Feeds:
Posts
Comments

Posts Tagged ‘दंगा’

पी.के. ने पीके किया नशा? कथांक – १

कूर्म पुराण और महाभारतमें एक सुसंस्कृत श्लोक है.

(१) आत्मनः प्रतिकुलानी परेषां न समाचरेत.
इसका अर्थ है;

जो वस्तु, स्वयंके लिये (आप) प्रतिकुल (मानते) है, (उसको आप) दुसरोंके उपर मत (लागु) करो.
इसका अर्थ यह भी है, कि जो आचार आप स्वयंके हितमें नही मानते चाहे कोइ भी कारण हो, तो वह आचार आप अन्यको अपनाने के लिये नही कह सकते.
इसका निष्कर्सका गर्भित अर्थ भी है. यदि आपको अन्य या अन्योंको आचारके लिये कहेना है तो सर्व प्रथम आप स्वयं उसका पालन करो और योग्यता प्राप्त करो.

क्या पी.के. में यह योग्यता है?

पी.के.की योग्यता हम बादमें करेंगे.
सर्व प्रथम हम इस वार्तासे अवगत हो जाय कि, फिलममें क्या क्या उपदेश है. किस प्रकारसे उपदेश दिया है और सामाजिक परिस्थिति क्या है.

संस्कृतमें नीतिशतकमें एक बोध है.
(२) सत्यं ब्रुयात्, प्रियं ब्रुयात्, न ब्रुयात् सत्यं अप्रियं.
सच बोलना चाहिये, किन्तु सत्य ऐसे बोलना चाहिये वह प्रिय लगे. अप्रिय लगे ऐसे सत्य नहीं बोलना चाहिये.
यदि आप स्वयंको उपदेश देनेके लिये योग्य समझते है तो आपके पास उपदेश देनेकी कला होनी आवश्यक है. क्या यह कला पी.के. के पास थी?

पी. के. की ईश निंदा

abhiSheka

(३) पूर्व पक्षका ज्ञानः
यदि एक विषय, आपने चर्चाके लिये उपयुक्त समझा, तो स्वयंको ज्ञात होना चाहिये कि चर्चा में दो पक्ष होते है.
एक पूर्व पक्ष होता है. दुसरा प्रतिपक्ष होता है.
पूर्वपक्ष का अगर आप खंडन करना चाहते है और उसके विरोधमें आप अपना प्रतिपक्ष रखना चाहते है, तो आपको क्या करना चाहिये?
पूर्वपक्ष पहेलेसे चला आता है इसलिये उसको पूर्वपक्ष समझा जाता है. और उसके विरुद्ध आपको अपना पक्ष को रखना है. तो आपका यह स्वयंका पक्ष प्रतिपक्ष है.
अगर आप बौद्धिक चर्चा करना चाहते है तो आपको पूर्वपक्षका संपूर्ण ज्ञान होना चाहिये तभी आप तर्क युक्त चर्चा करनेके लिये योग्य माने जायेंगे. अगर आपमें यह योग्यता नहीं है तो आप असंस्कृत और दुराचारी माने जायेंगे.
असंस्कृति और दुराचार समाजके स्वास्थ्य के लिये त्याज्य है.

(४) चर्चा का ध्येय और चर्चा के विषय का चयनः
सामान्यतः चर्चाका ध्येय, समाजको स्वस्थ और स्वास्थ्यपूर्ण रखनेका होता है. किसको आप स्वस्थ समाज कहेंगें? जिस समाजमें संघर्ष, असंवाद और विसंवाद न हो तदुपरांत संवादमें ज्ञान वृद्धि और आनंद हो उसको स्वस्थ समाज माना जायेगा. यदि समाजमें संघर्ष, वितंडावाद, अज्ञान और आनंद न हो तो वह समाज स्वस्थ समाज माना नहीं जायेगा.
आनंदमें यदि असमानता है तो वह वैयक्तिक और जुथ में संघर्षको जन्म देती है. उसका निवारण ज्ञान प्राप्ति है.
ज्ञान प्राप्ति संवादसे होती है.
संवाद भाषासे होता है.
किन्तु यदि भाषा में संवादके बदले विसंवाद हो तो ज्ञान प्राप्ति नहीं होती है.
ज्ञान प्राप्तिमें संवाद होना आवश्यक है. संवाद विचारोंका आदान-प्रदान है. और आदान प्रदान एक कक्षा पर आने से हो सकता है. विचारोंके आदान प्रदान के लिये उसके नियम होने चाहिये. इन नियम को तर्क कहेते है. कोई भी संवाद तर्कयुक्त तभी हो सकता है जब पूर्वपक्षका ज्ञान हो.

पी. के. स्वयंमें क्या योग्यता है?
स्वयंमें विषयके चयन की योग्यता है?
स्वयंमें विषय की चर्चा करनेकी योग्यता है? स्वयं को स्वयंके पक्षका ज्ञान है?
स्वयंमें पूर्वपक्षका ज्ञान है?
स्वयंके विचारोंका प्रदान तर्कपूर्ण है?

पी. के. अन्यको जो बोध देना चाहता है उस बोधका वह क्या स्वयं पालन करता है?
अंधश्रद्धा निर्मूलन यदि किसीका ध्येय है तो प्रथम समझना आवश्यक है कि अंधश्रद्धा क्या है.
अंधश्रद्धा क्या है?
अंध श्रद्धा यह है कि, कोई एक प्रणाली, जो परापूर्वसे चली आती है या कोई प्रणाली अचारमें लायी गई हो और उस प्रणालीकी उपयोगिता सही न हो और तर्कशुद्ध न हो.
क्या प्रणालीयां और उसकी तर्कशुद्धता की अनिवार्यता सिर्फ धर्म को ही लागु करने की होती है?
क्या अंधश्रद्धा धर्मसे ही संबंधित है?
क्या अंधश्रद्धा समाजके अन्य क्षेत्रों पर लागु नहीं होती है?
अंधश्रद्धा हर क्षेत्रमें अत्र तत्र सर्वत्र होती है.
अंद्धश्रद्धा समाजके प्रत्येक क्षेत्रमें होती है.
अगर अंधश्रद्धा हरेक क्षेत्रमें होती है तो प्राथमिकता कहा होनी चाहिये?

जो प्रणालीयां समाजको अधिकतम क्षति पहोंचाती हो वहां पर उस प्राणालीयों पर हमारा लक्ष्य होना होना चाहिये. इसलिये चयन उनका होना चाहिये.

पी. के. ने कौनसी प्रणालीयों को पकडा?
पी. के. ने धार्मिक प्रणालीयोंको पकडा.
पी. के. ने धार्मिक प्रणालीयोंको क्यूं पकडा?
पी. के. समझता है कि वह सभी धर्मोंकी, धार्मिक प्रणालीयोंके विषयोंके बारेमें निष्णात है. हां जी, अगर उपदेशक निष्णात नहीं होगा तो वह योग्य कैसे माना जायेगा?

पी. के. समझता है कि वह भारतीय समाजमें रहेता है, इसलिये वह भारतमें प्रचलित धार्मिक, क्षतिपूर्ण और नुकशानकारक प्रणालीयोंकी अंद्धश्रद्धा (तर्कहीनता) पर आक्रमण करेगा.
अगर ऐसा है तो वह किस धर्मकी अंधश्रद्धाको प्राथमिकता देगा?
वही धर्म को प्राथमिकता देगा जिसने समाजको ज्यादा नुकशान किया है और करता है.

कौनसे कौनसे धर्म है? ख्रीस्ती, इस्लाम और हिन्दु.

हे पी. के. !! आपका कौनसा धर्म है?
मेरा धर्म इस्लाम है.
आपके धर्ममें कौनसी अंधश्रद्धा है जिसको आप सामाजिक बुराईयोंके संदर्भ, प्रमाणभानके आधार पर प्राथमिकता देंगे?
पी. के. समझता है कि मुस्लिमोंकी अंधश्रद्धा वह शराब बंधी है, और वह भी प्रार्थना स्थलपर शराब बंधी है.
अब देखो पी. के. क्या करता है? वह मस्जिदके अंदर तो शराब ले नहीं जाता है. इस्लामके अनुसार शराब पीना मना है. लेकिन उसकी सजा खुदा देगा. शराबसे नुकशान होता है. अपने कुटूंबीजनोंको भी नुकशान होता है. शराब पीनेवालेको तो आनंद मिलता है. लेकिन पीने वालेके आनंदसे जो धनकी कमी होती है उससे उसके कुटुंबीजनोंको पोषणयुक्त आहार नहीं मिलता और जिंदगीकी सुचारु सुवाधाओंमें कमी होती है या/और अभाव रहेता है. शराब कोई आवश्यक चिज नहीं है. शराबके सेवनके आनंदसे शराबको पीनेवालेको तो नुकशान होता ही है. शराब पीना इस्लाम धर्मने मना है. किन्तु क्या इस्लामकी प्राथमिकता शराबबंधी है?

इस्लाममें क्या कहा है? इस्लामने तो यह ही कहा है कि, इस्लामके उसुलोंका प्रचार करो और जिनको मुसलमान बनना है उन सबको मुसलमान बनाओ. जब तक अन्य धर्मी तुमको अपने घरमेंसे निकाल न दें उसका कत्ल मत करो. उसका अदब करो.
क्या मुसलमानोंने यह प्रणाली निभाई है?
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. इसका अर्थ यह है कि भारतमें सब लोगोंको अपना अपना धर्म और प्रणालीया मनानेकी स्वतंत्रता है. इस स्वतंत्रताका आनंद लेनेके साथ साथ दुसरोंको नुकशान न हो जाय इस बातका ध्यान रखना है.

इस बातको ध्यानमें रखते है तो मुसलमान अगर शराब पीये या न पीये उससे अन्य धर्मीयोंको नुकशान नहीं होता है. अगर कोई मस्जिदमें जाता है तो वह वहां ईश्वरकी इबादतके बदले वह शराबी नशेमें होनेके कारण दुसरोंको नुकशान कर सकता है. इसलिये पूर्वानुमानके आधार पर इस्लामने शराब बंदी की है. यह बात तार्किक है. किन्तु यदि इसमें किसीको अंधश्रद्धा दिखाई देती है यह बात ही एक जूठ है.

तो पी. के. ने ऐसे जूठको क्यों प्राथमिकता दी?
प्राथमिकता क्या होनी चाहिये थी?
यदि अंधश्रद्धाको भारत तक ही सीमित रखना है तो, मुसलमानोंने किये दंगे और कत्लोंको प्राथमिकता देनी चाहिये थी. आतंकीयों और स्थानिक मुसलमानोंने मिलकर हिन्दुओंकी धर्मके नाम पर कत्लें की, हिन्दुओंको यातनाएं दी और दे भी रहे है वह भी तो अंधश्रद्धा है.

मुस्लिमोंकी अंधश्रद्धा क्या है?
इस्लामको अपनानेसे ही ईश्वर आपपर खुश होता है. अगर आपने इस्लाम कबुल किया तो ही वह आपकी प्रार्थना कबुल करेगा और आपके उपर कृपा करेगा.
ईश्वर निराकार है इस लिये उसकी कोई भी आकारमें प्रतिकृति बनाना ईश्वरका अपमान है. अगर कोई ईश्वरकी प्रतिकृति बनाके उसकी पूजा करगा तो उसके लिये ईश्वरने नर्ककी सजा निश्चित की है.
इस बातको छोड दो.

अन्य धर्मीयों की कत्ल करना तो अंधश्र्द्धा ही है.

१९९०में कश्मिरमें ३०००+ हिन्दुओंकी मुसलमानोंने कत्ल की. मुसलमानोंने अखबारोंमें इश्तिहार देके, दिवारों पर पोस्टरें चिपकाके, लाउड स्पीकरकी गाडीयां दौडाके, और मस्जीदोंसे घोषणाए की कि, अगर कश्मिरमें रहेना है तो इस्लाम कबुल करो, या तो इस मुल्कको छोड कर भाग जाओ, नहीं तो कत्लके लिये तयार रहो. इस एलान के बाद मुसलमानोंने ३००० से भी ज्यादा हिन्दुओंकी चून चून कर हत्या की. पांचसे सात लाख हिन्दुओंको अपना घर छोडने पर विवश किया. इस प्रकर मुसलमानोंने हिन्दुओंको अपने प्रदेशसे खदेड दिया.
आज तक कोई मुसलमानने हिन्दुओंको न्याय देनेकी परवाह नहीं की. इसकी वजह सिर्फ और सिर्फ मुसलमानोंकी अंधश्रद्धा ही तो है. लाखोंकी संख्यामें अन्यधमीयोंको २५ सालों तक यातनाग्रस्त स्थितिमें चालु रखना आतंकवाद ही तो है. यह तो सतत चालु रहेनेवाला आतंकवाद है. इससे बडी अंधश्रद्धा क्या हो सकती है?

किन्तु पी. के. ने इस आतंकवादको छूआ तक नहीं. क्यों छूआ तक नहीं?
क्यों कि वह स्वयंके धर्मीयोंसे भयभित है. जो भयभित है वह ज्यादा ही अंधश्रद्धायुक्त होता है. पी. के. खुद डरता है. उसके पास इतनी विद्वत्ता और निडरता नहीं है कि वह सच बोल सके.
कश्मिरके हिन्दुओंको लगातार दी जाने वाली यातनाओंको अनदेखी करना विश्वकी सबसे बडी ठगाई और दंभ है. इस बातको नकारना आतंकवादको मदद करना ही है. उसकी सजा सिर्फ और सिर्फ मौत ही हो सकती है.

तो फिर पी. के. ने किसको निशाना बनाया?

पी. के. ने बुत परस्तीको निशाना बनाया.
लेकिन क्या उसने पूर्व पक्ष को रक्खा? नहीं. उसने पूर्वपक्षको जनताके सामने रक्खा तक नहीं.
क्यों?
क्यों कि, वह अज्ञानी है. अद्वैतवादको समझना उसके दिमागके बाहरका विषय है. अद्वैतवाद क्या है? अद्वैतवाद यह है कि ईश्वर, सर्वज्ञ, सर्वयापी और सर्वस्व है. विश्वमें जो कुछ भी स्थावर जंगम और अदृष्ट है वे सब ईश्वरमें ही है. उसने ब्रह्माण्डको बनाया और आकर्षणका नियम बनाया फिर उसी नियमसे उसको चलाने लगा. उसने मनुष्यको बुद्धि दी और विचार करने की क्षमता दी ताकि वह तर्क कर सके. अगर वह तर्क करेगा तो वह तरक्की करेगा. नहीं तो ज्योंका त्यों रहेगा, या उसका पतन भी होगा और नष्ट भी होगा. ईश्वरने तो कर्मफलका प्रावधान किया और समाजको सामाजिक नियमो बनानेकी प्रेरणा भी रक्खी. जो समाज समझदार था वह प्रणालियोंमें उपयुक्त परिवर्तन करते गया और शाश्वतता की और चलता गया.
हिन्दु समाज क्या कहेता है?
सत्यं, शिवं और सुंदरं
सत्य है उसको सुंदरतासे प्रस्तूत करो तो वह कल्याणकारी बनेगा.
कल्याणकारीसे आनंद मिलता है वह स्थायी है.
आनंद स्थायी तब होता है जब भावना वैश्विक हो. न तो अपने स्वयं तक, न तो अपने कुटुंब तक, न तो अपने समाज तक, न तो अपनी जाति तक, मर्यादित हो, पर वह आनंद विश्व तक विस्तरित हो.
विश्वमेंसे जो कुछ भी तुम्हे मिलता है उसमेंसे विश्वको भी दो (स्वाहा).
यज्ञकी भावना यह है.
शिव तो तत् सत् है. ब्रह्माण्ड स्वरुप अग्निको उन्होने उत्पन्न किया. जो दृश्यमान अग्नि है वह यज्ञ है. अग्नि यज्ञ स्वरुप है. अग्निने आपको जिवन दिया. आप अग्निको भी तुष्ट करें और शांत भी करें. हिन्दुओंके लिये ईश्वरी शक्तियां अपने जिवन प्रणालीका एक भाग है. शिव लिंग एक ज्योति है. उसको जो स्वाहा करेंगे वह धरतीके अन्य जीवोंको मिलेगा. जीनेका और उपभोग करनेका उनका भी हक्क है.
तुम्हे ये सब अपनी शक्तिके अनुसार करना है. तुम अगर शक्तिमान नहीं हो तो मनमें ऐसी भावना रखो. ईश्वर तुम्हारी भावनाओंको पहेचानता है. संदर्भः “शिवमानसपूजा”

यदी पी. के. ने “अद्वैत” पढा होता तो वह शिव को मजाकके रुपमें प्रस्तूत न करता.

मनुष्य एक ऐसी जाति है कि इस जातिमें हरेक के भीन्न भीन्न स्वभाव होते है. यह स्वाभाव आनुवंशी, ज्ञान, विचार और कर्मके आधार पर होते है. इसलिये उनके आनंद पानेके मार्ग भी भीन्न भीन्न होते है. ध्यान योग, ज्ञान योग, कर्मयोग और भक्तियोग इस प्रकार चार योग माने गये है. अपने शरीरस्थ रासायणोंके अनुसार आप अपना मार्ग पसंद करें. हिन्दुओंके लिये ईश्वरकी उपासना एक प्रकृति उपासनाका काव्य है. काव्य एक कला है जिनके द्वारा तत्त्वज्ञान विस्मृतिमें नही चला जाता है. मूर्त्ति भी ईश्वरका काव्य है.

तो क्या पी. के.ने विषयके चयनमें सही प्राथमिकता रक्खी है?
नहीं. पी. के. को प्राथमिकताका चयन करने की या तो क्षमता ही नहीं थी या तो उसका ध्येय ही अंधश्रद्धाका निर्मूलन करना नहीं था. उसका ध्येय कुछ भीन्न ही था.

प्राथमिकता की प्रज्ञाः
अगर आपके घरमें चार चूहे और एक भेडिया घुस गये है तो किसको निकालनेकी प्राथमिकता आप देंगे?
चूहे चार है. भेडिया एक है. चार संख्या, संख्या एकसे ज्यादा है. तो भी जो ज्यादा नुकशानकारक है वह भेडिया है. इसलिये यहां पर प्रमाणभान स्वरुप संख्या नहीं है. किन्तु नुकशानका प्रमाणभान रखना है.
एक अरब हिन्दु है. २० करोड मुस्लिम है. लेकिन दंगे मुस्लिमोंने ज्यादा किया. अत्याचार भी मुस्लिमोंने ज्यादा किया. इसलिये समाजको होने वाले नुकशानके प्रमाणभानके अधारपर मुस्लिम अंधश्रद्धाको हिन्दुओंकी तथा कथित अंधश्रद्धाके विषयोंकी अपेक्षा ज्यादा प्राथमिकता देनी चाहिये.
किन्तु पी. के. ने ऐसा नहीं किया.

प्रमाणभानकी प्रज्ञाः
शिवलिंग पर दूध चढाना दूधका व्यय है. वह दूध गरीबोंके बच्चोंके मूंहमें जाना चाहिये.

abhiSheka01

दूधका व्यय है या नहीं? अगर व्यय है तो भी कितना व्यह है? किसका व्यय है? किसका पैसा है? किसकी कमाई है? क्या ईश्वरके उपर दूध चढाना अनिवार्य बनाया गया है? ऐसा कोई आदेश भी है?
दूधके पैसे तो पी. के.के या औरोंके है ही नहीं. दूधके पैसे तो दूध डालनेवालेके अधिकृत पैसे है. उसको कोई “लेन्ड ओफ लॉ” या और किसीकी सत्तका भी आदेश नहीं है, कि वह दूध डाले. किसी “लॉ ऑफ ध लेन्ड”ने उसे विवश भी नहीं किया है, कि वह दूध डाले. अगर वह दूध न डाले को उसको कोई दंड देनेवाला भी नहीं है. दूधका प्रमाण भी निश्चित नहीं है. वह अपनी ईच्छाके अनुसार दूध डाल सकता है या न भी डाले. वह अपनी मान्यताके अनुसार समझता है कि उसने कोई व्यय नहीं किया. क्यों कि विश्वने उसको दिया है वह उसमेंसे थोडा विश्वको वापस देता है. जो गाय है उससे वह आभारवश है और उसको भी वह सब देवोंका निवास समझता है और वह गायके प्रति आभारवश है (थेन्क फुल है. थेंकलेस नहीं है) वह गायको माता समझता है.
वह यह समझता है कि दूध चढाना कोई पाप नहीं है. खुदके पैसे है. अपने पैसे का कैसे उपयोग करना वह उसकी पसंद है. खुदकी पसंदका निर्णयकरना उसका अधिकार है.

आप कहोगे, वह जो कुछ भी हो, दूधका तो व्यय हुआ ही न? उसका क्या?
वह हिन्दु कहेता है; अगर आप गायको, भैंषको खाते है तो क्या आनेवाले दूधका घाटा नहीं हुआ?
वह आगे कहता है कि हम तो दूधसे अपनी भावना ईश्वरके प्रति प्रकट करते है. और इससे धरतीके जिवजंतुओंकी पुष्टि करते हैं ताकि धरतीकी फलद्रुपता बढे. हम गायका या ऐसे पशुका बली तो नहीं चढाते है ताकि विश्वमें दूधका स्थायी घाटा हो जाय.

वह आगे कहेता है, कि हमारा पावभर दूध ही क्यों आपकी नजरमें आता है?
हम जो टेक्ष भरते है, उनमेंसे एक बडा हिस्सा गवर्नर और राष्ट्रप्रमुखके और उसकी सुविधाओंके और मकानके रखरखावमें जाता है. टेक्ष द्वारा पैसा देना तो हमारे लिये अनिवार्य है और उसके लिये हम विवश भी है. हमारे पैसे का यह व्यय ही तो है. इसका प्रमाण भी तो बहुत बडा है. यह भी तो एक अंधश्रद्धा मात्र है. आपकी प्राथमिकता तो इस व्यय के विषय पर होनी चाहिये. क्यों आपकी प्रमाणभानकी प्रज्ञा इस बातको नहीं देख सकती?

आप खुद करोडों रुपये कमाते हो. आपको खानेके लिये कितना चाहिये? आपको कितना बडा मकान चाहिये? आप दाल चावल रोटी खाके आनंद पूर्वक जिन्दा रह सकते है, और बाकीके पैसोंसे हजारों कीलो दूध गरीबोंको बांट सकते है. लेकिन आप ऐसा नहीं करते है, क्यों कि दूसरे आप जैसे कई लोग ऐसा नहीं करते हैं. आप उन्हीकी प्रणालीको अनुसरते है. तो यह आपकी भी तो अंधश्रद्धा है. आपकी अंधश्रद्धा तो हमसे भी बडी है. आपकी प्राथमिकतामें वह क्यों नही आयी? अगर आप स्वयंकी कमाईको कैसे खर्च करें उसमें अपनी मुनसफ्फी चलाते हैं तो हमारे लिये क्यों अलग मापदंड?
ऐसी तो कई बातें लिखी जा सकती है.
(क्रमशः)
शिरीष मोहनलाल दवे
टेग्झः पी. के. , योग्यता, नीति शतक, सत्य, प्रिय, उपदेश, पूर्वपक्ष, प्रतिपक्ष, खंडन, बौद्धिक चर्चा, तर्क, शुद्ध, संस्कृति, संस्कृत, दुराचारी, शराब बंधी, विषय चयन, प्राथमिकता, संवाद, विसंवाद, वितंडावाद, ध्येय, हेतु, संघर्ष, ज्ञान, अंधश्रद्धा, प्रणाली, आतंक, धर्म, मुस्लिम, इस्लाम, ख्रिस्ती, धर्म निरपेक्ष, मस्जिद, धर्मस्थान, धर्मगुरु, दंगा, कत्ल, ईश्वर निराकार, प्रतिकृति, काव्य, कश्मिर, ओमर, फारुख, अद्वैतवाद, कर्मफल, सत्यं, शिवं, सुंदरं, कल्याणकारी, वैश्विक, प्रमाणभान, प्रज्ञा, लॉ ऑफ ध लेन्ड

Advertisements

Read Full Post »

अनीतियोंसे परहेज (त्यागवृत्ति) क्यों? जो जिता वह सिकंदर (नहेरुवीयन कोंग रहस्य)-७
(इस लेखको “अनीतियोंसे परहेज क्यों? जो जिता वह सिकंदर-६” के अनुसंधानमें पढें)

कोंग्रेस और उसके साथीयोंने वोटींग मशीनमें गडबडी की है और बहुत आसानीसे कर सकते है. सावधान.

एक ही मंत्रः “नरेन्द्र मोदीको रोको”

कोंगी को और उसके साथीयोंको नरेन्द्र मोदीके बारेमें प्रतित हो गया है कि, अब वे लोग नरेन्द्र मोदीकी जितको रोक नहीं पायेंगे. इसलिये अब कोंगी और उसके साथी, नरेन्द्र मोदीकी जितको कमसे कम कैसे करें, इस बात पर व्युह रचना करने लगे है.
समाचार माध्यम और कुछ महानुभाव, कोंगी और उनके साथीयोंको हो सके उतनी मदद करने को तैयार है.

कोंगी के साथीमें बोलीवुडके कुछ महानुभाव आते हैं. ये महानुभाव लोग अपनेको विचारक, विश्लेषक और धर्मनिरपेक्ष समझते है.

इन महानुभावोंमें महेश भट्ट जैसे लोग है. कुछ मूर्धन्योंमें गुजरातके कान्ति भट्ट, शीला भट्ट जैसे पत्रकार और प्रकाश शाह, तुषार गांधी जैसे अपनेको गांधीवादी मानने वाले लोग आते हैं. अमर्त्य सेन जैसे अपने को नव्य अर्थशास्त्री माननेवाले लोग आते है.

बेताज बादशाह और बेताज बेगम

“प्रियंका” नहेरुवीयन संस्कारका निम्नतम कक्षाका सेम्पल

कुछ समाचार माध्यमके द्वारा बनाये गये महानुभाव भी आते है जिसमें हालमें प्रियंका वाड्रा है. प्रियंका वाड्रा को प्रियंका गांधीके नामसे, लोगोंको मनाया जाता है. समाचार माध्यमोंकी ऐसी प्रवृत्ति इस लिये है कि वह सोनीया गांधी की पुत्री है. यह सोनीया गांधी, राजीव गांधीकी पत्नी है. राजीव गांधी, इन्दिरा गांधी का पुत्र है. यह इन्दिरा गांधी जो लग्नके समय पर “घांडी” थी जिसको बातमें गांधी करवाया गया. इन्दिरा का लग्नके समय क्या नाम था, और “घान्डी”का “गांधी” कैसे हुआ?. राजीव का नाम, सोनीयाका नाम, और राहुलका असली नाम क्या था और क्या है, इन सबके बारेमें सामाजिक समाचार माध्यमोंमें (ओन लाईन सोसीयल मीडीयामें) चर्चा होती है. लेकिन दृष्य-श्राव्य और मुद्रित माध्यमोंमें इन बातोंको प्रसिद्ध करना नामुमकिन है. इन समाचार माध्यमोंमे निडरता नहीं है. इसके कई प्रयोजन है. मुख्य प्रयोजन पैसेके आदान-प्रदान का विषय है. व्यक्तिगत अंगत गुप्तताका प्रश्न है. ऐसा नहीं है कि यह सब सरकारी और न्यायिक दस्तावेजों पर नहीं है. सुब्रह्मनीयन स्वामीने बताया है कि, राजीव, सोनीया और राहुलने अपने प्रतिज्ञा लेखोंमे अपनी शैक्षणिक योग्यता के प्रमाण पत्रोंके बारेमें असत्य लिखा है. स्वामीने उन बातोंको न्यायालयोमें पडकारा भी है. इन बातोंको सुब्रह्मनीयन स्वामी स्वयं अपनी जनसभाओंमें खुल्ले आम बोलते है, तो भी समाचार माध्यम इन बातोंको प्रकाशित करते नहीं है. इससे आप समझ जाओ कि अंतरगत मामला क्या हो सकता है.

नरेन्द्र मोदीके बालकी खाल निकालो

उपरोक्त सभी व्यक्ति विशेषोंको मालुम है कि बीजेपीकी जो हवा देशमें चल रही है उसका स्रोत नरेन्द्र मोदी है. इसलिये नरेन्द्र मोदीको बदनाम करनेमें, जो कुछ भी हो सकता वह सब करो. नरेन्द्र मोदी जो कुछ भी कहे उसमें बालकी खाल निकालो.

अखबारी फरजंद प्रियंका वाड्रा

प्रियंका वाड्रा को अगर पक्षीय दृष्टिसे देखा जाय तो वह एक शून्य है. लेकिन समाचारी माध्यमने उसको आगे कर दिया है. मानो कि इन्दिरा गांधीकी रुह (भटकते भटकते) उसमें आ गई है. और समाचारके व्यापारी जैसे अखबारोंको अपना आपतकालका धर्म याद आ गया है.
इस औरतने नरेन्द्र मोदीको ताने मारना शुरु कर दिया है. अखबारी व्यापारीयोंने उसके तमाम उच्चारणोंको उछाला. नरेन्द्र मोदीको मालुम है कौन कहां है. इसलिये उसने कहा कि, प्रियंका उसकी बेटी जैसी है.

नरेन्द्र मोदीका बडप्पन

प्रियंकाने इसको ऐसे उछाला मानो नरेन्द्र मोदीने उसको गाली दी. सभी समझदार वयस्क अपने से छोटोंको बेटे-बेटी समान समझना चाहिये ऐसा समझते हैं. और छोटोंको चाहिये कि अपनेसे जो बडे हैं उनको माता-पिता समान माने. यही भारतकी संस्कृति है. नरेन्द्र मोदीने वैसा ही कहा जो भारतके संस्कार के अनुरुप है. दुसरी बात यह है कि उम्रमें छोटा व्यक्ति अगर गलती करें, और असभ्यता दिखावें तो बडा व्यक्ति उसको माफ कर दे. नरेन्द्र मोदीने वही किया.

प्रियंकाका कमीनापन

लेकिन प्रियंकामें न तो वह संस्कार है न तो वह संस्कृति है न तो उसको बडोंका आदर करना कभी शिखाया गया है. उसने अपने चाचा संजय गांधीके पुत्र वरुण गांधीको भी “पथभ्रष्ट” कह चूकी है. नरेन्द्र मोदीके उस उच्चारण “वह मेरी बेटी जैसी है” को भी प्रियंकाने धुत्कार दिया, मानो कि नरेन्द्र मोदी एक अछूत व्यक्ति है और वह बडे होने पर भी आदरके पात्र नहीं है.

नरेन्द्र मोदी एक ऐसा व्यक्ति है जो गरीब के घरमें जन्म ले कर अपने आप अपनी कर्मशीलता, अपना कौशल्य और अपने श्रमसे, जीवनकी हर कक्षाके संकटोंसे लडकर सन्मार्ग पर चलकर इस उच्च पद पर पहूंचा है. वह सबके मानका लायक है. प्रियंकाको उसका आदर करना चाहिये. अगर प्रियंकाका संस्कार ऐसा नहीं है तो उसको मौन रहेना चाहिये.

प्रियंकाने नरेन्द्र मोदीका अपमान किया. उसने कहा कि नरेन्द्र मोदी अपने को मेरे पिताके समान न समझे. मेरे पिताजी राजीव गांधी थे. नरेन्द्र मोदी अपनेको राजीव गांधीके बराबर न समझे. मेरे पिताजी कि तुलनामें वह कुछ नहीं है. ऐसा विकृत अर्थ नहेरुवीयन फरजंद ही ले सकते है.

देखो इन नहेरुवीयनोंका संस्कार

अगर कोई बडा आदमी अपना बडप्पन दिखाता है तो नहेरुवीयन हमेशा अपना पामरपन दिखाते हैं. इन्दिरा गांधी भी, मोरारजी देसाईका अपमान करनेमें पीछे रही नहीं थी. उसने जयप्रकाश नारायणका भी अपमान किया था. उसने अपनेसे उम्रमें बहुत बडी और कर्मशीलतामें भी कई गुना बडी व्यक्तियोंका अपमान किया था उतना ही नहीं उनको बेवजह जेल में अनियतकालके लिये बंद भी कर दिया था. इन्दिराकी इस पोतीसे आप, उच्च संस्कारकी कैसे अपेक्षा रख सकते है?

इन्दिराकी इस पोतीमें यह समझने कि अक्ल होनी चाहिये कि, राजीव गांधी अपनी कर्मशीलता, कुशलता और श्रमसे प्रधान मंत्री नहीं बने थे. उस समय एक ऐसे राष्ट्रपति थे जो इन्दिरा गांधीके इतने अहेसानमंद थे कि इन्दिरा गांधीके कहेने पर झाडु लगानेके लिये भी तैयार थे.. इस राष्ट्रपतिने इन्दिरा गांधीकी हत्याके बाद तूरंत ही बिना मंत्रीमंडलके अनुरोध ही, राजीवको प्रधान मंत्रीका शपथ ग्रहण करवाया था. यह बात भारतीय संविधान और लोकशाहीके विरुद्ध थी. लेकिन भारतकी लोकशाही और संविधानको नहेरुवीयन फरजंदोने मजाक और मस्ती समझ लिया है. संविधान और लोकशाही मूल्योंकी अवमानना करना नहेरुवीयन फरजंदोंका संस्कार रहा है.

नरेन्द्र मोदी भारतीय संवैधानिक आदरणीय पदस्थ नेता है

नरेन्द्र मोदी भारतीय संविधानसे प्रस्थापित प्रक्रियाओंसे पसार होकर जनता द्वारा निर्वाचित जन प्रतिनिधि है. यह राज्य कोई ऐसा वैसा राज्य नहीं है. यह राज्य एक ऐसा राज्य है जिसकी संस्कृति अति प्राचीन है. इस बातको छोडकर, अगर अर्वाचीन इतिहासको देखें, तो भी इस भूमिने, दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी और सरदार पटेल जैसे युगपुरुषोंको पैदा किया है. नहेरु तो खास करके महात्मा गांधीका और सरदार पटेलका अत्यंत ही ऋणी रहा है. अगर महात्मा गांधी ने हस्तक्षेप न किया होता और सरदार पटेलने त्याग दिखाया न होता तो जवाहरलाल नहेरुका प्रधान मंत्री बनना असंभव था.

कृतघ्न और अनपढ औलाद

नहेरु तो कृतघ्न थे ही लेकिन उनकी संतान भी कृतघ्न निकली. नहेरु और इन्दिरा गांधीने गुजरातीयोंका और गुजरातकी अत्यंत अवमानना की है. प्रियंकाने भी वैसी ही कृतघ्नता दिखाई. नरेन्द्र मोदी की उम्रका, उसके बडप्पनका और उसके संविधानिक पदको जानबुझ करके नजर अंदाज करके नरेन्द्र मोदीको अपमानित किया है. यह बात नहेरुवीयनका निम्न स्तर प्रदर्शित करती है. वास्तविकता देखो तो नरेन्द्र मोदी एक उत्कृष्ट और उच्चस्तरीय नेता है. उसके उच्चारणमें गहनता और नाविन्य होता है. उसके उच्चारणमें माहिती, तर्क और संशोधन होता है. वह अगर कठोर शब्द या मनोरंजन करता है तो भी उसमें गर्भित वैचारिक गहनता होती है. नहेरु, इन्दिरा, सोनीया, राहुल और अब प्रियंका जैसा वाणी विलास और छीछरापन, नरेन्द्र मोदीके वक्तव्यमें नहीं होता है. नरेन्द्र मोदीके सामने ये नहेरुवीयन किसी गिनतीमें नहीं है.

मोदी विरोधी अब क्या करेंगे?

नरेन्द्र मोदी विरोधी सब यह सोचते है कि बीजेपीको पूर्ण बहुमत न मिले उसके लिये जो कुछ भी करना पडे वह करो. युएसका सहारा लो, १९६२में जब चीनने भारत पर आक्रमण किया तो उस सेना को यानी कि, चीनकी सेनाको “मुक्ति सेना का स्वागत करो” ऐसे कहेनेवाले साम्यवादीयोंका सहारा लो, नक्सलवादीयोंका सहारा लो, माओ वादीयोंकासहारा लो, पाकिस्तानी आतंक वादीयोंका सहारा लो, मुलायम, माया, जया, ममता, दाउद, उसके नेटवर्क आदि सबका सहारा लो और मोदीको कैसा भी करके बहुमतसे रोको.

अगर नरेन्द्र मोदीको बहुमत मिल गया तो भी कोंगी नेतागण परास्त होने वाला नहीं है. १९७७ में जनता पार्टीको ३४५ सीटें मिली थीं. इन्दिरा गांधीने समाचार माध्यमोंका सहारा लेके, जनता पार्टीकी छोटी छोटी बातोंको चमका कर उसके विभिन्न नेताओंको उकसाया था. इसमें चरणसिंह मुख्य थे. चरणसिंह और राजनारायणने एक ग्रुप बनाया था, और उन्होने जोर्ज फर्नान्डीस, मधु लिमये, मधुदंडवते को अलग कर दिया था. चरणसिंग बेवकुफ बन गये. यशवंतराव चवाण जो इन्दिरा गांधी से अलग हो गया था और अपना एक पक्ष बना लिया था उसको भी इन्दिराने बेवकुफ बनाया था. चरण सिंग, यशवंतराव चवाण और इन्दिरा गांधी तीनोंने मिलकर जनता पक्षकी काम करती सरकारको तोडी थी.

जब जनता पार्टीकी सरकार तूटी तो जयप्रकाश नारायणने बोला था “पूरा बाग उजड गया”. तब बाजपाईने उनको बोला कि हम फिरसे बाग खीला देंगे.
लेकिन इस बागको खीलानेमें बाजपाईको २० साल लग गये. और वह भी पूरी तरह खील नहीं पाया.

नरेन्द्र मोदी यह सब जानता है. कोंगी भी देशके बागको उजाडनेमें माहिर है. लेकिन हमारे देशमें जो राजकीय विश्लेषक है, समाचार माध्यमोंके मूर्धन्य है वे बेवकुफ ही नहीं स्वकेन्दी और मनमानी तटस्थाके घमंडी है. वे प्रमाणभानहीन और दंभी है. ये लोग आपात कालमें भी समयकी मांग को पहेचान नहीं सकते. जनता इन मूर्धन्योंसे देशको बचानेकी आशा नहीं रख सकती.

बीजेपीके अंदर और उसके सहयोगीयोंके अंदर भी कुछ तत्व ऐसे हैं कि वे आत्म-ख्यातिकी लालचमें बीजेपीको नुकशान पहूंचा सकते है. ऐसे तत्व हमने गुजरातमें देखें है. केशुभाई पटेल, दिलीप पारेख सुरेश महेता, शंकरसिंह वाघेला उनमें मुख्य है. समाचार माध्यमोंने हमेशा नरेन्द्र मोदी के विरुद्धमें इन बेवकुफ और आत्मकेन्द्री नेताओंको ज्यादा प्राधान्य दिया है. और नरेन्द्र मोदीको नीचा दिखानेकी भरपुर कोशिस की है.

१९७७ वाली जनता पार्टी जो ३४५ बैठक जीत गयी थी, उनमें जो सत्ताके लिये भ्रष्ट साधनकी शुद्धिमें मानते थे वे मोरारजी देसाईसे अलग हो गये. जो बेवकुफ थे या बेवकुफ भी थे वे सरकार तूटने पर हतःप्रभ हो गये.

समाचार माध्यम व्यापारका एक क्षेत्र

बीजेपीको ऐसे बेवकुफ, स्वार्थी और स्वकेन्द्री नेताओंसे बचना होगा. नरेन्द्र मोदी वैसे तो मोरारजी देसाईकी अपेक्षा सियासतमें ज्यादा कुशल है. लेकिन जो समाचार माध्यम है वह एक व्यापारका क्षेत्र बन गया है. समाचार माध्यम वाले अब बिल्डींग कंस्ट्रक्सन कंपनीया बनाने लगे है. इससे पता चल जाना चाहिये कि अब यह वर्तमान पत्र और टीवी चेनल वाले काले धंधेमें कितने डूबे हुए है. समाचार माध्यम की अब सामान्य कक्षाके आदमी पर ज्यादा असर पड सकती है. समाचार माध्यम अब जनताको सुशिक्षित करे ऐसा नहीं है. उनका ध्येय हरहालतमें पैसा कमाना है. वे जनताको सुशिक्षित करनेके स्थान पर जनताको गुमराह करने पर तुले हुए है.

तो अब जनताको क्या करना होगा?

जनताको समज लेना पडेगा कि, नरेन्द्र मोदी पर अभी कई मुसीबतें आने वाली है. उसमें आतंकी हमले के अतिरिक्त सियासती हमले भी होंगे. वे बडे जोरदार होंगे. अगर नरेन्द्र मोदी उसके विरोधीयों पर कार्यवाही नहीं करेगा तो ये विरोधीगण चूप बैठने वाला नहीं है. इन लोगोंको जेल भेजना इतना मुश्किल नहीं है. उनके कई काले धंधे है. जिसमें उनकी आर्थिक आय और संपत्ति जो प्रमाणसे कहीं ज्यादा ही है वह मुख्य है. दुसरे उनके असामाजिक तत्वोंके साथके संबंध है. इनके उपर कार्यवाही की जा सकती है. लेकिन इसके बारेमें बडी गुप्ततासे कदम उठाने पडेंगे. और ऐसा पूर्ण और मजबुत बहुमत आने पर ही यह सब संभव हो सकता है.

जो लोग आज नरेन्द्र मोदीके पक्षमें है उनको धिरज पूर्वक नरेन्द्र मोदीके पक्षमें ही रहेना होगा. चाहे नरेन्द्र मोदी पर कितने ही विवाद क्यूं न किया जाय.

एक लडकीके उपर तथा कथित जसुसी,
नरेन्द्र मोदीने जो अपनी पत्नीका नाम आवेदन पत्रमें लिखा,
गीने चूने उद्योगपतियोंको मुफ्तके दाम जमीन आबंटन … इत्यादि कई अर्थहीन विवाद, समाचार माध्यम द्वारा बडे चावसे नरेन्द्र मोदीके विरुद्ध चमकाया जाता है. और भी कई विवाद उछाले जायेंगे. तब जो जनता आज नरेन्द्र मोदीके साथ है, उसको अपने आप पर विश्वास रखकर मोदीके पक्षमें ही रहेना पडेगा. नरेन्द्र मोदीके चमत्कार देखनेके लिये जनताको धिरज और विश्वास रखना पडेगा. समाचार माध्यमोंके समाचारसे मतिभ्रष्ट नहीं होना है.

क्या जनता और जो मूर्धन्य लोग आज मोदीके साथ है वे ये सब समझ पायेंगें?

दंगे करवाना और बोम्ब ब्लास्ट करवाना कोंगका पेशा है

एक बात याद रक्खो कि फारुख और ओमर नया मोरचा खोल रहे है. कोंगी और उसके साथी लोग नया गेम खेल रहे है. वे नरेन्द्र मोदीके प्रधान मंत्रीकी शपथ के बाद कई जगह पर बोम्ब ब्लास्ट करवाने कि योजना बना सकते है. इस शक्यताको कतई नकारा नहीं जा सकता.

नहेरुवीयन कोंग और उनके कश्मिरके साथी फारुख और फरजंदका ट्रेक रेकार्ड देखोः

http://www.satp.org/satporgtp/countries/india/states/jandk/data_sheets/index.html

२००१ को भी याद करो. गुजरात के तत्कालिन मूख्य मंत्री केशुभाई पटेल गुजरातमें बीजेपीको सम्हाल नहीं सके, भूकंप ग्रस्त गुजरातको नवनिर्मित करनेमें वे अशक्त रहे थे. जनतामें केशुभाई और बीजेपी मजाकका विषय बनने लगे थे.

नरेन्द्र मोदी ने सख्त कदम उठाके गुजरातको और बीजेपी को और भूकंपग्रस्त गुजरातको विकासके रास्ते पर ला दिया. एक दफा नरेन्द्र मोदीने बोला कि बीजेपीके ५ सालके शासनमें कोमी दंगे बंद हो गये है. तो इससे नहेरुवीयन कोंगीयोंके पेटमें उबला हुआ तेल पडा और उन्होने की गई साजीशके अनुसार गोधराके एक स्थानीय नेता द्वारा साबरमती एक्सप्रेसका डीब्बा जलाया गया जिसमें अयोध्यासे आनेवाले सभी यात्री जला दिया गया. यह एक ठंडे दिमागसे की गई साजीश थी. एक नहेरुवीयन कोंगीने तो बोला भी था कि नरेन्द्र मोदीने “बीजेपीके शासनमें कोमी दंगे बंद हो गये है ऐसा निवेदन करके लघुमति कोमको दंगे करनेके लिये उकसाया है. कोंग चाहती है कि नरेन्द्र मोदी को मुस्लिमोंकी भावनाको ऐसे निवेदनो द्वारा भडकाना नहीं चाहिये था.

कोंग, दंगा करवानेमें और बोम्ब ब्लास्ट करवानेमें माहिर है. जब भी कोंग और उसके समसंस्कृति साथी मुसिबतमें होते हैं या तो वोटबेंक की राज नीतिको बडे पैमाने पर उजागर करनी होती है, तब वह दंगा करवाती है.

१९६९में मोरारजी देसाईकी कोंग्रेस, जो कोंग्रेस (ओ) नामसे जानी जाती थी वह इन्दिरा कोंगके लिये गुजरातमें एक चूनौति थी. उस समय केन्द्रमें इन्दिराका शासन था. कोंगीने ९९६९में अहमदाबादमें बडे पैमाने पर दंगे करवाये थे.

https://www.youtube.com/watch?v=-u92rWqUhaY

असममें बंग्लादेशी घुसपैठीयोंके कारण स्थानिक प्रजा के साथ दंगे करवाये. पूर्वोत्तर राजको आतंकवादीयों द्वारा पीडित ही रक्खा. युपी बिहारमें तो कई प्रकारके सियासती दंगे करवाते ही रहते है. अब वहां बीजेपी शक्ति बढी तो आजमगढमें दंगे करवाये. आतंकवाद की जड कोंग ही है. दाउदका नेटवर्क कोंगकी कृपासे ही बढा है. दाउदका नेटवर्क बोम्ब ब्लास्टमें सामेल है.

समझ लिजीये कि, जब नरेन्द्र मोदी प्रधान मंत्री बन जायेगा तब कोंग के पैसोंका मुख्य उपयोग दंगा करवाना ही होगा. और इन सभी दंगोंका कारण नरेन्द्र मोदीका शासन ही बताया जायेगा.

कोंग और उसके साथीयोंको दंगे करनेमेंसे रोकने के लिये उनके उपर जांच आयोग बैठा देना पडेगा.

शिरीष मोहनलाल दवे

Read Full Post »

खबर है नहीं कि, क्या पन्थ पे  आफत खडी है
खबर सिर्फ है यही कि मातने हमको पूकारा

  
तूट पडो हर हर बोलके, ये दुश्मनो ढोंगी जनों पे,
करदीया है इन सबोंने नाश भारतराष्ट्र का,
  
નથી જાણ્યું અમારે પંથ શી આફત ખડી છે,
ખબર છે એટલી કે માત ની હાકલ પડી છે.
  

WE KNOW THIS MUCH THAT MOTHER HAS CALLED US THAT IS ALL

WE KNOW THIS MUCH THAT MOTHER HAS CALLED US THAT IS ALL

विराट जागे

  

नौटंकी

सबलोग साथमें गाते है अपने नोर्मल ड्रेसमें

एक नया इतिहास रचे हम एक नया इतिहास रचे हम

धाराके प्रतिकुल नाव रखें हम एक नया इतिहास रचें हम

………..

(गुजराती लोग अपने राज्यमें झवेर चंद मेघाणीकाअमे जंगल ने झाडीमांथी, पर्वत ने पहाडीमांथी, ….. सुणी साद आव्या …. ” वाला सहगान गाने का)

उसके बाद सबको अपनी अपनी जगह ले लेनेकी

बेक ग्रांउन्डमेविराट जागेबेनर रखनेका

सुत्रधार (जोरसे पूकारता है); बंधु बंधु ….  बंधु बंधु ….  बंधु बंधु ….  कहां गया बंधु…. बंधु बंधु ….  बंधु बंधु ….  बंधु बंधु ….   अबे बंधु बंधु ….  

सहायक; आया साबजी आया,  आया साबजी आया, आया साबजी आया

सुत्रधार; हां तो बन्धु, मैं क्या कहेता था?

सहायक; आप ही बताइए सा. आप ठीक तरहसे बता पाएंगे, मै शायद कुछ गलती भी कर सकता हूं . आप ही बताइए.

सुत्रधार; हम यहां क्यूं आये हैं? बोलो हम यहां क्यूं आये हैं?

सहायकः आप ही बताइए सा. आप ठीक तरहसे बता पाएंगे, मै शायद कुछ गलती भी कर सकता हूं . आप ही बताइए.

सुत्रधार; हम यहां संदेश लेकर आये हैं. हम यह संदेश ये लोगोंके सामन कैसे प्रस्तुत करेंगे?

सहायकः आप ही बताइए सा. आप ठीक तरहसे बता पाएंगे, मै शायद कुछ गलती भी कर सकता हूं . आप ही बताइए.

सुत्रधारः हम हमारा संदेश ड्रामाके जरीये प्रस्तुअ करेंगे.

सहायकः यानी हम एक नाटक करेंगे और इस नाटक के माध्यमसे हम संदेश देंगे, यही ना?

सुत्रधारः सही बताया तुमने, अब तुम भी होशियार हो गये हो

सहायकः आपकी एनायत है, जनाब.

सुत्रधारः चलो ठीक है, मस्कापालीश का समय नही हैबोलो  नाटकका नाम क्याहै?

सहायकः नाटकका नाम हैविराट जागे“. लेकिन साविराट जागेका मतलब क्या है?

सुत्रधारः विराट का मतलब हैआम जनताजैसे की मैं, तुम, और ये सब लोग.

सहायकः लेकिन हम सब तो जगे हूए ही है ने. देखो , मेरी, आपकी, इन सब लोगोकी आंखे तो खूली हूई ही है ? बंद कहां है?

सुत्रधारः नही बन्धु, मै ये चर्मचक्षुकी बात नही करता हुं. मैं ग्यान चक्षुकी बात करता हुं.

सहायकः ये चर्म चक्षु और ग्यान चक्षु क्या होता है?

सुत्रधारः देखो (आंखे दिखाके) ये चर्म चक्षु है. और जो चीज हम दिमागसे सोचकर समझते है उसको ग्यान कहते है.

सहायकः मतलब की हम भी परमेश्वरकी तरह तीन नेत्र वाले है?

सुत्रधारः हां. सब मे शिवजी का अंश होता है, लेकिन जब ग्यान होताहै तब.

सहायकः लेकिन हम तो लिखना पढना जानते है और जगे हुए है तो सही?

सुत्रधारः नही हम कई लोग सोए हुए है. समझते नही है, डरते है, झगडते है, मील कर काम नही करते है. हम दरसल सोए हुए है.

सहायकः क्या हम कभी जगते नही?

सुत्रधारः कभी कभी जगते है, परंतु फिर सो जाते है. १९७७ में जगे थे. फिर सो गये. हमे हमेशा जगते रहेना है. १९९९में कछ लोग जगे फिर २००४मे सो गये. अब इस समय अगर हम समझेगे नही तो हमेशा सोते ही रहेंगे तो फिर बहोत देर हो जाएगी. अगर हम जगकर मिलकर भ्रष्टाचारको यानीकी भ्र्ष्टाचारी सरकारको भगाएंगे तभी तो देश आगे बढेगा.

सहायकः मतलब हमे विराटको जगाना है, लेकिन ये भ्रष्टाचार क्या होता है?

सुत्रधारः देखो सामने, जाके देखलो, (सहायक वहां जाके सबकी टोपीयां जोरसे पढता है.) ढोंग्रेस, फासफुसीया, माफिया, मारफाडीया, नारदीया, ४२०, दाणचोरीया, तोडफोडीया, घुसणखोर, अलेल टप्पु, नादान, चक्रम, लबाडी, नीचकोटी, रिश्वतखोर, पेटु, देशद्रोही, लघु द्रष्टी, बेखबर पत्री, आयारामा – गयाराम

जी हां, हम इस भ्रष्टाचारीयोंको हराके भगाएंगे.

 (बेकसीट ड्राइवरके पीछे जो मोटा आदमी जिसकी टोपी के उपरभ्राष्टाचारलिखा हुआ है और गलेमेंसेभ्रष्टाचार्यासुरका बोर्ड छाती उपर लटकाया होताहै वह अट्टाहास्य करता हुआ आता है)

भ्रष्टाचार्यासुरः हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हा…  मैं भ्रष्टाचारहूं …..

मैं उपर हूं…., मैं नीचे हऊं …., मै आगे हूं …. मैं पीछे हूं…. मैं दाये हूं…. मैं बाये हूं…. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचारहूं …..

(भ्रष्टाचार घुमता रहेता है और वो राक्षसकी तरह पंजा दिखाके पब्लिक की लाईनमें सबको डराता हुआ बोलता रहता है और घुमता घुमता बोलता है)

मैं गांव मे हूं …. मैं शहरमें हूंमै महानगरोमें तो विशाल हूं…. और देल्हिमॅं तो भयो भयो हूं….. हां मैं देल्हिमें तो भयो भयो हूंहा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हा…  मैं भ्रष्टाचारहूं …..

मैं मेनेजरमें जनरल मेनेजर हूं, जनरल मेनेजरोंमे मैं चिफ जनरल मेनेजर हूं, एन्जिनियरोमें मैं चिफ एन्जिनियर हूं और डायरेक्टरोमें मैं डायरेक्टर जनरल हूं, मैं वर्करोमें लीडर हूं और लीडरॉमें जनरल सेक्रेटरी हूं, सीयासत में मैं पार्टी हूं और पार्टीयोमें मै ढोंग्रेस-कोंग्रेस हूं और उसके साथी भी मैं ही हूं, ढोंग्रेसमें मैं मन्त्री हूं और उसका भी मै प्रमूख हुं. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचारहूं …..
मैं स्वतंत्रता के पहेले भी था और उसके बादमें तो भयो भयो भयो हूं. ठेके में हूं , ठेके लेनेमें में हूं और ठेके देनेवालोमें तो भयो भयो हूंमै सुरक्षाकी जीपोंमें था, हिमालयकी ब्लन्डरमें था और काश्मीरमें तो भयो भयो हूंमैं लोटरीमें था, मैं फोडर मशीनमें था, छोटी सादडीमे और छोटी सादडीमें तो भयो भयो भयो था.

सहायक; सुत्रधारजि, सुरक्शा की जीप, हिमालयन ब्लन्डर वैगेरे वैगेरे सब क्या है?

सुत्रधारः ये सब ढोंग्रेस के कौभान्ड और मूर्खता की मिसाले हैं. ढोंग्रेसके सुरक्शा मंत्री ने सुरक्शा दलोंके लिये फोरेनसे जीपोंका ओर्डर दीया था. लेकिन एक भी जीप चली नही थी. चिन का आक्रमण हुआ तो हमारे जवानोंके पास ठंडीसे बचने के लिए कपडे नहीं थे. काश्मीरमें जो कोइ आर्थिक मदद करते थे वो सब गायब हो जाती थी, चीनके आक्रमणके समय लोगोंसे मदद मांगी गई तो लोगोंने अपने गहने तक देदिए. वे गहनोंका कोइ अतापता नही और हिसाब नही. जब छोटी सादडीसे कुछ गहने सीएमसे घरसे मिले तो ढोंग्रेसी सीएमने बोला कि, मेरी मां वेश्या थी तो उसके पास तो गहने खूब ही आते थे. फोडर मशीन एक एरकन्डीशन मशीन है होता है, जो करोड रुपयोंका आता है. ऐसे कई सारे मशीन विदेशसे मंगवाये गये. वे बर्फिले प्रदेशमें उअसके अंदर घास उगाइ जाती हैं.

सहायकः लेकिन भारतमें तो ज्यादातर जगहोंमे तो बर्फ पडती ही नहि है, और जहां भी पडती है, वो तो हिमालयकी पहाडीयोंमे पडती है वो भी दो तीन महिने ही ज्यादासे ज्यादा. अच्छा तो उस मशीनोंका क्या हुआ?

सुत्रधार; कोइ अतापता नहीं

भ्रष्टाचार;  हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचारहूं ….. ,  

बोलो मैं आपकी सेवामें हूं …. मैं आपकी सेवामें हूं …. इलेक्सन आया है तो मैं आपकी सेवामें आया हूं …. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं अर्जुनकी लोटरीमें हूं, स्टेट बेंक नगरवाला में हूं, कुवेतकी ओइल के आयातमें हूं, मै जनताकार में भयो भयो हूं.

सहयकः सुत्रधारजी, ये लोटरी, ये नगरवाला, ओएल की आयात …  जनताकार ये सब क्या है?

सुत्रधारः ढोंग्रेसके मंत्रीजीने एक लोटरी निकाली थी, उसका हिसाब गायब. ढोंग्रेसके प्रधान मंत्री का नगरवाला नामका एक सिक्योरीटी ओफिसरथा. कहेते है कि, ईन्दीराजीकी आवाजसे उअसने देहली की स्टेट बेंकमें फोन कीया, कि, मेरे आदमीको ६० लाख रुपया दे दो. फिर नगर वालाजी वो पैसे ले लियेफिर उसके सामने केस २४ घन्टोमें चल गया. उसको जेलमें डाल दिया. पार्लामेंटमें इस बात पर बडा हंगामा हूआ. एक इन्स्पेक्टने जांच शुरु की. वो भी मर गया और नगरवाला भी जेलमें ही मर गया. बडी मजेकी बात तो यह है कि, प्रधानमंत्रीको कोर्टमें बयनके लिये बुलाया तक नहीं गई जो कायादाके हिसाबसे जरुरी था.

सहायक; ये जनताकार क्याहै?

सुत्रधारः १९५०का, भरतवर्षका एक सपना था कि, भारतमें ५०००/- रुपयेमें बिक सके ऐसी एक कार बनाइ जाय जिसे आम जनता उसका उपयोग कर सके.

सहायकः ५००० रुपयेमें कभी कार बन सकती है?

सुत्रधार; यह तो  १९५० की बात है. उस जमाने के ५००० रुपये तो आजके  लाख रुपये बरबर है

सहायकः तो उसका क्या हुआ? वह कार नही बनी?

सुत्रधारः बनाने दो तो बने ने? मुख्य मंत्री ने सोचा मेरा पोता बडा होगा और वही बनाएगा. दुसरा कोइ क्यूं बनावे

सहायकः फिर क्या हुआ?

सुत्रधारः अरे अभी ये नाटक देखो. धीरे धीरे सब पता चलेगा.

 

भ्रष्टाचार;  हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचारहूं ….. ,

            मैं भ्रष्टाचारहूं ….. इलेक्सन आया है तो मैं आपकी सेवामें आया हूंइलेक्सन आया है तो मैं आपकी सेवामें आया हूंइलेक्सन आया है तो मैं आपकी सेवामें आया हूं

भ्रष्टाचार बीचमें कूर्सी लगाके बैठता है. (कूर्सीके नीचे कूछ कागजके बंडल रख्खे जाते है) 

भ्रष्टाचार; चमचे ….. चमचे …. चमचे …. चमचे …..  साले कहां गए सब चमचे …… चमचे …. चमचे ….. चमचे ….  चमचे ……

अरे एल्युमिनियमके चमचे एल्युमिनियम के चमचे …. कहां गया तू ? अरे एल्युमिनियमके चमचे एल्युमिनियम के चमचे …. कहां गया तू ? अरे एल्युमिनियमके चमचे एल्युमिनियम के चमचे …. कहां गया तू ?

अरे स्टेइनलेस स्टील के चमचे …..  स्टेइनलेस स्टीलके चमचे …..  अरे स्टेइनलेस स्टील के चमचे …..  स्टेइनलेस स्टीलके चमचे ….. अरे स्टेइनलेस स्टील के चमचे …..  स्टेइनलेस स्टीलके चमचे ….. कहां गया तू? अरे स्टेइनलेस स्टील के चमचे …..  स्टेइनलेस स्टीलके चमचे …..  अरे स्टेइनलेस स्टील के चमचे …..  स्टेइनलेस स्टीलके चमचे ….. अरे स्टेइनलेस स्टील के चमचे …..  स्टेइनलेस स्टीलके चमचे ….. कहां गया तू?

अरे चांदीके चमचे ….. चांदीके चमचे ….. चांदीके चमचे …. अरे चांदीके चमचे ….. चांदीके चमचे ….. चांदीके चमचेअरे चांदीके चमचे ….. चांदीके चमचे ….. चांदीके चमचेकहां है तू ….

अरे सोने के चमचे …. सोने के चमचे ….. अरे सोने के चमचे …. सोने के चमचे ….. अरे सोने के चमचे …. सोने के चमचे ….. कहां सो गया है तू ?

अबे प्लेटीनमके चमचे….. प्लेटीनमके चमचे ….. अबे प्लेटीनमके चमचे….. प्लेटीनमके चमचे ….. अबे साले सब चमचे कहां गए ….

एक पात्र जिसने चमचेकी टोपी लगाई है जिसमें पीछे प्लेटीनम लिखाहुआ होताहै वो आगे आता है ….

चमचाः जि हजूर मैं तो यहां पर ही हुं जि हजूर मै आपको छोडके कैसे जा सकता हूं? हजूर आप फरमाइएमै आपकी क्या सेवा कर सकता हूं

सुत्रधार (जनतासे); ये तो इसका बंधवा है …. बंधवा गुलाम हैवो कैसे जा सकता है? ही …. ही …. ही ….

 भ्रष्टाचारः देखो… पता करो… कोई मुलाकाती है?

चमचा (आवाज लगाता है); अबे जनता कोइ है ? कोइ है? … पचास पचास सालोंसे आपकी सेवामें व्यस्त रहे है,और आप गरीबोंके गरीब पूरखोंकी सेवा और अब आप गरोबोंकी सेवा और बादमे आपके गरिब संतानोंकी सेवा का करना जिन्होने अपना परम पारिवारिक परंपरागत कर्तव्य समजा है ये महा कोंग्रेसी महामाया पार्टी आज आपके द्वारोकों पवित्र करने आई है. जो कोइ भी समस्या हो सामने लाइ जाए.

जनता (जिसके कपडे तुटे फुटे है भ्रष्टा चारके पैरोको पकड लेता हैमालिक बचाओ, मुझे बचाओ, मालिक मुझे बचालो, जल्दी बचालो…. मालिक बचाओ, मुझे बचाओ, मालिक मुझे बचालो, जल्दी बचालो…. मालिक बचाओ, मुझे बचाओ, मालिक मुझे बचालो, जल्दी बचालो…. मैं और मेरा परिवार भूखा मररहा है. आप कुछ करो …. मालिक आप कुछ करोहमे रोटी दो, हमारे पास रोटी नहि हैहमें रोटी दो. हमारे पास रोटी नही है. मालिक हमारे पास रोटी नही हैमालिक हमारे पास रोटी नही हैमालिक हमारे पास रोटी नही हैमालिक हमारे पास रोटी नही है

चमचाः अरे अबे अरे अबे जरा पीछे हठपीछे हठ…  अरे अबे अरे अबे जरा पीछे हठपीछे हठपीछे हठपीछे हठ

भ्रष्ट्राचारः ठीक है … ठीक हैइसमे क्या बडी बात है ….रोटी नहीं है तो बदाम खाओ, पीस्ता खाओ, बरफि खाओ, मलाइ खाओ, पेडे खाओ, रसमलाइ खाओ, और ऐसे शराब पीके मौज करो.. देखो हमने कभीसे दारु बंदी हटा दी हैअभी तो हमने विदेशी दारु की भि छुट्टी दे रख्खी हैअबे चमचेइसको जरा दारु दोदेखो हमारी पार्टी महात्मा गांधीकी पार्टी है, हम तूम गरीबोकी सेवा करने से कभी पीछे नही हटेंगे. हम तुम गरीबोकी सेवा करनेको कृतनिश्चयी है. हमारे संतान भी गरीबोंकी सेवा करते ही रहेंगे. हमारे पौत्र भी गरीबोंकी सेवा करते ही रहेंगे, हमारे सभी पौत्र प्र-पौत्र और उनके भी प्रपौत्र सब यावत चंन्द्र दिवाकरौ आप गरीबोंकी सेवा करते ही रहेंगे  सेवा करते ही रहेंगे  सेवा करते ही रहेंगे  

(भ्रष्टाचार दारु पीते पीते सो जाता है)

चमचाः गरीबो अमर रहोगरीबो अमर रहोगरीबो अमर रहोगरीबो अमर रहोगरीबो अमर रहो… (गरीबसे बोलता है) अभी तूम बाद मे आना. अभी मालीक थक गए है, और वे शोच रहे है. उनको दिस्टर्ब करना नही..भ्ा

भ्रष्टाचार (थोडी देरके बाद जगता है और फिर घूमने लगता है); हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचारहूं ….. , हा….हा….  हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचार हूं ….. हा….हा…. हा….हा….हामैं भ्रष्टाचारहूं ….. ,  मैं भ्रष्टाचारहूं ….. इलेक्सन आया है तो मैं आपकी सेवामें आया हूंइलेक्सन आया है तो मैं आपकी सेवामें आया हूंइलेक्सन आया है तो मैं आपकी सेवामें आया हूं.

चमचाः मालिक आपसे एक युवाक मिलना चाहता है.

भ्रष्टाचारः बूलाओ.

युवक आता है और बोलता हैः सर मुझे काम चाहिए. मैं बेकार हूं.

भ्रष्टाचारः देख बे चमचे, मेरी कुर्सीके नीचे कुछ  होगा. उसको दे दे.

चमचा कुर्सीके नीचे से एक भूंगळ निकालता है. चमचा युवकको देता है. युवक उसको प्रेक्षकोंके सामने खोलता है. उसमे लिखा होता है.

सर्वोदयवाद जिन्दाबाद. चमचा उसके और साथीयोंके साथ पांच दफा उंची आवाज से बोलता है  “सर्वोदयवाद जिन्दाबाद”

युवक कुछ निराशा दिखाता है.

भ्रष्टाचारः उसको एक दुसरा दे दे. मेरी कुर्सीके नीचे कुछ  होगा. उसको दे दे.

चमचा कुर्सीके नीचे से एक भूंगळ निकालता है. चमचा युवकको देता है. युवक उसको प्रेक्षकोंके सामने खोलता है. उसमे लिखा होता है.

समाजवाद जिन्दाबाद. चमचा उसके और साथीयोंके साथ पांच दफा उंची आवाज से बोलता है  “समाजवाद जिन्दाबाद”

 

युवक फिरभी कुछ निराशा दिखाता है.

भ्रष्टाचारः उसको एक और दुसरा दे दे. मेरी कुर्सीके नीचे कुछ  होगा. उसको दे दे.

चमचा कुर्सीके नीचे से एक भूंगळ निकालता है. चमचा युवकको देता है. युवक उसको प्रेक्षकोंके सामने खोलता है. उसमे लिखा होता है.

लोकशाही समाजवाद जिन्दाबाद. चमचा उसके और साथीयोंके साथ पांच दफा उंची आवाज से बोलता है  “लोकशाही समाजवाद जिन्दाबाद”

 

युवक फिरभी कुछ निराशा दिखाता है.

भ्रष्टाचारः उसको एक और दुसरा दे दे. मेरी कुर्सीके नीचे कुछ  होगा. उसको दे दे.

चमचा कुर्सीके नीचे से एक भूंगळ निकालता है. चमचा युवकको देता है. युवक उसको प्रेक्षकोंके सामने खोलता है. उसमे लिखा होता है.

ज्यादा पेड लगाओ, पानी बचाओ. चमचा उसके और साथीयोंके साथ पांच दफा उंची आवाज से बोलता है  “ज्यादा पेड लगाओ, पानी बचाओ”

युवक निराश हो जाता है.

चमचाः मालिकि इस युवकको तो अभी भी कुछ समझाइ देता नही है. क्या करेंगे?

 

 

भ्रष्टाचारः उसको एक और दुसरा दे दे. मेरी कुर्सीके नीचे कुछ  होगा. उसको दे दे. अबकी बार कुछ अच्छा होगा.

चमचा कुर्सीके नीचे से एक भूंगळ निकालता है. चमचा युवकको देता है. युवक उसको प्रेक्षकोंके सामने खोलता है. उसमे लिखा होता है. गरीबी हटाओ.. अबकी हम आये हैं नई रोशनी लाये हैं. चमचा उसके और साथीयोंके साथ पांच दफा उंची आवाज से बोलता है  “गरीबी हटाओ.. अबकी हम आये हैं नई रोशनी लाये हैं.”

युवक निराश हो जाता है. चला जाता है.

चमचा; मालिक यह तो चला गया.

भ्रष्टाचारः जाने दो. इतना समझाया लेकिन समझता नहीं है.

चमचा; पागल था नहीं तो और क्या?

चमचा थोडा घुमके आता है. और बोलता है. मालिक आपसे एक नवयुवक मिलना चाहता है. मंत्रीश्रीका सुपूत्र है.

एक शुटेड बुटेड लडका आता है.

युवकः सर, मुझे एक फैक्टरी डालनी है. परमिट चाहीये.

चमचाः कौनसी फैक्टरी डालनी है?

युवकः मुझे “फा इ व इन वन” की फेक्टरी डालनी है.

चमचाः ये फैव इन वन क्या हो ता है?

यवकः फाइव इन वन मतलब एक में पांच

चमचाः मतलब?

युवकः रेडियो, टेप रेकोर्डर, फोन, फोटो केमेरा और टीवी सब फेसिलिटी एक में ऐसा युनिट मै बनाना चाहता हूं

चमचाः इससे क्या फायदा? इससे तो किमत बढ जायेगी.

युवकः अरे ऐसा नहीं है और हम होने भी नहीं देंगे.

चमचाः वो कैसे?

युवकः वह आपको कहां देखन है? आप सिर्फ हमें लायसन्स दे दिजिये और लोनके लिए सिफारीस कर दिजिये.

भ्रष्टाचारः कैंची चलाके बोलता है और हमारा?

युवकः यह कोई कहने की बात है? आखीर मैं मंत्रीका पूत्र हुं

चमचाः लेकिन तुम्हारे पास कोइ डीग्री, सर्टीकफीकेट, अनुभव…

युवकः है न… मेरे पास इलेक्ट्रोनिक इक्वीपमेंट ओपरेशनल नोलेज है.

चमचा; मतबलब?

युवकः यह जो फा इ व इन वन है वह विजाणु उपकरन है मतलब कि, इलेक्ट्रोनीक इक्वीपमेंट. उसको चलाना मुझे आता है. मतलब ओपरेशनल ग्यान मुझे है.

ऐसा सर्टीफिकेट मैं ला दुंगा. आपको तो सर्टीफिकेट ही चाहियेना?

भ्रष्टाचारः अरे चमचेजी, उसको परमीट हर हालतमें देना है. और लोन भी दिलवाना है. इसिलीये तो हमने बेंकोका राष्ट्रीयकरण कीया है?

चमचाः अगर यह लडका फा इ व इन वन बना नहीं पाया तो?

भ्रष्टाचारः तो हम फेक्टरीको आग लगवा देंगे और बोलेंगे सब कुछ जल गया. मशीनरी जल गयी और हिसाब किताब भी जल गये.

फिर गर हंगामा हुआ तो एक कमिटी बैठा देंगे. कमिटी कमिटी का काम करेगी और हम इसका राष्ट्रीयकरण कर देंगे.

चमचाः जैसे “जनता कार मारुती” का कीया था वैसा?

भ्रष्टाचारः ठीक वैसा ही.

सुत्रधार (शायकको); अब आयी बात समझमें? आयी न.

सहायकः बिलकुल समझमे आ गई… बात  बिलकुल समझमे आ गई… बात  बिलकुल समझमे आ गई…  

चमचा (युवकसे) जा… तुम्हारा काम हो जायेगा. (युवक खुश होते होते शीटी बजाता बजाता चला जाता है)

भ्रष्टाचारः अब और कोइ है?

एक आदमी आता है.

चमचाः बोलो आपको क्या काम है?

आदमीः मुझे महान बनना है, पैसे कमाने है और आपको मदद करना है?

चमचाः जब तुम्हे हमे मदद भी करना है तो यह काम तो आसान है.

भ्रष्टाचारः तुम क्या क्या कर सकते हो.

आदमीः मै सब कुछ कर सकता हूं. मैं कुस्ति कर सकता हूं, मारफाड कर सकता हूं. दंगा फिसाद कर सकता हुं, करवा सकता हूं, चोरी, डकैती, खून खराबा कर सकता हं. लेकिन

मुझे आपकी मदद चाहिये. हमारी रक्शा आप किजिए. 

भ्रष्टाचारः अरे भाई, तुम जैसे लोगोंकी तो हमे जरुरत पडती ही रहेती है. लेकिन तुम्हारा प्रोब्लेम क्या है?

आदमीः मेरा प्रोब्लेम यह है कि, अगर मै ये सब चिजें करु तो महान नहीं कहेला सकता.

भ्रष्टाचारः देखो, तुम खुद न करो जबतक नौबत न आवे तुम खुद पर. … तुम दुसरोंसे करवाओ. और महान बनने के लिये.. यानी कि नाम कमाने के लिये

साधु बाबा बन जाओ. पैसा कमाके और हमें मदद करते रहो. तुम भी हमें मदद करो धिरेन्द्र ब्रह्मचारीकी तरह, हम भी तुम्हें मदद करेंगे

आदमीः वो कैसे?

पहेलेतो तुम बडे महानुभावोंकी खिलाफ बोलो जो मर गये हैं. वे जवाब देनेको तो आयेंगे नहीं.

आदमीः क्या मैं विवेकानन्द की खिलाफ बोलूं?

भ्रष्टाचारः नहिं नहीं, नहीं नहीं.. अभी साले कुछलोग ऐसे है जो समाचार पत्रोमें उसके खिलाफ छापेंगे नहीं, तुम्हें बहोत पढना पडेगा उनके खिलाफ

बोलनेके लीये.

आदमी; तो क्या मैं रामचन्द्रजि और कृष्णभगवानके खिलाफ बोलुं?

भ्रष्टाचारः उनको तुम साइडमें रखो. मौका मिलने पर बोललेना. करुनानिधिकी तरह.

आदमीः तो मैं क्या करूं?

भ्रष्टाचारः महान तो हम तुम्हें बना ही देंगे. फिल्हाल तुम बिजेपी शासित रज्योंमें जाओ और वहां एक दुसरोंको झगडाओ.

हमतुम्हे सूचना देते रहेंगे.

फसादीलोग आते हैं और गाते हैं.

कोंग्रेस बोलती है अपने साथीयों के साथ्

 

आओ आवो यहां सब आवो,

गुन्डे आवो, लफंगे आवो,

चोर सब आवो, डकैती आवो,

जूठे आवो, लबाडी आवो,

गद्दारों, घुसणखोरो आवो,

मौकापरस्ती लालची आवो,

काले पैसे वाले सब आवो,

मदद हमारी करने आवो,

झगडा झगडी खूब करावो,

मारा मारी खूब करावो,

गरीबको अमीरसे टकरावो,

गांवो से शहरोंको टकरावो,

छूत अछूतका भेद बढावो,

उनको एक दूसरेसे टकरावो,

ग्यातीयोंका संमेलन योजो

एक ग्यातीसे दूसरीको टकरावो,

और बोलो, तिलक तराजु और तलवार

उसको मारो जुते चार,

दिनमें बोलो महात्माजीका नाम

रातमे करलो सुरा पान,

मूहसे बोलो अहिंसाकी बात,

चूपकेसे करलो काम तमाम

जरुर पडे इमर्जन्सी लाओ,

पूलीस तन्त्र तो है हमारा,

मिडिया को कबजेमें करलो,

दुरदर्शन तो है हमारा,

और उनसे बुलाते जाओ,

बार बार बुलाते जाओ,

गुन्डोकों हमने पकडा है,

चोरोंको हमने पकडा है

(सुत्रधार सहायकको बोलता हैः उनको किसिको पकडने का नहीं, सिर्फ बात ही फैलाने का)

करचोरोंको हमने पकडा है

काला बजारीको हमने पकडा है

(और पैसे लेके छोड देनेका

वो किसिको बताना नहीं)

येही है तो धर्म हमारा,

यही इमान हमारा है

अर्ध शतक सेयानी पांच दशकसे करते आये

यही धन्धा हमारा है,

पूरखोंसे हमने शिखा ये

धन्धा हमारा पूराना है,

समझ सको तो बात समझ लो,

यह पैगाम हमारा है

यह भरत वर्ष हमरा है,

जबतक तुम इतिहास भूलोगे (तीन दफा बोलो)  (3 times)

कौभान्ड हमारे जारी रहेंगे,

राज दिया हमको पूरखोने

यह भरतवर्ष हमारा है,

जय हो” हमरी और हमारे

आने वाले बच्चोकोभी,

जय हो हमरे पूरखोंकी भी,

यह नारा हमरा पूराना है,

समझ सको तो बात समझ लो,

यह पंजा  हमारा है,

गरीबोंकी सेवा करने को,

भारतको गरीब हि रखना है,

झोंपड पट्टी भी रखना है,

और बेकारी भी रखना है,

उन्नति भी करनी है पर भी,

पर सिर्फ हमारी करनी है,

समझ सको तो बात समझ लो,

यह पैगाम हमारा है,

यह पंजा  हमारा है,

बेंको का राष्त्रीयकरण करके

पंजा हमने फैलाया था,

युनो और ये ताशकंदमें,

करार सिमलामें हमने ही,

वीर सैनेकोने जो जिता,

वही तो हमने लुटाया है,

देशपडोशी घुसमारुका

वोटबेंक बनाया है,

समझ सको तो बात समझ लो,

ये सब नूख्शे हमारे है,

महेलोंमे भी लूट चलाके

इमरजेंसीको संवारा था,

लाखु पाठक के करोड कया,

हर्शद को हमने चलाया था,

क्वात्रोची और सेंट कीटका,

प्लान भी हमने बनाया था,

तैलगी का जो फर्जी स्टेम्पका,

किस्सा नहीं पूराना है,

फिर भी हमने सत्यम को भी,

बरसो चार संवारा है,

समझ सको तो बात समझ लो,

यह नूश्खे हमारे है,

इसीलिये तो दशकोंसे हमने

कबजेमें भारत रख्खा है,

समझ सको तो बात समझ लो,

यह पंजा  हमारा है,

यह पैगाम हमारा है,

लतिफ, पप्पू, राजन, शर्मा,

दाउद, सकील और भींदराना,

सबको हमने बनाया है,

जरुर पडी जब जब उनको,

तब हमने ही तो,

देश पडोशमें भेजा है,

हमने ही हर गांव शहरमें,

राजा बाबु बनाया है,

समझ सको तो बात समझ लो,

आतंकवाद हमारा है,

ये शासन हमारा है

और ये सियासत हमारी है,

सुत्रधारः देख लिया बंधु, यह है उनकी कमाल. ५० साल पहले भी कहते थे गरीबी हटाओ, और अब भी वही कहते है. ये लोग शासन के काबिल ही नहीं है,

उन्होने खुदकॉ करोडपति और अरबों पति कर लिया है. और गरीब वहींका वहीं रहा, झोपड पट्टीयां भी रही और कठीनाईयां भी रही,

अबये लोग किस मूंहसे बोलते है जय करो.

बाजपेयीजिने जो रफ्तार से नये काम हाथ लिये थे वो भी इन्होने बंद करवादीये या तो रफ्तार कम करवा दी. 

इतना ही नही देश आतंक वादीयोंसे त्रस्त हो गया है, महंगाई बढ गई है और बेकारी बढ रही है,

एक तरफ विकासके कामोंका ढेर है, और ये लोग जबतक एड्वान्समें पैसे मिलते नहीं तबतक करवाते नही है, दुसरी तरफ बेकारी है. ये तो ऐसी बात है कि, दूध बिगड रहा है और दहिकी कमी है. 

बेकारी और विकास के कामोंको जोडना इनलोगोंको आता नहीं है

क्योंकी इनके पास न तो द्रष्टि है न तो निष्ठा है.

इनको सिर्फ खूदकी उन्नति करनी है

तो हम १०००० साल पूराने भारत वर्ष का गौरव स्थापित करना चाहते.  जय हमें भारत माताकी करनी है बोलो

भारत माताकी की जय.

 

 सबलोग साथमें गाते है अपने नोर्मल ड्रेसमें

एक नया इतिहास रचे हम एक नया इतिहास रचे हम

धाराके प्रतिकुल नाव रखें हम एक नया इतिहास रचें हम

. . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .

———————————-

जगहः ३o‘ – ३o-‘ नौटंकी के लिये

सामग्री; ‘ – साइझ का या थोडा बडा टेबल. जिसके उपर तीन व्यक्ति बैठ सके और एक व्यक्ति उसी टेबल के उपर ठाटसे बैसे

कूर्सीयां; तीन 

कागजसे बनी टोपीयां

उसके उपर लिखो;

ढोंग्रेस, फासफुसीया, माफिया, मारफाडीया, नारदीया, ४२०, दाणचोरीया, तोडफोडीया, घुसणखोर, अलेल टप्पु, नादान, चक्रम, लबाडी, नीचकोटी, रिश्वतखोर, पेटु, देशद्रोही, लघु द्रष्टी, बेखबर पत्री,

आयारामा – गयाराम

भारतप्रेमी, देशप्रेमी, कमल, सुसंस्कृत, दूरदर्शी, यूवाशक्ति,

प्लेकार्ड बनावोः ड्राइवर, बेकसीट ड्राइवर, चमचा मंडल,

मजबूत रस्सी २००’

पात्रगण; पुरुषगण = कमसे कम १०

         महिला = कमसे कम २ (महिलाका पात्र पूरुष कर सकते है)

ज्यादासे ज्यादामें कोई मर्यादा नहीं

Read Full Post »

%d bloggers like this: