१०.९) आप समज़ो और अपनी स्मृतिको टटोलो. सर्वोच्च न्यायालयके   एक निवृत्त न्यायाधीशने, एक टीवी चेनलके साक्षात्कारमें क्या कहा था? यह निवृत्त न्यायाधीशने एक प्रश्नके उत्तरमें कहा था कि, जब तक लुट्येन गेंगोंका प्रभाव, न्यायाधीशों परसे दूर नहीं होगा, तब तक न्यायालाय स्वतंत्रता पूर्वक न्याय, नहीं दे पायेका.

(१०.१०) न्यायालयके इस प्रकारके व्यवहारसे आपको एक संदेश लेना है, कि आप हमारे आंदोलनके कार्यकर्ताओंके साथ भी ऐसा ही व्यवहार करेंगे, कि जैसा आपने शाहीन बाग, कृषि-नियम विरोधीयोंके आंदोलनकारीयोंके साथ किया.   

(११) हमारी मांग है कि आप उपभोक्ता सुरक्षा नियम और अधिनियम रद करें.

हमारी इस मांग के प्रयोजनः

(१२) यह नियम और अधिनियम हमारे लिये नुकशानकारक और त्रासदायक है.

(१२.१) हमें न्याय मिलनेमें तीनसे अधिक स्तर बढ गये है.

(१२.२) हमें कागज दिखाने पडता है, कागज कैसा है वह कौन सुनिश्चित करेगा?

(१२.३) विक्रेताने जो कागज दिया वह सही है या नहीं वह बात अनपढ कैसे सुनिश्चित करेगा?

(१२.४) ग्राहकको वकिल रखना पडेगा, आपने तो कह दिया वकील अनिवार्य नहीं. किन्तु यह शक्य नहीं.

(१२.५) यदि विक्रेताने हमारी या फोरमकी कानूनी सूचना (लीगल नोटीस) लाने वाले को युक्तिसे भगा दिया, तो केस नहीं बनेगा,

(१२.६) यदि विक्रेताने या उत्पादकने अपना नाम नहीं बताया, गलत नाम बताया, नोटीस लिया नही, …  तो केस नहीं बनेगा …

 (१२.७) … यदि सबकुछ सीधा चला और फोरमने दंड भी लगाया, पर उसने दंड नहीं भरा, तो?

(१२.८) … ऐसा हुआ तो हमे “फोरमका अनादर हुआ” उसका केस करना पडेगा …

ऐसे तो हजार प्रश्न और कष्ट है.

संक्षिप्तमें कहें तो, हमे आंदोलन करना है. हमें हर हालतमें आंदोलन करना है.

(१३) न्यायालयकी संवेदनशीलता आपने भीन्न भीन्न समय पर भीन्न भीन्न देखा ही है.

रावणका आक्रमण

(१३.१) बाबा राम देव ने २०१२में सरकारसे कालेधन के उपर जाँच के विषय पर आंदोलन किया ही था. उनका आंदोलन भी शांत और अहिंसक था. किसान आंदोलनसे विपरित, उनका आंदोलन आम जनहितमें था. कानून बनानेके लिये था. सरकारने उनको रामलीला मैदानमें   आंदोलन करने की अनुमति भी दी थी. वे आंदोलनकारीयोंने देश विरोधी, सरकार विरोधी, प्रधान मंत्री विरोधी (नरेन्द्र मोदी तू मर जा … इन्दिराको हमने जैसे ठोक दिया,वैसे मोदी को भी ठोक देंगे, लाशोंका ढेर कर देंगे …) सूत्रोच्चार कभी भी किया नहीं था.

(१३.२) किन्तु २०१२की वह सरकार भीन्न थी. वह सरकार हलाहल, कोमवादी, वंशीय एकाधिकारवादी, भ्रष्टाचारसे लिप्त … ऐसी सेक्युलर, नरम, अनिर्वाचित प्रधानमंत्रीवाली जनतांत्रिक सरकार थी. जिसका नाम कोंगी यानी कि नेशनल इन्दिरा नहेरुगांधी कोंग्रेस (आइ.एन.सी) गठबंधनवाली युपीए सरकार थी.

(१३.३) ऐसी यु.पी.ए. की सरकारके सामने बाबा रामदेवकी नेतागीरीमें जनता रामलीला मैदानमें आंदोलन कर रही थी. उन आंदोलन कारीयोंने तो अपने मुद्दोंकी सूची भी दिया था. इन आंदोलनकारीयोंमें भी महिलाएं थी. वृद्ध भी थे. फिर भी उस सरकारने राम लीलाके मैदानके उपर आधी रातमें आक्रमण करके बलप्रयोगसे (ताडन पूर्वक) आंदोलन कारीयोंको भगा दिया था. तबसे बाबा रामदेव आंदोलन करना भूल गये है.

(१३.४) उस २०१२ वाले आंदोलनमें, न्यायालयकी संवेदनशीलता क्या थी वह जनता को अधिगत नहीं हो पायी थी.

(१३.५) जिन पक्षोंको चूनावमें जनताने पराजित किया ये पक्ष, कृषि-कानूनके विरोधमें प्रवर्तमान किसान आंदोलनके समर्थक है सामिल है. इन्होंने अपने शासन कालमें ही, कृषि-कानूनके समर्थनमें अपार वाणीविलास किया था. न्यायालयने इन सियासती तथ्योंकी अवहेलना करके, आंदोलनकारीयोंके प्रति उनकी उम्र, जाति, लिंग … को लक्ष्यमें लेके अपनी संवेदनशीलता प्रकट की है.

(१३.६) अवश्य एक बिन्दु और भी है. “सरकारी “एफ.आर. एवं एस आर (F.R. & S.R.)” के अनुसार, जो प्राधिकारी, कर्मचारी की नियुक्ति के लिये सक्षम है, वह सक्षम प्राधिकारी ही उसको निलंबित या पदच्युत कर सकता है. (Appointing authority only can suspend or dismiss an employee). यदि यह प्राधिकार उसको संविधानके अनुसार मिले है तो वह प्रात्यायोजित (delegate) कर सकता है, किन्तु यदि वह स्वयं प्रात्यायोजित होनेके कारण सक्षम बना है तो वह अन्यको प्रत्यायोजित नहीं कर सकता.

इससे क्या निष्कर्ष है?

नियम बनानेका काम संविधानने संसदको दिया है. संसद ही उस नियममें संशोधन या निलंबन या रद कर सकती है. संविधानने नियमको लागु करनेका अधिकार सरकारको दिया है.   संविधानने या तो संसदने, न्यायालयको नियम बनानेका, उसको स्थगित करनेका या तो उसको रद करनेका अधिकार नहीं दिया. सरकार न्यायालयसे परामर्श कर सकती है, किन्तु न्यायालयके उपदेशको माननेके लिये बाध्य नहीं है.

ये सर्व प्रावधान न्यायालयको अवगत होने पर भी न्यायालयने कृषि-नियमको अपनी संवेदनशीलताके कारण, निलंबित किया है.

हम भी हमारे पूर्वानुमानसे, न्यायालयकी उसी प्रकारकी मानसिकता की, अपेक्षा रखते है, और आंदोलन करना चाहते है.

(१४) आप समज़ते होगे कि, हमको संसदमें हारे हुए पक्षोंका साम और दामका समर्थन है. इसलिये हम आपको भय और दंड (हप्ता वसुली वाले लोग जो “भय” दिखाते है वह “भय”, और सूपारी लेनेवाले का “कार्य”, यानी कि आपके किसी भी चहितेका अपहरण कर उसकी “हत्या” … ) दिखाते है. अधिक जानकारीके लिये आप बोलीवुडके महानुभावोंका संपर्क करे और लुट्येन गेंग जो न्यायालयके उपर, साम, दाम, भेद और दंड का क्रियान्वयन करता है, उनका संपर्क करें.

 (१५) हम अपना सामर्थ्य दिखाना चाहते है. हम किसीकी निंदा करते नहीं है. हमे जो साफ दिखाई देता है वही हमें सिखाता है, कि, हमें कैसे, आंदोलन करना है, और कैसे आपके विरुद्ध वातावरण तयार करना है.

