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Posts Tagged ‘इन्दिराका दंभ’

कोंगी गेंग की एक और चाल

गरीबोंकों एक और खेरात

कोंगी के अध्यक्षने मध्यप्रदेशके चूनाव के समय किये गये ॠणमाफीके शस्त्रकी सफलताको देख कर, उसके ही एक और बडे स्वरुपके शस्त्रका आविष्कार किया और उसको नाम दिया है, “न्यूनतम आय योजना”. इसके उपर पूरे कोंगीलोग अति उत्तेजित और आनंदित है. लेकिन कुछ समय पश्चात्‌, उनको पता चला कि कुछ गडबड हुई है. उन्होंने अपने घोषणापत्रमें उसके विवरणमें शब्दोंकी चालाकीसे उस शस्त्रको पतला और असंपृक्त (डाईल्युट) किया. असंपृक्त इसलिये किया कि कुछ विद्वान लोग, उसका मजाक न बना दे.

७२००० हजार हरेक गरीबके खातेमें डाल देनेका है.

लेकिन गरीबको पहेचानना एक मुश्किल समस्या है. खास करके, कोंगी गेंगके लिये, यह अत्यंत दुष्कर है. कोंगी शासनमें “महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना” में और गेस सीलीन्डर सहायक योजनामें, राशन कार्ड पर सस्ता अनाज देनेकी योजनाओंमें और ऐसे कई कार्योंमें जब, नरेन्द्र मोदीने, आधारकार्ड को जोडा, तब कोंगीके शासनका, अरबों खरबों रुपयोंका भ्रष्टाचार सामने आया. इस कारणसे कोंगी गरीबोंकी सही पहेचान कर सके, वह असंभव है.

ऐसी खेराती योजनाओंका एक प्रभावक अवयव यह भी है, कि जो गरीब है, वह तो इन पैसोंका व्यवहार नकदसे ही करेगा. और यदि चार लाख करोडका नकद अर्थतंत्रमें आ जाय, तो वह अर्थतंत्रका क्या हाल कर कर सकता है!! इसके अतिरिक्त  वस्तुओंके मूल्यों  पर इसका क्या प्रभाव पडेगा वह भी एक संशोधनका विषय ही  नहीं, परंतु चिंताका विषय भी बन सकता है.  भारतमें तो जनतंत्र है. कोंगी स्थापित शासन व्यवस्थामें और वह भी अर्थतंत्रकी प्रणालीगत व्यवहारमें  बाबुमोशायोंका करिश्मा तो सर्व विदित है. बहेतीगंगामें कोंगीके खूदके सर्वोच्च महानुभाव कितने लिप्त है वह हमने ही नहीं किन्तु समग्र देशने देख लिया है.

याद करो १४ वरिष्ठ बेंकोका राष्ट्रीयकरणः

इन्दिरा गांधीने १४ वरिष्ठ बेंकोका राष्ट्रीयकरण १९६८में किया था. युवा पीढीको मालुम नहीं होगा, और जो उस समय युवान थे वे अब इतने वृद्ध हो गये है कि उनकी स्मृति कमजोर पड गई है. वे समज़ते है कि इन्दिरा गांधीने कोंग्रेसको तोडनेके पश्चात्‌ यह काम किया था. जैसे कि वे समज़ते है कि इन्दिरा गांधीने १९७७में आपातकाल हटाके चूनाव घोषित किया था. वास्तवमें इन्दिरा गांधीने आपातकालके चलते ही चूनाव किया था. जब उसका कोंगी पक्ष हार गया तो उसने आपातकाल को हटा लिया. क्यों कि उसको डर था कि आपातकालके सहारे नयी सरकार उसको गिरफ्तार कर लेगी.

इन्दिरा गांधीने बेंकोके राष्ट्रीयकरणका हेतु, यह बताया था कि, गरीबको व्यवसायके लिये छोटा ऋण दिया जा सकें. वैसे तो रीज़र्व बेंक ऐसा आदेश दे सकती थीं कि, हर बेंकको सुनिश्चित ऋण,  गरीबोंको देना ही पडेगा. लेकिन इन्दिराको इसका सियासती लाभ लेना था, और सरकारके पैसे से चूनाव जितना था.

“इन्दिरा जिसका नाम … वह सीधा काम भी टेढे प्रकारोंसे करती है” जयप्रकाश नारायण

ऋणके लिये सिफारिस चाहिये. और सिफारसी एजन्टके लिये तो कोंगी नेतासे अधिक श्रेय कौन हो सकता है!!

बस ऐसे ही ऋण दिया गया मानो उस ऋणको वापस  ही नहीं करना है. बेंकोंके राष्ट्रीयकरणका एक दुष्परिणाम यह भी था कि बेंकोके मेनेजमेन्ट पर युनीयनबाजी हामी हो गयी. बेंकोंके बाबुलोग बे-लगाम हो गये थे. फर्जी डीमान्डड्राफका व्यवहार ऐसा हो गया था कि हररोज एक करोडके फर्जी डीमान्डड्राफ्ट बनते थे और पैसा उठा लिया जाता था.

कोंगीका शासन हो और गफला न हो, यह बात ही असंभव है.

गफले न हो सके ऐसे नियम बनानेमें इन्दिरा मानती ही नहीं थी. सियासती नीतिमत्ताको धराशायी करनेमें इन्दिरा गांधीको कोई पराजित नहीं कर सकता. नहेरु भी दंभी और असत्यभाषी थे, लेकिन उन्होंने स्वातंत्र्य संग्राममें जनतंत्रकी दुहाईके हीरे खाये थे. इसलिये वे चाहते हुए भी सरमुखत्यारीके कोयले नहीं खा सकते थे.

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लेकिन इन्दिराका स्वातंत्र्यके संग्राममें कोई योगदान ही नहीं था. गुजरातीमें एक कहावत है कि नंगा नहायेगा क्या और नीचोडेगा क्या? इन्दिरा खूले आम आपखुद बनती थीं.

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राहुल घांडी क्या इन्दिरा फिरोज़ घांडीको हरा सकते है?

राहुल सचमुच इन्दिराको जूठ बोलनेमें हरा सकते है. सभी क्षेत्रोंमे हरा सकते है. ईश्वरकी कृपा है कि राहुल प्रधान मंत्री बन नहीं सकते. क्यों कि, उनका इटलीकी नागरिकता पर धारणाधिकार (लीन = lien) है. विदेशकी नागरिकता पर, ऐसा धारणाधिकार रखने वाला व्यक्ति, मंत्री पदके लिये योग्य नहीं है. भारतीय संविधानमें ऐसा प्रावधान है.

आप देख सकते है कि अब तक कोई समचार माध्यमने इसके उपर चर्चा नहीं की है. इसका कारण क्या है?

गुजरातीमें एक मूँहावर है कि “जिसको कोई न पहूँचे उसको पेट पहूँचे. “डीनर डीप्लोमसी”, “मैंने आपका नमक खाया है”, “मैंने आपकी मदीरा पी है”. ये सब समानार्थी है और समान असरकारक है.

२००१के पूर्व गुजरातमें केशुभाई पटेलका शासन था.

उस शासनमें और उसके पूर्वके शासनमें यह प्रणाली थी कि हररोज एक वातानुकुलित बस केवल और केवल पत्रकारोंके लिये अहमदाबादसे गांधी नगर प्रतिदिन जाती थी. और देर सामको उनको वापस लाती थी. सरकार द्वारा पत्रकारोंकी महेमान नवाज़ी ऐसी होती थी सौराष्ट्रवासी भी उससे सिख ले सकें. सौराष्ट्रके लोग महेमान नवाज़ीमें अतुल्य है.

पत्रकारों सब मौज करो

सरकार द्वारा,  ब्रेकफास्ट, लंच, डीनर मे स्वादिष्ट व्यंजन, चिकन-बिर्यानी और व्हीस्कीकी बोलबाला रहेती थी. लेकिन जब ऐसी परिस्थिति स्थायी बन जाती है तो फिर पत्रकारोंको सरकारकी दो आँखोंकी शर्म नडती नहीं है.

२००१के भूकंपकमें जब केशुभाई पटेलकी सरकार विफल रही तो पत्रकार लोग उनके पीछे पड गये.

नरेन्द्र मोदी आये.

उन्होंने असरकारक कदम उठाये. कुछ अधिकारीयोंको सस्पेन्ड किया. इसके अंतर्गत साबरमती एक्सप्रेसके रेल्वे कोच एस-६ को जलाके ५९ हिन्दुओंकी हत्या की. इसके कारण प्रत्याघात हुआ और कोमी दंगे हुए. अधिकतर समाचार माध्यमोंने इसको मोदीके विरुद्ध की घटना के रुपमें प्रस्तूत किया. इसकी एक यह वजह भी थी कि, मोदीने, सरकार द्वारा होती रही, पत्रकारोंकी वाहन और भोजन-नास्तेकी सुविधा बंद कर दी थी. अब सभी समाचार केशुभाईकी प्रशस्ति करने लगे और केशुभाईको मोदीके विरुद्ध उकसाने लगे. और केशुभाई पटेल समाचार माध्यमोंकी जालमें फंस भी गये. ऐसा होते हुए भी नरेन्द्र मोदी की बीजेपी २००२का चूनाव जीत गयी. लेकिन समाचार माध्यमोंने इस अप्राकृतिक युद्धको २०१२ के चूनाव तक पूरजोशमें चालु रक्खा.

इसी प्रकार समाचार माध्यमोंने अडवाणीको भी २०१४में उकसाया था. अडवाणी भी इन दंभी धर्मनिरपेक्षोंकी जालमें फंसनेको तयार थे. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री एक सौम्य और शांत व्यक्ति होना चाहिये. मध्य प्रदेशके शिवराज सिंह चौहाण एक सौम्य और शांत प्रकृतिवाले व्यक्ति है. अडवाणीका ईशारा स्पष्ट था कि उसको नरेन्द्र मोदी पसंद नहीं थे. लेकिन शिवराज सिंह चौहाण इस विभाजनवादी जालमें फंसे नहीं.

अडवाणीको २००४ और २००९ में दो दफा चान्स दिया गया था. वे विफल रहे. देशकी आम जनता भी चाहती थी कि नरेन्द्र मोदी ही प्रधान मंत्री बने. अडवाणीके इस प्रकारके परोक्ष विरोध का असर नहीं हुआ. उन्होंने बीजेपीके कॉटमें और अपनी गरीमाके विरुद्ध के कोटमें सेल्फ गोल कर दिया. समाचार माध्यम वाले तथा कथित मूर्धन्य लोग नरेन्द्र मोदीके विरुद्ध पडनेके लिये असभ्य तरिकोंका भी उपयोग करना न भूले.

आज अडवाणीके कथन पर मीडीया वाले, कैसा भ्रामक और मीथ्या अर्थघटन कर रहे है वह जरा देखें.

“हमने कभी हमसे विरुद्ध अभिप्राय रखनेवालोंको देश द्रोही नहीं समज़े” अडवाणी उवाच.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

 

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