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Archive for the ‘Uncategorized’ Category

२०२४में गद्दारोंको हरानेकी व्यूह रचना – २

सामुहिक रुपसे हमारा ध्येय स्पष्ट नहीं

सबसे बडी हमारी समस्या यह ही है कि हम राष्ट्रवादी लोग अधिकतर यह नहीं सोचते कि हमारी चर्चा मीथ्या की दिशामें जा रही है. और हममेंसे कई लोग इस परिस्थितिको समज़ ही नहीं पाते हैँ. और अपनी शक्तिको और समयको बरबाद करते है.हिक 

लुट्येन गेंगवाले अपने ध्येयमें स्पष्ट है कि, मोदीको हरानेके लिये सीवील वॉर, एवं हिंदुओंका विभाजन के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं है. इसलिये वे हिंदुओंको और मुस्लिमोंको-ख्रीस्तीयोंको उकसाना चाहते है. ख्रीस्तीयोंको उकसानेके लिये लुट्येन गेंगवाले लोग, पश्चिमी मीडीयाकी सहायता लेते है. और पश्चिमी मीडीया वाले, उनको यह सहाय देते भी है. मुस्लिमोंको उकसानेके लिये तो भारतके मुस्लिमनेता तयार है. इनके अतिरिक्त, हमारे समीपके मुस्लिम देश के शासकोंके लिये तो, (खास करके पाकिस्तानकी सरकारों के लिये यह) मुस्लिम जनमतको हिंदुओंके विरुद्ध उकसाना एक जनाधार है और उसमें आर्थिक रुपसे चीन उनकी सहायता करता है.

हमारे देशके पथभ्रष्ट मुस्लिम लोग, लुट्येनगेंगवालोंको और आतंकवादीयोंको भरपूर सहायता करते है क्योंकि ये लुट्येन गेंग वालोंका तो एक मात्र ध्येय है कि मोदी को हराना. इससे सरल कोई मार्ग है ही नहीं. क्यों कि “विकास” और “नैतिकता” के मुद्दे पर मोदीको हराना तो उनके बसकी बात नहीं है.

लुट्येन गेंगोका दुसरा ध्येय है कि हिंदुओंको विभाजित करो. हिंदुओंको विभाजित करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है. इसलिये ये लोग दलित, जाट, पटेल, मराठा, नीनामा, यादव, क्षेत्रवादी, भाषावादी, … आदि लोगोंमें जो कमअक्ल , स्वकेंद्री और अज्ञ लोक होते है उनको “तुम्हे अन्याय हुआ है” ऐसे विषय वस्तुको लेकर ब्लोग, लेख, समाचार, … द्वारा, हिंदुओंको विभाजित करते है.

हिंदुओंमे कुछ लोग जो फेंसींग पर बैठे है या कम अक्ल या अज्ञ है या स्वकेंद्री है वे, इनकी जालमें फंस जाते है, और अहंकारके कारण उनको हवा भी देते है.

राष्ट्रवादीयोंको समज़ना चाहिये कि इससे कुछ हिंदु लोग पथभ्रष्ट हो सकते है.

ऐसे हिंदु लोग मतदानसे विमुख रह सकते है. या नोटा (एक भी प्रत्याषी मतके योग्य नहीं है)का बटन दबा सकते है.

इस बातका इस ब्लोगके लेखकका अनुभव है. १९७९ – ८०मे जब जनता पार्टीकी सरकार गीरी, तब मीडीया विश्लेषक लोग, जनता पार्टीके नेतागणकी निंदा के लिये तूट पडे थे.

इसके परिणाम स्वरुप, जो लोग,  इंदिराके आपात्कालमें कारावासमें भी गये थे, वे लोग भी मतदानके लिये नहीं गये थे. इसके कारण भ्रष्ट कोंगी सरकार, फिरसे सत्तारुढ हो गयी थी. और इस कोंगी और उनके सांस्कृतिक सहयोगी पक्षोंने भारतका क्या हाल किया था वह आप सब लोग जानते ही है.

ममताका नया दांव

दलित वर्ग को लक्ष्य बनाना ममताके लिये सरल था. ममताने खुले आम,  दलितोंको डर बताया था कि हम जितेंगे तो तुम लोगोंके उपर खेरात करेंगे. यदि हमारा प्रत्याषी हार गया तो, तुम्हारी खैर नहीं.

दलित वर्ग एक ऐसा हिंदु वर्ग है जो आज भी गरीब है. उनको ये मोदी/बीजेपी विरोधी लोग लक्ष्य बनाते है. ममताको जब पता चला कि दलितोंने उसके पक्षको मत नहीं किया है तो उसने लाखों दलितोंके उपर अत्याचार किया, उनके घरोंको जलाया, उनको उनके  घरोंसे भगाया, उनकी महिलाओं की आबरु को निलाम किया, उनको नग्न करके उनके उपर दुष्कर्म किया. और ये सब रोहींग्या मुसलमानोंसे करवाया. ममताने स्वयंने गवर्नर एवं न्यायाधीश तक को हत्याकी धमकी दी/दिलवायी. ममता समज़ती है कि दलित लोग गरीबीके कारण लड नहीं सकते. और दलितोंको डराना और उनका वॉट लेना सरल कार्य है. और ममताने वह करके दिखाया है. यह प्रणाली अब पूरे भारतमें ये लुट्येन गेंग वाले लोग लागु करेंगे. दलितोंका धर्म परिवर्तन कराना भी सरल कार्य है. दलित लोग न तो न्यायालयका द्वार खटखटा सकते है न तो वे लोग लड सकते है. उनके लिये तो रोटी और जानका सवाल है.

आरएसएस वाले कुछ भी कर नहीं पाये.

यदि आर एस एस वाले प्रतिकारत्मक कार्यवाही करते तो, ल्युट्येन गेंग उनका जीना हराम कर देती. क्यों कि अभी भी न्यायतंत्र, ल्युट्येनगेंग वालोंसे मुक्त नहीं है. आज भी ममता और उनके साथी मुक्तरुपसे घुम रहे है और जी चाहे वह बोलते रहेते है.

एक बडा प्रश्न है.

हमें एक बात सुनिश्चित करना चाहिये कि हमें क्या चाहिये?

हमें मुसलमानोंका क्या करना है?

हमें मुसलमानोंको नेस्त नाबुद करना है?

या

हमें मुसलमानोंको हमारे देशसे भगाना है?

या

हमें मुसलमानोंके साथ रहेना है?

हमें यह भी सोचना है कि हम राष्ट्रवादीयोंकी हिंसा करनेकी ताकत क्या है? हमारे बीजेपी/मोदी सरकारकी ताकत क्या है.

मुसलमान लोग खुले आम धमकी दे कर हजारों हिंदुओंकी हत्याएं कर सकते हैं, अगणित हिंदु महिलाओं पर बलात्कार कर सकते है, सेंकडो हिंदुओंके घर जला सकते है, लाखों हिंदुओंको कश्मिरसे या कहींसे भी भगा सकते हैं. ये सब उन्होंने किया. फिर भी ये कोंगीयोंके, उनके सांस्कृतिक साथीयोंके और न्यायाधीशोंके कानोंमें कभी भी जू तक नहीं रेंगी.

इसके उपरांत मुसलमान लोग, देशमें अनेक केरेना बना सकते है.

और ये हिंदु लोग, कश्मिरकी बात तो छोडो, एक केरेना तक बना नहीं सकते. यह है भारतमें भारतीय मुस्लिमोंकी और घुसणखोर मुस्लिमोंकी ताकत.

ईश्वरकी कृपा मानो कि, उसने नरेंद्र मोदीको और बीजेपीको जिताया. और मुस्लिमोंकी ताकत घट रही है. लेकिन यदि फिरसे लुट्येन गेंग सत्ता में आती है तो लुट्येन गेंगवाले लोगोंकी, मुस्लिमोंकी और ख्रीस्तीयोंकी ताकत असीम बढ सकती है. हमें ईश्वर के भरोसे नहीं रहेना है. ईश्वर उन्हीको मदद करता है जो खुदकी मदद करते है. हर दफा ईश्वर अपने आप, मदद नहीं करता. 

हिंदुओंकी क्या ताकत है?

हिंदु लोग युद्धमें किसी को भी हरा सकते है. हिंदु लोग हमेशा जितते ही आये है. सिकंदर से लेकर अयुब खान तकको हराया है . हिंदु तब हारे है जब भारतस्थित गद्दारोंने दुश्मनोंको साथ दिया . निर्दोष लोगों की हत्या करना आम भारतीय (हिंदुओं) जनमानसका संस्कार नहीं है.

हमें भूल जाना है कि, हम कभी एक हिंदु केरेना भी बना पायेंगे. क्यों कि हिंदुओंकी सांस्कृतिक प्रकृतिकी ऐसी है ही नहीं.

तो राष्ट्रवादीयोंके लिये विकल्प क्या है?

विकल्प है भी या नहीं?

जी हांँ , विकल्प है और वह विकल्प सुचारु भी है. हमें हम पर आत्मविश्वास होना चाहिये.

वह कैसे?

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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नकलीको असली कहो और ध्वस्त करो – ५

यदि आप देश प्रेमी और राष्ट्र वादी है तो आपका कर्तव्य क्या है?

आपको एक बात समज़ना चाहिये की कोंगी,जिसको, कुछ लोग अज्ञानतावश और तर्कहीनता (राजकीय पक्षकी परिभाषा समज़नेका अभाव) के कारण “कोंग्रेस” कहेते है. उनकी यह बात जो लोग जनतंत्रकी परिभाषा और पक्षकी परिभाषा समज़ते है उनके लिये अस्विकार्य है. हमारा इस ब्लोगका विषय वह नहीं है. इसलिये हम इसकी चर्चा करेंगे नहीं.

हमें “कोंगी मानसिकता” समज़ना चाहिये कि कोंगी (कोंग्रेस) कोई भी हथकंडे अपना सकती है. जो पक्ष खुले आम कोमवादी आचरण करता है एवं खुले आम देशद्रोही आचरण करता है वह पक्ष हिंदुओंका विभाजन, हर मुद्दे पर कर ही सकता है.

कोंगीकी रणनीतिका यह एक अविभाज्य अंग है कि गांधीजीके सिद्धांतोंका खून तो हमने बार बार किया और करते रहेंगे, किंतु हमें गांधीजीकी निंदा भी करवाना है और उसको फैलाना भी है. कोंगीयोंको मालुम है कि गांधीजी एक महात्मा थे और उसके लाखों चाहनेवाले मध्यम स्तरके ज्ञानी और अज्ञानी दोनों है. इनमें विभाजन करना शक्य है. क्यों कि मूर्खता कोई कोम्युनीटीकी मोनोपोली नहीं है. यह काम हम दुसरोंसे करवायेंगे.

कुछ लोग इस बातको समज़ नहीं सकते है. भारतमें इस परिस्थितिका होना एक विडंबना है और अफसोस की बात है.

नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार यह बात समज़ती है. लेकिन कुछ लोगोंको यह बात हजम नहीं होती है. इससे देशको अवश्य हानि हो सकती है.

कोंगीयोंकी लुट्येन गेंगके लिये कोई भी निंदास्पद व्यवहार असंभव नहीं है. उनके अधिकतर मतदाता अटल है.

यह बात समज़ लो, कोंगीने राक्षस होनेके नाते, जब भी कोंगीके उपर प्रहार पडता है तो जो रक्तबिंदुएं धरती पडते है उनमेंसे और राक्षस पैदा होते है.

