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नरेन्द्र मोदीको क्या बनना चाहिये? कौटिल्य अथवा पृथ्वीराज चौहाण? – २

मुहम्मद घोरीने किसीको भी क्षमा किया नहीं था. ठीक उसी प्रकार नहेरुवीयन कोंग्रेसने भी कभी अपने देशी शत्रुको क्षमा किया नहीं था. उतना ही नहीं फर्जी मामले बनाकर भी उसकी मानहानि करनेकी और न्यायिक कार्यवाही द्वारा उसको हानि करनेके भरपुर प्रयत्न किये है.

नहेरुः
नहेरुने अपने विरोधी मोरारजीके विरुद्ध मोरारजीकी संतानको लेकर फर्जी कथाएं चलाइ थीं. कामराजप्लान के अंतर्गत एक फर्जी प्लान बनाके मोरारजी देसाईको मंत्री मंडलसे निकाला गया था.

Narendra Modi has to decide ०१

ईन्दीरा घाण्डीः

ईन्दिरा घान्डी नहेरुवाली नीति चलाके मोरारजीकी मानहानि करवाती रहती थीं.

इन्दिराने आपातकाल के दौरान कई नेताओंको मरणासन्न कर दिया था.

आपतकाल खुद एक फॉड था.

वीपी सींग के विरुद्ध सेंटकीट्स मे उनके नाम फर्जी एकाउन्टका केस दर्ज किया था.

सर्वोदय संस्थाओंके खिलाफ जांचके आदेश दिये थे और सर्वोदय संस्थाओंको निर्दोष होते हुए भी परेशान किया था.

मोरारजी देसाई सीआईएके वेतन पत्रक (पे रोल) पर है ऐसे आक्षेप करवाये थे.

जयप्रकाश नारायणने सैन्य को विद्रोह करनेका कहा था ऐसे आक्षेप करके उनको कारावसमें बंद किया था. अन्य हजारों नेताओंको भी कारावास में बंद किया था.

तारकेश्वरी सिंहाके उपर असत्य आक्षेप करवाये और उनको आत्म हत्या करनी पडी(!).

ज्योर्ज फर्नान्डीस पर फर्जी केस बनाया था और उनको जेलमें बंद किया था.

सोनीया-एमएमएसः

बाबा राम देव को फर्जी केस बनाके परेशान किया, अन्ना हजारे को भी परेशान किया, किरन बेदीके विरुद्ध आक्षेप करके परेशान किया, बाजपाईका किस्सा और अडवाणीकी घटनाएं तो हमने देख ही ली है.

नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, आदि के विरुद्ध फर्जी केस बनवाये.

पुलिसका मोरल डाउन करनेके कई और काम भी किये.

नहेरुवीयन और उनके साथीयोंका संस्कार रहा है कि खुदकी सत्ता और धनके लिये कुछ भी करो, चाहे देशका सामाजिक चारित्र्य कितना ही अधम क्युं न हो जाय.

जो लोग वोटबेंकी सियासत खेलते है वे हमेशा पुलिस और सीबीआई का यथेच्छ उपयोग करते हैं. सरकारी अधिकारीयोंको भ्रष्ट होने देते हैं फिर उनके भ्रष्टाचारके आधार पर उनसे गलत काम करवाते हैं. अन्य लोगोंकी भी ब्लेक डायरी बनाई जाती है जिनमें लालु, मुलायम, ममता, मायावती, जयललिता, करुणानिधि शरद पवार मुख्य है.

ये सब अर्वाचीन मुहम्मद घोरी है.

इन अर्वाचीन मुहम्मद घोरीयोंको कैसे नष्ट कर सकते है?

अति सरल है. क्युं कि ये लोग अतिभ्रष्ट है, जहां भी हाथ डालो उनका भ्रष्टाचार पकडा जा सकता है.

(१) आपातकालमें जिन्होने ईन्दिरा गांधीकी सहायता की थी और जो लोग अभी भी जीवित है, उनके उपर शाह जांच समितिके सूचनोंके आधार पर कार्यवाही हो सकती है. उनको गिरफ्तार कर लो और जेलमें डाल दो. कार्यवाही होती रहेगी.

(२) एन्डरसनको भगाने वालोंमें सोनिया गांधी एक पक्षकार बन सकती है. उनके उपर भी ऐसी ही कार्यवाही हो सकती है.

(३) कश्मिरी हिन्दुओंके प्राकृतिक अधिकारके हनन और लगातार हो रहे मानवीय अधिकार के हननके मामलेमें, अपना फर्ज न निभानेके कारण, कश्मिरके सभी नेताओंको तथा नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंको शिघ्र ही प्रग्रहित (गिरफ्तार) कर सकते हैं. उनकी संपत्ति जप्त कर सकते है.

(४) नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंने और उनके साथीयोंने विदेशी बेंकोमें बीना रीझर्वबेंककी संमति गैरकानुनी एकाउन्ट खोलके काला-लाल धन जमा किया, इस बात पर उन सबके उपर फौजदारी कार्यवाही कर सकते है. क्यों कि यह देशके साथ गद्दारीका विषय है ये सब एकाउन्ट होल्डर गिरफ्तार हो सकते है. इन एकाउन्टोंका राष्ट्रीयकरण करके सबके नाम प्राप्त किया जा सकता है और जो लोग एकाउन्ट होल्डर न हो किन्तु मनिनीत (नोमीनी) व्यक्ति हो तो भी उसके उपर फौजदारी कार्यवाही हो सकती है.

(५) कोमनवेल्थ गेम, कोयला आबंटन और २-जी के बारेमें कई नेताओंको गिरफ्तार करके जेलमें रखा जा सकता है.

(६) भारतीय करन्सी नोट के मुद्रणका संविदा (ठेका) जिसको दिया था वह आतंकी संगठनोंसे संलग्न होनेके कारण अन्य देशोंमे प्रतिबंधित थी. फिर भी नहेरुवीयन कोंग्रेसने उसको मुद्रणका संविद दिया. कई कर्जी करन्सी नोट सरकारी बेंकके एटीएम यंत्रमेंसे निकली थी. इससे यह निरपेक्ष प्रतिबिंबित होता है कि नहेरुवीयन कोंग्रेसके ही नेतागण इससे संलग्न है. इस मामले पर भी कई नेताओंको गिरफ्तार किया जा सकता है.

(७) कई नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण जातीय मामलेमें विवादित है. उनके उपर कार्यवाही शुरु की जा सकती है.

दुसरे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

कई नहेरुवीयन कोंग्रेसके मुसलमान नेताओंकी संतान अभद्र और विभाजनवादी कोमवादी भाषा प्रयोग करती रहेतीं हैं इतना ही नहीं कई नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके साथी नेताओंने कोमवादी उच्चारण अनेकानेक बार किया है उनको गिरफ्तार करके जेलमें बंद कर सकते है.

तीसरे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

ये है समाचार माध्यमके स्वामि. जिनका काम समाजिक शिक्षाका काम करना है. उसके स्थान पर वे देशको विभाजित करनेका काम करते हैं. इनके पाससे हमेशा उचित अवसरों पर स्पष्टिकरण मांगते रहेना चाहिये और जब वे विफल रहें तो उनका अनुमति पत्र रद करनेका और कानुनी कार्यवाहीका आरंभ कर देना चाहिये.

चौथे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

ख्रिस्ती धर्मके पादरी लोग हैं. ये लोग हिन्दु धर्मकी निंदा करते हैं. तत्कालिन बने इसाईयोंको हिन्दुओंसे संबंध न रखने के लिये प्रभावित करते हैं और विभाजनवादी प्रवृतियां करते हैं. गरीब हिन्दुओंको लालच दे के धर्म परिवर्तन करवाते हैं. ऐसे पादरीयों पर सुक्ष्म दृष्टि रखकर कानुनी कार्यवाही की जा सकती है.

पांचवे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

ये है सरकारी अफसर. इनका काम नियमका पालन करना है और नियमका पालन करवाना है. इस कामके लिये उनको वेतन मिलता है. वे अपनी क्षतियांके लिये और सामाजिक अव्यवस्थाके लिये उत्तरदेय है.

नरेन्द्र मोदीको चाहिये कि इनको सीधा करें. यदि इनको सीधा करेंगे तो सब कुछ सीधा हो जायेगा.

कार्यवाही कैसे की जाय?

जो भी कार्यवाही करनी है, वह किसी भी प्रकारका कोलाहल किये बिना करना है. इसमें कोई निवेदनों की या विज्ञापन देनेकी आवश्यकता नहीं हैं. यदि कोई समाचार माध्यमवाले अनावश्यक प्रश्न करें तो उनके उपर भी जनताको पथभ्रष्ट करनेकी और जनताको भ्रमित करनेके आरोप लगाके कानुनी कार्यवाही हो सकती है.

अन्य कई कार्य है जो विकास, कानुन सुधार और गवर्नन्सके बारेमें हैं वे होते रहेंगे, क्यों कि प्रत्येक विकासकी परिकल्पनाके निदेशकका उत्तरदायित्व है कि वह अपना पूर्ण करें. और वह करेगा ही. उपरोक्त कार्य जिसमें कानुनमें संशोधनकी आवश्यक नहीं है, वे प्रारंभ कर सकते हैं. वास्तवमें नियम तो प्रत्येक उत्तरदायुत्वके लिये है. केवल अर्थघटन नहीं किया जाता है.

ऐसा नहीं करेंगे तो क्या होगा?

इतिहासका पुनरावर्तन होगा.

यदा तदा दुश्मनके कुकर्मोंको क्षमा किया है तब देशको सहन करना पडा है.

(१) नहेरुने प्रेमभाव रखके चीनकी लश्करी घुसपैठकी उपेक्षा की तो चीनने भारतकी ९१००० चोरस मील धरती पर अधिकार जमा लिया. हमारे हजारों जवान बेमौत मरे.

(२) इन्दीरा घान्डीने पाकिस्तानके साथ बेवकुफी बतायी और सिमला करार किया जिससे पाकिस्तानने जो खोया था वह सब पा लिया. बंग्लादेशने अपना देश पा लिया और एक करोड बीन बंगाली मुस्लिमोंसे छूटकारा भी पा लिया जो आज भारतके शिर पर है. १९७१में भारतके सैन्यने पायी हुई विजयके कारण, इन्दिरा इतनी सीमा तक सशक्त बनी थी कि वह पाकिस्तान, बांग्लादेश और कश्मिरके साथ जो चाहे वे शर्तें लागु कर सकती थीं. यदि इन्दिरा चाहती तो पूरे कश्मिर पर भारतका अधिकार स्थापित करके कलम ३७०को खत्म कर सकती थी. सिमला करार एक व्यंढ करार था. आज पाकिस्तान भारत पर आतंकी आक्रमण करता है. इन्दिराकी दुश्मन देशको क्षमा करने के कारण हजारों भारतीय जवानोंकी सहादत पर पानी फिर गया. और दुश्मनके आतंकोंसे भी हजारो बेमौत मरे.

(३) मोरारजी देसाईने पक्ष विरोधी प्रवृत्तिके लिये चरणसिंघको मंत्रीमंडलसे निष्कासित कर दिया था. चरणने क्षमायाचना की. अटल बिहारी बाजपाईने मोरारजी देसाईको कहा कि उनको माफ कर दो. मोरारजी देसाईने, बाजपाईके कहेने पर चरणको माफ किया और उसको फिरसे मंत्री मडलमें लिया.

(४) चरण सिंघने अपना एक गुट बनाया. इन्दिरा के उपरकी शाह कमीशनकी कार्यवाही आगे न बढायी और इन्दिराका सहयोग लेके मोरारजी देसाईकी सरकारका पतन करवाया. उसी इन्दिराने चरण सिंघकी सरकारको दिये हुए समर्थनको प्रत्याहृत करके चरण सिंघकी सरकारका पतन किया.

(५) राहुल गांधी जब जाली पासपोर्ट और नकदके साथ युएसमें पकडा गया तो बाजपायीने उसको मुक्त करवाया. उसीके कारण नहेरुवीयन कोंग्रेसको जिवनदान मिला. देशको १० साल तक लुटनेका एक अधिक अवसर नहेरुवीयन कोंग्रेसको मिला.
जिन्होंने प्रतिस्पर्धीको माफ किया उनको सहन करना पडा. नहेरु और इन्दिराने विदेशी दुश्मनोंको माफ किया, इससे देशको आज भी सहन करना पडता है.

मोरारजी देसाईने चरणसिंहको क्षमा किया तो देशको कोंग्रेस मुक्त शासन मिलनेमें ३५ वर्षकी देरी हो गई. इस अंतर्गत देशके लाखों मनुष्य बेमौत मरे और करोडों मनुष्योंको यातनाएं सहन करनी पडी. खरबों रुपयेकी तस्करी हुई वह वार्ता तो भीन्न ही है.

शिरीष मोहनलाल दवे

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नरेन्द्र मोदीको क्या बनना चाहिये? कौटिल्य अथवा पृथ्वीराज चौहाण?

कौटिल्यकी विशेषता क्या थी और पृथ्वीराज की विशेषता क्या थी?

Narendra Modi has to decide
कौटिल्यः
कौटिल्यमें दुश्मनको पहेचानने की प्रज्ञा थी.
कौटिल्य दुश्मनको कभी छोटा मानता नहीं था,
पडौसी देश दुश्मन बने ऐसी शक्यता अधिक होती है इस लिये उसकी गतिविधियों दृष्टि रखनी चाहिये क्योंकि वह प्रथम कक्षाका दुश्मन बननेके काबिल होता है.
दुश्मनको कभी माफ करना नहीं चाहिये,
ऐसा क्यों?
क्योंकि राष्ट्रहित सर्वोपरी है.

पृथ्वीराज चौहाण
पृथ्वीराज चौहाण भी एक देशप्रेमी राजा था. लेकिन वह दुश्मनके चरित्रको समझ नहीं पाया. उसने मुहम्मद घोरीको फेली बार तो हरा दिया, किन्तु बिना ही उसके चरित्रकी जांच किये भारतीय प्रणालीको अनुसरा और उसको क्षमा प्रदान की. वही मुहम्मद घोरीने फिरसे आक्रमण किया और पृथ्वीराज चौहानको हराया और उसका कत्ल किया. अगर पृथ्वीराज चौहाणने मुहम्मद घोरीको माफ किया न होता तो भारतका इतिहास अलग होता.
कौटिल्यने क्या किया था.
पोरस राजा देश प्रेमी था. उसने सिकंदरसे युद्ध किया. कुछ लोग ऐसा बताते है कि सिकंदरने पोरस को पराजित किया था. और सिकंदरने पोरसकी वीरताको देखके उसए संधि की थी. लेकिन यह बात तथ्यहीन है. वीरताकोई भारतका एकआधिर नही था. वीर योद्धा हरेक देशमें होते है. सिकंदर अनेकोंको जितता आया था लेकिन जो राजा हारे थे उनके साथ और उनकी जनताके साथ, उसका हमेशा आतंकित व्यवहार रहा था. पोरसने सिकंदरको संधिके लिये विवश किया था.और सिकंदरको हतप्रभः किया था.
सिकंदरके बाद सेल्युकस निकेतर सिकंदरकी तरह ही विश्वविजय करनेको निकला था. उस समय पोरसके बदले उसका भतिजा गद्दी पर था. उसने बीना युद्ध किये सेल्युकसको भारतमें घुसनेका रास्ता दे दिया. सिकंदर तो धननंदकी विशाल सेनासे ही भयभित हो गया था. लेकिन सेल्युकसने मगध पर आक्रमण कर दिया. जो सम्राट विश्वविजयी बनके आया था वह मगधके चन्दगुप्त मौर्यके सामने बुरी तरह पराजित हो गया. किन्तु ये सब बातें छोड देतें है.
कौटिल्यने क्या किया. पोरसके भतीजेको हराया. उसने लाख क्षमाएं मांगी लेकिन कौटिल्यने उसको क्षमा नहीं किया और उसको हाथीके पैरके नीचे कुचलवा दिया. पोरसका भतिजा तो जवान था, वीर था, उसके सामने पूरी जिंदगी पडी थी. वह देशप्रेमी पोरस राजाकी संतानके बराबर था, अगर कौटिल्य चाहता तो उसको क्षमा कर सकता था किन्तु कौटिल्यने उसको क्षमा नहीं किया. क्यो कि जो देशके साथ गद्दारी करता है उसको कभी माफ किया नही जा सकता.

यदि आप इतिहासको भूल जाते है तो उसका पुनरावर्तन होता है.
साम्राट अकबरको आते आते तो भारतके मुस्लिम हिन्दुओंसे हिलमिल गये थे. जैसे हुण, शक, पहलव, गुज्जर हिन्दुओंसे मील गये थे. भारतके मुस्लिम भी उसी स्थितिमें आ गये थे. कोई लाख नकारे तो भी यह एक सत्य है कि मुघलयुग भारतका एक स्वर्णयुग था. इसमें औरंगझेब जैसा कट्टर मुस्लिम भी लंबे समय तक अपनी कट्टरताका असर रख पाया नहीं था.
मुघल बहादुरशाह जफर जिसके राज्यकी सीमा सिर्फ लालकिलेकी दिवारें थी उसके नेतृत्वमें हिन्दुओंने और मुस्लिमोंने १८५७का विप्लव किया. पूरे भारतके हिन्दु और मुस्लिम राजाएं उसका सार्वभौमत्व स्विकारने के लिये कृतनिश्चयी थे.
ऐसा क्यों था?
क्यों कि हिन्दुओंके लिये धर्म तो एक ही था जो मानव धर्म था. आप ईश्वरकी मन चाहे तरिकोंसे उपासना करें या न भी करें तो भी हिन्दुओंको कोई फर्क पडता नहीं था. (हिन्दु यह भी समझते हैं कि ईश्वरको भी कोई फर्क पडता नहीं है).
मुस्लिम लोग भी परधर्म समभाव ऐसा ही समझ रहे थे. आज भी देखो, ओमानका सुल्तान काबुस सच्चे अर्थमें हिन्दुओं जैसा ही धर्म निरपेक्ष है. हां एक बात जरुर है कि वह विदेशीयोंको अपने देशकी नागरिकता नहीं देता है. चाहे वह हिन्दु हो या मुस्लिम. क्यों कि देशका हित तो सर्वोपरी होना ही चाहिये. जो लोग ओमानमें पहेलेसे ही बसे हुए हैं वहांके नागरिक है उसमें हिन्दु भी है और मुस्लिम भी है. इस लिये ऐसा मानना आवश्यक नहीं कि, सारे विश्वकी मुस्लिम जमात अक्षम्य है.

