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Posts Tagged ‘कश्मिर’

सुओ मोटो? काहेका सुओ मोटो?

हम लुट्येन गेंगोमेंसे एक हैअंग है

सुओ मोटो?

यह तो लुट्येन गेंगोंको सहाय करनेके लिये ही आरक्षित है

हम ही तो लुट्येन गेंगका अभीन्न भाग है

आप समज़ते क्यूँ नहीं हो?

हम फर्जी सेक्युलर पक्ष बनाते है, हम सरकारी नौकरीके लिये मरते है, यदि  कोई आतंकवादी मर गया तो हम उसके मानव हक्कके लिये संयुक्त राष्ट्र संघ और मानव अधिकार सुरक्षा संघ तक पहूँच  जाते है,

हमारी (हम्प्टी डम्प्टी प्रकारकी) परिभाषा

भारतके कश्मिरमें यदि ९५ प्रतिशत जनसंख्या वालोंको हम अल्पसंख्यक मानते है,

वहाँकी प्रतिशत जनसंख्या वाले समुदायको हम बहुसंख्यक मानते है,

हमने इन प्रतिशतकी हजारों औरतोंके उपर दुष्कर्म कियाहमने, इनकी हजारोंकी खुले आम हत्या कीहमने लाखोंको बेघर कियाहमारे कानोमें जू तक नहीं रेंगती, बकवास है सुओ मोटो

किन्तु हाँ, यदि हमसे प्रमाणित इन ९५ प्रतिशत जनसंख्या वाले कश्मिरमेंकोई शासक पक्ष, जनतंत्रकी स्थापना करें तो हमारे हरेकके कर्णयुग्म, श्वानोंकी तरह, उंचे हो जाते है. इतना ही नहीं हम एकसुरमें सहगान करके, मौका मिले या मिले, आपके शासकको काट भी लेतें है.

हमारे पास क्या कया नहीं है?

हमारे पास सब कुछ है,

हमारे पास बडे बडे वकील है,

हमारे पास भूमाफिया है,

हमारे पास ड्रग माफिया है,

हमारे पास गुन्डोंका जाल है,

हमारे पास, केवल मरनेका ठान कर, इस दुनियामें आने वाले, जिनको हमने शांति प्रिय, आनंद प्रिय, भ्रातृभाव के गुणोंसे लिप्तआदि जैसे अनेक गुणोंसे प्रमाणित किया है, वे है. ये लोग नीले रंगको प्यार करने वाला जन समूह है,

हमारे पास, केवल ध्येय प्राप्तिके लिये, मार मिटाने (किसीको भी मारकर मिटाने) वाले लाल रंगका, प्यारा जन समूह है,

हमारे पास केवल सत्ता और संपत्तिको पानेके लिये, चाहे देश रसाताल क्यों होय जाय, ऐसा ठानने वाले, जिनका सारा अंग  विषमय है, ऐसे वंशवादी पक्ष भी है,

हम हर प्रकारसे कोमवादसे लिप्त होते हुए भी है, हम अपनोंसे प्रमाणित धर्मनिरपेक्ष और लीबरल  है,

अरे हमारा सांस्कृतिक क्षेत्र,  केवल भारत ही नहीं पाकिस्तान  और चीन ही नहीं, युएसए और यु.के. तक विस्तरित है. आप हमें देशद्रोही (लुट्येन गेंगवाले), प्रतिशोधवादी, पूर्वग्रह वाले और भ्रष्ट माना करो, किन्तु हम, स्वयं प्रमाणित जनतंत्र वादी, मानवता वादी, उदारमतवादी है.

अरे आपको मालुम नहींहमे कोई फर्क नहीं पडता, चाहे  कोई सर्वोच्च न्यायालयका निवृत्त मुख्य न्यायाधीश हमें लुट्येनगेंग वाले कहें.  हमें क्या? हमें कोई फर्क नहीं पडता.

आदित्यनाथ  योगीजी महाराज, आप हमें कोई भी नामसे बुलाओ, चाहे न्यायालय ही क्यों नहीं?

अरे योगीजी, क्या आप युपीके संस्कारमें परिवर्तित करना चाहते हो?

अबे बच्चु, हमसे पंगा मत लो. युपीका संस्कार तो जो १९५०से हमारे कोंगीयों द्वारा और उनके सांस्कृतिक साथीयोंके द्वारा सुसर्जित है. हम वही रखने वाले है.

हम परिवर्तनमें मानते नहीं. हमजैसे थे वादीहै. हम बुर्ज़वा लोग है. लेकिन हम आपको ही बुर्ज़वा कहेंगे और मीडीया वाले भी ऐसा ही कहेंगे,

सुओ मोटो  …  ?

 यदि आपने दुष्कर्म करनेवालोंकी छवी मुख्य स्थानों पर प्रदर्शित की तो हम आपको पूछेंगे ही, कि नियम कहां है? क्यों कि हम तो केवल नियमसे ही चलते है. नियम नहीं तो कुछ भी नहीं.

हमें तो नियम चाहिये. हमें अधिक सोचनेकी आदत नहीं. हम दिमाग चलानेमें मानते नही. वकीलको किस लिये रक्खा है? यदि हम दिमाग चलायेंगे तो वकिल क्या करेगा?

हम समाचार पत्र नहीं पढते है, हम टीवी चेनल नहीं देखते हैं, हम कानून भी नहीं पढते है. ऐसा आपको कभी कभी लगता होगा. अरे हम तो अपने आप अपना निर्णय भी नहीं लिखते. या तो हमारा स्टेनो लिखता है, या तो कोई और लिखता है जिसका हमारे पर प्रच्छन्न दबाव है.. अरे हम तो कभी कभी सुओ मोटो भी किसीकी प्रच्छन्न अनुज्ञासे लेते है.

काहेका सुओ मोटो … ?

पालघरमेंशस्त्रसे सुसज्ज दर्जनें पूलिस थींपूलिस अधिकारी थेएन.सी.पी. का नेता थाफिर भी एक अफवाह के फर्जी नाम पर दो हिन्दु संतोकी हत्या की. जी हाँ हम लुट्येन गेंगके सदस्य कुछ भी कर सकते है. और खास तौर पर जब हमारा शासन होता तब तो अवश्य ही करते हैं.

हमारे प्रिय समुदायके एक जुथ ने (जिनको हमलव धाय नेबरवाला जुथ कहेते हैं) हिन्दुके दो संतोंको मार डाला जिनमें एक संत वयोवृद्ध था,

तो क्या हुआ?

उसके ड्राईवरको भी तो मारा है. ऐसी निर्मम हत्या करना हमारे लिये आम बात है. ड्राईवरको भी तो मारा है. उसका तो आप लोग कुछ बोलते नहीं है. हिन्दुओंके संतोको माराहिन्दुओंके संतोंको माराऐसा ही आप लोग बोला करते है. आप लोगोंको ड्राईवरको जो मारा, उसका तो केवल उल्लेख करके चूप हो जाते है. आप हिन्दु लोग असहिष्णु ही नहीं, संकूचित मानसिकता वाले भी है.

अरे भाई, न्यायालय इसमें क्या करें !! हम तो लुट्येन गेंगके वकीलकी प्रज्ञा पर निर्भर है. वह यदि हमारे हिसाबसे जोरदार तर्क करे तो हमे तो उपरोक्त अभियुक्तोंको जमानत देनी ही पडेगी ?

अरे वाह! आप कैसी बातें करते है?

आप हमसे प्रश्न करते हैं कियदि हमने ये जिनके उपर हत्याका मामला दर्ज है उनको जमानत दे दी तो अर्णव गोस्वामीके सहायकोंको क्यूँ जमानत नहीं दी?

अरे भैया, अर्णव गोस्वामीने क्या गुस्ताखी की थी मालुम है आपको?

अर्णव गोस्वामीके सहायक तो महाराष्ट्रके मुख्य मंत्रीके करनाल स्थित फार्महाउस पर गये थे. और उस फार्महाउसके चौकीदारसे प्रश्न कर रहे थे कि यह फार्म हाउस किसका है?

मुख्य मंत्रीके उपर तो शासनकी धूरा है. जनतंत्रकी परिभाषा आपको ज्ञात है या नहीं? जनतंत्रमें जनताके प्रतिनिधिके विशेष अधिकार होते है. और मुख्यमंत्री तो ठहेरा सरकारका उच्च पदधारी.

क्या अर्णव गोस्वामीके कोई जनतंत्र प्रतिनिधि हो ऐसा मित्र नहीं है? प्रश्न पूछना है तो विधानसभामें पूछो. चौकीदारसे प्रश्न पूछनेकी क्या आवश्यकता है? तुम लोगोंको जनतंत्र क्या होता है वह मालुम ही नहींअरे भैया …, अब तो फर्म हाउस किसका था वह पता चल गया मुख्य मंत्रीके फार्महाउस पर जाके चौकीदारसे प्रश्न करने वाले को जमानत कैसे मिल सकती है … !! क्या वह जनताका अपमान नहीं होगा …? जनताके प्रतिनिधिका और विधान सभामें बहुमत होनेवाली सरकारके मुखीयाका अपमान करना जनताका ही अपमान हैहम जनताको अपमानित करनेवालोंको जमानत कैसे देख सकते … ? बोलो बोलो … !! चूप क्यूँ हो गये ? … बडे आये है हमें शिखाने वाले … !!

अर्णव गोस्वामीको हमने दश मीनटमें ही विधान सभा समक्ष उपस्थित होनेका आदेश दे दिया … !! देखा हमारा कमाल … !

सुओ मोटोकाहेका सुओ मोटो … ?

हम तो असंभव करनेका भी आदेश देते है. देख लिया …!! जो बात इन्दिरा गांधीके दिमागके बसकी बात नहीं थी वह भी हमने करके दिखायीऔर वह भी बिना आपात्काल घोषित किये … ?

सुओ मोटो … ? काहेका सुओ मोटो … !!

अरे भैया अभी तो तुमने  हमारा जनतंत्रका प्यार और नियमोंके प्रति हमारी प्रतिबद्धता देखा नहींहम तो हजार हजार एफ.आई.आर., अर्णवके हजार हजार सहयोगीयों पर दर्ज करेंगेउनके दायें, बायें, उपर, नीचे स्थित पडौशीयोंसे ले कर, फोन करनेवालोंसे लेकर, फोन रीसीव करनेवालों तक, सबकी पूछताछ करेंगेअर्णव और उसके सहायकोंको  त्राही माम्त्राही माम्‌  बुलवा देंगे

सुओ मोटो … ? काहेका सुओ मोटो … !!

हम आखिरमें सरकार है. हमारी जनताके प्रति, प्रतिबद्धता होती हैसमज़े समज़े … !!

कंगना रणौत?

कंगना रणौतका हमने क्या किया  ? देख लिया … !!

जब यह कंगना, मुंबईसे बाहर थी तब ही हमने उसको, २४ घंटेकी नोटीस देदी कि जवाब देदो

(वैसे तो उसने हमारी पहेलेकी नोटीसका जवाब दे ही दिया थालेकिन हमारी सरकार तो सरकार है. सरकारमें तो पूरी की पूरी फाईले गुम हो जाती है, तो एक पत्र को गुम कर देना क्या बडी बात है!)

वह कंगनाबाई हमें जवाब दें,और वह न्यायालयमें जा के स्टे ओर्डर लावे, उससे पहेले ही हमने, यंत्र सरंजाम ला के, उसका मकान तोड दिया. हमने कह दिया कि उसके मकानमें अवैध निर्माण कार्य हुआ था और हो रहा था.

क्या हम जूठ बोलते हैहमने जो कहा वही सच है. यह बात तो न्यायालयको भी मानना पडेगा. क्यों कि राजपत्रित अधिकारीसे भी हम यही बात बुलवायेंगे. संविधानमें ही लिखा है कि राजपत्रित अधिकारी जो बोले वह सत्य माना जायेगा.

दाउदके मकान क्यूँ नहीं तोडे ऐसा आप के मनमें है ?

अरे वह तो हमारे मातोश्री, पितोश्री जैसे आकोश्री है.

वोरा कमीशनका रीपोर्ट मांगने की गुंजाईश है आपमें? आप तो बडे नादान है.

हम इस कंगना रणौत, जो महाराणी लक्ष्मीबाई बननेका घमंड रखती है उसको तो हम खुले आम कहेते है कि,

तुम्हे सुरक्षा काहेकी? तुम्हारीतो टांग और कमर तोड देंगे यदि मुंबईमें पैर रक्खा तो

हम मराठी हैमुंम्बई महाराष्ट्रमें हैमुंबईका अपमानमहाराष्ट्रका अपमान हैमहाराष्ट्रका अपमान शिवाजी महाराजका अपमान है

(शिवाजी महाराज एक ही तो बचे है हमारे पासहमारी केवल शिवाजी महाराजसे ही बनती है.)

सुओ मोटो ? काहेका सुओ मोटो …!!

अरे आपने देखा नहीं कि हमारे पुलिस आयुक्तसे हमने क्या क्या बुलवाया?

सुओ मोटो ? काहेका सुओ मोटो …!!

जब आम आदमी पक्षने दिल्लीमें खुले आम अफवाह फैलाई कि यु.पी. – बिहारके श्रमजीवीयोंके जानेके लिये बसें तयार है सब वहाँ इकट्ठा हो जाओ

वैसे ही शरदके पक्षके नेताने बांद्रा पश्चिमकी मस्जिदके पास यु.पी. – बिहारके श्रमजीवीयोंके जानेके लिये रेल्वे ट्रेन तयार है ऐसी अफवाहें फैलाई,

और प्रयंका वाड्राने यु.पी. – बिहारके श्रमजीवीयोंके जानेके लिये १०० बसें तयार है ऐसी अफवाह फैलाई,

दिल्लीमें नीजामुद्दीन मर्कज़में विदेशी मुस्लिम धर्मगुरुओंने अधिवेशन बुलाया और खुले आम कहा कि कोरोना मुस्लिमोंका कुछ बिगाडने वाला नहीं है, वह तो खुदाकी देन है काफिरोंको मारनेकी

और इस प्रकार, भारत देशमें खुले आम हमने कोरोनाको फैलाया और देशके विकासशील अर्थतंत्रको पटरी परसे उतार दिया ……

सुओ मोटो ? काहेका सुओ मोटो …!!

शिरीष मोहनलाल दवे

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कहीं भी, कुछ भी कहेनेकी सातत्यपूर्ण स्वतंत्रता? (भाग-१)

कहीं भी, कुछ भी कहेनेकी सातत्यपूर्ण स्वतंत्रता? (भाग-१)

“स्वतंत्रता” शब्द पर अत्याचार

paise pe paisa

हमारा काम केवल प्रदर्शन करना है चर्चा नहीं

हमें चाहिये आज़ादी केवल प्रदर्शन के लिये 

कोंगी तो कोमवादी और उन्मादी (पागल) है. साम्यवादीयोंकी तो १९४२से ऐसी परिस्थिति है. किन्तु इन दोनोंमें भेद यह है कि साम्यवादी लोग तो १९४२के पहेलेसे उन्मादी है. उनके कोई सिद्धांत नहीं होते है. वे तो अपनी चूनावी कार्यप्रणालीमें प्रकट रुपसे कहेते है कि यदि आप सत्तामें नहीं है, तो  जनताको विभाजित करो, अराजकता पैदा करो, लोगोंमें  भ्रामक प्रचार द्वारा भ्रम फैलाओ, उनको असंजसमें डालो, और जनतंत्रके नाम पर जनतंत्रके संविधानके प्रावधानोंका भरपूर लाभ लो और तर्कको स्पर्ष तक मत करो. यदि आप सत्तामें है तो असंबद्ध और फर्जी मुद्दे उठाके जनतामें  अत्यधिक ट्रोल करो और  स्वयंने किये हुए निर्णय कितने महत्त्वके है वह जनताको दिखाके भ्रम फैलाओ. पारदर्शिता तो साम्यवादीयोंके लहुमें नहीं है. उनकी दुनियानें तो सब कुछ “नेशनल सीक्रेट” बन जाता है. समाचार माध्यमोंको तो साम्यवादी सरकार भेद और दंडसे अपने नियंत्रणमें रखती है. “भयादोहन (ब्लेक मेल)” करना और वह भी विवादास्पद बातोंको हवा देना आम बात है.

उन्नीसवी शताब्दीके उत्तरार्धमें और बीसवीं शातब्दीके पूर्वार्धमें युवावर्गमें “समाजवादी होना” फैशन था. युवा वर्गको अति आसानीसे पथभ्रष्ट किया जा सकता है. उनके शौक, आदतें बदली जा सकती है. उनको आसानीसे  प्रलोभित किया जा सकता है.

युवा वर्ग आसानीसे मोडा जा सकता है

आज आप देख रहे है कि सारी दुनियाके युवावर्गने दाढी रखना चालु कर दिया है. (वैसे तो नरेन्द्र मोदी भी दाढी रखते है. किन्तु वे तो ४० वर्ष पूर्वसे ही दाढी रखते है). बीस सालसे नरेन्द्र मोदी प्रख्यात है. किन्तु युवावर्गने दाढी रखनेकी फैशन तो दो वर्षसे चालु की है. और दाढीकी फैशन महामारीसे भी अधिक त्वरासे  फैल गयी है. सारे विश्वके युवा वर्ग दाढीकी फैशनके दास बन गये है. यही बात प्रदर्शित करती है कि युवा वर्ग कितनी त्वरासे फैशनका दासत्व स्विकार कर लेता है.

उसको लगता है कि वे यदि फैशनकी दासताका स्विकार नहीं करेगा तो वह अस्विकृतिके संकटमें पड जाएगा. ऐसी मानसिकताको “क्राईसीस ऑफ आडेन्टीफीकेशन” कहा जाता है.

छोडो यह बात. इनकी चर्चा हम किसी और समय करेंगे.

हमारे नहेरुजी भी समाजवाद (साम्यवाद)के समर्थक थे और साम्यवादीयोंके भक्त थे.

नहेरु न तो महात्मा गांधीके सर्वोदय-वादको समज़ पानेमें सक्षम थे न तो वे अपना समाजवाद महात्मा गांधीको समज़ानेके लिये सक्षम थे. गांधीजीने स्वयं इस विषयमें कहा था कि उनको जवाहरका समाजवाद समज़में नहीं आता है. नहेरु वास्तवमें अनिर्णायकता के कैदी  थे. जब प्रज्ञा सक्षम नहीं होती है, स्वार्थ अधिक होता है तो व्यक्ति तर्कसे दूर रहेता है. वह केवल अपना निराधार तारतम्य ही बताता है. नहेरु कोई निर्णय नहीं कर सकते थे क्यों कि उनकी विवेकशीलतासे कठोर समस्याको समज़ना उनके लिये प्राथमिकता नहीं थी. इस लिये वे पूर्वदर्शी नहीं थे. निर्णायकतासे अनेक समस्याएं उत्पन्न होती है. कोई भी एक समस्यामें जब प्रलंबित अनिर्णायकता रहती है तब उसको दूर करना असंभवसा बन जाता है.

नहेरुकी अनिर्णायक्तासे कितनी समस्या पैदा हूई?

कश्मिर, अनुच्छेद ३७०/३५ए को हंगामी के नाम पर संविधानमें असंविधानिक रीतिसे समावेश करना और फिर “हंगामी”शब्द को दूर भी नहीं करना और इसके विरुद्ध का काम भी नहीं करना, यह स्थिति नहेरुकी  घोर अनिर्णायकताका उदाहरण है. कश्मिरमें जनतंत्रको लागु करनेका काम ही नहीं करना, यह कैसी विडंबना थी? नहेरुने इस समस्याको सुलज़ाया ही नही.

अनुच्छेद ३७० कश्मिरको (जम्मु कश्मिर राज्यको) विशेष स्थिति देता है. किन्तु कश्मिरकी वह विशिष्ठ स्थिति क्या जनतंत्र के अनुरुप है?

नहीं जी. इस विशिष्ठ स्थिति जनतंत्रसे सर्वथा विपरित है. अनुछेद ३७० और ३५ए को मिलाके देखा जाय तो यह स्थिति जन तंत्रके मानवीय अधिकारोंका सातत्यपूर्वक हनन है. १९४४में ४४०००+ दलित  कुटुंबोको सफाई कामके लिये उत्तर-पश्चिम भारतसे बुलाया गया था. १९४७से पहेले तो कश्मिरमें जनतंत्र था ही नहीं. १९४७के बाद इस जत्थेको राज्यकी  नागरिकता न मिली. उतना ही नहीं उसकी पहेचान उसके धर्म और वर्णसे ही की जाने लगी. तात्पर्य यह है कि वे दलित (अछूत) ही माने जाने लगे. और उसका काम सिर्फ सफाई करनेका ही माना गया. क्यों कि वे हिन्दु थे. और तथा कथित हिन्दु प्रणालीके अनुसार उनका काम सिर्फ सफाई करना ही था. वैसे तो गांधीजीने इनका लगातार विरोध किया था और उनके पहेले कई संतोंने किसीको दलित नहीं माननेकी विचारधाराको पुरष्कृत किया था. ब्रीटीश इन्डियामें भी दलितको पूरे मानवीय अधिकार थे. लेकिन कश्मिरमें और वह भी स्वतंत्रत भारतके कश्मिरमें उनको जनतंत्रके संविधानके आधार पर दलित माने गये. यदि वह दलित कितना ही पढ ले और कोई भी डीग्री प्राप्त करले तो भी वह भारत और कश्मिरके जनतंत्रके संविधानके आधार पर वह दलित ही रहेगा, वह सफाईके अलावा कोई भी व्यवसायके लिये योग्य नहीं माना जाएगा. इन दलितोंकी संतान चाहे वह कश्मिरमें ही जन्मी क्यों न हो, उनको काश्मिरकी नागरिकतासे, जनतंत्रके संविधानके आधार पर ही सदाकालके लिये  वंचित ही रक्खा जायेगा.

क्या जनतंत्रका संविधान अपनी ही प्रजाके एक विभागको अन्यसे भीन्न समज़ सकता है?

क्या जनतंत्रका संविधान अपनी ही प्रजाके एक विभागको वंशवादी पहेचान दे सकता है?

क्या जनतंत्रका संविधान अपनी ही प्रजाके एक विभागके उपर उनकी जाति ठोप सकता है?

क्या जनतंत्रका संविधान अपनी ही प्रजाके एक विभागके उपर केवल उन विभागके लिये ही भीन्न और अन्यायकारी प्रावधान रख सकता है?

क्या जनतंत्रका संविधान अपनी ही प्रजाके एक विभागके लोगोंको और उनकी संतानोंको मताधिकार से वंचित रख सकता है.

यदि आप जनतंत्रके समर्थक है और आप “तड और फड” (बेबाक और बिना डरे) बोलने वाले है  तो आप क्या कहेंगे?

क्या आप यह कहेंगे कि कश्मिरमें अनुच्छेद ३७०/३५ए हटानेसे कश्मिर में जनतंत्र पर आघात्‌ हुआ है?

यदि कोई विदेशी संस्था भी भारत द्वारा कश्मिरमें “अनुच्छेद ३७०/३५ए” की हटानेकी बातको “जनतंत्र पर आघात” मानती है तो आप उस विदेशी संस्थाके लिये क्या कहोगे?

चाहे आप व्याक्यार्ध (वृद्धावस्था)से पीडित हो, तो क्या हुआ? यदि आप युवावस्थाकी छटपटाहतसे लिप्त हो, तो क्या हुआ? जनतंत्रके सिद्धांत तो आपके लिये बदलनेवाले नहीं है.

यदि आप जनतंत्रवादी है, तो आप अवश्य कहेंगे कि भारतने जो अनुच्छेद ३७०/३५ए हटानेका काम किया है वह जनतंत्रकी सही भावनाको पुरष्कृत करता है और कश्मिरमें वास्तविक जनतंत्रकी स्थापना करता है. काश्मिरको गांधीजीके जनतंत्रके सिद्धांतोंसे  समीप ले जाता है. नहेरुकी प्रलंबित रक्खी समस्याका निःरसन करता है. भारतके जनतंत्र के उपर लगी कालिमाको दूर करता है. जो भी व्यक्ति जनतंत्रके ह्रार्दसे ज्ञात है, वह ऐसा ही कहेगा.

यदि वह इससे विपरित कहेता है, तो वह या तो अनपढ है, या तो उसका हेतु (एजन्डा) ही केवल स्वकेद्री राजकारण है या तो वह मूढ या घमंडी है. उसके लिये इनके अतिरिक्त कोई विशेषणीय विकल्प नहीं है.

दीर्घसूत्री विनश्यति (प्रलंबित अनिर्णायकता विनाश है)

लेकिन कुछ लोग पाकिस्तानकी भाषा बोलते है. इनमें समाचार माध्यम भी संमिलित है. कश्मिर समस्या के विषयमें यु.नो.को घसीटनेकी आवश्यकता नहीं. यु.नो.को जो करना था वह कर दिया. उस समय जो उसके कार्यक्षेत्रमें आता था वह कर दिया. युनोका तो पारित प्रस्ताव था कि, पाकिस्तान काश्मिरके देशी राज्यके अपने कब्जेवाला हिस्सा खाली करें और भारतके हवाले कर दें. उस हिस्सेमें कोई सेनाकी गतिविधि न करें … तब भारत उसमें जनमत संग्रह करें. पाकिस्तानने कुछ किया नहीं. नहेरुने पाकिस्तानके उपर दबाव भी डाला नहीं. भारत सरकारने भारत अधिकृत काश्मिरके साथ जो अन्य देशी राज्योंके साथ किया था वही किया. केवल पाकिस्तान अधिकृत कश्मिरका हिस्सा छूट गया. नहेरुने इस समस्याको अपनी आदतके अनुसार प्रलंबित  रक्खा. आज हो रहे “हल्ला गुल्ला” की जड, नहेरुकी दीर्घसूत्री कार्यशैली है.

पाकिस्तानका जन्मः

पाकिस्तान का जन्म बहुमत मुस्लिम क्षेत्रके आधार पर हुआ वह अर्ध-सत्य है. जो मुस्लिम मानते थे कि वे बहुमत हिन्दु धर्म वाली जनताके शासनमें अपने हित की रक्षा नहीं कर सकते, उनके लिये बहुमत मुस्लिम समुदायवाले क्षेत्रका पाकिस्तान बनाया जाय. इन क्षेत्रोंको भारतसे अलग किया. जो मुस्लिम लोग उपरोक्त मान्यतावाले थे, वे वहां यानी कि पाकिस्तान चले गये. जो ऐसा नहीं मानते थे, वे भारतमें रहे. पाकिस्तानमें रहेनेवाले बीन-मुस्लिमोंको भारत आने की छूट थी. १९५० तक देशकी सीमाको स्थानांतरके लिये खुला छोड दिया था.

पाकिस्तानमें बीन-मुस्लिम जनताका उत्पीडन १९४७ और १९५०के बाद भी चालु रहा. इसके अतिरिक्त भी कई समस्यायें थी. गांधीजीने कहा था कि हम किसीको भी अपना देश छोडनेके लिये बाध्य नहीं कर सकते. पाकिस्तानमें जो अल्पसंख्यक रह रहे है उनकी सुरक्षाका उत्तरदायित्व पाकिस्तानकी सरकारका है. यदि पाकिस्तान की सरकार विफल रही तो, भारत उसके उपर चढाई करेगा.

नहेरु – लियाकत अली करार नामा

इसके अनुसार १९५४में दोनो देशोंके बीच एक समज़ौताका दस्तावेज बना. जिनमें दोनों देशोंने अपने देशमें रह रहे अल्पसंख्यकोके हित की सुरक्षाके लिये प्रतिबद्धता जतायी. 

नहेरुने लियाकत अलीसे पाकिस्तानसे पाकिस्तानवासी हिन्दुओंकी सुरक्षाके लिये सहमति का (अनुबंध) करारनामा किया.

किन्तु तत्‌ पश्चात्‌ नहेरुने उस अनुबंधका पालन होता है या नहीं इस बातको उपेक्षित किया. पाकिस्तान द्वारा पालन न होने पर भी पाकिस्तानके उपर आगेकी कार्यवाही नहीं की, और न तो नहेरुने इसके उपर जाँच करनेकी कोई प्रणाली बनाई.

नहेरु-लियाकत अली करारनामा के अनुसंधानमें सी.ए.ए. की आवश्यकताको देखना, तर्क बद्ध है और अत्यंत आवश्यक भी है.

नहेरुने अपनी आदत के अनुसार पाकिस्तानसे प्रताडित हिन्दुओंकी सुरक्षाको सोचा तक नहीं. जैसे कि कश्मिर देशी राज्य पर पाकिस्तानके आक्रमणके विरुद्ध यु.नो. मे प्रस्ताव पास करवा दिया. बस अब सब कुछ हो गया. अब कुछ भी करना आवश्यक नहीं. वैसे ही लियाकत अलीसे साथ समज़ौताका करारनामा हो गया. तो समज़ लो समस्या सुलज़ गयी. अब कुछ करना धरना नहीं है.   

भारतदेश  इन्डो-चायना युद्धमें ९२००० चोरसमील भूमि हार गया. तो कर लो एक प्रतिज्ञा संसदके समक्ष. नहेरुने लेली एक प्रतिज्ञा कि जब तक हम खोई हुई भूमि वापस नहीं लेंगे तब तक चैनसे बैठेंगे नहीं. संसद समक्ष प्रतिज्ञा लेली, तो मानो भूमि भी वापस कर ली.

इन्दिरा घांडी भी नहेरुसे कम नहीं थी.

इन्दिराने भी १९७१के युद्ध के पूर्व आये  एक करोड बंग्लादेशी निर्वासितोंकों वापस भेजनेकी प्रतिज्ञा ली थी, इस प्रतिज्ञाके बाद इन्दिराने इस दिशामें कोई प्रयास किया नहीं. और इस कारण और भी घुसपैठ आते रहे. समस्याओंको  प्रलंबित करके समस्याओंको बडा और गंभीर होने दिया. यहाँ तककी उसके बेटे राजिवने १९८४में एक संविदा पर प्रतिज्ञा ली के देश इन घुसपैठीयोंको कैसे सुनिश्चित करेगा. पर इसके उपर कुछ भी कार्यवाही न की. १९८९-९०में कश्मिरमें कश्मिरस्थ मुस्लिमों द्वारा, हजारों हिन्दुओंका संहार होने दिया, हजारों हिन्दु  स्त्रीयोंका शील भंग होने दिया,  लाखों हिन्दुओं को खूल्ले आम, कहा गया कि इस्लाम अंगीकार करो या मौतके लिये तयार रहो या घर छोड कर भाग जाओ. इस प्रकार उनको बेघर कर होने दिया. इसके उपर न तो जांच बैठाई, न तो किसीको गिरफ्तार किया, न तो किसीको कारावासमें भेजा.

इतने प्रताडनके बाद भी किसी भी हिन्दुने हथियार नहीं उठाया, न तो एक अरब हिन्दुओंमेंसे कोई आतंक वादी बना.

तो कोंगीयोंने क्या किया?

कोंगीयोंने इस बात पर मुस्लिमोंकी आतंक वादी घटनाओंको “हिन्दु आतंकवाद” की पहेचान देनेकी भरपुर कोशिस की. जूठ बोलनेकी भी सीमा होती है. किन्तु साम्यवादीयोंके लिये और उन्ही के संस्कारवाले कोंगीयोंके लिये जूठकी कोई सीमा नहीं होती.

सी.ए.ए. के विरोधमें आंदोलनः

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

अनुसंधान (गुजराती लेख)

https://treenetram.wordpress.com/2017/02/05/સુજ્ઞ-લોકોની-કાશ્મિર-વિષ/

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दायें पप्पु, बांये पप्पु, आगे पप्पु, पीछे पप्पु बोले कितने पप्पु?

दायें पप्पु, बांये पप्पु, आगे पप्पु, पीछे पप्पु बोले कितने पप्पु?

पप्पु पप्पु और पप्पु

पप्पुयुगका पिता वैसे तो मोतीलाल नहेरु है, लेकिन उनको तो शायद मालुम ही नहीं होगा कि वे एक नये पप्पु-युगकी नींव रख रहे है.

पहेला पप्प कौन?

आदि पप्पु यानी कि रा.गा. (राहुल गांधी) ही है किन्तु पप्पु युगका निर्माण तो नहेरुने ही किया. नहेरु ही प्रथम पप्पु है. यानी कि पप्पु-वंश तो नहेरुसे ही प्रारंभ हुआ.

क्या नहेरु पप्पु थे?

सोच लो. यदि आपने किसीको अमुक काम करनेसे मना किया. और इतिहासका हवाला भी दिया. भयस्थान भी बताये. फिर भी यदि आप वो काम करते हो तो लोग आपको पप्पु नहीं कहेंगे तो क्या कहेंगे.

(१) जी हाँ, नहेरुने ऐसा ही किया था. सप्टेंबर १९४९में तिबट पर चीन ने आक्रमण किया, तो नहेरुने सरदार पटेलके पटेलके संकेत और चेतावनी को नकारा और कहा कि चीनने उसको आश्वासन दिया है कि वह तिबटके साथ शांतिसे नीपटेगा. यह तो कहेता बी दिवाना और सूनता भी दिवाना जैसी बात थी.  और १९५१ आते आते चीनने तिबट पर कबजा कर दिया. इस अनादर पर भी नहेरुने दुर्लक्ष्य दिया. और चीनसे घनिष्ठ मैत्री संबंध (पंचशील) का  अनुबंध किया.

(२) तिबटको अब छोडो. पंचशीलके बाद भी चीनकी सेनाका अतिक्रमण प्रारंभ हो गया और जब वह बार बार होने लगा तो संसदमें प्रश्न भी उठे. नहेरुने संसदमें जूठ बोला. आचार्य क्रिपलानीने इसके उपर ठीक ठीक लिखा है.

(३) चीनकी घुस खोरीको अब छोडो. १९४७में नहेरुको गांधीजीने बताया कि शेख अब्दुल्ला पर सरदार पटेल विश्वास करते नहीं है. और लियाकत अली कश्मिरके राजाको स्वतंत्र रहेनेको समज़ा रहे है. काश्मिर न तो पाकिस्तानमें जा सकता है, न तो वह स्वतंत्र रह सकता है. काश्मिरको तो भारतके साथ ही रहेना चाहिये. लेकिन नहेरुने महात्मा गांधीकी बात न मानी और शेख अब्दुल्ला पर विश्वास किया.

(४) नहेरु इतने आपखुद थे कि राजाओंकी तरह उनके उपर कोई नियम या सिद्धांत चलता नहीं था. एक तरफ वे लोकशाहीका गुणगान करते थे और दुसरी तरफ उन्होंने शेख अब्दुलाको खुश करनेके लिये बिनलोकशाहीवादी अनुच्छेद ३७०/३५ए अ-जनतांत्रिक तरीकेसे संविधानमें सामेल किया. अस्थायी होते हुए भी जब तक वे जिन्दा रहे तब तक उसको छेडा नहीं, और १९४४से कश्मिरमें स्थायी हुए हिन्दुओंको ज्ञातिके आधार पर और मुस्लिम स्त्रीयोंको लिंगको आधार बनाके मानवीय और जनतांत्रिक अधिकारोंसे वंचित रक्खा.

इसको आप पप्पु नहीं कहोगे तो क्या कहोगे?

क्या इन्दिरा गांधी पप्पु थी?

१९७१की इन्डो-पाक युद्धमें भारतकी विजयका श्रेय इन्दिराको दिया जाता है. यह एक लंबी चर्चाका विषय है. किन्तु जरा ये परिस्थिति पर सोचो कि पाकिस्तान किस परिस्थितिमें युद्ध कर रहा था और बंग्लादेशकी मुक्ति-वाहिनी (जिसको भारतकी सहाय थी) किस परिस्थितिमें युद्ध कर रही थीं. भारतीय सेनाको यह युद्ध जीतना ही था उसके अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं था. और सेनाने तो अपना धर्म श्रेष्ठता पूर्वक निभाया.

किन्तु इन्दिरा यदि पप्पु नहीं थी तो उसने अपना धर्म निभाया? नहीं जी. जरा भी नहीं. जो परिस्थिति उस समय पाकिस्तानकी थी और जो परिस्थिति भारतकी थी, यदि इन्दिरामें थोडी भी अक्ल होती तो वह कमसे कम पाकिस्तान अधिकृत कश्मिर तो वह ले ही सकती थी. यदि ऐसा किया होता तो भारतने जो अन्य जीती हुई पाकिस्तानकी भूमि, और पाकिस्तानी युद्धकैदीयोंको परत किया उसको क्षम्य मान सकते थे. पाकिस्तानके उपर पेनल्टी नहीं लगायी, खर्चा वसुल नहीं किया उसको भी लोग भूल जाते.

बंग्लादेशमें ३० लाख हिन्दुओंकी कत्ल किसने छूपाया?

बंग्लादेशके अंदर पाकिस्तानकी सेनाने  ४०लाख लोगोंकी हत्या की थी इनमें ३० लाख हिन्दु थे १० लाख मुस्लिम थे. इन्दिरा गांधी जब भूट्टोके साथ सिमलामें बैठी थी तब क्या उसको इस तथ्य ज्ञात नहीं था? वास्तवमें उसको सबकुछ मालुम था. तो भी उसने न तो बंग्लादेशके साथ कोई भारतके श्रेय में कोई अनुबंध (एग्रीमेन्ट) किया न तो पाकिस्तानके साथ कोई भारतीय हितमें कोई अनुबंध किया. इतना ही नहीं, एक करोड निर्वाश्रित जो भारतमें आ गये थे उनको वापस भेजनेके बारेमें प्रावधानवाला कोई भी अनुबंध किसीके साथ नहीं किया.

उस समय आतंकवाद भारतमें तो नहीं था. भारतके बाहर तो था ही. प्रधानमंत्री होनेके नाते और “भारतीय गुप्तचर सेवा” के आधार पर भारतके बाहर तो अति उग्रतावाली आतंकी गतिविधियां  अस्तित्वमें थीं ही. वे प्रवृत्तियां कहाँ कहाँ अपना विस्तार बढा सकती है वह भी प्रधानमंत्रीको अपने बुद्धिमान परामर्शदाताओंसे (एड्वाईज़रोंसे)   मिलती ही रहेती है. यह तो आम बात है. किन्तु इन्दिराने भारतके हितकी उपेक्षा करके भूट्टो की यह बात मान ली “यदि मैं पाकिस्तान अधिकृत काश्मिरकी समस्या आपके साथ हल कर दूं और तत्‌ पश्चात्‍ मेरी यदि हत्या हो जाय तो उस डील का क्या मतलब.” फिर इन्दिराने “इस मसलेको आपसमें वार्ता द्वारा ही हल करना” ऐसा अनुबंध मान लिया. इसका भी क्या लाभ हुआ. पाकिस्तानने आतंकीओ द्वारा और कई समस्याएं उत्पन्न की. सिमला अनुबंधन तो पप्पु ही मान्य कर सकता है.  

 राजिव गांधी ने पीएम पदका स्विकार करके, श्री लंकाके आंतरिक हस्तक्षेप करके और शाहबानो न्यायिक निर्णयको निरस्त्र किया यह बात ही उसका पप्पुत्त्व सिद्ध किया.

सोनिया, राहुल और प्रियंका का पप्पुत्त्व सिद्ध करनेकी आवश्यकता नहीं.

यह पप्पुत्त्वकी महामारी ममता, मुलायम, लालु, शरद पवार … आदि कोंगीके सहयोगी पक्षोमें ही नहीं लेकिन बीजेपीके सहयोगी शिवसेनामें भी फैली है.

शिवसेनाका पप्पुत्व तो शिवसेना अपने सहयोगी बीजेपी के विरुद्ध निवेदन करके सिद्ध करता ही रहेता है.

उद्धव ठाकरेका क्या योगदान है? भारतके हितमें उसमें क्या किया है? यह उद्धव ठाकरे अपने फरजंद आदित्यको आगे करता है. आदित्यका क्या योगदान है? उसका अनुभव क्या है? क्या किसीने कहा भी है कि वह आदित्य के कारण चूनाव जीता है? शिवसेना स्वयं अपने कुकर्मोंके कारण मरणासन्न है किन्तु वह भी कोंगीकी तरह पगला गया है. चूनावमें शिवसेनाकी सफलता  अधिकतम ४५ प्रतिशत है. जब की बीजेपीकी सफलता ६५ प्रतिशत है.

“५०:५०” का रहस्य क्या है?

५० % मंत्री पद बीजेपीके पास और ५०% मंत्री पद शिवसेनाके पास रहेगा यदि दोनोंको समान बैठक मिली. किन्तु शिवसेनाको तो बीजेपीसे आधी से भी कम बैठकें मिली. और फिर भी उसको चाहिये मुख्य मंत्रीपद. यह तो “कहेता भी दिवाना और सूनता भी दिवाना” जैसी बात हुई. गठ बंधनको जो घाटा हुआ उसमें शिवसेना जीम्मेवार है. उसका हक्क तो १/३ मंत्री पद पर भी नहीं बनता है.

शिवसेना के विरुद्ध क्या क्या मुद्दे जाते है.

शिवसेनाका साफल्य केवल ४० प्रतिशत है. मतलब वह तृतीय कक्षामें पास हुआ है.

बीजेपीका साफल्य ६५% है. मतलब विशिष्ठ योग्यताके समकक्ष है.

बीजेपी उसको ५० प्रतिशत मंत्रीपद देनेको तयार है. लेकिन शिवसेना को तो इसके अतिरिक्त मुख्यमंत्री पद भी चाहिये.

मतलब की तृतीय कक्षामें पास होनेवाला आचार्य बनना चाहता है.

इतना ही नहीं किन्तु शिवसेना अपने पक्षके वंशवादी प्रमुखकी संतान को आचार्य बनाना चाह्ता है.

पप्पुके आगे पप्पु, पप्पुके पीछे पप्पु बोले कितने   पप्पु?

पप्पुको डीरेक्ट हिरो बना दो

क्या किया जाय?

शिवसेना के आदित्य को मुख्य मंत्री के बनानेके लिये = शिवसेना+कोंगी+एनसीपी

शिवसैनी पप्पुको पप्पुकी कोंगीका और शरदकी कोंगीका सहयोग लेके मुख्य मंत्री और सरकार बनाने दो. शिवसैनी पप्पुको भी पता चल जायेगा कितनी बार वीस मिलानेसे एक सौ बनता है (गुजरातीमें मूँहावरा है “केटला वीसे सो थाय” तेनी खबर पडशे.)

शिरीष मोहनलाल दवे

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बीजेपी विरोधीयोंकी समस्या क्या है?

बीजेपी विरोधीयोंकी समस्या क्या है?

“प्रशस्ति पत्रोंकी वापसी, इसमें हम नहीं, मैं शर्मींदा हूँ, भारतके मुस्लिम सुरक्षित नहीं, अखलाक, पत्रकारकी हत्याएं, दलितों पर अत्याचार, व्यर्थ विमुद्रीकरणके कारण कई मृत्यु और आम आदमीको परेशानी, जीएसटी एक गब्बरसींग टेक्ष, राफेल डील, उद्योगकर्ताओंको खेरात, सुशील मोदी, माल्या आदिको अति अधिक ॠण देकर देशसे भगा देना, सरकारी बेंकोका एनपीएन उत्पन्न करना, मी टू, काश्मिरमें अशांति पैदा करना आदि ये सब मोदी सरकार द्वारा बनी समस्याएं हैं.” ऐसा सिद्ध कैसे किया जाय? यह बीजेपी विरोधीयोंकी समस्या है.

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(मुझे मितु मितु करके मत बुलाओ. मुझे  मिताली कहो)

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ऐसी कई बातोंको नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षने अपने पालतु कटार लेखकों द्वारा, एंकरों द्वारा, महानुभावो द्वारा हवा देके मोदी सरकारके विरुद्ध हवा बनानेका भरपूर प्रयत्न किया है ताकि जनताको यह संदेश मिले कि, नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्ष, जब शासनमें था तब तो देश खुशहाल था और देशमें शांति ही शांति थी.

सत्य क्या था?

किन्तु हम सब जानते हैं कि नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके शासन वास्तवमें कैसा था. विकासको तो रोकके ही रक्खा था और वही योजनाएं होती थीं और वे भी अति देरीसे, जिनमें नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके सर्वोच्च नेताओंके साथ अंडर टेबल डील हो सकता था. इन बातोंके तो कई उदाहरण है.

“विकास पागल है” नहेरु-इन्दिरा गांधी वंशी कोंग्रेसका सूत्र !!

बीजेपीके सत्तामें आनेके बाद, आम जनताको तो अब पता है कि विकास क्या है. लेकिन नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके नेताओंने विकासको पागल बताके विकासके विरुद्ध बोलना आरंभ कर दिया था.

नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके नेताओंको पता चल गया है कि विकासके विरुद्ध प्रचार करने से उनकी दाल गलने वाली नहीं है. इसलिये उन्होंने अपने पालतु समाचार माध्यमके तथा कथित विद्वानोंसे “गठ बंधन” जो नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके नेतागण, उनके सांस्कृतिक साथी पक्षोंके साथ करनेवाले हैं उसका गुणगान करना प्रारंभ कर दिया है. भूतकाल में “गठ बंधनवाली” सरकारोंने अच्छा काम किया था इस बातको मनवाने के लिये उनके शौर्यगीत सूनाना चालु कर दिया है.

“शेखर गुप्ता” एक तथा कथित मूर्धन्य कोलमीस्ट है. सोनेमें सुहागा यह है कि वे “ध प्रीन्ट” के मुख्य तंत्री भी है. लगता है उनको नरसिंह रावका [ जो नहेरुवीयन-{इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके एक अनहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)}  प्रधान मंत्री थे ]  कार्यकाल पसंद होगा. उस समय मनमोहन सिंह वित्तमंत्री थे. इस लिये नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्ष पुरस्कृत युपीएकी अर्थ नीति पसंद हो सकती है. शेखर गुप्ताजीने एक पुस्तक “ईन्डिया रीडीफाईन्स इट्स रोल” लिखा है. वैसे तो कई लोग तत्कालिन वित्त मंत्री को (मनमोहनको) उस समयकी अर्थनीतिके कारण श्रेय देते हैं. वैसे तो नरसिंह रावके वित्तसलाहकार सुब्रह्मनीयम थे और विश्वबंधु गुप्ता जो तत्कालिन आयकर विभागके महान आयुक्त थे उन्होने मनमोहन सिंहके अभिगम और उनकी मान्यताओंके विरुद्ध स्वानुभवके विषय पर काफि कुछ लिखा है. इन बातोंकी चर्चा हम नहीं करेंगे. हम इस समय हमारे उपरोक्त कटारीया भाई (शेखर गुप्ताजी) जो नरेन्द्र मोदीकी अर्थनीतिकी उपलब्धियोंको निरर्थक बताने पर तूट पडे है, और नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षकी यानी कि “गठबंधन वाली” सरकारोंने कैसा अच्छा काम किया था वह सिद्ध करनेके लिये अपना दिमाग तोड रहे हैं, उनकी बाते करेंगे.

नरेन्द्र मोदी हमेशा पूर्ण बहुमत वाली सरकारको लानेका जनताको अनुरोध करते है. वे यह भी कहेते है कि पूर्ण बहुमत होनेके कारण उनकी सरकारकी उपलब्धियां अभूतपूर्व है. गठबंधनकी सरकारें अस्थिर होती हैं और उनकी उपलब्धियाँ पारस्परिक विरोधाभासोंके कारण देशके विकास पर ऋणात्मक असर पडता है.

कटारीयाजी का साध्यः “गठबंधनवाली सरकार श्रेय है” उससे डरना नहीं.

अब हमारे कटारीया भाईका एजन्डा है कि नरेन्द्र मोदीके इस तर्कका खंडन कैसे किया जाय?

किसी भी सत्यका खंडन करना हो तो सर्व प्रथम तो जो सत्य है उसको छोडकर, दुसरे विषय पर विवरण तयार कर देना चाहिये. तत्‍ पश्चात्‍, जो सत्य है उस सत्यको उलज़ा दो. यानी कि जिस समस्याको सुलज़ानेका बीडा जिस व्यक्तिको दिया था उसको पार्श्व भूमिमें रख दो और उसके स्थान पर पूर्व निश्चित और आप जिस व्यक्तिको या समूहको रखना चाह्ते हो उस/उन को रख दो. फिर श्रेय   उस/उन को दे दो.

सियासतमें ऐसा तो बार बार होता है.

जैसे कि दूरसंचार प्रणालीको सुधारनेका बुनियादी ढांचा (ईन्फ्रास्ट्रक्चर)का काम तो बहुगुणाने किया था. लेकिन बहुगुणा उसका श्रेय स्वयं ले रहे थे तो इन्दिरा गांधीने उनको हटा दिया और पक्षसे भी निकाल दिया. ऐसा ही हाल इन्दिराने वीपी सिंगका किया था जब वे अर्थमंत्री थे.

किन्तु नरसिंह रावने ऐसा नहीं किया. नरसिंह रावने अर्थतंत्रके सुधारका श्रेय मनमोहन सिंहको लेने दिया. वैसे तो उसका श्रेय अर्थ-तंत्र-सलाहकार टीम जिसमें नेता सुब्रह्मनीयम स्वामी थे, उनको भी जाता है. नीतियाँ एक अति असरकारक परिबल है और प्रक्रियायें भी एक और परिबल है. प्रक्रियाको सुधारने की महद्‍ जिम्मेवारी वित्त मंत्रीकी होती है. मनमोहनके वित्तमंत्रीकालके जमानेमें “शरद महेता”वाला कौभान्ड हुआ. क्यों कि मन मोहन सिंहने बेंको कि कागजी लेनदेनकी गलतीयों पर ध्यान नहीं दिया था. फिर उन्होंने आश्वासन दिया कि “अबसे (भविष्यमें) ऐसा नही होगा.” यदि मनमोहन सिंह चालाक होते तो, उनको जो प्रधानमंत्री का प्रमोशन मिला, तब जो सत्यम्‍ स्कॅम हुआ वह न होता.

“नहेरुवीयन प्रणाली”

नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षकी सियासतमें गलतीयोंको दुसरोंके नाम पर चढा देना और उपलब्धीयोंको नहेरुवंशके फरजंद पर चढा देना आम बात है. जैसे कि चीनके साथके युद्धमें भारतकी हारका कुंभ सिर्फ वि.के. मेनन पर फोड देना, और पाकिस्तान के उपर भारतकी १९७१की विजयका श्रेय तत्कालिन सुरक्षा मंत्री जगजिवन रामको न देना और सिर्फ इन्दिरा गांधीको दे देना, ये सब नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षका संस्कार है.

नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षकी ऐसी प्रणालीयोंपर तालियाँ पाडने वाले मूर्धन्य भारतमें पहेले भी विद्यमान थे और आज भी विद्यमान है.

अब गठबंधन वाली सरकारोंकी उपलब्धीयां पुरस्कृत करने के लिये हमारे कटारीया भाई, भारतवर्षकी प्रथम संयुक्त “राष्ट्रीय सरकार” १९४७-५२का उल्लेख करते हैं.

याद करो मूल कोंग्रेसी सदस्यका संस्कार

कोंग्रेसके शिर्ष और सर्वोच्च नेता यानी कि “नहेरु”की प्रच्छन्न मानसिकताको छोड दें, और कोंग्रेसके तत्कालिन सामान्य सदस्यकी बात करें तो मुज़े निम्न लिखित प्रसंग याद आता है.

१९४२में महात्मा गांधीने “भारत छोडो” आंदोलन छेडा था और जनताको कहा था कि हर व्यक्ति स्वयंका नेता है. आप कानून भंग करोगे. खूल्लेआम कानून भंग करोगे और यदि आप गिरफ्तार हुए तो आपको सहर्ष गिरफ्तारी स्विकारोगे और कारावासका भी स्विकार करोगे.

एक महिला थी. उसने अपने महिला साथीयोंके साथ प्रदर्शन किया. उस महिलाको पूलीसने गिरफ्तार किया. उस महिलाने कुछ गहने पहने थे. उसने पास खडे एक कोंग्रेसीको अपने गहने दे दिया और कहा कि मेरे घरका पता यह है, आप इन गहेनोंको मेरे घर पर पहूँचा देना, और कह देना कि मैं कारावास जा रही हूँ. उस कोंग्रेसीने कहा कि “बहनजी आप तो मुज़े पहेचानते तक नहीं है. आपने मुज़पर विश्वास कैसे कर दिया कि मैं इन गहनोंको आपके घर तक पहूँचा दूंगा?”

उस महिलाने उत्तर दिया कि आप कोंग्रेसी है इस बात ही मेरे लिये पर्याप्त है कि आप विश्वसनीय और नीतिमान है.”

आज क्या ऐसी स्थिति है कि “विश्वसनीयताके लिये कोंग्रेसी होना पर्याप्त है?”

नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके ६५ सालके शासनके बाद नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके नेतागण, अपनी विश्वसनीयताका, जनतामें कायम रख सके हैं क्या?

नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके आम सदस्यकी बात छोडो, नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके शिर्षनेता भी विश्वसनीय नहीं रहे है. इसका क्या हमारे कटारीयाजीको मिसाल देना पडेगा?

नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके सर्वोच्च नेतागण स्वयं “बेल (जमानत)” पर है. स्वयंके लिये जमानत लेना, यह बात ही मूल कोंग्रेसके मूलभूत सिद्धांतोसे विपरित है. किस मूँह से कोई नीतिमत्ताके इस विनिपातसे पराङगमुख बन सकता है. और वह भी एक मूर्धन्य राजकीय विश्लेषक श्रीमान शेखर गुप्ताजी.

“राष्ट्रीय सरकार” कोई चूनावी गठबंधन था ही नही.

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राष्ट्रीय सरकार के समय पर बना गठबंधन कोई गठबंधन नहीं था. वह कोई सत्ता पाने के लिये या तो किसी अन्य गठबंधनके विरुद्धवाला गठबंधन नहीं था. महात्मा गांधी चाहते थे कि भारतका तत्कालिन शासन और संविधान सभीको साथ लेके चले.

राष्ट्रीय सरकारको गठबंधनवाली सरकार का नाम देना “तर्कहीन” ही नहीं किन्तु “हास्यास्पद” भी है. यदि कोई विद्वान ऐसी तुलना और विश्लेषण करे तो उसकी निष्पक्षता पर कई प्रश्न चिन्ह उठते हैं. जो गठबंधन ही नहीं था उसको गठबंधन बताके उनकी उपलब्धीयोंको “सियासती गठबंधन भी ऐसी उपलब्धीयोंके लिये सक्षम है” ऐसा बताना, यह बात तो जनताको गुमराह करनेके बराबर है.  

वैसे तो हर गठबंधन यदि वह सियासती गठबंधन है तो वह एक पूर्ण बहुमत वाले पक्षकी सरकारसे श्रेय नही हो सकता, चाहे उसका आधार सियासती हो या न हो.

सियासती “अस्थिरता” नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षकी देन है. १९६९ और १९७९की अस्थिर सरकारोमें नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षका बडा योगदान था. इनका जिक्र हमारे कटारीया भाईने नहीं किया है.

१९६७ तक नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षकी आंतरिक संगठन शक्ति कायम थी. नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षकी शिर्ष नेता इन्दिरा गांधीने इस आंतरिक संगठनका विभाजन किया. १९७१की इन्दिरा-विजय नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षकी संगठन शक्ति पर आधारित नहीं था. वह विजय इन्दिरा-वेव्ज़ के कारण था. नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षका संगठन तो निर्बल ही बन गया था. १९८४की नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षकी विजय भी “सहानुभूति-वेव्‍ज़के” कारण था. और इसके बाद तो बहुपक्षीय-संगठनवाला अस्थिरताका युग शुरु हुआ इस बातको तो कटारीयाजी स्वयं कबुल करते है.

वी.पी. सिंघवाले बहुपक्षीय-संगठन सरकारकी उपलब्धीयां थी ऐसा कटारीयाजी प्रदर्शित करते है. वास्तवमें मोरारजी देसाईकी सरकारकी उपलब्धीयां कई गुना अधिक थी. इस बातको यदि हम छोड भी दें तो वीपी सिंघ स्वयं नरेन्द्र मोदीकी तरह नीतिमत्तामें मानते थे. तो भी, उनके उपर भी नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके नेताओंने कीचड उछाला था. जैसे कि वीपी सिंघका विदेशमें (सेन्टकीट्समें) एकाउन्ट था.

जब भी नीतिमत्ता की बात आती है तब बहु पक्षीय गठबंधन कमज़ोर पड जाता है.

इसका कारण यह है कि वंशवादी पक्षका आधार एक वंशवादी नेता होता है. उस पक्षके सदस्य, सियासतमें सिर्फ और सिर्फ पैसे बनानेके लिये आते है. इन सदस्योंको सर्वोच्च पद प्राप्त करनेकी ख्वाहिश होती ही नहीं है. क्या वाड्राको प्रधान मंत्री बननेकी ख्वाहिश है? क्या पप्पु यादवको मुख्य मंत्री बनना है? क्या अभीषेक मनु सिंघ्वी या रणदीप सुरजेवालाको प्रधान मंत्री बनना है? नहीं भाई हमें सर्वोच्च पद नहीं चाहिये. हमें हो सके तो मंत्री बना दो और यदि मंत्री भी न बना सको तो सिर्फ हमे हमारा असामाजिक यानी कि गैरकानूनी काम करने दो और कायदा हमे स्पर्ष न करे उसका आप ध्यान रक्खो. हमें सिर्फ यही चाहिये.

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अल्पमत सरकार आवकार्य नहीं है

नरसिंह राव की सरकार अल्प मत सरकार थी. और उसने ५ साल शासन किया. एक दो अल्पमत सरकारका उदाहरण लेके हम ऐसा वैश्विक धारणा/निष्कर्ष बनाके भविष्यवाणी नहीं कर सकते कि अल्पमत सरकार हर हालतमें आवकार्य है.  जब पक्षीय संगठनका मूलभूत प्रयोजन सामनेवाले को हराना हो और पैसा बनानेके लिये सत्ता प्राप्त करना हो,  तो आपको आठ सालमें तीन चूनाव के लिये तयार रहेना पडता है.

विवादास्पद उपलब्धीयां

कटारीया भाई ऐसा दिखाते है, कि चाहे कुछ भी हो १९९७में पी. चिदम्बरमने राष्ट्रीय विनिवेश पंचकी रचना की और पब्लिक उपक्रमोंका लीस्टींग और प्राईवेटाईझेशनका दरवाज़ा खोला.

कटारीयाजी प्रदर्शित करते है कि भाई हम तो तटस्थ है. मोदीकी विरुद्धमें है. उसका मतलब यह नहीं कि हम बाजपाईजीके भी विरोधी है. बाजपाईजीमें तो दम था. (मतलब? नरेन्द्र मोदीमें वह दम नहीं), क्योंकि बाजपाईने चतुर्भूज हाई वे योजना बनाई. दो बडे एरपोर्टका प्राईवेटाईझेशन किया. ११ पब्लिक सेक्टरकी कंपनीयां जो प्रोफिट करती थी और २४ आई.टी.डी.सी. हॉटेल्स बेच दी. और सर्वशक्तिमान नरेन्द्र मोदी एक भी कंपनी बेच नहीं पाये. कटारीया साहबका संदेश यह है कि पब्लिक सेक्टरकी कंपनीयां बेचना सरकार शक्तिमान होनेका गुण है. “साध्यम इति सिद्धम्‌.”

अरे भाई साहब, खोटमें चलनेवाली सरकारकी कंपनीयोंको नफा करनेवाली बनाना ही सरकारी शक्तिका गुण है जो नरेन्द्र मोदीने गुजरातमें करके दिखाया है. हर गांवमें हर खेतमें बीजली पहूँचाना और वह भी २४/७ घंटे, यह भी तो उपलब्धी है नरेन्द्र मोदीजीकी. हर घरमें गेस पहूँचाना यह भी तो एक महान उपलब्धी है.

भारतीय रीज़र्व्ड सोनेको देशके बाहर ले जानेकी हिमत दिखाना और वह भी भूगतानके लिये, इस घटनाको कटारीयाजी, अपना दिमाग तोड परिश्रमसे, तत्‌कालिन प्रधान मंत्री चन्द्रशेखरकी   उपलब्धीमें गीनती करवाते हैं. लेकिन ऐसी स्थिति किसने उत्पन्न की थी और इसके लिये कौनसी सरकार जीम्मेवार थी उस विषय पर हमारे कटारीया भाई मौन है.

कटारीयाजी मानते है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सिर्फ १९८९-९०में कमजोर थी. शायद कटारीयाजी १९८९से लेकर २०१४ तक कश्मिरमें हिन्दुओंकी कत्लेआम और आतंकवादीयोंका और नक्षलीयोंका देशके महानगरोंमें घुस कर और देशके भीतरी इलाकोंमें दूर दूर तक घूस घूस कर अपनी बोम्बब्लास्ट वाली प्रवृत्तियां विस्तारना, इन सब बातोंको राष्ट्रीय सुरक्षासे जोडनेमें नहीं मानते है. नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्ष,  राफेल का डील नहीं कर पाना उसका कारण ही तो २०१२में पैसा न होना ऐसा एन्टोनी खूद संसदमें बताते है. इस परिस्थितिको यदि दिवालियापन नहीं कहोगे तो क्या कहोगे?  

कटारीयाजी क्या समज़ते है?

कटारीयाजी समज़ते है कि, १९८९-९०की अराजकता और शासकीय निस्फलता पर जोर देना नहीं चाहते. क्यों कि यह बात, कटारीयाजीके एजन्डाके विरुद्ध है.  कटारीयाजी “आतंकवाद” शब्द का उपयोग करना ही नही चाहते है. वे यह कहेते है कि १९९१-१९९६ तक कश्मिर  सबसे बुरी स्थितिमें था. लेकिन परिस्थिति काबुमें थी.

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कमालकी बात है. यदि परिस्थिति काबुमें थी तो ५०००००+ हिन्दुओंको पुनर्थापित क्यों नहीं किया?

यदि परिस्थिति काबुमें थी तो कितनोकों गिरफ्तार कीया? परिस्थिति काबुमें थी तो  कितने केस कोर्टमें दर्ज किये? परिस्थिति काबुमें थी तो किन किन मंत्रीयोंको जिम्मेवार बनाया और उनके उपर कितने केस दाखिल किया? परिथिति काबु में थी तो कोई एस.आई.टी.का गठन किया या नहीं?

कटारीयाजी इन सब कमजोरीयोंको और निस्फलताओंको, नजर अंदाज करवाने लिए, इन सब विषयोंको कश्मिर और केन्द्रस्थ शासकोंकी क्रीमीनल निस्फलतासे नहीं जोडते है.

यह बात समज़नी चाहिये कि खालिस्तानवादीयोंका आतंकवाद खतम करनेका श्रेय सिर्फ केपीएसगील को जाता है (शायद अजित डोभाल भी सामिल हो), और खालिस्तानी नेताओंको बडाभाई बनानेका श्रेय इन्दिरा गांधीको जाता है. लेकिन कटारीया भाई, नहेरुवंशवादको शायद जनतंत्रके लिये घातक नहीं मानते. वे इस बातको समज़नेके लिये तयार नहीं कि, यदि जे.एल. नहेरु अपने कार्यकालमें, अपने फरजंद, इन्दिरा गांधीको, अपना अनुगामी प्रधानमंत्री बनानेका प्रबंध करके नहीं जाते, तो आज कोंग्रेस पर “नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्ष” होने की गाली नहीं लगती, नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्ष भ्रष्टाचारसे तरबर न होती, और वह कमजोर भी न पड जाती.

कटारीयाजी कुछ विवादास्पद विषयो पर, अपने हिसाबसे तत्कालिन सरकारोंके निर्णयोंको अच्छा निर्णय, बुरा निर्णय, या कमजोरीवाला निर्णय ऐसा तारतम्य निकालते है. और उपसंहार में कहेते हैं कि सुरक्षित बहुमतवाली सरकार नेताओंको बेदरकार और दंभी बनाती है.

इस तारतम्यमें कटारीयाजी, जे.एल. नहेरुका, समावेश करते नहीं है लेकिन इन्दिरा से लेकर, राजिव गांधी होकर,  नरेन्द्र मोदीका समावेश अवश्य करते है.

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नरेन्द्र मोदी समय बद्धता में मानते है

वास्तवमें देखें तो, नरेन्द्र मोदीके वचन, नहेरु के वचन जैसे “अनिश्चित कालिन नहीं है”. याद करो कि जय प्रकाश नारायण, नहेरुकी असमयबद्ध ध्येयोंके कारण ही उनके मंत्री मंडलसे दूर रहे थे. जय प्रकाश नारायणने नहेरुको कहा था कि “आप हरेक ध्येय प्राप्तिके लिये समय बद्ध योजना बनाओ तो मैं आपके मंत्री मंडलमें आउंगा.” लेकिन जे एल नहेरु तो बेदरकार और दंभी थे. उन्होने जयप्रकाशकी बात मानी नहीं. नहेरु समय बद्धतामें नहीं मानते थे. “ तत्वज्ञानीय लुज़ टॉकींग” नहेरुको प्रिय था.

“समय बद्ध ध्येय” नरेन्द्र मोदीका गुण

यदि आज जय प्रकाश नारायण होते तो वे नरेन्द्र मोदीको सहकार करते. नरेन्द्र मोदीजी हमेशा समय बद्धतासे ही चलते है और उन्होने पक्षके ध्येयोंको समयबद्ध प्रोग्राममें रक्खा है. लेकिन कटारीया भाई इनका जिक्र नहीं करेंगे. उनको पसंद है “नहेरुकी देशमें बहेनेवाली घी दूधकी नदिया” और इन्दिराके “गरीबी हटाओके नारे”

उनको ०२-१०-२०१९ तक स्वच्छभारत, २०२२ तक किसानकी आय दुगुनी, २०१९ तक घर घर संडास, २०२२ तक हरेकके पास अपना घर, २०२२ तक बुलेट ट्रेन …. आदि समय बद्ध ध्येय पसंद नहीं इसलिये उनका जिक्र नहीं.   

एक दुसरे विद्वान है जो अरुण शौरी है. वे भी नरेन्द्र मोदीके कटु टीकाकार है.

कुछ लोग जीएसटी और विमुद्रीकरण की कटु टिका करते है लेकिन एक भी माईकापूत नहीं निकला कि उसने बताया हो कि जो काला धन देशमें घुम रहा है उसको सरकारी रेकोर्ड पर कैसे लाया जाय, बेनामी कंपनीयोंको रेकोर्ड पर लाके कैसे कार्यवाही की जाय, फर्जी करन्सीको कैसे निरस्त्र किया जाय, आयकर रीटर्न भरने वालोंकी सख्यां कैसे बढाई जाय, टेक्स कलेक्शनमें कैसे वृद्धि की जाय….?

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नरेन्द्र मोदीने तो यह सब करके दिखाया है जो नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्ष ६५ सालमें नहीं कर सका.

शिरीष मोहनलाल दवे

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जो भय था वह वास्तविकता बना (बिहारका परिणाम) – 1

क्या  यह सत्य और श्रेयकी जित है?

नहीं. यह सत्यकी जित नहीं है.

सत्य और श्रेय है वह जनताके बहुमतसे सिद्ध नहीं होता है.

हम जिन चूनावी प्रक्रियाओंके आधार पर जनताका अभिप्राय प्राप्त कर रहे है वह हमेशा सत्य को पुरस्कृत नहीं करता.

बहुमत, सत्यका आधार नहीं बन सकता. बिहारकी जनताने जिस गठबंधनको जित दिलाई, इससे यह सिद्ध नहीं होता है कि सत्य, उस गठबंधनके पक्षमें था जो जिता था.

सत्य किसके पक्षमें था?

सत्य बीजेपीके पक्षमें था.

सत्य किसको कहेते हैं?

यहां पर सत्यका अर्थ है,

() ऐसा कोनसा पक्ष है कि जिसके पास भारतकी समस्याओंकी अधिक जानकारी है?

() ऐसा कौनसा पक्ष है जो इस समस्याओंका समाधान सुचारु रुपसे कर सकता है?

() ऐसा कौनसा पक्ष है जिसके पास आर्षदृष्टि है?

() ऐसा कौनसा पक्ष है जिसके पास अपनी कार्यसूचि है और उसके उपर प्रतिबद्ध है?

() ऐसा कौनसा पक्ष है जिसके पास अपनी कार्यसूचिकी प्रणाली भी सुनिश्चित है?

() ऐस कौनसा पक्ष है जो अधिक नीतिवान है?

() ऐसा कौनसा पक्ष है जिसके पास व्यापक संगठन है?

() ऐसा कौनसा पक्ष है जिसके लियेप्रामिकता भारतका हितहै?

 

श्रेय पक्ष बीजेपी ही है

ऐसा पक्ष केवल और केवल बीजेपी ही है जिसके नेता नरेन्द्र मोदी है. इसके उपर यदि किसीको संदेह हो तो इसकी चर्चा हो सकती है. इससे यदि कोई श्रेयतर नेता है तो बताओ.

नीतिओंकी स्पष्टता, आर्षदृष्टि और नीतिमत्ता इनका अभाव, वह जेडीयु है.

हम आरजेडी, नहेरुवीयन कोंग्रेस, एस पी, एनसीपी, आदिकी बातें नहीं करेंगे. इन सबके काले करतूत इतिहासके पन्नोंपर पर विद्यमान है. वे सभी पक्ष, एक दुसरेके अवलंबनके लिये विवश है. ये सभी राजकीय समीकरणों के आधार पर बनाई गई चूनावी गेमके से जिन्दा है. आवश्यकता होने पर एक होते है और आवश्यकता यदि हो तो एक दुसरेके दुश्मन बनते हैं.

बीजेपी भी ऐसे गठबंधनके लिये विवश बनता है. जैसे कि बीजेपी, शिवसेना, एमएनएस, एल जे पी, डी.एम.के. या .डी.एम. के साथ गठबंधन करती है. किन्तु बीजेपीने कभी भ्रष्टाचार के साथ समझौता नहीं किया.

यह बात सही है कि, कोई विस्तारमें अपने अस्तित्वको बनानेके लिये बीजेपीने ऐसे प्रादेशिक संकुचित मानसिकता वाले पक्षोंसे समझौता किया है. यदि प्रमाणभान की प्रज्ञासे देखा जाय तो बीजेपी की मात्रा अन्य पक्षोंकी तरह असीम नहीं है.

जेडीयुने आरजेडी और नहेरुवीयन कोंग्रेससे गठबंधन किया. ये दोनों पक्ष एक समय उसके सैधांतिक आधार पर दुश्मन नंबर एक थे.

नहेरुवीयन कोंग्रेस तो एक स्वकेन्द्री, वंशवादी और देशकी जनताको विभाजित करने वाला सरमुखत्यार शाहीमें मानने वाला पक्ष है. इसके पास स्वकेन्द्रीय सत्ता प्राप्त करनेके अतिरिक्त, कोई अन्य कार्य सूचि नहीं है. इसने ही उच्च न्यायालयकी अवमानना करके जनतंत्रको नष्ट भ्रष्ट करदिया था. महात्मा गांधीके निकटके साथीयों तकको इसने बिना कोई अपराध और बिना कोई न्यायिक प्रक्रिया, कारवासमें अनियतकाल के लिये बंद किया था और मरणासन्न किया था. ये सब बातें एततकालिन इतिहासके पन्नों पर विद्यमान है. तो भी जेडीयुने इस कोंग्रेसके साथ गठबंधन किया. इससे जेडीयुकी मानसिकताका दर्श्न होता है. आरजेडी नेता भी १९७७में जनता पक्षके सदस्य थे और उन्होंने नहेरुवीयन कोंग्रेसको नष्ट करनेका प्रण लिया था. जब जनता पक्ष तूट गया और जनता दल भी तूटा, तो लालु यादवने अपने लिये एक वंशवादी पक्ष बना लिया. इसने केवल सत्ताके लिये ही नहेरुवीयन कोंग्रेसके साथ गठबंधन किया. लालु यादव अपने कौभांडोके कारण कारावाससे बचने के लिये ये सब करते रहे. उनके  शासनकोजंगल राजका प्रमाणपत्र नीतीशकुमार स्वयंने दिया था.

ये तीनोंने मिलके बिहार पर कमसेकम ४० वर्ष राज किया है. तो भी ये पक्ष बिहारका विकास नहीं करपाये. ये सब बिहारको पछात राज्यकी कक्षा की मान्यता मिले ऐसी वार्ताएं करते रहे. तदुपरांत समाजकी विभीन्न जातियोंके लिये शिक्षा और नौकरीमें आरक्षण मिलता ही रहे ऐसी प्रतिक्रिया भी प्रदर्शित करते रहे.

इन तीनों पक्षकी अपेक्षा बीजेपीका व्यवहार व्यवस्थित रहा है. इसलिये बीजेपी की विजय चूनावमें होना अपेक्षित था और श्रेय भी था.

किन्तु बीजेपी और उसके साथी पक्ष बिहार चूनावमें पराजित हुए

बीजेपी एक ऐसा पक्ष है जो भारतकी ऐतिहासिक सांस्कृतिक धरोहर पर गर्व रखता है. उसका स्वदेशीमें विश्वास है. स्वदेशी उत्पादनमें मानता है और स्वदेशी भाषाओं उपर गर्व रखता है. विदेशीओं द्वारा लिखित आधारहीन भारतीय इतिहासमें वह विश्वास नहीं रखता है. तद उपरांत वह परशुराम, राम, कृष्ण आदि पौराणिक या महाकाव्यके पात्रोंको ऐतिहासिक मानता है.

बीजेपी और खास करके नरेन्द्र मोदी मानते है कि सभी समस्याओंका मूल, शिक्षाका अभाव और कामका अभाव है. इसलिये दो प्राथमिकता बननी चाहिये. एक है, शिक्षासे कौशल्य, और दुसरा है भूमिगत संरचना यानी कि, उर्जा, मार्ग, परिवहन, जल संचय, जलवितरण आदिके विकाससे उत्पादनमें वृद्धि. इस प्रकार विकास करनेसे हर समस्याका निवारण हो जायेगा चाहे वह जातिगत हो या आर्थिक हो.

नरेन्द्र मोदीके पास इन सबकी दृष्टिके उपरांत विदेशी संबंधोंके बारेमें और सुरक्षा संबंधित प्रश्नों के बारेमें सुनिश्चित आयोजन है. उत्पादन, कार्य, और प्रबंध के विषयमें नरेन्द्र मोदीके पास निर्धारित और सुनिश्चित प्रणालीयोंका आयोजन है. बीजेपी एक मात्र ऐसा पक्ष है जिसके पास नरेन्द्र मोदी जैसा एक मात्र नेता है जो बिना थके निस्वार्थ भावसे १८ घंटा काम करता है. सुभासचंद्र बोस, दयानंद सरस्वती, विवेकानन्द, महात्मा गांधी और सरदार पटेलके बाद केवल नरेन्द्र मोदी ही एक मात्र नेता भारतको उपलब्ध हुआ है जो अन्य सबसे एक हजार मिल आगे है.

बीजेपीकी पराजयको वक्र दृष्टिसे मुल्यांकन करनेवाले स्वार्थ परायण दल समूहः

जो महाठगबंधनवाले पक्ष थे उनका हित तो स्वयंका विजय पाना हो यह बात तो स्वाभाविक है. किन्तु जो विद्वज्जन अपनेको तटस्थ मानते है और जो दृष्य श्राव्य और वाच्य समाचार माध्यम है उनको चाहिये था कि वे केवल समाचार ही दें, और अपनी तरफसे तारतम्य वाली समाचार शिर्ष पंक्तियां बनावें. जो मूर्धन्य लोग समाचार माध्यममें या तो एंकर है या कोलमीस्ट (कटार लेखक) है वे तर्कबद्धतासे और प्रमाणभानकी प्रज्ञाका उपयोग करके समाचारोंका विश्लेषण करें और मूल्यांकन करनेमें मापदंड भी समान ही रखें.

समाचार माध्यमों द्वारा कौनसी बातें उछाली गई?

बीजेपी नेतागणसे संबंधितः

() शेतानको लालुजीकी जीभ पर बैठने का एड्रेस किसने दिया?

() ‘   ‘-वाले शर्म करो. पहेले अपना ४० सालका हिसाब बताओ.

() मैं क्या बाहरी हुं. मैं क्या पाकिस्तानका प्रधान मंत्री हुं …. …. ?

() अनामत पर पुनर्विचारणा होनी चाहिये

() मैं स्वयं पीछडी जातिका हुं और मुझपर क्या गुजरी है वह मैं जानता हुं..

() लालुजी किस कारणसे चूनावमें प्रत्याशी नहीं बने, इसका कारण तो बताओ लालुजी,

() यदि एनडीए की पराजय हुई तो पटाखे पाकिस्तानमें फूटेंगे

() यह महागठबंधन एक स्वार्थबंधन है. डीएनए चेक करना चाहियेये तीनों पक्षके नेता एक मंच पर क्यों नहीं सकते हैं?

(१०) नीतीश कुमारने जनतंत्रमें मंत्र तंत्रका आश्रय लिया है. यह वीडीयो क्लीप सोसीयल मीडीया पर बहुत चली.

(११) जिनको गोमांस खाना हो वे पाकिस्तान चले जाय.

(१२) यदि यहां गोमांस खाया तो मैं गला काट दूंगा.

महागठबंधन के उच्चारणः

() नीतीशकुमारने २००२ के गुजरातके दंगोंका उल्लेख किया

() बिहारीयोंको बाहरी चाहिये कि बिहारी?

() काला धनके डेढलाख हमारे एकाउन्टमें अभीतक जमा क्यों नहीं हुए,

() मांस खाने वाले असंस्कारी होते है, ऐसा जब मैंने कहा तब मेरी जबानपर शेतान बैठा था.

() गौमांस तो हिन्दु भी खाते है.

() मांस तो मांस ही है चाहे वह गायका हो, घोडेका हो या कुत्तेका हो.

() मुझे शेतान कहा,

() अमित शाह नरभक्षी है, वह नरपिशाच है,

() बीजेपीवालोंने काला जादु करके मुझ पर फैन गिराया. मैं काला जादु जानता हुं औरकाला कबुतरमीर्च मसाले मंत्र पढके उसको भगाउंगा.

(१०) देखो यह फोटो जिसमें नरेन्द्र मोदी अपना हाथ ज्योतीषीको दिखाते है.    

नरेन्द्र मोदीका चूनाव मंत्रविकासथा. लेकिन महागठबंधनके नेता हमेशा जातिवादकी बातें करते थे और आरएसएसके एक नेताने कहा कि अनामतपर पुनर्विचारणा होना चाहिये. यह सुनकर महागठबंधनके नेताओंमे लड्डु फूटने लगे. वैसे भी उनका गठबंधनजातिवादके आधार पर ही हुआ था. और विकासके आधार पर प्रचार करना उनके लिये कठिन था. क्यों कि बिहारके कई विस्तारोमें, मकान, पानी, मार्ग, बीजली और शिक्षासंस्थाओंकी सुविधाएं नहीं है. उद्योग भी इसके कारण अल्प मात्रामें है. बीजेपीको कोमवाद परस्त कह्ना और कोमवादका मुद्दा उठाना यह तो वैसे भी फैशन है.

दाद्रीनामके एक देहातमें जो हुआ, चूं कि वह हिन्दुओंने किया था, ये सब इस बात पर तूट पडे. और उसको गौमांसके साथ, नागरिक स्वतंत्रता और हिन्दुओंकी असहिष्णुता के साथ जोड दिया. इस बातको जिस सीमातक ले गये इससे ऐसा लगता है कि यह एक सोची समझी व्यूहरचना थी जिसको नकारा नही जा सकता.

सियासती महानुभावोंका एवोर्ड वापसीका सीलसीला

इस घटनाको लेके बीजेपीआरएसएस विरोधी और नहेरुवीयन कोंग्रेस परस्त, अभिनेता, कवि, लेखक, विवेचक, समाजसेवी, आदि तथा कथित महानुभावोंने, सरकार तरफसे दिये गये पुरस्कार एक के बाद एक ऐसा करके लौटाने लगे, ताकि, समाचार माध्यम, चूनावप्रचार अंतर्गत समयमें पूरा वातावरण बीजेपीआरएसएस की असहिष्णुताके विरोधमें बना हुआ रख सके.

यदि इस घटनापर विश्लेषण किया जाय तो भूतकालमें ऐसी ही नहीं किन्तु इससे हजारों लाखों दफा बडी कई मानव हनन और मानव अधिकार हननकी घटनाएं घटी तो भी इन महानुभावोंकी संवेदनशीलताको जरासी भी हानि नहीं पहोंची. ये लोग नींभर और संवेदनहीन रहे.

नहेरुकी नीतिके कारण और भारतीय सीमाको असुरक्षित रखनेसे और हमारे जवानोंको शस्त्रोंसज्ज करनेके कारण १९६२में हजारों जवानोंको बेमौत शहीद होना पडा. तो भी इन महानुभावोंकी संवेदनशीलताको जरासी भी हानि नहीं पहोंची. ये लोग नींभर और संवेदनहीन रहे.

१९७२में सिमला समझौता अंतर्गत इन्दिरा गांधीने भारतकी जितको पराजयमें परिवर्तित करके हजारों शहीदोंके बलिदानोंपर पानी फेर दिया. तो भी इन महानुभावोंकी संवेदनशीलताको जरासी भी हानि नहीं पहोंची. ये लोग नींभर और संवेदनहीन रहे.

१९७५१९७६ मे आपतकाल घोषित करके विरोधी आवाजको बंध करने के लिये ६००००+ लोगोंको कारावासमें अनियत कालके लिये बंद कर दिया. समाचार माध्यमों पर सेन्सरशीप डाल दी. तो भी इन महानुभावोंकी संवेदनशीलताको जरासी भी हानि नहीं पहोंची. ये लोग नींभर और संवेदनहीन रहे.

इन्दिराने युनीयन कार्बाईडसे क्षतियुक्त डील किया और भोपालगेस दुर्घटना हुई और सेंकडो मौत हुई और हजारों लोग, शरीरसे स्थायी रुपसे अपंग हुए. इन गेसकांड पीडितोंको, क्षतियुक्त डील के कारण मुआवझा नही मिला. तो भी इन महानुभावोंकी संवेदनशीलताको जरासी भी हानि नहीं पहोंची. ये लोग नींभर और संवेदनहीन रहे.

इस घटनाके दोषी एन्डरशनको अर्जुनसिंह और राजीवगांधीने भगा दिया. तो भी इन महानुभावोंकी संवेदनशीलताको जरासी भी हानि नहीं पहोंची. ये लोग नींभर और संवेदनहीन रहे.

इन्दिरा गांधीने, खालिस्तानी आतंकवादी भींदराणवालेको संत घोषित करके उसको बढावा दिया, इससे खालिस्तानी आतंकवाद और सीमापारके आतंकवादको बढावा मिला. इसी कुकर्मके कारण इन्दिराकी हत्या हुई. इस नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंने हजारों निर्दोष शिखोंका कत्लेआम किया. तो भी इन महानुभावोंकी संवेदनशीलताको जरासी भी हानि नहीं पहोंची. ये लोग नींभर और संवेदनहीन रहे.

सीमापारका आतंकवाद कश्मिरमें बढने लगा और जो हिन्दु कश्मिरमें १५% थे उनके उपर अत्याचार होने लगे और हिन्दु जनसंख्या १९८९ तक % हो यी. तब तो भी इन महानुभावोंकी संवेदनशीलताको जरासी भी हानि नहीं पहोंची. ये लोग नींभर और संवेदनहीन रहे.

१९९०में खुले आम, वर्तमान पत्रोंमें इस्तिहार देके, मस्जिदोंमेंसे लाऊडस्पीकर द्वारा घोषणा करवाके, दिवारों पर पोस्टरों लगाके,  हिन्दुओंको चेतावनी दी, कि निश्चित दिनांकके अंतर्गत या तो इस्लाम कबुल करो या कश्मिर छोड दो. यदि यह स्विकार्य नहीं है तो मौत के लिये तयार रहो. ६०००+ हिन्दुओंका कत्लेआम हुआ. ५००००० हिन्दुओंको अपना घर और राज्य छोडने पर विवश किया जो आज २५ सालके बाद भी, वे या तो तंबुमें रहेते है या खोलीमें रहेते है. १९९० पहेले भी नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनका साथी “एन. एफ” कश्मिर में राज करते थे, और १९९०के बाद नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके साथी पक्षोंने १५ साल राज किया तो भी नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनके साथी पक्षोंके कानोंमें जू तक नहीं रेंगी. इन शासकोंने कश्मिरी हिन्दुओंके मानव अधिकारोंके सतत होते हुए हननके विषयमें केवल उपेक्षा की. तो भी इन महानुभावोंकी संवेदनशीलताको जरासी भी हानि नहीं पहोंची. ये लोग नींभर और संवेदनहीन रहे.

और अब देखो यहां क्या हुआ? दाद्री देहातमें एक गरीब मुस्लिमकी हत्या हुई. युपी जो नहेरुवीयन कोंग्रेसके साथी पक्ष द्वारा शासित राज्य है तो उत्तर दायित्वतो उसका ही बनता है, किन्तु इन सियासती महानुभावोंने इस घटनाका उत्तर दायित्व बीजेपी केन्द्रकी बीजेपी सरकार पर डाल दिया. चूं कि मृत व्यक्ति मुस्लिम था और चूं कि मारने वाले हिन्दु थे. यदि मारने वाले हिन्दु है तो बीजेपी को  उत्तरदायी बता दो. क्या इसमें कोई तर्क है? यहा क्या बुद्धिगम्य है?

वास्तवमें महानुभावोंका तारतम्य और प्रतिभाव निरपेक्ष रुपसे एक प्रपंच है और निरपेक्ष रुपसे कोमवादको उकसाना है. ये सभी महानुभाव को कोमवाद फैलाने के आरोप पर न्यायिक कार्यवाही करनी चाहिये. और उनको कारावास में रखना चाहिये.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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पी.के. ने पीके किया नशा? कथांक – १

कूर्म पुराण और महाभारतमें एक सुसंस्कृत श्लोक है.

(१) आत्मनः प्रतिकुलानी परेषां न समाचरेत.
इसका अर्थ है;

जो वस्तु, स्वयंके लिये (आप) प्रतिकुल (मानते) है, (उसको आप) दुसरोंके उपर मत (लागु) करो.
इसका अर्थ यह भी है, कि जो आचार आप स्वयंके हितमें नही मानते चाहे कोइ भी कारण हो, तो वह आचार आप अन्यको अपनाने के लिये नही कह सकते.
इसका निष्कर्सका गर्भित अर्थ भी है. यदि आपको अन्य या अन्योंको आचारके लिये कहेना है तो सर्व प्रथम आप स्वयं उसका पालन करो और योग्यता प्राप्त करो.

क्या पी.के. में यह योग्यता है?

पी.के.की योग्यता हम बादमें करेंगे.
सर्व प्रथम हम इस वार्तासे अवगत हो जाय कि, फिलममें क्या क्या उपदेश है. किस प्रकारसे उपदेश दिया है और सामाजिक परिस्थिति क्या है.

संस्कृतमें नीतिशतकमें एक बोध है.
(२) सत्यं ब्रुयात्, प्रियं ब्रुयात्, न ब्रुयात् सत्यं अप्रियं.
सच बोलना चाहिये, किन्तु सत्य ऐसे बोलना चाहिये वह प्रिय लगे. अप्रिय लगे ऐसे सत्य नहीं बोलना चाहिये.
यदि आप स्वयंको उपदेश देनेके लिये योग्य समझते है तो आपके पास उपदेश देनेकी कला होनी आवश्यक है. क्या यह कला पी.के. के पास थी?

पी. के. की ईश निंदा

abhiSheka

(३) पूर्व पक्षका ज्ञानः
यदि एक विषय, आपने चर्चाके लिये उपयुक्त समझा, तो स्वयंको ज्ञात होना चाहिये कि चर्चा में दो पक्ष होते है.
एक पूर्व पक्ष होता है. दुसरा प्रतिपक्ष होता है.
पूर्वपक्ष का अगर आप खंडन करना चाहते है और उसके विरोधमें आप अपना प्रतिपक्ष रखना चाहते है, तो आपको क्या करना चाहिये?
पूर्वपक्ष पहेलेसे चला आता है इसलिये उसको पूर्वपक्ष समझा जाता है. और उसके विरुद्ध आपको अपना पक्ष को रखना है. तो आपका यह स्वयंका पक्ष प्रतिपक्ष है.
अगर आप बौद्धिक चर्चा करना चाहते है तो आपको पूर्वपक्षका संपूर्ण ज्ञान होना चाहिये तभी आप तर्क युक्त चर्चा करनेके लिये योग्य माने जायेंगे. अगर आपमें यह योग्यता नहीं है तो आप असंस्कृत और दुराचारी माने जायेंगे.
असंस्कृति और दुराचार समाजके स्वास्थ्य के लिये त्याज्य है.

(४) चर्चा का ध्येय और चर्चा के विषय का चयनः
सामान्यतः चर्चाका ध्येय, समाजको स्वस्थ और स्वास्थ्यपूर्ण रखनेका होता है. किसको आप स्वस्थ समाज कहेंगें? जिस समाजमें संघर्ष, असंवाद और विसंवाद न हो तदुपरांत संवादमें ज्ञान वृद्धि और आनंद हो उसको स्वस्थ समाज माना जायेगा. यदि समाजमें संघर्ष, वितंडावाद, अज्ञान और आनंद न हो तो वह समाज स्वस्थ समाज माना नहीं जायेगा.
आनंदमें यदि असमानता है तो वह वैयक्तिक और जुथ में संघर्षको जन्म देती है. उसका निवारण ज्ञान प्राप्ति है.
ज्ञान प्राप्ति संवादसे होती है.
संवाद भाषासे होता है.
किन्तु यदि भाषा में संवादके बदले विसंवाद हो तो ज्ञान प्राप्ति नहीं होती है.
ज्ञान प्राप्तिमें संवाद होना आवश्यक है. संवाद विचारोंका आदान-प्रदान है. और आदान प्रदान एक कक्षा पर आने से हो सकता है. विचारोंके आदान प्रदान के लिये उसके नियम होने चाहिये. इन नियम को तर्क कहेते है. कोई भी संवाद तर्कयुक्त तभी हो सकता है जब पूर्वपक्षका ज्ञान हो.

पी. के. स्वयंमें क्या योग्यता है?
स्वयंमें विषयके चयन की योग्यता है?
स्वयंमें विषय की चर्चा करनेकी योग्यता है? स्वयं को स्वयंके पक्षका ज्ञान है?
स्वयंमें पूर्वपक्षका ज्ञान है?
स्वयंके विचारोंका प्रदान तर्कपूर्ण है?

पी. के. अन्यको जो बोध देना चाहता है उस बोधका वह क्या स्वयं पालन करता है?
अंधश्रद्धा निर्मूलन यदि किसीका ध्येय है तो प्रथम समझना आवश्यक है कि अंधश्रद्धा क्या है.
अंधश्रद्धा क्या है?
अंध श्रद्धा यह है कि, कोई एक प्रणाली, जो परापूर्वसे चली आती है या कोई प्रणाली अचारमें लायी गई हो और उस प्रणालीकी उपयोगिता सही न हो और तर्कशुद्ध न हो.
क्या प्रणालीयां और उसकी तर्कशुद्धता की अनिवार्यता सिर्फ धर्म को ही लागु करने की होती है?
क्या अंधश्रद्धा धर्मसे ही संबंधित है?
क्या अंधश्रद्धा समाजके अन्य क्षेत्रों पर लागु नहीं होती है?
अंधश्रद्धा हर क्षेत्रमें अत्र तत्र सर्वत्र होती है.
अंद्धश्रद्धा समाजके प्रत्येक क्षेत्रमें होती है.
अगर अंधश्रद्धा हरेक क्षेत्रमें होती है तो प्राथमिकता कहा होनी चाहिये?

जो प्रणालीयां समाजको अधिकतम क्षति पहोंचाती हो वहां पर उस प्राणालीयों पर हमारा लक्ष्य होना होना चाहिये. इसलिये चयन उनका होना चाहिये.

पी. के. ने कौनसी प्रणालीयों को पकडा?
पी. के. ने धार्मिक प्रणालीयोंको पकडा.
पी. के. ने धार्मिक प्रणालीयोंको क्यूं पकडा?
पी. के. समझता है कि वह सभी धर्मोंकी, धार्मिक प्रणालीयोंके विषयोंके बारेमें निष्णात है. हां जी, अगर उपदेशक निष्णात नहीं होगा तो वह योग्य कैसे माना जायेगा?

पी. के. समझता है कि वह भारतीय समाजमें रहेता है, इसलिये वह भारतमें प्रचलित धार्मिक, क्षतिपूर्ण और नुकशानकारक प्रणालीयोंकी अंद्धश्रद्धा (तर्कहीनता) पर आक्रमण करेगा.
अगर ऐसा है तो वह किस धर्मकी अंधश्रद्धाको प्राथमिकता देगा?
वही धर्म को प्राथमिकता देगा जिसने समाजको ज्यादा नुकशान किया है और करता है.

कौनसे कौनसे धर्म है? ख्रीस्ती, इस्लाम और हिन्दु.

हे पी. के. !! आपका कौनसा धर्म है?
मेरा धर्म इस्लाम है.
आपके धर्ममें कौनसी अंधश्रद्धा है जिसको आप सामाजिक बुराईयोंके संदर्भ, प्रमाणभानके आधार पर प्राथमिकता देंगे?
पी. के. समझता है कि मुस्लिमोंकी अंधश्रद्धा वह शराब बंधी है, और वह भी प्रार्थना स्थलपर शराब बंधी है.
अब देखो पी. के. क्या करता है? वह मस्जिदके अंदर तो शराब ले नहीं जाता है. इस्लामके अनुसार शराब पीना मना है. लेकिन उसकी सजा खुदा देगा. शराबसे नुकशान होता है. अपने कुटूंबीजनोंको भी नुकशान होता है. शराब पीनेवालेको तो आनंद मिलता है. लेकिन पीने वालेके आनंदसे जो धनकी कमी होती है उससे उसके कुटुंबीजनोंको पोषणयुक्त आहार नहीं मिलता और जिंदगीकी सुचारु सुवाधाओंमें कमी होती है या/और अभाव रहेता है. शराब कोई आवश्यक चिज नहीं है. शराबके सेवनके आनंदसे शराबको पीनेवालेको तो नुकशान होता ही है. शराब पीना इस्लाम धर्मने मना है. किन्तु क्या इस्लामकी प्राथमिकता शराबबंधी है?

इस्लाममें क्या कहा है? इस्लामने तो यह ही कहा है कि, इस्लामके उसुलोंका प्रचार करो और जिनको मुसलमान बनना है उन सबको मुसलमान बनाओ. जब तक अन्य धर्मी तुमको अपने घरमेंसे निकाल न दें उसका कत्ल मत करो. उसका अदब करो.
क्या मुसलमानोंने यह प्रणाली निभाई है?
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. इसका अर्थ यह है कि भारतमें सब लोगोंको अपना अपना धर्म और प्रणालीया मनानेकी स्वतंत्रता है. इस स्वतंत्रताका आनंद लेनेके साथ साथ दुसरोंको नुकशान न हो जाय इस बातका ध्यान रखना है.

इस बातको ध्यानमें रखते है तो मुसलमान अगर शराब पीये या न पीये उससे अन्य धर्मीयोंको नुकशान नहीं होता है. अगर कोई मस्जिदमें जाता है तो वह वहां ईश्वरकी इबादतके बदले वह शराबी नशेमें होनेके कारण दुसरोंको नुकशान कर सकता है. इसलिये पूर्वानुमानके आधार पर इस्लामने शराब बंदी की है. यह बात तार्किक है. किन्तु यदि इसमें किसीको अंधश्रद्धा दिखाई देती है यह बात ही एक जूठ है.

तो पी. के. ने ऐसे जूठको क्यों प्राथमिकता दी?
प्राथमिकता क्या होनी चाहिये थी?
यदि अंधश्रद्धाको भारत तक ही सीमित रखना है तो, मुसलमानोंने किये दंगे और कत्लोंको प्राथमिकता देनी चाहिये थी. आतंकीयों और स्थानिक मुसलमानोंने मिलकर हिन्दुओंकी धर्मके नाम पर कत्लें की, हिन्दुओंको यातनाएं दी और दे भी रहे है वह भी तो अंधश्रद्धा है.

मुस्लिमोंकी अंधश्रद्धा क्या है?
इस्लामको अपनानेसे ही ईश्वर आपपर खुश होता है. अगर आपने इस्लाम कबुल किया तो ही वह आपकी प्रार्थना कबुल करेगा और आपके उपर कृपा करेगा.
ईश्वर निराकार है इस लिये उसकी कोई भी आकारमें प्रतिकृति बनाना ईश्वरका अपमान है. अगर कोई ईश्वरकी प्रतिकृति बनाके उसकी पूजा करगा तो उसके लिये ईश्वरने नर्ककी सजा निश्चित की है.
इस बातको छोड दो.

अन्य धर्मीयों की कत्ल करना तो अंधश्र्द्धा ही है.

१९९०में कश्मिरमें ३०००+ हिन्दुओंकी मुसलमानोंने कत्ल की. मुसलमानोंने अखबारोंमें इश्तिहार देके, दिवारों पर पोस्टरें चिपकाके, लाउड स्पीकरकी गाडीयां दौडाके, और मस्जीदोंसे घोषणाए की कि, अगर कश्मिरमें रहेना है तो इस्लाम कबुल करो, या तो इस मुल्कको छोड कर भाग जाओ, नहीं तो कत्लके लिये तयार रहो. इस एलान के बाद मुसलमानोंने ३००० से भी ज्यादा हिन्दुओंकी चून चून कर हत्या की. पांचसे सात लाख हिन्दुओंको अपना घर छोडने पर विवश किया. इस प्रकर मुसलमानोंने हिन्दुओंको अपने प्रदेशसे खदेड दिया.
आज तक कोई मुसलमानने हिन्दुओंको न्याय देनेकी परवाह नहीं की. इसकी वजह सिर्फ और सिर्फ मुसलमानोंकी अंधश्रद्धा ही तो है. लाखोंकी संख्यामें अन्यधमीयोंको २५ सालों तक यातनाग्रस्त स्थितिमें चालु रखना आतंकवाद ही तो है. यह तो सतत चालु रहेनेवाला आतंकवाद है. इससे बडी अंधश्रद्धा क्या हो सकती है?

किन्तु पी. के. ने इस आतंकवादको छूआ तक नहीं. क्यों छूआ तक नहीं?
क्यों कि वह स्वयंके धर्मीयोंसे भयभित है. जो भयभित है वह ज्यादा ही अंधश्रद्धायुक्त होता है. पी. के. खुद डरता है. उसके पास इतनी विद्वत्ता और निडरता नहीं है कि वह सच बोल सके.
कश्मिरके हिन्दुओंको लगातार दी जाने वाली यातनाओंको अनदेखी करना विश्वकी सबसे बडी ठगाई और दंभ है. इस बातको नकारना आतंकवादको मदद करना ही है. उसकी सजा सिर्फ और सिर्फ मौत ही हो सकती है.

तो फिर पी. के. ने किसको निशाना बनाया?

पी. के. ने बुत परस्तीको निशाना बनाया.
लेकिन क्या उसने पूर्व पक्ष को रक्खा? नहीं. उसने पूर्वपक्षको जनताके सामने रक्खा तक नहीं.
क्यों?
क्यों कि, वह अज्ञानी है. अद्वैतवादको समझना उसके दिमागके बाहरका विषय है. अद्वैतवाद क्या है? अद्वैतवाद यह है कि ईश्वर, सर्वज्ञ, सर्वयापी और सर्वस्व है. विश्वमें जो कुछ भी स्थावर जंगम और अदृष्ट है वे सब ईश्वरमें ही है. उसने ब्रह्माण्डको बनाया और आकर्षणका नियम बनाया फिर उसी नियमसे उसको चलाने लगा. उसने मनुष्यको बुद्धि दी और विचार करने की क्षमता दी ताकि वह तर्क कर सके. अगर वह तर्क करेगा तो वह तरक्की करेगा. नहीं तो ज्योंका त्यों रहेगा, या उसका पतन भी होगा और नष्ट भी होगा. ईश्वरने तो कर्मफलका प्रावधान किया और समाजको सामाजिक नियमो बनानेकी प्रेरणा भी रक्खी. जो समाज समझदार था वह प्रणालियोंमें उपयुक्त परिवर्तन करते गया और शाश्वतता की और चलता गया.
हिन्दु समाज क्या कहेता है?
सत्यं, शिवं और सुंदरं
सत्य है उसको सुंदरतासे प्रस्तूत करो तो वह कल्याणकारी बनेगा.
कल्याणकारीसे आनंद मिलता है वह स्थायी है.
आनंद स्थायी तब होता है जब भावना वैश्विक हो. न तो अपने स्वयं तक, न तो अपने कुटुंब तक, न तो अपने समाज तक, न तो अपनी जाति तक, मर्यादित हो, पर वह आनंद विश्व तक विस्तरित हो.
विश्वमेंसे जो कुछ भी तुम्हे मिलता है उसमेंसे विश्वको भी दो (स्वाहा).
यज्ञकी भावना यह है.
शिव तो तत् सत् है. ब्रह्माण्ड स्वरुप अग्निको उन्होने उत्पन्न किया. जो दृश्यमान अग्नि है वह यज्ञ है. अग्नि यज्ञ स्वरुप है. अग्निने आपको जिवन दिया. आप अग्निको भी तुष्ट करें और शांत भी करें. हिन्दुओंके लिये ईश्वरी शक्तियां अपने जिवन प्रणालीका एक भाग है. शिव लिंग एक ज्योति है. उसको जो स्वाहा करेंगे वह धरतीके अन्य जीवोंको मिलेगा. जीनेका और उपभोग करनेका उनका भी हक्क है.
तुम्हे ये सब अपनी शक्तिके अनुसार करना है. तुम अगर शक्तिमान नहीं हो तो मनमें ऐसी भावना रखो. ईश्वर तुम्हारी भावनाओंको पहेचानता है. संदर्भः “शिवमानसपूजा”

यदी पी. के. ने “अद्वैत” पढा होता तो वह शिव को मजाकके रुपमें प्रस्तूत न करता.

मनुष्य एक ऐसी जाति है कि इस जातिमें हरेक के भीन्न भीन्न स्वभाव होते है. यह स्वाभाव आनुवंशी, ज्ञान, विचार और कर्मके आधार पर होते है. इसलिये उनके आनंद पानेके मार्ग भी भीन्न भीन्न होते है. ध्यान योग, ज्ञान योग, कर्मयोग और भक्तियोग इस प्रकार चार योग माने गये है. अपने शरीरस्थ रासायणोंके अनुसार आप अपना मार्ग पसंद करें. हिन्दुओंके लिये ईश्वरकी उपासना एक प्रकृति उपासनाका काव्य है. काव्य एक कला है जिनके द्वारा तत्त्वज्ञान विस्मृतिमें नही चला जाता है. मूर्त्ति भी ईश्वरका काव्य है.

तो क्या पी. के.ने विषयके चयनमें सही प्राथमिकता रक्खी है?
नहीं. पी. के. को प्राथमिकताका चयन करने की या तो क्षमता ही नहीं थी या तो उसका ध्येय ही अंधश्रद्धाका निर्मूलन करना नहीं था. उसका ध्येय कुछ भीन्न ही था.

प्राथमिकता की प्रज्ञाः
अगर आपके घरमें चार चूहे और एक भेडिया घुस गये है तो किसको निकालनेकी प्राथमिकता आप देंगे?
चूहे चार है. भेडिया एक है. चार संख्या, संख्या एकसे ज्यादा है. तो भी जो ज्यादा नुकशानकारक है वह भेडिया है. इसलिये यहां पर प्रमाणभान स्वरुप संख्या नहीं है. किन्तु नुकशानका प्रमाणभान रखना है.
एक अरब हिन्दु है. २० करोड मुस्लिम है. लेकिन दंगे मुस्लिमोंने ज्यादा किया. अत्याचार भी मुस्लिमोंने ज्यादा किया. इसलिये समाजको होने वाले नुकशानके प्रमाणभानके अधारपर मुस्लिम अंधश्रद्धाको हिन्दुओंकी तथा कथित अंधश्रद्धाके विषयोंकी अपेक्षा ज्यादा प्राथमिकता देनी चाहिये.
किन्तु पी. के. ने ऐसा नहीं किया.

प्रमाणभानकी प्रज्ञाः
शिवलिंग पर दूध चढाना दूधका व्यय है. वह दूध गरीबोंके बच्चोंके मूंहमें जाना चाहिये.

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दूधका व्यय है या नहीं? अगर व्यय है तो भी कितना व्यह है? किसका व्यय है? किसका पैसा है? किसकी कमाई है? क्या ईश्वरके उपर दूध चढाना अनिवार्य बनाया गया है? ऐसा कोई आदेश भी है?
दूधके पैसे तो पी. के.के या औरोंके है ही नहीं. दूधके पैसे तो दूध डालनेवालेके अधिकृत पैसे है. उसको कोई “लेन्ड ओफ लॉ” या और किसीकी सत्तका भी आदेश नहीं है, कि वह दूध डाले. किसी “लॉ ऑफ ध लेन्ड”ने उसे विवश भी नहीं किया है, कि वह दूध डाले. अगर वह दूध न डाले को उसको कोई दंड देनेवाला भी नहीं है. दूधका प्रमाण भी निश्चित नहीं है. वह अपनी ईच्छाके अनुसार दूध डाल सकता है या न भी डाले. वह अपनी मान्यताके अनुसार समझता है कि उसने कोई व्यय नहीं किया. क्यों कि विश्वने उसको दिया है वह उसमेंसे थोडा विश्वको वापस देता है. जो गाय है उससे वह आभारवश है और उसको भी वह सब देवोंका निवास समझता है और वह गायके प्रति आभारवश है (थेन्क फुल है. थेंकलेस नहीं है) वह गायको माता समझता है.
वह यह समझता है कि दूध चढाना कोई पाप नहीं है. खुदके पैसे है. अपने पैसे का कैसे उपयोग करना वह उसकी पसंद है. खुदकी पसंदका निर्णयकरना उसका अधिकार है.

आप कहोगे, वह जो कुछ भी हो, दूधका तो व्यय हुआ ही न? उसका क्या?
वह हिन्दु कहेता है; अगर आप गायको, भैंषको खाते है तो क्या आनेवाले दूधका घाटा नहीं हुआ?
वह आगे कहता है कि हम तो दूधसे अपनी भावना ईश्वरके प्रति प्रकट करते है. और इससे धरतीके जिवजंतुओंकी पुष्टि करते हैं ताकि धरतीकी फलद्रुपता बढे. हम गायका या ऐसे पशुका बली तो नहीं चढाते है ताकि विश्वमें दूधका स्थायी घाटा हो जाय.

वह आगे कहेता है, कि हमारा पावभर दूध ही क्यों आपकी नजरमें आता है?
हम जो टेक्ष भरते है, उनमेंसे एक बडा हिस्सा गवर्नर और राष्ट्रप्रमुखके और उसकी सुविधाओंके और मकानके रखरखावमें जाता है. टेक्ष द्वारा पैसा देना तो हमारे लिये अनिवार्य है और उसके लिये हम विवश भी है. हमारे पैसे का यह व्यय ही तो है. इसका प्रमाण भी तो बहुत बडा है. यह भी तो एक अंधश्रद्धा मात्र है. आपकी प्राथमिकता तो इस व्यय के विषय पर होनी चाहिये. क्यों आपकी प्रमाणभानकी प्रज्ञा इस बातको नहीं देख सकती?

आप खुद करोडों रुपये कमाते हो. आपको खानेके लिये कितना चाहिये? आपको कितना बडा मकान चाहिये? आप दाल चावल रोटी खाके आनंद पूर्वक जिन्दा रह सकते है, और बाकीके पैसोंसे हजारों कीलो दूध गरीबोंको बांट सकते है. लेकिन आप ऐसा नहीं करते है, क्यों कि दूसरे आप जैसे कई लोग ऐसा नहीं करते हैं. आप उन्हीकी प्रणालीको अनुसरते है. तो यह आपकी भी तो अंधश्रद्धा है. आपकी अंधश्रद्धा तो हमसे भी बडी है. आपकी प्राथमिकतामें वह क्यों नही आयी? अगर आप स्वयंकी कमाईको कैसे खर्च करें उसमें अपनी मुनसफ्फी चलाते हैं तो हमारे लिये क्यों अलग मापदंड?
ऐसी तो कई बातें लिखी जा सकती है.
(क्रमशः)
शिरीष मोहनलाल दवे
टेग्झः पी. के. , योग्यता, नीति शतक, सत्य, प्रिय, उपदेश, पूर्वपक्ष, प्रतिपक्ष, खंडन, बौद्धिक चर्चा, तर्क, शुद्ध, संस्कृति, संस्कृत, दुराचारी, शराब बंधी, विषय चयन, प्राथमिकता, संवाद, विसंवाद, वितंडावाद, ध्येय, हेतु, संघर्ष, ज्ञान, अंधश्रद्धा, प्रणाली, आतंक, धर्म, मुस्लिम, इस्लाम, ख्रिस्ती, धर्म निरपेक्ष, मस्जिद, धर्मस्थान, धर्मगुरु, दंगा, कत्ल, ईश्वर निराकार, प्रतिकृति, काव्य, कश्मिर, ओमर, फारुख, अद्वैतवाद, कर्मफल, सत्यं, शिवं, सुंदरं, कल्याणकारी, वैश्विक, प्रमाणभान, प्रज्ञा, लॉ ऑफ ध लेन्ड

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अनीतियोंसे परहेज (त्यागवृत्ति) क्यों? जो जिता वह सिकंदर (नहेरुवीयन कोंग रहस्य)-५
(इस लेखको “अनीतियोंसे परहेज क्यों? जो जिता वह सिकंदर-४” के अनुसंधानमें पढें)

नहेरुवीयन कोंग्रेसने २००४का चूनाव कैसे जिता?

अटल बिहारी बाजपाइने अच्छा शासन किया था. उन्होने चार महामार्ग भी अच्छे बनाये थे जो विकसित देशोंकी तुलनामें आ सकते थे. बीजेपीका गठबंधन एनडीए कहा जाता था. उसमें छोटे मोटे कई पक्ष थे. एनडीएके मुख्य पक्ष जेडीयु, बीएसपी (मायावती), टीएमसी (ममता), डीएमके (करुणानिधि), एडीएमके (जयललिता जिसने समर्थन वापस ले लिया था), टीडीपी, शिवसेना आदि थे.
मायावती, ममता और डीएम न्युसंस वेल्यु रखते थे. बिहार, युपी और आन्ध्रमें स्थानिक गठबंधन पक्षका एन्टीइन्कंबन्सी फेक्टर बीजेपीको नडा. इससे एनडीए को घाटा हुआ और बीजेपीको भी घाटा हुआ. राजस्थानमें और गुजरातमें भी थोडा घाटा हुआ.

लेकिन घाटा किन कारणोंसे कैसे हुआ?

देशके सामने सबसे बडी समस्याएं क्या है?

बेकारीः यानी कि आर्थिक कठीनायीयोंसे जीवन दुखमय

विकासका अभावः भूमिगत संरचनाका (ईन्फ्रास्ट्रक्चरका) अभाव, और इससे उत्पादन और वितरणमें कठिनायीयां,

शिक्षा और प्रशिक्षाका अभावः इससे समस्याको समझनेमें, उसका निवारण करके उत्पादन करनेमें कौशल्यका अभाव,

अभाव तो हमेशा सापेक्ष होता है लेकिन समाजकी व्यवस्थाके अनुसार वह कमसे कम होना चाहिये.

बाजपाई सरकारने बिजली, पानी और मार्गकी कई योजनायें बनायी और लागु की, लेकिन पूर्ण न हो पायी. वैसे तो हर रोज औसत १४ किलोमीटरका पक्का मार्ग बनता था जो कोंग्रेसकी सरकारमें एक किलोमिटर भी बनता नहीं था.

बिजलीकी योजना बनानेमें और पावर हाउस बननेमें समय लग जाता है.
भारत विकसित देशोंसे १०० सालसे भी अधिक पीछे है.

स्थानिक नेतागण और सरकारी कर्मचारी भ्रष्ट होनेसे हमेशा अपनी टांग अडाते है यह बात विकासकी प्रक्रियाको मंद कर देते है. तो भी बाजपाईके समयमें ठीक ठीक काम हुआ लेकिन ग्रामीण विस्तार तक हवा चल नहीं पायी.

जब ऐसा होता है तो नहेरुवीयन कोंग्रेस ग्रामीण जनताको और शहेरकी गरीब जनताको विभाजित करनेमें अनुभवी और कुशल रही है. गुजरातमें ऐसा करनेमें नहेरुवीयन कोंग्रेस ज्यादा सफल नहीं हुई, लेकिन इसका प्रभाव जरुर पडा. अन्य राज्योंमें वह जरुर सफल रही.

समाचार माध्यमोंकी बेवकुफी या ठग-विद्या

समाचार माध्यमोंका भी अपना प्रभाव रहेता है, भारतके समाचार माध्यमके कोलमीस्ट, विश्लेषण करनेमें प्रमाणभानका ख्याल न रखकर अपनी (विवादास्पद) तटस्थता प्रदर्शित करनेका मोह ज्यादा रखते है. भारतमें समाचार माध्यमोंका ध्येय जनताको प्रशिक्षित करनेका नहीं है. भारतके समाचार माध्यम हकिकतके नाम पर जातिवादी और धार्मिक भेदभाव के बारेमें किये गये उच्चारणोंको ज्यादा ही प्रदर्शित करतें है. “नरेन्द्र मोदीने गुजरातमें पटेल नेताओंको अन्याय किया है…. गुजरातमें ब्राह्मण अब मंत्रीपद पर आने ही नहीं देंगे…. मुस्लिमोंको टिकट ही नहीं दी है…” आदि..

समाचार माध्यमों को चाहिये कि वे जातिवाद और धर्मवादकी भ्रर्स्तना करें. लेकिन ऐसा न करके इन लोंगोंका चरित्र ऐसा रहता है कि मानो, मंत्रीपद और टिकट देना एक खेरात है.

२००९ का चूनाव नहेरुवीयन कोंग्रेसने कैसे जिता?

२००९का चूनाव बीजेपीको जितनेके लिये एक अच्छा मौका था.

२००८में सीमापारके और भारतस्थ देशविरोधी आतंकीयोंने कई शहेरोंमें बोम्ब ब्लास्ट किये, और नहेरुवीयन कोंग्रेसकी सतर्क और सुरक्षा संस्थायें विफल रही थीं, यह सबसे बडा मुद्दा था.

लेकिन नहेरुवीयन कोंग्रेसने रणनीति क्या बनायी?

नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके साथी पक्षोंने उसका सामान्यीकरण कर दिया. वह कैसे? वह ऐसे …

“बोंम्ब ब्लास्ट तो बीजेपी शासित राज्योंमें भी हुआ है,

“संसद पर आतंकवादी हमला हुआ था, तब केन्द्रमें बीजेपीका ही तो शासन था,

“बीजेपीके मंत्री विमान अपहरण के किस्सेमें यात्रीयोंको मुक्त करनेके लिये खुद बंधक आतंकीयोंको लेकर कंदहार गये थे और आतंकीयोंको, विमान अपहरणकर्ताओंको सोंप दिया था.

इन सबको मिलाके जनताको यह बताया गया कि, आतंकवाद एक अलग ही बात है और इसके उपर सियासत नहीं होनी चाहिये.

दूसरी ओर, फिलमी हिरो-हिरोईन और अखबारी मूर्धन्यों और महानुभाव जो प्रच्छन रुपसे नहेरुवीयन कोंग्रेसके तरफदार थे वे लोग सडकपर आ गये. उन्होने प्रदर्शन किये कि पूरा शासक वर्ग निकम्मा है और हमारी सुरक्षा व्यवस्था मात्र, असफल रही है चाहे शासकपक्ष कोई भी हो.

वास्तवमें यह सब बातें आमजनताको असमंजसमें डालनेके लिये थी.

हिमालयन ब्लन्डर्स या हिमालयन्स स्केन्डल्स

नहेरुवीयन कोंग्रेसके विरुद्धमें क्या था जिसको दबा दिया गया?

नहेरुवीयन कोंग्रेस कश्मिरमें सत्ताकी हिस्सेदार थी तो भी ३००० हिन्दुओंका खुल्लेआम कत्ल कर दिया जाता था. ऐसा करनेसे पहेले सीमापारके और स्थानिक आतंकीयोंने खुल्लेआम दिवारोंपर पोस्टर चिपकाये थे, अखबारोंमें लगातार सूचना दी गई और खुल्ले आम लाऊड-स्पीकरोंसे घोषणा करवाने लगी कि हिंदु लोग या तो इस्लाम कबुल करे या तो जान बचाने के लिये कश्मिर छोड कर भाग जावे. कश्मिर सिर्फ मुस्लिमोंका है. न तो स्थानिक सरकारने उस समय कुछ किया न तो केन्द्रस्थ सरकारने कुछ किया. क्यों कि केन्द्रस्थ सरकार दंभी धर्मनिरपेक्षता वाली थी. नरसिंहरावकी कोंग्रेस सरकार जो केन्द्रमें आयी थीं उस सरकारने भी कुछ किया नहीं था. इस कारणसे आतंकवादका अतिरेक हो गया और मुंबईमें सीरीयल बोंब ब्लास्ट हुए. नहेरुवीयन कोंग्रेसने कहा कि यह तो बाबरी मस्जिद ध्वंशके कारण हुआ. लेकिन वह और समाचार माध्यम इस बात पर मौन रहे कि कश्मिरी हिन्दुओंको क्युं मार दिया गया और उनको क्युं अपने घरसे और राज्यसे खदेडा गया? वास्तवमें बाबरी ध्वंश तो एक बहाना था. आतंकवादी हमले तो लगातार चालु ही रहे थे.

खुदके स्वार्थके लिये देशकी सुरक्षाका बलिदान और आतंकीयोंसे सहयोग.

कश्मिरके मंत्रीकी लडकी महेबुबाका अपहरण आतंकवादीयोंने किया था. यह एक बडी सुरक्षाकी विफलता थी जिसमें राज्यकी सरकार और केन्द्रकी नहेरुवीयन कोंग्रेसी सरकार भी उत्तरदायी थी. इस लडकीके पिता जो शासक पक्ष के भी थे और मंत्री भी थे. उनको चाहिये था कि वे अपनी लडकीका बलिदान दे. लेकिन उन्होने ऐसा नहीं किया और उन्होने पांच बडे आतंकवादी नेताओंको मुक्त किया. उनको पकडनेकी कोई योजना भी बनाई नहीं. यह एक बडा गुन्हा था. क्योंकि खुदके स्वार्थके लिये उन्होने देशकी सुरक्षाके साथ समझौता किया. बीजेपीकी सरकारने जो आतंकीयोंकी मुक्ति की थी वे आतंकी तो अन्य देशके और उनको मुक्त भी दुश्मन देशमें किया था, और अपहृत विमानयात्रीयोंको छूडानेके लिये किया था. उनका कोई निजी स्वार्थ नहीं था.

लेकिन नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके साथी पक्षने जो मुक्ति की थी वह तो अपने ही देशमें की थी. मुक्ति देनेसे पहेले नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके साथी पक्षकी सरकार आतंकीयोंके शरीरमें विजाणु उपकरण डालके उसका स्थान निश्चित करके सभी आतंकवादीयोंको पकड सकती थी.

कोंगी और उसके साथी पक्षने की हुई आतंकीयोंकी मुक्ति तो बीजेपी की विफलतासे हजारगुना विफल थी उतना ही नहीं लेकिन आतंकीयोंसे मिली जुली सिद्ध होती है.
इन सभी बातोंको उजारगर करनेमें समाचार माध्यमके पंडित या तो कमअक्ल सिद्ध होते है या तो ठग सिद्ध होते है. समाचार माध्यम का प्रतिभाव दंभी और बिकाउ इस लिये लगता है कि उन्होने बीजेपीके नेताओंके बयानोंको ज्यादा प्रसिद्धि नहीं दी.

भारतीय संसद – कार्गील पर हमला और बीजेपी

कश्मिर – हिमालय पर हमला और नहेरुवीयन कोंग्रेस

बाजपाई सरकारको सुरक्षा और सतर्कता विभाग जो मिला था वह नहेरुवीयन कोंग्रेस की देन थी. बीजेपी सरकार इस मामलेमें बिलकुल नयी थी. बीजेपीकी इमानदारी पर शक नहीं किया जा सकता था.

कार्गील बर्फीला प्रदेश है. वहां पर जो बंकर है उनको शर्दीके समयमें हमेशा खाली किया जाता था. दोनों देशों की यह एक स्थापित प्रणाली थी. भारतीय सुरक्षा दलोंने १९९९में भी ऐसा किया. पाक सैन्यने पहेले आके भारतीय बंकरोंके उपर कब्जा कर लिया. बाजपायी सरकारने युद्ध करके वह कब्जा वापस लिया.

अब देखो नहेरुवीयन कोंग्रेसने अबतक क्या किया था?

१९४८में भारतीय सैन्यने पूरे कश्मिर पर कब्जा किया था, नहेरुवीयन कोंग्रेसने १/३ कश्मिर, पाकिस्तानको वापस किया.

१९६२ चिनके साथके युद्धमें नहेरुवीयन कोंग्रेसने, भारतका ७१००० चोरसमिल प्रदेश गंवाया. संसदके सामने उस प्रदेशको वापस लेनेकी कसम खानेके बावजुद भी आजतक नहेरुवीयन कोंग्रेसने उस प्रदेशको वापस लेनेका सोचा तक नहीं है.

१९६५ नहेरुवीयन कोंग्रेसने छाडबेट (कच्छ) का प्रदेश पाकिस्तानको दे दिया. १९७१में पाकिस्तानके साथके युद्धमें हमारे सैन्यने पाकिस्तानके कबजे वाले कश्मिरका जो हिस्सा जिता था और उसके उपर भारतके संविधानके हिसाबसे भारतका हक्क था, वह हिस्सा, इन्दिरा गांधीने सिमला समझौते अंतर्गत पाकिस्तानको वापस दे दिया.

बंग्लादेशी घुसपैठोंने उत्तरपूर्व भारतमें कई भूमिखंडोपर कब्जा कर लिया है.
आजतक नहेरुवीयन कोंग्रेस अपने शासनकालमें खोये हुए भूमिखंडोंको वापस लानेमें सर्वथा विफल रही है. वह सोचती भी नहीं है कि इनको वापस कैसे लें.
बीजेपी ही एक ऐसा शासक रही कि उसने अपने शासनकालमें जो भूमिखंड गंवाये वे वापस भी लिये.

संसदको उडानेका आतंकी हमला बीजेपी की सरकारने विफल बनाया.
इस फर्कको समझनेमें नहेरुवीयन कोंग्रेस तो समझनेको तयार न ही होगी, वह उसके संस्कारसे अनुरुप है, लेकिन समाचार माध्यम क्यों विफल रहा या तो बुद्धु साबित हुआ है? तो ऐसे समाचार माध्यमोंसे हम जनता प्रशिक्षणकरणकी अपेक्षा कैसे रख सकते है?

आज भी कई अखबारी मूर्धन्य है जो तटस्थताकी आडमें आम जनताको असमंजसमें डालते है. ऐसे वातावरणमें जनता निस्क्रीय बन जाती है.

२०१४के चूनावमें नहेरुवीयन कोंग्रेस का रवैया कैसा रहेगा?

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

देशको बचाओ
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