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क्या इस्लामका सर्वनाश सुनिश्चित हो गया है?

क्या इस्लामका सर्वनाश सुनिश्चित हो गया है?

जब भी तथा कथित शांतिप्रिय धर्म, इस्लामके मुसलमानों बहेकावेमें आके देशकी संपत्तिको नुकशान करते हुए हम देखते है तो ऐसा लगता है कोंगीने अपने शासन कालके अंतर्गत इन  मुस्लिमोंका  किस हद तक पतन किया है!!

यह केवल मुसलमानोंके मानसिक पतनकी समस्या नहीं है. कोंगीयोंके सर्वनाशकी भी यह भविष्यवाणी है.

आश्चर्य इस बातका है कि जिस इस्लामने अब्दुल कलाम आज़ाद, हसन निस्सार, तारेक फतह, मुख्तार अब्बास … ऐसे और कई सारे  नेतागण को जन्म दिया उस इस्लामको मानने वाले कैसे इतने निम्नस्तर पर पहूंच गये?

देशका विभाजन के समय

देशके विभाजनके समय भी भारतमें रहेने वाले  मुसलमानोंके बारेमें यह प्रश्न उत्पन्न हुआ था.

यदि भारत देशके मुसलमान, भारतको वफादार नहीं रहे तो क्या होगा? इतना ही नहीं, एक प्रश्न यह भी उठा था कि यदि पाकिस्तानस्थित हिन्दुओंकी सुरक्षा पर, पाकिस्तानके मुस्लिम शासकोंने ध्यान नहीं दिया तो क्या होगा?

महात्मा गांधीका उत्तर सुनिये.

(१) यदि पाकिस्तान, अपने व्यवहारमें पाक नहीं रहा तो पाकिस्तान नष्ट हो जायेगा.

(२) यदि भारतका मुसलमान भारतको वफादार नहीं रहा तो सरकार उसको गोली मारेगी. 

अहिंसामें माननेवाले और अहिंसामें पूर्ण श्रद्धा रखनेवाले महात्मा गांधीने इस प्रकार दो भविष्यवाणी की थी.

गांधीजीको कोसनेवालोंको गांधीजीको पढना चाहिये. यदि वे बिना पढे ही गांधीजीको कोसते रहेंगे  तो वे अविश्वसनीय ही बन बनते हैं.

अहिंसाके नाम पर कायरता दिखाना गांधीजीको ग्राह्य नहीं था. और यह बात जबलपुरके गांधीचोक पर भी शिलालिखित है.

पहेली भविष्य वाणी गांधीजीने, तत्कालिन  पाकिस्तानवासी हिन्दुओंकी सुरक्षाके अनुसंधानमें, की थी. हिन्दुओंको सुरक्षा देना पाकिस्तानके शासकोंकी प्रतिबद्धता थी. यदि पाकिस्तानको अपने नामकी सार्थकता रखना है तो यह पाक (पवित्र) कर्तव्य, उसके लिये निभाना अनिवार्य था.

किन्तु पाकिस्तानने प्रारंभसे ही पाकिस्तान स्थित हिन्दुओंका संहार करना चालु कर दिया था. और वह आज पर्यंत चालु रक्खा है. पाकिस्तानमें हिन्दुओंकी जनसंख्या उस समय (१९५१) २४ प्रतिशत थी. अब १.६ प्रतिशत है.

इसका तात्पर्य है कि, हिन्दु लोग,, पाकिस्तानमें सुरक्षित नहीं थे और नहीं है. पाकिस्तानमें हिन्दुओंके उपर अत्याचार हुए. उनका बलपुर्वक धर्म परिवर्तन हुआ और जो माने नहीं उनको भागके भारत आना पडा.

नहेरुने १९५४मे पाकिस्तानवासी हिन्दुओंकी सुरक्षा के लिये पाकिस्तानके प्रधान मंत्री लियाकत अली, के साथ एक करारनामा किया था. किन्तु नहेरु अपनी आदतके अनुसार, पाकिस्तानके शासकके उपर कभी इस करारका पालन करवानेके लिये दबाव नहीं बनाया.

नहेरु अनिर्णायकताके और अकर्मण्यताके गुलाम थे. उन्होंने अपने शब्दोंकी किमत कभी भी समज़ा नहीं. नहेरुके कोंगी अनुगामी भी अनिर्णायकताके गुलाम ही सिद्ध होके रहे है. इसका कारण केवल यही था कि नहेरुवीयनोंको कुछ फर्क नहीं पडता था. इनकी चर्चा हम कभी और समय करेंगे.

एक बात अवश्य याद रखना है कि हिन्दुओंने अपने देशके निवासी मुस्लिमोंको कोई कष्ट नहीं दिया. कोंगीयोंने तो लघुमतियोंको हिन्दुओंसे भी अधिक अधिकार और सुरक्षा दिया. वास्तव में असमान व्यवहार, जनतंत्रका अनादर ही है. किन्तु कोंगीयोंको और उनके सांस्कृतिक साथीयोंको इससे कोई फर्क पडता नहीं है. उनकी न्याय अन्यायकी परिभाषा धर्मके आधार पर है. उन्होंने तो महात्मा गांधीका बार बार और लगातार खून किया है और करते रहे हैऔर यदि नष्ट नहीं हुए तो उनका खून करते रहेंगे. नहेरुवीयन कोंग्रेसकी (कोंगीकी) यह जन्मजात प्रकृति है.

महात्मा गांधीको यह ज्ञात था कि नहेरु और उसकी कोंग्रेस कैसी है. इसलिये ही उन्होंने एक और भविष्यवाणी की थी कि, “एक समय आयेगा कि जव कोंगीयोंको चून चून कर जनता मारेगी.”

 कोंगीका सर्वनाश सुनिश्चित है. लेकिन कब?

पाकिस्तान का तो नष्ट होना सुनिश्चित है.

किन्तु भारतका भविष्य क्या है?

कोंगीयोंने अपने शासनकालमें पूरे होशहवासमें, अपने राजधर्मका पालन नहीं किया है. इसके अगणित उदाहरण है. और यही कोंगी, देशके सिद्ध देशद्रोहीयोंके साथ मिलकर, देशको नष्ट करने पर उतर आयी है.

कोंगीके सांस्कृतिक साथी “आम आदमी” पक्षने, मज़दुरोंको आधीरातको “डीडी बसें तयार है अपने राज्यमें चले जाओ” ऐसी खुले आम घोषणा करके ईकठ्ठा किया. इसी पक्षने  विदेशी कट्टरवादी मुस्लिमोंको मर्कज़में महासभा करने दिया. इनसे पुरे भारतमें महामारी फैली. इसके पहेले दिल्लीमें प्रदर्शन, रास्ता रोको और सुनियोजित तरिके से मुस्लिमोंसे आग लगवाई और खून खराबा करवाया. अन्य स्थानों पर भी ऐसा ही करवाया.

बेंगलुरुमें क्या हुआ?

एक दलितने, एक मुस्लिमकी, हिन्दु-देवीयोंकी अभद्र चित्रकी पोस्टींगके उत्तरमें प्रोफेट महम्मदकी अभद्र चित्रकी पोस्टींग की.

यह दोनों पोस्टींग कैसे हुई यह संशोधनका विषय है. लेकिन प्रोफेट महम्मद के चित्रकी अभद्र पोस्टंगके कारण एक ही घंटेमें दो पूलीस स्टॅशनके मुस्लिमोंकी भीड जमा हो गयी. पुलिस स्टेशनमें तोड फोड की उनमें  वाहनोंको आग लगायी, पथराव होने लगे… जिसने अभद्र पोस्टींग की थी वह एक कोंगी सदस्यका भतीजा था. दोनोंके घरको तोड दिया. ऐसा लगता है कि जैसे कि यह सब पूर्वसे ही सुनियोजित था.

मुस्लिम मोबकी मांग थी कि जिस व्यक्तिने (जो कोंगी सदस्यका भतीजा था) उसको मुस्लिम मोबके हवाले कर दिया जाय.

कोंगीके लडके को जो दलित और हिन्दु था उसको तो गिरफ्तार कर ही लिया था. उसका कहेना था कि उसका एकाउन्ट हेक हो गया था. फिर भी उसकी गिरफ्तारी हो गई. लेकिन जो मुस्लिम था जिसने अति अभद्र चित्र  पोस्ट किया था, उसका क्या हुआ? उसका कुछ नहीं हुआ. हिन्दु दलितने तो कहा भी है कि उसका एकाउन्ट हॅक हो गया था. मुस्लिमने तो ऐसा कुछ कहा भी नहीं है. तो भी  उसकी रफ्तारी हुई है या नहीं उसके बारेमें कुछ पता नहीं.

मुस्लिमोंकी मांग थी कि प्रोफेट महम्मदकी अभद्र पोस्टींग करनेवाला लडका उनके हवाले कर दिया जाय.

मुस्लिमोंकी इस मांगका आधार क्या है?

मुस्लिमोंका कहेना है कि, “जिसने प्रोफेट महम्मदके बारेमें अभद्र पोस्टींग की, उसका न्याय हम  करेंगे. हम भारतके संविधानकी प्रत लेके उसकी तथा कथित और फर्जी सुरक्षाके नाम पर प्रदर्शन भी करेंगे, माहात्मा गांधीकी छवी, हाथमे  रख कर, असंबद्ध प्रदर्शन भी करेंगे, रास्ता भी महिनों तक रोकेंगे, जनतंत्रके नाम पर अभिव्यक्तिकी स्वातंत्र्यताका फायदा भी उठायेंगे चाहे अन्य लोगके लिये असुविधा ग्रस्त हो”. मुस्लिम लोग आगे कहेते है;

फिर भी अय पूलिस लोग !

“हमे वह लडका, जिसने प्रोफेट महम्मदका चित्र पोस्ट किया है, हमारे हवाले कर दो. हम ही उसका न्याय करेंगे. यह हमारा हक्क है.

“जी हाँ. जब महाराष्ट्रकी पूलिसने, हिन्दुओंके दो सन्यासीयोंको, क्र्श्चीयन कम कोमी बिरादरोंके बने हुए मोबके हवाले कर दिया था, तो बेंगलुरुकी पूलिस, क्यूँ इस अपराधीको हमारे हवाले नहीं करती?

“अब देखो

“पालघरमें दो सन्यासी जिनमें एक सन्यासी ७० सालका था. दुसरा ३५ सालका था और उसका ड्राईवर, उन तीनोंको हमने मार डाला. जी हाँ हमने इनको मार डाला. क्यों कि उन्होंने हमारे बच्चोकों चोरी किया था.

“हमारे कौनसे बच्चे थे वह हमे मालुम नहीं. इसके पहेले भी हमारे बच्चोको चोरी किया था. वे बच्चे कौन कौन थे वह भी हमे मालुम नहीं. पूलीसको भी मालुम नहीं है. तो हम क्या करे?

“लेकिन हम जूठ नहीं बोलते है वह पालघरकी पूलीसको भी मालुम है. इस लिये तो उन्होंने इन तीनोंको हमारे हवाले कर दिया था. और हमने इन पूलिसके सामने ही इन तीनोंको मार मारके मार डाला. हम जो करते है वह सही ही करते है. उपरोक्त मामलेमें किस नेताको गिरफ्तार किया?

“आपके हिन्दुधर्मके महारक्षक पक्षवाले  मुख्य मंत्रीने भी हमारी बात मानी कि यह सब गलतफहमीसे हुआ था. हमने तो उनके उपर कोई दबाव नहीं डाला था कि वे हमारी बात ही माने. लेकिन उन्होंने हमारी बात मान ली. तो हम क्या करें? हमने गलतफहमीसे इन तीनोंको मार डाला, इस बातका आपका मुख्यमंत्री स्विकार कर लें वह भी क्या हमारा गुनाह है? आप तो बडे असहिष्णु है.

“जब एक हिन्दुपक्षकी सरकारकी पूलीस, जिन सन्यासीयोंको हमने बच्चोंके उचक्का करनेवाले माना उन  तथा कथित उचक्केवाली  हमारी बातसे वह सरकार तुरंत ही संतुष्ट हो गई और उस पोलीसने उन तीनोंको हमारे हवाले कर दिया. तो बेंगलुरुकी बात तो सरल ही थी. बेंगलुरुमें भी हिन्दुपक्षकी सरकार है. इसमें तो “तथा कथित” जैसा कुछ था ही नहीं. सीधा ही मामला था. बेंगलुरुमें उस अपराधीको हमारे हवाले क्यूं नहीं किया? हम शांतिप्रिय धर्मवाले है इसलिये ही न? हम अस्त्र शस्त्र, पेट्रोल बोंब, लाठी ले के आये थे इस लिये क्या? हमें किसीको मारना ही है तो लाठीसे भी मार सकते है.

“केवल लाठी तल्वार पेट्रोल बंब रखनेसे ही हम अपराधी बन जाते है क्या?

“एक तरफ आप हमारी सीधी और सरल बातको मानते नहीं है. ऐसा करके आप हमें उकसाते है तो अपराधी तो आप ही बनते है न? हिंसा करनेके लिये उकसानेवाला क्या छोटा अपराधी है?  लेकिन आप अपराध करनेके लिये उकसाने वालेको अपराधी मानते ही नहीं है.

दिल्लीके दंगेमें आप पार्टीका सदस्य संमिलित था. आप कैसे कह सकते है कि जिस केज्रीवालने देशभरमें कोरोना नही फैलाने के लिये, रातको लोगोंकी भीड इकठ्ठा कर दी थी? यदि गोडसे आर एसएसका सदस्य नहीं था तो भी आप पुरे आरएसएसको गांधीका खुनी मानते है तो “आप”के कर्ता हर्ता केज्रीवाल  भी तो दिल्लीके दंगोंका बाप हुआ.  कोंगी भी तो आतंकवादका बाप है. और इस निष्कर्षके तो हजार प्रमाण  है.

“देखीये हम अल्पसंख्यक है. और हमारे अधिकार हिन्दुओंसे कहीं अधिक है. यह प्रणालीसे भी सिद्ध है. हमारे सुज्ञ लोग और बीजेपीके शिर्ष नेतागण भी यह बातका अनुमोदन करते है. “जो लोग मुर्दे को भी नहीं जलाते वे जिंदाको क्या जलायेंगे?”  

“हमने कश्मिरमें सब कुछ खुल्ले आम किया है. हमने १०००० से भी अधिक हिन्दु  महिलाओं पर रेप किया, हमने १०००से अधिक हिन्दुओंका कत्ल किया, हमने ५०००००से अधिक हिन्दुओंको उनके घरसे भगाया और निराश्रित किया. यह सब हमने खुले आम किया. और यह सब जनतंत्रीय भारतके आधिन जनतंत्रीय  काश्मिरमे किया. हम भी तो जनतंत्रवादी है. इसकी मिसाल तो आपकी सर्वोच्च अदालत है. हमारा कोई भी आदमी या नेता गिरफ्तार नही हुआ. अरे हमारे नेता तो मजेसे विदेश जाकर मौज  करने लगे थे और वापस आके आपको ही उनको मुख्य मंत्री बनाना पडा. और आपके केन्द्रके  हिन्दु शासकको भी गिरफ्तार नहीं किया. हमारे कश्मिरी नेताको केन्द्रका गृह मंत्री बनाना पडा. फिर क्या कहेना!!  हमने तो पूरे देशमें दूर दूर तक बडे मजेसे आतंक फैला दिया.  न तो आप कोई स्पेसीयल ईन्वेस्टीगेशन टीम बना पाये. न तो कोई एफ.आई.आर. दर्ज कर पाये.

“अरे भाई हमतो खुले आम, आपके तीर्थ यात्रीयों पर सूचना देके हमला करते है. आपके सुज्ञ जनोंके कानमें जू तक नहीं रेंगती.

“अमरनाथ यात्रीयों की सुरक्षाके लिये आप अमरनाथ श्राईन बोर्ड के लिये भूमि उपलब्ध करना चाहते उस बात पर हमने और हमारी सरकारने भी कडा विरोध किया और पुरे राज्यमें हंगामा किया. आप क्या कर पाये? शून्य ही न?

“क्या आपमें ताकत है कि आप हमारे हजयात्रीओं पर हमला करें? अरे एक विरोधका सूर भी तो निकालके देखो? पूरी दुनिया आपके उपर थू थू  करेगी. हम तो खुले आम बोलते है और हमला भी करते है. और आपके शिर्ष नेता भी कबुल करते है कि हम मुस्लिमोंका ही भारत पर अधिक अधिकार है.

“जब हम कोंगी जैसी पर्टीको हमारी लुगाई बनाके देशको दशकों तक लूट सकते है तो उद्ध्व ममता जैसे कई हमारे शरणमें आ ही जाते है. देख लिया न?

“हमने कई मंदिर तोडे और अब भी तोडते है. उसके उपर बनाई एक मस्जिदको आपने तोडा तो हमने आपको पुरी दुनियामें बदनाम कर दिया. उस तूटी मस्जिदके उपर, मंदिर बनानेमें आपको अपनी नानी याद करवा दी. यह है हमारा जनतंत्र. जब आप लुट्येन गेंगका एक बाल भी बांका नहीं कर सकते तो हमे क्या कर पाओगे?

शिरीष मोहनलाल दवे  

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पी.के. ने पीके किया नशा? कथांक – २

विश्वमें एक हिन्दु धर्म ऐसा है कि जिसमें विज्ञान जैसा खुलापन है. यह खुलापन हजारों सालसे है.

हिन्दु धर्ममें वेद प्रमाण है. किन्तु वेदोंको समझना कठिन है. इसलिये उपनिषद है. उपनिषद विशेषज्ञोंके लिये है. इस लिये कृष्ण भगवानने वेदोंके आधारपर उपनिषदोंका दोहन किया और उस दूधका दहीं बनाके तक्रका मंथन करके गीताके स्वरुपमें मक्खन बनाके आम जनताको प्रस्तूत किया. अगर गीतामें वेदोंके साथ कोई विरोधाभाष है तो वेद प्रमाण है. किन्तु वेदप्रमाण और प्रत्यक्ष प्रमाणमें यदि कोई विरोधाभाष है तो जो प्रत्यक्ष है वह प्रमाण है. ऐसा आदि शंकराचार्यने कहा है.

यह हिन्दुओंका खुलापन है. जब ज्ञातिप्रथा अत्यंत जड थी तब भी उसके विरुद्धमें विद्रोह उठाने वाले लोग थे. हिन्दु लोग अपनी प्रणालीयोंमें यदा कदा क्षति पाते है तो वे उन क्षतियोंको सुधारने के लिये सक्षम भी है. उसमें अन्य धर्मीयोंको चंचूपात करनेकी जरुरत नहीं है. अन्य धर्मी स्वयंकी क्षतियों पर आत्मखोज करें वह हि उनके लिये योग्य है.

पी. के. का उद्देश क्या था?
वास्तवमें पी. के. का उद्देश अंधश्रद्धा निर्मूलन है ही नहीं.
हिन्दु धर्ममें एक खुलापन होनेसे वह चर्चाके लिये एक आसान लक्ष्य बनता है. उसके विरोधियोंके लिये यह एक आनंदका विषय बनता है.
हिन्दु धर्म एक भीन्न प्रकारका धर्म है.

अन्य धर्मोंने अपने धर्मोंके आधार पर, धर्मकी जो परिभाषा की है, उस व्याख्या के अनुरुप हिन्दु धर्म नहीं है.

इस लिये अन्य धर्मी लोग हतःप्रभः है.
ये विधर्मी जहां कहीं भी गये उन्होने सौ वर्ष के अंतर्गत उन देशोंके ९५ से १०० प्रतिशतको अपने धर्ममें परिवर्तित कर दिये. किन्तु भारतवर्ष जहां विधर्मी जातियोंनें २०० से ८०० साल तक शासन किया तो भी ८० प्रतिशत भारतवासी हिन्दु धर्मी ही रहे. हिन्दुंओंकी तथा कथित क्षतियों को भरपूर हवा देने पर भी वे हिन्दु ही रहे. यह बात इन लोगोंके लिये आघातजनक है. ये लोग आत्म खोज करने के स्थान पर, बिना सोचे समझे, और बिना हिन्दु धर्मकी गहनताका अभ्यास किये, हिन्दुओंके आचार पर आक्रमण करना पसंद करते है.
सामान्य जनतामें धर्म, ज्ञान के उपर चलता नहीं है किन्तु श्रद्धाके आधार पर चलता है. इन अन्य धर्मीयोंकी व्युह रचना यह है कि अगर सामान्य जनताको हिन्दु धर्मके ज्ञानीयोंसे अलग की जाय तो फिर संख्या के आधार पर इन ज्ञानी लोगोंसे तो निपटा जा सकता है.

मुस्लिमोंने ६०० वर्षतक हिन्दु राजाओंसे संघर्ष किया. ऐसा करते करते वे खुद आधे हिन्दु बन गये. जो मुस्लिम राजा आधे हिन्दु नहीं बने और धर्मांध भी थे उन्होने गरीबोंको और आशितोंको मुस्लिम बनानेके प्रयास किये. कुछ लोगों पर जबरदस्ती भी की, हत्याएं भी की, थोडे सफल भी रहे. किन्तु जितना वे अन्य देशोमें सफल हुए उतना यहां नहीं हो पाये.
इस बातका मुस्लिमोंको अफसोस भी नहीं था. क्यों कि ६०० वर्षके अंतरालमें खुदका राज बचाने की नौबत उनको आगयीं थीं. जब औरंगझेब मृत्युशैया पर था तब मुगल साम्राज्य तहस नहस हो गया था.
अंग्रेजोंने कूट नीति चलायी. भारतीयोंको गलत और विभाजनवादी इतिहास पढाया. अंग्रेजी भाषाको भारतीयों पर ठोक दी. अंग्रेजी भाषाके जाननेवालोंको नौकरीयोंकी सुविधाएं दी. उनका मान बढाया. पाश्चात्य शिक्षाको ही स्विकृति दी. हिन्दुधर्म के पुरस्कर्ताओंको धर्मांध ठहेराया. हिन्दुओंके लिखे पुस्तकोंको सर्वांश नकार दिया.
इतना करने के बावजुद भी, हिन्दुओंके सामने इन लोगोंकी पराजय हर मोड पर निश्चित थी. उन्होने ऐसे हाथोंमें स्वतंत्र भारतका सुकान दिया कि जो संस्कारमें उनकी योजना आगे चलायें.

वह था नहेरु.

उसने विभाजन वादी प्रक्रियाएं चालु रक्खी. और पाश्चात्य पंडितोंने लिखा हुआ इतिहास भी चालु रक्खा. हिन्दुओंको अपमानित करना चालु रक्खा. मुसलमानोमें यह भावना रक्खी की वे हिन्दुओंसे भीन्न है.

मुसलमान समझने लगे कि उनका इतिहास अधुरा है. ख्रिस्ती भी ऐसा समझने लगे कि उनका इतिहास भी भारतमें अधुरा है. क्यों कि दोनों भारत को ९५-१०० प्रतिशत अ-हिन्दु कर नहीं पाये.

मुसलमानोंका इतिहास क्या है?
जहां भी उनका शासन हुआ वहां उन्होने १०० प्रतिशत जनताका धर्म परिवर्तन किया और सबको मुस्लिम बना दिया. यहां तक कि ईजिप्त, सुमेरु बेबीलोनकी सुसंस्कृत संस्कृतियोंका पतन किया. उनके धर्मस्थानोंको तोड दिया. उन धर्मस्थानोंके उपर अपने धर्मस्थान बनाये. वहांकी जनताका जबरदस्तीसे धर्म परिवर्तन किया. मुस्लिम शासकोंने हर जगह ऐसा ही किया था. भारतमें भी उन्होने हजारों देवस्थानोंको नष्ट किया. नालंदा, तक्षशीला, वलभीपुर जैसे विश्वविद्यालयोंको भी पूरी तरह नष्ट किया था. किन्तु भारतमें कई राजाओंने उनको पराजित किया इस लिये वे अपने ध्येयमें १०० प्रतिशत सफल नहीं रहे.

ख्रिस्ती शासकोंने क्या किया?
उन्होनें वही किया जो मुस्लिमोंने आतंकवादी बनके अन्यत्र किया था. उसके उपरांत ख्रिस्ती शासकोंने वहांके आदिवासीयोंका करोडोंकी संख्यामें कत्ल किया. उनकी भाषा भी नष्ट की. आज अमेरिकाके बचे हुए आदिवासी सब ख्रिस्ती है. उनकी मूल भाषा भी विलुप्त हो गयी है. माया-संस्कृतिका और उस धर्मको माननेवालोंका एक आदमी आपको कहीं भी मिलेगा नहीं. केवल इतिहासके पन्नों पर माया संस्कृति और उसकी भाषा आपको मिलेगी.

THEY ARE ENDED UP

किसी भी संस्कृतिको अगर नष्ट करना है तो उसकी भाषा, प्रणालीयां और धर्मस्थानोंको नष्ट करदो तो वह अपने आप नष्ट हो जायेगी.

भारतमें अब तक नहेरुवीयन कोंग्रेसका शासन था. इन्होने हिन्दु धर्मको धर्म निरपेक्षताके नाम पर कई सारे आघात किये. जो विधर्मी शासकोंने भारत पर शतकों वर्ष तक शासन किया था उनके धर्मको माननेवालोंको रीयायतें दी. वे लोग हिन्दुओंका धर्म परिवर्तन कर सके, उसके लिये भी सुविधायें दी. उनके लिये अलग नागरिक नियम बनायें. बहारसे पैसे लाके ये विधर्मी लोग भारतीय जंगलवासीयोंको, पर्वतवासीयोंको और समूद्रके किनारेके वासीयोंको हिन्दुमेंसे परधर्मी कर सके उसके लिये सुविधायें दी.
अगर कोई विधर्मी, हिन्दु धर्मके विरुद्ध बोलें, तो सरकारका रवैया रहा कि, भारत तो, एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है इसलिये सरकार उसमें दखल नहीं करेगी. वाणीस्वातंत्र्य और अपने धर्मका प्रचार करना विधर्मीयोंका अधिकार माना गया. लेकिन कोइ हिन्दु अगर ऐसा कुछ करें तो उसको धर्मांध कहेना, उसकी हर बातको भगवाकरण मानना, और उसकी निंदा करना एक फेशन मनवायी गयी. भगवाकरण शब्दको गाली के रुपमें प्रस्तूत किया ग्या. आदि आदि
हिन्दुओंको नष्ट करनेका अब यही एक उपाय बचा है कि, सामान्य कक्षाके हिन्दुओंको असंजसमें डालो, अपमानित करो, उनकी यातनाओंकोके प्रति दूर्लक्ष्य दो, विभाजित करो.

जो मूर्धन्य है उनमेंसे अधिकतरोंको तो भ्रष्ट करना आसान है. बाकि जो हिन्दु बचें, उनके विरुद्धमें विवाद खडा करके बदनाम किया जायेगा तो वे तो वैसे ही आम जनताकी नजरोंमेंसे गीर जायेंगे. नरेन्द्र मोदीको क्या किया गया? उसके इतिहास के संदर्भमें दिये गये उदाहरणोंको तोडमोड के प्रदर्शित किया गया, और उनको खुब उछाला. उसकी अंग्रेजी भाषाके उपर बेवजह ही मजाक उडाया. वह अगर किसी बात पर प्राथमिकता दें तो उसके उपर विवाद खडा किया जाता है.

एक बार अगर हिन्दु जनसंख्या ६० प्रतिशत हो जाय तो फिर उनको नष्ट करना आसान है.

सत्तालोलुप विधर्मीयों जिनमें कुछ प्रच्छन्न विधर्मी भी है, उनके लिये यह तो बायें हाथ का खेल है. क्यों कि विधर्मी ख्रिस्ती और मुस्लिम संस्कारमें तो एक समान ही है. दोनों समझते है कि उनका ही धर्म ईश्वरको मंजुर है. और विधर्मीयोंको किसीभी साधनसे नष्ट करना ईश्वरको मंजुर है.

फिलहाल विधर्मीयोंने भारतके कई राज्योंमें अपने बहुमत वाले टापु बना दिये है. ये लोग उनमें बसे हिन्दुओंके उपर आतंक करके उनका धर्म परिवर्तन कर देते हैं. अगर उन्होने धर्म परिवर्तन नहीं किया तो उनको घर छोडके भाग जाने पर मजबुर कर देते हैं. केराला, तामिलनाडु, पश्चिम बंगालके कई कस्बोंका यही हाल है. उत्तरपूर्वी राज्यों पर तो इन्होंनें कबजा जमा ही लिया है.

भारतका सामान्य जन विधर्मीयोंके इस प्रकारके आचारोंसे अज्ञात है. क्यों?

क्यों कि,

समाचार माध्यमों पर इन विधर्मीयोंका कब्जा है.

विधर्मी संचालित समाचार माध्यम अपने धर्मकी आतंकवादकी घटनाओंको प्रसारित करते नहीं है.
कश्मिरके हिन्दुओंके उपर किये गये आतंकको किस चेनलने प्रमाणके आधार पर प्रसारित किया था या किया है? एक भी नही.
विधर्मीयोंका आतंकवाद आज भी चालु है.
लेकिन कौनसी चेनल हिन्दुओंके मानव अधिकारकी रक्षाके लिये जागृत है? प्रमाण भान रखना और विधर्मीयोंके मानव अधिकारको मान्यता देना, इन बातोंमें ये मुस्लिम और ख्रिस्ती लोग मानते ही नहीं है.
एक बात सही है कि सामान्य ख्रिस्ती लोग, हिन्दुओंके विरुद्ध वाचाल नहीं है. वे अलग वसाहत नहीं बनाते है और हमारी ही कोलोनीमें हमारी पडोसमें ही रहेते है और हमसे तदृप होके रहेते है. लेकिन उनके जो मूर्धन्य और धर्मगुरु होते है वे सक्रीय होते है. वे लोग अपनी सामान्य जनताको यही कहेते है कि आप लोग, सिर्फ हम कहें उनको ही, चूनावमें वॉट दो. बाकीका काम हम कर देंगे.

मुस्लिमोंको सही रस्ते पर लाना शायद शक्य हो सकता है. किन्तु ख्रिस्तीयोंको सही मार्ग पर लाना कठिन है. क्यों कि उनको तो समझाया गया है कि आपका उद्धार तो हमने ही किया है. इन भारतवासीयोंने तो आपको हाजारों सालों तक यातनाएं ही दी है. क्यों कि वे हिन्दु है.

आप जरुर कहेंगे कि, पी. के. जिन हिन्दुओंने देखी है उनमेंसे कई हिन्दुओंने उसकी प्रशंसा की है. उसका क्या?

यदि आप प्रशंसा करनेवालोंका वर्गीकाण करेंगे तो उसमें दो प्रकारके लोग है. एक सामान्य कक्षाके लोग, जिनमें कुछ लोगोंका एक स्वभाव होता है कि किसी भी बात को “एक साक्षीभाव”के रुपमें देखें.
जब ऐसा होता है और जब उनको हिन्दु धर्मका शास्त्रीय ज्ञान नहीं होता है तो ये सामान्य लोग, दुसरोंकी व्युह रचनाएं नहीं समझ सकते और व्युहरचना करने वालोंका हेतु भी समझ नहीं सकते. अगर उनमें प्रमाणिक प्रज्ञा और प्राथमिकताती प्रज्ञा होती तो वे व्युह रचना बनानेवालों की व्युह रचना समझ सकते.

आप कहेंगे कि, कुछ मूर्धन्योंने भी तो, पी. के. की प्रशंसा की है, जैसे कि एल के अडवाणी. उसका क्या?
आपकी बात सही है. लेकिन आपको ज्ञात होना चाहिये कि दंभी धर्मनिरेक्षता करनेवालोंने एक ऐसी हवा प्रसारित की है कि, अडवाणी एक सोफ्ट और धर्मनिरपेक्ष नेता है. भारतको एक सोफ्ट नेता पसंद है. जैसे कि अटलजी भी एक सोफ्ट नेता था इसलिये वे भारतीय जनतामें स्विकार्य बने…. आदि… आदि..
वास्तवमें यह “सोफ्ट” वाला मामला एक सियासती व्युहरचना है. भारतीय जनताको एक विकल्प चाहिये था. भारतीय जनता नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनके साथीयोंके उनके सीमाहीन भ्रष्टाचार, ठग विद्या, दंभ और कोमवादसे त्रस्त हो गई थी. जब जब भारतीय जनताको विकल्प मिला है, उसने नहेरुवीयन कोंग्रेसको पराजित किया है.

यह बात भी समझ लो कि, नाम बडा हो जानेसे व्यक्ति बडा नहीं हो जाता.

कई बडे व्यक्तिओंमें एक निम्न कक्षाका व्यक्ति होता है.

small people Big name

लालु, माया, मुलायम, जया, करुणा, ममता, नितीश, अडवाणी, केशु, संकरसिंह वाघेला, फारुख, ओमर, मुफ्ती मोहमद, रसिकलाल, जिवराज, हितेन्द्र, ईन्दिरा, राजीव, सोनीया, राहुल …. अगर आप लिखोगे तो एक किताब बन जायेगी.

उपरोक्त लोग दुसरोंके कन्धे पर बैठके बडे नामवाले बने है.

वास्तवमें ये सब निम्न कक्षाके है, और इनलोगोंको नेता मानने वाले तो अति निम्न कक्षाके है.
उसी तरह कई छोटे लोगोंके शरीरमें, एक महान व्यक्ति बैठा हुआ होता है. जैसे नरेन्द्र मोदी, बाबा रामदेव, जोर्ज फर्नाडीस, बाबुभाई जसभाई पटेल, सरदार पटेल, महात्मा गांधी, विवेकानंद, दयानंद सरस्वती … इन नेताओंकी भी एक सूची बन सकती है जो सामान्य होते हुए भी महान बने.
ऐसे भी कई लोग होते है जो महान होते हुए भी, शक्यताके सिद्धांतके अनुसार महान बन नहीं पाये.

आप कहोगे कि पी. के. में कोई व्युह रचना अगर है भी, तो वह कौन कौन सी व्युह रचना हो सकती है? और ऐसी मान्यताका आधार क्या है?

फिल्म उद्योग काले धनको सफेद करनेका एक सडयंत्र है यह बात सबको ज्ञात है.
पी. के. ने सीनेमा टीकीट का मूल्य बढा दिया था. जो सीनेमाघर खाली थे या “हाउसफुल” नहीं थे उनको भी “फाउसफुल” घोषित किये गये थे.
मान लिजिये अगर एक सीनेमा घरकी बैठकें १००० है. और टीकीटका मूल्य १४० रुपया है. और अगर वास्तवमें २०० टीकीट की ही बीक्री हुई किन्तु हाउसफुल घोषित किया गया तो कितना काला धन सफेद हुआ?
१४० में ४० रुपया सरकारी कर है.
(१) सीनेमा घरके मालिकके पास २०००० रुपये आये.
(२) किन्तु सरकारके हिसाबसे उसके पास १००००० आया.
(३) सरकार सीनेमाघरके मालिक की आवक ८००० मानेगी. उसके उपर ३० प्रतिशत आयकर लगायेगी. यह २४०० रुपये हुए. वास्तविक नफा १६०० था. और वास्तवमें उसको ४८० रुपया आयकर ही भरना था. तो भी उसने २४०० रुपया आयकर भरा. १९२० रुपया अधिक आयकर भरा.
(४) निर्माताने क्या किया? उसने ९२००० का ८ प्रतिशत यानी ७३६० नफा दिखाया, जो वास्तवमें १४७२ था. उसने ५८८८ रुपया ज्यादा दिखाया. मान लो की उसने सीनेमाघरके मालिकने जो १९२० ज्याद कर भरा था उसकी पूर्ती की या न की तो भी उसकी आयका नफा करीब ४००० रुपया हुआ. जो वास्तवमें ८०० रुपया था. ३२०० रुपया नफा ज्यादा दिखाया.
(५) यह तो एक शॉ की बात हुई और नफेकी ही बात हुई. खर्च तो इससे १२ गुना ज्यादा है. वह भी तो काले धनमेंसे खर्च किया था.
युपी और बिहार की जनताने टेक्ष फ्री किया. तो उनको भी हिस्सा मिला होगा जो दानके स्वरुपमें या उनके काले धनमें जायेगा.

यह काला धन सिर्फ काला ही नहीं है. वह लाल भी है. लाल धनसे मतलब है, असामाजीक तत्वोंकी कमाई, जो सुपारी, आउटओफ कॉर्ट प्रोपर्टी सेटलमेन्ट, ड्रग्झ, हवाला आदि सब है. नहेरुवीयन कोंग्रेसने पैदा की हुई दाउद गेंगका बडा नेटवर्क है.

ईन गद्दरोंसे दूर रहो.

शिरीष मोहनलाल दवे
टेग्झः वेद, उपनिषद, प्रमाण, गीता, प्रत्यक्ष प्रमाण, ज्ञातिप्रथा, भारत, हिन्दु धर्म, गहनता, मुस्लिम, इस्लाम, ख्रिस्ती, आक्रमण, अंग्रेज, माया-संस्कृति, नहेरुवीयन, निम्नकक्षा, धर्म परिवर्तन, भगवाकरण, मूर्धन्य, विधर्मी, मानव अधिकार, साक्षीभाव, कोमवाद, फिल्म, हाउसफुल, कालाधन, लालधन,

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पी.के. ने पीके किया नशा? कथांक – १

कूर्म पुराण और महाभारतमें एक सुसंस्कृत श्लोक है.

(१) आत्मनः प्रतिकुलानी परेषां न समाचरेत.
इसका अर्थ है;

जो वस्तु, स्वयंके लिये (आप) प्रतिकुल (मानते) है, (उसको आप) दुसरोंके उपर मत (लागु) करो.
इसका अर्थ यह भी है, कि जो आचार आप स्वयंके हितमें नही मानते चाहे कोइ भी कारण हो, तो वह आचार आप अन्यको अपनाने के लिये नही कह सकते.
इसका निष्कर्सका गर्भित अर्थ भी है. यदि आपको अन्य या अन्योंको आचारके लिये कहेना है तो सर्व प्रथम आप स्वयं उसका पालन करो और योग्यता प्राप्त करो.

क्या पी.के. में यह योग्यता है?

पी.के.की योग्यता हम बादमें करेंगे.
सर्व प्रथम हम इस वार्तासे अवगत हो जाय कि, फिलममें क्या क्या उपदेश है. किस प्रकारसे उपदेश दिया है और सामाजिक परिस्थिति क्या है.

संस्कृतमें नीतिशतकमें एक बोध है.
(२) सत्यं ब्रुयात्, प्रियं ब्रुयात्, न ब्रुयात् सत्यं अप्रियं.
सच बोलना चाहिये, किन्तु सत्य ऐसे बोलना चाहिये वह प्रिय लगे. अप्रिय लगे ऐसे सत्य नहीं बोलना चाहिये.
यदि आप स्वयंको उपदेश देनेके लिये योग्य समझते है तो आपके पास उपदेश देनेकी कला होनी आवश्यक है. क्या यह कला पी.के. के पास थी?

पी. के. की ईश निंदा

abhiSheka

(३) पूर्व पक्षका ज्ञानः
यदि एक विषय, आपने चर्चाके लिये उपयुक्त समझा, तो स्वयंको ज्ञात होना चाहिये कि चर्चा में दो पक्ष होते है.
एक पूर्व पक्ष होता है. दुसरा प्रतिपक्ष होता है.
पूर्वपक्ष का अगर आप खंडन करना चाहते है और उसके विरोधमें आप अपना प्रतिपक्ष रखना चाहते है, तो आपको क्या करना चाहिये?
पूर्वपक्ष पहेलेसे चला आता है इसलिये उसको पूर्वपक्ष समझा जाता है. और उसके विरुद्ध आपको अपना पक्ष को रखना है. तो आपका यह स्वयंका पक्ष प्रतिपक्ष है.
अगर आप बौद्धिक चर्चा करना चाहते है तो आपको पूर्वपक्षका संपूर्ण ज्ञान होना चाहिये तभी आप तर्क युक्त चर्चा करनेके लिये योग्य माने जायेंगे. अगर आपमें यह योग्यता नहीं है तो आप असंस्कृत और दुराचारी माने जायेंगे.
असंस्कृति और दुराचार समाजके स्वास्थ्य के लिये त्याज्य है.

(४) चर्चा का ध्येय और चर्चा के विषय का चयनः
सामान्यतः चर्चाका ध्येय, समाजको स्वस्थ और स्वास्थ्यपूर्ण रखनेका होता है. किसको आप स्वस्थ समाज कहेंगें? जिस समाजमें संघर्ष, असंवाद और विसंवाद न हो तदुपरांत संवादमें ज्ञान वृद्धि और आनंद हो उसको स्वस्थ समाज माना जायेगा. यदि समाजमें संघर्ष, वितंडावाद, अज्ञान और आनंद न हो तो वह समाज स्वस्थ समाज माना नहीं जायेगा.
आनंदमें यदि असमानता है तो वह वैयक्तिक और जुथ में संघर्षको जन्म देती है. उसका निवारण ज्ञान प्राप्ति है.
ज्ञान प्राप्ति संवादसे होती है.
संवाद भाषासे होता है.
किन्तु यदि भाषा में संवादके बदले विसंवाद हो तो ज्ञान प्राप्ति नहीं होती है.
ज्ञान प्राप्तिमें संवाद होना आवश्यक है. संवाद विचारोंका आदान-प्रदान है. और आदान प्रदान एक कक्षा पर आने से हो सकता है. विचारोंके आदान प्रदान के लिये उसके नियम होने चाहिये. इन नियम को तर्क कहेते है. कोई भी संवाद तर्कयुक्त तभी हो सकता है जब पूर्वपक्षका ज्ञान हो.

पी. के. स्वयंमें क्या योग्यता है?
स्वयंमें विषयके चयन की योग्यता है?
स्वयंमें विषय की चर्चा करनेकी योग्यता है? स्वयं को स्वयंके पक्षका ज्ञान है?
स्वयंमें पूर्वपक्षका ज्ञान है?
स्वयंके विचारोंका प्रदान तर्कपूर्ण है?

पी. के. अन्यको जो बोध देना चाहता है उस बोधका वह क्या स्वयं पालन करता है?
अंधश्रद्धा निर्मूलन यदि किसीका ध्येय है तो प्रथम समझना आवश्यक है कि अंधश्रद्धा क्या है.
अंधश्रद्धा क्या है?
अंध श्रद्धा यह है कि, कोई एक प्रणाली, जो परापूर्वसे चली आती है या कोई प्रणाली अचारमें लायी गई हो और उस प्रणालीकी उपयोगिता सही न हो और तर्कशुद्ध न हो.
क्या प्रणालीयां और उसकी तर्कशुद्धता की अनिवार्यता सिर्फ धर्म को ही लागु करने की होती है?
क्या अंधश्रद्धा धर्मसे ही संबंधित है?
क्या अंधश्रद्धा समाजके अन्य क्षेत्रों पर लागु नहीं होती है?
अंधश्रद्धा हर क्षेत्रमें अत्र तत्र सर्वत्र होती है.
अंद्धश्रद्धा समाजके प्रत्येक क्षेत्रमें होती है.
अगर अंधश्रद्धा हरेक क्षेत्रमें होती है तो प्राथमिकता कहा होनी चाहिये?

जो प्रणालीयां समाजको अधिकतम क्षति पहोंचाती हो वहां पर उस प्राणालीयों पर हमारा लक्ष्य होना होना चाहिये. इसलिये चयन उनका होना चाहिये.

पी. के. ने कौनसी प्रणालीयों को पकडा?
पी. के. ने धार्मिक प्रणालीयोंको पकडा.
पी. के. ने धार्मिक प्रणालीयोंको क्यूं पकडा?
पी. के. समझता है कि वह सभी धर्मोंकी, धार्मिक प्रणालीयोंके विषयोंके बारेमें निष्णात है. हां जी, अगर उपदेशक निष्णात नहीं होगा तो वह योग्य कैसे माना जायेगा?

पी. के. समझता है कि वह भारतीय समाजमें रहेता है, इसलिये वह भारतमें प्रचलित धार्मिक, क्षतिपूर्ण और नुकशानकारक प्रणालीयोंकी अंद्धश्रद्धा (तर्कहीनता) पर आक्रमण करेगा.
अगर ऐसा है तो वह किस धर्मकी अंधश्रद्धाको प्राथमिकता देगा?
वही धर्म को प्राथमिकता देगा जिसने समाजको ज्यादा नुकशान किया है और करता है.

कौनसे कौनसे धर्म है? ख्रीस्ती, इस्लाम और हिन्दु.

हे पी. के. !! आपका कौनसा धर्म है?
मेरा धर्म इस्लाम है.
आपके धर्ममें कौनसी अंधश्रद्धा है जिसको आप सामाजिक बुराईयोंके संदर्भ, प्रमाणभानके आधार पर प्राथमिकता देंगे?
पी. के. समझता है कि मुस्लिमोंकी अंधश्रद्धा वह शराब बंधी है, और वह भी प्रार्थना स्थलपर शराब बंधी है.
अब देखो पी. के. क्या करता है? वह मस्जिदके अंदर तो शराब ले नहीं जाता है. इस्लामके अनुसार शराब पीना मना है. लेकिन उसकी सजा खुदा देगा. शराबसे नुकशान होता है. अपने कुटूंबीजनोंको भी नुकशान होता है. शराब पीनेवालेको तो आनंद मिलता है. लेकिन पीने वालेके आनंदसे जो धनकी कमी होती है उससे उसके कुटुंबीजनोंको पोषणयुक्त आहार नहीं मिलता और जिंदगीकी सुचारु सुवाधाओंमें कमी होती है या/और अभाव रहेता है. शराब कोई आवश्यक चिज नहीं है. शराबके सेवनके आनंदसे शराबको पीनेवालेको तो नुकशान होता ही है. शराब पीना इस्लाम धर्मने मना है. किन्तु क्या इस्लामकी प्राथमिकता शराबबंधी है?

इस्लाममें क्या कहा है? इस्लामने तो यह ही कहा है कि, इस्लामके उसुलोंका प्रचार करो और जिनको मुसलमान बनना है उन सबको मुसलमान बनाओ. जब तक अन्य धर्मी तुमको अपने घरमेंसे निकाल न दें उसका कत्ल मत करो. उसका अदब करो.
क्या मुसलमानोंने यह प्रणाली निभाई है?
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. इसका अर्थ यह है कि भारतमें सब लोगोंको अपना अपना धर्म और प्रणालीया मनानेकी स्वतंत्रता है. इस स्वतंत्रताका आनंद लेनेके साथ साथ दुसरोंको नुकशान न हो जाय इस बातका ध्यान रखना है.

इस बातको ध्यानमें रखते है तो मुसलमान अगर शराब पीये या न पीये उससे अन्य धर्मीयोंको नुकशान नहीं होता है. अगर कोई मस्जिदमें जाता है तो वह वहां ईश्वरकी इबादतके बदले वह शराबी नशेमें होनेके कारण दुसरोंको नुकशान कर सकता है. इसलिये पूर्वानुमानके आधार पर इस्लामने शराब बंदी की है. यह बात तार्किक है. किन्तु यदि इसमें किसीको अंधश्रद्धा दिखाई देती है यह बात ही एक जूठ है.

तो पी. के. ने ऐसे जूठको क्यों प्राथमिकता दी?
प्राथमिकता क्या होनी चाहिये थी?
यदि अंधश्रद्धाको भारत तक ही सीमित रखना है तो, मुसलमानोंने किये दंगे और कत्लोंको प्राथमिकता देनी चाहिये थी. आतंकीयों और स्थानिक मुसलमानोंने मिलकर हिन्दुओंकी धर्मके नाम पर कत्लें की, हिन्दुओंको यातनाएं दी और दे भी रहे है वह भी तो अंधश्रद्धा है.

मुस्लिमोंकी अंधश्रद्धा क्या है?
इस्लामको अपनानेसे ही ईश्वर आपपर खुश होता है. अगर आपने इस्लाम कबुल किया तो ही वह आपकी प्रार्थना कबुल करेगा और आपके उपर कृपा करेगा.
ईश्वर निराकार है इस लिये उसकी कोई भी आकारमें प्रतिकृति बनाना ईश्वरका अपमान है. अगर कोई ईश्वरकी प्रतिकृति बनाके उसकी पूजा करगा तो उसके लिये ईश्वरने नर्ककी सजा निश्चित की है.
इस बातको छोड दो.

अन्य धर्मीयों की कत्ल करना तो अंधश्र्द्धा ही है.

१९९०में कश्मिरमें ३०००+ हिन्दुओंकी मुसलमानोंने कत्ल की. मुसलमानोंने अखबारोंमें इश्तिहार देके, दिवारों पर पोस्टरें चिपकाके, लाउड स्पीकरकी गाडीयां दौडाके, और मस्जीदोंसे घोषणाए की कि, अगर कश्मिरमें रहेना है तो इस्लाम कबुल करो, या तो इस मुल्कको छोड कर भाग जाओ, नहीं तो कत्लके लिये तयार रहो. इस एलान के बाद मुसलमानोंने ३००० से भी ज्यादा हिन्दुओंकी चून चून कर हत्या की. पांचसे सात लाख हिन्दुओंको अपना घर छोडने पर विवश किया. इस प्रकर मुसलमानोंने हिन्दुओंको अपने प्रदेशसे खदेड दिया.
आज तक कोई मुसलमानने हिन्दुओंको न्याय देनेकी परवाह नहीं की. इसकी वजह सिर्फ और सिर्फ मुसलमानोंकी अंधश्रद्धा ही तो है. लाखोंकी संख्यामें अन्यधमीयोंको २५ सालों तक यातनाग्रस्त स्थितिमें चालु रखना आतंकवाद ही तो है. यह तो सतत चालु रहेनेवाला आतंकवाद है. इससे बडी अंधश्रद्धा क्या हो सकती है?

किन्तु पी. के. ने इस आतंकवादको छूआ तक नहीं. क्यों छूआ तक नहीं?
क्यों कि वह स्वयंके धर्मीयोंसे भयभित है. जो भयभित है वह ज्यादा ही अंधश्रद्धायुक्त होता है. पी. के. खुद डरता है. उसके पास इतनी विद्वत्ता और निडरता नहीं है कि वह सच बोल सके.
कश्मिरके हिन्दुओंको लगातार दी जाने वाली यातनाओंको अनदेखी करना विश्वकी सबसे बडी ठगाई और दंभ है. इस बातको नकारना आतंकवादको मदद करना ही है. उसकी सजा सिर्फ और सिर्फ मौत ही हो सकती है.

तो फिर पी. के. ने किसको निशाना बनाया?

पी. के. ने बुत परस्तीको निशाना बनाया.
लेकिन क्या उसने पूर्व पक्ष को रक्खा? नहीं. उसने पूर्वपक्षको जनताके सामने रक्खा तक नहीं.
क्यों?
क्यों कि, वह अज्ञानी है. अद्वैतवादको समझना उसके दिमागके बाहरका विषय है. अद्वैतवाद क्या है? अद्वैतवाद यह है कि ईश्वर, सर्वज्ञ, सर्वयापी और सर्वस्व है. विश्वमें जो कुछ भी स्थावर जंगम और अदृष्ट है वे सब ईश्वरमें ही है. उसने ब्रह्माण्डको बनाया और आकर्षणका नियम बनाया फिर उसी नियमसे उसको चलाने लगा. उसने मनुष्यको बुद्धि दी और विचार करने की क्षमता दी ताकि वह तर्क कर सके. अगर वह तर्क करेगा तो वह तरक्की करेगा. नहीं तो ज्योंका त्यों रहेगा, या उसका पतन भी होगा और नष्ट भी होगा. ईश्वरने तो कर्मफलका प्रावधान किया और समाजको सामाजिक नियमो बनानेकी प्रेरणा भी रक्खी. जो समाज समझदार था वह प्रणालियोंमें उपयुक्त परिवर्तन करते गया और शाश्वतता की और चलता गया.
हिन्दु समाज क्या कहेता है?
सत्यं, शिवं और सुंदरं
सत्य है उसको सुंदरतासे प्रस्तूत करो तो वह कल्याणकारी बनेगा.
कल्याणकारीसे आनंद मिलता है वह स्थायी है.
आनंद स्थायी तब होता है जब भावना वैश्विक हो. न तो अपने स्वयं तक, न तो अपने कुटुंब तक, न तो अपने समाज तक, न तो अपनी जाति तक, मर्यादित हो, पर वह आनंद विश्व तक विस्तरित हो.
विश्वमेंसे जो कुछ भी तुम्हे मिलता है उसमेंसे विश्वको भी दो (स्वाहा).
यज्ञकी भावना यह है.
शिव तो तत् सत् है. ब्रह्माण्ड स्वरुप अग्निको उन्होने उत्पन्न किया. जो दृश्यमान अग्नि है वह यज्ञ है. अग्नि यज्ञ स्वरुप है. अग्निने आपको जिवन दिया. आप अग्निको भी तुष्ट करें और शांत भी करें. हिन्दुओंके लिये ईश्वरी शक्तियां अपने जिवन प्रणालीका एक भाग है. शिव लिंग एक ज्योति है. उसको जो स्वाहा करेंगे वह धरतीके अन्य जीवोंको मिलेगा. जीनेका और उपभोग करनेका उनका भी हक्क है.
तुम्हे ये सब अपनी शक्तिके अनुसार करना है. तुम अगर शक्तिमान नहीं हो तो मनमें ऐसी भावना रखो. ईश्वर तुम्हारी भावनाओंको पहेचानता है. संदर्भः “शिवमानसपूजा”

यदी पी. के. ने “अद्वैत” पढा होता तो वह शिव को मजाकके रुपमें प्रस्तूत न करता.

मनुष्य एक ऐसी जाति है कि इस जातिमें हरेक के भीन्न भीन्न स्वभाव होते है. यह स्वाभाव आनुवंशी, ज्ञान, विचार और कर्मके आधार पर होते है. इसलिये उनके आनंद पानेके मार्ग भी भीन्न भीन्न होते है. ध्यान योग, ज्ञान योग, कर्मयोग और भक्तियोग इस प्रकार चार योग माने गये है. अपने शरीरस्थ रासायणोंके अनुसार आप अपना मार्ग पसंद करें. हिन्दुओंके लिये ईश्वरकी उपासना एक प्रकृति उपासनाका काव्य है. काव्य एक कला है जिनके द्वारा तत्त्वज्ञान विस्मृतिमें नही चला जाता है. मूर्त्ति भी ईश्वरका काव्य है.

तो क्या पी. के.ने विषयके चयनमें सही प्राथमिकता रक्खी है?
नहीं. पी. के. को प्राथमिकताका चयन करने की या तो क्षमता ही नहीं थी या तो उसका ध्येय ही अंधश्रद्धाका निर्मूलन करना नहीं था. उसका ध्येय कुछ भीन्न ही था.

प्राथमिकता की प्रज्ञाः
अगर आपके घरमें चार चूहे और एक भेडिया घुस गये है तो किसको निकालनेकी प्राथमिकता आप देंगे?
चूहे चार है. भेडिया एक है. चार संख्या, संख्या एकसे ज्यादा है. तो भी जो ज्यादा नुकशानकारक है वह भेडिया है. इसलिये यहां पर प्रमाणभान स्वरुप संख्या नहीं है. किन्तु नुकशानका प्रमाणभान रखना है.
एक अरब हिन्दु है. २० करोड मुस्लिम है. लेकिन दंगे मुस्लिमोंने ज्यादा किया. अत्याचार भी मुस्लिमोंने ज्यादा किया. इसलिये समाजको होने वाले नुकशानके प्रमाणभानके अधारपर मुस्लिम अंधश्रद्धाको हिन्दुओंकी तथा कथित अंधश्रद्धाके विषयोंकी अपेक्षा ज्यादा प्राथमिकता देनी चाहिये.
किन्तु पी. के. ने ऐसा नहीं किया.

प्रमाणभानकी प्रज्ञाः
शिवलिंग पर दूध चढाना दूधका व्यय है. वह दूध गरीबोंके बच्चोंके मूंहमें जाना चाहिये.

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दूधका व्यय है या नहीं? अगर व्यय है तो भी कितना व्यह है? किसका व्यय है? किसका पैसा है? किसकी कमाई है? क्या ईश्वरके उपर दूध चढाना अनिवार्य बनाया गया है? ऐसा कोई आदेश भी है?
दूधके पैसे तो पी. के.के या औरोंके है ही नहीं. दूधके पैसे तो दूध डालनेवालेके अधिकृत पैसे है. उसको कोई “लेन्ड ओफ लॉ” या और किसीकी सत्तका भी आदेश नहीं है, कि वह दूध डाले. किसी “लॉ ऑफ ध लेन्ड”ने उसे विवश भी नहीं किया है, कि वह दूध डाले. अगर वह दूध न डाले को उसको कोई दंड देनेवाला भी नहीं है. दूधका प्रमाण भी निश्चित नहीं है. वह अपनी ईच्छाके अनुसार दूध डाल सकता है या न भी डाले. वह अपनी मान्यताके अनुसार समझता है कि उसने कोई व्यय नहीं किया. क्यों कि विश्वने उसको दिया है वह उसमेंसे थोडा विश्वको वापस देता है. जो गाय है उससे वह आभारवश है और उसको भी वह सब देवोंका निवास समझता है और वह गायके प्रति आभारवश है (थेन्क फुल है. थेंकलेस नहीं है) वह गायको माता समझता है.
वह यह समझता है कि दूध चढाना कोई पाप नहीं है. खुदके पैसे है. अपने पैसे का कैसे उपयोग करना वह उसकी पसंद है. खुदकी पसंदका निर्णयकरना उसका अधिकार है.

आप कहोगे, वह जो कुछ भी हो, दूधका तो व्यय हुआ ही न? उसका क्या?
वह हिन्दु कहेता है; अगर आप गायको, भैंषको खाते है तो क्या आनेवाले दूधका घाटा नहीं हुआ?
वह आगे कहता है कि हम तो दूधसे अपनी भावना ईश्वरके प्रति प्रकट करते है. और इससे धरतीके जिवजंतुओंकी पुष्टि करते हैं ताकि धरतीकी फलद्रुपता बढे. हम गायका या ऐसे पशुका बली तो नहीं चढाते है ताकि विश्वमें दूधका स्थायी घाटा हो जाय.

वह आगे कहेता है, कि हमारा पावभर दूध ही क्यों आपकी नजरमें आता है?
हम जो टेक्ष भरते है, उनमेंसे एक बडा हिस्सा गवर्नर और राष्ट्रप्रमुखके और उसकी सुविधाओंके और मकानके रखरखावमें जाता है. टेक्ष द्वारा पैसा देना तो हमारे लिये अनिवार्य है और उसके लिये हम विवश भी है. हमारे पैसे का यह व्यय ही तो है. इसका प्रमाण भी तो बहुत बडा है. यह भी तो एक अंधश्रद्धा मात्र है. आपकी प्राथमिकता तो इस व्यय के विषय पर होनी चाहिये. क्यों आपकी प्रमाणभानकी प्रज्ञा इस बातको नहीं देख सकती?

आप खुद करोडों रुपये कमाते हो. आपको खानेके लिये कितना चाहिये? आपको कितना बडा मकान चाहिये? आप दाल चावल रोटी खाके आनंद पूर्वक जिन्दा रह सकते है, और बाकीके पैसोंसे हजारों कीलो दूध गरीबोंको बांट सकते है. लेकिन आप ऐसा नहीं करते है, क्यों कि दूसरे आप जैसे कई लोग ऐसा नहीं करते हैं. आप उन्हीकी प्रणालीको अनुसरते है. तो यह आपकी भी तो अंधश्रद्धा है. आपकी अंधश्रद्धा तो हमसे भी बडी है. आपकी प्राथमिकतामें वह क्यों नही आयी? अगर आप स्वयंकी कमाईको कैसे खर्च करें उसमें अपनी मुनसफ्फी चलाते हैं तो हमारे लिये क्यों अलग मापदंड?
ऐसी तो कई बातें लिखी जा सकती है.
(क्रमशः)
शिरीष मोहनलाल दवे
टेग्झः पी. के. , योग्यता, नीति शतक, सत्य, प्रिय, उपदेश, पूर्वपक्ष, प्रतिपक्ष, खंडन, बौद्धिक चर्चा, तर्क, शुद्ध, संस्कृति, संस्कृत, दुराचारी, शराब बंधी, विषय चयन, प्राथमिकता, संवाद, विसंवाद, वितंडावाद, ध्येय, हेतु, संघर्ष, ज्ञान, अंधश्रद्धा, प्रणाली, आतंक, धर्म, मुस्लिम, इस्लाम, ख्रिस्ती, धर्म निरपेक्ष, मस्जिद, धर्मस्थान, धर्मगुरु, दंगा, कत्ल, ईश्वर निराकार, प्रतिकृति, काव्य, कश्मिर, ओमर, फारुख, अद्वैतवाद, कर्मफल, सत्यं, शिवं, सुंदरं, कल्याणकारी, वैश्विक, प्रमाणभान, प्रज्ञा, लॉ ऑफ ध लेन्ड

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हिन्दु और लघुमतीयोंको एक दुसरेसे क्या अपेक्षा है और अपेक्षा क्या होनी चाहिये? – २

जब देशकी जनता गरीब होती है वह किसीभी बात पर झगडा करने के लिये तैयार हो जाती है. और जिनका उद्देश्य सिर्फ सत्ता और पैसा है वह हमेशा दुसरोंकी अज्ञानताका लाभ लेकर देशको और मानवजातको चाहे कितना ही नुकशान क्युं न होजाय, दुसरोंको गुमराह करके मत बटोरके अपना उल्लु सीधा करती है.

लेकिन वास्तवमें ये हिन्दु और मुस्लिम कौन है और कैसे है?

और ये दोनो क्यों बेवकुफ बनते रहते है?

मुस्लिम और हिन्दु वास्तवमें एक ही जाति है. इसाकी प्रथम सदी तक हिन्दु राजाएं इरान तक राज करते थे. विक्रममादित्यने अरबस्तान तक अपना साम्राज्य फैलाया था. अगर आर्योंके आगमन वाली कल्पनाको सही माने तो भी अरबस्तान वाले भी आर्य जाति के है. अगर भारतसे लोग बाहर गये इस थीयेरीका स्विकार करे तो भी अरबस्तानके लोग और भारतके लोग एक ही जातिके है. एक ही जातिके हो या न हो अब जाति कोई महत्व रखती नहीं है.

फिर टकराव क्युं?

इस्लाम क्या है?

इससे प्रथम यह विचार करो कि इस्लाम क्यों आया? जब कोई भी प्रणालीमें अतिरेक होता है तो एक प्रतिकारवाला प्रतिभाव होता है.

प्रणालीयां समाजको लयबद्ध जिनेके लिये होती है. प्रणालीयां संवादके लिये होती है. प्रणालीयां आनंदके लिये होती है. अगर इसमें असंतुलन हो जाय और समाजके मनुष्योंकी सुविधाओंमें यानी कि आनंदमें असंतुलन हो जाय तब कोई सक्षम मनुष्य आगे आ जाता है और वह विद्रोहवाला प्रतिकार करता है.

इश्वरकी शक्तियों पर समाज निर्भर है. इन शक्तियोंको आप कुछ भी नाम दे दो. आप उनका भौतिक प्रतिक बनाके उनको याद रखो और उसकी उपासना करो. उस उपासनाओंकी विधियां बनाओ. उनकी विधियोंके अधिकारीयोंको सत्ता दो. यह पूरा फिर एक प्रपंच बन जाता है. समाजके युथोंके सुखोंमें असंतुलन हो जाता है. कोई न कोई कभी न कभी ऐसा व्यक्ति निकलेगा जो इनका विरोध करेगा.

अरबस्तानमें महोम्मद साहब हुए. और भारतमें दयानंद सरस्वती हुए. दयानंद सरस्वतीसे पहेले भी कई लोग हुए थे. शंकराचार्यने कर्मकांडका विरोध किया था. भारतमें किसी विद्रोहीने तिरस्कार और तलवारका उपयोग किया नहीं था. क्यों कि भारतमें धर्म-चर्चा एक प्रणाली थी. अरबस्तानमें मोहम्मद साहबके जमानेमें ऐसा कुछ था नहीं. उस समय शासकके हाथमें सर्व सत्ता थी.

मोहम्मद साहबने मूर्त्तिपूजाका और विधियोंका विरोध किया. और वैज्ञानिक तर्कसे सोचनेका आग्रह किया. उस समय जो उच्च लोग थे वे लोग जो अनाचार दुराचार करना चाहते थे वे इश्वरके नामपर करते थे. दारु पीना है? ईश्वरको समर्पित करो और फिर खुद पीओ. जुआ खेलना है? तो ईश्वरके नाम पर करो.

भारतमें भी आजकी तारिखमें ऐसा ही है. कृष्ण भगवानके नाम पर जुआ खेला जाता है. देवीके नाम पर दारु पीया जाता है. ईश्वरके नाम पर भंग पी जाती है. देवदासीके नाम पर व्यभिचार किया जाता है. आचार्य रजनीशने संभोगसे समाधि पुरस्कृत किया है. जब मानव समाजमें समुहोंके बीच सुखोंमे असंतुलन होता है तब दंगा फसाद और विद्रोह होता है.
मोहम्मद साहबने अपने जमानेमें जो जरुरी था वह किया.

इस्लाम यह कहता है

ईश्वर एक है. उसका कोई आकार नहीं. उसकी कोई जाति नहीं. वह किसीका संबंधी नहीं. वह जगतकी हर वस्तुसे नजदिकसे नजदिक है. वह सर्वत्र है और सबकुछ देखता है. वह ज्योतिके रुपमें प्रगट होता है. आपका कर्तव्य है कि आप सिर्फ उसकी ही उपासना करें. यह उपासना नमाजकी विधिके अनुसार करो. और दिनमें पांच बार करो. ईश्वर दयावान है. अगर आप, उनसे, अपने कुकर्मोंकी सच्चे दिलसे माफी मांगोगे तो वह माफ कर देगा.

ईश्वरको ईमान प्रिय है. इसलिये ईमानदार बनो.

वैज्ञानिक अभिगम रक्खो,

आप सुखी है? तो इसका श्रेय ईश्वरको दो.

आपने कुछ अच्छाकाम किया है? तो समझो की ईश्वरने आप पर कृपा है की है, कि उसने इस अच्छे कामके लिये आपको पसंद किया. आप इसका श्रेय ईश्वरको दो.

आप देखो कि आपका पडोसी दुःखी तो नहीं है न? उसको मदद करो. उसको भोजन करानेके बाद आप भोजन करो.

आप संपन्न है तो इसका एक हिस्सा इश्वरको समर्पित करो.

जिसको धनकी जरुरत है उसको धन दो और मदद करो. उससे व्याज मत लो.

अगर कोई गलत रास्ते पर जा रहा है और समझाने पर भी सही रास्ते पर नहीं आता है, तो समझलो कि यह ईश्वर की इच्छा है. ईश्वर उसको गुमराह करेगा और सजा देगा.

ईश्वरने तुम्हारे लिये वृक्षोंपर और पौधोंपर सुंदर भोजन बनाया है. तुम उसको ईश्वरकी कृपाको याद करते करते आनंदसे खाओ. (अगर इनकी कभी कमी पड गई तो) जिंदा रहेनेके लिये फलां फलां प्राणीयोंका मांस इश्वरको समर्पित करके खाओ.

यह है इस्लामके आदेश जो मोहम्मद साहबने अपने लोगोंको राह पर चलनेके लिये बतायें.

और भी कई बाते हैं लेकिन वह सब उस जमानेमें अनुरुप होगी ऐसा प्रस्तूत करने वालोंको लगा होगा इसलिये प्रस्तूत किया होगा. लग्न कैसे करना, किससे करना, कितनी बार करना, कितनोंके साथ करना चाहिये आदि आदि. यह कोई चर्चा और कटूताका विषय बनना नहीं चाहिये.

वैसे तो मनुस्मृतिकी कई बाते हम आज मानते नहीं है.

हिन्दु धर्म क्या है?

सत् एक ही है. वह ब्रह्म है. वह निराकार, निर्विकार और निर्गुण है. वह पूर्ण है. पूर्णमेंसे पूर्ण लेलो तो पूर्ण ही बचता है.

उसको कोई जानता नहीं न तो कोई जान सकता है न कोई वर्णन कर सकता है. जो भी कहो वह ऐसा नहीं है. वह ईन्द्रीयोंसे पर है.

ब्रह्ममेंसे ज्योतिरुप अग्नि निकला और जगत बनाया. यह अग्नि (महोदेवो) ईश्वर है. वह सर्वत्र है और वह ही सब है. वह अग्रमें (आरंभमें) है, मध्यमें है और अंतमें भी वही है.

सब क्रियाओंका कारण है. लेकिन ब्रह्ममेंसे जगत क्यों बना, सिर्फ इसका कारण नहीं है.

ईश्वर ब्रह्म ही है. ईश्वर जगतका संचालन करता है. उसने व्यवस्था बनाई है. और सबको कर्मके अनुसार फल मिलता है.

ईश्वर अनुभूतिका विषय है. भक्ति, कर्म, योग और ज्ञान के द्वारा आप उनको पा सकते है.

आप उसकी किसीभी रुपमें उपासना कर सकते है.

सभी चीजें सजिव है. वनस्पति भी सजीव है. वृक्षमें बीज है और बीजमें वृक्ष है. रसादार फल खाओ और बीजको वृक्ष होने दो. पर्ण खाओ लेकिन वृक्षको जिन्दा रखो. सबको जीनेका अधिकार है. सबका कल्याण हो. सबको शांति हो.

सत्य और अहिंसा अपनानेसे ध्येयकी प्राप्ति होती है.

ईश्वरीय शक्तियोंका आदर करो. और उनको उनका हिस्सा दो. उसके बाद उपभोग करो.

माता प्रथम शक्ति है. द्वीतीय शक्ति पिता है. तृतीय शक्ति जो तुम्हारे घर महेमान आया है वह है. तुम्हारा शिक्षक चतुर्थ शक्ति है. और पंचम शक्ति ईश्वर है.

यह पृथ्वी तुम्हारा कुटुंब है. कोई पराया नहीं है.

तुमने जो काम पसंद किया उसको निभाना तुम्हारा कर्तव्य (धर्म) है. तुमने जिस कामका अभ्यास नहीं किया उस काममें चोंच डालना ठीक नहीं है (अधर्म है). तुमने जिस कामका अभ्यास किया उसमें तुम्हारी मृत्यु हो जाय तो चलेगा. लेकिन अगर तुम अपने केवल स्वार्थको केन्द्रमें रखकर जिसका तुम्हे अभ्यास नहीं उसको करोगे तो समाजके लिये वह भय जनक है.

तुम जो भी कर्म करते हो वह अलिप्त भावसे करो.

कुछ भी तुम्हारा नहीं है. न तुम कुछ लाये हो न तुम कुछ ले जाओगे. तुम तो निमित्त मात्र हो.

तुम कुछ भी करते नहीं हो. सब कुछ ईश्वर करता है. कार्य करनेवाला ईश्वर है, कार्य भी ईश्वर है और क्रिया भी ईश्वर है. हम सब एकमात्र परमात्मा के अंश है. लेकिन अज्ञानताके आवरणके कारण हम अपनेको दुसरोंसे अलग है ऐसा अनुभव करते है.

विगतके लिये पढेः

NOT EVEN TWO. ONE AND ONE ONLY
https://treenetram.wordpress.com/2012/05/08/547/

“जो खुदको भले ही नुकशान हो जाय तो भी दुसरोंके लाभके लिये काम करता है वह सत्पुरुष है.

“जो दुसरोंको नुकशान न हो इस प्रकारसे अपने लाभका काम करता है वह मध्यम कक्षाका पुरुष है.

“जो अपने लाभके लिये दुसरोंका नुकशान करता है वह राक्षस है.

“जो ऐसे ही (निरर्थक ही) दुसरोंको नुकशान करता है वह कौन है वह हमें मालुम नहीं. (भर्तृहरि).

जो उपकार करनेवालेको भी (जनताको) नुकशान पहुंचाके अपना उल्लु सीधा करता है वह नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनके साथी हैं.

देशने नहेरुवीयनोंको क्या क्या नहीं दिया. ६० साल सत्ता दी, अरबों रुपये दिया, अपार सुविधाएं दी, तो भी उन्होने देशको लूटा और देशकी ७० प्रतिशत जनताको गरीब और अनपढ रक्खा, ता कि वह हमेशा उनके उपर आश्रित रहे. ये राक्षसके बाप है.

GODDESS OF KNOWLEDGE AND COMMUNICATION CAN TAKE US TO ETERNAL TRUTH

जो हिन्दु और मुस्लिम जनताके बीचमें जो समस्याएं है वह कैसे दूर की जाय? इन दोनोंको कैसे जोडा जाय?

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

 smdave1940@yahoo.com

टेग्झः हिन्दु, मुस्लिम, अरबस्तान, विक्रमादित्य, इस्लाम, प्रणाली, समाज, लयबद्ध, आनंद, संवाद, असंतुलन, विद्रोह, प्रतिकार, ईश्वर, शक्ति, युथ, महोम्मद साहब, विज्ञान, ईमान, दयानंद सरस्वती, शंकराचार्य, मूर्त्तिपूजा, दारु, ब्रह्म, जगत, कार्य, फल, व्यवस्था, संचालन, निमित्त, ज्ञान

विस्तृत जानकारी के लिये निम्न लिखित लींकके लेखको पढे.

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हिन्दु और लघुमतीयोंको एक दुसरेसे क्या अपेक्षा है और अपेक्षा क्या होनी चाहिये? – १

प्रथम तो हमें यह समझना चाहिये कि हिन्दु और मुस्लिम कौन है?

ALL THE MUGALS WERE NOT COMMUNAL

यदि हम १८५७ के स्वातंत्र्य संग्रामकी मानसिकतामें अवलोकन करे तो हिन्दु और मुस्लिम दोनों हिन्दुस्तानी है. जब भी कोई एक जन समुदाय एक स्थानसे दुसरे स्थान पर जाता है तो वह समुदाय वहांके रहेनेवालोंसे हिलमिल जानेकी कोशिस करता है. यदि जानेवाला समुदाय शासकके रुपमें जाता है तो वह अपनी आदतें मूलनिवासीयों पर लादें ये हमेशा अवश्यक नहीं है. इस बातके उपर हम चर्चा नहीं करेंगे. लेकिन संक्षिप्तमें इतना तो कह सकते है कि तथा कथित संघर्षके बाद भी इ.स. १७०० या उसके पहेले ही हिन्दु और मुस्लिम एक दुसरेसे मिल गये थे. इसका श्रेष्ठ उदाहरण यह है कि, बहादुरशाह जफर के नेतृत्वमें हिन्दु और मुसलमानोंने अंग्रेज सरकारसे विप्लव किया था. और यह भी तय था कि सभी राजा, बहादुर शाह जफरके सार्वभौमत्वके अंतर्गत राज करेंगे.

अब यह बहादुर शाह जफर कौन था?

यह बहादुर शाह जफर मुगलवंशका बादशाह था. उसके राज्य की सीमा लालकिले की दिवारें थीं. और उतनी ही उसके सार्वभौमत्वकी सीमा थी. यह होते हुए भी सभी हिन्दु और मुस्लिम राजाओंने बहादुरशाह जफर का सार्वभौमत्व स्विकार करके मुगल साम्राज्यकी पुनर्स्थापनाका निर्णय किया था. इससे यह तो सिद्ध होता है कि हिन्दुओंकी और मुस्लिमों की मानसिकता एक दुसरेके सामने विरोधकी नहीं थी.

शिवाजीको अधिकृतमान न मिला तो उन्होने दरबारका त्याग किया

आजकी तारिखमें हिन्दुओंके हिसाबसे माना जाता है कि मुस्लिम बादशाहोंने हिन्दु प्रजा पर अति भारी यातनाएं दी है और जिन हिन्दुओंने इस्लामको स्विकारा नहीं उनका अति मात्रामें वध किया था. इस बातमें कुछ अंश तक सच्चाई होगी लेकिन सच्चाई उतनी नहीं कि दोनो मिल न पायें. अगर ऐसा होता तो औरंगझेबके सैन्यमें हिन्दु सैनिक और सरदार न होते और शिवाजीके सैन्यमें मुस्लिम सैनिक और सरदार न होते. शिवाजी मुगल स्टाईल की पगडी न पहेनते, और औरंगझेब शिवाजीके पोते शाहुको उसकी जागीर वापस नहीं करता. मुस्लिम राजाओंने अगर अत्याचार किया है तो विशेषतः शासक होने के नाते किया हो ऐसा भी हो सकता है. जो अत्याचारी शासक होता है उसको या तो उसके अधिकारीयोंको तो अपना उल्लु सिधा करनेके लिये बहाना चाहिये.

अब एक बात याद करो. २०वीं सदीमें समाचार और प्रचार माध्यम ठीक ठीक विकसित हुए है. सत्य और असत्य दोनोंका प्रसारण हो सकता है. लेकिन असत्य बात ज्यादा समयके लिये स्थायी नहीं रहेगी. सत्य तो सामने आयेगा ही. तो भी विश्वसनीय बननेमें असत्यको काफि महेनत करनी पडती है. वैसा ही सत्यके बारेमें है.

इन्दिरा गांधीके उच्चारणोंको याद करो.
१९७५में इन्दिरा गांधीने अपनी कुर्सी बचानेके लिये प्रचूर मात्रामें गुन्हाहित काम किये और करवाये. समाचार प्रसार माध्यम भी डरके मारे कुछ भी बोलते नहीं थे. लेकिन जब इन्दिरा गांधीके शासनका पतन हुआ और शाह आयोग ने जब अपना जांचका काम शुरु किया तो अधिकारीयोंने बोला कि उन्होने जो कुछ भी किया वह उपरकी आज्ञाके अनुसार किया. इन्दिराने खुल्ले आम कहा कि उसने ऐसी कोई आज्ञा दी नहीं थी. उसने तो संविधानके अंतर्गत ही आचार करनेका बोला था. अब ये दोनों अर्ध सत्य हैं. इन्दिरा गांधी और अधिकारीयोंने एक दुसरेसे अलग अलग और कभी साथमें भी अपना उल्लु सीधा करने की कोशिस की थी, और उस हिसाबसे काम किया था.

अपना उल्लु सीधा करो

मुगल साम्राट का समय लोकशाहीका और संविधान वाला समय तो था नहीं. ज्यादातर अधिकारी अपना उल्लु सीधा करनेकी सोचते है. मुगलके समयमें समाचार प्रसारके माध्यम इतने त्वरित तो थे नहीं. अफवाहें और बढा चढा कर भी और दबाके भी फैलाई जा सकती है. सुबेदार अपना धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और अंगत स्वार्थ के लिये अपना उल्लु सिधा करते रहे होगे इस बातको नकारा नहीं जा सकता.

औरंगझेब एक नेक बादशाह था वह साम्राटकी संपत्तिको जनता की संपत्ति समजता था. और वह खुद टोपीयां और टोकरीयां बनाके बेचता था और उस पैसे से अपना गुजारा करता था. उसका पूर्वज शाहजहां एक उडाउ शासक था. औरंगझेबको अपने सुबेदारोंकी और अधिकारीयोंकी उडाऊगीरी पसंद न हो यह बात संभव है. सुबेदार और अधिकारी गण भी औरंगझेबसे खुश न हो यह भी संभव है. इस लिये औरंगझेबके नामसे घोषित अत्याचारमें औरंगझेब खुदका कितना हिस्सा था यह संशोधनका विषय है. मान लिजिये औरंगझेब धर्मान्ध था. लेकिन सभी मुघल या मुस्लिम राजा धर्मान्ध नहीं थे. शेरशाह, अकबर और दारा पूर्ण रुपसे सर्वधर्म समभाव रखते थे. अन्य एक बात भी है, कि धर्मभीरु राजा अकेला औरंगझेब ही था यह बात भी सही नहीं है. कई खलिफे हुए जो सादगीमें, सुजनतामें और मानवतामें मानते थे. कमसे कम औरंगझेबके नामके आधार पर हम आजकी तारिखमें इस्लामके विरुद्ध मानसिकता रक्खें वह योग्य नहीं है. शिवाजी के भाग जाने के बाद औरंगझेब धर्मान्ध हो गया. इ.स. १६६६ से १६९० तकके समयमें औरंगझेबने कई सारे प्रमुख मंदिर तोडे थे. खास करके काशी विश्वनाथका मंदिर, सोमनाथ मंदिर और केशव मंदिर उसने तुडवाया थे. दक्षिण भारतके मंदिर जो मजबुत पत्थरके थे और बंद थे वे औरंगझेबके सेनापति तोड नहीं पाये थे. उसके यह एक जघन्य अपराध था. ऐसा पाया गया है कि उसके एक सलाहकारने उसको ऐसी सलाह दी थी कि नास्तिकोंको मुसलमान करना ही चाहिये. दो रुपया प्रति माह से लेकर एक साथ १००० रुपया प्रलोभन इस्लाम कबुल करने पर दिया जाता था. लेकिन जो औरंगझेबके खिलाफ गये थे उनका कत्ल किया जाता था. इस वजहसे उसके साम्राज्यका पतन हुआ था. क्यों कि सेक्युलर मुस्लिम और हिन्दु उसके सामने पड गये थे. औरंगझेबने कुछ मंदिर बनवाये भी थे और हिन्दुओंके (परधर्मीयोंके) उपर हुए अन्यायोंवाली समस्याओंका समाधान न्याय पूर्वक किया था. कोई जगह नहीं भी किया होगा. लेकिन हिन्दुओंके प्रमुख मंदिरोंको तुडवानेके बाद उसके अच्छे काम भूलाये गये. मुस्लिम और हिन्दु दोनों राजाओंने मिलकर उसका साम्राज्यको तहस नहस कर दिया. सबसे ज्यादा महत्व पूर्ण यह बात है कि उस समयके सभी राजाएं मुगल साम्राज्यके प्रति आदर रखते थे. और ऐसा होने के कारण ही औरंगझेबके बाद मुगल साम्राटके सार्वभौमत्वको माननेके लिये तैयार हुए थे. हिन्दु और मुस्लिम दोनों हिन्दुस्तानी थे. अगर हम सेक्युलर है और संविधान भी धर्म और जातिके आधार पर भेद नहीं रखनेका आग्रह रखता है, तो क्यूं हम सब आजकी तारिखमें हिन्दुस्तानी नहीं बन सकते? यह प्रश्न हम सबको अपने आप से पूछना चाहिये.
चलो हम इसमें क्या समस्यायें है वह देखें.

प्रवर्तमान कोमवादी मानसिकता सबसे बडी समस्या है.

कोमवाद धर्मके कारण है ऐसा हम मानते है. अगर यह बात सही है तो हिन्दु, मुस्लिम, जैन, बौद्ध, शिख, इसाई, यहुदियोंके बीचमें समान रुपसे टकराव होता. कमसे कम हिन्दु, मुस्लिम और इसाईयोंके बीच तो टकराव होता ही. किन्तु बीलकुल ऐसा नहीं है. पाकिस्तानमें शियां और सुन्नी के बिचमें टकराव है. शियां और सुन्नीमें टकराव कब होता है या तो कब हो सकता है? अगर शियां और सुन्नी भेदभाव की नीति अपनावे तो ऐसा हो सकता है.

कोई भेदभाव की नीति क्यों अपनायेगा?

अगर अवसर कम है और अवसरका लाभ उठाने वाले ज्यादा है तो मनुष्य खुदको जो व्यक्ति ज्यादा पसंद है उसको लाभ देनेका प्रायः सोचता है.

अवसर क्या होता है?

अवसर होता है उपयुक्त व्यक्तियोंके सामने सहाय, संवर्धन, व्यवसाय, संपत्ति, ज्ञान, सुविधा, धन, वेतन देना दिलानेका प्रमाण (जत्था) होता है. अगर अवसर ज्यादा है तो भेदभाव की समस्या उत्पन्न होती नहीं है. लेकिन अगर अवसर कम है, और उपयुक्त यक्ति ज्यादा है तो, देनेवाला या दिलानेवाला जो मनुष्य है, कोई न कोई आधार बनाकर भेदभाव के लिये प्रवृत्त होता है.
इस समस्याका समाधान है अवसर बढाना.

अवसर कैसे बढाये जा सकते है?

प्राकृतिक स्रोतोंका, ज्ञानके स्रोतोंका और उपभोग्य वस्तुओंका उत्पादन करने वाले स्रोतोंमें विकास करनेसे अवसर बढाये जा सकते है. अगर यह होता है तो भेदभावकी कम और नगण्य शक्यता रहती है.

अवसर रातोंरात पैदा नहीं किये जा सकते है यह एक सत्य है.

अवसर और व्यक्तिओंका असंतुलन दूर करनेके लिये अनियतकाल भी नहीं लगता, यह भी एक सत्य है.

जैसे हमारे देशमें एक ही वंशके शासकोंने ६० साल केन्द्रमें राज किया और नीति-नियम भी उन्होने ही बनाये थे, तो भी शासक की खुदकी तरफसे भेदभावकी नीति चालु रही. अगर नीति नियम सही है, उसका अमल सही है और मानवीय दृष्टि भी रक्खी गई है तो आरक्षण और विशेष अधिकार की १० सालसे ज्यादा समय के लिये आवश्यकता रहेती ही नहीं है.

जो देश गरीब है और जहां अवसर कम है, वहां हमेशा दो या ज्यादा युथों में टकराव रहेता है. युएस में और विकसित देशोंमें युथोंके बीच टकराव कम रहेता है. भारत, पाकिस्तान, बार्मा, श्री लंका, बांग्लादेश, तिबेट, चीन आदि देशोंमें युथोंके बीच टकराव ज्यादा रहेता है. सामाजिक सुरक्षाके प्रति शासकका रवैया भी इसमें काम करता है. यानी की, अगर एक युथ या व्यक्ति के उपर दुसरेकी अपेक्षा भेदभाव पूर्ण रवैया शासक ही बडी निष्ठुरतासे अपनाता है तो जो पीडित है उसको अपना मनोभाव प्रगट करनेका हक्क ही नहीं होता है तो कुछ कम ऐतिहासिक समयके अंतर्गत प्रत्यक्ष शांति दिखाई देती है लेकिन प्रच्छन्न अशांति है. कभी भी योग्य समय आने पर वहां विस्फोट होता है.

अगर शिक्षा-ज्ञान सही है, अवसरकी कमी नहीं तो युथोंकी भीन्नता वैविध्यपूर्ण सुंदरतामें बदल जाती है. और सब उसका आनंद लेते है.

भारतमें अवसर की कमी क्यों है?

भारतमें अवसर की कमीका कारण क्षतियुक्त शिक्षण और अ-शिक्षण के कारण उत्पन्न हुई मानसिकता है. और ईसने उत्पादन और वितरणके तरिके ऐसे लागु किया कि अवसर, व्यक्ति और संवाद असंतुलित हो जाय.

शिक्षणने क्या मानसिकता बनाई?

मेकोलेने एक ऐसी शिक्षण प्रणाली स्थापितकी जिसका सांस्कृतिक अभ्यासक्रम पूर्वनियोजित रुपसे भ्रष्ट था. मेक्स मुलरने अपने अंतिम समयमें स्विकार कर लिया था कि, भारतके लोगोंको कुछ भी शिखानेकी आवश्यक नहीं. उनकी ज्ञान प्रणाली श्रेष्ठ है और वह उनकी खुदकी है. उनकी संस्कृति हमसे कहीं ज्यादा विकसित है और वे कहीं बाहरके प्रदेशसे आये नहीं थे.

लेकिन मेकोलेको लगा कि अगर इन लोगों पर राज करना है तो इनकी मानसिकता भ्रष्ट करनी पडेगी. इस लिये ऐसे पूर्व सिद्धांत बनाओ कि इन लोगोंको लगे कि उनकी कक्षा हमसे निम्न कोटिकी है और हम उच्च कोटी के है. और ऐसा करनेमें ऐसे कुतर्क भी लगाओ की वे लोग खो जाय. उनको पहेले तो उनके खुदके सांस्कृतिक वैचारिक और तार्किक धरोहरसे अलग कर दो. फिर हमारी दी हुई शिक्षा वालोंको ज्यादा अवसर प्रदान करो और उनको सुविधाएं भी ज्यादा दो.

अंग्रेजोंने भारतको दो बातें सिखाई.

भारतमें कई जातियां है. आर्य, द्रविड, आदिवासी. आदिवासी यहां के मूल निवासी है. द्रविड कई हजारों साल पहेले आये. उन्होने देश पर कबजा कर लिया. और एक विकसित संस्कृति की स्थापना की. उसके बाद एक भ्रमण शील, आर्य नामकी जाति आयी. वह पूर्व युरोप या पश्चिम एशियासे निकली. एक शाखा ग्रीसमें गई. एक शाखा इरानमें गयी. उसमेंसे एक प्रशाखा इरानमें थोडा रुक कर भारत गई. उन्होने द्रविड संस्कृतिका ध्वंष किया. उनके नगरोंको तोड दिया. उनको दास बनाया. बादमें यह आर्य जाति भारतमें स्थिर हुई. और दोनों कुछ हद तक मिल गये. ग्रीक राजाएं भारत पर आक्रमण करते रहे. कुछ संस्कृतिका आदान प्रदान भी हुआ. बादमें शक हुण, गुज्जर, पहलव आये. वे मिलगये. अंतमें मुसलमान आये.

मुस्लिम जाति सबसे अलग थी

यह मुस्लिम जाति सबसे अलग थी. आचार विचार और रहन सहनमें भी भीन्न थी. यह भारतके लोगोंसे हर तरहसे भीन्न थी इसलिये वे अलग ही रही. ईन्होने कई अत्याचार किये.

फिर इन अंग्रेजोंने आदिवासीयोंको कहा कि अब हम आये हैं. आप इन लोगोंसे अलग है. आपका इस देश पर ज्यादा अधिकार है. हम भी आर्य है. लेकिन हम भारतीय आर्योंसे अलग है. हम सुसंस्कृत है. हम आपको गुलाम नहीं बनायेंगे. आप हमारा धर्म स्विकार करो. हम आपका उद्धार करेंगे.

दक्षिण भरतीयोंसे कहा. यह आर्य तो आपके परापूर्वके आदि दुश्मन है. उन्होने आपके धर्म को आपकी संस्कृतिको, आपकी कला को आपके नगरोंको ध्वस्त किया है. आप तो उच्चा संस्कृतिकी धरोहर वाले है. आपका सबकुछ अलग है. भाषा और लिपि भी अलग है. आप हमारी शिक्षा ग्रहण करो. और इन आर्योंकी हरबात न मानो. ये लोग तो धुमक्कड, असंस्कृत, तोडफोड करनेवाले और आतंकी थे.

मुसलमानोंसे यह कहा गया कि आप तो विश्व विजयी थे. आपने तो भारत पर १२०० साल शासन किया है. ये भारतके लोग तो गंवार थे. इनके पास तो कहेनेके लिये भी कुछ भी नहीं था. ये लोग तो अग्निसे डर कर अग्निकी पूजा करते है. सूर्य जो आगका गोला है उसकी पूजा करते है. हवा, पानी, नदी जैसे बेजान तत्वोकी पूजा करते है. शिश्न की और अ योनी की पूजा करते हैं. ये लोग पशुओंकी और गंदी चीजोंकी भी पूजा करते है. इनके भगवान भी देखो कितने विचीत्र है? वे अंदर अंदर लडते भी हैं और गंदी आदतों वाले भी है. उनके मंदिरोंके शिल्प देखो उसमें कितनी बिभत्सता है.

इनके पास क्या था? कुछ भी नहीं. आपने भारतमें, ताज महाल, लालकिल्ला, फत्तेहपुर सिक्री, कुतुबमिनार, मकबरा, और क्या क्या कुछ आपने नहीं बनाया!! भारतकी जो भी शोभा है वह आपकी बदैलत तो है. आपने ही तो व्यापारमें भारतका नाम रोशन किया है. लेकिन जब कालके प्रवाहमें आपका शासन चला गया तो इन लोगोंने अपने बहुमतके कारण आपका शोषण किया और आपको गरीब बना दिया. आपके हक्ककी और आपकी सुरक्षा करना हमारा धर्म है.

इस प्रकारका वैचारिक विसंवाद अंग्रेज शासकोंने १८५७के बाद घनिष्ठता पूर्वक चलाया. एक बौधिक रुपसे गुलामी वाला वर्ग उत्पन्न हुआ जो अपने पैर नीचेकी धरतीकी गरिमासे अनभिज्ञ था. और वह कुछ अलग सूननेके लिये तैयार नहीं था.

इस बौधिक वर्गके दो नेताओंके बीच सत्ताके लिये आरपार का युद्ध हुआ. एक था नहेरु और दुसरा था जिन्ना.

जब देशकी जनता गरीब होती है वह किसीभी बात पर झगडा करने के लिये तैयार हो जाती है. और जिनका उद्देश्य सिर्फ सत्ता और पैसा है वह हमेशा दुसरोंकी अज्ञानताका लाभ लेकर देशको और मानव जातको चाहे कितना ही नुकशान क्युं न होजाय, दुसरोंको गुमराह करके मत बटोरके अपना उल्लु सीधा करती है.

लेकिन वास्तवमें ये हिन्दु और मुस्लिम कौन है और कैसे है? और क्यों बेवकुफ बनते रहते है?

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे (smdave1940@yahoo.com)
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