Feeds:
Posts
Comments

Archive for the ‘Social Issues’ Category

Is it that the Shaheen bag area is a privet property?

Can the protesters and their supporters reply to the point?

ANARCHY IN SHAHEEN BAGIs it that the Shaheen bag area or a single property?

(1) What is Shaheen Bag?

(2) Is there any public road in Shaheen Bag?

(3) Who are the protesters?

(4) Do the protesters have any leader or representative?

(5) If there is a leader or a representative/s what is his name?

(6) If the protesters have a representative/s then how he/she has been selected? What is his/her duty?

(7) If the protest is for the awareness of public on any issue, then why the protesters are not making it open to the public and media?

(8) If the protesters have leader, then who is he/she?

(9) Why is he/she not coming forward to explain his/her demand and the justification?

(10) Is it that the leader and the protesters have right of way in that property?

(11) Who has given the right to the leader and the protesters, to prevent other citizens from entering into Shaheen Bag?

(12) Has the leader taken necessary permission to demonstrate their protest?

(13) If yes, then what are the details? Put them to public.

Media should ask above questions to the protesters? Why the media does not ask such questions?

What is the duty of the SC/HC?

(1) Does the HC/SC understand that the protesters have unlimited right to protest without knowing the issue?

(2) Does the HC/SC understand that the protesters have unlimited rights to protest against any issue anywhere?

(3) Does the HC/SC understand that the protesters have unlimited rights to protest against any government institution at any place?

(4) Does the HC/SC understand that the protesters have unlimited rights to protest against any government institution for unlimited time?

(5) Does the HC/SC understand that the protesters have every right to encroach any property of public use, and to prevent others to use it?

(6) Does the HC/SC understand that the protesters have every right to put the public to a continuous loss of time and money?

(7) Does the HC/SC understand that HC/SC should hesitate to issue an order to immediately vacate the road and open it for public?

(8) Does the HC/SC understand that HC/SC agrees that the protesters have absolute right to fully occupy public road and public property and also to deny others to use it as if the property is their own private property?

(9) Does the HC/SC understand that to vacate the said public property, which is fully occupied by the protesters since several months and they have prevented others from the usage, should not be got vacated for public use? Has the HC/SC any justification which has convinced the HC/SC from giving an interim order of vacation of the road to enable the public to use it?

(10) Does the HC/SC want to allow the protesters to use it for protests and to allow to play the kids, the kid brought to protest by the women protesters, and to sell eatables by hawkers to feed protesters?

(11) Does the HC/SC is of the opinion that even the case of the issue is sub judicial, the protesters’ protest should not be stopped?

(12) Does the HC/SC is of the opinion that the protesters are not supposed to make their opinion to public with justification, because the public has no right to know the justification of their protests?

(13) Is it that the HC/SC has been convinced to the priority to try out the suggestion to allow mediators to talk to the protesters, instead of calling the protesters to present themselves before court or asking the protesters to vacate the space for public usage immediately?

(14) Is it that the HC/SC is of the of the opinion that now on wards, any lot, can protest, against any act of the Government, with an absolute right for selecting public place with unlimited period of time including the place the Airports  air strips and runways?    

If the practical action of the HC/SC till date is affirmative, then

Is there not any scope to receive a message by the public that the integrity of SC/HC is not beyond doubt?

Shirish Mohanlal Dave

Read Full Post »

कहीं भी, कुछ भी कहेनेकी सातत्यपूर्ण स्वतंत्रता – ३

कहीं भी, कुछ भी कहेनेकी सातत्यपूर्ण स्वतंत्रता – ३

गांधीका खूनी कोंगी है

शाहीन बाग पदर्शनकारीयोंका संचालन करनेवाली गेंग है वह अपनेको महात्मा गांधीवादी समज़ती है. कोंगी लोग और उनके सांस्कृतिक समर्थक भी यही समज़ते है.. इन समर्थकोमें समाचार माध्यम और उनके कटारलेखकगण ( कोलमीस्ट्स) भी आ जाते है.

ये लोग कहते है, “आपको प्रदर्शन करना है? क्या लोक शाही अधिकृत मार्गसे प्रदर्शन करना  है? तो गांधीका नाम लो … गांधीका फोटो अपने हाथमें प्रदर्शन करनेके वख्त रक्खो… बस हो गये आप गांधीवादी. ”

कोंगी यानी नहेरुवीयन कोंग्रेस [इन्दिरा नहेरुघांडी कोंग्रेस I.N.C.)] और उनके सांस्कृतिक साथीयोंकी गेंगें यह समज़ती है कि गांधीकी फोटो रक्खो रखनेसे आप गांधीजीके समर्थक और उनके मार्ग पर चलनेवाले बन जाते है. आपको गांधीजी के सिद्धांतोको पढने की आवश्यकता नहीं.

गांघीजीके नाम पर कुछ भी करो, केवल हिंसा मत करो, और अपनेको गांधी मार्ग द्वारा  शासन का प्रतिकार करनेवाला मान लो. यदि आपके पास शस्त्र नहीं है और बिना शस्त्र ही प्रतिकार कर रहे है तो आप महात्मा गांधीके उसुलों पर चलने वाले हैं मतलब कि आप गांधीवादी है.

देशके प्रच्छन्न दुश्मन भी यही समज़ते है.

हिंसक शस्त्र मत रक्खो. किन्तु आपके प्रदर्शन क्षेत्रमें यदि कोई अन्य व्यक्ति आता है तो आप लोग अपने बाहुओंका बल प्रयोग करके उनको आनेसे रोक सकते हो. यदि ऐसा करनेमें उसको प्रहार भी हो जाय तो कोई बात नहीं. उसका कारण आप नहीं हो. जिम्मेवार आपके क्षेत्रमें आने वाला व्यक्ति स्वयं है. आपका हेतु उसको प्रहार करनेका नहीं था. आपके मनाकरने पर भी, उस व्यक्तिने  आपके क्षेत्रमें आनेका प्रयत्न किया तो जरा लग गया. आपका उसको हताहत करनेका हेतु तो था ही नहीं. वास्तवमें तो हेतु ही मुख्य होता है न? बात तो यही है न? हम क्या करें?

शाहीन बागके प्रदर्शनकारीयोंको क्या कहा जाय?

लोकशाहीके रक्षक कहा जाय?

अहिंसक मार्ग द्वारा प्रदर्शन करने वाले कहा जाय?

निःशस्त्र क्रांतिकारी प्रदर्शनकारी कहा जाय?

गांधीवादी कहा जाय?

लोकशाहीके रक्षक तो ये लोग नहीं है.

इन प्रदर्शनकारीयोंका विरोध “नया नागरिक नियम”के सामने है.

इन प्रदर्शनकारीयोंका विरोध राष्ट्रीय नागरिक पंजिका (रजीस्टर) बनानेके प्रति है.

इन प्रदर्शन कारीयोंका विरोध राष्ट्रीय जनगणना पंजिका बनानेके प्रति है.

ये प्रदर्शनकारी और कई मूर्धन्य लोग भी मानते है कि प्रदर्शन करना जनताका संविधानीय अधिकार है. और ये सब लोकशाहीके अनुरुप और गांधीवादी है. क्यों कि प्रदर्शनकारीयोंके पास शस्त्र नहीं है इसलिये ये अहिंसक है. अहिंसक है इसलिये ये महात्मा गांधीके सिद्धांतोके अनुरुप है.

इन प्रदर्शन कारीयोंमें महिलाएं भी है, बच्चे भी है. शिशु भी है. क्यों कि इन सबको विरोध करनेका अधिकार है.

इन विरोधीयोंके समर्थक बोलते है कि यह प्रदर्शन दिखाते है कि अब महिलाएं जागृत हो गई हैं. अब महिलायें सक्रिय हो गई हैं, बच्चोंका भी प्रदर्शन करनेका अधिकार है. इन सबकी आप उपेक्षा नहीं कर सकते. ये प्रदर्शन कारीयों के हाथमें भारतीय संविधानकी प्रत है, गांधीजीकी फोटो है, इन प्रदर्शनकारीयोंके हाथमें अपनी मांगोंके पोस्टर भी है. इनसे विशेष आपको क्या चाहिये?

वैसे तो भारतकी उपरोक्त गेंग कई बातें छीपाती है.

ये लोग मोदी-शाहको गोली मारने के भी सूत्रोच्चार करते है, गज़वाहे हिंदके सूत्रोच्चार भी करते है,      

यदि उपरोक्त बात सही है तो हमें कहेना होगा कि ये लोग या तो शठ है या तो अनपढ है. और इनका हेतु कोई और ही है.

निःशस्त्र और सत्याग्रह

निःशस्त्र विरोध और सत्याग्रहमें बडा भेद है. यह भेद न तो यह गेंग समज़ती है, न तो यह गेंग समज़ना चाहती है.

(१) निःशस्त्र विरोधमें जिसके/जिनके प्रति विरोध है उनके प्रति प्रेम नहीं होता है.

(२) निःशस्त्र विरोध हिंसक विरोधकी पूर्व तैयारीके रुपमें होता है. कश्मिरमें १९८९-९०में हिन्दुओंके विरोधमें सूत्रोच्चार किया गया था. जब तक किसी हिन्दु की हत्या नहीं हुई तब तक तो वह विरोध भी अहिंसक ही था. मस्जिदोंसे जो कहा जाता था उससे किसीकी मौत नहीं हुई थी. वे सूत्रोच्चार भी अहिंसक ही थे. वे सब गांधीवादी सत्याग्रही ही तो थे.

(३) सत्याग्रहमें जिनके सामने विरोध हो रहा है उसमें उनको या अन्यको दुःख देना नहीं होता है.

(४) सत्याग्रह जन जागृति के लिये होता है और किसीके साथ भी संवाद के लिये सत्याग्रहीको तयार रहेनेका होता है.

(५) सत्याग्रही प्रदर्शनमें सर्वप्रथम सरकारके साथ संवाद होता है. इसके लिये सरकारको लिखित रुपसे और पारदर्शिता के साथ सूचित किया जाता है. यदि सरकारने संवाद किया और सत्याग्रहीके तर्कपूर्ण चर्चाके मुद्दों पर   यदि सरकार उत्तर नहीं दे पायी, तभी सत्याग्रहका आरंभ सूचित किया जा सकता है.

(६) सत्याग्रह कालके अंतर्गत भी सत्याग्रहीको संवादके लिये तयार रहना अनिवार्य है.

(७) यदि संविधानके अंतर्गत मुद्दा न्यायालयके आधिन होता है तो सत्याग्रह नहीं हो सकता.

(८) जो जनहितमें सक्रिय है उनको संवादमें भाग लेना आवश्यक है.

शाहीन बाग या अन्य क्षेत्रोंमे हो रहे विरोधकी स्थिति क्या है?

(१) प्रदर्शनकारीयोंमे जो औरतें है उनको किसीसे बात करनेकी अनुमति नहीं. क्यों कि जो गेंग, इनका संचालन कर रहा है, उसने या तो इन प्रदर्शनकारीयोंको समस्यासे अवगत नहीं कराया, या गेंग स्वयं नहीं जानती है कि समस्या क्या है? या गेंगको स्वयंमें आत्मविश्वासका अभाव है. वे समस्याको ठीक प्रकारसे समज़े है या तो वे समज़नेके लिये अक्षम है.

(२) प्रदर्शनकारी और उनके पीछे रही संचालक गेंग जरा भी पारदर्शी नहीं है.

(३) प्रदर्शनकारीयोंको और उनके पीछे रही संचालक गेंग को सरकारके प्रति प्रेम नहीं है, वे तो गोली और डंडा मारनेकी भी बातें करते हैं.

(४) प्रदर्शनकारीयोंको और उनके पीछे रही संचालक गेंगको गांधीजीके सत्याग्रह के नियम का प्राथमिक ज्ञान भी नहीं है, इसीलिये न तो वे सरकारको कोई प्रार्थना पत्र देते है न तो समाचार माध्यमके समक्ष अपना पक्ष रखते है.

(५) समस्याके विषयमें एक जनहितकी अर्जी की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालयमें है ही, किन्तु ये प्रदर्शनकारीयोंको और उनके संचालक गेंगोंको न्यायालय पर भरोसा नहीं है. उनको केवल प्रदर्शन करना है. न तो इनमें धैर्य है न तो कोई आदर है.

(६) कुछ प्रदर्शनकारी अपना मूँह छीपाके रखते है. इससे यह सिद्ध होता है कि वे अपने कामको अपराधयुक्त मानते है, अपनी अनन्यता (आईडेन्टीटी) गोपित रखना चाहते है ताकि वे न्यायिक दंडसे बच सकें. ऐसा करना भी गांधीजीके सत्याग्रहके नियमके विरुद्ध है. सत्याग्रही को तो कारावासके लिये तयार रहेना चाहिये. और कारावास उसके लिये आत्म-चिंतनका स्थान बनना चाहिये.

(७) इन प्रदर्शनकारीयोंको अन्य लोगोंकी असुविधा और कष्टकी चिंता नहीं. उन्होंने जो आमजनताके मर्गोंका अवैध कब्जा कर रक्खा है और अन्योंके लिये बंद करके रक्खा है यह एक गंभीर अपराध है. दिल्लीकी सरकार जो इसके उपर मौन है यह बात उसकी विफलता है या तो वह समज़ती है कि उसके लिये लाभदायक है. यह पूरी घटना जनतंत्रकी हत्या है.

(८) सी.ए.ए., एन.सी.आर. और एन.पी.आर. इन तीनोंका जनतंत्रमें होना स्वाभाविक है इस मुद्दे पर तो हमने पार्ट-१ में देखा ही है. वास्तवमें प्रदर्शनकारीयोंका कहेना यही निकलता है कि जो मुस्लिम घुसपैठी है उनको खूला समर्थन दो और उनको भी खूली नागरिकता दो. यानी कि, पडौशी देश जो अपने संविधानसे मुस्लिम देश है, और अपने यहां बसे अल्पसंख्यकोंको धर्मके आधार पर प्रताडित करते है और उनकी सुरक्षा नहेरु-लियाकत करार होते हुए भी नहीं करते है और उनको भगा देते है. यदि पडौशी देशद्वारा भगाये गये इन बिन-मुस्लिमोंको भारतकी सरकार नागरिकत्त्व दे तो यह बात हम भारतीय मुस्लिमोंको ग्राह्य नहीं है.

मतलब कि भारत सरकारको यह महेच्छा रखनी नहीं चाहिये कि पाकिस्तान, नहेरु-लियाकत अली करारनामा का पाकिस्तानमें पालन करें.

हाँ एक बात अवश्य जरुरी है कि भारतको तो इस करारनामाका पालन मुस्लिम हितोंके कारण करना ही चाहिये. क्यों कि भारत तो धर्म निरपेक्ष है.

“हो सकता है हमारे पडौशी देशने हमसे करार किया हो कि, वह वहांके अल्पसंख्यकोंके हित और अधिकारोंकी रक्षा करेगा, चाहे वह स्वयं इस्लामिक देश ही क्यों न हो. लेकिन यदि हमारे पडौशी देशने इस करारका पालन नहीं किया. तो क्या हुआ? इस्लामका तो आदेश ही है कि दुश्मनको दगा देना मुसलमानोंका कर्तव्य है.

