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एक गठबंधन नहेरुवीयन कोंग्रेसके विरुद्ध  और एक गठबंधन बीजेपीके विरुद्ध

केन्द्रीय स्तर पर गठ बंधन सर्व प्रथम १९७१में हुआ.

१९६७के  पहेले मोरारजी देसाई के पास कोई पद नहीं था. लाल बहादुर शास्त्रीके अवसानके बाद लोकसभाके नेताका चूनाव हूआ. मोरारजी देसाईकेे पास  कोई मंत्रालय नहीं था.  उन्होने प्रधानमंत्रीके प्रत्याषी के लिये आवेदन दिया और वे १६९ मत ले आये. इससे केन्द्रीय कारोबारी चकित हो गयी. केन्द्रीय कारोबारी तो उनको अधिकसे अधिक ६९ मत मिलेंगे ऐसा मानती थी. उस समय कोंग्रेस संसदमें एक विराट पक्ष था. १९६७के चूनावमें कोंग्रेस संसदमें काफि कमजोर हो गई थी. मोरारजी देसाई एक सशक्त नेता थे. तो उनको मंत्री बनाना जरुरी था.

१९६७ के चूनावके बाद  विपक्ष का गठबंधनका विचार सर्व प्रथम डॉ. राममनोहर लोहियाको आया था. उन्होनें कहा कि (नहेरुवीयन) कोंग्रेस तब तक राज करकर सकती है जब तक विपक्ष चाहे. इसका अर्थ यह था कि विपक्ष यदि चाहे तो एक जूट होकर कोंग्रेसको हरा सकता है. क्यों कि, कोंग्रेसको ४२% के अंदर मत मिले थे. और जो गठबंधन कर सके ऐसे पक्ष और वैसे ही कुछ अपक्ष मिल जाय तो (साम्यवादी पक्षोंको छोड कर भी) विपक्षको ४२% से अधिक मत मिल सकते है. विपक्ष एकजूट न होनेके कारण कोंग्रेसको बहुमत मिलता है. १९६७के चूनावमें विरोध पक्ष विभक्त होने के कारण और ४२%से कम प्रतिशत मत मिलने पर भी  कोंग्रेस बहुमत सीटें २८३   प्राप्त कर ली थी. वैसे ये संख्या  बहुमतसे थोडी ही अधिक थी. विपक्षको २३७ सीटें मिली थी जिसमें जिसमेंसे साम्यवादीयोंकी ४२ सीटें को यदि छोड दें तो १९५ सीटें बनती थी.

जब १९६९में नहेरुवीयन कोंग्रेसका विभाजन हुआ तो कोंग्रेस (ओ) की ६५ सीटें विपक्षमें आ गई. और नहेरुवीयन कोंग्रेसकी सीटें २८३-६५=२१८ हो गई.  लेकिन इन्दिरा गांधीने साम्यवादी पक्षोंका, कुछ पीएसपी के संसद सदस्योंका, अकालीदल, डीएमके, रिपब्लीकन, अपक्ष आदि पक्काषोंके सदस्योंका सहारा लेके बहुमत जारी रक्खा. लेकिन यह गठबंधन अधिक चलनेवाला नहीं था. इसलिये १९७१में चूनाव घोषित किया. लेकिन ये दो वर्षके अंतरर्गत कोंग्रेस(ओ)मेंसे आधे लोग इन्दिराके गुटमें आगये थे.

ग्रान्ड एलायन्स

१९७१के चूनावमें विपक्षका गठबंधन हुआ, जिसको अखबार वालोंने ग्रान्ड एलायन्स नाम दिया. इसमें कोंग्रेस (ओ), जनसंघ, स्वतंत्र पक्ष, पीएसपी, संयुक्त समाजवादी पक्ष समाविष्ट थे. ये लोग छोटे छोटे कई पक्षोंको गठबंधनमें सामील होनेको मना नहीं सकें.

इस चूनावमें सबसे महत्त्वकी भूमिका अखबारवालोंने निभायी. जो लगातार बेंकोका राष्ट्रीय करण, महाराजाओंके प्रीवीपर्सकी नाबुदीको और पक्षमें सीन्डीकेटके वर्चस्वको इन्दिरा गांधीने कैसे नष्ट किया और अपने प्रत्याषीको राष्ट्रप्रमुखके चूनावमें कैसे सिफत पूर्वक हराया  … इन सब बातोंकोआवश्यकतासे कहीं अधिक ही प्रसिद्धि दे रहे थे. वैसे तो कोंग्रेसके प्रत्याषीके विरुद्ध प्रचार करनेमें इन्दिराके ईशारे पर कई सारी बिभत्स बातों वाले पेम्फ्लेट बांटे गये थे, उसका विवरण हम अभी नहीं करेंगे.  थोडा जातिवाद भी था. 

इनबातोंको छोड देवें और १९७१के गठबंधन की बात करें तो मीडीया प्रचारके कारण इन्दिरा कोंग्रेसकी जीत हुई.

इन सबको मिलाके इन्दिरा गांधीकी कोंग्रेसको ४४ % मत मिले.

