Feeds:
Posts
Comments

Posts Tagged ‘इन्दिरा नहेरुघांडी कोंग्रेस = आई.एन.सी.’

कोंगी और भूमि-पुत्र और धिक्कार

कोंगी और भूमि-पुत्र और धिक्कार

भूमि-पुत्र कौन है?

जिसने जहां जन्म लिया वह वहाँका भूमि-पुत्र है.

क्या यह पर्याप्त है?

नहीं  जी. जिसने जहाँ जन्म लिया, भूमि पुत्र बननेके लिये व्यक्ति को उस प्रदेशकी भाषा भी आनी  चाहिये, और यदि वह उस राज्यमें १५ साल से रहेता है, तो वह उस राज्यका भूमि-पुत्र माना जाना चाहिये. यदि वह अवैध (घुस पैठीया अर्थात्‌ विदेशी घुसपैठीया है) रुपसे रहता है तो यह बात राज्य और केन्द्र सरकार मिलके सुनिश्चित कर सकती है. यदि इसमें केन्द्र सरकार और राज्य सरकारमें भीन्नता है तो न्यायालयका अभिप्राय माना जायेगा.

भूमि-पुत्रकी समस्या किन स्थानों पर है?

सबसे अधिक भूमि-पुत्रकी समस्या जम्मु- कश्मिरमें और  ईशानके राज्योमें है.

जम्मु-काश्मिरकी समस्या कोंगीयोंने वहाँ के स्थानिक मुस्लिमोंके साथ मिलकर उत्पन्न की है. वहाँ तो हिन्दुओंको भी  भगा दिया है. ४४००० दलित कुटूंब, जो जम्मु-कश्मिरमें १९४४से रह रहे है  जब तक नरेन्द्र मोदी सरकारने अनुच्छेद ३७० और ३५ए दूर नहीं किया था तब तक उनको भूमि-पुत्र नहीं माना जाता था. जनतंत्रका अनादर इससे अधिक क्या हो सकता है?

अब वहाँ की स्थिति  परिवर्तन की कैसी दीशा पकडती है उस पर नयी स्थिति निर्भर है.

ईशानीय राज्योंमें भूमि-पुत्रकी क्या समस्या है?

विदेशी घुसपैठी मुस्लिम

विदेशी घुसपैठी हिन्दु

भारतके अन्य राज्योंके बंगाली, बिहारी, मारवाडी …

विदेशी घुसपैठीकी समस्या का समाधान तो केन्द्र सरकार करेगी.

लेकिन विदेशी घुसपैठी इनमें जो हिन्दु है उनका क्या किया जाय?

विदेशी घुसपैथीयोंमें बंग्लादेशी हिन्दु है.

दुसरे नंबर पर पश्चिम बेंगालके हिन्दु है. इन दोनोंमे कोई फर्क नहीं होता है.

पश्चिम बंगालसे जो हिन्दु आये है उन्होंने सरकारी नौकरीयों पर कब्जा कर रक्खा है. असमकी सरकारी नौकरीयोंमें  बेंगालीयोंका प्रभूत्व है.

असममें और ईशानमें भी,  पश्चिम बेंगालके लोग अपनी दुकानमें स्थानिक जनताको न रखके अपने बेंगालीयोंको रखते हैं. इस प्रकार राज्य की छोटी नौकरीयां भी स्थानिकोंको कम मिलतीं है.

भूमिगत निर्माण कार्योंमें भी, पर प्रांतके कोन्ट्राक्टर लोग, अपने राज्यमेंसें मज़दुरोंको लाते है. अपनी दुकानोंमें भी वे अपने राज्यके लोगोंको रखते है.

इसके कारण स्थानिकोंके लिये व्यवसाय कम हो जाते है. इस प्रकार स्थानिक जनतामें परप्रांतियोंके प्रति द्वेषभावना उत्पन्न होती है.

इस कारणसे क्षेत्रवाद जन्म लेता है,  दंगे भी होते है, आतंकवाद उत्पन्न होता, और सबसे अधिक भयावह बात है  यह वह है कि इन परिस्थितियोंका लाभ ख्रीस्ती मिशनरीलोग, स्थानिकोंमें अलगतावाद उत्पन्न करके उनका धर्म परिवर्तन करते है और फिर उनके प्रांतीय अलगतावाद और धार्मिक अलगता वादका सहारा लेके स्थानिकोंमें “हमें अलग देश चाहिये” इस भावनाको जन्म देते है.