लेकिन भारतमें क्या हुआ?

अंग्रेजोंने खुदके देशके हितके लिये हिन्दु मुस्लिमोंमें भेद किये. सियासती तौर पर जीन्नाको उकसाया. नहेरुका भी कसुर था. नहेरु सियासती चालबाजीमें कुछ अधिक ही माहिर थे.
महात्मा गांधी के पास सबसे ज्यादा जनाधार था.

महात्मा गांधी के पास निम्न लिखित विकल्प थे
(१) अभी स्वतंत्रताको विलंबित करो, पहेले देशको और नेताओंको व्यवस्थित करो.
किन्तु यह किसीको भी स्विकार्य नहीं था. क्यो कि कोमी हिंसा ऐसी भडक उठी थी कि
नजदिकके भविष्यमें वह बीना विभाज किये शक्य ही नहीं थी.
(२) देशको फेडरल युनीयनमें विभाजीत करो जिसमें होगा पाकिस्तान, हिन्दुस्तान. ये दो देश संरक्षण और विदेशी मामलेके सिवा हर क्षेत्रमें स्वतंत्र होंगे. फेडरल युनीयन का हेड कोई भी हो.
नहेरुको यह स्विकार्य नहीं था क्यों कि उनको जीन्नाको चपरासी के स्थान पर रखना भी स्विकार्य नहीं था.
सरदार पटेलको और महात्मा गांधी इसके पक्षमें नहीं थे क्यों कि यह बडा पेचिदा मामला था. बहुत सारे स्थानिक राजाएं अपनी स्वायत्तता एक अलग देश की तरह ही रखना चाहते थे. ऐसी परिस्थितिमें देशमें अनेक जटिल समस्याएं उत्पन्न हो सकती है जो सदीयों तक उलझ नहीं सकती थी.
(३) फेडरल युनीयन हो लेकिन उसका नंबर वन पोस्ट पर जीन्ना हो.
नहेरुको यह स्विकार्य नहीं था. वे इस हालतमें देशके टुकडे टुकडे करने को भी तैयार थे.
(४) एक दुसरेसे बिलकुल स्वतंत्र हो वैसे देशके दो टुकडे स्वतंत्र हो. हिन्दुस्तान और पाकिस्तान. जनता अपनी ईच्छाद्वारा पसंद करें कि अपने प्रदेशको कहां रखना है ! हिन्दुस्तानमें या पाकिस्तान में?

नहेरुको यह चौथा विकल्प पसंद था. नहेरुने अपनी व्युह रचना तैयार रक्खी थी.

चौथे विकल्पको स्विकारनेमें नहेरुको कोई आपत्ति नहीं थी. हिन्दुस्तानमें नंम्बर वन बनना नहेरुके लिये बायें हाथका खेल तो नहीं था लेकिन अशक्य भी नहीं था. उन्होंने कोंग्रेसमें अपना सोसीयालिस्टीक ग्रुप बना ही लिया था.

नहेरुने गांधी और सरदारको प्रच्छन्न रुपसे दो विकल्प दिया.

या तो मुझे नंबर वन पोस्ट दो. नहीं तो मैं कोंग्रेसको विभाजित करके बचे हुए देशमेंसे अपना हिस्सा ले लुंगा और उसके बाद बचे हुए हिस्सेमें भी आग लगाके जाउंगा कि दुसरे नेता जाति आदि लोग अपना हिस्सा भी मांगे.

पक्षके नेताके रुपमें नहेरुका समर्थन किसी भी प्रांतीय समितिने किया नहीं था तो भी नहेरु अपने आवेदन पर अडग रहे.

महात्मा गांधीको नहेरुकी व्युह रचना समझमें आगयी थी.
महात्मा गांधीने कोंग्रेसको विलय करके उसको लोकसेवा संघमें परिवर्तन करने का निश्चय कर लिया. उन्होने सरदार पटेलको विश्वासमें ले लिया कि वे जब तक स्थानिक समस्याएं हल न हो जाय तब तक वे कोंग्रेसको विभाजित होने नहीं देंगे.
गांधीजीको मालुम हो गया था कि खुदकी जान कभी भी जा सकती है.

इसलिये महात्मा गांधीने २७वीं जनवरी १९४८में ही आदेश दे दिया की कोंग्रेसको एक राजकीय पक्षके स्थान पर अपना अस्तित्व समाप्त करना है. उन्होने इस दरम्यान लोकसेवा संघका संविधान भी बना दिय था.

नरेन्द्र मोदीको चाणक्य बनना है या पृथ्वीराज

अगर नरेन्द्र मोदीको चाणक्य बनना है या पृथ्वीराज चौहाण, इस बातकी चर्चा करते समय हमें कोंग्रेस और नहेरु की बातें क्यों करें?
भारतमे हमने और हमारे नेताओंने अंतिम सौ सालमें जो क्षतिपूर्ण व्यवहार किया, या जो क्षतिपूर्ण व्यावहार हो गया या करवाया गया उनको हमें याद रखके आगे बढना है.

यदि हम याद नहीं रक्खेंगे तो वैसी या उससे भी अधिक गंभीर क्षतियोंका पुनरावर्तन होगा, और भावी जनता हमे क्षमा नहीं करेंगी.

अंग्रेजोंकी नीतियां और उनका पढाया हुआ क्षतियुक्त इतिहासः
अंग्रेज तो चले गये, किन्तु उनकी विचारधारा के आधारपर उन्होने जो तीकडं बाजी चलायी और हमारे बुद्धिजिवीयोंने जो स्विकार कर लिया, ऐसे तथ्योंको हमे उजागर करना पडेगा. इतिहासके पन्नोंसे उनको निकालना नही है लेकिन उसको एक मान्यताके आधार पर उसके कदके अनुसार काट देना है. हमारे भारतीय शास्त्रोंके आधार पर तर्कपूर्ण रीतिसे इतिहास पढाना है.
इसका एक मानसशास्त्रीय असर यह भी होगा कि भारतमें जो विभाजनवादी तत्व है वे विरोध करने के लिये गालीप्रदानके साथ आगे आजायेंगे. उनको पहेचानना है और उनको सियासती क्षेत्रसे निकालना है. वे तर्क हीन होनेके कारण ध्वस्त ही हो जायेंगें. भारतमें एक हकारात्मक युग का प्रारंभ होगा.
https://www.youtube.com/watch?v=x4Vh0cBVPdU ancient scientific knowledge of India: A lecture delivered by CSIR scientist in IIT Chennai
https://www.youtube.com/watch?v=6YG6pXE8aDs Ancient Indian Scientists were all Rishis with High Spiritual Powers (Technology of Spirituality)
मुहम्मद घोरी क्षमाके पात्र नहीं है, किन्तु मुहम्मद घोरी कौन कौन है? और जयचंद कौन है.
मुहम्मद घोरी है; नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण, उनके साथीगण, कश्मिरके नेतागण और दंभी सेक्युलर समाचार माध्यम के पंडितगण.

यह है कभी न माफ करनेवाली सांस्कृतिक गेंग
इनलोगोमें सामान्य बात यह है कि वे बीजेपीकी एक भी क्षति कभी माफ नहीं करेंगे. उसके उपरांत ये लोग विवादास्पद तथ्यों पर और घटनाओं पर पूर्वग्रह रखकर उनको बीजेपीके और नरेन्द्र मोदीके विरुद्ध उजागर करेगे. इनके लिये समय कि कोई सीमा नहीम है.
(१) १९४२में कोई अन्य बाजपाई नामक व्यक्तिने क्षमा-पत्र देकर पेरोल पर उतर गया था तो इन नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंने २००३-४ के चूनाव अंतर्गत भी इस बातको अटल बिहारी बाजपाई के विरुद्ध उछाला था.
(२) कोई दो पुलीस अफसरोंके बीच, कोई पिताकी प्रार्थना पर उसकी पुत्रीके साथ कोई अनहोनी न हो जाय इसके लिये निगरानी रखनेकी बात हो रही थी और उसमें सफेद दाढीवाले और काली दाढीवाले नेताका संदर्भ बोला गया था तो नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेता मनमोहन और उसके मंत्रीमंडलने स्पेसीयल बैठक बुलाके एक जांच कमिटी बैठा दी थी.
(३) एक लडकी कोई आतंकी संगठन के युवकोंके साथ मिलकर अपने मातापिताको बीना बतायें गुजरातकी और निकल गयी थी और तत्कालिन केन्द्रीय खुफियातंत्रने ही माहिति दी थी कि वे नरेन्द्र मोदीको मारने के अनुसंधानमें आ रहे है तो गुजरातकी पुलीसने उनको सशस्त्र होनेके कारण खतम कर दिया तो इन्ही नहेरुवीयन कोंगी नेतागण और उनके साथीयोंने शोर मचा दिया था.
(४) ऐसे कई पुलिस अफसरोंके खिलाफ ही नहीं किन्तु गुजरातके गृहमंत्री तकको लपेटमें ले के उनको कारवासमें भेज दिया था. मतलब कि, फर्जी केस बनाकर भी इन लोगोंको बीजेपीको लपेटमें लेके अपना उल्लु सीधा करनेमें जरा भी शर्म नहीं आती है. ये लोग तो मुहम्मद घोरीसे भी कमीने है.
(५) नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंके इससे भी बढकर काले करतुतोंसे इतिहास भरा पडा है. इन्दिरा घांडीसे लेकर मनमोहन सोनीया तक. इसमें कोई कमी नहीं.
इन गद्दारोंको कैसे पीटा जाय?
(क्रमशः)
शिरीष मोहनलाल दवे
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હિન્દુઓ ૧૦ સંતાનો ઉત્પન્ન કરે: એક ચર્ચા

હિન્દુઓ ૧૦ સંતાનો ઉત્પન્ન કરે
જ્યારે ભારતની વાત કરીયે અને તેમાં પણ ભારતમાં હિન્દુ, મુસ્લિમ અને ખ્રિસ્તિ એ ત્રણ ધર્મને સાંકળતી અને વસ્તી વધારાના સંદર્ભમાં વાત કરીએ ત્યારે તેને એકાંગી રીતે ન વિચારી શકાય. આ બાબતને તેની સમગ્રતા જોવી જોઇએ.

હિન્દુધર્મના નેતાઓ

જો ભારતમાં મુસ્લિમ વસ્તીવધારાની વાત કરીએ અને મુસ્લિમ આક્રમણની વાત કરીએ તો આ મુસ્લિમ આક્રમણને પણ વસ્તીવધારાના સંદર્ભ પુરતું મર્યાદિત રાખવું જોઇએ. લવ જેહાદને વસ્તીવધારા સાથે સાંકળી ન શકાય. લવ જેહાદ અલગ વિષય છે.
જે હિન્દુ નેતાઓ મુસ્લિમ વસ્તીવધારા રુપી આક્રમણની વાત કરે છે અને તેઓને આપણે ખોટા પાડવા છે તો તેમની પ્રત્યે પૂર્વગ્રહ રાખીને અને પરોક્ષ રીતે નિમ્ન દર્શાવીને ચર્ચા ન ચલાવવી જોઇએ.
આપણે સહુ જાણીએ જ છીએ કે કે જેને આપણે પ્રણાલીગત રીતે હિન્દુ ધર્મ કહીએ છીએ તેને એવા કોઈ ધર્મગુરુ નથી કે તેઓશ્રી જે કંઈ કહે તે હિન્દુ ધર્મનું ફરમાન છે એવું સ્વિકારવામાં આવે. વળી આ નેતાઓને “હિન્દુઓના કહેવાતા નેતાઓ” એમ કહીને ઉલ્લેખવા તે પણ તેમની પ્રત્યેની અવમાનના જ સૂચવે છે. વિવેચકની એક પૂર્વગ્રહવાળું તારણ કાઢવાની મનોવૃત્તિ હોય તેવું પણ ફલિત થાય છે. વિવેચકની અવિશ્વસનીયતા પણ ઉભી થાય છે. આ હિન્દુ નેતાઓ તેઓ જે કંઈ છે અને જેવા છે તેવા રાખીને ઉપરોક્ત જેવું કશું કહ્યા વગર તેમના વક્તવ્યની ગુણદોષના આધાર ઉપર ચર્ચા કરીએ તો તે યોગ્ય ગણાશે.

ખ્રિસ્તીઓ અને મુસલમાનો

ખ્રિસ્તીઓએ અને મુસલમાનોના શાસકોએ મધ્યકાલિન અને તાજેતરના ભૂતકાળમાં શું કર્યું તે પેઢીઓને ભૂલી જઈએ તો તે સાવ અયોગ્ય નહીં ગણાય. છેલ્લા સો વર્ષની તવારિખ જ ને જ ધ્યાનમાં રાખીશું. અને શો બદલાવ આવ્યો છે અને તે બદલાવની ઝડપ શું છે. ભવિષ્યમાં આ બદલાવની ઝડપ શું અંદાજી શકાય તે વિષે વિચારવું પડશે.

ખ્રિસ્તીઓમાં ફક્ત ધર્મ ગુરુઓ જ પછાત રહ્યા છે કે જેઓ એમ માને છે કે વિશ્વને આખાને ખ્રિસ્તી કરી દેવું જોઇએ એ ઈશ્વરનો આદેશ છે. ખ્રિસ્તી ધર્મ એક સુગ્રથિત બંધારણવાળો ધર્મ છે અને પૉપ જે કહે તેને અંતિમ કહેવાય. વળી તેની પાસે મોટું ફંડ છે. સરકારોનું તેને પીઠબળ હોય છે. એટલે જે ખ્રિસ્તી સરકારો પોતાને ધર્મનિરપેક્ષ માને છે અને વિશ્વને મનાવે છે, પણ જ્યારે તેમને જરુર પડે તેમના ધર્મસંસ્થાઓ દ્વારા બીજા દેશોમાં થતી બળજબરી બાબતે આંખ મિંચામણા કરે છે. સમાચાર માધ્યમો આવી બાબતોને ચગાવવામાં માનતા નથી.

ખ્રિસ્તી અને મુસ્લિમ આતંકવાદ
ઇસ્લામ અને ખ્રિસ્તી ધર્મના સિદ્ધાંતો એક જ છે. મુસ્લિમોમાં એક વધારાનું તત્વ છે તે એ કે તેનો વિસ્તીર્ણ આતંકવાદ. આમ તો ખ્રિસ્તીઓનો પણ ખ્રિસ્તિ ધર્મગુરુઓના પ્રત્યક્ષ અને પરોક્ષ સહાકર દ્વારા પોષાતો આતંકવાદ છે પણ તે છૂટક છૂટક છે. ખ્રિસ્તીઓનો આ આતંકવાદ તમે ઉત્તર-પૂર્વી રાજ્યોમાં મોટા પાયે અને કેરાલા, તામિલનાડુ અને ઓરિસ્સામાં છૂટો છવાયો જોઈ શકો છે. પણ આની નોંધ લેવાતી નથી આના ઘણા કારણો છે. પણ તેની ચર્ચા નહીં કરીએ કારણ કે તેની ચર્ચા એક વિષયાંતર થઈ જશે.

મુસ્લિમો પુરતી ચર્ચા મર્યાદિત રાખીએ તો હિન્દુ નેતાઓની વાત સાવ નાખી દેવા જેવી નથી. હિન્દુઓ નેતાઓ જે વાત કરે છે તે કંઈ તેમનું આગવું સંશોધન નથી. ભારત સહિત આખા વિશ્વમાં મુસ્લિમ વસ્તી વધારા સામે એક સમસ્યા રુપી પ્રશ્નચિન્હ ઉત્પન્ન થયું છે. આપણા કેટલાક સુજ્ઞ લોકો કદાચ આનાથી માહિતગાર ન પણ હોય અને કદાચ હોય તો પણ તેમને કોઈપણ કારણસર તે વાતને લિપ્ત ન પણ કરવી હોય.

DO NOT DEMAND HUMAN RIGHTS

સાંપ્રત સામાજીક અને રાજકીય માનસિકતા

ભારતની સાંપ્રત સામાજીક અને રાજકીય માનસિકતાના સંદર્ભને અવગણીને આપણે જો કોઈ તારતમ્ય ઉપર આવીશું તો તે યોગ્ય ગણાશે નહીં. એટલું જ નહી પણ સાંપ્રત વિશ્વ આખાની સામાજીક અને રાજકીય માનસિકતાના સંદર્ભોને પણ લક્ષમાં લેવા પડશે. જાપાન, ચીન અને ઓસ્ટ્રેલીયા આ બાબતમાં શું વિચારે છે? અને શા માટે વિચારે છે? તેમના નાગરિક કાયદાઓ શું છે, અને આપણા કેવા છે તે બધું પણ લક્ષમાં લેવું પડશે. મુસ્લિમ દેશો કે જ્યાં મુસ્લિમો બહુમતિમાં છે ત્યાં વિધર્મ અને વિધર્મીઓની સ્થિતિ શું હતી અને શું છે? આ બધું એટલા માટે સંદર્ભમાં લેવું પડે કારણ કે પ્રસાર માધ્યમના કારણે વિશ્વ નાનું ને નાનું બનતું જાય છે. આવે સમયે આપણે છૂટક આંકડાઓ દ્વારા ભ્રમ ઉત્પન્ન કરીએ તે યોગ્ય નહીં ગણાય. જે પ્રત્યક્ષ છે તે સત્ય છે. કશ્મિરી હિન્દુઓ તંબુઓમાં છે તે સત્ય છે. ઉત્તર-પૂર્વ રાજ્યોમાં હિન્દુઓ નામશેષ છે તે સત્ય છે.
હિન્દુ નેતાઓ, સર્વમાન્ય હિન્દુ નેતા હોય કે ન હોય તે ચર્ચાનો વિષય નથી. વાસ્તવમાં તેઓ પણ ભારતના નાગરિક છે અને નાગરિક તરીકે તેઓ પોતે પોતાનો અભિપ્રાય વ્યક્ત કરવાનો અધિકાર ભોગવી શકે છે. આ સંદર્ભમાં તેમને મુલવવા જોઇએ.

આપણા હિન્દુ નેતાઓએ તો મુસ્લિમવસ્તી વિસ્ફોટને જીરવવા માટે એક રસ્તો પ્રસ્તુત કર્યો. પણ તેમનો હેતુ શું છે અને શા માટે આવો રસ્તો બતાવ્યો તે તેમણે છૂપાવ્યું નથી અને આપણે તેમની આ વાત છૂપાવવી ન જોઇએ. ચર્ચા કરવી હોય તો સમસ્યાને સમગ્રતામાં મુલવવી જોઇએ.

મુસ્લિમો તરફ થી આપણને શો ભય છે?
જ્યાં મુસ્લિમો તદન અલ્પમતમાં છે ત્યાં તેઓ તાબે થાય છે. જ્યાં તેઓ નગણ્ય નથી ત્યાં તેઓ વિશેષ અધિકારો માગ્યા કરે છે. જ્યાં તેઓ બહુમતિમાં છે ત્યાં તેઓ બળજબરી કરે છે અને પરધર્મીઓને કાં તો ધર્મ પરિવર્તન કરાવે છે અથવા તો તેમને નષ્ટ કરે છે. આના તાજા ઉદાહરણો મોટી માત્રામાં ઉપલબ્ધ છે. પાકિસ્તાન, બંગ્લાદેશ અને કશ્મિરમાં હિન્દુઓ કેટલા હતા? હવે કેટલા છે? જો આ સંદર્ભને તમે અવગણશો તો તમે માનવધર્મની જ અવગણના જ કરી ગણાશે.

ગરીબી અને નિરક્ષરતા બચાવ નથી
મુસ્લિમોની ધાર્મિક કટ્ટરતાવાળી માનસિકતા શું નિરક્ષરતા અને ગરીબી છે? જો આપણે એમ માનતા હોઇએ કે મુસ્લિમોની ધાર્મિક કટ્ટરતા અને વસ્તીવધારાનું મૂળ મુસ્લિમોની નિરક્ષરતા અને ગરીબી છે તો તે આપણી જાત સાથેની એક છેતરપીંડી ગણાશે. જો આમ હોત તો યુરોપના દેશો પોતાના દેશોમાં મુસ્લિમોના વસ્તીવિસ્ફોટને સમસ્યા ન માનતા હોત. અને સાઉદી અરેબિયામાં કે બીજા વિકસિત અને સુશિક્ષિત દેશોમાં ધર્મનિરપેક્ષતા પ્રસરી ગઈ હોત. પણ તેમ થયું નથી.

પ્રત્યાઘાતને સમજો
હિન્દુ નેતાઓએ ૧૦ બાળકો પેદા કરવાની જે વાત કરી તે વાતને પકડીને તે વાતને બીજા સંદર્ભોથી અલિપ્ત રાખીને ૧૦ બાળકોની વાતને જ આપણે નિશાન બનાવીએ તે બરાબર નથી. મુસ્લિમ વસ્તી બે રીતે વધે છે. એક છે મોટા પાયે થતી વિદેશી ઘુસણખોરી અને બીજી છે તેમનો સ્થાનિક વસ્તી વિસ્ફોટ. ત્રીજું પણ એક કારણ છે તે છે તેમનો અલગ નાગરિક કાયદો. આ નાગરિક કાયદા હેઠળ તમે તેમને લાભ આપી શકો પણ તેમને નાગરિક લાભોથી વંચિત ન કરી શકો. એટલે જો તેમની વસ્તી વધે તો દેખીતી રીતે જ ગરીબી પણ વધે અને ગરીબી વધે એટલે સરકાર મુસ્લિમોની અવગણના કરે છે તેમ પણ આંકડાઓ દ્વારા ફલિત થાય. તમારે તમારી મુસ્લિમ નાગરિક કૂટનીતિઓ દ્વારા ઉભી કરેલી ગરીબી રાહતો જાહેર કરવી પડે. આ રાહતોના નાણાં તમારે સામાન્ય નાગરિક નિધિ (પબ્લીકફંડ)માંથી ફાળવવા પડે. વિકાસના કામોમાં એટલો ઘાટો પહોંચે અને એટલે ગરીબી વધે. આમ એક વિષચક્ર ચાલ્યા કરે.

તો શું હિન્દુઓ ૧૦ બાળકો ઉત્પન્ન કરે તે યોગ્ય છે?
વાસ્તવમાં હિન્દુઓની આ એક પ્રતિક્રિયા છે.
પશ્ચિમ પાકિસ્તાને પૂર્વ પાકિસ્તાનને અન્યાય કર્યો એટલે બંગાળીભાષી મુસ્લિમોએ પ્રતિકાર કર્યો. તેના પ્રતિકાર રુપે પાકિસ્તાની સરકારે હિન્દુઓને અને અ-બંગાળી મુસ્લિમોને બંગાળમાંથી ખદેડ્યા. પાડાને વાંકે પખાલીને ડામ દેવાયો. પૂર્વ ભારતમાં અરાજકતા ફેલાઈ એટલે જનાક્રોષ થયો અને ભારત ઉપર યુદ્ધ લદાયું. આ યુદ્ધ ભારત જીત્યું એટલે કે પાકિસ્તાન ૧૯૭૧નું યુદ્ધ હાર્યું. ભારતીય લશ્કર ગમે તેવું મજબુત હોય. પણ ભારતીય અને ખાસ કરીને નહેરુવીયન કોંગ્રેસી નેતાઓ સ્વકેન્દ્રી હોય છે. તેઓ પાકિસ્તાન માટે સોફ્ટ ટાર્જેટ હોય છે. એટલે સિમલા કરાર દ્વારા ઈન્દીરા ગાંધીને મૂર્ખ બનાવી, ગુમાવેલું બધું પાછું મેળવી લીધું. પણ લશ્કરી હાર તો હાર હતી અને પાકિસ્તાની લશ્કર તે હાર જીરવી ન શક્યું. એટલે પાકિસ્તાની લશ્કરે તેની ગુપ્તચર સંસ્થા અને રશીયા-અમેરિકાના ઠંડાયુદ્ધની સમાપ્તિએ ફાજલ પડેલા આતંકી સંગઠનોની મીલી ભગતે પ્રત્યાઘાત તરીકે આતંકવાદ ચાલુ કર્યો. પહેલું ભક્ષ્ય કશ્મિરને બનાવ્યું. ત્યાં હિન્દુઓને ખુલ્લે આમ ધમકીઓ આપી ૩૦૦૦ હિન્દુઓને મોતને ઘાટ ઉતાર્યા. સાતલાખ હિન્દુઓને ભગાડ્યા. કશ્મિરની સરકારે અને ભારતની દંભી સેક્યુલર સરકારે પણ આંખ મીંચામણા કર્યા. હિન્દુઓ માટે આ અન્યાય થયો. એક મસ્જીદ તૂટી. એની સામે હજાર મંદીરો તૂટ્યા અને આતંકવાદીઓએ હજારોને મરણને શરણ કર્યા. એક રેલ્વે કોચને ઘેરીને સળગાવ્યો અને હિન્દુઓને જીવતા સળગાવ્યા. ગુજરાતમાં દંગાઓ થયા. મુસ્લિમો વધુ મર્યા. પછી તો મુસ્લિમોએ અનેક જગ્યાએ બોંબબ્લાસ્ટ કર્યા અને હ્જારો માણસ મર્યા.
મૂળ વાત જે હતી તે બંગ્લાભાષીઓને ૧૯૫૬થી કે તે પહેલાંથી થયેલા અન્યાયની હતી. તેમાં પાકિસ્તાનોના હિન્દુઓનો અને બીનબાંગ્લાભાષી મુસ્લિમોની ઉપરાંત પડોશી દેશ ભારતનો પણ ખૂડદો બોલી ગયો. આ વાત ભારતના દંભી ધર્મ નિરપેક્ષીઓને સમજવી નથી.

આ વાત ફક્ત પાકિસ્તાનના અને બંગ્લાદેશના મુસ્લિમોની માનસિકતાની જ નથી. સમગ્ર વિશ્વના મુસ્લિમોની માનસિકતા આવી છે અને આ માનસિકતાને સાક્ષરતા કે ગરીબી સાથે સ્નાનસૂતકનો પણ સંબંધ નથી.

હિન્દુઓએ ૧૦ બાળકો ઉત્પન કરવા એવી વાત શા માટે કરી?
ભારતની સરકારો દંભી ધર્મનિરપેક્ષતામાંથી બહાર આવી શકતી નથી. એટલે મુસ્લિમો અને ખ્રિસ્તી લોકો મનમાની કરે છે. તેઓ જે વિસ્તારોમાં પોતે બહુમતિમાં છે ત્યાં બળજબરી કરે છે, અને સમગ્ર ભારતમાં તેઓ લઘુમતિમાં છે તે ધોરણે તેઓ લઘુમતિના નામે અને ધાર્મિક સ્વતંત્રતાને નામે વિશેષાધિકારો ભોગવે છે.
હિન્દુઓ બહુમતિમાં છે. આ બહુમતિ તેમનો ગુનો બને છે. સરકાર જો ભેદભાવ વાળા વલણમાંથી બહાર ન નિકળી શકતી હોય તો હિન્દુઓએ શું કરે? આ સંદર્ભમાં હિન્દુઓએ પણ પોતાની બહુમતિ જાળવી રાખવા ૧૦ સંતાનો ઉભા કરવા જોઇએ એમ હિન્દુ નેતાઓએ કહ્યું.

મુસ્લિમ બનો અથવા ખતમ થાઓ
ટૂંકમાં એમ કહી શકાય કે હિન્દુઓ કુટૂંબ નિયોજન કરે આર્થિક રીતે સક્ષમ થાય પણ તે પછી મુસ્લિમો બહુમતિમાં આવે ત્યારે કાંતો તેઓ મુસ્લિમ થાય અથવા ખતમ થાય. કારણ કે કશ્મિરી હિન્દુઓ તો ભાગીને ભારતમાં આવી જાય. પણ ભારતના હિન્દુઓને ભાગી જવા માટે બીજો કોઈ દેશ નથી, એટલે તેમણે તો કાંતો મુસ્લિમ થવું પડે અથવા ખતમ થવું પડે.

હજી આગળ વિચારો.

જો હિન્દુઓ ખતમ થશે તો બે જ પ્રજા બચશે. એક ખ્રિસ્તી અને બીજી મુસ્લિમ.

ખ્રિસ્તીઓ અત્યાર સુધી ભલે અજેય રહ્યા હોય પણ મુસ્લિમો, ખ્રિસ્તીઓને ખતમ કરી દેશે. અપાર સંખ્યાના બળ આગળ શસ્ત્રોનું કશું ચાલ્યું નથી. અને મુસ્લિમો પણ કંઈ શસ્ત્ર વિહીન નથી. આખી પૃથ્વી મુસ્લિમ થશે પછી શું થશે. પછી મુસ્લિમો અંદર અંદર લડશે અને માનવ જાતનો નાશ થશે.
૧૦૦ અબજ વર્ષ પછીના બીજા બીગબેંગની રાહ જુઓ. તે દરમ્યાન મુસ્લિમોને અને ખ્રિસ્તીઓને સમજાઈ ગયું હશે કે જે અદૃષ્ટ સ્વર્ગની આશામાટે અને નર્કના ભયને કારણે, જે ખૂન ખરાબા કરેલ તે સ્વર્ગ અને નર્ક તો વાસ્તવમાં હતા જ નહીં. માટે હવે તો જો કોઈ ઇશ્વરના પુત્રના નામે કે પયગંબરના નામે આવે તો તેની ખેર નથી.

શું આ શક્ય છે?

હિન્દુ પુરાણો કહે છે કે એક બીગ બેંગ પછીના બીજા બેંગમાં ઐતિહાસિક સંસ્કૃતિમાં ૨૦% જેટલો બદલાવ આવે છે.

શિરીષ મોહનલાલ દવે
ટેગ્ઝઃ હિન્દુ, મુસ્લિમ, ખ્રિસ્તી, ઇસ્લામ, ધર્મ, ૧૦ સંતાન, લઘુમતિ, બહુમતિ, આતંકવાદ, ધર્મ નિપેક્ષ, માનસિકતા, ખૂનામરકી, ભારત, પાકિસ્તાન, બંગ્લાદેશ

હેલ્પેશભાઈએ ચા બનાવી

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હેલ્પેશભાઈએ જોયું કે તેમના પત્ની વંત્રિકાબેન દાદરો ઉતરીને નીચે રસોડામાં આવી રહ્યા છે.
હેલ્પેશભાઈએ કહ્યું; જો હવે હું ઉપર જાઉં છું. ગોપા ઓફીસ જતાં જતાં મને ત્રણવાત કહેતી ગઈ છે. એક વાત; કહેતી ગઈ છે કે દૂધના મોટા પેકેટ ખલાસ થઈ ગયા છે એટલે નાના પેકેટમાંથી ચા માટે તથા પીવા માટે દૂધ વાપરવાનું છે. બીજીવાત; ગોપાને ઓફીસ નું મોડું થતું હોવાથી ચાની તપેલી ધોઈ નથી. તેથી ચા માટે મમ્મી નવી તપેલી લે એમ પણ કહ્યું છે. ત્રીજીવાત; ગોપાએ બ્રેકફાસ્ટ માટે તારા માટે ઢોંસા બનાવીને રાખ્યા છે.

વંત્રિકાબેનઃ “એમાં ગણાવીને શું કામ કહો છો?

હેલ્પેશભાઈ; “ આતો હું ભૂલી ન જાઉં એટલે મેં ગણત્રી કરી રાખી કે મારે તને ત્રણ વાત કહેવાની છે.

વંત્રિકાબેન; “ જોયા મોટા ગણાવવાવાળા. પોતાને કશું આવડતું નથી એટલે આવું ડહાપણ સુઝે છે.

હેલ્પેશભાઈ; “ મને તો બધું જ આવડે છે. પણ તું મને કરવા ક્યાં દે છે!

વંત્રિકાબેન; “ આવડ્યો મોટો. હોંશીયારી ન મારતા હો તો સારું … શું આવડે છે બોલોને !

હેલ્પેશભાઈ; “ બધું જ આવડે છે. તું કહે તો મોહનથાળા બનાવી દઉં. બોલ બનાવી દઉં?

વંત્રિકાબેન; “ આવડ્યો … આવડ્યો … ચા બનાવતા તો આવડતી નથી … અને મોહનથાળ બનાવવો છે, મોટો …

હેલ્પેશભાઈ; “ પણ તું મને કશું બનાવવા ક્યાં દે છે કશું? હું તો બધું જ બનાવી શકું. તું કહે તો આજે ચા પણ બનાવી દઉં. પણ તારે તો તારો જાણે ગરાસ લુંટાઈ જાય છે. મને કશું કરવા જ ક્યાં દે છે?

વંત્રિકાબેન; “ કરવા શું દે ! આવડે તો કરવા દઉં ને? સેકેલો પાપડે ભાંગ્યો છે કોઈ દિવસ ! તે આવડવાની વાત કરો છો?

હેલ્પેશભાઈ; “ તું એક તો મને કશું કરવા નથી દેતી અને મારી બુરાઈ કરે છે. ચલ આજે તો ચા બનાવી જ દઉં. પણ તારે કશું વચ્ચે બોલવાનું નહીં. હું જેમ કરતો હોઉં તેમ મને મારી રીતે કરવા દેવું

વંત્રિકાબેન; “ લો બોલ્યા … મને મારી રીતે કરવા દેવું. એમ હું શેની કરવા દઉં. એક ચા કરવામાં રસોડું આખું ચિતરી મુકો. એટલે મારે તો કામ વધે. અહી હું મરી મરીને બધું કામ કરતી હોઉં છુ, અને તમે એમાં વધારો કરો … એ ક્યાંથી ચાલે !!
હેલ્પેશભાઈ; “ ઓ કે ચલ. … હું કંઇ ભૂલ કરું તો બોલજે એ સિવાય નહીં બોલતી. કબુલ?

વંત્રિકાબેન; “ મારે બોલવું હોય તો બોલું પણ ખરી.

હેલ્પેશભાઈ; “ ઓ કે. બોલજે બસ. હું ચા કરું છું કબુલ?

વંત્રિકાબેન; “ હા કરો . હું પણ જોઉં કે કેવી ચા કરો છો !!

હેલ્પેશભાઈ; “ તું તો જોતી જ રહી જઈશ એવી ફસક્લાસ ચા કરીશ.

વંત્રિકાબેન; “ હા કરો ને … જો ઉં તો ખરી કે કેવી ચા બનાવો છો!

હેલ્પેશભાઈ; “ ઓકે ચલ અહી આ ખુરશીમાં બેસી જા.

વંત્રિકાબેન; “ લો આ બેઠી. બનાવો ચા.

હેલ્પેશભાઈ તપેલી લેવા કીચનનું એક ડ્રૉઅર ખોલે છે.

વંત્રિકાબેન; “ એ .. એ ડ્રૉઅરમાં તપેલી ન હોય. ગેસની જમણી બાજુના બીજા નંબરના ડ્રૉઅરમાં તપેલી છે. ખબર તો છે નહીં કે રસોડામાં તપેલીઓ ક્યાં રખાય છે અને ચા બનાવવા નિકળી પડ્યા છે !!

