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दायें पप्पु, बांये पप्पु, आगे पप्पु, पीछे पप्पु बोले कितने पप्पु?

दायें पप्पु, बांये पप्पु, आगे पप्पु, पीछे पप्पु बोले कितने पप्पु?

पप्पु पप्पु और पप्पु

पप्पुयुगका पिता वैसे तो मोतीलाल नहेरु है, लेकिन उनको तो शायद मालुम ही नहीं होगा कि वे एक नये पप्पु-युगकी नींव रख रहे है.

पहेला पप्प कौन?

आदि पप्पु यानी कि रा.गा. (राहुल गांधी) ही है किन्तु पप्पु युगका निर्माण तो नहेरुने ही किया. नहेरु ही प्रथम पप्पु है. यानी कि पप्पु-वंश तो नहेरुसे ही प्रारंभ हुआ.

क्या नहेरु पप्पु थे?

सोच लो. यदि आपने किसीको अमुक काम करनेसे मना किया. और इतिहासका हवाला भी दिया. भयस्थान भी बताये. फिर भी यदि आप वो काम करते हो तो लोग आपको पप्पु नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे.

(१) जी हाँ, नहेरुने ऐसा ही किया था. सप्टेंबर १९४९में तिबट पर चीन ने आक्रमण किया, तो नहेरुने सरदार पटेलके पटेलके संकेत और चेतावनी को नकारा और कहा कि चीनने उसको आश्वासन दिया है कि वह तिबटके साथ शांतिसे नीपटेगा. यह तो कहेता बी दिवाना और सूनता भी दिवाना जैसी बात थी.  और १९५१ आते आते चीनने तिबट पर कबजा कर दिया. इस अनादर पर भी नहेरुने दुर्लक्ष्य दिया. और चीनसे घनिष्ठ मैत्री संबंध (पंचशील) का  अनुबंध किया.

(२) तिबटको अब छोडो. पंचशीलके बाद भी चीनकी सेनाका अतिक्रमण प्रारंभ हो गया और जब वह बार बार होने लगा तो संसदमें प्रश्न भी उठे. नहेरुने संसदमें जूठ बोला. आचार्य क्रिपलानीने इसके उपर ठीक ठीक लिखा है.

(३) चीनकी घुस खोरीको अब छोडो. १९४७में नहेरुको गांधीजीने बताया कि शेख अब्दुल्ला पर सरदार पटेल विश्वास करते नहीं है. और लियाकत अली कश्मिरके राजाको स्वतंत्र रहेनेको समज़ा रहे है. काश्मिर न तो पाकिस्तानमें जा सकता है, न तो वह स्वतंत्र रह सकता है. काश्मिरको तो भारतके साथ ही रहेना चाहिये. लेकिन नहेरुने महात्मा गांधीकी बात न मानी और शेख अब्दुल्ला पर विश्वास किया.

(४) नहेरु इतने आपखुद थे कि राजाओंकी तरह उनके उपर कोई नियम या सिद्धांत चलता नहीं था. एक तरफ वे लोकशाहीका गुणगान करते थे और दुसरी तरफ उन्होंने शेख अब्दुलाको खुश करनेके लिये बिनलोकशाहीवादी अनुच्छेद ३७०/३५ए अ-जनतांत्रिक तरीकेसे संविधानमें सामेल किया. अस्थायी होते हुए भी जब तक वे जिन्दा रहे तब तक उसको छेडा नहीं, और १९४४से कश्मिरमें स्थायी हुए हिन्दुओंको ज्ञातिके आधार पर और मुस्लिम स्त्रीयोंको लिंगको आधार बनाके मानवीय और जनतांत्रिक अधिकारोंसे वंचित रक्खा.

इसको आप पप्पु नहीं कहोगे तो क्या कहोगे?

क्या इन्दिरा गांधी पप्पु थी?

१९७१की इन्डो-पाक युद्धमें भारतकी विजयका श्रेय इन्दिराको दिया जाता है. यह एक लंबी चर्चाका विषय है. किन्तु जरा ये परिस्थिति पर सोचो कि पाकिस्तान किस परिस्थितिमें युद्ध कर रहा था और बंग्लादेशकी मुक्ति-वाहिनी (जिसको भारतकी सहाय थी) किस परिस्थितिमें युद्ध कर रही थीं. भारतीय सेनाको यह युद्ध जीतना ही था उसके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था. और सेनाने तो अपना धर्म श्रेष्ठता पूर्वक निभाया.

किन्तु इन्दिरा यदि पप्पु नहीं थी तो उसने अपना धर्म निभाया? नहीं जी. जरा भी नहीं. जो परिस्थिति उस समय पाकिस्तानकी थी और जो परिस्थिति भारतकी थी, यदि इन्दिरामें थोडी भी अक्ल होती तो वह कमसे कम पाकिस्तान अधिकृत कश्मिर तो वह ले ही सकती थी. यदि ऐसा किया होता तो भारतने जो अन्य जीती हुई पाकिस्तानकी भूमि, और पाकिस्तानी युद्धकैदीयोंको परत किया उसको क्षम्य मान सकते थे. पाकिस्तानके उपर पेनल्टी नहीं लगायी, खर्चा वसुल नहीं किया उसको भी लोग भूल जाते.

बंग्लादेशमें ३० लाख हिन्दुओंकी कत्ल किसने छूपाया?

बंग्लादेशके अंदर पाकिस्तानकी सेनाने  ४०लाख लोगोंकी हत्या की थी इनमें ३० लाख हिन्दु थे १० लाख मुस्लिम थे. इन्दिरा गांधी जब भूट्टोके साथ सिमलामें बैठी थी तब क्या उसको इस तथ्य ज्ञात नहीं था? वास्तवमें उसको सबकुछ मालुम था. तो भी उसने न तो बंग्लादेशके साथ कोई भारतके श्रेय में कोई अनुबंध (एग्रीमेन्ट) किया न तो पाकिस्तानके साथ कोई भारतीय हितमें कोई अनुबंध किया. इतना ही नहीं, एक करोड निर्वाश्रित जो भारतमें आ गये थे उनको वापस भेजनेके बारेमें प्रावधानवाला कोई भी अनुबंध किसीके साथ नहीं किया.

उस समय आतंकवाद भारतमें तो नहीं था. भारतके बाहर तो था ही. प्रधानमंत्री होनेके नाते और “भारतीय गुप्तचर सेवा” के आधार पर भारतके बाहर तो अति उग्रतावाली आतंकी गतिविधियां  अस्तित्वमें थीं ही. वे प्रवृत्तियां कहाँ कहाँ अपना विस्तार बढा सकती है वह भी प्रधानमंत्रीको अपने बुद्धिमान परामर्शदाताओंसे (एड्वाईज़रोंसे)   मिलती ही रहेती है. यह तो आम बात है. किन्तु इन्दिराने भारतके हितकी उपेक्षा करके भूट्टो की यह बात मान ली “यदि मैं पाकिस्तान अधिकृत काश्मिरकी समस्या आपके साथ हल कर दूं और तत्‌ पश्चात्‍ मेरी यदि हत्या हो जाय तो उस डील का क्या मतलब.” फिर इन्दिराने “इस मसलेको आपसमें वार्ता द्वारा ही हल करना” ऐसा अनुबंध मान लिया. इसका भी क्या लाभ हुआ. पाकिस्तानने आतंकीओ द्वारा और कई समस्याएं उत्पन्न की. सिमला अनुबंधन तो पप्पु ही मान्य कर सकता है.  

 राजिव गांधी ने पीएम पदका स्विकार करके, श्री लंकाके आंतरिक हस्तक्षेप करके और शाहबानो न्यायिक निर्णयको निरस्त्र किया यह बात ही उसका पप्पुत्त्व सिद्ध किया.

सोनिया, राहुल और प्रियंका का पप्पुत्त्व सिद्ध करनेकी आवश्यकता नहीं.

यह पप्पुत्त्वकी महामारी ममता, मुलायम, लालु, शरद पवार … आदि कोंगीके सहयोगी पक्षोमें ही नहीं लेकिन बीजेपीके सहयोगी शिवसेनामें भी फैली है.

शिवसेनाका पप्पुत्व तो शिवसेना अपने सहयोगी बीजेपी के विरुद्ध निवेदन करके सिद्ध करता ही रहेता है.

उद्धव ठाकरेका क्या योगदान है? भारतके हितमें उसमें क्या किया है? यह उद्धव ठाकरे अपने फरजंद आदित्यको आगे करता है. आदित्यका क्या योगदान है? उसका अनुभव क्या है? क्या किसीने कहा भी है कि वह आदित्य के कारण चूनाव जीता है? शिवसेना स्वयं अपने कुकर्मोंके कारण मरणासन्न है किन्तु वह भी कोंगीकी तरह पगला गया है. चूनावमें शिवसेनाकी सफलता  अधिकतम ४५ प्रतिशत है. जब की बीजेपीकी सफलता ६५ प्रतिशत है.

“५०:५०” का रहस्य क्या है?

५० % मंत्री पद बीजेपीके पास और ५०% मंत्री पद शिवसेनाके पास रहेगा यदि दोनोंको समान बैठक मिली. किन्तु शिवसेनाको तो बीजेपीसे आधी से भी कम बैठकें मिली. और फिर भी उसको चाहिये मुख्य मंत्रीपद. यह तो “कहेता भी दिवाना और सूनता भी दिवाना” जैसी बात हुई. गठ बंधनको जो घाटा हुआ उसमें शिवसेना जीम्मेवार है. उसका हक्क तो १/३ मंत्री पद पर भी नहीं बनता है.

शिवसेना के विरुद्ध क्या क्या मुद्दे जाते है.

शिवसेनाका साफल्य केवल ४० प्रतिशत है. मतलब वह तृतीय कक्षामें पास हुआ है.

बीजेपीका साफल्य ६५% है. मतलब विशिष्ठ योग्यताके समकक्ष है.

बीजेपी उसको ५० प्रतिशत मंत्रीपद देनेको तयार है. लेकिन शिवसेना को तो इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री पद भी चाहिये.

मतलब की तृतीय कक्षामें पास होनेवाला आचार्य बनना चाहता है.

इतना ही नहीं किन्तु शिवसेना अपने पक्षके वंशवादी प्रमुखकी संतान को आचार्य बनाना चाह्ता है.

पप्पुके आगे पप्पु, पप्पुके पीछे पप्पु बोले कितने   पप्पु?

पप्पुको डीरेक्ट हिरो बना दो

क्या किया जाय?

शिवसेना के आदित्य को मुख्य मंत्री के बनानेके लिये = शिवसेना+कोंगी+एनसीपी

शिवसैनी पप्पुको पप्पुकी कोंगीका और शरदकी कोंगीका सहयोग लेके मुख्य मंत्री और सरकार बनाने दो. शिवसैनी पप्पुको भी पता चल जायेगा कितनी बार वीस मिलानेसे एक सौ बनता है (गुजरातीमें मूँहावरा है “केटला वीसे सो थाय” तेनी खबर पडशे.)

शिरीष मोहनलाल दवे

https://www.treenetram.wordpress.com

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नहेरुवीयन कोंग्रेसके शासनकी परिभाषा है आतंकवाद और हत्याओंकी शृंखला

IMPOSITION OF EMERGENCY

साभार आर के लक्ष्मणका कटाक्ष चित्र

जून मास वैसे तो नहेरुवीयनोंकी और उनके पक्षकी निम्नस्तरीय और आततायी मानसिकताको याद करनेका समय है. सन्१९७५में नहेरुवीयन कोंग्रेसकी यह मानसिकता नग्न बनकर प्रत्यक्ष आयी. २५मार्च का दिन भारतके इतिहाससे, नष्ट होनेवाली कालीमाका जन्म दिन है. नहेरुवीयन कोंग्रेसके काले करतूतोंकी  जितनी ही भर्त्सना करो, कम ही है. यह कलंक एक वज्रलेप है.

आपातकाल १९९५ से १९७७.

आप कहोगे कि यह तो भूतकालकी वार्ता है. आज इसका क्या संदर्भ है? आज इसका क्या प्रास्तुत्य है?

इसका उत्तर है

यह नहेरुवीयन कोंग्रेस आज भी जीवित है. वह प्रभावशाली है. उसके पास अकल्पनीय मात्रामें धन है. अधिकतर समाचार माध्यम उसके पक्षमें है. इस पक्षकी और इस पक्षके नेताओंकी मानसिकतामें कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं आया है. याद करो. १९७७में हार कर यही नहेरुवीयन कोंग्रेस सत्ता पर आयी थी.  

कलंकोसे भरपूर नहेरु शासनः

१९६२ के युद्ध में हुई भारतकी घोर पराजयके कारण, नहेरुने मन बना लिया था. स्वयंके सिंहासन रक्षा तो उन्होंने करली. किन्तु वह पर्याप्त नहीं है.

नहेरुने अपने १९४७से १९६२के कार्यकालमें अनेकानेक कलंकात्मक कार्य किये थे. इतिहास उसको क्षमा करनेवाला नहीं था.

कौभाण्डोंकी यदि उपेक्षा करें, तो भी, ऐसी कई घटनाएं भूगर्भमें थी कि जिनसे, नहेरुका नाम निरपेक्षतासे लज्जास्पदोंकी सूचीमें आजाना निश्चित था.

सुभाषविवाद, चीनकी विस्तारवादी नीति, सीमा सुरक्षाकी उपेक्षा, सीमा सुरक्षा सैनिको सुसज्ज करनेके विषयोंकी  अवहेलना, व्यंढ समाजादवाद, दंभी धर्म निरपेक्षता और स्वकेन्द्री नीति के कारण नहेरुको अपयश मिलनेवाला था.

नहेरुने क्या विचारा?

यदि कुछ दशकों पर्यंत उसकी संतान इन्दिरा गांधी प्रधानमंत्री बन जाय, तो नहेरुके काले कारनामों पर पर्दा पड सकता था. इस हेतुसे नहेरुने चीनके आक्रमण के पश्चात अपने पक्षके प्रतिस्पर्धीयोंको सत्तासे विमुख रखनेकी व्यूह रचाना बनायी. कुछजैसे थे वादीयोंका मंडल नहेरुने बनाया. नहेरुने उनको समझाया. नहेरुने अपनी मृत्यु शैयासे इन जैसे थे वादीयोंसे वचन लिया कि वे इन्दिराको ही प्रधान मंत्री बनायेंगे. येजैसे थे वादीयोंकासमूहसीन्डीकेटनामसे ख्यात था.

नहेरुवीयन फरजंद, जो बिना किसी योग्यता, केवल नहेरुकी फरजंद होनेके नाते, “जैसे थे वादीयोंकी कृपासे १९६६में प्रधान मंत्री बन गयी थी. उस समय कई सारे वरिष्ठ और कार्य कुशल नेता थे. वे प्रधान मंत्री पदके लिये योग्य भी थे और उत्सुक भी थे. इनमें गुलजारीलाल नंदा और मोरारजी देसाई मुख्य थे.

समाचार माध्यम को नहेरु पसंद थे. क्यों कि स्वातंत्र्य संग्राममें वे एक प्रमुखवस्त्र परिधान और प्रदर्शन शैलीके  युवामूर्ति” (आईकोन) थे. समृद्ध व्यक्तियोंको आम कोंगी नेताओंकी सादगीवाली मानसिकता स्विकृत नहीं थी. समाचार माध्यमने नहेरुकी सभी क्षतियां गोपित रक्खी थी. समाचार माध्यम, नहेरुके लिये, शाश्वतअहो रुपं अहो ध्वनिकिया करता था, जैसे कि आज सोनिया और राहुलकी प्रशंसा किया करता है.

इन्दिरा गांधी एक सामान्य कक्षाकी औरत थी.

इन्दिरा गांधीको सत्ता मिल गई. उसको सहायकगण भी मिल या. इनमें साम्यवादी और कुछ नीतिभ्रष्ट युवा भी थे. नहेरुवीयनोंका गुरु था रुस. गुरु साम्यवादी था. साम्यवादी नेता कपट नीतिमें निपूण होते है. विरोधीयोंमें भेद कैसे उत्पन्न करना, अफवाह कैसे प्रसारित करना, जनसमुदायको विचारोंसे पथभ्रष्ट कैसे करना, निर्धनोंको निर्धन ही कैसे रखना, गुप्तचरोंसे विरोधीयोंके विषयमें कैसे विवाद उत्पन्न करना इन सर्व परिबलोंका उपयोग कैसे करना इस विषय पर रुस, नहेरुवीयनोंको पर्याप्त सहयोग करता रहा.

किन्तु रुसको भारतकी जन संस्कृतिका परिपूर्ण ज्ञान नहीं हो सकता था. इस लिये १९७३ के पश्चातकालमें इन्दिराको सर्व क्षेत्रीय विफलता मिलने लगी. वह अपने पिताकी तरह आपखुद भी थी. दोनों संसदोंमे निरपेक्ष बहुमत और अधिकतम राज्योंमें अपने खुदने प्रस्थापित मुख्य मंत्री होते हुए भी, इन्दिराको सर्वक्षेत्रीय विफलता मिलीसर्व क्षेत्रीय विफलताके कारण समाचार माध्यम उसके हाथसे जा सकते थे. इसका प्रारंभ हो गया था. जन आंदोलनका भी प्रारंभ हो गया था. नियमका शासन मृतप्राय हो रहा था. यदि इन्दिराके हाथसे सत्ता गई तो नहेरुवीयन कोंग्रेसकी मृत्यु निश्चित थी. तीन कार्य अतिआवश्यक थे. विरोधीयोंकी प्रवृत्तियों पर संपूर्ण प्रतिबंध, समाचार माध्यम पर संपूर्ण नियंत्रण और धनप्राप्ति.

भारतके संविधानमें आपात्कालका प्रावधान कैसे हुआ था?

१८५७के जनविद्रोहको असफल करने के पश्चात अंग्रेज शासनने भारतकी आपराधिक संहितामें संशोधन किया. नागरिक अधिकारोंको स्थगित करना और उस अंतर्गत न्यायिक प्रक्रियाको निलंबित करना. इस प्रकार अंग्रेज शासनने, भारतमें आपातकाल घोषित करनेका प्रावधान रक्खा था.

आपातकालमें ऐसे प्रावधानोंसे क्या क्या हो सकता था?

भारतके मानव अधिकारोंको विलंबित किया जा सकता था.

शासन, किसी भी व्यक्तिको गिरफ्तार कर सकती थी.

गिरफ्तार करनेके समय और बादमें भी, गिरफ्तार करनेका आधार बताना आवश्यक नहीं है.

गिरफ्तार व्यक्तिको सरकार अनियतकाल पर्यंत कारावासमें रख सकती है.

गिरफ्तार की हुई व्यक्तिपर न्यायिक कार्यवाही करना अनिवार्य नहीं है.

व्यक्तियोंके संविधानीय अधिकारोंको विलंबित किया जाता है. तात्पर्य यह है कि कोई समूह बना नहीं सकते, चर्चा नहीं कर सकते. प्रवचन नहीं कर सकते. यदि ऐसा करना है तो शासनसे अनुमति लेनी पडेगी. शासन अपना प्रतिनिधि भेजेगा और उसकी उपस्थितिमें संवाद हो सकेगा.

समाचार माध्यम शासनके विरुद्ध नहीं लिख सकते, यत्किंचित भी करना है उसके लिये शासनकी अनुमति लेना अनिवार्य था.

इन्दिराने गणतंत्रकी हत्या क्यों कि?

१२ जुन १९७५ को नहेरुवीयन कोंग्रेसकी लज्जास्पद पराजय हुई. यह वही नहेरुवीयन कोंग्रेसथी जिसके पास ३ साल पहेले किये गये चूनावमें १८३ मेंसे १४० बैठकें जित गयी थीं.

१३ जुनको ईलाहाबाद उच्च न्यायालयने ईन्दिरा गांधीका चूनाव रद किया. इतना ही नहीं उसको संसद सदस्यके पदके लिये सालके लिये अयोग्य घोषित किया. यदि वह संसद सदस्यता के लिये भी योग्य नहीं रही, तो प्रधान मंत्री पदके लिये भी अयोग्य बन जाती है.

१८ जुनको गुजरातमें जनता मोरचा की सरकार बनी.

बिहारने नारा दिया “गुजरातकी जित हमारी है अब बिहारकी बारी है.

देशव्यापी आंदोलन होने वाला था.

इन्दिरा गांधीने आंतरिक आपातकाल घोषित किया.

नहेरु भी ऐसी परिस्थितिमें ऐसा ही करते. किन्तु वह स्थिति आनेसे पहेले वे चल बसे.

किन्तु आपातकाल की वार्ता करनेसे पहेले हम इस कथांशको अधिगत कर कि, नहेरु इस प्रकार प्रधान मंत्री बने थे?

जब भारतका स्वातंत्र्य निश्चित हुआ तो प्रधान मंत्री किसको बनाना वह प्रश्न सामने आया.

नहेरु बडे नेता अवश्य थे किन्तु सबसे बडे नेता नहीं थे.

उस समय भारतमें कोंग्रेस पक्षका संगठन व्यापक था. कन्याकुमारीसे लदाख और बलुचिस्तानसे अरुणाचल तक कोंग्रेस पक्ष फैला हुआ था. प्रत्येक ग्राम, नगर, तहेसील, जिला और प्रांतमें कोंग्रेसकी समितियां थी. हरेक प्रांतका संचालन प्रांतीय समिति करती थी. प्रधान मंत्रीके पदके लिये प्रधान मंत्री पदके लिये सुझाव मंगवाये गये थे. एक भी समितिने जवाहरलाल नहेरुका सुझाव नहीं दिया.

नहेरुने अपना आवेदन पत्र दिया था. महात्मा गांधीने नहेरुको बुलया. उनको कहा कि आपका नामका सुझाव एक भी प्रांतीय समितिने नहीं भेजा है. इससे यह निष्पन्न होता था कि, नहेरु नंबर वन से अतिदूर थे. नहेरु यदि लोकतंत्रमें श्रद्धा रखते होते तो उनको अपना आवेदन पत्र वापस लेना अनिवार्य था. किन्तु नहेरु लोक तंत्र में मानते ही नहीं थे. लोकतंत्रकी गाथा करना, केवल उनकी व्यूह रचना का भाग था.

नहेरुको प्रारंभसे ही अवगत था कि, जनतामें वे सर्व स्विकार्य नहीं थे. युवावर्गमें भी उनका क्रम सुभाषसे पीछे था. इस लिये वे १९३९के कोंग्रेसके प्रमुख पदके चूनावमें सुभाषके सामने पदके लिये आवेदनपत्र नहीं भरा. सुभाष के कोंग्रेसके छोडनेके बाद भी लोकप्रियतामें कई नेता नहेरुसे आगे थे. इस कारणसे नहेरुने एक समाजवादी गुट कंग्रेसमें ही बना दिया था. लेकिन सामान्य कोंग्रेसीको तथा अन्य वरिष्ठ नेताओंको तथा कथित समाजवादमें रुचि नहीं थी. इस लिये कंग्रेसके संगठन पर नहेरुका इतना प्रभाव नहीं था कि वे प्रधानमंत्री बन सके.

नहेरुने अपनी व्यूह रचना मनमें रक्खी थी. उन्होंने अपना उत्पात मूल्यको (न्युसन्स वेल्युको) कार्यरत करने का निश्चय किया. नहेरुने कंग्रेसका विभाजन करने का विचार किया. कंग्रेसके अंदर उनका समाजवादी गुट तो था ही. उतना ही नहीं कोंग्रेसके बाहर भी एक समाजवादी पक्ष था. यदि आवश्यकता पडे तो साम्यवादी पक्ष कि सहायता ली जा सकती थी. इन सबको मिलाके एक प्रभावशाली पक्ष बन सकता था.

महात्मा गांधीने नहेरुको प्रज्ञापित किया. प्रधान मंत्रीके पदके लिये एक भी प्रांतीय समितिने आपके (नहेरुके) नामका सुझाव नहीं दिया है. इस पर नहेरुकी क्या प्रतिक्रिया थी? नहेरुको क्या करना योग्य था? तब नहेरुको अपना आवेदन पत्र वापस ले लेना चाहिये था. किन्तु अपना आवेदन पत्र वापस लेनेके स्थान पर, नहेरु खिन्नतायुक्त अन्यमनस्क मूंह बनाके चल दिये.

गांधीजीको विश्वास हो गया कि नहेरु कोई पराक्रम करनेवाले है. यह पराक्रम था कोंग्रेसका विभाजन करनेका. उस समय भारतके सामने अन्य कई समस्याएं थीं, जिनमें भारतको अविभाजित रखना मुख्य था. कई राजा स्वतंत्र रुपमें रहेना चाहते थे. द्रविडीस्तान, दलितीस्तान, सिखीस्तान की मांगे भी हो रही थी. यदि उसी समय कोंग्रेसका विभाजन हो जाय तो कोंग्रेस निर्बल हो जाय और देशकी एकता के लिये एक बडा संकट पैदा हो जाय. गांधीजीको अवगत था कि, यदि पाकिस्तान भारतसे भीन्न बनने के अतिरिक्त,  भारत ज्यादा विभाजित होनेसे बचाना ही प्राथमिकता होनी आवश्यक है. संविधान आनेके बाद, चूनावमें तो नहेरुको सरलतासे प्रभावहीन किया जा सकता है. महात्मा गांधीने सरदार पटेलको मना लिया और वचन ले लिया कि वे देशके हितमें सहायता करेंगे और कोंग्रेसको विभाजित नहीं होने देंगे. सरदार पटेल ने वचन दिया.

इस पार्श्व भूमिकामें नहेरु प्रधान मंत्री बने.

नहेरु प्रधान मंत्री बन गये तो, तत्पश्चात उन्होंने अपने एक एक करके सभीको विरोधीयोंको कोंग्रेस छोडने पर निरुपाय किया. जब तक यह लोकतंत्र, स्वयंके लिये वास्तविक रुपमें आपत्तिजनक नहीं बना तत्पर्यंत नहेरुने  लोकतंत्रको आनंदप्रमोदके स्वरुपमें चालु रक्खा,. जब भी लोकतंत्र आपत्तिजनक बना तब उन्होने ऐसी व्युहरचनाएं बनाई जो लोकतंत्रके सिद्धांतोंसे विरुद्ध थी और अशुद्ध भी थी.

इन्दिरा गांधी, नहेरुकी तरह व्युह रचनामें और मानवव्यवहारमें निपूण नहीं थी. इन्दिराको अपने पद पर लगे रहेने के लिये कंग्रेसको तोडना पडा. और १९७५में अपने पद पर लगे रहेने के लिये मानव अधिकारों पर और संविधानीय अधिकारों पर प्रहार करना पडा.