“यदि भारत सरकार कहेती है कि भारत तो ‘नहेरु-लियाकत अली करार’ जो कि उसकी आत्मा है उसका आदर करते है. इसी लिये हमने सी.ए.ए. बनाया है. लेकिन हम मुस्लिम, और हमारे कई सारे समर्थक मानते है कि ये सब बकवास है.

“कोई भी “करार” (एग्रीमेन्ट) का आदर करना या तो कोई भी न्यायालयके आदेशका पालन करना है तो सर्व प्रथम भारत सरकार को यह देख लेना चाहिये कि इस कानूनसे हमारे पडौशी देशके हमारे मुस्लिम बंधुओंकी ईच्छासे यह विपरित तो नहीं है न ! यदि हमारे पडौशी देशके हमारे मुस्लिम बंधुओंको भारतमें घुसनेके लिये और फिर भारतकी नागरिकता पानेके लिये अन्य प्रावधानोंके अनुसार प्रक्रिया करनी पडती है तो ये तो सरासर अन्याय है.

“हमारे पडौशी देश, यदि अपने संविधानके  विपरित या तो करारके विपरित आचार करें तो भारत भी उन प्रावधानोंका पालन न करें, ऐसा नहीं होना चाहिये. चाहे हमारे उन मुस्लिम पडौशी देशोंके मुस्लिमोंकी ईच्छा भारतको नुकशान करनेवाली हो तो भी हमारी सरकारको पडौशी देशके मुस्लिमोंका खयाल रखना चाहिये.

“भारत सरकारने, जम्मु – कश्मिर राज्यमें  कश्मिरी हिन्दुओंको जो लोकशाही्के आधार पर नागरिक अधिकार दिया. यह सरासर हम मुस्लिमों पर अन्याय है. आपको कश्मिरी हिन्दुओंसे क्या मतलब है?

“हमारा पडौशी देश यदि अपने देशमें धर्मके आधार पर कुछ भी करता है तो वह तो हमारे मुल्लाओंका आदेश है. मुल्ला है तो इस्लाम है. मतलब कि यह तो इस्लामका ही आदेश है.

भारतने पाकिस्तान से आये धर्मके आधार पर पीडित बीन मुस्लिमोंको नागरिक  अधिकार दिया उससे हम मुस्लिम खुश नहीं. क्यों कि भारत सरकारने हमारे पडौशी मुस्लिम देशके मुस्लिमोंको तो नागरिक अधिकार नहीं दिया है. भारत सरकारने  लोकशाहीका खून किया है. हम हमारे पडौशी देशके मुस्लिमोंको भारतकी नागरिकता दिलानेके लिये अपनी जान तक कुरबान कर देंगे. “अभी अभी ही आपने देखा है कि हमने एक शिशुका बलिदान दे दिया है. हम बलिदान देनेमें पीछे नहीं हठेंगे. हमारे धर्मका आदेश है कि इस्लामके लिये जान कुरबान कर देनेसे जन्नत मिलता है. “हम तो मृत्युके बादकी जिंदगीमें विश्वास रखते है. हमें वहा सोलह सोलह हम उम्रकी  हुरें (परीयाँ) मिलेगी. वाह क्या मज़ा आयेगा उस वख्त! अल्लाह बडा कदरदान है.

“अय… बीजेपी वालों और अय … बीजेपीके समर्थकों, अब भी वख्त है. तुम सुधर जाओ. अल्लाह बडा दयावान है. तुम नेक बनो. और हमारी बात सूनो. नहीं तो अल्लाह तुम्हे बक्षेगा नहीं.

“अय!  बीजेपीवालो और अय … बीजेपीके समर्थकों, हमें मालुम है कि तुम सुधरने वाले नहीं है. अल्लाह का यह सब खेल है. वह जिनको दंडित करना चाहता है उनको वह गुमराह करता है. “लेकिन फिर भी हम तुम्हें आगाह करना चाहते है कि तुम सुधर जाओ. ता कि, जब कयामतके दिन अल्लाह हमें पूछे कि अय इमान वाले, तुम भी तो वहां थे … तुमने क्या किया …? क्या तुम्हारा भी कुछ फर्ज था … वह फर्ज़ तुमने मेहसुस नहीं किया… ?

“तब हम भारतके मुस्लिम बडे गर्वसे अल्लाह को कहेंगे अय परवरदिगार, हमने तो अपना फर्ज खूब निभाया था. हमने तो कई बार उनको आगाह किया था कि अब भी वखत है सुधर जाओ … लेकिन क्या करें …

“अय खुदा … तुम हमारा इम्तिहान मत लो.  जब तुमने ही उनको गुमराह करना ठान लिया था… तो तुमसे बढ कर तो हम कैसे हो सकते? या अल्लाह … हम पर रहम कर … हम कुरबानीसे पीछे नहीं हठे. और अय खुदा … हमने तो केवल आपको खुश करने के लिये कश्मिर और अन्यत्र भी इन हिन्दुओंकी कैसी कत्लेआम की थी और आतंक फैलाके उनको उनके ही मुल्कमें बेघर किया था और उनकी औरतोंकी आबरु निलाम की थी … तुमसे कुछ भी छीपा नहीं है…

“ … अय खुदा ! ये सब बातें तो तुम्हें मालुम ही है. ये कोंगी लोगोंने अपने शासनके वख्त कई अपहरणोंका नाटक करके हमारे कई जेहादीयोंको रिहा करवाया था. यही कोंगीयोंने, हिन्दुओंके उपर, हमारा खौफ कायम रखनेके लिये, निर्वासित हिन्दुओंका पुनर्‌वास नहीं किया था. अय खुदा उनको भी तुम खुश रख. वैसे तो उन्होंने कुछ कुरबानियां तो नहीं दी है [सिर्फ लूटमार ही किया है], लेकिन उन्होंने हमे बहूत मदद की है.

“अय खुदा … तुम उनको १६ हुरें तो नहीं दे सकता लेकिन कमसे कम ८ हुरें तो दे ही सकता है. गुस्ताखी माफ. अय खुदा मुज़से गलती हो गई, हमने तो गलतीमें ही कह दिया कि तुम इन कोंगीयोंको १६ हुरे नहीं दे सकता. तुम तो सर्व शक्तिमान हो… तुम्हारे लिये कुछ भी अशक्य नहीं. हमें माफ कर दें. हमने तो सिर्फ हमसे ज्यादा हुरें इन कोंगीयोंको न मिले इस लिये ही तुम्हारा ध्यान खींचा था. ८ हुरोंसे इन कोंगीयोंको कम हुरें भी मत देना क्यों कि ४/५ हुरें तो उनके पास पृथ्वी पर भी थी. ४/५ हुरोंसे यदि उनको कम हुरें मिली तो उनका इस्लामके जन्नतसे विश्वास उठ जायेगा. ये कोंगी लोग बडे चालु है. अय खुदा, तुम्हे क्या कहेना! तुम तो सबकुछ जानते हो. अल्ला हु अकबर.

शिरीष मोहनलाल दवे

चमत्कृतिः

एक कोंगी नेताने मोदीको बडा घुसपैठी कहा. क्यों कि मोदी गुजरातसे दिल्ली आया. मतलब कि गुजरात भारत देशके बाहर है.

एक दुसरे कोंगी नेताने कहा कि मोदी तो गोडसे है. गोडसेने भी गांधीकी हत्या करनेसे पहेले उनको प्रणाम किया था. और मोदीने भी संविधानकी हत्या करनेसे पहेले संसदको प्रणाम किया था.

शिर्ष नेता सोनिया, रा.गा. और प्री.वा.  तो मोदी मौतका सौदागर है, मोदी चोर है इसका नारा ही लगाते और लगवाते है वह भी बच्चोंसे.

Read Full Post »

कहीं भी, कुछ भी कहेनेकी सातत्यपूर्ण स्वतंत्रता – २

कहीं भी, कुछ भी कहेनेकी सातत्यपूर्ण स्वतंत्रता – २

नज़ारा ए शाहीन बाग

कोंगी लोग सोच रहे है कि अब हम मर सकते है. अब हमे अंतीम निर्णय लेना पडेगा. इसके सिवा हमारा उद्धार नहीं है. यदि हम ऐसे ही समय व्यतीत करते रहे … नरेन्द्र मोदी और बीजेपी को गालियां देतें रहें तो ये सब प्रर्याप्त नहीं है.

यह तो हमने देख ही लिया कि, जो न्यायिक प्रक्रिया चल रही है उसमें हमारी लगातार हार हो रही है.  हमारे लिये कारावासके अतिरिक्त कोई स्थान नहीं. यदि हम सब नेतागण कारावासमें गये तो कोई हमारा ऐसा नेता नहीं बचा है जो हमारे पक्षको जीवित रख सकें और हमे कारावाससे बाहर निकाल सके. हमने पीछले ७० सालमें जो सेक्युलर, जनतंत्र और भारतीय इतिहास को तो छोडो, किन्तु जो नहेरु और नहेरुवीयनोंके विषयमें जूठ सिखाया है और पढाया है, उसका पर्दा फास हो सकता है.

अब हमारे पास तीन रास्ते है.

नवजोत सिध्धु, मणीशंकर अय्यर और शशि थरुर जैसे लोग यदि भारत में काममें न आये तो वे पाकिस्तानमें तो काममें आ ही सकते है. हमारे मुस्लिम लोगोंके कई रीस्तेदार पाकिस्तानमें है. इस लिये पाकिस्तानके उन रीस्तेदारों द्वारा हम भारतके मुस्लिमोंको उकसा सकते है. बोलीवुडके कई नामी लोग हमारे पक्षमें है और वे तो दाउदके पे रोल पर है. इस लिये ये लोग भी बीजेपीके विरुद्धमें वातावरण बनानेमें काममें आ सकते है. इस परिबल को हमें उपयोगमें लाना पडेगा. अभी तक तो हमने इनका छूटपूट उपयोग किया है लेकिन यह छूटपूट उपयोगसे कुछ होने वाला नहीं हैं.    

(१) मुस्लिम जनतासे हमें कुछ बडे काम करवाना है.

(२) जिन समाचार माध्यमोंने हमारा लुण खाया है उनसे हमे किमत वसुल करना है. यह काम इतना कठिन नहीं है क्यों कि हमारे पास उनकी ब्लेक बुक है. हमने इनको हवाई जहाजमें बहूत घुमाया है … विदेशोंकी सफरोंमे शोपींग करवाया है, फाईवस्टार होटलोंमें आरामसे मजा करवाया है, जो खाना है वो खाओ, जो पीना है वह पीओ, जहां घुमना हैं वहा घुमो … इनकी कल्पनामें न आवे ऐसा मजा हमने उनको करवाया है और इसी कारण वे भी तो नरेन्द्र मोदी से नाराज है तो वैसे भी हम उनका लाभ ले सकते है. और हम देख भी रहे है कि वे बीजेपीकी छोटी छोटी माईक्रोस्कोपिक तथा कथित गलतीयोंको हवा दे रहे है जैसे की पीएम और एच एम विरोधाभाषी कथन बोल रहे है, अर्थतंत्र रसाताल गया है, अभूत पूर्व बेकारी उत्पन्न हो गयी है, जीडीपी खाईमें गीर गया है, किसान आत्म हत्या कर रहा है, देश रेपीस्तान बन गया है …. और न जाने क्या क्या …?

(३) क्या मूर्धन्य लोगोंको हम असंजसमें डाल सकते हैं? जी हाँ. यदि मुसलमान लोग अपना जोर दिखाएंगे और हला गुल्ला करेंगे तो ये लोग अवश्य इस निष्कर्स पर पहोंचेंगे कि यह सब अभी ही क्यों हो रहा है …? पहेले तो ऐसा नहीं होता था …!! कुछ तो गडबड है …!! गुजरातीमें एक कहावत है “हलकुं लोहीं हवालदारनुं” मतलब की हवालदार ही जीम्मेवार है.

शशि थरुर और राजदीप सरदेसाई के वाणी विलासको तो हम समज़ सकते है कि उनका तो एक एजन्डा है कि नरेन्द्र मोदी/बीजेपीके बारेमें अफवाहें फैलाओ और एक ॠणात्मक हवा उत्पन्न करो तो जनता बीजेपीको हटाएगी. इन लोगोंसे जनता तटस्थता की अपेक्षा नहीं रखती.

अब देखो हमारे मूर्धन्य कटारीया लोग [कटारीया = कटार (कोलम) अखबारकी कोलमोंमें लिखने वाला यानी कोलमीस्ट)] क्या लिखते है?

प्रीतीश नंदीः

“घर छोडके विकास तो भाग गया है” “बीजेपी द्वारा हररोज मुश्केलियां उत्पन्न की जाती है”, यह मुश्केलियां हिंसक भी होती है”, “आखिरमें हमने इस सरकारको वोट क्यों दिया?” “हर महत्त्वकी बातको सरकार भूला देती है” “पागलपन, बेवकुफी भरी उत्तेजना सरकार फैला रही है”, “बीजेपीने चूनावमें बडे बडे वचन दिये थे”, “बीजेपीने चूनावमें युपीएके सामने कुछ सही और कुछ काल्पनिक कौभाण्ड  उजागर करके  सत्ता हांसिल की थी,” “प्रजाकी हालत “हिरन जैसी थी” … “नरेन्द्र मोदीके आक्रमक प्रचारमें जनता फंस गई थी”, “नरेन्द्र मोदीने इस फंसी हुई जनताका पूरा फायदा उठाया” और “मनमोहन जैसे सन्मानित और विद्वान व्यक्तिको  ऐसा दिखाय मानो वे दुष्ट और भ्रष्टाचारी …” “ कारोबारीयोंका संचालन कर रहे हो” “छात्रोंके नारोंकी ताकतको कम महत्त्व नहीं देना चाहिए.”

इस प्रीतीश नंदीकी अक्लका देवालीयापन देखो. वे पाकिस्तानके झीया उल हक्कके कालका एक कवि जो झीयाके विरुद्ध था, उसकी एक कविताका  उदाहरण देते है “हम देखेंगे …”. इसका नरेन्द्र मोदीके शासनके कोई संबंध नहीं. फिर भी यह कटारीया [कटारीया = कटार (कोलम) अखबारकी कोलमोंमें लिखने वाला कोलमीस्ट)] उसको उद्धृत करते है और मोदीको भय दिखाता है कि इस कविकी इस कवितासे लाखो लोग खडे हो जाते है.

यह कटारीयाजी इस काव्यका विवरण करते है. और कहेते है कि हे नरेन्द्र मोदी तुम्हारे सामने भी लाखो लोग खडे हो जायेंगे. फिर यह कटारीयाजी ढाकाके युवानोंका उदाहरण देते है. उनका भी लंबा चौडा विवरण देते है.

क्या बेतुकी बात करते है ये कटारीया नंदी. नंदी कटारीया का अंगुली निर्देश जे.एन.यु. के युवाओंके प्रति है. नंदी कटारीया, जे.एन.यु. के किनसूत्रोंको महत्त्व देना चाहते है? क्या ये सूत्र जो अर्बन नक्षल टूकडे टूकडे गेंग वाले थे?  क्या जे.एन.यु. अर्बन नक्षल वाले ही युवा है? बाकिके क्या युवा नहीं है? अरे भाई अर्बन नक्षल वाले तो ५% ही है. और वे भी युवा है या नहीं यह संशोधनका विषय है. ये कौनसी चक्कीका आटा खाते है कि उनको चालीस साल तक डॉक्टरेट की डीग्री नहीं मिल पाती? जरा इसका भी तो जीक्र करो, कटारीयाजी!!! 

नंदी कटारीयाजीका पूरा लेख ऐसे ही लुज़ टोकींगसे भरा हुआ है. तर्ककी बात तो अलग ही रही, लेकिन इनके लेखमें किसी भी प्रकारका मटीरीयल भी आपको मिलेगा नहीं.

यदि सही ढंगसे सोचा जाय तो प्रीतीश नंदीके इस लेखमें केवल और केवल वाणी विलास है. अंग्रेजीमें इनको “लुज़ टोकींग”कहा जाता है. कोंगी नेतागण लुज़ टॉकींग करे, इस बातको तो हम समज़ सकते है क्यों कि उनकी तो यह वंशीय आदत है.

शेखर गुप्ता (कटारीया)

शेखर गुप्ता क्या लिखते है?

मोदीने किसी प्रदर्शनकारीयोंके जुथको देखके ऐसा कहा कि “उनके पहेनावासे ही पता लग जाता है कि वे कौन है?”

यदि कोई मूँह ढकके सूत्र बाजी या तो पत्थर बाजी करता है तो;

एक निष्कर्ष तो यह है कि वह अपनी पहेचान छीपाना चाहता है, इससे यह भी फलित होता है कि वह व्यक्ति जो कर रहा है वह काम अच्छा नहीं है किन्तु बूरा काम कर रहा है.

दुसरा निष्कर्ष यह निकलता है कि वह अपराधवाला काम कर रहा है. अपराध करनेवालेको सज़ा मिल सकती है. वह व्यक्ति सज़ासे बचनेके लिये मूँह छीपाता है.

तीसरा निष्कर्ष में पहनावा है.  पहनावेमें तो पायजामा और कूर्ता आम तौर पर होता ही है. यह तो आम जनता या कोई भी अपनेको आम दिखानेके लिये पहेनेगा ही.

लेकिन हमारे शे.गु.ने यह निष्कर्ष  निकाला की नरेन्द्र मोदीने मुस्लिमोंके प्रति अंगूली निर्देश किया है. इस लिये मोदी कोम वादी है और मोदी कोमवादको बढावा देता है. शे.गु. कटारीयाका ऐसा संदेश जाता है.

शे.गु.जी ऐसा तारतम्य निकालनेके लिये, अरुंधती रोय और माओवादी जुथके बीचके डीलका उदाहरण देते है. गांधीवाद और माओवाद का समन्वय किस खूबीसे अरुंधती रोय ने किया है कि शे.गु.जी आफ्रिन हो गये. शे.गु.जी कहेते है कि, क्यूं कि प्रदर्शनकारी पवित्र मस्जिदमेंसे आ रहे है, क्यूँ कि उनके हाथमें त्रीरंगा है, क्यूँ कि वे राष्ट्रगान गा रहे है, क्यूँ कि उनके पास महात्मा गांधीकी फोटो है, क्यूं कि उनके पास आंबेडकर की फोटो है … आदि आदि .. शे.गु. जी यह संदेश भी देना चाहते है कि ये बीजेपी सरकार लोग चाहे कितनी ही बहुमतिसे निर्वाचित सरकार क्यूँ न हो इन (मुस्लिमों)के प्रदर्शनकी उपेक्षा नहीं करना चाहिये.

वास्तवमें शे.गु.जीको धैर्य रखना चाहिये. रा.गा.की तरह, बिना धैर्य रक्खे, शिघ्र ही कुछ भी बोल देना, या तो बालीशता है या तो पूर्वनियोजित एजन्डा है. तीसरा कोई विकल्प शे.गु. कटारीयाके लिये हो ही नहीं सकता.

शे.गु.जी ने आगे चलकर भी वाणी विलास ही किया है.

चेतन भगतः

चेतन भगत भी एक कटारीया है. वे लिखते है कि

“उदार मानसिकतासे ही विकास शक्य है.”

“हम चोकिदार कम और भागीदार अधिक बनें, इससे देश शानदार बनेगा”

श्रीमान चे.भ. जी (चेतन भगत जी), भी एक बावाजी ही है क्या? बावाजी से मतलब है संत रजनीश मल, ओशो आसाराम. बावाजी है तो उदाहरण तो देना ही आवश्यक बनता है न!! वे अपने बाल्यावस्थाका उदाहरण देते है. वे फ्रीज़ और नौकरानीका और बील गेट्सका उदाहरण देते है. परोक्ष में “चे.भ.”जी मोदीजी की मानसिकता अन्यों के प्रति अविश्वासका भाव है. फिर उन्होंने कह दिया कि, नरेन्द्र मोदीने कुछ नियम ऐसे बनाये कि लोग भारतमें निवेश करने से डरते है. कौनसे नियम? इस पर चे.भ.जी मौन है. शायद उनको भी पता नहीं होगा.

चे.भ.जी अपनी कपोल कल्पित तारतम्य को स्वयं सिद्ध मानकर मोदीकी बुराई करते है.

“मुस्लिमोके विरुद्ध हिन्दुओंमें गुस्सा है. इसका कारण हिन्दुओंकी संकुचित मानसिकता है.

“अप्रवासीयोंपर हुए हमले भी हिन्दुओंकी संकुचित मानसिकता कारण भूत है,

“मुस्लिमोंको बहुत कुछ दे दिया है, अब वह वापस ले लेना चाहिये,

“मुस्लिमोंका बहुत तुष्टीकरण किया है अब उनको लूट लेना चाहिये

चे.भ.जी इस बातको समज़ना नहीं चाहते कि, किसी भी जनसमुदायमें कुछ लोग तो कट्टर विचारधारा वाले होते ही है. लेकिन किस समुदायमें इस कट्टरतावादी लोगोंका प्रमाण क्या है? इतनी विवेकशीलता तो मूर्धन्य कटारीयाओंमें होना आवश्यक है. लेकिन इन कटारीयाओंमे विवेक हीनता है. तुलनात्मक विश्लेषणके लिये ये कटारीया लोग अक्षम ही नहीं अशक्त है. वे समज़ते है “… वाह हमने क्या सुहाना शब्द प्रयोग किया है. फिलोसोफिकल वाक्य बोलो तो हमारी सत्यता अपने आप सिद्ध हो जाती है…”चे.भ.जी जैसे लोगोंको तुलनात्मक सत्य दिखायी ही नहीं देता है.

कोंगी और उनके सांस्कृतिक साथी

कोंगी और उनके सांस्कृतिक साथी पक्षोंके शिर्ष नेताओंके उच्चारणोंको देख लो. “चोकिदार चोर है, नरेन्द्र मोदी नीच है, नरेन्द्र मोदीको डंडा मारो, नरेन्द्र मोदी फासीस्ट है, नरेन्द्र मोदी हीटलर है, नरेन्द्र मोदी खूनी है, बीजेपी वाले आर.एस.एस.वादी है, वे गोडसे है…” न जाने क्या क्या बोलते है. पक्षके प्रमुख और मंत्री रह चूके और सरकारी  पद पर रहेते हुए भी उन्होंने ऐसे उच्चारण किये है. लेकिन ये उपरोक्त मूर्धन्य कटारीया लोग इन उच्चारणों पर मौन धारण करते है. उनका जीक्र तक नहीं करतें.

आखिर ऐसा क्यूँ वे लोग ऐसा करते हैं?

यदि बीजेपीके या तो आर.एस.एस.के तृतीय कक्षाके लोग उपरोक्त उच्चारणोसे कम भी बोले तो ये लोग बडे बडे निष्कर्ष निकालते है. अपना कोरसगान (सहगान) चालु कर देते हैं.     

अपराध कब सिद्ध होता है?

“आप अपनी धारणाओंके आधार पर किसीको दोषी करार न ही दे सकते. न्यायिक प्रक्रियाके सिद्धांतोसे यह विपरित है. किसीको भी दोषी दिखानेके लिये आप अपनी मनमानी और धारणाओंका उपयोग नहीं कर सकते. किन्तु महान नंदीजी, शे.गु.जी, चे.भ. जी … आदि क्यूँ कि उनका एजन्डा कुछ और ही है, वे ऐसा कर सकते है. कोंगी लोग यही तो चाहते है.

इन कटारीया लोगोंको वास्तवमें पेटमें दुखता है क्या?

वास्तवमें कोंगी लोग और उनके सहयोगी लोग समज़ गये है कि,

नरेन्द्र मोदी, और भी समस्याएं हल कर सकता है. वैसे तो, जी.एस.टी. तो हमारा ही प्रस्ताव था, “विमुद्रीकरण करना” इस बातको तो हम भी सोच रहे थे, पाकिस्तानमें अल्पसंख्यकों की सुरक्षा हो और वे पीडित होके भारतमें आवे तो, हमे उनको नागरिकता देनी है, यह बात भी हमारे नहेरु-लियाकत अली समज़ौताका हिस्सा था, १९७१के युद्धसे संबंधित जो शरणार्थी प्रताडित होकर भारतमें आये उनमें जो पाकिस्तानके अल्पसंख्यक थे उनको नागरिकता देना, और बांग्लादेशके आये बिहारी मुस्लिमोंको वापस भेजना यह तो हमारे पक्षके प्रधान मंत्रीयोंका शपथ था.  किन्तु हममें उतनी हिंमत और प्रज्ञा ही नहीं थी कि हम अपने शपथोंको पुरा करे. मोदीके विमुद्रीकरण और जी.एस.टी.के निर्णयोंको तो हमने विवादास्पद बनाके विरोध किया और जूठ लगातार फैलाते रहे. बीजेपी के हर कदमका हम विरोध करेंगे चाहे वह मुद्दे हमारे शासनसे संलग्न क्यूँ न हो?

कोंगी और उनके साथी लोगोंको अनुभूति हो गई है कि, “अब तो मोदीने उन समस्याओंको हाथ पे ले लिया है जो हमने दशकों और पीढीयों तक अनिर्णित रक्खी”.

कोंगीने उनके सांस्कृतक साथी पक्षके नेतागणको आत्मसात्‌ करवा दिया है कि “मोदी सब कुछ कर सकता है. अब तक हम उसको हलकेमें ले रहे थे. किन्तु मोदी आतंकी गतिविधियोंको अंकूशमें रख सकने के अतिरिक्त और सर्जीकल स्ट्राईकके अतिरिक्त, अनुछेद ३७० और ३५ऍ तकको खतम कर सकता है. वह जम्मु – कश्मिर राज्यश्रेणी भी बदल सकता है. हमे खुलकर ही मुस्लिम नेताओंको और मुस्लिमोंको अधिकसे अधिक बहेकाना पडेगा.”

कोंगीके सांस्कृतिक साथी कौन कौन है?

कोंगी पक्ष कैसा है?

कोंगी वंशवादी है, वंशवादको स्थायी रखने के लिये अवैध मार्गोंसे संपत्तिकी प्राप्त करना पडता है, शठता करनी पडती है,

सातत्यसे जूठ बोलना पडता है,

असामाजिक तत्त्वोंको हाथ पर रखना पडता,

दुश्मनके दुश्मनको मित्र बनाना पडता है,

जनताको मतिभ्रष्ट और पथ भ्रष्ट करना पडता. और कई समस्याओंको अनिर्णायक स्थितिमें रखना पडता है चाहे ये अनिर्णायकता देशके लिये और आम जनताकाके लिये कितनी भी हानिकारक क्यूँ न हो!!

अनीतिमत्ता वंशवादका एक आनुषंगिक उत्पादन है.

कोंगी जैसा सांस्कृतिक चरित्र और किनका है?

 ममताका TMC, शरदका NCP, लालुका RJD, बाल ठकरे का Siv Sena, मुल्लायमका SP, शेख अब्दुल्लाके फरजंद फारुक अब्दुल्लाका N.C. और सबसे नाता जोडने और तोडने वाले साम्यवादी. अब हम इन सभी पक्षोंके समूह को कोंगी ही कहेंगे. क्योंकि इन सभीका काम येन केन प्रकारेण, बिना साधन शुद्धिसे, बिना देशके हितकी परवाह किये नरेन्द्र मोदी/बीजेपी को फिलहाल को बदनाम करो.

संवाद मत करो और तर्कयुक्त चर्चा मत करो केवल शोर मचाओ

संवाद करेंगे तो सामनेवाला तर्क करेगा. इस लिये संवाद मत करो, बार बार जूठ बोलो, असंबद्ध उदाहरण दो, सब नेता सहगान करो.

कहो… मोदी चोर है. अपने अनपढ श्रोताओंसे सूत्रोच्चार करवाओ मोदी चोर है. मोदीको चोरे सिद्ध करनेके लिये सबूत सामग्री की आवश्यकता नहीं.

मोदी हीटलर है.  सिद्ध करनेके लिये सबूत सामग्री की आवश्यकता नहीं.

मोदी खूनी है… सिद्ध करनेके लिये सबूत सामग्री की आवश्यकता नहीं.

बीजेपी लोग गोडसे है. चाहे गोडसे आर.एस.एस. का सदस्य न भी हो तो भी. हमें क्या फर्क पडता है!!!  सिद्ध करनेके लिये सामग्री की आवश्यकता नहीं.

विमूद्रीकरणमें मोदीने सेंकडो लोगोंको लाईनमें खडा करके मार दिया. बोलनेमें क्या हर्ज है? (वचनेषु किं दरिद्रता?). सिद्ध करनेके लिये सामग्री की आवश्यकता नहीं.

जी.एस.टी. गब्बर सींग टेक्ष है. (चाहे वह हमारा ही प्रस्ताव क्यों न हो. किन्तु हममें उतना नैपूण्य कहाँ कि हम उसको लागु करें). यह सब चर्चा करना कहाँ आवश्यक है? सिद्ध करनेके लिये सबूत सामग्री की आवश्यकता नहीं.

“भारतीय संविधान”को हमारे पक्षमें घसीटो, “मानव अधिकार और फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन” को भी हमारे पक्षमें घसीटो, रास्ता रोको, लगातार रास्ता रोको, आग लगाओ, फतवे निकालो, जनताको हो सके उतनी असुविधाओंमें डालो, कुछ भी करो और सब कुछ करो … मेसेज केवल यह देना है कि यह सब मोदीके कारण हो रहा है.

यदि इतना जूठ बोलते है तो “महात्मा गांधी”को भी हमारे पक्षमें घसीटो. गांधीजीका नाम लेके यह सब कुछ करो.

कोंगीयों द्वारा गांधीका एकबार और खून

कोंगीओंको, उनके सांस्कृतिक साथीयों और समाचार माध्यमोंके मालिकोंको भी छोडो, भारतमें विडंबना यह है कि अब मूर्धन्य कटारीया लोग भी ऐसा समज़ने लगे है कि अहिंसक विरोध और महात्मा गांधीके सिद्धांतों द्वारा विरोध ये दोनों समानार्थी है.

महात्मा गांधीके अनुसार विरोध कैसे किया जाता है?

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

https://www.treenetram.wordpress.com 

Read Full Post »

कहीं भी, कुछ भी कहेनेकी सातत्यपूर्ण स्वतंत्रता? (भाग-१)

कहीं भी, कुछ भी कहेनेकी सातत्यपूर्ण स्वतंत्रता? (भाग-१)

“स्वतंत्रता” शब्द पर अत्याचार

paise pe paisa

हमारा काम केवल प्रदर्शन करना है चर्चा नहीं

हमें चाहिये आज़ादी केवल प्रदर्शन के लिये 

कोंगी तो कोमवादी और उन्मादी (पागल) है. साम्यवादीयोंकी तो १९४२से ऐसी परिस्थिति है. किन्तु इन दोनोंमें भेद यह है कि साम्यवादी लोग तो १९४२के पहेलेसे उन्मादी है. उनके कोई सिद्धांत नहीं होते है. वे तो अपनी चूनावी कार्यप्रणालीमें प्रकट रुपसे कहेते है कि यदि आप सत्तामें नहीं है, तो  जनताको विभाजित करो, अराजकता पैदा करो, लोगोंमें  भ्रामक प्रचार द्वारा भ्रम फैलाओ, उनको असंजसमें डालो, और जनतंत्रके नाम पर जनतंत्रके संविधानके प्रावधानोंका भरपूर लाभ लो और तर्कको स्पर्ष तक मत करो. यदि आप सत्तामें है तो असंबद्ध और फर्जी मुद्दे उठाके जनतामें  अत्यधिक ट्रोल करो और  स्वयंने किये हुए निर्णय कितने महत्त्वके है वह जनताको दिखाके भ्रम फैलाओ. पारदर्शिता तो साम्यवादीयोंके लहुमें नहीं है. उनकी दुनियानें तो सब कुछ “नेशनल सीक्रेट” बन जाता है. समाचार माध्यमोंको तो साम्यवादी सरकार भेद और दंडसे अपने नियंत्रणमें रखती है. “भयादोहन (ब्लेक मेल)” करना और वह भी विवादास्पद बातोंको हवा देना आम बात है.

उन्नीसवी शताब्दीके उत्तरार्धमें और बीसवीं शातब्दीके पूर्वार्धमें युवावर्गमें “समाजवादी होना” फैशन था. युवा वर्गको अति आसानीसे पथभ्रष्ट किया जा सकता है. उनके शौक, आदतें बदली जा सकती है. उनको आसानीसे  प्रलोभित किया जा सकता है.

युवा वर्ग आसानीसे मोडा जा सकता है

आज आप देख रहे है कि सारी दुनियाके युवावर्गने दाढी रखना चालु कर दिया है. (वैसे तो नरेन्द्र मोदी भी दाढी रखते है. किन्तु वे तो ४० वर्ष पूर्वसे ही दाढी रखते है). बीस सालसे नरेन्द्र मोदी प्रख्यात है. किन्तु युवावर्गने दाढी रखनेकी फैशन तो दो वर्षसे चालु की है. और दाढीकी फैशन महामारीसे भी अधिक त्वरासे  फैल गयी है. सारे विश्वके युवा वर्ग दाढीकी फैशनके दास बन गये है. यही बात प्रदर्शित करती है कि युवा वर्ग कितनी त्वरासे फैशनका दासत्व स्विकार कर लेता है.

उसको लगता है कि वे यदि फैशनकी दासताका स्विकार नहीं करेगा तो वह अस्विकृतिके संकटमें पड जाएगा. ऐसी मानसिकताको “क्राईसीस ऑफ आडेन्टीफीकेशन” कहा जाता है.

छोडो यह बात. इनकी चर्चा हम किसी और समय करेंगे.

हमारे नहेरुजी भी समाजवाद (साम्यवाद)के समर्थक थे और साम्यवादीयोंके भक्त थे.

नहेरु न तो महात्मा गांधीके सर्वोदय-वादको समज़ पानेमें सक्षम थे न तो वे अपना समाजवाद महात्मा गांधीको समज़ानेके लिये सक्षम थे. गांधीजीने स्वयं इस विषयमें कहा था कि उनको जवाहरका समाजवाद समज़में नहीं आता है. नहेरु वास्तवमें अनिर्णायकता के कैदी  थे. जब प्रज्ञा सक्षम नहीं होती है, स्वार्थ अधिक होता है तो व्यक्ति तर्कसे दूर रहेता है. वह केवल अपना निराधार तारतम्य ही बताता है. नहेरु कोई निर्णय नहीं कर सकते थे क्यों कि उनकी विवेकशीलतासे कठोर समस्याको समज़ना उनके लिये प्राथमिकता नहीं थी. इस लिये वे पूर्वदर्शी नहीं थे. निर्णायकतासे अनेक समस्याएं उत्पन्न होती है. कोई भी एक समस्यामें जब प्रलंबित अनिर्णायकता रहती है तब उसको दूर करना असंभवसा बन जाता है.

नहेरुकी अनिर्णायक्तासे कितनी समस्या पैदा हूई?

कश्मिर, अनुच्छेद ३७०/३५ए को हंगामी के नाम पर संविधानमें असंविधानिक रीतिसे समावेश करना और फिर “हंगामी”शब्द को दूर भी नहीं करना और इसके विरुद्ध का काम भी नहीं करना, यह स्थिति नहेरुकी  घोर अनिर्णायकताका उदाहरण है. कश्मिरमें जनतंत्रको लागु करनेका काम ही नहीं करना, यह कैसी विडंबना थी? नहेरुने इस समस्याको सुलज़ाया ही नही.

अनुच्छेद ३७० कश्मिरको (जम्मु कश्मिर राज्यको) विशेष स्थिति देता है. किन्तु कश्मिरकी वह विशिष्ठ स्थिति क्या जनतंत्र के अनुरुप है?

नहीं जी. इस विशिष्ठ स्थिति जनतंत्रसे सर्वथा विपरित है. अनुछेद ३७० और ३५ए को मिलाके देखा जाय तो यह स्थिति जन तंत्रके मानवीय अधिकारोंका सातत्यपूर्वक हनन है. १९४४में ४४०००+ दलित  कुटुंबोको सफाई कामके लिये उत्तर-पश्चिम भारतसे बुलाया गया था. १९४७से पहेले तो कश्मिरमें जनतंत्र था ही नहीं. १९४७के बाद इस जत्थेको राज्यकी  नागरिकता न मिली. उतना ही नहीं उसकी पहेचान उसके धर्म और वर्णसे ही की जाने लगी. तात्पर्य यह है कि वे दलित (अछूत) ही माने जाने लगे. और उसका काम सिर्फ सफाई करनेका ही माना गया. क्यों कि वे हिन्दु थे. और तथा कथित हिन्दु प्रणालीके अनुसार उनका काम सिर्फ सफाई करना ही था. वैसे तो गांधीजीने इनका लगातार विरोध किया था और उनके पहेले कई संतोंने किसीको दलित नहीं माननेकी विचारधाराको पुरष्कृत किया था. ब्रीटीश इन्डियामें भी दलितको पूरे मानवीय अधिकार थे. लेकिन कश्मिरमें और वह भी स्वतंत्रत भारतके कश्मिरमें उनको जनतंत्रके संविधानके आधार पर दलित माने गये. यदि वह दलित कितना ही पढ ले और कोई भी डीग्री प्राप्त करले तो भी वह भारत और कश्मिरके जनतंत्रके संविधानके आधार पर वह दलित ही रहेगा, वह सफाईके अलावा कोई भी व्यवसायके लिये योग्य नहीं माना जाएगा. इन दलितोंकी संतान चाहे वह कश्मिरमें ही जन्मी क्यों न हो, उनको काश्मिरकी नागरिकतासे, जनतंत्रके संविधानके आधार पर ही सदाकालके लिये  वंचित ही रक्खा जायेगा.

क्या जनतंत्रका संविधान अपनी ही प्रजाके एक विभागको अन्यसे भीन्न समज़ सकता है?

क्या जनतंत्रका संविधान अपनी ही प्रजाके एक विभागको वंशवादी पहेचान दे सकता है?

क्या जनतंत्रका संविधान अपनी ही प्रजाके एक विभागके उपर उनकी जाति ठोप सकता है?

क्या जनतंत्रका संविधान अपनी ही प्रजाके एक विभागके उपर केवल उन विभागके लिये ही भीन्न और अन्यायकारी प्रावधान रख सकता है?

क्या जनतंत्रका संविधान अपनी ही प्रजाके एक विभागके लोगोंको और उनकी संतानोंको मताधिकार से वंचित रख सकता है.

यदि आप जनतंत्रके समर्थक है और आप “तड और फड” (बेबाक और बिना डरे) बोलने वाले है  तो आप क्या कहेंगे?

क्या आप यह कहेंगे कि कश्मिरमें अनुच्छेद ३७०/३५ए हटानेसे कश्मिर में जनतंत्र पर आघात्‌ हुआ है?

यदि कोई विदेशी संस्था भी भारत द्वारा कश्मिरमें “अनुच्छेद ३७०/३५ए” की हटानेकी बातको “जनतंत्र पर आघात” मानती है तो आप उस विदेशी संस्थाके लिये क्या कहोगे?

चाहे आप व्याक्यार्ध (वृद्धावस्था)से पीडित हो, तो क्या हुआ? यदि आप युवावस्थाकी छटपटाहतसे लिप्त हो, तो क्या हुआ? जनतंत्रके सिद्धांत तो आपके लिये बदलनेवाले नहीं है.

यदि आप जनतंत्रवादी है, तो आप अवश्य कहेंगे कि भारतने जो अनुच्छेद ३७०/३५ए हटानेका काम किया है वह जनतंत्रकी सही भावनाको पुरष्कृत करता है और कश्मिरमें वास्तविक जनतंत्रकी स्थापना करता है. काश्मिरको गांधीजीके जनतंत्रके सिद्धांतोंसे  समीप ले जाता है. नहेरुकी प्रलंबित रक्खी समस्याका निःरसन करता है. भारतके जनतंत्र के उपर लगी कालिमाको दूर करता है. जो भी व्यक्ति जनतंत्रके ह्रार्दसे ज्ञात है, वह ऐसा ही कहेगा.

यदि वह इससे विपरित कहेता है, तो वह या तो अनपढ है, या तो उसका हेतु (एजन्डा) ही केवल स्वकेद्री राजकारण है या तो वह मूढ या घमंडी है. उसके लिये इनके अतिरिक्त कोई विशेषणीय विकल्प नहीं है.

दीर्घसूत्री विनश्यति (प्रलंबित अनिर्णायकता विनाश है)

लेकिन कुछ लोग पाकिस्तानकी भाषा बोलते है. इनमें समाचार माध्यम भी संमिलित है. कश्मिर समस्या के विषयमें यु.नो.को घसीटनेकी आवश्यकता नहीं. यु.नो.को जो करना था वह कर दिया. उस समय जो उसके कार्यक्षेत्रमें आता था वह कर दिया. युनोका तो पारित प्रस्ताव था कि, पाकिस्तान काश्मिरके देशी राज्यके अपने कब्जेवाला हिस्सा खाली करें और भारतके हवाले कर दें. उस हिस्सेमें कोई सेनाकी गतिविधि न करें … तब भारत उसमें जनमत संग्रह करें. पाकिस्तानने कुछ किया नहीं. नहेरुने पाकिस्तानके उपर दबाव भी डाला नहीं. भारत सरकारने भारत अधिकृत काश्मिरके साथ जो अन्य देशी राज्योंके साथ किया था वही किया. केवल पाकिस्तान अधिकृत कश्मिरका हिस्सा छूट गया. नहेरुने इस समस्याको अपनी आदतके अनुसार प्रलंबित  रक्खा. आज हो रहे “हल्ला गुल्ला” की जड, नहेरुकी दीर्घसूत्री कार्यशैली है.

पाकिस्तानका जन्मः

पाकिस्तान का जन्म बहुमत मुस्लिम क्षेत्रके आधार पर हुआ वह अर्ध-सत्य है. जो मुस्लिम मानते थे कि वे बहुमत हिन्दु धर्म वाली जनताके शासनमें अपने हित की रक्षा नहीं कर सकते, उनके लिये बहुमत मुस्लिम समुदायवाले क्षेत्रका पाकिस्तान बनाया जाय. इन क्षेत्रोंको भारतसे अलग किया. जो मुस्लिम लोग उपरोक्त मान्यतावाले थे, वे वहां यानी कि पाकिस्तान चले गये. जो ऐसा नहीं मानते थे, वे भारतमें रहे. पाकिस्तानमें रहेनेवाले बीन-मुस्लिमोंको भारत आने की छूट थी. १९५० तक देशकी सीमाको स्थानांतरके लिये खुला छोड दिया था.

पाकिस्तानमें बीन-मुस्लिम जनताका उत्पीडन १९४७ और १९५०के बाद भी चालु रहा. इसके अतिरिक्त भी कई समस्यायें थी. गांधीजीने कहा था कि हम किसीको भी अपना देश छोडनेके लिये बाध्य नहीं कर सकते. पाकिस्तानमें जो अल्पसंख्यक रह रहे है उनकी सुरक्षाका उत्तरदायित्व पाकिस्तानकी सरकारका है. यदि पाकिस्तान की सरकार विफल रही तो, भारत उसके उपर चढाई करेगा.

नहेरु – लियाकत अली करार नामा

इसके अनुसार १९५४में दोनो देशोंके बीच एक समज़ौताका दस्तावेज बना. जिनमें दोनों देशोंने अपने देशमें रह रहे अल्पसंख्यकोके हित की सुरक्षाके लिये प्रतिबद्धता जतायी. 

नहेरुने लियाकत अलीसे पाकिस्तानसे पाकिस्तानवासी हिन्दुओंकी सुरक्षाके लिये सहमति का (अनुबंध) करारनामा किया.

किन्तु तत्‌ पश्चात्‌ नहेरुने उस अनुबंधका पालन होता है या नहीं इस बातको उपेक्षित किया. पाकिस्तान द्वारा पालन न होने पर भी पाकिस्तानके उपर आगेकी कार्यवाही नहीं की, और न तो नहेरुने इसके उपर जाँच करनेकी कोई प्रणाली बनाई.

नहेरु-लियाकत अली करारनामा के अनुसंधानमें सी.ए.ए. की आवश्यकताको देखना, तर्क बद्ध है और अत्यंत आवश्यक भी है.

नहेरुने अपनी आदत के अनुसार पाकिस्तानसे प्रताडित हिन्दुओंकी सुरक्षाको सोचा तक नहीं. जैसे कि कश्मिर देशी राज्य पर पाकिस्तानके आक्रमणके विरुद्ध यु.नो. मे प्रस्ताव पास करवा दिया. बस अब सब कुछ हो गया. अब कुछ भी करना आवश्यक नहीं. वैसे ही लियाकत अलीसे साथ समज़ौताका करारनामा हो गया. तो समज़ लो समस्या सुलज़ गयी. अब कुछ करना धरना नहीं है.   

