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बीजेपी विरोधीयोंकी समस्या क्या है?

बीजेपी विरोधीयोंकी समस्या क्या है?

“प्रशस्ति पत्रोंकी वापसी, इसमें हम नहीं, मैं शर्मींदा हूँ, भारतके मुस्लिम सुरक्षित नहीं, अखलाक, पत्रकारकी हत्याएं, दलितों पर अत्याचार, व्यर्थ विमुद्रीकरणके कारण कई मृत्यु और आम आदमीको परेशानी, जीएसटी एक गब्बरसींग टेक्ष, राफेल डील, उद्योगकर्ताओंको खेरात, सुशील मोदी, माल्या आदिको अति अधिक ॠण देकर देशसे भगा देना, सरकारी बेंकोका एनपीएन उत्पन्न करना, मी टू, काश्मिरमें अशांति पैदा करना आदि ये सब मोदी सरकार द्वारा बनी समस्याएं हैं.” ऐसा सिद्ध कैसे किया जाय? यह बीजेपी विरोधीयोंकी समस्या है.

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(मुझे मितु मितु करके मत बुलाओ. मुझे  मिताली कहो)

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ऐसी कई बातोंको नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षने अपने पालतु कटार लेखकों द्वारा, एंकरों द्वारा, महानुभावो द्वारा हवा देके मोदी सरकारके विरुद्ध हवा बनानेका भरपूर प्रयत्न किया है ताकि जनताको यह संदेश मिले कि, नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्ष, जब शासनमें था तब तो देश खुशहाल था और देशमें शांति ही शांति थी.

सत्य क्या था?

किन्तु हम सब जानते हैं कि नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके शासन वास्तवमें कैसा था. विकासको तो रोकके ही रक्खा था और वही योजनाएं होती थीं और वे भी अति देरीसे, जिनमें नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके सर्वोच्च नेताओंके साथ अंडर टेबल डील हो सकता था. इन बातोंके तो कई उदाहरण है.

“विकास पागल है” नहेरु-इन्दिरा गांधी वंशी कोंग्रेसका सूत्र !!

बीजेपीके सत्तामें आनेके बाद, आम जनताको तो अब पता है कि विकास क्या है. लेकिन नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके नेताओंने विकासको पागल बताके विकासके विरुद्ध बोलना आरंभ कर दिया था.

नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके नेताओंको पता चल गया है कि विकासके विरुद्ध प्रचार करने से उनकी दाल गलने वाली नहीं है. इसलिये उन्होंने अपने पालतु समाचार माध्यमके तथा कथित विद्वानोंसे “गठ बंधन” जो नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके नेतागण, उनके सांस्कृतिक साथी पक्षोंके साथ करनेवाले हैं उसका गुणगान करना प्रारंभ कर दिया है. भूतकाल में “गठ बंधनवाली” सरकारोंने अच्छा काम किया था इस बातको मनवाने के लिये उनके शौर्यगीत सूनाना चालु कर दिया है.

“शेखर गुप्ता” एक तथा कथित मूर्धन्य कोलमीस्ट है. सोनेमें सुहागा यह है कि वे “ध प्रीन्ट” के मुख्य तंत्री भी है. लगता है उनको नरसिंह रावका [ जो नहेरुवीयन-{इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके एक अनहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)}  प्रधान मंत्री थे ]  कार्यकाल पसंद होगा. उस समय मनमोहन सिंह वित्तमंत्री थे. इस लिये नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्ष पुरस्कृत युपीएकी अर्थ नीति पसंद हो सकती है. शेखर गुप्ताजीने एक पुस्तक “ईन्डिया रीडीफाईन्स इट्स रोल” लिखा है. वैसे तो कई लोग तत्कालिन वित्त मंत्री को (मनमोहनको) उस समयकी अर्थनीतिके कारण श्रेय देते हैं. वैसे तो नरसिंह रावके वित्तसलाहकार सुब्रह्मनीयम थे और विश्वबंधु गुप्ता जो तत्कालिन आयकर विभागके महान आयुक्त थे उन्होने मनमोहन सिंहके अभिगम और उनकी मान्यताओंके विरुद्ध स्वानुभवके विषय पर काफि कुछ लिखा है. इन बातोंकी चर्चा हम नहीं करेंगे. हम इस समय हमारे उपरोक्त कटारीया भाई (शेखर गुप्ताजी) जो नरेन्द्र मोदीकी अर्थनीतिकी उपलब्धियोंको निरर्थक बताने पर तूट पडे है, और नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षकी यानी कि “गठबंधन वाली” सरकारोंने कैसा अच्छा काम किया था वह सिद्ध करनेके लिये अपना दिमाग तोड रहे हैं, उनकी बाते करेंगे.

नरेन्द्र मोदी हमेशा पूर्ण बहुमत वाली सरकारको लानेका जनताको अनुरोध करते है. वे यह भी कहेते है कि पूर्ण बहुमत होनेके कारण उनकी सरकारकी उपलब्धियां अभूतपूर्व है. गठबंधनकी सरकारें अस्थिर होती हैं और उनकी उपलब्धियाँ पारस्परिक विरोधाभासोंके कारण देशके विकास पर ऋणात्मक असर पडता है.

कटारीयाजी का साध्यः “गठबंधनवाली सरकार श्रेय है” उससे डरना नहीं.

अब हमारे कटारीया भाईका एजन्डा है कि नरेन्द्र मोदीके इस तर्कका खंडन कैसे किया जाय?

किसी भी सत्यका खंडन करना हो तो सर्व प्रथम तो जो सत्य है उसको छोडकर, दुसरे विषय पर विवरण तयार कर देना चाहिये. तत्‍ पश्चात्‍, जो सत्य है उस सत्यको उलज़ा दो. यानी कि जिस समस्याको सुलज़ानेका बीडा जिस व्यक्तिको दिया था उसको पार्श्व भूमिमें रख दो और उसके स्थान पर पूर्व निश्चित और आप जिस व्यक्तिको या समूहको रखना चाह्ते हो उस/उन को रख दो. फिर श्रेय   उस/उन को दे दो.

सियासतमें ऐसा तो बार बार होता है.

जैसे कि दूरसंचार प्रणालीको सुधारनेका बुनियादी ढांचा (ईन्फ्रास्ट्रक्चर)का काम तो बहुगुणाने किया था. लेकिन बहुगुणा उसका श्रेय स्वयं ले रहे थे तो इन्दिरा गांधीने उनको हटा दिया और पक्षसे भी निकाल दिया. ऐसा ही हाल इन्दिराने वीपी सिंगका किया था जब वे अर्थमंत्री थे.

किन्तु नरसिंह रावने ऐसा नहीं किया. नरसिंह रावने अर्थतंत्रके सुधारका श्रेय मनमोहन सिंहको लेने दिया. वैसे तो उसका श्रेय अर्थ-तंत्र-सलाहकार टीम जिसमें नेता सुब्रह्मनीयम स्वामी थे, उनको भी जाता है. नीतियाँ एक अति असरकारक परिबल है और प्रक्रियायें भी एक और परिबल है. प्रक्रियाको सुधारने की महद्‍ जिम्मेवारी वित्त मंत्रीकी होती है. मनमोहनके वित्तमंत्रीकालके जमानेमें “शरद महेता”वाला कौभान्ड हुआ. क्यों कि मन मोहन सिंहने बेंको कि कागजी लेनदेनकी गलतीयों पर ध्यान नहीं दिया था. फिर उन्होंने आश्वासन दिया कि “अबसे (भविष्यमें) ऐसा नही होगा.” यदि मनमोहन सिंह चालाक होते तो, उनको जो प्रधानमंत्री का प्रमोशन मिला, तब जो सत्यम्‍ स्कॅम हुआ वह न होता.

“नहेरुवीयन प्रणाली”

नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षकी सियासतमें गलतीयोंको दुसरोंके नाम पर चढा देना और उपलब्धीयोंको नहेरुवंशके फरजंद पर चढा देना आम बात है. जैसे कि चीनके साथके युद्धमें भारतकी हारका कुंभ सिर्फ वि.के. मेनन पर फोड देना, और पाकिस्तान के उपर भारतकी १९७१की विजयका श्रेय तत्कालिन सुरक्षा मंत्री जगजिवन रामको न देना और सिर्फ इन्दिरा गांधीको दे देना, ये सब नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षका संस्कार है.

नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षकी ऐसी प्रणालीयोंपर तालियाँ पाडने वाले मूर्धन्य भारतमें पहेले भी विद्यमान थे और आज भी विद्यमान है.

अब गठबंधन वाली सरकारोंकी उपलब्धीयां पुरस्कृत करने के लिये हमारे कटारीया भाई, भारतवर्षकी प्रथम संयुक्त “राष्ट्रीय सरकार” १९४७-५२का उल्लेख करते हैं.

याद करो मूल कोंग्रेसी सदस्यका संस्कार

कोंग्रेसके शिर्ष और सर्वोच्च नेता यानी कि “नहेरु”की प्रच्छन्न मानसिकताको छोड दें, और कोंग्रेसके तत्कालिन सामान्य सदस्यकी बात करें तो मुज़े निम्न लिखित प्रसंग याद आता है.

१९४२में महात्मा गांधीने “भारत छोडो” आंदोलन छेडा था और जनताको कहा था कि हर व्यक्ति स्वयंका नेता है. आप कानून भंग करोगे. खूल्लेआम कानून भंग करोगे और यदि आप गिरफ्तार हुए तो आपको सहर्ष गिरफ्तारी स्विकारोगे और कारावासका भी स्विकार करोगे.

एक महिला थी. उसने अपने महिला साथीयोंके साथ प्रदर्शन किया. उस महिलाको पूलीसने गिरफ्तार किया. उस महिलाने कुछ गहने पहने थे. उसने पास खडे एक कोंग्रेसीको अपने गहने दे दिया और कहा कि मेरे घरका पता यह है, आप इन गहेनोंको मेरे घर पर पहूँचा देना, और कह देना कि मैं कारावास जा रही हूँ. उस कोंग्रेसीने कहा कि “बहनजी आप तो मुज़े पहेचानते तक नहीं है. आपने मुज़पर विश्वास कैसे कर दिया कि मैं इन गहनोंको आपके घर तक पहूँचा दूंगा?”

उस महिलाने उत्तर दिया कि आप कोंग्रेसी है इस बात ही मेरे लिये पर्याप्त है कि आप विश्वसनीय और नीतिमान है.”

आज क्या ऐसी स्थिति है कि “विश्वसनीयताके लिये कोंग्रेसी होना पर्याप्त है?”

नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके ६५ सालके शासनके बाद नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके नेतागण, अपनी विश्वसनीयताका, जनतामें कायम रख सके हैं क्या?

नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके आम सदस्यकी बात छोडो, नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके शिर्षनेता भी विश्वसनीय नहीं रहे है. इसका क्या हमारे कटारीयाजीको मिसाल देना पडेगा?

नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके सर्वोच्च नेतागण स्वयं “बेल (जमानत)” पर है. स्वयंके लिये जमानत लेना, यह बात ही मूल कोंग्रेसके मूलभूत सिद्धांतोसे विपरित है. किस मूँह से कोई नीतिमत्ताके इस विनिपातसे पराङगमुख बन सकता है. और वह भी एक मूर्धन्य राजकीय विश्लेषक श्रीमान शेखर गुप्ताजी.

“राष्ट्रीय सरकार” कोई चूनावी गठबंधन था ही नही.

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राष्ट्रीय सरकार के समय पर बना गठबंधन कोई गठबंधन नहीं था. वह कोई सत्ता पाने के लिये या तो किसी अन्य गठबंधनके विरुद्धवाला गठबंधन नहीं था. महात्मा गांधी चाहते थे कि भारतका तत्कालिन शासन और संविधान सभीको साथ लेके चले.

राष्ट्रीय सरकारको गठबंधनवाली सरकार का नाम देना “तर्कहीन” ही नहीं किन्तु “हास्यास्पद” भी है. यदि कोई विद्वान ऐसी तुलना और विश्लेषण करे तो उसकी निष्पक्षता पर कई प्रश्न चिन्ह उठते हैं. जो गठबंधन ही नहीं था उसको गठबंधन बताके उनकी उपलब्धीयोंको “सियासती गठबंधन भी ऐसी उपलब्धीयोंके लिये सक्षम है” ऐसा बताना, यह बात तो जनताको गुमराह करनेके बराबर है.  

वैसे तो हर गठबंधन यदि वह सियासती गठबंधन है तो वह एक पूर्ण बहुमत वाले पक्षकी सरकारसे श्रेय नही हो सकता, चाहे उसका आधार सियासती हो या न हो.

सियासती “अस्थिरता” नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षकी देन है. १९६९ और १९७९की अस्थिर सरकारोमें नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षका बडा योगदान था. इनका जिक्र हमारे कटारीया भाईने नहीं किया है.

१९६७ तक नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षकी आंतरिक संगठन शक्ति कायम थी. नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षकी शिर्ष नेता इन्दिरा गांधीने इस आंतरिक संगठनका विभाजन किया. १९७१की इन्दिरा-विजय नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षकी संगठन शक्ति पर आधारित नहीं था. वह विजय इन्दिरा-वेव्ज़ के कारण था. नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षका संगठन तो निर्बल ही बन गया था. १९८४की नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षकी विजय भी “सहानुभूति-वेव्‍ज़के” कारण था. और इसके बाद तो बहुपक्षीय-संगठनवाला अस्थिरताका युग शुरु हुआ इस बातको तो कटारीयाजी स्वयं कबुल करते है.

वी.पी. सिंघवाले बहुपक्षीय-संगठन सरकारकी उपलब्धीयां थी ऐसा कटारीयाजी प्रदर्शित करते है. वास्तवमें मोरारजी देसाईकी सरकारकी उपलब्धीयां कई गुना अधिक थी. इस बातको यदि हम छोड भी दें तो वीपी सिंघ स्वयं नरेन्द्र मोदीकी तरह नीतिमत्तामें मानते थे. तो भी, उनके उपर भी नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्षके नेताओंने कीचड उछाला था. जैसे कि वीपी सिंघका विदेशमें (सेन्टकीट्समें) एकाउन्ट था.

जब भी नीतिमत्ता की बात आती है तब बहु पक्षीय गठबंधन कमज़ोर पड जाता है.

इसका कारण यह है कि वंशवादी पक्षका आधार एक वंशवादी नेता होता है. उस पक्षके सदस्य, सियासतमें सिर्फ और सिर्फ पैसे बनानेके लिये आते है. इन सदस्योंको सर्वोच्च पद प्राप्त करनेकी ख्वाहिश होती ही नहीं है. क्या वाड्राको प्रधान मंत्री बननेकी ख्वाहिश है? क्या पप्पु यादवको मुख्य मंत्री बनना है? क्या अभीषेक मनु सिंघ्वी या रणदीप सुरजेवालाको प्रधान मंत्री बनना है? नहीं भाई हमें सर्वोच्च पद नहीं चाहिये. हमें हो सके तो मंत्री बना दो और यदि मंत्री भी न बना सको तो सिर्फ हमे हमारा असामाजिक यानी कि गैरकानूनी काम करने दो और कायदा हमे स्पर्ष न करे उसका आप ध्यान रक्खो. हमें सिर्फ यही चाहिये.

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अल्पमत सरकार आवकार्य नहीं है

नरसिंह राव की सरकार अल्प मत सरकार थी. और उसने ५ साल शासन किया. एक दो अल्पमत सरकारका उदाहरण लेके हम ऐसा वैश्विक धारणा/निष्कर्ष बनाके भविष्यवाणी नहीं कर सकते कि अल्पमत सरकार हर हालतमें आवकार्य है.  जब पक्षीय संगठनका मूलभूत प्रयोजन सामनेवाले को हराना हो और पैसा बनानेके लिये सत्ता प्राप्त करना हो,  तो आपको आठ सालमें तीन चूनाव के लिये तयार रहेना पडता है.

विवादास्पद उपलब्धीयां

कटारीया भाई ऐसा दिखाते है, कि चाहे कुछ भी हो १९९७में पी. चिदम्बरमने राष्ट्रीय विनिवेश पंचकी रचना की और पब्लिक उपक्रमोंका लीस्टींग और प्राईवेटाईझेशनका दरवाज़ा खोला.

कटारीयाजी प्रदर्शित करते है कि भाई हम तो तटस्थ है. मोदीकी विरुद्धमें है. उसका मतलब यह नहीं कि हम बाजपाईजीके भी विरोधी है. बाजपाईजीमें तो दम था. (मतलब? नरेन्द्र मोदीमें वह दम नहीं), क्योंकि बाजपाईने चतुर्भूज हाई वे योजना बनाई. दो बडे एरपोर्टका प्राईवेटाईझेशन किया. ११ पब्लिक सेक्टरकी कंपनीयां जो प्रोफिट करती थी और २४ आई.टी.डी.सी. हॉटेल्स बेच दी. और सर्वशक्तिमान नरेन्द्र मोदी एक भी कंपनी बेच नहीं पाये. कटारीया साहबका संदेश यह है कि पब्लिक सेक्टरकी कंपनीयां बेचना सरकार शक्तिमान होनेका गुण है. “साध्यम इति सिद्धम्‌.”

अरे भाई साहब, खोटमें चलनेवाली सरकारकी कंपनीयोंको नफा करनेवाली बनाना ही सरकारी शक्तिका गुण है जो नरेन्द्र मोदीने गुजरातमें करके दिखाया है. हर गांवमें हर खेतमें बीजली पहूँचाना और वह भी २४/७ घंटे, यह भी तो उपलब्धी है नरेन्द्र मोदीजीकी. हर घरमें गेस पहूँचाना यह भी तो एक महान उपलब्धी है.

भारतीय रीज़र्व्ड सोनेको देशके बाहर ले जानेकी हिमत दिखाना और वह भी भूगतानके लिये, इस घटनाको कटारीयाजी, अपना दिमाग तोड परिश्रमसे, तत्‌कालिन प्रधान मंत्री चन्द्रशेखरकी   उपलब्धीमें गीनती करवाते हैं. लेकिन ऐसी स्थिति किसने उत्पन्न की थी और इसके लिये कौनसी सरकार जीम्मेवार थी उस विषय पर हमारे कटारीया भाई मौन है.

कटारीयाजी मानते है कि राष्ट्रीय सुरक्षा सिर्फ १९८९-९०में कमजोर थी. शायद कटारीयाजी १९८९से लेकर २०१४ तक कश्मिरमें हिन्दुओंकी कत्लेआम और आतंकवादीयोंका और नक्षलीयोंका देशके महानगरोंमें घुस कर और देशके भीतरी इलाकोंमें दूर दूर तक घूस घूस कर अपनी बोम्बब्लास्ट वाली प्रवृत्तियां विस्तारना, इन सब बातोंको राष्ट्रीय सुरक्षासे जोडनेमें नहीं मानते है. नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्ष,  राफेल का डील नहीं कर पाना उसका कारण ही तो २०१२में पैसा न होना ऐसा एन्टोनी खूद संसदमें बताते है. इस परिस्थितिको यदि दिवालियापन नहीं कहोगे तो क्या कहोगे?  

कटारीयाजी क्या समज़ते है?

कटारीयाजी समज़ते है कि, १९८९-९०की अराजकता और शासकीय निस्फलता पर जोर देना नहीं चाहते. क्यों कि यह बात, कटारीयाजीके एजन्डाके विरुद्ध है.  कटारीयाजी “आतंकवाद” शब्द का उपयोग करना ही नही चाहते है. वे यह कहेते है कि १९९१-१९९६ तक कश्मिर  सबसे बुरी स्थितिमें था. लेकिन परिस्थिति काबुमें थी.

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कमालकी बात है. यदि परिस्थिति काबुमें थी तो ५०००००+ हिन्दुओंको पुनर्थापित क्यों नहीं किया?

यदि परिस्थिति काबुमें थी तो कितनोकों गिरफ्तार कीया? परिस्थिति काबुमें थी तो  कितने केस कोर्टमें दर्ज किये? परिस्थिति काबुमें थी तो किन किन मंत्रीयोंको जिम्मेवार बनाया और उनके उपर कितने केस दाखिल किया? परिथिति काबु में थी तो कोई एस.आई.टी.का गठन किया या नहीं?

कटारीयाजी इन सब कमजोरीयोंको और निस्फलताओंको, नजर अंदाज करवाने लिए, इन सब विषयोंको कश्मिर और केन्द्रस्थ शासकोंकी क्रीमीनल निस्फलतासे नहीं जोडते है.

यह बात समज़नी चाहिये कि खालिस्तानवादीयोंका आतंकवाद खतम करनेका श्रेय सिर्फ केपीएसगील को जाता है (शायद अजित डोभाल भी सामिल हो), और खालिस्तानी नेताओंको बडाभाई बनानेका श्रेय इन्दिरा गांधीको जाता है. लेकिन कटारीया भाई, नहेरुवंशवादको शायद जनतंत्रके लिये घातक नहीं मानते. वे इस बातको समज़नेके लिये तयार नहीं कि, यदि जे.एल. नहेरु अपने कार्यकालमें, अपने फरजंद, इन्दिरा गांधीको, अपना अनुगामी प्रधानमंत्री बनानेका प्रबंध करके नहीं जाते, तो आज कोंग्रेस पर “नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्ष” होने की गाली नहीं लगती, नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्ष भ्रष्टाचारसे तरबर न होती, और वह कमजोर भी न पड जाती.

कटारीयाजी कुछ विवादास्पद विषयो पर, अपने हिसाबसे तत्कालिन सरकारोंके निर्णयोंको अच्छा निर्णय, बुरा निर्णय, या कमजोरीवाला निर्णय ऐसा तारतम्य निकालते है. और उपसंहार में कहेते हैं कि सुरक्षित बहुमतवाली सरकार नेताओंको बेदरकार और दंभी बनाती है.

इस तारतम्यमें कटारीयाजी, जे.एल. नहेरुका, समावेश करते नहीं है लेकिन इन्दिरा से लेकर, राजिव गांधी होकर,  नरेन्द्र मोदीका समावेश अवश्य करते है.

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नरेन्द्र मोदी समय बद्धता में मानते है

वास्तवमें देखें तो, नरेन्द्र मोदीके वचन, नहेरु के वचन जैसे “अनिश्चित कालिन नहीं है”. याद करो कि जय प्रकाश नारायण, नहेरुकी असमयबद्ध ध्येयोंके कारण ही उनके मंत्री मंडलसे दूर रहे थे. जय प्रकाश नारायणने नहेरुको कहा था कि “आप हरेक ध्येय प्राप्तिके लिये समय बद्ध योजना बनाओ तो मैं आपके मंत्री मंडलमें आउंगा.” लेकिन जे एल नहेरु तो बेदरकार और दंभी थे. उन्होने जयप्रकाशकी बात मानी नहीं. नहेरु समय बद्धतामें नहीं मानते थे. “ तत्वज्ञानीय लुज़ टॉकींग” नहेरुको प्रिय था.

“समय बद्ध ध्येय” नरेन्द्र मोदीका गुण

यदि आज जय प्रकाश नारायण होते तो वे नरेन्द्र मोदीको सहकार करते. नरेन्द्र मोदीजी हमेशा समय बद्धतासे ही चलते है और उन्होने पक्षके ध्येयोंको समयबद्ध प्रोग्राममें रक्खा है. लेकिन कटारीया भाई इनका जिक्र नहीं करेंगे. उनको पसंद है “नहेरुकी देशमें बहेनेवाली घी दूधकी नदिया” और इन्दिराके “गरीबी हटाओके नारे”

उनको ०२-१०-२०१९ तक स्वच्छभारत, २०२२ तक किसानकी आय दुगुनी, २०१९ तक घर घर संडास, २०२२ तक हरेकके पास अपना घर, २०२२ तक बुलेट ट्रेन …. आदि समय बद्ध ध्येय पसंद नहीं इसलिये उनका जिक्र नहीं.   

एक दुसरे विद्वान है जो अरुण शौरी है. वे भी नरेन्द्र मोदीके कटु टीकाकार है.

कुछ लोग जीएसटी और विमुद्रीकरण की कटु टिका करते है लेकिन एक भी माईकापूत नहीं निकला कि उसने बताया हो कि जो काला धन देशमें घुम रहा है उसको सरकारी रेकोर्ड पर कैसे लाया जाय, बेनामी कंपनीयोंको रेकोर्ड पर लाके कैसे कार्यवाही की जाय, फर्जी करन्सीको कैसे निरस्त्र किया जाय, आयकर रीटर्न भरने वालोंकी सख्यां कैसे बढाई जाय, टेक्स कलेक्शनमें कैसे वृद्धि की जाय….?

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नरेन्द्र मोदीने तो यह सब करके दिखाया है जो नहेरुवीयन-[इन्दिरा (वंश)] कोंग्रेस पक्ष ६५ सालमें नहीं कर सका.

शिरीष मोहनलाल दवे

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तितलीयां कौन उडाते है?

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समाचार माध्यमोंके लिये अभी कई सारे ट्रोल विद्यमान (जिन्दा) है. खास करके बीजेपी-नरेन्द्र मोदी विरोधीयोंके लिये कई ट्रोल विद्यमान है. ट्रोलसे प्रयोजन है. समग्रतया दृष्टिसे देखा जाय तो कोई एक, जो वास्तवमें छोटा है, तथापि उसको बडा कर दो. और उसकी लगातार चर्चा किया करो. वह ट्रोल बन जाता है. ऐसी भी कई घटना घटती है जो वास्तवमें अधिक प्रभावशाली होती है किन्तु वह यदि हमारे निश्चित एजन्डाके लिये उचित नहीं है तो उनको अनदेखा करो.

ट्रोल चलाना नहेरुवीयन कोंग्रेसकी आदत है

ट्रोल चलाना वैसे तो राजकीय पक्षोंकी आदत है. लेकिन नहेरुवीयन कोंग्रेस पक्ष उनमें खास है.  खास करके जब, प्रतिस्पर्धी पार्टीकी बुराई करनी होती है तो ऐसे सुसर्जित ट्रोल मददगार सिद्ध होते है, ऐसा ये लोग मानते है.

जैसे कि अखलाक एक ट्रोल था. नहेरुवीयन कोंग्रेस पक्षके एक सहयोगी शासित राज्यमें “गौ-मांस” संबंधित घटनाको उछाला गया था. कन्हैया एक ट्रोल था जिसने जवाहर नहेरु युनीवर्सीटीमें देश विरोधी नारे लगवाये थे, खालेद एक ट्रोल था, जिसने अपने साथीयोंके साथ कन्हैयाके सहयोगसे उपरोक्त नारे लगाये थे. गुजरातके उना नामके गांवके समिप  “गौ-मांस” संबंधित तथा कथित घटना को लगातार उछाला गया था. वह व्यक्ति दलित था और गांवमें घटी एक घटनाका पीडित था. उसको एक ट्रोल बना दिया था, कश्मिरमें सुरक्षा दलोंने, जीपके हुड पर बंधा हुआ पत्थरबाज व्यक्तिको ट्रोल बनाया गया था, एक लडकी थी, गुर महेर कौर, जिसने कहा “मेरे पिताजी जो सैनिक थे, उनको पाकिस्तानने नहीं मारा था, उनको तो गोलीने मारा था”, गौरी लंकेशको एक ट्रोल बनाया गया था. वह एक पत्रकार थी. और ऐसी हवा फैलायी गयी कि उसको बीजेपीने मारा. वह कर्नाटकमें थी और वहां भी नहेरुवीयन कोंग्रेसका शासन था. यदि नहेरुवीयन कोंग्रेसका शासन है या तो उनके सहयोगी पक्ष/पक्षोंका शासन है तो, बीजेपी या बीजेपीके सहयोगी लोग उस राज्य में हिंसा फैलाते है ऐसी हवा फैलाना.

यदि बीजेपीका शासन है और ऐसे किसीका खून होता है तो ऐसी हवा फैलाना की शासक खुद ऐसी हिंसा फैलाता है. ऐसे सियासती खूनसे तो नहेरुवीयन कोंगी [नहेरुवीयन कोंग्रेस (ईन्दिरा) पक्ष] और उनके सहयोगी साम्यवादीयोंके हाथको खूनी पंजा भी कहा जाता है. केरलमें ऐसे सियासती खूनोंकी गिनती कर लो.

रा.गा. (राहुल गांधी) भी एक ट्रोल है

वैसे तो रा.गा. (राहुल गांधी) भी समाचार माध्यमोंके लिये एक ट्रोल है. लेकिन आज हम ट्रोलकी बातें नहीं करेंगे. आज हम तितलीयोंकी बाते करेंगे.

“तितलीयां उडाना” शायद हिन्दी भाषामें मूँहावरा नहीं है. अंग्रेजीमें “बटरफ्लाई” एक ऐसा शब्द प्रयोग है. यदि आपके पास किसीके निर्णयको क्षतिपूर्ण सिद्ध करना है, किन्तु आपके पास कोई तर्क नहीं है और फिर भी आपको उसकी मजाक करना है तो आप बटरफ्लाय जैसे सुशोभित शब्दोंका उपयोग करके लोगोंका ध्यान आकर्षित कर सकते हैं.

बटरफ्लाय मतलब तितली. तितली कैसी होती है?

तितली रंगबेरंगी होती है. फुलोंकी पत्तीयां जैसे उनके पंख होते हैं. या उससे भी अधिक सुंदर होते हैं. पंख ही उनकी पहेचान है. वास्तवमें तितलीयोंकी प्रजातियां कमजोर होती है. किन्तु कमज़ोर होना मुख्य बात नहीं है. उनकी सुंदरता ही आकर्षण है. लोग उनसे ईसी कारणसे प्रसन्न होते हैं. यदि हमारी बातसे लोग प्रसन्न है होते हैं तो वे शायद ज्यादा सोचेंगे नहीं और हमारी बातोंको स्विकृति दे देंगे.

यदि आपके पास तर्क नहीं है, फिर भी आप किसी नापसंद व्यक्तिकी बुराई करना चाहते हो, और उसको मजाकका पात्र बनाना चाहते हो, या तो उसने जो निर्णय लिये है उन निर्णयोंकी मजाक उडाना चाहते हो, तो आप तितलीयाँ जैसे खूबसुरत शब्दोंका चयन करें, और उनका प्रयोग करें. शब्दोंके प्रासमें सौंदर्य होता है. वैसे तो तितली-प्रयोगके पीछे एक विचार या तर्क भी होना चाहिये. लेकिन तर्क होना अनिवार्य नहीं है.

तितलीयां ही सिर्फ नहीं उडायी जाती, किटककी प्रजातिके ही अन्य इन्सेक्ट जैसे कोकरॉच, फुद्दा, मक्खीयां भी उडायी जा सकती हैं. मक्खीयोंका ज्यादा प्रचलन नहीं है, लेकिन जो लोग मक्खीयां मारते है वे तितलीयां और फुद्दे (फुद्दा एक ऐसा किटक प्रजातिका जीव है जो आकर्षक नहीं होता किन्तु आपको हानिकारक होनेकी भ्रमणा दे सकता है) भी उडाते है.  

मान लिजीये आपको नरेन्द्र मोदी पसंद नहीं है.

आप क्यों नरेन्द्र मोदीको पसंद नहीं करते हैं उसके अनेकानेक कारण हो सकते हैं.

तितलीयां या और फुद्दे कब उडाये जाते हैं?

यदि आप नरेन्द्र मोदीको आपका प्रतिस्पर्धी मानते हो. तो आपको नरेन्द्र मोदी पसंद नहीं पड सकता है. क्यों कि आगे बढनेकी स्पर्धामें उसने आपको पीछे छोड दिया, या तो आपसे वह आगे निकल गया, या तो नरेन्द्र मोदीकी बातें आपको आपके डी.एन.ए. के कारण या तो कोई अन्य कारणसे स्विकार्य नहीं है तो आप तितलीयोंका सहारा ले सकते है.

तितलीयां उडाने वाले अपने पक्षके बाहर होते है ऐसा आवश्यक नहीं है.

बीजेपीकी केन्द्रीय कारोबारीने २०१४के लोकसभा चूनावके लिये, अडवाणीना पत्ता काट दिया तो अडवाणीने भी कई तितलियां उडाई थी कि “नंबर – १ चूनावप्रचारक धीर गंभीर होना चाहिये.”

अभी थोडे समय पूर्व ही भूतपूर्व मंत्री यशवंत सिंहाने कुछ तितलीयां उडायी थीं.

“पहेले इन्डिया को बनाओ, फिर इन्डियामे बनानेकी बात करो” (फर्स्ट मेक इन्डिया धेन टॉक ओफ मेक ईन इण्डिया)

भारतीय अर्थतंत्र घुमरी खाके गीर रहा है.

इसका अर्थ समज़ना जरुरी है. यदि आप गुरुत्वाकर्षणके सिद्धांतको जानते है तो गुरुत्वके क्षेत्रमें पदार्थ प्रवेगित गतिसे गीरता है. लेकिन यदि वह पदार्थ गतिमान है तो चक्राकार गोलगोल घुमता हुआ गिरता है. क्यों कि गुरुत्वके क्षेत्रमें अवकाश वक्रीभूत होता है. हमारा अर्थ तंत्र भी गोलगोल घुमता हूआ हर क्षण गीरनेके बढते हुए वेगसे गिर रहा है.

“जीडीपी में जो वृद्धि देखाई जाती है वह तो नयी फोर्म्युलाके मापदंड पर आधारित है. पहेलेकी फोर्म्युलाके मापदंडसे तो वह दो अंक और कम है. इसके लिये विमूद्रीकरण और जीएसटी कारणभूत है.” वैसे तो यशवंत सिंहाने कश्मिर पोलीसी, गौ हत्या बंधीके बारेमें “कुछ लोगोंका प्रशासनके नियमोंको अपने हाथमें लेना” ईन सभी पर अपने विचार प्रकट किये. यशवंत सिंहाने अपने शासनकालमें प्लानींग कमीशनके विरुद्ध और उसकी कमजोरीके बारेमें कठोर अभिप्राय दिया था. लेकिन जब नरेन्द्र मोदीने प्लानींग कमीशनको नष्ट किया तो उन्होनें उतनी ही कठोरतासे नरेन्द्र मोदीके निर्णय पर टीप्पणी की.

वित्तमंत्री अरुण जेटलीने जब यशवंत सिन्हाको अंकोके आधार पर सविस्तर उत्तर दिया तो यशवंत सिंहाने बोला कि “मैं अंकोमें विश्वास नहीं रखता”. एक व्यक्ति अंकोंके आधार पर अन्यकी बुराई करता है वही जब अंकोंके सहारे दिये गये तर्कका हवाई इन्कार करता है, इस व्यक्तिके लक्षणको संस्कृतभाषामें “वदतः व्याघात” कहेते है. इसका हिन्दी अर्थ है “अभी बोले अभी फोक”.

नहेरुवीयन कोंग्रेसके युवराज तो तितलीयां ही उडाते है. क्यों कि वे समज़ते है कि यदि हम चूनाव बार बार हार जावें तोभी चूनाव जितनेका यही तरिका है. “लगे रहो पप्पुभाई” के सिवा इस युवराजको हम क्या कह सकते है?

जी.एस.टी.के बारेमें सरकारकी बुराई करना क्या नहेरुवीयन कोंग्रेसके लिये योग्य है?

जी.एस.टी. किस पक्षके दिमागकी उपज है इस बातको जाने दो. जी.एस.टी.का पूर्वालेख (ड्राफ्ट) और प्रस्ताव नहेरुवीयन कोंग्रेसने भी रक्खा था. वह पूर्वालेख क्षतिपूर्ण था. उसको लागु करनेकी प्रणालीयां भी क्षतिपूर्ण थीं. उतना ही नहीं किन्तु, नहेरुवीयन कोंग्रेसमें उतनी संकलन शक्ति भी नहीं थी कि वह सभी राज्योंकी ईच्छाओंका आकलन कर सके, जी.एस.टी.का कोई अर्थपूर्ण पूर्वालेख में संशोधन कर सके, और उसको कार्यान्वित करनेकी प्रणालीयोंमें संशोधन कर सके. बीजेपीके नेतृत्ववाली सरकारने यह सक्षमता दिखायी है, और उतना ही नहीं उसने, सभी राज्योंके प्रतिनिधियोंसे बनी, एक जी.एस.टी.-परिषद भी बनायी है, जो हर सत्रके अंतमें जी.एस.टी.में आवश्यक संशोधन करती रहती है. बीजेपीकी सरकारका जो जी.एस.टी.का प्रस्ताव था वह नहेरुवीयन कोंग्रेसका प्रतिबिंबित (कार्बन कॉपी) पूर्वालेख नहीं है. जिस जी.एस.टी.के प्रावधानोंको सभी पक्षोंने मान्य रक्खा है उसीका अंध विरोध करना तो कोई नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंसे ही सिखें.

नहेरुवीयन कोंग्रेसकी उडाई हुई तितलीयां कैसी है?

Tods

“जी.एस.टी. तो गब्बर सिंह टेक्स है.” रा.गा. उवाच …

ईस तितली पर क्या हम चर्चा कर सकते हैं? क्या यह कोई तर्क है? यह खचित्‌ वाणी विलास है या तो अधिक कठोर शब्दोंमें कहें, तो वाणी पर दुष्कर्म है.

“जी.एस.टी. और नोट बंदीने सुनामी सर्जी है” रा.गा. उवाच.

लगता है कि रा.गा. को सुनामी शब्द पसंद पड गया है. क्यों कि नकल करना उसकी आदत है. “चाय पे चर्चा” के विरुद्ध उसने “खाट पे चर्चा”का आयोजन किया था. २०१४के संसदके चूनावमें बीजेपीके नेताओंने कहा था कि “मोदीका प्रवाह” नहीं लेकिन “मोदी नामकी सुनामी” है. तो रा.गा.जी को यह सुनामी शब्द पसंद पड गया लगता है. तो उन्होंने बोल दिया कि “जी.एस.टी.” और “नोट बंदी” तो सुनामी है.

फर्जी नोटोंका मुद्रण, उनका भारत-प्रवेश और उनका वितरण पाकिस्तानमेंसे होता था. यह समस्या इतनी व्यापक थी कि, राष्ट्रीय कृत बेंक-संचालित एटीएम यंत्रोंसे भी फर्जी नोटें निकलती थीं, नहेरुवीयन कोंग्रेसने और उनके अमेरिकी ग्रीनकार्ड होल्डर आर.बी.आई. के गवर्नरने कभी न तो इसका उपाय किया, न तो उपाय बताया. क्यों कि, या तो इसका उपाय, उनके दिमागसे परे था, या तो फर्जी नोटोंके कारोबारमें उनका स्वहित निहित था. उनका नोट-बंधीका विरोध तो केवल व्यंढ ही था और है.

“आर.एस.एस. की सभामें लडकियाँ शोर्ट्स क्यों नहीं पहनती?” रा.गा. उवाच …

रा.गा.जी समज़ते हैं कि यदि बीजेपीवाले मुस्लिमोंके बुर्केके विरोधमें है तो हिन्दु लडकियोंके “देशी-ड्रेस”का भी विरोध करना चाहिये. उनका तात्पर्य यह कि कुर्ता पायजामा, चणीया-चोली-ऑढणी, साडीयाँ, सभी देशी ड्रेस व मटीरीयल को अपनाना बुर्केको अपनानाके समकक्ष है. यदि आरएसएसवाले अपने को प्रगतिशील मानते हैं तो उनकी सभामें लडकियोंको शोर्ट्स परिधान करनेकी आदत डालनी चाहिये. तो हे मुसलमान लोग, आप हमें यानी कि नहेरुवीयन कोंग्रेसको समज़ो, कि हम आर.एस.एस. वालोंकी कैसे मजाक उडाते हैं.

“महात्मा गांधी, एन.आर.आई. थे.” रा.गा. उवाच.

आप रा.गा.के कथनोंका कहाँ कहाँ विश्लेषण करते रहोगे. वह वास्तवमें विश्लेषणके योग्य है ही नहीं. जैसे “मौतका सौदागर”जैसी मीथ्या और अपरिपक्व दिमागवाली उसकी मम्मी वैसा ही उसकी संतान (फरजंद).

तो क्या नहेरुवीयन कोंग्रेसमें कोई उत्तर देने योग्य नेता बचा ही नहीं है?   

अभी तक तो दूर दूर क्षितिजमें भी ऐसा नेता दिखाई नहीं देता.

अपने प्रमाणपत्रोंके आधारसे लब्धप्रतिष्ठ स्वपक्ष प्रमाणित मनमोहन सिंहको देख लो. उन्होंने एक नमूनेदार सीयासती नेता जैसा बयान दिया था कि मुस्लिमोंका इस देश पर ज्यादा अधिकार है.

यही कोंग्रेसके एक नेताने पाकिस्तानी टीवी चेनलके वार्तालापके अंतर्गत कहा कि “आपको मोदीको हटाना होगा तभी तो पाकिस्तान और भारतके बीच संबंध सुधर सकते है.” इस उक्तिके अनेक मतलब निकल सकते है.

“कश्मिरके हिन्दुओंकी हकालपट्टीकी घटना आरएसएसके एजन्डाके अनुसार थी.” शशि थरुर उवाच

भारतके मुस्लिमोंकी वोटबेंक बनाये रखने के लिये एक नहेरुवीयन कोंग्रेसीने पाकिस्तानकी टीवी चेनल पर चलते वार्तालापमें अपना सूर पूराया था कि, “कश्मिरके हिन्दुओंकी हकालपट्टीकी घटना आरएसएसके एजन्डाके अनुसार थी.”

अभी आप यह देखिये कि नहेरुवीयन कोंग्रेसके सुज्ञ और वैज्ञानिक (टेक्नीकल सलाहकार) जो स्वयं सफेद टोपी पहन सकते है वे क्या कहेते है.

“जीन्स पहेनके, स्कॉच (व्हीस्की) पीके भी आप गांधी विचारोंको अपना सकते हो.” पित्रोडा उवाच …

हाँ जी यह साम पित्रोडाजीका कथन है. ये पित्रोडाजी नहेरुवीयन कोंग्रेस और समाचार माध्यम द्वारा प्रमाणित दूरसंचार तकनिकीके स्थापक और प्रवर्तक है.

पहेले तो यह बात अवगत होनी चाहिये कि दूरसंचार तकनिकीकी स्थापना ये पित्रोडाजीने नहीं की थी. इसके बीज बोनेकी कल्पना या तो बीजका बोने वाला हेमवतीनंदन बहुगुणा था. १९७२में उन्होंने शरीन कमीटी बिठाई थी और बहुगुणाजीको अनुभूति हुई थी कि “दूर संचार समस्याका समाधान करना ही होगा”. उन्होंनें एड्वान्स लेवल टेलीकोम ट्रेनींग सेंटरका निर्माण करवाया था. किन्तु उनसे गलती यह हो गयी कि स्वयंके कार्योंका श्रेय वे स्वयं हि लेने लगे थे. यह बात इन्दिरा नहेरु-गांधी (इन्दिरा नहेरु-गांधी मतलब इन्दिरा गांधी) स्थापित प्रणालीके विरुद्ध थी.  इन्दिराजी को बहुगुणा पसंद नहीं पडा. और उनको बरखास्त कर दिया था. कालक्रमसे इन्दिरा-कोंग्रेसकी १९७७में पराजय हुई. समाजवादी गांधीवादी नेता श्री ज्योर्ज फर्नान्डीस दूर संचार मंत्री बने थे तो उन्होने “डीजीटल ईलेक्ट्रोनिक दूरसंचार प्रणालीके टेक्नोलोजी ट्रान्स्फरके साथ” वाला वैश्विक निविदा (टेन्डर) फ्लोट करवाया था. उनकी सरकार गिर गयी. इन्दिराकी सरकारने फ्रान्सकी अल्काटेल कंपनीके टेन्डरको मान्य रक्खा. और ओर्डर भी दिये. १९८२-८३में भारतसे चार टीम, इन्स्टोलेशन और मेन्टेनन्सके प्रशिक्षणके लिये फ्रान्स गयी थी. सर्वप्रथम २०००० टेलीफोन लाईनकी क्षमता वाले डीजीटल ईलेक्ट्रोनिक्स टेलीफोन एक्सचेन्जके इन्स्टोलेशनका काम फ्रेन्च टीमने १९८३में ही शुरु कर दिया था. उसके बाद कफपरेड, कुपरेज, अंधेरी, घाटकोपर के डीजीटल ईलेक्ट्रोनिक्स टेलीफोन एक्सचेन्जके इन्स्टोलेशनका काम भारतीय टीमने शुरु कर दिया था. उस समय साम पीत्रोडाजी दूर दूर क्षितिज पर भी दिखाई नहीं देते थे.

इन्दिरा गांधीकी मृत्युके बाद जब राजिव गांधीजीका राज्याभिषेक हुआ तब कुछ समयके बाद  पित्रोडाजी  भारत आये. अलबत्त, वे “सी-डॉट” नामका एक छोटा १२८ से ५१२ लाईनकी क्षमतावाला टेलीफोन एक्सचेन्ज बना रहे थे. ऐसे टेलीफोन एक्सचेन्जका भी भारतके ग्राम्य विस्तारके लिये महत्त्व तो था ही. लेकिन १९८६में परिस्थिति ऐसी थी कि टेलीफोन कनेक्सनकी प्रतिक्षा यादी १० सालकी थी उसको आगामी छह सालमें खतम करना था. यदि नरसिंह राव नामका नोन-नहेरुवंशी प्रधानमंत्री नहीं आता तो पता नहीं नहेरुवीयन कोंग्रेस प्रगतिका अर्थ समज़ती या नहीं. अभी अभी यह प्रश्न तो विद्यमान ही है.

मूल विषय पर आवें तो पित्रोडाजीने गांधीजी को पढा नहीं है. गांधीजीने कहा था कि वे सरमुखत्यार बननेके पक्षमें नहीं है, लेकिन यदि उनको एक “मुद्रा-उछाल”समयके लिये सरमुखत्यार बनना भी पडे, तो वे उस समयमें शराब-बंदी कर दें. १९६०के दशकमें महाराष्ट्रमें नहेरुवीयन कोंग्रेसी मुख्य मंत्रीने शराब बंदीको नरम कर दिया. होटेल रेस्टोराँ वालोंको छूट देदी कि, वे विदेशीको शराब दे शकते है. रेस्टोरां वालेको ग्राहकको पूछनेका था कि आप विदेशी है? ग्राहक बोलेगा “हाँ”. “लो. ले जाओ शराब”. भला,  ग्राहक कभी जूठ बोल सकता है?

यदि आपको शराब घरपे ले जाना है, तो डोक्टरका सर्टीफीकेट चाहिये. फिर आप शराब को घरपे ले जाके पी सकते है. महेफिल भी कर सकते हैं. पैसे फैंको सर्टीफीकेट लेलो … शराब लेलो … गांधीजीका कहेनेका था कि जब शराबकी बात आती है तो मैं उन गरीब कूटुंबोंको देखता हूँ जिनका पूरा घर तूट पडता है. खादी के बारेमें गांधीजीने कहा था कि जब मैं खादीकी बात करता हूँ तो मेरे सामने भारतकी गरीब जनता दिखाई देती है जिनको मैं क्या काम दे सकता हूँ.

“नियम बनाओ. लेकिन वे नियम सिर्फ सुशोभनकारी ही होना चाहिये. उन नियमोंके अमलकी बात मत करो.” ऐसी संस्कृति नहेरुवीयन कोंग्रेसके सत्ताकालमें पैदा हुई है, और उस समयसे ही सर्वव्यापक बनी. लेकिन हमारे पित्रोडाजी गरीब, गांधी, स्कॉच (व्हीस्की) का त्रीवेणी संगम करने की बात कर सकते है, यह नहेरुवीयन कोंग्रेसकी पहेचान है.

समाचार माध्यमवाले क्या तितलीयां उडाते हैं?

trend changed

समाचार माध्यमोंके मालिकोंका तो यह धंधा है. उनसे तो शायद सियासती नेताओंने शिखा होगा. डीबीभाईके (दिव्य भास्कर भाईके) तंत्रीमंडलके सदस्य तो हमेशा यही चिंतामें रहते है कि हस्तस्थ घटनाको कैसे हृदयको अधिकसे अधिक चोट पहूँचावे ईस प्रकार संरचित करें.

डीबीभाईके एक कटारीया भाईने (कोलमीस्ट)ने लिखा की “गुजराती साहित्य परिषद”के प्रमुख पदके चूनावमें लाख प्रयत्न करने पर भी बीजेपी हार गया है. तीन नये युवानेताओंने बीजेपीकी विरुद्ध जो हवा बनायी है उसका प्रभाव हो सकता है.”

तो हमने उनको लिखाकी अब तो गुजरातके चूनावमें नहेरुवीयन कोंग्रेसकी जित सुनिश्चित है. गुजराती साहित्य परिषद साक्षरोंकी परिषद है. और गुजरातमें साक्षरता ८० प्रतिशत है.

वैसे तो यह कटारीयाभाई महात्मा गांधीके नाम या विचारमंचके निकटवर्ती माने जाते है लेकिन उन्होंने उपरोक्त तीन युवा नेताके बारेमें उनकी मांगकी यथार्थता और या योग्यताके बारेमें    

कभी चर्चा करना अनिवार्य नहीं समज़ा. उपरोक्त ये युवानेता कौन है? ये युवा नेता, जातिवादको उकसाके पटेलोंके लिये और क्षत्रियोंके लिये आरक्षणका आंदोलन चला रहे हैं. समाचार माध्यम वाले ऐसे विभाजनवादी नेताओंके आंदोलनोंको फूंक मार मार के प्रज्वलित रक्खा करते है. और समाचार माध्यमके ये कटारीया भाईलोग भारतीय समाजके विभाजनवादी नेताओंको उत्साहित करते है.  गुजरात साहित्य परिषदके प्रमुख पदके चूनावमें बीजेपीकी हारमें इन तीन नेताओंका योगदान रहा है. यदि गांधीजी जिन्दा होते तो वे एतद्‌ कथित अपने मानस पुत्रोंकी मानसिकतासे शायद आत्म हत्या कर लेते.

चूनाव आयुक्तको भी लेखक महाशयने एक “पंच” (गुजराती-काठीयावाडीमें हम पंचको गोदा मारना कहेते हैं) मार दिया है कि, ६५ सालमें प्रथम ऐसी घटना घटी है कि, चूनाव आयुक्तने सरकारकी नीली झंडीकी प्रतिक्षा की. वैसे तो ये महाशय जब नहेरु और इन्दिरा गांधीका शासन था तब उस शासनकालमें पेराम्बुलेटर नहीं चला रहे थे. तो उनको याद होना चाहिये कि उनके जमानेमें तो चूनाव आयुक्तका स्थान चपरासीके बराबर ही था. चूनावके नियमोंको दृढतासे लागुकरनेका काम और चूनाव आयुक्तको नियम बद्ध कठोरतासे कैसे काम करना चाहिये इसका प्रारंभ तो शेषनने ही किया है.

उपरोक्त तीन युवा नेताओंको बीजेपीवाले बरसाती मेंढक मानते है.

“बरसाती मेंढक” या तो कोई “घटना” है, या कोई नेता बरसाती मेंढक बनके सामने आ जाता है, या तो समाचार माध्यम बरसाती मेंढककी खोज में रहेता है.

जबसे इन्दिरा गांधीने चूनावकी शीड्युलको छीन्नभीन्न कर दिया तबसे कोईन कोई राज्यमें बरसात होती ही है. और चूँकि, देश प्रजातंत्र है, पूरे देशमें बरसाती ऋतु है ऐसा लगता है.

विकासनो वरख 

प्रगतिकी पन्नी (गुजरातीमें इन्होंनें “तितली शब्द प्रयोग”के लिये  “विकासनो वरख” कहा है) यह तितली भी उडती है.

“विकास पागल हुआ है” इस तितलीमें अब दम नहीं रहा. क्यों कि बीजेपीने उत्तर दिया कि पागलका विकास तो देशने उनके कौभाण्डोसे देख ही लिया है. जैसे कि कोमनवेल्थ गेम स्केम, २-जी स्केम, कोलगेट स्केम, नहेरुवीयनोंके अनेकानेक स्केम जिसमें नहेरुवीयन्स स्वयं जमानत पर है.

याद करो महात्मा गांधी कई बार जेल गये लेकिन कभी उन्होने जमानत नहीं ली. ये नहेरुवीयन लोग, गांधीजीको अपनी धरोहर मानते है और जमानत पर भी जाते है.  

वैसे तो डीबीभाईके सभी कटारीया लेखकगण ऐसे नहीं है. लेकिन ज्यादातर ऐसे ही है. क्यों कि यदि युद्धमें अन्य पक्ष बराबरीके स्थान पर न हो तो वह युध्धमें मज़ा कहाँ.

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्ज़ः

चमत्कृतिः

राहुल को पूछे गये प्रश्नोंका राहुल जवाब नहीं देता है. उसका चमच भनीस तीहारी या द्ग्गीदीन या सींघवी देता है.

(१) टमाटर फल है या सब्जी ?

(2) गुलाबजामुन में गुलाब के महत्व का वर्णन कीजिये |
(3)
अनु मालिक और हिमेश रेशमिया , दोनों में से कौनबेहतरीन गायक हैं ?
(4)
जस्टिन बाईबर क्या हैंमर्द, औरत या गे ?
(5)
दिग्विजय सिंह एक इंसानहैं , उदाहरण सहित साबित करे |
(6)
पहले मुर्गी आई या अंडा ?
(7)
काटजू साहब के हिसाब से 90% लोग मुर्खहैं , तो बाकी 10% कौन हैंबुद्धिमान या महामूर्ख ?
(8) Tsunami
और psychology में “T” और “P” साइलेंट क्या होता हैं और जब इन्हें बोलना ही नहीं तो फिर लिखते क्यों हैं ?
(9)
राहुल राय और राहुल महाजन , दोनों में से कौन ज्यादा टैलेंटेडहैं और क्यों ?
(10)
राहुल गाँधी खुद की पांच विशेषता बतलातेहुए खुद को युवा साबित करे |

 

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