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सुज्ञ मुस्लिम क्यूँ मौन है?

सुज्ञ मुस्लिम क्यूँ मौन है?

तर्क का एक सिद्धांत है कि आप जो भी शब्द प्रयोग करें, उसकी परिभाषा प्रस्तुत करें.

सुज्ञ मुस्लिम का अर्थ क्या है?

कौन समज़ाएगा

जो मुस्लिम ने कुरान पढा है और उसने कुरानको आत्मसात्‌ भी किया है.

वह यह भी जानता है कि सांप्रतकालमें मुस्लिमोंके लिये क्या आवश्यक है.

वह यह भी जानता है कि अन्य मुस्लिम सुज्ञ नहीं है.

वह यह भी जानता है कि, मुल्लाओंके अर्थघटनोंसे इस्लामका प्रभाव आम मुस्लिमों पर और अ-मुस्लिमों पर क्या  पडता है और उनको क्या संदेश मिलता है

वह यह भी जानता है कि ऐसे अर्थघटनोंके क्या क्या भयस्थान है और पैदा होने वाला है. इनको रोकनेके लिये क्या करना आवश्यक है,

वह यह भी जानता है कि अन्य धर्मोंका सार क्या है,

यह सुज्ञ मुस्लिम है.

सुज्ञ मुस्लिमका  कोई उदाहरण है?

अवश्य उदाहरण हैं. “मज़हब नहीं सिखाता आपसमें बैर रखना” कहनेवाला था. लेकिन वह तो “एक ही देशमें दो राष्ट्र है” ऐसा पुरस्कृत करने वाला हो गया. एक राष्ट्रका विभाजन हो गया. किन्तु उसका काव्य तो भारतमें अमर हो गया. किन्तु उसका नाम तो हम सुज्ञ मुस्लिमोंकी सूचीमें नहीं रह सकते.

पाकिस्तानमें कई सुज्ञ मुस्लिम होगे. भारतमें जितने सुज्ञ मुस्लिम है उनसे अधिक सुज्ञ  मुस्लिम पाकिस्तानमें हो सकते है. इस संभावनाको हम नकार नहीं सकते. किन्तु यह चर्चाका विषय नहीं है.

सुज्ञ मुस्लिम जो भारतमें है उनमें बीजेपीके सदस्य तो है ही. अरिफ मोहम्मद खान, एम जे अकबर, तारेक फतह जैसे कई है. उनके पास अपने मन्तव्यका आधार भी है. वे कुरानकी आयातोंका उदाहरण देकर अपनी मान्यता सिद्ध करते है. टीवी चेनल पर संवादमें भी हम कई मुस्लिम नेताओंको इनकी मान्यताके समर्थन करने वाले देखते हैं. और इनके विरोधीयोंमें केवल हवाई बातें होती है.

किन्तु उपरोक्त सुज्ञ मुस्लिमोंका व्यापक जनाधार नहीं है.

अन्य मुस्लिम युथ कैसे है?

(१) स्वयं प्रमाणित तटस्थ है, और ये दहीं-दूधमें रहेते है

(२) प्रच्छन्न कट्टर वादी है और ये लोग प्रच्छन्न रुपसे कट्टरवादीयोंका समर्थन करते है या उनके प्रति उनकी कोई प्रतिक्रिया ही नहीं होती. संभव है कि कट्टरवादीयोंके प्रति वे कोमल है.

(३) अपने ही मुस्लिमोंसे भयभित है इसलिये मौन है

(४) प्रदर्शन ऐसा करते है कि वे परस्पर भ्रातृभावमें मानते है किन्तु मुस्लिमों द्वारा किये गये अपराधों पर सप्रमाण निंदा नहीं करते,

(५) भारतमें तो रहेना है किन्तु मुस्लिमोंके आपराधिक घटनाओंकी चर्चा नहीं करना है,

(६) कोमवाद से ग्रस्त है और वितंडावादी है

(७) जो करना है वह कर लो हम तो गज़वाहे हिन्द बनाएंगे ही

(८) आतंकवादी मुस्लिम

जो स्वयंको सुज्ञ और तटस्थ मानते है उनके उपर सर्वाधिक उत्तरदायित्व है.

क्या हिन्दुओंमें भी कट्टारता वादी नहीं है?

हाँ अवश्य कट्टरतावादी है. किन्तु उनका वास्तविक जनाधार नहीं है.

सर्व प्रथम तो इस बातको समज़ना अत्यंत आवश्यक है कि जिस प्रकारकी व्याख्या अन्य धर्मोंको लागु पडती है उस व्याख्याको, हम हिन्दु धर्मको लागु नहीं कर सकते. फिर भी हम इस तथा कथित हिन्दुओंको संमिलित रख सकते है. अर्थात्‌ एक धर्म तो है ही. किन्तु इसका विवरण हम इस चर्चामें नहीं करेंगे. “इसी ब्लोगसाईट पर “अद्वैतवादकी मायाजाल … “की चर्चा-शृंखलामे विस्तारसे किया है और “नोट इवन टु, वन एन्ड वन ओन्ली” अंग्रेजी ब्लोगमें अतिसंक्षिप्तमें इसकी चर्चा की है.

हिन्दु कैसे विभाजित है?

कुछ वाचाल हिन्दु लोग, भारतीय-तत्त्वज्ञान क्या है वे जानते नहीं है तथापि स्वयंको सुज्ञ मानते है, फिर भी वे स्वयं प्रमाणित सुज्ञ है. इनमें संत रजनीशमल (जिनको लोग, या स्वयं रजनीश, स्वयंको, पहेले आचार्य, तत्‌ पश्चात्‌ भगवान और तत्‌ पश्चात्‌ ओशो यानी कि परम ज्ञानी. इनके अनुयायीओंकी संख्या के कारण मेरे जैसे लोग रजनीशको “संत” और शक्तिशाली होनेके कारण “मल’ कहेते है), ओशो आसाराम (ओशो मजाक के लिये), सांई बाबा, सत्य सांई बाबा, प्रजापिता ब्रह्माकुमारी,   … इनमें कुछ स्वयंको मोडर्न विचारधारावाले मानते है.

शोभनीय बात यह है कि ये लोग अराजकता नहीं फैलाते है. इसलिये समाजके लिये कोई कष्ट नहीं.

हिन्दु धर्म वास्तवमें एक पारदर्शी विचारधाराओंका समूह है. चर्चा आवकार्य है. किन्तु जब वितंडावादका प्रवेश होता है, तब समाजको हानि होनेका प्रारंभ होता है.

वितंडावाद कब होता है?

(१) स्वयं तटस्थ है इसकी धून जब व्यक्तिके उपर सवार होती है,

(२) स्वयं ज्ञाता है ऐसा स्वयं प्रमाणित मानते है,

(३) स्वयंका स्वार्थ होता है,

(४) पूर्व पक्ष का अज्ञान होता है,

(५) पूर्वग्रह होता है,

(७) सियासत व्यक्तिके उपर आरुढ होती है

 (३) और (५) वाले तत्त्व जब मिल जाते है यानी कि स्वार्थ और पूर्वग्रह जब मिल जाते है तो व्यक्ति सियासती तत्त्व वाला बन जाता है.

वैसे तो वितंडावाद का जन्म, प्रमाणभानकी प्रज्ञाका अभाव, प्राथमिकताकी प्रज्ञाका अभाव और प्रस्तूतताकी प्रज्ञाका अभाव, इन सभी अभावोंकी प्रज्ञाके मिश्रणके कारण वितंडावाद उत्पन्न होता है.

हिन्दु किन किन व्यर्थ बातों पर लडते है?

(१) हिन्दु धर्म क्या है?

(२) भारतका विभाजनका मूल कारण क्या है और कौन जिम्मेवार है?

(३) क्या भारत स्वतंत्र हुआ है?

(४) आज़ादी किसने दिलायी?

(५) प्रवर्तमान जो हिन्दु-मुस्लिम संबंध समस्या है उसका मूल कहांसे है और कौन है?

(६) भारतका विभाजन धर्मके आधार पर हुआ है तो मुसलमान लोगोंको भारतमें किसने रहेने दिया?

(७) भारत १२०० वर्ष गुलाम क्यूँ रहा?

इनमेंसे कई प्रश्न तो हास्यास्पद है.

वैसे तो ये लोग गद्दार तो नहीं ही है, लेकिन प्राथमिकताकी प्रज्ञाके अभावमें हिंदुओंकी संगठन शक्तिमें क्षति अवश्य पहूँचाते है*.

इन लोगोंके व्यर्थ विवादसे, भारत विरोधीयोंकी शक्तिमें अवश्य वृद्धि होती है. इन लोगोमें कुछ प्रच्छन्नरुपसे देशविरोधी तत्त्व छीपे हो सकते है. जो चाहते है कि हिन्दु लोग इन व्यर्थ बातोंमें समय बरबाद करेंगे तो हमारे साथ लडनेका सोचनेमें उनको कम समय मिलेगा और वे आपसमें ही लडते रहेंगे. इस संभावनाको हम नकार नहीं सकते.

वास्तवमें सर्वसे अधिक प्रभाविक समस्या यह है

(१) कोरोना वायरसके प्रसारको कैसे रोकना और कोरोना वायरसके प्रसारके साथ  संबंधित हिन्दु-मुस्लिम  संबंध.

अथवा इससे विलोमित (वाईस वर्सा) हिन्दु-मुस्लिम संबंध और कोरोना वायरसके प्रसारको कैसे रोकना. या तो मुस्लिमोंका क्या करना जिससे कोरोना वायरसका प्रसार कम हो.

 (२) कोंगी लोग और उनके सांस्कृतिक साथी, जैसे अर्बन नक्षल, साम्यवादी विचारधारा वाले लोग, मोदी/बीजेपी के प्रति पूर्वग्रह रखनेवाले देशी-विदेशी मीडीया-मूर्धन्य, असामाजिक तत्त्व, इन सबसे परोक्ष और प्रत्यक्ष संबंधसे जुडे आतंकवादीयोंका संगठन … इन सबके योजना बद्ध प्रपंच और पृथक पृथक आक्रमणोंको कैसे रोका जाय?

(३) कोंगीयों की ७०सालके शासनकी कृपासे कट्टारवादी मुस्लिम नेताओंको इतना बिगाडके रख दिया है कि अब वे हिन्दुओंको  प्रत्यक्ष रुपसे बिना संकोच गृहयुद्धका आव्हाहन  दे रहे है. उपरोक्त ल्युटीअन गेंग इन लोगोंके सभी करतूतों पर मौन है या तो यदि चर्चा करते है तो बिना संदर्भवाली बातें पर वाणीविलास करते है.

समस्या तो हम जानते है, किन्तु उसका उपाय क्या है?

इन समस्याओंको हल करना है तो कुछ खुले दिलवाले मुस्लिम, मुस्लिमोंको नसिहत दे सकने वाले मुस्लिम, सुज्ञ मुस्लिम युथ, आगे आना चाहिये. ऐसे मुस्लिम जो “स्पेड को स्पेड” कह सके. यानी कि बे जीज़क ताल ठोकके सत्यवक्ता हो. हिन्दुओंका युथ तो तयार ही है. लेकिन मुस्लिम लोग संवादके लिये तयार नहीं.

है कोई सज्ज, संवादके लिये?

