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Posts Tagged ‘ईश्वर’

हिन्दु और लघुमतीयोंको एक दुसरेसे क्या अपेक्षा है और अपेक्षा क्या होनी चाहिये? – २

जब देशकी जनता गरीब होती है वह किसीभी बात पर झगडा करने के लिये तैयार हो जाती है. और जिनका उद्देश्य सिर्फ सत्ता और पैसा है वह हमेशा दुसरोंकी अज्ञानताका लाभ लेकर देशको और मानवजातको चाहे कितना ही नुकशान क्युं न होजाय, दुसरोंको गुमराह करके मत बटोरके अपना उल्लु सीधा करती है.

लेकिन वास्तवमें ये हिन्दु और मुस्लिम कौन है और कैसे है?

और ये दोनो क्यों बेवकुफ बनते रहते है?

मुस्लिम और हिन्दु वास्तवमें एक ही जाति है. इसाकी प्रथम सदी तक हिन्दु राजाएं इरान तक राज करते थे. विक्रममादित्यने अरबस्तान तक अपना साम्राज्य फैलाया था. अगर आर्योंके आगमन वाली कल्पनाको सही माने तो भी अरबस्तान वाले भी आर्य जाति के है. अगर भारतसे लोग बाहर गये इस थीयेरीका स्विकार करे तो भी अरबस्तानके लोग और भारतके लोग एक ही जातिके है. एक ही जातिके हो या न हो अब जाति कोई महत्व रखती नहीं है.

फिर टकराव क्युं?

इस्लाम क्या है?

इससे प्रथम यह विचार करो कि इस्लाम क्यों आया? जब कोई भी प्रणालीमें अतिरेक होता है तो एक प्रतिकारवाला प्रतिभाव होता है.

प्रणालीयां समाजको लयबद्ध जिनेके लिये होती है. प्रणालीयां संवादके लिये होती है. प्रणालीयां आनंदके लिये होती है. अगर इसमें असंतुलन हो जाय और समाजके मनुष्योंकी सुविधाओंमें यानी कि आनंदमें असंतुलन हो जाय तब कोई सक्षम मनुष्य आगे आ जाता है और वह विद्रोहवाला प्रतिकार करता है.

इश्वरकी शक्तियों पर समाज निर्भर है. इन शक्तियोंको आप कुछ भी नाम दे दो. आप उनका भौतिक प्रतिक बनाके उनको याद रखो और उसकी उपासना करो. उस उपासनाओंकी विधियां बनाओ. उनकी विधियोंके अधिकारीयोंको सत्ता दो. यह पूरा फिर एक प्रपंच बन जाता है. समाजके युथोंके सुखोंमें असंतुलन हो जाता है. कोई न कोई कभी न कभी ऐसा व्यक्ति निकलेगा जो इनका विरोध करेगा.

अरबस्तानमें महोम्मद साहब हुए. और भारतमें दयानंद सरस्वती हुए. दयानंद सरस्वतीसे पहेले भी कई लोग हुए थे. शंकराचार्यने कर्मकांडका विरोध किया था. भारतमें किसी विद्रोहीने तिरस्कार और तलवारका उपयोग किया नहीं था. क्यों कि भारतमें धर्म-चर्चा एक प्रणाली थी. अरबस्तानमें मोहम्मद साहबके जमानेमें ऐसा कुछ था नहीं. उस समय शासकके हाथमें सर्व सत्ता थी.

मोहम्मद साहबने मूर्त्तिपूजाका और विधियोंका विरोध किया. और वैज्ञानिक तर्कसे सोचनेका आग्रह किया. उस समय जो उच्च लोग थे वे लोग जो अनाचार दुराचार करना चाहते थे वे इश्वरके नामपर करते थे. दारु पीना है? ईश्वरको समर्पित करो और फिर खुद पीओ. जुआ खेलना है? तो ईश्वरके नाम पर करो.

भारतमें भी आजकी तारिखमें ऐसा ही है. कृष्ण भगवानके नाम पर जुआ खेला जाता है. देवीके नाम पर दारु पीया जाता है. ईश्वरके नाम पर भंग पी जाती है. देवदासीके नाम पर व्यभिचार किया जाता है. आचार्य रजनीशने संभोगसे समाधि पुरस्कृत किया है. जब मानव समाजमें समुहोंके बीच सुखोंमे असंतुलन होता है तब दंगा फसाद और विद्रोह होता है.
मोहम्मद साहबने अपने जमानेमें जो जरुरी था वह किया.

इस्लाम यह कहता है

ईश्वर एक है. उसका कोई आकार नहीं. उसकी कोई जाति नहीं. वह किसीका संबंधी नहीं. वह जगतकी हर वस्तुसे नजदिकसे नजदिक है. वह सर्वत्र है और सबकुछ देखता है. वह ज्योतिके रुपमें प्रगट होता है. आपका कर्तव्य है कि आप सिर्फ उसकी ही उपासना करें. यह उपासना नमाजकी विधिके अनुसार करो. और दिनमें पांच बार करो. ईश्वर दयावान है. अगर आप, उनसे, अपने कुकर्मोंकी सच्चे दिलसे माफी मांगोगे तो वह माफ कर देगा.

ईश्वरको ईमान प्रिय है. इसलिये ईमानदार बनो.

वैज्ञानिक अभिगम रक्खो,

आप सुखी है? तो इसका श्रेय ईश्वरको दो.

आपने कुछ अच्छाकाम किया है? तो समझो की ईश्वरने आप पर कृपा है की है, कि उसने इस अच्छे कामके लिये आपको पसंद किया. आप इसका श्रेय ईश्वरको दो.

आप देखो कि आपका पडोसी दुःखी तो नहीं है न? उसको मदद करो. उसको भोजन करानेके बाद आप भोजन करो.

आप संपन्न है तो इसका एक हिस्सा इश्वरको समर्पित करो.

जिसको धनकी जरुरत है उसको धन दो और मदद करो. उससे व्याज मत लो.

अगर कोई गलत रास्ते पर जा रहा है और समझाने पर भी सही रास्ते पर नहीं आता है, तो समझलो कि यह ईश्वर की इच्छा है. ईश्वर उसको गुमराह करेगा और सजा देगा.

ईश्वरने तुम्हारे लिये वृक्षोंपर और पौधोंपर सुंदर भोजन बनाया है. तुम उसको ईश्वरकी कृपाको याद करते करते आनंदसे खाओ. (अगर इनकी कभी कमी पड गई तो) जिंदा रहेनेके लिये फलां फलां प्राणीयोंका मांस इश्वरको समर्पित करके खाओ.

यह है इस्लामके आदेश जो मोहम्मद साहबने अपने लोगोंको राह पर चलनेके लिये बतायें.

और भी कई बाते हैं लेकिन वह सब उस जमानेमें अनुरुप होगी ऐसा प्रस्तूत करने वालोंको लगा होगा इसलिये प्रस्तूत किया होगा. लग्न कैसे करना, किससे करना, कितनी बार करना, कितनोंके साथ करना चाहिये आदि आदि. यह कोई चर्चा और कटूताका विषय बनना नहीं चाहिये.

वैसे तो मनुस्मृतिकी कई बाते हम आज मानते नहीं है.

हिन्दु धर्म क्या है?

सत् एक ही है. वह ब्रह्म है. वह निराकार, निर्विकार और निर्गुण है. वह पूर्ण है. पूर्णमेंसे पूर्ण लेलो तो पूर्ण ही बचता है.

उसको कोई जानता नहीं न तो कोई जान सकता है न कोई वर्णन कर सकता है. जो भी कहो वह ऐसा नहीं है. वह ईन्द्रीयोंसे पर है.

ब्रह्ममेंसे ज्योतिरुप अग्नि निकला और जगत बनाया. यह अग्नि (महोदेवो) ईश्वर है. वह सर्वत्र है और वह ही सब है. वह अग्रमें (आरंभमें) है, मध्यमें है और अंतमें भी वही है.

सब क्रियाओंका कारण है. लेकिन ब्रह्ममेंसे जगत क्यों बना, सिर्फ इसका कारण नहीं है.

ईश्वर ब्रह्म ही है. ईश्वर जगतका संचालन करता है. उसने व्यवस्था बनाई है. और सबको कर्मके अनुसार फल मिलता है.

ईश्वर अनुभूतिका विषय है. भक्ति, कर्म, योग और ज्ञान के द्वारा आप उनको पा सकते है.

आप उसकी किसीभी रुपमें उपासना कर सकते है.

सभी चीजें सजिव है. वनस्पति भी सजीव है. वृक्षमें बीज है और बीजमें वृक्ष है. रसादार फल खाओ और बीजको वृक्ष होने दो. पर्ण खाओ लेकिन वृक्षको जिन्दा रखो. सबको जीनेका अधिकार है. सबका कल्याण हो. सबको शांति हो.

सत्य और अहिंसा अपनानेसे ध्येयकी प्राप्ति होती है.

ईश्वरीय शक्तियोंका आदर करो. और उनको उनका हिस्सा दो. उसके बाद उपभोग करो.

माता प्रथम शक्ति है. द्वीतीय शक्ति पिता है. तृतीय शक्ति जो तुम्हारे घर महेमान आया है वह है. तुम्हारा शिक्षक चतुर्थ शक्ति है. और पंचम शक्ति ईश्वर है.

यह पृथ्वी तुम्हारा कुटुंब है. कोई पराया नहीं है.

तुमने जो काम पसंद किया उसको निभाना तुम्हारा कर्तव्य (धर्म) है. तुमने जिस कामका अभ्यास नहीं किया उस काममें चोंच डालना ठीक नहीं है (अधर्म है). तुमने जिस कामका अभ्यास किया उसमें तुम्हारी मृत्यु हो जाय तो चलेगा. लेकिन अगर तुम अपने केवल स्वार्थको केन्द्रमें रखकर जिसका तुम्हे अभ्यास नहीं उसको करोगे तो समाजके लिये वह भय जनक है.

तुम जो भी कर्म करते हो वह अलिप्त भावसे करो.

कुछ भी तुम्हारा नहीं है. न तुम कुछ लाये हो न तुम कुछ ले जाओगे. तुम तो निमित्त मात्र हो.

तुम कुछ भी करते नहीं हो. सब कुछ ईश्वर करता है. कार्य करनेवाला ईश्वर है, कार्य भी ईश्वर है और क्रिया भी ईश्वर है. हम सब एकमात्र परमात्मा के अंश है. लेकिन अज्ञानताके आवरणके कारण हम अपनेको दुसरोंसे अलग है ऐसा अनुभव करते है.

विगतके लिये पढेः

NOT EVEN TWO. ONE AND ONE ONLY
https://treenetram.wordpress.com/2012/05/08/547/

“जो खुदको भले ही नुकशान हो जाय तो भी दुसरोंके लाभके लिये काम करता है वह सत्पुरुष है.

“जो दुसरोंको नुकशान न हो इस प्रकारसे अपने लाभका काम करता है वह मध्यम कक्षाका पुरुष है.

“जो अपने लाभके लिये दुसरोंका नुकशान करता है वह राक्षस है.

“जो ऐसे ही (निरर्थक ही) दुसरोंको नुकशान करता है वह कौन है वह हमें मालुम नहीं. (भर्तृहरि).

जो उपकार करनेवालेको भी (जनताको) नुकशान पहुंचाके अपना उल्लु सीधा करता है वह नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनके साथी हैं.

देशने नहेरुवीयनोंको क्या क्या नहीं दिया. ६० साल सत्ता दी, अरबों रुपये दिया, अपार सुविधाएं दी, तो भी उन्होने देशको लूटा और देशकी ७० प्रतिशत जनताको गरीब और अनपढ रक्खा, ता कि वह हमेशा उनके उपर आश्रित रहे. ये राक्षसके बाप है.

GODDESS OF KNOWLEDGE AND COMMUNICATION CAN TAKE US TO ETERNAL TRUTH

जो हिन्दु और मुस्लिम जनताके बीचमें जो समस्याएं है वह कैसे दूर की जाय? इन दोनोंको कैसे जोडा जाय?

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

 smdave1940@yahoo.com

टेग्झः हिन्दु, मुस्लिम, अरबस्तान, विक्रमादित्य, इस्लाम, प्रणाली, समाज, लयबद्ध, आनंद, संवाद, असंतुलन, विद्रोह, प्रतिकार, ईश्वर, शक्ति, युथ, महोम्मद साहब, विज्ञान, ईमान, दयानंद सरस्वती, शंकराचार्य, मूर्त्तिपूजा, दारु, ब्रह्म, जगत, कार्य, फल, व्यवस्था, संचालन, निमित्त, ज्ञान

विस्तृत जानकारी के लिये निम्न लिखित लींकके लेखको पढे.

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Rama has been lost who had walked on this earth in flesh and blood Part-9

खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग)

रामको कौन समझ पाया?

एक मात्र महात्मा गांधी है जो रामको सही अर्थोमें समझ पाये.

प्रणालीयोंको बदलना है? तो आदर्श प्रणाली क्या है वह सर्व प्रथम निश्चित करो.

आपको अगर ऐसा लगा कि आप आदर्श प्रणालीको समझ सके हो तो पहेले उसको मनमें बुद्धिद्वारा आत्मसात करो, और वैसी ही मानसिकता बनावो. फिर उसके अनुसार विचार करो और फिर आचार करो. इसके बाद ही आप उसका प्रचार कर सकते हो.

लेकिन यह बात आपको याद रखने की है कि, प्रचार करने के समय आपके पास कोई सत्ता होनी नहीं चाहिये. सत्ता इसलिये नहीं होनी चाहिये कि आप जिस बातका प्रचार करना चाहते है उसमें शक्ति प्रदर्शन होना वर्ज्य है. सत्ता, शक्ति और लालच ये सब एक आवरण है, और यह आवरण सत्यको ढक देता है. (हिरण्मयेन पात्रेण सत्यस्यापिहितं मुखम्‌.).

गांधीजीको जब लगा कि वे अब सामाजिक क्रांति लाना चाहते है तो उन्होने कोंग्रेसके पदोंसे ही नहीं लेकिन कोंग्रेसके प्राथमिक सभ्यपदसे भी त्यागपत्र दे दिया. इसकी वजह यह थी कि उनकी कोई भी बातोंका किसीके उपर उनके पदके कारण प्रभाव न पडे और जिनको शंका है वे संवादके द्वारा अपना समाधान कर सके.

कुछ लोग कहेंगे कि उनके उपवास, और कानूनभंग भी तो एक प्रकारका दबाव था! लेकिन उनका कानून भंग पारदर्शी और संवादशील और सजाके लिये आत्मसमर्पणवाला था. उसमें कोई हिंसात्मक सत्ता और शक्ति संमिलित नहीं थी. उसमें कोई कडवाहट भी नहीं थी. सामने वाले को सिर्फ यह ही कहेनेका था कि, उसके हदयमें भी मानवता है और “रुल ऑफ लॉ” के प्रति आदर है.

महात्मा गांधीने रामको ही क्यों आदर्श के लिये चूना?

भारत, प्राचीन समयमें जगत्‌गुरु था. गुरुकी शक्ति शस्त्र शक्ति नहीं है. गुरुको शस्त्र विद्या आती है लेकिन वह केवल शासकोंको सीखानेके लिये थी. गुरुका धर्म था विद्या और ज्ञानका प्रचार, ताकि जनता अपने सामाजिक धर्मका आचरण कर सके.

शासकका धर्म था आदर्श प्रणाली के अनुसार “रुल ऑफ लॉ” चलाना. शासकका काम और धर्म, यह कतई नहीं था कि वह सामाजीक क्रांति करें और प्रणालीयोंमें परिवर्तन या बदलाव लावें. यह काम ऋषियोंका था. राजाके उपर दबाव लानेका काम, ऋषियोंकी सलाह के अनुसार जनता का था.

वायु पुराणमें एक कथा है.

ब्राह्मणोंको मांस भक्षण करना चाहिये या नहीं? ऋषिगण मनुके पास गये. मनुने कहा ऋषि लोग यज्ञमें आहुत की हुई चीजें खाते है. इस लिये अगर मांस यज्ञमें आहुत किया हुआ द्रव्य बनता है तो वह आहुतद्रव्य खा सकते है. तबसे उन ब्राह्मणोंने यज्ञमें आहुत मांस खाना चालु किया. फिर जब ईश्वरने (शिवने) यह सूना तो उसने मनु और ब्राह्मणोंको डांटा. मनुसे कहाकि मनु, तुम तो राजा हो. राजाका ऐसा प्रणाली स्थापनेका और अर्थघटन करनेका अधिकार नहीं है. उसी प्रकार, ऋषियोंको भी ईश्वरने डांटा कि, उन्होने अनधिकृत व्यक्तिसे सलाह क्यों ली? तो मनु और ये ऋषिलोग पाप भूगतते रहेंगें. उस समयसे कुछ ब्राह्मण लोग मांस खाते रहे.

आचार्य मतलब है कि, आचार और विचारों पर शासन करें. मतलब कि, जिनके पास विद्या और ज्ञान है, उनके पास जो शासन रहेगा वह कहलायेगा अनुशासन. समस्याओंका समाधान ये लोग करेंगे. आचार्योंके शासन को अनुशासन कहा जायेगा. और शासकका काम है, सिर्फ “नियमों”का पालन करना और करवानेका. ऐसा होनेसे जनतंत्र कायम रहेगा.

अब देखो नहेरुवीयन कोंग्रेसने जो भी नियम बनायें वे सब अपने वॉट बेंक के लिये मतलबकी अपना शासन कायम रहे उसके लिये बनाया. वास्तवमें नियम बनानेका मुसद्दा जनताकी समस्याओंके समाधान के लिये ऋषियोंकी तरफसे मतलब कि,  ज्ञानी लोगोंकी तरफसे बनना चाहिये. जैसे कि लोकपालका मुसद्दा अन्ना हजारे की टीमने “जनलोकपाल” के बील के नामसे बनवाया था. उसके खिलाफ नहेरुवीयन कोंग्रेसके शासकोंने एक मायावी-लोकपाल बील बनाया जिससे कुछ भी निष्पन्न होनेवाला नहीं था.

शासक पक्षः

नहेरुवीयन कोंग्रेस एक शासक पक्ष है. वह प्रजाका प्रतिनिधित्व करती है. लेकिन उसने चूनाव अभियानमें अपना लोकपाल बीलका मुसद्दा जनताके सामने रखकर चूनाव जीता नहीं था. उतना ही नहीं वह खुद एक बहुमत वाला और सत्ताहीन पक्ष नहीं था. उसके पास सत्ता थी और वह एक पक्षोंके समूह के कारण सत्तामें आया था. अगर उसके पास सत्ता है तो भी वह कोई नियम बनानेका अधिकार नहीं रख सकता.

शासक पक्षके पास कानून बनानेकी सत्ता नहीः

उसका मतलब यह हुआ कि जनताके प्रतिनिधिके पास नये नियम और पूराने नियमोंमें परिवर्तन करनेकी सत्ता नहीं हो सकती.

जो लोग समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और मानसाशास्त्रमें निपूण है वे लोग ही हेतुपूर्ण मुसद्दा बनायेंगे और न्यायविद्वानोंसे मुसद्देका आखरी स्वरुप, नियम की भाषामें बद्ध करेंगे. फिर उसकी जनता और लोक प्रतिनिधियों के बीचमें और प्रसार माध्यमोंमें एक मंच पर चर्चा होगी, और उसमें फिरसे जो लोग समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और मानसाशास्त्रमें निपूण है वे लोग हेतुपूर्ण मुसद्दा बनायेंगे और न्यायविद्वानोंसे फिरसे मुसद्देका आखरी स्वरुप नियमकी भाषामें बद्ध करेंगे और फिर उसके उपर मतदान होगा. यह मतदान संसदमें नहीं परंतु चूनाव आयोग करवायेगा. संसदसदस्योंके पास शासन प्रक्रीया पर नीगरानी रखनेकी सत्ता है. जो बात जनताके सामने पारदर्शितरुपमें रख्खी गई नहीं है, उसको मंजुर करने की सत्ता उनके पास नहीं है.

महात्मा गांधीने कोंग्रेसका विलय करनेको क्यों कहा?

महात्मा गांधी चाहते थे कि जो लोग अपनेको समाज सेवक मानते है और समाजमें क्रांति लाना चाहते है, वे अगर सत्तामें रहेंगे तो क्रांतिके बारे में सोचनेके स्थान पर वे खुद सत्तामें बने रहे उसके बारेमें ही सोचते रहेंगे. अगर उनको क्रांति करनी है तो सत्ताके बाहर रह कर जनजागृतिका काम करना पडेगा. और अगर जनता इन महानुभावोंसे विचार विमर्श करके शासक पक्षों पर दबाव बनायेगी कि, ऐसा क्रांतिकारी मुसद्दा तैयार करो और चूनाव आयोगसे मत गणना करवाओ.

महात्मा गांधीको मालुम था

महात्मा गांधीको मालुम था कि कोंग्रेसमें अनगिनत लोग सत्ताकांक्षी और भ्रष्ट है. और जनताको यह बातका पता चल ही जायेगा. “लोग इन कोंग्रेसीयोंको चून चून कर मारेंगे”. और उनकी यह बात १९७३में सच्ची साबित हुई.

गुजरातके नवनिर्माण आंदोलनमें गुजरातकी जनताने कोंग्रेसीयोंको चूनचून कर मारा और उनका विधानसभाकी सदस्यतासे इस्तिफा लिया. विधानसभाका विसर्जन करवाया. बादमें जयप्रकाश नारायणके नेतृत्वमें पूरे देशमें कोंग्रेस हटावोका आंदोलन फैल गया. जिस नहेरुवीयन कोंग्रेसने “हम गरीबी हटायेंगे… हम इसबातके लिये कृत संकल्प है” ऐसे वादे देकर, निरपेक्ष बहुमतसे १९७०में सत्ता हांसिल की थी, वह चाहती तो देशमें अदभूत क्रांति कर सकती थी. तो भी, नहेरुवीयन फरजंद ईन्दीरा गांधीको सिर्फ सत्ता और संपत्ति ही पसंद था. वह देशके हितके हरेक क्षेत्रमें संपूर्ण विफल रही और जैसा महात्मा गांधीने भविष्य उच्चारा था वैसा ही ईन्दीरा गांधीने किया. उसने अपने हरेक जाने अनजाने विरोधीयोंको जेलके हवाले किया और समाचार पत्रोंका गला घोंट दिया. उसने आपतकाल घोषित किया और मानवीय अधिकारोंका भी हनन किया. उसके कायदाविदने कहा कि, आपतकालमें शासक, आम आदमीका प्राण तक ले सकता है तो वह भी शासकका अधिकार है.

रामराज्यकी गहराई समझना नहेरुवीयन संस्कारके बसकी बात नहीं

और देखो यह ईन्दीरा गांधी जिसने हाजारोंसाल पूराना भारतीय जनतंत्रीय मानस जो महात्मा गांधीने जागृत किया था उसका ध्वंस किया. और वह ईन्दीरा गांधी आज भी यह नहेरुवीयन कोंग्रेसमें एक पूजनीया मानी जाती है. ऐसी मानसिकता वाला पक्ष रामचंद्रजीके जनतंत्र की गहराई कैसे समझ सकता है?

राम मंदिरका होना चाहिये या नहीं?

रामकी महानताको समझनेसे भारतीय जनताने रामको भगवान बना दिया. भगवान का मतलब है तेजस्वी. आकाशमें सबसे तेजस्वी सूर्य है. सूर्यसे पृथ्वी स्थापित है. सूर्यसे पृथ्वी की जिंदगी है. सूर्य भगवान वास्तवमें जीवन मात्रका आधार है. जब भी कोई अतिमहान व्यक्ति पृथ्वी पर पैदा होता है तो वह सूर्य भगवान की देन माना जाता है. सूर्यका एक नाम विष्णु है. इसलिये अतिमहान व्यक्ति जिसने समाजको उन्नत बनाया उसको विष्णुका अवतार माना जाता है. ऐसी प्रणाली सिर्फ भारतमें ही है ऐसा नहीं है. यह प्रणाली जापानसे ले कर मीस्र और मेक्सीको तक है या थी.

लेकिन नहेरुवीयन कोंग्रेसको महात्मा गांधीका नाम लेके और महात्मा गांधीकी कोंग्रेसकी धरोहर पर गर्व लेके वोट बटोरना अच्छा लगता है, लेकिन महात्मा गांधीके रामराज्यकी बात तो दूर रही, लेकिन रामको भारत माता का ऐतिहासिक सपूत मानने से भी वह इन्कार करती है. यह नहेरुवीयन कोंग्रेसको भारतीय संस्कृतिकी परंपरा पर जरा भी विश्वास नहीं है. उसके लिये सब जूठ है. राम भी जूठ है क्योंकि वह धार्मिक व्यक्ति है.

नहेरुवीयन कोंग्रेसने रामको केवल धार्मिक व्यक्ति बनाके भारतीय जनतांत्रिक परंपराकी धज्जीयां उडा देनेकी भरपूर कोशिस की. नहेरुवीयन कोंग्रेसने रामका ऐतिहासिक अस्तित्व न्यायालयके सामने शपथ पूर्वक नकार दिया.

पूजन किनका होता है

अस्तित्व वाले तत्वोंका ही पूजन होता है. या तो वे प्राकृतिक शक्तियां होती है या तो वे देहधारी होते है. जिनका अस्तित्व सिर्फ साहित्यिक हो उनकी कभी पूजा और मंदिर बनाये जाते नहीं है. विश्वमें ऐसी प्रणाली नहीं है. लेकिन मनुष्यको और प्राकृतिक तत्वोंको पूजनेकी प्रणाली प्रचलित है, क्यों कि उनका अस्तित्व होता है.

महामानवके बारेमें एकसे ज्यादा लोग कथाएं लिखते है. महात्मागांधीके बारेमें हजारों लेखकोंने पुस्तकें लिखी होगी और लिखते रहेंगे. लेकिन “जया और जयंत”की या “भद्रंभद्र” की जीवनीके बारेमें लोग लिखेंगे नहीं क्यों कि वे सब काल्पनिक पात्र है.

भद्रंभद्रने माधवबागमें जो भाषण दिया उसकी चर्चा नहीं होगी, लेकिन विवेकानंदने विश्व धर्मपरिषदमें क्या भाषण दिया उसकी चर्चा होगी. विवेकानंदकी जन्म जयंति लोग मनायेंगे लेकिन भद्रंभद्रकी जन्म जयंति लोगे मनायेंगे नहीं.

राम धर्मके संलग्न हो य न हो, इससे रामके ऐतिहासिक सत्य पर कोई भी प्रभाव पडना नहीं चाहिये.

मान लिजीये चाणक्यको हमने भगवान मान लिया.

चाणक्यके नामसे एक धर्म फैला दिया. काल चक्रमें उसका जन्म स्थल ध्वस्त हो गया. नहेरुवीयनोंने भी एक धर्म बना लिया और एक जगह जो चाणक्यका जन्म स्थल था उसके उपर एक चर्च बना दिया. जनताने उसका उपयोग उनको करने नहीं दिया. तो अब क्या किया जाय? जे. एल. नहेरुका महत्व ज्यादा है या चाणक्य का? चाणक्य नहेरुसे २४०० मील सीनीयर है. चाणक्यका ही पहेला अधिकार बनेगा.

हिन्दु प्रणाली के अनुसार मृतदेहको अग्निदेवको अर्पण किया जाता है. वह मनुष्यका अंतिम यज्ञ है जिसमें ईश्वरका दिया हुआ देह ईश्वरको वापस दिया जाता है. यह विसर्जनका यज्ञ स्मशान भूमिमें होता है. इसलिये भारतीयोंमें कब्र नहीं होती. लेकिन महामानवों की याद के रुपमें उनकी जन्मभूमि या कर्म भूमि होती है. या तो वह उसकी जन्मभूमि होती है या तो उनसे स्थापित मंदिर होते हैं. ईश्वर का प्रार्थनास्थल यानी की मंदिर एक जगहसे दुसरी जगह स्थापित किया जा सकता है. लेकिन जन्म भूमि बदल नहीं सकती.

एक बात लघुमतीयोंको समझनी चाहिये कि, ईसाई और मुस्लिम धर्ममें शासकोंमें यह प्रणाली रही है कि जहां वे गये वहां उन्होने वहांका स्थानिक धर्म नष्ट करने की कोशिस की, और स्थानिक प्रजाके धर्मस्थानोंको नष्ट करके उनके उपर ही अपने धर्मस्थान बनाये है. यह सीलसीला २०वीं सदीके आरंभ तक चालु था. जिनको इसमें शक है वे मेक्सीको और दक्षिण अमेरिकाके स्थानिक लोगोंको पूछ सकते हैं.

जनतंत्रमें राम मंदिर किस तरहसे बन सकता है?

श्रेष्ठ उपाय आपसी सहमती है, और दूसरा उपाय न्यायालय है.

I RECOMMEND RAMA-RAJYA

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः राम वचन, प्रतिज्ञा, नहेरुवीयन, नहेरु, ईन्दीरा, महात्मा गांधी, राम राज्य, राजा राम, अर्थघटन, नियम, परिवर्तन, प्रणाली, शासक, अधिकार, रुल ऑफ लॉ, निगरानी, सत्ता, ऋषि, ईश्वर, मनु, अधिकारी, जनतंत्र, हिन्दु, धर्म 

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Rama has been lost who had walked on this earth in flesh and blood Part-8

खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग)

सीता धरतीमें समा गई. एक पाठ ऐसा है कि वाल्मिकी खुद, सीताकी शुद्धता शपथसे कहे और वशिष्ठ उसको प्रमाण माने . लेकिन राम का मानना है कि, ऐसी कोई प्रणाली नहीं है. प्रणाली सिर्फ अग्नि परीक्षाकी ही है. सीताको पहेलेकी तरह अग्निपरीक्षा देनी चाहिये.

सीताने पहेलेकी तरह अग्नि परीक्षा क्युं न दी? सीताको लगा कि, ऐसी बार बार परीक्षा देना उसका अपमान है. इस लिये योग्य यह ही है कि वह अपना जीवन समाप्त करें.

इस बातका जनताके उपर अत्यंत प्रभाव पडता है. और जनता के हृदयमें राम के साथ साथ सीताका स्थान भी उतनाही महत्व पूर्ण बन जाता है.

राम और नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेता गण

राम की सत्य और प्रणालीयोंके उपरकी निष्ठा इतनी कठोर थी, कि अगर उसको हमारे नहेरुसे लेकर आजके नहेरुवीयन कोंग्रेसके वंशज अगर रामके प्रण और सिद्धांकोके बारेमें सोचने की और तर्क द्वारा समझने की कोशिस करें, तो उनके लिये आत्महत्याके सिवा और कोई मार्ग बचता नहीं है.

राजाज्ञा और राजाज्ञाके शब्दोंका अर्थघटन

रामने तो अजेय हो गये थे. राज्य का कारोबार भी स्थापित और आदर्श परंपरा अनुसार हो रहा था.

एक ऋषि आते है. वे रामके साथ अकेलेमें और संपूर्णतः गुप्त बातचीत करना चाहते है. वह यह भी चाहते है कि जबतक बातचीत समाप्त न हो तब तक किसीको भी संवादखंडके अंदर आने न दिया जाय. राम, लक्ष्मणको बुलाते है. और संवादखंड के द्वारके आगे लक्ष्मणको चौकसी रखने को कहते है. और यह भी कहते है कि यह एक राजाज्ञा है. जिसका अनादर देहांत दंड होता है.

राम और ऋषि संवाद खंडके अंदर जाते है. लक्ष्मण द्वारपाल बन जाता है. संवादखंडके अंदर राम और ऋषि है और बातचीत चल रही है.

कुछ समयके बाद दुर्वासा ऋषि आते है. वे लक्ष्मणको कहेते है कि रामको जल्दसे जल्द बुलाओ. लक्ष्मण उनको बताते है कि राम तो गुप्त मंत्रणा कर रहे है, और किसीको भी जानेकी अनुमति नहीं है. दुर्वासा आग्रह जारी रखते है और शीघ्राति शीघ्र ही नहीं लेकिन तत्काल मिलनेकी हठ पर अड जाते है. और लक्ष्मणके मना करने पर वे गुस्सा हो जाते है. और पूरे अयोध्याको भष्म कर देनेकी धमकी देते है. तब लक्ष्मण संवाद खंड का द्वार खोलता है. ठीक उसी समय राम और ऋषिकी बातचीत खत्म हो जाती है और दोनों उठकर खडे हो जाते है.

“संवादका अंत” की परिभाषा क्या?

संवाद का प्रारंभ तो राम और ऋषि खंडके अंदर गये और द्वार बंद किया तबसे हो जाता है.

लेकिन संवादका अंत कब हुआ?

जब राम और ऋषिने बोलना बंद किया तबसे?

जब राम और ऋषि आसन परसे उठे तबसे?

जब राम और ऋषि द्वारके पास आये तबसे?

जब राम और ऋषि द्वार के बाहर आये तब?

रामके हिसाबसे जब तक राम और ऋषि द्वारके बाहर न आवे तब तक संवादका अंत मानना नहीं चाहिये.

जब राम और ऋषिने बोलना बंद किया तबसे संवादका अंत मानना नहीं चाहिये. क्यों कि यह तो दो मुद्दोंके बीचका विराम हो सकता है. यह भी हो सकता है वे दोनोंको कोई नया मुद्दा या कोई नयी  बात याद आ जावें?

जब राम और ऋषि आसन परसे उठे तबसे भी संवादका अंत न मानना चाहिये, क्योंकि  वे नयी बात याद आने से फिरसे बैठ भी सकते है. 

जब राम और ऋषि द्वारके पास आये तबसे भी संवादका अंत न मानना चहिये, क्यों कि वे बीना द्वार खोले वापस अपने स्थान पर जा सकते है.

चौकीदारके लिये ही नहीं परंतु राम, ऋषि और सबके लिये भी, जब वे दोनों (राम और ऋषि),  द्वार खोलके बाहर आते है तब ही संवाद का अंत मान सकता है. क्यों कि संवादकी गुप्तता तभी खतम हुई होती है.

तो अब प्रणाली के हिसाबसे राजाज्ञाका अनादर करने के कारण, लक्ष्मणको देहांत दंड देना चाहिये.

लक्ष्मण, जो रामके साथ रहा और दशरथकी आज्ञा न होने पर भी रामके साथ वनवासमें आया और खुदने अनेक दुःख और अपमान झेले. उसका त्याग अनुपम था. इस लक्ष्मणने अयोध्याकी रक्षाके लिये राजाज्ञाका शाब्दिक उल्लंघन किया जो वास्तवमें उल्लंघन था भी नहीं. जो ऋषि रामके साथ संवाद कर रहे थे उनको भी यह लगता नहीं था कि लक्ष्मणने राजाज्ञाका उल्लंघन किया है. लेकिन क्षुरस्य धारा पर चलने वाले रामको और लक्ष्मणको लगा की राजाज्ञाका उल्लंघन हुआ है.

रामने वशिष्ठसे पूछा. उनके अर्थघटनके अनुसार भी राजाज्ञाका उल्लंघन हुआ था. लेकिन देहांत  दंड के बारेमें एक ऐसी भी अर्थघटनकी प्रणाली थी कि अगर देहांत दंड जिस व्यक्ति के उपर लागु करना है वह अगर एक महाजन है तो उसको “स्वदेश त्याग” की सजा दे जा सकती है. रामने लक्ष्मणको वह सजा सूनायी.

लक्ष्मण अयोध्यासे बाहर निकल जाते है और सरयु नदीमें आत्म हत्या कर लेते है.

तो यह थी राम, लक्ष्मण और सीताकी मानसिकता.

इस मानसिकताको भारतकी जनताने मान्य रख्खी. अर्वाचीन समयको छोड कर किसीने रामको कमअक्ल और एक निस्फल पति या कर्तव्य हीन पति, ऐसा बता कर उनकी निंदा नहीं की. सीता और लक्ष्मण की भी निंदा नहीं की.

लेकिन अर्वाचीन युगमें और खास करके नहेरुवीयन युगमें कई मूर्धन्योंने रामकी निंदा की है. रामके त्यागका, रामके उत्कृष्ठ अर्थघटनोंका, रामकी कर्तव्य निष्ठाका, रामकी प्रणालीयोंके प्रति आदरका वास्तविक मूल्यांकन नहीं किया है.

RAMA PROVIDED RULE OF LAW

शिरीष मोहनलाल दवे 

टेग्झः राम वचन, प्रतिज्ञा, महात्मा गांधी, राम राज्य, राजा राम, अर्थघटन, नियम, परिवर्तन, प्रणाली, शासक, अधिकार, रुल ऑफ लॉ, निगरानी, सत्ता, ऋषि, ईश्वर, मनु, अधिकारी, जनतंत्र, हिन्दु, धर्म

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खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग-२)

रामके बारेमें कई पुस्तक लिखे गये है. उत्तर राम चरित्र, रघुवंश, वाल्मिकी रामायण और तुलसी रामायण. कदम्ब रामायण, और कई है जो सब १२वीं सदीके बादमें लिखे गये. इनमें वाल्मिकी रामायण और तुलसी रामायण मुख्य है जिसकी पारायण (सह वाचन श्रवण) की जाती है. महाभारतमें भी रामकथा है.

इसमें विशेष रुपसे रामको विष्णुका अवतार माना गया है. जब एक व्यक्तिको भगवान मानके उनका जीवन लिखा जाता है तो चमत्कार सामेल करने ही पडते है.

अब हम इन चमत्कारोंको छोड कर रामका सच्चा स्वरुप कैसे समझे?

ऐसी कौनसी कौनसी घटनाएं है जिनको हम नकार नहीं सकते. ऐतिहासिकता के निरुपण के लिये घटनाओं का महत्व और घटनाका घटना किस आधार पर हो सकता है उसके उपर ज्यादा सोचना चाहिये. संवाद, मनुष्यके बारेमें किया वर्णन, स्थळोंका वर्णन, प्रसंगका वर्णन इन सब बातोंका संबंध कला-साहित्य और लेखककी खुदकी पसंदगी का है. ऐतिहासिक तथ्योंसे ज्यादा नहीं.

चलो हम घटनाएं क्या घटी, उसका क्या आधार, संदर्भ और तथ्य हो सकता है ये सब देखें और समझे.   

वैवस्वतः वंश और राजाओंकी सूचि और दशरथका स्थान, दशरथ अयोध्याका राजा था.

दशरथको दो रानीयां थी कौशल्या, सुमित्रा

दशरथको कोई पुत्र नहीं था,

दशरथने एक और शादी की. यह तीसरी रानी कैकेयी थी जो गंधारके राजाकी पुत्री थी,

दशरथने पुत्रेष्टी यज्ञ किया,

तीनों रानीयोंने संतानको जन्म दिया,

कौशल्याने राम, कैकेयीने भरत, सुमित्राने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया  

चारों पुत्र विश्वामित्रके आश्रममें पढने गये,

जनक राजाने अपनी पुत्री सीताके लिये स्वयंवर रचा,

जनक के पास एक धनुष्य था. स्वयंवर की शर्त यह थी कि, धनुष्‌के उपर बाणको ठीक तरहसे चढाना था,

स्वयंवरमें कई राजा आये थे.

राम सफल हुए.

रामका सीतासे लग्न हुआ.

दुसरे भाईओंका भी लग्न हुआ,

रामका युवराजपद समारोह घोषित होता है, भरत और शत्रुघ्न उपस्थित नहीं है

कैकेयी विरोध करती है,

राम, सीता और लक्ष्मण वनवास के लिये जाते है,

भरत गांधारसे वापस आता है,

रामके पास जाता है, राम अयोध्या वापस नहीं जाते है,

भरत अयोध्या वापस जाता है,

राम सीता और लक्ष्मण पंचवटीमें समय पसार करते है,

शुर्पणखाका, राम और लक्ष्मण का प्रसंग,

शुर्पणखा ईजाग्रस्त,

रावणका आना और सीता और रावणका लंका जाना,

राम-लक्ष्मण और हनुमान-सुग्रीव का मिलन,

रामका वाली वध,

राम-लक्ष्मण और वानरसेना का लंका प्रयाण,

राम रावण युद्ध,

रावणकी पराजय,

रामका विभीषणका किया राज्याभिषेक,

सीताकी परीक्षा (?)

रामसेनाका अयोध्या जाना,

रामका राज्याभिषेक,

सीता सगर्भा,

रामका सीता त्याग,

सीताका वाल्मिकी आश्रममें पलना,

लवकुशका जन्म,

रामायण का लिखा जाना और जनतामें प्रचार प्रसार,

रामका राजसुय यज्ञ,

अश्वका वाल्मिकीके आश्रममें जाना,

सीताकी परीक्षा,

सीताका धरती प्रवेष,

रामके पास दुर्वासाका आना,

लक्ष्मणका देशत्याग,

रामकी मृत्यु (परलोक गमन)

चलो इन प्रसंगोमेंसे इतिहासका निस्कर्ष करें और रामकी और उनके वंशकी महानता समझें. (क्रमशः)

 राम दरबार

शिरीष मोहनलाल दवे,

टेग्झः

राम, दशरथ, कैकेयी, सीता, जनक, धनुष, शुर्पणखा, लंका, रावण, हनुमान, आर्य, आक्रमण, विजय, दक्षिण, रामायण, इतिहास, ऐतिहासिक, तथ्य, हिन्दु, भारत, अंधश्रद्धा, श्रद्धा, धर्म, चमत्कार, ईश्वर, भगवान, देवता, शिव, रुद्र, अग्नि, विष्णु, सूर्य, वाल्मिकी, आश्रम, परीक्षा, दुर्वासा

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खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग-१)

एक ऐसे राम थे जो रघुवंशी दशरथ राजाके पुत्र थे और हाडमांसके बने हुए मात्र और मात्र मनुष्य थे. वैसे तो वे एक राजपुत्र और काबिल राजा जरुर थे, लेकिन उनकी अद्वितीय महानता और आदर्श के कारण उनको हमने भगवान बना दिया. और भगवान बना दिया तो वे एक वास्तविक और ऐतिहासिक पात्र नष्ट हो कर एक काल्पनिक पात्र बन गये. और इसके कारण राम की बात करना एक धर्मकी बात करना और सफ्रोन (भगवा ब्रीगेड)की बात करना बराबर हो गया है.

अगर आप रामको भगवान मानो तो इसमें रामका क्या अपराध है?

रामको भगवान मानने वाले चमत्कारमें भी मानते है. रामने कई चमत्कार किये जो कोइ भी मनुष्य देहधारी नहीं कर सकता, इसीलिये राम मनुष्य हो ही नहीं सकते, और इसीलिये राम भगवान ही होने चाहिये.हमने उनको भगवान मान लिया इसीलिये राम धर्मका ही विषय बन गये. राम, धर्मका विषय बन गये इसीलिये वे श्रद्धाका विषय बन गये. राम भारतकी भाषाओंमे वर्णित है इसीलिये वे भारतके है. और भारतमें हिन्दु धर्मको माना जाता था और माना जाता है इसीलिये राम हिन्दुओंके भगवान है. और हिन्दुओंके भगवान है इसीलिये हिन्दुओंकी श्रद्धाका विषय है. और हिन्दुओंकी श्रद्धाका विषय है और हिन्दुओंका भगवान है इसीलिये ये सब बातें काल्पनिक है. काल्पनिक बातोंमें विश्वास रखना अंधश्रद्धा है. समाजमें अंधश्रद्धाको बढावा नहीं देना चाहिये. जो लोग खुदको रेशनल मानते है, वे ऐसा सोचते है.

राम मंदीरके लिये आग्रहीयोंका विरोध करने वालोंकी यही सोच है.

बडे बडे विद्वान और बुद्धिमान लोग भी रामको काल्पनिक पुरुष मानते है.

इसका मूख्य कारण यह है कि प्राचीन और मध्यकालिन भारतीय पुस्तकोंमे चमत्कारकी कई सारी बाते हैं और ये सब कपोलकल्पित है. सब बकवास है ऐसी मान्यता अपनेको ज्ञानी और तटस्थ समझने वाले लोग रखते है.वैसे तो हर धर्मके पुस्तकमें चमत्कारकी बातें लिखी हुई है. लेकिन उन धर्मोंके सभी महापुरुष ऐतिहासिक है. क्यों कि ये सब २६०० वर्षके अंतर्गत हुए. और इनके कुछ कुछ अवशेष मिल जाते हैं ऐसा माना गया है, इसलिये चमत्कारी बातें होते हुए भी वे सब ऐतिहासिक व्यक्ति है.

रामके प्राचीन अवशेष मिलते नहीं है. और जो भी मिलते है वे रामके संबंधित है ऐसा मानना अंधश्रद्धा है ऐसि मानसिकता स्थापित है. रामके प्राग्ऐतिहासिक अवशेष वैसे तो मिलते है, लेकिन उन अवशेषोंको रामके जमानेके या रामके संबंधित माने नहीं जाते हैं. इसके पीछे (आर्यन ईन्वेझन थीयेरी = आर्यजातिका भारत पर आक्रमण और फिर यहांके द्राविड और दस्युजातिकी पराजय और उनका पीछे दक्षिण दीशामें जाना) से अधितर्कका स्विकार है.

वैसे तो यह अधितर्क बिलकुल तर्कहीन और विरोधाभासोंसे भरपूर है, और अब तो यह अधितर्क निराधार और अस्विकृत माना भी जाता है तो भी जो मानसिकता बनी हुई है, वह अभी भी स्थापित है.क्या ऐतिहासिकता का आधार सिर्फ पूरातत्वके अवशेष ही हो सकते है? अगर उत्खनन किया नहीं है तो क्या मानोगे? अगर बाबरी ढांचाके नीचे उत्खनन नहीं हुआ होता और उसके नीचेसे जो विविध स्तर पर विभीन्न अवशेष मीले वह नहीं मिलते तो यही माना जाता कि नीचे कुछ अलग संस्कृति थी ही नहीं. मान लिजीये अगर उन स्तरोंसे भारतीय संस्कृति पर कुछ प्रकाश पडने वाला था, तो क्या होता?

मान लिजीये मोहें जो दडो का उत्खनन नहीं होता तो?

वास्तवमें हमें पुस्तकस्थ विवरणोंको महत्व देना ही पडेगा. उनकी अवगणना नहीं की जा सकती.हमारे पुराणोंको और महाकाव्योंको सिर्फ कपोल कल्पित मानके, उनको भी तिहासका एक हिस्सा मानना पडेगा. यह बात जरुर है कि उनमें कुछ चमत्कारिक बातें है, ईश्वर (रुद्रशिव), भगवान (सूर्यविष्णुब्रह्मा) और देवताओं (ईन्द्र, वायु, आदि)की बातें है. लेकिन ये सब तो तिहासके पुरुषोंकी बातोंको ज्यादा रसप्रद बनानेके लिये संमिलित किया गया है.

जैसे कोई पुस्तकमें वार्तालापोंके शब्दप्रयोगस्थलोंके वर्णनके शब्दप्रयोग, वस्त्रोंके वर्णनके शब्दप्रयोग आदि अक्षरसः वही शब्दोंका प्रयोग हुआ होगा ऐसा नहीं होता है. जैसे मैथिली शरण गुप्तने कोई संवाद लिखा है जिसमें सम्राट अशोक और उसकी पत्नी तिष्यरक्षिताके बीचमें कलिंगके युद्धको ले के संवाद जो वर्णित है, वह भी हुआ हो या अक्षरसः वह भी हो. लेकिन हम अशोककी और उसके कलिंगके युद्धकी ऐतिहासिकताको  नकार नहीं सकते. अशोकके पिताका नाम बहुतेरे पुस्तकोंमें बिंबिसार लिखा हुआ है. तो हम बिंबिसारकी ऐतिहासिकताको नकार नहीं सकते.

महाकाव्योंको अगर छोड दें, तो भी सभी पुराणोंमें रामका उल्लेख है. उसके पिता दशरथका भी उल्लेख है. दशरथके पिताका भी उल्लेख है. उतना भी नहीं पूरे वंशके राजाओंका उल्लेख है. और सभी पुराणोंमें समानरुपसे ही है. ये सब पुराण एक साथ नहीं लिखे गये हैं.पुराण सतत लिखते ही गये थे. अलग अलग जगह और अलग अलग समय पर लिखाते गये थे. कमसे कम ईसा पूर्व चौथे शतकसे ईसा की सातवीं सदी तक अनेकानेक पुराणोंमे लिखना चलता रहा था.

विश्वमें कई ग्रंथोमें ऐसा लिखना चलता रहा है.

सबसे पुराना पुराण वायु पुराण है.

वायु पुराण सबसे ज्यादा पुराना क्युं हैवैसे तो वायुपुराण के छः पाठ मिलते है. सर्वप्रथम पाठकी संस्कृतभाषा पुरी पूर्वपाणीनीकाल की है. बादमें उसमें कई प्रक्षेप होते गये और अध्याय बडे भी होते गये और बढते भी गये.इस पुराणमें बुद्ध भगवानका उल्लेख नहीं है. विष्णुके दशावतारकी बात है. लेकिन रामका नाम वे दश अवतारोंकी सूचीमें नहीं है. रामका एक पराक्रमी राजाके रुपमें उल्लेख है. रामके पिता दशरथका भी उल्लेख है. दशरथको भी पराक्रमी राजाके रुपमें उल्लेख है. पुरे सूर्यवंशके राजाओंकी नामावली है.

रामके बारेमें क्या लिखा है?

रामके बारेमें संक्षिप्तमें लिखा है. बलवान राजा दशरथके पुत्र रामने लंकाके रावणको हराया.

वैसे तो कृष्ण भगवानका भी उल्लेख है. कृष्णको तो विष्णुके अवतार तो माना ही है.

कृष्ण के बारेमें एक अध्यायका हिस्सा है.

लेखकने, श्यामंतक मणी जो खो गया था और कृष्णके उपर इस बातको लेकर जो आरोप लगा था और कृष्णने इस आरोपको कैसे दूर किया था इस  प्रसंगको वर्णित किया है.

एक पन्नेमें यह बताया है कि, वसुदेवके किन किन पुत्रोंको (पुत्रोंके नाम भी दिये है) कंसने मार डाले थे. और इसलिये कृष्ण के जन्मके पश्चात, वसुदेव इस कृष्णको अपने मित्र नंदके यहां छोड आते है. इसमें कोई चमत्कार वर्णित है कोई कारावासकी बात है, न कोई यमुनाके पूरकी कोई बात न और कोई लंबी बात है.

दुसरी विशेषता इसमें यह है कि, बलरामको विष्णुका अवतार बताया गया है.

तीसरी महत्वपूर्णबात यह है कि कई श्लोकोंमें ब्रह्मा विष्णु और रुद्र के बदले ब्रह्मा विष्णु और अग्नि ऐसा लिखा गया है. इसका प्रारंभ भी, महेश ईशान (रुद्र) की स्तूति से होता है.

वेदोमें अग्निका एक नाम ईशान भी है. महो देव (महः देवः अर्थात्महो देवो जैसे कि सो महो देवो मर्त्यां आविवेश) भी अग्निका नाम है. कहेनेआ तात्पर्य यह है कि अग्नि, रुद्र, और शिवकी एक रुपता वायुपुराणमें सिद्ध होती है.ऐसी कई बातें है जिससे वायु पुराणकी प्राचीनता सिद्ध होती है.(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे,

टेग्झः

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