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Posts Tagged ‘केज्री’

कोंगी गेंग पुलवामा हमले पर अपनी रोटी शेकने लिये सज्ज है

कोंगी गेंग पुलवामा हमले पर अपनी रोटी शेकने लिये सज्ज है

सावधान भारत

जब पुलवामा पर आतंकी हमला हुआ था तो पूरे देशमें पाकिस्तानके विरोधमें आक्रोश प्रकट हुआ, तो अधिकतर जनता को लगा कि, कोंगी पक्ष इस हमले को सियासती मुद्दा नहीं बनायेगी.

लेकिन जो लोग कोंगीका चरित्र जानते है उनको तो मालुम ही था कि, कोंगी गेंग, इस घटनासे सियासती लाभ लेनेकी चेष्टा ही नहीं किन्तु भरपुर लाभ लेनेके लिये अफवाहें तक फैलाएगी.

वास्तवमें पुलवामा-हमला एक पूर्वनियोजित सुनियोजित हमला है इस बातको नकारा नहीं जा सकता.

जो जवान शहीद हो गये उनके शव अपने घर पहुंचे और उनका अग्निसंस्कार हो जाय, उसके पहेले ही कुछ कोंगी-गेंग के सदस्योंने (रणवीर सुरजेवाला, शशि थरुर, ओमर, केज्री … ) बीजेपी पर आक्रमण करनेका प्रारंभ कर दिया है.

जूठ बोलना कोंगीयोंकी और उनके मीडीया मूर्धन्योंकी लिये जन्मजात आदत है.

मैं शपथ लेता हूँ

फर्जी घटनाएं पैदा करना भी कोंगी गेंगके लिये स्वभाव जन्य है.

(१) आपने देखा होगा कि राफेल मामलेमें मीडीया गुरु “हिन्दु”ने बेशर्मीसे पीएमओ के एक अधिकारीकी भ्रमित करनेवाली टिपणी को दिखाया, और सुरक्षा मंत्री स्वयंकी टिपणीको छिपाया. रा.गा.को  (रा.घा. राहुल घांडीको) लगा कि उसको ब्रह्मास्र मिल गया. और रा.घा.ने उसको ले के पत्रकार परिषद भी बुलाई. मोदीको बदनाम करनेका परिपूर्ण प्रयत्न किया. ये पूरा नाटक जनताको गुमराह करने वाला आयोजनका एक हिस्सा था. “हिन्दु” के मालिकने तो कहा कि क्या दिखाना और क्या नहीं दिखाना वह उसकी मुनसफ्फी की बात है. यह कुछ दिखाना और कुछ न दिखाना और अपनी कार्यसूचिके अनुसार जनताको गुमराह करना कोंगी गेंगकी पूराना चारित्र है. बीजेपी ने इसका पर्दाफास किया.

(२) “भारतमें इतना काला धन है कि यदि उसको वितरित किया जाय तो हर भारतवासीको १५ लाख रुपये मिल सके” नरेन्द्र मोदीके इस कथनका इस प्रकार प्रसार किया कि बीजेपीके सत्ता पर आनेसे कालाधान पकडा जायेगा और भारतवासीयोंमे यह धन बाँटा जायेगा. “हर भारतवासीको १५ लाख रुपये मिलेगा”.

(३) गुजरातके २००२ दंगेके बाद जब अटलजी गुजरात आये तो तो उन्होंने बोला था कि “मुख्य मंत्रीका फर्ज होता है राजधर्म बजाना” बाजपाईके बगलमें पास बैठे नरेन्द्र मोदीने कहा “हम राजधर्म ही बजा रहे हैं”. तब अटलजीने कहा “हमें विश्वास है कि मोदीजी राजधर्म बजा रहे है”.

लेकिन मोदी विरोधियोंने “मुख्यमंत्रीका फर्ज होता है राजधर्म बजाना” इस बातको ही पकड लिया और वे हमेशा  बार बार इसीबातका प्रचार करते रहे और यही कहेते रहे कि मोदीने राजधर्म का पालन नहीं किया. ऐसी अफवाह फैलानेमें कोंगी-गेंग और बीजेपी-विरोधी अन्य गेंगे भी सामेल हो गयी थीं. आज तक ये जूठ चल रहे हैं.

(४) इन्दिरा गांधीने कोंगीका विभाजन करनेके समयमें ऐसा ही प्रचार किया कि; “मेरे पिताजीको तो बहुत कुछ करना था लेकिन ये बुढ्ढे लोग (कामराज, अतुल्य घोष, सादोबा पाटिल, मोरारजी देसाई … अदि) उनको करने नहीं देते थे. इन्दिरासे किसीने यह नहीं पूछा कि वह इसके आधारमें कुछ उदाहरण तो दें.  नहेरुका जनहित का कौनसा काम था  जो नहेरु करना चाहते थे, पर “उन बुढ्ढे लोगोंने नहेरुको न करने दिया हो.” मीडीयाको खिलाना पीलाना तबसे इन्दिरा गांधीने शुरु कर दिया था.

“मोदीको हटाना है” कोंगीका पुराना प्लान है

मणीशंकर अय्यर पाकिस्तान गये थे, और उन्होंने पाकिस्ताको खुलेआम कहा था कि, आपको मोदीको हटाना है. जब पाकिस्तानमें गवर्नमेन्ट, आतंकवादी संगठन, दाउद, आई.एस.आई. और सेना एक साथ हो तब “आपको मोदीको हटाना है” उसका मतलब साफ है कि भारतमें दंगा करवाओ, भारतमें आतंकवादी हमले करवाओ, भारतमें मोदी विरुद्ध माहोल बनवाओ या मोदीको मार दो.

कोंगी कहेती है;

“फर्जी बाते करना, निराधार आरोप करना और भारतके मीडीयाको खरिद लेना तो हमें खूब आता है, और आप यदि हमने दिखाये काम करोगे तो हमारा बीजेपीको हरानेका  काम अति आसान हो जायेगा.

“यदि मोदीको हम लोग कैसे भी हटा पाये तो, हमारी दुकाने फुलफेज़में चालु हो जायेगी और हमारे उपर जो न्यायिक कार्यवाही चल रही है वह भी समाप्त हो जायेगी.

“सी.बी.आई., न्यायतंत्र, चूनाव आयुक्त, ब्युरोक्रसी आदि तो हमारे पालतु पोपट है क्यों कि हमने इनके अधिकारीयोंका बहुत काम किया है और हमने उनकी सहायता भी बहूत की है. इसी लिये तो हम जनताको कहेते है और परोक्ष रुपसे इन संस्थाओंके अधिकारीओंको चेतावनी भी देते हैं कि यदि आपने हमारे विरुद्ध गंभिर कार्यवाही की तो याद रक्खो हम तुम्हें छोडेंगे नहीं. क्यूं कि हमने इनको पोपट बना दिया था, हमें डर है कि बीजेपीके ये लोग पोपट न बन जाय. इस लिये हम बीजेपी उपर (भले ही निराधार) आरोप लगा रहे है कि बीजेपीने इन संस्थाओंकी स्वतंत्रता छीन ली है. हम कैसे है, वह तो इन अधिकारीयोंको खूब मालुम है. हम जब पुरा “शाह जाँच आयोग”को और उनके संबंधित सभी दस्तावेजोंको तहस नहस कर सकते है तो ये न्यायालय, ब्युरोक्रसी, चूनाव आयोग, सी.बी.आई. क्या चीज़ है?  हमने क्या ६५ वर्ष के हमारे शासनमें जख मारा है?

“अब देखो हम क्या करने वाले है!!

“हमारे मूर्धन्य लोग चालाकी पूर्वक समाचार पत्रोंमें लेख लिखते रहेंगे;

“हमारे समाचार पत्र, हमारी लिये हमारे अनुकूल समाचारकी  शिर्ष रेखाएं प्रकाशित करेंगे या तो बीजेपीके प्रतिकुल समाचारों की शिर्ष रेखाएं बनाएंगे,

“हमारे कुछ लोग प्रो-बीजेपीका मुखवटा पहेनके कई सालोंसे बीजेपीमें घुसे हुए है;

ये बीजेपीके मुखवाटे वाले मोदीके उपर राम मंदिर निर्माणमें वचन न निभाना, वेद अनुरुप शिक्षाका प्रबंध न करना, वेदोंके अनुरुप संविधान न बनाना, उर्दु का सर्वनाश न करना, गौ-हत्या बंधी के अमल पर निस्क्रिय रहना, आदि के समर्थनमें लगातार चर्चा करते रहेंगे,   दुरात्मा गांधीको महात्मा क्यूँ कहेना, उसको राष्ट्र पिता क्यूँ कहेना?, गांधीने देशको विभाजित किया, गोडसेकी वीरताको पुनःस्थापित करो, शहीद भगत सिंहकी और गोडसेकी छबीको करन्सी नोटों पर स्थापित करो …. ऐसी चर्चा भी लगातार चलाया करेंगे,. बीजेपी, आरएसएसमें भी कई अल्पज्ञ, और अशिक्षित लोग है, उनका हमें सहारा मिलेगा और इससे हमारा उल्लु सीधा होगा. हम कोंगी गेंगवाले कोई कम नहीं है. हमने क्या वैसे ही हमारे बाल धूपमें सफेद किया है क्या? समज़ गये न, हम कौन है?

“हम कोंगी गेंगवाले राक्षस है. हम मायावी है. हमारा उल्लु सीधा कैसे करना वह हम खूब जानते है.

“आतंकवादी हमला करवाने तो हम सफल हुए. लेकिन थोडी हलकी रही.

“हम तो पूरे देशमें कोमी दंगा करवाने की ठानके बैठे थे. हमारे शासित राज्योंमें तो हमने थोडे दंगे करवानेकी कोशिस की, लेकिन हमारे शासित राज्योंमें हम अधिक दंगा नहीं करवा शकते यदि वे बीजेपी शासित राज्योंमें प्रसरते नहीं. इस लिये अभी यह काम हमने ठंडे बक्सेमें रक्खा है.

“हम कोंगी गेंगवाले सरासर जूठ द्वारा मोदीकी बुराई करते रहेंगे.

“ “राफेल” के विषयमें हम नरेन्द्र मोदीको चोर कहेते रहेंगे,

“नरेन्द्र मोदीने कोई भी विकास  नहीं किया और वह विकासका जूठ फैलाता रहेता है ऐसा कहेते रहेंगे,

“नरेन्द्र मोदीने दलित, किसान, मुस्लिम और अन्य अल्पसंख्यकोंके लिये कुछ भी नहीं किया ऐसा बोलते रहेंगे,

“नरेन्द्र मोदीने बेकारी बढाई ऐसा कहेते रहेंगे,

और खासम खास तो हम पुलवामा हमलेके बाद भी मोदीकी आँखें नहीं खूली, नरेन्द्र मोदी सिर्फ वाणीविलास करता रहा है और पुलवामा हमले बाद भी उसने निस्क्रियता दिखाई है. जब हमारे जवान मरते थे तब नरेन्द्र मोदी  नौका विहार करता था …  जब देशकी जनताने अपने चूल्हे बंद रक्खे थे तब नरेन्द्र मोदी गेस्टहाउसमें ज्याफत उडा रहा था … ऐसी तो कई बातें हमारे दिमागमें है उसको उजागर करते ही रहेंगे. कश्मिरकी स्थिति बिगाडने के लिये नरेन्द्र मोदी ही उत्तरदायी है. जब हमारा शासन था तब कश्मिरमें परम शांति थी और वह कश्मिरके लिये स्वर्णीम समय था. अब देखो, कश्मिरमें हररोज कोई न कोई मरता है.

शिरीष मोहनलाल दवे

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पाकिस्तानके बुद्धिजीवीयोंको चाहिये एक नरेन्द्र मोदी … और ….

नरेन्द्र मोदीकी कार्यशैलीके बारेमें अफवाहोंका बाज़ार अत्याधिक गरम है. क्यों कि  अब मोदी विरोधियोंके लिये जूठ बोलना, अफवाहें फैलाना, बातका बतंगड करना और कुछ भी विवादास्पद घटना होती है तो मोदीका नाम उसमें डालना, बस यही बचा है.

लेकिन, ऐसा होते हुए भी …

हाँ साहिब, ऐसा होते हुए भी … पाकिस्तानके (१०० प्रतिशत शुद्ध) बुद्धिजीवीयोंको चाहिये एक नरेन्द्र मोदी जैसा प्रधान मंत्री. बोलो. पाकिस्तान जो मोदीके बारेमें जानता है वह हमारे स्वयं प्रमाणित बुद्धिजीवी नहीं जानते.

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पाकिस्तानके १००% शुद्ध बुद्धि वाले हसन निस्सार साहिबने अपनी इच्छा प्रगट की है कि पाकिस्तानको चाहिये एक नरेन्द्र मोदी. हमारे १०० प्रतिशत शुद्ध बुद्धिजीवी “मोदी चाहिये” इस बात बोलनेसे हिचकिचाते है.

बुद्धिजीवी

हमारे वंशवादी पक्षोंको ही नहीं किन्तु अधिकतर मूर्धन्यों, विश्लेषकों, कोलमीस्टोंको, चेनलोंको तो चाहिये अफज़ल गुरु. एक नहीं लेकिन अनेक. अनेक नहीं असंख्य. क्यों कि इनको तो भारतके हर घरसे चाहिये अफज़ल गुरु.

हाँजी, यह बात बिलकुल सही है. जब जे.एन.यु. के कुछ तथा कथित छात्रोंने (जिनका नेता २८ सालका होनेके बाद भी भारतके करदाताओंके पैसोंसे पलता है तो इसके छात्रत्व पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है ही)  भारतके टूकडे करनेका, हर एक घरसे एक अफज़ल पैदा करनेका,  भारतकी बर्बादीके नारे लगाते थे तब उनके समर्थनमें केज्री, रा.गा., दीग्गी, सिब्बल, चिदु, ममता, माया, अखिलेश, अनेकानेक कोलमीस्ट, टीवी चेनलके एंकर और अन्य बुद्धिजीवी उतर आये थे.  तो यह बात बिलकुल साफ हो जाती है कि उनकी मानसिकता अफज़ल के पक्ष में है या तो उनका स्वार्थ पूर्ण करनेमें यदि अफज़ल गुरुका नाम समर्थक बनता है तो इसमें उनको शर्म नहीं.

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जो लोग यु-ट्युब देखते हैं, उन्होने ने पाकिस्तानके हसन निस्सार को अवश्य सूना होगा. जिनलोंगोंने उनको नहीं सूना होगा वे आज “दिव्य भास्कर”में गुणवंतभाई शाहका लेख पढकर अवश्य हसन निस्सार को युट्युब सूनेंगे.

हमारा दुश्मन नंबर वन, यानी कि पाकिस्तान. वैसे ही पाकिस्तानका दुश्मन नंबर वन यानीकी भारत. तो पाकिस्तानके बुद्धिजीवीयोंको भी उनके लिये चाहिये नरेन्द्र मोदी जैसा प्रधान मंत्री. और देखो हमारे तथा कथित बुद्धिजीवी हमारे समाचार माध्यमोंमें विवाद खडा करते है कि नरेन्द्र मोदी आपखुद है, नरेन्द्र मोदी कोमवादी है, नरेन्द्र मोदी जूठ बोलता है, नरेन्द्र मोदीने कुछ किया नहीं ….

पाकिस्तानको जो दिखाई देता है वह इन कृतघ्न को दिखाई देता नहीं.

अब हम देखेंगे ममताका नाटक और उस पर समाचार माध्यमोंका यानी कि कोलमीस्ट्स, मूर्धन्य, विश्लेषक, एंकर, आदि महानुभावोंला प्रतिभाव.

घटनासे समस्या और समस्याकी घटना

ममता स्वयंको क्या समज़ती है?

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उनका खेल देखो कि वह किस हद तक जूठ बोल सकती है. पूरा कोंगी कल्चरको उसने आत्मसात्‍ कर लिया है.

यह वही ममता है. जिस जयप्रकाश नारायणने, भ्रष्टाचारके विरुद्ध इन्दिरा गांधीके सामने, आंदोलन छेडा था उस जयप्रकाश नारायणकी जीपके हुड पर यह ममता नृत्य करती थी. एक स्त्रीके नाते वह लाईम लाईटमें आ गयी. आज वही ममता कोंगीयोंका समर्थन ले रही है जब कि कोंगीके संस्कारमें कोई फर्क नहीं पडा है.

ऐसा कैसे हो गया? क्योंकि ममताने जूठ बोलना ही नहीं निरपेक्ष जूठ बोलना सीख लिया है. सिर्फ जूठ बोलना ही लगाना भी शिख लिया है. निराधार आरोप लगाना ही नहीं जो संविधान की प्रर्कियाओंका अनादर करना भी सीख लिया है. “ चोर कोटवालको दंडे”. अपनेको बचाने कि प्रक्रियामें यह ममता, मोदी पर सविधानका अनादर करनेका आरोप लगा रही है.

ऐसा होना स्वाभाविक था.

गुजरातीभाषामें एक मूँहावरा है कि यदि गाय गधोंके साथ रहे तो वह भोंकेगी तो नहीं, लेकिन लात मारना अवश्य शिख जायेगी. लेकिन यहां पर तो गैया लात मारना और भोंकना दोनों शिख गयी.

ममता गेंगका ओर्गेनाईझ्ड क्राईमका विवरणः

ममताके राजमें दो चीट-फंडके घोटाले हुए. कोंगीने अपने शासनके दरम्यान उसको सामने लाया. ममताने दिखावेके लिये जाँच बैठायी. कोंगी यह बात सर्वोच्च अदालतमें ले गयी. सर्वोच्च अदालतने आदेश दिया कि सीबीआई से जाँच हो. सीबीआईने जाँच शुरु की. जांचमें ऐसा पाया कि टीएमसी विधान सभाके सदस्य, मंत्री, एम. पी. और खूद पूलिसके उच्च अफसरोंकी घोटालेके और जाँचमें मीली भगत है. सीबीआईने पूलिससे उनकी जाँचके कागजात भी मांगे थे जिनमें कुछ काकजात,  पूलिसने गूम कर दिये. इस मामलेमें और अन्य कारणोंसे भी सीबीआई ने कलकत्ताके पूलिस आयुक्तकी पूछताछके लिये नोटीस भी भेजी और समय भी मांगा. पूलिस आयुक्त भी आरोपोंकी संशय-सूचिमें थे.

गुमशुदा पूलिस आयुक्तः

आश्चर्यकी बात तो यह है कि पूलिस आयुक्त खूद अदृष्य हो गया. सीबीआईको पुलिस आयुक्तको “गुमशुदा” घोषित करना पडा. तब तक ममताके कानोंमें जू तक नहीं रेंगी. हार कर सीबीआई, छूट्टीके दिन,  पूलिस आयुक्त के घर गई. तो पुलिस आयुक्तने सीबीआई के अफसरोंको गिरफ्तार कर दिया और वह भी बिना वॉरन्ट गिरफ्तार किया और उनको पूलिस स्टेशन ले गये. किस गुनाहके आधार पर सी.बी.आई.के अफसरोंको गिरफ्तार किया उसका ममताके के पास और उसकी पूलिसके पास उत्तर नही है. यदि गिरफ्तार किया है तो गुनाह का अस्तित्व तो होना ही चाहिये. एफ.आई.आर. भी फाईल करना चाहिये.

यह नाटकबाजी ममताकी पूलिसने की. और जब सभी टीवी चेनलोंमे ये पूलिसका नाटक चलने लगा तो ममताने भी अपना नाटक शुरु किया. वह मेट्रो पर धरने पर बैठ गयी. उसके साथ उसने अपनी गेंगको भी बुला लिया. सब धरने पर बैठ गये. पूलिस आयुक्त भी क्यों पीछे रहे? यह चीट फंड तो “ओर्गेनाईझ्ड क्राईम था”. तो ममताआकाको तो मदद करना ही पडेगा. तो वह पूलिस आयुक्त भी ममताके साथ उसकी बगलमें ही धरने पर बैठ किया.

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धरना काहेका है भाई?

ममता कौनसे संविधान प्रबोधित प्रावधान की रक्षाके लिये बैठी है?

ममता किसके सामने धरने पर बैठी है?

पूलिस कमिश्नर जो कायदेका रक्षक है वह  कैसे धरने पर बैठा है?

पूलिस आयुक्त ड्युटी पर है या नहीं?

कुछ टीवी चैनलवाले कहेते है कि वह सीवील-ड्रेसमें है, इसलिये ड्युटी पर नहीं?

अरे भाई, वह वर्दीमें नहीं है तो क्या वह छूट्टी पर है?

इन चैनलवालोंको यह भी पता नहीं कि वर्दीमें नहीं है इसका मतलब यह नहीं कि वह ड्युटी पर नहीं है. पूलिओस आयुक्त कोई सामान्य “नियत समयकी ड्युटी” वाला सीपाई नहीं है कि उसके लिये, यदि वह वर्दी न हो तो ड्युटी पर नहीं है ऐसा निस्कर्ष निकाला जाय.

सभी राजपत्रित अफसर (गेझेटेड अफसर) हमेशा २४/७ ड्युटी पर ही होते है ऐसे नियमसे वे बद्ध है. यदि पूलिस आयुक्त केज्युअल लीव पर है तो भी उसको ड्युटी पर ही माना जाता है. यदि वह अर्न्ड लीव (earned leave) पर है तभी ही उनको ड्युटी पर नहीं है ऐसा माना जाता है. लेकिन ऐसा कोई समाचार ही नहीं है, और किसी भी टीएमसीके नेतामें हिमत नहीं है कि वह इस बातका खुलासा करें.

ममता ने एक बडा मोर्चा खोल दिया है. सी.बी.आई. के सामने पूलिस. वैसे तो सर्वोच्च अदालतके आदेश पर ही सी.बी.आई. काम कर रही है तो भी.

इससे ममताके पूलिस अफसरों पर केस बनता है, ममता पर केस बनाता है चाहे ममता कितनी ही फीलसुफी (तत्त्व ज्ञानकी) बातें क्यूँ न कर ले.

कुछ लोग समज़ते है कि प्र्यंका (वाईदरा) खूबसुरत है इसलिये उसकी प्रसंशा होती है. लेकिन ऐसा कुछ नहीं है. प्रशंसाके लिये तो बहाना चाहिये. हम यह बात भी समज़ लेंगे.

अब सर्वोच्च न्यायालयमें मामला पहूँचा है.

लेकिन सर्वोच्च अदालत क्या है?

सर्वोच्च अदालतके न्याय क्या अनिर्वचनीय है?

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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“आगसे खेल” मुल्लायम और उसके सांस्कृतिक साथीयोंका

“आगसे खेल” मुल्लायम और उसके सांस्कृतिक साथीयोंका

यदि कोई जनताको धर्म, जाति और और क्षेत्रके नाम पर विभाजन करें और वॉट मांगे उसको गद्दार ही कहेना पडेगा. अब तो इस बातका समर्थन और आदेश सर्वोच्च न्यायालयने  और चूनाव आयुक्तने भी परोक्ष तरिकेसे कर दिया है.

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मुल्लायम, अखिलेश और उनके साथीयोंने युपीके चूनावमें  बीजेपी के विरुद्ध आंदोलन छेड दिया है. ये लोग बीजेपी के नेतागण चूनाव प्रचारके लिये भी न आवें क्यों कि वे युपीके नहीं हैं. आप समझलो कि ये मुल्लायम, अखिलेश आदि नेता लोग, स्थानिक लोगके अलावा, अन्य भारतीय नागरिकके वाणी स्वातंत्र्यके हक्कको भी युपीमें मान्य नहीं रखना चाहते हैं. उनके लिये युपी-बिहारमें नौकरी देनेकी तो बात ही छोड दो. ये लोग तो क्षेत्रवादमें अन्य राज्योंके क्षेत्रवादसे एक कदम आगे हैं. वे ऐसा प्रचार कर रहे है कि, स्थानिक नेताओंको छोडकर अन्य नेता युपीमें चूनाव प्रचार भी न करें. युपी-बिहारमें तो स्थानिक पक्ष (सिर्फ हिन्दीभाषी) ही होना चाहिये.

१९५७के चूनावमें पराजयसे बचने के लिये कोंग्रेसके नहेरुने मुम्बईमें भाषावाद को जन्म दिया था.

नहेरु है वॉटबेंक सियासत की जड

वॉटबेंककी सियासत करने वालोंमें नहेरुवंशी कोंग्रेसका  प्रथम क्रम है. नहेरु वंशवाद का यह संस्कारकी जड नहेरु ही है.

नहेरुने सर्व प्रथम गुजराती और मराठीको विभाजित करनेवाले उच्चारण किये थे.

नहेरुने कहा कि यदि महाराष्ट्रको मुंबई मिलेगा तो वे स्वयं खुश होंगे.

नहेरुका यह उच्चारण मुंबईके लिये बेवजह था. गुजरातने कभी भी मुंबई पर अपना दावा रक्खा ही नहीं था.  वैसे तो मुंबईको विकसित करनेमें गुजरातीयोंका योगदान अधिकतम था. लेकिन उन्होने कभी मुंबई को गुजरातके लिये मांगा नहीं था और आज भी है.

गुजराती और मराठी लोग हजारों सालोंसे मिलजुल कर रहेते थे.  स्वातंत्र्य पूर्वके कालमें कोंग्रेसकी यह नीति थी कि भाषाके अनुसार राज्योंका पुनर्गठन किया जाय और जैसे प्रादेशिक कोंग्रेस समितियां है उस प्रकारसे राज्य बनाया जाय. इस प्रकार मुंबईकी “मुंबई प्रदेश कोंग्रेस समिति” थी तो मुंबईका अलग राज्य बनें.

लेकिन महाराष्ट्र क्षेत्रमें भाषाके नाम पर एक पक्ष बना. उस समय सौराष्ट्र, कच्छ और मुंबई ईलाका था. मुंबई इलाकेमें राजस्थानका कुछ हिस्सा, गुजरात, महाराष्ट्र था, और कर्नाटकका कुछ हिस्सा आता था. १९५७के चूनावके बाद ऐसी परिस्थिति बनी की महाराष्ट्र क्षेत्रमें नहेरुवीयन कोंग्रेस अल्पमतमें आ गयी. यदि उस समय नहेरु भाषाके आधार पर महाराष्ट्रकी रचना करते तो महाराष्ट्रमें उसकी सत्ता जानेवाली थी. इस लिये नहेरुने द्विभाषी राज्यकी रचना की, जिसमें सौराष्ट्र, कच्छ, गुजरात, मुंबई और महाराष्ट्र मिलाके एक राज्य बनाया और अपना बहुमत बना लिया.

महाराष्ट्रमें विपक्षको तोडके १९६०में गुजरात और महाराष्ट्र अलग अलग राज्य बनाये.

जातिवादका जन्म

डॉ. आंबेडकर तो मार्यादित समयके लिये, और वह भी केवल अछूतोंके लिये ही आरक्षण मांग रहे थे. गांधीजी तो किसी भी प्रकारके आरक्षण के विरुद्ध थे. क्यों कि महात्मा गांधी समज़ते थे कि आरक्षणसे वर्ग विग्रह हो सकता है.

नहेरुने पचासके दशकमें आरक्षण को सामेल किया. अछूत के अतिरिक्त और जातियोंने भी आरक्षणकी  मांग की.

नहेरुवीयन कोंग्रेसको लगा कि विकासके बदले वॉट-बेंक बनानेका यह तरिका अच्छा है. सत्ताका आनंद लो, पैसा बनाओ और सत्ता कायम रखनेके लिये जातियोंके आधार पर जनताको विभाजित करके नीच जातियोंमें ऐसा विश्वास पैदा करो कि एक मात्र कोंग्रेस ही उनका भला कर सकती है.

नहेरुने विदेश और संरक्षण नीतिमें कई मूर्खतापूर्ण काम किये थे, इस लिये उन्होंने अपनी किर्तीको बचाने के लिये इन्दिरा ही अनुगामी बने ऐसी व्यवस्था की. ईन्दिरा भी सहर्ष बडे चावसे अपने वंशीय चरित्रके अनुसार प्रधान मंत्री बनी. लेकिन उसमें वहीवटी क्षमता न होने के कारण १९६७ के चूनावमें नहेरुवीयन कोंग्रेसकी बहुमतमें काफी कमी आयी.

हिन्दु-मुस्लिम के दंगे

जनताको गुमराह करने के लिये इन्दिराने कुछ विवादास्पद कदम उठाये. खास करके साम्यवादीयोंको अहेसास दिलाया की वह समाजवादी है.  वैसे तो जो नीतिमत्तावाला और अपने नामसे जो समाजवादी पक्ष संयुक्त समाजवादी पक्ष (डॉ. राममनोहर लोहियाका) था वह इन्दिराकी ठग विद्याको जानता था. वह इन्दिराकी जालमें फंसा नहीं. इस कारण इन्दिराको लगा की  एक बडे वॉट-बेंककी जरुरत है. इन्दिराके मूख्य प्रतिस्पर्धी मोरारजी देसाई थे. इन्दिराके लिये मोरारजी देसाईको कमजोर करना जरुरी था. इसलिये उसने १९६९में गुजरातमें हिन्दु-मुस्लिम के दंगे करवाये, इस बातको आप नकार नहीं सकते.

नहेरुवीयन कोंग्रेसकी संस्कृतिका असर

वॉट बेंक बनानेकी आदत वाला एक और पक्ष कांशीरामने पैदा किया. सत्ताके लिये यदि ऐसी वॉट बेंक मददरुप होती है तो बीजेपी (जनसंघ)को छोड कर, अपना अपना वॉट बेंक यानी की लघुमति, आदिवासी, अपनी जातिका, अपना क्षेत्र वाद, अपना भाषावाद आदिके आधार पर अन्य पक्ष भी वॉट बेंक बनाने लगे. यह बहूत लंबी बात है और इसी ब्लोग साईट पर अन्यत्र लिखी गयी है.

आज भारतमें, वॉट बेंकका समर्थन करनेमें, भाषा वादवाले  (शिव सेना, एमएनएस, ममता), जातिवाद वाले (लालु, नीतीश, अखिलेश, मुल्लायम, ममता, नहेरुवीयन कोंग्रेस, चरण सिंहका फरजंद अजित सिंह, मायावती, डीएमके, एडीएमके, सीपीआईएम आदि), धर्मवादके नाम पर वॉट बटोरने वाले(मुस्लिम पेंपरींग करनेवाले नेतागण जैसे कि मनमोहन सिंह, सोनिया, उनका फरजंद रा.गा.,  ममता, अकबरुद्दीन ओवैसी, आझम खान,   अखिलेश, मुल्लायम, केज्री, फारुख अब्दुल्ला, उनका फरजंद ओमर,  जूटे हुए हैं.

पीला पत्रकारित्व (यलो जर्नालीझम)

पीला पत्रकारित्व (यलो जर्नालीझम) भी वॉट बेंकोके समर्थनमें है और ऐसे समाचारोंसे आवृत्त समाचार रुपी अग्निको फूंक मार मार कर प्रज्वलित करनेमें जूटा हुआ है. आपने देखा होगा कि, ये पीला पत्रकारित्व, जिसकी राष्ट्रीय योगदानमें कोई प्रोफाईल नहीं और न कोई पार्श्व भूमिका है, ऐसे निम्न कक्षाके, पटेल, जट, यादव, ठाकुर, नक्षलवादी, देशके टूकडे करनेकी बात करने वाले नेताओंके कथनोंको समाचार पत्रोंमें और चेनलों पर बढावा दे रहा है.

भारतमें नहेरुसे लेकर रा.गा. (रा.गा.का पूरा नाम प्रदर्शित करना मैं चाहता नहीं हूं. वह इसके काबिल नहीं है) तकके नहेरुवीयन कोंग्रेसके सभी नेतागण और उसके सांस्कृतिक नेतागणने बिहारके चूनावमें क्षेत्रवादको भी उत्तेजित किया था. इसके परिणाम स्वरुप बिहारमें नरेन्द्र मोदीके विकास वादकी पराजय हूयी. अर्थात्‌ वॉट-बेंक वालोंको बिहारमें भव्य विजय मिली.

क्षेत्रवाद क्या है?

क्षेत्रवादके आधार पर नहेरुवीन कोंग्रेस और एन.सी. पी. की क्रमानुसार स्थापित शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना बनी है.

“हम भी कुछ कम नहीं” नीतीश-लालु चरित्र

नीतीश कुमारने सत्ता पानेके लिये “बाहरी” और “बिहारी” (स्थानिक), शब्दोंको प्रचलित करके बिहारमें बहुमत हांसिल किया. समाचार माध्यमोंने भी “बाहरी” और “स्थानिक” शब्दोंमें पल रही देशको पायमाल करने वाली वैचारिक अग्निको अनदेखा किया.

यदि क्षेत्रवादकी अग्निको हवा दी जाय तो देश और भी पायमाल हो सकता है.

गुजरातमें क्या हो सकता है?

गुजरातमें सरकारी नौकरीयोंमे खास करके राज्यपत्रित उच्च नौकरीयोंमें बिन-गुजरातीयोंकी बडी भारी संख्या है.

कंपनीयोंमें वॉचमेन, मज़दुर कर्मचारी ज्यादातर बिन-गुजराती होते है, सरकारी कामके और कंपनीयोंके ठेकेदार अधिकतर बिन-गुजराती होते है. और ये बिन-गुजराती ठेकेदार और उनके सामान्य कर्मचारी और श्रमजीवी कर्मचारी गण भारी मात्रामें बिन-गुजराती होते हैं.  शहेरोंमें राजकाम (मेशनरीकाम), रंगकाम, सुतारीकाम, इत्यादि काम करने वाले कारीगर, बिन-गुजराती होते है. और केन्द्र सरकारकी नौकरीयोंमें तो चतुर्थ वर्गमें सिर्फ युपी बिहार वाले ही होते है.  प्रथम वर्गमें भी उनकी संख्या अधिकतम ही होती है. द्वितीय वर्गमें भी वे ठीक ठीक मात्रामें होते हैं.  इतना ही नहीं, हॉकर्स, लारीवाले, अनधिकृत  ज़मीन पर कब्जा जमानेवालोंमे और कबाडीका व्यवसाय करनेवालोंमे, सबमें भी, अधिकतर बिन-गुजराती होते है. चोरी चपाटी, नशीले पदार्थोंके उत्पादन-वितरणके धंधा  उनके हाथमें है. अनधिकृत झोंपड पट्टीयोंमें बिन गुजराती होते हैं.ये सब होते हुए भी गुजरातके सीएम कभी “बाहरी-स्थानिक”का विवाद पैदा नहीं होने देते. उतना ही नहीं लेकिन उनके कानुनी व्यवसायोंकी प्रशंसा करते हुए कहेते है कि गुजरातकी तरक्कीमें,  बिन-गुजरातीयोंके योगदान के लिये गुजरात उनका आभारी है. पीले पत्रकारित्वने कभी भी गुजरातकी इस भावनाकी  कद्र नहीं की. इसके बदले गुजरातीयोंकी निंदा करनेमें अग्रसर रहे. यहां तक कि नीतीशने बिहारकी प्राकृतिक आपदाके समय गुजरातकी आर्थिक मददको नकारा था. बहेतर था कि नीतीश गुजरातमें बसे बिहारीयोंको वापस बुला लेता.

यदि गुजरातमेंसे बिनगुजरातीयोंको नौकरीयोंमेंसे और असामाजिक प्रवृत्ति करनेवाले बिनगुजरातीयोंको निकाला जाय तो गुजरातमें बेकारीकी और गंदकीकी कोई समस्या ही न रहे. इतना ही नहीं भ्रष्टाचार भी ९५% कम हो जाय. गुजरात बिना कुछ किये ही यु.के. के समकक्ष हो जायेगा.

नीतीशलालु और अब मुल्लायम फरजंदका आग फैलाने वाला खेल

नीतीश कुमार और उसके सांस्कृतिक साथीगण को मालुम नहीं है कि गुजरातकी जनता वास्तवमें यदि चाहे तो नीतीशकुमारके जैसा “बाहरी और बिहारी” संस्कार अपनाके बिहारीयोंको और युपीवालोंको निकालके युपी और बिहारको बेहाल कर सकता है.

यदि समाचार माध्यम वास्तव में तटस्थ होते तो नीतीशकुमारके “बाहरी – बिहारी” प्राचारमें छीपा क्षेत्रवाद को उछाल कर, बीजेपीके विकासवादको पुरस्कृत कर सकता था. लेकिन समाचार माध्यमोंको बीजेपीका विकासवाद पसंद ही नहीं था. उनको तो “जैसे थे” वाद पसंद था. ताकि, वे नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंकी तरह, और उनके सांस्कृतिक साथीयोंकी तरह, पैसे बना सके. इसलिये उन्होंने बिहारको असामाजिक तत्वोंके भरोसे छोड दिया.

अन्य राज्योंमे बिन-स्थानिकोंका नौकरीयोंमें क्या हाल है?

बेंगालमें आपको राज्यकी नौकरीयोंमें बिन-बंगाली मिलेगा ही नहीं.

युपी-बिहारमें थोडे बंगाली मिलेंगे क्योंकि वे वहां सदीयोंसे रहेते है.

कश्मिरमें तो काश्मिरी हिन्दु मात्रको मारके निकाल दिया है.

पूर्वोत्तर राज्योंमें बिन-स्थानिकोंके प्रति अत्याचार होते है. आसाममें  नब्बेके दशकमें सरकारी दफ्तरोंके एकाउन्ट ओफीसरोंको, आतंकवादीयोंको मासिक हप्ता देना पडता था. नागालेन्ड, त्रीपुरामें भी यही हाल था. मेघालयमें बिहारीयोंका, बंगालीयोंका और मारवाडीयोंका आतंकवादीयों द्वारा गला काट दिया जाता था.

केराला, तामीलनाडु और हैदराबादमें तो आप बिना उनकी भाषा जाने कुछ नहीं कर सकते. बिन-स्थानिकोंको नौकरी देना  वहांके लोगोंके सोचसे बाहर है. कर्नाटकमें आई.टी. सेक्टरको छोडके ज्यादातर ऐसा ही हाल है.

मुंबईमें बिन-मराठीयोंका क्या हाल है?

मुंबईका तो विकास ही गुजरातीयोंने किया है. मुंबईमें गुजराती लोग स्थानिक लोगोंको नौकरीयां देते है. नौकरीयोंमे अपना हिस्सा मांगने के बदले गुजराती लोग स्थानिकोंके लिये बहुत सारी नौकरीयां पैदा करते हैं. इसके बावजुद भी राज्यसरकारकी नौकरीयोंमें गुजरातीयोंका प्रमाण नहींवत है. नब्बेके दशकमें मैंने देखा था कि, ओमानकी मीनीस्ट्री ऑफ टेलीकोम्युनीकेशनमें जितने गुजराती कर्मचारी थे उससे कम, मुंबईके प्रभादेवीके संचार भवनमें गुजराती कर्मचारी थे. मराठी लोगोंकी गुजरातीयोंके प्रति खास कोई शिकायत नहीं है इसके बावजुद भी यह हाल है..

मुंबईमें शिवसेना और एमएन एस है. उनके नेता उत्तर भारतीयोंके प्रति धिक्कार युक्त भावना फैलाते है. और उनके उपर कभी कभी आक्रमक भी बनते है.

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चूनाव आयुक्त को मुल्लायम, अखिलेश, नहेरुवीयन कोंग्रेसको सबक सिखाना चाहिये. युपीकी जनताको भी समझना चाहिये कि मुल्लायम, अखिलेश, और उसके साथ सांस्कृतिक दुर्गुणोंसे जुडे नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंके विरुद्ध चूनाव आयुक्तसे शिकायत करें. भारतमें यह आगका खेल पूरे देशको जला सकता है.

स्वातंत्र्यके संग्राममें हरेक नेता “देशका नेता” माना जाता था. लेकिन अब छह दशकोंके नहेरुवीयन शासनने ऐसी परिस्थिति बनायी है कि नीतीश, लालु, मुल्लायम, अखिलेश, ममता, माया, फारुख, ओमर, करुणा आदि सब क्षेत्रवादकी नीति खेलते हैं.  

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः आगसे खेल, मुल्लायम और उनके सांस्कृतिक साथी, नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके सांस्कृतिक साथी, सर्वोच्च

न्यायालय, चूनाव आयुक्त, १९५७के चूनाव, नहेरु, मुंबईमें भाषावाद, वॉटबेंक सियासत, नहेरुका वंशवाद, विभाजित,

महाराष्ट्रको मुंबई, राज्योंका पुनर्गठन, जातिवादका जन्म, सत्ताका आनंद, इन्दिरा, जनताको गुमराह, नहेरुवीयन कोंग्रेसकी संस्कृतिका असर, लालु, नीतीश, अखिलेश, ममता, नहेरुवीयन कोंग्रेस, चरण सिंहका फरजंद अजित सिंह, मायावती, डीएमके, एडीएमके, सीपीआईएम, अकबरुद्दीन ओवैसी, आझम खान,   अखिलेश, मुल्लायम, केज्री, फारुख अब्दुल्ला, फारुख अब्दुल्लाका फरजंद ओमर, पीला पत्रकारित्व (यलो जर्नालीझम), राष्ट्रीय योगदानमें कोई प्रोफाईल, देशके टूकडे करनेकी बात करने वाले नेता, क्षेत्रवाद, भाषावाद, “बाहरी” और “बिहारी” (स्थानिक), बाहरी और युपीवाले, असामाजिक तत्वोंके भरोसे,

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