शिरीष मोहनलाल महाशंकर दवे

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कहीं भी, कुछ भी कहेनेकी सातत्यपूर्ण स्वतंत्रता? (भाग-१)

कहीं भी, कुछ भी कहेनेकी सातत्यपूर्ण स्वतंत्रता? (भाग-१)

“स्वतंत्रता” शब्द पर अत्याचार

paise pe paisa

हमारा काम केवल प्रदर्शन करना है चर्चा नहीं

हमें चाहिये आज़ादी केवल प्रदर्शन के लिये 

कोंगी तो कोमवादी और उन्मादी (पागल) है. साम्यवादीयोंकी तो १९४२से ऐसी परिस्थिति है. किन्तु इन दोनोंमें भेद यह है कि साम्यवादी लोग तो १९४२के पहेलेसे उन्मादी है. उनके कोई सिद्धांत नहीं होते है. वे तो अपनी चूनावी कार्यप्रणालीमें प्रकट रुपसे कहेते है कि यदि आप सत्तामें नहीं है, तो  जनताको विभाजित करो, अराजकता पैदा करो, लोगोंमें  भ्रामक प्रचार द्वारा भ्रम फैलाओ, उनको असंजसमें डालो, और जनतंत्रके नाम पर जनतंत्रके संविधानके प्रावधानोंका भरपूर लाभ लो और तर्कको स्पर्ष तक मत करो. यदि आप सत्तामें है तो असंबद्ध और फर्जी मुद्दे उठाके जनतामें  अत्यधिक ट्रोल करो और  स्वयंने किये हुए निर्णय कितने महत्त्वके है वह जनताको दिखाके भ्रम फैलाओ. पारदर्शिता तो साम्यवादीयोंके लहुमें नहीं है. उनकी दुनियानें तो सब कुछ “नेशनल सीक्रेट” बन जाता है. समाचार माध्यमोंको तो साम्यवादी सरकार भेद और दंडसे अपने नियंत्रणमें रखती है. “भयादोहन (ब्लेक मेल)” करना और वह भी विवादास्पद बातोंको हवा देना आम बात है.

उन्नीसवी शताब्दीके उत्तरार्धमें और बीसवीं शातब्दीके पूर्वार्धमें युवावर्गमें “समाजवादी होना” फैशन था. युवा वर्गको अति आसानीसे पथभ्रष्ट किया जा सकता है. उनके शौक, आदतें बदली जा सकती है. उनको आसानीसे  प्रलोभित किया जा सकता है.

युवा वर्ग आसानीसे मोडा जा सकता है

आज आप देख रहे है कि सारी दुनियाके युवावर्गने दाढी रखना चालु कर दिया है. (वैसे तो नरेन्द्र मोदी भी दाढी रखते है. किन्तु वे तो ४० वर्ष पूर्वसे ही दाढी रखते है). बीस सालसे नरेन्द्र मोदी प्रख्यात है. किन्तु युवावर्गने दाढी रखनेकी फैशन तो दो वर्षसे चालु की है. और दाढीकी फैशन महामारीसे भी अधिक त्वरासे  फैल गयी है. सारे विश्वके युवा वर्ग दाढीकी फैशनके दास बन गये है. यही बात प्रदर्शित करती है कि युवा वर्ग कितनी त्वरासे फैशनका दासत्व स्विकार कर लेता है.

उसको लगता है कि वे यदि फैशनकी दासताका स्विकार नहीं करेगा तो वह अस्विकृतिके संकटमें पड जाएगा. ऐसी मानसिकताको “क्राईसीस ऑफ आडेन्टीफीकेशन” कहा जाता है.

छोडो यह बात. इनकी चर्चा हम किसी और समय करेंगे.

हमारे नहेरुजी भी समाजवाद (साम्यवाद)के समर्थक थे और साम्यवादीयोंके भक्त थे.

नहेरु न तो महात्मा गांधीके सर्वोदय-वादको समज़ पानेमें सक्षम थे न तो वे अपना समाजवाद महात्मा गांधीको समज़ानेके लिये सक्षम थे. गांधीजीने स्वयं इस विषयमें कहा था कि उनको जवाहरका समाजवाद समज़में नहीं आता है. नहेरु वास्तवमें अनिर्णायकता के कैदी  थे. जब प्रज्ञा सक्षम नहीं होती है, स्वार्थ अधिक होता है तो व्यक्ति तर्कसे दूर रहेता है. वह केवल अपना निराधार तारतम्य ही बताता है. नहेरु कोई निर्णय नहीं कर सकते थे क्यों कि उनकी विवेकशीलतासे कठोर समस्याको समज़ना उनके लिये प्राथमिकता नहीं थी. इस लिये वे पूर्वदर्शी नहीं थे. निर्णायकतासे अनेक समस्याएं उत्पन्न होती है. कोई भी एक समस्यामें जब प्रलंबित अनिर्णायकता रहती है तब उसको दूर करना असंभवसा बन जाता है.

नहेरुकी अनिर्णायक्तासे कितनी समस्या पैदा हूई?

कश्मिर, अनुच्छेद ३७०/३५ए को हंगामी के नाम पर संविधानमें असंविधानिक रीतिसे समावेश करना और फिर “हंगामी”शब्द को दूर भी नहीं करना और इसके विरुद्ध का काम भी नहीं करना, यह स्थिति नहेरुकी  घोर अनिर्णायकताका उदाहरण है. कश्मिरमें जनतंत्रको लागु करनेका काम ही नहीं करना, यह कैसी विडंबना थी? नहेरुने इस समस्याको सुलज़ाया ही नही.

अनुच्छेद ३७० कश्मिरको (जम्मु कश्मिर राज्यको) विशेष स्थिति देता है. किन्तु कश्मिरकी वह विशिष्ठ स्थिति क्या जनतंत्र के अनुरुप है?

नहीं जी. इस विशिष्ठ स्थिति जनतंत्रसे सर्वथा विपरित है. अनुछेद ३७० और ३५ए को मिलाके देखा जाय तो यह स्थिति जन तंत्रके मानवीय अधिकारोंका सातत्यपूर्वक हनन है. १९४४में ४४०००+ दलित  कुटुंबोको सफाई कामके लिये उत्तर-पश्चिम भारतसे बुलाया गया था. १९४७से पहेले तो कश्मिरमें जनतंत्र था ही नहीं. १९४७के बाद इस जत्थेको राज्यकी  नागरिकता न मिली. उतना ही नहीं उसकी पहेचान उसके धर्म और वर्णसे ही की जाने लगी. तात्पर्य यह है कि वे दलित (अछूत) ही माने जाने लगे. और उसका काम सिर्फ सफाई करनेका ही माना गया. क्यों कि वे हिन्दु थे. और तथा कथित हिन्दु प्रणालीके अनुसार उनका काम सिर्फ सफाई करना ही था. वैसे तो गांधीजीने इनका लगातार विरोध किया था और उनके पहेले कई संतोंने किसीको दलित नहीं माननेकी विचारधाराको पुरष्कृत किया था. ब्रीटीश इन्डियामें भी दलितको पूरे मानवीय अधिकार थे. लेकिन कश्मिरमें और वह भी स्वतंत्रत भारतके कश्मिरमें उनको जनतंत्रके संविधानके आधार पर दलित माने गये. यदि वह दलित कितना ही पढ ले और कोई भी डीग्री प्राप्त करले तो भी वह भारत और कश्मिरके जनतंत्रके संविधानके आधार पर वह दलित ही रहेगा, वह सफाईके अलावा कोई भी व्यवसायके लिये योग्य नहीं माना जाएगा. इन दलितोंकी संतान चाहे वह कश्मिरमें ही जन्मी क्यों न हो, उनको काश्मिरकी नागरिकतासे, जनतंत्रके संविधानके आधार पर ही सदाकालके लिये  वंचित ही रक्खा जायेगा.

क्या जनतंत्रका संविधान अपनी ही प्रजाके एक विभागको अन्यसे भीन्न समज़ सकता है?

क्या जनतंत्रका संविधान अपनी ही प्रजाके एक विभागको वंशवादी पहेचान दे सकता है?

क्या जनतंत्रका संविधान अपनी ही प्रजाके एक विभागके उपर उनकी जाति ठोप सकता है?

क्या जनतंत्रका संविधान अपनी ही प्रजाके एक विभागके उपर केवल उन विभागके लिये ही भीन्न और अन्यायकारी प्रावधान रख सकता है?

क्या जनतंत्रका संविधान अपनी ही प्रजाके एक विभागके लोगोंको और उनकी संतानोंको मताधिकार से वंचित रख सकता है.

यदि आप जनतंत्रके समर्थक है और आप “तड और फड” (बेबाक और बिना डरे) बोलने वाले है  तो आप क्या कहेंगे?

क्या आप यह कहेंगे कि कश्मिरमें अनुच्छेद ३७०/३५ए हटानेसे कश्मिर में जनतंत्र पर आघात्‌ हुआ है?

यदि कोई विदेशी संस्था भी भारत द्वारा कश्मिरमें “अनुच्छेद ३७०/३५ए” की हटानेकी बातको “जनतंत्र पर आघात” मानती है तो आप उस विदेशी संस्थाके लिये क्या कहोगे?

चाहे आप व्याक्यार्ध (वृद्धावस्था)से पीडित हो, तो क्या हुआ? यदि आप युवावस्थाकी छटपटाहतसे लिप्त हो, तो क्या हुआ? जनतंत्रके सिद्धांत तो आपके लिये बदलनेवाले नहीं है.

यदि आप जनतंत्रवादी है, तो आप अवश्य कहेंगे कि भारतने जो अनुच्छेद ३७०/३५ए हटानेका काम किया है वह जनतंत्रकी सही भावनाको पुरष्कृत करता है और कश्मिरमें वास्तविक जनतंत्रकी स्थापना करता है. काश्मिरको गांधीजीके जनतंत्रके सिद्धांतोंसे  समीप ले जाता है. नहेरुकी प्रलंबित रक्खी समस्याका निःरसन करता है. भारतके जनतंत्र के उपर लगी कालिमाको दूर करता है. जो भी व्यक्ति जनतंत्रके ह्रार्दसे ज्ञात है, वह ऐसा ही कहेगा.

यदि वह इससे विपरित कहेता है, तो वह या तो अनपढ है, या तो उसका हेतु (एजन्डा) ही केवल स्वकेद्री राजकारण है या तो वह मूढ या घमंडी है. उसके लिये इनके अतिरिक्त कोई विशेषणीय विकल्प नहीं है.

दीर्घसूत्री विनश्यति (प्रलंबित अनिर्णायकता विनाश है)

लेकिन कुछ लोग पाकिस्तानकी भाषा बोलते है. इनमें समाचार माध्यम भी संमिलित है. कश्मिर समस्या के विषयमें यु.नो.को घसीटनेकी आवश्यकता नहीं. यु.नो.को जो करना था वह कर दिया. उस समय जो उसके कार्यक्षेत्रमें आता था वह कर दिया. युनोका तो पारित प्रस्ताव था कि, पाकिस्तान काश्मिरके देशी राज्यके अपने कब्जेवाला हिस्सा खाली करें और भारतके हवाले कर दें. उस हिस्सेमें कोई सेनाकी गतिविधि न करें … तब भारत उसमें जनमत संग्रह करें. पाकिस्तानने कुछ किया नहीं. नहेरुने पाकिस्तानके उपर दबाव भी डाला नहीं. भारत सरकारने भारत अधिकृत काश्मिरके साथ जो अन्य देशी राज्योंके साथ किया था वही किया. केवल पाकिस्तान अधिकृत कश्मिरका हिस्सा छूट गया. नहेरुने इस समस्याको अपनी आदतके अनुसार प्रलंबित  रक्खा. आज हो रहे “हल्ला गुल्ला” की जड, नहेरुकी दीर्घसूत्री कार्यशैली है.