गठबंधनको २४% मत मिले.  और गठबंधनके सभी पक्षोंकी सीटें कम हो गई. बडा लाभ इन्दिरा कोंग्रेसको हुआ और कुछ फायदा छोटे छोटे पक्षोंको हुआ.

इन्दिरा कोंग्रेसको  ३५२ सीटें मिलीं

गठबंधनको ५१ सीटें मिलीं

साम्यवादीयोंको ४८   सीटें मिलीं

(साम्यवादीयोंने जहां पर खुदका प्रत्याशी नहीं था वहा पर इन्दिरा कोंग्रेसका समर्थन किया था)

छोटे छोटे प्रादेशिक पक्ष और अपक्षोंको ६७  सीटें मिलीं.

विपक्षकी हारका कारण क्या था?

(१) क्या विपक्ष लोकप्रिय नहीं था?

विपक्ष अतिलोकप्रिय था. उनके प्रवचनको लोग आदर पूर्वक सूनते थे.

(२) क्या विपक्षमें उच्च कोटीके नेता नहीं थे?

विपक्षके नेता अत्यंत उच्च कोटीके थे. स्वातंत्र्य संग्राम में उनका बडा योगदान रहा था. उनकी अपेक्षामें इन्दिरा गांधीका योगदान, न के बराबर था. चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, कामराज, कमलापती त्रीपाठी, मोरारजी देसाई, मनुभाई शाह, अतुल्य घोष, पटनायक, एच.एम.पटेल, सादोबा पाटिल, मधु दन्डवते, जोर्ज फर्नन्डीस, मधु लिमये, दांडॅकर आदि कई बडे नाम वाले विपक्षी नेता थे.

(३) क्या विपक्ष स्वकेद्री था?

कोई भी विपक्षी नेता किसी भी प्रकारसे स्वकेन्द्री नहीं थे.

(४) क्या विपक्ष सत्ताका लालची था?

मोरारजी देसाईको और सीन्डीकेटके नेताओं पर इन्दिरा कोंग्रेसवाले ऐसा आरोप लगाते थे. लेकिन उन्होंने कभी गैरकानूनी तरीके अपनाये नहीं थे. संयुक्त कोंग्रेसके समयमें केन्द्रस्थ कारोबारी बहुमतसे निर्णय लेती थीं. यह प्रणाली कोंग्रेसके संविधान और जनतंत्रके अनुरुप थी.

अन्य नेताओंके बारेमें यदि कुछ कहें तो सत्ता तो उनको  कभी मिली ही नहीं थी. और उनका ऐसा कोई व्यवहार नहीं था कि उनके उपर ऐसा अरोप लग सके.

(५) क्या विपक्ष वंशवादी था?

स्वातंत्र्य संग्रामके नेतागण इस समय विद्यमान थे. इसलिये ऐसा कोई प्रश्न ही नहीं उठता था.

(६) क्या विपक्षने गैर कानूनी तरीके अपनाये थे?

विपक्ष संपूर्ण रीतसे कानूनका आदर करता था. वास्तवमें ऐसे आरोप तो इन्दिराके उपर और उसकी कोंग्रेसके नेता पर लग रहे थे.

(७) क्या विपक्षके नेताओंकी भूतकालकी कार्यवाही कलंकित थी?

विपक्षके नेताओंका भूतकाल उज्वल था. और सब लोगोंने एक या दुसरे समयमें गांधीजीके साथ काम किया था और अन्य विपक्षी नेता आई.सी.एस. अफसर रह चूके थे.

(८) क्या विपक्षके नेताओंका समाजके प्रति कोई योगदान नहीं था?

आम जनताके हितमें और देशके हितमें वे सब संसदमें सक्रीय रहेते थे. जो लोग अविभक्त कोंग्रेसमें थे उनका अपने विभागके प्रति अच्छा योगदान रहा था. यदि खराब और विवादास्पद रहा हो तो वह नहेरुका खुदके मंत्रालयका कार्य और उनके मित्र वी.के. मेननके संरक्षण मंत्रालयका काम कमजोर रहा था जिनकी विदेश नीति और संरक्षण नीतिके कारण  आज भी भारतको भूगतना पड रहा है.

तो फिर इन्दिरा गांधी जीती कैसे?

(१) जब अविभक्त कोंग्रेसका विभाजन हुआ तो जो कोंग्रेसके जो संगठन कार्यालय थे उनके अधिकतर कर्मचारी और अन्य नेता इन्दिरा गांधीके समर्थनमें रहे.

इसमें अपवाद था   गुजरात. क्यों कि गुजरातमें मोरारजी देसाई का संगठन सक्षम रहा था. अन्य सब जगह जो क्षेत्रीय नेतागण थे वे कोंग्रेसके नामपर ही चूनाव जीतते थे.

(२) देशके युवा वर्गने  कभी ऐसा उच्चस्तरीय सियासती विखवाद देखा ही नहीं था.

(३) इन्दिरा गांधीका कहेना था कि मेरे पिता तो देशके लिये बहूत कुछ करना चाहते थे लेकिन ये बुढे लोग उनको करने नहीं देते थे. वैसे तो किसी समाचार माध्यमने या तो विवेचकोंने इसका विवरण इन्दिरा गांधीसे पूछने योग्य समज़ा नहीं. और समाचार माध्यम भी संरक्षणकी क्षतियोंको भी कोंग्रेस(ओ)की क्षति मानता था और मनवाता था क्यों कि केन्द्रीय  मंत्रीमंडलका निर्णय सामुहिक होता है.

(४) अविभक्त कोंग्रेसको जो आर्थिक दान मिलता था वह प्रान्तीय (राज्यका) सर्वोच्च नेता द्वारा संचित होता था और उसका वहीवट भी प्रान्तका सर्वोच्च नेता ही करता था. लेकिन इन्दिरा गांधीने उस दान और वहीवटको अपने हाथमें ले लिया.

(५) बेंकोंका जो राष्ट्रीयकरण हुआ तो इससे इन्दिरा कोंग्रेसके स्थानिक और कनिष्ठ नेताओंकी सिफारिस पर निम्नस्तरके लोगोंको ऋण मिलना चालु हो गया, और उसमें भी स्थानिक कनिष्ठ नेता अपना कमीशन रखके करजदारको कहेता था कि यह कर्ज परत करना आवश्यक नहीं है. और इस प्रकार शासक पक्षका बेंकोंके वहीवटमें हस्तक्षेप बढ गया और बढता ही गया. और यह बात एक प्रणाली बन गया. जो अभी अभी जनता बेंकोके  एन.पी.ए.के विषयमें जो कौभाण्ड के किस्से से अवगत हो रही है, उनके बीज और उनकी जडें १९६८में शुरु होई. फर्जी नामवाला सीलसीला भी चालु हो गया था.

(६) नहेरुने आम जनताको शिक्षित बनानेमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं ली थी. इसलिये आम जनता, ईन्दिरा-प्रवाहमें आ जाती थी.  

(७) इन्दिरा गांधी सत्ता पर थी और उस समय सरकारी अफसर गवर्नमेंटको कमीटेड रहेते थे क्यों कि नेताओमें और खास करके उच्च स्तरके नेताओमें भ्रष्टाचार व्यापक रुपसे नहीं था.   

(८) इस इन्दिरा-प्रवाहको  प्रवाह किसने बनाया?  राष्ट्रप्रमुखके चूनावमें अविभक्त कोंग्रेसके सूचित प्रत्याषी संजीव रेड्डीके विरुद्ध इन्दिराके सूचित प्रत्याषी वीवी गिरीके विजयकी भारतके विद्वानोंने और विवेचकोंने, प्रशंसा की थी इस कारणसे जनताको इन्दिरा गांधी सही लगी. कुछ लोग अन्यमनस्क भी हो गये.

परिणाम स्वरुप क्या हुआ? विधिकी वक्रता

सबकुछ मिलाके इन्दिरा गांधीके पक्षकी विजय हुई.

सीन्डीकेटकी हार हुई. कोंग्रेस (ओ) की सिर्फ मोरारजी देसाईके गुजरातमें जित हुई वह भी सीमित जीत हुई. अन्य पक्ष भी सिकुडकर रह गये.

अपने पक्षके प्रत्याषीको मत न दे के, अन्य पक्षके प्रत्याषीको मत देना दिलवाना, अपने स्वार्थको ही देखना, पक्षांतर करना “आया राम गया राम”, पैसोंकी हेराफेरी करना, हवामें बात करना, जूठे आरोप लगाना, अफवाहें फैलाना, कुछ भी बोल देना और अंतमें “जो जीता वह सिकंदर” … ऐसी अनीतियोंको  विद्वानोंने और विवेचकोंने स्विकृति दी और प्रमाणित भी कर दी. यह एक विधिकी वक्रता थी.

बीना कोई सबूत अपने पिताके सहयोगीयों पर बे बुनियाद आरोप लगाना, पूर्व पाकिस्तानसे आये हिन्दीभाषी मुस्लिमोंको वापस भेजनेकी समस्याको निलंबित करना, राजकीय मूल्योंकी अवमानना करना, भ्रष्टाचारको निम्नस्तरके लोगों तक प्रसारित करना, व्हाईट कोलर मज़दुर संगठनोंको सीमासे बाहर का महत्व देना, कर्मचारीयोंमे अनुशासन को खत्म करना … यह सब परिबळोंका विकास होना शुरु हो गया था. इन्दिराको, नहेरुके साथ रहेनेसे एक  कोट भेंट मिला था. उस मींक कॉटको सरकारमें जमा करवाने के बदले इन्दिरा गांधीने अपने कब्जेमें रख लिया था, यह बात आचार संहिताके विरुद्ध थी,  लेकिन ये सब इन्दिरा गांधीके ऋणात्म कार्यों को (अल्पदृष्टा) विद्वानोंने और समाचार माध्यमोंने अनदेखा किया.

इन्दिरा गांधीका एक ही सूत्र था कि गरीबी हटाओ.

क्रमशः

शिरीष मोहनलाल दवे

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