इसका आरंभ राक्षस नहेरुसे हुआ है. उसके बीज राक्षस नहेरुने ही १९४६में बोयें थे.

“किसीभी राज्यकी समितिने पक्ष प्रमुखके पद पर नहेरुके नामका प्रस्ताव पास किया नहीं है” ये समाचार जब गांधीजीने उस मानवरुपधारी, राक्षस नहेरुको बताया, तब नहेरुने अपना पक्ष-प्रमुख बनने का आवेदन वापस नहीं लिया. यदि नहेरु जनतंत्रवादी होते तो उनका कर्तव्य था कि वे अपना आवेदन वापस लेेले. नहेरु मौन रहे. वे अन्यमनस्क मूंँह बनाके वहांसे निकल गये. इस राक्षसके मनमें क्या था, वह गांधीजीने भांप लिया कि नहेरु कोई साहस करनेवाले है.

उस समयकी परिस्थिति को याद करो. केबीनेट मीशन देशका विभाजन करने पर तुला था. पाकिस्तान, खालिस्तान, दलितस्तान, द्रवीडीस्तान … की मांगे तो थी ही. उस समयकी कोंग्रेसका प्रयास था कि भारतका विभाजन कमसे कम हो.

नहेरुको तो हर हालतमें प्रधान मंत्री बनना ही था.

भारतकी संस्कृतिमें राक्षसका अर्थ क्या है? प्राचीन अर्थ भीन्न है. लेकिन प्रचलित अर्थ यह है कि जो स्वार्थके लिये यज्ञ (कर्म) करता है वह राक्षस है. जो विश्व हितमें यज्ञ करता है वह मानव है. जब स्वार्थ ही ध्येय है, तो जूठ तो बोलना ही पडेगा … सत्यको गुह्य रखना पडेगा … प्रपंच करना पडेगा … माया फैलानी पडेगी…

नहेरुने प्रारंभसे ही कोंग्रेसके भीतर एक समाजवादी-गुट बनाके रक्खा था. समाजवादी होना एक फैशन था. जैसे आजके युवाओमें दाढी रखनेका फैशन ३/४ सालसे चलता है. राक्षस नहेरुकी एक माया थी कि वे नौटंकी करनेके उस्ताद थे. इसलिये नहेरु (सुभाषचंद्रके अभावमें) जनतामें काफि लोकप्रिय थे.

यदि कोंग्रेसका विभाजन उस समय होता तो कोंग्रेस, केबीनेट मीशनके साथ सियासती परिसंवादमें अवश्य कमजोर बनती. नहेरु कमसे कम, उत्तरांचल राष्ट्र के प्रधान मंत्री बनते. देशी राज्योंके कई राजा भी अपना स्वतंत्र राष्ट्र मांगते ही थे. ऐसी परिस्थिति बननेका संभव था. गांधीजी ऐसा साहस करना नहीं चाहते थे. गांधीजीने सरदारसे वचन ले लिया कि सरदार पटेल ऐसी हालतमें कोंग्रेसको तूटने नहीं देंगे. सरदार पटेलने वचन दिया भी.

गांधीजीको मालुम था कि, लोकशाहीमें कोई भी व्यक्ति (जबतक सूरज-चांद रहे तब तक) कोई होद्दा पर आजीवन तक रह नहीं सकता. व्यक्तिको चूनावसे गुजरना पडता है.

गांधीजीको यह भी मालुम था, कि नहेरु मायावी है. और वे कुछ भी कर सकते है. स्वतंत्रता मिलनेके बाद इसीलिये गांधीजीने कोंग्रेसका विलय करनेको कहा. क्यों कि गांधीजी जानते थे कि नहेरु नौटंकी बाज है, और सत्ताके लिये कुछ भी कर सकते है. वैसे तो १९४८में सरदार पटेल का कद असीम बढ गया था. लेकिन वे आमचूनाव तक जिंदा नहीं रह पाये. यदि वे जिंदा रहेते तो १९५२के बाद, भारतके विकास का एक भीन्न स्वरुप होता.

नहेरुने अगणित गोलमाल करके और जूठकी दुकान खोलके कई जगह पर जीते हुए प्रत्याशी को हरा दिया. चूनाव की प्रणाली ही अपार क्षतियुक्त थी.

क्या करें?

नहेरुकी टीमके सदस्य नहेरु जैसे बुरे नहीं थे. नहेरु ही अपने पोर्टफोलीयोमें विफल रहे लेकिन अन्य मंत्रीयोंने अच्छा काम किया. नहेरुने विदेशनीतिमें अपने आर्षदृष्टिके अभावके कारण और वैचारिक धूनके कारण असीम गलतियां की जो आज भी देश भूगत रहा है.

लेकिन कोंगी राक्षसोंकी माया अपार है.

इन मायामें हमारी कई बुआएं और चाचूएं फंसे हुए है. वे नहेरुसे कहीं अधिक गांधीजीकी निंदा करते है. क्यों कि गांधीजी तो मर गये है.

नहेरुवीयन तो जिंदा है. उनके सहायक राक्षसोंने (जैसे कि ममता, शरद, उद्धव, केज्री, मुल्लायम, अखिलेश, फारुख, ओमर, डिएमके, एडीएमके के राक्षस, सीपीआईएमके राक्षसोंने … आदि अगणित नेताओंने) अपने विरोधीयोंका (जैसे कि साध्वी प्रज्ञा, बाबा रामदेव, अमित शाह, अर्णव गोस्वामी, कंगना रणोत, ममताको वोट न देनेवाले हजारों दलितोंका) क्या हाल किया था वह तो उनको मालुम ही है.

इसलिये ये चाचूएं और बुआएं, प्रवर्तमान समस्याओंमें इन राक्षसोंकी बुराई करनेका छोड कर, गांधीजीकी बुराई करनेमें व्यस्त रहेतीं हैं. हमारा नाम “देशभक्तोंकी लीस्ट”में होना आवश्यक है इसलिये नहेरुकी भी थोडी बहोत बुराई कर लेते है, लेकिन अधिकतर बुराई, मुघल, तैमूर, अल्लाउदीन, मोहम्मद तघलख, मोहम्मद घोरी, … इस्लाम, कुरान, शरीयत … आदि की बुराई करते रहेंगें. इससे मुस्लिम मतका धृवीकरण होता है. कोंगीयोंको और उनके साथीयोंको यही तो चाहिये.

तर्क शुद्धता और चर्चा किस बलाका नाम है?

शिरीष मोहनलाल दवे

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नकलीको असली कहो और ध्वस्त करो – ३

गत प्रकरणमें हमने लिखा था, चाचूओंका और बुआ/आंटिओंकी सामान्य प्रवृत्ति रही है कि; असली गांधीको पढो नहीं, किसीने जो बोलदिया उसको या तो स्वयंने कुछ गांधीजीके उपर सुनिश्चित और पूर्वनिश्चित तारतम्य निकाला उसके उपर ही बोलो.
जूठका एक नकली किला बनाओ … बोलो कि यही असली किला है. फिर उस नकली किलेको तोडो. लोगोंको बोलो कि हमने कैसे असली किला तोडा.

लेकिन इससे फायदा क्या …? यदि इससे फायदा भी है तो किसको फायदा?

ऐसे प्रश्न अवश्य उठते है. यह अवश्य संशोधनका विषय है. लेकिन वह हम बादमें देखेंगे कि इसका असर खास करके हिंदुओं पर और देशके उपर क्या पडने वाला है.
अभी तो हम कुछ चाचूओंको और बुआओंको देख लें. हम कभी “रोमीला थापर” जैसी बुआ, और “करण थापर” जैसे चाचूओंकी बात नहीं करेंगे, क्यों कि ऐसे लोग प्रमाणित देश द्रोही है.

आपको फिरसे एक बार बता देता हूंँ कि चाचूएं और बूआएं अनेक है. वैसे तो बुआएं कम है, लेकिन चाचूएं अगणित है.

हम किसीका नाम नहीं लेंगे. हमसे चर्चित बिंदुओंवाली (टोपिकवाली) टोपी/पगडी जिन चाचूओंको और बुआओंको फीट होती है तो वे लगाले. यदि उनको फीट नहीं भी होती है फिर भी जिन चाचूंओ और बुआओंको वह लगानी है तो भी वे लगा सकते है. हमे इससे कोई समस्या नहीं है.

आप कहोगे कि जो बुआएं है, वे कैसे टोपी/पगडी लगाएगी !!!

अरे भाईसाब, आज तो फर्जी सच बोलनेकी फैशन है. क्या यह असंभव नहीं है कि महिलाएं जूठ नहीं बोल सकतीं !

अब मुद्देकी बात करेंगे.

दो चाचू थे. एक बुआजी थीं.

तीनो एक विषय पर चर्चा कर रहे थे. उस चर्चामें जो भी कथन बोले जाते थे, और तारतम्य निकाले जाते थे उनमें ये तीनों, उन प्रस्तूतियोंका आनंद लेते थे.

संस्कृतका एक श्लोक याद आगया, मानो ऐसा लगता था;

ऊष्ट्राणां च गृहे लग्नं, गर्दभाः शांतिपाठकाः ।
परस्परं प्रशंसंते अहो रुपं अहो ध्वनिः ॥

ऊंटोंके घरमें लग्न हो और गधे शांति पाठ कर रहे हो
ये सब परस्पर एक दुसरेकी प्रशंसा कर रहे है; क्या मीठा आपका सूर है !!! … वाह क्या सुंदर रुप है … !!!

(इसको दो चाचू और एक बुआ तीनोंने जिन शब्दोंका चयन किया था उनमें उनकी परस्पर स्विकृतिके थी. इस बात पर कोई शक नही)

इन तीनोंका संवाद सूनके कोई एक बच्चूने उनको लिखा (संक्षिप्त) विस्तृत के लिये इस इमेलके संलग्न फाईल देखिये; या मुज़े इमेल करें, या यहां पर लिखें.

प्रिय चाचूएं और बुआजी,

आपके संवाद का शिर्षक है “गांधीसे मोह भंग”. आप तीनों परस्परके कथनोंसे संमत दिखाई देते है .

“चाचू – १”जी, आपने एम.के. गांधीकी हत्याको “गांधी-वध” शब्द से प्रस्तूत किया. “वध” शब्दका आपके द्वारा चयन होना यह दिखाता है कि जैसे “जयद्रथ वध”, “कंस वध”, “शिशुपाल वध” … हुआ वैसे “गांधी-वध” हुआ. क्या यह माता सरस्वति पर दुस्कर्म नही है?

फिर आपने “राष्ट्र पिता” शब्द जो गांधीजी के लिये कहा जाता है उसके उपर भी विरोध जताया. क्यों कि भारत तो हजारों साल पूराना राष्ट्र है. उसका पिता (उन्नीसवी शताब्दीका) गांधी कैसे हो सकता है?

आप जानते है इटलीके लिये राष्ट्रपिता कौन था? इटलीका राष्ट्रपिता “गेरीबाल्डी” था. आपका क्या कहेना है? इटली भी तो दो हजार सालसे अधिक पूराना है.

आप आगे आईए, और दिखाईए, कि, आपके हिसाबसे, सबसे प्रभावशाली मुद्दा कौनसा है, जिसके लिये गांधीजी ही सबसे अधिक जीम्मेवार है, और उससे देशको सबसे अधिक नुकशान हुआ है.

लिखित बच्चू

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(चाचू का उत्तर )

“गांधी की अहिंसा और राजनीति” और “गांधीके ब्रह्मचर्यके प्रयोग” ये दोनों बुक एक साल पहेले प्रकाशित हुई है. वे दोनों “कलेक्टेड वर्कस ओफ महात्मा गांधी पर आधारित है. इन पर आप क्षति निकालीये.

जो हमारी तीनोंकी चर्चामेंसे आपको एक भी बात अच्छी नहीं लगी तो आगे चर्चा व्यर्थ है.

लिखित चाचू
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फिर बच्चूने क्या लिखा?

बच्चूने प्रत्युत्तर लिखा

क्या आप “गांधी – वध” में “वध” शब्दके औचित्यको सिद्ध कर सकते है?

“राष्ट्र पिता” की परिभाषा पर आप प्रकाश डाल सकते हैं? “राष्ट्र पिता”का प्रणालीगत “पिता” के अतिरिक्त क्या अर्थ है?

मैं आपको “फलां फलां पुस्तक पढो,” ऐसा नहीं कहूंँगा.

मैं आपके साथ इन दो शब्द प्रयोग पर ही चर्चा करना चाहता हूंँ.

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चाचूने लिखा

मैंने न तो मेरी बुकमें “वध” शब्दका उपयोग किया है न तो मेरे लेखमें उपयोग किया है.
“राष्ट्रपिता” एक मूर्खता पूर्ण शब्द है.

यदि आप फिर भी आपके प्रश्नका उत्तर चाहते है तो निम्न दर्शित वीडीयो देखो.

“मैंने गांधीको क्यूंँ मारा”गोडसे का बचाव. कोएनराड एल्स्ट.
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बच्चूने लिखा

हमारी जो बात है वह “गांधीसे मोह भंग” वीडीयोमे आप तीनोंके  संवादकी बात है.

आपको “गांधीवध” और “राष्ट्रपिता” के मेरे प्रश्न पर उत्तर देना है.
आप द्वारा प्रेषित वीडीयोकी तो बात ही नहीं है.
यदि आप गांधीकी हत्याको उचित मानते है तो मेरे कुछ प्रश्न है;

“हांँ” या “ना” में उत्तर दजिये.

भाग-१

(१) कया आप गांधीजीके खून पर चल रही न्यायिक प्रक्रियामें जो बातें बताई, उन का अनुमोदन करते है?
(२) क्या आप गोडसेकी बातोंका अनुमोदन करते है?
(३)क्या गोडसेने जो बातें कही वे, और किसीको पता ही नहीं था?
(४) क्या गोडसे कोई खास गुप्तचर सेवा चलाता था जो सरकारसे चलती गुप्तचर सेवासे भी उत्कृष्ट थी?
(५) गोडसेने गांधीको मारनेका कारण बताया कि, गांधी ५५ करोड रुपया पाकिस्तानको दिलवानेके लिये आमरणांत उपवास पर बैठे थे. क्या इस बातका आप अनुमोदन करते है?

भाग-२

(१) न्यायाधीशने इस मतलबका कहा कि, “यदि मुज़े यहांँ उपस्थित जनताके बहुमतसे न्याय करना है तो मुज़े गोडसेको बरी कर देना है.” क्या आप मानते है कि न्याय देना बहुमतके आधारसे मान्य करना चाहिये?
(२) आप मानते है कि जिसके उपर (गांधी) आरोप है उसको सज़ा देनेसे पहेले उसको क्या कहेना है वह सूनना चाहिये?
(३) गोडसेने गांधीजीको सज़ा देनेसे पहेले गांधीजीको सूना था?
(४) क्या धारणाओंके आधार पर किसीको सजा देना योग्य है?

मैं मेरी बात दोहराता हूंँ. आप, अपने हिसाबसे, सबसे प्रभावशाली मुद्दा कौनसा है जिसके लिये, गांधीजी ही सबसे अधिक जीम्मेवार है और उससे देशको सबसे अधिक नुकशान हुआ है?

आपने जो वीडीयो “मैंने गांधीको क्यूंँ मारा”गोडसे का बचाव. कोएनराड एल्स्ट. भेजा है.

(मुझे, एक से एक संवाद चाहिये. मैं कुछ पूछुं और सामने वाला एक विडीयो भेज दे, जिसमें,  कोएनराड लिखित गांधीके जीवनका अपना नेरेटीव्ज़ भेजे, उसका कोई मतल ही नहीं. यदि आप बुकके पन्नोंके फोटोका वीडीयो बनाके भेजो और फिर कहो कि यह तो बुक है वीडीयो नहीं. ) यह कोई चर्चा नहीं है.
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चाचूने लिखा

आप वीडीयो और बुकका भेद समज़ते नहीं.

आप अतिरेक करते है वह समज़में नही आता.

आप शब्दोंके उपर विरोध करते है.

आपके साथ संवाद नहीं हो सकता.

मैं संवाद रोक देता हूंँ

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बच्चूने लिखा

“गांधीसे मोहभंग” वाला आपका तीनोंका संवाद एक कलाक तक सूना. आप तीनों हर बात पर एक दुसरेसे सहमत दिखाई देते थे, और सहमत है भी. किसीने किसीका किसी बातका विरोध नहीं किया है.

आपका संवाद अतार्किक था. मैंने दो शब्द-प्रयोगवाले दो कथन पकडे.

वे दोनों कथन, गांधीजी के उपरके आपके अभिप्राय को उजागर करते थे. उन पर चर्चाके लिये मैंने प्रश्न किये है.

उपसंहार

गांधी-विरोधीयोंमें एक प्रतिक्रिया समान रुपसे है कि, या तो विषयको बदल देना, या तो कोई लेख या विडीयो-लींक सामने वालेको दे देना. आपने वही किया. गांधी-विरोधीयोंको “वन टु वन” चर्चा करनेका कोई कष्ट लेना नहीं है.
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बुआ जी की बात;

गांधी-फोबिया पीडीतोंका दुसरा एक वीडीयो सामने आया.

इस वीडीयोमें एक यंग महिला, अपने हिसाबसे रामराज्यका विश्लेषण कर रही थी. और वही बुआजी, उसमेंसे, गांधीजीकी समज़ का रामराज्य पर, अपना अर्थघटन लगाके, गांधीजीकी बुराई करना चाहती थीं. बुआजी इसके लिये उत्सुक, एवं प्रयत्नशील रहती थीं. बुआजी, उस महिलाके शाब्दिक एवं अप्रच्छन्न समर्थनके लिये प्रयत्नशील रहती थीं.

महिला भी चालाक थी. जब बुआजी अपना उपद्रव गांधीके उपर दिखाती थीं, तब वह महिला मंद मंद मुस्कराती थीं. वह बुआजीका अपमान करना चाहती नहीं थीं ऐसा स्पष्ट दिखाई देता है.

बुआजी बार बार गांधीजीके रामको “पुतलावाला राम” स्थापित करना चाहती थी.

बुआजीने पुतलावाला राम शब्द कहांँसे निकाला? इस बातको तो राम ही जाने.

वाल्मिकीका राम लो, या तुलसीदासजीका राम लो, या गांधीजीके राम लो … तीनों पुरुष तो एक ही है. तीनो राम, दशरथ राजाके ज्येष्ठ पुत्र है. लेकिन रामके दो स्वरुप है.  एक ईश्वर और एक राजा राम.  वाल्मिकीके राम विष्णुके अवतार है. तुलसीदासके राम ब्रह्म स्वरुप है. और महात्मा गांधीके राम सबके हृदयमें रममाण परम तत्त्व है. जब “राजा राम” की बात होती है तब आदर्श राजा (शासक) की बात होती है. 

कुछ मुस्लिम लोग हिंदुओंकी बुराई करनेके लिये, हिंदुओंको बुत – परस्त कहेते हैं. संभव है कि, यह बुआजी भी गांधीजीको अपमानित करनेके लिये, गांधीजीके रामको “पुतलावाला राम” नामसे पहेचान करवाती है.

शिरीष मोहनलाल दवे

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नकलीको असली कहो और ध्वस्त करो – २

हमने गत अध्याय (चेप्टर)में देखा कि, नकली यदि एक व्यक्तित्त्व होता है, तो उसको जूठ/ विवादास्पद वर्णन/फर्जी/अर्ध सत्य/वितंडावाद प्रचारका सहारा लेके, असलीके रुपमें प्रदर्शित किया जाता है. क्यों कि उस सुनिश्चित व्यक्तिके व्यक्तित्वको नष्ट करना ही कुछ लोगोंका हेतु होता है. “नकली” व्यक्तित्त्व के निर्माताओं का आखरी हेतु एक नहीं किंतु, परस्पर भीन्न भीन्न, एवं प्रच्छन्न भी होता है.

तो चलो हम देखें चाचू, चाची, दादू, बच्चू, असली, नकली कैसे प्रदर्शित होते हैं !!!

आखिर इन लोगोंका ध्येय क्या है? ये लोग कौन है यह मुद्दा भी संशोधनका विषय है !!

ये लोग चाहते हैं कि जनता इन लोगोंके ध्येय सत्य, तथ्य, श्रेय … एवं विशुद्ध तर्क इन सबकी चचामें न पडें. इन लोग द्वारा जो पुरस्कृत होता है वह अपने आपमें परिपूर्ण है ऐसा मान लिया जाय, क्यों कि वे अंकल/आंटी/बुआ सेम या सारा है.

हमने “दुरात्मा गांधी एवं विनाश पुरुष मोदी” विषय के संदर्भमें गत ब्लोगमें इन लोगोंकी समज़ को देखा. उनके तर्क को देखा. उनके तारताम्योंको भी देखा.

उनकी मानसिकता यह है, कि वे जो संदर्भ प्रस्तूत करे उसको ही ग्राह्य समज़ना, विरोधीने जो संदर्भ प्रस्तूत किया उसके उपर ध्यान देना ही नहीं.

एक महानुभावने प्रचलित और तथा कथित कथन के समर्थनमॅ एक लेख लिखा. “मुस्लिम तुष्टीकरणका प्रारंभ गांधीजीने किया.”

मैंने लिखा कि आप एक मुद्दा बताओ कि जिससे आपका निष्कर्ष प्रमाणित हो जाय कि, गांधीजी मुस्लिमोंकी मार से डरते थे इसलिये उनका तूष्टिकरण किया करते थे.

न्यायिक अनिवार्यता

न्याय करने कि प्रक्रियाकी एक अनिवार्यता है, कि जब हम किसीके उपर आरोप लगावें और उसको सही भी मान ले तो उसके पूर्व हमारा धर्म बनता है कि जिसके उपर हमने आरोप लगाया है, उसको हम सूने कि उसको इस घटनाके बारेमें क्या कहेना है.

उसकी बातको सूनना चाहिये. फिर उसके कथन का तर्क संगत विश्लेषण करके, उसके उपर हमें निर्णय करना चाहिये.

उपरोक्त महानुभाव ने कोई उत्तर दिया नहीं. मैंने इन महानुभावके लेखके प्रथम दो पेरेग्राफ पढे. एकमें लिखा था “ मुस्लिमोंने द. आफ्रिकामें गांधीजीके आंदोलनको सपोर्ट नहीं किया था. वे उनसे नाराज थे.” मैंने उनको कहा कि गांधीजी कि आत्मकथामें मुझे ऐसा कोई उल्लेख मिला नही है.

ये महानुभावने अपने लेखके दुसरे पेरेग्राफमें बाबा साहेब आंबेडकर का कथन का उल्लेख किया है किया है कि गांधीजी मुसलमानोंकी मारसे डरते थे. इसलिये उनका तूष्टीकरण करते थे.

मैंने लेखक महाशयको दिखाया कि यदि गांधीजी मुस्लिमसे डरते थे यदि यह बात सही है तो गांधीजी ख्रिस्तीयोंसे भी डरना चाहिये. क्यों कि गांधीजी ख्रिस्ती मॉबसे भी पीटे गये थे. ख्रिस्ती मॉबने गांधीजी को इतना पीटा था कि उनको चक्कर आने लगे थे और वे खडा नहीं रह पाये थे. (गांधीजीकी ओटोबायोग्राफी भाग – ३, प्रकरण-३).

गांधीजी को एक मुस्लिमने यहां तक पीटा था कि वे मारकी पीडासे बेहोश हो गये थे. गांधीजीने इस प्रसंग से कहा है कि; ” जब मैं बेहोश था मेरी पीडा चली गयी. मैं समज़ता हूंँ कि आत्मा जब शरीरसे अलग होती है तो पीडाका दुःख नहीं होता. जब शरीरके साथ होती है तो पीडा होती है. इससे मेरी हिमतमें वृद्धि हो गयी. “(संदर्भ “कलेक्टेड वर्क ऑफ महात्मा गांधी भाग – ८ पेज १५५”).

लेखक महाशय को समज़ना चाहिये कि बाबा साहेब आंबेडकरने जो कहा वह उनका अभिप्राय था. अभिप्राय और एवीडंस (प्रमाण), दोनों भीन्न भीन्न है.

इतना सब प्रदर्शित करने पर भी लेखक महाशयने कहा कि लेखक महाशय स्वयंने उनके सभी तर्कोमें प्रमाण दिये है. और प्रतिपक्षवाला मैंने, एक भी प्रमाण दिया नहीं है.

इस तरह स्वयं गलत होने पर भी मुज़े गलत बताया.

क्या किसीको जूठा कहेना गली नहीं है? “जूठा” शब्द गाली नहीं है तो क्या है? अवश्य यह गाली ही है. यदि कोई व्यक्तिने संदर्भ प्रस्तूत किया है, और फिर भी उसको कहेना कि तुमने एक भी संदर्भ प्रस्तूत नहीं किया, तो “जूठा (गलत)” एक गाली ही है. गालीकी परिभाषा यही तो है.

लेखक महाशयने मेरे इ-मेलोंका उत्तर नहीं दिया.

चाचू, बच्चू, दादू, बुआ, चाची … संवाद श्रेणी के ब्लोग “दुरात्मा गांधी और विनाशपुरुष मोदी” में, अनेक चाचूओंके विषयमें लिखा है. एक टोपी, इन लेखक महाशयको फीट हो गयी. तो फिरसे ये महाशय मुज़े नयी (उम्रसे संबंधित) “बिनविवादास्पद सही गाली” दे कर भाग गये.

“महानुभाव बननेके लिये ये सब करना आवश्यक है”

संस्कृतमें एक श्लोक है, कि ;

“अकृतोपद्रव कश्चिद्‍ महानपि न पूज्यते” तो चाचूओंका तो क्या कहेना … ?

यदि आपको पूजनीय बनना है तो थोडा बहोत उपद्रव तो करना ही पडेगा.

गांधीजी हिंदु और मुस्लिमके बीच भेदभाव नहीं रखते थे. वे जो हिंदुओंको कहेते थे वही बात वे मुस्लिमोंको भी कहेते थे. कोंग्रेसी नेताओंके प्रति वे अवश्य भीन्न थे. लेकिन कई महाशय लोग, “इधरसे कुछ उठाओ, …  उधरसे कुछ उठाओ, … छूट पूट उठाओ …. फिर उनकी अपने हिसाबसे रचना बनाओ. और अपना ध्येय सिद्ध हुआ ऐसा मानो और मनवाओ.

एक जूठका एक नकली किला बनाओ … बोलो कि यही असली किला है. फिर उस नकली किलेको तोडो. लोगोंको बोलो कि हमने कैसे असली किला तोडा.

लेकिन इससे फायदा क्या?

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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नकलीको असली कहो और ध्वस्त करो – १

लोग हमें पूछते है …

बच्चू क्या है?

दादु क्या है?

चाचू क्या है?

चाची या आंटी क्या है?

असली, नकली किला क्या है? …

बच्चूसे मतलब है कोमन मेन

लेकिन कोमन मेनके बारेमें तो एक मूंँहावरा है कि कोमन सेंस इज़ कोमनली अनकोमन. [ common sense (the sense to understand common matters) is commonly (generally) uncommon. That means common men generally does not have common sense] यानी कि, सामान्यतः सामान्य बुद्धि (सामान्य बातोंको समज़ने वाली बुद्धि) , सामान्य व्यक्तिमें न होना सामान्य है.लेकिन यह तो शक्यताका सिद्धांत है. इसीलिये शक्यताके सिद्धांतके आधार पर असामान्यतः यानी कि सामान्यव्यक्तिमें सामान्यबुद्धि हो भी सकती है. हमारा यह बच्चू, सामान्यबुद्धि रखता है.

यह सामान्य बुद्धि है क्या?

पूरा विज्ञान, मतलब कि, भौतिक शास्त्र, सामान्य बुद्धि पर, अवलंबित है, जो सामान्य सिद्धांतोंके आधारके उपर असामान्य निष्कर्ष निकालता है.

ओके चलो. ये सब बादमें देखेंगे.

यह दादू क्या है

दादू से मतलब है “निष्णात”. सुज्ञ.महानुभाव, महापुरुष, सुचारुरुपसे सत्य, श्रेय और आनेवाली घटनाओंको, और उनकी असरोंको समज़नेवाला.

यह चाचू क्या है?

चाचूका मतलब है … जो स्वयंको (अपनी सोसीयल मीडीयावाली सामाजिक कवरेज के कारण) दादू समज़ता है वह चाचू है. “अंकल सेम” कौन है मालुम है?

हांँ जी, सूना है. “अंकल सेम” से मतलब है अमेरिका यानी कि यु.एस.ए. का राष्ट्रप्रमुख.

सही कहा. चाहे अंकल सेम किसीभी पार्टीका हो वह यदि यु.एस.ए.का प्रेसीडेंट बन गया, तो अंकलसेम स्वयंको विश्वका चाचा समज़ता है. वह पूरे विश्वके देशोंको सूचनाएं सलाह और एवं आदेश दे सकता है. उसी प्रकार यदि किसी व्यक्तिको अपनी योग्यतासे अधिक प्रसिद्धि मिल गयी हो तो वह अपनेको चाचू (अंकल सेम), समज़ने लगता है और अन्य सामान्य जन को बच्चू समज़ता है. जैसे कि फिलमके क्षेत्रके अभिनेता, निर्माता, वितरक, लेखक, … या तो वर्तमान पत्रके तंत्री, कोलमीस्ट्स, विश्लेषक, … एवॉर्डधारी, कोई संस्थाके पदधारी [कोंगीके पद धारी रा.गा., सोनिया, मीसेज़ प्रियंका वाईदरा (घांडी)] …

यह असली नकली किला क्या है?

“असली” यदि एक निर्माण/स्थापत्य है तो वह जिस प्रयोजनसे बना है या बनाया गया है वह असामान्यरुपसे शक्तिमान है. वह अनियत और प्रलंबित काल तक प्राकृतिक प्रहार सहन कर सकता है. कभी कभी असली यह भी होता है जो तूट कर भी फिर से बन जाता है. बार बार तूट कर बार बार बन जाता है. “असली”को बनानेमें कालमींढ पत्थर, चूना और पानीका उपयोग होता है. इन तीनोंसे मिलकर स्थापत्यका यथेच्छ आकार बनता है. चूना और पानी मिलकर प्रारंभमें केल्स्यम हाईड्रोक्साईड बनता है और समयांतरमें वह केल्स्यम कार्बोनेट पत्थर बन जाता है. कालमींढ पत्थर और केल्स्यम कार्बोनेट एकदुसरेके साथ एकजूट पत्थर जैसा बन जाता है. समय साथ वह मजबुतसे अतिमजबुत बनने लगता है.

यदि “असली” एक व्यक्तित्त्व है, तो वह तार्किक सिद्धांत/विचारधारा और आचार संहितासे बनता है. सिद्धांत/विचारधारा पर यदि “ कलुषित मानवजुथ सर्जित”, आक्रमण एवं विसंवादित विचार धाराओंके प्रहार होते हैं तो वह झेल सकता है. क्यों कि ये “मानव जुथ” वास्तवमें, परस्परमें भी और स्वयंमें भी विरोधाभासी एवं विसंवादी होते है.

नकली क्या होता है?

नकली एक “ प्रतिकृति” होती है. वह अस्थायी और कमजोर होती है. वह खास हेतुसे बनायी जाती है. उसको नष्ट करनेके लिये बनाया जाता है. उसको रेत, मीट्टी और तेल या पानीसे बनाया जाता है. रेतका उपयोग, प्रतिकृतिको कमजोर रखनेके लिये, किया जाता है, मीटी और पानी/तेल का उपयोग, रेतको चीपकाके, प्रतिकृति/ संरचनाको “असली”वाला आकार देनेके लिये होता है.

नकली यदि एक व्यक्तित्त्व होता है, तो उसको जूठ, विवादास्पद वर्णन/फर्जी/अर्ध सत्य और वितंडावादी प्रचारका सहारा लेके, असलीके रुपमें प्रदर्शित किया जाता है. क्यों कि उस सुनिश्चित व्यक्तिके व्यक्तित्वको नष्ट करना ही उनका हेतु होता है. “नकली” व्यक्तित्त्व के निर्माताओं का आखरी हेतु, परस्पर भीन्न भीन्न, एवं प्रच्छन्न भी होता है.

तो चलो हम देखें चाचू, चाची, दादू, बच्चू, असली, नकली कैसे प्रदर्शित होते हैं !!!

( क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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दुरात्मा गांधी और विनाशपुरुष मोदी – ४

गत ब्लोगसे चालु;

बच्चेने अपने चाचुसे बोलाः “ और दूसरी खास बात, गांधीजीके राजकीय क्षेत्रके योगदान को छोड कर, उनका और क्या योगदान था? इसके बारेमें आप क्या जानते है वह मुज़े बताओ …

“चल हट, बच्चू … !! तेरे साथ बात करना बेकार है.

“चाचू, आप ने शायद श्री दिनकर जोषीजीकी “जीन्ना” पर लिखी किताब भी नहीं पढी है. जीन्ना की गांधीजीके विरोधकी भाषा और शैलीसे भी बढकर, आजके कोंगीनेताओंकी और उनके सांस्कृतिक सहयोगी लुट्येन गेंगके नेताओंकी नरेंद्र मोदीके विरुद्ध भाषा और शैली है.

“कौन दिनकर जोषी?

“लो बस… कर लो बात. यदि आपने ‘दिनकर जोषीजी’को पढा नहीं और गांधीजीके विरुद्ध बोलते हो तो सब आपकी महेनत बेकार गयी. सोरी सोरी … आपने तो महेनत तो की ही नहीं है. इधर उधर के कुछ गांधी विरोधीयोंके या भारतकी संस्कृतिसे अज्ञ विदेशी लेखकों द्वारा लिखे, छूट पूट कथनोंमेंसे, आपके अनुकुल कथनोंको उठाकर, उनको ही ब्रह्म वाक्य मानकर, आप तो, गांधीकी कटू आलोचना कर देते है.

“बच्चू, तेरे कहेना मतलब क्या है? कोई मिसाल है?

“मिसाल के तौर पर एक लेखक एलन अक्षेलरोड ने लिखा है कि गांधीजी शाकाहारी इसलिये थे कि उनके एक मित्र जैन थे. जैन लोग शाकाहारी होते है.

“तो इसमें गलत क्या है?

“ ‘वैष्णव बनिये’ क्या कम शाकाहारी होते है? ब्राह्मण तो हड्डीको, पींछे को छूते तक नहीं. मावजीभाई दवे तो उनके कौटुंबिक सलाहकार थे.

“तो क्या हुआ? उसने जो सोचा वह लिख दिया. तूम तो बालकी खाल निकालते हो …!!!

“बात यह नहीं है कि वह गलत था. बात यह है कि मानव समाजका, एक व्यक्तिके उपर क्या प्रभाव है. बडे परिवर्तनके लिये कभी कोई एक ही परिबल प्रभावक नहीं हो सकता. ‘एलन अक्षेलरोड’ ने तो गांधीजीकी प्रबंधन निपूणता का असाधारण विश्लेषण किया है. गांधीजीकी नेतृत्व करने की क्षमताका भी खुबसूरत विश्लेषण किया है. जो बात तत्कालिन समाजसे संबंधित नहीं थी या तो कम प्रभावित थी, ऐसी बातोंका निरुपण, विदेशी विश्लेषक अच्छी तरह कर सकता है. लेकिन हिंदु समाजका विश्लेषण या उनसे संलग्न घटनाओंका विश्लेषण करना है तो हिंदुओंके साथ दो दशकके लिये जीना पडता है.

ईंग्लेंडमें गांधीकी प्रवृत्ति, साउथ आफ्रिकामें गांधीजीकी प्रवृत्ति, भारतमें मुस्लिमोंके साथ गांधीजीकी प्रवृत्ति, भारतमें अंग्रेज सरकारके साथ गांधीजीकी प्रवृत्ति, हिंदु समाजके साथ गांधीजीकी प्रवृत्ति, भारतकी अर्थव्यवस्थाके साथ गांधीजीकी प्रवृत्ति, हिंदु धर्मके साथ गांधीजीकी प्रवृत्ति …. इन सबके बारेमें विश्लेषण करना है तो भीन्न भीन्न क्षेत्रके ज्ञाता चाहिये. एक क्षेत्रका ज्ञाता लिख नहीं सकता.

एक विदेशी महिला इतिहासकार (?) संभव है वह रोमिला थापर की शिष्या हो, उसने लिखा, प्राचीन भारतके लोग, केवल कुत्तेको ही पहेचानते थे. बाकी सब प्राणीयोंको वे अश्व कहेते थे. कुत्तेको ‘श्व’ कहेते थे और बाकी प्राणीयोंको “अ-श्व” कहेते थे. (अ = नहीं. श्व= कुत्ता. अश्व = कुत्ता नहीं. कुत्तेसे भीन्न प्राणी = अश्व). रोमिला थापर का उल्लेख इस लिये किया है कि उसके कहेनेके अनुसार मुस्लिमों द्वारा मूर्त्ति तोडना और हिंदु राजा द्वारा मूर्त्ति को उठाके ले जाना एक ही बात है.

“तू कहेना क्या चाहता है, बच्चू?” चाचू उवाच.

“यही की ‘हम सत्य प्रिय है’ वाली कुछ लोगोंकी प्रणाली ऐसे ही चालु रहेगी और तथा कथित महानुभाव लोग, ठीक ठीक पढनेका कष्ट उठाने के बदले, सिंहावलोकन करके “ ‘वाणीविलास’ करनेमें अधिक परिश्रम करेंगे और छूटपूट कथनोंका सहारा लेके , अपने द्वारा पूर्वनिर्धारित तारतम्य निकालते रहेंगे, तो सौ सालके बाद, हमे क्या पढनेको मिल सकता है मालुम है !!!

“तुम बोलो तो हम भी सूने” चाचू उवाच.

“ तो चाचू सूनो … ई.स. २१२१ का यह भविष्यकालका लेख पढो;

नरेंद्र मोदीने सन १९८९ -९० में काश्मिरमें १००००+ हिंदुओंका नरसंहास करवाया. हजारों हिंदु औरतोंका गेंग रेप करवाया और पूर्व आयोजित तरिकेसे लाखों हिंदुओंका पलायन करवाया. इस बात पर, पाकिस्तान की एक चेलन पर चर्चा हो रही थी, तब शशि थरुरने अनुमोदन किया. नरेंद्र मोदीने कभी भी इस बातको नकारा नहीं. आर. एस. एस. के कोई भी नेताने भी इस बातको नकारा नहीं. आप जानते होगे कि नरेंद्र मोदी उस समय आर एस एस द्वारा संचालित बीजेपीका महामंत्री था.

मुस्लिमोंका तूष्टीकरण करनेमें नरेंद्र मोदी अग्रेसर था. इनके तो हजारों उदाहरण है. उसने कश्मिरमें सबसे अधिक प्रोजेक्ट डाले. उसने जम्मुको अन्याय करना चालु रक्खा. वह बोलता रहेता था कि सबका विकास सबका विश्वास. सबका विश्वास शब्द से सूचित था मुस्लिमोंका विश्वास.

मोदी देशके लूटनेवालोंसे मिला हुआ था. इन लुटनेवालोंको उस समयका मीडीया लुट्येन गेंगसे पहेचाना जाता था. ये लुट्येन गेंगवाले पाकिस्तान और चीन परस्त थे. ममताके सामने नरेंद्र मोदीने बीजेपीको हराया. लेकिन अपने प्लानको छीपाने के लिये केवल ममताको ही हराया. जो मुख्य मंत्रीको हरा सकता है वह क्या ममताकी पार्टीके आम प्रत्याशीयोंको नहीं हरा सकता क्या? नरेंद्र मोदीने मूंह छीपानेके लिये केवल दो डीजीटमें बीजेपीकी सीटें जीता. मोदीके मुस्लिम तुष्टीकरणकी नीतिस, कई लोग बीजेपीको छोड कर भागने लगे थे. बीजेपीका पुराना साथी “शिव सेना” भी मोदीकी मुस्लिम तुष्टीकरणकी नीतिके कारण बीजेपीसे अलग हो गया था.

सुब्रह्मनीयन स्वामी नामका बीजेपीका एक महान एवं होनहार नेता था. उसने राममंदिरका केस लडा था, रामसेतूका केस भी लडा था. दोनो केस जितवाये थे. इस नेताने लुट्येनगेंगके कई नेताओंको न्यायालय में मुकद्दमा लडके कारावासमें भेजा था. नरेंद्र मोदीने इस स्वामीको कभी भी एक छोटासा मंत्री भी नहीं बनाया.

नरेंद्र मोदी को केवल वाह वाह चाहिये थी. उसको लोग फेंकू भी कहेते थे. लेकिन वह अपनी गोदी मीडीया द्वारा अपनी प्रसिद्धि करवाता था. वह सत्ताका लालची था. वह प्रच्छन्न रुपसे इंदिरा नहेरु गांधीका प्रशंसक था और जब आवश्यक्ता पडने पर इन तीनों की प्रशंसा कर लेता था.

उसने बाजपायी जैसे कदावर नेताको ब्लेक मेल करके, खुदको गुजरातका मुख्य मंत्री बनवाया था. और गुजरातका मुख्यमंत्री बननेके बाद वह देशका प्रधान मंत्री बननेका स्वप्न देखा करता था.

अष्टम पष्टम करके वह देशका प्रधान मंत्री भी बन गया था.

यह नरेंद्र मोदी अपने बारेमें कहा करता था कि वह १८ घंटा काम करता है लेकिन वास्तवमें उसको आंखे खुला रखके सोनेकी आदत थी.

उसको अपने भाई, बहन, पत्नीसे बनती नहीं थी. वह अपनी अतिवृद्ध मांका भी खयाल नही रखता था.

नरेंद्र मोदी एक अत्यंत कामी पुरुष था. दुसरा गांधी ही समज़ लो.

महिलाओंका उपभोग करनेका आदि था. जब वह मुख्य मंत्री था तबसे वह महिलाओंके लिये योजनाएं बनाता था ताकि ज्यादासे ज्यादा महिलाओंका वह उपभोग कर सके. सखी-मंडल, मा, आशावर्कर … ३३ % महिला आरक्षण ये सब क्या था?

वास्तवमें नरेंद्र मोदी मोहनदास गांधीका अवतार था. उसने अपने “मोहनदास गांधी” के अवतारमें कोई सत्ताधारी पद का उपभोग किया नहीं, क्यों कि वह जीम्मेवारी लेना नहीं चाहता था.

लेकिन उसके बाद उसने अपने नरेंद्र मोदीके अवतारमें नहेरु, इंदिरा, संजय, राजिव, सोनिया के ७० सालके शासनसे सिख लिया कि अपनी सत्तासे कुछ गीनेचूने खरबपतियोंको मालामाल करते रहो और अपनी वाह वाह करवाते रहो तो “खेला” आपकी पकडमें ही रहेगा. यदि आवश्यकता पडे तो जैसे इंदिराने कहा था कि “मेरे पिताजीको तो बहूत कुछ काम करना था लेकिन ये सींडीकेटके नेतालोग मेरे पिताजीको काम करने नहीं देते थे”. कोई भी बहाना बता दो. बात खतम. संस्कृतमें एक श्लोक है कि;

यस्यास्ति वित्तं स नर कुलिनः, स श्रुतवान स च गुणज्ञः ।

स एव वक्ता, सच दर्शनीय, सर्वे गुणा कांचनमाश्रयन्ते ॥

जिस व्यक्तिके पास धन है, वह ही उच्चकुलका है, वही वेद ज्ञाता है, वही गुणोंको जाननेवाला है, वही अच्छा बोलनेवाला है, और वही सुंदर है (जैसेकी शाहरुख खान), सभी सद्गुण पैसेके गुलाम है.

ऐसे तो कई वीडीयो, लेख, समाचार आदि आपको १०० सालके बाद मिलेंगे. क्यूं कि उत्तर देनेवाला नरेंद्र मोदी तो होगा नहीं. जैसे आज महात्मा गांधी नहीं है.

“अरे बच्चू तू तो है, उत्तर देनेवाला गांधीके बदले.

“मैं तो हूंँ. लेकिन मेरी बात तो लोग नकार दे सकते है. मुज़से कई अधिक संख्यामें और अधिक शोर करने वाले वाजिंत्र, और लोगोंके पास है. मैं तो गांधीजीका अंतेवासी हूंँ नहीं. और जो गांधीजीके उपर कहेनेमें विश्वसनीय माने जाते है वे तो बोलेंगे नहीं. क्यों कि वे तो समज़ते है कि गांधीजी तो एक सूर्य है. सूर्यके सामने थूकनेसे सूर्यको कोई हानि होती नहीं है. गांधीजी के अनुयायीयोंकी यही मानसिकता है. आपने कभी गांधीवादी संस्था चलानेवालोंका गांधीका बचाव करते पढा है. वैसा ही हाल नरेंद्र मोदीका होगा.

“लेकिन तू तो गांधीजीका बचाव करने पर उतर आता है. इसका क्या?

“आपने ‘नकली किला’ काव्य पढा है?

“नहीं तो …!!

“तो पढ लो.

आज भी चित्तौरका सून नाम कुछ जादूभरा, चमक जाती चंचलासी चित्तमें करके त्त्वरा  … “

   …………….

राणाने  अपनी प्रतिज्ञाका तात्कालिक पालन करनेके लिये  बूंदीका नकली किला बना दिया (जैसे आज कुछ लोग अपने मनसे एक नकली  कपोल कल्पित  गांधी बना देते है, फिर उसको  ….) और  उसको  तोडने के लिये सज्ज हो जाता है. 
 
ऐसा क्यूंँ करता है वह  राजा? 
क्यूंँ  कि उसने   आवेशमें  आके  प्रतिज्ञा ली  कि “दूर्ग बूंंदीको तोडे बिना ही अब कहीं, ग्रहण अन्नोदक करुं तो मैं प्राकृतिक क्षत्रीय नहीं”
लेकिन  बूंदीके दूर्गको तोडना तो आसान नहीं था. और बिना खाये पीये कैसे जिंदा रहा जा सकता है. “ईष्ट सिद्धि कहांँ रही जब न साधन   (जिवन) ही  रहा!!!” 
 
तो नकली किला बनाया जाता है.
 
नकली किला तोडनेके लिये  राणा सज्ज हो जाता  है. ….
 
(अब आप वह कविता ही पढो. दिलको छूने वाली है)

 

 

शिरीष मोहनलाल दवे

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It is a matter of research as to what objection, Mr. Amit Bhaduri has, to the usage of “Transfer of power”?

———————————–

Let us discuss;

-:(I):-

Suppose;

(1) Country A is a democratic country. i.e. The Government of Country A, is controlled by the peoples representatives of country A.

(2) Country B is also having peoples representatives.

(3) But the peoples representatives of country B, have no full power. They have to act under the instructions of the Government A.

(4) The country A, is ruling the country B.

(5) Now suppose a Government A wants to go away from Country B with certain conditions.

(6) Such conditions have been agreed by both the country A and country B.

(7) The peoples representatives of Country B had been empowered to take decisions as per the then prevailing law.

The conditions were;

(7.1) Because the Government A has to secure the interest of minority communities of Country B, it will hand over the full charge of the Government A pertaining to Country B, it would divide the country B in different parts.

(7.2) Till these divided parts frame a constitution of their own, passed by their representative body, the parts will have to take the final approval of the head of the Country A.

(7.3) Once a part which has become a country, frames its constitution then it will enjoy the full liberty to make changes in any law, rules and regulations at its will. No further approval of Country A, would be needed once its constitution came in force.

(8) Country A had sent a mission. Its name was Cabinet Mission. The work entrusted to this mission by the Government A, is to decide how to divide the country B in how many parts, What should be the criteria of land and boundaries, What should be the base …

(9) Now suppose, both the countries viz. A and B has agreed to the conditions of partitions and independence, then what should be the way of granting independence other then the transfer of power agreement? Either Mr. Amit is confused or knowingly or unknowingly has objection with the word “transfer of power” from Government A to part B1 and Government A to part B2. Let Mr. Amit may define as to what way it should have been processed and how the aforesaid adopted way, differs from what his (would be proposed) way of independence which he feels proper.

——————————————

-:(II):-

At moment from the narratives of Mr. Amit, it appears that;

(1) Partition, transfer of power, independence and elected members of 1946 were fake and not proper.

(2) Partition is not independence. i.e. If India is divided in parts, the parts cannot be said to be independents even if they frame and pass their separate constitution. i.e. according to Mr. Amit, the a part which has been made independent from the crown, even if that part has been empowered to frame its own constitution and allowed absolutely to be administered, cannot be termed as independent.

(3) Because it was only the transfer of power and not independence.

(4) And transfer of power is not independence, because it was peaceful.

(5) And no peaceful transfer of power can be termed as independence, even though a part (the new nation) has got its own constitution.

(6) i.e. According to Mr. Amit, it is not the constitution that decides the independence but it is the violent way of snatching the power from the previous government e.g. Government A, by the people of the Country B, can be said to have become independent.

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-:(III);-

(1) One fact must not be forgotten that Cabinet Mission came to India in March 1946.

(2) When the commission put forward a condition that they have to take care of the minorities of India. Hence partition would be the inevitable condition. Gandhi had said that “the partition would be on my dead body”. He had presumed that he would get public support in course of time.

(3) Gandhiji said to Cabinet Mission; “First of all you (British) quit India. How to maintain the interest of our minorities, is our problem. It is not your problem. We are capable to solve it, and we will solve it by any means. If needed, we will solve it by sward. You British, leave us to our fate. You please quit.

(4) When the Cabinet Mission stick to its pre-condition, Gandhiji resigned from the representative of presenting Indian side and he said “I cannot be a party to a Mission who is determined to divide India.”

(5) Gandhiji asked Congress to Boycott Cabinet Mission. But Congress leaders had no courage to boycott Cabinet Mission. However they continued negotiation.

(6) A stage had come when the partition issue was likely to be replaced under the negotiation with the proposal of “ federal Union”.

(7) This proposal was acceptable to Cabinet Mission, Congress and Muslim League, at a moment of time. But Nehru had rejected it with his own ground. Sardar Patel also had rejected it, because it was much more complicated. It required much more time to workout conditions among all the Federal parts inclusive of the factor of Princely States. India was likely to be divided in 10 to 20 (?) parts. Nehru bluntly said, “In my office, I cannot give even a post of the peon to Mr. Jinna.

(8) Gandhi who had once agreed privately for Federal Union, because he was not in hurry to get independence. Ultimately Gandhiji changed his mind because of the massacre conducted by Muslims under the call “Direct Action” given by Jinna in August 1946.

(9) Gandhiji said; “ I am not able to control this massacre. Are you able to control?”

It is not only mischievous action to pass blame on Gandhiji for partition, but it is a criminal lie. Gandhiji went to Noakhali in November 1946, to stop genocide being conducted by Muslims on Hindus. More than 5000 Hindus were murdered. Muslims were murdered only in few numbers. Gandhi went there as a “one man army”. He went on fast. Many accompanied him. Despite of this, many leaders suffering from Anti-Gandhi phobia, say, Gandhi was responsible for killing Hindus in Noakhali, hence it was ok when Godse killed him.

HOW MUCH THANKLESS WE ARE !!!

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Shirish M. Dave

If you have any pointwise reply, write me at smadave1940@yahoo.com

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दुरात्मा गांधी और विनाशपुरुष मोदी – ३

चाचा – भतीजा संवाद गत ब्लोगसे चालु …

“ तेरी भली थाय … तू मुज़े पढाता है बच्चू …!! तू पहेचानता नहीं है मुज़े … कि, मैं कौन हूँ? मैं तो बारबार टीवी के वार्तालापमें आता हूँ. अखबारोंमे मेरी कोलमें चलती है, मुज़े लोग प्रवचन करने बुलाते हैं. मेरे लेख वर्तमान पत्रोमें छपते है, मेरी स्वयं की एक चेनल भी है, मेरी वेबसाईट भी है … मेरे पर आन्टीयाँ मरती है … हमारी सहयोगी महिलाओंके उपर भी कई अंकल मरते होगे …

“तो चाचू, आपकी दाल ईतनी काली क्यूँ है? चाचू, आप विषय मत बदलीये. आप क्या क्या है, आप क्या क्या कर रहे है या किनके उपर कौन कौन मरता है या आपके उपर कौन कौन मरता है, यह चर्चाका विषय नहीं है. चर्चाका विषय है तथा कथित दुरात्मा पुरुष और विनाश पुरुष की निंदा करना. आपको इस बातका भी पता नहीं कि साहित्यमें “पिता”का क्या क्या अर्थ होते है. आपने जो कहा, इससे तो आपका अज्ञान उजागर होता है. आप अपना अज्ञान स्विकारनेके स्थान पर विषयांतर कर देते है, या तो सामने वाले पर आप अंगत आक्षेप करने लगते है. इस बातसे तो आप अपनी असंस्कारिताका भी प्रदर्शन कर देते है. आप ऐसा क्य़ूँ करते है वह मैं दादुसे पूछुं?

“कौन है तेरा दादु?

“यह तो मेरा सीक्रेट है. मैं आपको क्य़ूँ बताउं? मैं मेरे दादुको स्पीकर पर रखुंगा. आप भी श्रवण कर पाओगे.

(अतः बच्चू-दाद्वोः संवादः)

“दादू !! मैं यह सोचता हूंँ कि, कुछ चाचूओंकी और आंटी / बुआओंकी दाल काली क्यों होती है? वैसे तो वे कभी कभी महान विद्यालयोंकी डीग्री धारक होते है. तो भी उनकी दाल काली क्यों होती है?

“मेरे खयालसे तुम्हारा कहेना यह है कि कुछ लोग तर्क करनेमें और समज़नेमें अक्षम होते हुए भी महानुभाव कैसे बन जाते है?

“जी हांँ, दादुजी, कुछ आम कक्षाके लोग और कभी कभी तो आम कक्षासे भी कनिष्ठ, स्वयंको महानुभाव कैसे समज़ने लगते है?

“मेरे खयालसे तू, ख्याति प्राप्त लोगोंको महानुभाव समज़ता है !!

“बिलकुल तो ऐसा नहीं, लेकिन सामान्यतः, ख्याति प्राप्त लोगोंको महानुभाव समज़ा जाता है. खास करके समाचार माध्यम द्वारा. क्यूँ कि ख्याति प्राप्त लोग समाचारमें आने से वाचक वर्गमें वृद्धि होती है ऐसा समज़ा जाता है.

“ बेटा, ख्याति, महानता और महानुभाव ये शब्द भीन्न भीन्न अर्थवाले है. और इसमें सामान्यकक्षाका व्यक्ति असंजसमें पड जाता है. यह बात आम समस्या है. जैसे की जवाहरलाल नहेरु, मोतिलालकी संतान थे और मोतिलाल, जवाहरलालको आगे लाना चाहते थे तो जवाहरकी तर्कशक्ति सामान्य कक्षाकी होते हुए भी ख्याति प्राप्त कर सके. फिर तो उसको पद भी मिल गया. तो पदके कारण भी महानुभाव बन गये. वैसा ही उनके वंशजोके बारेमें समज़ो.

“लेकिन दादू, डी.एन.ए. के कारण महानुभावकी संतान महान बननेमें सक्षम नहीं होती है क्या? जैसे की आम तौर पर माता-पिताकी आयु संतानोमें आती है वैसे ही डी.एन.ए.की वजहसे महानुभावत्त्व संतानोमें नहीं आ सकता क्या?

“जैसे भौतिक संपत्ति वारसागत मिलती है क्योंकी वह शरीरके बाहर होती है, और वह भौतिक है. लेकिन शरीरके अंदरकी संपत्ति जिसे हम बौद्धिक संपत्ति कहें तो वास्तव में वह “टेंडेंसी” (झुकाव) होती है. लेकिन मस्तिष्क के विकासके लिये कई और परिबल भी अति प्रभावक और बदलाव कारक है. जैसे कि परिपालन, वाचन, विचार, कर्म, मित्रमंडल, खानपान, स्मृति-शक्ति और आसपास बनती घटनाएं … हैं. स्मृतिको सक्षम बनानेके लिये बारबार रटना आवश्यक है. जो झुकाव है वह तो मातृपक्ष एवं पितृपक्ष के संबंधीयोंमेंसे कहींसे भी आ सकता है. वह तो मिश्रण है. इस प्रकार महानुभावकी संतान, माहानुभावत्त्व के लिये सक्षम नहीं होती है.

“ … तो दादू, कुछ लोग स्वयंको महानुभाव कैसे मानते है?

“पद मिलनेके कारण व्यक्तिको ख्याति मिलती है. पक्षका प्रमूख पद, पक्षका प्रवक्ता पद, प्रधानपद, शिक्षकपद, समाचार पत्र या टीवी-चेनलोंके मालिकोंसे पहेचान, पैसा, अभिनयकला, या अभिनयक्षेत्रको चलानेवालोंके साथ संबंध, … और शक्यताके सिद्धांत के अनुसार भी कभी कभी प्रसिद्धि मिल जाती है. और वह व्यक्ति अपनेको महानुभाव समज़ने लगता है.

“तो दादू … ऐसे व्यक्तिकी पहेचान क्या है?

“जब तक चलता है तब तक चलता है, लेकिन जब उसके सामने तर्कका मामला आ जाता है तब उसकी खुला पड जानेकी शक्यता बढ जाती है. जब ऐसा होता है तब, वह व्यक्ति या तो विषय बदलनेकी कोशिस करता है, या तो असंबद्ध बातें/तुलना करता है या तो सामनेवाले पर शाब्दिक हमला कर देता है. तू, टीवी चेनल पर चलती चर्चाओंमें देख सकता है कि कोंगीके कोई नेता या तो उनके सांस्कृतिक सहयोगी पक्षोंके कोई नेता, उनको पूछे हुए प्रश्नके उत्तर देने के बजाय बीजेपी पर आक्षेप करने पर उतर आते है.

“सही कहा दादू … कुछ लोग आज भी महात्मा गांधीके फोबीयासे पीडित है. और ऐसे लोग अपनेको देशभक्त सिद्ध करनेके लिये बेतूकी बातें करते है. गोडसेने महात्मा गाधीका खून किया तो वे इस घटनाको अच्छी दिखानेके लिये इस घटनाका “गांधी-वध” नामांकरण करते है. जैसे “पिता” (राष्ट्रपिता वाला “पिता” शब्द) शब्द प्रयोगमें क्षति की, वैसे ही “वध” शब्द प्रयोगमें क्षति की. उन्होंने सोचा कि, जैसे दुरात्मा शिशुपाल, जयद्रथ, कंस, … है वैसे दुरात्मा गांधी भी है. जैसे शिशुपाल-वध, जयद्रथ-वध, कंस-वध, … हुआ, वैसे ही गाँधी-वध हुआ … इसमें क्या गलत है !!! हमारे कथित सुज्ञ लोग जो वास्तवमें अज्ञ है वे “शब्दोंका वाणी-विलास” करते करते भाषा-देवी पर दुष्कर्म करने लगे. जब उनके समक्ष यह तथ्य लाया गया तो उन्होंने एक असंबद्ध अनुसंधान लीन्क दिया और कहा “देख इसमें मैंने कहांँ “वध” शब्द प्रयोजित किया है?

“सही कहा बेटे तुमने … ऐसे लोग जो होते है आम कक्षाके या तो उससे भी निम्न कक्षाके, वे ऐसा ही करते है. “मूंँह बचाव” की स्थितिमेंसे भागनेके के लिये वे तुम्हारे पर अतार्किक तारतम्य निकालके चर्चासे भाग जाते है.

“यही हुआ दादु … वैसे तो मैंने गांधी-फोबियासे पीडित लोगोंको आहवाहन किया है कि “आप केवल एक ही बात ऐसी बताओ कि जिसके लिये केवल गांधी ही सबसे अधिक जीम्मेवार है और आपके हिसाबसे देशको महत्तम हानि हुई हो.” गुजरातके एक वाचाल व्यक्तिने कहा “मुस्लिम तुष्टिकरण की नीतिके जन्म दाता गांधीजी थे.” मैंने उनको अनुसंधान देके बताया कि ऐसा नहीं है.

उन्होने कहा गांधीजी मुस्लिमोंसे डरते थे. मैंने उस प्रसंगका गांधीजीके खूदके शब्दोमें दिखाया कि गांधीजीकी क्या प्रतिक्रिया थी और अनुसंधान भी दिया.

उन्होने फिर खिलाफतका मुद्दा उठाया. मैंने गांधीजीके कथनका संदर्भ दिया.

बात तो लंबी है. अंतमें फिर उन्होंने अपना इंदिराई संस्कार दिखाया और उल्टी ही बात की. [ईंदिराई कल्चर यह है कि कोई आपको जूठा कहे उसके पहेले आप उसको जूठा कह दो]. मैंने गांधीजीने खुदने क्या कहा था उसका अनुसंधान हर मुद्दे पर दिया था, और ये महाशयने एक भी संदर्भ नहीं दिया था, तो भी उन्होंने जरा भी शर्म रक्खे बिना लिख दिया कि मैंने कोई संदर्भ नहीं दिया और उन्होंने हर बात का संदर्भ दिया. इन्होंने बिलकुल अपना इंदिरा-नहेरुगांधी कल्चर दिखा दिया.

“बच्चू … ऐसा तो होना ही था. बडे नाममें कई बार छोटा व्यक्ति बैठा हुआ होता है. सियासती और वंशवादी पक्षोंमें ऐसा होना आम बात है. और कुछ कहेना है?

“जी हांँ दादु … एक व्यक्तिने तो कह दिया कि “यदि किसीने लाखोंका खून किया हो तो उसको मार देना चाहिये या नहीं. मुज़े सीधा उत्तर चाहिये.” मैंने कहा संदर्भ बताओ या तो पूरी कहानी सूनाओ. लेकिन वह तयार नहीं हुआ. और गाली देके भाग गया.

[स्पीकर और फोन बंद हुआ]

“ तो चाचू आपने सब सूना. चाचू आप जानते हो कि गांधीजीने सत्याग्रहके कुछ नियम बनाये थे. यदि आप जानते है तो मुज़े कहो. गांधीजी की अहिंसाकी परिभाषा क्या थी? सविनय कानून भंग कौन कर सकता है?

और दूसरी खास बात, गांधीजीके राजकीय क्षेत्रके योगदान को छोड कर उनका और क्या योगदान था? इसके बारेमें आप क्या जानते है वह मुज़े बताओ …

“चल हट, बच्चू … !! तेरे साथ बात करना बेकार है.

“चाचू, आप ने शायद श्री दिनकर जोषीजीकी “जीन्ना” पर लिखी किताब भी नहीं पढी है. जीन्ना की गांधीजीके विरोधकी भाषा और शैलीसे बढकर आजके कोंगीनेताओंकी और उनके सांस्कृतिक सहयोगी लुट्येन गेंगके नेताओंकी भाषा और शैली है.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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दुरात्मा गांधी और विनाशपुरुष मोदी – २

“गांधीके बचपन के बारेमें हम कोई और बुराई नहीं कर सकते?

“ कर सकते है न, क्यूँ नहीं कर सकते?  गांधी कामातुर था. उसने अपने पिताको उत्कृष्ट उपचार न करवाके मरने दिया था. अरे उसने तो अपनी औरतको ऐसे ही मरने दिया था.

“लेकिन जब हम गांधीकी फर्स्ट हेंन्ड पुस्तक पढते है, तो ऐसा तो हमे, जैसा आप कहेते है वैसा, तो कुछ भी लगता नहीं है.

“अरे बच्चु, तू एक बात याद रक्ख. कोई गांधीको पढता नहीं है. हमें केवल घटना का अस्तित्त्व है या नहीं, उसका ही खयाल रखना है. फिर विवरण और तारतम्य तो हमें ही देना है न ! प्रियंका वांईदरा क्या करती है वह मालुम है न ! वह बच्चोंसे क्या बुलवाती थी?

“यही कि, चौकीदार चोर है.”

“चौकीदार कौन है?

“नरेंद्र मोदी अपनेको चौकीदार कहेता है.

“तो फिर चौर कौन ठहेरा?

“नरेंद्र मोदी.”

“बस तो यही काम हमें करना है. मोदी भ्रष्टाचार हटाना चाहता है, तो हमे उन्हे ही “चोकीदार चोर है” ऐसा सूत्र बनाके, उसने भ्रष्टाचारके विरुद्ध जो भी कदम उठाए, उनको अविश्वसनीय कर देना है.

“लेकिन चाचु, गांधीने तो स्वदेशी अपनानेकी और स्वदेशीका प्रचार करनेकी बात कही थी, उसमें क्या बुरा था? इस बातमें हम, भारतकी जनताको कैसे असमंजसमें डालेंगे ?

“इसमें क्या है? स्वदेशीको अपनानेकी बात तो सर्वप्रथम सावरकरने कही थी. “स्वदेशी”का प्रचारका हक्कदार तो सावरकर थे. गांधी तो बडा चालु था. उसने सावरकरकी इस स्वदेशीकी बात “हाईजेक” कर ली, और अपने नाम कर दी. ऐसा घीनौना काम तो बेशर्म गांधी ही कर सकता है न?

“लेकिन चाचू, गांधीने ही तो, चरखा केंद्र स्थापना, हस्तबुनाईके केंद्र स्थापना, वितरण केंद्र स्थापना, … समग्र व्यवस्था और तंत्र प्रस्थापित करना और चलाना, उनके नियम बनाना … ये सब तो गांधीने ही किया था न ! जैसे कि जीवदया, प्रेम, अहिंसा परमोधर्मकी बातें, ये सब तो वेद के कालसे चली आती है, लेकिन इन सबके साथ बुद्ध और महावीर का नाम लिया जाता है. तो “स्वदेशी” आंदोलनसे गांधीका नाम जोडनेमें बुराई क्या है?

“अरे बच्चु. तू कब सुधरेगा? जो बात हमारे एजंडाके विरुद्ध जाने वाली है, उन बातोंको हमें स्पर्श ही नहीं करनेका. समज़े न समज़े? जब हम कहेंगे तभी तो जनताको पता चलेगा न !! ऐसी बातें तो हमे जनतासे छीपाना है.

“लेकिन चाचू !! गांधीने तो, जो कोंग्रेस मालेतुजार और बुद्धि-जीवीयोंकी संस्था थी, उसको आम गरीब के लिये भी खुला कर दिया और दूर सुदूर के गांवों तक कोंग्रेसको फैला दिया उसका क्या … !!!

“ अबे बच्चू, तू कब समज़ेगा? हमे ऐसी बाते करना ही नहीं है.

“ तो … और … हम क्या क्या कर सकते है?

“ हमारे पास तो कहेनेके लिये  बहूत कुछ है. जिन जिन मुद्दोंपर गांधीको श्रेय मिलता है उन  सबको, हमें विवादास्पद बनाके और वितंडावाद करके नष्ट करना. जैसे कि, ‘राष्ट्रपिता’, ‘महात्मा’, ‘स्वातंत्र्य दिलाने वाला’ …

“चाचू … !!! ‘राष्ट्रपिता’ किसे कहेते है? ‘स्वातंत्र्य’ किसे कहेते है? ‘महात्मा’, किसे कहेते है?

“देख बच्चू !! मेरी परीक्षा तू मत ले. तू मेरा चाचा है कि मैं तेरा चाचा हूँ ? तू मेरा भतीजा है तो भतीजा बनके ही रहे. मेरा चाचा बननेकी कोशिस मत कर. राष्ट्रपिता मतलब राष्ट्रपिता, स्वातंत्र्य मतलब स्वातंत्र्य, महात्मा मतलब महात्मा, …

“लेकिन चाचू … !! कोई पूछेगा तो क्या कहोगे?

“देख बच्चू !! हमारा राष्ट्र तो ५००० सालसे भी अधिक पुराना है. क्या इ.स. १८६९में पैदा होनेवाला गांधी, हमारे राष्ट्रका बाप हो सकता है? स्वातंत्र्य मतलब अंग्रेजी सत्ताका खातमा. महात्मा मतलब महान आदमी.

“नहीं चाचू ऐसा नहीं है. जो सोचनेकी सीस्टम बदल देता है वह नयी सीस्टमका पिता कहेलाता है. जैसे “आईन स्टाईन”ने भौतिक विश्वको समज़नेकी सोच बदल दी तो वह आधुनिक भौतिकशास्त्रका पिता कहा जाता है. “फेरेडे”ने वीजचूंबत्त्वको समज़नेकी सोच बदलदी तो वह वीज-चूंबकत्त्वका पिता कहेलाता है. “गेलेलियो”ने प्रयोगोंद्वारा सिद्धकरनेकी प्रणाली लागु की तो वह अर्वाचिन विज्ञानका पिता कहेलाता है …

“ तेरी भली थाय … तू मुज़े पढाता है बच्चू …!! तू पहेचानता नहीं है मुज़े… मैं कौन हूँ? मैं तो बारबार टीवी के वार्तालापमें आता हूँ. अखबारोंमें मेरी कोलमें चलती है, मुज़े लोग प्रवचन करने बुलाते हैं. मेरे लेख वर्तमान पत्रोमें छपते है, मेरी स्वयं की एक चेनल भी है, मेरी वेबसाईट भी है … मेरे पर आन्टीयाँ मरती है … हमारी सहयोगी  महिलाओंके उपर अंकल मरते है …

“तो चाचू, आपकी दाल ईतनी काली क्यूँ है?

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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दुरात्मा गांधी और विनाशपुरुष मोदी – १

गत दो ओक्टोबरको सोसीयल मीडीया एवं यु-ट्युब पर महात्मा गांधीके विरुद्ध कई लोग तूट पडे थे.

गांधीजीका जन्म दो ओक्टोबर १८६९ को हुआ था. उनकी मृत्यु ३० जनवरीको हुई थी. ये दो दिन गांधीके विरोधीयोंके लिये एक पर्व के समान है जिसमें उनकी प्रच्छन्न मनीषा स्वयंका सत्यके प्रति एवं देशके प्रति कितना प्रेम और आदर है कि वे गांधीको भी छोडते नहीं है.

“ तो चलो हम भी पीछे क्यूं रहे. हम भी उनकी ही भाषा बोलेंगे चाहे वह “लुज़ टोकींग” और “तर्कहीन”

“ तो बोलो कहांसे प्रारंभ करेंगे?

“ बचपन से ही तो… !!!

“ गांधी जब छोटा था तब बेडमें पेशाब करता था ऐसा लिखेंगे क्या?

“ अरे भैया, वे तो सभी बच्चे जब कुछ मासके होते है तब बेडमें ही पेशाब और मलोत्सर्जन है. उसमें नया क्या है?

“ किंतु हम गांधीकी उम्र नहीं लिखेंगे तो औसा सिद्ध हो जायेगा न कि वह बचपनसे ही असंस्कृत था !!

“ किंतु ऐसा कहीं लिखा है?  हमारा काम राईका पर्वत बनाना है, लेकिन उसके लिये राई तो होना चाहिये न?

“ तो हम क्या ऐसा लिखेंगे कि वह मांसाहारी था?

“ हां यह बात सही है. उसने खुदने लिखा है कि वह सशक्त होने के लिये चूपके चूपके मांस खाता था. वह बीडी भी पीता था. चोरी करता था. सुवर्णकी चोरी भी करता था. वैसे तो उसने पछतावा किया था और पिताको चीठ्ठी लिखके स्वयंको दंडित करनेको भी बोला था. किंतु हम चीठ्ठीवाली, “दंडित”करनेकी गुजरीश करनेवाली और पछतावा करने वाली बात छीपायेंगे.

“ यह हम कैसे लिखेंगे?

“ वह मांसाहारका आदि हो गया था, वह जूठ भी बोलता था. वह इतना मांसाहार करता था कि वह माताका बनाया हुआ सामका (सायंकालका)  खाना भी “मुज़े भूख नहीं  है, या पेटमें दर्द है ….“ ऐसा जूठ बोलके खाता नहीं था. जूठ बोलनेकी तो उसकी आदत थी. बीडी पीनेकी भी उसकी आदत पड गयी थी. उसको अपने चाचाकी बीडी तो क्या घरके नौकरकी भी बीडी चूरानेमें कभी शर्म नहीं आती थी. अरे वह तो नौकरकी जेबसे भी पैसोंकी चोरी करता था. जब पैसे कम पडते तो वह गहने भी चूराता था.

“ लेकिन बादमें तो वह शाकाहारी हो गया था …

“ अरे ये सब बकवास है. जो आदमी जूठ बोल सकता है वह जूठ लिख भी सकता है न? उसने शाकाहारके बारेमें क्या पढा और क्या लिखा वह सब हमें छीपाना है.

“उसकी कामेच्छाके बारेमें क्या लिखेंगे?

“अरे वाह, इसमें तो हम एक पुस्तक लिख सकते है. उसके पिता बिमार रहेते थे. उनको अपने पुत्रकी सेवा और सुश्रुषाकी अत्यंत आवश्यकता थी. उसके पिता अपने पुत्रकी उपस्थिति चाहते थे. लेकिन यह कमीना अपनी औरतके साथ रंगरेलीया मनाता था. वह अपनी औरत पर अत्याचार भी करता था. वह अपनी औरतको मायके तक नहीं जाने देता था. अरे जब उसके पिताके अंतिम सांस चल रहे थे तब भी वह अपनी औरतके साथ अपनी कामतृप्ति कर रहा था और बुलाने पर भी नहीं जाता था. पितृसेवाके धर्मकी तो बात ही छोडो.

“ लेकिन गांधीने तो बह्मचर्यके गुणगान गाये है न !! सत्य, अहिंसा, सादगी और ब्रह्मचर्य तो उसके मुख्य सिद्धांत थे न!!

“ अरे सब बकवास है. वह पूरा दंभी था. वह तो बचपनसे ही वेश्या गामी था. उसके आश्रममें उसने कई कडे नियम बनाये थे. कोई भी आश्रमवासी अपनी औरतके साथ भी सो नहीं सकता था. लेकिन गांधीको कोई बंधन नहीं था. वह कोई भी औरतके साथ सो सकता था और सोता था. गांधी बडा ही कामी और कामातुर था. वह तो नहेरुके साथ भी चालु था. गांधीकी औरत जिंदा थी तब भी वह किसीभी औरतको छोडता नहीं था, चाहे वह विवाहित हो, अविवाहित हो, या बच्ची हो, या चाहे वह अपने घनीष्ठ मित्रकी नज़दीकी संबंधी ही क्यूं न हो. वह तो पागलकी तरह पत्रव्यवहार भी किया करता था. इस आदमीकी कामातुरता मरते दम तक रही.

सावधान. इस लेखका हेतु न तो गांधीके विरोधमें लिखनेका है न तो मोदीके विरोधमें लिखनेका है.हमारा हेतु पवित्र है. और सत्यको प्रकाशित करना है.

हमसे कई बातें गुह्य रखी गई है.

किंतु एक कथन है कि आप यदि इतिहासको विस्मृतिकी गर्ता में दबाके रखते हो तो वह पुनर्जन्म लेके आपको (”आपको” से सूचित है आपके देशको) पुनः दंश दे के नष्ट करता है. हमारा भारतवर्ष ऐसे अनृत (असत्य) इतिहासकी शिक्षाके कारण पुनः पुनः नष्ट होता रहा है.

पूर्वकाल १८५७ में  अंग्रेज शासन के सामने विद्रोह हुआ था. कैसे भी करके, अंग्रेज लोग उस विद्रोह को परास्त करनेमें सफल और विजयी हुए.

उनको एक ऐसी विद्वत्तापूर्ण सेना तयार करनेका विचार आया कि भारतीयोंको अपने गर्वशाली इतिहाससे विमुख करके, अपने द्वारा वर्णित इतिहासको पढाना पडेगा. और पूराणों द्वारा वर्णित इतिहासको उनमें लिखित चमत्कारोंके कारण असत्य सिद्ध करना पडेगा. उनका कहेना था, भला ऐसे कभी इतिहास लिखा जा सकता है क्या !! इतिहास तो केवल इतिहास होना चाहिये. पुराण तो सब गप्पे बाजी है.

अंग्रेजोंने लोकभोग्य मनोरंजनवाला इतिहास मूलसे ही नकार दिया. अंग्रेजोने ऐसी सेना सुसज्ज की, कि जो स्वयं को और अपने देशके भूतकालको असभ्य और निम्न स्तरका समज़े. और इस तरह भारतमें अर्वाचिन युगका निर्माण हुआ. डॉक्टर ह्युमने कोंग्रेसकी स्थापना की. उसके पूर्वकालमें कुछ दशक पूर्व, लॉर्ड र्बेंटिकने विश्वविद्यालयोंकी स्थापना की थी, उसका भरपुर लाभ लिया गया.

“श्वेत लोग ही उच्च कक्षाके है और वे ही अपने देश पर शासन करने के योग्य है”  ऐसी घनिष्ठ मान्यता सभी विद्वानोंके मनमें ठोसकर भर दी.

राजा राममोहन रॉय, फिरोजशाह महेता, गणेश वासुदेव, दिनशा वाछा, बहेरामजी मलबारी, जीके पील्लाई, पी. आर. नायडु …. ये सब लोग अंग्रेज सरकारसे अभिभूत थे. ये लोग, आम जनता और अंग्रेज सरकारके बीचमें एक सेतूके रुपमें प्रस्थापित किये गये थे. समयांतरमें गोपाल कृष्ण गोखले, बालगंगाधर टीळख, मोतिलाल नहेरु आदि लोग आये. ये सब लोग भी अंग्रेज सरकारको भारत पर शासन करनेके लिये ईश्वर दत्त, योग्य शासक मानते थे. क्यूंकि इन सभीको इसी प्रकारकी शिक्षा दी गयी थी. गांधीभी इसी शिक्षाकी संतान थे.

अंग्रेज सरकारने गांधीमें अपने सर्वोत्तम भक्त को देखा. और उन्होंने इस गांधीको दक्षिण आफ्रिकामें प्रसिद्ध किया. गांधीकी प्रसिद्धिके कुछ बूंद भारत पर भी पडे. गांधीने दक्षिण आफ्रिकामें क्या किया, या उसको क्या सफलता मिली, उसकी कब कब पीटाई हुई, उसके दांत किसने, कैसे, क्यूं तोडे, वैसी बातें हम नहीं करेंगे. क्यों कि हमें केवल उसकी बुराई ही करना है.

गांधी महिलाको संपत्ति और दासी मानता था.

दक्षिण आफ्रिकामें जब वह था, तब उसने आधी रातको अपनी पत्नीको घरसे निकाल दिया था. उसने यह भी नहीं सोचा कि विदेशमें आधी रातको वह औरत कहां कैसे जायेगी? गांधी ऐसा तो नराधम था.

हां, एक बात सही है कि ऐसी उसकी इन सब बातोंका पता, हमें उसकी ही आत्मकथासे चलता है. यदि उसने यह सब बातें नहीं लिखी होती, तो हमे पता तक नहीं चलता. किंतु हमें उनको सत्यवादी नहीं कहेना है क्योंकि हमारा एजंडा उसकी केवल बुराई करना है. हम उसकी कही बातें भी बढा चढाके ही कहेंगे.

अरे भैया बढा चढाके कहेना भी तो एक कला है. यह भी तो अलंकारका हिस्सा है साहित्यके क्षेत्रमें.

तो यह नराधम और दुरात्मा गांधी, हार कर दक्षिण आफ्रिकासे भारत लौटा. लेकिन अंग्रेजोंने उसकी कार्यशैलीको विजयके रुपमें प्रस्तूत की. और भारतमें हिरो बनाके भेजा.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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