पाकिस्तानका जन्मः

पाकिस्तान का जन्म बहुमत मुस्लिम क्षेत्रके आधार पर हुआ वह अर्ध-सत्य है. जो मुस्लिम मानते थे कि वे बहुमत हिन्दु धर्म वाली जनताके शासनमें अपने हित की रक्षा नहीं कर सकते, उनके लिये बहुमत मुस्लिम समुदायवाले क्षेत्रका पाकिस्तान बनाया जाय. इन क्षेत्रोंको भारतसे अलग किया. जो मुस्लिम लोग उपरोक्त मान्यतावाले थे, वे वहां यानी कि पाकिस्तान चले गये. जो ऐसा नहीं मानते थे, वे भारतमें रहे. पाकिस्तानमें रहेनेवाले बीन-मुस्लिमोंको भारत आने की छूट थी. १९५० तक देशकी सीमाको स्थानांतरके लिये खुला छोड दिया था.

पाकिस्तानमें बीन-मुस्लिम जनताका उत्पीडन १९४७ और १९५०के बाद भी चालु रहा. इसके अतिरिक्त भी कई समस्यायें थी. गांधीजीने कहा था कि हम किसीको भी अपना देश छोडनेके लिये बाध्य नहीं कर सकते. पाकिस्तानमें जो अल्पसंख्यक रह रहे है उनकी सुरक्षाका उत्तरदायित्व पाकिस्तानकी सरकारका है. यदि पाकिस्तान की सरकार विफल रही तो, भारत उसके उपर चढाई करेगा.

नहेरु – लियाकत अली करार नामा

इसके अनुसार १९५४में दोनो देशोंके बीच एक समज़ौताका दस्तावेज बना. जिनमें दोनों देशोंने अपने देशमें रह रहे अल्पसंख्यकोके हित की सुरक्षाके लिये प्रतिबद्धता जतायी. 

नहेरुने लियाकत अलीसे पाकिस्तानसे पाकिस्तानवासी हिन्दुओंकी सुरक्षाके लिये सहमति का (अनुबंध) करारनामा किया.

किन्तु तत्‌ पश्चात्‌ नहेरुने उस अनुबंधका पालन होता है या नहीं इस बातको उपेक्षित किया. पाकिस्तान द्वारा पालन न होने पर भी पाकिस्तानके उपर आगेकी कार्यवाही नहीं की, और न तो नहेरुने इसके उपर जाँच करनेकी कोई प्रणाली बनाई.

नहेरु-लियाकत अली करारनामा के अनुसंधानमें सी.ए.ए. की आवश्यकताको देखना, तर्क बद्ध है और अत्यंत आवश्यक भी है.

नहेरुने अपनी आदत के अनुसार पाकिस्तानसे प्रताडित हिन्दुओंकी सुरक्षाको सोचा तक नहीं. जैसे कि कश्मिर देशी राज्य पर पाकिस्तानके आक्रमणके विरुद्ध यु.नो. मे प्रस्ताव पास करवा दिया. बस अब सब कुछ हो गया. अब कुछ भी करना आवश्यक नहीं. वैसे ही लियाकत अलीसे साथ समज़ौताका करारनामा हो गया. तो समज़ लो समस्या सुलज़ गयी. अब कुछ करना धरना नहीं है.   

भारतदेश  इन्डो-चायना युद्धमें ९२००० चोरसमील भूमि हार गया. तो कर लो एक प्रतिज्ञा संसदके समक्ष. नहेरुने लेली एक प्रतिज्ञा कि जब तक हम खोई हुई भूमि वापस नहीं लेंगे तब तक चैनसे बैठेंगे नहीं. संसद समक्ष प्रतिज्ञा लेली, तो मानो भूमि भी वापस कर ली.

इन्दिरा घांडी भी नहेरुसे कम नहीं थी.

इन्दिराने भी १९७१के युद्ध के पूर्व आये  एक करोड बंग्लादेशी निर्वासितोंकों वापस भेजनेकी प्रतिज्ञा ली थी, इस प्रतिज्ञाके बाद इन्दिराने इस दिशामें कोई प्रयास किया नहीं. और इस कारण और भी घुसपैठ आते रहे. समस्याओंको  प्रलंबित करके समस्याओंको बडा और गंभीर होने दिया. यहाँ तककी उसके बेटे राजिवने १९८४में एक संविदा पर प्रतिज्ञा ली के देश इन घुसपैठीयोंको कैसे सुनिश्चित करेगा. पर इसके उपर कुछ भी कार्यवाही न की. १९८९-९०में कश्मिरमें कश्मिरस्थ मुस्लिमों द्वारा, हजारों हिन्दुओंका संहार होने दिया, हजारों हिन्दु  स्त्रीयोंका शील भंग होने दिया,  लाखों हिन्दुओं को खूल्ले आम, कहा गया कि इस्लाम अंगीकार करो या मौतके लिये तयार रहो या घर छोड कर भाग जाओ. इस प्रकार उनको बेघर कर होने दिया. इसके उपर न तो जांच बैठाई, न तो किसीको गिरफ्तार किया, न तो किसीको कारावासमें भेजा.

इतने प्रताडनके बाद भी किसी भी हिन्दुने हथियार नहीं उठाया, न तो एक अरब हिन्दुओंमेंसे कोई आतंक वादी बना.

तो कोंगीयोंने क्या किया?

कोंगीयोंने इस बात पर मुस्लिमोंकी आतंक वादी घटनाओंको “हिन्दु आतंकवाद” की पहेचान देनेकी भरपुर कोशिस की. जूठ बोलनेकी भी सीमा होती है. किन्तु साम्यवादीयोंके लिये और उन्ही के संस्कारवाले कोंगीयोंके लिये जूठकी कोई सीमा नहीं होती.

सी.ए.ए. के विरोधमें आंदोलनः

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

अनुसंधान (गुजराती लेख)

https://treenetram.wordpress.com/2017/02/05/સુજ્ઞ-લોકોની-કાશ્મિર-વિષ/

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There is a difference between alliance against INC and against BJP

एक गठबंधन नहेरुवीयन कोंग्रेसके विरुद्ध  और एक गठबंधन बीजेपीके विरुद्ध -२

जो गठबंधन १९७०में हुआ और उस समय जो सियासती परिस्थितियां थी वह १९७२के बाद बदलने लगी थीं.

भारत पाकिस्तान संबंधः

१९७०में एक ऐसी परिस्थिति बनानेमें इन्दिरा गांधी सफल हुई थी, कि उसने जो भी किया वह देशके हितके लिये किया. उसके पिताजी देशके लिये बहुत कुछ करना चाहते थे लेकिन कोंग्रेसके (वयोवृद्ध नेतागण) उसको करने नहीं देते थे. और अब वह स्वयं, नहेरुका अधूरा काम पूरा करना चाहती है. विद्वानोने, विवेचकोंने, मूर्धन्योंने और बेशक समाचार माध्यमोंने यह बात, जैसे कि उनको आत्मसात्‌ हो गयी हो, ऐसे मान ली थी, और जनताको मनवा ली थी.

पूर्व पाकिस्तानमें बंग्लाभाषी कई सालोंसे आंदोलन कर रहे थे. पश्चिम पाकिस्तानी सेना हिन्दुओं पर और बंग्लाभाषी मुसलमानों पर आतंक फैला रही थी. उसके पहेले हिन्दीभाषीयोंसे बंगलाभाषी जनता नाराज थी. हिन्दीभाषी पूर्वपाकिस्तानवासीयोंकी और हिन्दुओंकी हिजरत लगातार चालु थी. वह संख्या एक करोडके उपर पहूंच चुकी थी. इन लोगोंको वापस भेजनाका वादा इन्दिरा गांधी कर रही थी.

भारतमें भी इन्दिरा गांधी पर सेनाका और खास करके जनताका दबाव बढ रहा था.  पाकिस्तानने सोचा कि यह एक अच्छा मौका है कि भारत पर आक्रमण करें. यह लंबी कहानी है.  १९७१में पाकिस्तानने भारत पर आक्रमण किया. भारतीय सेना तो तैयार ही थी. भारतकी सेनाके पास यह युद्ध जीतनेके सिवा कोई चारा ही नहीं था. और भारतने यह युद्ध प्रशंसनीय तरीकेसे जीत लिया. लेकिन इन्दिरा गांधीने सिमला समज़ौता अंतर्गत पराजयमें परिवर्तित कर दिया. या तो इन्दिरा गांधी बेवकुफ थी या ठग थी.

SIMLA

इस युद्धसे पहेले तो विधानसभाओंके चूनावको विलंबित करनेकी बातें इन्दिरा गांधी कर रही थी. लेकिन इस युद्धकी जीतके बात इन्दिरा गांधीने राज्योंकी विधान सभाओंका चूनाव भी कर डाला.

१९७2में राज्यों के विधान सभाके चूनाव भी इन्दिरा गांधीने जीत लिये. उसकी हिंमत बढ गयी थी. अब तो उसकी आदत बन गयी थी कि वह राज्योंमे अपनी स्वयंकी पसंदका नेता चूनें. इस प्रकार मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात … आदि सब राज्योंमें इन्दिराकी पसंदका नेता चूना गया यानी कि इन्दिराकी पसंदके मूख्य मंत्री बने.

गुजरातमें क्या हुआ?

वैसे तो १९७१ के लोकसभाके चूनावके बाद, देशके अन्य पक्षोंमें खास करके कोंग्रेस (ओ) में अफरातफरी मच गयी थी. बहुतेरे कोंग्रेस(ओ)के कोंग्रेसी चूहोंकी तरह इन्दिरा कोंग्रेसकी तरफ भाग रहे थे. कोंग्र्स(ओ)मेंसे बहुतसारे सभ्य इन्दिरा कोंग्रेसमें भाग गये थे. स्वतंत्र पक्ष तूट गया था.  हितेन्द्र देसाई की सरकार तूट चूकी थी. इन्दिरा गांधीने अपनी पसंदका मुख्य मंत्री घनश्याम भाई ओझा को मुख्य मंत्री बनाया. १९७२में गुजरात विधान सभाका चूनाव हुआ. इस चूनावमें मोरारजी देसाईका गढ तूट गया था. विधान सभामें इन्दिरा कोंग्रेसको विधान सभाकी कुल १६८ सीटोमेंसे १४० सीटें मिलीं.

युद्ध सेना जीतती है, सरकार तो सिर्फ युद्ध करनेका   या तो न करनेका निर्णय करती है. सेनाने युद्ध जीत लिया. इस जीतका लाभ भी इन्दिरा गांधीने १९७२के विधान सभा चूनावमें ले लिया. लेकिन युद्ध जीतना और चूनाव जीतना एक बात है. सरकार चलाना अलग बात है.

