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Posts Tagged ‘कौटिल्य’

नरेन्द्र मोदीको क्या बनना चाहिये? कौटिल्य अथवा पृथ्वीराज चौहाण?

कौटिल्यकी विशेषता क्या थी और पृथ्वीराज की विशेषता क्या थी?

Narendra Modi has to decide
कौटिल्यः
कौटिल्यमें दुश्मनको पहेचानने की प्रज्ञा थी.
कौटिल्य दुश्मनको कभी छोटा मानता नहीं था,
पडौसी देश दुश्मन बने ऐसी शक्यता अधिक होती है इस लिये उसकी गतिविधियों दृष्टि रखनी चाहिये क्योंकि वह प्रथम कक्षाका दुश्मन बननेके काबिल होता है.
दुश्मनको कभी माफ करना नहीं चाहिये,
ऐसा क्यों?
क्योंकि राष्ट्रहित सर्वोपरी है.

पृथ्वीराज चौहाण
पृथ्वीराज चौहाण भी एक देशप्रेमी राजा था. लेकिन वह दुश्मनके चरित्रको समझ नहीं पाया. उसने मुहम्मद घोरीको फेली बार तो हरा दिया, किन्तु बिना ही उसके चरित्रकी जांच किये भारतीय प्रणालीको अनुसरा और उसको क्षमा प्रदान की. वही मुहम्मद घोरीने फिरसे आक्रमण किया और पृथ्वीराज चौहानको हराया और उसका कत्ल किया. अगर पृथ्वीराज चौहाणने मुहम्मद घोरीको माफ किया न होता तो भारतका इतिहास अलग होता.
कौटिल्यने क्या किया था.
पोरस राजा देश प्रेमी था. उसने सिकंदरसे युद्ध किया. कुछ लोग ऐसा बताते है कि सिकंदरने पोरस को पराजित किया था. और सिकंदरने पोरसकी वीरताको देखके उसए संधि की थी. लेकिन यह बात तथ्यहीन है. वीरताकोई भारतका एकआधिर नही था. वीर योद्धा हरेक देशमें होते है. सिकंदर अनेकोंको जितता आया था लेकिन जो राजा हारे थे उनके साथ और उनकी जनताके साथ, उसका हमेशा आतंकित व्यवहार रहा था. पोरसने सिकंदरको संधिके लिये विवश किया था.और सिकंदरको हतप्रभः किया था.
सिकंदरके बाद सेल्युकस निकेतर सिकंदरकी तरह ही विश्वविजय करनेको निकला था. उस समय पोरसके बदले उसका भतिजा गद्दी पर था. उसने बीना युद्ध किये सेल्युकसको भारतमें घुसनेका रास्ता दे दिया. सिकंदर तो धननंदकी विशाल सेनासे ही भयभित हो गया था. लेकिन सेल्युकसने मगध पर आक्रमण कर दिया. जो सम्राट विश्वविजयी बनके आया था वह मगधके चन्दगुप्त मौर्यके सामने बुरी तरह पराजित हो गया. किन्तु ये सब बातें छोड देतें है.
कौटिल्यने क्या किया. पोरसके भतीजेको हराया. उसने लाख क्षमाएं मांगी लेकिन कौटिल्यने उसको क्षमा नहीं किया और उसको हाथीके पैरके नीचे कुचलवा दिया. पोरसका भतिजा तो जवान था, वीर था, उसके सामने पूरी जिंदगी पडी थी. वह देशप्रेमी पोरस राजाकी संतानके बराबर था, अगर कौटिल्य चाहता तो उसको क्षमा कर सकता था किन्तु कौटिल्यने उसको क्षमा नहीं किया. क्यो कि जो देशके साथ गद्दारी करता है उसको कभी माफ किया नही जा सकता.

यदि आप इतिहासको भूल जाते है तो उसका पुनरावर्तन होता है.
साम्राट अकबरको आते आते तो भारतके मुस्लिम हिन्दुओंसे हिलमिल गये थे. जैसे हुण, शक, पहलव, गुज्जर हिन्दुओंसे मील गये थे. भारतके मुस्लिम भी उसी स्थितिमें आ गये थे. कोई लाख नकारे तो भी यह एक सत्य है कि मुघलयुग भारतका एक स्वर्णयुग था. इसमें औरंगझेब जैसा कट्टर मुस्लिम भी लंबे समय तक अपनी कट्टरताका असर रख पाया नहीं था.
मुघल बहादुरशाह जफर जिसके राज्यकी सीमा सिर्फ लालकिलेकी दिवारें थी उसके नेतृत्वमें हिन्दुओंने और मुस्लिमोंने १८५७का विप्लव किया. पूरे भारतके हिन्दु और मुस्लिम राजाएं उसका सार्वभौमत्व स्विकारने के लिये कृतनिश्चयी थे.
ऐसा क्यों था?
क्यों कि हिन्दुओंके लिये धर्म तो एक ही था जो मानव धर्म था. आप ईश्वरकी मन चाहे तरिकोंसे उपासना करें या न भी करें तो भी हिन्दुओंको कोई फर्क पडता नहीं था. (हिन्दु यह भी समझते हैं कि ईश्वरको भी कोई फर्क पडता नहीं है).
मुस्लिम लोग भी परधर्म समभाव ऐसा ही समझ रहे थे. आज भी देखो, ओमानका सुल्तान काबुस सच्चे अर्थमें हिन्दुओं जैसा ही धर्म निरपेक्ष है. हां एक बात जरुर है कि वह विदेशीयोंको अपने देशकी नागरिकता नहीं देता है. चाहे वह हिन्दु हो या मुस्लिम. क्यों कि देशका हित तो सर्वोपरी होना ही चाहिये. जो लोग ओमानमें पहेलेसे ही बसे हुए हैं वहांके नागरिक है उसमें हिन्दु भी है और मुस्लिम भी है. इस लिये ऐसा मानना आवश्यक नहीं कि, सारे विश्वकी मुस्लिम जमात अक्षम्य है.

लेकिन भारतमें क्या हुआ?

अंग्रेजोंने खुदके देशके हितके लिये हिन्दु मुस्लिमोंमें भेद किये. सियासती तौर पर जीन्नाको उकसाया. नहेरुका भी कसुर था. नहेरु सियासती चालबाजीमें कुछ अधिक ही माहिर थे.
महात्मा गांधी के पास सबसे ज्यादा जनाधार था.

महात्मा गांधी के पास निम्न लिखित विकल्प थे
(१) अभी स्वतंत्रताको विलंबित करो, पहेले देशको और नेताओंको व्यवस्थित करो.
किन्तु यह किसीको भी स्विकार्य नहीं था. क्यो कि कोमी हिंसा ऐसी भडक उठी थी कि
नजदिकके भविष्यमें वह बीना विभाज किये शक्य ही नहीं थी.
(२) देशको फेडरल युनीयनमें विभाजीत करो जिसमें होगा पाकिस्तान, हिन्दुस्तान. ये दो देश संरक्षण और विदेशी मामलेके सिवा हर क्षेत्रमें स्वतंत्र होंगे. फेडरल युनीयन का हेड कोई भी हो.
नहेरुको यह स्विकार्य नहीं था क्यों कि उनको जीन्नाको चपरासी के स्थान पर रखना भी स्विकार्य नहीं था.
सरदार पटेलको और महात्मा गांधी इसके पक्षमें नहीं थे क्यों कि यह बडा पेचिदा मामला था. बहुत सारे स्थानिक राजाएं अपनी स्वायत्तता एक अलग देश की तरह ही रखना चाहते थे. ऐसी परिस्थितिमें देशमें अनेक जटिल समस्याएं उत्पन्न हो सकती है जो सदीयों तक उलझ नहीं सकती थी.
(३) फेडरल युनीयन हो लेकिन उसका नंबर वन पोस्ट पर जीन्ना हो.
नहेरुको यह स्विकार्य नहीं था. वे इस हालतमें देशके टुकडे टुकडे करने को भी तैयार थे.
(४) एक दुसरेसे बिलकुल स्वतंत्र हो वैसे देशके दो टुकडे स्वतंत्र हो. हिन्दुस्तान और पाकिस्तान. जनता अपनी ईच्छाद्वारा पसंद करें कि अपने प्रदेशको कहां रखना है ! हिन्दुस्तानमें या पाकिस्तान में?

नहेरुको यह चौथा विकल्प पसंद था. नहेरुने अपनी व्युह रचना तैयार रक्खी थी.

चौथे विकल्पको स्विकारनेमें नहेरुको कोई आपत्ति नहीं थी. हिन्दुस्तानमें नंम्बर वन बनना नहेरुके लिये बायें हाथका खेल तो नहीं था लेकिन अशक्य भी नहीं था. उन्होंने कोंग्रेसमें अपना सोसीयालिस्टीक ग्रुप बना ही लिया था.

नहेरुने गांधी और सरदारको प्रच्छन्न रुपसे दो विकल्प दिया.

या तो मुझे नंबर वन पोस्ट दो. नहीं तो मैं कोंग्रेसको विभाजित करके बचे हुए देशमेंसे अपना हिस्सा ले लुंगा और उसके बाद बचे हुए हिस्सेमें भी आग लगाके जाउंगा कि दुसरे नेता जाति आदि लोग अपना हिस्सा भी मांगे.

पक्षके नेताके रुपमें नहेरुका समर्थन किसी भी प्रांतीय समितिने किया नहीं था तो भी नहेरु अपने आवेदन पर अडग रहे.

महात्मा गांधीको नहेरुकी व्युह रचना समझमें आगयी थी.
महात्मा गांधीने कोंग्रेसको विलय करके उसको लोकसेवा संघमें परिवर्तन करने का निश्चय कर लिया. उन्होने सरदार पटेलको विश्वासमें ले लिया कि वे जब तक स्थानिक समस्याएं हल न हो जाय तब तक वे कोंग्रेसको विभाजित होने नहीं देंगे.
गांधीजीको मालुम हो गया था कि खुदकी जान कभी भी जा सकती है.

इसलिये महात्मा गांधीने २७वीं जनवरी १९४८में ही आदेश दे दिया की कोंग्रेसको एक राजकीय पक्षके स्थान पर अपना अस्तित्व समाप्त करना है. उन्होने इस दरम्यान लोकसेवा संघका संविधान भी बना दिय था.

नरेन्द्र मोदीको चाणक्य बनना है या पृथ्वीराज

अगर नरेन्द्र मोदीको चाणक्य बनना है या पृथ्वीराज चौहाण, इस बातकी चर्चा करते समय हमें कोंग्रेस और नहेरु की बातें क्यों करें?
भारतमे हमने और हमारे नेताओंने अंतिम सौ सालमें जो क्षतिपूर्ण व्यवहार किया, या जो क्षतिपूर्ण व्यावहार हो गया या करवाया गया उनको हमें याद रखके आगे बढना है.

यदि हम याद नहीं रक्खेंगे तो वैसी या उससे भी अधिक गंभीर क्षतियोंका पुनरावर्तन होगा, और भावी जनता हमे क्षमा नहीं करेंगी.

अंग्रेजोंकी नीतियां और उनका पढाया हुआ क्षतियुक्त इतिहासः
अंग्रेज तो चले गये, किन्तु उनकी विचारधारा के आधारपर उन्होने जो तीकडं बाजी चलायी और हमारे बुद्धिजिवीयोंने जो स्विकार कर लिया, ऐसे तथ्योंको हमे उजागर करना पडेगा. इतिहासके पन्नोंसे उनको निकालना नही है लेकिन उसको एक मान्यताके आधार पर उसके कदके अनुसार काट देना है. हमारे भारतीय शास्त्रोंके आधार पर तर्कपूर्ण रीतिसे इतिहास पढाना है.
इसका एक मानसशास्त्रीय असर यह भी होगा कि भारतमें जो विभाजनवादी तत्व है वे विरोध करने के लिये गालीप्रदानके साथ आगे आजायेंगे. उनको पहेचानना है और उनको सियासती क्षेत्रसे निकालना है. वे तर्क हीन होनेके कारण ध्वस्त ही हो जायेंगें. भारतमें एक हकारात्मक युग का प्रारंभ होगा.
https://www.youtube.com/watch?v=x4Vh0cBVPdU ancient scientific knowledge of India: A lecture delivered by CSIR scientist in IIT Chennai
https://www.youtube.com/watch?v=6YG6pXE8aDs Ancient Indian Scientists were all Rishis with High Spiritual Powers (Technology of Spirituality)
मुहम्मद घोरी क्षमाके पात्र नहीं है, किन्तु मुहम्मद घोरी कौन कौन है? और जयचंद कौन है.
मुहम्मद घोरी है; नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण, उनके साथीगण, कश्मिरके नेतागण और दंभी सेक्युलर समाचार माध्यम के पंडितगण.

यह है कभी न माफ करनेवाली सांस्कृतिक गेंग
इनलोगोमें सामान्य बात यह है कि वे बीजेपीकी एक भी क्षति कभी माफ नहीं करेंगे. उसके उपरांत ये लोग विवादास्पद तथ्यों पर और घटनाओं पर पूर्वग्रह रखकर उनको बीजेपीके और नरेन्द्र मोदीके विरुद्ध उजागर करेगे. इनके लिये समय कि कोई सीमा नहीम है.
(१) १९४२में कोई अन्य बाजपाई नामक व्यक्तिने क्षमा-पत्र देकर पेरोल पर उतर गया था तो इन नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंने २००३-४ के चूनाव अंतर्गत भी इस बातको अटल बिहारी बाजपाई के विरुद्ध उछाला था.
(२) कोई दो पुलीस अफसरोंके बीच, कोई पिताकी प्रार्थना पर उसकी पुत्रीके साथ कोई अनहोनी न हो जाय इसके लिये निगरानी रखनेकी बात हो रही थी और उसमें सफेद दाढीवाले और काली दाढीवाले नेताका संदर्भ बोला गया था तो नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेता मनमोहन और उसके मंत्रीमंडलने स्पेसीयल बैठक बुलाके एक जांच कमिटी बैठा दी थी.
(३) एक लडकी कोई आतंकी संगठन के युवकोंके साथ मिलकर अपने मातापिताको बीना बतायें गुजरातकी और निकल गयी थी और तत्कालिन केन्द्रीय खुफियातंत्रने ही माहिति दी थी कि वे नरेन्द्र मोदीको मारने के अनुसंधानमें आ रहे है तो गुजरातकी पुलीसने उनको सशस्त्र होनेके कारण खतम कर दिया तो इन्ही नहेरुवीयन कोंगी नेतागण और उनके साथीयोंने शोर मचा दिया था.
(४) ऐसे कई पुलिस अफसरोंके खिलाफ ही नहीं किन्तु गुजरातके गृहमंत्री तकको लपेटमें ले के उनको कारवासमें भेज दिया था. मतलब कि, फर्जी केस बनाकर भी इन लोगोंको बीजेपीको लपेटमें लेके अपना उल्लु सीधा करनेमें जरा भी शर्म नहीं आती है. ये लोग तो मुहम्मद घोरीसे भी कमीने है.
(५) नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंके इससे भी बढकर काले करतुतोंसे इतिहास भरा पडा है. इन्दिरा घांडीसे लेकर मनमोहन सोनीया तक. इसमें कोई कमी नहीं.
इन गद्दारोंको कैसे पीटा जाय?
(क्रमशः)
शिरीष मोहनलाल दवे
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क्या आप भारतके होतैषी है? और फिर भी क्या आप इनमेंसे कोई एक  वर्गमें भी आते हैं?

अगर हां, तो सावधान !

हम वार्ता करेंगे इन वर्गोंकी जो भारतकी संस्कृति और भारतका भविष्य उज्वल बनाने के लिये भयावह है, विघ्नरुप है और बाधक भी है.

ये लोग कौन कौन है?

(१) ये लोग, अपनेको स्वयं प्रमाणित मूर्धन्य मानते है और अति-वाचाल है,

(२) ये लोग भारतके इतिहाससे या तो अर्धदग्ध है, या तो इन लोगोंने क्षतियुक्त इतिहास, ज्यों का त्यों पढ लिया है, और उसका स्विकार करके अपनी मान्यता बना ली है. वे लोग अपनी इस मान्यताके उपर अटल है,

(३) ये लोग अपनी मान्यताओंको नकारने वाले साहित्यका वाचन करना उचित मानते नहीं है, इस लिये आप उनको शिक्षित नहीं कर सकते.

(४) ये लोग बीजेपी या/और नरेन्द्रके विरोधी हो सकते है,

(५) ये लोग देश द्रोही हो सकते है,

(६) ये लोग “जैसे थे” वादी हो सकते है,

(७) ये लोग नकात्मक मानसिकता वाले हो सकते है,

(८) ये लोग मूर्ख और मूढ हो सकते है,

(९) ये लोग नहेरुवंशके चाहक या/और उनकी विचार/आचार धाराके चाहक हो सकते है,

(१०) ये लोग महात्मा गांधीके विरोधी, या/और उनकी विचारधारा के विरोधी हो सकते है,

(११) ये लोग गोडसेके चाहक या/और उसकी आचार धाराके चाहक हो सकते है,

(१२) ये लोग अहिंसा और हिंसा कहां योग्य है और कहां योग्य नहीं है इस बातको अवगत करनेकी वैचारिक शक्ति नहीं रखते है,

(१३) ये लोग भारतके हितमें क्या है और कैसी व्युह रचना बनानी आवश्यक है, इन बातोंको अवगत करनेमें असमर्थ है  या/और,  जिन लोंगोंने नरेन्द्र मोदीका और भारतीय हितोंका पतन करनेकी ठान ली है उनकी व्युहरचनाको अवगत करनेकी उनमें क्षमता नहीं है,

(१४) ये लोग जिन्होनें अपना उल्लु सीधा करनेके लिये भारतकी जनताको और/या भारतको और विभाजित करनेका अटल निश्चय किया है,

(१५) ये लोग जो अपना उल्लु सीधा करनेके लिये, नरेन्द्र मोदी और बीजेपीके विषयमें आधार हीन, या/और विवादास्पद वार्ताएं बनाते हैं, उछालते हैं और हवा देते हैं,

(१६) ये लोग जो, या तो अपने धर्मके विषयमें अंध है, या परधर्मके बारेमें या/और परधर्मीयोंके विषयमें सतत धिक्कारकी मानसिकता या/और आचार रखते है,  

(१७) ये लोग स्वयंको धर्मनिरपेक्षके रुपमें प्रस्तूत करते हैं, किंतु उनके रोम रोममें, नरेन्द्र मोदी या/और, बीजेपी या/और सनातन धर्म या/और भारतीय प्राचीन धरोहर के प्रति अस्विकृतिकी मानसिकता या/और घृणा है,

(१८) ये लोग एक विवादास्पद तारतम्य की सत्यताको सिद्ध करनेके लिये दुसरे विवादास्पद तारतम्यका आधार लेते है और अपने निर्णय को तर्कयुक्त मानते है और मनवाते है,

(१९) ये लोग पाश्चात्य साहित्य, इतिहास लेखन, दृष्टिकोण, प्रणालियां या/और व्यक्तियोंसे अभिभूत है.

इन सबकी वजह यह है कि, इन लोगोंमें प्रमाणभानकी और प्राथमिकताकी प्रज्ञा नहीं है, इस लिये ये लोग आपसे एक निश्चित विचार बिन्दु पर चर्चा नहीं करपायेंगे और करेंगे भी नहीं. वे दुसरा विचार बिंदु पकड लेंगे,

अगर आप इनमेंसे कोई भी एक वर्गमें आते है और तत्‌ पश्चात्‌  भी स्वयंको भारतके हितमें आचार रखने वाले मानते हैं, तो आप अवश्य आत्ममंथन करें. यदि आप आत्ममंथन नहीं करेंगे तो भारतके हितैषीयोंको आपसे सावध रहेना पडेगा.

(१) ये लोग, अपनेको स्वयं प्रमाणित मूर्धन्य मानते है और अति-वाचाल है;

भारत ही नहीं किन्तुं दुनियाका मध्यमवर्ग सोसीयल मीडीयासे संबंधित है. समाचार माध्यममें भी कई लोग ऐसे है, जो अपनेको मूर्धन्य मानते है और इस प्रकारसे अपने अभिप्राय प्रकट करते रहेते हैं.

समाचारपत्र और विजाणुमाध्यम का प्राथमिककर्तव्य है कि वे जनताकी अपेक्षाएं और मान्यताओंको प्रतिबिंबित करें और उनके उपर सुज्ञ व्यक्तियोंकी तात्विक चर्चा करवायें.

जो व्यक्ति चर्चा चलाता है उसका कार्यक्षेत्र संसदमें जो कार्यक्षेत्र संसदके अध्यक्षका होता है, उसको निभाना है, किन्तु वह ऐसा करनेके स्थानपर अपनेविचारसे विरोधी विचार रखने वाले पक्षके वक्ताके प्रति भेदभावपूर्ण वर्तन करता है. कई बार वह चर्चाको, उस चर्चा बिन्दुसे दूर ले जाता है. चर्चाको निरर्थक कर देता है. बोलीवुडके हिरोकी तरह वह खुदको ग्लोरीफाय करता है. अर्णव गोस्वामी, पंकज पचौरी, करण थापर, राजदिप सरदेसाई, राहुल कनवाल, विनोद दुआ, पून्यप्रसून बाजपाई, आशुतोष, निधि कुलपति, बरखा दत्त, नलिनी सिंग, आदि कई सारे हैं. जिनकी एक सुनिश्चित एवं पूर्वनिश्चित दिशा होती है.  चर्चाद्वारा वे उसई दिशामें हवा बनानेका प्रयास करते हैं. अधिकतर विजाणु संचार प्रणालीयां ख्रिस्ती और मुस्लिम संस्थाओंने हस्तगत की है, इस लिये उनकी दिशा और सूचन पूर्वनिश्चित होता है.

प्रभु चावला, डॉ. मनीषकुमार, संतोष भारतीय, सुरेश चव्हाण जैसे सुचारु रुपसे चर्चा चलाने वाले चर्चा संचालक अति अल्प संख्यामें हैं.

कुछ कटारलेखक (कॉलमीस्ट) होते हैं जो मनमानीसे समाचारपत्रमें वे अपनी अपनी कॉलम चलाते है. वे सब बंदरके व्यापारी होते है.

सोसीयल मीडीयामें कई मध्यम वर्गके, मेरे जैसे लोग भी होते है. जो अपने वेबसाईट ब्लॉग चलाते है और अपनी प्रतिक्रिया देते रहते हैं.

इनमें हर प्रकारके लोग होते हैं. कुछ लोग अ-हिन्दु होते हुए  भी हिन्दु नाम रखकर, हिन्दुओंको असंमंजसमें डालनेका काम करते है. अल्पसंख्यक होने पर भी नरेन्द्र मोदी और बीजेपीको समर्थन करनेवाले बहुत ही कम लोग आपको सोसीयल मीडीयामें मिलेंगे.

(२) ये लोग भारतके इतिहाससे या तो अर्धदग्ध है, या तो इन लोगोंने क्षतियुक्त इतिहास ज्यों का त्यों पढ लिया है और उसका स्विकार करके अपनी मान्यता बना ली है और अपनी इस मान्यताके उपर अटल है;

aryan invasion

अंग्रेज सरकार के हेतु और कार्यशैलीसे ज्ञात होते हुए भी,  अज्ञानी की तरह मनोभाव रखना इन लोगोंका लक्षण है.

यह बात दस्तावेंजों द्वारा सिद्ध हो गई है कि अंग्रेज सरकारका ध्येय भारतीय जनताको विभाजित करके उनको निर्बल बनाना और निर्‍विर्य बनाना था. भारतके प्राचीन ग्रंथोंको आधारहीन घोषित करना. उनको सिर्फ मनगढंत मनवाना, और अ-भारतीयोंने जो लिखा हो या तो खुदने जो तीकडमबाजी चलाके कहा हो उसको आधारभूत मनवाना और उनको ही शिक्षामें संमिलित करना, अंग्रेजोंकी कार्यशैली रही है.

उन्होने पौराणिक इतिहासको नकार दिया. उन्होने “आर्य” को एक प्रजाति घोषित कर दिया. उन्होंने आर्योंकों आक्रमणकारी और ज्यादा सुग्रथित व्यवस्थावाले बताया. भारतमें इन आर्योंका आगमन हुआ, आर्योंको, उनके घोडेके कारण विजय मीली. उन्होने भारतवासी प्रजाको हराया. उन्होने उनके नगर नष्ट किये. उन्होने पर्वतवासी, जंगलवासी आदिवासीयों पर भी आक्रमण किया. सबको दास बनाया.

इस प्रकार भारतको आदिवासी, द्रविड और आर्य जातिमें विभाजित कर दिया. आज करुणानिधि, जयललिता, मायावती, उत्तरपूर्वके वनवासी नेतागण आदि सभी लोगोंकी मानसिकता जो हमें दिखाई देती है, यह बात इस विभाजनवादी मान्यताका दुष्‌परीणाम है.

अंग्रेज सरकारने दुषित, कलुषित और अनर्थकारी इतिहास पढाके, भारतवासीयोंमें अपने ही देशमें अपने ही देशकी उत्तमोत्तम धरोहरसे वंचित रहेनेकी मानसिकता  पैदा की है. इन दुषित मान्यतांके मूल इतने गहन है कि अब अधिकतर विद्वान उसके उपर पुनः विचार करना भी नहीं चाह्ते, चाहे इस इतिहासमें कितना ही विरोधाभास क्यूं न हो.

इन विषयों पर चर्चा करना आवश्यक नहीं है. क्यों कि कई सुज्ञ लोगोंने जिन्होनें भारतीय वेद, उपनिषद और पुराण और आचारोंद्वारा लिखित ग्रंथोंका अध्ययन किया है उन्होनें इस विभाजनवादी मान्यतामें रहे विरोधाभासोंको प्रदर्शित करके अनेक प्रश्न उठाये है. इन प्रश्नोंका तार्किक उत्तर देना उनके लिये अशक्य है. इस विभाजनवादी मान्यताको दयानंद सरस्वती, सायणाचार्य, सातवळेकर और अनेक आधुनिक पंडितोंने ध्वस्त किया है. इसके बारेमें ईन्टरनेट पर प्रचूरमात्रामें साहित्य उपलब्ध है.  

विभाजनवादी अंग्रेज सरकारने भारतीयोंको कैसे ठगा?

जो लोग अपनेको आदिवासी मानते हैं वे समझते है कि भारतमें स्थायी होनेवाले आर्योंने हमपर सतत अन्याय किया है. हमारा शोषण किया है. ये जो नये आर्य (अंग्रेज ख्रिस्ती) आये है वे अच्छे हैं. ख्रिस्ती बनाके उन्होने हमारा उद्धार किया है.

उदाहरण के आधार पर, आप, मेघालयकी आदिवासी “खासी” प्रजा को ही लेलो. पहेले उनकी भाषा सुग्रथित लिपि देवनागरी लिपि की पुत्री, बंगाली लिपिमें लिखी जाती थी. लेकिन जब वहां ख्रिस्तीधर्मका प्रभाव बढा और उनको एक अलग राज्यकी कक्षा मिली, तो उन्होने रोमन लिपि अक्षर लिपि है, जो उच्चारोंके बारेमें अति अक्षम है उस “रोमन” लिपिको अपनी लिपि बना ली.

आदिवासी जनताके मनमें ऐसी ग्रंथी उत्पन्न कर दी है कि उनको भारतीय साहित्य, कला, स्थापत्य और संस्कृति पर जरा भी गौरव और मान  ही न रहे. वे इनको पराया  मानते है.   

मुस्लिम लोग तो अपनेको भारतीय संस्कृतिको अपना अंग मानते ही नहीं है. उनकी तो मान्यता है कि, भारतके आर्य तो एक विचरित जातिके थे. उन्होने भारतकी मूल सुसंस्कृत जनताकी संस्कृतिको ध्वस्त किया. इन भारतीयोंको हमने ही सुसंस्कृत किया है.

भारतीय गुलामी

भारतीय जनता हमेशा युद्धमें हारती ही रही है, कुछ लोग इस गुलामीका अंतराल २३०० से १२०० सालका मानते है.

अलक्षेन्द्रने भारत के एक सीमान्त राजा पर्वतराजको हराया, तो बस समझ लो पूरे भारतकी गुलामी प्रारंभ हो गई. या तो कोई मुस्लिम राजाने १२०० साल पहेले सिंधके राजाको हराया तो १२००से पूरा भारत गुलाम हो गया. बस साध्यं इति सिद्धं. 

वास्तवमें क्या था?  वास्तवमें मुस्लिम राजाओंको ६०० साल तक भारतके अधिकतर राजाओंको हराने के लिये परिश्रम करना पडा था.

विजयनगरका साम्राज्य एक मान्यताके अनुसार मोगल साम्राज्यसे भी बडा था. मुगलसाम्राज्यका जो स्वर्णयुग और मध्यान्हकाल था उस अकबर के समयमें भी, अकबरको राणा प्रतापको हराना पडा था. और बादमें राणाप्रतापने अपना युद्ध जारी रखके चित्तोर को छोडकर अपनी धरती वापस ले ली थी. औरंगझेबके समयमें भी शिवाजी जैसे विद्रोही थे जिन्होने औरंगझेबकी सत्ता को नष्टभ्रष्ट कर दिया था.

एक बात और है. क्या मुगलका समय भारतीयोंके लिये गुलामीका समय था?

शेरशाह के समयसे ज्यादातर मुस्लिम राजाओंने भारतको अपना ही देश समझा है. भारतीय संस्कृतिका आदर किया है. उन्होने ज्यादातर एक भारतीय राजाके संस्कारका ही आचारण किया है. दुराचारी तो कोई न कोई राजा होता है चाहे वह हिन्दु हो या मुस्लिम हो.

किन्तु अंग्रेज सरकारने यह पढाया कि मुस्लिम धर्मवाले राजा मुस्लिम होनेके कारण हिन्दुओंकी कत्लेआम किया करते थे. अगर ऐसा ही होता तो अकबर और औरंगझेबके सैन्यमें हिन्दु सैनिक नहीं होते और शिवाजीके सैन्यमें मुस्लिम सैनिक नहीं होते. इतना ही नहीं, बहादुर शाह जफर जिसका राज्य सिर्फ लालकिलेकी दिवालों तक सीमित था, तो भी  उसके नेतृत्वमें विप्लव करना और उसको भारतका साम्राट बनाना ऐसा १८५७में निश्चित हुआ था. यदि मुस्लिम राजा हिन्दुस्तानी बन गये नहीं होते तो ऐसा नहीं होता. इस बातसे समझ लो कि मुगल साम्राज्य विदेशी नहीं था. जैसे शक, पहलव, गुज्जर, हुन जैसी जातियां भारतके साथा हिलमिल गई, वैसे ही मुस्लिम जनता भी भारतसे हिलमील गई थीं. अंग्रेजोने अत्याचारी मुस्लिम राजओंका इतिहास बढाचढाके पढाया है.

कोई देश गुलाम कब माना जायेगा?

कोई देश तभी गुलाम माना जायेगा जब उसकी धरोहर नष्ट कर दी जाती है. राजा बदलनेसे देश गुलाम नहीं हो जाता. मुस्लिम राजाओंने और मुस्लिम जनताने भी भारतकी कई प्राणालीयोंका स्विकार किया है. अगर आप पंजाबी मुस्लिम (पाकिस्तान सहितके),  और पंजाबी हिन्दु के लग्नमें जाओगे तो पाओगे कि दोंनोमें एकसी पगडी पहेनते है. स्त्रीयां एक ही प्रकारके लग्नगीतें गातीं हैं. ऐसा ही गुजरातमें हिन्दु और मुस्लिमोंका है. हां जी, लग्नविधि भीन्न होती है. वह तो भीन्न भीन्न प्रदेशके हिन्दुओंमे भी लग्न विधिमें भीन्नता होती है.

भारतके मुस्लिम कौन है? अधिकतर तो हिन्दु पूर्वजोंकी संतान ही है. भारत पर मुस्लिम युगका शासन रहा है तो कुछ राजाओंने जबरदस्ती की ही होगी. उन्होने लालच भी दिया  होगा. कुछ लोगोंने राजाका प्रियपात्र बननेके लिये भी धर्म परिवर्तन किया होगा. सम्राट अशोकने ज्यादातर भारतीयोंको बौद्ध बना दिये थे. किन्तु भारतीय तत्वज्ञान और प्रणालीयां इतनी सुग्रथित और लयबद्ध है कि, सनातन धर्मने अपना वर्चस्व पुनः प्राप्त कर लिया. आदि शंकराचार्यने बौद्धधर्मको नष्टप्राय कर दिया.

क्या मुस्लिमोंने हिन्दुओं पर बेसुमार जुल्म किये थे?

अपना उल्लु सीधा करने के लिये कई लोग अफवाहें फैलाते हैं और शासक सम्राट को मालुम तक नहीं होता है. ऐसी संभावना संचार प्रणाली कमजोर होती है वहां तो होता ही है. कभी शासक, इसका लाभ भी लेता है.

१९७५में जब नहेरुवीयन महाराणीने आपातकाल लगाया तो कई सारे नहेरुवीयन नेताओंने और कार्यकरोंने अपना उल्लु सीधा किया था. वैसे तो संचारप्रणाली इतनी कमजोर नहीं थी किन्तु इस नहेरुवीयन फरजंदने सेन्सरशीप लगाके जनतामें वैचारिक आदानप्रदानको निर्बल कर दिया था. जब इन्दीरा हारी तो उसने घोषित किया कि उसने तो कोई अत्याचारके आदेश नहीं दिये थे.

औरंगझेब एक सच्चा मुसलमान था. वह अपनी रोटी अपने पसीने के पैसे से खाता था. राजकोषके धनको वह खुदका धन मानता नहीं था. वह सादगीसे रहता था. शाहजहांके समयसे चालु मनोवृत्तिवाले  अधिकारीओंको औरंगझेबकी नीति पसंद न पडे यह स्वाभाविक है. वे अपना उल्लु सीधा करनेके लिये और औरंगझेबका स्नेह पानेके लिये या तो अपनी शासन शक्ति बढानेके लिये औरंगबके नामका उपयोग करते भी हो. औरंगझेबको कई बातें पसंद भी हो. उसने उच्च ज्ञातिके हिन्दुको मुस्लिम धर्म स्विकृत करने के  लिये (वन टाईम लम्पसम मूल्य) १००० रुपये, और गरीब के लिये हर दिनके ४ रुपये निश्चित किये थे. अगर सिर्फ अत्याचार ही करने के होते तो ऐसा लालच देना जरुरी नहीं था. अवगत करो, कि उस समयमें रु. १०००/- और प्रतिदिन रु.४/- कोई कम मूल्य नहीं था. उन हिन्दुओंको प्रणाम करो कि वे विभाजित होते हुए भी हिन्दुधर्मके पक्षमें रहे.

हां जी, मुस्लिमोने भारतके कई मंदिर तोडे. मंदिर तोडनेका और जहां मंदिर तूटा है, वहां ही अपना धर्मस्थान बनाना यह बात ईसाई और मुस्लिम शासक और धर्मगुरुओंकी नीति और संस्कार रहा है. ऐसा व्यवहार इन दोंनोंने ईजिप्त, पश्चिम एसिया, ओस्ट्रेलीया, अफ्रिका और अमेरिकामें किया ही है. यहां तक कि ईसाईयोंने और कुछ हद तक मुस्लिमोंने भी, पराजितोंकी स्थानिक भाषाको भी नष्ट कर दिया है.

किन्तु भारतमें ये लोग ऐसा नहीं कर पाये. क्यों कि भारतीय तत्वज्ञान, भारतीय भाषाएं और भारतीय प्रणालियां,  भारतीय जिवनके साथ ईतनी सुग्रथित है कि उनको नष्ट करने के लिये ये लोग भारतमें अक्षम सिद्ध हुए.

ऐसा क्यों हुआ? कौटिल्यने कहा था कि एक सरमुखत्यार राजासे एक गणतंत्रका नेता १०० गुना शक्तिशाली है. कारण यह है कि सरमुखत्यार की शक्ति उसका सैन्य है. गणतंत्रके नेताकी शक्ति उसका सैन्य ही नहीं किन्तु साथ साथ जनता भी है. गणतंत्रमें चर्चा और विचारोंका आदानप्रदान क्षेत्र व्यापक रुपसे होता है. और जो निर्णय होता है वह सुग्रथित और उत्कृष्ट होता है. भारतीय सनातन तत्वज्ञान कर्मधर्म, प्रणालियां आदि सहस्रोंसालोंके आचारोंके अनुभवओंसे सुग्रथित है और अपनी एकात्मताकी रक्षा करते हुए परिवर्तन शील भी रहा है. धर्मके बारेमें चर्चा करना और वैश्विक भावना रखकर तर्कबद्ध निर्णय करना, अन्य धर्माचार्योंके मस्तिष्ककी सीमाका क्षेत्र है ही नहीं.

ऐसे कई कारण है कि जिनकी वजहसे सनातन धर्म सनातन बना. हम उनकी चर्चा नहीं करेंगे.

किन्तु हमें किससे क्यूं सावधान रहेना है?

(३) ये लोग अपनी मान्यताओंको नकारने वाले साहित्यका वाचन करना उचित मानते नहीं है, इस लिये आप उनको शिक्षित नहीं कर सकते.

हमें नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनके सांस्कृतिक साथी पक्षोंसे सावधान रहेना है, क्योंकि वे कुत्सित इतिहासके आधारपर भारतको विभाजित करने वाले ठग है.

इन नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंने महात्मा गांधीवादी जयप्रकाश नारायण तक को, छोडा नहीं था, उनको हम कैसे क्षमा दे सकते है?

इन नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंने गांधीजीके सिद्धांतोंका और तथा कथित समाजवाद का नाम मात्र लेकर, अशुद्ध आचारद्वारा सत्ता प्राप्तिका ध्येय  रक्खा है. देशके उपर ६० सालके निरंकुश शासन करने के पश्चात भी, प्राकृतिक संशाधन प्रचूर मात्रामें होने के पश्चात भी, उत्कृष्ट संस्कृति होनेके पश्चात भी, गरीबोंका और समाजका उद्धार किया नहीं है. केवल और केवल खुदकी संपत्तिमें वृद्धि की है. देशको रसाताल किया है. इन लोगोंका तो कभी भी विश्वास करना नहीं चाहिये. ये लोग सदाचारी बन जायेंगे ऐसा मानना देशद्रोह के समकक्ष ही मानना अति आवश्यक है.

यदि आप, अंग्रेजी शासकोंने जो कुत्सित और विभाजनवादी इतिहास पढाया उसको अगर विश्वसनीय मानते है, और उनसे अतिरिक्त इतिहासक सत्यको मानना नकारते है तो, निश्चित ही समझलो, कि भारतका विकास एक कल्पना ही रह जायेगा.

चौथा कौनसा वर्ग है जिनसे हमें सावध रहेना है?

(४) ये लोग बीजेपी या/और नरेन्द्रके विरोधी हो सकते है,

(क्रमशः)

चमत्कृतिः

एक ऐसी बात है कि, औरंगझेबने काशीमें इतने ब्राह्मणोंकी हत्या की, कि, उनके उपवित (जनेउ) का वजन ही, ४० मण था.

चलो देखें उसका कलनः

एक उपवितका वजन = ग्राम

४० मण उपवित (जनेउ).

एक मण = ४० किलोग्राम = ४०००० ग्राम,

४० मण = ४० x ४०००० = १६००००० ग्राम.

एक जनेउ = ग्राम = ब्राह्मण

१६०००००/ = ३२०००० ब्राह्मणोंकी हत्या. क्या बनारसमें तीन लाख ब्राह्मण की हत्या हुई थी?

अगर आधे ब्राह्मणोंको मार दिया, तो बचे लितने. ३२००००. दुसरे किसीकोभी नहीं मारे तो मान लो कि ५० % ब्राह्मण थे और बाकी अन्य थे तो काशीकी जनसंख्या हुई १२६००००/-

इनता बडा नगर उस जमानेमें दुनियामें कहीं नहीं था. आग्रा सबसे बडा नगर था और उसकी जनसंख्या ५००००० पांच लाख थी.

अगर ३० हजार मनुष्योंकी हत्या होती है तो भी निरंकुश महामारी फैल सकती है.

  

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः इतिहास, अंग्रेज, संस्कृति, संस्कार, सुग्रथित, लयबद्ध, तर्कबद्ध, धरोहर, विभाजनवादी, भाषा, धर्म, सनातन, मुस्लिम, ईसाई, राजा शासक, गणतंत्र, कौटिल्य, गुलामी

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