भारतदेश  इन्डो-चायना युद्धमें ९२००० चोरसमील भूमि हार गया. तो कर लो एक प्रतिज्ञा संसदके समक्ष. नहेरुने लेली एक प्रतिज्ञा कि जब तक हम खोई हुई भूमि वापस नहीं लेंगे तब तक चैनसे बैठेंगे नहीं. संसद समक्ष प्रतिज्ञा लेली, तो मानो भूमि भी वापस कर ली.

इन्दिरा घांडी भी नहेरुसे कम नहीं थी.

इन्दिराने भी १९७१के युद्ध के पूर्व आये  एक करोड बंग्लादेशी निर्वासितोंकों वापस भेजनेकी प्रतिज्ञा ली थी, इस प्रतिज्ञाके बाद इन्दिराने इस दिशामें कोई प्रयास किया नहीं. और इस कारण और भी घुसपैठ आते रहे. समस्याओंको  प्रलंबित करके समस्याओंको बडा और गंभीर होने दिया. यहाँ तककी उसके बेटे राजिवने १९८४में एक संविदा पर प्रतिज्ञा ली के देश इन घुसपैठीयोंको कैसे सुनिश्चित करेगा. पर इसके उपर कुछ भी कार्यवाही न की. १९८९-९०में कश्मिरमें कश्मिरस्थ मुस्लिमों द्वारा, हजारों हिन्दुओंका संहार होने दिया, हजारों हिन्दु  स्त्रीयोंका शील भंग होने दिया,  लाखों हिन्दुओं को खूल्ले आम, कहा गया कि इस्लाम अंगीकार करो या मौतके लिये तयार रहो या घर छोड कर भाग जाओ. इस प्रकार उनको बेघर कर होने दिया. इसके उपर न तो जांच बैठाई, न तो किसीको गिरफ्तार किया, न तो किसीको कारावासमें भेजा.

इतने प्रताडनके बाद भी किसी भी हिन्दुने हथियार नहीं उठाया, न तो एक अरब हिन्दुओंमेंसे कोई आतंक वादी बना.

तो कोंगीयोंने क्या किया?

कोंगीयोंने इस बात पर मुस्लिमोंकी आतंक वादी घटनाओंको “हिन्दु आतंकवाद” की पहेचान देनेकी भरपुर कोशिस की. जूठ बोलनेकी भी सीमा होती है. किन्तु साम्यवादीयोंके लिये और उन्ही के संस्कारवाले कोंगीयोंके लिये जूठकी कोई सीमा नहीं होती.

सी.ए.ए. के विरोधमें आंदोलनः

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

अनुसंधान (गुजराती लेख)

https://treenetram.wordpress.com/2017/02/05/સુજ્ઞ-લોકોની-કાશ્મિર-વિષ/

Read Full Post »

લોકશાહીના “નામ” પર જનતાને ત્રાસ આપવો બંધ કરો

લોકશાહીના “નામ” પર જનતાને ત્રાસ આપવો બંધ કરો./તટસ્થતાની ધૂનમાં હવે કેટલાક મૂર્ધન્યોએ બધી સીમા પાર કરી દીધી છે.

વંશવાદી કોંગ્રેસ અને તેના સાંસ્કૃતિક સહયોગી વિપક્ષો બેફામ ઉચ્ચારણો કરે તેનાથી સુજ્ઞ લોકોની વિચારધારાને અસર થતી નથી. પણ જ્યારે સત્તાની લાલસા વગરના, અને જેમના પ્રત્યે જનતા નો સામાન્ય જણ, માન ધરાવે છે, તેઓ જ્યારે તટસ્થતાની ધૂનમાં બે બાજુ ઢોલકી વગાડે છે ત્યારે, આ સામાન્ય જણ, કાં તો ભ્રમમાં પડે છે, કે કાં તો મુંઝવણમાં પડે છે./દંભી સેક્યુલરોની ગેંગો, એમ જ ઇચ્છે છે કે, સામાન્ય માણસ તેમને સાથ ન આપે તો કંઈ નહીં, પણ તે મૂંગો રહે તો પણ ઘણું. આ સામાન્ય જણ “કંઈક ખોટું તો થયું છે” એટલું વિચારતો થાય તો આપણે “ગંગા નાહ્યા”.

બીજેપી એટલે એક માત્ર હિન્દુધર્મીઓના હિત માટેનો પક્ષ.

બીજેપી હિન્દુઓનો કોમવાદી પક્ષ છે. એવું માનવાની અને મનાવવા માટેની નહેરુવીયન કોંગ્રેસની જ નહીં પણ મોટાભાગના મૂર્ધન્યોની પણ ફેશન છે. આ વરણાગીપણાથી સુજ્ઞ મૂર્ધન્યો મુક્ત થાય તે દેશના હિત માટે અત્યંત જરુરી છે. નહેરુ જીવતા હતા ત્યારથી નહેરુ સ્વયં, કોમવાદી હતા. કેરલની નાંબુદ્રીપાદની સરકારને ઉથલાવવામાં તેમનો સહયોગ હતો. અને સૌ પ્રથમ હળાહળ કોમવાદી પક્ષ સાથે ગઠબંધન કરનાર પક્ષ પણ, નહેરુવીયન કોંગ્રેસ જ હતી. જે નેહરુવીયન કોંગ્રેસ, ગઈ કાલ સુધી શિવ સેનાને હળાહળ કોમવાદી પક્ષ માનતી હતી તે નહેરુવીયન કોંગ્રેસ, સત્તા માટે તેની સાથે જોડાણ કરે છે.

યહ તો હોના હી થા

શિવસેનાને જન્મ આપનાર તો કોંગ્રેસ જ હતી. મજદુર યુનીયનો ઉપરની સામ્યવાદીઓની પકડને તોડવા, નહેરુવીયન કોંગ્રેસે જ ક્ષેત્રવાદ અને ભાષાવાદને ઉત્તેજન આપવા શિવસેનાને જન્મ આપ્યો હતો. જ્યારે જ્યારે નહેરુવીયન કોંગ્રેસને જરુર પડી ત્યારે શિવસેનારુપી ગર્દભે તેને દોડીને મદદ કરી જ છે. એટલે ટૂંકમાં નહેરુવીયન કોંગ્રેસ દૂધથી ધોયેલી તો શું, ગંદા પાણીથી ય નહી, પણ ગટરના ઘટ્ટ પાણીથી ખરડાયેલી છે.

નહેરુવીયન કોંગ્રેસને, તેના સાંસ્કૃતિક સહયોગી પક્ષ, અને મોટા ભાગના મૂર્ધન્યો સહિત, કોઈને ખબર નથી કે લોકશાહી માર્ગ એટલે શું? ગાંધીવાદી માર્ગ એટલે શું?

રાજમોહન ગાંધી શું કહે છે?

રાજમોહન ગાંધી કોણ છે?

રાજમોહન ગાંધી, મહાત્મા ગાંધીના પૌત્ર છે. હવે તેઓશ્રી એક મહાનુભાવના પૌત્ર થયા એટલે તેઓશ્રી બોલે તો વજન તો પડે જ. તેઓશ્રીએ કહ્યું કે ગાંધીજી “હેટ નોટ” નું મહત્વ સમજાવવામાં નિસ્ફળ ગયા હતા. “ફિયર નોટ” સમજાવવામાં સફળ થયા હતા.

કોઈ વ્યક્તિ, જો કોઈ મહાપુરુષ વિષે કોઈક બાબતમાં બોલે તો તે કંઈક અંશે સાપેક્ષે વધુ અસરકારક બને. તેમાં પણ જો તે વ્યક્તિ, જે તે મહાપુરુષનો નજદીકી સંબંધ ધરાવતો હોય તો તો તેના બોલનું વજન પડે જ પડે. વળી તે વ્યક્તિ જો નકારાત્મક બોલે, તો તે, ખાસ સમાચારનું હેડીંગ બને.

હેટ નોટ અને ફિયર નોટમાં વધુ ઉચ્ચ સ્તરે શું છે?

બેશક “હેટ નોટ”નું સ્તર વધુ ઉચ્ચ છે. અને આ સ્તરે તો સ્થિતપ્રજ્ઞ જ જઈ શકે. આ સ્તરે સમજાવવામાં તો રામથી શરુ કરી કૃષ્ણ સહિતના, બુદ્ધ અને મહાવીર પણ નિસ્ફળ ગયેલ એટલે ગાંધીને જ નિસ્ફળ માનવા તે અપ્રસ્તુત છે.

“ફિયર નોટ” એ બે વ્યક્તિ, કે એક જુથ અને એક વ્યક્તિ, કે બે જુથ વચ્ચેની, માનસિકતાના સ્તર ઉપર અવલંબે છે. “ફીયર-લેસ વ્યક્તિની વ્યાખ્યા નારાયણભાઈ દેસાઈએ આમ કરી છે. “જે વ્યક્તિ કોઈથી ડરે નહીં, અને કોઈ આ વ્યક્તિથી ડરે નહીં”.

કોઈ વ્યક્તિ ગાંધીજીને પ્રશ્ન કરવાથી ડરતું ન હતું. પણ અઘટિત કામ કરવામાં, વ્યક્તિને, ગાંધીજી નો ડર લાગતો હતો. આ એક નૈતિક ડર હતો. તે આવશ્યક છે. આચાર્યનું (ઋષિઓનું) શાસન એ અનુશાસન છે.

“ફિયર નોટ” એ ગાંધીજીના અંતેવાસીઓ માટે અને  વિચારકો માટે લાગુ પડતું હતું. પણ જીન્ના જેવા, ગાંધી વિરોધીઓને લાગુ પડતું ન હતું. કારણ કે તેઓ ગાંધીજીને ઓળઘોળ કરીને હિન્દુઓના નેતા જ માનતા હતા./હાજી જેમ અત્યારે નરેન્દ્ર મોદીને, કોંગી અને તેના સાંસ્કૃતિક સાથીઓ હિન્દુવાદી ખપાવે છે તેમ જ. જીન્ના અને મોદી વિરોધીઓની ભાષા એક જ છે.

નરેન્દ્ર મોદી વિષે શું છે?

મોદીના વિરોધીઓ મોદીથી “ફિયર નોટ” છે. તેમને, મોદીને પણ હિન્દુઓના નેતા જ માનવામાં અને મનાવવામાં, ડર લાગતો નથી. હાજી કેટલાક પ્રચ્છન્ન વિરોધીઓ પણ છે કે જેમને મોદીને હિન્દુઓના નેતા માનવામાં અને મનાવવામાં ડર લાગતો નથી. મોદી તો સત્તા ઉપર છે અને આવા જુથના હિટલર પણ છે છતાં પણ તેમને ડર લાગતો નથી. શું આ વિરોધાભાસ નથી?

“ભારત પ્રથમ હિન્દુઓનો દેશ છે, અને રાષ્ટ્રીય ઓળખ કોઈ ખાસ ધર્મ અને વંશ ઉપર આધારિત હોવી જોઇએ. એમ ‘કેટલાક’ માને છે.” એમ શ્રી રાજ મોહન ગાંધી માને છે. અને એને નકારે છે.

આવી માન્યતા જ્યારે પ્રગટ કરવામાં આવે ત્યારે જનતા એવો જ સંદેશ ગ્રહે છે કે આ વાત આરએસએસ અને બીજેપીને લાગુ પડે છે અને તેમણે આમાંથી શિખ લેવાની છે, એવી રાજમોહન ગાંધીની મંછા છે.

એક સમય હતો કે જ્યારે આર.એસ.એસ./બીજેપી (જનસંઘ) તેઓ હિંદુ(ધર્મ)વાદી હતા. કારણકે તેમનો જન્મ, હિન્દુઓ ઉપર થતા હિંસક પ્રહારના આઘાતના,  પ્રત્યાઘાતના રુપમાં થયો હતો. પણ તે પછી તો ગંગા-જમનામાં ઘણા પાણી વહી ગયાં. ગાંધીવાદી નેતા મોરારજી દેસાઈ અને જયપ્રકાશ નારાયણે પણ આર.એસ.એસ./જનસંઘને પોંખ્યા હતા.

ઘણા જુથો છે કે જેઓ અ-ગાંધીવાદી હોવા છતાં અને આચારે તદ્‌ન અ-ગાંધીવાદી હોવા છતાં, તેમણે પોતાનું આર.એસ.એસ./બીજેપી પરત્વેના વિરોધનું સહગાન પૂર્વવત ચાલુ રાખ્યું છે.

ઉપરોક્ત સહગાન/વિચારોનું વરણાગીપણું દશકાઓથી ચાલ્યું આવે છે. પણ આ વરણાગીપણાને પુરસ્કૃત કરનારાઓ, ગાંધી વિચારધારાથી ઉંધી દીશામાં જનારાઓ વિષે લગભગ મૌન જ રહે છે. ખચીત રીતે જ આમાં લઘુમતિ એટલે કે મુસ્લિમ પણ છે. આ મુસ્લિમ લઘુમતિએ પોતાનો ઇન્ડિયન મુસ્લિમ લીગ પક્ષ ચાલુ રાખ્યો, પણ ભારતીય રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસના મહાન નેતાઓએ પાકિસ્તાનમાં પાકિસ્તાની રાષ્ટ્રીય કોંગ્રેસ ચાલુ રાખી નહીં કારણકે આ નેતાઓ તેમના કહેવા પ્રમાણે પોતાના પ્રાણોની રક્ષા કાજે ભારતમાં નાશી આવ્યા. ગાંધીજીએ આ કોંગ્રેસીઓને ઠીક ઠીક ઠપકો આપેલ … “તમે ત્યાં મરી કેમ ન ગયા? મેં તો તમને મરતાં શિખવ્યું હતું. જરુર પડી ત્યારે તમને મરતાં ન આવડ્યું. તમે તો ડરપોકની જેમ અહીં જીવ બચાવવા ભાગી આવ્યા. જો તમે મરી ગયા હોત તો હું ખૂબ ખુશ થાત. એટલો ખુશ થાત કે હું ખુશીમાં નાચત. ખૂબ નાચત … ખુબ નાચત … ખુબ નાચત.”

ગાંધીજીએ પોતે કબુલ કરેલી કોંગીઓની નિસ્ફળતા આ હતી. પણ આ ગાંધીજીની નિસ્ફળતા ન હતી. ગાંધીજી તો દિલ્લી શાંત થાય એટલે પાકિસ્તાન જવાના જ હતા. વાસ્તવમાં તો કોંગ્રેસના શિર્ષ નેતાઓની “ફિયર નોટ”ની નિસ્ફળતા હતી. મોટા નામ હેઠળ છુપાયેલું આ તેમનું વામનપણું હતું. આવું અને આથી પણ વિશેષ કોંગીનેતાઓનું વામનપણું આપણને સ્વતાંત્ર્ય પ્રાપ્તિ પછી અવારનવાર જોવા મળ્યું છે. પોતાના વ્યક્તિગત કે પક્ષીય સ્વાર્થ માટે કોંગી નેતાઓ દેશને ધરાશાયી કરવા હમેશા તૈયાર જ હોય છે./મહાત્મા ગાંધીએ મુસ્લિમોની કે એમના નેતાઓની ક્યારેય તરફદારી કરી નથી. જો કોઈને ખબર ન હોય તો તેના હજાર દાખલા છે. “દિલ્લીમેં ગાંધીજી ભાગ-૧ અને ભાગ-૨” વાંચો. પણ કોંગીનેતાગણનો એક પણ માઈનો લાલ નિકળશે નહીં કે જે આ પુસ્તક વાંચે. કારણકે તેને દેશહિતની ક્યાં પડી છે!

નાગરિકતા સુધારણા કાયદોઃ

cartoonists’ curtsy

હાલમાં જે હિંસાત્મક પરિસ્થિતિ ઉત્પન્ન થઈ છે તેને માટે જવાબદાર કોંગીનેતાઓ અને તેમના સાંસ્કૃતિક સાથીઓ છે. આ વાત દિવા જેવી સ્પષ્ટ છે. કારણ કે આ કાયદામાં વિરોધને કોઈ અવકાશ નથી.

જે કર્તવ્ય પ્રત્યે કોંગી-સરકારે ૧૯૫૪ થી ૨૦૧૪ સુધી પ્રમાદ કર્યો હતો તે અધુરું કામ બીજેપી સરકારે પુરું કર્યું. બીજેપીને બંને ગૃહોમાં સ્પષ્ટ બહુમતિ મળી ત્યારે તેણે પોતાની ફરજ બજાવી. કોંગીનેતાઓ પોતે કરેલા પ્રમાદને ધર્મનિરપેક્ષતાના વાઘા પહેરાવી, ભારતીય મુસ્લિમોને ઉશ્કેરે છે. મુસ્લિમો અને તેમના કેટલાક નેતાઓ પણ અભણ અથવા/અને અસામાજિક તત્ત્વોનો સાથ લઈ હિંસા ઉપર ઉતરી આવે છે.

નહેરુ-લિયાકત અલી કરાર

કોંગીનેતાઓ પોતે જ અભણ અને અસંસ્કારી જેવું વર્તન કરે છે. કોંગીનેતાઓએ નહેરુ લિયાકત અલી સમજુતી વાંચવી જોઇએ. તેમાં સ્પષ્ટ લખ્યું છે કે પાકિસ્તાન પોતાની લઘુમતિ કોમોને સુરક્ષા પ્રદાન કરશે. અને તેમાં જો પાકિસ્તાનની સરકાર કોઈ પણ કારણસર નિસ્ફળ જશે તો ભારત સરકાર તે લઘુમતિને આશ્રય અને નાગરિકતા આપશે. આ જોગવાઈ ભારતને પણ લાગુ પડે છે. પણ ભારતમાં મુસ્લિમો અતિસુરક્ષિત છે.

તમે જુઓ છો કે ભારતની જનતાએ મુસ્લિમોને સુરક્ષિત રાખ્યા છે. આને સિદ્ધ કરવાની જરુર નથી. આ સત્ય ૧૯૫૧ની જનગણના અને ૨૦૧૧ની જનગણના જ સિદ્ધ કરે છે. આનાથી ઉલ્ટું પાકિસ્તાન અને બંગ્લાદેશ પોતાને ત્યાં રહેલી લઘુમતિને સુરક્ષા આપી શક્યા નથી.

કોંગીનેતાગણ, તેમના સાંસ્કૃતિક સાથીઓ સહિત, અને મુસ્લિમો નેતાઓ સહિત, જાણીજોઈને મુસ્લિમોને અને પોતે પણ ભ્રમમાં રહેવા માગે છે, અથવા એવો ઢોંગ કરે છે. કોંગી નેતાગણ ઉપર તો ન્યાયિક કાર્યવાહી કરવી જોઇએ. અફવા ફેલાવવી અને હિંસા માટે મુસ્લિમોને ઉશ્કેરવા તે ગેર બંધારણીય છે, અને ગુનો પણ બને છે.

કોંગીનેતાઓના પેટમાં શું છે?

કોંગી સરકારોએ ખંધાઇપૂર્વક દશકાઓ સુધી સમસ્યાઓને અનિર્ણિત રાખેલી, તે સમસ્યાઓને બીજેપીએ ઉકેલી છે. કોંગી સરકારનું વલણ અનૈતિક અને જનતંત્રની વિરુદ્ધ હતું. પણ નહેરુથી શરુ કરી ઇન્દિરા સહિતની, અને સોનિયા-મનમોહન સરકારોને આવી અનિર્ણાયકતાનો છોછ નથી. પછી તે, પાકિસ્તાન હસ્તક રહેલો જમ્મુ-કાશ્મિરના હિસ્સા ઉપર  યુનોના ઠરાવનો અમલ હોય, કે અલોકતાંત્રિક કલમ ૩૭૦/કલમ ૩૫એ હોય, કે નહેરુ-લિયાકત અલી સમજુતીનો અમલ હોય, કે સંસદ સામે ચીનસાથેના યુદ્ધમાં ૭૧૦૦૦ ચોરસ માઈલ ભારતીય ભૂમિ પાછી લેવાની હોય, કે ઇન્દિરાએ લીધેલી એક કરોડ બાંગ્લાદેશી ઘુસણખોરોને પાછા મોકલવાની પ્રતિજ્ઞા હોય કે, ભારતીય બંધારણને સુરક્ષા આપવાની વાત હોય કે, મુસ્લિમ સ્ત્રીઓને માનવીય અધિકાર આપવાનો મુદ્દો હોય, કે આતંકવાદી આક્રમણ નો ઉત્તર આપવાની વાત હોય કે જનતાની ગરીબી હટાવવાની વાત હોય, કે ભ્રષ્ટાચાર હઠાવવા માટે ફુલપ્રુફ સીસ્ટમ બનાવવાની વાત હોય … આ બધું જ અવગણી શકાય છે. કારણ કે કોંગીનેતાઓનું એકમાત્ર ધ્યેય, દેશના કોઈપણ ભોગે, સત્તા પ્રાપ્ત કરો અને લૂટ ચલાવો. અને આમ કરવા માટે વોટબેંક બનાવો./કરમની કઠણાઈ અને કોંગીની વિચારધારા/

કોંગીનેતાઓ માટે કરમની કઠણાઈ એ થઈ કે ૨૦૧૪માં અને ૨૦૧૯માં તે કેન્દ્રમાં ચૂંટણી હારી ગઈ. હવે સત્તા પાછી કેવી રીતે મેળવવી?/અરે ભાઈ, આપણે કોંગી છીએ. માન ન માન આપણી પાસે સ્વાતંત્ર્યની લડતની ધરોહર છે, ભલે આપણા આચાર તદ્‌ન ભીન્ન હોય. આપણને સાધન-અશુદ્ધીનો કશો છોછ નથી. આપણા વિરોધીઓને કોઈપણ ગાળ આપવી અને તેમની ઉપર કોઈ પણ આરોપ મુકવો એ આપણી ગળથુથીમાં છે. માટે આપણે આપણા એજન્ડા ને આગળ ચલાવો.

“આ મોદી સરકાર, પાકિસ્તાનમાંથી આવેલા હિન્દુઓની જ ચિંતા કરે તે ન ચાલે. ભલે તેઓ પાકિસ્તાનમાં ધર્મના આધાર પર પ્રતાડિત થયેલા હોય અને ઘરબાર છોડી અહીં શરણાર્થી થયેલા હોય. તમે તેમને નાગરિકતા બક્ષો એ ન ચાલે.

“પાકિસ્તાનમાં તો આતંકવાદી મુસ્લિમો પણ લઘુમતિમાં છે. ભલે મુસ્લિમ લોકો પાકિસ્તાનમાં બહુમતિમાં હોય. આ બહુમતિ આતંકવાદમાં સક્રિય નથી એટલે સક્રિય આતંકવાદીઓ પણ લઘુમતિમાં જ ગણાવા જોઇએ. જુઓને હાફિજ઼ મહમ્મદ સઈદનો પક્ષ પાકિસ્તાનની ચૂંટણીમાં હારી ગયો એટલે તેનો પક્ષ બહુમતિમાં તો કહેવાય જ નહીં. આવા તો અનેક પક્ષો છે, જે બધા જ લઘુમતિમાં છે. જો આ બધા બહુમતિમાં હોત તો તેઓ પોતેજ સરકાર ચલાવતા ન હોત શું? તેઓ પોતે સરકાર ચલાવતા નથી એટલે સિદ્ધ થાય છે કે તેઓ લઘુમતિમાં જ છે.

“બીજેપી વાળા અક્કલ માં ઝીરો છે. તેઓ લઘુમતિ એટલે શું, એ સમજ઼તા જ નથી. ધર્મના આધારે તેઓ પાકિસ્તાનને પણ છોડતા નથી.

આ બીજેપી વાળા તો પાકિસ્તાનની પ્રજાની અંદર પણ તેઓને ધાર્મિક આધાર પર ભેદભાવ ઉત્પન્ન કરવા માગે છે. આ રીતે પાકિસ્તાનના નાગરિકોને ધર્મના આધાર પર ઓળખવા તે શું આપણા જનતંત્રને શોભે ખરું?

“માટે ભારતના અને પાકિસ્તાનના હે મુસ્લિમો, અમે તમારી સાથે છીએ. એક વખત તો તમારી શક્તિ, બીજેપી સરકારને બતાવી દો. અમે તમને માર્ગદર્શન આપીશું કે તમારે (દેશમાં આગ લગાવવાની) તમારી શક્તિ ક્યારે ક્યારે બતાવવાની છે. અમે તમારી કોમવાદી અને અસામાજિક શક્તિઓને ખીલવતા આવ્યા છીએ, અને હિન્દુઓને તેમના માનવ અધિકારોથી તમારા થકી વંચિત રાખતા આવ્યા છીએ તે તમે સુપેરે જાણો જ છો.

“હિન્દુઓ તમારી એક મસ્જીદ તોડે અને તેના પ્રત્યાઘાતમાં કે પ્રત્યાઘાત વગર પણ તમે હજાર મંદિર તોડો તો કોઈની મજાલ છે કે તમને કોઈ નોન-સેક્યુલર કહી શકે? હિન્દુઓએ તોડી પાડેલી એક મસ્જિદના વિરોધમાં તો અમે તેમને બતાવી દઈએ કે કેટલી વિશે સો થાય છે.

“હે મુસ્લિમ ભાઈઓ, અમે તો તમારા ગુન્ડાઓની પણ વહારે આવીએ. ગુન્ડાઓ જ નહીં આતંકવાદીઓની વહારે પણ આવીએ છીએ, અને તેમના માનવ અધિકારની સુરક્ષા માટે અમે તત્પર હોઇએ છીએ. તમારા આતંકવાદીઓને ભૂલે ચૂકે ભારત સરકારે પકડ્યા હોય તો અમે અમારા ગૃહમંત્રીના લોહીના સગાંઓનું અપહરણનું નાટક કરાવી, બદલામાં તમારા રકમબંધ આતંકવાદીઓને છોડાવીએ. મુફ્તિ મહંમદ સઈદનો જ દાખલો લો ને!

“આ બધી વાતો તો તમે જાણો જ છો. હા પણ, અમે આ બધું ત્યારે જ કરી શકીએ જ્યારે તમે અમને સત્તા પર રાખો.

“હે મુસ્લિમ ભાઈઓ, કેટલાક સુજ્ઞ મુસ્લિમ ભાઈઓ, તમારા વિરોધનો વિરોધ કરશે. પણ તમારે તેમને ગણકારવાના નથી. અમે તમારી સાથે છીએ. તમારે દશ હિંસક વિરોધ કરવાની સાથે એક શાંત વિરોધ પણ કરવો. જો કે નહીં કરો તો પણ ચાલશે. અમે કહીશું કે સરકારની પોલીસે શાંત વિરોધકર્તાઓ પર દમનનો કોરડો વીંઝ્યો છે. લઘુમતિઓના અવાજને રુંધ્યો છે. લઘુમતિઓના બંધારણીય અધિકારોને સરકારે નકાર્યા છે. બીજેપી સરકારે બંધારણનું ખૂન કર્યું છે. આ સરકાર નાઝીવાદી છે. અમે યુનોમાં આ સરકારને પડકારીશું.

“હે મુસ્લિમ બંધુઓ, તમે યાદ રાખો કે તમે પણ જેવા તેવા નથી. ચંગીજ઼ખાન, તૈમૂર, મોહમ્મદ ઘોરી, મોહમ્મદ ગજ઼નવી … વિગેરે અનેક મહાનુભાવોના સંતાન છો. વારસદાર છો.

મુસ્લિમોને કશું મોળું ખપે

“હે મુસ્લિમ બંધુઓ, અમે જાણીએ છીએ કે તમને કશું મોળું ન ખપે. તમે નાના પાયે કશું કરવામાં માનતા નથી. અમે તમને આ વાત જ શિખવી છે. તમારે તો આખા રેલ્વેના ડબાને બાળવાનો હોય છે.  તમે હજારો કાશ્મિરી હિન્દુઓની કત્લ કરો, હાજારો કશ્મિરી હિન્દુ સ્ત્રીઓની લાજ લૂંટો, અને પાંચ લાખ કાશ્મિરી હિન્દુઓને ખૂલ્લંખૂલ્લી બિન્ધાસ્ત ધમકીઓ આપી તેમના ઘરોમાંથી તગેડી મુકો, અને દશકાઓ સુધી તેમને નિરાશ્રિત રાખો, તો પણ તેમાંના એક પણ હિન્દુની મજાલ છે કે તે આતંકવાદી બને? એટલું જ નહીં દેશના એક અબજ હિન્દુઓમાં પણ એક પણ આતંકવાદી ન પાકે એવો અમારો કડપ છે. અરે! એટલું જ નહીં, હિન્દુઓ આતંકવાદી ન હોય તો પણ અમે આ હિન્દુઓ વિષે “હિન્દુ આતંકવાદ”થી ભારતને બચાવો એવી કાગારોળ અને ઘોષણાઓ દેશ વિદેશમાં કર્યા કરીએ છીએ. હે મુસ્લિમ બંધુઓ, તમને અમારા જેવા (ખાવિંદ, હમસફર) મળવા અશક્ય છે. આ વાત તમે મહેસુસ કરો.

“હે મુસ્લિમ બંધુઓ, તમે એક કશ્મિરમાં જ હિન્દુઓને હતા ન હતા કરી શકો એટલું પુરતું છે એમ ન માનતા. અમે તમને ભારતમાં છૂટક છૂટક અનેક છોટે કાશ્મિર બનાવવાની છૂટ આપી છે અને તમને એનો લાભ લેવા સશક્ત કર્યા છે. એટલે તમે બેફામ બનો. તમે રેલ્વેના પાટા ઉખેડો, બસો બાળો, વાહનો બાળો, પોલીસ ચોકીઓ બાળો, પોલીસો અને સુરક્ષા દળો ઉપર પત્થર મારો કરો … આખા દેશમાં હા હા કાર મચાવી દો. એટલે દુનિયાને પણ ખબર પડશે કે આ બીજેપી સરકારે કંઇક તો એવું કર્યું છે કે જે આ શાંત, અમન પ્રિય, સાચાબોલી અને ઇમાનદાર ધર્મ પાલન કરનારી મુસ્લિમ પ્રજા વિરુદ્ધ છે. અને તેથી જ તો તે ન્યાયની યાચના માટે રસ્તા ઉપર આવી ગઈ છે.”

તડ અને ફડ વાળા

કેટલાક તડ અને ફડ વાળા મૂર્ધન્યો પોતે તટસ્થ છે, તે બતાવવાની ઘેલછામાં નાગરિકતા સંશોધન કાયદાને (સી.એ.એ.)ને અ-જનતાંત્રિક અને ભારતીય સંવિધાનની બિનસાંપ્રદાયિક જોગવાઈના હનન તરીકે ઠેરવે છે. જો સાચેસાચ આમ જ હોય તો તેમણે “નહેરુ-લિયાકત અલી સમજુતી”ને પણ સાંપ્રદાયિક ગણાવવી જોઇએ. એટલે કે નહેરુની ઉપર આ સમજુતીનો આધાર લઈ માછલાં ધોવા જોઇએ. પણ આ ઘેલા લોકોમાં આ હિમત નથી. અથવા તો તેમની સ્મૃતિમાંથી આ ઘટનાનો લોપ થયો છે. જો આવું ન હોય તો તેમની દૃષ્ટિએ કરાર કરવો અને પછી ભૂલી જવો તે સેક્યુલર છે. પણ તે કરારનો અમલ કરવો તે એક દુષ્કૃત્ય છે અને અક્ષમ્ય છૅ. એટલે કે નહેરુ અને લિયાકત અલી વચ્ચે કરાર થયો તે વાત તો ઠીક છે મારા ભાઈ. નહેરુ/ઇન્દિરાએ તે કરારની રુએ પ્રતાડિત હિન્દુઓની તરફમાં પગલાં લેવામાં પ્રમાદ કર્યો તે માટે તેમને ધન્ય છે. અને લિયાકત અલીએ કે તેમના અનુગામીઓએ તો હિન્દુઓની સુરક્ષા પણ ન કરી. તેથી તે સૌ નેતાઓને સલામ છે. આ મૂર્ધન્યોની વક્રતા જુઓ. મોદીને કોઈ પણ તાર્કિક આધાર વગર કોમવાદી, નાઝીવાદી કહેશે, પણ જે નહેરુએ કાશ્મિરમાં બિનલોકશાહીયુક્ત કલમ ૩૭૦/૩૫એ, દાખલ કરી તે વિષે મૌન રહેશે. વળી તેઓ, કાશ્મિરની સ્વાયત્તતા નરેન્દ્ર મોદીએ નષ્ટ કરી તેમ કુદી કુદીને કહેશે. ૧૯૪૮માં જમ્મુ કાશ્મિર ઉપર યુનોએ ઠરાવ પાસ કર્યો, પણ તેના અમલ માટે નહેરુએ પાકિસ્તાન ઉપર દબાણ ન કર્યું. નહેરુવંશવાદીઓના આવા તો અગણિત પ્રમાદો ઇતિહાસના પર્ણો ઉપર લખાયેલા છે.

દરેક દેશનું કર્તવ્ય છે અને તે પણ જનતાંત્રિક રાષ્ટ્રો માટે તો ખાસ, કે પોતાના નગરિકોની નોંધ રાખે. જો આવું તે ન કરે તો લાંબે ગાળે દેશ ઘુસણખોરોથી ખદબદવા લાગે. દરેક રાષ્ટ્ર આવી નોંધણી રાખે છે. વળી ભારતમાં તો સર્વોચ્ચ ન્યાયાલયે આદેશ કર્યો છે. નહેરુવંશવાદી સરકારોએ કદી ન્યાયિક આદેશોને ગંભીરતાથી લીધા જ નથી. તેના અનેક ઉદાહરનો નોંધાયેલા છે. આ પણ એક પ્રમાદમાં ભૂલાયેલો આદેશ છે./આપણા મૂર્ધન્યોને બીજેપી જેવી પ્રતિબદ્ધ સરકાર પસંદ નથી. આપણા મૂર્ધન્યોને તો કોંગી જેવી એદી સરકાર જ પસંદ પડે છે. વેસ્ટલેન્ડ હેલીકોપ્ટર કૌભાંડમાં ૪૦ કરોડ રુપીયા, મીડીયાનું મોં બંધ રાખવા આપ્યા હતા. આ શું દર્શાવે છે? જોકે કેટલાક મૂર્ધન્યોને પાઈ પણ નહીં મળી હોય પણ આવા મૂર્ધન્યોને તો આ કૌભાંડોની ખબર પણ નહીં હોય.

શિરીષ મોહનલાલ દવે

Read Full Post »

What is the full form of I.N.C.?

Who does represent the opposition in Indian Parliament?

The leader of opposition in the Indian parliament is Adhir Ranjan Chaudhary. He is also the leader of the Congi (I.N.C.) party in the Parliament

Congi = Congress which was led by India Gandhi, was known as Congress (I), Short form is Cong(I) i.e. Congi.

This party had been made a dynastic party by J. L. Nehru.

Indira Gandhi’s full name as per the Election Commission Record, was Indira NehruGandhi, where the word “NehruGandhi” stands for the surname of Indira Gandhi. That is why the real cultural name of this party is Indira NehruGandhi Congress party i.e. I.N.C. party.

In 1977 the real Congress declared dead and cremated by the then leader of the Congress party Morarji Desai. No Claim was lying with EC or SC as to who should get the heritage other than the Congi in 1981. So any verdict given by any authority, was uncalled besides null and void in 1981.

Who is Adhir Ranjan Chaudhary?

This fellow has been elected from Behrampore seat of West Bengal. He is being elected from West Bengal since 1999 as the Member of Parliament. In general in West Bengal TMC and INC plus CPIM they do not like any opposite view. They generally do not believe in democracy as and when they are in power. And this point is recorded in its History. Still at this moment such records are being supplemented by the TMC under its culture.

The fellow viz. Adhir is currently the leader of Congi in the 17th Lok Sabha alias 17th Parliament). He was also the President of West Bengal State Congi party Committee.

This fellow is constitutionally recognized a top leader of Congi party and designated as one of the top leader of Congi party.

This fellow is designated and authorized spokesperson of Congi in the Parliament and thereby also outside the parliament.

This means, this fellow viz. Adhir Ranjan Chaudhary is more than the Spokesperson of all the opposition parties. If the other parties of the opposition deny his role and or speaks against his statement, even then this person remains the Spokesperson of Congi.

What statement has this fellow viz. “Adhir Ranjan Chaudhary” given in the Indian Parliament in the current session?

The subject of the discussion was NRC and the MoS.

NRC is the National Register of Citizens which is a part of Indian Constitutional provisions.

MoS is the Memorandum of Settlement, which is a legal document where the Central Government is the main party. The document was signed by the then Prime Minister Government of India to execute to meet the demand of the agitating Students of Assam in 1986, on the matter of cross border infiltrators. The infiltrators had paralyzed the normal lives of the people, economy of the Assam States and law and Order Conditions of Assam and other states. Infiltration was continuous in a large scale before and after 1968 till the MoS was signed in 1986.

The ruling party at the Center was Congi. It was Rajiv Gandhi, a son of Indira NehruGandhi, who had signed the said undertaking document.

But as usual the Congi was lethargic in execution of any type of its undertaking for which it was liable to act.

Recall Abrogation of Article 370 and 35A. This was introduced in the Indian Constitution by JL Nehru in 1954 with view to oblige his friend Sheikh Abdullah. This was introduced with a specific wording as a “Temporary Provision”. This Temporary Provision remained in the Indian Constitution for Seven Decades despite of the provisions were absolutely undemocratic and hurting the human rights. Modi lead Government removed them in 2019.

This shows the value of words/promises of the Congi and its cultural allied parties. Practically the value of their word has always remained nil.

Let us understand the implications of the statement of Adhir Ranjan Chaudhary.

First of all let us look at the Statement of Adhir Ranjan Chaudhary.

Adhir Ranjan Chaudhary stated in the Indian Parliament on 1st December 2019,

“the REAL INFILTRATORs in India is Narendra Modi & Amit Shah.

What is the logic of this fellow i.e. the logic behind the statement of Adhir Ranjan Chaudhary?

(1) Narendra Modi and Amit Shah though they are Prime Minister and Home Minister respectively in the Central Government of India, are the Real infiltrator. The rest infiltrators being narrated by the BJP Government are not the real infiltrators. This implies by the word “REAL” used by Adhir Ranjan Chaudhary while making the statement into the statement.

(2) Why Narendra Modi and Amit Shah are REAL Infiltrator in India? B’casue Narendra Modi and Amit Shah has their home in Gujarat but they have come to New Delhi. This means, those who are coming from one Indian State to other Indian State e.g. From Gujarat State to New Delhi are the Real Infiltrators. But the persons  coming from another country into India even without INDIAN VISA inclusive of terrorists are not REAL INFILTRATORS, but they are “simple” INFILTRATORs. They are supposed to have more rights than the PM Narendra Modi and the HM Amit Shah because these people are REAL INFILTRATORs.  

(2.1)This fellow Adhir Ranjan Chaudhary himself becomes a REAL INFILTRATOR on his own logic. But he ignores his own logic for himself.

(2.2)This fellow [this fellow means Adhir Ranjan Chaudhary] does not recognize Indian Constitution. He does not know or he does not want to know that in accordance to Indian Constitution the elections were held time to time. Narendra Modi and Amit Shah had lawfully met with the qualifying conditions stipulated under Election Act, and they had contested elections. They won. They accordingly had taken the oath before the constitutional authorities. But this fellow in our subject matter, does not recognize the qualification stipulated under the constitution, and he further does not recognize the authority.     

(3)On the other hand and on the contrary “this fellow” believes that India is for all and thereby the infiltrators inclusive of terrorists from across the border have right to live in India, despite of the law of the land does not support the infiltrators.

(4) This fellow further says, that the “India is not the property of anybody”.  This fellow points the finger at Narendra Modi (PM) and Amit Shah (HM), that India is not the property of Narendra Modi and Amit Shah.

(4.1) Hence Narendra Modi and Amit Shah have neither the right to update National Register of Citizens nor to execute to implement the qualifying conditions.

(4.2) It further implies from the statement of “this Fellow”, that the Memorandum of Settlement was signed by the then Prime Minister Rajiv Gandhi of Congi Party in 1986.

Since Rajiv Gandhi is dead the document is deemed to be dead. Because Rajiv Gandhi had signed the memorandum document as the PM of India. India is to be taken as the property of Rajiv Gandhi. That is why he had signed the memorandum document. Rajiv Gandhi is dead. The memorandum document is also dead.

How is it?

Recall Nehru’s oath on “lost land to China in 1962 Indo-China war”. China had achieved cake walk victory over India and captured 71000 Sqaure miles of Indian land of its CLAIM. Nehru had taken an Oath before the Indian Parliament that he and his party would not take rest till the lost land of India is not recaptured. Nehru died when he came to Delhi after taking rest in Dehradoon. Indira died. Rajiv died. The oath also had been taken as died. Now we Congis never talk on the lost land. We never considered it, that it is an issue. Off course we had never considered any issue/problem as an issue/problem. We had only considered the only issue as an issue, as how to capture power and how to make money by any means and at any cost to Nation.

(5) “This fellow further says “Narendra Modi and Amit Shah are recognizing citizens under Muslims and non-Muslims”. We Congis are recognizing only Muslims. We want to show the Muslim community that we may be making money through unauthorized and illegal means whenever we are in power, but we are for the Muslims, we are of the Muslims, thereby we want to give the Muslims of India and Pakistan and Bangladesh, a message that we are here to protect you and also we are here to protect your every new entrant in India. We well come you always. You can take citizenship at your free will, because India is for all. This “all” means Muslims.      

Look at the media coverage on this matter:

“Divya Bhaskar” is at low profile. It publishes this news on an inner page viz. page – 14, in small size characters on RHS end, in line with less important news.

No question of trolling the statement.

To allege a Prime Minister and Home Minister infiltrator in a democratic country is hurting the feeling of the people of the nation and further it is degrading prestige of the Nation.

Had been it made an equivalent statement even by a third grade RSS leader (not even BJP), the news would have been published on front page with large and bold characters.

TOI has off course published the news, but not as a Top News Item. No trolling.  

Recall. How much the statement of a third grade leader of BJP, viz. Sadhvi Pragya was trolled by the media and oppositions.

What action is required against “this fellow” Adhir.

Adhir is not a Badhir. He spoke everything thing in his total sense.

He was not drunk when he spelled out the statement.  

Neither he nor his party president has said that it was the statement in his personal capacity. Thereby this was the official statement. Thereby it was in accordance to the policy of his party. His party is Congi. Whatever we have charged  Adhir in this blog, the same charges go on Congi too. Media has kept mum. Let us watch as to what political analysts react and troll.

But at a prima facie;

(1) “this fellow viz. Mr. Adhir” and Congis are anti-nationals and does not pay regards to the Indian constitution.

(2) “Adhir’s” membership of parliament must be terminated, and his citizenship must be withdrawn.

(3) HC/SC must take a note of Congi party’s and “Adhir’s” behavior.

(4) HC/SC should call Congi’s party President, for clarification, call for explanation and HC/SC should order of arrest of all the MPs who supported “Adhir”, and “Adhir” should be kept in jail till the judgement of FINAL ORDERs

(5) Meanwhile the recognition of Congi Party should be suspended till further order.   

(6) No apology from the end of Sonai, RaGa, Priyanka etc… can be made acceptable. Adhir and Congis cannot say that they do not know Hindi in proper sense. They are liar.

Shirish M. Dave

https://www.treenetram.wordpress.com

Read Full Post »

हम कैसे वितंडावादीको परिलक्षित (आइडेन्टीफाय) करें?

हम कैसे वितंडावादीको परिलक्षित (आइडेन्टीफाय) करें?

वितंडावाद क्या है?

यदि कोई, चर्चाके विषय पर असंबद्ध, प्रमाणहीन और स्वयंसिद्ध विधिसे चर्चा प्रस्तूत करें, इसको वितंडावाद कहा जाता है. वितंडावादका प्रयोजन वैसे तो पूर्वग्रह भी हो सकता है. किन्तु क्वचित ऐसा भी होता है कि, स्वयंमें कोई पूर्वग्रह है या नहीं वह लेखक स्वयंको ज्ञात होता नहीं है.

यदि लेखकको ज्ञात होता है कि, अपना पक्ष सही नहीं है तत्‌ पश्चात्‌ भी वह वितंडावाद करता है तो उसका प्रयोजन वह किसी सांस्कृतिक समूहके ध्येय पर वह काम कर रहा है. लेखक उस समूहका सदस्य हो सकता है. कोई एक समूहका सदस्य होनेके कारणसे वह उस समूहके ध्येय के अनुसार लिखता है. तात्पर्य यह है कि लेखक जो विवरण उसके ध्येयके अनुरुप नहीं है उसको प्रकट नहीं करता है और जो ध्येयको अनुरुप है उसको किसी भी प्रकार प्रकट किया करता है.

वितंडावादी को कैसे परिलक्षित (पहेचाने) करे?

कोमन मेन

जैसे कि, कोई एक समय “जे.एन.यु.” में देशविरोधी सूत्रोच्चार किया गया. इस घटनाका विवरण किन किन वैचारिक जूथोंने कैसे किया था? याद करो.

सर्व प्रथम सूत्रोच्चारोंसे अवगत हो

“भारत तेरे टूकडे होगे, इन्शाल्ला इन्शाल्ला

“कश्मिरको चाहिये आज़ादी … आज़ादी …  छीनके लेंगे आज़ादी … आज़ादी … लडके लेंगे आज़ादी … आज़ादी…

“अफज़ल हम शर्मींदा है … तेरे कातिल जिन्दा है …

“कितने अफज़ल मारोगे हर घरसे अफज़ल निकलेगा …

इन सूत्रोंसे संदेश क्या मिलता है?

संदेश तो यह है कि इन लोगोंको “भारतको तोडना है”,

सूत्रोच्चार करनेवाले देशहितके विरोधी है,

सूत्रोच्चार करनेवाले देशविरोधी वातावरण बनानेका प्रयत्न कर रहे है,

सूत्रोच्चार करनेवाले जनतंत्रमें मानते नहीं है,

सूत्रोच्चार करनेवाले संविधानमें मानते नहीं है,

सूत्रोच्चार करनेवाले अहिंसामें मानते नहीं है, पर्याप्त जनाधार न होनेके कारण इन्होंने हिंसा नहीं की किन्तु हिंसाके लिये प्रचार अवश्य किया.

हिंसाका साक्ष्य नहीं

कुछ मूर्धन्य लोग, इस घटनामें  प्रत्यक्ष हिंसाका साक्ष्य (एवीडन्स) नहीं होने से,  इन सूत्रोंच्चार करनेवालोंको अहिंसक मानते है और ऐसी ही एक प्रणाली स्थापित करना चाहते हैं,

चूकि इसमें प्रत्यक्ष हिंसाका साक्ष्य नहीं है इसको लोकतंत्रके अधिकारके रुपमें देखते है,

यह विद्यार्थीगण, जे.एन.यु.में शिक्षा प्राप्त करनेके लिये आते है और इन सूत्रोच्चारोंको शिक्षाके एक  परिमाणके रुपमें समज़ते है और स्थापित करना चाहते हैं. यानी कि ऐसा करना शिक्षाका एक भाग है.

इस घटनाके संबंधित बिन्दु (टोपिक) क्या है?

ये सभी सूत्र घटनाकी चर्चाके  बिन्दु ही तो हैं. इनके उपर चर्चा हो सकती है.

प्राथमिकता किन किन बिन्दुओंको दी जाय?

(१) सूत्रोंको  प्राथमिकता देना आवश्यक है,

(२) सूत्रोंका पूर्वनियोजित रीतिसे समूह द्वारा उच्चारण करवाना इनमें विद्यार्थीयोंका ध्येय तो निहित है, तो इन विद्यार्थीओं पर कार्यवाही किस प्रमाण-प्रज्ञाने होना आवश्यक है, तो इनके उपर चर्चा की जाय.

(३) इन विद्यार्थीयोंकी पार्श्वभूमि क्या है उसका भी अन्वेषण होना आवश्यक है इसके उपर चर्चा होना आवश्य्क है,

(४) इन विद्यार्थीयोंने क्या और कैसे आयोजन किया था उसके उपर अन्वेषण होना आवश्यक है इसके उपर भी चर्चा हो सकती है,

(५) यह घटना देशके लिये श्रेय है या नहीं इसके उपर चर्चा हो सकती है,

(६) इन विद्यार्थीयों पर कार्यवाही करके कितना दंड देना आवश्यक है इसके उपर चर्चा हो सकती है,

(७) इन विद्यार्थीयोंके बाह्य सहयोगी कौन कौन है और उनका कार्यक्षेत्र क्या है उसके उपर अन्वेषण होना आवश्यक है इसके उपर चर्चा आवश्यक है.

किन्तु यदि आप बीजेपी शासनके विरोधी है तो आप क्या करोगे?

तो आप सूत्रोंका उल्लेख ही विवरणमें करोगे नहीं.

कुछ समाचार माध्यमके विश्लेषकोंने “सूत्रों”का उल्लेख ही उचित नहीं माना, यानी कि “सूत्रों”के अर्थका कोई महत्त्व ही नहीं है. इन महानुभावोंने “सूत्रों”को उपेक्षित ही किया.

उनका कहेना है  शासनके विरुद्ध अहिंसक विद्रोह करना संविधानिक अधिकार है … सूत्रोंसे देशको हानि नहीं होती … कई राजकीय पक्षोंके नेता और समाचार माध्यमोंके संवादक इन विद्यार्थी नेताओंका साक्षात्कार करनेके लिये तत्पर बने और उनका साक्षात्कार भी किया. राहुल गांधी जैसे मूर्ख नेताओंने तो इन नेताओंको कह भी दिया कि “ … तूम आगे बढो … हम तुम्हारे साथ है …”

मूर्धन्योंके, नेताओंके और समाचार माध्यमोंके इस प्रकारके प्रचारसे क्या होता है?

ऐसी घटनाओंका पुनरावर्तन होता है. 

अन्य कोमवादी मानसिकता रखनेवाली शिक्षा-संस्थाओंके विद्यार्थीओंने जे.एन.यु. के विद्यार्थीयोंके समर्थनमें प्रदर्शन किये. इनसे जे.एन.यु. के विद्यार्थीयोंके मनोबलमें असीम वृद्धि हुई.

बीजेपी शासनने जे.एन.यु. के नियमोंमें कुछ संशोधन किया.

क्यों संशोधन किया?

“अरे भाई, हम तो दोघलापन दिखानेवाले है ही नहीं. जो अन्य सरकार संचालित संस्थाएं है उसमें जो शिक्षण फीस और अन्य शुल्क शिक्षार्थीयोंसे लिये जाते है उसके साथ जे.एन.यु. के फीस और शुल्क तुलनात्मक होना आवश्यक है. यह आवश्यक नहीं है कि यदि कोई न्यायालयमें जाके न्याय मांगे और न्यायालय आदेश करें तभी हम फीस और शुल्कमें तुलनात्मकतासे परिवर्तन करें. सरकारी अन्य संस्थाएं, जे.एन.यु.से, प्रतिविद्यार्थी दशगुना खर्च करती है. यह सरकार पक्षपात्‌ नहीं कर सकती. पक्षपात्‌ करना भारतीय संविधानके विरुद्ध है.

“लेकिन जे.एन.यु. एक विशिष्ठ संस्था है …

“देशमें कई संस्थाएं विशिष्ठ है … वीजेटीआई, खरगपुरकी आई.टी.आइ. रुडकी आई.टी.आई. …

जी हाँ … सरकारने जेएनयुमें फीस और शुल्कमें वृद्धि की. अब इस वृद्धिका विवरण हम करेंगे नहीं. क्यों कि ये सब विवरण “ऑन-लाईन” पर उपलब्ध है.

किन्तु अब आप देखो मूर्धन्योंका वितंडावाद.

किस मूर्धन्यकी हम बात करेंगें?

प्रीतीश नंदीकी बात हम करेंगे.

डीबीभाईने [(दिव्य भास्कर दैनिक दिनांक २०-११-२०१९) गुजराती प्रकाशन ] प्रीतीशका लेख

यह प्रीतीशभाई, “जे.एन.यु. घटना”की सद्य घटित घटना जिसमें  फीस-शुल्क वृद्धिके अतिरिक्त कुछ विशेष भी संमिलित है उन बातोंको पतला-दुर्बल करनेके लिये नक्षलवादके जन्म तक पहूँच जाते है. और विवरणका प्रारंभ वहाँसे करते है.

“विद्यार्थी तो पहेलेसे ही विद्रोही होता है,

 “मैं जब महाविद्यालयमें था …. मुज़े पता चला कि कुछ अदृष्य हुए विद्यार्थी क्या कर रहे थे !!! अरे वे तो किसान और भूमिहीनोंकी लडाई लडनेके लिये देहातोंमें गये थे. वे तो संघर्ष करते थे. और कुछ तो उसमें शहिद भी हो गये. … अरे ये विद्रोही विद्यार्थीयोंमें कई लोग तो धनवान माता-पिताकी संतान थे … ये विद्यार्थी लोग सुविधाजनक जिंदगीसे उब चूके थे …” वगैरा वगैरा … तत्त्वज्ञान और त्याग … की बातें हमारे प्रीतीशभाईने लिख डाली. क्यों कि उनको जे.एन.यु. के विद्यार्थीयोंकी असाधारणता और उत्कृष्टता सिद्ध करनेके लिये ऐसी एक भूमिका बनानी है. चाहे उसका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुपसे भी सीधा या टेढा-मेढा संबंध भी न हो, तो भी.

जैसे कि

“हालके नोबेल पुरस्कारके विजेता के पिता भी हमारे महाविद्यालयमें हमारे अध्यापक थे.”

भला ! यह भी कोई तर्क है?

फिर हमारे प्रीतीशभाई, इन कुछ विद्यार्थीयोंकी तथा कथित “जीवनकी सार्थकताकी शोधकी तालाशामें थे” इस बातका जीक्र करते है.

“उस समयकी कविताएं, नाट्यगृहके नाटक, मूवीज़, शानदार वार्ताएं … आदि, उनकी निरस जीवनको पडकार दे रही थीं. … ये लोग तो समाजको एक कदम आगे ले गये थे … लेकिन समाजको बदलनेका उनके स्वप्नको किसीने भी सहयोग नहीं दिया … कोंग्रेस ने भी … (हंसना मना है)

फिर हमारे प्रीतीशभाई फ्रांस, जर्मनी, युरोपके देशों की बाते करते है. उन देशोंके तथा कथित हिरोका नाम लेते है. चाल्स द गॉल के विरुद्ध युवानोंने अभियान चलाया इस बातका भी उल्लेख करते है.

शायद प्रीतीशभाई पचास या साठके दशककी बातें कर रहे है.

“विद्यार्थी तो विद्यार्थी है, उसको तो पढाईमें ध्यान देना चाहिये”. इस बातको प्रीतीशभाई नकारते है. और उसी तर्क का आवर्तन करते है कि सूत्रोच्चार करने के लिये विद्यार्थीयोंको “टूकडे टूकडे गेंग” और “देश द्रोही” के आरोपी बनाये जाता है. प्रीतीशभाई यह भी लिखते है कि “विद्यार्थी विरोध नहीं करेगा तो कौन विरोध करेगा?” प्रीतीशभाई इस के समर्थनमें लिखते है कि अमेरिकाके  विद्यार्थीयोंने विएटनाम युद्धका विरोध किया था, ब्रीटनके विद्यार्थीयोंने  ब्रेक्ज़िटका विरोध किया था तो किसीने भी उनको “देशद्रोह”का लेबल नहीं लगाया था, तो यदि “जे.एन.यु. घटना” पर जे.एन.यु.के विद्यार्थीयों पर देशद्रोहका आरोप क्यों?

प्रीतीशभाईने  “वादोंका” भी जीक्र भी करते है.

१०० प्रतिशत लेख इन असंबंध विवरणोंसे भरा है.

क्या हमारे मूर्धन्य लोग सीधी बात नहीं कर सकते?

लोकशाहीमें सूत्रों को पूकारे जाते हैं किन्तु उसकी एक प्रक्रिया होती है. केवल सूत्र पूकारना एक गंदी सियासत है. आओ चर्चा करें…

आपके विश्वविद्यालयमें ही आपसे भीन्न विचारधारा रखनेवालोंसे  चर्चा सभा आयोजित करो. वियेतनाम युद्ध या चाल्स द गॉल या ब्रेक्ज़िट और अफज़लको फांसी   आदि ये तुलनात्मक विषय नहीं है. कमसे कम भारतके मूर्धन्यों की प्रज्ञानेमें यह भ्रम नहीं होना चाहिये.

प्रीतीश भाई कहेते है कि;

“ जे.एन.यु. के विद्यार्थीयोंका अनुरोध (डीमान्ड) न तो विश्वविद्यालय की फीसमें वृद्धि के विरोधमें है, न तो शुक्ल वृद्धिके विरोधमें है, न तो नियमोंमें किये गये परिवर्तनके विरोधमें है, न तो उपाहार गृह ११ बजे तक ही खूला रहेगा उसके विरोधमें है … वास्तवमें उनका विरोध वे उस जगतका विरोध कर रहे है जिसमें वे है, जिस दुनिया उनकी सरलता, निरापराधताकी परीक्षा ले रही है…..

इन विद्यार्थीयोंको (जिनके नेताविद्यार्थीगण २६ वर्षसे ४१ वर्षके है) उनको नियमबद्ध करना और भयभित करना बंद करो …. क्यों कि ऐसा करनेसे हमारे ये विद्यार्थी, वाहियात कायदाओंको मानने वाले हमारे जैसे स्वप्नहीन और बिनादिमागवाले बन जायेंगे … आदि आदि आदि “.

भाई मेरे प्रीतीश, क्या तत्त्वज्ञान चलाया है आपने, जिसमें कोई सुनिर्देशित मुद्दा ही नहीं है. प्रीतीशभाई का लेख एक ऐसे असंबंद्ध अनिश्चित बातोंसे पूर्ण होता है.

पढनेके पश्चात्‌ हमे लगता है कि हम कोई मूर्धन्यका लेख पढ रहे है या  कोई स्वयं प्रमाणित, स्वयंप्रमाणित सर्वतत्त्वज्ञ संत रजनीश मल जैसे बाबाका लेख?

लोकशाहीमें विरोध आवश्यक है. चर्चा आवश्यक है.  यह बात तो नरेन्द्र मोदी भी कहेते है. किन्तु विरोध करने की भी रीत होती है.

महात्मा गांधीको पढो.

कमसे कम उनका “मेरा स्वप्नका भारत” पढो और विरोध कैसे किया जाना चाहिये उनके उपर भी उन्होंने स्पष्ट रुपसे लिखा है. यदि आप शास्त्र पढनेमें मानते नहीं है और आप जिसको आपका हक्क समज़ते है और वही हक्क दुसरोंका नहीं होना चाहिये ऐसा ही मानते है तो सरकार अपनी दंड संहितासे आपको दंडित करेगा.

किन्तु दुःखकी बात यह है कि भारतके मूर्धन्य भी पूर्वग्रह से पीडित है और वे स्वयं वितंडावाद में ग्रस्त है.

शिरीष मोहनलाल दवे

चमत्कृतिः

अविज्ञातप्रबंधस्य वचः वाचस्पतिः इव I

व्रजति अफलतां एव नयत्युह इव अहितम्‌ II

बृहस्पतिकी वाणी जैसी उक्ति भी यदि संदर्भहीन हो तो, वह भी अन्याय करने वाले मनुष्यकी तरह निरर्थक है.

Read Full Post »

Older Posts »

%d bloggers like this: