Feeds:
Posts
Comments

Posts Tagged ‘आपातकाल’

किसी भी नगरको/ग्रामको/विस्तारको बदसूरत और गंदा कैसे किया जाय … 

गत ब्लोगमें हमने गोदरेज गार्डन सीटीकी व्यवस्थाका संक्षेपमें विवरण किया था. और यह प्रश्न चिन्ह लगाया था कि क्या गोदरेज गार्डन सीटी गंदा और अराजकता वाला विस्तार बनने के काबिल है?

हम कुछ गीने चूने परिबलोंका विवरण करेंगे.

किसी भी विस्तारको बदसूरत करनेमें और अराजकतायुक्त करनेमें प्रजाकी मानसिकता भी प्रभावशाली होती है. यदि नियम (बाय लॉज़ – कानून) बनानेमें उसकी उपेक्षा की तो “विस्तार”में अराजकता फैल सकती है. अराजकताकी शक्यताकी हम बादमें चर्चा करेंगे.

विस्तारको बदसूरत करने वाले परिबल, आकृति (डीज़ाईन)बनावटकी गुणवत्ताका चयन (स्पेसीफीकेशन)  और  कामकी कुशलता का मिश्रण है. यदि आकृति ठीक नहीं है तो क्षतिग्रस्त होनेकी क्षमता अधिक होती है. यदि आकृति सहीं हैकिंतु गुणवत्ता कनिष्ठ प्रकारकी है तो भी उसकी क्षतिग्रस्त होने की शक्यता अधिक है. यदि ये दोनों सही है लेकिन कामकी कुशलता (पुअर वर्कमेनशीप) यथा योग्य नहीं है तो भी वह निर्माण क्षतिग्रस्त हो सकता है.

निर्माण परिपूर्ण होनेके बाद ऐसे प्रकारके निर्माणके, रखरखाव में अधिक खर्च आता है. दुरस्त करने की गतिक्षतिग्रस्त होनेकी गति से कम है तो भी निर्माण गंदा बदसूरत हो सकता है.

एक बात ध्यानमें रखना चहिये कि हम जो उदाहरण लेते हैं वह आज तो छूटपूटकी घटनाए हैं. लेकिन यदि रखरखाव शिघ्राति  शिघ्र नहीं किया गया तो क्षतिग्रस्त विस्तारकी घटनाओं वाले स्थल, बढते जायेंगे और अंतमें विस्तार बदसूरत दिखेगा.

यातायात मार्गकी चौडाईः  आंतरिक मार्गकी चौडाई, आज तो जो दो लेन (१+१=२) वाली है वह सही लगती हैलेकिन भविष्यमे पांच सालके बाद) याता यातकी समस्या हो सकती है. मुख्य मार्ग जो चार लेनका (२+२=४) है उसके विषयमें भी ऐसा कहा जा सकता है.

08 good main road

आंतरिक मार्गोंकी और मुख्य्त मार्गोंकी  आकृतिसूचित गुणवत्ता और निर्माणकी गुणवत्ता सही है.

09 good internal street road

सायकल मार्ग (द्विचक्र वाहन यातायात) भी सही ही है.

किंतु पदयात्रीयोंके लिये जो मार्ग है उसकी आकृति और निर्माणकी गुणवत्ता सही नहीं है.

पेड पौधेंकी जो भूमि है वह नीची है और फुटपाथके दाहिने बाजु का स्तर उंचा हैऔर निर्माणकी वर्कमेनशीप पुअर होने से फुटपाथके किनारे के पत्थर निकल जाते है. यदि इनको शिघ्राति शिघ्र रीपेर किया जाय और किनारे वाले पेडपौधोंकी भूमि उंची कि जाय तो फुटपाथको क्षतिग्रस्त बनने की घटनाओंको रोका जा सकता है.

01 can break at any time

क़ोंट्राक्टरोंका अपना काम होनेके बाद सबस्टांडर्ड रीसरफेसींग वर्क.

05 gas agency does not reinstate properly

जैसे कि गेस एजंसी जब अपना लाईन बीठाती है तो जो खोदाई होती है उनको ढंगसे री-सरफेसींगका काम नहीं करती है. ईनमें गोदरेज प्रोपर्टीज़ की तरफसे शायद नीगरानी नहीं रक्खी गई है. तो इनकी क्षतिग्रस्त स्थलोंकी छूटपूट घटनाएं मिलती है.

मानवीय असभ्यताः
06 why to walk on footpath

रहेनेवालोंको भी नियमका पालन करना चाहिये. लेकिन यदि गोदरेज प्रोपर्टीज़वाले उनको दंडित नहीं करेंगे तो उनकी आदतमें सुधार लाना असंभव है.

 

यदि फुटपाथ है तो निवासीयोंको फुटपाथ पर चलने की आदत डलनी चाहिय

स्वच्छता पर आघात

पशुओंके प्रति दया भावना का प्रदर्शन करना भारतीयोंकी आदत है. इस आदतके गुणदोषमें  पडें परंतु यह दयाभावना के कारण गंदकी फैलानी नहीं चाहिये.

07 we want to feed animals at the cost of cleanliness

स्वच्छताके उपकरण और स्वच्छता कर्मचारीयोंकी नासमज़ः

सफाई कामदारोंकी समज़ है कि उनको केवल पेडपौधोंके पत्तेकागज़के टूकडे,प्लास्टिक बेग्ज़ और उसके टूकडे … आदि ही को कचरा समज़ना है. कुत्तोंकी वीष्टागाय भेंसका गोबर आदि को उठाना सफाईके अंतर्गत नहीं आता है. इसके कारण जब वे सुखकर मीट्टी बनजाता है तब वह हवामें उड जाता है.  वैसे तो गायभैंस कम दिखाई देते है इसलिये ऐसी घटनाएं  छूट पूट मिलतीं हैकिंतु भविष्यमें इनमें वृद्धि हो सकती है.

गोदरेज प्रोपर्टीज़का काम व्यापारी और निवासी आवास पैदा करना है  कि अवैध व्यवसाय दिलाना

गोदरेज गार्डन सीटी में कोमर्सीयल केंद्र है. सीटी सेंटरमें कई सारी सुयोग्य तरिकेसे निर्मित दुकाने हैं. इसका निर्माण परिपूर्ण नहीं हुआ होगा.

लेकिन हमारे कुछ व्यवसायी लोगोंको मुफ्त मे व्यवसाय करने की जगह चाहिये. इसकी दो वजह है. एकः यह कि पुलीस या तो सुरक्षा कर्मीको खुश रखना और मुफ्तमें जगहका व्यवसायके लिये उपयोग करना.

हाथ लारी” एक ऐसा ही व्यवसाय है. जिसमें व्यक्ति एक हाथ-लॉरीमें सब्जी-तरकारी फैलाके ग्राहकोंकी प्रतिक्षा करता है. और ग्राहक भी उसकी लॉरीमेंसे सब्ज़ी तरकारी खरीदता है.

प्रारंभमें एक हाथलॉरीवाला, एक हाथलॉरीमे सब्ज़ी लगाके एक मार्गकी फुटपाथ पर पार्ट टाईम खडा रहेता है.

फिर वह अपना खडा रहनेकी समय मर्यादा बढाता रहेता है.

05 hand lorry with spreaded material

फिर वह एक लॉरीमें तीन लॉरीका सामान लाता है. वह सामान फुटपाथ पर फैला देता है. फिर वह और किसमका भी सामान लाता हैजैसे कि नारीयलवॉटरमेलनकेले … आदि.

ऐसा करनेके समयके अंतर्गत उसकी सुरक्षा दलो सें पुख्ता दोस्ती हो जाती है. शायद उपरी स्तरके कर्मचारी/अधिकारीगणके साथ भी परोक्ष प्रत्यक्ष संबंध प्रस्थापित हो जाते है.

तो एक दुसरा हाथ लॉरीवाला भी पैदा हो जाता है. उसका  भी ऐसे ही इतिहासका पुनरावर्तन होता है. 

05b one more larywala

फिर तो क्या कहेनाबलुन वाला आता हैखिलौना वाला आता हैगन्नेका रसवाला  जाता है. फुलवाला आता हैमोची आता हैपंक्चर रीपेरर आता है… ऐसे फुटपाथ पर अतिक्रमण बढता ही रहता है.

इसकालके अंतर्गत कई कर्मचारीगण/अधिकारीगणका तबादला होता रहेता है इस लिये किसीकी जीम्मेवारी फिक्स करना उच्चस्तरीय अधिकारीगण योग्य समज़ते नहीं है.

इस प्रकार समयांतर कालके अंतर्गत अराजकता फैल जाती है. गोदरेज गार्डन सीटीमें अराजकता के बीज बोये है. आज जो छूटपूट घटना है और जिसको निवारा जा सकता हैयदि गोदरेज गार्डन सीटीके अधिकारीयोंकी मानसिकता यही रही तो पांच सालमें अराजकता फैल सकती है.

अग्निशामक तकनिकी सुविधाएं और उसके नियमके अंतर्गत प्रावधान

अग्निप्रतिरोधक उपकरण, अग्निशामक व्यवस्थाएं और आपातकालिन व्यवस्था रखना आदिके बडे कठिन नियम है. उसमें एक नियम है बहु मंज़िला इमारतमें आपातकालमें निवासीयोंको निश्चित जगहसे उठानेका. इस जगहको फायर रेफ्युज खंड (फायर रेस्क्यु रुम) कहेते है. निश्चित मंज़िल पर दो ऐसे खंड आमने सामनेकी दिशामें छोर पर रक्खे जाते है. दो इस लिये कि यदि एक छोरका खंड आगके कारण उस आगकी दिशामें उपलब्ध नहीं होता है तो तो दुसरा छोरवाला खंड काममें  जाता है. निवासीयोंको वहां इकठ्ठा करके क्रॅनकी मददसे बचाया जा सकता है. फायर रेस्क्यु खंड एक स्वतंत्र खंड होता है. उसमें  तो कोई निवासी अपना सामान रख सकता है  तो उसका नीजी उपयोग कर सकता है. इस खंडको बंद करना निषेध है. इस खंडमें प्रवेश होता है पर द्वार नहीं रखा जा सकता. उसी प्रकार उसमें गेलेरी होती है उसमें उसको बंद करनेकी खीडाकीयां नहीं होती. ता कि आपात कालमें आसानीसे निवासीयोंको निकाले जा सके.

लेकिन यहां गोदरेज गार्डन सीटीके बहुमंज़िला इमारतोमें इसका अक्षरसः पालन नहीं किया गया. दोमेंसे एक फायर रेस्क्यु खंडको करीबी निवासीको ऐसे ही व्यक्तिगत उपयोगकी सुविधा दे दी गई है.

01 fire rescue room02 break open wall of Fire rescue room

04 fire rescue room exclisive use

नियम के अनुसार फायर रेस्क्यु खंड को कोई निवासी अपने अंगत स्वार्थ के लिये उपयोगमें ले नहीं सकता. किंतु गोदरेज गार्डन सीटीके अधिकारीयोंने फायर रेस्क्यु खंडमें विशेष वीज सुविधा भी उपलब्ध करवायी है. फायर रेस्क्यु खंडमें वीज सुविधा होती है. और उसमें एक लेंप होल्डरका प्रावधान होता है. सामान्य परिस्थितियोंमे इस लेंप होल्डरमें लेंप    लगाना होता है ताकि असामान्य परिस्थितिमें लेंपका अन्वेशण करना न पडे. रेस्क्यु खंड दो होते है. एक मुख्य और एक विकल्पके लिये अतिरिक्त (स्टेंड बाय). कौन मुख्य और कौन विकल्प केलिये अतिरिक्त यह कोई नामाभिधानका विषय नहीं है. दोनों ही एकदुसरेके परिपेक्ष्यमें विकल्पीय है. जैसे की दो स्टेर केस होते है  तो एक यदि आग की घटनामें उपलब्ध नहीं है तो दुसरा जो सामने के छोर पर है वह उपलब्ध होता ही है. तो यहां गोदरेज गार्डन सीटीमें क्या हुआ कि निवासीको फेसीलीटेट करने के लिये उसके पासवाले रेस्क्यु खंडमे तो दिवारको तोडके प्रवेश द्वार तो लगवाही दिया पर उसके लिये फायर रेस्क्यु खंडमें लेंप भी लगवा दिया और ट्युबलाईटभी लगवा दिया. अब फायर रेस्क्यु खंडकी बीजलीका कंट्रोल किसके पास है और उसका विद्युत का बील किसको आता है यह संशोधन का विषय है.

भारतमें और खास करके उत्तरभारतीयोंकी (खास करके राजस्थान, पंजाब, यु.पी, बिहार और गुजराती भी कम नहीं) आदत है कि गैरकानूनी तरीके से उपलब्ध जगहोंका उपयोग करना. और अधिकारीगण/कर्मचारीगण भी वैसे ही चरित्रवाले होनेसे अवैध तरीकेसे आंखे बंद कर देते है.

इसका समाधान क्या है?

कौटिल्यने कहा है कि, आमजनता तो “दंड” से ही सावधान रहेती है. 

“गोदरेज गार्डन सीटी”में और क्या करने कि आवश्यकता है?

गोदरेज गार्डन सीटी बडी आसानीसे स्मार्ट सीटी विस्तार बन सकता है. अभी तो यह विकसित हो ही रहा है तो इसमें अभीसे जनताको सुव्यवस्थित और सुसंस्कृत की जा सकती है.

(१) प्रत्येक मार्ग पर जैसे कि मुख्य मार्ग पर गति-सीमा ४० कि. आंतरिक मार्ग पर १५ कि. और क्लस्टरके अंदर ५/१० कि. की सीमा रक्खी जा सकती है. गतिसीमा के सूचना बॉर्ड रखना चाहिये.

(२) प्रत्येक प्रवेशद्वार के पास सीसीटीवी केमेराका प्रबंध किया जाना चहिये.

(३) प्रत्येक क्लस्टरमें सदस्यके लिये स्मार्टकार्डसे प्रवेश किया जा सकता है,

(४) प्रत्येक बिल्डींगमे प्रत्येक स्तर (फ्लोर) पर भी सीसीटीवी केमेरा का प्रबंध होना चाहिये. सुरक्षा कर्मचारी निवासीसे बात करके सुनिश्चित करेगा कि आगंतुक को प्रवेश देना है या नहीं, यदि निवासीने अनुमति दी, तो वह आगंतुक वहीं पर ही गया या कहीं और गया.

(५) प्रत्येक मार्ग पर भी सीसीटीवी केमेरा का प्रावधान किया जाना चाहिये ताकि सभी कोई सज्जनता पूर्वकका व्यवहार करें और यातायातके नियमोंका भंग करनेसे बचे.

(६) सीसीटीवी केमेरासे अतिक्रमण पर कडा निरीक्षण रखा जा सकता है.

कर्मचारीको नियमपालनके लिये प्रतिबद्ध होना चाहिये. यदि ऐसा नहीं हुआ तो समज़ लो 

अराजकताका आरंभ है.

 

शिरीष मोहनलाल दवे

Read Full Post »

२५ जुन नहेरुवीयन कोंग्रेस बनी भारतका एक कलंक

अहो आश्चर्यम्

DEMOCRACY MEANS

२५ जुन भारतके लिये एक लज्जास्पद दिन है. यह प्रजातंत्रकी मृत्यु का दिन था. और उसकी हत्यारी थीं नहेरुवीयन कोंग्रेसकी उनके द्वारा एक मात्र मान्य नेत्री इन्दिरा गांधी.

वैसे तो १९७० के चूनावमें इन्दिराके पक्षको प्रचंड बहुमत मिला था.

पाकिस्तानकी भौगोलिक परिस्थितियों के कारण और भारतके जवानोंकी वीरता और व्युहरचानाके कारण भारतको भव्य विजय प्राप्त हुई थी. इस विजयका श्रेय भी इन्दिराने लिया था. समाचार माध्यमोंने भी यही बात चलायी.