आपतकाल घोषित करनेसे क्या हुआ?

हजारों लोग कारावासमें बंद हुए. उनके कुटूंबीजनोंको या तो उनके मित्रोंने संम्हाला यातो उनको अति कठिन परिस्थितियोंसे पसार होना पडा. अनेक लोग रोगग्रस्त भी हुए.

नागरिक अधिकारोंकी सुरक्षाके लिये न्यायालय अर्थ हीन बना.

सरकारी गुप्तचर संस्थासे लोग भयग्रस्त हुए.

इतना ही नहीं सुरक्षा कर्मचारी किसी भी व्यवसाय करने वालेको भय दिखाने लगा कि तुम यद्वा तद्वा असामाजिक कार्य कर रहे हो सा मैं शासनमें सूचन कर दुंगा. ऐसा मैं करुं, इस लिये तुम मुझे इतनी रिश्वत दे दो.

सभा प्रदर्शन पर निषेध था. शासनके विषय पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रुपसे भी कुछ नहीं लिख सकते. क्यों कि आपने जो लिखा उसका मनस्वी अर्थघटन शासनका नियंत्रक अधिकारी करेगा.

आपतकालमें अनधिकृत धन राशी का कितना स्थानांतर और हस्तांतरण हुआ इसके लिये एक महाभारत से भी बडा ग्रंथ लिखा जा सकता है. आपातकालके अत्याचार, शासकीय अतिरेक, मानव अधिकारका हनन इन सबके अन्वेषण शाह आयोग द्वारा किया गया. शाह आयोगने, एक मालवाहक भर जाय इतना बडा विवरण दिया है.

इन्दिरा गांधीने यह क्यूं नहीं सोचा कि इससे भारतकी गरिमाको हानि पहूंचेगी?

भारत एक महान देश क्यूं माना जाता है?

क्यों कि उसकी संस्कृति सिर्फ पूरानी ही नहीं किन्तु सुग्रथित, वैभवशाली, वैज्ञानिक विचार धारासे प्लावित, पारदर्शी और लयबद्ध है. भारतमें धर्मका प्रणालिगत अर्थघटन नहीं है. भारतमें विरोधी विचार आवकार्य है. चार्वाक भी है और मधुस्छंदा भी है. ६००० सालसे अधिक प्राचीन वेद आज भी उतने ही मान्य और आदरीणीय है, जितना वे पहेले थे. तत्वज्ञान जो है वह शाश्वत है. और जिवनके सभी घटक प्रणालीयोंमे एक सूत्रित है. यतः भारत विश्वका एक मात्र ऐसा देश है जो अतिप्राचीन समयसे विभीन्नविघटित, प्रकिर्ण, भौगोलिकतामें अति विस्तीर्ण होने पर भी एक देशके नामसे प्रख्यात है. इसका उल्लेख वेद पुराणोंमें भी विस्तारसे है. उसने अपनी संस्कृतिको जीवित रक्खा.

ऐसे भारतने १५० सालसे चलनेवाले एक सुसज्ज, सुग्रथित और नियमसे चलनेवाले विदेशी शासनका, अहिंसाके शस्त्रसे अंत किया. प्राचीन कालसे अर्वाचीन काल तक विश्वमें कहीं भी ऐसा मुक्तिसंग्राम नहीं हुआ. अहिसा आधारित संग्राम बलिदान देनेमें पीछे नहीं है. अहिंसा में भीरुता नहीं किन्तु शाश्वत निडरता रहती है. यह बात भारतने ही सिद्ध की. इस भारतके अहिंसक स्वातंत्र्य संग्रामसे अन्य कई देशोंने बोध लिया.

ऐसे देशकी प्रतिष्ठाको इन्दिरा गांधीने सिर्फ अपने स्वार्थ के लिये धूलमें मिला दीया.

जो जगजिवनराम अंग्रेजोंकी गोलीसे नहीं डरते थे वे कारावास और अपमृत्युसे डरने लगे. जो यशवंतराव चवाण स्वयंको शिवाजी, प्रदर्शित करते थे वे भी कारावाससे डरने लगे.

गुरुता लघुता पुरुषकी आश्रयवस ते होय, वृन्दमें करि विंध्य सो, दर्पनमें लघु होय.

इसका अर्थ है, व्यक्तिकी उच्चता व्यक्ति जिसके साथ है उसके पर अवलंबित है. यदि व्यक्ति निम्न कोटीके साथ है तो आप भी निम्न कोटीके बन जाता है.

अहो सज्ज संसर्ग कस्योन्नति कारक, पुष्पमालाप्रसंगेन सुत्रं शिरसि धार्यते.

यदि व्यक्ति उच्च कोटीके संसर्गमें रहेता है तो उसकी कोटी भी उन्नत बन जाती है. जैसे पुष्पमाला मस्तिष्क  पर चढती है तो साथमें सुत्र (धागा) भी मस्तिष्क पर चढ जाता है.

इन्दिरा गांधीने पातकालके विषय पर अपने पक्षमें यह कहा कि, वह आवश्यक था. उसने कई कारण भी दिये. हम उसकी चर्चा नहीं करेंगे.

किन्तु जब स्वयं इन्दिरा चूनावमें ५५००० मतोंसे हार गयी तो उसने पातकालका अंत घोषित कर दिया. उसने आपातकालके अंतर्गत ही चूनाव करवाया ताकि जनतामें भय कायम रहे.

इसका अर्थ तो यही हुआ कि आपातकालका कारण वह स्वयं थी. यदि शासकीय व्यवस्था अस्तव्यस्त थी तो उसकी स्वयंकी पराजयकी दुसरी क्षणसे वह व्यवस्था स्वस्थ तो नहीं हो जा सकती?

यदि इन्दिराकी दृष्टिमें और नीतिमें आपातकाल आवश्यक था और यदि वह स्वयंसे प्रस्थापित सिद्धांतोमें सत्यकी अनुभूति करती थी, स्वयंके निर्णयोंमें दृढताकी आग्रही थी, तो उसको स्वयंकी पराजय के पश्चात भी आपातकाल को चालु ही रखना चाहिये था. आपातकाल चालु रखना या उसका अंत करना, अनुगामी शासक पर छोड देना चाहिये था. किन्तु उसने ऐसा नहीं किया क्यों कि वह भीरु थी और अनुगामी सरकारसे भयभीत थी. वह भीरु थी उसका दुसरा उदाहरण यह था कि उसको शाह आयोग के प्रत्यक्ष स्वयं को प्रस्तूत करने कि निर्भयता नहीं दिखायी. यदि इन्दिरा स्वयंको प्रस्तूत करती तो …?

नहेरु और इन्दिरामें कोई वास्तविक भीन्नता नहीं थी.

दोनों नीतिहीन थे. नहेरु अपनी व्यूहरचनासे और उत्पात मूल्यसे प्रधान मंत्री बने और छल कपटवाली कूटनीतिसे प्रधान मंत्री बने रहे. इन्दिरा गांधी, अपने पिताके कारण प्रधानमंत्री बनी. फिर नीति हीनतासे और जनतंत्र को अस्तव्यस्त करके वह प्रधान मंत्रीके पद पर चालु रही.

इन्दिरा गांधी, जो स्वयं, इतिहासके दस्तावेजों पर सत्तालोलुपथी, और अपनी सत्ताकी रक्षाके लिये सारे देशको कारावास ग्रस्त करती थी, वह विपक्षके नेताओंको जो कारावासमें बंद थे उनको सत्ता लालची कहा करती थी. वह खुद, विपक्षके नेतांओंके प्रदर्शनको, शासनमें विघ्नकारी घोषित कहा करती थी, उसके स्वयं के नेतागण, चूं कि नहेरुवीयन कोंग्रेस गुजरातमें विपक्षमें था, सातत्यतासे बाबुभाई जशभाई पटेल की जनता पार्टीके शासनकी विरुद्ध प्रदर्शन, धरणा, व्याख्यान, निवेदन, आवेदन और गालीप्रदान किया करते थे. और जनता पार्टी के विरुद्ध बोलनेमें कोई निषेध नहीं था. आपातकालमें निषेध था तो वह नहेरुवीयन कोंग्रेसके विरुद्धमें नहीं बोलनेका.

INDIRA WAS A FRAUD

सौजन्य आरके लक्ष्मण का कटाक्ष चित्र

आतंकवाद और कपटपूर्ण हत्याः

यदि कोई कहे कि नहेरु और इन्दिरा आतंक वादी थे और कपटयुक्त हत्या (फेक एन्काउन्टर) करनेवाले थे तो?

खुदको क्षति करके अन्यका भला करो यह सज्जनका लक्षण है.

अपने विरोधीको नष्ट करके स्वयं को और अपने मित्रको लाभ करो उसको आप क्या कहोगे?

श्यामप्रसाद मुखर्जीका कश्मिरमें क्या हुआ? शेख अब्दुल्ला किसका मित्र था? शेख अब्दुल्लाके लिये नहेरुने क्या क्या नहीं किया?

समाजवादके नाम पर नहेरुने चीन से स्नेह किया. सीमा पर सैन्य सुसज्ज नहीं रखा. जब चीनने खुल्ला क्रमण किया तो सैन्यके पास कपडे नहीं थे, जूते नहीं थे, शस्त्र नहीं थे…. और ऐसे जवानोंको कहा कि जाओ युद्ध करो. इसको आप क्या कहोगे? आतंक कहोगे या फेक एनकाउन्टर?

१९७१में भारतीय सैन्य वीरतासे लडा. कश्मिरका जो भूभाग पाकिस्तानके पास था उसमेंसे भी, कुछ भाग हमारे सैन्यने ले लिया. हमारे सैन्यने ९२००० दुश्मनके सैनिकोंको गिरफ्तार भी किया. पूर्वपाकिस्तानको स्वतंत्र करवाया. हमारे कई सैनिकोंने बलिदान भी दिया. और भारतकी इस विजयका पूरा श्रेय इन्दिराने लिया.

इस युद्धके पूर्व इन्दिराने घोषणा की थी इस समय हम जिता हुआ भू भाग वापस नहीं देंगे, दुश्मनसे हानि वसुलीका दंड करेंगे. ९२००० पाक सैनिकोकों एक वर्ष तक खिलाया पिलाया उसका मूल्य वसुल करेंगे, एक कोटीसे ज्यादा बांग्लादेशी घुसपैठोंको वापस भेजेंगे, इनका भी हानिवसुलीका दंड देंगे. एक परिपूर्ण ऐसी संधि करेंगे कि पाकिस्तान कभी हमसे आंख उंची करके देख सके.

किन्तु इन्दिराने, सिमला संधिके अंतर्गत परिपूर्ण विजयको घोर पराजय में परिवर्तित कर दिया. भारतकोविशाल शून्य” प्राप्त हुआ. पाकिस्तानका जो भी भूभाग पराभूत हुआ था वह सब उसको मिल गया. कश्मिरका जो भूभाग पाकिस्तानके पास था उसमेंसे भी कुछ भाग हमारे सैन्यने ले लिया वह भी इन्दिराने पाकिस्तानको दे दिया. इन्दिराने ९२००० पाकिस्तानी सैनिकोंको मुक्त कर दिया. पाकिस्तान ने हमारे ४०० सैनिकोंको मुक्त नहीं किया. कोई बांग्लादेशी वापस नहीं भेजा. और अधिक बांग्लादेशी घुसखोर आये. इतना ही नहीं बांग्लादेशने हिन्दुओंको भयभित करके बांग्लादेश त्यागने पर विवश किया.

आप भारतीय सैनिकोंके बलिदानको क्या कहोगे? क्या उनके बलिदान का ध्येय यह था कि अपना देश पराजित देशके सामने नतमस्तक हो जाय? यदि उनका ध्येय यह नहीं था तो इन भारतीय सैनिकोंकी मृत्युको आप फेक एनकाउन्टर नहीं कहोगे क्या कहोगे?

जय प्रकाश नारायण की हत्या

इन्दिरा गांधीने आपतकाल अंतर्गत महात्मा गांधीके अंतेवासी जयप्रकाश नारायणको कारावासमें, चिक्तित्सा की और उनको मरणासन्न कर दिया. यह एक हत्या ही थी.

इन्दिरा गांधीने युनीयन कार्बाईडका संविद अनुबंध (कोन्ट्राक्ट डील) किया, किन्तु वह क्षतिपूर्ण था. आकस्मिक विपत्ति का प्रावधान इतना क्षतिपूर्ण था कि भोपालके गेस पीडितोंका जीवन अस्तव्यस्त हो गया. इतना ही नहीं, जो युनीयन कार्बाईडका प्रमुख एन्डरसन था, उनको भाग जानेमें मुख्य मंत्री और कोंगी फरजंद राजीव गांधीने मदद की.

इन निर्दोंषोंकी पायमाली को आप क्या कहोगे? यह आतंक नहीं है तो और क्या है?

लिखित और अलिखित, घोषित और अघोषित आपतकाल केवल और केवल नहेरुवीयनोंने ही लगाया था और लगाते रहे है. रामलीला मैदान मे रावण लीला जैसे अनेका अनेक उदाहरण आपको मिल सकते है.

क्या आपातकालके समय अडवाणी शिशु थे?

नहेरुवीयन शासनके समय अडवाणी पेराम्बुलेटर (बालगाडी) ले के नहीं चलते थे. उस समय अडवाणी ५०+ के वयस्क थे. १९७७१९७९ के अंतर्गत अडवाणी उच्च कक्षाके मंत्री भी थे. उस समय भविष्यमें कोई सत्तालोलुप प्रधान मंत्री आपातकाल घिषित करके मानव अधिकारोंको निर्मूलन कर सके, इस विषय पर पर्याप्त चर्चा विचारणाके बाद एक विधेयक बनाया था और उसको संसदसे अनुमोदित करवाया था. उस समय तो अडवाणी ने स्वयंकी तरफसे प्रस्तूत विधेयके प्रारुप लेखमें रुप परिवर्तनके लिये कोई संशोधन प्रस्तूत नहीं किया था. क्या वे कोई शुभ समय की प्रतिक्षामें थे?

प्रतिक्षा करो … चौधरी चरण सिंघका आत्मा .

क्रमशः

शिरीष मोहनलाल दवे.

 टेग्झः

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नरेन्द्र मोदीको क्या बनना चाहिये? कौटिल्य अथवा पृथ्वीराज चौहाण?

कौटिल्यकी विशेषता क्या थी और पृथ्वीराज की विशेषता क्या थी?

Narendra Modi has to decide
कौटिल्यः
कौटिल्यमें दुश्मनको पहेचानने की प्रज्ञा थी.
कौटिल्य दुश्मनको कभी छोटा मानता नहीं था,
पडौसी देश दुश्मन बने ऐसी शक्यता अधिक होती है इस लिये उसकी गतिविधियों दृष्टि रखनी चाहिये क्योंकि वह प्रथम कक्षाका दुश्मन बननेके काबिल होता है.
दुश्मनको कभी माफ करना नहीं चाहिये,
ऐसा क्यों?
क्योंकि राष्ट्रहित सर्वोपरी है.

पृथ्वीराज चौहाण
पृथ्वीराज चौहाण भी एक देशप्रेमी राजा था. लेकिन वह दुश्मनके चरित्रको समझ नहीं पाया. उसने मुहम्मद घोरीको फेली बार तो हरा दिया, किन्तु बिना ही उसके चरित्रकी जांच किये भारतीय प्रणालीको अनुसरा और उसको क्षमा प्रदान की. वही मुहम्मद घोरीने फिरसे आक्रमण किया और पृथ्वीराज चौहानको हराया और उसका कत्ल किया. अगर पृथ्वीराज चौहाणने मुहम्मद घोरीको माफ किया न होता तो भारतका इतिहास अलग होता.
कौटिल्यने क्या किया था.
पोरस राजा देश प्रेमी था. उसने सिकंदरसे युद्ध किया. कुछ लोग ऐसा बताते है कि सिकंदरने पोरस को पराजित किया था. और सिकंदरने पोरसकी वीरताको देखके उसए संधि की थी. लेकिन यह बात तथ्यहीन है. वीरताकोई भारतका एकआधिर नही था. वीर योद्धा हरेक देशमें होते है. सिकंदर अनेकोंको जितता आया था लेकिन जो राजा हारे थे उनके साथ और उनकी जनताके साथ, उसका हमेशा आतंकित व्यवहार रहा था. पोरसने सिकंदरको संधिके लिये विवश किया था.और सिकंदरको हतप्रभः किया था.
सिकंदरके बाद सेल्युकस निकेतर सिकंदरकी तरह ही विश्वविजय करनेको निकला था. उस समय पोरसके बदले उसका भतिजा गद्दी पर था. उसने बीना युद्ध किये सेल्युकसको भारतमें घुसनेका रास्ता दे दिया. सिकंदर तो धननंदकी विशाल सेनासे ही भयभित हो गया था. लेकिन सेल्युकसने मगध पर आक्रमण कर दिया. जो सम्राट विश्वविजयी बनके आया था वह मगधके चन्दगुप्त मौर्यके सामने बुरी तरह पराजित हो गया. किन्तु ये सब बातें छोड देतें है.
कौटिल्यने क्या किया. पोरसके भतीजेको हराया. उसने लाख क्षमाएं मांगी लेकिन कौटिल्यने उसको क्षमा नहीं किया और उसको हाथीके पैरके नीचे कुचलवा दिया. पोरसका भतिजा तो जवान था, वीर था, उसके सामने पूरी जिंदगी पडी थी. वह देशप्रेमी पोरस राजाकी संतानके बराबर था, अगर कौटिल्य चाहता तो उसको क्षमा कर सकता था किन्तु कौटिल्यने उसको क्षमा नहीं किया. क्यो कि जो देशके साथ गद्दारी करता है उसको कभी माफ किया नही जा सकता.

यदि आप इतिहासको भूल जाते है तो उसका पुनरावर्तन होता है.
साम्राट अकबरको आते आते तो भारतके मुस्लिम हिन्दुओंसे हिलमिल गये थे. जैसे हुण, शक, पहलव, गुज्जर हिन्दुओंसे मील गये थे. भारतके मुस्लिम भी उसी स्थितिमें आ गये थे. कोई लाख नकारे तो भी यह एक सत्य है कि मुघलयुग भारतका एक स्वर्णयुग था. इसमें औरंगझेब जैसा कट्टर मुस्लिम भी लंबे समय तक अपनी कट्टरताका असर रख पाया नहीं था.
मुघल बहादुरशाह जफर जिसके राज्यकी सीमा सिर्फ लालकिलेकी दिवारें थी उसके नेतृत्वमें हिन्दुओंने और मुस्लिमोंने १८५७का विप्लव किया. पूरे भारतके हिन्दु और मुस्लिम राजाएं उसका सार्वभौमत्व स्विकारने के लिये कृतनिश्चयी थे.
ऐसा क्यों था?
क्यों कि हिन्दुओंके लिये धर्म तो एक ही था जो मानव धर्म था. आप ईश्वरकी मन चाहे तरिकोंसे उपासना करें या न भी करें तो भी हिन्दुओंको कोई फर्क पडता नहीं था. (हिन्दु यह भी समझते हैं कि ईश्वरको भी कोई फर्क पडता नहीं है).
मुस्लिम लोग भी परधर्म समभाव ऐसा ही समझ रहे थे. आज भी देखो, ओमानका सुल्तान काबुस सच्चे अर्थमें हिन्दुओं जैसा ही धर्म निरपेक्ष है. हां एक बात जरुर है कि वह विदेशीयोंको अपने देशकी नागरिकता नहीं देता है. चाहे वह हिन्दु हो या मुस्लिम. क्यों कि देशका हित तो सर्वोपरी होना ही चाहिये. जो लोग ओमानमें पहेलेसे ही बसे हुए हैं वहांके नागरिक है उसमें हिन्दु भी है और मुस्लिम भी है. इस लिये ऐसा मानना आवश्यक नहीं कि, सारे विश्वकी मुस्लिम जमात अक्षम्य है.

लेकिन भारतमें क्या हुआ?

अंग्रेजोंने खुदके देशके हितके लिये हिन्दु मुस्लिमोंमें भेद किये. सियासती तौर पर जीन्नाको उकसाया. नहेरुका भी कसुर था. नहेरु सियासती चालबाजीमें कुछ अधिक ही माहिर थे.
महात्मा गांधी के पास सबसे ज्यादा जनाधार था.

महात्मा गांधी के पास निम्न लिखित विकल्प थे
(१) अभी स्वतंत्रताको विलंबित करो, पहेले देशको और नेताओंको व्यवस्थित करो.
किन्तु यह किसीको भी स्विकार्य नहीं था. क्यो कि कोमी हिंसा ऐसी भडक उठी थी कि
नजदिकके भविष्यमें वह बीना विभाज किये शक्य ही नहीं थी.
(२) देशको फेडरल युनीयनमें विभाजीत करो जिसमें होगा पाकिस्तान, हिन्दुस्तान. ये दो देश संरक्षण और विदेशी मामलेके सिवा हर क्षेत्रमें स्वतंत्र होंगे. फेडरल युनीयन का हेड कोई भी हो.
नहेरुको यह स्विकार्य नहीं था क्यों कि उनको जीन्नाको चपरासी के स्थान पर रखना भी स्विकार्य नहीं था.
सरदार पटेलको और महात्मा गांधी इसके पक्षमें नहीं थे क्यों कि यह बडा पेचिदा मामला था. बहुत सारे स्थानिक राजाएं अपनी स्वायत्तता एक अलग देश की तरह ही रखना चाहते थे. ऐसी परिस्थितिमें देशमें अनेक जटिल समस्याएं उत्पन्न हो सकती है जो सदीयों तक उलझ नहीं सकती थी.
(३) फेडरल युनीयन हो लेकिन उसका नंबर वन पोस्ट पर जीन्ना हो.
नहेरुको यह स्विकार्य नहीं था. वे इस हालतमें देशके टुकडे टुकडे करने को भी तैयार थे.
(४) एक दुसरेसे बिलकुल स्वतंत्र हो वैसे देशके दो टुकडे स्वतंत्र हो. हिन्दुस्तान और पाकिस्तान. जनता अपनी ईच्छाद्वारा पसंद करें कि अपने प्रदेशको कहां रखना है ! हिन्दुस्तानमें या पाकिस्तान में?

नहेरुको यह चौथा विकल्प पसंद था. नहेरुने अपनी व्युह रचना तैयार रक्खी थी.

चौथे विकल्पको स्विकारनेमें नहेरुको कोई आपत्ति नहीं थी. हिन्दुस्तानमें नंम्बर वन बनना नहेरुके लिये बायें हाथका खेल तो नहीं था लेकिन अशक्य भी नहीं था. उन्होंने कोंग्रेसमें अपना सोसीयालिस्टीक ग्रुप बना ही लिया था.

नहेरुने गांधी और सरदारको प्रच्छन्न रुपसे दो विकल्प दिया.

या तो मुझे नंबर वन पोस्ट दो. नहीं तो मैं कोंग्रेसको विभाजित करके बचे हुए देशमेंसे अपना हिस्सा ले लुंगा और उसके बाद बचे हुए हिस्सेमें भी आग लगाके जाउंगा कि दुसरे नेता जाति आदि लोग अपना हिस्सा भी मांगे.

पक्षके नेताके रुपमें नहेरुका समर्थन किसी भी प्रांतीय समितिने किया नहीं था तो भी नहेरु अपने आवेदन पर अडग रहे.

महात्मा गांधीको नहेरुकी व्युह रचना समझमें आगयी थी.
महात्मा गांधीने कोंग्रेसको विलय करके उसको लोकसेवा संघमें परिवर्तन करने का निश्चय कर लिया. उन्होने सरदार पटेलको विश्वासमें ले लिया कि वे जब तक स्थानिक समस्याएं हल न हो जाय तब तक वे कोंग्रेसको विभाजित होने नहीं देंगे.
गांधीजीको मालुम हो गया था कि खुदकी जान कभी भी जा सकती है.

इसलिये महात्मा गांधीने २७वीं जनवरी १९४८में ही आदेश दे दिया की कोंग्रेसको एक राजकीय पक्षके स्थान पर अपना अस्तित्व समाप्त करना है. उन्होने इस दरम्यान लोकसेवा संघका संविधान भी बना दिय था.

नरेन्द्र मोदीको चाणक्य बनना है या पृथ्वीराज

अगर नरेन्द्र मोदीको चाणक्य बनना है या पृथ्वीराज चौहाण, इस बातकी चर्चा करते समय हमें कोंग्रेस और नहेरु की बातें क्यों करें?
भारतमे हमने और हमारे नेताओंने अंतिम सौ सालमें जो क्षतिपूर्ण व्यवहार किया, या जो क्षतिपूर्ण व्यावहार हो गया या करवाया गया उनको हमें याद रखके आगे बढना है.

यदि हम याद नहीं रक्खेंगे तो वैसी या उससे भी अधिक गंभीर क्षतियोंका पुनरावर्तन होगा, और भावी जनता हमे क्षमा नहीं करेंगी.

अंग्रेजोंकी नीतियां और उनका पढाया हुआ क्षतियुक्त इतिहासः
अंग्रेज तो चले गये, किन्तु उनकी विचारधारा के आधारपर उन्होने जो तीकडं बाजी चलायी और हमारे बुद्धिजिवीयोंने जो स्विकार कर लिया, ऐसे तथ्योंको हमे उजागर करना पडेगा. इतिहासके पन्नोंसे उनको निकालना नही है लेकिन उसको एक मान्यताके आधार पर उसके कदके अनुसार काट देना है. हमारे भारतीय शास्त्रोंके आधार पर तर्कपूर्ण रीतिसे इतिहास पढाना है.
इसका एक मानसशास्त्रीय असर यह भी होगा कि भारतमें जो विभाजनवादी तत्व है वे विरोध करने के लिये गालीप्रदानके साथ आगे आजायेंगे. उनको पहेचानना है और उनको सियासती क्षेत्रसे निकालना है. वे तर्क हीन होनेके कारण ध्वस्त ही हो जायेंगें. भारतमें एक हकारात्मक युग का प्रारंभ होगा.
https://www.youtube.com/watch?v=x4Vh0cBVPdU ancient scientific knowledge of India: A lecture delivered by CSIR scientist in IIT Chennai
https://www.youtube.com/watch?v=6YG6pXE8aDs Ancient Indian Scientists were all Rishis with High Spiritual Powers (Technology of Spirituality)
मुहम्मद घोरी क्षमाके पात्र नहीं है, किन्तु मुहम्मद घोरी कौन कौन है? और जयचंद कौन है.
मुहम्मद घोरी है; नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण, उनके साथीगण, कश्मिरके नेतागण और दंभी सेक्युलर समाचार माध्यम के पंडितगण.

यह है कभी न माफ करनेवाली सांस्कृतिक गेंग
इनलोगोमें सामान्य बात यह है कि वे बीजेपीकी एक भी क्षति कभी माफ नहीं करेंगे. उसके उपरांत ये लोग विवादास्पद तथ्यों पर और घटनाओं पर पूर्वग्रह रखकर उनको बीजेपीके और नरेन्द्र मोदीके विरुद्ध उजागर करेगे. इनके लिये समय कि कोई सीमा नहीम है.
(१) १९४२में कोई अन्य बाजपाई नामक व्यक्तिने क्षमा-पत्र देकर पेरोल पर उतर गया था तो इन नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंने २००३-४ के चूनाव अंतर्गत भी इस बातको अटल बिहारी बाजपाई के विरुद्ध उछाला था.
(२) कोई दो पुलीस अफसरोंके बीच, कोई पिताकी प्रार्थना पर उसकी पुत्रीके साथ कोई अनहोनी न हो जाय इसके लिये निगरानी रखनेकी बात हो रही थी और उसमें सफेद दाढीवाले और काली दाढीवाले नेताका संदर्भ बोला गया था तो नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेता मनमोहन और उसके मंत्रीमंडलने स्पेसीयल बैठक बुलाके एक जांच कमिटी बैठा दी थी.
(३) एक लडकी कोई आतंकी संगठन के युवकोंके साथ मिलकर अपने मातापिताको बीना बतायें गुजरातकी और निकल गयी थी और तत्कालिन केन्द्रीय खुफियातंत्रने ही माहिति दी थी कि वे नरेन्द्र मोदीको मारने के अनुसंधानमें आ रहे है तो गुजरातकी पुलीसने उनको सशस्त्र होनेके कारण खतम कर दिया तो इन्ही नहेरुवीयन कोंगी नेतागण और उनके साथीयोंने शोर मचा दिया था.
(४) ऐसे कई पुलिस अफसरोंके खिलाफ ही नहीं किन्तु गुजरातके गृहमंत्री तकको लपेटमें ले के उनको कारवासमें भेज दिया था. मतलब कि, फर्जी केस बनाकर भी इन लोगोंको बीजेपीको लपेटमें लेके अपना उल्लु सीधा करनेमें जरा भी शर्म नहीं आती है. ये लोग तो मुहम्मद घोरीसे भी कमीने है.
(५) नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंके इससे भी बढकर काले करतुतोंसे इतिहास भरा पडा है. इन्दिरा घांडीसे लेकर मनमोहन सोनीया तक. इसमें कोई कमी नहीं.
इन गद्दारोंको कैसे पीटा जाय?
(क्रमशः)
शिरीष मोहनलाल दवे
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क्या आप भारतके होतैषी है? और फिर भी क्या आप इनमेंसे कोई एक  वर्गमें भी आते हैं?

अगर हां, तो सावधान !

हम वार्ता करेंगे इन वर्गोंकी जो भारतकी संस्कृति और भारतका भविष्य उज्वल बनाने के लिये भयावह है, विघ्नरुप है और बाधक भी है.

ये लोग कौन कौन है?

(१) ये लोग, अपनेको स्वयं प्रमाणित मूर्धन्य मानते है और अति-वाचाल है,

(२) ये लोग भारतके इतिहाससे या तो अर्धदग्ध है, या तो इन लोगोंने क्षतियुक्त इतिहास, ज्यों का त्यों पढ लिया है, और उसका स्विकार करके अपनी मान्यता बना ली है. वे लोग अपनी इस मान्यताके उपर अटल है,

(३) ये लोग अपनी मान्यताओंको नकारने वाले साहित्यका वाचन करना उचित मानते नहीं है, इस लिये आप उनको शिक्षित नहीं कर सकते.

(४) ये लोग बीजेपी या/और नरेन्द्रके विरोधी हो सकते है,

(५) ये लोग देश द्रोही हो सकते है,

(६) ये लोग “जैसे थे” वादी हो सकते है,

(७) ये लोग नकात्मक मानसिकता वाले हो सकते है,

(८) ये लोग मूर्ख और मूढ हो सकते है,

(९) ये लोग नहेरुवंशके चाहक या/और उनकी विचार/आचार धाराके चाहक हो सकते है,

(१०) ये लोग महात्मा गांधीके विरोधी, या/और उनकी विचारधारा के विरोधी हो सकते है,

(११) ये लोग गोडसेके चाहक या/और उसकी आचार धाराके चाहक हो सकते है,

(१२) ये लोग अहिंसा और हिंसा कहां योग्य है और कहां योग्य नहीं है इस बातको अवगत करनेकी वैचारिक शक्ति नहीं रखते है,

(१३) ये लोग भारतके हितमें क्या है और कैसी व्युह रचना बनानी आवश्यक है, इन बातोंको अवगत करनेमें असमर्थ है  या/और,  जिन लोंगोंने नरेन्द्र मोदीका और भारतीय हितोंका पतन करनेकी ठान ली है उनकी व्युहरचनाको अवगत करनेकी उनमें क्षमता नहीं है,

(१४) ये लोग जिन्होनें अपना उल्लु सीधा करनेके लिये भारतकी जनताको और/या भारतको और विभाजित करनेका अटल निश्चय किया है,

(१५) ये लोग जो अपना उल्लु सीधा करनेके लिये, नरेन्द्र मोदी और बीजेपीके विषयमें आधार हीन, या/और विवादास्पद वार्ताएं बनाते हैं, उछालते हैं और हवा देते हैं,

(१६) ये लोग जो, या तो अपने धर्मके विषयमें अंध है, या परधर्मके बारेमें या/और परधर्मीयोंके विषयमें सतत धिक्कारकी मानसिकता या/और आचार रखते है,  

(१७) ये लोग स्वयंको धर्मनिरपेक्षके रुपमें प्रस्तूत करते हैं, किंतु उनके रोम रोममें, नरेन्द्र मोदी या/और, बीजेपी या/और सनातन धर्म या/और भारतीय प्राचीन धरोहर के प्रति अस्विकृतिकी मानसिकता या/और घृणा है,

(१८) ये लोग एक विवादास्पद तारतम्य की सत्यताको सिद्ध करनेके लिये दुसरे विवादास्पद तारतम्यका आधार लेते है और अपने निर्णय को तर्कयुक्त मानते है और मनवाते है,

(१९) ये लोग पाश्चात्य साहित्य, इतिहास लेखन, दृष्टिकोण, प्रणालियां या/और व्यक्तियोंसे अभिभूत है.

इन सबकी वजह यह है कि, इन लोगोंमें प्रमाणभानकी और प्राथमिकताकी प्रज्ञा नहीं है, इस लिये ये लोग आपसे एक निश्चित विचार बिन्दु पर चर्चा नहीं करपायेंगे और करेंगे भी नहीं. वे दुसरा विचार बिंदु पकड लेंगे,

अगर आप इनमेंसे कोई भी एक वर्गमें आते है और तत्‌ पश्चात्‌  भी स्वयंको भारतके हितमें आचार रखने वाले मानते हैं, तो आप अवश्य आत्ममंथन करें. यदि आप आत्ममंथन नहीं करेंगे तो भारतके हितैषीयोंको आपसे सावध रहेना पडेगा.

(१) ये लोग, अपनेको स्वयं प्रमाणित मूर्धन्य मानते है और अति-वाचाल है;

भारत ही नहीं किन्तुं दुनियाका मध्यमवर्ग सोसीयल मीडीयासे संबंधित है. समाचार माध्यममें भी कई लोग ऐसे है, जो अपनेको मूर्धन्य मानते है और इस प्रकारसे अपने अभिप्राय प्रकट करते रहेते हैं.

समाचारपत्र और विजाणुमाध्यम का प्राथमिककर्तव्य है कि वे जनताकी अपेक्षाएं और मान्यताओंको प्रतिबिंबित करें और उनके उपर सुज्ञ व्यक्तियोंकी तात्विक चर्चा करवायें.

जो व्यक्ति चर्चा चलाता है उसका कार्यक्षेत्र संसदमें जो कार्यक्षेत्र संसदके अध्यक्षका होता है, उसको निभाना है, किन्तु वह ऐसा करनेके स्थानपर अपनेविचारसे विरोधी विचार रखने वाले पक्षके वक्ताके प्रति भेदभावपूर्ण वर्तन करता है. कई बार वह चर्चाको, उस चर्चा बिन्दुसे दूर ले जाता है. चर्चाको निरर्थक कर देता है. बोलीवुडके हिरोकी तरह वह खुदको ग्लोरीफाय करता है. अर्णव गोस्वामी, पंकज पचौरी, करण थापर, राजदिप सरदेसाई, राहुल कनवाल, विनोद दुआ, पून्यप्रसून बाजपाई, आशुतोष, निधि कुलपति, बरखा दत्त, नलिनी सिंग, आदि कई सारे हैं. जिनकी एक सुनिश्चित एवं पूर्वनिश्चित दिशा होती है.  चर्चाद्वारा वे उसई दिशामें हवा बनानेका प्रयास करते हैं. अधिकतर विजाणु संचार प्रणालीयां ख्रिस्ती और मुस्लिम संस्थाओंने हस्तगत की है, इस लिये उनकी दिशा और सूचन पूर्वनिश्चित होता है.

प्रभु चावला, डॉ. मनीषकुमार, संतोष भारतीय, सुरेश चव्हाण जैसे सुचारु रुपसे चर्चा चलाने वाले चर्चा संचालक अति अल्प संख्यामें हैं.

कुछ कटारलेखक (कॉलमीस्ट) होते हैं जो मनमानीसे समाचारपत्रमें वे अपनी अपनी कॉलम चलाते है. वे सब बंदरके व्यापारी होते है.

सोसीयल मीडीयामें कई मध्यम वर्गके, मेरे जैसे लोग भी होते है. जो अपने वेबसाईट ब्लॉग चलाते है और अपनी प्रतिक्रिया देते रहते हैं.

इनमें हर प्रकारके लोग होते हैं. कुछ लोग अ-हिन्दु होते हुए  भी हिन्दु नाम रखकर, हिन्दुओंको असंमंजसमें डालनेका काम करते है. अल्पसंख्यक होने पर भी नरेन्द्र मोदी और बीजेपीको समर्थन करनेवाले बहुत ही कम लोग आपको सोसीयल मीडीयामें मिलेंगे.

(२) ये लोग भारतके इतिहाससे या तो अर्धदग्ध है, या तो इन लोगोंने क्षतियुक्त इतिहास ज्यों का त्यों पढ लिया है और उसका स्विकार करके अपनी मान्यता बना ली है और अपनी इस मान्यताके उपर अटल है;

aryan invasion

अंग्रेज सरकार के हेतु और कार्यशैलीसे ज्ञात होते हुए भी,  अज्ञानी की तरह मनोभाव रखना इन लोगोंका लक्षण है.

यह बात दस्तावेंजों द्वारा सिद्ध हो गई है कि अंग्रेज सरकारका ध्येय भारतीय जनताको विभाजित करके उनको निर्बल बनाना और निर्‍विर्य बनाना था. भारतके प्राचीन ग्रंथोंको आधारहीन घोषित करना. उनको सिर्फ मनगढंत मनवाना, और अ-भारतीयोंने जो लिखा हो या तो खुदने जो तीकडमबाजी चलाके कहा हो उसको आधारभूत मनवाना और उनको ही शिक्षामें संमिलित करना, अंग्रेजोंकी कार्यशैली रही है.

उन्होने पौराणिक इतिहासको नकार दिया. उन्होने “आर्य” को एक प्रजाति घोषित कर दिया. उन्होंने आर्योंकों आक्रमणकारी और ज्यादा सुग्रथित व्यवस्थावाले बताया. भारतमें इन आर्योंका आगमन हुआ, आर्योंको, उनके घोडेके कारण विजय मीली. उन्होने भारतवासी प्रजाको हराया. उन्होने उनके नगर नष्ट किये. उन्होने पर्वतवासी, जंगलवासी आदिवासीयों पर भी आक्रमण किया. सबको दास बनाया.

इस प्रकार भारतको आदिवासी, द्रविड और आर्य जातिमें विभाजित कर दिया. आज करुणानिधि, जयललिता, मायावती, उत्तरपूर्वके वनवासी नेतागण आदि सभी लोगोंकी मानसिकता जो हमें दिखाई देती है, यह बात इस विभाजनवादी मान्यताका दुष्‌परीणाम है.

अंग्रेज सरकारने दुषित, कलुषित और अनर्थकारी इतिहास पढाके, भारतवासीयोंमें अपने ही देशमें अपने ही देशकी उत्तमोत्तम धरोहरसे वंचित रहेनेकी मानसिकता  पैदा की है. इन दुषित मान्यतांके मूल इतने गहन है कि अब अधिकतर विद्वान उसके उपर पुनः विचार करना भी नहीं चाह्ते, चाहे इस इतिहासमें कितना ही विरोधाभास क्यूं न हो.

इन विषयों पर चर्चा करना आवश्यक नहीं है. क्यों कि कई सुज्ञ लोगोंने जिन्होनें भारतीय वेद, उपनिषद और पुराण और आचारोंद्वारा लिखित ग्रंथोंका अध्ययन किया है उन्होनें इस विभाजनवादी मान्यतामें रहे विरोधाभासोंको प्रदर्शित करके अनेक प्रश्न उठाये है. इन प्रश्नोंका तार्किक उत्तर देना उनके लिये अशक्य है. इस विभाजनवादी मान्यताको दयानंद सरस्वती, सायणाचार्य, सातवळेकर और अनेक आधुनिक पंडितोंने ध्वस्त किया है. इसके बारेमें ईन्टरनेट पर प्रचूरमात्रामें साहित्य उपलब्ध है.  

विभाजनवादी अंग्रेज सरकारने भारतीयोंको कैसे ठगा?

जो लोग अपनेको आदिवासी मानते हैं वे समझते है कि भारतमें स्थायी होनेवाले आर्योंने हमपर सतत अन्याय किया है. हमारा शोषण किया है. ये जो नये आर्य (अंग्रेज ख्रिस्ती) आये है वे अच्छे हैं. ख्रिस्ती बनाके उन्होने हमारा उद्धार किया है.

उदाहरण के आधार पर, आप, मेघालयकी आदिवासी “खासी” प्रजा को ही लेलो. पहेले उनकी भाषा सुग्रथित लिपि देवनागरी लिपि की पुत्री, बंगाली लिपिमें लिखी जाती थी. लेकिन जब वहां ख्रिस्तीधर्मका प्रभाव बढा और उनको एक अलग राज्यकी कक्षा मिली, तो उन्होने रोमन लिपि अक्षर लिपि है, जो उच्चारोंके बारेमें अति अक्षम है उस “रोमन” लिपिको अपनी लिपि बना ली.

आदिवासी जनताके मनमें ऐसी ग्रंथी उत्पन्न कर दी है कि उनको भारतीय साहित्य, कला, स्थापत्य और संस्कृति पर जरा भी गौरव और मान  ही न रहे. वे इनको पराया  मानते है.   

मुस्लिम लोग तो अपनेको भारतीय संस्कृतिको अपना अंग मानते ही नहीं है. उनकी तो मान्यता है कि, भारतके आर्य तो एक विचरित जातिके थे. उन्होने भारतकी मूल सुसंस्कृत जनताकी संस्कृतिको ध्वस्त किया. इन भारतीयोंको हमने ही सुसंस्कृत किया है.

भारतीय गुलामी

भारतीय जनता हमेशा युद्धमें हारती ही रही है, कुछ लोग इस गुलामीका अंतराल २३०० से १२०० सालका मानते है.

अलक्षेन्द्रने भारत के एक सीमान्त राजा पर्वतराजको हराया, तो बस समझ लो पूरे भारतकी गुलामी प्रारंभ हो गई. या तो कोई मुस्लिम राजाने १२०० साल पहेले सिंधके राजाको हराया तो १२००से पूरा भारत गुलाम हो गया. बस साध्यं इति सिद्धं. 

वास्तवमें क्या था?  वास्तवमें मुस्लिम राजाओंको ६०० साल तक भारतके अधिकतर राजाओंको हराने के लिये परिश्रम करना पडा था.

विजयनगरका साम्राज्य एक मान्यताके अनुसार मोगल साम्राज्यसे भी बडा था. मुगलसाम्राज्यका जो स्वर्णयुग और मध्यान्हकाल था उस अकबर के समयमें भी, अकबरको राणा प्रतापको हराना पडा था. और बादमें राणाप्रतापने अपना युद्ध जारी रखके चित्तोर को छोडकर अपनी धरती वापस ले ली थी. औरंगझेबके समयमें भी शिवाजी जैसे विद्रोही थे जिन्होने औरंगझेबकी सत्ता को नष्टभ्रष्ट कर दिया था.

एक बात और है. क्या मुगलका समय भारतीयोंके लिये गुलामीका समय था?

शेरशाह के समयसे ज्यादातर मुस्लिम राजाओंने भारतको अपना ही देश समझा है. भारतीय संस्कृतिका आदर किया है. उन्होने ज्यादातर एक भारतीय राजाके संस्कारका ही आचारण किया है. दुराचारी तो कोई न कोई राजा होता है चाहे वह हिन्दु हो या मुस्लिम हो.

किन्तु अंग्रेज सरकारने यह पढाया कि मुस्लिम धर्मवाले राजा मुस्लिम होनेके कारण हिन्दुओंकी कत्लेआम किया करते थे. अगर ऐसा ही होता तो अकबर और औरंगझेबके सैन्यमें हिन्दु सैनिक नहीं होते और शिवाजीके सैन्यमें मुस्लिम सैनिक नहीं होते. इतना ही नहीं, बहादुर शाह जफर जिसका राज्य सिर्फ लालकिलेकी दिवालों तक सीमित था, तो भी  उसके नेतृत्वमें विप्लव करना और उसको भारतका साम्राट बनाना ऐसा १८५७में निश्चित हुआ था. यदि मुस्लिम राजा हिन्दुस्तानी बन गये नहीं होते तो ऐसा नहीं होता. इस बातसे समझ लो कि मुगल साम्राज्य विदेशी नहीं था. जैसे शक, पहलव, गुज्जर, हुन जैसी जातियां भारतके साथा हिलमिल गई, वैसे ही मुस्लिम जनता भी भारतसे हिलमील गई थीं. अंग्रेजोने अत्याचारी मुस्लिम राजओंका इतिहास बढाचढाके पढाया है.

कोई देश गुलाम कब माना जायेगा?

कोई देश तभी गुलाम माना जायेगा जब उसकी धरोहर नष्ट कर दी जाती है. राजा बदलनेसे देश गुलाम नहीं हो जाता. मुस्लिम राजाओंने और मुस्लिम जनताने भी भारतकी कई प्राणालीयोंका स्विकार किया है. अगर आप पंजाबी मुस्लिम (पाकिस्तान सहितके),  और पंजाबी हिन्दु के लग्नमें जाओगे तो पाओगे कि दोंनोमें एकसी पगडी पहेनते है. स्त्रीयां एक ही प्रकारके लग्नगीतें गातीं हैं. ऐसा ही गुजरातमें हिन्दु और मुस्लिमोंका है. हां जी, लग्नविधि भीन्न होती है. वह तो भीन्न भीन्न प्रदेशके हिन्दुओंमे भी लग्न विधिमें भीन्नता होती है.

भारतके मुस्लिम कौन है? अधिकतर तो हिन्दु पूर्वजोंकी संतान ही है. भारत पर मुस्लिम युगका शासन रहा है तो कुछ राजाओंने जबरदस्ती की ही होगी. उन्होने लालच भी दिया  होगा. कुछ लोगोंने राजाका प्रियपात्र बननेके लिये भी धर्म परिवर्तन किया होगा. सम्राट अशोकने ज्यादातर भारतीयोंको बौद्ध बना दिये थे. किन्तु भारतीय तत्वज्ञान और प्रणालीयां इतनी सुग्रथित और लयबद्ध है कि, सनातन धर्मने अपना वर्चस्व पुनः प्राप्त कर लिया. आदि शंकराचार्यने बौद्धधर्मको नष्टप्राय कर दिया.

क्या मुस्लिमोंने हिन्दुओं पर बेसुमार जुल्म किये थे?

अपना उल्लु सीधा करने के लिये कई लोग अफवाहें फैलाते हैं और शासक सम्राट को मालुम तक नहीं होता है. ऐसी संभावना संचार प्रणाली कमजोर होती है वहां तो होता ही है. कभी शासक, इसका लाभ भी लेता है.

१९७५में जब नहेरुवीयन महाराणीने आपातकाल लगाया तो कई सारे नहेरुवीयन नेताओंने और कार्यकरोंने अपना उल्लु सीधा किया था. वैसे तो संचारप्रणाली इतनी कमजोर नहीं थी किन्तु इस नहेरुवीयन फरजंदने सेन्सरशीप लगाके जनतामें वैचारिक आदानप्रदानको निर्बल कर दिया था. जब इन्दीरा हारी तो उसने घोषित किया कि उसने तो कोई अत्याचारके आदेश नहीं दिये थे.

औरंगझेब एक सच्चा मुसलमान था. वह अपनी रोटी अपने पसीने के पैसे से खाता था. राजकोषके धनको वह खुदका धन मानता नहीं था. वह सादगीसे रहता था. शाहजहांके समयसे चालु मनोवृत्तिवाले  अधिकारीओंको औरंगझेबकी नीति पसंद न पडे यह स्वाभाविक है. वे अपना उल्लु सीधा करनेके लिये और औरंगझेबका स्नेह पानेके लिये या तो अपनी शासन शक्ति बढानेके लिये औरंगबके नामका उपयोग करते भी हो. औरंगझेबको कई बातें पसंद भी हो. उसने उच्च ज्ञातिके हिन्दुको मुस्लिम धर्म स्विकृत करने के  लिये (वन टाईम लम्पसम मूल्य) १००० रुपये, और गरीब के लिये हर दिनके ४ रुपये निश्चित किये थे. अगर सिर्फ अत्याचार ही करने के होते तो ऐसा लालच देना जरुरी नहीं था. अवगत करो, कि उस समयमें रु. १०००/- और प्रतिदिन रु.४/- कोई कम मूल्य नहीं था. उन हिन्दुओंको प्रणाम करो कि वे विभाजित होते हुए भी हिन्दुधर्मके पक्षमें रहे.

हां जी, मुस्लिमोने भारतके कई मंदिर तोडे. मंदिर तोडनेका और जहां मंदिर तूटा है, वहां ही अपना धर्मस्थान बनाना यह बात ईसाई और मुस्लिम शासक और धर्मगुरुओंकी नीति और संस्कार रहा है. ऐसा व्यवहार इन दोंनोंने ईजिप्त, पश्चिम एसिया, ओस्ट्रेलीया, अफ्रिका और अमेरिकामें किया ही है. यहां तक कि ईसाईयोंने और कुछ हद तक मुस्लिमोंने भी, पराजितोंकी स्थानिक भाषाको भी नष्ट कर दिया है.

किन्तु भारतमें ये लोग ऐसा नहीं कर पाये. क्यों कि भारतीय तत्वज्ञान, भारतीय भाषाएं और भारतीय प्रणालियां,  भारतीय जिवनके साथ ईतनी सुग्रथित है कि उनको नष्ट करने के लिये ये लोग भारतमें अक्षम सिद्ध हुए.

ऐसा क्यों हुआ? कौटिल्यने कहा था कि एक सरमुखत्यार राजासे एक गणतंत्रका नेता १०० गुना शक्तिशाली है. कारण यह है कि सरमुखत्यार की शक्ति उसका सैन्य है. गणतंत्रके नेताकी शक्ति उसका सैन्य ही नहीं किन्तु साथ साथ जनता भी है. गणतंत्रमें चर्चा और विचारोंका आदानप्रदान क्षेत्र व्यापक रुपसे होता है. और जो निर्णय होता है वह सुग्रथित और उत्कृष्ट होता है. भारतीय सनातन तत्वज्ञान कर्मधर्म, प्रणालियां आदि सहस्रोंसालोंके आचारोंके अनुभवओंसे सुग्रथित है और अपनी एकात्मताकी रक्षा करते हुए परिवर्तन शील भी रहा है. धर्मके बारेमें चर्चा करना और वैश्विक भावना रखकर तर्कबद्ध निर्णय करना, अन्य धर्माचार्योंके मस्तिष्ककी सीमाका क्षेत्र है ही नहीं.

ऐसे कई कारण है कि जिनकी वजहसे सनातन धर्म सनातन बना. हम उनकी चर्चा नहीं करेंगे.

किन्तु हमें किससे क्यूं सावधान रहेना है?

(३) ये लोग अपनी मान्यताओंको नकारने वाले साहित्यका वाचन करना उचित मानते नहीं है, इस लिये आप उनको शिक्षित नहीं कर सकते.

हमें नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनके सांस्कृतिक साथी पक्षोंसे सावधान रहेना है, क्योंकि वे कुत्सित इतिहासके आधारपर भारतको विभाजित करने वाले ठग है.

इन नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंने महात्मा गांधीवादी जयप्रकाश नारायण तक को, छोडा नहीं था, उनको हम कैसे क्षमा दे सकते है?

इन नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंने गांधीजीके सिद्धांतोंका और तथा कथित समाजवाद का नाम मात्र लेकर, अशुद्ध आचारद्वारा सत्ता प्राप्तिका ध्येय  रक्खा है. देशके उपर ६० सालके निरंकुश शासन करने के पश्चात भी, प्राकृतिक संशाधन प्रचूर मात्रामें होने के पश्चात भी, उत्कृष्ट संस्कृति होनेके पश्चात भी, गरीबोंका और समाजका उद्धार किया नहीं है. केवल और केवल खुदकी संपत्तिमें वृद्धि की है. देशको रसाताल किया है. इन लोगोंका तो कभी भी विश्वास करना नहीं चाहिये. ये लोग सदाचारी बन जायेंगे ऐसा मानना देशद्रोह के समकक्ष ही मानना अति आवश्यक है.

यदि आप, अंग्रेजी शासकोंने जो कुत्सित और विभाजनवादी इतिहास पढाया उसको अगर विश्वसनीय मानते है, और उनसे अतिरिक्त इतिहासक सत्यको मानना नकारते है तो, निश्चित ही समझलो, कि भारतका विकास एक कल्पना ही रह जायेगा.

चौथा कौनसा वर्ग है जिनसे हमें सावध रहेना है?

(४) ये लोग बीजेपी या/और नरेन्द्रके विरोधी हो सकते है,

(क्रमशः)

चमत्कृतिः

एक ऐसी बात है कि, औरंगझेबने काशीमें इतने ब्राह्मणोंकी हत्या की, कि, उनके उपवित (जनेउ) का वजन ही, ४० मण था.

चलो देखें उसका कलनः

एक उपवितका वजन = ग्राम

४० मण उपवित (जनेउ).

एक मण = ४० किलोग्राम = ४०००० ग्राम,

४० मण = ४० x ४०००० = १६००००० ग्राम.

एक जनेउ = ग्राम = ब्राह्मण

१६०००००/ = ३२०००० ब्राह्मणोंकी हत्या. क्या बनारसमें तीन लाख ब्राह्मण की हत्या हुई थी?

अगर आधे ब्राह्मणोंको मार दिया, तो बचे लितने. ३२००००. दुसरे किसीकोभी नहीं मारे तो मान लो कि ५० % ब्राह्मण थे और बाकी अन्य थे तो काशीकी जनसंख्या हुई १२६००००/-

इनता बडा नगर उस जमानेमें दुनियामें कहीं नहीं था. आग्रा सबसे बडा नगर था और उसकी जनसंख्या ५००००० पांच लाख थी.

अगर ३० हजार मनुष्योंकी हत्या होती है तो भी निरंकुश महामारी फैल सकती है.

  

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः इतिहास, अंग्रेज, संस्कृति, संस्कार, सुग्रथित, लयबद्ध, तर्कबद्ध, धरोहर, विभाजनवादी, भाषा, धर्म, सनातन, मुस्लिम, ईसाई, राजा शासक, गणतंत्र, कौटिल्य, गुलामी

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खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग-३)

दशरथ राजा

वैवस्वतः मनु (सूर्यवंश) के बादके ६३ क्रमके राजा दशरथ (दशरथ-२)का प्रथम पुत्र रामचन्द्रजी थे. हम चाहे मनवन्तर-७ को माने या न माने, रामके पिताका नाम दशरथके अस्तित्वको न माननेका कोई कारण नहीं. सभी पुराणोंमे जो क्रम दिया है वह मुख्यतः समान है. कुछ राजाओंके नाम अलग मिलते है, लेकिन फिर पुत्रके नाम सही मिलते है. एक राजा दो नामसे जाना जा सकता है.

अयोध्या को नकारना भी जरुरी नहीं है.

दशरथने कैकेयीसे शादी की. कैकेयी केकेय देशकी थी, इस लिये “कैकेयी” नामसे जानी जाती थी. केकेय प्रदेश अयोध्याकी पश्चिम दीशामें लम्बी मुसाफरी के बाद, कुरुक्षेत्रको पसार करने के बाद भी कई सारी नदीयोंको पार करने के बाद आता है. उस जमानेमें तेज गतिसे दौडने वाले अश्वोंके बावजुद, सात दिन लगते थे. केकेय के बाद गांधार आता था. केकेय हालके पाकिस्तानमें होना चाहिये.

दशरथको दो रानीया थी लेकिन कोई पुत्र नहीं था, इसलिये उसने एक और शादी की. दशरथने केकेयकी राजकन्या पसंद की थी. इससे ऐसे निष्कर्ष पर जा सकते है कि, भारतीय संस्कृति उस समय भी गांधार तक विस्तृत थी.

वैसे तो ईशु की पहेली सदी तक हिन्दु राजाएं ईरान तक राज करते थे. रावण का भाई कुबेर पूर्वोत्तर (ईशान) सीमामें राज करता था, मतलब यह हुआ कि, आज हम जिसको अखंड भारत मानते है, उससे भी बडे विस्तारमें भारतीय संस्कृति फैली हुई थी.

कैकेयी के साथ शादी करनेके बाद भी दशरथको कोई संतान नहीं होती है. दशरथ पुत्रेष्टी यज्ञ करता है.

पुत्रेष्टी यज्ञ क्या था?

वास्तवमें यह एक उपचार हो शकता है. आयुर्वेदमें दूध चावल और सर्कराका नीत्य सेवन, पुत्र प्राप्तिका एक उपचार माना गया है. यज्ञ भी हुआ होगा. शायद वह खीरके नीत्य सेवनके उपचारका  आरंभ या पूर्णाहुतिका हो. उपचारकी क्रिया को भी यज्ञ कह सकते है. कोई भी कार्यको यज्ञ कह सकते है.

सभी रानीयां गर्भवती हुई. सुमित्राको लक्ष्मण और शत्रुघ्न हुए. कौशल्याको राम हुए. कैकेयीको भरत हुआ. सबसे बडे राम थे. दुसरे क्रम पर भरत. तीसरे क्रम पर लक्ष्मण और चौथे क्रम पर शत्रुघ्न.

राम-लक्ष्मण और भरत-शत्रुघ्न इस प्रकार जोडी भी बनी थी ऐसा कहा जाता है.

ऐसा क्युं था?

शायद प्रारंभसे ही यह बात निश्चित नहीं थी कि, दशरथका अनुगामी राजा किसको बनने का था?

रामका राज्याभिषेक करनेका था या भरतका राज्याभिषेक करनेका था?

तीनों रानीयोंके मनमें इसमें अनिश्चिंतता थी. कमसे कम सुमित्राके मनमें तो थी ही. क्यों कि सुमित्राने अपने एक पुत्रको रामके साथ लगा दिया था. और दुसरे पुत्रको भरतके साथ लगा दिया था. अगर राम राजा बने तो लक्ष्मणका भावी निश्चिंत बने. और अगर भरत राजा बने तो शत्रुघ्नका भावी निश्चिंत बने. और इससे खुद भी निश्चिंत रहे.

जब दशरथ केकेयके राजाके पास उसकी पुत्रीका हाथ मांगने गये तो हो सकता ही है कि उसने दशरथ से प्रश्न पूछा हो कि तुम्हे दो रानीयां तो है ही, तो तीसरी करने की क्या जरुरत पडी. तो दशरथने कहा होगा कि मुझे कोई संतान नहीं है इसलिये तीसरी शादी करनी है. केकेयके राजाने कहा भी हो, मेरी पुत्रीके पुत्रको तुम्हे राजा बनाना पडेगा. यदि कौशल्या पुत्रको जन्म दे तो भी, मेरी पुत्रीके पुत्रको राज सिंहासन पर बैठाना पडेगा. दशरथने इसका स्विकार किया था. ऐसी भी एक मान्यता है और पाठ भी है.

कैकेयी शूरवीर और मेधावती थी. वह दशरथको ज्यादा प्रिय थी. लेकिन पट्टराणी कौशल्या थी. उस समयकी प्रणालीके अनुसार पट्टराणीका पद एकबार दिया तो उसको विस्थापित किया जा सकता नहीं था.   

चारों पुत्रोंने विश्वामित्र ऋषिसे अस्र शस्त्र की विद्या प्राप्त की. विश्वामित्र कैसे आये और विश्वामित्रका दशरथ और दशरथके, मंत्रीमंडळ से क्या संवाद हुआ इसका विवरण आवश्यक नहीं. क्योंकि यह सब संवाद है. और संवादसे ऐतिहासिकताका निष्कर्ष निकाला नहीं जा सकता. प्रसंगोके क्रमसे ऐतिहासिकता पर अनुमान लगाया जा सकता है.

शिव धनुष और उसके उपर पणछ बांधना और शरसंधान करना

दक्षने एक यज्ञ किया था. जिसके यज्ञका ध्वंश शिवने किया था. शिवने वैसे इस यज्ञका ध्वंश किया नहीं था, परंतु, शिवने वीरभद्रको और भद्रकालीको उत्पन्न किया था और इन दोनोंने दक्षके यज्ञका नाश किया था. वीरभद्र का यह धनुष कालांतरे मिथीला के जनक राजाके पास आया था. ऐसी एक कहानी है. इसका विवरण हम छोड देतें है. लेकिन इतना जरुर कि वह एक बडा अदभूत धनुष था. जिसके बारे यह हो सकता है कि, उसको कैसे उठाना और उसके उपर पणछ की रस्सी कैसे बांधना और शरसंधान कैसे करना वह एक समस्या होगी.

जनकराजाकी कोई शर्त थी या नहीं?  सीता स्वयंवर हुआ था या नहीं? कौन कौन राजा आये थे? रावण आया था या नहीं?

क्या रावण सचमुच मान गया था?

एक बातकी पुष्टि होती है कि, राम एक नीपूण बाणावली थे. और उन्होने वह धनुष उठाके, पणछ बांधके सरसंधान कर दिया. अगर रामने यह काम सीता स्वयंवर के अंतर्गत किया था तो उस समय कई और कई राजा भी आये होगे. तो रावण भी होगा. ऐसे पाठ मिलते है कि रावण भी उस धनुषको उठा न पाया था.क पाठ यह भी है कि रावण जब उठा तो उसको समझाया गया कि तुम तो उम्रमें सीताके पिता समान हो इसलिये तुम न उठो तो बहेतर रहेगा. रावण मान गया था.

यदि इस बात पर शका है तो इस पाठको पढे.

१९५५में बृहद्‍ गुजरात संस्कृत विद्यापीठकी संस्कृतकी “मध्यमा” अभ्यासक्रममें एक पाठ था. “कौशल्याहरणम्‌” या तो “रावणस्य कौशल्याहरणम्‌” जिसमें रावण कौशल्याका ही नहीं लेकिन दशरथकी कौशल्याके साथ शादीके बाद कौशल्या और दशरथ, दोनोंका हरण करता है. और लंका ले जाता है. बादमें ऋषि लोग उसको समझाते है कि, अब तो कौशल्या परिणित स्त्री है, उसका हरण करना और परिणित स्त्रीके साथ लग्न करना तुम्हारे लिये वर्जित है. तो रावण मान जाता है. बादमें रावण, दशरथ और कौशल्याको एक लकडीकी टोकरीमें रखके टोकरीको समूद्रमें छोड देता है. अगर रावण, लग्नके बारेमें कौशल्याको छोड दे सकता है तो वह सीताको भी छोड सकता है.

भरतकी अनुपस्थितिमें रामका युवराज पद समारोह.

“युवराजपद समारोह” ऐसी कोई प्रणाली, दुसरी कोई जगह इतिहासमें सुनाई नहीं दी है. क्या दशरथ मुत्सद्दी था?

हमने अभी थोडे समय पहले देखा था कि भारतीय जनता पक्षने लोकसभाकी आगामी चूनावके लिये एक समितिका गठन किया और, इस चूनाव प्रचार समितिके अध्यक्ष के स्थानपर नरेन्द्र मोदीको नियुक्त किया गया. इस बातका बडा प्रचार भी हुआ. जिसको विरोध करना था उन लोगोंने विरोध किया. जिसको रुसवाना था उन लोगोंने रुसवाई की. इन लोंगोंकी शक्तिका नाप हो गया. जनशक्तिका भी पता लग गया.

दशरथने रामकी युवराजपदकी घोषणाके लिये अपना समय सुनिश्चित किया. जब भरत अपने नानाके यहां गया था तबका समय उसने युवराजपद समारोह के लिये चूना. दशरथकी धारणा थी कि शायद भरत ही विरोध प्रगट करेगा. कैकेयी कुछ विरोध प्रगट नहीं करेगी. जनता भी कोई विरोध नहीं करेगी इसलिये नानाके घरसे वापस आनेके बाद, भरतको भी जनताकी ईच्छाको मानना पडेगा.

कैकेयीको दशरथने दो वर मांगनेको कोई एक समय कहा था. इसमें दो प्रकारके पाठ है. जब दशरथ राजा असुरोंके सामने सुरोंके युद्धके समय सुरोंको मदद करने के लिये गये थे तब कैकेयी दशरथकी सारथी बनी थी. असुरोंने दशरथ पर जमकर आक्रमण किया, तो कैकेयीने इस आक्रमणसे दशरथको बचानेके लिये रथको भगाकर ले गई थी और दशरथ को बचा लिया था.  दुसरी कथा यह है, दशरथके रथका एक पहिया उसके धरीकी ठेसी निकल जानेकी वजहसे धरीसे निकलजानेवाला था, तब कैकेयीने अपनी उंगली रखके पहियेको निकले नहीं दिया. कैकेयीकी उंगली ईजाग्रस्त हो गई या कट गई थी. दशरथने इस कारण कैकेयीको दो वरदान दिये थे.

केकेय एक सीमावर्ती प्रदेश था. विदेशी आक्रमण का प्रथम भक्ष्य सीमावर्ती प्रदेश बनते है. हो सकता है कि, कैकेयी वीरांगना हो. इसलिये उसके पिताने उसके पुत्रको ही राजगद्दी मीले ऐसा दशरथसे वचन लिया हो. लेकिन एक बात यह भी है कि, प्रणाली ज्येष्ठपुत्रको ही राजगद्दी मिले ऐसी थी.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे,

टेग्झः

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खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग-२)

रामके बारेमें कई पुस्तक लिखे गये है. उत्तर राम चरित्र, रघुवंश, वाल्मिकी रामायण और तुलसी रामायण. कदम्ब रामायण, और कई है जो सब १२वीं सदीके बादमें लिखे गये. इनमें वाल्मिकी रामायण और तुलसी रामायण मुख्य है जिसकी पारायण (सह वाचन श्रवण) की जाती है. महाभारतमें भी रामकथा है.

इसमें विशेष रुपसे रामको विष्णुका अवतार माना गया है. जब एक व्यक्तिको भगवान मानके उनका जीवन लिखा जाता है तो चमत्कार सामेल करने ही पडते है.

अब हम इन चमत्कारोंको छोड कर रामका सच्चा स्वरुप कैसे समझे?

ऐसी कौनसी कौनसी घटनाएं है जिनको हम नकार नहीं सकते. ऐतिहासिकता के निरुपण के लिये घटनाओं का महत्व और घटनाका घटना किस आधार पर हो सकता है उसके उपर ज्यादा सोचना चाहिये. संवाद, मनुष्यके बारेमें किया वर्णन, स्थळोंका वर्णन, प्रसंगका वर्णन इन सब बातोंका संबंध कला-साहित्य और लेखककी खुदकी पसंदगी का है. ऐतिहासिक तथ्योंसे ज्यादा नहीं.

चलो हम घटनाएं क्या घटी, उसका क्या आधार, संदर्भ और तथ्य हो सकता है ये सब देखें और समझे.   

वैवस्वतः वंश और राजाओंकी सूचि और दशरथका स्थान, दशरथ अयोध्याका राजा था.

दशरथको दो रानीयां थी कौशल्या, सुमित्रा

दशरथको कोई पुत्र नहीं था,

दशरथने एक और शादी की. यह तीसरी रानी कैकेयी थी जो गंधारके राजाकी पुत्री थी,

दशरथने पुत्रेष्टी यज्ञ किया,

तीनों रानीयोंने संतानको जन्म दिया,

कौशल्याने राम, कैकेयीने भरत, सुमित्राने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया  

चारों पुत्र विश्वामित्रके आश्रममें पढने गये,

जनक राजाने अपनी पुत्री सीताके लिये स्वयंवर रचा,

जनक के पास एक धनुष्य था. स्वयंवर की शर्त यह थी कि, धनुष्‌के उपर बाणको ठीक तरहसे चढाना था,

स्वयंवरमें कई राजा आये थे.

राम सफल हुए.

रामका सीतासे लग्न हुआ.

दुसरे भाईओंका भी लग्न हुआ,

रामका युवराजपद समारोह घोषित होता है, भरत और शत्रुघ्न उपस्थित नहीं है

कैकेयी विरोध करती है,

राम, सीता और लक्ष्मण वनवास के लिये जाते है,

भरत गांधारसे वापस आता है,

रामके पास जाता है, राम अयोध्या वापस नहीं जाते है,

भरत अयोध्या वापस जाता है,

राम सीता और लक्ष्मण पंचवटीमें समय पसार करते है,

शुर्पणखाका, राम और लक्ष्मण का प्रसंग,

शुर्पणखा ईजाग्रस्त,

रावणका आना और सीता और रावणका लंका जाना,

राम-लक्ष्मण और हनुमान-सुग्रीव का मिलन,

रामका वाली वध,

राम-लक्ष्मण और वानरसेना का लंका प्रयाण,

राम रावण युद्ध,

रावणकी पराजय,

रामका विभीषणका किया राज्याभिषेक,

सीताकी परीक्षा (?)

रामसेनाका अयोध्या जाना,

रामका राज्याभिषेक,

सीता सगर्भा,

रामका सीता त्याग,

सीताका वाल्मिकी आश्रममें पलना,

लवकुशका जन्म,

रामायण का लिखा जाना और जनतामें प्रचार प्रसार,

रामका राजसुय यज्ञ,

अश्वका वाल्मिकीके आश्रममें जाना,

सीताकी परीक्षा,

सीताका धरती प्रवेष,

रामके पास दुर्वासाका आना,

लक्ष्मणका देशत्याग,

रामकी मृत्यु (परलोक गमन)

चलो इन प्रसंगोमेंसे इतिहासका निस्कर्ष करें और रामकी और उनके वंशकी महानता समझें. (क्रमशः)

 राम दरबार

शिरीष मोहनलाल दवे,

टेग्झः

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खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग-१)

एक ऐसे राम थे जो रघुवंशी दशरथ राजाके पुत्र थे और हाडमांसके बने हुए मात्र और मात्र मनुष्य थे. वैसे तो वे एक राजपुत्र और काबिल राजा जरुर थे, लेकिन उनकी अद्वितीय महानता और आदर्श के कारण उनको हमने भगवान बना दिया. और भगवान बना दिया तो वे एक वास्तविक और ऐतिहासिक पात्र नष्ट हो कर एक काल्पनिक पात्र बन गये. और इसके कारण राम की बात करना एक धर्मकी बात करना और सफ्रोन (भगवा ब्रीगेड)की बात करना बराबर हो गया है.

अगर आप रामको भगवान मानो तो इसमें रामका क्या अपराध है?

रामको भगवान मानने वाले चमत्कारमें भी मानते है. रामने कई चमत्कार किये जो कोइ भी मनुष्य देहधारी नहीं कर सकता, इसीलिये राम मनुष्य हो ही नहीं सकते, और इसीलिये राम भगवान ही होने चाहिये.हमने उनको भगवान मान लिया इसीलिये राम धर्मका ही विषय बन गये. राम, धर्मका विषय बन गये इसीलिये वे श्रद्धाका विषय बन गये. राम भारतकी भाषाओंमे वर्णित है इसीलिये वे भारतके है. और भारतमें हिन्दु धर्मको माना जाता था और माना जाता है इसीलिये राम हिन्दुओंके भगवान है. और हिन्दुओंके भगवान है इसीलिये हिन्दुओंकी श्रद्धाका विषय है. और हिन्दुओंकी श्रद्धाका विषय है और हिन्दुओंका भगवान है इसीलिये ये सब बातें काल्पनिक है. काल्पनिक बातोंमें विश्वास रखना अंधश्रद्धा है. समाजमें अंधश्रद्धाको बढावा नहीं देना चाहिये. जो लोग खुदको रेशनल मानते है, वे ऐसा सोचते है.

राम मंदीरके लिये आग्रहीयोंका विरोध करने वालोंकी यही सोच है.

बडे बडे विद्वान और बुद्धिमान लोग भी रामको काल्पनिक पुरुष मानते है.

इसका मूख्य कारण यह है कि प्राचीन और मध्यकालिन भारतीय पुस्तकोंमे चमत्कारकी कई सारी बाते हैं और ये सब कपोलकल्पित है. सब बकवास है ऐसी मान्यता अपनेको ज्ञानी और तटस्थ समझने वाले लोग रखते है.वैसे तो हर धर्मके पुस्तकमें चमत्कारकी बातें लिखी हुई है. लेकिन उन धर्मोंके सभी महापुरुष ऐतिहासिक है. क्यों कि ये सब २६०० वर्षके अंतर्गत हुए. और इनके कुछ कुछ अवशेष मिल जाते हैं ऐसा माना गया है, इसलिये चमत्कारी बातें होते हुए भी वे सब ऐतिहासिक व्यक्ति है.

रामके प्राचीन अवशेष मिलते नहीं है. और जो भी मिलते है वे रामके संबंधित है ऐसा मानना अंधश्रद्धा है ऐसि मानसिकता स्थापित है. रामके प्राग्ऐतिहासिक अवशेष वैसे तो मिलते है, लेकिन उन अवशेषोंको रामके जमानेके या रामके संबंधित माने नहीं जाते हैं. इसके पीछे (आर्यन ईन्वेझन थीयेरी = आर्यजातिका भारत पर आक्रमण और फिर यहांके द्राविड और दस्युजातिकी पराजय और उनका पीछे दक्षिण दीशामें जाना) से अधितर्कका स्विकार है.

वैसे तो यह अधितर्क बिलकुल तर्कहीन और विरोधाभासोंसे भरपूर है, और अब तो यह अधितर्क निराधार और अस्विकृत माना भी जाता है तो भी जो मानसिकता बनी हुई है, वह अभी भी स्थापित है.क्या ऐतिहासिकता का आधार सिर्फ पूरातत्वके अवशेष ही हो सकते है? अगर उत्खनन किया नहीं है तो क्या मानोगे? अगर बाबरी ढांचाके नीचे उत्खनन नहीं हुआ होता और उसके नीचेसे जो विविध स्तर पर विभीन्न अवशेष मीले वह नहीं मिलते तो यही माना जाता कि नीचे कुछ अलग संस्कृति थी ही नहीं. मान लिजीये अगर उन स्तरोंसे भारतीय संस्कृति पर कुछ प्रकाश पडने वाला था, तो क्या होता?

मान लिजीये मोहें जो दडो का उत्खनन नहीं होता तो?

वास्तवमें हमें पुस्तकस्थ विवरणोंको महत्व देना ही पडेगा. उनकी अवगणना नहीं की जा सकती.हमारे पुराणोंको और महाकाव्योंको सिर्फ कपोल कल्पित मानके, उनको भी तिहासका एक हिस्सा मानना पडेगा. यह बात जरुर है कि उनमें कुछ चमत्कारिक बातें है, ईश्वर (रुद्रशिव), भगवान (सूर्यविष्णुब्रह्मा) और देवताओं (ईन्द्र, वायु, आदि)की बातें है. लेकिन ये सब तो तिहासके पुरुषोंकी बातोंको ज्यादा रसप्रद बनानेके लिये संमिलित किया गया है.

जैसे कोई पुस्तकमें वार्तालापोंके शब्दप्रयोगस्थलोंके वर्णनके शब्दप्रयोग, वस्त्रोंके वर्णनके शब्दप्रयोग आदि अक्षरसः वही शब्दोंका प्रयोग हुआ होगा ऐसा नहीं होता है. जैसे मैथिली शरण गुप्तने कोई संवाद लिखा है जिसमें सम्राट अशोक और उसकी पत्नी तिष्यरक्षिताके बीचमें कलिंगके युद्धको ले के संवाद जो वर्णित है, वह भी हुआ हो या अक्षरसः वह भी हो. लेकिन हम अशोककी और उसके कलिंगके युद्धकी ऐतिहासिकताको  नकार नहीं सकते. अशोकके पिताका नाम बहुतेरे पुस्तकोंमें बिंबिसार लिखा हुआ है. तो हम बिंबिसारकी ऐतिहासिकताको नकार नहीं सकते.

महाकाव्योंको अगर छोड दें, तो भी सभी पुराणोंमें रामका उल्लेख है. उसके पिता दशरथका भी उल्लेख है. दशरथके पिताका भी उल्लेख है. उतना भी नहीं पूरे वंशके राजाओंका उल्लेख है. और सभी पुराणोंमें समानरुपसे ही है. ये सब पुराण एक साथ नहीं लिखे गये हैं.पुराण सतत लिखते ही गये थे. अलग अलग जगह और अलग अलग समय पर लिखाते गये थे. कमसे कम ईसा पूर्व चौथे शतकसे ईसा की सातवीं सदी तक अनेकानेक पुराणोंमे लिखना चलता रहा था.

विश्वमें कई ग्रंथोमें ऐसा लिखना चलता रहा है.

सबसे पुराना पुराण वायु पुराण है.

वायु पुराण सबसे ज्यादा पुराना क्युं हैवैसे तो वायुपुराण के छः पाठ मिलते है. सर्वप्रथम पाठकी संस्कृतभाषा पुरी पूर्वपाणीनीकाल की है. बादमें उसमें कई प्रक्षेप होते गये और अध्याय बडे भी होते गये और बढते भी गये.इस पुराणमें बुद्ध भगवानका उल्लेख नहीं है. विष्णुके दशावतारकी बात है. लेकिन रामका नाम वे दश अवतारोंकी सूचीमें नहीं है. रामका एक पराक्रमी राजाके रुपमें उल्लेख है. रामके पिता दशरथका भी उल्लेख है. दशरथको भी पराक्रमी राजाके रुपमें उल्लेख है. पुरे सूर्यवंशके राजाओंकी नामावली है.

रामके बारेमें क्या लिखा है?

रामके बारेमें संक्षिप्तमें लिखा है. बलवान राजा दशरथके पुत्र रामने लंकाके रावणको हराया.

वैसे तो कृष्ण भगवानका भी उल्लेख है. कृष्णको तो विष्णुके अवतार तो माना ही है.

कृष्ण के बारेमें एक अध्यायका हिस्सा है.

लेखकने, श्यामंतक मणी जो खो गया था और कृष्णके उपर इस बातको लेकर जो आरोप लगा था और कृष्णने इस आरोपको कैसे दूर किया था इस  प्रसंगको वर्णित किया है.

एक पन्नेमें यह बताया है कि, वसुदेवके किन किन पुत्रोंको (पुत्रोंके नाम भी दिये है) कंसने मार डाले थे. और इसलिये कृष्ण के जन्मके पश्चात, वसुदेव इस कृष्णको अपने मित्र नंदके यहां छोड आते है. इसमें कोई चमत्कार वर्णित है कोई कारावासकी बात है, न कोई यमुनाके पूरकी कोई बात न और कोई लंबी बात है.

दुसरी विशेषता इसमें यह है कि, बलरामको विष्णुका अवतार बताया गया है.

तीसरी महत्वपूर्णबात यह है कि कई श्लोकोंमें ब्रह्मा विष्णु और रुद्र के बदले ब्रह्मा विष्णु और अग्नि ऐसा लिखा गया है. इसका प्रारंभ भी, महेश ईशान (रुद्र) की स्तूति से होता है.

वेदोमें अग्निका एक नाम ईशान भी है. महो देव (महः देवः अर्थात्महो देवो जैसे कि सो महो देवो मर्त्यां आविवेश) भी अग्निका नाम है. कहेनेआ तात्पर्य यह है कि अग्नि, रुद्र, और शिवकी एक रुपता वायुपुराणमें सिद्ध होती है.ऐसी कई बातें है जिससे वायु पुराणकी प्राचीनता सिद्ध होती है.(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे,

टेग्झः

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