હેલ્પેશભાઈ; “ તે એમાં શું થઈ ગયું. આ ડ્રૉઅરમાં ન હોત તો બીજું ડ્રૉઅર ખોલત.
(હેલ્પેશભાઈ એક તપેલી બહાર કાઢે છે.)

વંત્રિકાબેન; “ એ તપેલી નહીં. પેલી ત્રીજા નંબરની તપેલી લો.

હેલ્પેશભાઈ ત્રીજા નંબરની તપેલી લે છે. અને ફ્રીજમાંથી તપેલીમાં પાણી લેવા જાય છે.

વંત્રિકાબેન; “ ચા માટે કંઈ ફ્રીજનું પાણી લેવાની જરુર ન હોય. જુઓ જમણી બાજુના સીંકમાં જે નાનો નળ છે તે પીવાના પાણીનો છે. એ પાણી લો.

હેલ્પેશભાઈ; “ મને એમ કે ફ્રીજનું પાણી તો ફિલ્ટરવાળું હોય એટલે સારું કહેવાય.

વંત્રિકાબેન; “ હું કહું એમ કરો. ડાહપણ કર્યા વગર ..

હેલ્પેશભાઈ સીંકના નળનું પાણી લેવાની શરુઆત કરે છે.

વંત્રિકાબેન; “ એમ ધડ ધડ નળ ખોલવાની જરુર નથી. અને તપેલી જરા વચ્ચે રાખો. એટલે પાણી બહાર ન પડે.

હેલ્પેશભાઈ; “ બધું કહેવાની જરુર નથી.

વંત્રિકાબેન; “ કહેવું તો પડે જ ને. આવડતું તો કશું છે નહીં

હેલ્પેશભાઈ; “ ભલે ભલે.. લે બસ.
હેલ્પેશભાઈ પાણી લે છે.

વંત્રિકાબેન; “ તપેલીમાં દુધ નાખવાની જગ્યા પણ રાખજો. છલો છલ ભરી ન દેશો.

હેલ્પેશભાઈ; “ મને ખબર છે કે સવા ત્રણ કપ પાણી અને એક કપ દુધ એમ હોય છે.
હેલ્પેશભાઈ ગેસની ડાબી બાજુની સઘડી ઉપર તપેલી મુકે છે.

વંત્રિકાબેન; “ એ સઘડી ચા માટે નથી. ચા માટે જમણી બાજુની નીચેની સઘડી ઉપર તપેલી મુકો. હેલ્પેશભાઈ તેમ કરે છે.

વંત્રિકાબેન; “ એમ ફાંફાં શું મારો છો. ત્રીજા નંબરનો નોબને ઑન કરો એટલે ગેસ ચાલુ થશે. ઉપરનો એગ્ઝોસ્ટ ચાલુ કરો. ફાયર એલાર્મ ચાલુ થશે તો પોલીસ આવીને ઉભી રહેશે. બધું કહેવું પડે. કોઈ દિવસ બૈરી કેમ કરે છે એ જોયું હોય તો ખબર પડેને… !!

હેલ્પેશભાઈ; “ તું વચ્ચે બોલ બોલ ન કર. હું તને ચા કરી દઈશ …

વંત્રિકાબેન; “ હવે આદુ શોધશો કે નહીં? જુઓ ડાબી બાજુના ખુણામાં પ્લાસ્ટીકની થેલીમાં છે.

હેલ્પેશભાઈ; “મને ખબર છે આદુ ક્યા છે તે સમજી !!
હેલ્પેશભાઈ થેલીમાંથી આદુની મોટી ગાંઠ કાઢે છે.

વંત્રિકાબેન; “ એ મોટી ગાંઠ લેવાની જરુર નથી. બીજી નાની ગાંઠ પણ છે.

વંત્રિકાબેન; “ એ મીડીયમ ગાંઠ નહીં. નાની ગાંઠ લો અને મીડીયમ ગાંઠમાંથી એક નાનો કટકો કાપો.

હેલ્પેશભાઈ નાની ગાઠ લે છે. અને મીડીયમ ગાંઠ ને કાપવા ચપ્પુ માટે એક ડ્રૉઅર ખોલે છે.

વંત્રિકાબેન; “ એ ડ્રૉઅરમાં ચપ્પુ ન હોય. એની ડાબી બાજુના ઉપલા ડ્રૉઅરને ખોલો એમાં ચપ્પુ હશે.

હેલ્પેશભાઈ એમ કરે છે અને એક ચપ્પુ લે છે.

વંત્રિકાબેન; “ એ ચપ્પુ નહીં. એ ચપ્પુ તો બ્રેડ કાપવા માટે છે. જુઓ એની પાછળ થોડું મોટું ચપ્પુ છે તે લો.

હેલ્પેશભાઈ; “ હવે એમાં શો ફેર પડે? આ ચપ્પુથી પણ કપાય છે તો ખરું જ ને.

વંત્રિકાબેન; “ હું કહું એમ કરો. ખોટી જીભા જોડી ન કરો.

હેલ્પેશભાઈ મોટું ચપ્પુ લે છે. અને આદુની છાલ કાઢે છે.

વંત્રિકાબેન; “ પહેલાં આદુને પાણી થી ધુઓ. પછી છાલ કાઢો.

હેલ્પેશભાઈ; “ મને મારી રીતે કરવા દે.

વંત્રિકાબેન; “ ના હું કહું હું એમ કરો. નહીં તો ચા નથી કરવી તમારે. ચલો .. ખસો આઘા.

હેલ્પેશભાઈ; “ ના હવે તો ચા કરીને જ જંપીશ.

વંત્રિકાબેન; “ કરો તો હવે. પણ હું કહું તેમ કરો.

હેલ્પેશભાઈ આદુને ધોવે છે. પછી એક ટીસ્યુ પેપેર નો કટકો ફાડે છે.

વંત્રિકા બેનઃ એવડો મોટો કટકો શેનો ફાડ્યો છે?

હેલ્પેશભાઈ; “ આદુના છોડા એમાં નાખવા પડશે ને !! નહીં તો કીચનનો આ પથરો બગડશે. મને બગડે એવું ન ગમે.

વંત્રિકાબેન; “ બહુ જોયા ચોક્ખાઈવાળા. નાનો કટકો ન ફડાય શું?

હેલ્પેશભાઈ પછી છીણીને શોધે છે.

વંત્રિકાબેન; “ શું શોધો છો. છીણી? અહીં છીણી નથી. જુઓ પેલા ખુણામાં પેલો નાનો ખલ છે. તેમાં આદુને વાટો.

હેલ્પેશભાઈ આદુને વાટે છે.

વંત્રિકાબેન; “ આ બધા આદુની છાલ જે પડી છે તેને કોણ ડસ્ટબીનમાં નાખશે? શું હું નાખીશ.?
હેલ્પેશભાઈ ટીસ્યુપેપરને છાલ સહિત ડસ્ટબીનમાં નાખે છે.
હેલ્પેશભાઈ ગેસના ચૂલાની પાણીની તપેલીમાં આદુ નાખે છે.

વંત્રિકાબેન; “ હવે હમણાં દુધ ન નાખશો. નહીં તો દુધ ફાટી જશે. પહેલાં પાણીને ઉકળવા દો.

હેલ્પેશભાઈ; “ મને ખબર છે. મને ફીઝીક્સ ના નિયમોની બધી ખબર છે.

વંત્રિકાબેન; “ એમાં ફીઝીક્સ ક્યાં આવ્યું વળી?

હેલ્પેશભાઈ; “ફીઝીક્સ તો બધામાં જ આવે. ઉકળતા પાણીમાં આદુના બેક્ટેરીયા જીવી ન શકે. અને જો પાણી ઉકળે એ પહેલાં આદુ નાખીએ તો બેક્ટેરીયા દુધને ફાડી નાખે.

વંત્રિકાબેન; “ બેક્ટેરીયા ફીઝીક્સમાં ન આવે. બેક્ટેરીયા બાયોલોજીમાં આવે.

હેલ્પેશભાઈ; “ બધા કોષ અણુઓના બનેલા હોય. અને અણુનું શાસ્ત્ર ફીઝીક્સમાં આવે. ઉકળવું, થીજી જવું … એવું બધું ફીઝીક્સમાં આવે. અંતે બધાં જ શાસ્ત્ર ફીઝીક્સમાં જ આવીને મળે. ખબર પડી?

વંત્રિકાબેન; “ મારે કશું જાણવું નથી.

હેલ્પેશભાઈ ચા ખાંડના ડબા શોધે છે.

વંત્રિકાબેન; “ એમ કેટલા કબાટ ખોલશો? જુઓ ડાબીબાજુના કબાટના બીજા શેલ્ફમાં ચા ખાંડના ડબા છે. પહેલાં ખાંડ નાખો. પાણી ઉકળે પછી ચા નાખજો.

હેલ્પેશભાઈ; “ મને બધી ખબર છે. કહેવાની જરુર નથી.

વંત્રિકાબેન; “ પણ તમે જે ડબો હાથમાં લીધો એ તો ચાનો ડબો છે.

હેલ્પેશભાઈ; “ તે ભલે ને હોય. ડબો ખોલીશ એટલે ખબર તો પડશે જ ને.

વંત્રિકાબેન; “ ચાની ચમચી જુદી છે. ખાંડની ચમચી થોડી મોટી છે એ લો. બધું કહેવું પડશે તમને.

હેલ્પેશભાઈ; “ કશું કહેવું નહીં પડે. શું હું એકલો રહ્યો જ નથી. લગન પહેલાં એકલો રહેતો હતો તો શું ચા પીતો ન હતો? મજાની ચા કરીને પીતો હતો.

વંત્રિકાબેન; “ એ હા… છે ને .. તે હું મરી જઉં પછી ચા કરીને પીજો ને. મારે ક્યાં જોવા આવવું છે!

હેલ્પેશભાઈ; “ એમાં મરવાની વાત ક્યાંથી આવી? હું ચા કરીને પીતો હતો એમાં મરવાને શું લાગે વળગે?

વંત્રિકાબેન; “ તો બીજું શું. હું આમ કરતો હતો અને હું તેમ કરતો હતો. જાણે કે શું નું શું ય કરી નાખ્યું હશે !!

હેલ્પેશભાઈ; “ હવે લબલાટી બંધ કર. આ મેં તને બહુ પપલાવીને રાખી ને … એટલે તું બહુ ફાટી છે. લકડે ધકડે રાખવા જેવી હતી.

વંત્રિકાબેન; “ તે લાવવી’તી ને તમારા ગામની. મારે ઘરે શું કામ જોડા ફાડવા આવતા હતા?

હેલ્પેશભાઈ; “ એ મારી ભૂલ થઈ ગઈ બસ. હવે છે કંઈ?

વંત્રિકાબેન; “ ભૂલ તો મારી થઈ કે મેં તમારી સાથે લગન કર્યા. મેં કશું વિચાર્યું જ નહીં. મારે વિચારવા જેવું હતું. આ વિચાર્યું નહીં એનું પરિણામ ભોગવવાનું આવ્યું. હું નકામી ફસાઈ ગઈ.

હેલ્પેશભાઈ; “ ફસાઈ તો હું ગયો. શરમાઈ શરમાઈને તેં મને ફસાવ્યો. જુદી જુદી છોકરીઓ જુદી જુદી રીતે છોકરાઓને ફસાવે. તેં મને શરમાઈ શરમાઈને ફસાવ્યો.

વંત્રિકાબેન; “ હવે ગેસ ઉપર ધ્યાન રાખો. ગેસને થોડો ધીમો કરો. અને દૂધ નાખો. બહુ ફસાઈ જનારા ન જોયા હોય તો. તમારા ગામની કોઈ મળી હોત ને ! તો ખબર પડત. માથે છાણા થાપત થાણા… આ પેલી “ …. “ ને જોઈ નથી… તમારા ગામની જ હતી ને હવે એનો વર પોશ પોશ પસ્તાય છે.

હેલ્પેશભાઈ; “ બધાને કંઈ એવી જ છોકરી મળે એવું કંઈ ન હોય, સમજી? અને હું કંઈ અમારા ગામની જ છોકરી લાવું એ કંઈ જરુરી નથી, સમજી?

વંત્રિકાબેન; “ જોયા મોટા છોકરી લાવવાવાળા. ચાને હલાવતા રહો. નહીં તો ઉભરાઈને ગેસનો ચૂલો બગાડશે. કાલે જ સાફ કર્યો છે.
હેલ્પેશભાઈ તપેલીમાં ચમચો ફેરવે છે અને બોલે છે “હજી ઉભરાવવાને ઘણી વાર છે.” પછી તેઓ ડાબી બાજુનું કબાટ ખોલે છે. બે કપ રકાબી કાઢે છે.

વંત્રિકાબેન; “ એ મારી રકાબી નથી. મારી રકાબી તો એક લાઈનવાળી છે. તમે બે લાઈનવાળી રકાબી કાઢી છે. એ પાછી મુકી દો. જુઓ પાછળ એક લાઈનવાળી રકાબી છે. અને એ કપ પણ મારો નથી. મારા કપ ઉપર લીલા રંગનું ફુલ દોરેલું છે. તમે લાલરંગના ફુલવાળો કપ કાઢ્યો છે. પાછો મુકી દો.

હેલ્પેશભાઈ; “ આમાં ચા ગાળીયે કે તેમાં ચા ગાળીએ, આમાં ચા પીએ કે તેમાં ચા પીએ, તો એમાં શું ફેર પડે. કંઈ ચાનો સ્વાદ બદલાઈ જાય છે?

વંત્રિકાબેન; “ હા સ્વાદ બદલાઈ છે. હું કહું એમ કરો. બધા કપ જુના નથી કરી દેવા મારે. સમજ્યા.

હેલ્પેશભાઈ; “ તારે તો ધત્તીંગ બહુ છે. લે બસ. આ તારો કપ અને આ તારી રકાબી.

વંત્રિકાબેન; “ ફુદીનો નાખ્યો? ધોઈને નખજો.

હેલ્પેશભાઈ; “ એ હા.. નાખું છું..

વંત્રિકાબેન; “ જુઓ પેલા કપરકાબીના કબાટની નીચેના બીજા ડ્રૉઅરમાં ગળણી છે. એટલે ખોટા ફાંફાં ન મારશો. કઈ વસ્તુ ક્યાં છે, એની કશી ખબર તો રાખતા નથી. અને પછી ફાંફાં માર્યા કરો છો.

હેલ્પેશભાઈ; “હા ભલે. ફાંફા મારવામાં મને વાંધો નથી. તારે શું છે? અને તને પણ એક ઘાએ ક્યાં કશું મળે છે? ઘરની ચાવી પણ જો પર્સમાંથી કાઢવી હોય તો તને પણ એક ઘાએ ક્યાં મળે છે. કેટલાયા ખાનાની ચેઈનો ખોલે ત્યારે માંડ માંડ પર્સમાંથી ચાવી મળે છે.

વંત્રિકાબેન; “ ગળણી બરાબર રાખો. તપેલીના હેંડલને તપેલીની નજીકથી પકડો. ચા નીચે ઢોળાશે. ધીમે ધીમે ધાર કરો. ધાડ નથી પડી કંઈ !! તમને તો બધું કહેવું પડે છે…

હેલ્પેશભાઈ; “ હવે તું મુંગી રહે… એક ટીપુંય ચા ઢોળી નથી.

વંત્રિકાબેન; “ ઢોળાઈ હોત તો? સાફ તો મારે જ કરવું પડત ને. તમે કોઈ રાખી છે જે સાફ કરે?

હેલ્પેશભાઈ; “ તું કહે એટલી વાર છે.. તું કહે તો ફુલ ટાઈમ નોકરાણી રાખી દઉં.

વંત્રિકાબેન; “ હા … ખબર છે બહુ પૈસા જાણે કૂદી પડ્યા છે. ફુલ ટાઈમ નોકરાણી કઈ મફત નથી આવતી.

હેલ્પેશભાઈ; “ ભલેને પૈસા લે. એટલા પૈસા તો આપણને પોષાય તેમ છે.

વંત્રિકાબેન; “ ના રે ના. નોકરાણી તો પછી એ એના મોઢા જેવું કરે. મારે ન ચાલે ..

હેલ્પેશભાઈ; “ તો હસવું અને લોટ ફાકવો એમ બંને સાથે ન થાય.

વંત્રિકાબેન; “ મારે કશી જીભા જોડી કરવી નથી. મૂગાં મોંઢે ચા પીવો છાના માના. ચા કરી એમાં તો જાણે ધાડ મારી.

શિરીષ મોહનલાલ દવે

ટેગ્ઝઃ ચા, ખાંડ, પાણી, તપેલી, દૂધ, કપ, રકાબી, આદુ, ફુદીનો, કામવાળી

पी.के. ने पीके किया नशा? कथांक – २

विश्वमें एक हिन्दु धर्म ऐसा है कि जिसमें विज्ञान जैसा खुलापन है. यह खुलापन हजारों सालसे है.

हिन्दु धर्ममें वेद प्रमाण है. किन्तु वेदोंको समझना कठिन है. इसलिये उपनिषद है. उपनिषद विशेषज्ञोंके लिये है. इस लिये कृष्ण भगवानने वेदोंके आधारपर उपनिषदोंका दोहन किया और उस दूधका दहीं बनाके तक्रका मंथन करके गीताके स्वरुपमें मक्खन बनाके आम जनताको प्रस्तूत किया. अगर गीतामें वेदोंके साथ कोई विरोधाभाष है तो वेद प्रमाण है. किन्तु वेदप्रमाण और प्रत्यक्ष प्रमाणमें यदि कोई विरोधाभाष है तो जो प्रत्यक्ष है वह प्रमाण है. ऐसा आदि शंकराचार्यने कहा है.

यह हिन्दुओंका खुलापन है. जब ज्ञातिप्रथा अत्यंत जड थी तब भी उसके विरुद्धमें विद्रोह उठाने वाले लोग थे. हिन्दु लोग अपनी प्रणालीयोंमें यदा कदा क्षति पाते है तो वे उन क्षतियोंको सुधारने के लिये सक्षम भी है. उसमें अन्य धर्मीयोंको चंचूपात करनेकी जरुरत नहीं है. अन्य धर्मी स्वयंकी क्षतियों पर आत्मखोज करें वह हि उनके लिये योग्य है.

पी. के. का उद्देश क्या था?
वास्तवमें पी. के. का उद्देश अंधश्रद्धा निर्मूलन है ही नहीं.
हिन्दु धर्ममें एक खुलापन होनेसे वह चर्चाके लिये एक आसान लक्ष्य बनता है. उसके विरोधियोंके लिये यह एक आनंदका विषय बनता है.
हिन्दु धर्म एक भीन्न प्रकारका धर्म है.

अन्य धर्मोंने अपने धर्मोंके आधार पर, धर्मकी जो परिभाषा की है, उस व्याख्या के अनुरुप हिन्दु धर्म नहीं है.

इस लिये अन्य धर्मी लोग हतःप्रभः है.
ये विधर्मी जहां कहीं भी गये उन्होने सौ वर्ष के अंतर्गत उन देशोंके ९५ से १०० प्रतिशतको अपने धर्ममें परिवर्तित कर दिये. किन्तु भारतवर्ष जहां विधर्मी जातियोंनें २०० से ८०० साल तक शासन किया तो भी ८० प्रतिशत भारतवासी हिन्दु धर्मी ही रहे. हिन्दुंओंकी तथा कथित क्षतियों को भरपूर हवा देने पर भी वे हिन्दु ही रहे. यह बात इन लोगोंके लिये आघातजनक है. ये लोग आत्म खोज करने के स्थान पर, बिना सोचे समझे, और बिना हिन्दु धर्मकी गहनताका अभ्यास किये, हिन्दुओंके आचार पर आक्रमण करना पसंद करते है.
सामान्य जनतामें धर्म, ज्ञान के उपर चलता नहीं है किन्तु श्रद्धाके आधार पर चलता है. इन अन्य धर्मीयोंकी व्युह रचना यह है कि अगर सामान्य जनताको हिन्दु धर्मके ज्ञानीयोंसे अलग की जाय तो फिर संख्या के आधार पर इन ज्ञानी लोगोंसे तो निपटा जा सकता है.

मुस्लिमोंने ६०० वर्षतक हिन्दु राजाओंसे संघर्ष किया. ऐसा करते करते वे खुद आधे हिन्दु बन गये. जो मुस्लिम राजा आधे हिन्दु नहीं बने और धर्मांध भी थे उन्होने गरीबोंको और आशितोंको मुस्लिम बनानेके प्रयास किये. कुछ लोगों पर जबरदस्ती भी की, हत्याएं भी की, थोडे सफल भी रहे. किन्तु जितना वे अन्य देशोमें सफल हुए उतना यहां नहीं हो पाये.
इस बातका मुस्लिमोंको अफसोस भी नहीं था. क्यों कि ६०० वर्षके अंतरालमें खुदका राज बचाने की नौबत उनको आगयीं थीं. जब औरंगझेब मृत्युशैया पर था तब मुगल साम्राज्य तहस नहस हो गया था.
अंग्रेजोंने कूट नीति चलायी. भारतीयोंको गलत और विभाजनवादी इतिहास पढाया. अंग्रेजी भाषाको भारतीयों पर ठोक दी. अंग्रेजी भाषाके जाननेवालोंको नौकरीयोंकी सुविधाएं दी. उनका मान बढाया. पाश्चात्य शिक्षाको ही स्विकृति दी. हिन्दुधर्म के पुरस्कर्ताओंको धर्मांध ठहेराया. हिन्दुओंके लिखे पुस्तकोंको सर्वांश नकार दिया.
इतना करने के बावजुद भी, हिन्दुओंके सामने इन लोगोंकी पराजय हर मोड पर निश्चित थी. उन्होने ऐसे हाथोंमें स्वतंत्र भारतका सुकान दिया कि जो संस्कारमें उनकी योजना आगे चलायें.

वह था नहेरु.

उसने विभाजन वादी प्रक्रियाएं चालु रक्खी. और पाश्चात्य पंडितोंने लिखा हुआ इतिहास भी चालु रक्खा. हिन्दुओंको अपमानित करना चालु रक्खा. मुसलमानोमें यह भावना रक्खी की वे हिन्दुओंसे भीन्न है.

मुसलमान समझने लगे कि उनका इतिहास अधुरा है. ख्रिस्ती भी ऐसा समझने लगे कि उनका इतिहास भी भारतमें अधुरा है. क्यों कि दोनों भारत को ९५-१०० प्रतिशत अ-हिन्दु कर नहीं पाये.

मुसलमानोंका इतिहास क्या है?
जहां भी उनका शासन हुआ वहां उन्होने १०० प्रतिशत जनताका धर्म परिवर्तन किया और सबको मुस्लिम बना दिया. यहां तक कि ईजिप्त, सुमेरु बेबीलोनकी सुसंस्कृत संस्कृतियोंका पतन किया. उनके धर्मस्थानोंको तोड दिया. उन धर्मस्थानोंके उपर अपने धर्मस्थान बनाये. वहांकी जनताका जबरदस्तीसे धर्म परिवर्तन किया. मुस्लिम शासकोंने हर जगह ऐसा ही किया था. भारतमें भी उन्होने हजारों देवस्थानोंको नष्ट किया. नालंदा, तक्षशीला, वलभीपुर जैसे विश्वविद्यालयोंको भी पूरी तरह नष्ट किया था. किन्तु भारतमें कई राजाओंने उनको पराजित किया इस लिये वे अपने ध्येयमें १०० प्रतिशत सफल नहीं रहे.

ख्रिस्ती शासकोंने क्या किया?
उन्होनें वही किया जो मुस्लिमोंने आतंकवादी बनके अन्यत्र किया था. उसके उपरांत ख्रिस्ती शासकोंने वहांके आदिवासीयोंका करोडोंकी संख्यामें कत्ल किया. उनकी भाषा भी नष्ट की. आज अमेरिकाके बचे हुए आदिवासी सब ख्रिस्ती है. उनकी मूल भाषा भी विलुप्त हो गयी है. माया-संस्कृतिका और उस धर्मको माननेवालोंका एक आदमी आपको कहीं भी मिलेगा नहीं. केवल इतिहासके पन्नों पर माया संस्कृति और उसकी भाषा आपको मिलेगी.

THEY ARE ENDED UP

किसी भी संस्कृतिको अगर नष्ट करना है तो उसकी भाषा, प्रणालीयां और धर्मस्थानोंको नष्ट करदो तो वह अपने आप नष्ट हो जायेगी.

भारतमें अब तक नहेरुवीयन कोंग्रेसका शासन था. इन्होने हिन्दु धर्मको धर्म निरपेक्षताके नाम पर कई सारे आघात किये. जो विधर्मी शासकोंने भारत पर शतकों वर्ष तक शासन किया था उनके धर्मको माननेवालोंको रीयायतें दी. वे लोग हिन्दुओंका धर्म परिवर्तन कर सके, उसके लिये भी सुविधायें दी. उनके लिये अलग नागरिक नियम बनायें. बहारसे पैसे लाके ये विधर्मी लोग भारतीय जंगलवासीयोंको, पर्वतवासीयोंको और समूद्रके किनारेके वासीयोंको हिन्दुमेंसे परधर्मी कर सके उसके लिये सुविधायें दी.
अगर कोई विधर्मी, हिन्दु धर्मके विरुद्ध बोलें, तो सरकारका रवैया रहा कि, भारत तो, एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है इसलिये सरकार उसमें दखल नहीं करेगी. वाणीस्वातंत्र्य और अपने धर्मका प्रचार करना विधर्मीयोंका अधिकार माना गया. लेकिन कोइ हिन्दु अगर ऐसा कुछ करें तो उसको धर्मांध कहेना, उसकी हर बातको भगवाकरण मानना, और उसकी निंदा करना एक फेशन मनवायी गयी. भगवाकरण शब्दको गाली के रुपमें प्रस्तूत किया ग्या. आदि आदि
हिन्दुओंको नष्ट करनेका अब यही एक उपाय बचा है कि, सामान्य कक्षाके हिन्दुओंको असंजसमें डालो, अपमानित करो, उनकी यातनाओंकोके प्रति दूर्लक्ष्य दो, विभाजित करो.

जो मूर्धन्य है उनमेंसे अधिकतरोंको तो भ्रष्ट करना आसान है. बाकि जो हिन्दु बचें, उनके विरुद्धमें विवाद खडा करके बदनाम किया जायेगा तो वे तो वैसे ही आम जनताकी नजरोंमेंसे गीर जायेंगे. नरेन्द्र मोदीको क्या किया गया? उसके इतिहास के संदर्भमें दिये गये उदाहरणोंको तोडमोड के प्रदर्शित किया गया, और उनको खुब उछाला. उसकी अंग्रेजी भाषाके उपर बेवजह ही मजाक उडाया. वह अगर किसी बात पर प्राथमिकता दें तो उसके उपर विवाद खडा किया जाता है.

एक बार अगर हिन्दु जनसंख्या ६० प्रतिशत हो जाय तो फिर उनको नष्ट करना आसान है.

सत्तालोलुप विधर्मीयों जिनमें कुछ प्रच्छन्न विधर्मी भी है, उनके लिये यह तो बायें हाथ का खेल है. क्यों कि विधर्मी ख्रिस्ती और मुस्लिम संस्कारमें तो एक समान ही है. दोनों समझते है कि उनका ही धर्म ईश्वरको मंजुर है. और विधर्मीयोंको किसीभी साधनसे नष्ट करना ईश्वरको मंजुर है.

फिलहाल विधर्मीयोंने भारतके कई राज्योंमें अपने बहुमत वाले टापु बना दिये है. ये लोग उनमें बसे हिन्दुओंके उपर आतंक करके उनका धर्म परिवर्तन कर देते हैं. अगर उन्होने धर्म परिवर्तन नहीं किया तो उनको घर छोडके भाग जाने पर मजबुर कर देते हैं. केराला, तामिलनाडु, पश्चिम बंगालके कई कस्बोंका यही हाल है. उत्तरपूर्वी राज्यों पर तो इन्होंनें कबजा जमा ही लिया है.

भारतका सामान्य जन विधर्मीयोंके इस प्रकारके आचारोंसे अज्ञात है. क्यों?

क्यों कि,

समाचार माध्यमों पर इन विधर्मीयोंका कब्जा है.

विधर्मी संचालित समाचार माध्यम अपने धर्मकी आतंकवादकी घटनाओंको प्रसारित करते नहीं है.
कश्मिरके हिन्दुओंके उपर किये गये आतंकको किस चेनलने प्रमाणके आधार पर प्रसारित किया था या किया है? एक भी नही.
विधर्मीयोंका आतंकवाद आज भी चालु है.
लेकिन कौनसी चेनल हिन्दुओंके मानव अधिकारकी रक्षाके लिये जागृत है? प्रमाण भान रखना और विधर्मीयोंके मानव अधिकारको मान्यता देना, इन बातोंमें ये मुस्लिम और ख्रिस्ती लोग मानते ही नहीं है.
एक बात सही है कि सामान्य ख्रिस्ती लोग, हिन्दुओंके विरुद्ध वाचाल नहीं है. वे अलग वसाहत नहीं बनाते है और हमारी ही कोलोनीमें हमारी पडोसमें ही रहेते है और हमसे तदृप होके रहेते है. लेकिन उनके जो मूर्धन्य और धर्मगुरु होते है वे सक्रीय होते है. वे लोग अपनी सामान्य जनताको यही कहेते है कि आप लोग, सिर्फ हम कहें उनको ही, चूनावमें वॉट दो. बाकीका काम हम कर देंगे.

मुस्लिमोंको सही रस्ते पर लाना शायद शक्य हो सकता है. किन्तु ख्रिस्तीयोंको सही मार्ग पर लाना कठिन है. क्यों कि उनको तो समझाया गया है कि आपका उद्धार तो हमने ही किया है. इन भारतवासीयोंने तो आपको हाजारों सालों तक यातनाएं ही दी है. क्यों कि वे हिन्दु है.

आप जरुर कहेंगे कि, पी. के. जिन हिन्दुओंने देखी है उनमेंसे कई हिन्दुओंने उसकी प्रशंसा की है. उसका क्या?

यदि आप प्रशंसा करनेवालोंका वर्गीकाण करेंगे तो उसमें दो प्रकारके लोग है. एक सामान्य कक्षाके लोग, जिनमें कुछ लोगोंका एक स्वभाव होता है कि किसी भी बात को “एक साक्षीभाव”के रुपमें देखें.
जब ऐसा होता है और जब उनको हिन्दु धर्मका शास्त्रीय ज्ञान नहीं होता है तो ये सामान्य लोग, दुसरोंकी व्युह रचनाएं नहीं समझ सकते और व्युहरचना करने वालोंका हेतु भी समझ नहीं सकते. अगर उनमें प्रमाणिक प्रज्ञा और प्राथमिकताती प्रज्ञा होती तो वे व्युह रचना बनानेवालों की व्युह रचना समझ सकते.

आप कहेंगे कि, कुछ मूर्धन्योंने भी तो, पी. के. की प्रशंसा की है, जैसे कि एल के अडवाणी. उसका क्या?
आपकी बात सही है. लेकिन आपको ज्ञात होना चाहिये कि दंभी धर्मनिरेक्षता करनेवालोंने एक ऐसी हवा प्रसारित की है कि, अडवाणी एक सोफ्ट और धर्मनिरपेक्ष नेता है. भारतको एक सोफ्ट नेता पसंद है. जैसे कि अटलजी भी एक सोफ्ट नेता था इसलिये वे भारतीय जनतामें स्विकार्य बने…. आदि… आदि..
वास्तवमें यह “सोफ्ट” वाला मामला एक सियासती व्युहरचना है. भारतीय जनताको एक विकल्प चाहिये था. भारतीय जनता नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनके साथीयोंके उनके सीमाहीन भ्रष्टाचार, ठग विद्या, दंभ और कोमवादसे त्रस्त हो गई थी. जब जब भारतीय जनताको विकल्प मिला है, उसने नहेरुवीयन कोंग्रेसको पराजित किया है.

यह बात भी समझ लो कि, नाम बडा हो जानेसे व्यक्ति बडा नहीं हो जाता.

कई बडे व्यक्तिओंमें एक निम्न कक्षाका व्यक्ति होता है.

small people Big name

लालु, माया, मुलायम, जया, करुणा, ममता, नितीश, अडवाणी, केशु, संकरसिंह वाघेला, फारुख, ओमर, मुफ्ती मोहमद, रसिकलाल, जिवराज, हितेन्द्र, ईन्दिरा, राजीव, सोनीया, राहुल …. अगर आप लिखोगे तो एक किताब बन जायेगी.

उपरोक्त लोग दुसरोंके कन्धे पर बैठके बडे नामवाले बने है.

वास्तवमें ये सब निम्न कक्षाके है, और इनलोगोंको नेता मानने वाले तो अति निम्न कक्षाके है.
उसी तरह कई छोटे लोगोंके शरीरमें, एक महान व्यक्ति बैठा हुआ होता है. जैसे नरेन्द्र मोदी, बाबा रामदेव, जोर्ज फर्नाडीस, बाबुभाई जसभाई पटेल, सरदार पटेल, महात्मा गांधी, विवेकानंद, दयानंद सरस्वती … इन नेताओंकी भी एक सूची बन सकती है जो सामान्य होते हुए भी महान बने.
ऐसे भी कई लोग होते है जो महान होते हुए भी, शक्यताके सिद्धांतके अनुसार महान बन नहीं पाये.

आप कहोगे कि पी. के. में कोई व्युह रचना अगर है भी, तो वह कौन कौन सी व्युह रचना हो सकती है? और ऐसी मान्यताका आधार क्या है?

फिल्म उद्योग काले धनको सफेद करनेका एक सडयंत्र है यह बात सबको ज्ञात है.
पी. के. ने सीनेमा टीकीट का मूल्य बढा दिया था. जो सीनेमाघर खाली थे या “हाउसफुल” नहीं थे उनको भी “फाउसफुल” घोषित किये गये थे.
मान लिजिये अगर एक सीनेमा घरकी बैठकें १००० है. और टीकीटका मूल्य १४० रुपया है. और अगर वास्तवमें २०० टीकीट की ही बीक्री हुई किन्तु हाउसफुल घोषित किया गया तो कितना काला धन सफेद हुआ?
१४० में ४० रुपया सरकारी कर है.
(१) सीनेमा घरके मालिकके पास २०००० रुपये आये.
(२) किन्तु सरकारके हिसाबसे उसके पास १००००० आया.
(३) सरकार सीनेमाघरके मालिक की आवक ८००० मानेगी. उसके उपर ३० प्रतिशत आयकर लगायेगी. यह २४०० रुपये हुए. वास्तविक नफा १६०० था. और वास्तवमें उसको ४८० रुपया आयकर ही भरना था. तो भी उसने २४०० रुपया आयकर भरा. १९२० रुपया अधिक आयकर भरा.
(४) निर्माताने क्या किया? उसने ९२००० का ८ प्रतिशत यानी ७३६० नफा दिखाया, जो वास्तवमें १४७२ था. उसने ५८८८ रुपया ज्यादा दिखाया. मान लो की उसने सीनेमाघरके मालिकने जो १९२० ज्याद कर भरा था उसकी पूर्ती की या न की तो भी उसकी आयका नफा करीब ४००० रुपया हुआ. जो वास्तवमें ८०० रुपया था. ३२०० रुपया नफा ज्यादा दिखाया.
(५) यह तो एक शॉ की बात हुई और नफेकी ही बात हुई. खर्च तो इससे १२ गुना ज्यादा है. वह भी तो काले धनमेंसे खर्च किया था.
युपी और बिहार की जनताने टेक्ष फ्री किया. तो उनको भी हिस्सा मिला होगा जो दानके स्वरुपमें या उनके काले धनमें जायेगा.

यह काला धन सिर्फ काला ही नहीं है. वह लाल भी है. लाल धनसे मतलब है, असामाजीक तत्वोंकी कमाई, जो सुपारी, आउटओफ कॉर्ट प्रोपर्टी सेटलमेन्ट, ड्रग्झ, हवाला आदि सब है. नहेरुवीयन कोंग्रेसने पैदा की हुई दाउद गेंगका बडा नेटवर्क है.

ईन गद्दरोंसे दूर रहो.

शिरीष मोहनलाल दवे
टेग्झः वेद, उपनिषद, प्रमाण, गीता, प्रत्यक्ष प्रमाण, ज्ञातिप्रथा, भारत, हिन्दु धर्म, गहनता, मुस्लिम, इस्लाम, ख्रिस्ती, आक्रमण, अंग्रेज, माया-संस्कृति, नहेरुवीयन, निम्नकक्षा, धर्म परिवर्तन, भगवाकरण, मूर्धन्य, विधर्मी, मानव अधिकार, साक्षीभाव, कोमवाद, फिल्म, हाउसफुल, कालाधन, लालधन,

पी.के. ने पीके किया नशा? कथांक – १

कूर्म पुराण और महाभारतमें एक सुसंस्कृत श्लोक है.

(१) आत्मनः प्रतिकुलानी परेषां न समाचरेत.
इसका अर्थ है;

जो वस्तु, स्वयंके लिये (आप) प्रतिकुल (मानते) है, (उसको आप) दुसरोंके उपर मत (लागु) करो.
इसका अर्थ यह भी है, कि जो आचार आप स्वयंके हितमें नही मानते चाहे कोइ भी कारण हो, तो वह आचार आप अन्यको अपनाने के लिये नही कह सकते.
इसका निष्कर्सका गर्भित अर्थ भी है. यदि आपको अन्य या अन्योंको आचारके लिये कहेना है तो सर्व प्रथम आप स्वयं उसका पालन करो और योग्यता प्राप्त करो.

क्या पी.के. में यह योग्यता है?

पी.के.की योग्यता हम बादमें करेंगे.
सर्व प्रथम हम इस वार्तासे अवगत हो जाय कि, फिलममें क्या क्या उपदेश है. किस प्रकारसे उपदेश दिया है और सामाजिक परिस्थिति क्या है.

संस्कृतमें नीतिशतकमें एक बोध है.
(२) सत्यं ब्रुयात्, प्रियं ब्रुयात्, न ब्रुयात् सत्यं अप्रियं.
सच बोलना चाहिये, किन्तु सत्य ऐसे बोलना चाहिये वह प्रिय लगे. अप्रिय लगे ऐसे सत्य नहीं बोलना चाहिये.
यदि आप स्वयंको उपदेश देनेके लिये योग्य समझते है तो आपके पास उपदेश देनेकी कला होनी आवश्यक है. क्या यह कला पी.के. के पास थी?

पी. के. की ईश निंदा

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(३) पूर्व पक्षका ज्ञानः
यदि एक विषय, आपने चर्चाके लिये उपयुक्त समझा, तो स्वयंको ज्ञात होना चाहिये कि चर्चा में दो पक्ष होते है.
एक पूर्व पक्ष होता है. दुसरा प्रतिपक्ष होता है.
पूर्वपक्ष का अगर आप खंडन करना चाहते है और उसके विरोधमें आप अपना प्रतिपक्ष रखना चाहते है, तो आपको क्या करना चाहिये?
पूर्वपक्ष पहेलेसे चला आता है इसलिये उसको पूर्वपक्ष समझा जाता है. और उसके विरुद्ध आपको अपना पक्ष को रखना है. तो आपका यह स्वयंका पक्ष प्रतिपक्ष है.
अगर आप बौद्धिक चर्चा करना चाहते है तो आपको पूर्वपक्षका संपूर्ण ज्ञान होना चाहिये तभी आप तर्क युक्त चर्चा करनेके लिये योग्य माने जायेंगे. अगर आपमें यह योग्यता नहीं है तो आप असंस्कृत और दुराचारी माने जायेंगे.
असंस्कृति और दुराचार समाजके स्वास्थ्य के लिये त्याज्य है.

(४) चर्चा का ध्येय और चर्चा के विषय का चयनः
सामान्यतः चर्चाका ध्येय, समाजको स्वस्थ और स्वास्थ्यपूर्ण रखनेका होता है. किसको आप स्वस्थ समाज कहेंगें? जिस समाजमें संघर्ष, असंवाद और विसंवाद न हो तदुपरांत संवादमें ज्ञान वृद्धि और आनंद हो उसको स्वस्थ समाज माना जायेगा. यदि समाजमें संघर्ष, वितंडावाद, अज्ञान और आनंद न हो तो वह समाज स्वस्थ समाज माना नहीं जायेगा.
आनंदमें यदि असमानता है तो वह वैयक्तिक और जुथ में संघर्षको जन्म देती है. उसका निवारण ज्ञान प्राप्ति है.
ज्ञान प्राप्ति संवादसे होती है.
संवाद भाषासे होता है.
किन्तु यदि भाषा में संवादके बदले विसंवाद हो तो ज्ञान प्राप्ति नहीं होती है.
ज्ञान प्राप्तिमें संवाद होना आवश्यक है. संवाद विचारोंका आदान-प्रदान है. और आदान प्रदान एक कक्षा पर आने से हो सकता है. विचारोंके आदान प्रदान के लिये उसके नियम होने चाहिये. इन नियम को तर्क कहेते है. कोई भी संवाद तर्कयुक्त तभी हो सकता है जब पूर्वपक्षका ज्ञान हो.

पी. के. स्वयंमें क्या योग्यता है?
स्वयंमें विषयके चयन की योग्यता है?
स्वयंमें विषय की चर्चा करनेकी योग्यता है? स्वयं को स्वयंके पक्षका ज्ञान है?
स्वयंमें पूर्वपक्षका ज्ञान है?
स्वयंके विचारोंका प्रदान तर्कपूर्ण है?

पी. के. अन्यको जो बोध देना चाहता है उस बोधका वह क्या स्वयं पालन करता है?
अंधश्रद्धा निर्मूलन यदि किसीका ध्येय है तो प्रथम समझना आवश्यक है कि अंधश्रद्धा क्या है.
अंधश्रद्धा क्या है?
अंध श्रद्धा यह है कि, कोई एक प्रणाली, जो परापूर्वसे चली आती है या कोई प्रणाली अचारमें लायी गई हो और उस प्रणालीकी उपयोगिता सही न हो और तर्कशुद्ध न हो.
क्या प्रणालीयां और उसकी तर्कशुद्धता की अनिवार्यता सिर्फ धर्म को ही लागु करने की होती है?
क्या अंधश्रद्धा धर्मसे ही संबंधित है?
क्या अंधश्रद्धा समाजके अन्य क्षेत्रों पर लागु नहीं होती है?
अंधश्रद्धा हर क्षेत्रमें अत्र तत्र सर्वत्र होती है.
अंद्धश्रद्धा समाजके प्रत्येक क्षेत्रमें होती है.
अगर अंधश्रद्धा हरेक क्षेत्रमें होती है तो प्राथमिकता कहा होनी चाहिये?

जो प्रणालीयां समाजको अधिकतम क्षति पहोंचाती हो वहां पर उस प्राणालीयों पर हमारा लक्ष्य होना होना चाहिये. इसलिये चयन उनका होना चाहिये.

पी. के. ने कौनसी प्रणालीयों को पकडा?
पी. के. ने धार्मिक प्रणालीयोंको पकडा.
पी. के. ने धार्मिक प्रणालीयोंको क्यूं पकडा?
पी. के. समझता है कि वह सभी धर्मोंकी, धार्मिक प्रणालीयोंके विषयोंके बारेमें निष्णात है. हां जी, अगर उपदेशक निष्णात नहीं होगा तो वह योग्य कैसे माना जायेगा?

पी. के. समझता है कि वह भारतीय समाजमें रहेता है, इसलिये वह भारतमें प्रचलित धार्मिक, क्षतिपूर्ण और नुकशानकारक प्रणालीयोंकी अंद्धश्रद्धा (तर्कहीनता) पर आक्रमण करेगा.
अगर ऐसा है तो वह किस धर्मकी अंधश्रद्धाको प्राथमिकता देगा?
वही धर्म को प्राथमिकता देगा जिसने समाजको ज्यादा नुकशान किया है और करता है.

कौनसे कौनसे धर्म है? ख्रीस्ती, इस्लाम और हिन्दु.

हे पी. के. !! आपका कौनसा धर्म है?
मेरा धर्म इस्लाम है.
आपके धर्ममें कौनसी अंधश्रद्धा है जिसको आप सामाजिक बुराईयोंके संदर्भ, प्रमाणभानके आधार पर प्राथमिकता देंगे?
पी. के. समझता है कि मुस्लिमोंकी अंधश्रद्धा वह शराब बंधी है, और वह भी प्रार्थना स्थलपर शराब बंधी है.
अब देखो पी. के. क्या करता है? वह मस्जिदके अंदर तो शराब ले नहीं जाता है. इस्लामके अनुसार शराब पीना मना है. लेकिन उसकी सजा खुदा देगा. शराबसे नुकशान होता है. अपने कुटूंबीजनोंको भी नुकशान होता है. शराब पीनेवालेको तो आनंद मिलता है. लेकिन पीने वालेके आनंदसे जो धनकी कमी होती है उससे उसके कुटुंबीजनोंको पोषणयुक्त आहार नहीं मिलता और जिंदगीकी सुचारु सुवाधाओंमें कमी होती है या/और अभाव रहेता है. शराब कोई आवश्यक चिज नहीं है. शराबके सेवनके आनंदसे शराबको पीनेवालेको तो नुकशान होता ही है. शराब पीना इस्लाम धर्मने मना है. किन्तु क्या इस्लामकी प्राथमिकता शराबबंधी है?

इस्लाममें क्या कहा है? इस्लामने तो यह ही कहा है कि, इस्लामके उसुलोंका प्रचार करो और जिनको मुसलमान बनना है उन सबको मुसलमान बनाओ. जब तक अन्य धर्मी तुमको अपने घरमेंसे निकाल न दें उसका कत्ल मत करो. उसका अदब करो.
क्या मुसलमानोंने यह प्रणाली निभाई है?
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. इसका अर्थ यह है कि भारतमें सब लोगोंको अपना अपना धर्म और प्रणालीया मनानेकी स्वतंत्रता है. इस स्वतंत्रताका आनंद लेनेके साथ साथ दुसरोंको नुकशान न हो जाय इस बातका ध्यान रखना है.

इस बातको ध्यानमें रखते है तो मुसलमान अगर शराब पीये या न पीये उससे अन्य धर्मीयोंको नुकशान नहीं होता है. अगर कोई मस्जिदमें जाता है तो वह वहां ईश्वरकी इबादतके बदले वह शराबी नशेमें होनेके कारण दुसरोंको नुकशान कर सकता है. इसलिये पूर्वानुमानके आधार पर इस्लामने शराब बंदी की है. यह बात तार्किक है. किन्तु यदि इसमें किसीको अंधश्रद्धा दिखाई देती है यह बात ही एक जूठ है.

तो पी. के. ने ऐसे जूठको क्यों प्राथमिकता दी?
प्राथमिकता क्या होनी चाहिये थी?
यदि अंधश्रद्धाको भारत तक ही सीमित रखना है तो, मुसलमानोंने किये दंगे और कत्लोंको प्राथमिकता देनी चाहिये थी. आतंकीयों और स्थानिक मुसलमानोंने मिलकर हिन्दुओंकी धर्मके नाम पर कत्लें की, हिन्दुओंको यातनाएं दी और दे भी रहे है वह भी तो अंधश्रद्धा है.

मुस्लिमोंकी अंधश्रद्धा क्या है?
इस्लामको अपनानेसे ही ईश्वर आपपर खुश होता है. अगर आपने इस्लाम कबुल किया तो ही वह आपकी प्रार्थना कबुल करेगा और आपके उपर कृपा करेगा.
ईश्वर निराकार है इस लिये उसकी कोई भी आकारमें प्रतिकृति बनाना ईश्वरका अपमान है. अगर कोई ईश्वरकी प्रतिकृति बनाके उसकी पूजा करगा तो उसके लिये ईश्वरने नर्ककी सजा निश्चित की है.
इस बातको छोड दो.

अन्य धर्मीयों की कत्ल करना तो अंधश्र्द्धा ही है.

१९९०में कश्मिरमें ३०००+ हिन्दुओंकी मुसलमानोंने कत्ल की. मुसलमानोंने अखबारोंमें इश्तिहार देके, दिवारों पर पोस्टरें चिपकाके, लाउड स्पीकरकी गाडीयां दौडाके, और मस्जीदोंसे घोषणाए की कि, अगर कश्मिरमें रहेना है तो इस्लाम कबुल करो, या तो इस मुल्कको छोड कर भाग जाओ, नहीं तो कत्लके लिये तयार रहो. इस एलान के बाद मुसलमानोंने ३००० से भी ज्यादा हिन्दुओंकी चून चून कर हत्या की. पांचसे सात लाख हिन्दुओंको अपना घर छोडने पर विवश किया. इस प्रकर मुसलमानोंने हिन्दुओंको अपने प्रदेशसे खदेड दिया.
आज तक कोई मुसलमानने हिन्दुओंको न्याय देनेकी परवाह नहीं की. इसकी वजह सिर्फ और सिर्फ मुसलमानोंकी अंधश्रद्धा ही तो है. लाखोंकी संख्यामें अन्यधमीयोंको २५ सालों तक यातनाग्रस्त स्थितिमें चालु रखना आतंकवाद ही तो है. यह तो सतत चालु रहेनेवाला आतंकवाद है. इससे बडी अंधश्रद्धा क्या हो सकती है?

किन्तु पी. के. ने इस आतंकवादको छूआ तक नहीं. क्यों छूआ तक नहीं?
क्यों कि वह स्वयंके धर्मीयोंसे भयभित है. जो भयभित है वह ज्यादा ही अंधश्रद्धायुक्त होता है. पी. के. खुद डरता है. उसके पास इतनी विद्वत्ता और निडरता नहीं है कि वह सच बोल सके.
कश्मिरके हिन्दुओंको लगातार दी जाने वाली यातनाओंको अनदेखी करना विश्वकी सबसे बडी ठगाई और दंभ है. इस बातको नकारना आतंकवादको मदद करना ही है. उसकी सजा सिर्फ और सिर्फ मौत ही हो सकती है.

तो फिर पी. के. ने किसको निशाना बनाया?

पी. के. ने बुत परस्तीको निशाना बनाया.
लेकिन क्या उसने पूर्व पक्ष को रक्खा? नहीं. उसने पूर्वपक्षको जनताके सामने रक्खा तक नहीं.
क्यों?
क्यों कि, वह अज्ञानी है. अद्वैतवादको समझना उसके दिमागके बाहरका विषय है. अद्वैतवाद क्या है? अद्वैतवाद यह है कि ईश्वर, सर्वज्ञ, सर्वयापी और सर्वस्व है. विश्वमें जो कुछ भी स्थावर जंगम और अदृष्ट है वे सब ईश्वरमें ही है. उसने ब्रह्माण्डको बनाया और आकर्षणका नियम बनाया फिर उसी नियमसे उसको चलाने लगा. उसने मनुष्यको बुद्धि दी और विचार करने की क्षमता दी ताकि वह तर्क कर सके. अगर वह तर्क करेगा तो वह तरक्की करेगा. नहीं तो ज्योंका त्यों रहेगा, या उसका पतन भी होगा और नष्ट भी होगा. ईश्वरने तो कर्मफलका प्रावधान किया और समाजको सामाजिक नियमो बनानेकी प्रेरणा भी रक्खी. जो समाज समझदार था वह प्रणालियोंमें उपयुक्त परिवर्तन करते गया और शाश्वतता की और चलता गया.
हिन्दु समाज क्या कहेता है?
सत्यं, शिवं और सुंदरं
सत्य है उसको सुंदरतासे प्रस्तूत करो तो वह कल्याणकारी बनेगा.
कल्याणकारीसे आनंद मिलता है वह स्थायी है.
आनंद स्थायी तब होता है जब भावना वैश्विक हो. न तो अपने स्वयं तक, न तो अपने कुटुंब तक, न तो अपने समाज तक, न तो अपनी जाति तक, मर्यादित हो, पर वह आनंद विश्व तक विस्तरित हो.
विश्वमेंसे जो कुछ भी तुम्हे मिलता है उसमेंसे विश्वको भी दो (स्वाहा).
यज्ञकी भावना यह है.
शिव तो तत् सत् है. ब्रह्माण्ड स्वरुप अग्निको उन्होने उत्पन्न किया. जो दृश्यमान अग्नि है वह यज्ञ है. अग्नि यज्ञ स्वरुप है. अग्निने आपको जिवन दिया. आप अग्निको भी तुष्ट करें और शांत भी करें. हिन्दुओंके लिये ईश्वरी शक्तियां अपने जिवन प्रणालीका एक भाग है. शिव लिंग एक ज्योति है. उसको जो स्वाहा करेंगे वह धरतीके अन्य जीवोंको मिलेगा. जीनेका और उपभोग करनेका उनका भी हक्क है.
तुम्हे ये सब अपनी शक्तिके अनुसार करना है. तुम अगर शक्तिमान नहीं हो तो मनमें ऐसी भावना रखो. ईश्वर तुम्हारी भावनाओंको पहेचानता है. संदर्भः “शिवमानसपूजा”

यदी पी. के. ने “अद्वैत” पढा होता तो वह शिव को मजाकके रुपमें प्रस्तूत न करता.

मनुष्य एक ऐसी जाति है कि इस जातिमें हरेक के भीन्न भीन्न स्वभाव होते है. यह स्वाभाव आनुवंशी, ज्ञान, विचार और कर्मके आधार पर होते है. इसलिये उनके आनंद पानेके मार्ग भी भीन्न भीन्न होते है. ध्यान योग, ज्ञान योग, कर्मयोग और भक्तियोग इस प्रकार चार योग माने गये है. अपने शरीरस्थ रासायणोंके अनुसार आप अपना मार्ग पसंद करें. हिन्दुओंके लिये ईश्वरकी उपासना एक प्रकृति उपासनाका काव्य है. काव्य एक कला है जिनके द्वारा तत्त्वज्ञान विस्मृतिमें नही चला जाता है. मूर्त्ति भी ईश्वरका काव्य है.

तो क्या पी. के.ने विषयके चयनमें सही प्राथमिकता रक्खी है?
नहीं. पी. के. को प्राथमिकताका चयन करने की या तो क्षमता ही नहीं थी या तो उसका ध्येय ही अंधश्रद्धाका निर्मूलन करना नहीं था. उसका ध्येय कुछ भीन्न ही था.

प्राथमिकता की प्रज्ञाः
अगर आपके घरमें चार चूहे और एक भेडिया घुस गये है तो किसको निकालनेकी प्राथमिकता आप देंगे?
चूहे चार है. भेडिया एक है. चार संख्या, संख्या एकसे ज्यादा है. तो भी जो ज्यादा नुकशानकारक है वह भेडिया है. इसलिये यहां पर प्रमाणभान स्वरुप संख्या नहीं है. किन्तु नुकशानका प्रमाणभान रखना है.
एक अरब हिन्दु है. २० करोड मुस्लिम है. लेकिन दंगे मुस्लिमोंने ज्यादा किया. अत्याचार भी मुस्लिमोंने ज्यादा किया. इसलिये समाजको होने वाले नुकशानके प्रमाणभानके अधारपर मुस्लिम अंधश्रद्धाको हिन्दुओंकी तथा कथित अंधश्रद्धाके विषयोंकी अपेक्षा ज्यादा प्राथमिकता देनी चाहिये.
किन्तु पी. के. ने ऐसा नहीं किया.

प्रमाणभानकी प्रज्ञाः
शिवलिंग पर दूध चढाना दूधका व्यय है. वह दूध गरीबोंके बच्चोंके मूंहमें जाना चाहिये.

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दूधका व्यय है या नहीं? अगर व्यय है तो भी कितना व्यह है? किसका व्यय है? किसका पैसा है? किसकी कमाई है? क्या ईश्वरके उपर दूध चढाना अनिवार्य बनाया गया है? ऐसा कोई आदेश भी है?
दूधके पैसे तो पी. के.के या औरोंके है ही नहीं. दूधके पैसे तो दूध डालनेवालेके अधिकृत पैसे है. उसको कोई “लेन्ड ओफ लॉ” या और किसीकी सत्तका भी आदेश नहीं है, कि वह दूध डाले. किसी “लॉ ऑफ ध लेन्ड”ने उसे विवश भी नहीं किया है, कि वह दूध डाले. अगर वह दूध न डाले को उसको कोई दंड देनेवाला भी नहीं है. दूधका प्रमाण भी निश्चित नहीं है. वह अपनी ईच्छाके अनुसार दूध डाल सकता है या न भी डाले. वह अपनी मान्यताके अनुसार समझता है कि उसने कोई व्यय नहीं किया. क्यों कि विश्वने उसको दिया है वह उसमेंसे थोडा विश्वको वापस देता है. जो गाय है उससे वह आभारवश है और उसको भी वह सब देवोंका निवास समझता है और वह गायके प्रति आभारवश है (थेन्क फुल है. थेंकलेस नहीं है) वह गायको माता समझता है.
वह यह समझता है कि दूध चढाना कोई पाप नहीं है. खुदके पैसे है. अपने पैसे का कैसे उपयोग करना वह उसकी पसंद है. खुदकी पसंदका निर्णयकरना उसका अधिकार है.

आप कहोगे, वह जो कुछ भी हो, दूधका तो व्यय हुआ ही न? उसका क्या?
वह हिन्दु कहेता है; अगर आप गायको, भैंषको खाते है तो क्या आनेवाले दूधका घाटा नहीं हुआ?
वह आगे कहता है कि हम तो दूधसे अपनी भावना ईश्वरके प्रति प्रकट करते है. और इससे धरतीके जिवजंतुओंकी पुष्टि करते हैं ताकि धरतीकी फलद्रुपता बढे. हम गायका या ऐसे पशुका बली तो नहीं चढाते है ताकि विश्वमें दूधका स्थायी घाटा हो जाय.

वह आगे कहेता है, कि हमारा पावभर दूध ही क्यों आपकी नजरमें आता है?
हम जो टेक्ष भरते है, उनमेंसे एक बडा हिस्सा गवर्नर और राष्ट्रप्रमुखके और उसकी सुविधाओंके और मकानके रखरखावमें जाता है. टेक्ष द्वारा पैसा देना तो हमारे लिये अनिवार्य है और उसके लिये हम विवश भी है. हमारे पैसे का यह व्यय ही तो है. इसका प्रमाण भी तो बहुत बडा है. यह भी तो एक अंधश्रद्धा मात्र है. आपकी प्राथमिकता तो इस व्यय के विषय पर होनी चाहिये. क्यों आपकी प्रमाणभानकी प्रज्ञा इस बातको नहीं देख सकती?

आप खुद करोडों रुपये कमाते हो. आपको खानेके लिये कितना चाहिये? आपको कितना बडा मकान चाहिये? आप दाल चावल रोटी खाके आनंद पूर्वक जिन्दा रह सकते है, और बाकीके पैसोंसे हजारों कीलो दूध गरीबोंको बांट सकते है. लेकिन आप ऐसा नहीं करते है, क्यों कि दूसरे आप जैसे कई लोग ऐसा नहीं करते हैं. आप उन्हीकी प्रणालीको अनुसरते है. तो यह आपकी भी तो अंधश्रद्धा है. आपकी अंधश्रद्धा तो हमसे भी बडी है. आपकी प्राथमिकतामें वह क्यों नही आयी? अगर आप स्वयंकी कमाईको कैसे खर्च करें उसमें अपनी मुनसफ्फी चलाते हैं तो हमारे लिये क्यों अलग मापदंड?
ऐसी तो कई बातें लिखी जा सकती है.
(क्रमशः)
शिरीष मोहनलाल दवे
टेग्झः पी. के. , योग्यता, नीति शतक, सत्य, प्रिय, उपदेश, पूर्वपक्ष, प्रतिपक्ष, खंडन, बौद्धिक चर्चा, तर्क, शुद्ध, संस्कृति, संस्कृत, दुराचारी, शराब बंधी, विषय चयन, प्राथमिकता, संवाद, विसंवाद, वितंडावाद, ध्येय, हेतु, संघर्ष, ज्ञान, अंधश्रद्धा, प्रणाली, आतंक, धर्म, मुस्लिम, इस्लाम, ख्रिस्ती, धर्म निरपेक्ष, मस्जिद, धर्मस्थान, धर्मगुरु, दंगा, कत्ल, ईश्वर निराकार, प्रतिकृति, काव्य, कश्मिर, ओमर, फारुख, अद्वैतवाद, कर्मफल, सत्यं, शिवं, सुंदरं, कल्याणकारी, वैश्विक, प्रमाणभान, प्रज्ञा, लॉ ऑफ ध लेन्ड

Do not fall in the trap of Nehruvian Congress. क्या आप भारतके होतैषी है? और फिर भी क्या आप इनमेंसे कोई एक  वर्गमें भी आते हैं? ()

() ये लोग बीजेपी या/और नरेन्द्रके विरोधी हो सकते है,

Modi is the big threat to Nehruvian Congress

             Terrorists Bomb Blasts in Patana” By UPA !

भारतमें ज्ञातिवाद अभी नामशेष नहीं हुआ. प्रांतवाद भाषावाद भी चलता है. याद करो, जिस नहेरुवीयन कोंग्रेसने जयप्रकाश नारायणके आंदोलनको समर्थन देनेके कारण ममताको भी कारावास दिया था, उसी कोंग्रेसके आपातकालके दिलोजान समर्थक रहे प्रणव मुखर्जी जो ममताके प्रथम दुश्मन होने चाहिये, तो भी केवल और केवल बंगाली होने के कारण, ममताने थोडे नखरे करनेके बाद, उनको ही भारतके राष्ट्रप्रमुख पदके लिये समर्थन दिया. उसी प्रकार शिवसेनाने प्रतिभा पाटिलको समर्थन दिया.

दुसरा कारण यह भी है कि स्वकीय सत्तालाभके लिये कुछ नेता अपने ही पक्षके नेता के विरुद्धमें काम करते है. इसमें इन्दीरा गांधीने संजीव रेड्डीके विरुद्ध प्रचार किया, चरण सिंगने अपने ही पक्षके नेता मोरारजी देसाईकी सरकारका पतन किया , यशवंत राव चवाणने १९७७ की नहेरुवीयन सरकारके पराजयके बाद अपनी अलग पार्टी बनाली, शरद पवारने सत्ताके लिये नहेरुवीयन वंशके पक्षको छोडा, पकडा, छोडा, पकडा, छोडा जो क्रिया आज भी चालु है, बाला ठाकरेको नरेन्द्र मोदी का कद बढते हुए डर लगता था और ऐसे निवेदन देते रहेते थे कि बीजेपीकी शक्तिमें घाटा हो. चंद्रबाबु नायडुने अपने श्वसुर एन टी रामारावकी सरकारसे नाता छोडा था, शंकर सिंह वाघेलाने  केशुभाई पटेलकी सरकारका पतन किया था, केशुभाई खुद, नरेन्द्र मोदीका पक्ष चूनाव में हार जाय ऐसे भरपुर प्रयत्न करते रहते है, अडवाणी खुद ने अपने पक्षके जनमान्य नेता नरेन्द्र मोदीको नीचा दिखानेके लिये भरपुर प्रयत्नशील है.

सत्ताके लिये साधनशुद्धिका अभाव. मैं चाहे खतम हो जाउं लेकिन तुम्हे सत्तासे हटाउं;

जिन्होंने सत्ताके लिये साधनशुद्धि नहीं रक्खी है उनसे सावधान रहो. ये लोग बिना ही कोई योग्य विकल्प दिये ही बीजेपीको कमजोर कर सकते है. उनसे सावधान.

और कौन है जिनसे सावधान रहेना है?

 () ये लोग देश द्रोही हो सकते है, जो सिर्फ धारणाओंके आधारपर सरकारको दोष देते हैं;

Double standard alias perverted eyes of media

जिनको भारतकी धरोहर पर गर्व नहीं है और जो लोग, मनोमन, भारतका विकास नहीं चाहते है उनको आप क्या कहोगे? इन लोगोंको यह बात ज्ञात नहीं है कि, एक स्थिर सरकार को केवल नकारात्मक धारणाएं उत्पन्न करके, सरकार और उसके नेताओंके विरुद्धमें हवा फैलाना, कोई देशहितका काम तो है नहीं. एक सरकार को पांच वर्षके लिये नियुक्त की है तो उसको पांच साल पुरा करने दो. उसके पश्चात पूर्व सरकारने जो किया था, उसके साथ इस सरकारकी तुलनात्मक समीक्षा करो. आपको यह अवगत होना आवश्यक है कि, यदि आपने बीजेपीको मत नहीं दिया है तो भी वह पूर्णबहुमतसे भारतीय बंधारणके अनुसार विजयी हुई है. अब आपको उसका सन्मान करना है. धारणाओंके आधारपर उसको दोषी नही मान सकते. बीजेपीकी और खास करके नरेन्द्र मोदीकी कार्यशैली को नीचा दिखानेके लिये आपके पास ऐसा कोई आधार नहीं है कि आप उसको दोषी है ऐसा प्रचार करते रहो.

किन्तु ऐसा देखा जाता है कि जिनको बीजेपी और नरेन्द्र मोदी पसंद नहीं था उनमेंसे अधिकतर लोग नरेन्द्र मोदी और बीजेपीके सुक्ष्मातिसुक्ष्म बातोंको या/और जो चर्चाबिन्दु, वर्तमानमें अस्पष्ट है, संवादके आधिन है, कार्यवाही चल रही है, उसमें विसंवाद करके, उसको उछालते है और व्यर्थ ही नकारात्मक हवा फैलाते है. क्यों कि वे चाहते है कि यह सरकारका पतन हो जाय.

क्या होगा? इनको चिंता नहीं है

अगर इस सरकारका पतन होगा तो देशकी क्या दशा होगी इस बातकी इनको चिंता नहीं है.  १९८९ में चन्द्रशेखरने वीपी सिंगकी सरकार गीरायी. १९८९में क्या हुआ था? शेख अब्दुल्ला भाग गया. कश्मिरमें ३०००+ लोगोंका कत्लेआम हुआ और पांच लाख से उपर हिन्दुओंको सरेआम अपना घर छोडने पर विवश किया. आज तक वे लोग तंबुओंमें रहते हैं. यह एक ऐसा आतंक है जो लगातार २५ सालोंसे चल रहा है. १९९६ से १९९८ तक सरकारोंको गिरानेकी परंपरा चालु रही.

क्या ये आतंकी लोग और आतंकीयोंके इरादोंके पोषक और हिन्दुओंके प्राकृतिक अधिकारकी अवहेलना करनेवाले ये नहेरुवीयन और उनके साथीगण और वे लोग जो इस विषय पर मौन और निष्क्रिय रहे उन लोगोंको आप देश द्रोही नहीं कहोगे तो क्या कहोगे?

कश्मिरसे निष्कासित हिन्दुओंको अपने घरमें २५ सालके बाद भी सुस्थापित न करना, इस परिश्तितिको आप क्या कहोगे? यह उनके उपर सतत हो रहा आतंकवाद ही तो है.

नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके साथी लोग जिनमें फरुख आदि कश्मिरके मुस्लिम नेतागण आते है उन्होने सातत्यतासे कश्मिरी हिन्दुओंके मानवाधिकारका हनन किया. इनको अगर आप आतंकवादी नहीं कहोगे तो क्या कहोगे?

इस विषय पर मौन रहेने वाले या तो वितंडावाद करने वाले समाचार माध्यमोंके वक्ताओंसे भी सावधान. क्यों कि ये लोग भी मौन रहे हैं. ऐसे लोगोंके द्वारा किये गये निवेदनोंसे और मंतव्योंसे सावधान. उनके उपर तनिक भी विश्वास मत करो.

दुसरे कौन लोग है?

() ये लोग जोजैसे थेवादी है,

भारतकी आर्थिक प्रगति असंतोषजनक होनेका क्या कारण है? उसका मुख्य कारण भारतीय नेतागण है. मात्राके आधार पर नहेरुवीयन कोंग्रेस है. नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागणसे जुडे हुए अन्य नेतागण और कर्मचारीगण की राक्षसीय वृत्तियां कारणभूत है.

राक्षसी वृत्तिसे अर्थ है अन्यको नुकशान करके खुदका लाभ देखना. इसको अनीतिमत्ता भी कहेते हैं.

अगर ठेकेदार सही काम करेगा तो उसका लाभ कम होगा या तो नुकशान भी हो सकता है. इसलिये वह निम्नकक्षाका काम करता है और सरकारी कर्मचारी/अधिकारीको भ्रष्ट करता है. सरकारी कर्मचारी/अधिकारी भ्रष्ट होनेको उत्सुक है. और इसकी कोई सीमा नहीं है. जहां १००० रुपया खर्च होता है वहां पर कम आयु वाला १००५०० रुपयेका काम होता है. अगर नियमका शासन (रुल ऑफ लॉ) आजाय तो इनके ये लाभ नष्ट हो जायेंगे. इस लिये ये लोगजैसे थे”-वादी बनते है. जो भ्रष्ट है वे सत्ताके पदोंको दयादानका विषय मानते है. इसलिये अपनेवालोंको सत्ताके पदों पर नियुक्त करते है और भ्रष्टाचार बढाते है. इन्दिरा गांधीके समयसे भीन्न भीन्न पदोंकी भीन्न भीन्न मूल्य रक्खा था. यह बात युपीए के शासनमें भी चालु ही थी. इन लोगोंसे सावधान.

और कौन लोग है जिनसे सावधान रहेना है?

() ये लोग नकात्मक मानसिकता वाले हो सकते है,

ये लोग ऐसे है जो या तो नीतिसे भ्रष्ट है या तो निराशावादी है. चाणक्यने कहा है, जो निराशावादी है उनकी बातों पर विश्वास करो. निराशावाद एक रोग है. इस रोगके सांनिध्यमें रहेने वालोंको भी यह रोग ग्रस लेता है. निराशात्मक वातवरण विकासके लिये हानिकारक है. ये लोग नकारात्मक बोलते ही रहेते है कि, नरेन्द्र मोदी कुछ नहीं करता है, उसने यह नहीं किया, उसने वह नहीं किया, देखो टमाटरके भाव बढ गये. देखो सोनेके भाव स्थिर हुए तो जिन किसानोंने अपनी फसलके पैसोंसे सोना खरीदा था उनको इतने अरबका घाटा हुआ. यह सरकार किसानोंको पायमाल करने पर तुली है.

और कौन लोग है जिनसे सावधान रहेना है?

() ये लोग मूर्ख और मूढ हो सकते है,

मूर्ख वे लोग है जो व्यूहरचना समझ नहीं सकते और व्युह रचना बना भी नहीं सकते. उनके पास इतनी माहिति, ज्ञान और अनुभव नहीं होता है कि वे शत्रुओंकी ही नहीं किन्तु खुद अपने नेताकी व्युह रचना समझ शके. तद्यपि ये मूर्ख लोग इस बातका इन्कार करते है और अपनी खूदकी व्यूह रचना बनाते है और अमलमें भी प्रयोजित करते है. इससे वे अपने आप कष्टमें पडे उस शक्यताको तो छोड दो, लेकिन अपने पक्षको भी नुकशान पहोंचता है.

उदाहरणः

धोती धारण करने पर स्टारमें लाभः चरण सिंहने फरमान किया था कि जो धोती पहेनेगा उसको स्टार होटलमें २०% का डीसकाउन्ट मिलेगा.

गौवध पर प्रतिबंधः कोई भारतीय गौमांस नहीं खाता. यह एक सांस्कृतिक प्रणाली है. क्योंकि हम गाय का दूध पीते है, इसलिये वह हमारी माता समान है. इसके अलावा पर्यावरण और धरतीकी फळद्रुपताके लिये गौसृष्टिका हनन करना योग्य नहीं है. लेकिन अंग्रेज सरकारने ऐसे कतलखाने चलवाये थे. नहेरुवीयन कोंग्रेसने उनको चालु रक्खा उतना ही नहीं लेकिन उसमें वृद्धि भी की. देश ऐसी स्थिति पर पहोंचा है कि अगर ये कारखानोंको शिघ्रतासे समाप्त कर दें तो कई और प्रश्न उत्पन्न होते हैं. समस्या के निवारण के लिये कुछ समय की अवधि भी होती है. कुछ व्यूह रचना भी बनानी पडती है. व्यूहरचनाओंको गोपनीय भी रखनी पडती है.

अब तक जनताने क्या किया था?

जनताने यानी कि, आपने इस गौहत्या करने वाले राक्षसको मारने के लिये एक वृकोदरको चूना था. इस वृकोदरने कई दशकोंका समय व्यय किया. उसने राक्षसको मारने के बदले अनेक और राक्षस उत्पन्न किये.

अब आपने एक शेरको चूना है. अगर यह राक्षस मरेगा तो इस शेरसे ही मरेगा. अतः उसको पर्याप्त समय दो. आप धैर्य रक्खो. यदि आप शासक को पर्याप्त समय नहीं देते हैं, और यदि आप इस विषय पर धैर्यहीन बन जाते हैं तो समझ लो कि आप वृकोदरको ही मदद करते हैं.

विदेशी बेंकोंमे जमा काले धनकी वापसीः यह एक आंतर्राष्ट्रीय नियमोंसे युक्त समस्या है इस बातको अगर छोड भी दे सकते हैं. किन्तु नहेरुवीयन कोंग्रेसने इस समस्याको अपने फायदेके लिये ऐसे दस्तावेज बनाये हैं कि उन कुकर्मोकों सही मात्रामें अवगत करना है, यह एक ऐसे अन्वेषणका विषय है कि उसके उपर सावधानीसे गोपनीय रीतसे व्युह रचना बनानी पडती है. विशेष निरीक्षण अन्वेषण जुथ तो बनाया गया है ही. इसके नेता सर्वोच्च न्यायालयके एक न्यायाधीश है. ये लोग अपना काम कर रहे है. समस्या कमसे कम ३५/४० साल पुरानी है. अतः उसको पर्याप्त समय दो. आप धैर्य रक्खो.

() ये लोग नहेरुवंशके चाहक या/और उनकी विचार/आचार धाराके चाहक हो सकते है,

कुछ लोग ऐसा समझते है कि वे लोग, ईश्वरकी क्षतिसे भारतमें जन्मे हैं. वे ऐसा समझते हैं कि पाश्चात्य विचारधाराके प्रति आचार विचार रखना और भारतीय धरोहरकी निंदा करना ही प्रगतिशीलता है. भारतका जो कुछ भी है वह निम्न कक्षाका है. भारतकी प्रणालीया, तत्वज्ञान भाषा आदि सब निम्न है.

शौक भी कोई चिज है”. नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनके साथीयोंकी क्षतियोंका ये लोग सामान्यीकरण करके उसको निरस और शुष्क कर देते है. लेकिन ये ही लोग नरेन्द्र मोदीकी छोटी छोटी असांदर्भिक बातों पर मजाक करते है. जैसे कि प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को ये लोग परिधान मंत्री नरेन्द्र मोदी. क्या जवाहर लाल नहेरु और उनकी संतान नंगा घुमती थीं?

(१०) ये लोग महात्मा गांधीके विरोधी, या/और उनकी विचारधारा के विरोधी हो सकते है,

ये लोग मुढ की कक्षामें आते है. उनको ज्ञात नहीं है कि वे क्या कर रहे है? उनको ज्ञात नहीं कि, उनके मन्तव्योंसे जनताको क्या संदेश जाता है? उनको यह अवगत नहीं कि, देशकी और विदेशकी जनता उनके बारेमें क्या सोचेगी? जिनका ये लोग विरोध करते है उनकी विश्वमें क्या कक्षा है? उनको यह मालुम नहीं कि, जिनकी तटस्थता विश्व मान्य है उनका प्रतिभाव, बीजेपी के बारेमें कैसा सकता है?

उनको यह अवगत होना चाहिये कि, महात्मा गांधी एक विचार भी है. व्यक्तिसे ज्यादा एक विचारधारा है. गांधीजीकी विचारधारा एक विस्वस्त विचारधारा है. गांधीने अपनी क्षतियां खुद बताई थी. वे क्षतियां महात्मा गांधीने तो छोड ही दी थी. और उसने कभी उसका पुनरावर्तन किया नहीं. तो भी कुछ लोग उसी क्षतियोंको आधार बनाके गांधीकी निंदा करते है.

गांधीके कर्मके सिद्धांत विश्व मान्य है और विश्वने गांधीजीके आचारमें विश्वसनीयता पायी है. जिन्होने गांधीको पढा है उन्होने गांधीको कलंक रहित समझा है. अगर आपने गांधी के बारेमें पढा नहीं है तो आपमें गांधीके बारेमें चर्चा करनेकी योग्यता ही नहीं है. फिर भी अगर आप, अपनी अल्पज्ञतासे गांधी की निंदा करते हैं तो विश्वमें आप ही नहीं आपका पक्ष भी अविश्वसनीय बनता है. और आपका दुश्मन पक्ष इसका भरपुर लाभ उठा सकता है. अगर आप मुढ नहीं है तो आप गांधीके विषय पर मौन रहोगे. क्यों कि जिस विषय की चर्चा आपके पक्षके लिये हानिकारक है उसमें अगर आप मौन रहे तो आपका यह लक्षण एक सन्मित्रका लक्षण बनेगा. ऐसा भर्तृहरिने कहा है.  

(११) ये लोग गोडसेके चाहक या/और उसकी आचार धाराके चाहक हो सकते है.

गोडसे एक सामान्य व्यक्ति था. सामान्य व्यक्ति भी देश प्रेमी हो सकता है. अज्ञान और परिस्थितिसे अवगत होनेकी अक्षमता और असंवाद की मानसिकता के कारणसे यदि एक देशप्रेमी, दुसरी एक व्यक्ति, जो निःशस्त्र, सत्ताहीन और निर्दोष, मानवता वादी, करुणापूर्ण और युगपुरुष मानी जाती है उस व्यक्तिका खून करता है तो यह पाप ही तो है.

ऐसे पापीकर्मको आप पूण्य कर्म सिध्ध करना चाहते हैं तो विश्वमें कोई भी आपकी बात मान्य नहीं रखेगा. आप अपात्रको, महान सिद्ध करते रहोगे तो विश्वमें आपका पक्ष ही बदनाम और अविश्वसनीय होगा. भारत एक बडा देश है. और अगर कहीं चूनाव प्रक्रिया चल रही है तो आप, बीजेपी के मतोंको हानि पहोंचा सकते हो. क्यों कि आपका दुश्मन पक्ष, आपके इस आचारका भरपुर लाभ लेता है और आगेचलकर भी लेगा. इस बातको समझनेमें यदि आप अक्षम है तो यह बात आपके मुढत्वको सिद्ध करती है.

(१२) ये लोग अहिंसा उचित है और हिंसा कहां उचित है और कहां उचित नहीं है इसको अवगत करनेकी वैचारिक शक्ति नहीं रखते है,

GANDHI SARDAR AND NEHRU

अहिंसा एक सापेक्ष आचार है.

दुर्योधन के साथ युद्धका निर्णय श्री कृष्णने तभी लिया जब दुर्योधनने कहा कि मैं धर्म जानता हूं और अधर्म भी जानता हूं. परंतु, धर्ममें मैं प्रवृत नहीं हूंगा और अधर्मसे मैं निवृत नहीं हूंगा.

शेर अगर सामने गया तो आप क्या करोगे? या तो खुद भाग जाओ या तो उसको भगा दो. जहां संवादकी कोई शक्यता ही नहीं है वहां कमसे कम हिंसा, अहिंसा बनती है. अहिंसा और सुरक्षाके अधिकार विश्वमान्य है. उसमें विसंवाद उत्पन्न करना खुदकी असंस्कृत विचारधारा और अज्ञानताका प्रदर्शन है.

पाकिस्तानने जब कश्मिर पर आक्रमण किया और जब कश्मिरके राजाने भारतकी मदद मांगी तो नहेरु और सरदार, गांधीजी की सलाह लेनेके लिये उनके पास गये थे. गांधीने कश्मिरके राज्यकी सुरक्षाके लिये भारतीय लश्करको भेजना यह अपना धर्म बताया था. गांधीजीने ऐसा नहीं कहा था किजाओ जाके सत्याग्रह करो”. क्यों कि आक्रमणकारी संवाद और अहिंसाको मान्य नही करते. वे केवल और केवल हिंसासे ही कश्मिर पर अधिकार प्राप्त करना चाहते थे. ऐसे लोगोंको हिंसाकी भाषामें उत्तर देना ही योग्य था.

(१३) ये लोग या तो अपने धर्मके विषयमें अंध है, परधर्मके बारेमें या/और परधर्मीयोंके विषयमें सतत धिक्कारकी मानसिकता या/और आचार रखते है,

धर्ममें यदि मानवधर्म नहीं मिला हो तो वह धर्म ही नहीं होता है. ऐसा धर्म, एक समूह (मॉब) मात्र होता है. ऐसे धर्मके कोईएक नेताने जो कुछ भी लिखा हो उसको परम सत्य मानके चलनेवालोंका एक पशु समूह ही बन जाता है. और उस समुहका व्यवहार भी हिंसक पशु जैसा ही होता है.

अपने धार्मिक पुस्तकका हेतु क्या था? वह कब, कहां कैसी स्थितिमें लिखा गया, और क्यों लिखा गया उसके उपर निरंतर चिंतन विचार करने के स्थान पर, ये लोग क्या करते हैं? ये लोग, युगोंके पश्चात भी, उसी लिखावट के अनुसार ही अनुसरण करना चाहते है. वे तो यह भी मानते है कि सारी दुनियाके लोगोंको हमारा धर्म ही स्विकारना करना चाहिये.  ऐसी मानसिकता वाले धर्मान्ध होते है. ऐसे लोग जो प्रत्यक्ष दिखाई देता है उसकी अनदेखी करके जो नहीं दिखाई देता है, और जो तर्कसे कोषों दूर है उस परलोकको पानेके लिये परधर्मको माननेवालोंको यातना देते हैं और कत्ल करते है. इन लोगोंसे सावधान.

(१४) ये लोग स्वयंको धर्मनिरपेक्षके रुपमें प्रस्तूत करते हैं, किंतु उनके रोम रोममें, नरेन्द्र मोदी या/और बीजेपी या/और सनातन धर्म या/और भारतीय प्राचीन धरोहर के प्रति अस्विकृतिकी मानसिकता या/और घृणा है,

प्रोनहेरुवीयन पक्षके लोग नरेन्द्र मोदी और बीजेपी को कोमवादी कहेते है. क्यों कि नरेन्द्र मोदी आरएसएस का सदस्य है.

आर एसएस की गलती क्या है?

वैसे तो कुछ भी गलती नहीं है. किन्तु नथुराम गोडसे नामके एक आदमीने गांधीजीका खून किया था. नथुराम गोडसे आरएसएसका सदस्य था इसलिये आरएसएसका हर सभ्य खूनी है. आरएसएसने कभी अपनी कारोबारी में या किसीभी हालतमें गांधीजीको मारनेका प्रस्ताव पास नहीं किया था. तो भी ये दंभी धर्मनिरपेक्ष लोग कि, आरएसएस और उसके कारण बीजेपी भी कोमवादी है. साध्यम इति सिद्धम्‌.

यह इन दंभी धर्मनिरपेक्षोंका तर्क है जो तर्कके शास्त्रसे हजारों कोस दूर है. वे लोग इस तर्कको आरएसएस और बीजेपी के उपर चलाना चाहते है. वास्तवमें गांधीजीका खून करने वाली तो नहेरुवीयन कोंग्रेस ही है. गांधीजी अगर महान थे तो वे अपने विचारोंसे और अपने आचारोंसे महान थे. किन्तु नहेरुवीयन कोंग्रेसने तो गांधीके विचारोंका खून किया है.

इसी कोंग्रेसने प्रस्ताब पास करके दारुबंधीमें सातत्यसे छूट दी और कभी लागु नहीं की,

इसी कोंग्रेसने प्रस्ताब पास करके गौवध बंधी कभी लागु नहीं की,

इसी कोंग्रेसने प्रस्ताब पास करके कतल खानोंको रियायतें दी,

इसी कोंग्रेसने प्रस्ताब पास करके विभाजनवादी प्रवृत्तियां की,

इसी कोंग्रेसने प्रस्ताब पास करके अपनी सुविधाएं बढाई,

इसी कोंग्रेसने प्रस्ताब पास करके सीमा रेखाको असुरक्षा दी,

इसी कोंग्रेसने प्रस्ताब पास करके मंत्रीयोंको मनमानी करनेका अधिकार दिये,

इसी कोंग्रेसने प्रस्ताब पास करके जनतंत्रका खून किया था,

इसी कोंग्रेसने प्रस्ताब पास करके गांधीवादी जयप्रकाश नारायण तकको कारावासमें डाल दिया था,

और इन्ही लोंगोने असामाजीक तत्वोकों सहारा लिया और सहारा दिया.

साबरमती एक्सप्रेसके डीब्बेको जलानेकी योजना, गोधराके एक स्थानिक नहेरुवीयन कोंग्रेसी नेताने बनाई थी और लागु की थी. वह नहेरुवीयन कोंग्रेसी नेता पाकिस्तान भाग गया है. आप इन दंभी धर्मनिरपेक्षकी पूरी जमातको दस्तावेजोंके आधारपर कारावासकी सजा दे सकतो हो.

ऐसे दंभी धर्म निरपेक्ष लोगोंसे सावधान रहो.

इन लोगोंसे सावधान जो हिन्दुधर्ममें सुधारकी वार्ताएं करते हैं.

इन लोगोंको समाजसुधारकी बातें करते समय उनको सिर्फ हिन्दु समाज ही दिखाई देता है.

इनकी जमातके एक बिरादरने राजस्थान जाके एक हिरनका शिकार किया. हिरनको जलाके अपने यारोंके साथ खा भी लिया. अब यह हिरन तो विलुप्त जातिका था और उसको शासनने सुरक्षित घोषित किया था. तो भी इस बिरादरने नियमकी अवहेलना करके उसका शिकार किया. इसी बिरादरनेसत्यमेव जयतेभी चलाया. उसमें इन्होंनें केवल गुन्हाहोंका सामान्यीकरण किया लेकिन शासनका क्या फर्ज बनता है और शासनस्थ किस व्यक्तिका फर्ज बनता है उसका नाम भी नहीं लिया. “मैं तुमसे ज्यादा पवित्र हूं, मैंने तुम्हें सुधारने के लिये कैसा अच्छा सिरीयल बनाया, अब जनताको जागना पडेगा, जनता को ही आगे आना पडेगाइत्यादि इत्यादि.

DOUBLE STANDARDS OF CENSOR BOARD

अभी अभी इस बिरादरनेपी केनामकी फिलम बनायी. उसमें वे खुदपी केहै. और अंधश्रद्धा को उजागर करनेमें वे कैसे मचे रहेते है वह दिखाया है. उनको अपनी जमातकी पहाड जैसी भी अंधश्रद्धा दिखाई देती नहीं है. लेकिन हिन्दु धर्मकी तिलके बराबरकी बुराई, यह महाशय पहाड जैसी प्रदर्शित करते हैइस बातकी चर्चा हम अलग लेखसे करेंगे. लेकिन ऐसे दंभी ठगलोगोंसे सावधान.  

(१५) ये लोग एक विवादास्पद वार्ताकी सत्यताको सिद्ध करनेके लिये दुसरी विवादास्पद वार्ताका आधार लेते है और अपने निर्णय को तर्कयुक्त मानते है और मनवाते है,

एक व्यक्ति जो महानुभाव है. कोई क्षेत्रका विद्वान माना जाता है. किन्तु समझ लो. कार्ल मार्क्स के समाजवादका सिद्धांत विवादास्पद है. एक अमर्त्यसेन था उसने नरेन्द्र मोदी के आर्थिक कदमोंको बिना नरेन्द्र मोदीसे चर्चा किये नकार दिया. ये लोग ऐसा तारतम्य निकालते है कि नरेन्द्र मोदीके आर्थिक कदम खोटे है.

वास्तवमें एक विवादास्पद बातसे दुसरी बातको गलत नहीं कह सकते.

(१६) ये लोग पाश्चात्य साहित्य, इतिहास लेखन, दृष्टिकोण, प्रणालियां या/और व्यक्तिओंसे अभिभूत है.

भारतके कई लोग जो अपनेको मूर्ध्न्य मानते है और साथमें महानुभाव भी है, उनमें एक फेशन है कि पाश्चात्य विद्द्वानोंके कथन उद्धृत करके बीजेपी और उसके नेताओंको बदनाम करो.

वास्तवमें हरेक कथन पर समस्या पर संदर्भके साथ रख कर गुणवत्ता, प्रमाणिक और प्राथमिकता को लक्षमें रख कर विचार करना चाहिये. किसीका कथन मात्र कुछभी सिद्ध करता नहीं है.

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः नरेन्द्र मोदी, बीजेपी, आर एस एस, नहेरुवीयन कोंग्रेस, नेतागण, सत्तालाभ, साधनशुद्धि, नकारात्मक, आतंकवाद, निष्कासित, जातिवाद, प्रांतवाद, विकल्प

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