इसके उपरांत इन्दिराने संविधानमें कई संशोधन करके अपनी सत्ता बढाई. उसने ऐसे भी प्रयत्न किये कि मानव अधिकारों को भी क्षति पहोंचानेकी संसदको सत्ता मिले. किन्तु इसमें वह विफल रही. क्यों कि सर्वोच्च न्यायालयने इस प्रस्तावको नकार दिया और कहा कि मानव अधिकार और प्राकृतिक अधिकार को नष्ट नहीं किया जा सकता. क्यों कि यह तो प्रजासत्ताककी नींव है.

वैसे तो इन्दिरा गांधी अपने पक्षमें सर्वेसर्वा थी और अधिकतर राज्योंमें भी उसके खुदके नियुक्त मुख्य मंत्री थे. तो भी इन्दिरा गांधी देशकी आर्थिक स्थितिमें कोई सुधार करनेमें असफल रहीं.

कोंग्रेसके विभाजनके बाद सीन्डीकेटके नेतागण तो उसके सामने स्पर्धाके लिये रहे नहीं. किन्तु पक्षमें भी वह कोई सर उठाके चले और कोई भी अच्छे कामका श्रेय खुदके नाम पर ले ले वह इन्दिराको पसंद नहीं था. उसने हमेशा स्वयंकी सत्ताको कोई ललकारने वाला रहे उसीमें व्यस्त रहीं. वीपी सिंघ, बहुगुणा, ललितनारायण मिश्र आदि उनमें मुख्य थे. प्रथम दो थे इनको निकाल दिया. तीसरेकी मृत्यु हो गई. और दो बचे. वे थे यशवंत राव चौहाण और जगजिवन राम.

सर्व क्षेत्रीय विफलताके कारण १९७३से जन आंदोलन का प्रारंभ हुआ. १९७४ उसके प्रचंड बहुमतवाली गुजरातकी विधानसभाका विसर्जन करना पडा. १९७५में इन्दिराका खुदका चूनाव रद हो गया, उतना ही नहीं किन्तु वह स्वयं सालके लिये अयोग्य घोषित की गयी. गुजरातकी विधानसभा चूनावमें उसका पक्ष सत्तासे विमुख हो गया. स्वयं को बचाने के लिये और सत्ता पर चालु रहेने के लिये वह साम्यवादीयं की तरह कुछ भी कर सकती थी. इन्दिराने आंतरिक आपातकाल घोषित किया. आपतकालमें क्या हुआ वह हमने देख लिया. इस विषय पर इसी वेबसाईट पर कई और लेख है. आप कृपया उनको पढें.

शासन किसीको भी पकड सकता था और कारावासमें भेज सकता था. सिर्फ शासनके अधिकृत अफसरको  न्यायधीशके सामने कहेनाका था कि यह समाज और शासनके लिये खतरा है.

एक न्यायाधीशने एक आरोपीको जब उसके सामने प्रस्तूत किया तो पुलिस अफसरसे पूछा की इसको क्यूं पकडा है? पूलिस प्रोसीक्युटरने बताया कि वह देश विरोधी कार्य कर रहा है.

न्यायधीशने पूछा कि वह क्या कर रहा है?

आरोपीने बोला, मैंने तो कुछ भी किया नहीं है.

न्यायधीशने प्रोसीक्युटरसे पूछा कि किस आधार पर शासनने उसको पकडा है.

प्रोसीक्युटरने बोला कि आपातकालमें कारण और आधार बतानेकी आवश्यकता नहीं.

न्यायधीशने बोला कि आप चाहे आरोपी को बाताओ, लेकिन मुझे तो बताओ. चलो मेरी केबिनमें और मुझे बताओ.

प्रोसीक्युटरने बोला कि आपको बताना भी आपातकालमें आवश्यक नहीं है.

न्यायधीश ने बोला कि आरोपके आधारका अस्तित्व होना तो आवश्यक है ही. यदि आप न्यायालयको भी नहीं कहोगे तो इसका अर्थ तो यह हुआ कि आप किसीको भी कुछ भी करोगे.

शासनने बताया कि आपातकालमें शासन चूं कि संविधानके अधिकार स्थगित हुए है, शासन चाहे तो मनुष्यका प्राण भी ले सकता है.

न्यायधीशने कहा कि, संविधान के अधिकार स्थगित हुए है. संविधानके अधिकार नष्ट नही हुए है. इस लिये आरोपके आधारका अस्तित्व होना अनिवार्य है. और न्यायालयके प्रत्यक्ष तो प्रस्तूत करना ही पडेगा.

भारतके न्यायतंत्रकी निडरतासे इन्दिरा को बेहद नफरत थी. सर्वोच्च न्यायालयके मुख्य नायाधीश जब निवृत्त हुए तब उसने उच्चताके क्रममें चौथे क्रमवाले न्यायधीश, जो इन्दिराको सपर्पित थे उनको मुख्य न्यायाधीश बनाया. इससे वरिष्ठ क्रमके तीनों न्यायाधीशोंने त्यागपत्र दे दिया. अब सर्वोच्च न्यायालय इन्दिराके समर्पित हो गया. किन्तु  इन्दिराको लगा कि पूरा न्यायतंत्र उसको समर्पित नहीं हो सकता किन्तु सर्वोच्च न्यायालय समर्पित हो गया है तो इससे भी लाभ तो होगा ही. संसदकी अवधि कभी की समाप्त हो गयी थी और जो समय चल रहा था वह विस्तारित अवधिका था. विदेशोंमें इन्दिरा अपकीर्तित हो गयी थी. चूनाव करना आवश्यक हो गया था. उसके विश्वस्त गुप्ततंत्रने उसको बता दिया था कि आपतकालके विरुद्ध कोई कुत्ता भी नहीं भोंका है, तो इन्दिराने चूनावकी घोषणा कर दी.

किन्तु भारतीय संस्कृतिमें लोकतंत्रका मूल सहस्त्रों वर्ष पूराना है. और उस बीसवीं सदीके सत्तरके दशकके  समय माहात्मा गांधीवादीके समयके कई नेता जीवित थे. आरएसएस के सेवकोंने भी पूरा समय दिया. आरएसएसका व्यापक संगठन है. वह यदि सुग्रथित, सुनिश्चित और लयबद्ध रीतिसे बिना भेदभावसे एक ध्येय पर कार्य करें तो वह क्या कर सकता है यह बात उसने भारतमें १९७७में सिद्ध कर दिया.

इन्दिरा गांधी स्वयं ५५००० मतोंसे हारी. एक सरमुखत्यार, आपतकाल चालु रखके और समाचार माध्यमोंको एक मात्र स्वयंको ही समर्पित रखके चूनाव घोषित करें, तो भी, केवल उसका पक्ष ही नहीं स्वयं भी पराजित हो जाय, ऐसा विश्वमें कहीं हुआ नहीं है. केवल भारतमें ही हुआ और केवल भारतमें ही ऐसा हो सकता है.

मोरारजी देसाईको प्रधानमंत्री पदके लिये क्यों चूना गया?

१९७०के चूनावमें इन्दिरा प्रवाहमें पूरे देशमें कोंग्रेस (संस्था) हार गयी. अन्य दलोंका भी यही हाल हुआ था. केवल गुजरातमें मोरारजी देसाई वाली कोंग्रेसको अधिक बैठकें मिली. जयप्रकाश नारायणके आंदोलनमें और गुजरातके नवनिर्माण आंदोलनमें मोरारजी देसाईकी बडी भूमिका रही थी. वैसे भी वे वरिष्ठ थे और प्रशासनमें दक्ष थे. १९७७के चूनावमें भी कोंग्रेस (संगठान)की श्रेष्ठ भूमिका रही.

मोरारजी देसाई जनता पार्टीके नेता हुए. और प्रधान मंत्री बने.

किन्तु अपनेको महात्मा गांधीके सच्चे अनुयायी मानने वाले चौधरी चरण सिंहकी तबियत गुदगुदाई और उन्होने शासनकी अंतर्गत ही सियासत चालु कर दी. एक स्थिति ऐसी आयी कि मोरारजी देसाईने उनको पदभ्रष्ट भी कर दिया. और कहा कि तुम अपना चूनाव चिन्ह भी लेलो और जनता पार्टीसे अलग हो जाओ. उस समय चरण सींग के पास केवल ४० सदस्य थे. वे यदि चले भी जाते तो और कम सदस्य उनके साथ जाते. किन्तु अटल बिहारी बाजपाइ ने मोरारजी देसाईको मना लिया और आश्वासन दिलाया कि अब चरण सिंघ पुनरावृत्ति नहीं करेंगे.

लेकिन युपीकी और बिहारकी सियासत ही भीन्न है या वह कुछ भी हो चरणसींगने अपने गुटके सदस्यों और इन्दिरा, यशवंतराव चवाणके पक्षकी सहायता लेके मोरारजी देसाई की सरकारको गिरायी. चरण सिंहने इन्दिरा और चवाणसे आश्वासन लिया था कि वे संसदमें उनको प्रधानमंत्री बननेमें सहयोग देंगे. किंतु जब संसदमें बहुमत सिद्ध करने का समय आया तो इन्दिराने उनके विरुद्ध मतदान किया. इन्दिराने कहा मैंने तो केवल जनता पक्षकी सरकारके पतनके लिये ही आपको सहयोग दिया था. आपको प्रधानमंत्री तो बनने दिया, किन्तु यह आवश्यक नहीं कि हम आपको लगातार सहयोग देते रहें. इस प्रकार संसदमें प्रधानमंत्रीकी बैठक पर चौधरी चरण सिंह केवल ४५ सेकंड के लिये ही बैठ पाये. यह वही चरण सिंग थे जो इन्दिरा गांधीको प्रथम क्रमके दुश्मन मानते थे. उन्होंने इन्दिरा गांधीको, बिना कोइ पूर्व योजना बनाये गिरफ्तार भी किया था, किन्तु न्यायालयके सामने प्रस्तूत करने के समय सुयोग्य आधार होने के कारण न्याधीशने इन्दिराको मुक्त कर दिया था. यह सब अधिगत होने पर भी चरणसिंगने इन्दिरा गांधीका सहयोग लिया और जनता द्वारा सुस्थापित शासनका पतन करवाया. प्रयोजन केवल स्वयंको येनकेन प्रकारेण प्रधान मंत्री बननेका था.

यह मोरारजी देसाईने अपने १८ मासके शासन दरम्यान अर्थतंत्रमें पर्याप्त सुधार ला दिया था. संविधानमें भी पर्याप्त संशोधन कर दिया था ताकि, कोई स्वकेन्द्री और आपखुद व्यक्ति गणतंत्रको हानि कर सके.

चरण सिंह हंगामी प्रधानमंत्री बने रहे. इन्दिराने नीलम संजिव रेड्डीको मनवाकर संसद्का विसर्जन करवा दिया. चरणसिंगके कारण पुरा जनता पक्ष अपकीर्तित हो गया. १९८०का चूनाव जनता पक्ष हार गया. इन्दिरा पुनः सत्ता पर गई.

वह पुनः आपातकाल ला सकी. किन्तु सर्वोदय संस्थाओंको चून चून कर कष्ट दिया. सर्वोदयवाले भी अपनी संस्थाकी रक्षाके लिये इंदिराको समर्पित हो गये. आरएसएसवाले भी निवृत हो गये.

राम मनोहर लोहिया, राज गोपलाचारी, मसाणी, दांडेकर, मधु दंडवते, मधु लिमये और जयप्रकाश नारायण नारयण के अभावमें २००४ से २००८ तकके नहेरुवीयन कोंग्रेसके कुकर्मोंका उत्तर मागने वाला और ऊंचे स्वरमें बोलने वाला कोई बचा नहीं था.

लालकृष्ण अडवाणीकी रामरथ लेके देशमें कोमवाद फैलानेके लिये दोषित मानके कडी आलोचना की जाती थी, और रामजन्म भूमि पर स्थित बाबरी मस्जिदका ढांचा गिराने के लिये उनको कारावासमें भेजनेका कहा जाता था, वही समाचार माध्यम आज उनकी कथित लोकशाही संकट के विधानोंपर प्रशंसा के पुष्पोंकी वर्षा कर रहे हैं. जब जब अडवाणीने नरेन्द्र मोदीके विरुद्ध विसंवादी उच्चारण किया है तब तब समाचार माध्यमोंने और मोदीसे जलने वालोंने अडावाणी पर पुष्पोंकी वर्षा की है.  

अडवाणी को अवश्य पेटमें दर्द है. किन्तु अडवाणीको समझना आवश्यक है कि १९९९२००४ वे स्वयं गृह मंत्री थे. यदि वे दक्ष होते तो वे अपने कार्य द्वारा दक्षता और मस्तिष्क द्वारा व्युहरचना के आधार पर पुनःविजय प्राप्त कर सकते थे. मान लिजीये एक बार विफल हो गये. तो भी २००९ में तो अडवाणीके पास अति सानुकुल परिस्थिति थी. नहेरुवीयन कोंग्रेसके कौभाण्ड, आपखुदी और शिथिल शासन चरमसीमा पर था. इतना ही नहीं आपतकालकी नहेरुवीयन कोंग्रेसकी मानसिकता ही एक वज्रास्त्र है. किन्तु बीजेपीके अन्य नेताओं को छोड दो तो भी, अडवाणीको स्वयंको इस शस्त्रका उपयोग करना नहीं आता है. नहेरुवीयन कोंग्रेस, जिसके लिये आज भी इन्दिरा और नहेरु उतने ही पूज्य है जितने पूर्वकालमें थे. और इसीकारणनहेरुवीयन आपातकालबीजेपीके नेताओंके लिये एक वज्रास्त्र है यदि उसका उपयोग करना चाहे तो.

२०१४ के चूनावके पूर्व यदि अडवाणी प्रधानमंत्री पदके लिये प्रस्तूत किये जाते तो बीजेपीकी पराजय निश्चत थी. संघने बीजेपी पर मोदीके लिये दबाव नहीं डाला था. किन्तु आम जनताका क्या मत है वह संघ और बीजेपीनेता अधिगत कर पाये इसी कारणसे बीजेपी ने मोदी का नाम प्रस्तूत किया या करना पडा.

क्या मोदीकी तरह अडवाणी परियोजनाएं सोच सकते है? नहीं.

क्या मोदीकी तरह अडवाणी नवतर संकल्प कर सकते है?

क्या मोदीकी तरह अडवाणी व्यूहरचानाएं कर सकते है? नहीं.

क्या मोदीकी तरह अडवाणी प्रवचन कर सकते है? नहीं.

क्या नरेन्द्र मोदीकी तरह १८ कलाक, अडवाणी काम कर सकते है? नहीं.

यदि ऐसा होता तो अडवाणी २००४ और २००९ में बीजेपीको चूनाव में विजय दिला सकते थे.

अडवाणी को अपातकाल कैसा था वह योग्य प्रमाणमें अवगत है, अधिगत और अनुभूत भी है.

ADVANI 01

उन्होने ऐसे सियासतसे भरपुर और स्वयंके पक्षके उच्चस्थ और लोकप्रिय नेताको हानि पहोंचे ऐसा  उच्चारण प्रथमवार नहीं किया है. अडवाणीने ऐसा अनेक बार किया है.

नरेन्द्र मोदीको चूनाव प्रचारके लिये मुख्य प्रचारक घोषित किया गया तब भी अडवाणीने ऐसे विसंवादी उच्चारण किया था. आदवाणीने शिवराज चौहाण और सुष्मा स्वराजको भी उकसाया था. किन्तु इन दोनोंको भूतलकी परिस्थिति ज्ञात थी.

उस समय भी समाचार माध्यमोंने इस वार्ता को उछाली थी.

तत्पश्चात जब नरेन्द्र मोदीका नाम प्रधानमंत्रीके पदके अभ्यर्थी के लिये अनुमोदित किया तब भी अडवाणीने इसमें विसंवादी उच्चारण करके अपनी मनोवृत्तिका प्रदर्शन किया था. उन्होंने पक्षके लिये अतिप्रतिकुल स्थिति उत्पन्न की थी.

इस समय जब नरेन्द्र मोदीने वैश्विक संबंधोंमें दूरगामी और देशके लिये सानुकुल परिवर्तन के लिये अनेक कदम उठाये हैं और सर्वत्र नरेन्द्र मोदी और उसकी सरकारको कीर्ति मिल रही है उस समय यह अडवाणीने असंबद्ध और अनुचित विसंवादीआपतकाल की शक्यता है और लोकतंत्र असुरक्षित हैऐसे उच्चारण किये.

हो सकता है कि अडवाणीके पेटमें पीडा हो. किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि वह इस प्रकार अपनी विद्वत्ता प्रदर्शित करनेकी चेष्टा करें.

समाचार माध्यम और नरेन्द्र मोदीके विरुद्ध गुट नरेन्द्र मोदीको धराशायी करने के लिये उत्सुक है उसको तो यही चाहिये कि बीजेपीमें कोई चरणसिंग पैदा हो.

अडवाणीको तो, नरेन्द्र मोदीके विरोधीयोंको मोदीकी निराधार भर्त्सनाके लिये, अवसर देना था वह दे दिया. नरेन्द्र मोदीके विरोधीयोंने अपना काम कर दिया. नरेन्द्र मोदीको जो आघात पहोंचाना था वह पहुंचा दिया. इतना सबकुछ कर देनेके बाद अडवाणीने कहा कि स्वयंने तो कोंग्रेसको अनुसंधानमें रख कर उचारण किया था.

अरे भैया अडवाणी, यदि आपातकाल प्रसिद्ध कुकर्म कुत्सित कोंग्रेसके संदर्भमें उच्चारण किया था तो उसका नाम क्यों नहीं लिया?

राम लीला मैदानमें मध्य रात्रिको रामदेवके साथ जो हुआ, टीम अन्ना हजारेके साथ नहेरुवीयन कोंग्रेसने जो व्यवहार किया, उनके बारे में जो कहा गया कि वे सरसे पांव तक भ्रष्ट है. किरण बेदीके उपर जो आक्षेप हुए, नहेरुवीयन कोंग्रेसने उस समयके उसके विरोधीयोंके साथ जो वर्तन और गाली प्रदान किया, उस समय हे अडवाणी, आपने क्या किया? यदि उस समयआपातकाल की शक्यता है और लोकतंत्र असुरक्षित हैकहा होता तो अडवाणीजी आप कुछ विश्वसनीय बनते.

जनता हैरान है कि आप इस उम्रमें और वह भी अद्यतन वर्तमान समयमें तात्विक सबूतके अभावमें निश्चयात्मक साध्य सिद्ध हो गया मानके क्यों चलते है? जब आपसे पूछा गया तो आपने कोंग्रेसका संदर्भ बताया. स्पष्टीकरण ऐसा करते है. वास्तवमें यह आपका स्पष्टीकरण है ही नहीं. आपको आपकी सीमा ज्ञात होनी आवश्यक है.

लोग यही मानेंगेकी चरणसिंगकी रुह आपमें घुसी है. चरणसिंहने जो किया इससे नहेरुवीयन कोंग्रेसको दूर करनेमें जनताको ३५ वर्ष लग गये. आप नरेन्द्र मोदीके विकासके यज्ञमें हड्डीयां क्यों डालते है? एकबात ध्यानसे समझ लो, अब आप प्रधानमंत्री नहीं बन सकते. यदि राष्ट्र पति बनना है तो जीव्हा पर और स्वयंकी मंशापर अंकुश रक्खो

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः आपातकाल, २५ जुन, नहेरुवीयन कोंग्रेस, इन्दिरा गांधी, मोरारजी देसाई, जयप्रकाश नारायण, चरणसिंग, रुह, पराजय, विसंवाद, अडवाणी, नरेन्द्र मोदी, प्रधान मंत्री   

Read Full Post »

नहेरुवीयन कोंग्रेसके शासनकी परिभाषा है आतंकवाद और हत्याओंकी शृंखला

IMPOSITION OF EMERGENCY

साभार आर के लक्ष्मणका कटाक्ष चित्र

जून मास वैसे तो नहेरुवीयनोंकी और उनके पक्षकी निम्नस्तरीय और आततायी मानसिकताको याद करनेका समय है. सन्१९७५में नहेरुवीयन कोंग्रेसकी यह मानसिकता नग्न बनकर प्रत्यक्ष आयी. २५मार्च का दिन भारतके इतिहाससे, नष्ट होनेवाली कालीमाका जन्म दिन है. नहेरुवीयन कोंग्रेसके काले करतूतोंकी  जितनी ही भर्त्सना करो, कम ही है. यह कलंक एक वज्रलेप है.

आपातकाल १९९५ से १९७७.

आप कहोगे कि यह तो भूतकालकी वार्ता है. आज इसका क्या संदर्भ है? आज इसका क्या प्रास्तुत्य है?

इसका उत्तर है

यह नहेरुवीयन कोंग्रेस आज भी जीवित है. वह प्रभावशाली है. उसके पास अकल्पनीय मात्रामें धन है. अधिकतर समाचार माध्यम उसके पक्षमें है. इस पक्षकी और इस पक्षके नेताओंकी मानसिकतामें कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं आया है. याद करो. १९७७में हार कर यही नहेरुवीयन कोंग्रेस सत्ता पर आयी थी.  

कलंकोसे भरपूर नहेरु शासनः

१९६२ के युद्ध में हुई भारतकी घोर पराजयके कारण, नहेरुने मन बना लिया था. स्वयंके सिंहासन रक्षा तो उन्होंने करली. किन्तु वह पर्याप्त नहीं है.

नहेरुने अपने १९४७से १९६२के कार्यकालमें अनेकानेक कलंकात्मक कार्य किये थे. इतिहास उसको क्षमा करनेवाला नहीं था.

कौभाण्डोंकी यदि उपेक्षा करें, तो भी, ऐसी कई घटनाएं भूगर्भमें थी कि जिनसे, नहेरुका नाम निरपेक्षतासे लज्जास्पदोंकी सूचीमें आजाना निश्चित था.

सुभाषविवाद, चीनकी विस्तारवादी नीति, सीमा सुरक्षाकी उपेक्षा, सीमा सुरक्षा सैनिको सुसज्ज करनेके विषयोंकी  अवहेलना, व्यंढ समाजादवाद, दंभी धर्म निरपेक्षता और स्वकेन्द्री नीति के कारण नहेरुको अपयश मिलनेवाला था.

नहेरुने क्या विचारा?

यदि कुछ दशकों पर्यंत उसकी संतान इन्दिरा गांधी प्रधानमंत्री बन जाय, तो नहेरुके काले कारनामों पर पर्दा पड सकता था. इस हेतुसे नहेरुने चीनके आक्रमण के पश्चात अपने पक्षके प्रतिस्पर्धीयोंको सत्तासे विमुख रखनेकी व्यूह रचाना बनायी. कुछजैसे थे वादीयोंका मंडल नहेरुने बनाया. नहेरुने उनको समझाया. नहेरुने अपनी मृत्यु शैयासे इन जैसे थे वादीयोंसे वचन लिया कि वे इन्दिराको ही प्रधान मंत्री बनायेंगे. येजैसे थे वादीयोंकासमूहसीन्डीकेटनामसे ख्यात था.

नहेरुवीयन फरजंद, जो बिना किसी योग्यता, केवल नहेरुकी फरजंद होनेके नाते, “जैसे थे वादीयोंकी कृपासे १९६६में प्रधान मंत्री बन गयी थी. उस समय कई सारे वरिष्ठ और कार्य कुशल नेता थे. वे प्रधान मंत्री पदके लिये योग्य भी थे और उत्सुक भी थे. इनमें गुलजारीलाल नंदा और मोरारजी देसाई मुख्य थे.

समाचार माध्यम को नहेरु पसंद थे. क्यों कि स्वातंत्र्य संग्राममें वे एक प्रमुखवस्त्र परिधान और प्रदर्शन शैलीके  युवामूर्ति” (आईकोन) थे. समृद्ध व्यक्तियोंको आम कोंगी नेताओंकी सादगीवाली मानसिकता स्विकृत नहीं थी. समाचार माध्यमने नहेरुकी सभी क्षतियां गोपित रक्खी थी. समाचार माध्यम, नहेरुके लिये, शाश्वतअहो रुपं अहो ध्वनिकिया करता था, जैसे कि आज सोनिया और राहुलकी प्रशंसा किया करता है.

इन्दिरा गांधी एक सामान्य कक्षाकी औरत थी.

इन्दिरा गांधीको सत्ता मिल गई. उसको सहायकगण भी मिल या. इनमें साम्यवादी और कुछ नीतिभ्रष्ट युवा भी थे. नहेरुवीयनोंका गुरु था रुस. गुरु साम्यवादी था. साम्यवादी नेता कपट नीतिमें निपूण होते है. विरोधीयोंमें भेद कैसे उत्पन्न करना, अफवाह कैसे प्रसारित करना, जनसमुदायको विचारोंसे पथभ्रष्ट कैसे करना, निर्धनोंको निर्धन ही कैसे रखना, गुप्तचरोंसे विरोधीयोंके विषयमें कैसे विवाद उत्पन्न करना इन सर्व परिबलोंका उपयोग कैसे करना इस विषय पर रुस, नहेरुवीयनोंको पर्याप्त सहयोग करता रहा.

किन्तु रुसको भारतकी जन संस्कृतिका परिपूर्ण ज्ञान नहीं हो सकता था. इस लिये १९७३ के पश्चातकालमें इन्दिराको सर्व क्षेत्रीय विफलता मिलने लगी. वह अपने पिताकी तरह आपखुद भी थी. दोनों संसदोंमे निरपेक्ष बहुमत और अधिकतम राज्योंमें अपने खुदने प्रस्थापित मुख्य मंत्री होते हुए भी, इन्दिराको सर्वक्षेत्रीय विफलता मिलीसर्व क्षेत्रीय विफलताके कारण समाचार माध्यम उसके हाथसे जा सकते थे. इसका प्रारंभ हो गया था. जन आंदोलनका भी प्रारंभ हो गया था. नियमका शासन मृतप्राय हो रहा था. यदि इन्दिराके हाथसे सत्ता गई तो नहेरुवीयन कोंग्रेसकी मृत्यु निश्चित थी. तीन कार्य अतिआवश्यक थे. विरोधीयोंकी प्रवृत्तियों पर संपूर्ण प्रतिबंध, समाचार माध्यम पर संपूर्ण नियंत्रण और धनप्राप्ति.

भारतके संविधानमें आपात्कालका प्रावधान कैसे हुआ था?

१८५७के जनविद्रोहको असफल करने के पश्चात अंग्रेज शासनने भारतकी आपराधिक संहितामें संशोधन किया. नागरिक अधिकारोंको स्थगित करना और उस अंतर्गत न्यायिक प्रक्रियाको निलंबित करना. इस प्रकार अंग्रेज शासनने, भारतमें आपातकाल घोषित करनेका प्रावधान रक्खा था.

आपातकालमें ऐसे प्रावधानोंसे क्या क्या हो सकता था?

भारतके मानव अधिकारोंको विलंबित किया जा सकता था.

शासन, किसी भी व्यक्तिको गिरफ्तार कर सकती थी.

गिरफ्तार करनेके समय और बादमें भी, गिरफ्तार करनेका आधार बताना आवश्यक नहीं है.

गिरफ्तार व्यक्तिको सरकार अनियतकाल पर्यंत कारावासमें रख सकती है.

गिरफ्तार की हुई व्यक्तिपर न्यायिक कार्यवाही करना अनिवार्य नहीं है.

व्यक्तियोंके संविधानीय अधिकारोंको विलंबित किया जाता है. तात्पर्य यह है कि कोई समूह बना नहीं सकते, चर्चा नहीं कर सकते. प्रवचन नहीं कर सकते. यदि ऐसा करना है तो शासनसे अनुमति लेनी पडेगी. शासन अपना प्रतिनिधि भेजेगा और उसकी उपस्थितिमें संवाद हो सकेगा.

समाचार माध्यम शासनके विरुद्ध नहीं लिख सकते, यत्किंचित भी करना है उसके लिये शासनकी अनुमति लेना अनिवार्य था.

इन्दिराने गणतंत्रकी हत्या क्यों कि?

१२ जुन १९७५ को नहेरुवीयन कोंग्रेसकी लज्जास्पद पराजय हुई. यह वही नहेरुवीयन कोंग्रेसथी जिसके पास ३ साल पहेले किये गये चूनावमें १८३ मेंसे १४० बैठकें जित गयी थीं.

१३ जुनको ईलाहाबाद उच्च न्यायालयने ईन्दिरा गांधीका चूनाव रद किया. इतना ही नहीं उसको संसद सदस्यके पदके लिये सालके लिये अयोग्य घोषित किया. यदि वह संसद सदस्यता के लिये भी योग्य नहीं रही, तो प्रधान मंत्री पदके लिये भी अयोग्य बन जाती है.

१८ जुनको गुजरातमें जनता मोरचा की सरकार बनी.

बिहारने नारा दिया “गुजरातकी जित हमारी है अब बिहारकी बारी है.

देशव्यापी आंदोलन होने वाला था.

इन्दिरा गांधीने आंतरिक आपातकाल घोषित किया.

नहेरु भी ऐसी परिस्थितिमें ऐसा ही करते. किन्तु वह स्थिति आनेसे पहेले वे चल बसे.

किन्तु आपातकाल की वार्ता करनेसे पहेले हम इस कथांशको अधिगत कर कि, नहेरु इस प्रकार प्रधान मंत्री बने थे?

जब भारतका स्वातंत्र्य निश्चित हुआ तो प्रधान मंत्री किसको बनाना वह प्रश्न सामने आया.

नहेरु बडे नेता अवश्य थे किन्तु सबसे बडे नेता नहीं थे.

उस समय भारतमें कोंग्रेस पक्षका संगठन व्यापक था. कन्याकुमारीसे लदाख और बलुचिस्तानसे अरुणाचल तक कोंग्रेस पक्ष फैला हुआ था. प्रत्येक ग्राम, नगर, तहेसील, जिला और प्रांतमें कोंग्रेसकी समितियां थी. हरेक प्रांतका संचालन प्रांतीय समिति करती थी. प्रधान मंत्रीके पदके लिये प्रधान मंत्री पदके लिये सुझाव मंगवाये गये थे. एक भी समितिने जवाहरलाल नहेरुका सुझाव नहीं दिया.

नहेरुने अपना आवेदन पत्र दिया था. महात्मा गांधीने नहेरुको बुलया. उनको कहा कि आपका नामका सुझाव एक भी प्रांतीय समितिने नहीं भेजा है. इससे यह निष्पन्न होता था कि, नहेरु नंबर वन से अतिदूर थे. नहेरु यदि लोकतंत्रमें श्रद्धा रखते होते तो उनको अपना आवेदन पत्र वापस लेना अनिवार्य था. किन्तु नहेरु लोक तंत्र में मानते ही नहीं थे. लोकतंत्रकी गाथा करना, केवल उनकी व्यूह रचना का भाग था.

नहेरुको प्रारंभसे ही अवगत था कि, जनतामें वे सर्व स्विकार्य नहीं थे. युवावर्गमें भी उनका क्रम सुभाषसे पीछे था. इस लिये वे १९३९के कोंग्रेसके प्रमुख पदके चूनावमें सुभाषके सामने पदके लिये आवेदनपत्र नहीं भरा. सुभाष के कोंग्रेसके छोडनेके बाद भी लोकप्रियतामें कई नेता नहेरुसे आगे थे. इस कारणसे नहेरुने एक समाजवादी गुट कंग्रेसमें ही बना दिया था. लेकिन सामान्य कोंग्रेसीको तथा अन्य वरिष्ठ नेताओंको तथा कथित समाजवादमें रुचि नहीं थी. इस लिये कंग्रेसके संगठन पर नहेरुका इतना प्रभाव नहीं था कि वे प्रधानमंत्री बन सके.

नहेरुने अपनी व्यूह रचना मनमें रक्खी थी. उन्होंने अपना उत्पात मूल्यको (न्युसन्स वेल्युको) कार्यरत करने का निश्चय किया. नहेरुने कंग्रेसका विभाजन करने का विचार किया. कंग्रेसके अंदर उनका समाजवादी गुट तो था ही. उतना ही नहीं कोंग्रेसके बाहर भी एक समाजवादी पक्ष था. यदि आवश्यकता पडे तो साम्यवादी पक्ष कि सहायता ली जा सकती थी. इन सबको मिलाके एक प्रभावशाली पक्ष बन सकता था.

महात्मा गांधीने नहेरुको प्रज्ञापित किया. प्रधान मंत्रीके पदके लिये एक भी प्रांतीय समितिने आपके (नहेरुके) नामका सुझाव नहीं दिया है. इस पर नहेरुकी क्या प्रतिक्रिया थी? नहेरुको क्या करना योग्य था? तब नहेरुको अपना आवेदन पत्र वापस ले लेना चाहिये था. किन्तु अपना आवेदन पत्र वापस लेनेके स्थान पर, नहेरु खिन्नतायुक्त अन्यमनस्क मूंह बनाके चल दिये.

गांधीजीको विश्वास हो गया कि नहेरु कोई पराक्रम करनेवाले है. यह पराक्रम था कोंग्रेसका विभाजन करनेका. उस समय भारतके सामने अन्य कई समस्याएं थीं, जिनमें भारतको अविभाजित रखना मुख्य था. कई राजा स्वतंत्र रुपमें रहेना चाहते थे. द्रविडीस्तान, दलितीस्तान, सिखीस्तान की मांगे भी हो रही थी. यदि उसी समय कोंग्रेसका विभाजन हो जाय तो कोंग्रेस निर्बल हो जाय और देशकी एकता के लिये एक बडा संकट पैदा हो जाय. गांधीजीको अवगत था कि, यदि पाकिस्तान भारतसे भीन्न बनने के अतिरिक्त,  भारत ज्यादा विभाजित होनेसे बचाना ही प्राथमिकता होनी आवश्यक है. संविधान आनेके बाद, चूनावमें तो नहेरुको सरलतासे प्रभावहीन किया जा सकता है. महात्मा गांधीने सरदार पटेलको मना लिया और वचन ले लिया कि वे देशके हितमें सहायता करेंगे और कोंग्रेसको विभाजित नहीं होने देंगे. सरदार पटेल ने वचन दिया.

इस पार्श्व भूमिकामें नहेरु प्रधान मंत्री बने.

नहेरु प्रधान मंत्री बन गये तो, तत्पश्चात उन्होंने अपने एक एक करके सभीको विरोधीयोंको कोंग्रेस छोडने पर निरुपाय किया. जब तक यह लोकतंत्र, स्वयंके लिये वास्तविक रुपमें आपत्तिजनक नहीं बना तत्पर्यंत नहेरुने  लोकतंत्रको आनंदप्रमोदके स्वरुपमें चालु रक्खा,. जब भी लोकतंत्र आपत्तिजनक बना तब उन्होने ऐसी व्युहरचनाएं बनाई जो लोकतंत्रके सिद्धांतोंसे विरुद्ध थी और अशुद्ध भी थी.

इन्दिरा गांधी, नहेरुकी तरह व्युह रचनामें और मानवव्यवहारमें निपूण नहीं थी. इन्दिराको अपने पद पर लगे रहेने के लिये कंग्रेसको तोडना पडा. और १९७५में अपने पद पर लगे रहेने के लिये मानव अधिकारों पर और संविधानीय अधिकारों पर प्रहार करना पडा.

आपतकाल घोषित करनेसे क्या हुआ?

हजारों लोग कारावासमें बंद हुए. उनके कुटूंबीजनोंको या तो उनके मित्रोंने संम्हाला यातो उनको अति कठिन परिस्थितियोंसे पसार होना पडा. अनेक लोग रोगग्रस्त भी हुए.

नागरिक अधिकारोंकी सुरक्षाके लिये न्यायालय अर्थ हीन बना.

सरकारी गुप्तचर संस्थासे लोग भयग्रस्त हुए.

इतना ही नहीं सुरक्षा कर्मचारी किसी भी व्यवसाय करने वालेको भय दिखाने लगा कि तुम यद्वा तद्वा असामाजिक कार्य कर रहे हो सा मैं शासनमें सूचन कर दुंगा. ऐसा मैं करुं, इस लिये तुम मुझे इतनी रिश्वत दे दो.

सभा प्रदर्शन पर निषेध था. शासनके विषय पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रुपसे भी कुछ नहीं लिख सकते. क्यों कि आपने जो लिखा उसका मनस्वी अर्थघटन शासनका नियंत्रक अधिकारी करेगा.

आपतकालमें अनधिकृत धन राशी का कितना स्थानांतर और हस्तांतरण हुआ इसके लिये एक महाभारत से भी बडा ग्रंथ लिखा जा सकता है. आपातकालके अत्याचार, शासकीय अतिरेक, मानव अधिकारका हनन इन सबके अन्वेषण शाह आयोग द्वारा किया गया. शाह आयोगने, एक मालवाहक भर जाय इतना बडा विवरण दिया है.

इन्दिरा गांधीने यह क्यूं नहीं सोचा कि इससे भारतकी गरिमाको हानि पहूंचेगी?

भारत एक महान देश क्यूं माना जाता है?

क्यों कि उसकी संस्कृति सिर्फ पूरानी ही नहीं किन्तु सुग्रथित, वैभवशाली, वैज्ञानिक विचार धारासे प्लावित, पारदर्शी और लयबद्ध है. भारतमें धर्मका प्रणालिगत अर्थघटन नहीं है. भारतमें विरोधी विचार आवकार्य है. चार्वाक भी है और मधुस्छंदा भी है. ६००० सालसे अधिक प्राचीन वेद आज भी उतने ही मान्य और आदरीणीय है, जितना वे पहेले थे. तत्वज्ञान जो है वह शाश्वत है. और जिवनके सभी घटक प्रणालीयोंमे एक सूत्रित है. यतः भारत विश्वका एक मात्र ऐसा देश है जो अतिप्राचीन समयसे विभीन्नविघटित, प्रकिर्ण, भौगोलिकतामें अति विस्तीर्ण होने पर भी एक देशके नामसे प्रख्यात है. इसका उल्लेख वेद पुराणोंमें भी विस्तारसे है. उसने अपनी संस्कृतिको जीवित रक्खा.

ऐसे भारतने १५० सालसे चलनेवाले एक सुसज्ज, सुग्रथित और नियमसे चलनेवाले विदेशी शासनका, अहिंसाके शस्त्रसे अंत किया. प्राचीन कालसे अर्वाचीन काल तक विश्वमें कहीं भी ऐसा मुक्तिसंग्राम नहीं हुआ. अहिसा आधारित संग्राम बलिदान देनेमें पीछे नहीं है. अहिंसा में भीरुता नहीं किन्तु शाश्वत निडरता रहती है. यह बात भारतने ही सिद्ध की. इस भारतके अहिंसक स्वातंत्र्य संग्रामसे अन्य कई देशोंने बोध लिया.

ऐसे देशकी प्रतिष्ठाको इन्दिरा गांधीने सिर्फ अपने स्वार्थ के लिये धूलमें मिला दीया.

जो जगजिवनराम अंग्रेजोंकी गोलीसे नहीं डरते थे वे कारावास और अपमृत्युसे डरने लगे. जो यशवंतराव चवाण स्वयंको शिवाजी, प्रदर्शित करते थे वे भी कारावाससे डरने लगे.

गुरुता लघुता पुरुषकी आश्रयवस ते होय, वृन्दमें करि विंध्य सो, दर्पनमें लघु होय.

इसका अर्थ है, व्यक्तिकी उच्चता व्यक्ति जिसके साथ है उसके पर अवलंबित है. यदि व्यक्ति निम्न कोटीके साथ है तो आप भी निम्न कोटीके बन जाता है.

अहो सज्ज संसर्ग कस्योन्नति कारक, पुष्पमालाप्रसंगेन सुत्रं शिरसि धार्यते.

यदि व्यक्ति उच्च कोटीके संसर्गमें रहेता है तो उसकी कोटी भी उन्नत बन जाती है. जैसे पुष्पमाला मस्तिष्क  पर चढती है तो साथमें सुत्र (धागा) भी मस्तिष्क पर चढ जाता है.

इन्दिरा गांधीने पातकालके विषय पर अपने पक्षमें यह कहा कि, वह आवश्यक था. उसने कई कारण भी दिये. हम उसकी चर्चा नहीं करेंगे.

किन्तु जब स्वयं इन्दिरा चूनावमें ५५००० मतोंसे हार गयी तो उसने पातकालका अंत घोषित कर दिया. उसने आपातकालके अंतर्गत ही चूनाव करवाया ताकि जनतामें भय कायम रहे.

इसका अर्थ तो यही हुआ कि आपातकालका कारण वह स्वयं थी. यदि शासकीय व्यवस्था अस्तव्यस्त थी तो उसकी स्वयंकी पराजयकी दुसरी क्षणसे वह व्यवस्था स्वस्थ तो नहीं हो जा सकती?

यदि इन्दिराकी दृष्टिमें और नीतिमें आपातकाल आवश्यक था और यदि वह स्वयंसे प्रस्थापित सिद्धांतोमें सत्यकी अनुभूति करती थी, स्वयंके निर्णयोंमें दृढताकी आग्रही थी, तो उसको स्वयंकी पराजय के पश्चात भी आपातकाल को चालु ही रखना चाहिये था. आपातकाल चालु रखना या उसका अंत करना, अनुगामी शासक पर छोड देना चाहिये था. किन्तु उसने ऐसा नहीं किया क्यों कि वह भीरु थी और अनुगामी सरकारसे भयभीत थी. वह भीरु थी उसका दुसरा उदाहरण यह था कि उसको शाह आयोग के प्रत्यक्ष स्वयं को प्रस्तूत करने कि निर्भयता नहीं दिखायी. यदि इन्दिरा स्वयंको प्रस्तूत करती तो …?

नहेरु और इन्दिरामें कोई वास्तविक भीन्नता नहीं थी.

दोनों नीतिहीन थे. नहेरु अपनी व्यूहरचनासे और उत्पात मूल्यसे प्रधान मंत्री बने और छल कपटवाली कूटनीतिसे प्रधान मंत्री बने रहे. इन्दिरा गांधी, अपने पिताके कारण प्रधानमंत्री बनी. फिर नीति हीनतासे और जनतंत्र को अस्तव्यस्त करके वह प्रधान मंत्रीके पद पर चालु रही.

इन्दिरा गांधी, जो स्वयं, इतिहासके दस्तावेजों पर सत्तालोलुपथी, और अपनी सत्ताकी रक्षाके लिये सारे देशको कारावास ग्रस्त करती थी, वह विपक्षके नेताओंको जो कारावासमें बंद थे उनको सत्ता लालची कहा करती थी. वह खुद, विपक्षके नेतांओंके प्रदर्शनको, शासनमें विघ्नकारी घोषित कहा करती थी, उसके स्वयं के नेतागण, चूं कि नहेरुवीयन कोंग्रेस गुजरातमें विपक्षमें था, सातत्यतासे बाबुभाई जशभाई पटेल की जनता पार्टीके शासनकी विरुद्ध प्रदर्शन, धरणा, व्याख्यान, निवेदन, आवेदन और गालीप्रदान किया करते थे. और जनता पार्टी के विरुद्ध बोलनेमें कोई निषेध नहीं था. आपातकालमें निषेध था तो वह नहेरुवीयन कोंग्रेसके विरुद्धमें नहीं बोलनेका.

INDIRA WAS A FRAUD

सौजन्य आरके लक्ष्मण का कटाक्ष चित्र

आतंकवाद और कपटपूर्ण हत्याः

यदि कोई कहे कि नहेरु और इन्दिरा आतंक वादी थे और कपटयुक्त हत्या (फेक एन्काउन्टर) करनेवाले थे तो?

खुदको क्षति करके अन्यका भला करो यह सज्जनका लक्षण है.

अपने विरोधीको नष्ट करके स्वयं को और अपने मित्रको लाभ करो उसको आप क्या कहोगे?

श्यामप्रसाद मुखर्जीका कश्मिरमें क्या हुआ? शेख अब्दुल्ला किसका मित्र था? शेख अब्दुल्लाके लिये नहेरुने क्या क्या नहीं किया?

समाजवादके नाम पर नहेरुने चीन से स्नेह किया. सीमा पर सैन्य सुसज्ज नहीं रखा. जब चीनने खुल्ला क्रमण किया तो सैन्यके पास कपडे नहीं थे, जूते नहीं थे, शस्त्र नहीं थे…. और ऐसे जवानोंको कहा कि जाओ युद्ध करो. इसको आप क्या कहोगे? आतंक कहोगे या फेक एनकाउन्टर?

१९७१में भारतीय सैन्य वीरतासे लडा. कश्मिरका जो भूभाग पाकिस्तानके पास था उसमेंसे भी, कुछ भाग हमारे सैन्यने ले लिया. हमारे सैन्यने ९२००० दुश्मनके सैनिकोंको गिरफ्तार भी किया. पूर्वपाकिस्तानको स्वतंत्र करवाया. हमारे कई सैनिकोंने बलिदान भी दिया. और भारतकी इस विजयका पूरा श्रेय इन्दिराने लिया.

इस युद्धके पूर्व इन्दिराने घोषणा की थी इस समय हम जिता हुआ भू भाग वापस नहीं देंगे, दुश्मनसे हानि वसुलीका दंड करेंगे. ९२००० पाक सैनिकोकों एक वर्ष तक खिलाया पिलाया उसका मूल्य वसुल करेंगे, एक कोटीसे ज्यादा बांग्लादेशी घुसपैठोंको वापस भेजेंगे, इनका भी हानिवसुलीका दंड देंगे. एक परिपूर्ण ऐसी संधि करेंगे कि पाकिस्तान कभी हमसे आंख उंची करके देख सके.

किन्तु इन्दिराने, सिमला संधिके अंतर्गत परिपूर्ण विजयको घोर पराजय में परिवर्तित कर दिया. भारतकोविशाल शून्य” प्राप्त हुआ. पाकिस्तानका जो भी भूभाग पराभूत हुआ था वह सब उसको मिल गया. कश्मिरका जो भूभाग पाकिस्तानके पास था उसमेंसे भी कुछ भाग हमारे सैन्यने ले लिया वह भी इन्दिराने पाकिस्तानको दे दिया. इन्दिराने ९२००० पाकिस्तानी सैनिकोंको मुक्त कर दिया. पाकिस्तान ने हमारे ४०० सैनिकोंको मुक्त नहीं किया. कोई बांग्लादेशी वापस नहीं भेजा. और अधिक बांग्लादेशी घुसखोर आये. इतना ही नहीं बांग्लादेशने हिन्दुओंको भयभित करके बांग्लादेश त्यागने पर विवश किया.

आप भारतीय सैनिकोंके बलिदानको क्या कहोगे? क्या उनके बलिदान का ध्येय यह था कि अपना देश पराजित देशके सामने नतमस्तक हो जाय? यदि उनका ध्येय यह नहीं था तो इन भारतीय सैनिकोंकी मृत्युको आप फेक एनकाउन्टर नहीं कहोगे क्या कहोगे?

जय प्रकाश नारायण की हत्या

इन्दिरा गांधीने आपतकाल अंतर्गत महात्मा गांधीके अंतेवासी जयप्रकाश नारायणको कारावासमें, चिक्तित्सा की और उनको मरणासन्न कर दिया. यह एक हत्या ही थी.

इन्दिरा गांधीने युनीयन कार्बाईडका संविद अनुबंध (कोन्ट्राक्ट डील) किया, किन्तु वह क्षतिपूर्ण था. आकस्मिक विपत्ति का प्रावधान इतना क्षतिपूर्ण था कि भोपालके गेस पीडितोंका जीवन अस्तव्यस्त हो गया. इतना ही नहीं, जो युनीयन कार्बाईडका प्रमुख एन्डरसन था, उनको भाग जानेमें मुख्य मंत्री और कोंगी फरजंद राजीव गांधीने मदद की.

इन निर्दोंषोंकी पायमाली को आप क्या कहोगे? यह आतंक नहीं है तो और क्या है?

लिखित और अलिखित, घोषित और अघोषित आपतकाल केवल और केवल नहेरुवीयनोंने ही लगाया था और लगाते रहे है. रामलीला मैदान मे रावण लीला जैसे अनेका अनेक उदाहरण आपको मिल सकते है.

क्या आपातकालके समय अडवाणी शिशु थे?

नहेरुवीयन शासनके समय अडवाणी पेराम्बुलेटर (बालगाडी) ले के नहीं चलते थे. उस समय अडवाणी ५०+ के वयस्क थे. १९७७१९७९ के अंतर्गत अडवाणी उच्च कक्षाके मंत्री भी थे. उस समय भविष्यमें कोई सत्तालोलुप प्रधान मंत्री आपातकाल घिषित करके मानव अधिकारोंको निर्मूलन कर सके, इस विषय पर पर्याप्त चर्चा विचारणाके बाद एक विधेयक बनाया था और उसको संसदसे अनुमोदित करवाया था. उस समय तो अडवाणी ने स्वयंकी तरफसे प्रस्तूत विधेयके प्रारुप लेखमें रुप परिवर्तनके लिये कोई संशोधन प्रस्तूत नहीं किया था. क्या वे कोई शुभ समय की प्रतिक्षामें थे?

प्रतिक्षा करो … चौधरी चरण सिंघका आत्मा .

क्रमशः

शिरीष मोहनलाल दवे.

 टेग्झः

नहेरु, फरजंद, इन्दिरा, अहो रुपं अहो ध्वनि, कलंक, समाजवाद, चीन आक्रमण, पराजय, मृत्युशैया, प्रजातंत्र, मानव अधिकार, संविधान, आपातकाल, प्रदर्शन, निषेध, इतिहास, कालिमा, वज्रलेप, १९७५, जुन, सिमला संधि, उत्पात मूल्य, न्युसंस वेल्यु, चार्वाक, मधुस्छन्दा, तत्वज्ञान, भारत, एकमात्र, युनीयन कार्बाईड, संविद अनुबंध, डील

Read Full Post »

नरेन्द्र मोदीको क्या बनना चाहिये? कौटिल्य अथवा पृथ्वीराज चौहाण? – २

मुहम्मद घोरीने किसीको भी क्षमा किया नहीं था. ठीक उसी प्रकार नहेरुवीयन कोंग्रेसने भी कभी अपने देशी शत्रुको क्षमा किया नहीं था. उतना ही नहीं फर्जी मामले बनाकर भी उसकी मानहानि करनेकी और न्यायिक कार्यवाही द्वारा उसको हानि करनेके भरपुर प्रयत्न किये है.

नहेरुः
नहेरुने अपने विरोधी मोरारजीके विरुद्ध मोरारजीकी संतानको लेकर फर्जी कथाएं चलाइ थीं. कामराजप्लान के अंतर्गत एक फर्जी प्लान बनाके मोरारजी देसाईको मंत्री मंडलसे निकाला गया था.

Narendra Modi has to decide ०१

ईन्दीरा घाण्डीः

ईन्दिरा घान्डी नहेरुवाली नीति चलाके मोरारजीकी मानहानि करवाती रहती थीं.

इन्दिराने आपातकाल के दौरान कई नेताओंको मरणासन्न कर दिया था.

आपतकाल खुद एक फॉड था.

वीपी सींग के विरुद्ध सेंटकीट्स मे उनके नाम फर्जी एकाउन्टका केस दर्ज किया था.

सर्वोदय संस्थाओंके खिलाफ जांचके आदेश दिये थे और सर्वोदय संस्थाओंको निर्दोष होते हुए भी परेशान किया था.

मोरारजी देसाई सीआईएके वेतन पत्रक (पे रोल) पर है ऐसे आक्षेप करवाये थे.

जयप्रकाश नारायणने सैन्य को विद्रोह करनेका कहा था ऐसे आक्षेप करके उनको कारावसमें बंद किया था. अन्य हजारों नेताओंको भी कारावास में बंद किया था.

तारकेश्वरी सिंहाके उपर असत्य आक्षेप करवाये और उनको आत्म हत्या करनी पडी(!).

ज्योर्ज फर्नान्डीस पर फर्जी केस बनाया था और उनको जेलमें बंद किया था.

सोनीया-एमएमएसः

बाबा राम देव को फर्जी केस बनाके परेशान किया, अन्ना हजारे को भी परेशान किया, किरन बेदीके विरुद्ध आक्षेप करके परेशान किया, बाजपाईका किस्सा और अडवाणीकी घटनाएं तो हमने देख ही ली है.

नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, आदि के विरुद्ध फर्जी केस बनवाये.

पुलिसका मोरल डाउन करनेके कई और काम भी किये.

नहेरुवीयन और उनके साथीयोंका संस्कार रहा है कि खुदकी सत्ता और धनके लिये कुछ भी करो, चाहे देशका सामाजिक चारित्र्य कितना ही अधम क्युं न हो जाय.

जो लोग वोटबेंकी सियासत खेलते है वे हमेशा पुलिस और सीबीआई का यथेच्छ उपयोग करते हैं. सरकारी अधिकारीयोंको भ्रष्ट होने देते हैं फिर उनके भ्रष्टाचारके आधार पर उनसे गलत काम करवाते हैं. अन्य लोगोंकी भी ब्लेक डायरी बनाई जाती है जिनमें लालु, मुलायम, ममता, मायावती, जयललिता, करुणानिधि शरद पवार मुख्य है.

ये सब अर्वाचीन मुहम्मद घोरी है.

इन अर्वाचीन मुहम्मद घोरीयोंको कैसे नष्ट कर सकते है?

अति सरल है. क्युं कि ये लोग अतिभ्रष्ट है, जहां भी हाथ डालो उनका भ्रष्टाचार पकडा जा सकता है.

(१) आपातकालमें जिन्होने ईन्दिरा गांधीकी सहायता की थी और जो लोग अभी भी जीवित है, उनके उपर शाह जांच समितिके सूचनोंके आधार पर कार्यवाही हो सकती है. उनको गिरफ्तार कर लो और जेलमें डाल दो. कार्यवाही होती रहेगी.

(२) एन्डरसनको भगाने वालोंमें सोनिया गांधी एक पक्षकार बन सकती है. उनके उपर भी ऐसी ही कार्यवाही हो सकती है.

(३) कश्मिरी हिन्दुओंके प्राकृतिक अधिकारके हनन और लगातार हो रहे मानवीय अधिकार के हननके मामलेमें, अपना फर्ज न निभानेके कारण, कश्मिरके सभी नेताओंको तथा नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंको शिघ्र ही प्रग्रहित (गिरफ्तार) कर सकते हैं. उनकी संपत्ति जप्त कर सकते है.

(४) नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंने और उनके साथीयोंने विदेशी बेंकोमें बीना रीझर्वबेंककी संमति गैरकानुनी एकाउन्ट खोलके काला-लाल धन जमा किया, इस बात पर उन सबके उपर फौजदारी कार्यवाही कर सकते है. क्यों कि यह देशके साथ गद्दारीका विषय है ये सब एकाउन्ट होल्डर गिरफ्तार हो सकते है. इन एकाउन्टोंका राष्ट्रीयकरण करके सबके नाम प्राप्त किया जा सकता है और जो लोग एकाउन्ट होल्डर न हो किन्तु मनिनीत (नोमीनी) व्यक्ति हो तो भी उसके उपर फौजदारी कार्यवाही हो सकती है.

(५) कोमनवेल्थ गेम, कोयला आबंटन और २-जी के बारेमें कई नेताओंको गिरफ्तार करके जेलमें रखा जा सकता है.

(६) भारतीय करन्सी नोट के मुद्रणका संविदा (ठेका) जिसको दिया था वह आतंकी संगठनोंसे संलग्न होनेके कारण अन्य देशोंमे प्रतिबंधित थी. फिर भी नहेरुवीयन कोंग्रेसने उसको मुद्रणका संविद दिया. कई कर्जी करन्सी नोट सरकारी बेंकके एटीएम यंत्रमेंसे निकली थी. इससे यह निरपेक्ष प्रतिबिंबित होता है कि नहेरुवीयन कोंग्रेसके ही नेतागण इससे संलग्न है. इस मामले पर भी कई नेताओंको गिरफ्तार किया जा सकता है.

(७) कई नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण जातीय मामलेमें विवादित है. उनके उपर कार्यवाही शुरु की जा सकती है.

दुसरे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

कई नहेरुवीयन कोंग्रेसके मुसलमान नेताओंकी संतान अभद्र और विभाजनवादी कोमवादी भाषा प्रयोग करती रहेतीं हैं इतना ही नहीं कई नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके साथी नेताओंने कोमवादी उच्चारण अनेकानेक बार किया है उनको गिरफ्तार करके जेलमें बंद कर सकते है.

तीसरे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

ये है समाचार माध्यमके स्वामि. जिनका काम समाजिक शिक्षाका काम करना है. उसके स्थान पर वे देशको विभाजित करनेका काम करते हैं. इनके पाससे हमेशा उचित अवसरों पर स्पष्टिकरण मांगते रहेना चाहिये और जब वे विफल रहें तो उनका अनुमति पत्र रद करनेका और कानुनी कार्यवाहीका आरंभ कर देना चाहिये.

चौथे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

ख्रिस्ती धर्मके पादरी लोग हैं. ये लोग हिन्दु धर्मकी निंदा करते हैं. तत्कालिन बने इसाईयोंको हिन्दुओंसे संबंध न रखने के लिये प्रभावित करते हैं और विभाजनवादी प्रवृतियां करते हैं. गरीब हिन्दुओंको लालच दे के धर्म परिवर्तन करवाते हैं. ऐसे पादरीयों पर सुक्ष्म दृष्टि रखकर कानुनी कार्यवाही की जा सकती है.

पांचवे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

ये है सरकारी अफसर. इनका काम नियमका पालन करना है और नियमका पालन करवाना है. इस कामके लिये उनको वेतन मिलता है. वे अपनी क्षतियांके लिये और सामाजिक अव्यवस्थाके लिये उत्तरदेय है.

नरेन्द्र मोदीको चाहिये कि इनको सीधा करें. यदि इनको सीधा करेंगे तो सब कुछ सीधा हो जायेगा.

कार्यवाही कैसे की जाय?

जो भी कार्यवाही करनी है, वह किसी भी प्रकारका कोलाहल किये बिना करना है. इसमें कोई निवेदनों की या विज्ञापन देनेकी आवश्यकता नहीं हैं. यदि कोई समाचार माध्यमवाले अनावश्यक प्रश्न करें तो उनके उपर भी जनताको पथभ्रष्ट करनेकी और जनताको भ्रमित करनेके आरोप लगाके कानुनी कार्यवाही हो सकती है.

अन्य कई कार्य है जो विकास, कानुन सुधार और गवर्नन्सके बारेमें हैं वे होते रहेंगे, क्यों कि प्रत्येक विकासकी परिकल्पनाके निदेशकका उत्तरदायित्व है कि वह अपना पूर्ण करें. और वह करेगा ही. उपरोक्त कार्य जिसमें कानुनमें संशोधनकी आवश्यक नहीं है, वे प्रारंभ कर सकते हैं. वास्तवमें नियम तो प्रत्येक उत्तरदायुत्वके लिये है. केवल अर्थघटन नहीं किया जाता है.

ऐसा नहीं करेंगे तो क्या होगा?

इतिहासका पुनरावर्तन होगा.

यदा तदा दुश्मनके कुकर्मोंको क्षमा किया है तब देशको सहन करना पडा है.

(१) नहेरुने प्रेमभाव रखके चीनकी लश्करी घुसपैठकी उपेक्षा की तो चीनने भारतकी ९१००० चोरस मील धरती पर अधिकार जमा लिया. हमारे हजारों जवान बेमौत मरे.

(२) इन्दीरा घान्डीने पाकिस्तानके साथ बेवकुफी बतायी और सिमला करार किया जिससे पाकिस्तानने जो खोया था वह सब पा लिया. बंग्लादेशने अपना देश पा लिया और एक करोड बीन बंगाली मुस्लिमोंसे छूटकारा भी पा लिया जो आज भारतके शिर पर है. १९७१में भारतके सैन्यने पायी हुई विजयके कारण, इन्दिरा इतनी सीमा तक सशक्त बनी थी कि वह पाकिस्तान, बांग्लादेश और कश्मिरके साथ जो चाहे वे शर्तें लागु कर सकती थीं. यदि इन्दिरा चाहती तो पूरे कश्मिर पर भारतका अधिकार स्थापित करके कलम ३७०को खत्म कर सकती थी. सिमला करार एक व्यंढ करार था. आज पाकिस्तान भारत पर आतंकी आक्रमण करता है. इन्दिराकी दुश्मन देशको क्षमा करने के कारण हजारों भारतीय जवानोंकी सहादत पर पानी फिर गया. और दुश्मनके आतंकोंसे भी हजारो बेमौत मरे.

(३) मोरारजी देसाईने पक्ष विरोधी प्रवृत्तिके लिये चरणसिंघको मंत्रीमंडलसे निष्कासित कर दिया था. चरणने क्षमायाचना की. अटल बिहारी बाजपाईने मोरारजी देसाईको कहा कि उनको माफ कर दो. मोरारजी देसाईने, बाजपाईके कहेने पर चरणको माफ किया और उसको फिरसे मंत्री मडलमें लिया.

(४) चरण सिंघने अपना एक गुट बनाया. इन्दिरा के उपरकी शाह कमीशनकी कार्यवाही आगे न बढायी और इन्दिराका सहयोग लेके मोरारजी देसाईकी सरकारका पतन करवाया. उसी इन्दिराने चरण सिंघकी सरकारको दिये हुए समर्थनको प्रत्याहृत करके चरण सिंघकी सरकारका पतन किया.

(५) राहुल गांधी जब जाली पासपोर्ट और नकदके साथ युएसमें पकडा गया तो बाजपायीने उसको मुक्त करवाया. उसीके कारण नहेरुवीयन कोंग्रेसको जिवनदान मिला. देशको १० साल तक लुटनेका एक अधिक अवसर नहेरुवीयन कोंग्रेसको मिला.
जिन्होंने प्रतिस्पर्धीको माफ किया उनको सहन करना पडा. नहेरु और इन्दिराने विदेशी दुश्मनोंको माफ किया, इससे देशको आज भी सहन करना पडता है.

मोरारजी देसाईने चरणसिंहको क्षमा किया तो देशको कोंग्रेस मुक्त शासन मिलनेमें ३५ वर्षकी देरी हो गई. इस अंतर्गत देशके लाखों मनुष्य बेमौत मरे और करोडों मनुष्योंको यातनाएं सहन करनी पडी. खरबों रुपयेकी तस्करी हुई वह वार्ता तो भीन्न ही है.

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः अर्वाचीन मुहम्मद घोरी, नहेरु, इन्दिरा, एन्डरसन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मोरारजी देसाई, आपातकाल, फ्रॉड, मरणासन्न, जयप्रकाश, मानहानि, कर्जी नोट, एटीएम यंत्र, सेन्ट कीट्स, सर्वोदय संस्था, सीआईए, पे-रोल, तारकेश्वरी सिंहा, ज्योर्ज फर्नान्डीस, सोनीया-एमएमएस, कारावास, गिरफ्तार, बाबा रामदेव, अन्ना हजारे, किरन बेदी, नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, कश्मिरी हिन्दु, विदेशी बेंक, काला-लाल धन

Read Full Post »

अनीतियोंसे परहेज (त्यागवृत्तिक्योंजो जिता वह सिकंदर-2

के अनुसंधानमें इसको पढें

नहेरुवीयन कोंग्रेससे सावधान रहेनेके लिये और देशको बुराईयोंसे मुक्त करनेके लियेनहेरुवीयन कोंग्रेसकी आचार नीतियां और चूनाव रणनीतियां समझना आवश्यक है.

नहेरुने कैसी चूनावी रणनीतियां अपनाई थी और खुदकी सत्ता कैसे बनाई रखी थीवह हमने इसके पूर्वके लेखमें देख लियानहेरु खुदकी सत्ता टिकानेकी व्युहरचना बनानेमें चालबाज थेउन्होने कैसे मोरारजी देसाई और अन्य विरोधीयोंको हटाया वह हमने देख लियाउनकी व्युह रचनामें साधन की अशुद्धि गर्भित थीलेकिन कोई उसको नीतिमत्ताके तर्क के आधार पर चूनौति नहीं दे सकता था  तो समाधान कारी टीका कर सकता था.

नहेरुकी तरह  ईन्दीरा गांधी अपने समकक्षको दूर करनेकी और उसको निरर्थक बनानेकी फिराकमें रहती थीं.

मोरारजी देसाई और सीन्दीकेटके नेतागण ईन्दीरा गांधीके समकक्षही नहीं लेकिन काफि सीनीयर थेइस लिये ईन्दीरा गांधीने उनको हटानेकी योजना बनाई

ईन्दीरा गांधी नहेरुकी सभी रण नीतियोंसे वह अवगत थीचूनाव जितने के लिये और या सत्ता बनाये रखने के लिये साम्यवादीयोंकी रणनीति ऐसी रही कि जनताके साथ मानसिक जर्क (आंचकेदेनेवाली राजकीय घोषणाये करते रहो.  जनताको विभाजित करो और विरोधीयोंको बदनाम करते रहोसमाचार माध्यम पर प्रभूत्व रखो और उसका भी उपयोग करो.

जर्क देने वाली प्रवृत्तिः

पूर्व रजवीयोंके वर्षासन और विशेषाधिकारोंका अंतः

१४ बडी बेंको का राष्ट्रीय करणः

आम कारीगरोंको कम मुल्यवाला उधार:

ये सब करनेकी क्या जरुरत पडी?

ईन्दीरा गांधीने कहा मेरे पिताजी यह सब करना चाहते थे लेकिन ये सीन्डीकेट के नेता गण उनको करने देते नहीं थेमुझे गरीबी हटानी हैइसलिये मेरा नारा है “गरीबी हटाओ”.

समाचार माध्यमोंने ईन्दीरा गांधीको अभूत पूर्व प्रसिद्धि दीक्यों कि एक बडे पक्षमें नेतागाण एक दूसरेके विरुद्ध बाते करेंवे समाचार पत्रोंके लिये बीलकुल नयी बात थी.

राष्ट्र प्रमुख का चूनाव  पडा थासींडीकेटके नेतागण चाहते थे कि संजिव रेड्डी राष्ट्रप्रमुखपक्षीय कारोबारीके बहुमत सभ्य संजिव रेड्डीके पक्षमें थेईन्दीरा गांधी इसी कारण उनको चाहती नहीं थींउन्होने अपना उम्मिदवार पर्दे के पीछे तयार कर दियावह थे एक मजदूर नेता मानेजाने वाले वीवी गीरी.

इन्दिराका फतवा

ईन्दीरा गांधीने “आत्माकी आवाज”का एक सूत्र चलाया किराष्ट्रप्रमुखके चूनावमें सभी संसदोंको आत्माकी आवाजके अनुसार मत देना चाहियेआत्माकी आवाजका गर्भित अर्थ था वीवी गीरीको मत देनाराजकीय विश्लेषकोंने समझ लिया कि यह एव शक्ति परिचय का दाव हैविपक्ष बिखरा हुआ थाजो विपक्ष लेफ्टीस्ट थे उन्होने ईन्दीरा गांधीके उम्मिदवारको मत देनेका मन बनायाकोंग्रेसमें जिन्होने घोषित किया कि वे आत्माकी आवाजको पुरस्कृत करते हैउनको समाचार माध्यमोंने रेडियो सहितजरुरतसे ज्यादा प्रसिद्धि दी.

ईन्दीरा गांधीके प्रशंसकोंने  संजिव रेड्डीके खिलाफ बिभत्स पत्रिकाएं संसदके मध्यस्थ खंडमें फैलाईयह बात गैर कानुनी थीफिर भी हवा ईन्दीरा गांधीके पक्षमें थी इसलिये इन सब बातोंको नजर अंदाज किया गयाकोई रोक टोक हुई नहीं.

राष्ट्रप्रमुख के मतदान प्रक्रिया में दुसरी पसंदका प्रावधान हैउस दुसरी पसंदके मतोंको भी लक्षमें लेनेसे वीवी गीरी निर्वाचित घोषित किये गयेइस प्रकार कोंग्रेसके मान्य उम्मिदवार परास्त हुएईन्दीरा गांधीने खुदकी शक्तिको बढाने के लिये अपने पक्षके उम्मिदवार को परास्त करवायाइसके बाद उसने असाधारण सभा बुलाई और अपना खुदका पक्षप्रमुख और कारोबारी नियुक्त कीकथा तो बहुत लंबी हैअसली कोंग्रेस कौनक्योंकि मूलभूत कोंग्रेसकी महासभा भी बुलाई गई थीजो ईन्दीराके पक्षमें थे वे ईन्दीराकी महासभामें गये और जो ईन्दीराके पक्षमें नहीं थे वे मूल कोंग्रेसकी महासभामें गये.

ईन्दीरा गांधीके कोंग्रेस पक्षको कोंग्रेस (जे), इस नामसे उल्लेख होने लगाक्योंकि इसके पक्ष प्रमुख जगजीवनराम थेमूल कोंग्रेसके प्रमुख नीलम संजिव रेड्डी थे इस लिये इस कोंग्रेसको कोंग्रेस (एनसे उल्लेखित किया गयादुसरे भी नाम थे . कोंग्रेस आर (रुलींग) [या तो कोंग्रेस आई (ईन्दीरा)], कोंग्रेस  (ओर्गेनीझेशन).

सीन्डीकेट के अन्य नेतागण को छोड दे तो मोरारजी देसाई अपने राज्यमें भूमिगत नेता थेउनको परास्त करना जरुरी थाबदनाम करनेमें तो तरुण तर्क नामका जुथ सक्रीय थालेकिन चूनावमें खास करके गुजरातमें मोरारजी देसाईके प्रभूत्वको खतम करना मुस्किल थामोरारजी देसाईको और उनके साथीयोंको चूनावमें कैसे हराया जाय?

यहांसे ईन्दीरा गांधीने शुरुकिया राजकीय नीतिहीन दावपेंच.

जनताको विभाजित करो और चूनाव जितोः

१९६९७०का चूनाव

जनताको कैसे विभाजित करें?

गरीबी हटाओका नारा एक नारा मात्र नहीं थालेकिन इसके पीछे ऐसा प्रचार था किनहेरुवीयन वंशके लोग तो गरीबी हटाने के लिये प्रतिबद्ध थे लेकिन ये बुढ्ढे लोग (स्वतंत्रताके आंदोलनमें भागलेनेवाले नेतागण जो पक्षके उपर प्रभूत्व रखते थे वे ६०६५के उपरके हो गये थेनहेरुको आर्थिक क्रांति करनेसे रोक रहे थेइसके साथ एक प्रचार यह भी हुआ किअब कोंग्रेसका नेतृत्व युवा नेता (ईन्दीरा गांधी)के पास  गया हैअब प्रत्याघाती नेताओंको उखाडके फैंक दो.

युवावर्ग ही नहीं लेकिन जो मूर्धन्यवर्ग थाराजकीय विश्लेषक थे वे भी ईन्दीरा गांधीकी बातोंमें  गये थे क्यों कि बडे नामवाले भी विवेक शक्तिमें कमजोर हो शकते है या तो उनका खुदके स्वार्थसे विमुक्त नहीं हो सकते हैसाधानशुद्धिप्रमाणभानप्रास्तुत्य के तर्ककी क्षमता हरेक के बसकी बात होती नहीं होती है.

नाम बडे लेकिन दिल कमजोर हो ऐसे कई नेता कोंग्रेसमें थेजो सबके सब सर्व प्रथम ईन्दीराकी कोंग्रेसमें लग गयेइन नामोंमे जगजिवनरामयशवंतराव चवाणललित मिश्राबहुगुणावीपी सिंग आदि कई सारे थे.

सीन्डीकेट के अन्य नेतागण को छोड दे तो मोरारजी देसाई अपने राज्यमें भूमिगत नेता थेउनको परास्त करना जरुरी थाबदनाम करनेमें तो तरुण तर्क नामका जुथ सक्रीय थालेकिन चूनावमें खास करके गुजरातमें मोरारजी देसाईके प्रभूत्वको खतम करना मुस्किल थामोरारजी देसाईको और उनके साथीयोंको चूनावमें कैसे हराया जाय?

गुजरातमें १९६९का कोमी दंगा

गरीब और अमीर इसमें तो थोडासा भेद उत्पन्न कर दिया थालेकिन वह पर्याप्त नहीं था१९६९में कैसे हिन्दु मुस्लिमका दंगा हुआ यह एक बडे संशोधनका विषय हैयह एक लंबी कहानी हैपरिणाम यह हुआ किमोरारजीदेसाईके प्रभूत्ववाली गुजरातकी कोंग्रेस (), के खिलाफ मुस्लिम मत हो गयाऔर १९६९७०के संसद चूनावमें देशमें इन्दीरा गांधीके कोंग्रेस पक्षको भारी बहुमत मिलागुजरातमें भी उसको २४मेंसे  बैठक मिली जो एक आश्चर्य था क्योंकि गुजरातमें इन्दीरा गांधी उतनी लोकप्रिय नहीं थींयह हो सकता है किमुस्लिम मतोंका धृवीकरण हो गया था१९६८ तक मुस्लिम लोग सामान्य प्रवाहमें थेबीन कोंग्रेसी विपक्षमें भी मुस्लिम नेता थेबीन कोंग्रेसी विपक्षमें स्वतंत्र पक्षसंयुक्त समाजवादी पक्ष और कुछ स्थानिक पक्ष थेलेकिन १९६९के दंगो द्वारा देशके मुस्लिम समुदायको संदेश दे दिया था कि बीन कोंग्रेसी पक्ष मुस्लिमों की रक्षा कर नहीं कर सकता.

जितके कारण और विधानसभा चूनाव

१९७१में पाक– युद्धमें भारतके लश्करको भारी विजय मिलीउसका श्रेय इन्दीरा गांधीको दिया गया१९७१की जितके बाद घुसखोरोंको वापस भेजनेकि कार्यवाही करके सामान्य स्थिति करनेके बजायअन्य राज्योंमें और गुजरातमें भी चूनाव करवाये और विधानसभाके चूनावोंमें भी इन्दीरा की कोंग्रेसको भारी बहुमत मिलागुजरातमें १६८ बैठकमेंसे १४० बैठक उनको मिलीं.

मुस्लिम मतोंका धृवीकरण के साथ साथ नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओ द्वारा जाती विभाजन द्वारा विभाजन भी शुरु कर दियानवनिर्माणका आंदोलन ग्राम्य विस्तार तक फैला नहीं था और वैसे भी ज्ञातिप्रथा ग्राम्यविस्तारमें ज्यादा असरकारक होती हैइसलिये ग्राम्य विस्तारमें यह विभाजन करना आसान था.

चूनाव प्रपंच और गुड  गवर्नन्स अलग अलग है     

इन्दीरा गांधी सियासत के प्रपंच करनेमें माहिर थींलेकिन वहीवट (गवर्नन्स)में माहिर नहीं थींविदेश नीति रुस परस्त थीसिमला करार में ईन्दीरा गांधीने देशकी विजयको पराजयमें परिवर्तित कर दिया थाइन्दीरा गांधी बंगलादेशी मुस्लिम घुसपैठोंको वापस नहीं भेज सकी थीं.  महंगाई और करप्शन बहुत बढ गयेइन्दीरा गांधी खुद साधन शुद्धिमें मानती नहीं थी और सिर्फ वोटबेंक पोलीटीक्समें मानती थींइसलिये बेंकोका वहीवट रसाताल गयासमाचार माध्यम की आंखे भी खुल गई थींगुजरातमें भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन हुआ जिसमें सौ से उपर छात्रनहेरुवीयन सरकार द्वारा किये गये गोलीबारमें मार दिये गयेसर्वोदयी नेतागण भी इन्दीराके विरुद्ध हो गये थे.

इतना ही नहीं उनका खुदका चूनाव उच्चन्यायालयमें चल रहा थागुजरातका नवनिर्माणका लोक आंदोलन व्यापक हो रहा थाईन्दीराको लगा कि १९७६में आने वाला चूनावमें उसका पक्ष हार सकता हैगुजरातमें विधानसभा भंग करनी पडी थीऔर नया चूनाव भी देना पडा थाउसमें उसका पक्ष खाम (क्षत्रीयआदिवासी और मुस्लिम मतोंका धृवी करण हो गया था तो भी पक्ष विरोधी वातावरणके कारण कमजोर पड गया था और जनता मोरचाने शासन धुरा ले ली थीगुजरातके भ्रष्टाचार के विरुद्धके लोक आंदोलन के आधार पर ऐसा आंदोलन पूरे देशमें व्यापक हो रहा थाविपक्ष एक हो रहा थाइन्दीराको लगा कि १९७६में आने वाले चूनावमें उसका पक्ष हार सकता है.

सबका मुंह बंद करनेके लिये इन्दीरा गांधीने आपातकालकी घोषणा कीऔर विरोधियोंको जेल भेज दियासमाचार के उपर सेन्सरशीप लागु कीसभासरघस पर प्रतिबंध लागु कर दियेक्योंकि इन्दीरा गांधीने समझा किसमाचार माध्यम के कारण और विरोधियोंके कारण ही कोंग्रेसका जनाधार जा रहा हैआपात काल भी इन्दीरा गांधीको भारी पड रहा थाक्यों कि उनके पास गवर्नन्सका कौशल्य नहीं थागवर्नन्स एक सुस्थापित चेनलसे चलता हैयह एक बुद्धि और विवेक शक्तिका काम हैयह कोई मुनसफ्फीसे संबंधित नहीं हैसियासतमें लचिलापन चल सकता हैगवर्नन्समें लचिलापन और मनमानी चल सकती नहीं हैइन्दिरागांधी गवर्नन्स में कमजोर थींजो आपखुद होते है वे मानवके अंदरके आंतर प्रवाहको नहीं जान सकतेइन्दिराने सोचा कि समाचार माध्यम सरकार की बुराई नहीं करते हैऔर सरकारके बारेमें अच्छी अच्छी बातें ही बताते है तो जनता कोंग्रेसको  ही मतदान करेगीआपतकाल अपने भारसे ही तूट पडा थाइन्दिरा गांधीने समाचार माध्यमोंमे खुदके पक्षका एक पक्षीय प्रचार द्वारा चूनाव जितनेका प्रयास कियालेकिन वह असफल रही क्यों कि विपक्ष और जनताके सुज्ञ लोग घर घर जाके लोकशाही का प्रचार कियाइतना ही नहीं यह भी पता चला किभारतीयोंकी सांस्कृतिक विरासत इतनी कमजोर पड गई नहीं थी कि वह विवेक शून्य बनके दृष्यमान श्रेय और अश्रेय समज  सके.

१९८०का चूनाव

इन्दीरा गांधीने १९६९  से १९७५ तक के कार्यकालमें काफी पैसे जमा किये थे ऐसा माना जाता है.

गुजरातके इन्दीरा कोंग्रेसके मुख्य मंत्री जब १९७२७३में इन्दिरा की ईच्छा  होने पर भी मुख्यमंत्री बने और बादमें जन आंदोलनके कारण उनको पदभ्रष्ट करना पडा तो वे इन्दीरा गांधीके विरुद्ध हो गये और उन्होने एक किताब लिखी थीकि इन्दीरा गांधीने तेल-मीलरोंसे कैसे और कितने पैसे वसुल किया थाउत्पादन पर सरकारका संपूर्ण अंकूश थाअंकूश पैसेसे बिकते थेयुनीयन कार्बाईड का सौदा भी जानबुझकर क्षतियुक्त रक्खा गया सौदा था१९७७के संसदीय चूनावमें अहमदाबादके ख्यातनाम वकिल चंद्रकांत दरुने बताया था कि उसने मुगलसराई रेल्वे वेगन के चीफको आदेश दिया था कि वह एक करोड रुपया दे दे१९७९८० के चूनाव के समय इन्दीरा गांधीने संसदीय टीकटे एक एक करोडमें बेची थीआपतकाल दरम्यान ऐसा कहा जाता है किजमाखोरोंसे और रीश्वत खोरोंसे धमकीयां दे के इन्दीरा गांधीने बहुत सारे पैसे ईकठ्ठे किये थेआज जो राजकारणमें पैसेकीशराबकी और बाहुबलीओंकी जो बोलबालाए दिखाई देती हैउसके बीज नहींलेकिन इस बरगदके पेडकी जडे और विस्तार इन्दीरा गांधीने बनाया है.

१९७७ में जब आखीरमें इन्दीरा गांधीको लगा कि उस चूनावमें पैसे बिखरना काममें आने वाला नहीं हैतो उसने उम्मिदवारोंको उनके भरोसे छोड दिये थेनहेरुवीयन कोंग्रेसके कई लोगकी डिपोझीट जप्त हुई उसकी वजह भी यही थी.

१९७७ तकके जमा किये हुए पैसे इन्दीरा गांधीको १९८०के चूनावमें काम आयेचरण सिंह जिन्होने खुदको महात्मा गांधी वादी मनवाया थावे इन्दिरासे बिक गयेमोरारजी देसाईकी कामकरने वाली सरकारको गिरायानये चूनाव प्रचार दरम्यान खूब पैसे बांटे गये होगेसमाचार माध्यम वैसे ही बिकनेको तैयार थे और उन्होने नहेरुवीयन कोंग्रेसका भरपूर प्रचार किया और जनता फ्रंटकी भरपूर निंदा कीईन्दीरा गांधीको फिरसे निरपेक्ष बहुमत मिला.

१९८०१९८४ के अंतर्गत खालिस्तानी आतंकवादका जन्म हुआ और प्रसार भी हुआपंजाबकी सियासतमें दो गुटोंमेसे एक को कमजोर करनेके लिये इन्दीरा गांधीने भीन्दरानवाले को संत बनाके बडा कियाइन्दीरा गांधी वैसे भी अनिर्णायकता की कैदी थींइन्दीरा गांधीने जैसी उसने बंग्लादेशी घुसपैठोंको निकाल देनेमें अनिर्णायकता और कमजोरी रक्खीवैसा ही उन्होने भीन्दराणवाले की खुल्ले आम होती हुई बैंकोंमे होती डकैत आतंकी हुमलोंके बारेमें कियाईन्दीरा गांधीने आतंकीयोंको सुवर्णमंदिरमें लगातरा शस्त्रोके साथ घुसने दिये और आश्रय लेने दियादुनियामें ऐसा कोई देश नहीं है जहां अगर खूनी धर्मस्थानमें घुस जाय तो सरकार उस धार्मिक स्थानमें जाके खूनी को  पकड सकेभारतमें भी अगर कोई चोर धर्मिक स्थानमें जाके घुस गया है तो पुलीस वहां नहीं जा सकतीऐसा कोई कानुन नहीं हैलेकिन इन्दीरा गांधीने अनिर्णायकता की कैदी होनेकी वजहसे और समय बीतानेके लियेएक कानुन पास किया किअगर आतंक वादी धार्मिक स्थानमें जायेंगे तो पुलीस वहां जाके उनको पकड सकती हैजब सरसे पानी गुजरने लगा और वे बदनाम होने लगीं तब उसने ब्रीटनको विश्वासमें लेके सुवर्ण मंदिर पर हमला किया और उसमें भींदराणवाले मारा गयालेकिन बहुत देर हो चूकी थीकई भीन्दराणवाले पैदा हो चूके थे.

(क्रमशः)

शिरीषमोहनलालदवे

टेग्झः  नहेरुवीयन, चूनावी, प्रपंच, रणनीति, सत्ता, गरीबीहटाओ, समाचारमाध्यम, इन्दिरा, आत्माकीआवज, मोरारजीदेसाई, कोमीदंगा, भ्रष्टाचार, आंदोलन, आपातकाल, चरणसिंग, स्वर्णमंदिर, आतंकवाद, सीमापार

 

 

 

         

 

 

   

 

          

Read Full Post »

खुशवंत सिंह जो शेरकी खालमें शृगाल था

khushvant

खुशवंत सिंह को कुछ लोग खुशामतसिंह भी कहते थे.

क्या खुशवंत सिंह शेर थे यानी कि निडर थे?

क्या ऐसा भी हो सकता है?

अगर दुधपाकमें सर्कराकी जगह नमक डले तो वह क्या दुधपाक माना जायेगा?

अगर महाराणा प्रतापका घोडा चेतक युद्धभूमिमें घुसनेसे इन्कार करे तो राणा प्रताप उसको प्यार करते?

अगर देशप्रेमकी बांगे पूकारने वाला कोई सरदार, दुश्मनके आगे घुटने टेक दें तो वह क्या वह सरदार कहेलायेगा?

क्या कोई वीर अपने देशके अपमानका बदला लेनेकी प्रतिज्ञा ले और उसका पालन भी करे तो वह क्या रघुवंशी कहेलायेगा?

अगर खुदको शूरवीर प्रस्तुत करनेवाला चोर आने पार दूम दबाके भाग जाय या चोरसे जिवंत पर्यंत दोस्ती करले तो क्या वह शूरवीर माना जायेगा?

इस बात पर यही कहेना पडेगा कि जो शेर कुत्तेसे डरकर भाग जाता है वह शेर नहीं कहेलाता.

बकरीकी तीन टांग

तो यह खुशवंत सिंह जिसको समाचार माध्यमोंके कई मूर्धन्योंने सदाकाळ और उसकी मृत्युके अवसर पर तो खास, एक निडर पत्रकार लेखक घोषित किया उसमें कितना तथ्य और कितनी वास्तविकता?

जिनको नहेरुका और उनकी लडकी इन्दीरा गांधीका शासन काल और कार्य शैलीका ज्ञान नहीं और उस समय खुशवंत सिंह कहां थे वह मालुम ही नहीं हो उसके लिये खुशवंत सिंहकी निडरताकी बातें बकरीके तीन टांग जैसी है. लेकिन उसका मतलब यह नहीं कि वे लोग अपनी अज्ञानता उनके विवेकशून्यता का कारण बता दें.

खुशवंत सिंहको निडर कहेना क्या मजाक है या वाणी विलास है?

नहेरुका समर्थन करना नहेरुकी रुस और चीन परस्तीवाली विदेश नीतिको समर्थन करनेके बराबर है. नहेरु अपनेको जन्म मात्र से हिन्दु समझते थे. कर्म और विचारसे नहीं. धार्मिक विचार धारा कैसी पसंद करनी है, यह अपनी अपनी पसंदगीका विषय है. लेकिन जब अगर कोई नेता राजकीय प्रवृत्तिमें है और जन विकासके लिये अपनी नीतियां बनाता है तब उसको अपनी नीतियोंके बारेमें आज और कलका ही नहीं परसोंका भी सोचना चाहिये. अगर नेता इस बारेमें सोचता नहीं है तो वह नेताके योग्य नहीं. उसके समर्थकों बारेमें भी हमें वैसा ही सोचना चाहिये.

नहेरुकी विदेशनीति देशके लिये विद्ध्वंशकारी थी. उसका व्यापक प्रभाव है

नहेरुका सर्वग्राही समर्थनमें उनकी परिपेक्षित विदेश नीति का समर्थन भी हो जाता है.  

नहेरुकी विदेश नीतिका समर्थन करना मतलब है कि सरदार पटेलने जो चेतावनी दी थी वह गलत थी उसका स्विकार करना.

नहेरुकी विदेश नीतिका समर्थन करना मतलब है कि राजगोपालाचारी और जेबी क्रिपलानी, महावीर त्यागी आदि कई नेतागण संसदमें जो समाचार देते रहे थे उसको नहेरु गलत मानते रहेते थे और उनके सुझावोंकी अवमानना करते थे तो इस बातमें उन सभी महानुभावोंको गलत समझना और नहेरुको सत्यवादी समझना.

नहेरुकी विदेश नीतिका समर्थन करना मतलब है कि जब सत्य सामने आया और चीनने भारत पर हमला करके भारतकी ९०००० (नब्बे हजार चोरस मील) भूमि पर कबजा जमा लिया), तो भी १९६७के चूनाव में नहेरुकी पूत्री इन्दीरा गांधीका समर्थन करना ऐसा ही सिद्ध होता है.

नहेरुकी विदेश नीतिका समर्थन करना मतलब है कि, इन्दीरा गांधी नहेरुकी नीतियोंकी समर्थक थी. इस कारण इन्दिराका और उसके साथीयोंका समर्थन करना यह ही सिद्ध करता है कि भारतको नहेरुवीयनोंकी आत्मकेन्द्री और देशको बरबाद करनेवाली नीतियोंका अगर आप समर्थन करते है.

इस कारण से नहेरुकी विदेश नीतिका समर्थन करना मतलब है कि तो शायद आपकी दिमागी खराबी है या तो आप भी आत्मख्यातिकी प्रच्छन्न ध्येय के सामने देश हितको गौण समझते है.

नहेरुकी विदेश नीतिका समर्थन करना मतलब है कि, नहेरुवीयन कोंग्रेसकी (नहेरु, इन्दिरा आदिकी विदेश नीतियोंके कारण भारतके हजारों जवान बेमौत मारे गये और  देशकी आर्थिक विनीपात आपकी कोई गिनतीमें नहीं.

अगर ऐसा नहीं है तो आप कभी खुशवंत सिंह को निडर पत्रकार कभी नहीं मान्य रखते.

निडर कौन है?

निडर वह है जो यातनाओंसे डरता नहीं है. साथ ही साथ कमजोर आदमी भी वह निडर आदमीसे डरेगा नहीं. क्यों कि कमजोर आदमी भी निडरके पास सुरक्षित है.

निडरता वैसे तो एक सापेक्ष सदगुण है

जब नहेरुकी पुत्रीने अपनी सव्रक्षेत्रीय प्रशासनीय निस्फलताको छिपानेके लिये आपातकालकी घोषणा की, तो जिन मूर्धन्योंने इन्दीराके आपातकालका समर्थन किया उन डरपोक मूर्धन्योंमे खुशवंत सिंह भी थे.

जब कोई व्यक्ति आपातकालका समर्थन करता है तब उसके खुदके बारेमें कई और बातें भी सिद्ध हो जाती है.

अगर आप आपतकालका समर्थन करते है तो आप अपने आपमें यह भी सिद्ध मान लेते हो;

महात्मा गांधीके वैचारिक और निवासीय अंतेवासी जय प्रकाश नारायण पथभ्रष्ट थे और उनको जेलमें भेजना आवश्यक था.

देशकी समस्याओंका कारण इन्दिराका शासन नहीं था, लेकिन जो लोग इन्दिरा गांधीकी विफलताका विरोध कर रहे थे वह विरोध ही विफलताका कारण था.

लोकशाहीमें विरोधी सुर उठानेवाले और जन जागृतिके लिये मान्य प्रक्रियाका सहारा लेनेवाले देश द्रोही है.

यह भी कम है. आगे और भी देखो;

जिन लोगोंने आपातकालका विरोध किया नहीं था, लेकिन भूतकालमें इन्दिराका विरोध किया था और (और ही नहीं या भी लगा लो) या तो भविष्यमें विरोध कर सकते है, उनको भी जेलमें बंद कर दो. इसकाभी आप समर्थन करते है.

समाचार माध्यम पर शासकका पूर्ण निरपेक्ष अधिकार और शासकका अफवाहें फैलानेका अबाधित अधिकार और सुविधा इसका भी आप समर्थन करते है.

मतलब की आप (खुशवंत सिंघ), शासकको संपूर्ण समर्पित है. आपका शरीर एक शरीर नहीं एक रोबोट है, जिसका कोई जैविक अस्तित्व नहीं है. आप एक अस्तित्व हीन निःशरीरी है. यह बात आपने पहेले से ही सिद्ध कर दी है.

खुशवंत सिंह की दाढी और धर्म की चर्चा हम नहीं करेंगे.

स्वर्ण मंदिर पर हमले की बात भी कभी बादमें (२५वी जुन पर) करेंगे.

ईशावास्य उपनिषदमें लिखा हैः

असूर्या नाम ते लोका अंधेन तमसावृता,

तांस्ते प्रेत्याभि गच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ()

जो लोग विवेकशील बुद्धिका अभाव रखकर अंधकारसे आवृत रहते है वे लोग आत्माको जानते नहीं और वे हमेशा अंधकारमें ही रहेंगे क्यों कि उन्होने अपनी आत्माको नष्ट किया है.

निडरता सापेक्ष है

आपतकालमें जो लोग निडर रहे उसके प्रमाणित निडरता क्या क्या थी? हम उनको इस प्रकार गुण (मार्क्स) देंगे;

१०० % गुण; ऐसे लोग, वैसे तो इन लोगोंका काम शासनका विरोध था ही नहीं, लेकिन क्यूं कि मानव अधिकार का हनन हुआ तो उन्होने खूल्ले आम विरोधका प्रारंभ किया.

उदाहरण; भूमिपूत्रके संपादक गण. नानुभाई मजमुदार, कान्तिभाई शाह

१०० % गुण; जो लोग वास्तवमें महात्मा गांधीकी परिभाषा के हिसाब से निडर थे उन्होने लोक जागृतिकी प्रवृत्ति खुल्लेआम चालु रखी और कारावासको भूगतनेके लिये हमेशा सज्ज रहे.

उदाहरण;ओपीनीअनके मालिक पदत्यागी आईसीएस अधिकारीगोरवाला

९९ % गुण; जेल जानेसे डरते नहीं थे लेकिन जनता सत्यसे विमुख रहे इसलिये भूगर्भ प्रवृत्तिद्वारा समाचार पत्र प्रकाशित करने के लिये अपनी जिंदगीभरकी पूरी बचतको खर्च कर दिया.

उदाहरण; भोगीभाई गांधी  

७५% गुण; वे लोग जेल जानेसे डरते थे या तो व्यर्थ ही जेल जाना चाहते नहीं थे इस लिये भूगर्भ प्रवृत्ति जितनी हो सके उतनी करने वाले.

उदाहरण; नरेन्द्र मोदी और उसके कुछ साथी, सुब्रह्मनीयन स्वामी, जोर्ज फर्नाडीस, आदि कई लोग

५०% गुण; वे लोग जेल जानेसे डरते थे लेकिन शासनके विरोधी तो बने ही रहने चाहते थे लेकिन कुछ समयावधिके लिये निस्क्रीय हो गये.

उदाहरण; विनोबा भावे और सर्वोदयी मित्रगण

४०% गुण; वे लोग जो जेल जानेसे डरते थे लेकिन शासनके विरोधी तो बने ही रहने चाहते थे लेकिन निस्क्रीय हो गये.

उदाहरण; सुज्ञ जनता, सुज्ञ मूर्धन्यगण

३०% गुण; वे लोग जो सरकारी माध्यमोंके द्वारा किये गये प्रचारसे द्विधामें पड गये और मौन हो गयेः उदाहरण; आम जनता

२०% गुण; वे लोग जो समाचार पत्रमें शासन के बारेमें गतिविधियोंका विश्लेषण करते थे और अपनी कोलम चलाते थे, उन्होने अपनी कोलम चालु रखनेके लिये कोई और विषय पर चर्चा चलाने लगे. या तो असंबद्ध बातें लिखने लगे.

उदाहरण; ख्याति प्रिय स्वकेन्द्री अखबारी मूर्धन्य गण

००% गुण; वे लोग जो समझने लगे कि सियासतसे दूर ही रहो.

उदाहरण; आम जनता

अब सब ऋणात्मक गुण प्राप्त करने वाले आते हैः

(५० % गुण); वे लोग जो मानते थे कि इन्दिरा को पछतावा होता था और वह डर डर कर रहेती थी,

(६०% गुण); वे लोग जो कहते थे अरे उसने तो आपातकाल हटा लिया था. और बादमें उसने घर घर जाके अफसोस जताया था.

उदाहरण; अखबारी मूर्धन्य कान्ति भट्ट (जंगलमें मोर नाचाहा पस्तावा, विपूल झरना, स्वर्गसे नीकला हैपापी उसमे  गोता लगाके पूण्यशाली बनेगा)

(७० % गुण); वे लोग जो बोलते थे कि आपात काल घोषित करने कि इन्दिराकी तो ईच्छा नहीं थी और वह अस्वस्थ थी                         

(८० % गुण); वे लोग जो बोलते थे कि, क्या करती वह इन्दिरा? सब उसके पीछे पड गये थे. इसलिये उसने आपात काल घोषित किया

(९० % गुण); वे लोग जो बोलते थे “लोकशाहीने क्या किया. कुछ नही. अब इन्दिराको अपने तरिके से काम करने दो”.

(९५ % गुण); हम भारतीय, लोकशाहीके लायक ही नहीं है.

उदाहरण; शिवसेना,

(९९ % गुण); वे लोग जो बोलते थे अरे भाई हमारा तो नहेरुसे कौटूंबिक नाता है. हमें तो उसका अनुमोदन करना ही पडेगा.

उदाहरण; जिसनेसूतकी मालालिखके महात्मा गांधीको अंजली दिया था, उसने आपात कालमेंजूठकी मालालिखनी चाहिये थी और उसको इन्दिराको पहेनानी चाहिये थी. अमिताभ बच्चन के पिता 

(९९. % गुण); अरे भाई, इन्दिरा और मैं तो साथमें पढे थे,

उदाहरण; बच्चन कुटुंब

(१०० % गुण); जो लोग बोलते थे; वाह वाह इन्दिरा गांधी वाह वाह. इन्दिरा गांधी तूम आगे बढो हम तुम्हारे साथ है.

उदाहरण; साम्यवादी नेतागण, नहेरुवीयन कोंग्रेसके बंधवा, खुशवंत सिंघ, आदि.

खुशवंत सिंह पर कुछ मूर्धन्य इसलिये फिदा है कि खुशवंत सिंह चिकनी चुकनी बातें लिखते थे. क्या चिकनी और गुदगुदी कराने वाली बातें लिखनेसे आदमी निडर माना जाता है?

अरे भाई, खुशवंत सिंह की मौत हुई है. मौतका तो मलाजा रक्खो?

क्या वह कभी जिन्दा भी था? उपर पढो; “(तांस्ते प्रेत्याभि गच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः)”

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः खुशवंत सिंह, नहेरु, इन्दिरा, लोकशाही, आपातकाल, गुण, ऋणात्मक गुण, निडर  

Read Full Post »

Rama has been lost who had walked on this earth in flesh and blood Part-7

खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग)

एक बात हमे फिरसे याद रख लेनी चाहिये कि व्यक्ति और समाज प्रणालीके अनुसार चलते है.

समाजमें व्यक्तिओंका व्यवहार प्रणालीयोंके आधार पर है

     प्रणाली के अंतर्गत नीति नियमोंका पालन आता है. अलग अलग जुथोंका व्यक्तिओंका कारोबार भी प्रणालीके अंतर्गत आता है. कर्म कांड और पूजा अर्चना भी प्रणालीके अंतरर्गत आते है.

     मानव समाज प्रणाली के आधार पर चलता है. प्रणालीके पालनसे मानव समाज उपर उठता है. समाज के उपर उठनेसे मतलब है समाजकी सुखाकारीमें और ज्ञानमें वृद्धि. समाजके ज्ञानमें वृद्धि होनेसे समाजको पता चलता है कि, समाजकी प्रणालीयों को कैसे बदला जाय, कैसे नयी प्रणालीयोंको लाया जाय और कैसे प्रणालीयों को सुव्यवस्थित किया जाय.

     शासक का कर्तव्य है कि वह स्थापित प्रणालीयोंका पालन करें और और जनतासे पालन करवायें.

कुछ प्रणालीयां कोई समाजमें विकल्प वाली होती हैं.

     जैसे कि एक स्त्रीसे ही शादी करना या एक से ज्यादा स्त्रीयोंसे शादी करना.

जीवन पर्यंत एक ही स्त्रीसे विवाहित जीवन बीताना या उसके होने से या और कोई प्रयोजनसे दुसरी स्त्रीसे भी शादी करना.

     ऐसे और कई विकल्प वाले बंधन होते है. इनमें जो विकल्प आदर्श माना गया हो उसको स्विकारना सत्पुरुषोंके लिये आवश्यक है.

शासक को भी ऐसी आदर्श प्रणालीयोंका पालन करना ईच्छनीय है.

शासकको हृदयसे प्रणालीयोंका पालन करना है.

     शासक (राजा या कोई भी व्यक्ति या व्यक्ति समूह जिनके उपर शासन की जिम्मेवारी है) तो कभी प्रणालीयों मे संशोधन कर सकता है तो वह नयी प्रणालीयां सूचित कर सकता है. अगर वह ऐसा करता है तो वह जनताकी निंदाके पात्र बनता है और जनता चाहे तो उसको पदभ्रष्ट कर सकती है.

रामने क्या किया?

     रामने एक आदर्श राजाका पात्र निभाया.

     उन्होने एक मात्र सीता से ही शादी की, और एक पत्नीव्रत रखा,

     वनवासके दरम्यान ब्रह्मचर्यका पालन किया,

     रावणको हरानेके बाद, सीताकी पवित्रताकी परीक्षा ली,

(वैसे भी सीता पवित्र ही थी उसका एक कारण यह भी था कि वह अशोकवाटिकामें गर्भवती बनी नहीं थी. अगर रावणने उसके उसके साथ जातीय संबंध रखा होता तो वह गर्भवती भी बन सकती थी.)

     रामने जनताकी निंदासे बोध लिया और सीताका त्याग किया. राम जनताके साथ बहस नहीं किया. रामने सीताका त्याग किया उस समय सीता सगर्भा थी. रामने सीताको वाल्मिकीके आश्रममें रखवाया, ताकि उसकी सुरक्षा भी हो और उसकी संतानकी भी सुरक्षा और संतानका अच्छी तरह लालन पालन हो सके.

     रामने सीताका त्याग करने के बाद कोई दूसरी शादी नहीं की.

     रामने यज्ञके क्रीया कांडमें पत्नी की जरुरत होने पर भी दूसरी शादी नहीं की, और पत्नी की जगह सीताकी ही मूर्तिका उपयोग किया.

 

     इससे साफ प्रतित होता है कि, राम सिर्फ सीताको ही चाहते थे और सिर्फ सीताको ही पत्नी मानते थे.

 

रामने तो ढिंढोरा पीटवाया कि सीता को एक बडा अन्याय हो रहा है,

रामने तो ढिंढोरा पीटवाया कि खुदको एक बडा अन्याय हो रहा है,

रामने तो अपने फायदे के लिये प्रणालीमें बदलाव लानेका ढिंढोरा पीटवाया,

रामने खुद अपने महलमें रहेते हुए भी एक वनवासी जैसा सादगीवाला जीवन जिया और एक शासक का धर्मका श्रेष्ठतासे पालन किया.

क्या रामने ये सब सत्तामें चालु रहने के लिये किया था?

     नहीं जी.

     रामको तो सुविधा का मोह था तो सत्ताका मोह था.

     अगर वे चाहते तो १४ सालका वनवास स्विकारते ही नहीं. अपने पार्शदों द्वारा जनतासे आंदोलन करवाते और अयोध्यामें ही रुक जाते.

     अगर ऐसा नहीं करते तो भी जब भरत वापस आता है और  रामको विनति करता है कि, वे अयोध्या वापस आजाय और राजगद्दी का स्विकार कर लें, तब भी राम भरतकी बात मान सकते थे. लेकिन रामने दशरथके वचनका पालन किया. और अपने निर्णयमें भी अडग रहे.

रामने वचन निभाया.

     रामने अपने पुरखोंका वचन निभाया. अपना वचन भी निभाया. अगर राम चाहते तो वालीका राज्य स्वहस्तगत कर सकते थे. अगर राम चाहते तो रावणकी लंकाका राज्य स्वहस्तगत कर सकते थे. उसके लिये कुछभी बहाना बना सकते थे. लेकिन रामने प्रणालीयां निभायी और एक आदर्श राजा बने रहे.

ईन्दीरा गांधीने क्या किया?

     नहेरुने भारतकी संसदके सामने प्रतिज्ञा ली थी कि, वे और उसका पक्ष, चीनके साथ युद्धमें हारी हुई जमीन को वापस प्राप्त किये बीना आराम नहीं करेगा. नहेरुको तो वार्धक्यके कारण बुलावा गया. लेकिन ईन्दीरा गांधीने तो १६ साल तक शासन किया. परंतु इस प्रतिज्ञाका पालन तो क्या उसको याद तक नहीं किया.

     ईन्दीराने खुद जनताको आश्वस्त किया था कि वह एक करोड बंगलादेशी घुसपैठोंको वापस भेज देगी. लेकिन उसने वोंटबेंककी राजनीतिके तहत उनको वापस नहीं भेजा.

     पाकिस्तानने आखिरमें भारत पर हमला किया तब ही ईन्दीरा गांधीने जनताके और लश्करके दबावके कारण युद्धका आदेश दिया. भारतके जवानोंने पाकिस्तानको करारी हार दी.

     याद करो, तब ईन्दीरागांधीने और उसके संरक्षण मंत्रीने एलान किया था कि अबकी बार पाकिस्तानके साथ पेकेजडील किया जायगा और इसके अंतर्गत दंड, नुकशान वसुली, १९४७१९५० अंतर्गत पाकिस्तानसे आये भारतीय निर्वासितों की संपत्तिकी किमत वसुली और उनकी समस्याओंका समाधान, पाकिस्तान स्थित हिन्दु अल्पसंख्यकोंकी सुरक्षा और उनके हितोंकी रक्षा, पाकिस्तानमें भारत विरुद्ध प्रचार अभियान पर कडी पाबंदी, पाकिस्तान की जेलों कैद भारतीय नागरिकोंकी मुक्ति, पाकिस्तानी घुसपैठीयोंकी वापसी, काश्मिरकी लाईन ओफ कन्ट्रोलको कायमी स्विकार और भारतके साथ युद्धनहीं का करार. ऐसा पेकेज डील पर हस्ताक्षर करने पर ही पाकिस्तानी युद्ध कैदीयों की मुक्ति और जमीन वापसी पर डील किया जायेगा.

     लेकिन ईन्दीरा गांधीने इस पेकेज डील किया नहीं और वचन भंग किया. इतना ही नहीं जो कुछ भी जिता था वह सब बीना कोई शर्त वापस कर दिया.

     नहेरु और ईन्दीराने गरीबी हटानेका वचन दिया था वह भी एक जूठ ही था.

     ईंदीरा गांधीका चूनाव संविधान अंतर्गत स्थापित प्रणालीयोंसे विरुद्ध था. न्यायालयने ईन्दीरा गांधीका चूनाव रद किया और उसको संसद सदस्यता के लिये सालके लिये योग्यता हीन घोषित किया.

प्रणालीयोंका अर्थघटन करनेका अंतिम अधिकार उच्चन्यायालय का है. यह भी संविधानसे स्थापित प्रणाली है.

     अगर इन प्रणालीयोंको बदलना है तो शासक का यह अधिकार नहीं है. लेकिन ईन्दीरागांधीने अपनी सत्ता लालसा के कारण, इन प्रणालीयोंको बदला. वह शासनपर चालु रही. और उसने आपतकाल घोषित किया. जनताके अधिकारोंको स्थगित किया. विरोधीयोंको कारावासमें बंद किया. यह सब उसने अपनी सत्ता चालु रखने के लिये किया. ये सब प्रणालीयोंके विरुद्ध था.

प्रणाली बदलनेकी आदर्श प्रक्रिया क्या है?

     प्रजातंत्रमें प्रणालीयोंमे संशोधन प्रजाकी तरफसे ही आना चाहिये. उसका मुसद्दा भी प्रजा ही तयार करेगी.  

     रामने तो सीताको वापस लाने के लिये या तो उसको शुद्ध साबित करने के लिये कुछ भी किया नहीं. तो उन्होने कुछ करवाया. तो रामने अपने विरोधीयोंको जेल भेजा.

तो हुआ क्या?

     सीता जो वाल्मिकीके आश्रममें थी. वाल्मिकीने सीतासे सारी बाते सूनी और वाल्मिकीको लगा की सीताके साथ न्याय नहीं हुआ है. इसलिये उन्होने एक महाकाव्य लिखा. और इस कथाका लव और कुशके द्वारा जनतामें प्रचार करवाया और जनतामें जागृति लायी गई. और जनताने राम पर दबाव बनाया.

     लेकिन जिस आधार पर यानी कि, जिस तर्क पर प्रणालीका आधार था, वह तर्कको कैसे रद कर सकते है? नयी कौनसी प्रणाली स्थापित की जाय की जिससे सीताकी शुद्धता सिद्ध की जाय.

     जैसे राम शुद्ध थे उसी आधार पर सीता भी शुद्ध थी. वाल्मिकी और उनका पूरा आश्रम साक्षी था. और यह प्रक्रियाको वशिष्ठने मान्य किया.

     इस पूरी प्रक्रियामें आप देख सकते हैं कि रामका कोई दबाव नहीं है. रामका कोई आग्रह नहीं है. इसको कहेते हैं आदर्श शासक.

रामका आदर्श अभूत पूर्व और अनुपमेय है.

RAMA KEEPS SITA IN VALMIKI ASHRAM

पत्नीके साथ अन्याय?

     रामने सीताका त्याग किया तो क्या यह बात सीताके लिये अन्याय पूर्ण नहीं थी?

सीता तो रामकी पत्नी भी थी. सीताके पत्नी होनेका अधिकारका हनन हुआ था उसका क्या?

इस बातके लिये कौन दोषित है?

राम ही तो है?

रामने पतिधर्म क्यों नहीं निभाया?

रामको राजगद्दी छोड देनी चाहिये थी. रामने राजगद्दीका स्विकार किया और अपने पतिधर्मका पालन नहीं क्या उसका क्या?

रामका राज धर्म और रामका पतिधर्म

     रामकी प्राथमिकता राजधर्मका पालन करनेमें थी. राम, दशरथराजाके ज्येष्ठपुत्र बने तबसे ही रामके लिये प्राथमिक धर्म निश्चित हो गया था कि, उनको राजधर्मका पालन करना है. यह एक राजाके ज्येष्ठपुत्रके लिये प्रणालीगत प्राथमिकता थी.

     सीता रामकी पत्नी ही नहीं पर प्रणाली के अनुसार रानी भी थी. अगर रानी होनेके कारण उसको राज्यकी सुविधाओंके उपभोगका अधिकार मिलता है तो उसका भी धर्म बनता है कि, राजा अगर प्रणालीयोंके पालन करनेमें रानीका त्याग करें तो रानी भी राजाकी बातको मान्य करें. राजा और रानी प्रणालीयोंके पालनके मामलेमें पलायनवादका आचरण करें.

सीता भी हाडमांसकी बनी हुई थी

      रामायणकी कथा, हाडमांससे बने हुए मानवीय समाजकी एक ऐतिहासिक महाकथा है. सीता भी हाडमांसकी बनी हुई थी. उसने अपने हाडमांसके नातेसे सोचा की यह क्या बात हुई जो शुद्धताकी बात इतनी लंबी चली! यदि ऐसा ही चलते रहेगा तो मुझे क्या बार बार शुद्धताका प्रमाण पत्र लेते रह्ना पडेगा?

     सीता कोई खीणमें पडकर आत्महत्या कर लेती है.

     जनक राजाको यह सीता खेतकी धरती परसे प्राप्त हुई थी. वह सीता धरतीमें समा गयी. कविने उसको काव्यात्मक शैलीमें लिखा की अन्याय के कारण भूकंप हुआ और धरतीमाता सिंहासन लेके आयी और अपनी पुत्रीको ले के चली गई.

     रामने अपनी महानता दिखायी. सीताने भी अपनी महानता दिखाई.

क्या रामके लिये यह एक आखरी अग्निपरीक्षा थी. नहीं जी. और भी कई पडाव आये जिसमें रामके सामने सिद्धांतोकी रक्षाके लिये चूनौतियां आयीं.

(क्रमशः)

 

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः सीता, राम, शासक, राजा, रानी, वचन, शुद्धता, जनता, प्रणाली, परिवर्तन, ईन्दीरा, आपातकाल, अधिकार, योग्यता, अर्थघटन, अयोग्यता, पाबंदी, सत्ता, लालसा, प्राथमिकता, राजधर्म   

Read Full Post »

%d bloggers like this: