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“आगसे खेल” मुल्लायम और उसके सांस्कृतिक साथीयोंका

“आगसे खेल” मुल्लायम और उसके सांस्कृतिक साथीयोंका

यदि कोई जनताको धर्म, जाति और और क्षेत्रके नाम पर विभाजन करें और वॉट मांगे उसको गद्दार ही कहेना पडेगा. अब तो इस बातका समर्थन और आदेश सर्वोच्च न्यायालयने  और चूनाव आयुक्तने भी परोक्ष तरिकेसे कर दिया है.

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मुल्लायम, अखिलेश और उनके साथीयोंने युपीके चूनावमें  बीजेपी के विरुद्ध आंदोलन छेड दिया है. ये लोग बीजेपी के नेतागण चूनाव प्रचारके लिये भी न आवें क्यों कि वे युपीके नहीं हैं. आप समझलो कि ये मुल्लायम, अखिलेश आदि नेता लोग, स्थानिक लोगके अलावा, अन्य भारतीय नागरिकके वाणी स्वातंत्र्यके हक्कको भी युपीमें मान्य नहीं रखना चाहते हैं. उनके लिये युपी-बिहारमें नौकरी देनेकी तो बात ही छोड दो. ये लोग तो क्षेत्रवादमें अन्य राज्योंके क्षेत्रवादसे एक कदम आगे हैं. वे ऐसा प्रचार कर रहे है कि, स्थानिक नेताओंको छोडकर अन्य नेता युपीमें चूनाव प्रचार भी न करें. युपी-बिहारमें तो स्थानिक पक्ष (सिर्फ हिन्दीभाषी) ही होना चाहिये.

१९५७के चूनावमें पराजयसे बचने के लिये कोंग्रेसके नहेरुने मुम्बईमें भाषावाद को जन्म दिया था.

नहेरु है वॉटबेंक सियासत की जड

वॉटबेंककी सियासत करने वालोंमें नहेरुवंशी कोंग्रेसका  प्रथम क्रम है. नहेरु वंशवाद का यह संस्कारकी जड नहेरु ही है.

नहेरुने सर्व प्रथम गुजराती और मराठीको विभाजित करनेवाले उच्चारण किये थे.

नहेरुने कहा कि यदि महाराष्ट्रको मुंबई मिलेगा तो वे स्वयं खुश होंगे.

नहेरुका यह उच्चारण मुंबईके लिये बेवजह था. गुजरातने कभी भी मुंबई पर अपना दावा रक्खा ही नहीं था.  वैसे तो मुंबईको विकसित करनेमें गुजरातीयोंका योगदान अधिकतम था. लेकिन उन्होने कभी मुंबई को गुजरातके लिये मांगा नहीं था और आज भी है.

गुजराती और मराठी लोग हजारों सालोंसे मिलजुल कर रहेते थे.  स्वातंत्र्य पूर्वके कालमें कोंग्रेसकी यह नीति थी कि भाषाके अनुसार राज्योंका पुनर्गठन किया जाय और जैसे प्रादेशिक कोंग्रेस समितियां है उस प्रकारसे राज्य बनाया जाय. इस प्रकार मुंबईकी “मुंबई प्रदेश कोंग्रेस समिति” थी तो मुंबईका अलग राज्य बनें.

लेकिन महाराष्ट्र क्षेत्रमें भाषाके नाम पर एक पक्ष बना. उस समय सौराष्ट्र, कच्छ और मुंबई ईलाका था. मुंबई इलाकेमें राजस्थानका कुछ हिस्सा, गुजरात, महाराष्ट्र था, और कर्नाटकका कुछ हिस्सा आता था. १९५७के चूनावके बाद ऐसी परिस्थिति बनी की महाराष्ट्र क्षेत्रमें नहेरुवीयन कोंग्रेस अल्पमतमें आ गयी. यदि उस समय नहेरु भाषाके आधार पर महाराष्ट्रकी रचना करते तो महाराष्ट्रमें उसकी सत्ता जानेवाली थी. इस लिये नहेरुने द्विभाषी राज्यकी रचना की, जिसमें सौराष्ट्र, कच्छ, गुजरात, मुंबई और महाराष्ट्र मिलाके एक राज्य बनाया और अपना बहुमत बना लिया.

महाराष्ट्रमें विपक्षको तोडके १९६०में गुजरात और महाराष्ट्र अलग अलग राज्य बनाये.

जातिवादका जन्म

डॉ. आंबेडकर तो मार्यादित समयके लिये, और वह भी केवल अछूतोंके लिये ही आरक्षण मांग रहे थे. गांधीजी तो किसी भी प्रकारके आरक्षण के विरुद्ध थे. क्यों कि महात्मा गांधी समज़ते थे कि आरक्षणसे वर्ग विग्रह हो सकता है.

नहेरुने पचासके दशकमें आरक्षण को सामेल किया. अछूत के अतिरिक्त और जातियोंने भी आरक्षणकी  मांग की.

नहेरुवीयन कोंग्रेसको लगा कि विकासके बदले वॉट-बेंक बनानेका यह तरिका अच्छा है. सत्ताका आनंद लो, पैसा बनाओ और सत्ता कायम रखनेके लिये जातियोंके आधार पर जनताको विभाजित करके नीच जातियोंमें ऐसा विश्वास पैदा करो कि एक मात्र कोंग्रेस ही उनका भला कर सकती है.

नहेरुने विदेश और संरक्षण नीतिमें कई मूर्खतापूर्ण काम किये थे, इस लिये उन्होंने अपनी किर्तीको बचाने के लिये इन्दिरा ही अनुगामी बने ऐसी व्यवस्था की. ईन्दिरा भी सहर्ष बडे चावसे अपने वंशीय चरित्रके अनुसार प्रधान मंत्री बनी. लेकिन उसमें वहीवटी क्षमता न होने के कारण १९६७ के चूनावमें नहेरुवीयन कोंग्रेसकी बहुमतमें काफी कमी आयी.

हिन्दु-मुस्लिम के दंगे

जनताको गुमराह करने के लिये इन्दिराने कुछ विवादास्पद कदम उठाये. खास करके साम्यवादीयोंको अहेसास दिलाया की वह समाजवादी है.  वैसे तो जो नीतिमत्तावाला और अपने नामसे जो समाजवादी पक्ष संयुक्त समाजवादी पक्ष (डॉ. राममनोहर लोहियाका) था वह इन्दिराकी ठग विद्याको जानता था. वह इन्दिराकी जालमें फंसा नहीं. इस कारण इन्दिराको लगा की  एक बडे वॉट-बेंककी जरुरत है. इन्दिराके मूख्य प्रतिस्पर्धी मोरारजी देसाई थे. इन्दिराके लिये मोरारजी देसाईको कमजोर करना जरुरी था. इसलिये उसने १९६९में गुजरातमें हिन्दु-मुस्लिम के दंगे करवाये, इस बातको आप नकार नहीं सकते.

नहेरुवीयन कोंग्रेसकी संस्कृतिका असर

वॉट बेंक बनानेकी आदत वाला एक और पक्ष कांशीरामने पैदा किया. सत्ताके लिये यदि ऐसी वॉट बेंक मददरुप होती है तो बीजेपी (जनसंघ)को छोड कर, अपना अपना वॉट बेंक यानी की लघुमति, आदिवासी, अपनी जातिका, अपना क्षेत्र वाद, अपना भाषावाद आदिके आधार पर अन्य पक्ष भी वॉट बेंक बनाने लगे. यह बहूत लंबी बात है और इसी ब्लोग साईट पर अन्यत्र लिखी गयी है.

आज भारतमें, वॉट बेंकका समर्थन करनेमें, भाषा वादवाले  (शिव सेना, एमएनएस, ममता), जातिवाद वाले (लालु, नीतीश, अखिलेश, मुल्लायम, ममता, नहेरुवीयन कोंग्रेस, चरण सिंहका फरजंद अजित सिंह, मायावती, डीएमके, एडीएमके, सीपीआईएम आदि), धर्मवादके नाम पर वॉट बटोरने वाले(मुस्लिम पेंपरींग करनेवाले नेतागण जैसे कि मनमोहन सिंह, सोनिया, उनका फरजंद रा.गा.,  ममता, अकबरुद्दीन ओवैसी, आझम खान,   अखिलेश, मुल्लायम, केज्री, फारुख अब्दुल्ला, उनका फरजंद ओमर,  जूटे हुए हैं.

पीला पत्रकारित्व (यलो जर्नालीझम)

पीला पत्रकारित्व (यलो जर्नालीझम) भी वॉट बेंकोके समर्थनमें है और ऐसे समाचारोंसे आवृत्त समाचार रुपी अग्निको फूंक मार मार कर प्रज्वलित करनेमें जूटा हुआ है. आपने देखा होगा कि, ये पीला पत्रकारित्व, जिसकी राष्ट्रीय योगदानमें कोई प्रोफाईल नहीं और न कोई पार्श्व भूमिका है, ऐसे निम्न कक्षाके, पटेल, जट, यादव, ठाकुर, नक्षलवादी, देशके टूकडे करनेकी बात करने वाले नेताओंके कथनोंको समाचार पत्रोंमें और चेनलों पर बढावा दे रहा है.

भारतमें नहेरुसे लेकर रा.गा. (रा.गा.का पूरा नाम प्रदर्शित करना मैं चाहता नहीं हूं. वह इसके काबिल नहीं है) तकके नहेरुवीयन कोंग्रेसके सभी नेतागण और उसके सांस्कृतिक नेतागणने बिहारके चूनावमें क्षेत्रवादको भी उत्तेजित किया था. इसके परिणाम स्वरुप बिहारमें नरेन्द्र मोदीके विकास वादकी पराजय हूयी. अर्थात्‌ वॉट-बेंक वालोंको बिहारमें भव्य विजय मिली.

क्षेत्रवाद क्या है?

क्षेत्रवादके आधार पर नहेरुवीन कोंग्रेस और एन.सी. पी. की क्रमानुसार स्थापित शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनी है.

“हम भी कुछ कम नहीं” नीतीश-लालु चरित्र

नीतीश कुमारने सत्ता पानेके लिये “बाहरी” और “बिहारी” (स्थानिक), शब्दोंको प्रचलित करके बिहारमें बहुमत हांसिल किया. समाचार माध्यमोंने भी “बाहरी” और “स्थानिक” शब्दोंमें पल रही देशको पायमाल करने वाली वैचारिक अग्निको अनदेखा किया.

यदि क्षेत्रवादकी अग्निको हवा दी जाय तो देश और भी पायमाल हो सकता है.

गुजरातमें क्या हो सकता है?

गुजरातमें सरकारी नौकरीयोंमे खास करके राज्यपत्रित उच्च नौकरीयोंमें बिन-गुजरातीयोंकी बडी भारी संख्या है.

कंपनीयोंमें वॉचमेन, मज़दुर कर्मचारी ज्यादातर बिन-गुजराती होते है, सरकारी कामके और कंपनीयोंके ठेकेदार अधिकतर बिन-गुजराती होते है. और ये बिन-गुजराती ठेकेदार और उनके सामान्य कर्मचारी और श्रमजीवी कर्मचारी गण भारी मात्रामें बिन-गुजराती होते हैं.  शहेरोंमें राजकाम (मेशनरीकाम), रंगकाम, सुतारीकाम, इत्यादि काम करने वाले कारीगर, बिन-गुजराती होते है. और केन्द्र सरकारकी नौकरीयोंमें तो चतुर्थ वर्गमें सिर्फ युपी बिहार वाले ही होते है.  प्रथम वर्गमें भी उनकी संख्या अधिकतम ही होती है. द्वितीय वर्गमें भी वे ठीक ठीक मात्रामें होते हैं.  इतना ही नहीं, हॉकर्स, लारीवाले, अनधिकृत  ज़मीन पर कब्जा जमानेवालोंमे और कबाडीका व्यवसाय करनेवालोंमे, सबमें भी, अधिकतर बिन-गुजराती होते है. चोरी चपाटी, नशीले पदार्थोंके उत्पादन-वितरणके धंधा  उनके हाथमें है. अनधिकृत झोंपड पट्टीयोंमें बिन गुजराती होते हैं.ये सब होते हुए भी गुजरातके सीएम कभी “बाहरी-स्थानिक”का विवाद पैदा नहीं होने देते. उतना ही नहीं लेकिन उनके कानुनी व्यवसायोंकी प्रशंसा करते हुए कहेते है कि गुजरातकी तरक्कीमें,  बिन-गुजरातीयोंके योगदान के लिये गुजरात उनका आभारी है. पीले पत्रकारित्वने कभी भी गुजरातकी इस भावनाकी  कद्र नहीं की. इसके बदले गुजरातीयोंकी निंदा करनेमें अग्रसर रहे. यहां तक कि नीतीशने बिहारकी प्राकृतिक आपदाके समय गुजरातकी आर्थिक मददको नकारा था. बहेतर था कि नीतीश गुजरातमें बसे बिहारीयोंको वापस बुला लेता.

यदि गुजरातमेंसे बिनगुजरातीयोंको नौकरीयोंमेंसे और असामाजिक प्रवृत्ति करनेवाले बिनगुजरातीयोंको निकाला जाय तो गुजरातमें बेकारीकी और गंदकीकी कोई समस्या ही न रहे. इतना ही नहीं भ्रष्टाचार भी ९५% कम हो जाय. गुजरात बिना कुछ किये ही यु.के. के समकक्ष हो जायेगा.

नीतीशलालु और अब मुल्लायम फरजंदका आग फैलाने वाला खेल

नीतीश कुमार और उसके सांस्कृतिक साथीगण को मालुम नहीं है कि गुजरातकी जनता वास्तवमें यदि चाहे तो नीतीशकुमारके जैसा “बाहरी और बिहारी” संस्कार अपनाके बिहारीयोंको और युपीवालोंको निकालके युपी और बिहारको बेहाल कर सकता है.

यदि समाचार माध्यम वास्तव में तटस्थ होते तो नीतीशकुमारके “बाहरी – बिहारी” प्राचारमें छीपा क्षेत्रवाद को उछाल कर, बीजेपीके विकासवादको पुरस्कृत कर सकता था. लेकिन समाचार माध्यमोंको बीजेपीका विकासवाद पसंद ही नहीं था. उनको तो “जैसे थे” वाद पसंद था. ताकि, वे नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंकी तरह, और उनके सांस्कृतिक साथीयोंकी तरह, पैसे बना सके. इसलिये उन्होंने बिहारको असामाजिक तत्वोंके भरोसे छोड दिया.

अन्य राज्योंमे बिन-स्थानिकोंका नौकरीयोंमें क्या हाल है?

बेंगालमें आपको राज्यकी नौकरीयोंमें बिन-बंगाली मिलेगा ही नहीं.

युपी-बिहारमें थोडे बंगाली मिलेंगे क्योंकि वे वहां सदीयोंसे रहेते है.

कश्मिरमें तो काश्मिरी हिन्दु मात्रको मारके निकाल दिया है.

पूर्वोत्तर राज्योंमें बिन-स्थानिकोंके प्रति अत्याचार होते है. आसाममें  नब्बेके दशकमें सरकारी दफ्तरोंके एकाउन्ट ओफीसरोंको, आतंकवादीयोंको मासिक हप्ता देना पडता था. नागालेन्ड, त्रीपुरामें भी यही हाल था. मेघालयमें बिहारीयोंका, बंगालीयोंका और मारवाडीयोंका आतंकवादीयों द्वारा गला काट दिया जाता था.

केराला, तामीलनाडु और हैदराबादमें तो आप बिना उनकी भाषा जाने कुछ नहीं कर सकते. बिन-स्थानिकोंको नौकरी देना  वहांके लोगोंके सोचसे बाहर है. कर्नाटकमें आई.टी. सेक्टरको छोडके ज्यादातर ऐसा ही हाल है.

मुंबईमें बिन-मराठीयोंका क्या हाल है?

मुंबईका तो विकास ही गुजरातीयोंने किया है. मुंबईमें गुजराती लोग स्थानिक लोगोंको नौकरीयां देते है. नौकरीयोंमे अपना हिस्सा मांगने के बदले गुजराती लोग स्थानिकोंके लिये बहुत सारी नौकरीयां पैदा करते हैं. इसके बावजुद भी राज्यसरकारकी नौकरीयोंमें गुजरातीयोंका प्रमाण नहींवत है. नब्बेके दशकमें मैंने देखा था कि, ओमानकी मीनीस्ट्री ऑफ टेलीकोम्युनीकेशनमें जितने गुजराती कर्मचारी थे उससे कम, मुंबईके प्रभादेवीके संचार भवनमें गुजराती कर्मचारी थे. मराठी लोगोंकी गुजरातीयोंके प्रति खास कोई शिकायत नहीं है इसके बावजुद भी यह हाल है..

मुंबईमें शिवसेना और एमएन एस है. उनके नेता उत्तर भारतीयोंके प्रति धिक्कार युक्त भावना फैलाते है. और उनके उपर कभी कभी आक्रमक भी बनते है.

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चूनाव आयुक्त को मुल्लायम, अखिलेश, नहेरुवीयन कोंग्रेसको सबक सिखाना चाहिये. युपीकी जनताको भी समझना चाहिये कि मुल्लायम, अखिलेश, और उसके साथ सांस्कृतिक दुर्गुणोंसे जुडे नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंके विरुद्ध चूनाव आयुक्तसे शिकायत करें. भारतमें यह आगका खेल पूरे देशको जला सकता है.

स्वातंत्र्यके संग्राममें हरेक नेता “देशका नेता” माना जाता था. लेकिन अब छह दशकोंके नहेरुवीयन शासनने ऐसी परिस्थिति बनायी है कि नीतीश, लालु, मुल्लायम, अखिलेश, ममता, माया, फारुख, ओमर, करुणा आदि सब क्षेत्रवादकी नीति खेलते हैं.  

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः आगसे खेल, मुल्लायम और उनके सांस्कृतिक साथी, नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके सांस्कृतिक साथी, सर्वोच्च

न्यायालय, चूनाव आयुक्त, १९५७के चूनाव, नहेरु, मुंबईमें भाषावाद, वॉटबेंक सियासत, नहेरुका वंशवाद, विभाजित,

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जो भय था वह वास्तविकता बना (बिहारका परिणाम) – 1

क्या  यह सत्य और श्रेयकी जित है?

नहीं. यह सत्यकी जित नहीं है.

सत्य और श्रेय है वह जनताके बहुमतसे सिद्ध नहीं होता है.

हम जिन चूनावी प्रक्रियाओंके आधार पर जनताका अभिप्राय प्राप्त कर रहे है वह हमेशा सत्य को पुरस्कृत नहीं करता.

बहुमत, सत्यका आधार नहीं बन सकता. बिहारकी जनताने जिस गठबंधनको जित दिलाई, इससे यह सिद्ध नहीं होता है कि सत्य, उस गठबंधनके पक्षमें था जो जिता था.

सत्य किसके पक्षमें था?

सत्य बीजेपीके पक्षमें था.

सत्य किसको कहेते हैं?

यहां पर सत्यका अर्थ है,

() ऐसा कोनसा पक्ष है कि जिसके पास भारतकी समस्याओंकी अधिक जानकारी है?

() ऐसा कौनसा पक्ष है जो इस समस्याओंका समाधान सुचारु रुपसे कर सकता है?

() ऐसा कौनसा पक्ष है जिसके पास आर्षदृष्टि है?

() ऐसा कौनसा पक्ष है जिसके पास अपनी कार्यसूचि है और उसके उपर प्रतिबद्ध है?

() ऐसा कौनसा पक्ष है जिसके पास अपनी कार्यसूचिकी प्रणाली भी सुनिश्चित है?

() ऐस कौनसा पक्ष है जो अधिक नीतिवान है?

() ऐसा कौनसा पक्ष है जिसके पास व्यापक संगठन है?

() ऐसा कौनसा पक्ष है जिसके लियेप्रामिकता भारतका हितहै?

 

श्रेय पक्ष बीजेपी ही है

ऐसा पक्ष केवल और केवल बीजेपी ही है जिसके नेता नरेन्द्र मोदी है. इसके उपर यदि किसीको संदेह हो तो इसकी चर्चा हो सकती है. इससे यदि कोई श्रेयतर नेता है तो बताओ.

नीतिओंकी स्पष्टता, आर्षदृष्टि और नीतिमत्ता इनका अभाव, वह जेडीयु है.

हम आरजेडी, नहेरुवीयन कोंग्रेस, एस पी, एनसीपी, आदिकी बातें नहीं करेंगे. इन सबके काले करतूत इतिहासके पन्नोंपर पर विद्यमान है. वे सभी पक्ष, एक दुसरेके अवलंबनके लिये विवश है. ये सभी राजकीय समीकरणों के आधार पर बनाई गई चूनावी गेमके से जिन्दा है. आवश्यकता होने पर एक होते है और आवश्यकता यदि हो तो एक दुसरेके दुश्मन बनते हैं.

बीजेपी भी ऐसे गठबंधनके लिये विवश बनता है. जैसे कि बीजेपी, शिवसेना, एमएनएस, एल जे पी, डी.एम.के. या .डी.एम. के साथ गठबंधन करती है. किन्तु बीजेपीने कभी भ्रष्टाचार के साथ समझौता नहीं किया.

यह बात सही है कि, कोई विस्तारमें अपने अस्तित्वको बनानेके लिये बीजेपीने ऐसे प्रादेशिक संकुचित मानसिकता वाले पक्षोंसे समझौता किया है. यदि प्रमाणभान की प्रज्ञासे देखा जाय तो बीजेपी की मात्रा अन्य पक्षोंकी तरह असीम नहीं है.

जेडीयुने आरजेडी और नहेरुवीयन कोंग्रेससे गठबंधन किया. ये दोनों पक्ष एक समय उसके सैधांतिक आधार पर दुश्मन नंबर एक थे.

नहेरुवीयन कोंग्रेस तो एक स्वकेन्द्री, वंशवादी और देशकी जनताको विभाजित करने वाला सरमुखत्यार शाहीमें मानने वाला पक्ष है. इसके पास स्वकेन्द्रीय सत्ता प्राप्त करनेके अतिरिक्त, कोई अन्य कार्य सूचि नहीं है. इसने ही उच्च न्यायालयकी अवमानना करके जनतंत्रको नष्ट भ्रष्ट करदिया था. महात्मा गांधीके निकटके साथीयों तकको इसने बिना कोई अपराध और बिना कोई न्यायिक प्रक्रिया, कारवासमें अनियतकाल के लिये बंद किया था और मरणासन्न किया था. ये सब बातें एततकालिन इतिहासके पन्नों पर विद्यमान है. तो भी जेडीयुने इस कोंग्रेसके साथ गठबंधन किया. इससे जेडीयुकी मानसिकताका दर्श्न होता है. आरजेडी नेता भी १९७७में जनता पक्षके सदस्य थे और उन्होंने नहेरुवीयन कोंग्रेसको नष्ट करनेका प्रण लिया था. जब जनता पक्ष तूट गया और जनता दल भी तूटा, तो लालु यादवने अपने लिये एक वंशवादी पक्ष बना लिया. इसने केवल सत्ताके लिये ही नहेरुवीयन कोंग्रेसके साथ गठबंधन किया. लालु यादव अपने कौभांडोके कारण कारावाससे बचने के लिये ये सब करते रहे. उनके  शासनकोजंगल राजका प्रमाणपत्र नीतीशकुमार स्वयंने दिया था.

ये तीनोंने मिलके बिहार पर कमसेकम ४० वर्ष राज किया है. तो भी ये पक्ष बिहारका विकास नहीं करपाये. ये सब बिहारको पछात राज्यकी कक्षा की मान्यता मिले ऐसी वार्ताएं करते रहे. तदुपरांत समाजकी विभीन्न जातियोंके लिये शिक्षा और नौकरीमें आरक्षण मिलता ही रहे ऐसी प्रतिक्रिया भी प्रदर्शित करते रहे.

इन तीनों पक्षकी अपेक्षा बीजेपीका व्यवहार व्यवस्थित रहा है. इसलिये बीजेपी की विजय चूनावमें होना अपेक्षित था और श्रेय भी था.

किन्तु बीजेपी और उसके साथी पक्ष बिहार चूनावमें पराजित हुए

बीजेपी एक ऐसा पक्ष है जो भारतकी ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर पर गर्व रखता है. उसका स्वदेशीमें विश्वास है. स्वदेशी उत्पादनमें मानता है और स्वदेशी भाषाओं उपर गर्व रखता है. विदेशीओं द्वारा लिखित आधारहीन भारतीय इतिहासमें वह विश्वास नहीं रखता है. तद उपरांत वह परशुराम, राम, कृष्ण आदि पौराणिक या महाकाव्यके पात्रोंको ऐतिहासिक मानता है.

बीजेपी और खास करके नरेन्द्र मोदी मानते है कि सभी समस्याओंका मूल, शिक्षाका अभाव और कामका अभाव है. इसलिये दो प्राथमिकता बननी चाहिये. एक है, शिक्षासे कौशल्य, और दुसरा है भूमिगत संरचना यानी कि, उर्जा, मार्ग, परिवहन, जल संचय, जलवितरण आदिके विकाससे उत्पादनमें वृद्धि. इस प्रकार विकास करनेसे हर समस्याका निवारण हो जायेगा चाहे वह जातिगत हो या आर्थिक हो.

नरेन्द्र मोदीके पास इन सबकी दृष्टिके उपरांत विदेशी संबंधोंके बारेमें और सुरक्षा संबंधित प्रश्नों के बारेमें सुनिश्चित आयोजन है. उत्पादन, कार्य, और प्रबंध के विषयमें नरेन्द्र मोदीके पास निर्धारित और सुनिश्चित प्रणालीयोंका आयोजन है. बीजेपी एक मात्र ऐसा पक्ष है जिसके पास नरेन्द्र मोदी जैसा एक मात्र नेता है जो बिना थके निस्वार्थ भावसे १८ घंटा काम करता है. सुभासचंद्र बोस, दयानंद सरस्वती, विवेकानन्द, महात्मा गांधी और सरदार पटेलके बाद केवल नरेन्द्र मोदी ही एक मात्र नेता भारतको उपलब्ध हुआ है जो अन्य सबसे एक हजार मिल आगे है.

बीजेपीकी पराजयको वक्र दृष्टिसे मुल्यांकन करनेवाले स्वार्थ परायण दल समूहः

जो महाठगबंधनवाले पक्ष थे उनका हित तो स्वयंका विजय पाना हो यह बात तो स्वाभाविक है. किन्तु जो विद्वज्जन अपनेको तटस्थ मानते है और जो दृष्य श्राव्य और वाच्य समाचार माध्यम है उनको चाहिये था कि वे केवल समाचार ही दें, और अपनी तरफसे तारतम्य वाली समाचार शिर्ष पंक्तियां बनावें. जो मूर्धन्य लोग समाचार माध्यममें या तो एंकर है या कोलमीस्ट (कटार लेखक) है वे तर्कबद्धतासे और प्रमाणभानकी प्रज्ञाका उपयोग करके समाचारोंका विश्लेषण करें और मूल्यांकन करनेमें मापदंड भी समान ही रखें.

समाचार माध्यमों द्वारा कौनसी बातें उछाली गई?

बीजेपी नेतागणसे संबंधितः

() शेतानको लालुजीकी जीभ पर बैठने का एड्रेस किसने दिया?

() ‘   ‘-वाले शर्म करो. पहेले अपना ४० सालका हिसाब बताओ.

() मैं क्या बाहरी हुं. मैं क्या पाकिस्तानका प्रधान मंत्री हुं …. …. ?

() अनामत पर पुनर्विचारणा होनी चाहिये

() मैं स्वयं पीछडी जातिका हुं और मुझपर क्या गुजरी है वह मैं जानता हुं..

() लालुजी किस कारणसे चूनावमें प्रत्याशी नहीं बने, इसका कारण तो बताओ लालुजी,

() यदि एनडीए की पराजय हुई तो पटाखे पाकिस्तानमें फूटेंगे

() यह महागठबंधन एक स्वार्थबंधन है. डीएनए चेक करना चाहियेये तीनों पक्षके नेता एक मंच पर क्यों नहीं सकते हैं?

(१०) नीतीश कुमारने जनतंत्रमें मंत्र तंत्रका आश्रय लिया है. यह वीडीयो क्लीप सोसीयल मीडीया पर बहुत चली.

(११) जिनको गोमांस खाना हो वे पाकिस्तान चले जाय.

(१२) यदि यहां गोमांस खाया तो मैं गला काट दूंगा.

महागठबंधन के उच्चारणः

() नीतीशकुमारने २००२ के गुजरातके दंगोंका उल्लेख किया

() बिहारीयोंको बाहरी चाहिये कि बिहारी?

() काला धनके डेढलाख हमारे एकाउन्टमें अभीतक जमा क्यों नहीं हुए,

() मांस खाने वाले असंस्कारी होते है, ऐसा जब मैंने कहा तब मेरी जबानपर शेतान बैठा था.

() गौमांस तो हिन्दु भी खाते है.

() मांस तो मांस ही है चाहे वह गायका हो, घोडेका हो या कुत्तेका हो.

() मुझे शेतान कहा,

() अमित शाह नरभक्षी है, वह नरपिशाच है,

() बीजेपीवालोंने काला जादु करके मुझ पर फैन गिराया. मैं काला जादु जानता हुं औरकाला कबुतरमीर्च मसाले मंत्र पढके उसको भगाउंगा.

(१०) देखो यह फोटो जिसमें नरेन्द्र मोदी अपना हाथ ज्योतीषीको दिखाते है.    

नरेन्द्र मोदीका चूनाव मंत्रविकासथा. लेकिन महागठबंधनके नेता हमेशा जातिवादकी बातें करते थे और आरएसएसके एक नेताने कहा कि अनामतपर पुनर्विचारणा होना चाहिये. यह सुनकर महागठबंधनके नेताओंमे लड्डु फूटने लगे. वैसे भी उनका गठबंधनजातिवादके आधार पर ही हुआ था. और विकासके आधार पर प्रचार करना उनके लिये कठिन था. क्यों कि बिहारके कई विस्तारोमें, मकान, पानी, मार्ग, बीजली और शिक्षासंस्थाओंकी सुविधाएं नहीं है. उद्योग भी इसके कारण अल्प मात्रामें है. बीजेपीको कोमवाद परस्त कह्ना और कोमवादका मुद्दा उठाना यह तो वैसे भी फैशन है.

दाद्रीनामके एक देहातमें जो हुआ, चूं कि वह हिन्दुओंने किया था, ये सब इस बात पर तूट पडे. और उसको गौमांसके साथ, नागरिक स्वतंत्रता और हिन्दुओंकी असहिष्णुता के साथ जोड दिया. इस बातको जिस सीमातक ले गये इससे ऐसा लगता है कि यह एक सोची समझी व्यूहरचना थी जिसको नकारा नही जा सकता.

सियासती महानुभावोंका एवोर्ड वापसीका सीलसीला

इस घटनाको लेके बीजेपीआरएसएस विरोधी और नहेरुवीयन कोंग्रेस परस्त, अभिनेता, कवि, लेखक, विवेचक, समाजसेवी, आदि तथा कथित महानुभावोंने, सरकार तरफसे दिये गये पुरस्कार एक के बाद एक ऐसा करके लौटाने लगे, ताकि, समाचार माध्यम, चूनावप्रचार अंतर्गत समयमें पूरा वातावरण बीजेपीआरएसएस की असहिष्णुताके विरोधमें बना हुआ रख सके.

यदि इस घटनापर विश्लेषण किया जाय तो भूतकालमें ऐसी ही नहीं किन्तु इससे हजारों लाखों दफा बडी कई मानव हनन और मानव अधिकार हननकी घटनाएं घटी तो भी इन महानुभावोंकी संवेदनशीलताको जरासी भी हानि नहीं पहोंची. ये लोग नींभर और संवेदनहीन रहे.

नहेरुकी नीतिके कारण और भारतीय सीमाको असुरक्षित रखनेसे और हमारे जवानोंको शस्त्रोंसज्ज करनेके कारण १९६२में हजारों जवानोंको बेमौत शहीद होना पडा. तो भी इन महानुभावोंकी संवेदनशीलताको जरासी भी हानि नहीं पहोंची. ये लोग नींभर और संवेदनहीन रहे.

१९७२में सिमला समझौता अंतर्गत इन्दिरा गांधीने भारतकी जितको पराजयमें परिवर्तित करके हजारों शहीदोंके बलिदानोंपर पानी फेर दिया. तो भी इन महानुभावोंकी संवेदनशीलताको जरासी भी हानि नहीं पहोंची. ये लोग नींभर और संवेदनहीन रहे.

१९७५१९७६ मे आपतकाल घोषित करके विरोधी आवाजको बंध करने के लिये ६००००+ लोगोंको कारावासमें अनियत कालके लिये बंद कर दिया. समाचार माध्यमों पर सेन्सरशीप डाल दी. तो भी इन महानुभावोंकी संवेदनशीलताको जरासी भी हानि नहीं पहोंची. ये लोग नींभर और संवेदनहीन रहे.

इन्दिराने युनीयन कार्बाईडसे क्षतियुक्त डील किया और भोपालगेस दुर्घटना हुई और सेंकडो मौत हुई और हजारों लोग, शरीरसे स्थायी रुपसे अपंग हुए. इन गेसकांड पीडितोंको, क्षतियुक्त डील के कारण मुआवझा नही मिला. तो भी इन महानुभावोंकी संवेदनशीलताको जरासी भी हानि नहीं पहोंची. ये लोग नींभर और संवेदनहीन रहे.

इस घटनाके दोषी एन्डरशनको अर्जुनसिंह और राजीवगांधीने भगा दिया. तो भी इन महानुभावोंकी संवेदनशीलताको जरासी भी हानि नहीं पहोंची. ये लोग नींभर और संवेदनहीन रहे.

इन्दिरा गांधीने, खालिस्तानी आतंकवादी भींदराणवालेको संत घोषित करके उसको बढावा दिया, इससे खालिस्तानी आतंकवाद और सीमापारके आतंकवादको बढावा मिला. इसी कुकर्मके कारण इन्दिराकी हत्या हुई. इस नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंने हजारों निर्दोष शिखोंका कत्लेआम किया. तो भी इन महानुभावोंकी संवेदनशीलताको जरासी भी हानि नहीं पहोंची. ये लोग नींभर और संवेदनहीन रहे.

सीमापारका आतंकवाद कश्मिरमें बढने लगा और जो हिन्दु कश्मिरमें १५% थे उनके उपर अत्याचार होने लगे और हिन्दु जनसंख्या १९८९ तक % हो यी. तब तो भी इन महानुभावोंकी संवेदनशीलताको जरासी भी हानि नहीं पहोंची. ये लोग नींभर और संवेदनहीन रहे.

१९९०में खुले आम, वर्तमान पत्रोंमें इस्तिहार देके, मस्जिदोंमेंसे लाऊडस्पीकर द्वारा घोषणा करवाके, दिवारों पर पोस्टरों लगाके,  हिन्दुओंको चेतावनी दी, कि निश्चित दिनांकके अंतर्गत या तो इस्लाम कबुल करो या कश्मिर छोड दो. यदि यह स्विकार्य नहीं है तो मौत के लिये तयार रहो. ६०००+ हिन्दुओंका कत्लेआम हुआ. ५००००० हिन्दुओंको अपना घर और राज्य छोडने पर विवश किया जो आज २५ सालके बाद भी, वे या तो तंबुमें रहेते है या खोलीमें रहेते है. १९९० पहेले भी नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनका साथी “एन. एफ” कश्मिर में राज करते थे, और १९९०के बाद नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके साथी पक्षोंने १५ साल राज किया तो भी नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनके साथी पक्षोंके कानोंमें जू तक नहीं रेंगी. इन शासकोंने कश्मिरी हिन्दुओंके मानव अधिकारोंके सतत होते हुए हननके विषयमें केवल उपेक्षा की. तो भी इन महानुभावोंकी संवेदनशीलताको जरासी भी हानि नहीं पहोंची. ये लोग नींभर और संवेदनहीन रहे.

और अब देखो यहां क्या हुआ? दाद्री देहातमें एक गरीब मुस्लिमकी हत्या हुई. युपी जो नहेरुवीयन कोंग्रेसके साथी पक्ष द्वारा शासित राज्य है तो उत्तर दायित्वतो उसका ही बनता है, किन्तु इन सियासती महानुभावोंने इस घटनाका उत्तर दायित्व बीजेपी केन्द्रकी बीजेपी सरकार पर डाल दिया. चूं कि मृत व्यक्ति मुस्लिम था और चूं कि मारने वाले हिन्दु थे. यदि मारने वाले हिन्दु है तो बीजेपी को  उत्तरदायी बता दो. क्या इसमें कोई तर्क है? यहा क्या बुद्धिगम्य है?

वास्तवमें महानुभावोंका तारतम्य और प्रतिभाव निरपेक्ष रुपसे एक प्रपंच है और निरपेक्ष रुपसे कोमवादको उकसाना है. ये सभी महानुभाव को कोमवाद फैलाने के आरोप पर न्यायिक कार्यवाही करनी चाहिये. और उनको कारावास में रखना चाहिये.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्ज़ः बिहार चूनाव, प्रक्रिया, परिणाम, बीजेपी, जय प्रकाश नारायण, भारतीय संविधान, बहुमत, सत्यका आधार, श्रेय, नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, आर्षदृष्टा, नीतिवान, प्राथमिकता भारतका हित, कुशल, ठगबंधन, गठबंधन, आरजेडी, लालु, जंगल राज, जेडीयु, नीतीश, नहेरुवीयन कोंग्रेस, नहेरु, इन्दिरा, वंशवादी, स्वकेन्दी, सत्ता, जवान, शहीदी, दाद्री, नहेरुवीयन कोंग्रेसका साथी पक्ष, महानुभाव, एवोर्ड वापसी, सियासत, परस्त, संवेदनहीन , नींभर, कश्मिर, हिन्दु, शिख, भीन्दरानवाले, खालिस्तान, आतंकवाद, कत्लेआम, हिन्दुओंको चेतावनी

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नहेरुवीयन कोंग्रेसके शासनकी परिभाषा है आतंकवाद और हत्याओंकी शृंखला

IMPOSITION OF EMERGENCY

साभार आर के लक्ष्मणका कटाक्ष चित्र

जून मास वैसे तो नहेरुवीयनोंकी और उनके पक्षकी निम्नस्तरीय और आततायी मानसिकताको याद करनेका समय है. सन्१९७५में नहेरुवीयन कोंग्रेसकी यह मानसिकता नग्न बनकर प्रत्यक्ष आयी. २५मार्च का दिन भारतके इतिहाससे, नष्ट होनेवाली कालीमाका जन्म दिन है. नहेरुवीयन कोंग्रेसके काले करतूतोंकी  जितनी ही भर्त्सना करो, कम ही है. यह कलंक एक वज्रलेप है.

आपातकाल १९९५ से १९७७.

आप कहोगे कि यह तो भूतकालकी वार्ता है. आज इसका क्या संदर्भ है? आज इसका क्या प्रास्तुत्य है?

इसका उत्तर है

यह नहेरुवीयन कोंग्रेस आज भी जीवित है. वह प्रभावशाली है. उसके पास अकल्पनीय मात्रामें धन है. अधिकतर समाचार माध्यम उसके पक्षमें है. इस पक्षकी और इस पक्षके नेताओंकी मानसिकतामें कोई गुणात्मक परिवर्तन नहीं आया है. याद करो. १९७७में हार कर यही नहेरुवीयन कोंग्रेस सत्ता पर आयी थी.  

कलंकोसे भरपूर नहेरु शासनः

१९६२ के युद्ध में हुई भारतकी घोर पराजयके कारण, नहेरुने मन बना लिया था. स्वयंके सिंहासन रक्षा तो उन्होंने करली. किन्तु वह पर्याप्त नहीं है.

नहेरुने अपने १९४७से १९६२के कार्यकालमें अनेकानेक कलंकात्मक कार्य किये थे. इतिहास उसको क्षमा करनेवाला नहीं था.

कौभाण्डोंकी यदि उपेक्षा करें, तो भी, ऐसी कई घटनाएं भूगर्भमें थी कि जिनसे, नहेरुका नाम निरपेक्षतासे लज्जास्पदोंकी सूचीमें आजाना निश्चित था.

सुभाषविवाद, चीनकी विस्तारवादी नीति, सीमा सुरक्षाकी उपेक्षा, सीमा सुरक्षा सैनिको सुसज्ज करनेके विषयोंकी  अवहेलना, व्यंढ समाजादवाद, दंभी धर्म निरपेक्षता और स्वकेन्द्री नीति के कारण नहेरुको अपयश मिलनेवाला था.

नहेरुने क्या विचारा?

यदि कुछ दशकों पर्यंत उसकी संतान इन्दिरा गांधी प्रधानमंत्री बन जाय, तो नहेरुके काले कारनामों पर पर्दा पड सकता था. इस हेतुसे नहेरुने चीनके आक्रमण के पश्चात अपने पक्षके प्रतिस्पर्धीयोंको सत्तासे विमुख रखनेकी व्यूह रचाना बनायी. कुछजैसे थे वादीयोंका मंडल नहेरुने बनाया. नहेरुने उनको समझाया. नहेरुने अपनी मृत्यु शैयासे इन जैसे थे वादीयोंसे वचन लिया कि वे इन्दिराको ही प्रधान मंत्री बनायेंगे. येजैसे थे वादीयोंकासमूहसीन्डीकेटनामसे ख्यात था.

नहेरुवीयन फरजंद, जो बिना किसी योग्यता, केवल नहेरुकी फरजंद होनेके नाते, “जैसे थे वादीयोंकी कृपासे १९६६में प्रधान मंत्री बन गयी थी. उस समय कई सारे वरिष्ठ और कार्य कुशल नेता थे. वे प्रधान मंत्री पदके लिये योग्य भी थे और उत्सुक भी थे. इनमें गुलजारीलाल नंदा और मोरारजी देसाई मुख्य थे.

समाचार माध्यम को नहेरु पसंद थे. क्यों कि स्वातंत्र्य संग्राममें वे एक प्रमुखवस्त्र परिधान और प्रदर्शन शैलीके  युवामूर्ति” (आईकोन) थे. समृद्ध व्यक्तियोंको आम कोंगी नेताओंकी सादगीवाली मानसिकता स्विकृत नहीं थी. समाचार माध्यमने नहेरुकी सभी क्षतियां गोपित रक्खी थी. समाचार माध्यम, नहेरुके लिये, शाश्वतअहो रुपं अहो ध्वनिकिया करता था, जैसे कि आज सोनिया और राहुलकी प्रशंसा किया करता है.

इन्दिरा गांधी एक सामान्य कक्षाकी औरत थी.

इन्दिरा गांधीको सत्ता मिल गई. उसको सहायकगण भी मिल या. इनमें साम्यवादी और कुछ नीतिभ्रष्ट युवा भी थे. नहेरुवीयनोंका गुरु था रुस. गुरु साम्यवादी था. साम्यवादी नेता कपट नीतिमें निपूण होते है. विरोधीयोंमें भेद कैसे उत्पन्न करना, अफवाह कैसे प्रसारित करना, जनसमुदायको विचारोंसे पथभ्रष्ट कैसे करना, निर्धनोंको निर्धन ही कैसे रखना, गुप्तचरोंसे विरोधीयोंके विषयमें कैसे विवाद उत्पन्न करना इन सर्व परिबलोंका उपयोग कैसे करना इस विषय पर रुस, नहेरुवीयनोंको पर्याप्त सहयोग करता रहा.

किन्तु रुसको भारतकी जन संस्कृतिका परिपूर्ण ज्ञान नहीं हो सकता था. इस लिये १९७३ के पश्चातकालमें इन्दिराको सर्व क्षेत्रीय विफलता मिलने लगी. वह अपने पिताकी तरह आपखुद भी थी. दोनों संसदोंमे निरपेक्ष बहुमत और अधिकतम राज्योंमें अपने खुदने प्रस्थापित मुख्य मंत्री होते हुए भी, इन्दिराको सर्वक्षेत्रीय विफलता मिलीसर्व क्षेत्रीय विफलताके कारण समाचार माध्यम उसके हाथसे जा सकते थे. इसका प्रारंभ हो गया था. जन आंदोलनका भी प्रारंभ हो गया था. नियमका शासन मृतप्राय हो रहा था. यदि इन्दिराके हाथसे सत्ता गई तो नहेरुवीयन कोंग्रेसकी मृत्यु निश्चित थी. तीन कार्य अतिआवश्यक थे. विरोधीयोंकी प्रवृत्तियों पर संपूर्ण प्रतिबंध, समाचार माध्यम पर संपूर्ण नियंत्रण और धनप्राप्ति.

भारतके संविधानमें आपात्कालका प्रावधान कैसे हुआ था?

१८५७के जनविद्रोहको असफल करने के पश्चात अंग्रेज शासनने भारतकी आपराधिक संहितामें संशोधन किया. नागरिक अधिकारोंको स्थगित करना और उस अंतर्गत न्यायिक प्रक्रियाको निलंबित करना. इस प्रकार अंग्रेज शासनने, भारतमें आपातकाल घोषित करनेका प्रावधान रक्खा था.

आपातकालमें ऐसे प्रावधानोंसे क्या क्या हो सकता था?

भारतके मानव अधिकारोंको विलंबित किया जा सकता था.

शासन, किसी भी व्यक्तिको गिरफ्तार कर सकती थी.

गिरफ्तार करनेके समय और बादमें भी, गिरफ्तार करनेका आधार बताना आवश्यक नहीं है.

गिरफ्तार व्यक्तिको सरकार अनियतकाल पर्यंत कारावासमें रख सकती है.

गिरफ्तार की हुई व्यक्तिपर न्यायिक कार्यवाही करना अनिवार्य नहीं है.

व्यक्तियोंके संविधानीय अधिकारोंको विलंबित किया जाता है. तात्पर्य यह है कि कोई समूह बना नहीं सकते, चर्चा नहीं कर सकते. प्रवचन नहीं कर सकते. यदि ऐसा करना है तो शासनसे अनुमति लेनी पडेगी. शासन अपना प्रतिनिधि भेजेगा और उसकी उपस्थितिमें संवाद हो सकेगा.

समाचार माध्यम शासनके विरुद्ध नहीं लिख सकते, यत्किंचित भी करना है उसके लिये शासनकी अनुमति लेना अनिवार्य था.

इन्दिराने गणतंत्रकी हत्या क्यों कि?

१२ जुन १९७५ को नहेरुवीयन कोंग्रेसकी लज्जास्पद पराजय हुई. यह वही नहेरुवीयन कोंग्रेसथी जिसके पास ३ साल पहेले किये गये चूनावमें १८३ मेंसे १४० बैठकें जित गयी थीं.

१३ जुनको ईलाहाबाद उच्च न्यायालयने ईन्दिरा गांधीका चूनाव रद किया. इतना ही नहीं उसको संसद सदस्यके पदके लिये सालके लिये अयोग्य घोषित किया. यदि वह संसद सदस्यता के लिये भी योग्य नहीं रही, तो प्रधान मंत्री पदके लिये भी अयोग्य बन जाती है.

१८ जुनको गुजरातमें जनता मोरचा की सरकार बनी.

बिहारने नारा दिया “गुजरातकी जित हमारी है अब बिहारकी बारी है.

देशव्यापी आंदोलन होने वाला था.

इन्दिरा गांधीने आंतरिक आपातकाल घोषित किया.

नहेरु भी ऐसी परिस्थितिमें ऐसा ही करते. किन्तु वह स्थिति आनेसे पहेले वे चल बसे.

किन्तु आपातकाल की वार्ता करनेसे पहेले हम इस कथांशको अधिगत कर कि, नहेरु इस प्रकार प्रधान मंत्री बने थे?

जब भारतका स्वातंत्र्य निश्चित हुआ तो प्रधान मंत्री किसको बनाना वह प्रश्न सामने आया.

नहेरु बडे नेता अवश्य थे किन्तु सबसे बडे नेता नहीं थे.

उस समय भारतमें कोंग्रेस पक्षका संगठन व्यापक था. कन्याकुमारीसे लदाख और बलुचिस्तानसे अरुणाचल तक कोंग्रेस पक्ष फैला हुआ था. प्रत्येक ग्राम, नगर, तहेसील, जिला और प्रांतमें कोंग्रेसकी समितियां थी. हरेक प्रांतका संचालन प्रांतीय समिति करती थी. प्रधान मंत्रीके पदके लिये प्रधान मंत्री पदके लिये सुझाव मंगवाये गये थे. एक भी समितिने जवाहरलाल नहेरुका सुझाव नहीं दिया.

नहेरुने अपना आवेदन पत्र दिया था. महात्मा गांधीने नहेरुको बुलया. उनको कहा कि आपका नामका सुझाव एक भी प्रांतीय समितिने नहीं भेजा है. इससे यह निष्पन्न होता था कि, नहेरु नंबर वन से अतिदूर थे. नहेरु यदि लोकतंत्रमें श्रद्धा रखते होते तो उनको अपना आवेदन पत्र वापस लेना अनिवार्य था. किन्तु नहेरु लोक तंत्र में मानते ही नहीं थे. लोकतंत्रकी गाथा करना, केवल उनकी व्यूह रचना का भाग था.

नहेरुको प्रारंभसे ही अवगत था कि, जनतामें वे सर्व स्विकार्य नहीं थे. युवावर्गमें भी उनका क्रम सुभाषसे पीछे था. इस लिये वे १९३९के कोंग्रेसके प्रमुख पदके चूनावमें सुभाषके सामने पदके लिये आवेदनपत्र नहीं भरा. सुभाष के कोंग्रेसके छोडनेके बाद भी लोकप्रियतामें कई नेता नहेरुसे आगे थे. इस कारणसे नहेरुने एक समाजवादी गुट कंग्रेसमें ही बना दिया था. लेकिन सामान्य कोंग्रेसीको तथा अन्य वरिष्ठ नेताओंको तथा कथित समाजवादमें रुचि नहीं थी. इस लिये कंग्रेसके संगठन पर नहेरुका इतना प्रभाव नहीं था कि वे प्रधानमंत्री बन सके.

नहेरुने अपनी व्यूह रचना मनमें रक्खी थी. उन्होंने अपना उत्पात मूल्यको (न्युसन्स वेल्युको) कार्यरत करने का निश्चय किया. नहेरुने कंग्रेसका विभाजन करने का विचार किया. कंग्रेसके अंदर उनका समाजवादी गुट तो था ही. उतना ही नहीं कोंग्रेसके बाहर भी एक समाजवादी पक्ष था. यदि आवश्यकता पडे तो साम्यवादी पक्ष कि सहायता ली जा सकती थी. इन सबको मिलाके एक प्रभावशाली पक्ष बन सकता था.

महात्मा गांधीने नहेरुको प्रज्ञापित किया. प्रधान मंत्रीके पदके लिये एक भी प्रांतीय समितिने आपके (नहेरुके) नामका सुझाव नहीं दिया है. इस पर नहेरुकी क्या प्रतिक्रिया थी? नहेरुको क्या करना योग्य था? तब नहेरुको अपना आवेदन पत्र वापस ले लेना चाहिये था. किन्तु अपना आवेदन पत्र वापस लेनेके स्थान पर, नहेरु खिन्नतायुक्त अन्यमनस्क मूंह बनाके चल दिये.

गांधीजीको विश्वास हो गया कि नहेरु कोई पराक्रम करनेवाले है. यह पराक्रम था कोंग्रेसका विभाजन करनेका. उस समय भारतके सामने अन्य कई समस्याएं थीं, जिनमें भारतको अविभाजित रखना मुख्य था. कई राजा स्वतंत्र रुपमें रहेना चाहते थे. द्रविडीस्तान, दलितीस्तान, सिखीस्तान की मांगे भी हो रही थी. यदि उसी समय कोंग्रेसका विभाजन हो जाय तो कोंग्रेस निर्बल हो जाय और देशकी एकता के लिये एक बडा संकट पैदा हो जाय. गांधीजीको अवगत था कि, यदि पाकिस्तान भारतसे भीन्न बनने के अतिरिक्त,  भारत ज्यादा विभाजित होनेसे बचाना ही प्राथमिकता होनी आवश्यक है. संविधान आनेके बाद, चूनावमें तो नहेरुको सरलतासे प्रभावहीन किया जा सकता है. महात्मा गांधीने सरदार पटेलको मना लिया और वचन ले लिया कि वे देशके हितमें सहायता करेंगे और कोंग्रेसको विभाजित नहीं होने देंगे. सरदार पटेल ने वचन दिया.

इस पार्श्व भूमिकामें नहेरु प्रधान मंत्री बने.

नहेरु प्रधान मंत्री बन गये तो, तत्पश्चात उन्होंने अपने एक एक करके सभीको विरोधीयोंको कोंग्रेस छोडने पर निरुपाय किया. जब तक यह लोकतंत्र, स्वयंके लिये वास्तविक रुपमें आपत्तिजनक नहीं बना तत्पर्यंत नहेरुने  लोकतंत्रको आनंदप्रमोदके स्वरुपमें चालु रक्खा,. जब भी लोकतंत्र आपत्तिजनक बना तब उन्होने ऐसी व्युहरचनाएं बनाई जो लोकतंत्रके सिद्धांतोंसे विरुद्ध थी और अशुद्ध भी थी.

इन्दिरा गांधी, नहेरुकी तरह व्युह रचनामें और मानवव्यवहारमें निपूण नहीं थी. इन्दिराको अपने पद पर लगे रहेने के लिये कंग्रेसको तोडना पडा. और १९७५में अपने पद पर लगे रहेने के लिये मानव अधिकारों पर और संविधानीय अधिकारों पर प्रहार करना पडा.

आपतकाल घोषित करनेसे क्या हुआ?

हजारों लोग कारावासमें बंद हुए. उनके कुटूंबीजनोंको या तो उनके मित्रोंने संम्हाला यातो उनको अति कठिन परिस्थितियोंसे पसार होना पडा. अनेक लोग रोगग्रस्त भी हुए.

नागरिक अधिकारोंकी सुरक्षाके लिये न्यायालय अर्थ हीन बना.

सरकारी गुप्तचर संस्थासे लोग भयग्रस्त हुए.

इतना ही नहीं सुरक्षा कर्मचारी किसी भी व्यवसाय करने वालेको भय दिखाने लगा कि तुम यद्वा तद्वा असामाजिक कार्य कर रहे हो सा मैं शासनमें सूचन कर दुंगा. ऐसा मैं करुं, इस लिये तुम मुझे इतनी रिश्वत दे दो.

सभा प्रदर्शन पर निषेध था. शासनके विषय पर प्रत्यक्ष या परोक्ष रुपसे भी कुछ नहीं लिख सकते. क्यों कि आपने जो लिखा उसका मनस्वी अर्थघटन शासनका नियंत्रक अधिकारी करेगा.

आपतकालमें अनधिकृत धन राशी का कितना स्थानांतर और हस्तांतरण हुआ इसके लिये एक महाभारत से भी बडा ग्रंथ लिखा जा सकता है. आपातकालके अत्याचार, शासकीय अतिरेक, मानव अधिकारका हनन इन सबके अन्वेषण शाह आयोग द्वारा किया गया. शाह आयोगने, एक मालवाहक भर जाय इतना बडा विवरण दिया है.

इन्दिरा गांधीने यह क्यूं नहीं सोचा कि इससे भारतकी गरिमाको हानि पहूंचेगी?

भारत एक महान देश क्यूं माना जाता है?

क्यों कि उसकी संस्कृति सिर्फ पूरानी ही नहीं किन्तु सुग्रथित, वैभवशाली, वैज्ञानिक विचार धारासे प्लावित, पारदर्शी और लयबद्ध है. भारतमें धर्मका प्रणालिगत अर्थघटन नहीं है. भारतमें विरोधी विचार आवकार्य है. चार्वाक भी है और मधुस्छंदा भी है. ६००० सालसे अधिक प्राचीन वेद आज भी उतने ही मान्य और आदरीणीय है, जितना वे पहेले थे. तत्वज्ञान जो है वह शाश्वत है. और जिवनके सभी घटक प्रणालीयोंमे एक सूत्रित है. यतः भारत विश्वका एक मात्र ऐसा देश है जो अतिप्राचीन समयसे विभीन्नविघटित, प्रकिर्ण, भौगोलिकतामें अति विस्तीर्ण होने पर भी एक देशके नामसे प्रख्यात है. इसका उल्लेख वेद पुराणोंमें भी विस्तारसे है. उसने अपनी संस्कृतिको जीवित रक्खा.

ऐसे भारतने १५० सालसे चलनेवाले एक सुसज्ज, सुग्रथित और नियमसे चलनेवाले विदेशी शासनका, अहिंसाके शस्त्रसे अंत किया. प्राचीन कालसे अर्वाचीन काल तक विश्वमें कहीं भी ऐसा मुक्तिसंग्राम नहीं हुआ. अहिसा आधारित संग्राम बलिदान देनेमें पीछे नहीं है. अहिंसा में भीरुता नहीं किन्तु शाश्वत निडरता रहती है. यह बात भारतने ही सिद्ध की. इस भारतके अहिंसक स्वातंत्र्य संग्रामसे अन्य कई देशोंने बोध लिया.

ऐसे देशकी प्रतिष्ठाको इन्दिरा गांधीने सिर्फ अपने स्वार्थ के लिये धूलमें मिला दीया.

जो जगजिवनराम अंग्रेजोंकी गोलीसे नहीं डरते थे वे कारावास और अपमृत्युसे डरने लगे. जो यशवंतराव चवाण स्वयंको शिवाजी, प्रदर्शित करते थे वे भी कारावाससे डरने लगे.

गुरुता लघुता पुरुषकी आश्रयवस ते होय, वृन्दमें करि विंध्य सो, दर्पनमें लघु होय.

इसका अर्थ है, व्यक्तिकी उच्चता व्यक्ति जिसके साथ है उसके पर अवलंबित है. यदि व्यक्ति निम्न कोटीके साथ है तो आप भी निम्न कोटीके बन जाता है.

अहो सज्ज संसर्ग कस्योन्नति कारक, पुष्पमालाप्रसंगेन सुत्रं शिरसि धार्यते.

यदि व्यक्ति उच्च कोटीके संसर्गमें रहेता है तो उसकी कोटी भी उन्नत बन जाती है. जैसे पुष्पमाला मस्तिष्क  पर चढती है तो साथमें सुत्र (धागा) भी मस्तिष्क पर चढ जाता है.

इन्दिरा गांधीने पातकालके विषय पर अपने पक्षमें यह कहा कि, वह आवश्यक था. उसने कई कारण भी दिये. हम उसकी चर्चा नहीं करेंगे.

किन्तु जब स्वयं इन्दिरा चूनावमें ५५००० मतोंसे हार गयी तो उसने पातकालका अंत घोषित कर दिया. उसने आपातकालके अंतर्गत ही चूनाव करवाया ताकि जनतामें भय कायम रहे.

इसका अर्थ तो यही हुआ कि आपातकालका कारण वह स्वयं थी. यदि शासकीय व्यवस्था अस्तव्यस्त थी तो उसकी स्वयंकी पराजयकी दुसरी क्षणसे वह व्यवस्था स्वस्थ तो नहीं हो जा सकती?

यदि इन्दिराकी दृष्टिमें और नीतिमें आपातकाल आवश्यक था और यदि वह स्वयंसे प्रस्थापित सिद्धांतोमें सत्यकी अनुभूति करती थी, स्वयंके निर्णयोंमें दृढताकी आग्रही थी, तो उसको स्वयंकी पराजय के पश्चात भी आपातकाल को चालु ही रखना चाहिये था. आपातकाल चालु रखना या उसका अंत करना, अनुगामी शासक पर छोड देना चाहिये था. किन्तु उसने ऐसा नहीं किया क्यों कि वह भीरु थी और अनुगामी सरकारसे भयभीत थी. वह भीरु थी उसका दुसरा उदाहरण यह था कि उसको शाह आयोग के प्रत्यक्ष स्वयं को प्रस्तूत करने कि निर्भयता नहीं दिखायी. यदि इन्दिरा स्वयंको प्रस्तूत करती तो …?

नहेरु और इन्दिरामें कोई वास्तविक भीन्नता नहीं थी.

दोनों नीतिहीन थे. नहेरु अपनी व्यूहरचनासे और उत्पात मूल्यसे प्रधान मंत्री बने और छल कपटवाली कूटनीतिसे प्रधान मंत्री बने रहे. इन्दिरा गांधी, अपने पिताके कारण प्रधानमंत्री बनी. फिर नीति हीनतासे और जनतंत्र को अस्तव्यस्त करके वह प्रधान मंत्रीके पद पर चालु रही.

इन्दिरा गांधी, जो स्वयं, इतिहासके दस्तावेजों पर सत्तालोलुपथी, और अपनी सत्ताकी रक्षाके लिये सारे देशको कारावास ग्रस्त करती थी, वह विपक्षके नेताओंको जो कारावासमें बंद थे उनको सत्ता लालची कहा करती थी. वह खुद, विपक्षके नेतांओंके प्रदर्शनको, शासनमें विघ्नकारी घोषित कहा करती थी, उसके स्वयं के नेतागण, चूं कि नहेरुवीयन कोंग्रेस गुजरातमें विपक्षमें था, सातत्यतासे बाबुभाई जशभाई पटेल की जनता पार्टीके शासनकी विरुद्ध प्रदर्शन, धरणा, व्याख्यान, निवेदन, आवेदन और गालीप्रदान किया करते थे. और जनता पार्टी के विरुद्ध बोलनेमें कोई निषेध नहीं था. आपातकालमें निषेध था तो वह नहेरुवीयन कोंग्रेसके विरुद्धमें नहीं बोलनेका.

INDIRA WAS A FRAUD

सौजन्य आरके लक्ष्मण का कटाक्ष चित्र

आतंकवाद और कपटपूर्ण हत्याः

यदि कोई कहे कि नहेरु और इन्दिरा आतंक वादी थे और कपटयुक्त हत्या (फेक एन्काउन्टर) करनेवाले थे तो?

खुदको क्षति करके अन्यका भला करो यह सज्जनका लक्षण है.

अपने विरोधीको नष्ट करके स्वयं को और अपने मित्रको लाभ करो उसको आप क्या कहोगे?

श्यामप्रसाद मुखर्जीका कश्मिरमें क्या हुआ? शेख अब्दुल्ला किसका मित्र था? शेख अब्दुल्लाके लिये नहेरुने क्या क्या नहीं किया?

समाजवादके नाम पर नहेरुने चीन से स्नेह किया. सीमा पर सैन्य सुसज्ज नहीं रखा. जब चीनने खुल्ला क्रमण किया तो सैन्यके पास कपडे नहीं थे, जूते नहीं थे, शस्त्र नहीं थे…. और ऐसे जवानोंको कहा कि जाओ युद्ध करो. इसको आप क्या कहोगे? आतंक कहोगे या फेक एनकाउन्टर?

१९७१में भारतीय सैन्य वीरतासे लडा. कश्मिरका जो भूभाग पाकिस्तानके पास था उसमेंसे भी, कुछ भाग हमारे सैन्यने ले लिया. हमारे सैन्यने ९२००० दुश्मनके सैनिकोंको गिरफ्तार भी किया. पूर्वपाकिस्तानको स्वतंत्र करवाया. हमारे कई सैनिकोंने बलिदान भी दिया. और भारतकी इस विजयका पूरा श्रेय इन्दिराने लिया.

इस युद्धके पूर्व इन्दिराने घोषणा की थी इस समय हम जिता हुआ भू भाग वापस नहीं देंगे, दुश्मनसे हानि वसुलीका दंड करेंगे. ९२००० पाक सैनिकोकों एक वर्ष तक खिलाया पिलाया उसका मूल्य वसुल करेंगे, एक कोटीसे ज्यादा बांग्लादेशी घुसपैठोंको वापस भेजेंगे, इनका भी हानिवसुलीका दंड देंगे. एक परिपूर्ण ऐसी संधि करेंगे कि पाकिस्तान कभी हमसे आंख उंची करके देख सके.

किन्तु इन्दिराने, सिमला संधिके अंतर्गत परिपूर्ण विजयको घोर पराजय में परिवर्तित कर दिया. भारतकोविशाल शून्य” प्राप्त हुआ. पाकिस्तानका जो भी भूभाग पराभूत हुआ था वह सब उसको मिल गया. कश्मिरका जो भूभाग पाकिस्तानके पास था उसमेंसे भी कुछ भाग हमारे सैन्यने ले लिया वह भी इन्दिराने पाकिस्तानको दे दिया. इन्दिराने ९२००० पाकिस्तानी सैनिकोंको मुक्त कर दिया. पाकिस्तान ने हमारे ४०० सैनिकोंको मुक्त नहीं किया. कोई बांग्लादेशी वापस नहीं भेजा. और अधिक बांग्लादेशी घुसखोर आये. इतना ही नहीं बांग्लादेशने हिन्दुओंको भयभित करके बांग्लादेश त्यागने पर विवश किया.

आप भारतीय सैनिकोंके बलिदानको क्या कहोगे? क्या उनके बलिदान का ध्येय यह था कि अपना देश पराजित देशके सामने नतमस्तक हो जाय? यदि उनका ध्येय यह नहीं था तो इन भारतीय सैनिकोंकी मृत्युको आप फेक एनकाउन्टर नहीं कहोगे क्या कहोगे?

जय प्रकाश नारायण की हत्या

इन्दिरा गांधीने आपतकाल अंतर्गत महात्मा गांधीके अंतेवासी जयप्रकाश नारायणको कारावासमें, चिक्तित्सा की और उनको मरणासन्न कर दिया. यह एक हत्या ही थी.

इन्दिरा गांधीने युनीयन कार्बाईडका संविद अनुबंध (कोन्ट्राक्ट डील) किया, किन्तु वह क्षतिपूर्ण था. आकस्मिक विपत्ति का प्रावधान इतना क्षतिपूर्ण था कि भोपालके गेस पीडितोंका जीवन अस्तव्यस्त हो गया. इतना ही नहीं, जो युनीयन कार्बाईडका प्रमुख एन्डरसन था, उनको भाग जानेमें मुख्य मंत्री और कोंगी फरजंद राजीव गांधीने मदद की.

इन निर्दोंषोंकी पायमाली को आप क्या कहोगे? यह आतंक नहीं है तो और क्या है?

लिखित और अलिखित, घोषित और अघोषित आपतकाल केवल और केवल नहेरुवीयनोंने ही लगाया था और लगाते रहे है. रामलीला मैदान मे रावण लीला जैसे अनेका अनेक उदाहरण आपको मिल सकते है.

क्या आपातकालके समय अडवाणी शिशु थे?

नहेरुवीयन शासनके समय अडवाणी पेराम्बुलेटर (बालगाडी) ले के नहीं चलते थे. उस समय अडवाणी ५०+ के वयस्क थे. १९७७१९७९ के अंतर्गत अडवाणी उच्च कक्षाके मंत्री भी थे. उस समय भविष्यमें कोई सत्तालोलुप प्रधान मंत्री आपातकाल घिषित करके मानव अधिकारोंको निर्मूलन कर सके, इस विषय पर पर्याप्त चर्चा विचारणाके बाद एक विधेयक बनाया था और उसको संसदसे अनुमोदित करवाया था. उस समय तो अडवाणी ने स्वयंकी तरफसे प्रस्तूत विधेयके प्रारुप लेखमें रुप परिवर्तनके लिये कोई संशोधन प्रस्तूत नहीं किया था. क्या वे कोई शुभ समय की प्रतिक्षामें थे?

प्रतिक्षा करो … चौधरी चरण सिंघका आत्मा .

क्रमशः

शिरीष मोहनलाल दवे.

 टेग्झः

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राहुल गांधीकी घरवापसी या मूंहदिखाई या राहुलवर्सन – n+1

मूंह दिखाई

मीडीया धन्य हो गया.

यदि आपको मीडीयाका निम्नसे निम्न स्तर देखना हो तो भारतके समाचार माध्यमोंको देख लिजीये.

यदि आप भारतकी प्रज्ञा पर गर्व करते हैं, तो भारतीय समाचार माध्यमों का स्तर देखके आप लज्जासे नतमस्तक हो जाओ.

वैसे तो आप नतमस्तक हो जाओ, ऐसी कई घटनाएं है, जिसमें नहेरुवीयन कोंग्रेसी संस्कार पर चलनेवाली मुस्लिम नेतागीरी भी संमिलित है, जो सतत हिन्दुओंके मानव अधिकारोंका हनन किया करती है. ये लोग तो सिद्ध देशद्रोही है, उनके विषय पर क्या चर्चा करें ! आम जनताको धीरे धीरे सबकुछ ज्ञात हो गया है.

नहेरुका जूठ

नहेरुने स्वातंत्र्यके प्रथम दशकमें कई जूठ फैलायें थे.

उस समय मीडीया माध्यम को यह ज्ञात नहीं था कि सत्य और असत्य, श्रेय और अश्रेय क्या होता है. क्यों कि उनको ऐसी प्रशिक्षा नहीं दी गयी थी. वैसे तो १९४७के पूर्व समय, स्वातंत्र्य सेनानीयोंके द्वारा संचालित कई उत्कृष्ट समाचार पत्र थे जिनसे वे बोध ले सकते थे. लेकिन भय के कारण वे अंग्रेज सल्तनत के विरुद्ध लिखना नहीं चाहते थे. हो सकता कि वे लोग शिशु अवस्थामें हो. मीडीयामें परिपक्वता नहीं आयी थी.

किन्तु यदि २८ वर्षके बाद भी मीडीया पंडित परिपक्व नहीं बन सकते है तो कारण कुछ और ही हो सकता है.

इन मीडीया मूर्धन्योंको १९७५१९७६ के अंतर्गत, नहेरुवीयन फरजंद इन्दिराने झुकनेको कहा था. किन्तु इन मीडीया मूर्धन्योंने इन्दिरा संचालित सेन्सरशीप को साष्टांग दंडवत प्रणाम करके, उसके शासन द्वारा संचालित अफवाहें फैलानेमें और शासनके भाट बननेमें कोई शर्म नहीं रक्खी.

मीडीयाकी यह अपरिपक्वता कहां तक रहेगी?

मीडीयाका एजन्डा कुछ और ही है.

मीडीयाको क्या लिखना है, कैसे लिखना है, कितना लिखना है, ये सब पूर्व निश्चित है.

वैसे तो आदर्श मीडीया का धर्म है कि, वह जनताको माहिति प्रदान करे. जनताको सुशिक्षित करें. जनताके हितमें लिखे. सत्य लिखे, प्रमाणभान रखकर लिखें, सच्चे संदर्भमें लिखें, विवेकशीलतासे लिखें और निडरतासे लिखें.

नरेन्द्र मोदीने एक बार अपने वक्तव्यमें कहा कि समाचार माध्यम अपना वाचकगण और दर्शकगण बढानेके चक्करमें उत्तेजित शब्द प्रयोग करते है. ऐसा करनेमें ये समाचार माध्यम के पंडित लो यह नहीं देखते कि समाजमें नकारात्मक वातावरण फैलता है या सकारात्मक वातावरण फैलता है? जनताको सत्य अधिगत होता है या असत्य अधिगत होता है?   

सकारात्मक समाचारकी अखबारी परिभाषाः

एक ख्यातनाम समाचार पत्रने नरेन्द्र मोदीको लिखा कि वह, सप्ताहमें एक दिन सिर्फ सकारात्मक समाचार ही छापेगा. वैसे तो उस समाचार पत्रकी इस प्रकारकी घोषणा ही उसकी मानसिकता प्रदर्शित करती थी. क्यों कि वैसे तो प्रत्येक समाचार पत्रको हमेशा सकारात्मक समाचार ही प्रसिद्ध करना चाहिये.

लेकिन सकारात्मक समाचार की परिभाषा उस समाचार पत्र की अलग ही थी.

खून हुआ, दंगा हुआ, मारपीट हुआ, चोरी हुई, डकैती हुई, परिणित स्त्रीके साथ दुष्कर्म हुआ, सगिराके साथ दुष्कर्म हुआ, बच्चेके साथ दुष्कर्म हुआ, शिशुके साथ दुष्कर्म हुआ, विदेशीके साथ दुष्कर्म हुआ, कौनसी हिन्दु जाति द्वारा दुष्कर्म हुआ, ठगाई हुई, अकस्मात हुआ, किसीने गाली दी, कोंगीने प्रदर्शन किया, क्या क्या बोला आदि आदि ही नकारात्मक घटनाएं है.

वास्तवमें नकारात्म समाचार क्या है?

समझ लो. कोई भी घटना जब घटती है और जब वह जनमानसके दिमाग पर पडती है तब उसका असर भीन्न भीन्न प्रकारकी व्यक्ति के उपर भीन्न भीन्न होता है.

एक व्यक्ति है जो चोर है उसको यदि चोरीके समाचारसे पता चलता है कि फलां जगह पर इस प्रकारसे चोरी हुई, तो उसको चोरीका एक और तरिका मालुम हो जाता है.

जिसकी जातीय वृत्ति असंतुष्ट है उसको भी जब दुष्कर्म का समाचार मिलता है तो उसको पता चलता है कि इन इन व्यक्तियों पर ऐसे ऐसे प्रकारसे दुष्कर्म किया जा सकता है. दुसरे लोग करते है तो हम भी क्यों करें !

यदि कोई फिल्मी हिरो कहेता है कि यदि मैं सिग्रेट मूंहमें रखकर अपनी अदा बताउं तो मैं सोचनेका अभिनय कैसे करु? कोई हिरी (हिरो का स्त्रीलिंग), कहेगी मेरा शरीर मेरा है. मेरी जिंदगी मेरी है, मैं उसका जो चाहे वह करुं. … (फिर वह हिरोईन, आगे बहूत कुछ कहेती है जो समाजकी तंदुरस्तीके लिये विवादका विषय है, इसलिये यहां नहीं लिखा जा सकता).

ऐसे समाचारोंको ज्योंका त्यों और बार बार प्रसिद्ध करनेसे और ऐसे समाचारोंको ज्यादा महत्व देनेसे, वे नकारात्मक बन जाते है. यदि समाचार माध्यम, समाचारोंमे विवेकशीलता रखके समाचारको प्रसारित करता है और वह स्वयं तटस्थ बनकर पूर्व पक्ष और प्रतिपक्ष का मुद्दोंपर प्रतिक्रिया प्रकट करता है तब वे ही समाचार सकारात्मक बन जाते हैं.

एक समाचारपत्रकी मानसिकता देखो

“दिव्यभास्कर” गुजरातका एक ख्यात नाम समाचार पत्र है. वह नरेन्द्र मोदीके विदेश-प्रवासके वर्णन और विदेशप्रवासकी उपलब्धियां, केवल एक अष्टमांश पन्ने पर, और वे भी सातवें या नवमे या ग्यारवें पन्ने जो भितरके पन्ने है उनमेंसे कोई एक पन्ने पर ही प्रकट करता था.

वास्तवमे ऐसे समाचार भारतके भविष्य के विकास पर सर्वाधिक प्रभावशाली माने जाते है. तो भी हमारा यह समाचार पत्र इसको महत्व देना नहीं चाह्ता था. क्यों कि, बीजेपीके विषयमें सकारात्मक समाचार प्रकट करना, नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनके सांस्कृतिक साथीयोंके लिये नकारात्मक बन जाता है.

एक हंगामेका समाचार

“आवास योजनाके एक प्रकल्प के लिये बीजेपीकी सरकारने गुजरातके एक नगरमें शिलान्यासका आयोजन किया. इस प्रसंगमें कुछ लोगोंने हंगामा किया. मंडपको तोडा, कुर्सीयां तोडी, टेबल उलट दिये. पूरे समाचार पढने पर भी आपको ऐसा कोई विवरण नहीं मिलता है कि, ऐसा क्यूं हुआ? समाचार माध्यमके लिये हेतु प्रसारित करना महत्व का नहीं. जो हंगामा हुआ उसका वर्णन ही महत्वका है क्यों कि हंगामा बीजेपी द्वारा शासित राज्यमें हुआ है. बीजेपीके लिये नकारात्मक बनता है. और यही समाचार कोंगीके लिये सकारात्मक बनता है. समाचार माध्यमकी हेतुसूचिके अनुसार, समाचार हमेशा सकारात्मक (कोंगीके लिये) होना आवश्यक है.

अभी भूकंप के बारेमें बीजेपी सरकारकी कार्यवाही प्रसंशनीय बन रही है.

कुछ नकारात्मक तो ढूंढना पडेगा.

एक रुग्णालयमें भूकंप पीडित व्यक्तियों के कपोल पर “भूकंप” का लेबल लगाया गया. कर्मचारीका हेतू केवल भूकंप पीडितोंकी पहेचान का था. क्यों कि उनकी चिकित्सा निशुल्क करनी है. समाचार माध्यमोंने हंगामा खडा कर दिया.

“रुग्णालयका अमानवीय कृत्य”. हमारे डीबीने (दिव्यभास्करने) इस समाचारको प्रथम पन्ने पर विशाल अक्षरोंमे मुद्रित किया. हांजी, नरेन्द्र मोदीकी विदेशयात्राका विवरण और उपलब्धियां देशके लिये महत्वपूर्ण नहीं है. किन्तु एक गांवके रुग्णालयके कर्मचारीका “भूकंप”का लेबल लगाना कई गुना ज्यादा सकारात्मक है.

कोंगी साथी नेता उवाच

एक नहेरुवीयन कोंगके साथी नेताने बोला “नरेन्द्र मोदी भूकंपमें भूतानीयों पर और विदेशीयों पर  ज्यादा ध्यान केन्द्रित करता है”. इस नेताने न तो कोई विवरण दिया न तो मीडीयाने कोई विवरण मांगा. नरेन्द्र मोदी सभी भूकंप पीडितोंको मनुष्य माने उसमें समाचार माध्यमोंको और कोंगी और उसके साथीयोंको आपत्ति है. उनका संस्कार है कि सभी मनुष्योंको आपत्तिके समय पर भी भीन्नतासे देखना चाहिये.        

जिन समाचारोंके प्रकट करनेके पीछेस्वार्थरहता है वे नकारात्मक होते है. क्योंकिस्वार्थनामका अखबारी तत्व सत्यको ढक देता है.

हिरण्मयेन पात्रेण, सत्यस्य अपिहितं मुखं.

स्वर्ण पात्रसे (पीले चमकिले और आकर्षक शब्दोंसें ये पीले पत्रकारत्ववाले समाचारमाध्यम के पंडितोंसे) सत्य ढक जाता है

कुछ नेताओंकी व्यक्तिओंकी ऐसी प्रकृति ही होती है.  इनमें फिल्मी हिरोहिरोईन, राजकीय पक्ष के नेता खास करके जो नये नये है या पुराने है लेकिन सत्तासे हाथ धो बैठे है, वे ऐसे मौके ढूंढते है कि उनको प्रसिद्धि मिले. ऐसे लोग पैसे देके भी समाचार प्रसिद्ध करवाते है. समाचार माध्यमको और क्या चाहिये? समाचार माध्यमको तो पैसा और वाचक वर्ग चाहिये.

मजाक करना मना है?

बीजेपी के एक नेताने कहा कि नहेरुवीयन कोंग्रेसको चमडीके कलरसे कोंप्लेक्ष (ग्रंथी) है. यदि राजिव गांधीने नाईजिरीयाकी लडकीसे (श्यामा लडकीसे) शादी कि होती तो क्या वे उसको कोंग्रेस प्रमुख बनाते?

यह तो एक प्रश्न था. जो औरत श्वेत है उसको श्वेत कहा गया. यह बात कोई बुराई तो है नहीं. नाईजिरीयाकी लडकीयोंको ( कोई व्यक्ति विशेषको श्याम कहा गया) श्याम कहा गया. यह भी कोई बडी बात तो है नहीं. वैसे तो “ब्लेक इझ ब्युटीफुल” कहा जाता है.

वैसे भी, नहेरुको श्वेत रंग के लोग ज्यादा पसंद थे. नहेरुने विदेशोंकी एम्बेसीयोंमें मूलकश्मिरीयोंकी बिना योग्यता देखें ज्यादा ही भर्ती कर दी थी. उसके कारण भारतको लज्जास्पद स्थितिमें आना पडता था. ऐसे तो कई उदाहरण है.

कमसे कम श्वेत स्त्रीको परोक्ष या प्रत्यक्ष रुपसे श्वेत कहेना, उसकी बुराई तो नहीं है. रही बात श्यामा की. लेकिन यह तो सामान्यीकरण है. यह कोई व्यक्ति विशेषकी बात नहीं है. किन्तु नहेरुवीयनोंने तो नाईजिरीया तक यह बात पहूंचा दी.

प्रमाणभान हीनता

जो कुछ भी हो. श्वेत श्यामकी इस बातको उछालना, उसके उपर टीवीमें चर्चाएं रखना, कोंगी और उसके साथीयों द्वारा संसदकी कार्यवाहीको स्थगित कर देना क्या आवश्यक है?

मीडीया का क्या यही एजंडा है? अन्य कुछ तो नहीं?

क्या यह श्याम-श्वेत” की चर्चा भारतके लिये जिवनमृत्युकी समस्या है?

क्या इस कारण किसी नेतानेत्रीने आत्महत्या कर ली है?

क्या इस बातसे कोई नेता नेत्री बिमार पड या हैं?

संवेदनशीलताका मिथ्या प्रदर्शन या हास्यवृत्तिका अभाव

एक समय महात्मा गांधीने कोई एक महाकविके संदर्भमें कहा था कियदि दूध देने वाली गैया, लात मारे तो भी सहन कर लेना चाहिये.”

उस समय तो वह महाकविके भक्तोंने या वह महाकवि खूदने कोई कोलाहल नहीं किया था.

हांजी, महाकविने यह तो अवश्य कहा किमैं गैया नहीं हूं, मैं तो सांढ हूं”. बात खतम.

लेकिन यहां पर तो सोनियाने भी यह प्रदर्शित किया कि वह कोई संवेदनहीन नहीं है, लेकिन वह उच्चकोटीकी होनेकी वजहसे, निम्नकोटीकी व्यक्तिसे की गई अभिव्यक्ति पर कोई टीका नहीं करेगी. इस प्रकर, स्वयंको उच्चस्तरकी माननेवाली व्यक्तिने अन्यको निम्न कक्षाकी दिखाने की मानसिकता प्रदर्शित तो कर ही दी. (अभी बोला अभी फोक).

यह वही सोनिया गांधी है, जिसने खूदने, गुजरातकी जनताको गोडसे कहा था और नरेन्द्र मोदीको मौतका सौदागर कहा था. और उसके पक्षके लोगोंने नरेन्द्र मोदीको जगतके हर आततायीयोंके नामसे नवाजा था और हर निम्नकक्षाके माने जाने वाले प्राणीयोंके नामसे भी नवाजा था. उस समय इन नहेरुवीयन नेताओं की और सोनीयाकी संवेदनशीलता कहां गई थी? इसको कहेते है “सौ चूहे मारके बिल्ली हज करने चली.”

मीडीया पंडितोंने कोई चर्चा नहीं चलायी

एक और नहेरुवीयन फरजंद है जो नहेरुइन्दिराकी मिक्ष्ड स्टाईल मारता है. संसदके एक सवालके उत्तरमें नहेरुने कहा थायुनोमें लाईन ऑफ कन्ट्रोलकी परिभाषा नहीं है”.

घटना कुछ इस प्रकार थी. नहेरु चीनके चाहक थे. चीनका सैन्य लाईन ऑफ कन्ट्रोलका उलंघन करता रहेता था. महात्मागांधीके अंतेवासी जेबी क्रीपलानीने सवाल उठाया, कि, भारत सरकार चीनी घुस पैठके विषय पर क्या कदम उठा रही है?

तब नहेरुने ऐसी घटनाको ही नकार दिया.

वास्तवमें हमारे सुरक्षा दलके अधिकारीगण, चीनके साथ नियमित रुपसे होनेवाली बैठकोंमें यह मुद्दा उठा ही रहेते थे. और तब चीनी अधिकारी, नहेरुके कथनोंका हवाला देके घुसपैठको नकारते थे.

लेकिन जब चीनी लश्करकी घुसपैठ, हदसे ज्यादा बढ गयी, तो संसदमें जे बी क्रिपलानीजीने सूचित किया कि हम लाईन ओफ कन्ट्रोलका उलंघन करने वालों पर निगरानी करनेके लिये, लाईन ओफ कन्ट्रोल पर अधिक सुरक्षा व्यवस्था रक्खें और युनोमें केस दर्ज करें. तब नहेरुने कहा कि एल..सी. की कोई परिभाषा युनोके पास नहीं है. और युनोने अभी तक कोई समस्या हल नहीं की है.

क्रीपलानी ने कहा कि तो हम युद्ध करें.

तो नहेरुने कहा कि युद्धसे कोई समस्या हल नहीं होती.

इस प्रकार नहेरुके पास हरेक समस्याका उत्तर फिलोसोफीकल था. उसका यह प्रपोता भी ऐसा लुझ टोकींग करता है. “गरीबी एक मानसिकता है

यह नहेरुवीयन फरजंदके कितने वर्सन (अवतार) है?

राहुल ? अहो रुपं अहो ध्वनि?

राहुल वर्सन०१

बिहारमें राहुलकी नेतागीरीमें चूनाव लडा जायेगा ऐसा घोषित हुआ. मीडीयाने अहो रुपं अहो ध्वनिचलाया. वह था उसका अवतार वर्सन०१. फिर क्या हुआ? नहेरुवीयन कोंग्रेस पीट गयी.

ऐसा क्यों हुआ? नहेरुवीयन नेतागण बोले अरे भाई उसने अपना फर्ज निभाया लेकिन कार्यकर्ता लोग असफल रहें.

राहुल वर्सन०२

कोंगी बोली, अब राहुलजी एक बडी जेम्मेवारी लेने वाले है. वे युपी एसेम्ब्ली चूनावमें प्रभारीकी जिम्मेवारी ले रहे है.

मीडीयाने राहुलका वहीअहो रुपं अहो ध्वनिचलाया”. उसमें भी नहेरुवीयन कोंग्रेस पीट गयी. वर्सन०२ समाप्त.

लेकिन अब तो वे एक बहोत बडी जिम्मेवारी अदा करने वाले है…. ऐसा करके उनके कई वर्सन निकले.

फिर उनको महामंत्री बनाया. फिर उनका पक्षके उपप्रमुखका वर्सन आया. सबमें उसका पक्ष पीट गया.

फिर क्या हुआ?

प्रोडीगल सन क्या घर छोडके भाग गया?

या वालिया लुटेरा तप करनेके नाम पर ब्लेक मनी को ईधर उधर करने चला गया?

या जिम्बो कोई और बेनाम जगह चला गया?

रोबिन हुड …  खेल खेलने बेनाम जगह चला गया?

पूरे दो मास बिना कुछ काम किये गुमनाम हो गया. के सेवकोंने बताया वह छूट्टी पर गया है.

वैसे तो संसद सदस्यको सरकारी व्यक्ति मानना चाहिये. क्यों कि उसको जननिधि (पब्लीक फंड)मेंसे वेतन मिलता है. और उसका निवृत्ति वेतन भी सुनिश्चित है.

राहुलके लिये नैतिक धर्म बनता है कि वह क्यों जाता है, कहां जाता है और उसके अवकाशके समयका पता क्या है ये सभी माहिति संसदके स्पीकरको बतावें. ऐसा नहीं करनेसे उसको निलंबित किया जा सकता है. यदि कोई सर्वोच न्यायालयमें जनयाचिका प्रस्तूत करे तो सभी संसदोंको जनसेवक (पब्लिक सर्वन्ट) घोषित किया जा सकता है. इसके अतिरिक्त भी राहुलका नैतिक धर्म बनता है.

खास करके इन्दिरा गांधीकी स्थापित प्रणालीके अनुसार गुप्तता रखना नहेरुवीयनोंका संस्कार बना है. सोनिया गांधीकी चिकित्सा जननिधि (पब्लिक फंड)में से हुई और वह भी विदेशमें हुई. क्या चिकित्सा? कौनसे रोगकी चिकित्सा? कौनसे रग्णालयमें चिकित्सा हुई? ये सब माहिति गोपनीय रक्खी गयी.

समाचार माध्यमोंने भी इसबात पर आपत्ति नहीं जताई.

राहुलके अज्ञातवासका अंत. उसके आगमनको कैसे प्रदर्शित किया जाय?

क्या कोई युद्ध जिता? नहीं तो.

क्या कोई अभूतपूर्व सेवाका काम किया? नहीं तो.

स्वागत तो अभूतपूर्व करना ही पडेगा !

दिये जलाओ, पटाखे फोडो, अब तो आनंद मंगल हो गया.    

मानो झीम्बो कम्स टु टाऊन.

मूंह दिखाई की रसममें सब उमट पडे. मीडीया भी उमट पडा.

वह जो कुछ भी हो, हमारे समाचार माध्यमोंने हेड लाईन दिया

राहुलने नरेन्द्र मोदीको आडे हाथ लिया. “शुट बुट की सरकार”, “किसानसे छीनके उद्योगपतियोंको जमीन देनेवाली सरकार”, “किसानको जमीनके बदलेमें कुछ भी नहीं देनेवाली सरकार”, “किसानोका खेतीका अधिकार छीना” … “राहुल है आत्मविश्वाससे भरपूर”.

शुट बुट की सरकारसे क्या मतलब है?

क्या राहुके पिता और प्रपिता, दादी, वे सब, महात्मा गांधीकी तरह सिर्फ दो कपडेके टूकडे लपेटके घुमा करते थे? क्या वे शुटबुट पहेनते नहीं थे? क्या अन्य नेता भी महात्मा गांधी की तरह कपडा लपेटके घुमते थे और घुमते है?

राहुलको खूदके पूर्वजोंके चरित्रको याद करना चाहिये

ईन्दिरा गांधीको नहेरुकी गद्दी विरासतमें लेनेकी थी, इसलिये वे नहेरुके साथ ही रहा करती थीं. उनके साथ विदेश भी जाती थीं. एक बार उनको सरकारी विदेशी डीग्नीटरी होनेके नाते, मींक कोट जिसकी किमत ३००००० रुपये होती है, भेटमें मिला.

सरकारी नियम अनुसार उनको, या तो उसकी किमत जनकोषमें जमा करा देनी चाहिये, या तो वह प्रधानमंत्रीके वस्तुभंडारमें जमा करवा देना चाहिये. इन्दिरा गांधीने उस भेटको अपने पास ही रख लिया.

राम मनोहर लोहियाने कुछ साल बाद यह प्रश्न संसदमें उठाया कि, वह मींक कोट कहां गया? संसदमें हंगामा हुआ. तब जाके इन्दिराने उस कोटको राष्ट्रीय कोषमें जमा किया.

अब आप तुलना करो. नरेन्द्र मोदीने क्या करते है?

उनको जो भेट मिलती है वह एक बार, भेट देनेवाले के मानके लिये पहन लेते है. फिर उस भेटका निलाम कर देते हैं और भेटकी वास्तविक किमतसे कई गुना ज्यादा मूल्य प्राप्त करके जनकोषमें रकम जमा करवाते है.

किन्तु नहेरुवीयनोंमे ऐसी विचार धारा और प्रज्ञा कहां हो सकती है?    

भूमि अधिग्रहणकी चर्चाएं

मीडीयाने तो चर्चा बहूत चलाई, मीडीयाने कई बातें अनदेखी भी की.

जिजाजी वाढेराने जो भूमि अधिग्रहण किया तो कितना पैसा किसानको मिला?

यदि किसानकी हालत दयनीय है तो अभी ६० सालतक नहेरुवीयन कोंग्रेसने किसानके लिये क्या किया कि किसानको आज भी आत्म हत्या करनी पडती है?

किन्तु समाचार माध्यमने ऐसे प्रश्न नहीं उठाये.

भूमिअधिग्रहण विधेयकको निजी उद्योगसे कोई संबंध नहीं तो भी इसकी चर्चा होती रहेती है और कोंगी वक्ता बिना कोई आधार असंबद्ध बाते बिना रुके करता रहेता है और समय पसार करता है. मीडीया कोंगीयोंको ऐसी बाते करने देता है.

मीडीयाको भी असंबद्ध बातोंको हवा देनेका ज्यादा शौक है.

राहुलका अब कौनसे नंबरका अवतार चलता है? तो मीडीयाको पता है, तो राहुल को पता है. तो फिर राहुल का नया अवतार…. राहुलका नया अवतार …. ऐसा कहेते रहो …. वही पर्याप्त है.

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः मूंह दिखाई, सकारात्मक, नकारात्मक, निम्न स्तर, समाचार माध्यम, मीडीया, पंडित, अपरिपक्व, कार्यसूचि, पूर्व निश्चित, हंगामा, एजंडा, नहेरु, इन्दिरा, नहेरुवीयन कोंग्रेस, सांस्कृतिक साथी, प्रभावशाली

 

 

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गोब्बेल्स अन्यत्र ही नहीं भारतमें भी जिवित है.

WE SPREAD RUMOR

रामायण में ऐसा उल्लेख है कि रावणने राम के मृत्युकी अफवाह फैलायी थी. किन्तु सभी रामकाथाओंमें ऐसा उलेख नहीं है. रावणने अफवाह फैलायी थी ऐसी भी एक अफवाह मानी जाती है. सर्वप्रथम विश्वसनीयन अफवाहका उल्लेख महाभारतके युद्धके समय मिलता है, जब भीमसेन एक अफवाह फैलाता है किअश्वस्थामा मर गया”. यह बात अश्वस्थामाके पिता द्रोणके पास जाती है. किन्तु द्रोणके मंतव्यके अनुसार, भीमसेन विश्वसनीय नहीं है. द्रोण इस घटनाकी सत्यताके विषय पर सत्यवादी युधिष्ठिरसे प्रूच्छा करते है. युधिष्ठिर उच्चरते हैनरः वा कुंजरः वा (नरो वा कुंजरो वा)”. लेकिन नरः शब्द उंचे स्वरमें बोलते है और कुंजरः (हाथी) धीरेसे बोलते है जो द्रोणके लिये श्रव्य सीमा से बाहर था. तो इस प्रकार पांण्डव पक्ष, अफवाह फैलाके द्रोण जैसे महारथी को मार देता है.

अर्वाचिन युगमें गोब्बेल्स नाम अफवाहें फैलानेवालोंमे अति प्रख्यात है. ऐसा कहा जाता है कि, उसने अफवाहें फैलाके शत्रुसेनाके सेनापतियोंको असमंजसमें डाल दिया था.

अफवाह की परिभाषा क्या है?

अफवाहको संस्कृतभाषामें जनश्रुति कहेते है. जनश्रुति का अर्थ है एक ऐसी घटना जिसके घटनेकी सत्यताका कोई प्रमाण नहीं होता है. इसके अतिरिक्त इस घटनाको सत्यके रुपमें पुरष्कृत किया जाता है या तो उसका अनुमोदन किया जाता है. और इस अनुमोदनमें भी किया गया तर्क शुद्ध नहीं होता है. एक अफवाहकी सत्यताको सिद्ध करने के लिये दुसरी अफवाह फैलायी जाती है. और ऐसी अफवाहोंकी कभी एक लंबी शृंखला बनायी जाती है कभी उसकी माला भी बनायी जाती है.

अफवाह उत्पन्न करो और प्रसार करो

कई बार अफवाह फैलाने वाला दोषित नहीं होता है. वह मंदबुद्धि अवश्य होता है. जिन्होंने अफवाहका जनन किया है वे लोग, ऐसे मंदबुद्धि लोगोंका एक प्रसारण उपकरण (टुल्स), के रुपमें उपयोग करते है. ऐसा भी होता है कि ऐसे प्रसारमाध्यमव्यक्ति अपने स्वार्थके कारण या अहंकारके कारण अफवाह को सत्य मान लेता है और प्रसारके लिये सहायभूत हो जाता है.

अफवाहें फैलानेमें पाश्चात्य संस्कृतियां का कोई उत्तर नहीं.

वास्तवमें तो स्वर्ग, नर्क, सेतान, देवदूत, क्रोधित होनेवाला ईश्वर, प्रसन्न होनेवाला ईश्वर, कुछ लोगोंकोये तो अपनवाले हैऔर दुसरोंकोंपरायेकहेने वाला ईश्वर, यही धर्म श्रेष्ठ है, इसी धर्मका पालन करनेसे ईश्वरकी प्राप्ति हो सकती है, इस धर्मको स्विकारोगे तो तुम्हारा पाप यह देवदूत ले लेगा, ये सभी कथाएं और मान्यताएं भी अफवाह ही तो है.

कामदेव, विष्णु भगवानका पुत्र था. “कामका यदि प्रतिकात्मक अर्थ करें तो नरमादामें परस्पर समागमकी वृत्ति को काम कहा जाता है.

भारतीय संस्कृतिमें तत्वज्ञानको प्रतिकात्मक करके, काव्य के रुपमें उसको लोकभोग्य बनानेकी एक प्रणाली है.  इस तरहसे जन समुदायको तत्वज्ञान अवगत करानेकी परंपरा बनायी है.

काम भी एक देव है. देवसे प्रयोजित है शक्ति या बल.

कामातुर जिवकी कामेच्छा कब मर जाती है?

जब कामातुर व्यक्तिको अग्निकी ज्वालाका स्पर्ष हो जाता है, तब उसकी कामेच्छा मर जाती है. लेकिन काम मरता नहीं है. इस प्राकृतिक घटनाको प्रतिकात्मक रुपमें इस प्रकार अवतरण किया कि रुद्रने (अग्निने) कामको भष्म कर दिया. किन्तु देव तो कभी मर नहीं ता. अब क्या किया जाय? तो तत्पश्चात्इश्वरने उसको सजिवोंमे स्थापित कर दिया. बोध है कि कामदेव सजिवमें विद्यमान है.

जनश्रुतियानीकी अफवाह भी जनसमुदायोंमे जिवित है. हांजी, प्रमाण कितना है वह चर्चा का विषय है.

इतिहासमें जनश्रुति (अफवाहें रुमर);

पाश्चात्य इतिहासकारोंने भारतके पूरे पौराणिक साहित्यको अफवाह घोषित कर दिया. पुराणोमें देवोंकी और ईश्वरकी जो प्रतिकात्मक या मनोरंजनकी कथायें थी उनकी प्रतिकात्मकताको इन पाश्चात्य इतिहासकारोंने समझा नही या तो समझनेकी उनकी ईच्छा नहीं थी क्योंकि उनका ध्येय अन्य था. उनको उनकी ध्येयसूची (एजन्डा)के अनुसार, कुछ अन्य ही सिद्ध करनेका था. उस ध्येय सूचि के अनुसार उन्होंने इन सब प्रतिकात्मक ईश्वरीय कथाओंको मिथ्या घोषित कर दिया. और  उनको आधार बनाके भारतमें भारतवासीयोंके लिखे इस इतिहासको अफवाह घोषित कर दिया.

भारत पर आर्योंका आक्रमणः

पराजित देशकी जनताको सांस्कृतिक पराजय देना उनकी ध्येयसूची थी. अत्र तत्र से कुछ प्रकिर्ण वार्ताएं उद्धृत करके उसमें कालगणना. भाषाकी प्रणाली, जन सामान्यकी तत्कालिन प्रणालीयां, प्रक्षेपनकी शक्यताआदि को उपेक्षित कर दिया.   

आर्य, अनार्य, वनवासी, आदि जातियोंमें भारतकी जनताको विभाजित करके भारतीय संस्कृतिको भारतीय लोगोंके लिये गौरवहीन कर दिया. ऐसी तो कई बातें हैं जो हम जानते ही है.

ऐसा करना उनके लिये नाविन्य नहीं था. ऐसी ही अफवाहें फैलाके उन्होने अमेरिकाकी माया संस्कृतिको और इजिप्तकी महान संस्कृतिको नष्ट कर दिया था. पश्चिम एशियाकी संस्कृतियां भी अपवाद नहीं रही है.

आप कहोगे कि इन सब बातोंका आज क्या संदर्भ है?

संदर्भ अवश्य है. भारतीय संस्कृतिकी प्रत्येक प्रणालीयोंमें इसका संदर्भ है और उसका प्रास्तूत्य भी है.

अफवाहें फैलाके दुश्मनोंमें विभाजन करना, दुश्मनोंकी सांस्कृतिक धरोहर को नष्ट करना, दुश्मनोंकी प्रणालीयोंको निम्नस्तरीय सिद्ध करना और उसका आनंद लेना ये सब उनके संस्कार है. आज भी आपको यह दृष्टिगोचर होता है.

भारतमें इन अफवाहोंके कारण क्या हुआ?

भारतकी जनतामें विभाजन हुआ. उत्तर, दक्षिण, पूर्वोत्तर, हिन्दु, मुस्लिम, ख्रीस्ती, भाषा, आर्य, अनार्य, ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, शुद्र, वनवासी, पर्वतवासी, अंग्रेजीके ज्ञाता, अंग्रेजीके अज्ञाता  आदि आदिइनमें सबसे भयंकर भेद धर्म, जाति और ज्ञाति.

मुस्लिमोंमें यह अफवाह फैलायी कि वे तो भारतके शासक थे. उन्होने भारतके उपर ०० साल शासन किया है. उन्होंने ही भारतीयोंको सुसंस्कृत किया है. भारतकी अफलातुन इमारतें आपने ही तो बनायी. भारतके पास तो कुछ नहीं था. भारत तो हमेशा दुश्मनों से २५०० सालोंसे हारता ही आया है. सिकंदरसे लेके बाबर तक भारत हारते ही आया है.

ख्रीस्ती और मुसलमानोंने भारतके निम्न वर्णको यह बताया कि आपके उपर उच्च वर्णके लोगोंने अमानवीय अत्याचार किया है. दक्षिण भारतकी ब्राह्मण जनताको भी ऐसा ही बताया गया. इन कोई भी बातोंमे सत्यका अभाव था.

सबल लोग, निर्बल लोगोंका शोषण करे ऐसी प्रणाली पूरे विश्वमें चली है और आज भी चलती है. केवल सबल और निर्बलके नाम बदल जाते है. भारतमें शोषण, अन्य देशोंके प्रमाणसे अति अल्प था. जो ज्ञातियां थी वे व्यवसाय के आधार पर थी. और पूरा भारतीय समाज सहयोगसे चलता था.

धार्मिक अफवाहेः

धर्मकी परिभाषा जो पाश्च्यात देशोंने बानायी है, वह भारतके सनातन धर्म को लागु नहीं पड सकती. किन्तु यह समझनेकी पाश्चात्य देशोंकी वृत्ति नहीं है या तो उनकी समझसे बाहर है.

भारतके अंग्रेजीज्ञाताओंकी मानसिकता पराधिन है. इतिहास, धरोहर, प्रणालीयां, तत्वज्ञान, वैश्विक भावना, आदिको एक सुत्रमें गुंथन करके भारतीय विद्वानोंने भारतकी संस्कृतिमें सामाजिक लयता स्थापित की है. लयता और सहयोग शाश्वत रहे इस कारण उन्होंने स्थितिस्थापकता भी रक्खी है.

किन्तु तथ्योंको समझना और आत्मसात्करना पाश्चात्य विद्वानोंके मस्तिष्कसे बाहर की बात है. इस लिये उन्होंने ऐसी अफवाहें फैलायी कि, हिन्दु देवदेवीयां तो बिभत्स है. उनके उपासना मंत्र और पुस्तकें भी बिभत्स है. वे लोग जननेन्द्रीयकी पूजा करते है. उनके देव लडते भी रहेते है और मूर्ख भी होते है. भला, देव कभी ऐसे हो सकते हैं? पाश्चात्य भाषी इस प्रकार हिन्दु धर्मकी निंदा करके खुश होते हैं.

वेदोंमे और कुछ मान्य उपनिषदोंमे नीहित तत्वज्ञानका अर्क जो गीतामें है उनको आत्मसात तो क्या किन्तु समझनेकी इन लोगोंमें क्षमता नहीं है.

शास्त्र क्या है? इतिहास क्या है? समाज क्या है? कार्य क्या है? इश्वर क्या है? आत्मा क्या है? शरीर सुरक्षा क्या है? आदि में प्रमाणभूत क्या है, इन बातोंको समझनेकी भी इन विद्वानोंमे क्षमता नहीं है. तो ये लोग इनके तथ्योंको आत्मसात्तो करेंगे ही कैसे?  

राजकीय अफवाहेः

दुसरों पर अधिकार जमाना यह पाश्चात्य संस्कृतिकी देन है.

भारतमें गुरु परंपरा रही है. गुरु उपदेश और सूचना देता है. हरेक राजाके गुरु होते थे. राजाका काम सिर्फ गुरुनिर्देशित और सामाजिक मान्यता प्राप्त प्रणालियोंके आधार पर शासन करना था. भारतका जनतंत्र एक निरपेक्ष जनतंत्र था. गणतंत्र राज्य थे. राजाशाही भी थी. तद्यपि जनताकी बात सूनाई देती थी. यह बात केवल महात्मा गांधी ही आत्मसात कर सके थे.

भारतकी यथा कथित जनतंत्रको अधिगत करनेकी नहेरुमें क्षमता नहीं थी. नहेरुको भारतीय संस्कृति और संस्कारसे कोई लेना देना नहीं था. उन्होंनें तो कहा भी था किमैं (केवल) जन्मसे (ही) हिन्दु हूं. मैं कर्मसे मुस्लिम हूं और धर्मसे ख्रीस्ती हूं. नहेरुको महात्मा गांधी ढोंगी लगते थे. किन्तु यह मान्यता  उन्होंने गांधीजीके मरनेके सात वर्षके पश्चात्‍, केनेडाके एक राजद्वारी व्यक्तिके सामने प्रदर्शित की थी.

नहेरुकी अपनी प्राथमिकता थी, हिन्दुओंकी निंदा. नहेरुने हिन्दुओंकी निंदा करनेकी बात, आचारमें तभी लाया, जब वे एक विजयी प्रधान मंत्री बन गये.

हिन्दु महासभा को नष्ट करनेमें नहेरुका भारी योगदान था.

वंदे मातरम्और राष्ट्रध्वजमें चरखाका चिन्ह को हटानेमें उनका भारी योगदान था. गौ रक्षा और संस्कृतभाषाकी अवहेलना करना, मद्य निषेध करना, समाजको अहिंसाकी दिशामें ले जाना, अंग्रेजीको अनियत कालके लिये राष्ट्रभाषा स्थापित करके रखना, समाजवादी (साम्यवादी) समाज रचना आदि सब आचारोंमे नहेरुका सिक्का चला. उन्होंने तथा कथित समाजवाद, हिन्दी चीनी भाई भाई, स्व कथित और स्व परिभाषित धर्म निरपेक्षताकी अफवाहें फैलायी. इन सभी अफवाहोंको अंग्रेजी ज्ञाताजुथोंने स्वकीय स्वार्थके कारण अनुमोदन भी किया.

जनतंत्र पर जो प्रहार नहेरु नहीं कर पाये, वे सब प्रहार इन्दिरा गांधीने किया.

इन्दिरा गांधी, अफवाहें फैलानेमें प्रथम क्रम पर आज भी है.

इन्दिरा गांधीने जितनी अफवाहें फेलायी थी उसका रेकॉर्ड कोई तोड नहीं सकता. क्यों कि अब भारतमें आपात्काल घोषित करना संविधानके प्रावधानोंके अनुसार असंभव है.

सुनो, ऑल इन्डिया रेडियो क्या बोलता था?

एक वयोवृद्ध नेता, सेनाको और कर्मचारीयोंको विद्रोहके लिये उद्युत कर रहा है. (संदर्भः जय प्रकाश नारायणने कहा था कि सभी सरकारी कर्मचारी संविधानके नियमोंसे बद्ध है. इसलिये उनको हमेशा उन नियमोंके अनुसार कार्य करना है. यदि उनका उच्च अधिकारी या मंत्री नियमहीन आज्ञा दें तो उनको वह आदेश लेखित रुपमें मांगना आवश्यक है.) किन्तु उपरोक्त समाचार  ‘एक वयोवृद्ध नेता, सेनाको और कर्मचारीयोंको विद्रोहके लिये उद्युत कर रहा हैसातत्य पूर्वक चलता रहा.

उसी प्रकारआपातकाल अनुशासन हैका अफवाहयुक्त अर्थघटन यह किया गया कि, “आपातकाल एक आवश्यक और निर्दोष कदम है और विनोबा भावे इस कदमसे सहमत है.”

विनोबा भावेने खुदने इस अयोग्य कदमके विषय पर स्पष्टता की थी, “यदि वास्तवमें देशके उपर कठोर आपत्ति है तो यह, एक शासककी समस्या नहीं है, यह तो पुरे देशवासीयोंकी समस्या है. इस लिये देशको कैसे चलाया जाय इस बात पर सिर्फ (सत्ताहीन) आचार्योंकी सूचना अनुसार शासन होना चाहिये. क्योंकि आचार्योंका शासन ही अनुशासन है. “आचार्योंका अनुशासन होता है. सत्ताधारीयोंका शासन होता है.”

विनोबा भावे का स्पष्टीकरण दबा दिया गया. सत्यको दबा देना भी तो अफवाहका हिस्सा है.

एक वयोवृद्ध नेता (मोरारजी देसाई) के लिये प्रतिदिन २० कीलोग्राम फल का खर्च होता है.” यह भी एक अफवाह इन्दिरा गांधीने फैलायी थी. मोरारजी देसाईने कहा कि यदि मैं प्रतिदिन २० कीलोग्राम फल खाउं तो मैं मर ही जाउं.

ऐसी तो सहस्रों अफवायें फैलायी जाती थी. अफवाहोंके अतिरिक्त कुछ चलता ही नहीं था.

समाचार माध्यमों द्वारा प्रसारित अफवाहें

आज दंभी धर्मनिरपेक्षताके पुरस्कर्ताओंने समाचार पत्रों और विजाणुंमाध्यमों द्वारा अफवाहें फैलानेका ठेका नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंके पक्षमें ले लिया है.

मोदीफोबीयासे पीडित नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनके साथीयोंके द्वारा कथित उच्चारणोंसे नरेन्द्र मोदी कौनसा जानवर है या वह कौनसा दैत्य है, या वह कौनसा आततायी है, इन बातों को छोड दो. यह तो गाली प्रदान है. ऐसे संस्कारवालोंने (नहेरुवीयनोंने) इन लोगोंका नाम बडा किया है.

किन्तु भूमि अधिग्रहण विधेयक, आतंकवाद विरोधी विधेयक, उद्योग नीति, परिकल्पनाएं, विशेष विनिधान परिक्षेत्र (स्पेश्यल इन्वेस्टमेंट झोन), आदि विकास निर्धारित योजनाओं के विषय पर अनेक अफवाहें ये लोग फैलाते हैं. इसके विषय पर एक पुस्तक लिखा जा सकता है.

उदाहरण के तौर पर, भूमिअधिग्रहणमें वनकी भूमि नहीं है तो भी वनवासीयोंको अपने अधिकार से वंचित किया है, ऐसी अफवाह फैलायी जाती है. कृषकोंको अपनी भूमिसे वंचित करनेका यह एक सडयंत्र है. यह भी एक अफवाह है. क्यों कि उसको चार गुना प्रतिकर मिलता है जिससे वह पहेलेसे भी ज्यादा भूमि कहींसे भी क्रय कर सकते है.

आतंकवाद विरुद्ध हिन्दु और भारत समाज सुरक्षाः

कश्मिरके हिन्दुओंने तो कुछ भी नहीं किया था.

तो भी, १९८९९० में कश्मिरी हिन्दुओंको खुल्ले आम, अखबारोंमें, दिवारों पर, मस्जिदके लाउड स्पीकरों द्वारा धमकियां दी गयी कि, “इस्लाम कबुल करो या तो कश्मिर छोड दो. यदि ऐसा नहीं करना है तो मौतके लिये तयार रहो.” फिर ३००० से भी अधिक हिन्दुओंकी कत्ल कर दी. और उनके उपर हर प्रकारका आतंक फैलाया. लाख हिन्दुओंको अपना घर छोडना पडा. उनको अपने प्रदेशके बाहर, तंबूओंमे आश्रय लेना पडा. उनका जिवन तहस नहस हो गया है.

ऐसे आतंकके विरुद्ध दंभी धर्मनिरपेक्ष जमात मौन रही, नहेरुवीयन कोंग्रेसनेतागण मौन रहा, कश्मिरी नेतागण मौन रहा, समाचार माध्यम मौन रहा, मानव अधिकार सुरक्षा संस्थाएं मौन रहीं, समाचार पत्र मौन रहें, दूरदर्शन चेनलें मौन रहीं, सर्वोदयवादी मौन रहेंये केवल मौन ही नहीं निरपेक्ष रीतिसे निष्क्रीय भी रहे. जिनको मानवोंके अधिकारकी सुरक्षाके लिये करप्रणाली द्वारा दिये जननिधिमेंसे वेतन मिलता है वे भी मौन और निष्क्रीय रहे. यह तो ठंडे कलेजेसे चलता नरसंहार ही था और यह एक सातत्यपूर्वक चलता आतंक ही है जब तक इन आतंकवादग्रस्त हिन्दुओंको सम्मानपूर्वक पुनर्वासित नहीं किया जाता.  

एक नहेरुवीयन कोंग्रेस पदस्थ नेताने आयोजन पूर्वक २००२ में गोधरा रेल्वे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेसका डीब्बा जलाकर ५९ स्त्री, पुरुष बच्चोंको जिन्दा जला दिया. ऐसा शर्मनाक आतंक, गुजरातमें प्रथम हुआ.

गुजरात भारतका एक भाग है. वह कोई संतोंका मुल्क नहीं है, तो वह भारत में, संतोंका एक टापु बन सकता है. यदि कोई ऐसी अपेक्षा रक्खे तो वह मूर्ख ही है.

५९ हिन्दुओंको जिन्दा जलाया तो हिन्दुओंकी प्रतिक्रिया हुई. दंगे भडक उठे. तीन दिन दंगे चले. शासनने दिनमें नियंत्रण पा लिया. जो निर्वासित हो गये थे उनका पुनर्वसन भी कर दिया. इनमें हिन्दु भी थे और मुसलमान भी थे. मुसलमान अधिक थे. से मासमें, स्थिति पूर्ववत्कर दी गयी.

तो भी गुजरातके शासन और शासककी भरपुर निंदा कर दी गयी और वह आज भी चालु है.

मुस्लिमोंने जो सहन किया उसके उपर जांच आयोग बैठे,

विशेष जांच आयोग बैठे,

सेंकडोंको जेलमें बंद किया,

न्यायालयोंमें केस चले.

सजाएं दी गयी.

इसके अतिरिक्त इसके उपर पुस्तकें लिखी गयीं,

पुस्तकोंके विमोचन समारंभ हुए,

घटनाके विषय को ले के हिन्दुओंके विरुद्ध चलचित्र बने,

अनेक चलचित्रोंमें इन दंगोंका हिन्दुओंके विरुद्ध और शासनके विरुद्ध प्रसार हुआ. इसके वार्षिक दिन मनाये जाने लगें.

२००२ के दंगोमें क्या हुआ था?

२००० से कम हुई मौत/हत्या जिनमें पुलीस गोलीबारीसे हुई मौत भी निहित है.

इसमें हिन्दु अधिक थे. ११४००० लोगोंको तंबुमें जाना पडा जिनमें / से ज्यादा हिन्दु भी थे

से महीनेमें सब लोगोंका पुनर्वसन कर दिया गया.

 

इनके सामने तुलना करो कश्मिरका हत्याकांड १९८९९०

हिन्दुओंने कुछ भी नहीं किया था.

३०००+ मौत हुई केवल हिन्दुओंकी.

५०००००७००००० निर्वासित हुए. सिर्फ हिन्दुओंको निर्वासित किया गया था.

शून्य पोलीस गोलीबारी

शून्य मुस्लिम मौत

शून्य पुलीस या अन्य रीपोर्ट

शून्य न्यायालय केस

शून्य गिरफ्तारी

शून्य दंड विधान

शून्य सरकारी नियंत्रण

शून्य पुस्तक

शून्य चलचित्र

शून्य दूरदर्शन प्रदर्शन

शून्य उल्लेख अन्यत्र माध्यम

शून्य सरकारी कार्यवायी

शून्य मानवाधिकारी संस्थाओंकी कार्यवाही

यदि हिन्दुओंका यही हाल है और फिर भी उनके बारेमें कहा जाता है कि, मुस्लिम आतंकवादकी तुलनामें हिन्दु आतंकवाद से देशको अधिक भय है ऐसा जब नहेरुवीयन कोंग्रेसका अग्रतम नेता एक विदेशीको कहेता है तो इसको अफवाह नहीं कहोगे तो क्या कहोगे?

अघटित को घटित बताना, संदर्भहीन घटनाको अधिक प्रभावशाली दिखाना, असत्य अर्थघटन करना, प्रमाणभान नहीं रखना, संदर्भयुक्त घटनाओंको गोपित रखना, निष्क्रीय रहना, अपना कर्तव्य नहीं निभानाये सब बातें अफवाहोंके समकक्ष है. इनके विरुद्ध दंडका प्रावधान होना आवश्यक है.

और कौन अफवाहें फैलाते हैं?

लोगोंमें भी भीन्न भीन्न फोबिया होता है.

मोदी और बीजेपी या आएसएस फोबीया केवल दंभी धर्मनिरपेक्ष पंडितोमें होता है ऐसा नहीं है, यह फोबीया सामान्य मुस्लिमोंमें और पाश्चात्य संस्कृति से अभिभूत व्यक्तिओमें भी होता है. ऐसा ही फोबीया महात्मा गांधी के लिये भी कुछ लोगोंका होता है. कुछ लोगोंको मुस्लिम फोबिया होता है. कुछ लोगोंको क्रिश्चीयन लोगोंसे फोबीया होता है. कुछ लोगोंको श्वेत लोगोंकी संस्कृतिसे या  श्वेत लोगोंसे फोबिया होता है. वे भी अपनी आत्मतूष्टिके लिये अफवाहें फैलाते है.  ये सब लोग केवल तारतम्य वाले कथनों द्वारा अपना अभिप्राय व्यक्त करके उसके उपर स्थिर रहते हैं.

शिरीष मोहनलाल दवे

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नरेन्द्र मोदीको क्या बनना चाहिये? कौटिल्य अथवा पृथ्वीराज चौहाण? – २

मुहम्मद घोरीने किसीको भी क्षमा किया नहीं था. ठीक उसी प्रकार नहेरुवीयन कोंग्रेसने भी कभी अपने देशी शत्रुको क्षमा किया नहीं था. उतना ही नहीं फर्जी मामले बनाकर भी उसकी मानहानि करनेकी और न्यायिक कार्यवाही द्वारा उसको हानि करनेके भरपुर प्रयत्न किये है.

नहेरुः
नहेरुने अपने विरोधी मोरारजीके विरुद्ध मोरारजीकी संतानको लेकर फर्जी कथाएं चलाइ थीं. कामराजप्लान के अंतर्गत एक फर्जी प्लान बनाके मोरारजी देसाईको मंत्री मंडलसे निकाला गया था.

Narendra Modi has to decide ०१

ईन्दीरा घाण्डीः

ईन्दिरा घान्डी नहेरुवाली नीति चलाके मोरारजीकी मानहानि करवाती रहती थीं.

इन्दिराने आपातकाल के दौरान कई नेताओंको मरणासन्न कर दिया था.

आपतकाल खुद एक फॉड था.

वीपी सींग के विरुद्ध सेंटकीट्स मे उनके नाम फर्जी एकाउन्टका केस दर्ज किया था.

सर्वोदय संस्थाओंके खिलाफ जांचके आदेश दिये थे और सर्वोदय संस्थाओंको निर्दोष होते हुए भी परेशान किया था.

मोरारजी देसाई सीआईएके वेतन पत्रक (पे रोल) पर है ऐसे आक्षेप करवाये थे.

जयप्रकाश नारायणने सैन्य को विद्रोह करनेका कहा था ऐसे आक्षेप करके उनको कारावसमें बंद किया था. अन्य हजारों नेताओंको भी कारावास में बंद किया था.

तारकेश्वरी सिंहाके उपर असत्य आक्षेप करवाये और उनको आत्म हत्या करनी पडी(!).

ज्योर्ज फर्नान्डीस पर फर्जी केस बनाया था और उनको जेलमें बंद किया था.

सोनीया-एमएमएसः

बाबा राम देव को फर्जी केस बनाके परेशान किया, अन्ना हजारे को भी परेशान किया, किरन बेदीके विरुद्ध आक्षेप करके परेशान किया, बाजपाईका किस्सा और अडवाणीकी घटनाएं तो हमने देख ही ली है.

नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, आदि के विरुद्ध फर्जी केस बनवाये.

पुलिसका मोरल डाउन करनेके कई और काम भी किये.

नहेरुवीयन और उनके साथीयोंका संस्कार रहा है कि खुदकी सत्ता और धनके लिये कुछ भी करो, चाहे देशका सामाजिक चारित्र्य कितना ही अधम क्युं न हो जाय.

जो लोग वोटबेंकी सियासत खेलते है वे हमेशा पुलिस और सीबीआई का यथेच्छ उपयोग करते हैं. सरकारी अधिकारीयोंको भ्रष्ट होने देते हैं फिर उनके भ्रष्टाचारके आधार पर उनसे गलत काम करवाते हैं. अन्य लोगोंकी भी ब्लेक डायरी बनाई जाती है जिनमें लालु, मुलायम, ममता, मायावती, जयललिता, करुणानिधि शरद पवार मुख्य है.

ये सब अर्वाचीन मुहम्मद घोरी है.

इन अर्वाचीन मुहम्मद घोरीयोंको कैसे नष्ट कर सकते है?

अति सरल है. क्युं कि ये लोग अतिभ्रष्ट है, जहां भी हाथ डालो उनका भ्रष्टाचार पकडा जा सकता है.

(१) आपातकालमें जिन्होने ईन्दिरा गांधीकी सहायता की थी और जो लोग अभी भी जीवित है, उनके उपर शाह जांच समितिके सूचनोंके आधार पर कार्यवाही हो सकती है. उनको गिरफ्तार कर लो और जेलमें डाल दो. कार्यवाही होती रहेगी.

(२) एन्डरसनको भगाने वालोंमें सोनिया गांधी एक पक्षकार बन सकती है. उनके उपर भी ऐसी ही कार्यवाही हो सकती है.

(३) कश्मिरी हिन्दुओंके प्राकृतिक अधिकारके हनन और लगातार हो रहे मानवीय अधिकार के हननके मामलेमें, अपना फर्ज न निभानेके कारण, कश्मिरके सभी नेताओंको तथा नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंको शिघ्र ही प्रग्रहित (गिरफ्तार) कर सकते हैं. उनकी संपत्ति जप्त कर सकते है.

(४) नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंने और उनके साथीयोंने विदेशी बेंकोमें बीना रीझर्वबेंककी संमति गैरकानुनी एकाउन्ट खोलके काला-लाल धन जमा किया, इस बात पर उन सबके उपर फौजदारी कार्यवाही कर सकते है. क्यों कि यह देशके साथ गद्दारीका विषय है ये सब एकाउन्ट होल्डर गिरफ्तार हो सकते है. इन एकाउन्टोंका राष्ट्रीयकरण करके सबके नाम प्राप्त किया जा सकता है और जो लोग एकाउन्ट होल्डर न हो किन्तु मनिनीत (नोमीनी) व्यक्ति हो तो भी उसके उपर फौजदारी कार्यवाही हो सकती है.

(५) कोमनवेल्थ गेम, कोयला आबंटन और २-जी के बारेमें कई नेताओंको गिरफ्तार करके जेलमें रखा जा सकता है.

(६) भारतीय करन्सी नोट के मुद्रणका संविदा (ठेका) जिसको दिया था वह आतंकी संगठनोंसे संलग्न होनेके कारण अन्य देशोंमे प्रतिबंधित थी. फिर भी नहेरुवीयन कोंग्रेसने उसको मुद्रणका संविद दिया. कई कर्जी करन्सी नोट सरकारी बेंकके एटीएम यंत्रमेंसे निकली थी. इससे यह निरपेक्ष प्रतिबिंबित होता है कि नहेरुवीयन कोंग्रेसके ही नेतागण इससे संलग्न है. इस मामले पर भी कई नेताओंको गिरफ्तार किया जा सकता है.

(७) कई नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण जातीय मामलेमें विवादित है. उनके उपर कार्यवाही शुरु की जा सकती है.

दुसरे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

कई नहेरुवीयन कोंग्रेसके मुसलमान नेताओंकी संतान अभद्र और विभाजनवादी कोमवादी भाषा प्रयोग करती रहेतीं हैं इतना ही नहीं कई नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके साथी नेताओंने कोमवादी उच्चारण अनेकानेक बार किया है उनको गिरफ्तार करके जेलमें बंद कर सकते है.

तीसरे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

ये है समाचार माध्यमके स्वामि. जिनका काम समाजिक शिक्षाका काम करना है. उसके स्थान पर वे देशको विभाजित करनेका काम करते हैं. इनके पाससे हमेशा उचित अवसरों पर स्पष्टिकरण मांगते रहेना चाहिये और जब वे विफल रहें तो उनका अनुमति पत्र रद करनेका और कानुनी कार्यवाहीका आरंभ कर देना चाहिये.

चौथे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

ख्रिस्ती धर्मके पादरी लोग हैं. ये लोग हिन्दु धर्मकी निंदा करते हैं. तत्कालिन बने इसाईयोंको हिन्दुओंसे संबंध न रखने के लिये प्रभावित करते हैं और विभाजनवादी प्रवृतियां करते हैं. गरीब हिन्दुओंको लालच दे के धर्म परिवर्तन करवाते हैं. ऐसे पादरीयों पर सुक्ष्म दृष्टि रखकर कानुनी कार्यवाही की जा सकती है.

पांचवे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

ये है सरकारी अफसर. इनका काम नियमका पालन करना है और नियमका पालन करवाना है. इस कामके लिये उनको वेतन मिलता है. वे अपनी क्षतियांके लिये और सामाजिक अव्यवस्थाके लिये उत्तरदेय है.

नरेन्द्र मोदीको चाहिये कि इनको सीधा करें. यदि इनको सीधा करेंगे तो सब कुछ सीधा हो जायेगा.

कार्यवाही कैसे की जाय?

जो भी कार्यवाही करनी है, वह किसी भी प्रकारका कोलाहल किये बिना करना है. इसमें कोई निवेदनों की या विज्ञापन देनेकी आवश्यकता नहीं हैं. यदि कोई समाचार माध्यमवाले अनावश्यक प्रश्न करें तो उनके उपर भी जनताको पथभ्रष्ट करनेकी और जनताको भ्रमित करनेके आरोप लगाके कानुनी कार्यवाही हो सकती है.

अन्य कई कार्य है जो विकास, कानुन सुधार और गवर्नन्सके बारेमें हैं वे होते रहेंगे, क्यों कि प्रत्येक विकासकी परिकल्पनाके निदेशकका उत्तरदायित्व है कि वह अपना पूर्ण करें. और वह करेगा ही. उपरोक्त कार्य जिसमें कानुनमें संशोधनकी आवश्यक नहीं है, वे प्रारंभ कर सकते हैं. वास्तवमें नियम तो प्रत्येक उत्तरदायुत्वके लिये है. केवल अर्थघटन नहीं किया जाता है.

ऐसा नहीं करेंगे तो क्या होगा?

इतिहासका पुनरावर्तन होगा.

यदा तदा दुश्मनके कुकर्मोंको क्षमा किया है तब देशको सहन करना पडा है.

(१) नहेरुने प्रेमभाव रखके चीनकी लश्करी घुसपैठकी उपेक्षा की तो चीनने भारतकी ९१००० चोरस मील धरती पर अधिकार जमा लिया. हमारे हजारों जवान बेमौत मरे.

(२) इन्दीरा घान्डीने पाकिस्तानके साथ बेवकुफी बतायी और सिमला करार किया जिससे पाकिस्तानने जो खोया था वह सब पा लिया. बंग्लादेशने अपना देश पा लिया और एक करोड बीन बंगाली मुस्लिमोंसे छूटकारा भी पा लिया जो आज भारतके शिर पर है. १९७१में भारतके सैन्यने पायी हुई विजयके कारण, इन्दिरा इतनी सीमा तक सशक्त बनी थी कि वह पाकिस्तान, बांग्लादेश और कश्मिरके साथ जो चाहे वे शर्तें लागु कर सकती थीं. यदि इन्दिरा चाहती तो पूरे कश्मिर पर भारतका अधिकार स्थापित करके कलम ३७०को खत्म कर सकती थी. सिमला करार एक व्यंढ करार था. आज पाकिस्तान भारत पर आतंकी आक्रमण करता है. इन्दिराकी दुश्मन देशको क्षमा करने के कारण हजारों भारतीय जवानोंकी सहादत पर पानी फिर गया. और दुश्मनके आतंकोंसे भी हजारो बेमौत मरे.

(३) मोरारजी देसाईने पक्ष विरोधी प्रवृत्तिके लिये चरणसिंघको मंत्रीमंडलसे निष्कासित कर दिया था. चरणने क्षमायाचना की. अटल बिहारी बाजपाईने मोरारजी देसाईको कहा कि उनको माफ कर दो. मोरारजी देसाईने, बाजपाईके कहेने पर चरणको माफ किया और उसको फिरसे मंत्री मडलमें लिया.

(४) चरण सिंघने अपना एक गुट बनाया. इन्दिरा के उपरकी शाह कमीशनकी कार्यवाही आगे न बढायी और इन्दिराका सहयोग लेके मोरारजी देसाईकी सरकारका पतन करवाया. उसी इन्दिराने चरण सिंघकी सरकारको दिये हुए समर्थनको प्रत्याहृत करके चरण सिंघकी सरकारका पतन किया.

(५) राहुल गांधी जब जाली पासपोर्ट और नकदके साथ युएसमें पकडा गया तो बाजपायीने उसको मुक्त करवाया. उसीके कारण नहेरुवीयन कोंग्रेसको जिवनदान मिला. देशको १० साल तक लुटनेका एक अधिक अवसर नहेरुवीयन कोंग्रेसको मिला.
जिन्होंने प्रतिस्पर्धीको माफ किया उनको सहन करना पडा. नहेरु और इन्दिराने विदेशी दुश्मनोंको माफ किया, इससे देशको आज भी सहन करना पडता है.

मोरारजी देसाईने चरणसिंहको क्षमा किया तो देशको कोंग्रेस मुक्त शासन मिलनेमें ३५ वर्षकी देरी हो गई. इस अंतर्गत देशके लाखों मनुष्य बेमौत मरे और करोडों मनुष्योंको यातनाएं सहन करनी पडी. खरबों रुपयेकी तस्करी हुई वह वार्ता तो भीन्न ही है.

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः अर्वाचीन मुहम्मद घोरी, नहेरु, इन्दिरा, एन्डरसन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मोरारजी देसाई, आपातकाल, फ्रॉड, मरणासन्न, जयप्रकाश, मानहानि, कर्जी नोट, एटीएम यंत्र, सेन्ट कीट्स, सर्वोदय संस्था, सीआईए, पे-रोल, तारकेश्वरी सिंहा, ज्योर्ज फर्नान्डीस, सोनीया-एमएमएस, कारावास, गिरफ्तार, बाबा रामदेव, अन्ना हजारे, किरन बेदी, नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, कश्मिरी हिन्दु, विदेशी बेंक, काला-लाल धन

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हिन्दु और लघुमतीयोंको एक दुसरेसे क्या अपेक्षा है और अपेक्षा क्या होनी चाहिये? – १

प्रथम तो हमें यह समझना चाहिये कि हिन्दु और मुस्लिम कौन है?

ALL THE MUGALS WERE NOT COMMUNAL

यदि हम १८५७ के स्वातंत्र्य संग्रामकी मानसिकतामें अवलोकन करे तो हिन्दु और मुस्लिम दोनों हिन्दुस्तानी है. जब भी कोई एक जन समुदाय एक स्थानसे दुसरे स्थान पर जाता है तो वह समुदाय वहांके रहेनेवालोंसे हिलमिल जानेकी कोशिस करता है. यदि जानेवाला समुदाय शासकके रुपमें जाता है तो वह अपनी आदतें मूलनिवासीयों पर लादें ये हमेशा अवश्यक नहीं है. इस बातके उपर हम चर्चा नहीं करेंगे. लेकिन संक्षिप्तमें इतना तो कह सकते है कि तथा कथित संघर्षके बाद भी इ.स. १७०० या उसके पहेले ही हिन्दु और मुस्लिम एक दुसरेसे मिल गये थे. इसका श्रेष्ठ उदाहरण यह है कि, बहादुरशाह जफर के नेतृत्वमें हिन्दु और मुसलमानोंने अंग्रेज सरकारसे विप्लव किया था. और यह भी तय था कि सभी राजा, बहादुर शाह जफरके सार्वभौमत्वके अंतर्गत राज करेंगे.

अब यह बहादुर शाह जफर कौन था?

यह बहादुर शाह जफर मुगलवंशका बादशाह था. उसके राज्य की सीमा लालकिले की दिवारें थीं. और उतनी ही उसके सार्वभौमत्वकी सीमा थी. यह होते हुए भी सभी हिन्दु और मुस्लिम राजाओंने बहादुरशाह जफर का सार्वभौमत्व स्विकार करके मुगल साम्राज्यकी पुनर्स्थापनाका निर्णय किया था. इससे यह तो सिद्ध होता है कि हिन्दुओंकी और मुस्लिमों की मानसिकता एक दुसरेके सामने विरोधकी नहीं थी.

शिवाजीको अधिकृतमान न मिला तो उन्होने दरबारका त्याग किया

आजकी तारिखमें हिन्दुओंके हिसाबसे माना जाता है कि मुस्लिम बादशाहोंने हिन्दु प्रजा पर अति भारी यातनाएं दी है और जिन हिन्दुओंने इस्लामको स्विकारा नहीं उनका अति मात्रामें वध किया था. इस बातमें कुछ अंश तक सच्चाई होगी लेकिन सच्चाई उतनी नहीं कि दोनो मिल न पायें. अगर ऐसा होता तो औरंगझेबके सैन्यमें हिन्दु सैनिक और सरदार न होते और शिवाजीके सैन्यमें मुस्लिम सैनिक और सरदार न होते. शिवाजी मुगल स्टाईल की पगडी न पहेनते, और औरंगझेब शिवाजीके पोते शाहुको उसकी जागीर वापस नहीं करता. मुस्लिम राजाओंने अगर अत्याचार किया है तो विशेषतः शासक होने के नाते किया हो ऐसा भी हो सकता है. जो अत्याचारी शासक होता है उसको या तो उसके अधिकारीयोंको तो अपना उल्लु सिधा करनेके लिये बहाना चाहिये.

अब एक बात याद करो. २०वीं सदीमें समाचार और प्रचार माध्यम ठीक ठीक विकसित हुए है. सत्य और असत्य दोनोंका प्रसारण हो सकता है. लेकिन असत्य बात ज्यादा समयके लिये स्थायी नहीं रहेगी. सत्य तो सामने आयेगा ही. तो भी विश्वसनीय बननेमें असत्यको काफि महेनत करनी पडती है. वैसा ही सत्यके बारेमें है.

इन्दिरा गांधीके उच्चारणोंको याद करो.
१९७५में इन्दिरा गांधीने अपनी कुर्सी बचानेके लिये प्रचूर मात्रामें गुन्हाहित काम किये और करवाये. समाचार प्रसार माध्यम भी डरके मारे कुछ भी बोलते नहीं थे. लेकिन जब इन्दिरा गांधीके शासनका पतन हुआ और शाह आयोग ने जब अपना जांचका काम शुरु किया तो अधिकारीयोंने बोला कि उन्होने जो कुछ भी किया वह उपरकी आज्ञाके अनुसार किया. इन्दिराने खुल्ले आम कहा कि उसने ऐसी कोई आज्ञा दी नहीं थी. उसने तो संविधानके अंतर्गत ही आचार करनेका बोला था. अब ये दोनों अर्ध सत्य हैं. इन्दिरा गांधी और अधिकारीयोंने एक दुसरेसे अलग अलग और कभी साथमें भी अपना उल्लु सीधा करने की कोशिस की थी, और उस हिसाबसे काम किया था.

अपना उल्लु सीधा करो

मुगल साम्राट का समय लोकशाहीका और संविधान वाला समय तो था नहीं. ज्यादातर अधिकारी अपना उल्लु सीधा करनेकी सोचते है. मुगलके समयमें समाचार प्रसारके माध्यम इतने त्वरित तो थे नहीं. अफवाहें और बढा चढा कर भी और दबाके भी फैलाई जा सकती है. सुबेदार अपना धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और अंगत स्वार्थ के लिये अपना उल्लु सिधा करते रहे होगे इस बातको नकारा नहीं जा सकता.

औरंगझेब एक नेक बादशाह था वह साम्राटकी संपत्तिको जनता की संपत्ति समजता था. और वह खुद टोपीयां और टोकरीयां बनाके बेचता था और उस पैसे से अपना गुजारा करता था. उसका पूर्वज शाहजहां एक उडाउ शासक था. औरंगझेबको अपने सुबेदारोंकी और अधिकारीयोंकी उडाऊगीरी पसंद न हो यह बात संभव है. सुबेदार और अधिकारी गण भी औरंगझेबसे खुश न हो यह भी संभव है. इस लिये औरंगझेबके नामसे घोषित अत्याचारमें औरंगझेब खुदका कितना हिस्सा था यह संशोधनका विषय है. मान लिजिये औरंगझेब धर्मान्ध था. लेकिन सभी मुघल या मुस्लिम राजा धर्मान्ध नहीं थे. शेरशाह, अकबर और दारा पूर्ण रुपसे सर्वधर्म समभाव रखते थे. अन्य एक बात भी है, कि धर्मभीरु राजा अकेला औरंगझेब ही था यह बात भी सही नहीं है. कई खलिफे हुए जो सादगीमें, सुजनतामें और मानवतामें मानते थे. कमसे कम औरंगझेबके नामके आधार पर हम आजकी तारिखमें इस्लामके विरुद्ध मानसिकता रक्खें वह योग्य नहीं है. शिवाजी के भाग जाने के बाद औरंगझेब धर्मान्ध हो गया. इ.स. १६६६ से १६९० तकके समयमें औरंगझेबने कई सारे प्रमुख मंदिर तोडे थे. खास करके काशी विश्वनाथका मंदिर, सोमनाथ मंदिर और केशव मंदिर उसने तुडवाया थे. दक्षिण भारतके मंदिर जो मजबुत पत्थरके थे और बंद थे वे औरंगझेबके सेनापति तोड नहीं पाये थे. उसके यह एक जघन्य अपराध था. ऐसा पाया गया है कि उसके एक सलाहकारने उसको ऐसी सलाह दी थी कि नास्तिकोंको मुसलमान करना ही चाहिये. दो रुपया प्रति माह से लेकर एक साथ १००० रुपया प्रलोभन इस्लाम कबुल करने पर दिया जाता था. लेकिन जो औरंगझेबके खिलाफ गये थे उनका कत्ल किया जाता था. इस वजहसे उसके साम्राज्यका पतन हुआ था. क्यों कि सेक्युलर मुस्लिम और हिन्दु उसके सामने पड गये थे. औरंगझेबने कुछ मंदिर बनवाये भी थे और हिन्दुओंके (परधर्मीयोंके) उपर हुए अन्यायोंवाली समस्याओंका समाधान न्याय पूर्वक किया था. कोई जगह नहीं भी किया होगा. लेकिन हिन्दुओंके प्रमुख मंदिरोंको तुडवानेके बाद उसके अच्छे काम भूलाये गये. मुस्लिम और हिन्दु दोनों राजाओंने मिलकर उसका साम्राज्यको तहस नहस कर दिया. सबसे ज्यादा महत्व पूर्ण यह बात है कि उस समयके सभी राजाएं मुगल साम्राज्यके प्रति आदर रखते थे. और ऐसा होने के कारण ही औरंगझेबके बाद मुगल साम्राटके सार्वभौमत्वको माननेके लिये तैयार हुए थे. हिन्दु और मुस्लिम दोनों हिन्दुस्तानी थे. अगर हम सेक्युलर है और संविधान भी धर्म और जातिके आधार पर भेद नहीं रखनेका आग्रह रखता है, तो क्यूं हम सब आजकी तारिखमें हिन्दुस्तानी नहीं बन सकते? यह प्रश्न हम सबको अपने आप से पूछना चाहिये.
चलो हम इसमें क्या समस्यायें है वह देखें.

प्रवर्तमान कोमवादी मानसिकता सबसे बडी समस्या है.

कोमवाद धर्मके कारण है ऐसा हम मानते है. अगर यह बात सही है तो हिन्दु, मुस्लिम, जैन, बौद्ध, शिख, इसाई, यहुदियोंके बीचमें समान रुपसे टकराव होता. कमसे कम हिन्दु, मुस्लिम और इसाईयोंके बीच तो टकराव होता ही. किन्तु बीलकुल ऐसा नहीं है. पाकिस्तानमें शियां और सुन्नी के बिचमें टकराव है. शियां और सुन्नीमें टकराव कब होता है या तो कब हो सकता है? अगर शियां और सुन्नी भेदभाव की नीति अपनावे तो ऐसा हो सकता है.

कोई भेदभाव की नीति क्यों अपनायेगा?

अगर अवसर कम है और अवसरका लाभ उठाने वाले ज्यादा है तो मनुष्य खुदको जो व्यक्ति ज्यादा पसंद है उसको लाभ देनेका प्रायः सोचता है.

अवसर क्या होता है?

अवसर होता है उपयुक्त व्यक्तियोंके सामने सहाय, संवर्धन, व्यवसाय, संपत्ति, ज्ञान, सुविधा, धन, वेतन देना दिलानेका प्रमाण (जत्था) होता है. अगर अवसर ज्यादा है तो भेदभाव की समस्या उत्पन्न होती नहीं है. लेकिन अगर अवसर कम है, और उपयुक्त यक्ति ज्यादा है तो, देनेवाला या दिलानेवाला जो मनुष्य है, कोई न कोई आधार बनाकर भेदभाव के लिये प्रवृत्त होता है.
इस समस्याका समाधान है अवसर बढाना.

अवसर कैसे बढाये जा सकते है?

प्राकृतिक स्रोतोंका, ज्ञानके स्रोतोंका और उपभोग्य वस्तुओंका उत्पादन करने वाले स्रोतोंमें विकास करनेसे अवसर बढाये जा सकते है. अगर यह होता है तो भेदभावकी कम और नगण्य शक्यता रहती है.

अवसर रातोंरात पैदा नहीं किये जा सकते है यह एक सत्य है.

अवसर और व्यक्तिओंका असंतुलन दूर करनेके लिये अनियतकाल भी नहीं लगता, यह भी एक सत्य है.

जैसे हमारे देशमें एक ही वंशके शासकोंने ६० साल केन्द्रमें राज किया और नीति-नियम भी उन्होने ही बनाये थे, तो भी शासक की खुदकी तरफसे भेदभावकी नीति चालु रही. अगर नीति नियम सही है, उसका अमल सही है और मानवीय दृष्टि भी रक्खी गई है तो आरक्षण और विशेष अधिकार की १० सालसे ज्यादा समय के लिये आवश्यकता रहेती ही नहीं है.

जो देश गरीब है और जहां अवसर कम है, वहां हमेशा दो या ज्यादा युथों में टकराव रहेता है. युएस में और विकसित देशोंमें युथोंके बीच टकराव कम रहेता है. भारत, पाकिस्तान, बार्मा, श्री लंका, बांग्लादेश, तिबेट, चीन आदि देशोंमें युथोंके बीच टकराव ज्यादा रहेता है. सामाजिक सुरक्षाके प्रति शासकका रवैया भी इसमें काम करता है. यानी की, अगर एक युथ या व्यक्ति के उपर दुसरेकी अपेक्षा भेदभाव पूर्ण रवैया शासक ही बडी निष्ठुरतासे अपनाता है तो जो पीडित है उसको अपना मनोभाव प्रगट करनेका हक्क ही नहीं होता है तो कुछ कम ऐतिहासिक समयके अंतर्गत प्रत्यक्ष शांति दिखाई देती है लेकिन प्रच्छन्न अशांति है. कभी भी योग्य समय आने पर वहां विस्फोट होता है.

अगर शिक्षा-ज्ञान सही है, अवसरकी कमी नहीं तो युथोंकी भीन्नता वैविध्यपूर्ण सुंदरतामें बदल जाती है. और सब उसका आनंद लेते है.

भारतमें अवसर की कमी क्यों है?

भारतमें अवसर की कमीका कारण क्षतियुक्त शिक्षण और अ-शिक्षण के कारण उत्पन्न हुई मानसिकता है. और ईसने उत्पादन और वितरणके तरिके ऐसे लागु किया कि अवसर, व्यक्ति और संवाद असंतुलित हो जाय.

शिक्षणने क्या मानसिकता बनाई?

मेकोलेने एक ऐसी शिक्षण प्रणाली स्थापितकी जिसका सांस्कृतिक अभ्यासक्रम पूर्वनियोजित रुपसे भ्रष्ट था. मेक्स मुलरने अपने अंतिम समयमें स्विकार कर लिया था कि, भारतके लोगोंको कुछ भी शिखानेकी आवश्यक नहीं. उनकी ज्ञान प्रणाली श्रेष्ठ है और वह उनकी खुदकी है. उनकी संस्कृति हमसे कहीं ज्यादा विकसित है और वे कहीं बाहरके प्रदेशसे आये नहीं थे.

लेकिन मेकोलेको लगा कि अगर इन लोगों पर राज करना है तो इनकी मानसिकता भ्रष्ट करनी पडेगी. इस लिये ऐसे पूर्व सिद्धांत बनाओ कि इन लोगोंको लगे कि उनकी कक्षा हमसे निम्न कोटिकी है और हम उच्च कोटी के है. और ऐसा करनेमें ऐसे कुतर्क भी लगाओ की वे लोग खो जाय. उनको पहेले तो उनके खुदके सांस्कृतिक वैचारिक और तार्किक धरोहरसे अलग कर दो. फिर हमारी दी हुई शिक्षा वालोंको ज्यादा अवसर प्रदान करो और उनको सुविधाएं भी ज्यादा दो.

अंग्रेजोंने भारतको दो बातें सिखाई.

भारतमें कई जातियां है. आर्य, द्रविड, आदिवासी. आदिवासी यहां के मूल निवासी है. द्रविड कई हजारों साल पहेले आये. उन्होने देश पर कबजा कर लिया. और एक विकसित संस्कृति की स्थापना की. उसके बाद एक भ्रमण शील, आर्य नामकी जाति आयी. वह पूर्व युरोप या पश्चिम एशियासे निकली. एक शाखा ग्रीसमें गई. एक शाखा इरानमें गयी. उसमेंसे एक प्रशाखा इरानमें थोडा रुक कर भारत गई. उन्होने द्रविड संस्कृतिका ध्वंष किया. उनके नगरोंको तोड दिया. उनको दास बनाया. बादमें यह आर्य जाति भारतमें स्थिर हुई. और दोनों कुछ हद तक मिल गये. ग्रीक राजाएं भारत पर आक्रमण करते रहे. कुछ संस्कृतिका आदान प्रदान भी हुआ. बादमें शक हुण, गुज्जर, पहलव आये. वे मिलगये. अंतमें मुसलमान आये.

मुस्लिम जाति सबसे अलग थी

यह मुस्लिम जाति सबसे अलग थी. आचार विचार और रहन सहनमें भी भीन्न थी. यह भारतके लोगोंसे हर तरहसे भीन्न थी इसलिये वे अलग ही रही. ईन्होने कई अत्याचार किये.

फिर इन अंग्रेजोंने आदिवासीयोंको कहा कि अब हम आये हैं. आप इन लोगोंसे अलग है. आपका इस देश पर ज्यादा अधिकार है. हम भी आर्य है. लेकिन हम भारतीय आर्योंसे अलग है. हम सुसंस्कृत है. हम आपको गुलाम नहीं बनायेंगे. आप हमारा धर्म स्विकार करो. हम आपका उद्धार करेंगे.

दक्षिण भरतीयोंसे कहा. यह आर्य तो आपके परापूर्वके आदि दुश्मन है. उन्होने आपके धर्म को आपकी संस्कृतिको, आपकी कला को आपके नगरोंको ध्वस्त किया है. आप तो उच्चा संस्कृतिकी धरोहर वाले है. आपका सबकुछ अलग है. भाषा और लिपि भी अलग है. आप हमारी शिक्षा ग्रहण करो. और इन आर्योंकी हरबात न मानो. ये लोग तो धुमक्कड, असंस्कृत, तोडफोड करनेवाले और आतंकी थे.

मुसलमानोंसे यह कहा गया कि आप तो विश्व विजयी थे. आपने तो भारत पर १२०० साल शासन किया है. ये भारतके लोग तो गंवार थे. इनके पास तो कहेनेके लिये भी कुछ भी नहीं था. ये लोग तो अग्निसे डर कर अग्निकी पूजा करते है. सूर्य जो आगका गोला है उसकी पूजा करते है. हवा, पानी, नदी जैसे बेजान तत्वोकी पूजा करते है. शिश्न की और अ योनी की पूजा करते हैं. ये लोग पशुओंकी और गंदी चीजोंकी भी पूजा करते है. इनके भगवान भी देखो कितने विचीत्र है? वे अंदर अंदर लडते भी हैं और गंदी आदतों वाले भी है. उनके मंदिरोंके शिल्प देखो उसमें कितनी बिभत्सता है.

इनके पास क्या था? कुछ भी नहीं. आपने भारतमें, ताज महाल, लालकिल्ला, फत्तेहपुर सिक्री, कुतुबमिनार, मकबरा, और क्या क्या कुछ आपने नहीं बनाया!! भारतकी जो भी शोभा है वह आपकी बदैलत तो है. आपने ही तो व्यापारमें भारतका नाम रोशन किया है. लेकिन जब कालके प्रवाहमें आपका शासन चला गया तो इन लोगोंने अपने बहुमतके कारण आपका शोषण किया और आपको गरीब बना दिया. आपके हक्ककी और आपकी सुरक्षा करना हमारा धर्म है.

इस प्रकारका वैचारिक विसंवाद अंग्रेज शासकोंने १८५७के बाद घनिष्ठता पूर्वक चलाया. एक बौधिक रुपसे गुलामी वाला वर्ग उत्पन्न हुआ जो अपने पैर नीचेकी धरतीकी गरिमासे अनभिज्ञ था. और वह कुछ अलग सूननेके लिये तैयार नहीं था.

इस बौधिक वर्गके दो नेताओंके बीच सत्ताके लिये आरपार का युद्ध हुआ. एक था नहेरु और दुसरा था जिन्ना.

जब देशकी जनता गरीब होती है वह किसीभी बात पर झगडा करने के लिये तैयार हो जाती है. और जिनका उद्देश्य सिर्फ सत्ता और पैसा है वह हमेशा दुसरोंकी अज्ञानताका लाभ लेकर देशको और मानव जातको चाहे कितना ही नुकशान क्युं न होजाय, दुसरोंको गुमराह करके मत बटोरके अपना उल्लु सीधा करती है.

लेकिन वास्तवमें ये हिन्दु और मुस्लिम कौन है और कैसे है? और क्यों बेवकुफ बनते रहते है?

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे (smdave1940@yahoo.com)
टेग्झः लघुमती, हिन्दु, मुस्लिम, ईसाई, औरंगझेब, बहादुरशाह, सार्वभौमत्व, १८५७, शिवाजी, शासक, यातना, अत्याचार, वध, सरदार, सुबेदार, अधिकारी, मेक्स मुलर, मेकोले, आर्य, द्रविड, इस्लाम, जाति, प्रजा, सत्य, असत्य, इन्दिरा, अफवाह, सत्ता, शाह आयोग, कोमवाद, शियां सुन्नी, भेदभाव, अवसर, स्रोत, असंतुलन, मानसिकता, न्याय, शिक्षण, विकास

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अनीतियोंसे परहेज (त्यागवृत्ति) क्यों? जो जिता वह सिकंदर (नहेरुवीयन कोंग रहस्य)-७
(इस लेखको “अनीतियोंसे परहेज क्यों? जो जिता वह सिकंदर-६” के अनुसंधानमें पढें)

कोंग्रेस और उसके साथीयोंने वोटींग मशीनमें गडबडी की है और बहुत आसानीसे कर सकते है. सावधान.

एक ही मंत्रः “नरेन्द्र मोदीको रोको”

कोंगी को और उसके साथीयोंको नरेन्द्र मोदीके बारेमें प्रतित हो गया है कि, अब वे लोग नरेन्द्र मोदीकी जितको रोक नहीं पायेंगे. इसलिये अब कोंगी और उसके साथी, नरेन्द्र मोदीकी जितको कमसे कम कैसे करें, इस बात पर व्युह रचना करने लगे है.
समाचार माध्यम और कुछ महानुभाव, कोंगी और उनके साथीयोंको हो सके उतनी मदद करने को तैयार है.

कोंगी के साथीमें बोलीवुडके कुछ महानुभाव आते हैं. ये महानुभाव लोग अपनेको विचारक, विश्लेषक और धर्मनिरपेक्ष समझते है.

इन महानुभावोंमें महेश भट्ट जैसे लोग है. कुछ मूर्धन्योंमें गुजरातके कान्ति भट्ट, शीला भट्ट जैसे पत्रकार और प्रकाश शाह, तुषार गांधी जैसे अपनेको गांधीवादी मानने वाले लोग आते हैं. अमर्त्य सेन जैसे अपने को नव्य अर्थशास्त्री माननेवाले लोग आते है.

बेताज बादशाह और बेताज बेगम

“प्रियंका” नहेरुवीयन संस्कारका निम्नतम कक्षाका सेम्पल

कुछ समाचार माध्यमके द्वारा बनाये गये महानुभाव भी आते है जिसमें हालमें प्रियंका वाड्रा है. प्रियंका वाड्रा को प्रियंका गांधीके नामसे, लोगोंको मनाया जाता है. समाचार माध्यमोंकी ऐसी प्रवृत्ति इस लिये है कि वह सोनीया गांधी की पुत्री है. यह सोनीया गांधी, राजीव गांधीकी पत्नी है. राजीव गांधी, इन्दिरा गांधी का पुत्र है. यह इन्दिरा गांधी जो लग्नके समय पर “घांडी” थी जिसको बातमें गांधी करवाया गया. इन्दिरा का लग्नके समय क्या नाम था, और “घान्डी”का “गांधी” कैसे हुआ?. राजीव का नाम, सोनीयाका नाम, और राहुलका असली नाम क्या था और क्या है, इन सबके बारेमें सामाजिक समाचार माध्यमोंमें (ओन लाईन सोसीयल मीडीयामें) चर्चा होती है. लेकिन दृष्य-श्राव्य और मुद्रित माध्यमोंमें इन बातोंको प्रसिद्ध करना नामुमकिन है. इन समाचार माध्यमोंमे निडरता नहीं है. इसके कई प्रयोजन है. मुख्य प्रयोजन पैसेके आदान-प्रदान का विषय है. व्यक्तिगत अंगत गुप्तताका प्रश्न है. ऐसा नहीं है कि यह सब सरकारी और न्यायिक दस्तावेजों पर नहीं है. सुब्रह्मनीयन स्वामीने बताया है कि, राजीव, सोनीया और राहुलने अपने प्रतिज्ञा लेखोंमे अपनी शैक्षणिक योग्यता के प्रमाण पत्रोंके बारेमें असत्य लिखा है. स्वामीने उन बातोंको न्यायालयोमें पडकारा भी है. इन बातोंको सुब्रह्मनीयन स्वामी स्वयं अपनी जनसभाओंमें खुल्ले आम बोलते है, तो भी समाचार माध्यम इन बातोंको प्रकाशित करते नहीं है. इससे आप समझ जाओ कि अंतरगत मामला क्या हो सकता है.

नरेन्द्र मोदीके बालकी खाल निकालो

उपरोक्त सभी व्यक्ति विशेषोंको मालुम है कि बीजेपीकी जो हवा देशमें चल रही है उसका स्रोत नरेन्द्र मोदी है. इसलिये नरेन्द्र मोदीको बदनाम करनेमें, जो कुछ भी हो सकता वह सब करो. नरेन्द्र मोदी जो कुछ भी कहे उसमें बालकी खाल निकालो.

अखबारी फरजंद प्रियंका वाड्रा

प्रियंका वाड्रा को अगर पक्षीय दृष्टिसे देखा जाय तो वह एक शून्य है. लेकिन समाचारी माध्यमने उसको आगे कर दिया है. मानो कि इन्दिरा गांधीकी रुह (भटकते भटकते) उसमें आ गई है. और समाचारके व्यापारी जैसे अखबारोंको अपना आपतकालका धर्म याद आ गया है.
इस औरतने नरेन्द्र मोदीको ताने मारना शुरु कर दिया है. अखबारी व्यापारीयोंने उसके तमाम उच्चारणोंको उछाला. नरेन्द्र मोदीको मालुम है कौन कहां है. इसलिये उसने कहा कि, प्रियंका उसकी बेटी जैसी है.

नरेन्द्र मोदीका बडप्पन

प्रियंकाने इसको ऐसे उछाला मानो नरेन्द्र मोदीने उसको गाली दी. सभी समझदार वयस्क अपने से छोटोंको बेटे-बेटी समान समझना चाहिये ऐसा समझते हैं. और छोटोंको चाहिये कि अपनेसे जो बडे हैं उनको माता-पिता समान माने. यही भारतकी संस्कृति है. नरेन्द्र मोदीने वैसा ही कहा जो भारतके संस्कार के अनुरुप है. दुसरी बात यह है कि उम्रमें छोटा व्यक्ति अगर गलती करें, और असभ्यता दिखावें तो बडा व्यक्ति उसको माफ कर दे. नरेन्द्र मोदीने वही किया.

प्रियंकाका कमीनापन

लेकिन प्रियंकामें न तो वह संस्कार है न तो वह संस्कृति है न तो उसको बडोंका आदर करना कभी शिखाया गया है. उसने अपने चाचा संजय गांधीके पुत्र वरुण गांधीको भी “पथभ्रष्ट” कह चूकी है. नरेन्द्र मोदीके उस उच्चारण “वह मेरी बेटी जैसी है” को भी प्रियंकाने धुत्कार दिया, मानो कि नरेन्द्र मोदी एक अछूत व्यक्ति है और वह बडे होने पर भी आदरके पात्र नहीं है.

नरेन्द्र मोदी एक ऐसा व्यक्ति है जो गरीब के घरमें जन्म ले कर अपने आप अपनी कर्मशीलता, अपना कौशल्य और अपने श्रमसे, जीवनकी हर कक्षाके संकटोंसे लडकर सन्मार्ग पर चलकर इस उच्च पद पर पहूंचा है. वह सबके मानका लायक है. प्रियंकाको उसका आदर करना चाहिये. अगर प्रियंकाका संस्कार ऐसा नहीं है तो उसको मौन रहेना चाहिये.

प्रियंकाने नरेन्द्र मोदीका अपमान किया. उसने कहा कि नरेन्द्र मोदी अपने को मेरे पिताके समान न समझे. मेरे पिताजी राजीव गांधी थे. नरेन्द्र मोदी अपनेको राजीव गांधीके बराबर न समझे. मेरे पिताजी कि तुलनामें वह कुछ नहीं है. ऐसा विकृत अर्थ नहेरुवीयन फरजंद ही ले सकते है.

देखो इन नहेरुवीयनोंका संस्कार

अगर कोई बडा आदमी अपना बडप्पन दिखाता है तो नहेरुवीयन हमेशा अपना पामरपन दिखाते हैं. इन्दिरा गांधी भी, मोरारजी देसाईका अपमान करनेमें पीछे रही नहीं थी. उसने जयप्रकाश नारायणका भी अपमान किया था. उसने अपनेसे उम्रमें बहुत बडी और कर्मशीलतामें भी कई गुना बडी व्यक्तियोंका अपमान किया था उतना ही नहीं उनको बेवजह जेल में अनियतकालके लिये बंद भी कर दिया था. इन्दिराकी इस पोतीसे आप, उच्च संस्कारकी कैसे अपेक्षा रख सकते है?

इन्दिराकी इस पोतीमें यह समझने कि अक्ल होनी चाहिये कि, राजीव गांधी अपनी कर्मशीलता, कुशलता और श्रमसे प्रधान मंत्री नहीं बने थे. उस समय एक ऐसे राष्ट्रपति थे जो इन्दिरा गांधीके इतने अहेसानमंद थे कि इन्दिरा गांधीके कहेने पर झाडु लगानेके लिये भी तैयार थे.. इस राष्ट्रपतिने इन्दिरा गांधीकी हत्याके बाद तूरंत ही बिना मंत्रीमंडलके अनुरोध ही, राजीवको प्रधान मंत्रीका शपथ ग्रहण करवाया था. यह बात भारतीय संविधान और लोकशाहीके विरुद्ध थी. लेकिन भारतकी लोकशाही और संविधानको नहेरुवीयन फरजंदोने मजाक और मस्ती समझ लिया है. संविधान और लोकशाही मूल्योंकी अवमानना करना नहेरुवीयन फरजंदोंका संस्कार रहा है.

नरेन्द्र मोदी भारतीय संवैधानिक आदरणीय पदस्थ नेता है

नरेन्द्र मोदी भारतीय संविधानसे प्रस्थापित प्रक्रियाओंसे पसार होकर जनता द्वारा निर्वाचित जन प्रतिनिधि है. यह राज्य कोई ऐसा वैसा राज्य नहीं है. यह राज्य एक ऐसा राज्य है जिसकी संस्कृति अति प्राचीन है. इस बातको छोडकर, अगर अर्वाचीन इतिहासको देखें, तो भी इस भूमिने, दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी और सरदार पटेल जैसे युगपुरुषोंको पैदा किया है. नहेरु तो खास करके महात्मा गांधीका और सरदार पटेलका अत्यंत ही ऋणी रहा है. अगर महात्मा गांधी ने हस्तक्षेप न किया होता और सरदार पटेलने त्याग दिखाया न होता तो जवाहरलाल नहेरुका प्रधान मंत्री बनना असंभव था.

कृतघ्न और अनपढ औलाद

नहेरु तो कृतघ्न थे ही लेकिन उनकी संतान भी कृतघ्न निकली. नहेरु और इन्दिरा गांधीने गुजरातीयोंका और गुजरातकी अत्यंत अवमानना की है. प्रियंकाने भी वैसी ही कृतघ्नता दिखाई. नरेन्द्र मोदी की उम्रका, उसके बडप्पनका और उसके संविधानिक पदको जानबुझ करके नजर अंदाज करके नरेन्द्र मोदीको अपमानित किया है. यह बात नहेरुवीयनका निम्न स्तर प्रदर्शित करती है. वास्तविकता देखो तो नरेन्द्र मोदी एक उत्कृष्ट और उच्चस्तरीय नेता है. उसके उच्चारणमें गहनता और नाविन्य होता है. उसके उच्चारणमें माहिती, तर्क और संशोधन होता है. वह अगर कठोर शब्द या मनोरंजन करता है तो भी उसमें गर्भित वैचारिक गहनता होती है. नहेरु, इन्दिरा, सोनीया, राहुल और अब प्रियंका जैसा वाणी विलास और छीछरापन, नरेन्द्र मोदीके वक्तव्यमें नहीं होता है. नरेन्द्र मोदीके सामने ये नहेरुवीयन किसी गिनतीमें नहीं है.

मोदी विरोधी अब क्या करेंगे?

नरेन्द्र मोदी विरोधी सब यह सोचते है कि बीजेपीको पूर्ण बहुमत न मिले उसके लिये जो कुछ भी करना पडे वह करो. युएसका सहारा लो, १९६२में जब चीनने भारत पर आक्रमण किया तो उस सेना को यानी कि, चीनकी सेनाको “मुक्ति सेना का स्वागत करो” ऐसे कहेनेवाले साम्यवादीयोंका सहारा लो, नक्सलवादीयोंका सहारा लो, माओ वादीयोंकासहारा लो, पाकिस्तानी आतंक वादीयोंका सहारा लो, मुलायम, माया, जया, ममता, दाउद, उसके नेटवर्क आदि सबका सहारा लो और मोदीको कैसा भी करके बहुमतसे रोको.

अगर नरेन्द्र मोदीको बहुमत मिल गया तो भी कोंगी नेतागण परास्त होने वाला नहीं है. १९७७ में जनता पार्टीको ३४५ सीटें मिली थीं. इन्दिरा गांधीने समाचार माध्यमोंका सहारा लेके, जनता पार्टीकी छोटी छोटी बातोंको चमका कर उसके विभिन्न नेताओंको उकसाया था. इसमें चरणसिंह मुख्य थे. चरणसिंह और राजनारायणने एक ग्रुप बनाया था, और उन्होने जोर्ज फर्नान्डीस, मधु लिमये, मधुदंडवते को अलग कर दिया था. चरणसिंग बेवकुफ बन गये. यशवंतराव चवाण जो इन्दिरा गांधी से अलग हो गया था और अपना एक पक्ष बना लिया था उसको भी इन्दिराने बेवकुफ बनाया था. चरण सिंग, यशवंतराव चवाण और इन्दिरा गांधी तीनोंने मिलकर जनता पक्षकी काम करती सरकारको तोडी थी.

जब जनता पार्टीकी सरकार तूटी तो जयप्रकाश नारायणने बोला था “पूरा बाग उजड गया”. तब बाजपाईने उनको बोला कि हम फिरसे बाग खीला देंगे.
लेकिन इस बागको खीलानेमें बाजपाईको २० साल लग गये. और वह भी पूरी तरह खील नहीं पाया.

नरेन्द्र मोदी यह सब जानता है. कोंगी भी देशके बागको उजाडनेमें माहिर है. लेकिन हमारे देशमें जो राजकीय विश्लेषक है, समाचार माध्यमोंके मूर्धन्य है वे बेवकुफ ही नहीं स्वकेन्दी और मनमानी तटस्थाके घमंडी है. वे प्रमाणभानहीन और दंभी है. ये लोग आपात कालमें भी समयकी मांग को पहेचान नहीं सकते. जनता इन मूर्धन्योंसे देशको बचानेकी आशा नहीं रख सकती.

बीजेपीके अंदर और उसके सहयोगीयोंके अंदर भी कुछ तत्व ऐसे हैं कि वे आत्म-ख्यातिकी लालचमें बीजेपीको नुकशान पहूंचा सकते है. ऐसे तत्व हमने गुजरातमें देखें है. केशुभाई पटेल, दिलीप पारेख सुरेश महेता, शंकरसिंह वाघेला उनमें मुख्य है. समाचार माध्यमोंने हमेशा नरेन्द्र मोदी के विरुद्धमें इन बेवकुफ और आत्मकेन्द्री नेताओंको ज्यादा प्राधान्य दिया है. और नरेन्द्र मोदीको नीचा दिखानेकी भरपुर कोशिस की है.

१९७७ वाली जनता पार्टी जो ३४५ बैठक जीत गयी थी, उनमें जो सत्ताके लिये भ्रष्ट साधनकी शुद्धिमें मानते थे वे मोरारजी देसाईसे अलग हो गये. जो बेवकुफ थे या बेवकुफ भी थे वे सरकार तूटने पर हतःप्रभ हो गये.

समाचार माध्यम व्यापारका एक क्षेत्र

बीजेपीको ऐसे बेवकुफ, स्वार्थी और स्वकेन्द्री नेताओंसे बचना होगा. नरेन्द्र मोदी वैसे तो मोरारजी देसाईकी अपेक्षा सियासतमें ज्यादा कुशल है. लेकिन जो समाचार माध्यम है वह एक व्यापारका क्षेत्र बन गया है. समाचार माध्यम वाले अब बिल्डींग कंस्ट्रक्सन कंपनीया बनाने लगे है. इससे पता चल जाना चाहिये कि अब यह वर्तमान पत्र और टीवी चेनल वाले काले धंधेमें कितने डूबे हुए है. समाचार माध्यम की अब सामान्य कक्षाके आदमी पर ज्यादा असर पड सकती है. समाचार माध्यम अब जनताको सुशिक्षित करे ऐसा नहीं है. उनका ध्येय हरहालतमें पैसा कमाना है. वे जनताको सुशिक्षित करनेके स्थान पर जनताको गुमराह करने पर तुले हुए है.

तो अब जनताको क्या करना होगा?

जनताको समज लेना पडेगा कि, नरेन्द्र मोदी पर अभी कई मुसीबतें आने वाली है. उसमें आतंकी हमले के अतिरिक्त सियासती हमले भी होंगे. वे बडे जोरदार होंगे. अगर नरेन्द्र मोदी उसके विरोधीयों पर कार्यवाही नहीं करेगा तो ये विरोधीगण चूप बैठने वाला नहीं है. इन लोगोंको जेल भेजना इतना मुश्किल नहीं है. उनके कई काले धंधे है. जिसमें उनकी आर्थिक आय और संपत्ति जो प्रमाणसे कहीं ज्यादा ही है वह मुख्य है. दुसरे उनके असामाजिक तत्वोंके साथके संबंध है. इनके उपर कार्यवाही की जा सकती है. लेकिन इसके बारेमें बडी गुप्ततासे कदम उठाने पडेंगे. और ऐसा पूर्ण और मजबुत बहुमत आने पर ही यह सब संभव हो सकता है.

जो लोग आज नरेन्द्र मोदीके पक्षमें है उनको धिरज पूर्वक नरेन्द्र मोदीके पक्षमें ही रहेना होगा. चाहे नरेन्द्र मोदी पर कितने ही विवाद क्यूं न किया जाय.

एक लडकीके उपर तथा कथित जसुसी,
नरेन्द्र मोदीने जो अपनी पत्नीका नाम आवेदन पत्रमें लिखा,
गीने चूने उद्योगपतियोंको मुफ्तके दाम जमीन आबंटन … इत्यादि कई अर्थहीन विवाद, समाचार माध्यम द्वारा बडे चावसे नरेन्द्र मोदीके विरुद्ध चमकाया जाता है. और भी कई विवाद उछाले जायेंगे. तब जो जनता आज नरेन्द्र मोदीके साथ है, उसको अपने आप पर विश्वास रखकर मोदीके पक्षमें ही रहेना पडेगा. नरेन्द्र मोदीके चमत्कार देखनेके लिये जनताको धिरज और विश्वास रखना पडेगा. समाचार माध्यमोंके समाचारसे मतिभ्रष्ट नहीं होना है.

क्या जनता और जो मूर्धन्य लोग आज मोदीके साथ है वे ये सब समझ पायेंगें?

दंगे करवाना और बोम्ब ब्लास्ट करवाना कोंगका पेशा है

एक बात याद रक्खो कि फारुख और ओमर नया मोरचा खोल रहे है. कोंगी और उसके साथी लोग नया गेम खेल रहे है. वे नरेन्द्र मोदीके प्रधान मंत्रीकी शपथ के बाद कई जगह पर बोम्ब ब्लास्ट करवाने कि योजना बना सकते है. इस शक्यताको कतई नकारा नहीं जा सकता.

नहेरुवीयन कोंग और उनके कश्मिरके साथी फारुख और फरजंदका ट्रेक रेकार्ड देखोः

http://www.satp.org/satporgtp/countries/india/states/jandk/data_sheets/index.html

२००१ को भी याद करो. गुजरात के तत्कालिन मूख्य मंत्री केशुभाई पटेल गुजरातमें बीजेपीको सम्हाल नहीं सके, भूकंप ग्रस्त गुजरातको नवनिर्मित करनेमें वे अशक्त रहे थे. जनतामें केशुभाई और बीजेपी मजाकका विषय बनने लगे थे.

नरेन्द्र मोदी ने सख्त कदम उठाके गुजरातको और बीजेपी को और भूकंपग्रस्त गुजरातको विकासके रास्ते पर ला दिया. एक दफा नरेन्द्र मोदीने बोला कि बीजेपीके ५ सालके शासनमें कोमी दंगे बंद हो गये है. तो इससे नहेरुवीयन कोंगीयोंके पेटमें उबला हुआ तेल पडा और उन्होने की गई साजीशके अनुसार गोधराके एक स्थानीय नेता द्वारा साबरमती एक्सप्रेसका डीब्बा जलाया गया जिसमें अयोध्यासे आनेवाले सभी यात्री जला दिया गया. यह एक ठंडे दिमागसे की गई साजीश थी. एक नहेरुवीयन कोंगीने तो बोला भी था कि नरेन्द्र मोदीने “बीजेपीके शासनमें कोमी दंगे बंद हो गये है ऐसा निवेदन करके लघुमति कोमको दंगे करनेके लिये उकसाया है. कोंग चाहती है कि नरेन्द्र मोदी को मुस्लिमोंकी भावनाको ऐसे निवेदनो द्वारा भडकाना नहीं चाहिये था.

कोंग, दंगा करवानेमें और बोम्ब ब्लास्ट करवानेमें माहिर है. जब भी कोंग और उसके समसंस्कृति साथी मुसिबतमें होते हैं या तो वोटबेंक की राज नीतिको बडे पैमाने पर उजागर करनी होती है, तब वह दंगा करवाती है.

१९६९में मोरारजी देसाईकी कोंग्रेस, जो कोंग्रेस (ओ) नामसे जानी जाती थी वह इन्दिरा कोंगके लिये गुजरातमें एक चूनौति थी. उस समय केन्द्रमें इन्दिराका शासन था. कोंगीने ९९६९में अहमदाबादमें बडे पैमाने पर दंगे करवाये थे.

https://www.youtube.com/watch?v=-u92rWqUhaY

असममें बंग्लादेशी घुसपैठीयोंके कारण स्थानिक प्रजा के साथ दंगे करवाये. पूर्वोत्तर राजको आतंकवादीयों द्वारा पीडित ही रक्खा. युपी बिहारमें तो कई प्रकारके सियासती दंगे करवाते ही रहते है. अब वहां बीजेपी शक्ति बढी तो आजमगढमें दंगे करवाये. आतंकवाद की जड कोंग ही है. दाउदका नेटवर्क कोंगकी कृपासे ही बढा है. दाउदका नेटवर्क बोम्ब ब्लास्टमें सामेल है.

समझ लिजीये कि, जब नरेन्द्र मोदी प्रधान मंत्री बन जायेगा तब कोंग के पैसोंका मुख्य उपयोग दंगा करवाना ही होगा. और इन सभी दंगोंका कारण नरेन्द्र मोदीका शासन ही बताया जायेगा.

कोंग और उसके साथीयोंको दंगे करनेमेंसे रोकने के लिये उनके उपर जांच आयोग बैठा देना पडेगा.

शिरीष मोहनलाल दवे

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अनीतियोंसे परहेज (त्यागवृत्तिक्योंजो जिता वह सिकंदर-2

के अनुसंधानमें इसको पढें

नहेरुवीयन कोंग्रेससे सावधान रहेनेके लिये और देशको बुराईयोंसे मुक्त करनेके लियेनहेरुवीयन कोंग्रेसकी आचार नीतियां और चूनाव रणनीतियां समझना आवश्यक है.

नहेरुने कैसी चूनावी रणनीतियां अपनाई थी और खुदकी सत्ता कैसे बनाई रखी थीवह हमने इसके पूर्वके लेखमें देख लियानहेरु खुदकी सत्ता टिकानेकी व्युहरचना बनानेमें चालबाज थेउन्होने कैसे मोरारजी देसाई और अन्य विरोधीयोंको हटाया वह हमने देख लियाउनकी व्युह रचनामें साधन की अशुद्धि गर्भित थीलेकिन कोई उसको नीतिमत्ताके तर्क के आधार पर चूनौति नहीं दे सकता था  तो समाधान कारी टीका कर सकता था.

नहेरुकी तरह  ईन्दीरा गांधी अपने समकक्षको दूर करनेकी और उसको निरर्थक बनानेकी फिराकमें रहती थीं.

मोरारजी देसाई और सीन्दीकेटके नेतागण ईन्दीरा गांधीके समकक्षही नहीं लेकिन काफि सीनीयर थेइस लिये ईन्दीरा गांधीने उनको हटानेकी योजना बनाई

ईन्दीरा गांधी नहेरुकी सभी रण नीतियोंसे वह अवगत थीचूनाव जितने के लिये और या सत्ता बनाये रखने के लिये साम्यवादीयोंकी रणनीति ऐसी रही कि जनताके साथ मानसिक जर्क (आंचकेदेनेवाली राजकीय घोषणाये करते रहो.  जनताको विभाजित करो और विरोधीयोंको बदनाम करते रहोसमाचार माध्यम पर प्रभूत्व रखो और उसका भी उपयोग करो.

जर्क देने वाली प्रवृत्तिः

पूर्व रजवीयोंके वर्षासन और विशेषाधिकारोंका अंतः

१४ बडी बेंको का राष्ट्रीय करणः

आम कारीगरोंको कम मुल्यवाला उधार:

ये सब करनेकी क्या जरुरत पडी?

ईन्दीरा गांधीने कहा मेरे पिताजी यह सब करना चाहते थे लेकिन ये सीन्डीकेट के नेता गण उनको करने देते नहीं थेमुझे गरीबी हटानी हैइसलिये मेरा नारा है “गरीबी हटाओ”.

समाचार माध्यमोंने ईन्दीरा गांधीको अभूत पूर्व प्रसिद्धि दीक्यों कि एक बडे पक्षमें नेतागाण एक दूसरेके विरुद्ध बाते करेंवे समाचार पत्रोंके लिये बीलकुल नयी बात थी.

राष्ट्र प्रमुख का चूनाव  पडा थासींडीकेटके नेतागण चाहते थे कि संजिव रेड्डी राष्ट्रप्रमुखपक्षीय कारोबारीके बहुमत सभ्य संजिव रेड्डीके पक्षमें थेईन्दीरा गांधी इसी कारण उनको चाहती नहीं थींउन्होने अपना उम्मिदवार पर्दे के पीछे तयार कर दियावह थे एक मजदूर नेता मानेजाने वाले वीवी गीरी.

इन्दिराका फतवा

ईन्दीरा गांधीने “आत्माकी आवाज”का एक सूत्र चलाया किराष्ट्रप्रमुखके चूनावमें सभी संसदोंको आत्माकी आवाजके अनुसार मत देना चाहियेआत्माकी आवाजका गर्भित अर्थ था वीवी गीरीको मत देनाराजकीय विश्लेषकोंने समझ लिया कि यह एव शक्ति परिचय का दाव हैविपक्ष बिखरा हुआ थाजो विपक्ष लेफ्टीस्ट थे उन्होने ईन्दीरा गांधीके उम्मिदवारको मत देनेका मन बनायाकोंग्रेसमें जिन्होने घोषित किया कि वे आत्माकी आवाजको पुरस्कृत करते हैउनको समाचार माध्यमोंने रेडियो सहितजरुरतसे ज्यादा प्रसिद्धि दी.

ईन्दीरा गांधीके प्रशंसकोंने  संजिव रेड्डीके खिलाफ बिभत्स पत्रिकाएं संसदके मध्यस्थ खंडमें फैलाईयह बात गैर कानुनी थीफिर भी हवा ईन्दीरा गांधीके पक्षमें थी इसलिये इन सब बातोंको नजर अंदाज किया गयाकोई रोक टोक हुई नहीं.

राष्ट्रप्रमुख के मतदान प्रक्रिया में दुसरी पसंदका प्रावधान हैउस दुसरी पसंदके मतोंको भी लक्षमें लेनेसे वीवी गीरी निर्वाचित घोषित किये गयेइस प्रकार कोंग्रेसके मान्य उम्मिदवार परास्त हुएईन्दीरा गांधीने खुदकी शक्तिको बढाने के लिये अपने पक्षके उम्मिदवार को परास्त करवायाइसके बाद उसने असाधारण सभा बुलाई और अपना खुदका पक्षप्रमुख और कारोबारी नियुक्त कीकथा तो बहुत लंबी हैअसली कोंग्रेस कौनक्योंकि मूलभूत कोंग्रेसकी महासभा भी बुलाई गई थीजो ईन्दीराके पक्षमें थे वे ईन्दीराकी महासभामें गये और जो ईन्दीराके पक्षमें नहीं थे वे मूल कोंग्रेसकी महासभामें गये.

ईन्दीरा गांधीके कोंग्रेस पक्षको कोंग्रेस (जे), इस नामसे उल्लेख होने लगाक्योंकि इसके पक्ष प्रमुख जगजीवनराम थेमूल कोंग्रेसके प्रमुख नीलम संजिव रेड्डी थे इस लिये इस कोंग्रेसको कोंग्रेस (एनसे उल्लेखित किया गयादुसरे भी नाम थे . कोंग्रेस आर (रुलींग) [या तो कोंग्रेस आई (ईन्दीरा)], कोंग्रेस  (ओर्गेनीझेशन).

सीन्डीकेट के अन्य नेतागण को छोड दे तो मोरारजी देसाई अपने राज्यमें भूमिगत नेता थेउनको परास्त करना जरुरी थाबदनाम करनेमें तो तरुण तर्क नामका जुथ सक्रीय थालेकिन चूनावमें खास करके गुजरातमें मोरारजी देसाईके प्रभूत्वको खतम करना मुस्किल थामोरारजी देसाईको और उनके साथीयोंको चूनावमें कैसे हराया जाय?

यहांसे ईन्दीरा गांधीने शुरुकिया राजकीय नीतिहीन दावपेंच.

जनताको विभाजित करो और चूनाव जितोः

१९६९७०का चूनाव

जनताको कैसे विभाजित करें?

गरीबी हटाओका नारा एक नारा मात्र नहीं थालेकिन इसके पीछे ऐसा प्रचार था किनहेरुवीयन वंशके लोग तो गरीबी हटाने के लिये प्रतिबद्ध थे लेकिन ये बुढ्ढे लोग (स्वतंत्रताके आंदोलनमें भागलेनेवाले नेतागण जो पक्षके उपर प्रभूत्व रखते थे वे ६०६५के उपरके हो गये थेनहेरुको आर्थिक क्रांति करनेसे रोक रहे थेइसके साथ एक प्रचार यह भी हुआ किअब कोंग्रेसका नेतृत्व युवा नेता (ईन्दीरा गांधी)के पास  गया हैअब प्रत्याघाती नेताओंको उखाडके फैंक दो.

युवावर्ग ही नहीं लेकिन जो मूर्धन्यवर्ग थाराजकीय विश्लेषक थे वे भी ईन्दीरा गांधीकी बातोंमें  गये थे क्यों कि बडे नामवाले भी विवेक शक्तिमें कमजोर हो शकते है या तो उनका खुदके स्वार्थसे विमुक्त नहीं हो सकते हैसाधानशुद्धिप्रमाणभानप्रास्तुत्य के तर्ककी क्षमता हरेक के बसकी बात होती नहीं होती है.

नाम बडे लेकिन दिल कमजोर हो ऐसे कई नेता कोंग्रेसमें थेजो सबके सब सर्व प्रथम ईन्दीराकी कोंग्रेसमें लग गयेइन नामोंमे जगजिवनरामयशवंतराव चवाणललित मिश्राबहुगुणावीपी सिंग आदि कई सारे थे.

सीन्डीकेट के अन्य नेतागण को छोड दे तो मोरारजी देसाई अपने राज्यमें भूमिगत नेता थेउनको परास्त करना जरुरी थाबदनाम करनेमें तो तरुण तर्क नामका जुथ सक्रीय थालेकिन चूनावमें खास करके गुजरातमें मोरारजी देसाईके प्रभूत्वको खतम करना मुस्किल थामोरारजी देसाईको और उनके साथीयोंको चूनावमें कैसे हराया जाय?

गुजरातमें १९६९का कोमी दंगा

गरीब और अमीर इसमें तो थोडासा भेद उत्पन्न कर दिया थालेकिन वह पर्याप्त नहीं था१९६९में कैसे हिन्दु मुस्लिमका दंगा हुआ यह एक बडे संशोधनका विषय हैयह एक लंबी कहानी हैपरिणाम यह हुआ किमोरारजीदेसाईके प्रभूत्ववाली गुजरातकी कोंग्रेस (), के खिलाफ मुस्लिम मत हो गयाऔर १९६९७०के संसद चूनावमें देशमें इन्दीरा गांधीके कोंग्रेस पक्षको भारी बहुमत मिलागुजरातमें भी उसको २४मेंसे  बैठक मिली जो एक आश्चर्य था क्योंकि गुजरातमें इन्दीरा गांधी उतनी लोकप्रिय नहीं थींयह हो सकता है किमुस्लिम मतोंका धृवीकरण हो गया था१९६८ तक मुस्लिम लोग सामान्य प्रवाहमें थेबीन कोंग्रेसी विपक्षमें भी मुस्लिम नेता थेबीन कोंग्रेसी विपक्षमें स्वतंत्र पक्षसंयुक्त समाजवादी पक्ष और कुछ स्थानिक पक्ष थेलेकिन १९६९के दंगो द्वारा देशके मुस्लिम समुदायको संदेश दे दिया था कि बीन कोंग्रेसी पक्ष मुस्लिमों की रक्षा कर नहीं कर सकता.

जितके कारण और विधानसभा चूनाव

१९७१में पाक– युद्धमें भारतके लश्करको भारी विजय मिलीउसका श्रेय इन्दीरा गांधीको दिया गया१९७१की जितके बाद घुसखोरोंको वापस भेजनेकि कार्यवाही करके सामान्य स्थिति करनेके बजायअन्य राज्योंमें और गुजरातमें भी चूनाव करवाये और विधानसभाके चूनावोंमें भी इन्दीरा की कोंग्रेसको भारी बहुमत मिलागुजरातमें १६८ बैठकमेंसे १४० बैठक उनको मिलीं.

मुस्लिम मतोंका धृवीकरण के साथ साथ नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओ द्वारा जाती विभाजन द्वारा विभाजन भी शुरु कर दियानवनिर्माणका आंदोलन ग्राम्य विस्तार तक फैला नहीं था और वैसे भी ज्ञातिप्रथा ग्राम्यविस्तारमें ज्यादा असरकारक होती हैइसलिये ग्राम्य विस्तारमें यह विभाजन करना आसान था.

चूनाव प्रपंच और गुड  गवर्नन्स अलग अलग है     

इन्दीरा गांधी सियासत के प्रपंच करनेमें माहिर थींलेकिन वहीवट (गवर्नन्स)में माहिर नहीं थींविदेश नीति रुस परस्त थीसिमला करार में ईन्दीरा गांधीने देशकी विजयको पराजयमें परिवर्तित कर दिया थाइन्दीरा गांधी बंगलादेशी मुस्लिम घुसपैठोंको वापस नहीं भेज सकी थीं.  महंगाई और करप्शन बहुत बढ गयेइन्दीरा गांधी खुद साधन शुद्धिमें मानती नहीं थी और सिर्फ वोटबेंक पोलीटीक्समें मानती थींइसलिये बेंकोका वहीवट रसाताल गयासमाचार माध्यम की आंखे भी खुल गई थींगुजरातमें भ्रष्टाचार के विरुद्ध आंदोलन हुआ जिसमें सौ से उपर छात्रनहेरुवीयन सरकार द्वारा किये गये गोलीबारमें मार दिये गयेसर्वोदयी नेतागण भी इन्दीराके विरुद्ध हो गये थे.

इतना ही नहीं उनका खुदका चूनाव उच्चन्यायालयमें चल रहा थागुजरातका नवनिर्माणका लोक आंदोलन व्यापक हो रहा थाईन्दीराको लगा कि १९७६में आने वाला चूनावमें उसका पक्ष हार सकता हैगुजरातमें विधानसभा भंग करनी पडी थीऔर नया चूनाव भी देना पडा थाउसमें उसका पक्ष खाम (क्षत्रीयआदिवासी और मुस्लिम मतोंका धृवी करण हो गया था तो भी पक्ष विरोधी वातावरणके कारण कमजोर पड गया था और जनता मोरचाने शासन धुरा ले ली थीगुजरातके भ्रष्टाचार के विरुद्धके लोक आंदोलन के आधार पर ऐसा आंदोलन पूरे देशमें व्यापक हो रहा थाविपक्ष एक हो रहा थाइन्दीराको लगा कि १९७६में आने वाले चूनावमें उसका पक्ष हार सकता है.

सबका मुंह बंद करनेके लिये इन्दीरा गांधीने आपातकालकी घोषणा कीऔर विरोधियोंको जेल भेज दियासमाचार के उपर सेन्सरशीप लागु कीसभासरघस पर प्रतिबंध लागु कर दियेक्योंकि इन्दीरा गांधीने समझा किसमाचार माध्यम के कारण और विरोधियोंके कारण ही कोंग्रेसका जनाधार जा रहा हैआपात काल भी इन्दीरा गांधीको भारी पड रहा थाक्यों कि उनके पास गवर्नन्सका कौशल्य नहीं थागवर्नन्स एक सुस्थापित चेनलसे चलता हैयह एक बुद्धि और विवेक शक्तिका काम हैयह कोई मुनसफ्फीसे संबंधित नहीं हैसियासतमें लचिलापन चल सकता हैगवर्नन्समें लचिलापन और मनमानी चल सकती नहीं हैइन्दिरागांधी गवर्नन्स में कमजोर थींजो आपखुद होते है वे मानवके अंदरके आंतर प्रवाहको नहीं जान सकतेइन्दिराने सोचा कि समाचार माध्यम सरकार की बुराई नहीं करते हैऔर सरकारके बारेमें अच्छी अच्छी बातें ही बताते है तो जनता कोंग्रेसको  ही मतदान करेगीआपतकाल अपने भारसे ही तूट पडा थाइन्दिरा गांधीने समाचार माध्यमोंमे खुदके पक्षका एक पक्षीय प्रचार द्वारा चूनाव जितनेका प्रयास कियालेकिन वह असफल रही क्यों कि विपक्ष और जनताके सुज्ञ लोग घर घर जाके लोकशाही का प्रचार कियाइतना ही नहीं यह भी पता चला किभारतीयोंकी सांस्कृतिक विरासत इतनी कमजोर पड गई नहीं थी कि वह विवेक शून्य बनके दृष्यमान श्रेय और अश्रेय समज  सके.

१९८०का चूनाव

इन्दीरा गांधीने १९६९  से १९७५ तक के कार्यकालमें काफी पैसे जमा किये थे ऐसा माना जाता है.

गुजरातके इन्दीरा कोंग्रेसके मुख्य मंत्री जब १९७२७३में इन्दिरा की ईच्छा  होने पर भी मुख्यमंत्री बने और बादमें जन आंदोलनके कारण उनको पदभ्रष्ट करना पडा तो वे इन्दीरा गांधीके विरुद्ध हो गये और उन्होने एक किताब लिखी थीकि इन्दीरा गांधीने तेल-मीलरोंसे कैसे और कितने पैसे वसुल किया थाउत्पादन पर सरकारका संपूर्ण अंकूश थाअंकूश पैसेसे बिकते थेयुनीयन कार्बाईड का सौदा भी जानबुझकर क्षतियुक्त रक्खा गया सौदा था१९७७के संसदीय चूनावमें अहमदाबादके ख्यातनाम वकिल चंद्रकांत दरुने बताया था कि उसने मुगलसराई रेल्वे वेगन के चीफको आदेश दिया था कि वह एक करोड रुपया दे दे१९७९८० के चूनाव के समय इन्दीरा गांधीने संसदीय टीकटे एक एक करोडमें बेची थीआपतकाल दरम्यान ऐसा कहा जाता है किजमाखोरोंसे और रीश्वत खोरोंसे धमकीयां दे के इन्दीरा गांधीने बहुत सारे पैसे ईकठ्ठे किये थेआज जो राजकारणमें पैसेकीशराबकी और बाहुबलीओंकी जो बोलबालाए दिखाई देती हैउसके बीज नहींलेकिन इस बरगदके पेडकी जडे और विस्तार इन्दीरा गांधीने बनाया है.

१९७७ में जब आखीरमें इन्दीरा गांधीको लगा कि उस चूनावमें पैसे बिखरना काममें आने वाला नहीं हैतो उसने उम्मिदवारोंको उनके भरोसे छोड दिये थेनहेरुवीयन कोंग्रेसके कई लोगकी डिपोझीट जप्त हुई उसकी वजह भी यही थी.

१९७७ तकके जमा किये हुए पैसे इन्दीरा गांधीको १९८०के चूनावमें काम आयेचरण सिंह जिन्होने खुदको महात्मा गांधी वादी मनवाया थावे इन्दिरासे बिक गयेमोरारजी देसाईकी कामकरने वाली सरकारको गिरायानये चूनाव प्रचार दरम्यान खूब पैसे बांटे गये होगेसमाचार माध्यम वैसे ही बिकनेको तैयार थे और उन्होने नहेरुवीयन कोंग्रेसका भरपूर प्रचार किया और जनता फ्रंटकी भरपूर निंदा कीईन्दीरा गांधीको फिरसे निरपेक्ष बहुमत मिला.

१९८०१९८४ के अंतर्गत खालिस्तानी आतंकवादका जन्म हुआ और प्रसार भी हुआपंजाबकी सियासतमें दो गुटोंमेसे एक को कमजोर करनेके लिये इन्दीरा गांधीने भीन्दरानवाले को संत बनाके बडा कियाइन्दीरा गांधी वैसे भी अनिर्णायकता की कैदी थींइन्दीरा गांधीने जैसी उसने बंग्लादेशी घुसपैठोंको निकाल देनेमें अनिर्णायकता और कमजोरी रक्खीवैसा ही उन्होने भीन्दराणवाले की खुल्ले आम होती हुई बैंकोंमे होती डकैत आतंकी हुमलोंके बारेमें कियाईन्दीरा गांधीने आतंकीयोंको सुवर्णमंदिरमें लगातरा शस्त्रोके साथ घुसने दिये और आश्रय लेने दियादुनियामें ऐसा कोई देश नहीं है जहां अगर खूनी धर्मस्थानमें घुस जाय तो सरकार उस धार्मिक स्थानमें जाके खूनी को  पकड सकेभारतमें भी अगर कोई चोर धर्मिक स्थानमें जाके घुस गया है तो पुलीस वहां नहीं जा सकतीऐसा कोई कानुन नहीं हैलेकिन इन्दीरा गांधीने अनिर्णायकता की कैदी होनेकी वजहसे और समय बीतानेके लियेएक कानुन पास किया किअगर आतंक वादी धार्मिक स्थानमें जायेंगे तो पुलीस वहां जाके उनको पकड सकती हैजब सरसे पानी गुजरने लगा और वे बदनाम होने लगीं तब उसने ब्रीटनको विश्वासमें लेके सुवर्ण मंदिर पर हमला किया और उसमें भींदराणवाले मारा गयालेकिन बहुत देर हो चूकी थीकई भीन्दराणवाले पैदा हो चूके थे.

(क्रमशः)

शिरीषमोहनलालदवे

टेग्झः  नहेरुवीयन, चूनावी, प्रपंच, रणनीति, सत्ता, गरीबीहटाओ, समाचारमाध्यम, इन्दिरा, आत्माकीआवज, मोरारजीदेसाई, कोमीदंगा, भ्रष्टाचार, आंदोलन, आपातकाल, चरणसिंग, स्वर्णमंदिर, आतंकवाद, सीमापार

 

 

 

         

 

 

   

 

          

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खुशवंत सिंह जो शेरकी खालमें शृगाल था

khushvant

खुशवंत सिंह को कुछ लोग खुशामतसिंह भी कहते थे.

क्या खुशवंत सिंह शेर थे यानी कि निडर थे?

क्या ऐसा भी हो सकता है?

अगर दुधपाकमें सर्कराकी जगह नमक डले तो वह क्या दुधपाक माना जायेगा?

अगर महाराणा प्रतापका घोडा चेतक युद्धभूमिमें घुसनेसे इन्कार करे तो राणा प्रताप उसको प्यार करते?

अगर देशप्रेमकी बांगे पूकारने वाला कोई सरदार, दुश्मनके आगे घुटने टेक दें तो वह क्या वह सरदार कहेलायेगा?

क्या कोई वीर अपने देशके अपमानका बदला लेनेकी प्रतिज्ञा ले और उसका पालन भी करे तो वह क्या रघुवंशी कहेलायेगा?

अगर खुदको शूरवीर प्रस्तुत करनेवाला चोर आने पार दूम दबाके भाग जाय या चोरसे जिवंत पर्यंत दोस्ती करले तो क्या वह शूरवीर माना जायेगा?

इस बात पर यही कहेना पडेगा कि जो शेर कुत्तेसे डरकर भाग जाता है वह शेर नहीं कहेलाता.

बकरीकी तीन टांग

तो यह खुशवंत सिंह जिसको समाचार माध्यमोंके कई मूर्धन्योंने सदाकाळ और उसकी मृत्युके अवसर पर तो खास, एक निडर पत्रकार लेखक घोषित किया उसमें कितना तथ्य और कितनी वास्तविकता?

जिनको नहेरुका और उनकी लडकी इन्दीरा गांधीका शासन काल और कार्य शैलीका ज्ञान नहीं और उस समय खुशवंत सिंह कहां थे वह मालुम ही नहीं हो उसके लिये खुशवंत सिंहकी निडरताकी बातें बकरीके तीन टांग जैसी है. लेकिन उसका मतलब यह नहीं कि वे लोग अपनी अज्ञानता उनके विवेकशून्यता का कारण बता दें.

खुशवंत सिंहको निडर कहेना क्या मजाक है या वाणी विलास है?

नहेरुका समर्थन करना नहेरुकी रुस और चीन परस्तीवाली विदेश नीतिको समर्थन करनेके बराबर है. नहेरु अपनेको जन्म मात्र से हिन्दु समझते थे. कर्म और विचारसे नहीं. धार्मिक विचार धारा कैसी पसंद करनी है, यह अपनी अपनी पसंदगीका विषय है. लेकिन जब अगर कोई नेता राजकीय प्रवृत्तिमें है और जन विकासके लिये अपनी नीतियां बनाता है तब उसको अपनी नीतियोंके बारेमें आज और कलका ही नहीं परसोंका भी सोचना चाहिये. अगर नेता इस बारेमें सोचता नहीं है तो वह नेताके योग्य नहीं. उसके समर्थकों बारेमें भी हमें वैसा ही सोचना चाहिये.

नहेरुकी विदेशनीति देशके लिये विद्ध्वंशकारी थी. उसका व्यापक प्रभाव है

नहेरुका सर्वग्राही समर्थनमें उनकी परिपेक्षित विदेश नीति का समर्थन भी हो जाता है.  

नहेरुकी विदेश नीतिका समर्थन करना मतलब है कि सरदार पटेलने जो चेतावनी दी थी वह गलत थी उसका स्विकार करना.

नहेरुकी विदेश नीतिका समर्थन करना मतलब है कि राजगोपालाचारी और जेबी क्रिपलानी, महावीर त्यागी आदि कई नेतागण संसदमें जो समाचार देते रहे थे उसको नहेरु गलत मानते रहेते थे और उनके सुझावोंकी अवमानना करते थे तो इस बातमें उन सभी महानुभावोंको गलत समझना और नहेरुको सत्यवादी समझना.

नहेरुकी विदेश नीतिका समर्थन करना मतलब है कि जब सत्य सामने आया और चीनने भारत पर हमला करके भारतकी ९०००० (नब्बे हजार चोरस मील) भूमि पर कबजा जमा लिया), तो भी १९६७के चूनाव में नहेरुकी पूत्री इन्दीरा गांधीका समर्थन करना ऐसा ही सिद्ध होता है.

नहेरुकी विदेश नीतिका समर्थन करना मतलब है कि, इन्दीरा गांधी नहेरुकी नीतियोंकी समर्थक थी. इस कारण इन्दिराका और उसके साथीयोंका समर्थन करना यह ही सिद्ध करता है कि भारतको नहेरुवीयनोंकी आत्मकेन्द्री और देशको बरबाद करनेवाली नीतियोंका अगर आप समर्थन करते है.

इस कारण से नहेरुकी विदेश नीतिका समर्थन करना मतलब है कि तो शायद आपकी दिमागी खराबी है या तो आप भी आत्मख्यातिकी प्रच्छन्न ध्येय के सामने देश हितको गौण समझते है.

नहेरुकी विदेश नीतिका समर्थन करना मतलब है कि, नहेरुवीयन कोंग्रेसकी (नहेरु, इन्दिरा आदिकी विदेश नीतियोंके कारण भारतके हजारों जवान बेमौत मारे गये और  देशकी आर्थिक विनीपात आपकी कोई गिनतीमें नहीं.

अगर ऐसा नहीं है तो आप कभी खुशवंत सिंह को निडर पत्रकार कभी नहीं मान्य रखते.

निडर कौन है?

निडर वह है जो यातनाओंसे डरता नहीं है. साथ ही साथ कमजोर आदमी भी वह निडर आदमीसे डरेगा नहीं. क्यों कि कमजोर आदमी भी निडरके पास सुरक्षित है.

निडरता वैसे तो एक सापेक्ष सदगुण है

जब नहेरुकी पुत्रीने अपनी सव्रक्षेत्रीय प्रशासनीय निस्फलताको छिपानेके लिये आपातकालकी घोषणा की, तो जिन मूर्धन्योंने इन्दीराके आपातकालका समर्थन किया उन डरपोक मूर्धन्योंमे खुशवंत सिंह भी थे.

जब कोई व्यक्ति आपातकालका समर्थन करता है तब उसके खुदके बारेमें कई और बातें भी सिद्ध हो जाती है.

अगर आप आपतकालका समर्थन करते है तो आप अपने आपमें यह भी सिद्ध मान लेते हो;

महात्मा गांधीके वैचारिक और निवासीय अंतेवासी जय प्रकाश नारायण पथभ्रष्ट थे और उनको जेलमें भेजना आवश्यक था.

देशकी समस्याओंका कारण इन्दिराका शासन नहीं था, लेकिन जो लोग इन्दिरा गांधीकी विफलताका विरोध कर रहे थे वह विरोध ही विफलताका कारण था.

लोकशाहीमें विरोधी सुर उठानेवाले और जन जागृतिके लिये मान्य प्रक्रियाका सहारा लेनेवाले देश द्रोही है.

यह भी कम है. आगे और भी देखो;

जिन लोगोंने आपातकालका विरोध किया नहीं था, लेकिन भूतकालमें इन्दिराका विरोध किया था और (और ही नहीं या भी लगा लो) या तो भविष्यमें विरोध कर सकते है, उनको भी जेलमें बंद कर दो. इसकाभी आप समर्थन करते है.

समाचार माध्यम पर शासकका पूर्ण निरपेक्ष अधिकार और शासकका अफवाहें फैलानेका अबाधित अधिकार और सुविधा इसका भी आप समर्थन करते है.

मतलब की आप (खुशवंत सिंघ), शासकको संपूर्ण समर्पित है. आपका शरीर एक शरीर नहीं एक रोबोट है, जिसका कोई जैविक अस्तित्व नहीं है. आप एक अस्तित्व हीन निःशरीरी है. यह बात आपने पहेले से ही सिद्ध कर दी है.

खुशवंत सिंह की दाढी और धर्म की चर्चा हम नहीं करेंगे.

स्वर्ण मंदिर पर हमले की बात भी कभी बादमें (२५वी जुन पर) करेंगे.

ईशावास्य उपनिषदमें लिखा हैः

असूर्या नाम ते लोका अंधेन तमसावृता,

तांस्ते प्रेत्याभि गच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ()

जो लोग विवेकशील बुद्धिका अभाव रखकर अंधकारसे आवृत रहते है वे लोग आत्माको जानते नहीं और वे हमेशा अंधकारमें ही रहेंगे क्यों कि उन्होने अपनी आत्माको नष्ट किया है.

निडरता सापेक्ष है

आपतकालमें जो लोग निडर रहे उसके प्रमाणित निडरता क्या क्या थी? हम उनको इस प्रकार गुण (मार्क्स) देंगे;

१०० % गुण; ऐसे लोग, वैसे तो इन लोगोंका काम शासनका विरोध था ही नहीं, लेकिन क्यूं कि मानव अधिकार का हनन हुआ तो उन्होने खूल्ले आम विरोधका प्रारंभ किया.

उदाहरण; भूमिपूत्रके संपादक गण. नानुभाई मजमुदार, कान्तिभाई शाह

१०० % गुण; जो लोग वास्तवमें महात्मा गांधीकी परिभाषा के हिसाब से निडर थे उन्होने लोक जागृतिकी प्रवृत्ति खुल्लेआम चालु रखी और कारावासको भूगतनेके लिये हमेशा सज्ज रहे.

उदाहरण;ओपीनीअनके मालिक पदत्यागी आईसीएस अधिकारीगोरवाला

९९ % गुण; जेल जानेसे डरते नहीं थे लेकिन जनता सत्यसे विमुख रहे इसलिये भूगर्भ प्रवृत्तिद्वारा समाचार पत्र प्रकाशित करने के लिये अपनी जिंदगीभरकी पूरी बचतको खर्च कर दिया.

उदाहरण; भोगीभाई गांधी  

७५% गुण; वे लोग जेल जानेसे डरते थे या तो व्यर्थ ही जेल जाना चाहते नहीं थे इस लिये भूगर्भ प्रवृत्ति जितनी हो सके उतनी करने वाले.

उदाहरण; नरेन्द्र मोदी और उसके कुछ साथी, सुब्रह्मनीयन स्वामी, जोर्ज फर्नाडीस, आदि कई लोग

५०% गुण; वे लोग जेल जानेसे डरते थे लेकिन शासनके विरोधी तो बने ही रहने चाहते थे लेकिन कुछ समयावधिके लिये निस्क्रीय हो गये.

उदाहरण; विनोबा भावे और सर्वोदयी मित्रगण

४०% गुण; वे लोग जो जेल जानेसे डरते थे लेकिन शासनके विरोधी तो बने ही रहने चाहते थे लेकिन निस्क्रीय हो गये.

उदाहरण; सुज्ञ जनता, सुज्ञ मूर्धन्यगण

३०% गुण; वे लोग जो सरकारी माध्यमोंके द्वारा किये गये प्रचारसे द्विधामें पड गये और मौन हो गयेः उदाहरण; आम जनता

२०% गुण; वे लोग जो समाचार पत्रमें शासन के बारेमें गतिविधियोंका विश्लेषण करते थे और अपनी कोलम चलाते थे, उन्होने अपनी कोलम चालु रखनेके लिये कोई और विषय पर चर्चा चलाने लगे. या तो असंबद्ध बातें लिखने लगे.

उदाहरण; ख्याति प्रिय स्वकेन्द्री अखबारी मूर्धन्य गण

००% गुण; वे लोग जो समझने लगे कि सियासतसे दूर ही रहो.

उदाहरण; आम जनता

अब सब ऋणात्मक गुण प्राप्त करने वाले आते हैः

(५० % गुण); वे लोग जो मानते थे कि इन्दिरा को पछतावा होता था और वह डर डर कर रहेती थी,

(६०% गुण); वे लोग जो कहते थे अरे उसने तो आपातकाल हटा लिया था. और बादमें उसने घर घर जाके अफसोस जताया था.

उदाहरण; अखबारी मूर्धन्य कान्ति भट्ट (जंगलमें मोर नाचाहा पस्तावा, विपूल झरना, स्वर्गसे नीकला हैपापी उसमे  गोता लगाके पूण्यशाली बनेगा)

(७० % गुण); वे लोग जो बोलते थे कि आपात काल घोषित करने कि इन्दिराकी तो ईच्छा नहीं थी और वह अस्वस्थ थी                         

(८० % गुण); वे लोग जो बोलते थे कि, क्या करती वह इन्दिरा? सब उसके पीछे पड गये थे. इसलिये उसने आपात काल घोषित किया

(९० % गुण); वे लोग जो बोलते थे “लोकशाहीने क्या किया. कुछ नही. अब इन्दिराको अपने तरिके से काम करने दो”.

(९५ % गुण); हम भारतीय, लोकशाहीके लायक ही नहीं है.

उदाहरण; शिवसेना,

(९९ % गुण); वे लोग जो बोलते थे अरे भाई हमारा तो नहेरुसे कौटूंबिक नाता है. हमें तो उसका अनुमोदन करना ही पडेगा.

उदाहरण; जिसनेसूतकी मालालिखके महात्मा गांधीको अंजली दिया था, उसने आपात कालमेंजूठकी मालालिखनी चाहिये थी और उसको इन्दिराको पहेनानी चाहिये थी. अमिताभ बच्चन के पिता 

(९९. % गुण); अरे भाई, इन्दिरा और मैं तो साथमें पढे थे,

उदाहरण; बच्चन कुटुंब

(१०० % गुण); जो लोग बोलते थे; वाह वाह इन्दिरा गांधी वाह वाह. इन्दिरा गांधी तूम आगे बढो हम तुम्हारे साथ है.

उदाहरण; साम्यवादी नेतागण, नहेरुवीयन कोंग्रेसके बंधवा, खुशवंत सिंघ, आदि.

खुशवंत सिंह पर कुछ मूर्धन्य इसलिये फिदा है कि खुशवंत सिंह चिकनी चुकनी बातें लिखते थे. क्या चिकनी और गुदगुदी कराने वाली बातें लिखनेसे आदमी निडर माना जाता है?

अरे भाई, खुशवंत सिंह की मौत हुई है. मौतका तो मलाजा रक्खो?

क्या वह कभी जिन्दा भी था? उपर पढो; “(तांस्ते प्रेत्याभि गच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः)”

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः खुशवंत सिंह, नहेरु, इन्दिरा, लोकशाही, आपातकाल, गुण, ऋणात्मक गुण, निडर  

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