मेघालयः

उदाहरणके लिये आप मेघालयको ले लिजीये. यह पूर्णरुपसे हिन्दु राज्य था. (नोर्थ-ईस्ट फ्रन्टीयर्स = ईशानके सीमागत)). ब्रीटीशका तो एजन्डा धर्म प्रचारका था ही.  किन्तु कोंगीने ब्रीटीशका एजन्डा चालु रक्खा. नहेरुमें आर्ष दृष्टि थी ही नहीं कि ब्रीटीशका एजन्डा आगे चलके गंभीर  समस्या बन सकता है. इन्दिराका काम तो केवल और केवल सत्ता लक्षी ही था. उसने  क्रीस्चीयन मीशनरीयोंको धर्मप्रचारसे रोका नहीं.

लिपि परिवर्तन

मेघालयकी स्थानिक भाषा “खासी” है. यह भाषा पूर्वकालमें बंगाली लिपिमें लिखी जाती थी. कोंगीके शासनमें ही वह रोमन लिपिमें लिखी जाने लगी. रोमन लिपिसे ज्ञात ही नहीं होता है कि वसुदेव लिखा है या वासुदेव लिखा है. ऐसी अपूर्ण रोमन लिपिको क्रीस्चीयन मीशनरीयोंने लागु करवा दी. ऐसा करनेसे खासी (मेघालयके स्थानिक)  लोगोंमें वे “भारतसे भीन्न है” भावना बलवत्तर बनी. ऐसी ही स्थिति अन्य राज्योंकी है. असमके लोगोंने अपनी लिपि नहीं बदली किन्तु अलगताकी भावना उनमें भी विकसित हुई. मूल कारण तो विकासका अभाव ही था.

एक काल था, जब यह ईशानका क्षेत्र संपत्तिवान था. कुबेर यहाँ का राजा था. आज भी इशानके राज्योंमें प्राकृतिक संपदा अधिक है, किन्तु  शीघ्रतासे कम हो रही है.. इन्दिरा नहेरुघान्डी कोंग्रेसने इन राज्योंका विकास ही नहीं किया. इसके अतिरिक्त कोंगीने अन्य समस्याओंको जन्म दिया और उन समस्याओंको विकसित होने दिया.

ईशानके राज्य आतंकवाद से लिप्त बने. ईशानके राज्योंमें परप्रांतीय भारतीयों पर हुए अत्याचारोंकी और नरसंहारकी अनेक कथाएं है. इनके उपर बडा पुस्तक लिखा जा सकता है.

सियासतका प्रभाव

भूमि-पुत्रकी समस्यामें जब सियासत घुसती है तो वह अधिक शीघ्रतासे बलवत्तर बनती है. जहाँ स्थानिक लोग शिक्षित होते है वे भी सियासतमें संमिलित हो जाते है.

मुंबई (महाराष्ट्र) ; १९५४-५५में नहेरुने कहा “यदि महाराष्ट्रीयन लोगोंको मुंबई मिलेगा तो मुझे खुशी होगी.” इस प्रकार नहेरुने मराठी लोगोंको संदेश दिया कि,” गुजराती लोग नहीं चाहते है कि  महाराष्ट्रको मुंबई मिले.” ऐसा बोलके नहेरुने मराठी और गुजरातीयोंके बीचमें वैमनस्य उत्पान्न किया.

वास्तवमें तो कोंग्रेसकी केन्द्रीय कारोबारीका पहेलेसे ही निर्णय था कि “गुजरात, महाराष्ट्र और मुंबई” ऐसे तीन राज्य बनाया जाय. किन्तु बिना ही यह निर्णयको बदले, नहेरुने ऐसा बता दिया कि गुजराती लोग चाहते नहीं है कि मुंबई, महाराष्ट्रको मिले.

मुंबईको बसाने वाले गुजराती ही थे. गुजरातीयोंमे कच्छी, काठीयावाडी (सौराष्ट्र), गुजराती बोलनेवाले मारवाडी, और गुजराती (पारसी सहित) लोग आते है. ९० प्रतिशत उद्योग इनके हाथमें था. स्थानिक संपत्तिमें ७० प्रतिशत उनका हिस्सा था. गुजरातीयोंने स्थानिक लोगोंको ही अवसर दिया था. गुजराती कवि लोगोंने शिवाजीका और अन्य मराठाओंका गुणगान गाया है. सेंकडों सालसे गुजराती और मराठी लोग एक साथ शांतिसे रह रहे थे. उनमें नहेरुने आग लगायी. मुंबई एक  व्यवसायोंका केन्द्र है. गुजराती लोग व्यवसाय देनेवाले है. गुजराती लोग व्यवसाय छीनने वाले नहीं है. यदी गुजराती लोग चाह्ते तो वडोदरा जो पेश्वाका राज था वहांसे मराठी लोगोंको भगा सकते थे. किन्तु गुजराती लोग शांति प्रिय है. उन्होंने ऐसा कुछ किया नहीं.

शिव सेना न तो शिवजीकी सेना है, न तो वह शिवाजीकी सेना है.