इन्दिरा गांधी पक्षमें सर्वोच्च थी क्यों कि उसको जनताका सपोर्ट था. पक्षमें वह मनचाहे निर्णय कर सकती थी. लेकिन सरकार चलाना अलग बात है. सरकार कायदेसे चलती है. सरकार चलानेमें अनेक परिबल होते है. इन परिबलोंको समज़नेमें कुशाग्र बुद्धि चाहिये, पूर्वानुमान करने की क्षमता चाहिये. आर्षदृष्टि चाहिये. विवेकशीलता चाहिये. इन सब क्षमताओंका इन्दिरा गांधीमें अभाव था.

गुजरातमें विधानसभा चूनावके बाद इन्दिराने अपने स्वयंके पसंद व्यक्तिको  (घनश्याम भाई ओझाको) मुख्य मंत्रीपद के लिये स्विकारने का आदेश दिया. गुजरातके चिमनभाई पटेलने इसका विरोध किया. इन्दिराने एक पर्यवेक्षक भेजा जिससे वह घनश्याम भाई ओझाकी स्विकृति करवा सके. लेकिन वह असफल रहा. गुजरातमें इन्दिरा गांधी की मरजी नहीं चली.

१९७३में परिस्थिति बदलने लगी. केन्द्र सरकारके पास बहुमत अवश्य था. लेकिन कार्यकुशता और दक्षता नहीं थी. युवा कोंग्रेसके लोग मनमानी कर रहे थे. देशमें हर जगह अराजकताकी अनुभूति होती थी. विरोध पक्षके कई सक्षम नेता थे लेकिन वे हार गये थे. अराजकता और शासन के अभावोंके परिणाम स्वरुप महंगाई बढने लगी थी. घटीया चीज़े मिलने लगी. वस्तुएं राशनमेंसे अदृष्य होने लगी. सीमेंट, लोहा, तो पहेले भी परमीटसे मिलते था अब तो गुड, लकडीका कोयला, दूध, शक्कर, चावल भी अदृष्य होने लागा.

१६८मेंसे १४० सीट जीतने वाली इन्दिरा कोंग्रेसका हारनेका श्री गणेश १९७२के एक उपचूनावसे ही हो गया. इन्दिरा कोंग्रेस १४० सीटें ले तो गई लेकिन उसमें जनता खुश नहीं थी.  लोकसभाकी सीट जो इन्दुलाल याज्ञिक (अपक्ष= इन्दिरा कोंग्रेस)   की मृत्यु से खाली पडी.

उस सीट पर पुरुषोत्तम गणेश मावलंकर, इन्दिरा कोंग्रेसके प्रत्यासीके उपर २००००+मतके मार्जिनसे जित गये. सभी पक्षोंका उनको समर्थन था.

Mavalankar

पुरुषोत्तम मावलंकर अहमदाबादके अध्यापक, पोलीटीकल विवेचक, बहुश्रुत विद्वान थे. वैसे तो वे भारतकी प्रथम लोकसभाके अध्यक्ष गणेशमावलंकरके पुत्र थे, लेकिन उनका खुदका व्यक्तित्व था.

गुजरातमें नवनिर्माण का आंदोलन

गुजरातमें नवनिर्माण का आंदोलन शुरु हुआ. लोगोंको भी लगा कि उसने गलत पक्षको जिताया है.  लेकिन इसका सामना करने के लिये इन्दिरा कोंग्रेसने जातिवाद को बढाने की कोशिस शुरु की. शहरमें उसका खास प्रभाव न पडा. गांवके प्रभावशील होनेका प्रारंभ हुआ. लेकिन आखिरमें १६८मेंसे १४० सीट लाने वाली इन्दिरा कोंग्रेसकी सरकार गीर गयी. चिमनभाई पटेलको इस्तिफा देना पडा. इन्दिराने फिर भी विधान सभाको विसर्जित नहीं किया. जनताको विसर्जनके सिवा कुछ और नहीं पसंद था. राष्ट्रपति शासन लदा. चूनावके लिये मोरारजी देसाईको आमरणांत उपवास पर बैठना पडा. परिणाम स्वरुप १९७५में चूनाव घोषित करना पडा. इन सभी प्रक्रियामें इन्दिराकी विलंब करने की नीति सामने आती थी.

अब सारे देशके नेताओंको लगा कि इन्दिरा हर बात पर विलंब कर रही है. तो विपक्षको एक होना ही पडेगा.

गुजरातमें विधानसभा चूनावमें  जनता फ्रंटका निर्माण हुआ. इसमें जनसंघ, कोंग्रेस(ओ), संयुक्त समाजवादी पार्टी, अन्य छोटे पक्ष और कुछ अपक्ष थे. चिमनभाई पटेलको इन्दिरा कोंग्रेसने बरखास्त किया था. उन्होंने अपना किमलोप (किसान, मज़दुर, लोक पक्ष) नामका नया पक्ष बनाया था.

चूनावमें १८२ सीटमेंसे

जनता मोरचाको   = ६९

जिनमें

कोंग्रेस (ओ) = ५६

जन संघ = १८

राष्ट्रीय मज़दुर पक्ष = १

भारतीय लोक दल =२

समाजवादी पक्ष = २

किसान मजदुर लोक पक्ष = १२

अपक्ष = १८

और

इन्दिरा कोंग्रेसको = ७५

अपक्षोंके उपर विश्वास नहीं कर सकते थे. इस लिये स्थाई सरकार बनानेके लिये जनता मोरचाने, किसान मजदुर लोक पक्षका सहारा लिया. और बाबुभाई जशभाई पटेल जो एक कदावर नेता थे उनकी सरकार बनी. हितेन्द्र देसाई ने चूनाव लडा नहीं था. और चिमनभाई पटेल चूनाव हार गये थे.

यह चूनाव एक गठबंधनका विजय था.

वैसे तो गुजरातकी तुलना अन्य राज्योंसे नहीं हो सकती, लेकिन जो देशमें होनेवाला है उसका प्रारंभ गुजरातसे होता है.

गुजरातमें इन्दिरा गांधीके कोंग्रेसकी हारके कारण देश भरमें जयप्रकाशनारायण की नेतागीरीमें आंदोलन शुरु हुआ. वैसे भी जब नवनिर्माणका आंदोलन चलता था तो सर्वोदयके कई नेता आते जाते रहेते थे.

सर्व सेवा संघमें अघोषित विभाजन

सर्वोदय मंडल दो भागमें विभक्त हो गया था. एक भाग मानता था कि जयप्रकाश नारायण जो संघर्ष कर रहे है उनको सक्रिय साथ देना चाहिये. दुसरा भाग मानता था कि, इससे सर्वोदय को कोई फायदा नहीं होने वाला है. यदि फायदा होना है तो राजकीय पक्षोंको ही होने वाला है. इसलिये हमें किसी पक्षको फायदा पहोंचे ऐसे संघर्षमें भाग लेना नहीं चाहिये.

लेकिन शांतिसेना तो जयप्रकाश नारायणको ही मानती थी. शांतिसेनाके सदस्योंकी संख्या बहुत बढ गयी थी. और वह सक्रिय भी रही.

कुछ समयके बाद इन्दिराके सामने उसके चूनावको रद करनेका जो केस चल रहा था उसका निर्णय आया. इन्दिरा गांधी को दोषी करार दिया और उसको ६ सालके लिये चूनाव के लिये अयोग्य घोषित किया.

मनका विचार आचरणमें आया

DEMOCRACY WAS ATTACKED

emergency

जो बात नहेरुके मनमें विरोधीयोंको कैसे बेरहेमीसे नीपटना चाहिये, जो गुह्य रुपसे निहित थी लेकिन खुल कर कही जा सकती नहीं थीं. क्यों कि स्वातंत्र्यके अहिंसक संग्राममें नहेरु, पेट भर जनतंत्रकी वकालत कर रहे थे. उनके लिये अब कोयला खाना मुश्किल था.

इन्दिरा गांधी अपने पिताके साथ ही हर हमेश रहेती थी इसलिये उनको तो अपने पिताजीकी ये मानसिकता अवगत ही थी.

वैसे भी नहेरु और गांधीके बीचमें ऐसे कोई एक दुसरेके प्रति मानसिक आदर नहीं था.  यह बात नहेरुने केनेडाके एक राजनयिक (डीप्लोमेट)को, जो बादमें केनेडाके प्रधान मंत्री बने, उनके साथ भारतमें एक मुलाकात में उजागर की थी. नहेरुने गांधीजीको ढोंगी और दंभी और नाटकबाज बताया था. इस बात सुनकर वह राज नयिक चकित और आहत हो गया था. इसके बारेमें इस ब्लोग साईट पर ही विवरण दिया है. गांधीजीने भी नहेरुके बारे में कहा था कि जवाहरको तो मैं समज़ सकता हूँ, लेकिन उनके समाजवादको नहीं समज़ सकता. वे खुदभी समज़ते है मैं मान नहीं सकता.

इन्दिराको सब बातें मालुम थीं.

गांधीजीने यह भी कहा था कि “अब जवाहर मेरा काम करेगा और मेरी भाषा बोलेगा.” इसका अर्थ यही था कि नहेरुको सत्ता प्राप्तिसे विमुख रहेना चाहिये और बिना सत्ता ही जन जागृतिका काम करना चाहिये. गांधीजीने इसलिये कोंग्रेसका विलय करने का भी आदेश दिया था.

यदि जवाहर स्वयं, गांधीजीका काम करते, तो उनको यह बात कहेने कि आवश्यकता न पडती. गांधीजीने कभी विनोबा भावेके बारेमें तो ऐसा नहीं किया कि “अब विनोबा मेरी भाषा बोलेंगे और मेरा काम करेंगे”. क्यों कि ऐसा कहनेकी उनको आवश्यकता ही नहीं थी. विनोबा भावे तो गांधीजीका काम करते ही थे.

यह सब बातोंसे इन्दिरा गांधी अज्ञात तो हो ही नही सकती. इस लिये नहेरुके मनमें जो राक्षस गुस्सेसे उबल रहा था, वह राक्षस इन्दिराके अंदर विरासतमें आया था. चूं कि इन्दिरा गांधीका, स्वातंत्र्य संग्राममें कोई योगदान नहीं था, इस लिये उसको अनियंत्रित सरमुखत्यार बनने की बात त्याज्य नहीं थी. “गुजरातीमें एक मूँहावरा है कि नंगेको नाहना क्या और निचोडना क्या?”

जनतंत्रकी रक्षा

PM rules out pre emergency days

कुछ फर्जी या स्वयं द्वारा प्रमाणित विद्वान लोग बोलते है कि भारतमें जो जनतंत्र है वह नहेरुवीयन कोंग्रेस के कारण विद्यमान है. वास्तवमें जनतंत्रके अस्तित्व लिये नहेरुवीयन कोंग्रेसको श्रेय देना एक जूठको प्रचारित करना है. नहेरुवीयन कोंग्रेसने तो जनतंत्रको आहत करने की भरपूर कोशिस की है.

वास्तवमें यदि जनतंत्रको जीवित रखनेका श्रेय किसीको भी जाता है तो भारतकी जनताको ही जाता है. दुसरा श्रेय यदि किसीको जाता है तो गांधीजीके सब अंतेवासी और कोंग्रेस(ओ)के कुछ नेताओंको जाता है और उस समयके कुछ विपक्षीनेताओंको जाता है जो इन्दिरा गांधीके विरोध करनेमें दृढ रहे.

नहेरुवीयन फरजंदकी सरमुखत्यारी और दीशाहीनता

i order poverty to quit india

आपातकालमें क्या हुआ वह सबको ज्ञात है. लाखों लोगोंको बिना कारण बाताये कारावासमें अनिश्चित कालके लिये रखना, समाचार पर अंधकार पट, सरकार द्वारा अफवाहें फैलाना, न्यायालयके निर्णयों पर भी निषेध, भय फैलाना…. अदि जो भी सरकारके मनमें आया वह करना. यह आपात्कालकी परिभाषा थी.

Judiciary afraid

जो भारतके नागरिक विदेशमें थे वे भी विरोध करनेसे डर रहे थे. क्यों कि उनको डर था कि कहीं उनका पासपोर्ट रद न हो जाय. क्यों कि सरकारके कोई भी आचार, सिर्फ मनमानीसे चलता था. इसमें अपना उल्लु सिधा करनेवालोंको भी नकार नहीं सकते.

लेकिन सरकार कैसी भी हो, जब वह अकुशल हो तो वह अपना माना हुए ध्येय क्षमतासे नहीं प्राप्त कर सकती. गुजरातमें “जनता समाचार” और “जनता छापुं” ये दो भूगर्भ पत्रिकाएं चलती थीं. गुजरातमें बाबुभाई पटेलकी सरकार थी तब तक ये दोनों चले. इन्दिरा गांधीने कुछ विधान सभ्योंको भयभित करके पक्षपलटा करवाया और सरकारको गिराया. और ये भूगर्भ पत्रिका वालोंको कारावासमें भेज दिया.

जनता तो डरी हई थी. प्रारंभमें तो कुछ मूर्धन्यों द्वारा आपातकालका अनुमोदन हुआ या तो करवाया. लेकिन बादमें सच सामने आने लगा. आपात्काल, अपने बोज़से ही समास्याएं उलज़ाने की अक्षमताके कारण थकने लगा.

इन्दिरा आपात्काल के समय में डरी हुई रहेती थी. घरमें जरा भी आहटसे वह चौंक जाती थीं ऐसे समाचार भूगर्भ पत्रिकाओंमे आते रहे थे.  इन्दिरा गांधी, वास्तवमें सही विश्वसनीय परिस्थित क्या थी यह जाननेमें वह असमर्थन बनी थी.

साम्यवादी लोग, इस आपात्कालको क्रांतिका एक शस्त्र बनाने के लिये उत्सुक थे. लेकिन क्रांति क्या होती है और साम्यवादीयोंकी सलाह कहां तक माननी चाहिये, उनकी बातों पर इन्दिराको विश्वास नहीं था. उनके कई संपर्क उद्योगपतियोंसे थे. इन्दिरा गांधी स्वयं अपने बेटे संजयसे कार बनवाना चाहती थी. उसके सिद्धांत में कोई मनमेल नहीं था. वह दीशाहीन थी और उसके भक्त भी दीशा हीन थे.

एक और साहस

परिस्थिति हाथसे चली जाय, उसके पहेले वह फिरसे प्रधान मंत्री बनना चाहती थी ताकि वह आरामसे सोच सकें.   ऐसा चूनावी साहस उसने १९७१में लिया था और उसको विजय मिली थी. उसने आपात्काल चालु रखके ही चूनावकी घोषणा की.

कुछ लोग समज़ते है कि, इन्दिरा गांधीने आपात्काल हटा लिया था और फिर चूनाव घोषित किया था. यह बात वास्तवमें जूठ है.

जब वह खूद हार गयी तो उसने सेना प्रमुखको सत्ता हाथमें ले लेनेका प्रस्ताव दिया था. लेकिन सेनाने उसको नकार दिया था. तब इन्दिरा गांधीने आपात्कालको उठा लिया और यह निवेदन दिया कि, मैंने तो जरुरी था इसलिये आपात्काल घोषित किया था. अब यदि आपको लगे कि मैं सत्य बोलती थीं तो आप फिरसे आपात्काल लगा सकते हैं.

वास्तवमें उसको आपात्काल चालु रखके ही सत्ताका हस्तांतरण करना चाहिये था. यदि आने वाली सरकारको आपात्काल आवश्यक न लगे तो वह आपात्कालको उठा सकती थी. यह भी तो एक वैचारिक विकल्प था. लेकिन इन्दिरा गांधी ऐसा साहस लेना चाहती नहीं थीं. क्यों कि उसको डर था कि विपक्ष आपात्कालका आधार लेके उनको ही गिरफ्तार करके कारावास में भेज दें तो?

जो लोग कारावासमें थे वे सब एक हो गये. और इस प्रकार विपक्षका एक संगठन बना.

विपक्षके कोई भी नेताके नाम पर कोई कालीमा नहीं थी. सबके सब सिर्फ जनतंत्र पर विश्वास करने वाले थे. उनकी कार्यरीति (परफोर्मन्स)में कोई कमी नहीं थी. न तो उन्होने पैसे बनाये थे न तो उन्होंने कोई असामाजीक काम किया था, न तो कोई विवाद था उनकी प्रतिष्ठा पर.

मोरारजी देसाई, ज्योर्ज फर्नान्डीस, मधु दन्डवते, पीलु मोदी, मीनु मसाणी, दांडेकर, मधु लिमये,  राजनारायण, बहुगुणा, अजीत सिंह … ये सब इन्दिरा विरोधी थे. जब कोम्युनीस्टोंने देखा कि इन्दिरा कोंग्रेसका सहयोग करनेसे उनको अब कोई लाभ नहीं तो वे भी जनता मोरचाका समर्थन करने लगे.

आपात्कालसे डरी हुई  शिवसेना भी सियासती लाभ लेनेके लिये जनता मोरचाको सहयोग देनेके लिये आगे आयी. आंबेडकरका दलित पक्ष भी जनता मोरचाके समर्थनमें आगे आया. जगजीवन राम भी इन्दिराको छोड कर जनता मोरचामें सामिल हो गये.

हाँ जी. यह संगठनका नाम जनता मोरचा था. उसके सभी प्रत्याषी जनता दलके चूनाव चिन्ह पर चूनाव लडे थे.

जनता फ्रंटको भारी बहुमत मिला.

janata from ministry

प्रधान मंत्री बननेके लिये थोडा विवाद अवश्य हुआ.

जय प्रकाश नारायणकी मध्यस्थतामें सभी निर्णय लिये गये और उनके निर्णयको सभीने मान्य भी रखा. सबसे वरिष्ठ, उज्ज्वल और निडर कार्यरीतिके प्रदर्शन वाले मोरारजी देसाईको प्रधान मंत्री बनाया गया. वह भी सर्वसंमतिसे बनाया गया. जयप्रकाश नारायणने इन सबकी शपथ विधि भी राजघाट संपन्न करवाई.

इस प्रधान मंडलमें कोई कमी नहीं थी. मन भी साफ था ऐसा लगता था.

गठबंधनवाली सभी पार्टीयोंका जनता पार्टीमें विलय हुआ.

जनता पार्टीने क्या किया?

(१) सर्व प्रथम इस गठबंधनवाली सरकारने फिरसे कोई सरमुखत्यारी मानसिकता वाला प्रधान मंत्री आपात्काल देश के उपर लाद न सके उसका प्रावधान किया.

(२) उत्पादनकी इकाईयों उपरके अनिच्छनीय प्रतिबंध रद किया. जिसका परिणाम १९८०से बाद मिला.

(३) नोटबंदी लागु की जिसमें ₹ १००० ₹ ५००० और ₹ १०००० नोंटे रद की गयी.

(४) आपात्कालके समयमें जो अतिरेक हुआ था, उसके उपर जाँच कमीटी बैठायी.

१९७७के चूनाव परिणामके पश्चात यशवंतराव चवाणने इन्दिरा कोंग्रेससे अलग हो कर अपना नया पक्ष एन.सी.पी. बनाया.

जगजीवन राम तो चूनावसे पहेले ही जनता पार्टीमें आ गये थे.

अब गठबंधनका जो एक पार्टीके रुपमें था तो भी उसका क्या हुआ?

चौधरी चरण सिंहमें धैर्यका अभाव था. उनको शिघ्र ही प्रधान मंत्री बनना था.

उनकी व्युह रचना मोरारजी देसाई जान गये, और उन्होंने चौधरीको रुखसद दे दी. उस समय यदि जनसंघके नेता बाजपाई बीचमें न आते तो चरण सिंहके साथ अधिक संख्या बल न होने से उनके साथ २० से २५ ही सदस्य जाते.

मोरारजीने बाजपाई की बात मानली. यह उनकी गलती साबित हुई. क्यों कि चरण सिंह तो सुधरे नहीं थे. और वे कृतघ्न ही बने.

इन्दिराने इसका लाभ लिया. यशवंत राव चवाणने उसका साथ दिया. थोडे समयके अंदर चरण सिंहने अपने होद्देके कारण कुछ ज्यादा संख्या बल बनाया. और तीनोंने मिलकर मोरारजी देसाईकी सरकारको गीरा दी.

मोरारजी देसाईने प्रधान मंत्रीके पदसे त्याग पत्र दे दिया. लेकिन संसदके नेता पदसे त्याग पत्र नहीं दिया. यदि उन्होने त्याग पत्र दिया होता तो शायद सरकार बच जाती. लेकिन जगजीवन राम प्रधान मंत्री बननेको तयार हो गये. चरण सिंह और जगजीवन राममें बनती नहीं थी. इस लिये उन्होने नहेरुने जैसा जीन्ना के बारेमें कहा था उसके समकक्ष बोल दिया कि, मैं उस चमार को तो कभी भी प्रधानमंत्री बनने नहीं दुंगा.

जब ये नेता नहेरुवीयन कोंग्रेसमें थे तो उनके प्रधान मंत्री बननेकी शक्यताओंको नहेरुवीयनोंने निरस्त्र कर दिया था. वे सब इसी कारणसे नहेरुवीयन कोंग्रेससे अलग हुए थे या तो अलग कर दिया था.

उपरोक्त संगठन वरीष्ठ नेताओंका प्रधान मंत्री बननेकी इच्छाका भी एक परिमाण था. प्रधान मंत्री बननेकी इच्छा रखना बुरी बात नहीं. लेकिन अयोग्य तरीकोंसे प्रधान मंत्री बनना ठीक बात नहीं है.

प्रवर्तमान गठबंधनका प्रयास

अभी तक इन सभी नेताओं की संतान नहेरुवीयन कोंग्रेसको शोभायमान कर रही थीं. उनको महेसुस हो गया कि अब प्रधान मंत्री बनने के बजाय यदि प्रधान पद भी मिल जाय तो भी चलेगा.

इसलिये चरण सिंघ, जगजीवन राम, वीपी सींघ, बहुगुणा, गुजराल, एन.टी. रामाराव,  … आदि की संतान नहेरुवीयन कोंग्रेसको सपोर्ट देनेको तत्पर है. लेकिन जब नहेरुवीयन कोंग्रेस भी डूब गयी और उनका संख्या बल कम हो गया तो इनकी संतानोंमें फिरसे उनके अग्रजोंकी तरह वह सुसुप्त इच्छाएं जागृत हुई है.

यदि २०१९में ये सरकार चले भी तो उनका कारण देशको लूटनेमें सहयोग की वजहसे चलेगी. जैसे मनमोहन सिंघकी सरकार १० साल चली थी क्यों कि मनमोहन सिंघने सबको अपने अपने मंत्रालयमें जो चाहे वह करने की छूट दे रक्खी थी. शीला दिक्षित, ए. राजा, चिदंबरम आदि अनेक के कारनामे इसकी मिसाल है. इन लोगोंको यथेच्छ मनमानी करने की छूट दे दी थी. जब न्यायालय स्वयं विवादसे परे न हो तो इन लोगोंको कौन सज़ा दे सकता है?

आप देख लो सोनिया, माया, मुल्लायम, लालु, शरद पवार, जया, शशिकला, फारुख, ममता आदि सभी नेता पर एक या दुसरे कौभान्ड के आरोप है. कुछ लोग तो सजा काट रहे है, कुछ लोग बेल पर है और बाकी नेता न्यायालयमें सुनवाई पर है.

किसी भी मुंबई वालेको पूछोगे तो वह शिवसेना को नीतिमत्ताका प्रमाण पत्र देगा नहीं. महाराष्ट्रके मुख्यमंत्रीने उनके पर काट लिया है इस लिये वह भी अब ये नया गठबंधनमें सामिल होने जा रहा है.

गठ बंधनका  कोई भी नेता, नरेन्द्र मोदी के पैंगडेमें पैर रखनेके काबिल नहीं है.

अब जो विद्वान और मोदी-फोबियासे पीडित है वे और सर्वोदय वादी या गांधीवादी बचे है वे न तो गांधीवादी है न तो सर्वोदयवादी है. वे सब खत-पतवार (वीड) है. वे लोग सिर्फ अपने नामकी ख्याति के लिये मिथ्या आलाप कर रहे हैं.  

२०१९का चूनाव, भारतमें विवेचकोंकी, विद्वानोंकी और  मूर्धन्योंकी विवेक शक्तिकी एक परीक्षा स्वरुप है. १९७७में तो जयप्रकाश और मोरारजी देसाई जैसे गांधी वादी विद्यमान थे. इससे शर्मके मारे ये लोग जनतंत्रकी रक्षाके लिये बाहर आये. किन्तु अब ये लोग अपना कौनसा फरेबी रोल अदा करते हैं वह इतिहास देखेगा.

शिरीष मोहनलाल दवे

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किसी भी नगरको/ग्रामको/विस्तारको बदसूरत और गंदा कैसे किया जाय … 

गत ब्लोगमें हमने गोदरेज गार्डन सीटीकी व्यवस्थाका संक्षेपमें विवरण किया था. और यह प्रश्न चिन्ह लगाया था कि क्या गोदरेज गार्डन सीटी गंदा और अराजकता वाला विस्तार बनने के काबिल है?

हम कुछ गीने चूने परिबलोंका विवरण करेंगे.

किसी भी विस्तारको बदसूरत करनेमें और अराजकतायुक्त करनेमें प्रजाकी मानसिकता भी प्रभावशाली होती है. यदि नियम (बाय लॉज़ – कानून) बनानेमें उसकी उपेक्षा की तो “विस्तार”में अराजकता फैल सकती है. अराजकताकी शक्यताकी हम बादमें चर्चा करेंगे.

विस्तारको बदसूरत करने वाले परिबल, आकृति (डीज़ाईन)बनावटकी गुणवत्ताका चयन (स्पेसीफीकेशन)  और  कामकी कुशलता का मिश्रण है. यदि आकृति ठीक नहीं है तो क्षतिग्रस्त होनेकी क्षमता अधिक होती है. यदि आकृति सहीं हैकिंतु गुणवत्ता कनिष्ठ प्रकारकी है तो भी उसकी क्षतिग्रस्त होने की शक्यता अधिक है. यदि ये दोनों सही है लेकिन कामकी कुशलता (पुअर वर्कमेनशीप) यथा योग्य नहीं है तो भी वह निर्माण क्षतिग्रस्त हो सकता है.

निर्माण परिपूर्ण होनेके बाद ऐसे प्रकारके निर्माणके, रखरखाव में अधिक खर्च आता है. दुरस्त करने की गतिक्षतिग्रस्त होनेकी गति से कम है तो भी निर्माण गंदा बदसूरत हो सकता है.

एक बात ध्यानमें रखना चहिये कि हम जो उदाहरण लेते हैं वह आज तो छूटपूटकी घटनाए हैं. लेकिन यदि रखरखाव शिघ्राति  शिघ्र नहीं किया गया तो क्षतिग्रस्त विस्तारकी घटनाओं वाले स्थल, बढते जायेंगे और अंतमें विस्तार बदसूरत दिखेगा.

यातायात मार्गकी चौडाईः  आंतरिक मार्गकी चौडाई, आज तो जो दो लेन (१+१=२) वाली है वह सही लगती हैलेकिन भविष्यमे पांच सालके बाद) याता यातकी समस्या हो सकती है. मुख्य मार्ग जो चार लेनका (२+२=४) है उसके विषयमें भी ऐसा कहा जा सकता है.

08 good main road

आंतरिक मार्गोंकी और मुख्य्त मार्गोंकी  आकृतिसूचित गुणवत्ता और निर्माणकी गुणवत्ता सही है.

09 good internal street road

सायकल मार्ग (द्विचक्र वाहन यातायात) भी सही ही है.

किंतु पदयात्रीयोंके लिये जो मार्ग है उसकी आकृति और निर्माणकी गुणवत्ता सही नहीं है.

पेड पौधेंकी जो भूमि है वह नीची है और फुटपाथके दाहिने बाजु का स्तर उंचा हैऔर निर्माणकी वर्कमेनशीप पुअर होने से फुटपाथके किनारे के पत्थर निकल जाते है. यदि इनको शिघ्राति शिघ्र रीपेर किया जाय और किनारे वाले पेडपौधोंकी भूमि उंची कि जाय तो फुटपाथको क्षतिग्रस्त बनने की घटनाओंको रोका जा सकता है.

01 can break at any time

क़ोंट्राक्टरोंका अपना काम होनेके बाद सबस्टांडर्ड रीसरफेसींग वर्क.

05 gas agency does not reinstate properly

जैसे कि गेस एजंसी जब अपना लाईन बीठाती है तो जो खोदाई होती है उनको ढंगसे री-सरफेसींगका काम नहीं करती है. ईनमें गोदरेज प्रोपर्टीज़ की तरफसे शायद नीगरानी नहीं रक्खी गई है. तो इनकी क्षतिग्रस्त स्थलोंकी छूटपूट घटनाएं मिलती है.

मानवीय असभ्यताः
06 why to walk on footpath

रहेनेवालोंको भी नियमका पालन करना चाहिये. लेकिन यदि गोदरेज प्रोपर्टीज़वाले उनको दंडित नहीं करेंगे तो उनकी आदतमें सुधार लाना असंभव है.

 

यदि फुटपाथ है तो निवासीयोंको फुटपाथ पर चलने की आदत डलनी चाहिय

स्वच्छता पर आघात

पशुओंके प्रति दया भावना का प्रदर्शन करना भारतीयोंकी आदत है. इस आदतके गुणदोषमें  पडें परंतु यह दयाभावना के कारण गंदकी फैलानी नहीं चाहिये.

07 we want to feed animals at the cost of cleanliness

स्वच्छताके उपकरण और स्वच्छता कर्मचारीयोंकी नासमज़ः

सफाई कामदारोंकी समज़ है कि उनको केवल पेडपौधोंके पत्तेकागज़के टूकडे,प्लास्टिक बेग्ज़ और उसके टूकडे … आदि ही को कचरा समज़ना है. कुत्तोंकी वीष्टागाय भेंसका गोबर आदि को उठाना सफाईके अंतर्गत नहीं आता है. इसके कारण जब वे सुखकर मीट्टी बनजाता है तब वह हवामें उड जाता है.  वैसे तो गायभैंस कम दिखाई देते है इसलिये ऐसी घटनाएं  छूट पूट मिलतीं हैकिंतु भविष्यमें इनमें वृद्धि हो सकती है.

गोदरेज प्रोपर्टीज़का काम व्यापारी और निवासी आवास पैदा करना है  कि अवैध व्यवसाय दिलाना

गोदरेज गार्डन सीटी में कोमर्सीयल केंद्र है. सीटी सेंटरमें कई सारी सुयोग्य तरिकेसे निर्मित दुकाने हैं. इसका निर्माण परिपूर्ण नहीं हुआ होगा.

लेकिन हमारे कुछ व्यवसायी लोगोंको मुफ्त मे व्यवसाय करने की जगह चाहिये. इसकी दो वजह है. एकः यह कि पुलीस या तो सुरक्षा कर्मीको खुश रखना और मुफ्तमें जगहका व्यवसायके लिये उपयोग करना.

हाथ लारी” एक ऐसा ही व्यवसाय है. जिसमें व्यक्ति एक हाथ-लॉरीमें सब्जी-तरकारी फैलाके ग्राहकोंकी प्रतिक्षा करता है. और ग्राहक भी उसकी लॉरीमेंसे सब्ज़ी तरकारी खरीदता है.

प्रारंभमें एक हाथलॉरीवाला, एक हाथलॉरीमे सब्ज़ी लगाके एक मार्गकी फुटपाथ पर पार्ट टाईम खडा रहेता है.

फिर वह अपना खडा रहनेकी समय मर्यादा बढाता रहेता है.

05 hand lorry with spreaded material

फिर वह एक लॉरीमें तीन लॉरीका सामान लाता है. वह सामान फुटपाथ पर फैला देता है. फिर वह और किसमका भी सामान लाता हैजैसे कि नारीयलवॉटरमेलनकेले … आदि.

ऐसा करनेके समयके अंतर्गत उसकी सुरक्षा दलो सें पुख्ता दोस्ती हो जाती है. शायद उपरी स्तरके कर्मचारी/अधिकारीगणके साथ भी परोक्ष प्रत्यक्ष संबंध प्रस्थापित हो जाते है.

तो एक दुसरा हाथ लॉरीवाला भी पैदा हो जाता है. उसका  भी ऐसे ही इतिहासका पुनरावर्तन होता है. 

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फिर तो क्या कहेनाबलुन वाला आता हैखिलौना वाला आता हैगन्नेका रसवाला  जाता है. फुलवाला आता हैमोची आता हैपंक्चर रीपेरर आता है… ऐसे फुटपाथ पर अतिक्रमण बढता ही रहता है.

इसकालके अंतर्गत कई कर्मचारीगण/अधिकारीगणका तबादला होता रहेता है इस लिये किसीकी जीम्मेवारी फिक्स करना उच्चस्तरीय अधिकारीगण योग्य समज़ते नहीं है.

इस प्रकार समयांतर कालके अंतर्गत अराजकता फैल जाती है. गोदरेज गार्डन सीटीमें अराजकता के बीज बोये है. आज जो छूटपूट घटना है और जिसको निवारा जा सकता हैयदि गोदरेज गार्डन सीटीके अधिकारीयोंकी मानसिकता यही रही तो पांच सालमें अराजकता फैल सकती है.

अग्निशामक तकनिकी सुविधाएं और उसके नियमके अंतर्गत प्रावधान

अग्निप्रतिरोधक उपकरण, अग्निशामक व्यवस्थाएं और आपातकालिन व्यवस्था रखना आदिके बडे कठिन नियम है. उसमें एक नियम है बहु मंज़िला इमारतमें आपातकालमें निवासीयोंको निश्चित जगहसे उठानेका. इस जगहको फायर रेफ्युज खंड (फायर रेस्क्यु रुम) कहेते है. निश्चित मंज़िल पर दो ऐसे खंड आमने सामनेकी दिशामें छोर पर रक्खे जाते है. दो इस लिये कि यदि एक छोरका खंड आगके कारण उस आगकी दिशामें उपलब्ध नहीं होता है तो तो दुसरा छोरवाला खंड काममें  जाता है. निवासीयोंको वहां इकठ्ठा करके क्रॅनकी मददसे बचाया जा सकता है. फायर रेस्क्यु खंड एक स्वतंत्र खंड होता है. उसमें  तो कोई निवासी अपना सामान रख सकता है  तो उसका नीजी उपयोग कर सकता है. इस खंडको बंद करना निषेध है. इस खंडमें प्रवेश होता है पर द्वार नहीं रखा जा सकता. उसी प्रकार उसमें गेलेरी होती है उसमें उसको बंद करनेकी खीडाकीयां नहीं होती. ता कि आपात कालमें आसानीसे निवासीयोंको निकाले जा सके.

लेकिन यहां गोदरेज गार्डन सीटीके बहुमंज़िला इमारतोमें इसका अक्षरसः पालन नहीं किया गया. दोमेंसे एक फायर रेस्क्यु खंडको करीबी निवासीको ऐसे ही व्यक्तिगत उपयोगकी सुविधा दे दी गई है.

01 fire rescue room02 break open wall of Fire rescue room

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नियम के अनुसार फायर रेस्क्यु खंड को कोई निवासी अपने अंगत स्वार्थ के लिये उपयोगमें ले नहीं सकता. किंतु गोदरेज गार्डन सीटीके अधिकारीयोंने फायर रेस्क्यु खंडमें विशेष वीज सुविधा भी उपलब्ध करवायी है. फायर रेस्क्यु खंडमें वीज सुविधा होती है. और उसमें एक लेंप होल्डरका प्रावधान होता है. सामान्य परिस्थितियोंमे इस लेंप होल्डरमें लेंप    लगाना होता है ताकि असामान्य परिस्थितिमें लेंपका अन्वेशण करना न पडे. रेस्क्यु खंड दो होते है. एक मुख्य और एक विकल्पके लिये अतिरिक्त (स्टेंड बाय). कौन मुख्य और कौन विकल्प केलिये अतिरिक्त यह कोई नामाभिधानका विषय नहीं है. दोनों ही एकदुसरेके परिपेक्ष्यमें विकल्पीय है. जैसे की दो स्टेर केस होते है  तो एक यदि आग की घटनामें उपलब्ध नहीं है तो दुसरा जो सामने के छोर पर है वह उपलब्ध होता ही है. तो यहां गोदरेज गार्डन सीटीमें क्या हुआ कि निवासीको फेसीलीटेट करने के लिये उसके पासवाले रेस्क्यु खंडमे तो दिवारको तोडके प्रवेश द्वार तो लगवाही दिया पर उसके लिये फायर रेस्क्यु खंडमें लेंप भी लगवा दिया और ट्युबलाईटभी लगवा दिया. अब फायर रेस्क्यु खंडकी बीजलीका कंट्रोल किसके पास है और उसका विद्युत का बील किसको आता है यह संशोधन का विषय है.

भारतमें और खास करके उत्तरभारतीयोंकी (खास करके राजस्थान, पंजाब, यु.पी, बिहार और गुजराती भी कम नहीं) आदत है कि गैरकानूनी तरीके से उपलब्ध जगहोंका उपयोग करना. और अधिकारीगण/कर्मचारीगण भी वैसे ही चरित्रवाले होनेसे अवैध तरीकेसे आंखे बंद कर देते है.

इसका समाधान क्या है?

कौटिल्यने कहा है कि, आमजनता तो “दंड” से ही सावधान रहेती है. 

“गोदरेज गार्डन सीटी”में और क्या करने कि आवश्यकता है?

गोदरेज गार्डन सीटी बडी आसानीसे स्मार्ट सीटी विस्तार बन सकता है. अभी तो यह विकसित हो ही रहा है तो इसमें अभीसे जनताको सुव्यवस्थित और सुसंस्कृत की जा सकती है.

(१) प्रत्येक मार्ग पर जैसे कि मुख्य मार्ग पर गति-सीमा ४० कि. आंतरिक मार्ग पर १५ कि. और क्लस्टरके अंदर ५/१० कि. की सीमा रक्खी जा सकती है. गतिसीमा के सूचना बॉर्ड रखना चाहिये.

(२) प्रत्येक प्रवेशद्वार के पास सीसीटीवी केमेराका प्रबंध किया जाना चहिये.

(३) प्रत्येक क्लस्टरमें सदस्यके लिये स्मार्टकार्डसे प्रवेश किया जा सकता है,

(४) प्रत्येक बिल्डींगमे प्रत्येक स्तर (फ्लोर) पर भी सीसीटीवी केमेरा का प्रबंध होना चाहिये. सुरक्षा कर्मचारी निवासीसे बात करके सुनिश्चित करेगा कि आगंतुक को प्रवेश देना है या नहीं, यदि निवासीने अनुमति दी, तो वह आगंतुक वहीं पर ही गया या कहीं और गया.

(५) प्रत्येक मार्ग पर भी सीसीटीवी केमेरा का प्रावधान किया जाना चाहिये ताकि सभी कोई सज्जनता पूर्वकका व्यवहार करें और यातायातके नियमोंका भंग करनेसे बचे.

(६) सीसीटीवी केमेरासे अतिक्रमण पर कडा निरीक्षण रखा जा सकता है.

कर्मचारीको नियमपालनके लिये प्रतिबद्ध होना चाहिये. यदि ऐसा नहीं हुआ तो समज़ लो 

अराजकताका आरंभ है.

 

शिरीष मोहनलाल दवे

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My blood is boiling on the episode of Jinna Nehru University (JNU), and the reaction of Pseudo-s which includes Nehruvian Congress and its culturally associates gangs inclusive of some of the media. These people are trying to present this case to make it political and as a conflict between two parties viz. BJP and Anti-BJPs. These people are illogical and talks without material or they talk with misinterpreted material. Expose these traitors. Hit them back very hard. Ask the Government to arrest them and to prosecute them.

जे.एन.यु. जीन्ना नहेरु युनीवर्सीटी, मार दिया जाय, न कि, छोड दिया जाय. पार्ट – ३

मेरा रक्त उबल जाता है, जब जीन्ना नहेरु विश्वविद्यालय की घटना पर दंभी और ठग लोगोंकी प्रतिक्रिया और चापलुसी देखता हूँ.
ये सब लोग कुछ वकीलोंके लॉ हाथमें लेनेकी घटना पर अत्याधिक कवरेज देते हैं. और देश विरोधी सुत्रोंको न्यायलयके अर्थघटनके हवाले छोड देते हैं.

क्या उनका शाश्वत ऐसा चरित्र रहा है?

वे कहेते हैं कि वकीलोंका काम न्यायालय के द्वारा न्याय दिलाना है, और यहां पर वकील स्वयं न्याय देने बैठ गये.

तथा कथित महानुभावोंका यह तर्क आंशिक रुपसे सही है.

लेकिन सभी वकीलोंको आप मात्र ही मात्र वकीलके रुपमें नहीं देख सकतें. वकील भी शाश्वत वकील नहीं होता है. वह भी आवेशमें आ जाता है. देशप्रेम एक ऐसी संवेदनशील अभिव्यक्ति है कि, कोई भी देशप्रेमी आवेशमें आजा सकता है. याद करो, सुभाषचंद्र बोस, अपनी बिमार मां को छोडके देशप्रेमके कारण निकल पडे थे.

एक और जो कदाचित कुछ लोगोंको अप्रस्तूत लगे तो भी इसको समज़े.

वकीलोंको कभी आपने स्ट्राईक जाते देखा है?

हाँ अवश्य देखा है.

वकीलोंका काम न्यायालय के द्वारा न्याय दिलाना है, और यहां पर वकील स्वयं न्याय देने बैठ गये. क्या वे स्वयंको न्याय दिला नहीं सकते हैं? यदि ऐसा ही है तो वे वकील बने ही क्यों? लिकिन मैंने देखा है कि कोई वर्तमान पत्रने वकीलोंकी ट्राईकके बारेमें ऐसी टीका की नहीं.
तब ये उपरोक्त महानुभावोंका तर्क “वकीलोंका काम न्यायालय के द्वारा न्याय दिलाना है” कहां गायब हो जाता है?
याद रक्खो, इसमें आक्रमक वकीलका कोई स्वार्थ नहीं था.
वकीलकी पतियाला कॉर्टकी घटनाको उसके परिपेक्ष्यमें लेनी चाहिये और सीमा के बाहर जाके महत्व देना नहीं चाहिये. क्राउडकी आवेशकी अभिव्यक्ति और प्रतिक्रिया भीन्न होती है इस बातको बहुश्रुत विद्वानोंको समज़ना चाहिये.

आप कहोगे कि यह तर्क जे.एन.यु. के छात्र समूहको क्यों लागु करना नहीं चाहिये?

आप घटनाक्रम देखिये और प्रमाणभानकी प्रज्ञा और प्राथमिकता की प्रज्ञाका उपयोग किजीये.

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रमाणित एक आतंकवादीको सज़ा दी.
आप कहोगे कि क्या सर्वोच्च न्यायालयके दिये हुए न्याय के विरुद्ध बोलनेकी आज़ादी नहीं है?

हां न्यायालयके दिये हुए न्याय के विरुद्ध बोलनेकी आज़ादी है.

लेकिन सभी आज़ादी असीमित नहीं है. न्याय मात्र, माहिति, तर्क और घटनाचक्रसे संलग्न होता है. यदि आतंकीको न्याय दिलाने के लिये कन्हैया और उसके साथीयोंके पास कुछ और, माहिति थी तो आतंकीको बचाने के लिये उन्होंने उस माहितिको, न्यायालयके सामने प्रस्तूत क्यूँ नहीं किया?

कन्हैया और उसके साथीयोंका उत्तरदायित्व

कन्हैया और उसके साथीयोंका सर्वप्रथम यह उत्तरदायित्व बनता है कि इस बातको समज़ाएं. दुसरी बात यह है कि यदि उनके पास जो माहिति और तर्क है उससे वे जनता को समज़ावें कि कैसे वह आतंकी निर्दोष था. सुत्रोच्चार करनेसे सत्य सिद्ध नहीं हो जाता है.

विश्वविद्यालय एक शिक्षण संस्था है. शिक्षण संस्था और न्यायालय दोनोंका क्षेत्र भीन्न भीन्न है. शिक्षण संस्थाका उपयोग कन्हैया और उसके साथीयोंने जो किया इससे शिक्षण संस्थाके कार्यमें बाधा पडती है. शिक्षाका अधिकार भी मानव अधिकार है. इसका हनन करना मानव अधिकारका हनन है. यदि यह शिक्षा संस्था सरकारी है तो सरकारी सेवामें बाधा डाली है ऐसा अर्थघटन भी अवश्य हो सकता है. उतना ही नहीं एक संस्था जिस कार्यके लिये है उसके बदले उसका उपयोग जबरदस्तीसे दूसरे कार्यमें किया गया वह भी गुनाह बनता है.

जनतंत्र संवादसे चलाता है

बिना तर्क, और वह भी देशके विरुद्ध और देशका विभाजन, देशके समाजका विभाजन और विघातक बातोंको फैलाके जनताको गुमराह करना जघन्य अपराध ही बनता है. बिना तर्क, बिना तथ्य और देशके विरुद्ध बात करनेकी आज़ादी किसीको नहीं दी जा सकती. जनतंत्र संवादसे चलाता है, सूत्रोंसे और महाध्वनिसे नहीं.
न्यायके लिये न्यायालय है. न्यायालयके सुनिश्चित प्रणालीयोंके द्वारा ही न्याय लेना तर्कसंगत है. यदि ऐसा नहीं हुआ तो अराजकता फैल जायेगी. यदि कोई अराजकता फैलानेकी दिशामें प्रयत्न करता है तो उसको देशद्रोह ही समज़ना पडेगा.

Coterie Dance of Nehruvian Congress of India Private Limited(Curtsy of the Cartoonists)

वितंडावादी पत्रकारित्व और अफवाहें

एक समाचार पत्रके कटारीयाभाईने (केतन भगतभाईने) जे.एन.यु. की घटनाकी प्रतिक्रियाको बीजेपी और एन्टी-बीजेपीका मामला बताया. कुछ समाचार पत्रोंने इस प्रतिक्रियाको “बीजेपीका दांव निस्फळ” ऐसा सिद्ध करने की कोशिस की.

एक समाचार पत्रने एक ऐसा तर्क दिया कि “गांधीवादी साहित्य यदि किसीके पाससे मिले तो वह गांधीवादी नहीं हो जाता है, उसी तरह यदि किसीके पाससे आतंकवादी साहित्य मिले तो वह आतंकवादी नहीं बन जाता”.

आमकक्षाके व्यक्तिको इसमें तथ्य दिखाई दे यह संभव है.

किन्तु सूत्रोंका अर्थघटन, उनको अलिप्त (आईसोलेटेड) रखकर, घटनाका अर्थघटन, घटनाको अलिप्त रखकर, वास्तविक सत्यको समज़ा नहीं जा सकता.

निम्न लिखित एक घटनाको समज़ो.

एक अश्वेत अपने घरमें बैठा था. इतनेमें खीडकी खूली और एक श्वेत शक्ख्स दिखाई दिया. तो अश्वेतने उसको गोली मार दी.
अब अश्वेत पर मुकद्दमा चला. न्यायाधीशने पूरी बातें सूनके अश्वेतको निर्दोष बताया. यदि न्यायाधीश इस घटनाको आईसोलेशनमें देखता तो?

किन्तु न्यायाधीशने इस घटनाका संदर्भ और माहोल देखा. वह जो माहोल था उसके आधार पर न्यायाधीशने उसको छोड दिया. वह क्या माहोल था? उस देशमें श्वेत और अश्वेत आमने सामने आगये थे. श्वेत लोगोंने हाहाकार मचा दिया था. श्वेत लोग, अश्वेतको देखते ही गोली मारने लगे थे. इसमें अफवाहें भी हो सकती है.

माहोल ऐसा था. वह अश्वेत अपने घरमें बैठा था. खीडकी खूली और एक श्वेत शक्ख्स दिखाई दिया. तो अश्वेत बहूत गभरा गया. अश्वेतको लगा कि वह श्वेत उसको गोली मार देगा. अश्वेतके पास बंदूक थी उसने गोली मार दी. वास्त्वमें वह श्वेत तो एक सीधा सादा निर्दोष श्वेत था.

कश्मिरमें हिन्दुओंके साथ क्या हुआ?

नहेरुवीयन कोंग्रेसके नहेरुवीयन फरजंद राजीव गांधीकी केन्द्रमें सरकार थी. उसकी सहयोगी सरकार कश्मिरमें थी. हिन्दुओं पर यातनाएं बढ रही थीं. १९८७से मुस्लिमोंने आतंककी सभी सीमाए पार कर दी. मस्जीदोंसे लाउड स्पीकर बोलने लगे. दिवारोंपर पोस्टर चिपकने लगे, समाचार पत्रोंमे चेतावनी छपने लगी, लाउड स्पीकरके साथ घुमने वाले वाहनोंमेसे लगातार आवाज़ निकलने लगी कि ऑ! हिन्दुओ ईस्लाम कबुल करो या तो कश्मिर छोडके भाग जाओ. यदि ऐसा नहीं किया तो मौतके लिये तैयार रहो. कश्मिर सिर्फ मुस्लिमोंका है. मुस्लिम लोग इश्तिहारमें कट-ऑफ डेट भी बताते थे.

नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके सांस्कृतिक साथी पक्षोंने भारतकी जनताको अनभिज्ञ रक्खा.

समाचार माध्यम मौन रहे.

कश्मिरकी सरकार निस्क्रीय रही.

सुरक्षा दल निस्क्रीय रहा. ३०००+ हिन्दुओंकी खुल्ले आम कत्ल हुई. ५०००००+ हिन्दुओंको भगाया.

अपने ही देशमें हिन्दु निर्वासित हो गये वे भी आज तक २५ साल तक.

न कोई गिरफ्तारी हुई,

न कोई एफ.आई.आर. दर्ज हुई,

न कोई जांच एजन्सी बैठी,

न कोई मानव अधिकारकी बात हुई,

न कोई इस्तिफा मांगा गया,

न तो हिन्दुओंकी तरफसे कोई प्रतिकार हुआ.

न कोई फिलम बनीं,

न कोई वार्ता लिखी गयी,

न किसीने मुस्लिम असहिष्णुता पर चंद्रक वापिस किये,

वास्तवमें हर कत्ल और हर निर्वासितके पीछे एक बडी दुःखद कहानी है

ऐसे कश्मिरके कुछ लोग जे.एन.यु. में आये और उन्होंने आजादीके सुत्रोच्चार किया. भारतको टूकडे टूकडे करनेकी बात की, और हमारे दंभी मूर्धन्य विश्लेषक महानुभाव इन सुत्रोंको आईसोलेशनमें रखकर अर्थघटन करके बोलते है कि कोई गद्दारीका केस नहीं बनता.

वास्तवमें तो जो आज़ादीकी बाते करते हैं उनको दुसरोंके यानी कि, कश्मिरी हिन्दुओंके मानव अधिकारोंकी रक्षा करना चाहिये. जो दुसरोंके मानव अधिकारोंका हक्क छीन लेते हैं और दशकों तक उनको वंचित रखते हैं. ऐसे लोगोंका आज़ादीकी बात करनेका हक्क बनता नहीं है. और वैसे भी उनको कौनसी आज़ादी चाहिये और किससे आज़ादी चाहिये? कौनसा संविधान चाहिये? कश्मिर तो भारतीय संस्कृतिका अभीन्न अंग है. वहां उनकी ही त सरकार है.

महात्मा गांधी और आतंकी का फर्क समज़ो

“गांधी साहित्य घरमें रखनेसे कोई गांधीवादी माना नहीं जा सकता” इसका हम विश्लेषण करें

गांधीवादी साहित्य एक विचार है. उसमें तर्क है. गांधीवादी बनना एक लंबी प्रक्रिया है.

आतंकवाद एक आवेश है आतंकवाद एक संकूचित आचार है.

आतंकवाद विभाजनवादी है और विघातक है. आतंकवादीका मनोविष्लेषण करना एक शैक्षणिक वृत्ति हो सकती है.

चूंकि गांधी साहित्य और आतंकवादी साहित्य एक दुसरेसे विरुद्ध है, जिनके पास आतंकवादी साहित्य होता है उसको सिद्ध करना होता है कि उसका आतंकवादसे कोई संबंध नहीं है. आतंकवाद प्रस्थापित न्यायप्रणाली और जनतंत्र के विरोधमें है इस लिये वह समाजके लिये घातक भी है. जिन लोगोंके पाससे ऐसा साहित्य मिलता है, उसकी प्रश्नोत्तरी होती है, उसके साथीयोंकी, संबंधीयोंकी, रिस्तेदारोंकी भी प्रश्नोत्तरी होती है. यदि उसमें विरोधाभास मिले तो उसका आतंकवादीयोंसे संबंध सिद्ध हो जाता है.

डरपोक नारेबाज़

एक सूत्रोच्चारी भगौडेके पिताश्रीने कहा कि उसका पुत्र देशद्रोही नहीं है. जब उसके पुत्र द्वारा किये गये देशविरोधी सुत्रोच्चारके बारेमें उससे प्रश्न पूछा गया, तो उसने कहा कि उसका निर्णय अदालत को करने दो. जो दिखाई देता है वह उसको देखना नहीं है. आज़ादीके नारे लगानेवाला खुदके लिये सुरक्षाकी मांग करता है. वह भूल जाता है कि आज़ादीकी लडत तो निडर लोगोंका काम है. क्या गांधीजी और शहिद भगत सिंहने कभी ब्रीटीश सरकारसे सुरक्षाकी मांग की थी?
अराजकताका माहोल बनाना चाहते हैं

कई दंभी समाचार माध्यम समाजके विघातक परिबलोंको उत्तेजित करते है. अनामत उसका उत्तम उदाहरण है. ये समाचार माध्यमके लोग इसकी तात्विक और तार्किक चर्चा कतई नहीं करते. जाटों और पाटीदारोंके अनरेस्टके समाचारोंको बेहद कवरेज देतें हैं ताकि उनका उत्साह बढे. ये लोग ऐसा माहोल बनाते है कि सरकार उनकी समस्यामें बराबर फंसी है. समाचार माध्यम सरकारकी निस्फलता पर तालीयां बजाता है. समाजके इन वर्गोंकी विघातक प्रवृत्तियोंको समाचार माध्यम उजागर नहीं करता और न हि उसकी बुराई करता है. मार्ग यातायात रोक देना, रेलको उखाड देना, रेल रोकना, रेलरुटोंकों रद करनेके कारण रेलको नुकशान होना, बस स्टोपोंको जला देना, पूलिस चौकीको जला देना, आदिकी निंदा ये समाचार माध्यम कभी नहीं करता. लेकिन पूलिस एक्सन पर इन्क्वायरी की मांगको और पूलिस एक्सेसीस की मांगको उजागर करते हैं और उसको ही कवरेज दिया करते है. जाट और पाटीदार के समाचार साथ साथ देते हैं ताकि पाटीदारोंका उत्साह बढे और फिरसे जोरदार आंदोलन करें ताकि समाज जीवन अस्तव्यस्त हो जाय. और वे जनता को बतादें कि देखो बीजेपीके राजमें कैसी अराजकता फैल गयी है.

शिरीष मोहनलाल दवे

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