(१६) इस विषयमें हम भौतिक-शास्त्रके शास्त्री आलबर्ट आईन्स्टाईन वादी है और समाज-शास्त्रके शास्त्री महात्मा गांधीके वादी है.  जैसे पदार्थकी गतिमें परिवर्तन क्षेत्र-बलसे होता है, वैसे ही मनुष्यकी मानसिकता मे परिवर्तन, सामाजिक वातावरणके क्षेत्र-बलसे होता है.

सामाजिक क्षेत्र आपके प्रति ऋणात्मक बने ऐसी कार्यवाही हम करेंगें. ये सब साम, दाम, भेद और दंड से होता है.  आपको भी अनुभूति हो जाय, लुट्येन गेंग संसदको ही स्थगित कर सकती है उतना ही नहीं, संसदके बाहर भी उसके पास विशाल क्षेत्र है. 

हम है किसानके अतिरिक्त आम जनतामें रही लुट्येन गेंग

.

शिरीष मोहनलाल दवे

चमत्कृतिः

आपको इससे अधिक ज्ञानकी यदि आवश्यक है तो श्री संदिप देवका निम्न लिखित लींक पर  वीडीयो देखें.

https://youtu.be/2wXI7TkcLjM

(India Speaks Daily)

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अबे तुम हो बच्चु, हम है चक्कू

अबे बीजेपी वालों तुम लोग अभी बच्चे हो बच्चेकुछ समज़ते नहीं.

हम तो है जैसे था बाबु चक्कू

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क्या बात है? कुछ समज़में नहीं आता है हमें तो …. कुछ ढंगसे तो बताओ … “ भारतीय जनता बोली.

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तो सूनो… “बाबु चक्कुपचाससाठके दशकमें, राजकोटका गुन्डा था. हाँ जीवही राजकोट जो सौराष्ट्र राज्यका केपीटल था.

जब शहर बना, तो शहरमें गुन्डा तो होना ही चाहिये. एक, अकेले, गुन्डेसे भी क्या होगा? उसके पास, अपनी टीम भी होना चाहिये. क्यों कि गुन्डा होना ही तो शहरकी पहेचान और शान है.

यदि कोई शहरमें  गुन्डा आदमी नहीं होता है तो पूलिसवाले गली गलीमें गुन्डेको पैदा कर देते थे. अरे भाई, हप्ता वसुली करना है तोऐसा तो कुछ करना तो पडेगा ही !!. 

इन गुन्डोंका काम था फिलमकी टीकटोंका काला बज़ारी करना, किसीकी जेब काटना और आवश्यकता पडने पर चक्कू चलाना. चक्कू से मतलब है चाकु, छूरी.

जेब कतर्रे भी कलाकार होते है, वैसे ही चक्कू चलाने वाले भी कलाकार होते है.

कलाकार से क्या मतलब है?

मान लो कि कोई एक व्यक्ति कलाकार है,

कलाकार व्यक्ति जब, अपने कामका  प्रारंभ करता है तो उस कामको पूरा होनेमें कुछ समय तो लगता ही है. तब तक आपको पता चलता नहीं है कि वह व्यक्ति क्या बना रहा है. फिर धीरे धीरे आपको पता चलता जाता है कि उसने नाव का चित्र बनाया है या चूहेका चित्र.

अरे भैया, मैं वह विश्वकर्माजीने बनाये कलाकारके बारेमें नहीं पूछता हूँ. मैं तो चक्कू चलानेवाले कलाकारके बारेमें पूछ रहा हूँ?

मैं उसी कलाकारके विषय पर आता हूँ. ये विश्वकर्माके कलाकारकी कृतिका तो आप, पूर्वानुमान (अहेसास) लगा सकते है. लेकिन जेबकतरे कलाकार ने तो कब अपनी कला दिखाई, वह आपको पता ही नहीं चलता है. जब आप अपनी जेबमें हाथ डालते है तब ही आपको पता चलता है किपैसेका पर्सआपकी जेबमें नहीं है. … चक्कू चलानेवाला ऐसे चक्कू मारके अदृष्य हो जाता है कि जब आपका पेन्ट लहूसे तर बर हो जाता है और आहिस्ता आहिस्ता दर्द बढने लगता है तब आपको पता चल जाता है कि कोई आपको चक्कू मारके चला गया. इस क्रिया कोस्टेबींगकहा जाता है.

आपको पता होगा कि २००२के दंगेका आरंभ कैसे हुआ था.

“ल्यानत है हम पर” कोंगीयोंने सोचा

बात ऐसी थी कि नरेन्द्र मोदी नये नये मुख्यमंत्री बने थे. उन्होंने बात बातमें कह दिया किबीजेपीके शासन कालसे गुजरातमें दंगा होना बंद हो गया है. … “

यह बात जब कोंगीयोंके कर्णोंमें  (कानमें) पडी तो उनके कर्णयुग्म श्वानके कर्णयुग्मकी तरह ऊचे हो गये. वे अपना दिमाग लगाने लगे. यह क्या बात हुई!! हमारे होते हुए भी कभी क्या ऐसा हो सकता है, कि दंगे हो? ल्यानत है हम पर.

गोधराके स्थानिक कोंगीनेताने बीडा उठाया. और साबरमती एक्सप्रेसके दो डीब्बोंको हिन्दु मुसाफिरों सहित जला दिया.

वजह क्या थी?

वजह यह थी कि वे अयोध्यासे रहे थे जहां दश वर्ष पहेले एक मस्जिदको तोड दिया था.   

लेकिन उसका बदला तो मुस्लिमोंने मुंबईमें अनेक बंब ब्लास्ट करके हजारोंको मारके ले लिया थाअब काहेका बदला …!! “ जनताने पूछा.

अरे भाई हम मुसलमान हैहमारा हर मुसलमान, हर जगह बदला लेगा. हमें क्या सोच रक्खा है तुम लोगोंने? हम पर, इन दशानन कोंगीयोंके बीस हाथोंका आशिर्वाद है…. अयोध्या तो एक बहाना था…  मोदी ऐसा बोल ही कैसे सकता है कि बीजेपीके शासन में दंगा नहीं हो सकता. … चापलुस कहींकाहमने दिखादिया …  !!!” कट्टरवादी कोंगी मुस्लिम  बोला.

अरे भाई कोंगी !! तुम्हे क्या कहेना है?”बीजेपीने पूछा.

अबे, बीजेपी बच्चु, हम तो मुस्लिमोंकी पार्टी है. हम उनके खाविंद है और वे हमारे आका है. हमारा और उनका गज़बका है रिश्ता !! तुम क्या जानो हमारे रिश्तोंको !!

हम सब एक है. हम दो ही नहीं है. हम अनेक है. हमारे पास गोदीमीडीया है, हमारे पास गोदीअर्थशास्त्री लोग है, हमारे पास गोदीलेखकगण है, हमारे पास गोदी आतंकवादी है, हमारे पास गोदी अर्बन नक्सल है, हमारे पास गोदी पक्षधर भी है. तुमने देखलिया हमने उद्धव को उसके पक्षके साथ कैसे हमारी गोदमें बैठा लिया !!

तुम भी तो किसीकी गोदमें बैठे होउसका क्या …?” बीजेपी बोला.

तो क्या हुआ? हम तो किसीकी भी गोदमें बैठ जाते हैदुश्मनको दोस्त बनाना हमे आता हैचाहे वह देशका दुश्मन ही क्यूँ हो … !!! समज़े समज़े !! … तुम बीजेपी वाले तो बच्चू ही रहोगे. कभी चक्कू नहीं बन पाओगे…” कोंगीने बोला.

इस लिये तो तुम संसदमें ४०० बैठक्मेंसे ४०में सीमट गयेदेश भी तुम्हारे करतूत जान गया है…” बीजेपीने कोंगीको बताया.

अबे बीजेपी … !!! तुम तो बच्चू का बच्चू ही रहोगे. तुम किताबी बातें करते रहो और बच्चू ही बने रहो…” कोंगी बोला.

फिर कोंगी ने अपना पर्दा फास किया ;अबे बीजेपी, तुम तो ढक्कन हो ढक्कन …  तुम हमें क्या समज़ते हो? अबे ढक्कन, यदि हम संसदमें शून्य भी हो गये तो क्या हार मान जायेंगे? अबे बीजेपी बुद्धु, हम संसदके बाहर तो हजारगुना ताकतवर है….

तुम्हारे मोदीने विमुद्रीकरण कर दियालेकिन तुमने देखलियाने हमने, उसको समज़नेमें, जनताको कैसा गुमराह कर दिया

हमने तुम्हारे सी... और सी.आर.सी ही नहीं तुम्हारे सी.आर. पी को भी आंतर्राष्ट्रीय  मुद्दा बनाके तुम्हे बदनाम कर दिया

किसी भी मीडीया कर्मीकी औकात नहीं थी कि वहनहेरुलियाकत अली समज़ौता को याद करके हमे  विरोधाभाषी कहें !!

हमने मुस्लिमोंको बहेकाके, तुम्हारे शिर पर मत्स्य प्रक्षालन कर ही लिया !!! ऐसा तो हम करते ही रहेंगे !

अबे बच्चूहमने मुस्लिमोंको तो, भ्रमित ही नहीं अंधा भी कर दिया है. वे तुमसे हजारो मील दूर हो गये है.

हमारी गोदीमीडीयाकी ताकतको समज़ने की तुम्हारी औकात नहीं है. हमारी गोदमें तो हार्वडमें से पैदा हुए निष्णात बैठे है. वे हमारे पोपट है पोपट …  और यहांके अधिकतम मीडीयामूर्धन्य तो पहेलेसे ही हमारी गोदीमें है !

तुम जरा याद रक्खो  … यदि हम संसदमें शून्य  जाय, तो भी हमारी ताकत तो बनी ही रहेगी. तुम हमें क्या समज़ते हो?

संसद तो हमारे लिये एक बहाना है. हमें संसदकी परवाह ही नहींहमें संविधानके प्रावधानोंकी परवाह नहीं. हमें मानव अधिकारोंकी परवाह ही नहीं.

हमने तो न्यायालयके समक्ष शपथपूर्वक बोला था कि आपात्कालमें हमारी सरकार किसीको भी गोलीसे उडा देनेका अधिकार रखती है. अबे बच्चू, तुमने कभी इस शपथ पूर्वक कहे कथन पर हमारी बुराई की?

तुम क्या हमारी बुराई करोगे!!  तुम तोब्युरीडानके गधे हो. [ब्युरीडान के पास एक गधा था. उसके पास जई के  दो समान ढेर रक्खे गये तो वहकिसको पहेले खाउं यह सोचते सोचते भूखा मर गया”]. तुम तो, हमारे कोंगीयोंकेराक्षसी कर्मोंमेंसे किसकी सबसे पहेले निंदा की जायइस पर सोचते सोचते, बुढे हो जाओगे.

सहगान

अबे बीजेपी बच्चू !! तुमने कभी सहगान किया है? अबे, तुम्हे तो यह भी मालुम नहीं होगा कि सहगान क्या होता है !

जब तुम २००४ का और २००९का चूनाव हार गये तोहमने और हमारे सांस्कृतिक साथीयोंने क्या कहा था?

हमारा हर वक्ता केवल और केवल यही बोलता था किजनताने बता दिया कि जनता कोमवादी तत्त्वोंके साथ नहीं हैजनताने कोमवादी तत्त्वोंको पराजित कर दियाजनताने दिखा दिया कि वह कोमवादी तत्त्वोंके साथ नहीं है …  जनताने धर्मनिरपेक्षता पर अपनी मोहर लगाईजनताने गोडसेकी भाषा बोलनेवालोंको नकार दियाजनताने नाज़ीवादीयों को उखाडके फैंक दिया

हमारा सहगान ऐसा होता है तुम लोगोंको तोनमस्ते नमस्ते सद वत्सले मातृभूमिके अलावा भी सहगान  होते हैं वह भी मालुम नहीं.

जूठ बोलना हमारी पहेचान

अरे बच्चू बीजेपी, हम तो जूठ बोलनेके आदि है. तुम, हमारे जूठको, मिलजुलकर सहगान से उजागर करो, ऐसे काम करनेकी क्षमता तुम लोगोंमें कहां है?

मुस्लीम लीग नामकी एक पार्टी है. इस पार्टीमें अन्यधर्मी को सदस्यता नहीं मिल सकती. ऐसी कोमवादी पार्टी के साथ गठबंधन करे हम, फिर भी हम कहे, कोमवादी तुमको …  बोलो, है मजेकी बात?

हमारा ही एक स्थानिक मुस्लिम नेता, रेल्वेकोचको हिन्दुओंके साथ जलाकर राख कर दे, और खूनका दलाली करनेवाले सिद्ध हो तुमहमारे ही मुस्लिम गुन्डे स्टेबींग का सीलसीला करके सेंकडो निर्दोष राहादारीयोंकी कत्ल करे, लेकिन मौतके सौदागरका लेबल लगे तुम पर. है हमारी कमाल?

तुम लोगोंने हमे २०१४ और २०१९के चूनावमें पराजित किया. और अब तुम सोच रहे हो कि हम कोंगी नेता लोग निर्माल्य हो जायेंगे क्यों कि हमारी सरकारी पैसा खाने की दुकानें बंद हो गई.

तुम्हारी यही सोच तो गलत है.

हमारा भू माफियाका धंधा चालु है,

हमारा हप्ता वसुलीका धंधा  चालु है,

हमारा अवैध कन्स्ट्रक्सनका धंधा चालु है,

हमारी बोलिवुडकी दुकानोंका धंधा चालु है,

हमारा ड्रग माफियाका धंधा चालु है,

हमारा अवैध शराब बनानेका और बेचनेका धंधा चालु है,

हमारा सूपारी लेनेका धंधा चालु है,

हमारे देशके बाहरके कई धंधे चालु है. तुम देखते हो , कि देशमें ही नहीं, लेकिन  तुम्हारे विदेशी दोस्त और दुश्मन देशोंमें भी हम, तुम्हारे पक्षके विरुद्ध प्रदर्शन करवाते है. हम तो निराधार मुद्दों पर भी  प्रदर्शन करवाते है.

पैसा बनाना हमारे लिये आसान धंधा है. और हमे हमारे सांस्कृतिक साथीयों पर पूरा भरोसा है. उद्धव सेनाने तुमलोगोंको कैसा ठेंगा दिखा दिया? सिखोंके संत भीन्दरानवालेको मारा था हमने, तो भी ये सिख लोग हमारे साथ है.

पैसे से क्या नहीं होता? हमारे पास विदेशोंमें बडे बडे टापु है और तुम लगे रहो स्वीस बेंक और पनामा के पीछे.

अरे हमने तो तुम्हारे पक्षमें और आर.एस.एस.में भी फर्जी आदमी लगाये है. वे सब मीथ्या विषयों पर बकवास करते रहेते है. और कुछ तुम्हारे ही बेवकुफ लोग उसी मीथ्या विषयोंको ट्रोल करके अपना समय बरबाद करते है. हमारा असली कोंग्रेससे कोई नाता नहीं, तो भी बडे बडे मूर्धन्य लोग हमे ही, असली १३५ वर्ष पूरानी कोंग्रेस मानते है. जब ऐसे मूर्धन्य लोगोंको भी, हम गुमराह कर सकते है तो तुम्हारे हितैषी लेकिन बेवकुफ लोगोंको मतिभ्रष्ट करना तो हमारे लिये बांये हाथका खेल है.

 अरे हम कोंगी लोग, यदि राज्यमें सत्ता पर जाते है तो हमारे विरोधीयों पर प्रतिशोधके बेसुमार फर्जी केस कर देते है और उनको गिरफ्तार भी करके कारावास में भेज देते हैं. तुम्हें तो अरण्य रुदन करना भी नहीं आता है. शासन कैसे किया जाता है वह तुम हमसे शिख सकते हो.

हम तो किसीको भी आधीरातको भी गिरफ्तकार कर लेते है, उतना ही उनको पीटते भी है. हमने रामदेवको पीटा था, अर्णव गोस्वामीको पीटा था, उनके स्टाफ को पीटा था. हम तो कंगना रणोतकी कमर तोड देते. शुक्र करो हमने तो केवल उसका घर ही तोडा.

ज्युडीसीयरीने हमारा क्या उखाड लिया?सुओ मोटोका शस्त्र तो ज्युडीसीयरीने तुम्हारे लिये रक्खा है बच्चू …!!! हमारे लिये नहींसमज़े समज़े …?

हम निर्भिकतासे ऐसा कैसे कर सकते है  बोलो?

अरे भैया बीजेपी, हमारे पास ऐसा नेटवर्क है कि हम साम, दाम, भेद और दंड सभीका प्रयोग कर सकते है, चाहे तुम्हारा ही शासन क्यूँ हो.

ज्युडीसीयरी क्या चीज है?

अरे भैया बीजेपी, दंडमें जान भी समाविष्ट है.

जान किसको प्यारी नहीं होती?

न्यायालय भी सोचता है किजान है तो जहाँन है’. आप मर गये फिर तो डूब गई दुनिया.

तुम लोग तो अभी शोर करते हो कि कोम्युनीस्टोंने हमारे इतने बीजेपी सदस्योंको मार डालेममता सरकारने हमारे बीजेपीके इतने सदस्योंको मार डाले ….

अबे बीजेपीतुम तो बच्चे हो बच्चे. हम तो पूलिस हिरासतमें भी हमारे विरोधीयोंको मार डालते है. श्यामाप्रसाद मुखर्जीका हमने क्या किया था?  जयप्रकास नारायण का हमने क्या किया था? जयप्रकाश नारायण तो महात्मागांधीके अनुयायी थे. लेकिन हमें क्या फर्क पडता है? हम तो महात्मा गांधीको मार देते यदि वह जिदा होता तो.

अरे बीजेपी भैया …  हम कितने चालाक है वह तो तुम क्या जान पाओगे!! हमारे सदस्य तो तुम्हारे पक्षमें भी है. हम चाहे महात्मा गांधीवादीयोंको प्रताडित करें और मार भी डाले, तो भी तुम लोग तो महात्मा गाँधीकी विरासत हमें ही देते रहोगे. क्यूँ कि हमने तुम्हारे कुछ मूर्धन्योंको भी ऐसा उलज़ा दिया है, कि वे अपने पूर्वग्रह पर अटल है कि, गांधीने नहेरुको प्रधान मंत्री बना दिया और वह भी यावत्चंद्र दिवाकरौ (जब तक सुरज चांद है तब तक के लिये) के लिये. और गांधीने ही देशका बटवारा करवाया . गांधी ही सब समस्याओंकी जड है …. तुम अपने पूर्वग्रह छोड ही नहीं सकते हो. तुम अपने पूर्वग्रहोंमें ही रममाण रहो यही तो हम चाहते है.

अरे हम तुम्हें तो क्या, सर्वोदय वादीयोंमेंसे भी कुछ लोगोंको, वैचारिक विवेकशीलतामेंसे पथभ्रष्ट कर सकते हो, तो तुम तो क्या चीज़ हो?  

 तुम्हें हमसे शिखना है. लेकिन हम तुम्हे शिखने नहीं देंगे. यदि तुम हमारी तरह प्रतिशोधका तो क्या, यदि नियम अनुसार भी हमारे लोगोंके विरुद्ध कार्यवाही करोगे, तो हमारा गोदीमीडीया और हमारे गोदी कोलमीस्ट्स, तुम बीजेपीवालोंके उपर तूट पडेंगे …  किबीजेपी लोकशाही खून कर रहा है और बेवजह ही प्रतिशोधकी कार्यवाही कर रहा है

शस्त्र होते हुए भी उलज़ा हुआ बीजेपी

शिरीष मोहनलाल दवे

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Can we say that Congress is 135+ year old party? Part – 2

But what is the legal position of the is issue judiciously?God knows as to why the Nehruvian Congress was not challenged before 1969 when it was not split up in two Congress?

It is better to call this Congress, “Nehruvian Congress” or “Indian Nehruvian Congress” however it has no branch in Pakistan and Bangladesh or elsewhere.

Why the Nehruvian Congress or the so said Congress, has no branch elsewhere in the other countries?

It is only because, all the Congress members including its leaders, had ran away from Pakistan to India at the time of partition on plea of the fear of unsecured life in Pakistan for Hindus.

MK Gandhi had made a public statement that “You ran away from Pakistan, and you say your life was not safe in Pakistan. Why?

I have taught to die. Had you been killed there, I would have been extremely happy. I would have danced … I would have danced and danced with a joy. But like a coward you ran away from Pakistan. I have never taught you this…”

Off course some people suffering from “MK Gandhi-phobia” put this statement as if it was addressed to a lot of common migrant from Pakistan into India. Because it fits to their agenda to find every fault with MK Gandhi only.

Leave this topic of phobia aside.

We should not forget;

(1) We should not forget that Muslims have many communal parties in India including Indian Muslim League. In this and all other Muslim  parties, only Muslim are allowed to be the member of the party.

(2) Congress failed to have “Pakistan National Congress” and “Bangladesh National Congress” parties in Pakistan and in Bangladesh respectively.

Why?

(3) Because Congress leaders willfully forgot the advice of MK Gandhi. MK Gandhi had told that “I will come to Pakistan once Delhi becomes peaceful”.

(4) Actually the Congress leaders killed the scope of reuniting India.

(5) To go to Pakistan was the next step of MK Gandhi. By going in Pakistan, he was to convince the common mass to fight against the division of India. If the leadership fails to prevent the partition, only the common mass can reunite the nation.

Any way Leave this topic too, aside.

(6) Because this was not the topic of the subject line. But the Congress has deviated from its principle.

Can a democratic party be a dynastic party by its principles or by it action?

What is meant by Dynastic Party?

(1) If a person who held Number One post in the party, a progeny of that person also would hold the Number One post directly, then such party has to be termed as dynastic party.

(2) Nehru had made such arrangement for India. Indira had made such arrangement for Sanjay. But Sanjay Gandhi died accidently.

(3) Indira Gandhi installed not only a Rubber Stamp President of India, but also a President completely devoted to her.

(4) The Indian President was so much devoted to India Gandhi, that he was ready to broom, if Indira Gandhi said so.

(5) Thus after Indira Gandhi, Rajiv Gandhi was installed as the Prime Minister of India by Zail Singh the then President of India. This was done before the dead body of Indira Gandhi, gets cremated. Such a practice is prevailed in monarchy.   

 (6) The President of India did not follow prescribed procedure which was mandatory for a democratic country and as per the constitution of India, by Zail Singh. And we know what is happening till date in Congress.

But what about the Real Congress (1951 to the dispute aroused in 1969)?

Yes. We can now forget the aim of a party and the moral binding of the party, and we accept the party is a political party.

In this case what should be the criteria that can decide the original party?

Now suppose the party breaks into two. Then which fraction should get the inheritance of the original party?

What does the constitution of the party say?

(1) Party has a president. President is the Number One power post in the party.

(2) The central working committee holds the power of making the decision on any issue related with the party policy including disciplinary action against any member.

(3) The party president is elected in the General Conference by the delegates by majority. These delegates were elected by the state general body meeting of the members, in proportion to its membership in the state.

(4) Party has a central working committee. It consists 50% elected members by the delegates in the general Conference. The remaining 50% of working committee members are selected and appointed by the elected party president.

(5) The party president will take the decisions on majority basis of the Central Working Committee members.

(6) President will hold the post till he enjoys the majority or to the prescribed period under the party’s constitution.

(7) The president is authorized to call for working committee meeting, and general conference of the party with asking for points of discussion and to be decided and to be put into agenda.

(8) The party President  and then circulates the agenda.

(9) The Coram of the meeting follows general rules of a meeting.

(10) Any member can ask the president under the signature of 20% members (this 20% presence is the Coram under general rule of a meeting. If there is no Coram, the date of the meeting must be extended.

(11) If the president is satisfied on the ground, or the president of his own, can call for emergency general body meeting in consultation of the working committee member.

(12) Any member can ask the party president or of its own, can call for a requisition meeting provided majority of the members supports him/her.

What had been happened in 1967-69?

Leaving aside many other disputes related with ministerial powers prevailing in Congress party;

(1) The central working committee had selected by its majority, Sanjeev Reddy as the Congress Candidate for the Indian Presidential election.

(2) Indira Gandhi was not in favor of his candidature. But as per the majority decision of the central working committee, she had to sign the candidature of Sanjeev Reddy, as the leader of the Congress party of the  parliament.

(3) Indira Gandhi asked VV Giri to file his candidature. VV Giri deed it.

(4) Indira Gandhi and her gang propagated false sexual allegations by distributing pamphlets in central hall, against Sanjeev Reddi at the day of the election.

(5) Sanjeev Reddy got defeated. VV Giri won.

(6) As the leader of the party Indira Gandhi asked the Congress party president Nijalingappaa, to call for the emergency general body meeting. Nijalingappa refused to call because the regular general meeting was due after only few months.

(7) Central working committee dismissed Indira Gandhi from the leadership of the Congress party..

(8) Indira Gandhi called for requisition meeting. She enrolled new and bogus members. Some old members defected to Indira Congress ignoring the directive of the Congress (N).

(9) Some defected members and the new members attended the general conference. In this requisition meeting Indira Gandhi dismissed Nijaligappa from the party’s presidential post.

(10) Indira Gandhi installed herself as the party president.

Now these both the Congress-s claimed the original heritage of the party. Case was filed in 1969.

(1) As an interim measure, the CEC withhold the symbol of Congress. Allotted different symbol to each party.

(2) Congress (I) i.e. Congress lead by Indira Gandhi selected Cow and her two Calf as the party symbol. Congress (N) lead by Nijaligappa selected a man with the spinning wheel.

(3) By this time Indira managed the majority in L.S. by taking supports of CPIM, Muslim League, some defected members and some other miscellaneous parties.

(4) In the general election of L.S. 1971, Indira gained clear majority.

(5) To win the elections and to get the majority is one thing. And to administer efficiently and to do progress is another capability. Despite of winning the war in 1971, Indira Government failed in all of the development and the diplomacy fields.

(6) Public agitation started and Indira Gandhi imposed emergency. She arrested all the persons who opposed her, and put to jail say 66000+ for indefinite period.

(7) Emergency collapsed by its own wait. Failures remain as they were.

(8) Congress (O), Jan Sangh, SSP, Janata Dal, Republican etc… got united and formed a Janata Front. They defeated Congress (I) in 1977. Then in the leadership of Moraraji Desai, Janata Party was constituted.

(9) Congress (O) was dissolved. Janata front converted inot Janata Party.

(10) Till this date SC did not give its verdict.

(11) In 1979 Charan Singh took the support of Indira Gandhi and toppled Janata Party Government. Then Indira Gandhi betrayed and toppled Charan Singh’s government.

(12) President of India declared general election and Congress (I) won the elections with a clear majority.

(13) Now the SC thought a proper time to give its verdict on the dispute.

(14) The SC said that in the Democracy, public is supreme. The victory of Congress (I) had been considered the criterion of deciding base. SC said, because Congress (I) has secured more L.S. seats, the heritage should go to Congress (I). Off course the SC did not gave any verdict on the property. Viz. Intellectual property of heritage and the real property.

(15) This was a funny and ridiculous judgement.

How was it funny and ridiculous?

(1) The SC did taken a cut-off date as the criteria of the number of the LS members of new parliament of 1981. At this time the Congress (N) was not existing, because it was sissolved in 1977.  

(2) Now suppose the Congress (O) had not been dissolved and it would have continued, then in the time to come the Real Congress would have been flip-flopped several time, because in democracy elections are held time to time as a routine. Every time different party may win with different number of seats. The possibility cannot be ruled out that in one or other L.S. elections Congress (N or O) can get more number of seats in L.S.

What should have been the appropriate criteria for deciding the heritage of a party when it gets spitted up?

(Continued)

Shirish M. Dave

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Can we say that Congress is 135+ year old party? Part – 1

If we believe in logic, morality and democracy, the so called Indian National Congress cannot be termed in any way a political party. What to talk of 135+ years old party when the INC cannot be termed as a political party at all.

(A) What is the requirements to identify a group of persons as a political party?

The political party has to be composed of its structural design with the aims and principles, i.e. the constitution of the party has to consisting of

(1) Eligibility criteria of members at the various level in the party,

(2) to establish the national sovereignty and to protect the national sovereignty,

(3) the principles of the party for the welfare of the citizens

(4) the line of implementation of the aims,

(5) the authority to make the changes in the aims without changing the main (fundamental) principles if the party accepts the democracy,

(B) The Congress formed by Hume. Hume was not having the aim of national sovereignty. Hence it was not a political party at all.

(1) Hume’s Congress was only formed to work as an agency to understand the feeling of the people of India towards the Government.

(2) The eligibility criteria was to be a “white collar person” under the approval of Hume.

(3) It was not open to public even up to 1916.

(4) Only in 1919 the Congress was opened up for common mass with a highly reduced membership fee. i.e. 4 Annas (25 paise), or under the acceptance the principle of swadeshi, one hand-spun skein of thread was to be deposited.

( C) Real birth of the Congress

(1) The birth of Congress took place when Balgangadhar Tilak had started HOME RULE in December 1916, and when the split-up congress was reunited.

(2) Thus the birth of a real political party as the Congress, has to be considered to be in December 1916. Mahatma Gandhi designated Lokmanya Bal Gangadhar Tilak as the Father of Congress party who fought for freedom.

(3) Life span of Congress

The life span of Congress as a political party is from December 1919 to December 1949. i.e. 30 years.

Why?

(4) Lawfully, December 1919 is the birth year of the Congress, where its main aim had become to achieve the political independence of India.

(5) The main aim has been partially achieved in August 1947. But this was not the lawfully total independence. Till 26th January 25 1950 India was under the sovereignty of British Crown. On 26th when India passed the Indian Constitution, India became totally independent of British Crown. Off course the cultural independence was/is still pending. But that was not the part of  the  Indian constitution prepared and approved in 1949.

(6) In other words as desired by Mahatma Gandhi, the Congress was to be dissolved once we got the political independence i.e. 15-08-1947. Theoretically the Congress as a political party died in 1947. The said party died principally and legally, on 26th January 1950.

( E ) How can we say that it died on 26th January 1950?

The main aim of Congress was independence. It is ok. But what about the other principles?

e.g. Welfare of the people, democratic society, civil code, to establish a non-violent society, reforms in the society … ?

(1) As for M. K. Gandhi, “the duty of the Congress was to achieve political independence only. And that was achieved.

(2) The security, common civil code, common penal code, educational reforms, social reform, law and order … etc. are the work of government.

(3) As for making a reform in the society the government needs experts’ opinion. It also needs discussions among peoples’ representative and experts.

(4) This can be processed only after people’s mandate. The Congress had no mandate. MK Gandhi had asked the  Congress to convert itself into a missionary organization.”

(F)  So what? Why the Congress cannot continue as a political party?

(1) To continue as political party, the Congress should change its name. Its name does not indicate by its name, which indicates, it has any specified identity.

(2) Congress has lost all its main principles and aims too?

(G) What were the principles and aims of the original Congress? How has the Congress ignored them each?

(1) Its democratic structure and Constitution lost.

The democracy is killed and murdered several times right from 1950 to till this date. e.g.

(2) To flow the rivers of milk and ghee i.e. people will be happy with full amenities.

No willful approach is visible even after 65+ years of its rule. What to talk of flooding with milk and ghee, even pure drinking water has not been made available to each house, The Congress leaders themselves have become multiple billionaires but the Congress leaders had never even recognized, a toilet is also an issue for the people,

(3) Prohibition on liquor,

Congress Government had relaxed the prohibition on liquor in nineteen fifties. Congress even allowed to flourish the drug-mafia, and it gave a convincing message that Congress is a party to it.

(4) Non-violent society

Slaughter houses are increased and the capacity of existed slaughter houses were also being increased continuously.

(5) Natural rights and democratic rights

Natural rights were ignored with an affidavit before court of law that the Government has right to kill its citizen without assigning even a reason to the citizen during emergency. The constitutional rights were totally abolished by fake and undemocratic laws.

If a person uses this right of Freedom of expression, the person is harassed, threatened and punished illegally in the Congress ruled states, even now,    

(6) All are equal before law;

Congress has framed many laws, by way of following irregular procedure, where the citizens are deprived of the fundamental rights by identifying them by their caste, religion, gender and area, for indefinite period. When another party’s government abolished such laws following democratic procedure, then the Congress has been and is instigating one or more communities to revolt openly against the government.

(7) Protect sovereignty of India:

POK is a part and parcel of India. Indian military captured a portion of POK, during  the war between India and Pakistan in 1972. The Congress handed over this portion of  POK to Pakistan in 1973. India has the claim on this portion. Congress also handed over 91000 square miles land to China by keeping the Indo-China border unsecured, though it was brought  to notice of Congress time to time, in the parliament. Congressi PM  had  denied the fact bluntly all the time in the parliament. Refer autobio graphy of JB Kriplani.

Congress even allowed drug-mafia to flourished. Congress allied ministers says the person who are involved in trading and using drugs should not be arrested and should not be sent to jail, but they should be sent to rehabilitation centers. This culture of Congress is not a surprise. Congress was a party to feed terrorists from public fund. Now also it is allied with the same gangs who want to take help from China to restore Article 370 and 35A which laws permitted to recognize the citizens’ rights by their caste, region, religion, gender.

Congress party made a private agreement with China, the China, which is “Enemy Number One” of India, leave aside various scams and frauds committed by the Congress.

(8) Missing all moral values:

It has become a part and parcel of Lutyen gangs. Refer the meaning of Lutyen Gang elsewhere in this blog site, and also the conclusions of the Vora Committee Report. Only 12 pages are disclosed of the Vora Committee Report.

(9) People wants to know if any evil is missing in the Congress.

Congress can be disqualified as a political party itself on every democratic ground.

But what is the legal position judiciously?

(Continued)

Shirish Mohanlal Dave

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Influence on Judiciary a matter of research

Please recall the interview of a retired Supreme Court Chief Justice, by Arnav Goswami on his TV channel. Common mass can smell a lot. We will discuss about the influence on Judiciary. But let us understand what is else.

There many more heads of Lutyen Gangs

 

Who is independent?

If a person has a liberty to express his view then either the person is bold or the person is secured. That is, a person can express his idea or view point or decisions without any fear, if this can applies to a common mass then it is an independent.

What is fear?

A person wants to live its life happily. That is the person feels that there is no scope or chances to get damaged his body and mind (off course, as for the body and mind, whatsoever is the damage happens to the body including brain is felt by mind) while it passes through its life span. Besides this the person also wants the same situation for his beloveds. Fear is the chances of disintegration of the body ultimately.

In a democratic society (country is also a society) the person is more secured and happy, compared to non-democratic society.

What is meant by democracy?

Democracy means, where the truth is honored and accepted, if it steps up the society. Step up means the mental evolution.

So far democracy is concern, the society is composed of common mass, people’s representatives, administrators (bureaucrats), media (which provides information and guide the society by giving information and suggestions), and judiciary (which takes ultimate decision on a dispute). The duties of all these lots are governed by the Constitution approved by the people through their representatives.

What is meant by “Influence”?

Influence is a change in thinking and arriving to an opinion. The change can be by Education and by more information. The change can also be under bribe, threat and penalty. We are talking about the latter type of influence.

Why are we discussing the influence by   bribe, threat and penalty?

We will not discuss on the influence other than influence on judgement of judiciary. Because judiciary is the final authority to award justice. If judiciary influenced by bribe, threat and penalty then it is harmful to the nation. Hence in a democratic country to have an independent judiciary is mandatory.

In most of the cases in India, bureaucrats have a culture to get influenced by bribe. Similar is the case with politicians. But in case of politician, it varies with party to party. The dynastic party viz. Congi has broken all records making money through unauthorized sources and dividing communities  in India, during its rule of 65 years. Congi’s top most leaders are also not beyond doubt of their integrity. They are bails too. Under this condition, what to talk about its normal members!!. The Congi has produced similar cultural parties like TMC, SP, RJD, NC, PDP …

BJP is the least corrupted party.

Who is powerful to influence the judiciary?

In a democracy the people are the most powerful. But the people are the soft target to get them influenced. It is a long story.

But we must know that the ruler of Oman can make his country from undeveloped to a developed country  within 15 years, but the Congi despite of its absolute power for decades together, failed in every field and keep the country undeveloped. On the other hand Congi created and developed social problems. Because Congi knows that, it can influence the people at a large scale, by dividing them by caste, religion, language and by encouraging antisocial element, bribing media, besides keeping the mass at large illiterate and by spreading lies.

People’s representatives have power for making the laws and implementing them. The people’s representatives can bribe, the bureaucrats, to implement the laws in such a way, in selective instances, as and when needed, such that the law can be made ineffective. However the judiciary can prevent this by taking SUO MOTO or it does not entertain the delay tactics in the process of proceeding and giving judgement.

Who can take SUO MOTO?

Judiciary of the level of High Court and the Supreme Court can take SUO MOTO. But these level judiciary would take SUO MOTO provided the matter according to them is serious and a breach of fundamental right. But it all depends upon the perceptions of the judiciary of an event.

Recent cases of failure of a state government of Maharashtra

Murdering Hindu saints at Palghar:

Two Hindu saints were murdered in Palghar by a mob, appeared to be under a non-Hindus’ agenda. This was done under a plea that the Sadhus had come to kidnap children.

There is no information at any place about, how many children are kidnapped in Palghar, how many cases are lodged with police, and on what ground the mob had a doubt on these Hindu Saints? One of the two saints, was above 70+ years of age. Mob had killed the driver also.

The high side of the selective behavior of Maharashtra Government is, it was not a case of happened suddenly. The car was stopped by some people. They gathered a mob. The car was turned down. Police came by its own time. Till this time the saints were in the overturned car only. They came out of the car by the police. Police was in at least a dozen in number, with a fully informed of the situation. It had required arms to control the situation/ Police was capable to stop the beating the Saints and driver. Police could have used their lathi  and or could have done fires in the air.

But police did nothing. The 70 years old saint was holding a arm of a police, under the normal expectation that police party would save him from beating by the mob. Police force was determined to see, both the saints and their car driver, killed by the mob. It absolutely appeared and very clear, it was not the only a lynching by the mob, but the police force was also a party, in killing the saints and their driver. Not only police and the mob, but a local leader of Sharad’s NCP’s was also present there. The NCP leader did nothing there, as he too was determined to not to protect the saints and their driver from the mob and the police force.

This case of murders  was kept hidden.

It is normal for this pseudo seculars, viz. SS (alias Sonia Sena, (which is wrongly termed as Shiv Sena), plus Sharad Sena (better known as a right hand of Daud), plus Congi Sena (known as the left hand of Daud), plus the Defense network of Daud in Mumbai i.e. the Police ), in this case of Palghar, tried to hide such cases where the Hindus are the victims. But some somehow they failed to hide the triple murder case of Palghar.

The R. Bharat channel got the video clip, and the news reached to the public. Surprisingly the CM of Maharashtra threatened the noise makers, to not make any noise, otherwise the Maharashtra Government take sever actions against them whosoever making the noise.

Bharat’s Arnva and the social media continued to protest. The public noticed as to how badly the case was handled by the Maharashtra Government.

Disha Shalyan murder case and Sushant Singh Rajput murder case!!:

A story was cooked up theory that Disha Shalyan the secretary of Sushant Singh (a successful actor of Bollywood) committed suicide. She jumped from 14th floor of a gallery. There are a lot of stories. But it is am matter of research as to how the police accepted the story of Disha’s death was a suicide, when the body found in naked condition. Is there prevailed such incident of  suicide?

Sushant Singh Rajput death case was also declared a case of suicide by a minister of Maharashtra State Government before any report comes out.

There are multiple stories running in media and on social media. This is very common in a democratic country. It is supposed to be accepted by the state government of Maharashtra. But a senior leader and a minister of the government of Maharashtra, surprisingly took it personally.

There are several narratives: Nepotism in Bollywood, involvement of Drugs Mafia run by Daud Ibrahim, Drug trading in Bollywood, Drug parties’ management in farm houses with the help of police and the agents of Daud Ibrahim in politics, Involvement of near relative of CM Maharashtra in the above mentioned two death cases. Surprisingly the Maharashtra Chief Minister and the Commissioner of Mumbai Police took the case personally and showed vindictiveness.

Kangana Ranaut reacted with the Chief Minister of Maharashtra. She says that she is ready to disclose a lot information about the evils prevailing in Bollywood before CBI. She is also ready to provide information on Disha Salyan Case and Sushant Singh case.

Chief Minister of Maharashtra demolished her house in Mumbai in an absolutely illegal way. Sanjay Raut a senior leader of SS openly used derogative words for Kangana Ranaut. He also threatened that if she would come in Maharashtra her waistline will be broken.

Can a minister in a democratic country behave like an autocrat? Can a minister in a democratic country stop the movement of a female citizen? Can a minister in a democratic country threaten a female to damage her body? Why a minister should be angry and get irritated on a citizen for nothing? People and the media has a right to expose such minister’s behavior. Is it not a matter of research as to why the judiciary cannot perceive the fact that the constitutional rights of a citizen are denied by the state government.

The more alarming situation of the action of the government machinery is used against Arnav Goswami clear cut vendetta and with absolutely false evidences and lies. The Commissioner of Police is a gazetted officer. A statement of a gazetted has to be accepted as a truth of proof by law. If a gazetted officer speaks lie, he gets disqualified for its  post. The Government is supposed to be dismissed. If the government does not suspend the gazetted officer, it should be termed as failure constitution in the state. The court should take a SUO MOTO and it should ask the union government to suspend the state government to investigate into the matter and arrest the officials involved in the case and also the ministry because it is a joint responsibility of the state ministerial cabinet unless the responsible ministers are not sacked out.   Here in the case of Maharashtra the whole cabinet and the allied parties members are responsible, because Sanjay Raut who is the spokesperson who speaks on behalf of the state government policy and action. The state assembly must be dissolved. This is the perception of common me common men of the country. The common men expect the judiciary to intervene.

Why the Union Government is silence on the matter?

The ruling alliance has two groups. One group believes in establishment of morality in India. Other Group wants that the alliance should not rush towards morality. The latter group is afraid of Sharad gangs. Sharad gang has link with cross border antisocial gangs and local antisocial gangs inclusive of police network especially of greater Mumbai. Lutyen gangs are composed of several gangs which is not a secret. In ruling alliance there are several leaders have links with Lutyen Gang, this possibility cannot be ruled out. Narendra Modi group thinks that when Sharad-Sonia-Uddhav gangs otherwise also to be die in near future, why should the BJP should open a new front?

Shirish Mohanlal Dave

Punch:

Daud has exerted pressure on and asked Sharad Sena, Sonia Sena and Congi Sena to  promise him to award Bharat Ratna to  Param Vir Singh as and when their alliance would come to power at Center. This cannot be ruled out. All the four gangs have also decided to merge and to have a single party with the name as United Lutyen Gang . ULG

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WHO WAS M. K. GANDHI – 2

Suffering from Gandhi phobia

How a 5000 years old country has a father of 150 years. These perverted persons do not know what is the meaning of the Father of a nation?

Who was the father of nation of Italy? Giuseppe Maria Garibaldi was termed as the Father of Italy. Giuseppe Maria Garibaldi was born in 1807 and died in 1882. He was democrat.

Italy is a 2000+ year old country. The people of Italy had never objected that how Giuseppe Maria Garibaldi can be the father of our nation.

Perverted persons oppose blindly like RaGa and his gangs.

A nation passes through many faces during the period of history.

(17) Was Gandhi a sex maniac?

There are some videos on social media e.g. “Satya Sanatan” where one can find a person having misperceptions and/or willfully posting the abusive narrative on the matter related to M. K. Gandhi. He quotes the Prime Minister of Travancore State. According to this Prime Minister Gandhi was a dangerous sex maniac far greater than Asaram Bapu. Further he quotes Jad Adams book “Gandhi: Naked Ambitions”. Gandhi used to become totally naked to take bath with women and used to take massage from his female veterans under the totally naked position. Jad Adams says he had written this book after going through several hundreds of letters of Gandhi.

It is very easy to defame anybody very well, by abusing him on sex related matters.

When there are so many lies, we cannot spare time to prove them all as the lies. One false narrative of an event would be enough to expose the falsehood of the person.

Gandhi in his early young age

The narrator says “Karamchand, the father of Gandhi was in the last stage of his life. At this stage a father needs the presence of his son, his youngest son. Ignoring the desire of his father, Gandhi left his dying father, just to satisfy his sexual desire. … This Gandhi also moved with a lot women and slept with them naked and having sex with them. He did not spare his secretary’s daughter and his granddaughter too. Wherever he go he would be surrounded by women. Gandhi in his ashram had strictly banned his male veterans to sleep even with their own wife. But this rule was not binding to Gandhi himself. Gandhi had full liberty to sleep naked with any women.”

Above narrative is available on a video on social media.

Definitely, everybody who has even a little respect for M. K. Gandhi, would get hurt, provided the person is aware of the real story or the person had read Gandhi.

What was the fact?

M. K. Gandhi had never disliked or ignored his duty as a son. Gandhi’s hero was Shravan (श्रवण). We know the story of Shravan as to how he took his parents to pilgrimage.

Gandhi used to perform his nursing duty toward his father during his prolonged illness. Gandhi used to be with his father till late nights. Gandhi used to leave the bed of his father only when his father would asked him to go to sleep or when Gandhi would found him at fast asleep.

On that last night of his father, Gandhi’s uncle had asked him to go for sleep. Nobody knew that it was to become the last night of his father. On that night, Gandhi had sex with his wife.  He was ashamed of his deed. He has narrated the full event and the situation prevailed in those days of Saurashtra. One should understand that this act could be common for a boy of 16 years of age.

Gandhi was committed to be an ideal son of his father and an ideal husband of his wife. Gandhi has narrated his feeling, relations and attitude with his wife in details. He has also narrated the disease of his father and his efforts to cure it in details. Everything is available in his autobiography.

But some people are not able grasp and understand the facts. Most probably this could be due to they have no firsthand information on M. K. Gandhi. That is these people have not read the autobiography of Gandhi. Either they do not want to read it or it does not suit to their agenda. These people must know that they are able to know the event only when Gandhi has disclosed it. If Gandhi had hidden it, the world had no chance to know it. Gandhi was open minded. He did not hide anything. Some perverted people cannot appreciate this. These people have manufactured their own narratives.    

Is it not a matter of research as to why some persons are more interested in trolling the topics of abusing MK Gandhi by way of creating false narratives? For these people the Lutyen Gangs’ current activity is not important and significant. They prefer to go back to 72 years for a dead person, and not the dynasty (Nehru) which is alive.

They are also not bothered on the frauds executed and the lies spread by Lutyen gangs against Narendra Modi/BJP. One can suspect from the very beginning that they are under the mask of pro-BJP, giving material to Congis and their cultural allies to abuse MK Gandhi.

As for sleeping naked with the specified two girls, was not to perform intercourse with them, but to test his own mind whether he had overcome the sex. Though he was successful in the experiment on his abstinence, he had not recommended the test for public. One should also understand that the test was only for one or two days.

It was not proper

I understand that MK Gandhi’s test was not proper. After some age even a great person can also become crazy on one or other point. But we cannot discard his overall reputation.  Many great persons had possessed their craziness on irrelevant point. We should also understand, that his life is an open book. He did not hide anything of his life. He could have done that like many others. But he did not.

Congi and its associates (Lutyen gangs) can have a lot of persons with having mask of pro-BJP, remains busy to spread fake or unauthentic news, time to time on M. K. Gandhi. This would give a message to the common mass that RSS persons are liars, and not trustworthy. This situation causes the possibility to divide the votes of Hindus. This possibility cannot be ruled out. Lutyen gangs want to divide the Hindu votes of BJP.

(18) Matter of research?

Is it not a matter of research as to why the judiciary is not taking SUO MOTTO on false presentation on M. K. Gandhi?

If judiciary can take SUO MOTTO on displaying the photos of rapists at the prominent places of a city, and if the judiciary does not take SUO MOTTO on must more prominent events? What to do? How to stop the wrong message which is going to the common mass. What is the wrong message? The message that judiciary does get influenced by Lutyen Gangs.

Recall and go through the contents of the interview of a retired CJ of SC. The interview was taken by Republic Bharat TV, where the retired CJ says that unless the pressure of Lutyen Gangs gets eliminated, the judiciary cannot give independent judgement.

Recall the delay in the judgement on Shaheen Bag case where the lakhs of people put to inconvenience for months together.

(Continued)

Shirish Mohanlal Dave

Punch Ahead:

Saint Rajnishmal presents sexual intercourse as the way towards Deep Contemplation to join with supreme spirit. This he says without assigning any proof. Because Rajnish is modern BABA, the people applauds him.

Osho Asaram travels in the same boat of Saint Rajnish. Osho Asaram is put behind the bars.

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WHO WAS M. K. GANDHI – 2

Suffering from Gandhi phobia

How a 5000 years old country has a father of 150 years. These perverted persons do not know what is the meaning of the Father of a nation?

Who was the father of nation of Italy? Giuseppe Maria Garibaldi was termed as the Father of Italy. Giuseppe Maria Garibaldi was born in 1807 and died in 1882. He was democrat.

Italy is a 2000+ year old country. The people of Italy had never objected that how Giuseppe Maria Garibaldi can be the father of our nation.

Perverted persons oppose blindly like RaGa and his gangs.

A nation passes through many faces during the period of history.

(17) Was Gandhi a sex maniac?

There are some videos on social media e.g. “Satya Sanatan” where one can find a person having misperceptions and/or willfully posting the abusive narrative on the matter related to M. K. Gandhi. He quotes the Prime Minister of Travancore State. According to this Prime Minister Gandhi was a dangerous sex maniac far greater than Asaram Bapu. Further he quotes Jad Adams book “Gandhi: Naked Ambitions”. Gandhi used to become totally naked to take bath with women and used to take massage from his female veterans under the totally naked position. Jad Adams says he had written this book after going through several hundreds of letters of Gandhi.

It is very easy to defame anybody very well, by abusing him on sex related matters.

When there are so many lies, we cannot spare time to prove them all as the lies. One false narrative of an event would be enough to expose the falsehood of the person.

Gandhi in his early young age

The narrator says “Karamchand, the father of Gandhi was in the last stage of his life. At this stage a father needs the presence of his son, his youngest son. Ignoring the desire of his father, Gandhi left his dying father, just to satisfy his sexual desire. … This Gandhi also moved with a lot women and slept with them naked and having sex with them. He did not spare his secretary’s daughter and his granddaughter too. Wherever he go he would be surrounded by women. Gandhi in his ashram had strictly banned his male veterans to sleep even with their own wife. But this rule was not binding to Gandhi himself. Gandhi had full liberty to sleep naked with any women.”

Above narrative is available on a video on social media.

Definitely, everybody who has even a little respect for M. K. Gandhi, would get hurt, provided the person is aware of the real story or the person had read Gandhi.

What was the fact?

M. K. Gandhi had never disliked or ignored his duty as a son. Gandhi’s hero was Shravan (श्रवण). We know the story of Shravan as to how he took his parents to pilgrimage.

Gandhi used to perform his nursing duty toward his father during his prolonged illness. Gandhi used to be with his father till late nights. Gandhi used to leave the bed of his father only when his father would asked him to go to sleep or when Gandhi would found him at fast asleep.

On that last night of his father, Gandhi’s uncle had asked him to go for sleep. Nobody knew that it was to become the last night of his father. On that night, Gandhi had sex with his wife.  He was ashamed of his deed. He has narrated the full event and the situation prevailed in those days of Saurashtra. One should understand that this act could be common for a boy of 16 years of age.

Gandhi was committed to be an ideal son of his father and an ideal husband of his wife. Gandhi has narrated his feeling, relations and attitude with his wife in details. He has also narrated the disease of his father and his efforts to cure it in details. Everything is available in his autobiography.

But some people are not able grasp and understand the facts. Most probably this could be due to they have no firsthand information on M. K. Gandhi. That is these people have not read the autobiography of Gandhi. Either they do not want to read it or it does not suit to their agenda. These people must know that they are able to know the event only when Gandhi has disclosed it. If Gandhi had hidden it, the world had no chance to know it. Gandhi was open minded. He did not hide anything. Some perverted people cannot appreciate this. These people have manufactured their own narratives.    

Is it not a matter of research as to why some persons are more interested in trolling the topics of abusing MK Gandhi by way of creating false narratives? For these people the Lutyen Gangs’ current activity is not important and significant. They prefer to go back to 72 years for a dead person, and not the dynasty (Nehru) which is alive.

They are also not bothered on the frauds executed and the lies spread by Lutyen gangs against Narendra Modi/BJP. One can suspect from the very beginning that they are under the mask of pro-BJP, giving material to Congis and their cultural allies to abuse MK Gandhi.

As for sleeping naked with the specified two girls, was not to perform intercourse with them, but to test his own mind whether he had overcome the sex. Though he was successful in the experiment on his abstinence, he had not recommended the test for public. One should also understand that the test was only for one or two days.

It was not proper

I understand that MK Gandhi’s test was not proper. After some age even a great person can also become crazy on one or other point. But we cannot discard his overall reputation.  Many great persons had possessed their craziness on irrelevant point. We should also understand, that his life is an open book. He did not hide anything of his life. He could have done that like many others. But he did not.

Congi and its associates (Lutyen gangs) can have a lot of persons with having mask of pro-BJP, remains busy to spread fake or unauthentic news, time to time on M. K. Gandhi. This would give a message to the common mass that RSS persons are liars, and not trustworthy. This situation causes the possibility to divide the votes of Hindus. This possibility cannot be ruled out. Lutyen gangs want to divide the Hindu votes of BJP.

(18) Matter of research?

Is it not a matter of research as to why the judiciary is not taking SUO MOTTO on false presentation on M. K. Gandhi?

If judiciary can take SUO MOTTO on displaying the photos of rapists at the prominent places of a city, and if the judiciary does not take SUO MOTTO on must more prominent events? What to do? How to stop the wrong message which is going to the common mass. What is the wrong message? The message that judiciary does get influenced by Lutyen Gangs.

Recall and go through the contents of the interview of a retired CJ of SC. The interview was taken by Republic Bharat TV, where the retired CJ says that unless the pressure of Lutyen Gangs gets eliminated, the judiciary cannot give independent judgement.

Recall the delay in the judgement on Shaheen Bag case where the lakhs of people put to inconvenience for months together.

(Continued)

Shirish Mohanlal Dave

Punch Ahead:

Saint Rajnishmal presents sexual intercourse as the way towards Deep Contemplation to join with supreme spirit. This he says without assigning any proof. Because Rajnish is modern BABA, the people applauds him.

Osho Asaram travels in the same boat of Saint Rajnish. Osho Asaram is put behind the bars.

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