महाराष्ट्रकी  सियासती कोंग्रेसी नेताओंने मराठीयोंका एक पक्ष तैयार किया. उसका नाम रक्खा शिव सेना. जिनका उद्देश साठके दशकमें कर्मचारी मंडलोंमेंसे साम्यवादीयोंका प्रभूत्त्व खतम करनेका था, और साथ साथ महाराष्ट्र स्थित  केन्द्र सरकारके कार्यालयोंमेंसे दक्षिण भारतीयोंको हटानेका था. यह वही शिवसेना है जिसके स्थापकने इन्दिराको आपत्कालमें समर्थन दिया था. और आज भी यह शिवसेना सोनिया सेना बनके इन्दिरा नहेरुघांडीकी भाषा बोल रही है.

दक्षिण भारत

दक्षिणके राज्योंमे भाषाकी समस्या होनेसे उत्तरभारतीय वहाँ कम जाते है. लेकिन ये उत्तर भारतीय जिनमें राजस्थान, मध्यप्रदेश, ओरीस्सा, उत्तर प्रदेश, बिहार … वे गुजरात, मुंबई (महाराष्ट्र) में नौकरीके लिये अवश्य आते है. ये लोग अपने राज्यमें भूखे मरते है इसीलिये वे गुजरात में (और मुंबईमें भी) आके  कोई भी नौकरी व्यवसाय कर लेते है. इनकी वजह से गुजरात और मुंबईमें झोंपड पट्टी भी बढती  है. कोंगीने  और समाचार माध्यमोंने गुजरातमें भाषावाद पर लोगोंको बांटनेका २००१से  प्रयत्न किया था. एक “पाटीदार (पटेल)”को नेता बनाया था. उसने प्रथम तो आरक्षणके लिये आंदोलन किया था. वह लाईम लाईटमें आया था. कोंगीने परोक्षरुपसे उसका समर्थन भी किया था. शिवसेनाके उद्धव ठाकरेने उसको गुजरातका मुख्य  मंत्री बनानेका आश्वासन भी दिया था. कोंगीयोंने परोक्ष रुपसे गुजरातसे कुछ उत्तर भारतीयोंको भगानेका प्रयत्न भी किया था. कोंगीलोग गुजरातमें सफल नहीं हो पाये.

राहुल गांधीने दक्षिण भारतमें जाके ऐसी घोषणा की थी कि बीजेपी सरकार, दक्षिणभारतीय संस्कृतिकी रक्षा नहीं कर रही है. हम यदि सत्तामें आयेंगे तो दक्षिण भारतीय संस्कृतिकी पूर्णताके साथ रक्षा करेंगे. कोंगीयोंका क्षेत्रवाद और भाषावादके नाम पर भारतीय जनताको विभाजित करनेका यह भी एक प्रकार रहा है.

ईशान, बंगाल और कश्मिरके अतिरिक्त, क्वचित्‌ ही कोई राज्य होगा जहां पर यदि आप उस राज्यकी स्थानिक भाषा सिखलें तो आपको कोई पर प्रांतीय समज़ लें.

 भाषासे कोई महान है?

“गर्म हवा” फिल्ममें एक  घटना  और संवाद है.

परिस्थित ऐसी है कि एक मुस्लिम ने सरकारी टेन्डर भरा. बाकीके सब हिन्दु थे.

मुस्लिम के लिये यह टेन्डर लेना अत्यधिक आवश्यक था. लेकिन धर्मको देखते हुए असंभव था. उसके घरवालोंको लगा कि यह टेन्डर उसको मिलेगा ही नहीं. जब वह मुस्लिम घर पर आया तो घरवालोंने पूछा कि टेन्डर का क्या हुआ? उस मुस्लिमने बताया कि “धर्म से भी एक चीज महान है … वह है रिश्वत … मुझे वह टेन्डर मिल गया.”

 उसी प्रकार, भाषासे भी एक चीज़ महान है वह एक सियासत. सियासती परिबल किसी भी समस्याका हल है और वह है नेताओंकी जेब भर देना.

किन्तु यह रास्ता श्रेयकर नहीं है.

कौनसा रास्ता श्रेयकर है?

प्रत्येक राज्यके लोगोंकी अपनी संस्कृति होती है.

शासन में स्थानिकोंका योगदान आवश्यक है

स्थानिकोंका आदर करना आवश्यक है

स्थानिककोंकी भाषा हर कार्यालयमें होना आवश्यक है,

स्थानिकोंके रहन सहनका आदर और उसको अपनाना आवश्यक है,

स्थानिकोंके पर्व में योगदान देना आवश्यक है,

स्थानिकोकी कलाओंको आदर करना और अपनाना आवश्यक है,

ऐसा तब हो सकता है कि जब राज्यके शासनकी भाषा स्थानिक भाषा बनें.

ऐसी स्थिति की स्थापना करनेके लिये महात्मा गांधीने कोंग्रेसकी कारोबारी द्वारा भाषाके अनुसार राज्य नव रचना करना सूचित किया था. प्रत्येक राज्यका शासन उसकी स्थानिक भाषामें होने से प्रत्येक राज्यकी अस्मिता सुरक्षित रहेती है.

राज्य स्थित केन्द्रीय कार्यालयोंमें भी स्थानिक भाषा ही वहीवटी भाषा होना चाहिये.

पर प्रांतीय लोग, यदि स्थानिक लोगोंका आदर करनेके बदले उनको कोसेंगे तो वे लोग स्विकार्य नहीं होंगे. इसका अर्थ यह है कि वे स्थानीय जनताका एवं उनकी संस्कृतिका आदर करें और उनके उपर प्रभूत्त्व जमानेकी कोशिस न करें.

परप्रांतीय लोग यदि स्थानिक जनता की भाषा अपना लें तो, ६० प्रतिशत समस्याएं उत्पन्न ही नहीं होती हैं..  

क्या आप सोच सकतें है कि आप बिना फ्रेंचभाषा सिखें फ्रान्समें आरामसे रह सकते है?

क्या आप सोच सकते है कि आप बिना जापानी भाषा पढे जापानमें रह सकते है?

क्या आप सोच सकते है कि आप स्पेनीश भाषा पढें स्पेन और दक्षिण अमेरिकामें आरामसे रह सकते है?

भारत देश भी, वैविध्यतासे भरपूर है. वही भारतका सौंदर्य है.

७० प्रतिशत स्थानिक संस्कार स्विकृत करें. ३० प्रतिशत अपना मूल रक्खें.

कोंगीने कैसे अराजकता फैलायी?

कोंगीयोंका ध्येय ही, हर कदम पर, सियासती लाभ प्राप्त करना है. इसीलिये लोक नायक जय प्रकाश नारायणने १९७४में कहा था कि कोंगी अच्छा काम भी बुरी तरहसे करता है.

क्या कश्मिरमें शासनकी भाषा कश्मिरी भाषा है?

क्या हरियाणामें शासनकी भाषा हरियाणवी है?

क्या पंजाबमें शासनकी भाषा पंजाबी है?

क्या हिमाचलमें शासनकी भाषा गढवाली है,

क्या मेघालयमें शासनकी भाषा खासी है?

ऐसे कई राज्य है जिनमें राज्यकी स्थानिक भाषा,  शासनकी भाषा  नहीं है. यह है कोंगीयोंका कृतसंकल्प. कोंगीयोंने अपने शासनके  ७० वर्ष तक जनताके परम हितकी अवमानना करके अनिर्णायकता रक्खी.

शिरीष मो. दवे

चमत्कृतिः

भारतको  १९४७में स्वतंत्रता मिलने पर बडौदामें क्या हुआ?

बडौदा राज्यमें शासनकी भाषा बदली. गुजरातीके बदलेमें अंग्रेजी आयी.

वाह कोंगी स्वतंत्रता, तेरा कमाल ?

हाँजी बरोडाके गायकवाडके राज्यमें शासनकी भाषा (वहीवटी भाषा गुजराती थी)

लेकिन स्वतंत्रता आनेसे उसका मुंबई प्रान्तमें विलय हुआ. मुंबई प्रांतकी वहीवटी भाषा अंग्रेजी थी.

Read Full Post »

कहीं भी, कुछ भी कहेनेकी सातत्यपूर्ण स्वतंत्रता – ३

कहीं भी, कुछ भी कहेनेकी सातत्यपूर्ण स्वतंत्रता – ३

गांधीका खूनी कोंगी है

शाहीन बाग पदर्शनकारीयोंका संचालन करनेवाली गेंग है वह अपनेको महात्मा गांधीवादी समज़ती है. कोंगी लोग और उनके सांस्कृतिक समर्थक भी यही समज़ते है.. इन समर्थकोमें समाचार माध्यम और उनके कटारलेखकगण ( कोलमीस्ट्स) भी आ जाते है.

ये लोग कहते है, “आपको प्रदर्शन करना है? क्या लोक शाही अधिकृत मार्गसे प्रदर्शन करना  है? तो गांधीका नाम लो … गांधीका फोटो अपने हाथमें प्रदर्शन करनेके वख्त रक्खो… बस हो गये आप गांधीवादी. ”

कोंगी यानी नहेरुवीयन कोंग्रेस [इन्दिरा नहेरुघांडी कोंग्रेस I.N.C.)] और उनके सांस्कृतिक साथीयोंकी गेंगें यह समज़ती है कि गांधीकी फोटो रक्खो रखनेसे आप गांधीजीके समर्थक और उनके मार्ग पर चलनेवाले बन जाते है. आपको गांधीजी के सिद्धांतोको पढने की आवश्यकता नहीं.

गांघीजीके नाम पर कुछ भी करो, केवल हिंसा मत करो, और अपनेको गांधी मार्ग द्वारा  शासन का प्रतिकार करनेवाला मान लो. यदि आपके पास शस्त्र नहीं है और बिना शस्त्र ही प्रतिकार कर रहे है तो आप महात्मा गांधीके उसुलों पर चलने वाले हैं मतलब कि आप गांधीवादी है.

देशके प्रच्छन्न दुश्मन भी यही समज़ते है.

हिंसक शस्त्र मत रक्खो. किन्तु आपके प्रदर्शन क्षेत्रमें यदि कोई अन्य व्यक्ति आता है तो आप लोग अपने बाहुओंका बल प्रयोग करके उनको आनेसे रोक सकते हो. यदि ऐसा करनेमें उसको प्रहार भी हो जाय तो कोई बात नहीं. उसका कारण आप नहीं हो. जिम्मेवार आपके क्षेत्रमें आने वाला व्यक्ति स्वयं है. आपका हेतु उसको प्रहार करनेका नहीं था. आपके मनाकरने पर भी, उस व्यक्तिने  आपके क्षेत्रमें आनेका प्रयत्न किया तो जरा लग गया. आपका उसको हताहत करनेका हेतु तो था ही नहीं. वास्तवमें तो हेतु ही मुख्य होता है न? बात तो यही है न? हम क्या करें?

शाहीन बागके प्रदर्शनकारीयोंको क्या कहा जाय?

लोकशाहीके रक्षक कहा जाय?

अहिंसक मार्ग द्वारा प्रदर्शन करने वाले कहा जाय?

निःशस्त्र क्रांतिकारी प्रदर्शनकारी कहा जाय?

गांधीवादी कहा जाय?

लोकशाहीके रक्षक तो ये लोग नहीं है.

इन प्रदर्शनकारीयोंका विरोध “नया नागरिक नियम”के सामने है.

इन प्रदर्शनकारीयोंका विरोध राष्ट्रीय नागरिक पंजिका (रजीस्टर) बनानेके प्रति है.

इन प्रदर्शन कारीयोंका विरोध राष्ट्रीय जनगणना पंजिका बनानेके प्रति है.

ये प्रदर्शनकारी और कई मूर्धन्य लोग भी मानते है कि प्रदर्शन करना जनताका संविधानीय अधिकार है. और ये सब लोकशाहीके अनुरुप और गांधीवादी है. क्यों कि प्रदर्शनकारीयोंके पास शस्त्र नहीं है इसलिये ये अहिंसक है. अहिंसक है इसलिये ये महात्मा गांधीके सिद्धांतोके अनुरुप है.

इन प्रदर्शन कारीयोंमें महिलाएं भी है, बच्चे भी है. शिशु भी है. क्यों कि इन सबको विरोध करनेका अधिकार है.

इन विरोधीयोंके समर्थक बोलते है कि यह प्रदर्शन दिखाते है कि अब महिलाएं जागृत हो गई हैं. अब महिलायें सक्रिय हो गई हैं, बच्चोंका भी प्रदर्शन करनेका अधिकार है. इन सबकी आप उपेक्षा नहीं कर सकते. ये प्रदर्शन कारीयों के हाथमें भारतीय संविधानकी प्रत है, गांधीजीकी फोटो है, इन प्रदर्शनकारीयोंके हाथमें अपनी मांगोंके पोस्टर भी है. इनसे विशेष आपको क्या चाहिये?

वैसे तो भारतकी उपरोक्त गेंग कई बातें छीपाती है.

ये लोग मोदी-शाहको गोली मारने के भी सूत्रोच्चार करते है, गज़वाहे हिंदके सूत्रोच्चार भी करते है,      

यदि उपरोक्त बात सही है तो हमें कहेना होगा कि ये लोग या तो शठ है या तो अनपढ है. और इनका हेतु कोई और ही है.

निःशस्त्र और सत्याग्रह

निःशस्त्र विरोध और सत्याग्रहमें बडा भेद है. यह भेद न तो यह गेंग समज़ती है, न तो यह गेंग समज़ना चाहती है.

(१) निःशस्त्र विरोधमें जिसके/जिनके प्रति विरोध है उनके प्रति प्रेम नहीं होता है.

(२) निःशस्त्र विरोध हिंसक विरोधकी पूर्व तैयारीके रुपमें होता है. कश्मिरमें १९८९-९०में हिन्दुओंके विरोधमें सूत्रोच्चार किया गया था. जब तक किसी हिन्दु की हत्या नहीं हुई तब तक तो वह विरोध भी अहिंसक ही था. मस्जिदोंसे जो कहा जाता था उससे किसीकी मौत नहीं हुई थी. वे सूत्रोच्चार भी अहिंसक ही थे. वे सब गांधीवादी सत्याग्रही ही तो थे.

(३) सत्याग्रहमें जिनके सामने विरोध हो रहा है उसमें उनको या अन्यको दुःख देना नहीं होता है.

(४) सत्याग्रह जन जागृति के लिये होता है और किसीके साथ भी संवाद के लिये सत्याग्रहीको तयार रहेनेका होता है.

(५) सत्याग्रही प्रदर्शनमें सर्वप्रथम सरकारके साथ संवाद होता है. इसके लिये सरकारको लिखित रुपसे और पारदर्शिता के साथ सूचित किया जाता है. यदि सरकारने संवाद किया और सत्याग्रहीके तर्कपूर्ण चर्चाके मुद्दों पर   यदि सरकार उत्तर नहीं दे पायी, तभी सत्याग्रहका आरंभ सूचित किया जा सकता है.

(६) सत्याग्रह कालके अंतर्गत भी सत्याग्रहीको संवादके लिये तयार रहना अनिवार्य है.

(७) यदि संविधानके अंतर्गत मुद्दा न्यायालयके आधिन होता है तो सत्याग्रह नहीं हो सकता.

(८) जो जनहितमें सक्रिय है उनको संवादमें भाग लेना आवश्यक है.

शाहीन बाग या अन्य क्षेत्रोंमे हो रहे विरोधकी स्थिति क्या है?

(१) प्रदर्शनकारीयोंमे जो औरतें है उनको किसीसे बात करनेकी अनुमति नहीं. क्यों कि जो गेंग, इनका संचालन कर रहा है, उसने या तो इन प्रदर्शनकारीयोंको समस्यासे अवगत नहीं कराया, या गेंग स्वयं नहीं जानती है कि समस्या क्या है? या गेंगको स्वयंमें आत्मविश्वासका अभाव है. वे समस्याको ठीक प्रकारसे समज़े है या तो वे समज़नेके लिये अक्षम है.

(२) प्रदर्शनकारी और उनके पीछे रही संचालक गेंग जरा भी पारदर्शी नहीं है.

(३) प्रदर्शनकारीयोंको और उनके पीछे रही संचालक गेंग को सरकारके प्रति प्रेम नहीं है, वे तो गोली और डंडा मारनेकी भी बातें करते हैं.

(४) प्रदर्शनकारीयोंको और उनके पीछे रही संचालक गेंगको गांधीजीके सत्याग्रह के नियम का प्राथमिक ज्ञान भी नहीं है, इसीलिये न तो वे सरकारको कोई प्रार्थना पत्र देते है न तो समाचार माध्यमके समक्ष अपना पक्ष रखते है.

(५) समस्याके विषयमें एक जनहितकी अर्जी की सुनवाई सर्वोच्च न्यायालयमें है ही, किन्तु ये प्रदर्शनकारीयोंको और उनके संचालक गेंगोंको न्यायालय पर भरोसा नहीं है. उनको केवल प्रदर्शन करना है. न तो इनमें धैर्य है न तो कोई आदर है.

(६) कुछ प्रदर्शनकारी अपना मूँह छीपाके रखते है. इससे यह सिद्ध होता है कि वे अपने कामको अपराधयुक्त मानते है, अपनी अनन्यता (आईडेन्टीटी) गोपित रखना चाहते है ताकि वे न्यायिक दंडसे बच सकें. ऐसा करना भी गांधीजीके सत्याग्रहके नियमके विरुद्ध है. सत्याग्रही को तो कारावासके लिये तयार रहेना चाहिये. और कारावास उसके लिये आत्म-चिंतनका स्थान बनना चाहिये.

(७) इन प्रदर्शनकारीयोंको अन्य लोगोंकी असुविधा और कष्टकी चिंता नहीं. उन्होंने जो आमजनताके मर्गोंका अवैध कब्जा कर रक्खा है और अन्योंके लिये बंद करके रक्खा है यह एक गंभीर अपराध है. दिल्लीकी सरकार जो इसके उपर मौन है यह बात उसकी विफलता है या तो वह समज़ती है कि उसके लिये लाभदायक है. यह पूरी घटना जनतंत्रकी हत्या है.

(८) सी.ए.ए., एन.सी.आर. और एन.पी.आर. इन तीनोंका जनतंत्रमें होना स्वाभाविक है इस मुद्दे पर तो हमने पार्ट-१ में देखा ही है. वास्तवमें प्रदर्शनकारीयोंका कहेना यही निकलता है कि जो मुस्लिम घुसपैठी है उनको खूला समर्थन दो और उनको भी खूली नागरिकता दो. यानी कि, पडौशी देश जो अपने संविधानसे मुस्लिम देश है, और अपने यहां बसे अल्पसंख्यकोंको धर्मके आधार पर प्रताडित करते है और उनकी सुरक्षा नहेरु-लियाकत करार होते हुए भी नहीं करते है और उनको भगा देते है. यदि पडौशी देशद्वारा भगाये गये इन बिन-मुस्लिमोंको भारतकी सरकार नागरिकत्त्व दे तो यह बात हम भारतीय मुस्लिमोंको ग्राह्य नहीं है.

मतलब कि भारत सरकारको यह महेच्छा रखनी नहीं चाहिये कि पाकिस्तान, नहेरु-लियाकत अली करारनामा का पाकिस्तानमें पालन करें.

हाँ एक बात अवश्य जरुरी है कि भारतको तो इस करारनामाका पालन मुस्लिम हितोंके कारण करना ही चाहिये. क्यों कि भारत तो धर्म निरपेक्ष है.

“हो सकता है हमारे पडौशी देशने हमसे करार किया हो कि, वह वहांके अल्पसंख्यकोंके हित और अधिकारोंकी रक्षा करेगा, चाहे वह स्वयं इस्लामिक देश ही क्यों न हो. लेकिन यदि हमारे पडौशी देशने इस करारका पालन नहीं किया. तो क्या हुआ? इस्लामका तो आदेश ही है कि दुश्मनको दगा देना मुसलमानोंका कर्तव्य है.

“यदि भारत सरकार कहेती है कि भारत तो ‘नहेरु-लियाकत अली करार’ जो कि उसकी आत्मा है उसका आदर करते है. इसी लिये हमने सी.ए.ए. बनाया है. लेकिन हम मुस्लिम, और हमारे कई सारे समर्थक मानते है कि ये सब बकवास है.

“कोई भी “करार” (एग्रीमेन्ट) का आदर करना या तो कोई भी न्यायालयके आदेशका पालन करना है तो सर्व प्रथम भारत सरकार को यह देख लेना चाहिये कि इस कानूनसे हमारे पडौशी देशके हमारे मुस्लिम बंधुओंकी ईच्छासे यह विपरित तो नहीं है न ! यदि हमारे पडौशी देशके हमारे मुस्लिम बंधुओंको भारतमें घुसनेके लिये और फिर भारतकी नागरिकता पानेके लिये अन्य प्रावधानोंके अनुसार प्रक्रिया करनी पडती है तो ये तो सरासर अन्याय है.

“हमारे पडौशी देश, यदि अपने संविधानके  विपरित या तो करारके विपरित आचार करें तो भारत भी उन प्रावधानोंका पालन न करें, ऐसा नहीं होना चाहिये. चाहे हमारे उन मुस्लिम पडौशी देशोंके मुस्लिमोंकी ईच्छा भारतको नुकशान करनेवाली हो तो भी हमारी सरकारको पडौशी देशके मुस्लिमोंका खयाल रखना चाहिये.

“भारत सरकारने, जम्मु – कश्मिर राज्यमें  कश्मिरी हिन्दुओंको जो लोकशाही्के आधार पर नागरिक अधिकार दिया. यह सरासर हम मुस्लिमों पर अन्याय है. आपको कश्मिरी हिन्दुओंसे क्या मतलब है?

“हमारा पडौशी देश यदि अपने देशमें धर्मके आधार पर कुछ भी करता है तो वह तो हमारे मुल्लाओंका आदेश है. मुल्ला है तो इस्लाम है. मतलब कि यह तो इस्लामका ही आदेश है.

भारतने पाकिस्तान से आये धर्मके आधार पर पीडित बीन मुस्लिमोंको नागरिक  अधिकार दिया उससे हम मुस्लिम खुश नहीं. क्यों कि भारत सरकारने हमारे पडौशी मुस्लिम देशके मुस्लिमोंको तो नागरिक अधिकार नहीं दिया है. भारत सरकारने  लोकशाहीका खून किया है. हम हमारे पडौशी देशके मुस्लिमोंको भारतकी नागरिकता दिलानेके लिये अपनी जान तक कुरबान कर देंगे. “अभी अभी ही आपने देखा है कि हमने एक शिशुका बलिदान दे दिया है. हम बलिदान देनेमें पीछे नहीं हठेंगे. हमारे धर्मका आदेश है कि इस्लामके लिये जान कुरबान कर देनेसे जन्नत मिलता है. “हम तो मृत्युके बादकी जिंदगीमें विश्वास रखते है. हमें वहा सोलह सोलह हम उम्रकी  हुरें (परीयाँ) मिलेगी. वाह क्या मज़ा आयेगा उस वख्त! अल्लाह बडा कदरदान है.

“अय… बीजेपी वालों और अय … बीजेपीके समर्थकों, अब भी वख्त है. तुम सुधर जाओ. अल्लाह बडा दयावान है. तुम नेक बनो. और हमारी बात सूनो. नहीं तो अल्लाह तुम्हे बक्षेगा नहीं.

“अय!  बीजेपीवालो और अय … बीजेपीके समर्थकों, हमें मालुम है कि तुम सुधरने वाले नहीं है. अल्लाह का यह सब खेल है. वह जिनको दंडित करना चाहता है उनको वह गुमराह करता है. “लेकिन फिर भी हम तुम्हें आगाह करना चाहते है कि तुम सुधर जाओ. ता कि, जब कयामतके दिन अल्लाह हमें पूछे कि अय इमान वाले, तुम भी तो वहां थे … तुमने क्या किया …? क्या तुम्हारा भी कुछ फर्ज था … वह फर्ज़ तुमने मेहसुस नहीं किया… ?

“तब हम भारतके मुस्लिम बडे गर्वसे अल्लाह को कहेंगे अय परवरदिगार, हमने तो अपना फर्ज खूब निभाया था. हमने तो कई बार उनको आगाह किया था कि अब भी वखत है सुधर जाओ … लेकिन क्या करें …

“अय खुदा … तुम हमारा इम्तिहान मत लो.  जब तुमने ही उनको गुमराह करना ठान लिया था… तो तुमसे बढ कर तो हम कैसे हो सकते? या अल्लाह … हम पर रहम कर … हम कुरबानीसे पीछे नहीं हठे. और अय खुदा … हमने तो केवल आपको खुश करने के लिये कश्मिर और अन्यत्र भी इन हिन्दुओंकी कैसी कत्लेआम की थी और आतंक फैलाके उनको उनके ही मुल्कमें बेघर किया था और उनकी औरतोंकी आबरु निलाम की थी … तुमसे कुछ भी छीपा नहीं है…

“ … अय खुदा ! ये सब बातें तो तुम्हें मालुम ही है. ये कोंगी लोगोंने अपने शासनके वख्त कई अपहरणोंका नाटक करके हमारे कई जेहादीयोंको रिहा करवाया था. यही कोंगीयोंने, हिन्दुओंके उपर, हमारा खौफ कायम रखनेके लिये, निर्वासित हिन्दुओंका पुनर्‌वास नहीं किया था. अय खुदा उनको भी तुम खुश रख. वैसे तो उन्होंने कुछ कुरबानियां तो नहीं दी है [सिर्फ लूटमार ही किया है], लेकिन उन्होंने हमे बहूत मदद की है.

“अय खुदा … तुम उनको १६ हुरें तो नहीं दे सकता लेकिन कमसे कम ८ हुरें तो दे ही सकता है. गुस्ताखी माफ. अय खुदा मुज़से गलती हो गई, हमने तो गलतीमें ही कह दिया कि तुम इन कोंगीयोंको १६ हुरे नहीं दे सकता. तुम तो सर्व शक्तिमान हो… तुम्हारे लिये कुछ भी अशक्य नहीं. हमें माफ कर दें. हमने तो सिर्फ हमसे ज्यादा हुरें इन कोंगीयोंको न मिले इस लिये ही तुम्हारा ध्यान खींचा था. ८ हुरोंसे इन कोंगीयोंको कम हुरें भी मत देना क्यों कि ४/५ हुरें तो उनके पास पृथ्वी पर भी थी. ४/५ हुरोंसे यदि उनको कम हुरें मिली तो उनका इस्लामके जन्नतसे विश्वास उठ जायेगा. ये कोंगी लोग बडे चालु है. अय खुदा, तुम्हे क्या कहेना! तुम तो सबकुछ जानते हो. अल्ला हु अकबर.

शिरीष मोहनलाल दवे

चमत्कृतिः

एक कोंगी नेताने मोदीको बडा घुसपैठी कहा. क्यों कि मोदी गुजरातसे दिल्ली आया. मतलब कि गुजरात भारत देशके बाहर है.

एक दुसरे कोंगी नेताने कहा कि मोदी तो गोडसे है. गोडसेने भी गांधीकी हत्या करनेसे पहेले उनको प्रणाम किया था. और मोदीने भी संविधानकी हत्या करनेसे पहेले संसदको प्रणाम किया था.

शिर्ष नेता सोनिया, रा.गा. और प्री.वा.  तो मोदी मौतका सौदागर है, मोदी चोर है इसका नारा ही लगाते और लगवाते है वह भी बच्चोंसे.

Read Full Post »

%d bloggers like this: