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विनोबा भावे और कोंगीके संबंध – २

नहेरुका पुरा पांडित्य चीनने ध्वस्त कर दिया था. नहेरुने तो एक फरेबी प्रतिज्ञा लेली कि “जब तक हम खोई हुई भूमि वापस नहीं लेंगे तब तक चैनसे बैठेंगे नहीं”. पूर्णविराम.

नहेरुके लिये तो अपने साम्यवादी मित्रका मंत्रीपद बचाना एक काम था. जब तत्कालिन राष्ट्रप्रमुख डॉ. राधाकृष्ननने नहेरुसे कहा कि “यदि आप वी. के. मेनन को सुरक्षा-मंत्रीपदसे दूर नहीं करोगे तो हमे नेता बदलनेका सोचना पडेगा.

नहेरु भी वैसे तो अडे हुए थे लेकिन उनके पास और कोई विकल्प नहीं था. उन्होंने सुरक्षा मंत्रालयका दो भाग कर दिया. सुरक्षा शस्त्र मंत्रालय और सुरक्षा कार्य मंत्रालय.

आगे चलके नहेरुने कामराज प्लान बनाके अपने पदके दावेदार मोरारजी देसाईको निरस्त्र किया. अपनको हटानेकी धमकी देनेवाले  डॉ. राधाकृष्णन दुसरा कार्यकाल नहीं दिया. इसकी हम चर्चा नहीं करेंगे.

इन्दिरा और विनोबा भावे

विमुख १

१९६९में जब इन्दिरा गांधीने अपनी ही कोंग्रेसके राष्ट्रपति पदके प्रत्याशी संजीव रेड्डीको “आत्माकी आवाज़” के नाम, छद्मतासे पराजित करवाया तो कोंग्रेसकी तथा-कथित एकताकी दिवार तूट गयी. इन्दिराने असाधारण महासभाका एलान दिया. लेकिन कोंग्रेसके संगठनका बहुमत तो सीन्डीकेटके साथ था. इसलिये इन्दिराको नये सदस्य बनानेका दाव खेलना पडा. उसने खुला आमंत्रण दिया, आ ओ … आ ओ …. आजाओ … कोंग्रेसका द्वार सबके लिये खुला है. (चोर, लुटेरे, डकैत, ठग … सब लोग आओ)

विनोबा भावेने क्या कहा?

यदि नंबर ही बनाना है तो बंदरोंको भी बुला लो … बंदरोंको भी सदस्यता देदो … क्या फर्क पडता है? नंबर ही तो बनाना है!!

जिस कोंग्रेसका सदस्य बनने के लिये, एक समय खादी, सादगी और त्याग आवश्यक माना जाता था उस कोंग्रेसमें अब केवल नंबरका ही महत्त्व रहा था.  

वैसे ऐसी हालतके बीज तो नहेरुने ही डाल दिया था. लेकिन अब विनोबा भावेसे न रहा गया. उनको बोलना ही पडा कि बंदरोंको भी बुला लो.

आपात्काल और विनोबा भावे

इन्दिराने आपात्काल घोषित किया

इन्दिराकी घोषणाके अनुसार देश हर क्षेत्रमें आपत्तिग्रस्त हो गया था. इस लिये आपात्काल घोषित करना आवश्यक था. सरकारके पास अधिकतम सत्ता होना भी आवश्यक था. नागरिकोंके हकमें कटौति करना आवश्यक था.

विनोबा भावेने कहा कि “आपात्काल अनुशासन पर्व”

वैसे भी नहेरुके भक्तोंके प्रचार के अनुसार, विनोबा भावे तो जनताकी नजरमें सरकारी संत ही थे. किन्तु इस उच्चारणसे विनोबा भावे को सरकारी संत माननेवालोंकी संख्यामें अपार वृद्धि हो गई. कई लोगोंने बोला कि विनोबा भावे, गांधीवादी होते हुए भी “ताल ठोक” के सत्य नहीं बोल सके.  इस परिस्थितिका भरपुर  लाभ सरकारी प्रचार तंत्रने और समाचार माध्यमोंने उठाया. पोस्टर छपवाये गये.  

किन्तु गांधीवादीयोमें वास्तविकता कुछ भीन्न थी.

गांधीवादीयोंमे दो प्रकारसे विभाजन हो गया था. विनोबा भावे को माननेवाले और जयप्रकाश नारायणको मानने वाले.

इन्दिराके हिसाबसे “विनोबा भावे”वाले गांधीवादी निरुपद्रवी थे और जयप्रकाश नारायण वाले उपद्रवी थे. यह भेद रेखा सुक्ष्म नहीं थी. इन्दिराको जो गांधीवादी  उपद्रवी लगा उनको कारावास भेज दिया. गांधीवादके मुखपत्र “भूमि-पुत्र”के संचालन करनेवालोंको क्र्मशः कारावासमे भेज दिया. यह चर्चा सुदीर्घ है. हम नहीं करेंगे.

विनोबा एक खिलाडी

विनोबा भावे “चेस”के खिलाडी थे. उनको ऐसा लगा होगा कि, आपात्काल घोषित करना एक पागलपन तो है, तथापि  इन्दिरा गांधी अभी संपूर्णतः पागल हुई है या नहीं, उसके पर संशोधन करना पडेगा. विनोबाने अपने उच्चारण “आपात्काल अनुशासन पर्व है” उसके उपर स्पष्टीकरण नहीं दिया.

कुछ लोग समज़ते थे कि विनोबा भावे कारावाससे डरते थे. जो लोग विनोबाको समज़ते थे उनके लिये यह सही नहीं था. वास्तवमें भी यह जूठ ही था. यदि विनोबा भावेका जीवन शैली देखा जाय, तो उनके लिये तो कारावास एक लक्ज़री था.

विनोबा भावे ने कुछ समय व्यतीत होने दिया. उनको पता ही था कि, इन्दिरा गांधी “गुड एड्मीनीस्ट्रेटर नहीं है.”. न्यायतंत्रके उपर भी उसका अबाधित प्रभुत्व नहीं था. विनोबा भावेने सरकारको आवेदन दिया कि “यदि फलां दिनांक तक गौ-हत्या निषेध कानून नहीं लाओगे तो मैं आमरणांत अनशन करुंगा.”

कोई समाचार माध्यमकी शक्ति नहीं थी कि वे इस समाचारको प्रकाशित करें.

किन्तु कोंगीयोंमें बेवकुफोंकी कमी उस समय भी नहीं थी. वे तो जो भी कोई सरकारके विरुद्ध बोले, तो उनकी भर्त्सना करनेके लिये तत्पर थे. और सरकारके विरुद्ध बोलनेवालों की  भर्त्सना करने पर तो कोई निषेध था ही नहीं. विनोबा भावे किस खेतकी मूली? समाचार पत्रोंमे विनोबाके प्रस्तावित अनशनकी भर्त्सना करनेवाले लेख आये. “जब देश आपात्कालसे गुजर रहा हो तब अनशन पर बैठना क्या योग्य है?”

इन्दिरा गांधी पूर्णरुपसे पगला नहीं गयी थी. उसने कहा, कि उसकी सरकारको समय चाहिये. विनोबा भावेने समय दे दिया.

खिलाडी विनोबा भावेकी दुसरी चाल

विनोबा भावेने वर्धामें आचार्य संमेलन बुलाया

उस संमेलनकी कार्यसूचिः

आपात्काल अनियतकाल तक नहीं हो सकता. उसके अन्तका दिवस निश्चित करना चाइये.

जिनको कारावासमे रक्खा है उनको अनियतकाल तक नहीं रख सकते

आपात्काल कोई पक्षकी आपत्ति नहीं है. आपात्काल यदि है तो वह देशकी आपत्ति है, इस लिये देशवासीयोंका सहयोग लेना आवश्यक है,

अनुशासन आचार्योंका होता है. शासकोंका नहीं. शासकोंका जो होता है वह  शासन  है.

विनोबा भावेने अपने प्रवचनमें कहा था कि “मैं देखता हूँ कि यहां कुछ लोग डरे हुए है. उनसे मैं कहेता हूँ कि यहाँ डरनेकी आवश्यकता नहीं.”

आचार्य संमेलनका रीपोर्ट सरकार को भी दिया गया.

समाचार माध्यमोंमे तो इसका कोई उल्लेख नही मिलता था. लेकिन इन्दिराके लिये चूनाव घोषित करना आवश्यक बन गया था. इसमें एक परिबल विनोबा भावेका आचार्य संमेलन भी था.

“हनी ट्रेप” उस समय भी नयी बात नहीं थी. ऐसा कहा जाता है कि एक फर्जी हनी ट्रेप बनाया गया था. यशवंत राव चवाणने इन्दिरा को सलाह दी कि ऐसा मत करो. लेनेका देना पड जायेगा.

शिरीष मोहनलाल दवे

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विनोबा भावे और कोंगीके संबंध – १

विनोबा भावे और कोगींके संबंध

नहेरु और विनोबा भावे

प्रज्ञावान पद यात्रिक

कुछ मूर्धन्योंका कोंगी नेताओंके प्रति और कोंगी पक्षके प्रति भरोसा उठ गया नहीं है. ऐसा लगता है कि ये लोग शाश्वत ऐसा ही मानेंगे.

पक्षकी रचना ध्येय और सिद्धांतोके आधार पर होती है. तथापि इस बातकी कुछ  मूर्धन्योंने स्विकृत की है कि, सिद्धांत के अनुसार कार्य करना अब आवश्यक नहीं है. जो जीता वह सिकंदर.

इस विरोधाभाष पर हमने इसी ब्लोग-साईट पर अनेक बार चर्चा की है. सर्वोच्च  न्यायालयका निर्णय भी कितना हास्यास्पद था वह भी हमने देखा है. दुःखद बात यह है कि कुछ मूर्धन्य लोग भी, क्यूँ कि (विद्यमान कोंग्रेस पक्ष, जो वास्तवमें कोंगी पक्ष है) इस पक्षके उपर नहेरवंशवादीयोंका एकाधिकार है इसी लिये वही मूल कोंग्रेस पक्ष है. जब स्वतंत्रता मिली तब  नहेरु पक्षके प्रमुख थे, और आज उनके वंशज पक्षके प्रमुख है, इसी लिये यह पक्ष मूल कोंग्रेस पक्ष है. ये मूर्धन्य  ऐसा मानके, वंशवाद की स्विकृतिका थप्पा भी  मारते है. इन मूर्धन्योंकी मानसिकता ऐसी क्यूँ है? यह बात संशोधनका विषय है.

महात्मा गांधीके दो पट्टाशिष्य

आम जनताका सामान्यतः मन्तव्य यह है कि महात्मा गांधीके दो पट्टशिष्य थे. एक था जवाहरलाल नहेरु और दुसरा था विनोबा भावे.

वास्तवमें यह एक विरोधाभाष है. कहाँ नहेरु के विचार और आचार, और कहाँ विनोबा भावे के विचार और आचार?

नहेरु एक दंभी, एकाधिकारवादी, पूर्वग्रहवादी और गांधीजीको सत्ता प्राप्त करनेका सोपान-मार्ग समज़ने वाले  थे. वे गांधीको नौटंकीबाज़ मानते थे. नहेरुके विचार और आचारमें प्रचंड विरोधाभास था. गांधीजी इस सत्यसे अज्ञात नहीं थे. उन्होंने अपनी भाषामे “अब जवाहर मेरी भाषा बोलेगा…” बोलके नहेरुको अवगत कर दिया था कि नहेरुको अपने आचारमें परिवर्तन करना आवश्यक है. किन्तु नहेरुने माना नहीं. अन्तमें गांधीने कोंग्रेसका विलय करनेकी बात कही और उसको सेवासंघमें परिवर्तन करनेको कहा और उसके नियम भी बनाये.

महात्मा गांधीने विनोबा भावेको कोई सूचन किया नहीं. क्यों कि विनोबा भावेके विचार और आचारके बीच कोई विरोधाभाष नहीं था.

नहेरु और विनोबा इन दोनोंकी तुलना ही नहीं हो सकती. जैसे शेतान और जीसस की तुलना नहीं हो सकती.

नहेरु और विनोबा के आपसी संबंध

नहेरु और विनोबा के आपसी संबंध पर चर्चा करें, उसके पूर्व हमें विनोबा कैसे थे इस बातसे अवगत होना आवश्य्क है.

आम जनताकी मान्यता यह थी कि विनोबा भावे, महात्मा गांधीके अपूर्ण कार्य पूर्ण करेंगे.

महात्मा गांधीके अपूर्ण कार्य क्या थे?

(१) कश्मिरका विलय भारतमें करना,

(२) कश्मिरकी समस्याको युनोमें नहीं ले जाना,

(३) कोंग्रेसका विलय सेवा संघमें करना,

(४) विभाजित भारतको पुनः अखंड भारत बनाना

(५) भारतीय आम प्रजाका दारीद्र्य दूर करना,

(६) गौवंशकी हत्या रोकना,

(७) शराब बंदी करना,

(८) शासनमें पारदर्शिता लाना,

(९) शासनको जनताभिमुख करना,

(१०) अहिंसक समाज की स्थापना करना. ग्रामोद्योग आधारित उत्पादन, निसर्गोपचार, सादगी इसके अंग है.

(११) भारतीय संस्कृतिके अनुरुप जनताको शिक्षित करना, मातृभाषामें शिक्षण देना, शिक्षाको स्वावलंबी करना (उत्पादन आधारित)

(१) से (४) बातका उल्लेख तो मनुबेन गांधीने अपनी गांधीकी अंतिम तीन मासकी डायरी  “दिल्लीमें गांधी” पुस्तकमें किया ही है. सेवा संघकी स्थापना तो हो गई. नहेरु और उनके साथी सत्ताका त्याग करके “सेवा संघ”में गये नहीं.  लेकिन सभी सर्वोदय कार्यकर उसमें गये.

विनोबा भावे पाकिस्तान नहीं गये.

विनोबा भावे कर्मशील तो थे. किन्तु प्रथम वे एक विचारशील व्यक्ति अधिक थे. उन्होंने गांधी विचारको आगे बढाया. उनका अंतिम लक्ष्य शासकहीन शासन था. अहिंसक समाजका अंतिम लक्ष्य यही होना आवश्यक है.

भूमिका आधिकारित्त्व (ओनरशीप ओफ लेन्ड)

भूमि पर किसका अधिकार होना चाहिये?

विनोबा भावे का कहेना था कि भूमि तो हमारी माता है. माताके उपर किसीका अधिकार नहीं हो सकता. “माता पर अधिकार” सोचना भी निंदनीय है.

नहेरुकी सरकारने तो “जो जोते उसकी ज़मीन” ऐसा नियम कर दिया और उसका अमल करना राज्योंके उपर छोड दिया.

युपी, बिहार, बेंगाल, एम.पी. जैसे राज्योमें तो खास फर्क पडा नहीं. ज़मीनदारी प्रथा में बडा फर्क नहीं पडा. ठाकुर और पंडित का दबदबा कायम रहा. वहाँ ज़मीनदारोंने अपने पोतों पोतीयों तक ज़मीन बांट दी.  गुजरात, महाराष्ट्र जैसे राज्योंमें जहाँ बडे बडे ज़मीनदार ही नहीं थे फिर भी वहाँ  जोतने वालोंको अधिक फायदा हुआ.

भूदान

ऐसी शासकीय अराजकतामें विनोबा भावे को भूदानका विचार आया. विनोबा भावे तो अहिंसावादी थे. उन्होंने लोगोको कहा कि आपके उपर कोई दबाव नहीं है. आप हमें कुछ न कुछ भूमि दानमें देदो. इस कामके लिये विनोबा  भावेने गांव गांव और पूरे देशमें पदयात्रा की. उन्होंने हर गांवमें गांव वालोंसे समिति बनायी और जिन किसानोंके पास ज़मीन नहीं थी उनको ज़मीन दिलायी. विनोबाके इस पुरुषार्थसे जो ज़मीन मिली वह नहेरुके सरकारी कानूनसे मिली ज़मीन से कहीं अधिक ही थी. जो व्यक्ति नीतिमान होता है उसके परिणाम हमेशा अधिक लाभदायी होते है.

एक बात गौरसे याद रक्खो. सरकारको तो भूदानमें मिली हुई ज़मीनको लाभकर्ताके नाम ही करना था. यानी कि कलम ही चलाना था. लेकिन यह काम सरकार दशकों तक न कर सकीं. महेसुल विभाग (रेवन्यु कलेक्टर) कितना नीतिहीन है उसका यह एक ज्वलंत उदाहरण है. विनोबा भावेने नहेरुका इस बात पर ध्यान आकर्षित किया था. लेकिन हम सब जानते है कि नहेरु केवल वाणीविलासमें ही अधिक व्यस्त रहेते थे और वे जब फंस जाते थे तब वे वितंडावाद पर उतर आते  थे या तो गुस्सा कर बैठते थे.

हारकर विनोबा भावे ने कुछ इस मतलबका  कहा कि “मेघ राजा तो पानी बरसाते बरसाते चले जाते है. उनके दिये हुए पानीसे खेती करना तो मनुष्यके दिमागका काम है. सरकारी कलम चलाना मेरा काम नहीं. मैंने तो मेरा काम कर दिया”

सहकारी खेतीः

नहेरु ने सहकारी खेतीका कानून बनाया. और सहकारी खेतीको कुछ रियायतें देनेका का प्रावधान भी रक्खा.

तब विनोबा भावेने क्या कहा?

यह सरकार या तो ठग है या तो यह सरकार बेवकुफ है. इन दोनोंमेंसे एकका तो उसको स्विकार करना ही पडेगा. मेरी पांच संताने थीं. मैंने कुछ मित्रोंको सामेल किया ताकि सरकारको ऐसा न लगे कि मैं फ्रोड करता हूँ. फिर हमने एक सहकारी खेत मंडली बनाई और सरकारी रियायतें ले ली.

क्या  कोई इसको सहकारी खेती कहेगा? यह तो सरकारको बेवकुफ बनानेका धंधा ही हुआ. सहकारी खेतीमें तो पूरा गाँव होना चाहिये.

पाकिस्तानमें मार्शल लॉ

१९५४में पाकिस्तानके प्रमुख  इस्कंदर मीर्ज़ा सर्वसत्ताधीश बन गये.फिर उन्होंने भारतको सूचन  दिया कि चलो हम भारत-पाकिस्तानका फेडरल युनीयन बनावें.

नहेरुने इसको धुत्कार दिया. फेडरल युनीयनके बारेमें  उन्होंने कहा कि क्या एक जनतंत्रवादी देश और एक लश्करी शासनवाले देशके साथ फेडरल युनीयन बन सकता है? नहेरु लगातार लश्करी-शासनकी निंदामें व्यस्त रहेने लगे.

तब विनोबा भावे ने क्या कहा?

जनतंत्रवादी देश और लश्करी शासनवाले देश भी मिलकर फेडरल युनीयन बना ही सकते है. दो देशोंका मिलना ही तो मित्रता है उसको आप कुछ भी नाम देदो. क्या भारतकी चीन और रुससे मित्रता नहीं है. वे कहाँ जनतांत्रिक देश है? भारत और पाकिस्तान मिलकर एक फेडरल युनीयन अवश्य बना सकते है.

नहेरुको विनोबा भावे का स्वभावका पता था. नहेरु तर्कबद्ध संवादमें मानते नहीं थे. क्यूँ कि वह उनके बसकी बात नहीं थी. लेकिन वे १०० प्रतिशत सियासती थे. समाचार माध्यम और उनका समाजवादी ग्रुप, उनका शस्त्र था. विनोबा भावे को सरकारी संत नामसे पहेचाने जाते थे. उनके क्रांतिकारी विचोरोंको प्रसिद्धि नहीं दी जाती थीं.

१९६२का भारत चीन युद्ध

चीनने भारतकी ९१००० चोरसमील भूमि आसानीसे जीत ली. वास्तवमें चीनका दावा ७१००० चोरस मील पर ही था. जब चीनके ध्यानमें यह बात आयी तो उसने अतिरिक्त २०००० चोरसमील भूमि खाली कर दी. युद्ध विराम भी चीनने ही घोषित किया था. कमालकी बात यह है कि जिस युद्धमें भारतने ९१००० चोरस मिल भूमि हारी, वह एक अघोषित युद्ध था.

विनोबा भावे सियासती नहीं थे. लेकिन वे खिलाडी अवश्य थे. उन्होंने चीनकी प्रशंसा की. “चीन एकमात्र ऐसा देश है जिसने विजेता होते हुए भी युद्ध विराम किया. इतना ही नहीं चीन एकमात्र देश है जिसने जीती हुई भूमि अपने दुश्मनको बिना मांगे वापस कर दी.”

नहेरु तो “दुश्मनने हमें दगा दिया … दुश्मनने हमें पीठमें खंजर भोंका … “ ऐसा प्रलाप करनेमें व्यस्त थे. 

 विनोबा भावेका संदेश वास्तवमें नहेरुके लिये था कि ज्यादा बकवास मत करो.  युद्ध विराम,  तुमने तो नहीं किया है. तुम तो युद्ध कर सकते हो.

विमुख

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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There is a difference between alliance against INC and against BJP

एक गठबंधन नहेरुवीयन कोंग्रेसके विरुद्ध  और एक गठबंधन बीजेपीके विरुद्ध -२

जो गठबंधन १९७०में हुआ और उस समय जो सियासती परिस्थितियां थी वह १९७२के बाद बदलने लगी थीं.

भारत पाकिस्तान संबंधः

१९७०में एक ऐसी परिस्थिति बनानेमें इन्दिरा गांधी सफल हुई थी, कि उसने जो भी किया वह देशके हितके लिये किया. उसके पिताजी देशके लिये बहुत कुछ करना चाहते थे लेकिन कोंग्रेसके (वयोवृद्ध नेतागण) उसको करने नहीं देते थे. और अब वह स्वयं, नहेरुका अधूरा काम पूरा करना चाहती है. विद्वानोने, विवेचकोंने, मूर्धन्योंने और बेशक समाचार माध्यमोंने यह बात, जैसे कि उनको आत्मसात्‌ हो गयी हो, ऐसे मान ली थी, और जनताको मनवा ली थी.

पूर्व पाकिस्तानमें बंग्लाभाषी कई सालोंसे आंदोलन कर रहे थे. पश्चिम पाकिस्तानी सेना हिन्दुओं पर और बंग्लाभाषी मुसलमानों पर आतंक फैला रही थी. उसके पहेले हिन्दीभाषीयोंसे बंगलाभाषी जनता नाराज थी. हिन्दीभाषी पूर्वपाकिस्तानवासीयोंकी और हिन्दुओंकी हिजरत लगातार चालु थी. वह संख्या एक करोडके उपर पहूंच चुकी थी. इन लोगोंको वापस भेजनाका वादा इन्दिरा गांधी कर रही थी.

भारतमें भी इन्दिरा गांधी पर सेनाका और खास करके जनताका दबाव बढ रहा था.  पाकिस्तानने सोचा कि यह एक अच्छा मौका है कि भारत पर आक्रमण करें. यह लंबी कहानी है.  १९७१में पाकिस्तानने भारत पर आक्रमण किया. भारतीय सेना तो तैयार ही थी. भारतकी सेनाके पास यह युद्ध जीतनेके सिवा कोई चारा ही नहीं था. और भारतने यह युद्ध प्रशंसनीय तरीकेसे जीत लिया. लेकिन इन्दिरा गांधीने सिमला समज़ौता अंतर्गत पराजयमें परिवर्तित कर दिया. या तो इन्दिरा गांधी बेवकुफ थी या ठग थी.

SIMLA

इस युद्धसे पहेले तो विधानसभाओंके चूनावको विलंबित करनेकी बातें इन्दिरा गांधी कर रही थी. लेकिन इस युद्धकी जीतके बात इन्दिरा गांधीने राज्योंकी विधान सभाओंका चूनाव भी कर डाला.

१९७2में राज्यों के विधान सभाके चूनाव भी इन्दिरा गांधीने जीत लिये. उसकी हिंमत बढ गयी थी. अब तो उसकी आदत बन गयी थी कि वह राज्योंमे अपनी स्वयंकी पसंदका नेता चूनें. इस प्रकार मध्य प्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात … आदि सब राज्योंमें इन्दिराकी पसंदका नेता चूना गया यानी कि इन्दिराकी पसंदके मूख्य मंत्री बने.

गुजरातमें क्या हुआ?

वैसे तो १९७१ के लोकसभाके चूनावके बाद, देशके अन्य पक्षोंमें खास करके कोंग्रेस (ओ) में अफरातफरी मच गयी थी. बहुतेरे कोंग्रेस(ओ)के कोंग्रेसी चूहोंकी तरह इन्दिरा कोंग्रेसकी तरफ भाग रहे थे. कोंग्र्स(ओ)मेंसे बहुतसारे सभ्य इन्दिरा कोंग्रेसमें भाग गये थे. स्वतंत्र पक्ष तूट गया था.  हितेन्द्र देसाई की सरकार तूट चूकी थी. इन्दिरा गांधीने अपनी पसंदका मुख्य मंत्री घनश्याम भाई ओझा को मुख्य मंत्री बनाया. १९७२में गुजरात विधान सभाका चूनाव हुआ. इस चूनावमें मोरारजी देसाईका गढ तूट गया था. विधान सभामें इन्दिरा कोंग्रेसको विधान सभाकी कुल १६८ सीटोमेंसे १४० सीटें मिलीं.

युद्ध सेना जीतती है, सरकार तो सिर्फ युद्ध करनेका   या तो न करनेका निर्णय करती है. सेनाने युद्ध जीत लिया. इस जीतका लाभ भी इन्दिरा गांधीने १९७२के विधान सभा चूनावमें ले लिया. लेकिन युद्ध जीतना और चूनाव जीतना एक बात है. सरकार चलाना अलग बात है.

इन्दिरा गांधी पक्षमें सर्वोच्च थी क्यों कि उसको जनताका सपोर्ट था. पक्षमें वह मनचाहे निर्णय कर सकती थी. लेकिन सरकार चलाना अलग बात है. सरकार कायदेसे चलती है. सरकार चलानेमें अनेक परिबल होते है. इन परिबलोंको समज़नेमें कुशाग्र बुद्धि चाहिये, पूर्वानुमान करने की क्षमता चाहिये. आर्षदृष्टि चाहिये. विवेकशीलता चाहिये. इन सब क्षमताओंका इन्दिरा गांधीमें अभाव था.

गुजरातमें विधानसभा चूनावके बाद इन्दिराने अपने स्वयंके पसंद व्यक्तिको  (घनश्याम भाई ओझाको) मुख्य मंत्रीपद के लिये स्विकारने का आदेश दिया. गुजरातके चिमनभाई पटेलने इसका विरोध किया. इन्दिराने एक पर्यवेक्षक भेजा जिससे वह घनश्याम भाई ओझाकी स्विकृति करवा सके. लेकिन वह असफल रहा. गुजरातमें इन्दिरा गांधी की मरजी नहीं चली.

१९७३में परिस्थिति बदलने लगी. केन्द्र सरकारके पास बहुमत अवश्य था. लेकिन कार्यकुशता और दक्षता नहीं थी. युवा कोंग्रेसके लोग मनमानी कर रहे थे. देशमें हर जगह अराजकताकी अनुभूति होती थी. विरोध पक्षके कई सक्षम नेता थे लेकिन वे हार गये थे. अराजकता और शासन के अभावोंके परिणाम स्वरुप महंगाई बढने लगी थी. घटीया चीज़े मिलने लगी. वस्तुएं राशनमेंसे अदृष्य होने लगी. सीमेंट, लोहा, तो पहेले भी परमीटसे मिलते था अब तो गुड, लकडीका कोयला, दूध, शक्कर, चावल भी अदृष्य होने लागा.

१६८मेंसे १४० सीट जीतने वाली इन्दिरा कोंग्रेसका हारनेका श्री गणेश १९७२के एक उपचूनावसे ही हो गया. इन्दिरा कोंग्रेस १४० सीटें ले तो गई लेकिन उसमें जनता खुश नहीं थी.  लोकसभाकी सीट जो इन्दुलाल याज्ञिक (अपक्ष= इन्दिरा कोंग्रेस)   की मृत्यु से खाली पडी.

उस सीट पर पुरुषोत्तम गणेश मावलंकर, इन्दिरा कोंग्रेसके प्रत्यासीके उपर २००००+मतके मार्जिनसे जित गये. सभी पक्षोंका उनको समर्थन था.

Mavalankar

पुरुषोत्तम मावलंकर अहमदाबादके अध्यापक, पोलीटीकल विवेचक, बहुश्रुत विद्वान थे. वैसे तो वे भारतकी प्रथम लोकसभाके अध्यक्ष गणेशमावलंकरके पुत्र थे, लेकिन उनका खुदका व्यक्तित्व था.

गुजरातमें नवनिर्माण का आंदोलन

गुजरातमें नवनिर्माण का आंदोलन शुरु हुआ. लोगोंको भी लगा कि उसने गलत पक्षको जिताया है.  लेकिन इसका सामना करने के लिये इन्दिरा कोंग्रेसने जातिवाद को बढाने की कोशिस शुरु की. शहरमें उसका खास प्रभाव न पडा. गांवके प्रभावशील होनेका प्रारंभ हुआ. लेकिन आखिरमें १६८मेंसे १४० सीट लाने वाली इन्दिरा कोंग्रेसकी सरकार गीर गयी. चिमनभाई पटेलको इस्तिफा देना पडा. इन्दिराने फिर भी विधान सभाको विसर्जित नहीं किया. जनताको विसर्जनके सिवा कुछ और नहीं पसंद था. राष्ट्रपति शासन लदा. चूनावके लिये मोरारजी देसाईको आमरणांत उपवास पर बैठना पडा. परिणाम स्वरुप १९७५में चूनाव घोषित करना पडा. इन सभी प्रक्रियामें इन्दिराकी विलंब करने की नीति सामने आती थी.

अब सारे देशके नेताओंको लगा कि इन्दिरा हर बात पर विलंब कर रही है. तो विपक्षको एक होना ही पडेगा.

गुजरातमें विधानसभा चूनावमें  जनता फ्रंटका निर्माण हुआ. इसमें जनसंघ, कोंग्रेस(ओ), संयुक्त समाजवादी पार्टी, अन्य छोटे पक्ष और कुछ अपक्ष थे. चिमनभाई पटेलको इन्दिरा कोंग्रेसने बरखास्त किया था. उन्होंने अपना किमलोप (किसान, मज़दुर, लोक पक्ष) नामका नया पक्ष बनाया था.

चूनावमें १८२ सीटमेंसे

जनता मोरचाको   = ६९

जिनमें

कोंग्रेस (ओ) = ५६

जन संघ = १८

राष्ट्रीय मज़दुर पक्ष = १

भारतीय लोक दल =२

समाजवादी पक्ष = २

किसान मजदुर लोक पक्ष = १२

अपक्ष = १८

और

इन्दिरा कोंग्रेसको = ७५

अपक्षोंके उपर विश्वास नहीं कर सकते थे. इस लिये स्थाई सरकार बनानेके लिये जनता मोरचाने, किसान मजदुर लोक पक्षका सहारा लिया. और बाबुभाई जशभाई पटेल जो एक कदावर नेता थे उनकी सरकार बनी. हितेन्द्र देसाई ने चूनाव लडा नहीं था. और चिमनभाई पटेल चूनाव हार गये थे.

यह चूनाव एक गठबंधनका विजय था.

वैसे तो गुजरातकी तुलना अन्य राज्योंसे नहीं हो सकती, लेकिन जो देशमें होनेवाला है उसका प्रारंभ गुजरातसे होता है.

गुजरातमें इन्दिरा गांधीके कोंग्रेसकी हारके कारण देश भरमें जयप्रकाशनारायण की नेतागीरीमें आंदोलन शुरु हुआ. वैसे भी जब नवनिर्माणका आंदोलन चलता था तो सर्वोदयके कई नेता आते जाते रहेते थे.

सर्व सेवा संघमें अघोषित विभाजन

सर्वोदय मंडल दो भागमें विभक्त हो गया था. एक भाग मानता था कि जयप्रकाश नारायण जो संघर्ष कर रहे है उनको सक्रिय साथ देना चाहिये. दुसरा भाग मानता था कि, इससे सर्वोदय को कोई फायदा नहीं होने वाला है. यदि फायदा होना है तो राजकीय पक्षोंको ही होने वाला है. इसलिये हमें किसी पक्षको फायदा पहोंचे ऐसे संघर्षमें भाग लेना नहीं चाहिये.

लेकिन शांतिसेना तो जयप्रकाश नारायणको ही मानती थी. शांतिसेनाके सदस्योंकी संख्या बहुत बढ गयी थी. और वह सक्रिय भी रही.

कुछ समयके बाद इन्दिराके सामने उसके चूनावको रद करनेका जो केस चल रहा था उसका निर्णय आया. इन्दिरा गांधी को दोषी करार दिया और उसको ६ सालके लिये चूनाव के लिये अयोग्य घोषित किया.

मनका विचार आचरणमें आया

DEMOCRACY WAS ATTACKED

emergency

जो बात नहेरुके मनमें विरोधीयोंको कैसे बेरहेमीसे नीपटना चाहिये, जो गुह्य रुपसे निहित थी लेकिन खुल कर कही जा सकती नहीं थीं. क्यों कि स्वातंत्र्यके अहिंसक संग्राममें नहेरु, पेट भर जनतंत्रकी वकालत कर रहे थे. उनके लिये अब कोयला खाना मुश्किल था.

इन्दिरा गांधी अपने पिताके साथ ही हर हमेश रहेती थी इसलिये उनको तो अपने पिताजीकी ये मानसिकता अवगत ही थी.

वैसे भी नहेरु और गांधीके बीचमें ऐसे कोई एक दुसरेके प्रति मानसिक आदर नहीं था.  यह बात नहेरुने केनेडाके एक राजनयिक (डीप्लोमेट)को, जो बादमें केनेडाके प्रधान मंत्री बने, उनके साथ भारतमें एक मुलाकात में उजागर की थी. नहेरुने गांधीजीको ढोंगी और दंभी और नाटकबाज बताया था. इस बात सुनकर वह राज नयिक चकित और आहत हो गया था. इसके बारेमें इस ब्लोग साईट पर ही विवरण दिया है. गांधीजीने भी नहेरुके बारे में कहा था कि जवाहरको तो मैं समज़ सकता हूँ, लेकिन उनके समाजवादको नहीं समज़ सकता. वे खुदभी समज़ते है मैं मान नहीं सकता.

इन्दिराको सब बातें मालुम थीं.

गांधीजीने यह भी कहा था कि “अब जवाहर मेरा काम करेगा और मेरी भाषा बोलेगा.” इसका अर्थ यही था कि नहेरुको सत्ता प्राप्तिसे विमुख रहेना चाहिये और बिना सत्ता ही जन जागृतिका काम करना चाहिये. गांधीजीने इसलिये कोंग्रेसका विलय करने का भी आदेश दिया था.

यदि जवाहर स्वयं, गांधीजीका काम करते, तो उनको यह बात कहेने कि आवश्यकता न पडती. गांधीजीने कभी विनोबा भावेके बारेमें तो ऐसा नहीं किया कि “अब विनोबा मेरी भाषा बोलेंगे और मेरा काम करेंगे”. क्यों कि ऐसा कहनेकी उनको आवश्यकता ही नहीं थी. विनोबा भावे तो गांधीजीका काम करते ही थे.

यह सब बातोंसे इन्दिरा गांधी अज्ञात तो हो ही नही सकती. इस लिये नहेरुके मनमें जो राक्षस गुस्सेसे उबल रहा था, वह राक्षस इन्दिराके अंदर विरासतमें आया था. चूं कि इन्दिरा गांधीका, स्वातंत्र्य संग्राममें कोई योगदान नहीं था, इस लिये उसको अनियंत्रित सरमुखत्यार बनने की बात त्याज्य नहीं थी. “गुजरातीमें एक मूँहावरा है कि नंगेको नाहना क्या और निचोडना क्या?”

जनतंत्रकी रक्षा

PM rules out pre emergency days

कुछ फर्जी या स्वयं द्वारा प्रमाणित विद्वान लोग बोलते है कि भारतमें जो जनतंत्र है वह नहेरुवीयन कोंग्रेस के कारण विद्यमान है. वास्तवमें जनतंत्रके अस्तित्व लिये नहेरुवीयन कोंग्रेसको श्रेय देना एक जूठको प्रचारित करना है. नहेरुवीयन कोंग्रेसने तो जनतंत्रको आहत करने की भरपूर कोशिस की है.

वास्तवमें यदि जनतंत्रको जीवित रखनेका श्रेय किसीको भी जाता है तो भारतकी जनताको ही जाता है. दुसरा श्रेय यदि किसीको जाता है तो गांधीजीके सब अंतेवासी और कोंग्रेस(ओ)के कुछ नेताओंको जाता है और उस समयके कुछ विपक्षीनेताओंको जाता है जो इन्दिरा गांधीके विरोध करनेमें दृढ रहे.

नहेरुवीयन फरजंदकी सरमुखत्यारी और दीशाहीनता

i order poverty to quit india

आपातकालमें क्या हुआ वह सबको ज्ञात है. लाखों लोगोंको बिना कारण बाताये कारावासमें अनिश्चित कालके लिये रखना, समाचार पर अंधकार पट, सरकार द्वारा अफवाहें फैलाना, न्यायालयके निर्णयों पर भी निषेध, भय फैलाना…. अदि जो भी सरकारके मनमें आया वह करना. यह आपात्कालकी परिभाषा थी.

Judiciary afraid

जो भारतके नागरिक विदेशमें थे वे भी विरोध करनेसे डर रहे थे. क्यों कि उनको डर था कि कहीं उनका पासपोर्ट रद न हो जाय. क्यों कि सरकारके कोई भी आचार, सिर्फ मनमानीसे चलता था. इसमें अपना उल्लु सिधा करनेवालोंको भी नकार नहीं सकते.

लेकिन सरकार कैसी भी हो, जब वह अकुशल हो तो वह अपना माना हुए ध्येय क्षमतासे नहीं प्राप्त कर सकती. गुजरातमें “जनता समाचार” और “जनता छापुं” ये दो भूगर्भ पत्रिकाएं चलती थीं. गुजरातमें बाबुभाई पटेलकी सरकार थी तब तक ये दोनों चले. इन्दिरा गांधीने कुछ विधान सभ्योंको भयभित करके पक्षपलटा करवाया और सरकारको गिराया. और ये भूगर्भ पत्रिका वालोंको कारावासमें भेज दिया.

जनता तो डरी हई थी. प्रारंभमें तो कुछ मूर्धन्यों द्वारा आपातकालका अनुमोदन हुआ या तो करवाया. लेकिन बादमें सच सामने आने लगा. आपात्काल, अपने बोज़से ही समास्याएं उलज़ाने की अक्षमताके कारण थकने लगा.

इन्दिरा आपात्काल के समय में डरी हुई रहेती थी. घरमें जरा भी आहटसे वह चौंक जाती थीं ऐसे समाचार भूगर्भ पत्रिकाओंमे आते रहे थे.  इन्दिरा गांधी, वास्तवमें सही विश्वसनीय परिस्थित क्या थी यह जाननेमें वह असमर्थन बनी थी.

साम्यवादी लोग, इस आपात्कालको क्रांतिका एक शस्त्र बनाने के लिये उत्सुक थे. लेकिन क्रांति क्या होती है और साम्यवादीयोंकी सलाह कहां तक माननी चाहिये, उनकी बातों पर इन्दिराको विश्वास नहीं था. उनके कई संपर्क उद्योगपतियोंसे थे. इन्दिरा गांधी स्वयं अपने बेटे संजयसे कार बनवाना चाहती थी. उसके सिद्धांत में कोई मनमेल नहीं था. वह दीशाहीन थी और उसके भक्त भी दीशा हीन थे.

एक और साहस

परिस्थिति हाथसे चली जाय, उसके पहेले वह फिरसे प्रधान मंत्री बनना चाहती थी ताकि वह आरामसे सोच सकें.   ऐसा चूनावी साहस उसने १९७१में लिया था और उसको विजय मिली थी. उसने आपात्काल चालु रखके ही चूनावकी घोषणा की.

कुछ लोग समज़ते है कि, इन्दिरा गांधीने आपात्काल हटा लिया था और फिर चूनाव घोषित किया था. यह बात वास्तवमें जूठ है.

जब वह खूद हार गयी तो उसने सेना प्रमुखको सत्ता हाथमें ले लेनेका प्रस्ताव दिया था. लेकिन सेनाने उसको नकार दिया था. तब इन्दिरा गांधीने आपात्कालको उठा लिया और यह निवेदन दिया कि, मैंने तो जरुरी था इसलिये आपात्काल घोषित किया था. अब यदि आपको लगे कि मैं सत्य बोलती थीं तो आप फिरसे आपात्काल लगा सकते हैं.

वास्तवमें उसको आपात्काल चालु रखके ही सत्ताका हस्तांतरण करना चाहिये था. यदि आने वाली सरकारको आपात्काल आवश्यक न लगे तो वह आपात्कालको उठा सकती थी. यह भी तो एक वैचारिक विकल्प था. लेकिन इन्दिरा गांधी ऐसा साहस लेना चाहती नहीं थीं. क्यों कि उसको डर था कि विपक्ष आपात्कालका आधार लेके उनको ही गिरफ्तार करके कारावास में भेज दें तो?

जो लोग कारावासमें थे वे सब एक हो गये. और इस प्रकार विपक्षका एक संगठन बना.

विपक्षके कोई भी नेताके नाम पर कोई कालीमा नहीं थी. सबके सब सिर्फ जनतंत्र पर विश्वास करने वाले थे. उनकी कार्यरीति (परफोर्मन्स)में कोई कमी नहीं थी. न तो उन्होने पैसे बनाये थे न तो उन्होंने कोई असामाजीक काम किया था, न तो कोई विवाद था उनकी प्रतिष्ठा पर.

मोरारजी देसाई, ज्योर्ज फर्नान्डीस, मधु दन्डवते, पीलु मोदी, मीनु मसाणी, दांडेकर, मधु लिमये,  राजनारायण, बहुगुणा, अजीत सिंह … ये सब इन्दिरा विरोधी थे. जब कोम्युनीस्टोंने देखा कि इन्दिरा कोंग्रेसका सहयोग करनेसे उनको अब कोई लाभ नहीं तो वे भी जनता मोरचाका समर्थन करने लगे.

आपात्कालसे डरी हुई  शिवसेना भी सियासती लाभ लेनेके लिये जनता मोरचाको सहयोग देनेके लिये आगे आयी. आंबेडकरका दलित पक्ष भी जनता मोरचाके समर्थनमें आगे आया. जगजीवन राम भी इन्दिराको छोड कर जनता मोरचामें सामिल हो गये.

हाँ जी. यह संगठनका नाम जनता मोरचा था. उसके सभी प्रत्याषी जनता दलके चूनाव चिन्ह पर चूनाव लडे थे.

जनता फ्रंटको भारी बहुमत मिला.

janata from ministry

प्रधान मंत्री बननेके लिये थोडा विवाद अवश्य हुआ.

जय प्रकाश नारायणकी मध्यस्थतामें सभी निर्णय लिये गये और उनके निर्णयको सभीने मान्य भी रखा. सबसे वरिष्ठ, उज्ज्वल और निडर कार्यरीतिके प्रदर्शन वाले मोरारजी देसाईको प्रधान मंत्री बनाया गया. वह भी सर्वसंमतिसे बनाया गया. जयप्रकाश नारायणने इन सबकी शपथ विधि भी राजघाट संपन्न करवाई.

इस प्रधान मंडलमें कोई कमी नहीं थी. मन भी साफ था ऐसा लगता था.

गठबंधनवाली सभी पार्टीयोंका जनता पार्टीमें विलय हुआ.

जनता पार्टीने क्या किया?

(१) सर्व प्रथम इस गठबंधनवाली सरकारने फिरसे कोई सरमुखत्यारी मानसिकता वाला प्रधान मंत्री आपात्काल देश के उपर लाद न सके उसका प्रावधान किया.

(२) उत्पादनकी इकाईयों उपरके अनिच्छनीय प्रतिबंध रद किया. जिसका परिणाम १९८०से बाद मिला.

(३) नोटबंदी लागु की जिसमें ₹ १००० ₹ ५००० और ₹ १०००० नोंटे रद की गयी.

(४) आपात्कालके समयमें जो अतिरेक हुआ था, उसके उपर जाँच कमीटी बैठायी.

१९७७के चूनाव परिणामके पश्चात यशवंतराव चवाणने इन्दिरा कोंग्रेससे अलग हो कर अपना नया पक्ष एन.सी.पी. बनाया.

जगजीवन राम तो चूनावसे पहेले ही जनता पार्टीमें आ गये थे.

अब गठबंधनका जो एक पार्टीके रुपमें था तो भी उसका क्या हुआ?

चौधरी चरण सिंहमें धैर्यका अभाव था. उनको शिघ्र ही प्रधान मंत्री बनना था.

उनकी व्युह रचना मोरारजी देसाई जान गये, और उन्होंने चौधरीको रुखसद दे दी. उस समय यदि जनसंघके नेता बाजपाई बीचमें न आते तो चरण सिंहके साथ अधिक संख्या बल न होने से उनके साथ २० से २५ ही सदस्य जाते.

मोरारजीने बाजपाई की बात मानली. यह उनकी गलती साबित हुई. क्यों कि चरण सिंह तो सुधरे नहीं थे. और वे कृतघ्न ही बने.

इन्दिराने इसका लाभ लिया. यशवंत राव चवाणने उसका साथ दिया. थोडे समयके अंदर चरण सिंहने अपने होद्देके कारण कुछ ज्यादा संख्या बल बनाया. और तीनोंने मिलकर मोरारजी देसाईकी सरकारको गीरा दी.

मोरारजी देसाईने प्रधान मंत्रीके पदसे त्याग पत्र दे दिया. लेकिन संसदके नेता पदसे त्याग पत्र नहीं दिया. यदि उन्होने त्याग पत्र दिया होता तो शायद सरकार बच जाती. लेकिन जगजीवन राम प्रधान मंत्री बननेको तयार हो गये. चरण सिंह और जगजीवन राममें बनती नहीं थी. इस लिये उन्होने नहेरुने जैसा जीन्ना के बारेमें कहा था उसके समकक्ष बोल दिया कि, मैं उस चमार को तो कभी भी प्रधानमंत्री बनने नहीं दुंगा.

जब ये नेता नहेरुवीयन कोंग्रेसमें थे तो उनके प्रधान मंत्री बननेकी शक्यताओंको नहेरुवीयनोंने निरस्त्र कर दिया था. वे सब इसी कारणसे नहेरुवीयन कोंग्रेससे अलग हुए थे या तो अलग कर दिया था.

उपरोक्त संगठन वरीष्ठ नेताओंका प्रधान मंत्री बननेकी इच्छाका भी एक परिमाण था. प्रधान मंत्री बननेकी इच्छा रखना बुरी बात नहीं. लेकिन अयोग्य तरीकोंसे प्रधान मंत्री बनना ठीक बात नहीं है.

प्रवर्तमान गठबंधनका प्रयास

अभी तक इन सभी नेताओं की संतान नहेरुवीयन कोंग्रेसको शोभायमान कर रही थीं. उनको महेसुस हो गया कि अब प्रधान मंत्री बनने के बजाय यदि प्रधान पद भी मिल जाय तो भी चलेगा.

इसलिये चरण सिंघ, जगजीवन राम, वीपी सींघ, बहुगुणा, गुजराल, एन.टी. रामाराव,  … आदि की संतान नहेरुवीयन कोंग्रेसको सपोर्ट देनेको तत्पर है. लेकिन जब नहेरुवीयन कोंग्रेस भी डूब गयी और उनका संख्या बल कम हो गया तो इनकी संतानोंमें फिरसे उनके अग्रजोंकी तरह वह सुसुप्त इच्छाएं जागृत हुई है.

यदि २०१९में ये सरकार चले भी तो उनका कारण देशको लूटनेमें सहयोग की वजहसे चलेगी. जैसे मनमोहन सिंघकी सरकार १० साल चली थी क्यों कि मनमोहन सिंघने सबको अपने अपने मंत्रालयमें जो चाहे वह करने की छूट दे रक्खी थी. शीला दिक्षित, ए. राजा, चिदंबरम आदि अनेक के कारनामे इसकी मिसाल है. इन लोगोंको यथेच्छ मनमानी करने की छूट दे दी थी. जब न्यायालय स्वयं विवादसे परे न हो तो इन लोगोंको कौन सज़ा दे सकता है?

आप देख लो सोनिया, माया, मुल्लायम, लालु, शरद पवार, जया, शशिकला, फारुख, ममता आदि सभी नेता पर एक या दुसरे कौभान्ड के आरोप है. कुछ लोग तो सजा काट रहे है, कुछ लोग बेल पर है और बाकी नेता न्यायालयमें सुनवाई पर है.

किसी भी मुंबई वालेको पूछोगे तो वह शिवसेना को नीतिमत्ताका प्रमाण पत्र देगा नहीं. महाराष्ट्रके मुख्यमंत्रीने उनके पर काट लिया है इस लिये वह भी अब ये नया गठबंधनमें सामिल होने जा रहा है.

गठ बंधनका  कोई भी नेता, नरेन्द्र मोदी के पैंगडेमें पैर रखनेके काबिल नहीं है.

अब जो विद्वान और मोदी-फोबियासे पीडित है वे और सर्वोदय वादी या गांधीवादी बचे है वे न तो गांधीवादी है न तो सर्वोदयवादी है. वे सब खत-पतवार (वीड) है. वे लोग सिर्फ अपने नामकी ख्याति के लिये मिथ्या आलाप कर रहे हैं.  

२०१९का चूनाव, भारतमें विवेचकोंकी, विद्वानोंकी और  मूर्धन्योंकी विवेक शक्तिकी एक परीक्षा स्वरुप है. १९७७में तो जयप्रकाश और मोरारजी देसाई जैसे गांधी वादी विद्यमान थे. इससे शर्मके मारे ये लोग जनतंत्रकी रक्षाके लिये बाहर आये. किन्तु अब ये लोग अपना कौनसा फरेबी रोल अदा करते हैं वह इतिहास देखेगा.

शिरीष मोहनलाल दवे

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सोमनाथका मंदिर कैसे तोडा जाय? भाग-१

सोमनाथका मंदिर कैसे तोडा जाय? भाग-१

यदि आप बछडेकी सरे आम और वह भी सडक पर हत्या कर सकते है और बछडेके मांसको पका सकते है और मांसका वितरण कर सकते है और भोजन समारंभ कर सकते है तो अब तुम कई सारे कार्य कर सकते हो. सोमनाथका मंदिर तोडने के लिये आगे बढो. प्रदर्शन करना, कानुन भंग करना जनतंत्रमें आपका अधिकार है.

लोग पूछेंगे आप किससे बात कर रहे हो? कौन तोडेगा सोमनाथका मंदिर?

नहेरुवीयन कोंग्रेस ही सोमनाथका मंदिर तोड सकती है. सामान्य मुसलमान लोगोंके लिये यह बसकी बात नहीं है. यदि नहेरुवीयन कोंग्रेस द्वारा सोमनाथका मंदिर तोडा जाय तो भारतके अधिकतर मुसलमान अवश्य आनंदित होगे. पाकिस्तान के लोग भी आनंदित होगे. इससे पाकिस्तान और हिंदुस्तानके संबंधोंमे सुधार आयेगा. नहेरुवीयन कोंग्रेसका और उसके सांस्कृतिक साथीयोंका ध्येय मुसलमानोंको आनंदित करना ही तो है.

“दो बैलोंकी जोडी”

गाय के ब्रह्मरंध्रके हिस्सेमें परमेश्वरका वास है. वैसे तो गायमें सभी देवताओंका वास है. किन्तु सबसे वरिष्ठ, ऐसे देवाधिदेव महादेव ब्रह्मरंध्रमें बिराजमान है. देवताओंके अतिरिक्त सप्तर्षियोंका भी वास है. गाय का दूध, गोबर और मूत्र, औषधि माना जाता है. हमारे बंसीभाई पटेल, कुछ वर्षोंसे केवल गायके दूध पर ही जीवन व्यतित कर रहे हैं. वे ९५ वर्षके है और तंदुरस्त है.

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महात्मा गांधीकी कार्य सूचिमें मदिरा-निषेधके पश्चात्‌ गौ-वंश वध निषेध आता था. उसके पश्चात्‌ स्वावलंबन और अहिंसा आदि “मेरे स्वप्नका भारत और हिन्द स्वराज”में लिखी गई कार्य सूचिमें आते थे.

नहेरुको महात्मा गांधीकी यह मानसिकता पसंद नही  थी. किन्तु नहेरुका कार्य सूचिमें प्रथम क्रम पर सत्ता, और उसमें भी सर्वोच्च शक्तिमान प्रधानमंत्री पद था. यदि वे निर्भय होकर सामने आते और “मनकी बात” प्रदर्शित करते तो उनके लिये प्रधानमंत्रीका पद आकाशकुसुमवत बन जाता.

इस कारणसे नहेरुने महात्मा गांधीका कभी भी विरोध नहीं किया.

भारतीय संविधानमें ही मदिरा-निषेध, गौवध-निषेध और अहिंसक समाजकी स्थापना, ऐसे कर्य-विषयोंका समावेश किया जाय ऐसी महात्मा गांधीकी महेच्छा थी. ये बातें महात्मागांधीके “हिन्द-स्वराज्य”में स्पष्ट रुपसे लिखित है. संविधानकी रचनाके कालमें तो कई सारे महात्मा गांधीवादी, विद्यमान थे. नहेरुने तो कोई संविधान लिखा नहीं. हां नहेरुने भारतका इतिहास जो अंग्रेजोने लिखा था उसका “कोपी-पेस्ट” किया था. नाम तो डीस्कवरी ऑफ ईन्डीया लिखा था, किन्तु कोई डीस्कवरी सुक्ष्मदर्शक यंत्रसे भी मिलती नहीं है.

बाबा साहेब आंबेडकरने भारतका संविधान लिखा है. नहेरुने केवल स्वयंको जो विपरित लगा उनको निर्देशात्मक सूचिमें समाविष्ठ करवा दिया. निर्देशात्मक सुचिमें समावेश  करवाया उतना ही नहीं, उनको राज्योंके कार्यक्षेत्रमें रख दिया.

उत्तर प्रदेश सर्वप्रथम राज्य था जिसने गौवध निषेध किया. उस समय नहेरुने आपत्ति प्रदर्शित की थी, और त्याग पत्र देनेकी भी धमकी भी दी थी, किन्तु तत्कालिन पंतप्रधानने उनकी धमकीकी अवगणना की.

नहेरु अपने को धर्म निरपेक्ष मानते थे और वे अपने अल्पसंख्यकोंको अनुभूति करवाना चाहते थे कि वे (स्वयं परिभाषित परिभाषाको, स्वयं द्वारा ही प्रमाणित) धर्मनिरपेक्षता पर प्रतिबद्ध थे.

नहेरुकी यह मानसिकता, नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण और उनसे अभिभूत अनुयायीगणमें भी है. अभिभूत शब्द ही सही है.

एक समय था जब कोंग्रेसका पक्षचिन्ह दो-बैलोकी जोडी था. बैल भी गायकी ही प्रजातिमें आता है. १९६९में नहेरुवीयन कोंग्रेसका, नहेरुकी फरजंद ईदिरा गांधीकी नेतागीरीवाली, और कोंग्रेस संगठनकी सामुहिक नेतागीरीवाली, कोंग्रेसमें विभाजन हुआ. कोंगी [कोंग्रेस (आई)], कोंगो [कोंग्रेस (ओ)].

गाय बछडावाली नहेरुवीयन कोंग्रेस

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ईन्दीरा गांधीमें नहेरुके सभी कुलक्षण प्रचूर मात्रामें थे. अपने पक्षका चिन्ह उसने गाय-बछडा रक्खा जिससे हिन्दुओंको और खास करके कृषक और गोपाल समाजको आकर्षित किया जा सके. ईन्दिरा गांधीने आचारमें भी जनताका विभाजन, धर्म और ज्ञातिके आधार पर किया. जब वह शासन करनेमें प्रत्येक क्षेत्रमें विफल रही तो उसने आपत्‌ काल घोषित किया.

I CAN DEFEAT YOU

इस आपात्‌ काल अंतर्गत विनोबा भावे ने ईन्दिरा गांधीको पत्र लिखा की “गौ-हत्या”का  निषेध किया जाय, नहीं तो वे आमरणांत अनशन पर जायेंगे. आपात्‌कालके अंतर्गत तो समाचार माध्यममें शासनके विरुद्ध लिखना निषेध था. इस लिये विनोबा भावे के पत्रको प्रसिद्धि नहीं मिली. ईन्दिरा गांधीने आश्वासन दिया की वह गौ-हत्या पर निषेध करेगी और उसने समय मांगा. विनोबा भावे तो शतरंजके निपूण खिलाडी थे. उनको तो परीक्षा करनेकी थी कि इन्दिरा गांधी पूरी तरह मनोरोगी हो गई है या नहीं. विनोबा भावेको लगा कि ईन्दिरा गांधी पूर्णतया मनोरोगी नहीं बन गयी है किन्तु रोग अवश्य आगे बढ गया है. इसलिये उन्होने आचार्य संमेलन बुलाया. इसकी बात हम यहां नहीं करेंगे.

विनोबा भावे को यह अनुभूति नहीं हुई कि जब कोई पक्षका नेता स्वकेन्द्री और दंभी बन जाता है तो ऐसी मानसिकता उनके पक्षके अधिकतर सदस्योंमें भी आ जाती है. ये लोग तो अपने नेतासे भी आगे निकल जाते है. और शिर्षनेतागणको यह उचित भी लगता है क्यों कि पक्षके एक सदस्यने यदि कोई अभद्र व्यवहार किया और पकडा गया, तो शिर्ष नेतागण स्वयंको उससे वे सहमत नहीं है ऐस घोषित कर सकते है और आवश्यकता अनुसार स्वयंको वे, उससे असहमत और भीन्न है ऐसा दिखा सकते है.

नियमोंवाला संविधान किन्तु आचारमें मनमानी

नहेरुवीयन कोंग्रेसने नियम तो ऐसे कई बनाये है. किन्तु नियम ऐसे क्षतिपूर्ण बनाये कि वे नियम व्यंढ ही बने रहे. ऐसे नियम बनानेका उसका हेतु अबुध जनता को भ्रमित करनेका था. उनका कहना था कि “देखो, हमने तो नियम बनाये है, किन्तु उसका पालन करवाना शासनका काम है. यदि कोई राज्यमें विपक्ष का शासन है तो नहेरुवीयन कोंग्रेस ऐसा कहेगी कि “यह तो राज्यका विषय है” यदि वहां पर नहेरुवीयन कोंग्रेसका शासन है तो उसका कथन होगा “हमने विवरण मांगा है ….” या तो “अभी तो केस न्यायालयके आधिन है … देखते हैं आगे क्या होता है. … हम प्रतिक्षा कर रहे हैं”. यदि न्यायालयने नियम तोडनेवालेके पक्षमें न्याय दिया तो नहेरुवीयन कोंग्रेस कहेगी कि “हम अध्ययन कर रहे है कि कैसे संशोधन किया जाय.”

नहेरुवीयन कोंग्रेस द्वारा आपने गौ-मांस-भोजन-समारंभ तो देखे ही है.

निर्देशात्मक नियमोंका दिशा सूचन

समाजमें सुधार आवश्यक है. किन्तु समाज अभी पूरी तरह शिक्षित हुआ नहीं है. इसीलिये क्रमशः सुधार लाना है. निर्देशात्मक नियमोंका  यह प्रयोजन है. वे दिशासूचन करते हैं. यदि कोई राज्यका शासन नियम बनानेकी ईच्छा रखता है तो वह निर्देशात्मक नियमकी दिशामें विचारें और नियमका पूर्वालेख, नियमको उसी दिशामें, आचारके प्रति, शासनको प्रतिबद्ध करें. यही अपेक्षा है. निर्देशित दिशासे भीन्न दिशामें या विरुद्ध दिशामें नियम बनाया नहीं जा सकता.

नहेरुवीयन कोंग्रेस शासित राज्योंमें, जो नये नियम बने, वे अधिकतर निर्देशित सिद्धांतोसे विपरित दिशामें है. जैसे कि मद्य-निषेध. उन्नीसौसाठके दशकमें महाराष्ट्र स्थित नहेरुवीयन कोंग्रेसने मद्यनिषेधके नियमोंको सौम्य बनया ताकि ज्यादा लोग मद्यपान कर सके.

असहिष्णुताकी वोट बेंक बनाओ

 

धर्म के आधार पर विभाजन इस हद तक कर दो कि लोग अन्य धर्मके प्रति असहिष्णु बन जाय. हिन्दुओंको विभाजित करना तो सरल है.

वेमुला, अखलाक, कन्हैया जैसे प्रसंगोंको कैसे हवा दी गयी इस बातको हम सब जानते है. यदि कोई हिन्दु जरा भी असहिष्णु बने तो पूरे हिन्दुओंकी मानसिकताकी अपकिर्ती फैला दो.

नहेरुवीयन कोंग्रेसने ऐसी परिस्थिति बना दी है कि यदि कोई सुरक्षाकर्मी,  जीपके आगे किसी पत्थरबाज़ को बांध दे और सुरक्षा कर्मीयोंको पत्थरबाज़ोंसे बचायें और परिणाम स्वरुप आतंक वादियोंसे जनताकी भी सुरक्षा करें, तो फारुख और ओमर जैसे मुस्लिम लोग आगबबुला हो जाते हैं.

यदि फारुख और ओमर इस हद तक जा सकते है तो नहेरुवीयन कोंग्रेसको तो फारुख और ओमरसे बढकर ही होना चाहिये न !!

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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