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Posts Tagged ‘छाया’

Rama has been lost who had walked on this earth in flesh and blood

 

खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग-)

 

राजगद्दी किसको दिया जाय? राम को या भरतको?

 

कैकेयीके पिताको आश्वस्त किया था कि पट्टराणीको अगर पुत्र हुआ तो भी कैकेयीके पुत्र का ही राज्याभिषेक होगा. अब हुआ ऐसा कि पट्टराणीको ज्येष्ठ पुत्र हुआ और कैकेयीका पुत्र ज्येष्ठ पुत्र नहीं बना. प्रणाली ऐसी थी कि ज्येष्ठपुत्र को राजगद्दी मिले. अगर एकसे ज्यादा राजकुमार है तो जनतामें जो राजकुमार सर्वाधिक लोकप्रिय हो तो उस राजकुमारकी लोकप्रियता भी राजगद्दी पानेकी प्राथमिकता थी. राम सर्वोत्तम लोकप्रिय थे. अब क्या किया जाय?

राजाका कैकेयीको (या उसके पिताको) दिया हुआ वचन और प्रजाकीय प्रणाली, इन दोनोमें किसको महत्व दिया जाय.

अगर प्रणाली को मान लिया जाय तो राजाके वचनकी किमत नहीं रहती. राजाके वचनके मूल्यका ह्रास यह भी एक महाप्रणालीका नाश था.

 

हर लडाई मीकी – माउस की

 

इस समस्यामें जिन दैवी तत्वोंकी और खेल खेलनेकी बाते कहीं है उसकी हम चर्चा नहीं करेंगे. रामको राजा बनते देखते हुए ईन्द्रादि देवों को लगा कि अगर राम राजा बन जायेंगे तो वे राजकाजमें व्यस्त हो जायेंगे तो रावणके त्राससे हमें छूडायेगा कौन? ऐसा समझकर देवोंने मंथराको बलिका बकरा (बकरी) बनाया. और उसके मनमें भरतको राजा बनानेका विचार डाला और मंथराने कैकेयीको उकसाया. वैसे तो कैकेयी का कोई कसुर नहीं था. लेकिन दैवी शक्तियोंके सामने वह बेचारी क्या करे? ऐसा कारस्तान देवताओंने रचा. यह सब बकवास है.

 

कैकेयीने जो ईच्छा प्रगट की, और जो आचरण दिखाया वह उसका हक्क था. लेकिन ज्यादातर पुराण कथाकारोंको  यह असुर, दैत्य, राक्षस, दानवोंका ब्रह्माजी, शिवजी आदिकी तपस्या करके वर पाना फिर देवोंको परेशान करना और आखिर ईन मीकी-माउस समकक्ष युद्धमें विष्णु, शिव, गणेश, शक्तिमाता, कार्तीकेय इत्यादिका देवोंके पक्षमें संमिलित होना और युद्ध करके इन राक्षसी शक्तिओंको हराना ऐसा व्यवहार कायम रहा है. यह एक अलग ही विषय है.

 

संभव है कि दशरथ और मंत्रीमंडल दोनोंने मिलके यह रास्ता निकाला हो कि जिससे प्रणाली, जनताकी ईच्छा और राजाके वचन ये तीनोंको यथा योग्य सन्मान मिले. उस हिसाबसे रामको १४ साल वनवास मिले ताकि भरत निश्चिंत रुपसे राज कर सके.

 

रामको वनवास क्यों?

रामको वनवास इसलिये कि राम लोकप्रिय थे. और अगर जनता रामके लिये सडकपर उतर आवे, तो भरतको राजगद्दी छोडनी न पडे. रामके वनवासके समय दरम्यान, भरत जनताका प्रेम हांसिल कर ले सकता है.

 

रामके साथ सेना भी नहीं. क्यों कि अगर वही सेनासे राम शुरुआतमें दुसरे मुल्कोंको जितके बादमें राम या उसकी संतान अयोध्या पर भी कबजा कर ले तो!

 

रघुवंश या तो उस समयके राजा मनमानी नहीं कर सकते थे. राजाने अगर वचन दिया तो निभाना पडता था. प्रणालीयोंका पालन करना पडता था. जनताकी बात को मानना पडता. रामने दशरथकी बात कबुल कर ली.

 

लक्ष्मणको तो रामके साथ ही रहेनाका था.

 

सीताने भी सोचा होगा कि, जो पुराने टाईपके और अटपटे धनुषका उपयोग करनेमें भी माहिर है, वह वनवास के समय दरम्यान भी चूप बैठेगा नहीं. तो रामके उपर नजर तो रखना पडेगा. शायद सीता और लक्ष्मणकी पत्नी उर्मिला दोनोंने मिलके निर्णय लिया होगा. सीता जो है वह राम और लक्ष्मण पर नजर रखेगी, कि ये दोनों कहीं दुसरी शादी न कर ले. और उर्मिला अयोध्यामें क्या होता है, उसके उपर नजर रखेगी.

 

वैसे रामायण, कई सारे चमत्कारोंसे, दंतकथाओंसे, भगवानोंसे और प्रक्षेपोंसे भरपूर है. पहेलेसे ही कई सारे राक्षसों की हत्या, आकाशमेंसे पुष्पवृष्टि करना, अह्ल्याका उद्धार, देवताओंका अयोध्यामें आना, विष्णुके अवतार रामके साथ साथ, लक्ष्मी (सीता), शेषनाग (लक्ष्मण), शिव (हनुमान), ईन्द्रादि देवोंका पृथ्वी पर जन्म लेना, इत्यादि… जैसे कि अगर  कोई मंत्री कोई  प्रदेशमें जाता है तो साथमें अपनी मंडळी अथवा और सीक्योरीटी ले जाता है, और यजमान प्रदेशका समकक्ष मंत्री प्रोटोकोल निभाता है. इन सबकी चर्चा करना व्यर्थ है.

 

शुर्पणखा और राम-लक्ष्मण

 

राम लक्ष्मण और सीता, पंचवटीमें रहेते है. राम हमेशा अपनेको साम्राट भरतके प्रतिनिधिके रुपमें प्रस्तुत करते है. और यथा योग्य वनवासीयों कि सुरक्षा करते है.

 

रावणकी बहेन शुर्पणखा

 

एक दिन घुमते घुमते शुर्पणखा पंचवटी आती है और रामके रुपसे मोहित हो जाती है. वह रामको शादीके लिये प्रपोझ करती है. राम तो आदर्श पुरुष है. एक पत्नी रखनेमें ही मानते है. इसलिये राम शुर्पणखाको सूचन करते है कि वह लक्ष्मणसे प्रपोझ करें.

 

शुर्पणखा लक्ष्मण के पास वह जाती है तो लक्ष्मण उसको रामके पास जानेको कहेता है. ऐसा बारबार होता है. इस ईव-टीझींगसे शुर्पणखा गुस्से हो जाती है. इन दोनोंको मारने के लिये आती है. लक्ष्मण उसकी नाक और कान काट लेता है.

 

यह बात सचमुचमें नाक और कान काटनेकी नहीं होगी. शुर्पणखाके नाक कानसे ईजाग्रस्त हुई होगी. नाक और कान को काटलेना तो जघन्य अपराध है. शादी के लिये प्रपोझ करना कोई अपराध नहीं है. और स्त्रीका तो इस तरह टीझींग (परेशान)  करनेसे गुस्सा करना उसका अधिकार है. वह तो रावण की बहेन है. अगर हमारे इस जमानेमें मंत्री महोदयका लडका ट्राफिक पुलिसको मारपीट करने पर उतर आता है, तो शुर्पणखा क्या कुछ नहीं करती? शुर्पणखा, रावणके पास जाके राम लक्ष्मणके खिलाफ फरीयाद करती है.

 

सीता हरण

सीता हरण क्या होगा? एक पाठके अनुसार, सीता खुद लंका चली गई थी. एक पाठ के अनुसार सीता रावणकी पुत्री थी. और कई पाठोंके अनुसार रावण सीताका हरण कर गया था.

सुवर्ण मृगकी बात आती है. मरिची जो रावणका मामा था. वह अपनी मायावी शक्तिसे सुवर्ण मृग बन जाता है. सीताको लुभाता है. बहुरुप धारण करना एक कला है.

सीता रामको वह मृग लानेके लिये कहेती है. मरीची रामको दूर दूर ले जाता है. फिर राम उसको तीर मारते है, तो वह रामकी आवाजमें लक्ष्मण लक्ष्मण ऐसी आवाज देता है.

 

लक्ष्मण एक रेखा खींचके सीताको कहेता है कि इसका उलंघन न करना. लेखकोंने इसको नाटकीय बनाया है. हो सकता है कि वह एक सीमा हो, जिसके अंतर्गत सीता पर नजर रक्खी जा सके. या तो ऐसा कुछ हो ही नहीं. ऐसे ही लक्ष्मण चला गया हो.

रावण साधु के रुपमें आता है और भिक्षा मांगता है. इसमें भी नाट्यकरण है. सीता पैर उठाती है. रावण पैर पकडके खींच के सीताको उठा लेता है.

 

राम तो विष्णु भगवान है. सीता तो साक्षात लक्ष्मी है. सीता वल्कल पहेनी हुई है. रावण इस सीताको उसकी टांग पकडके अपने कंधेपर उठा लेता है. जो रावण, शिवका धनुष उठा भी नहीं पाया था, सीता उस शिवके धनुषके साथ बचपनमें खेलने लगी थी. उस सीताको रावण उठा लेता है. सीता इतनी बेबस और निर्बल कैसे? लक्ष्मी की ऐसी अवमानना कैसे?

 

किसीको भगवान बनानेमें है मुसिबतें

 

जब किसी मनुष्यको भगवान और किसी स्त्रीको देवी या महादेवी बना देते है तो ऐसी मुसबतें पैदा होगी ही.

 

इसको कैसे दुर किया जाय?

हमारे लेखकोंने या धर्मगुरुओंने इसका उपाय खोज रखा है.

 

अरे भाई, ये सब तो भगवानकी लिला है. भगवान तो संकल्प मात्रसे सबकुछ कर सकते है. लेकिन उनको लीला भी करनी है. इसलिये वे ये सब करते है.

 

अरे भाई लीला तो लीला, लेकिन भगवानकी ऐसी कैसी लीला है, कि, लक्ष्मी देवी की इज्जत चली जाय? भगवानने अपनी पत्नी लक्ष्मीकी बेईज्जती क्यों होने दी?

 

इसका भी जवाब है. देखो. जब राम वनवासके लिये निकले तो लक्ष्मीजी वैकुंठ वापस चली गई. रामके साथ जो सीता गई, वह कोई साक्षात लक्ष्मी नहीं थीं. वह तो लक्ष्मी की छाया थी. लक्ष्मीजी तो रामके पास अपनी छाया छोडके गई थीं. वह कोई सचमुच लक्ष्मी थोडी थी! वह तो छाया लक्ष्मी थी. इति सिद्धम्‌.

 

तो फिर हुआ क्या था?

बस ईतना हि समझ लो कि, सीता लंका पहुंच गई

 

रावणको सीतामें कोई चाहना थी? रावण क्या सीतासे शादी करना चाहता था? रावणने सीता पर अत्याचार किया था?

 

ऐसा कुछ नहीं था. रावणको सीतामें कोई रस नहीं था. न तो वह सीतासे शादी करना चाहता था न तो वह सीताको परेशान करना चाहता था. जिस रावणको कौशल्यामें रस नहीं था, उसको सीतामें कैसे रस हो सकता है? जो रावण कैशल्या और दशरथका हरण कर सकता है और बादमें  छोड भी सकता है, उसको सीतामें कोई रस नहीं हो सकता. कई पुरुषोंमें ऐसी प्रकृति होती है कि, वे स्त्री पर दबाव डालना चाहते नहीं है. रावण तो रामका सिर्फ अपमान करना चाहता था. वह उसने कर दिखाया. उसने अपनी बहेन पर किया हुआ “ईवटीझींग” का जवाब दे दिया. रावणने सीताको अशोकवाटिकामें छोड दिया. मजाकका जवाब दुगुनी मजाकसे दे दिया.

 

रामका अपमान तो होई गया.

 

लेकिन राम कोई कम नहीं थे.

(क्रमशः)

 

शिरीष मोहनलाल दवे

 

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