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Posts Tagged ‘दशरथ’

Rama has been lost who had walked on this earth in flesh and blood

 

खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग-)

 

राजगद्दी किसको दिया जाय? राम को या भरतको?

 

कैकेयीके पिताको आश्वस्त किया था कि पट्टराणीको अगर पुत्र हुआ तो भी कैकेयीके पुत्र का ही राज्याभिषेक होगा. अब हुआ ऐसा कि पट्टराणीको ज्येष्ठ पुत्र हुआ और कैकेयीका पुत्र ज्येष्ठ पुत्र नहीं बना. प्रणाली ऐसी थी कि ज्येष्ठपुत्र को राजगद्दी मिले. अगर एकसे ज्यादा राजकुमार है तो जनतामें जो राजकुमार सर्वाधिक लोकप्रिय हो तो उस राजकुमारकी लोकप्रियता भी राजगद्दी पानेकी प्राथमिकता थी. राम सर्वोत्तम लोकप्रिय थे. अब क्या किया जाय?

राजाका कैकेयीको (या उसके पिताको) दिया हुआ वचन और प्रजाकीय प्रणाली, इन दोनोमें किसको महत्व दिया जाय.

अगर प्रणाली को मान लिया जाय तो राजाके वचनकी किमत नहीं रहती. राजाके वचनके मूल्यका ह्रास यह भी एक महाप्रणालीका नाश था.

 

हर लडाई मीकी – माउस की

 

इस समस्यामें जिन दैवी तत्वोंकी और खेल खेलनेकी बाते कहीं है उसकी हम चर्चा नहीं करेंगे. रामको राजा बनते देखते हुए ईन्द्रादि देवों को लगा कि अगर राम राजा बन जायेंगे तो वे राजकाजमें व्यस्त हो जायेंगे तो रावणके त्राससे हमें छूडायेगा कौन? ऐसा समझकर देवोंने मंथराको बलिका बकरा (बकरी) बनाया. और उसके मनमें भरतको राजा बनानेका विचार डाला और मंथराने कैकेयीको उकसाया. वैसे तो कैकेयी का कोई कसुर नहीं था. लेकिन दैवी शक्तियोंके सामने वह बेचारी क्या करे? ऐसा कारस्तान देवताओंने रचा. यह सब बकवास है.

 

कैकेयीने जो ईच्छा प्रगट की, और जो आचरण दिखाया वह उसका हक्क था. लेकिन ज्यादातर पुराण कथाकारोंको  यह असुर, दैत्य, राक्षस, दानवोंका ब्रह्माजी, शिवजी आदिकी तपस्या करके वर पाना फिर देवोंको परेशान करना और आखिर ईन मीकी-माउस समकक्ष युद्धमें विष्णु, शिव, गणेश, शक्तिमाता, कार्तीकेय इत्यादिका देवोंके पक्षमें संमिलित होना और युद्ध करके इन राक्षसी शक्तिओंको हराना ऐसा व्यवहार कायम रहा है. यह एक अलग ही विषय है.

 

संभव है कि दशरथ और मंत्रीमंडल दोनोंने मिलके यह रास्ता निकाला हो कि जिससे प्रणाली, जनताकी ईच्छा और राजाके वचन ये तीनोंको यथा योग्य सन्मान मिले. उस हिसाबसे रामको १४ साल वनवास मिले ताकि भरत निश्चिंत रुपसे राज कर सके.

 

रामको वनवास क्यों?

रामको वनवास इसलिये कि राम लोकप्रिय थे. और अगर जनता रामके लिये सडकपर उतर आवे, तो भरतको राजगद्दी छोडनी न पडे. रामके वनवासके समय दरम्यान, भरत जनताका प्रेम हांसिल कर ले सकता है.

 

रामके साथ सेना भी नहीं. क्यों कि अगर वही सेनासे राम शुरुआतमें दुसरे मुल्कोंको जितके बादमें राम या उसकी संतान अयोध्या पर भी कबजा कर ले तो!

 

रघुवंश या तो उस समयके राजा मनमानी नहीं कर सकते थे. राजाने अगर वचन दिया तो निभाना पडता था. प्रणालीयोंका पालन करना पडता था. जनताकी बात को मानना पडता. रामने दशरथकी बात कबुल कर ली.

 

लक्ष्मणको तो रामके साथ ही रहेनाका था.

 

सीताने भी सोचा होगा कि, जो पुराने टाईपके और अटपटे धनुषका उपयोग करनेमें भी माहिर है, वह वनवास के समय दरम्यान भी चूप बैठेगा नहीं. तो रामके उपर नजर तो रखना पडेगा. शायद सीता और लक्ष्मणकी पत्नी उर्मिला दोनोंने मिलके निर्णय लिया होगा. सीता जो है वह राम और लक्ष्मण पर नजर रखेगी, कि ये दोनों कहीं दुसरी शादी न कर ले. और उर्मिला अयोध्यामें क्या होता है, उसके उपर नजर रखेगी.

 

वैसे रामायण, कई सारे चमत्कारोंसे, दंतकथाओंसे, भगवानोंसे और प्रक्षेपोंसे भरपूर है. पहेलेसे ही कई सारे राक्षसों की हत्या, आकाशमेंसे पुष्पवृष्टि करना, अह्ल्याका उद्धार, देवताओंका अयोध्यामें आना, विष्णुके अवतार रामके साथ साथ, लक्ष्मी (सीता), शेषनाग (लक्ष्मण), शिव (हनुमान), ईन्द्रादि देवोंका पृथ्वी पर जन्म लेना, इत्यादि… जैसे कि अगर  कोई मंत्री कोई  प्रदेशमें जाता है तो साथमें अपनी मंडळी अथवा और सीक्योरीटी ले जाता है, और यजमान प्रदेशका समकक्ष मंत्री प्रोटोकोल निभाता है. इन सबकी चर्चा करना व्यर्थ है.

 

शुर्पणखा और राम-लक्ष्मण

 

राम लक्ष्मण और सीता, पंचवटीमें रहेते है. राम हमेशा अपनेको साम्राट भरतके प्रतिनिधिके रुपमें प्रस्तुत करते है. और यथा योग्य वनवासीयों कि सुरक्षा करते है.

 

रावणकी बहेन शुर्पणखा

 

एक दिन घुमते घुमते शुर्पणखा पंचवटी आती है और रामके रुपसे मोहित हो जाती है. वह रामको शादीके लिये प्रपोझ करती है. राम तो आदर्श पुरुष है. एक पत्नी रखनेमें ही मानते है. इसलिये राम शुर्पणखाको सूचन करते है कि वह लक्ष्मणसे प्रपोझ करें.

 

शुर्पणखा लक्ष्मण के पास वह जाती है तो लक्ष्मण उसको रामके पास जानेको कहेता है. ऐसा बारबार होता है. इस ईव-टीझींगसे शुर्पणखा गुस्से हो जाती है. इन दोनोंको मारने के लिये आती है. लक्ष्मण उसकी नाक और कान काट लेता है.

 

यह बात सचमुचमें नाक और कान काटनेकी नहीं होगी. शुर्पणखाके नाक कानसे ईजाग्रस्त हुई होगी. नाक और कान को काटलेना तो जघन्य अपराध है. शादी के लिये प्रपोझ करना कोई अपराध नहीं है. और स्त्रीका तो इस तरह टीझींग (परेशान)  करनेसे गुस्सा करना उसका अधिकार है. वह तो रावण की बहेन है. अगर हमारे इस जमानेमें मंत्री महोदयका लडका ट्राफिक पुलिसको मारपीट करने पर उतर आता है, तो शुर्पणखा क्या कुछ नहीं करती? शुर्पणखा, रावणके पास जाके राम लक्ष्मणके खिलाफ फरीयाद करती है.

 

सीता हरण

सीता हरण क्या होगा? एक पाठके अनुसार, सीता खुद लंका चली गई थी. एक पाठ के अनुसार सीता रावणकी पुत्री थी. और कई पाठोंके अनुसार रावण सीताका हरण कर गया था.

सुवर्ण मृगकी बात आती है. मरिची जो रावणका मामा था. वह अपनी मायावी शक्तिसे सुवर्ण मृग बन जाता है. सीताको लुभाता है. बहुरुप धारण करना एक कला है.

सीता रामको वह मृग लानेके लिये कहेती है. मरीची रामको दूर दूर ले जाता है. फिर राम उसको तीर मारते है, तो वह रामकी आवाजमें लक्ष्मण लक्ष्मण ऐसी आवाज देता है.

 

लक्ष्मण एक रेखा खींचके सीताको कहेता है कि इसका उलंघन न करना. लेखकोंने इसको नाटकीय बनाया है. हो सकता है कि वह एक सीमा हो, जिसके अंतर्गत सीता पर नजर रक्खी जा सके. या तो ऐसा कुछ हो ही नहीं. ऐसे ही लक्ष्मण चला गया हो.

रावण साधु के रुपमें आता है और भिक्षा मांगता है. इसमें भी नाट्यकरण है. सीता पैर उठाती है. रावण पैर पकडके खींच के सीताको उठा लेता है.

 

राम तो विष्णु भगवान है. सीता तो साक्षात लक्ष्मी है. सीता वल्कल पहेनी हुई है. रावण इस सीताको उसकी टांग पकडके अपने कंधेपर उठा लेता है. जो रावण, शिवका धनुष उठा भी नहीं पाया था, सीता उस शिवके धनुषके साथ बचपनमें खेलने लगी थी. उस सीताको रावण उठा लेता है. सीता इतनी बेबस और निर्बल कैसे? लक्ष्मी की ऐसी अवमानना कैसे?

 

किसीको भगवान बनानेमें है मुसिबतें

 

जब किसी मनुष्यको भगवान और किसी स्त्रीको देवी या महादेवी बना देते है तो ऐसी मुसबतें पैदा होगी ही.

 

इसको कैसे दुर किया जाय?

हमारे लेखकोंने या धर्मगुरुओंने इसका उपाय खोज रखा है.

 

अरे भाई, ये सब तो भगवानकी लिला है. भगवान तो संकल्प मात्रसे सबकुछ कर सकते है. लेकिन उनको लीला भी करनी है. इसलिये वे ये सब करते है.

 

अरे भाई लीला तो लीला, लेकिन भगवानकी ऐसी कैसी लीला है, कि, लक्ष्मी देवी की इज्जत चली जाय? भगवानने अपनी पत्नी लक्ष्मीकी बेईज्जती क्यों होने दी?

 

इसका भी जवाब है. देखो. जब राम वनवासके लिये निकले तो लक्ष्मीजी वैकुंठ वापस चली गई. रामके साथ जो सीता गई, वह कोई साक्षात लक्ष्मी नहीं थीं. वह तो लक्ष्मी की छाया थी. लक्ष्मीजी तो रामके पास अपनी छाया छोडके गई थीं. वह कोई सचमुच लक्ष्मी थोडी थी! वह तो छाया लक्ष्मी थी. इति सिद्धम्‌.

 

तो फिर हुआ क्या था?

बस ईतना हि समझ लो कि, सीता लंका पहुंच गई

 

रावणको सीतामें कोई चाहना थी? रावण क्या सीतासे शादी करना चाहता था? रावणने सीता पर अत्याचार किया था?

 

ऐसा कुछ नहीं था. रावणको सीतामें कोई रस नहीं था. न तो वह सीतासे शादी करना चाहता था न तो वह सीताको परेशान करना चाहता था. जिस रावणको कौशल्यामें रस नहीं था, उसको सीतामें कैसे रस हो सकता है? जो रावण कैशल्या और दशरथका हरण कर सकता है और बादमें  छोड भी सकता है, उसको सीतामें कोई रस नहीं हो सकता. कई पुरुषोंमें ऐसी प्रकृति होती है कि, वे स्त्री पर दबाव डालना चाहते नहीं है. रावण तो रामका सिर्फ अपमान करना चाहता था. वह उसने कर दिखाया. उसने अपनी बहेन पर किया हुआ “ईवटीझींग” का जवाब दे दिया. रावणने सीताको अशोकवाटिकामें छोड दिया. मजाकका जवाब दुगुनी मजाकसे दे दिया.

 

रामका अपमान तो होई गया.

 

लेकिन राम कोई कम नहीं थे.

(क्रमशः)

 

शिरीष मोहनलाल दवे

 

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खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग-३)

दशरथ राजा

वैवस्वतः मनु (सूर्यवंश) के बादके ६३ क्रमके राजा दशरथ (दशरथ-२)का प्रथम पुत्र रामचन्द्रजी थे. हम चाहे मनवन्तर-७ को माने या न माने, रामके पिताका नाम दशरथके अस्तित्वको न माननेका कोई कारण नहीं. सभी पुराणोंमे जो क्रम दिया है वह मुख्यतः समान है. कुछ राजाओंके नाम अलग मिलते है, लेकिन फिर पुत्रके नाम सही मिलते है. एक राजा दो नामसे जाना जा सकता है.

अयोध्या को नकारना भी जरुरी नहीं है.

दशरथने कैकेयीसे शादी की. कैकेयी केकेय देशकी थी, इस लिये “कैकेयी” नामसे जानी जाती थी. केकेय प्रदेश अयोध्याकी पश्चिम दीशामें लम्बी मुसाफरी के बाद, कुरुक्षेत्रको पसार करने के बाद भी कई सारी नदीयोंको पार करने के बाद आता है. उस जमानेमें तेज गतिसे दौडने वाले अश्वोंके बावजुद, सात दिन लगते थे. केकेय के बाद गांधार आता था. केकेय हालके पाकिस्तानमें होना चाहिये.

दशरथको दो रानीया थी लेकिन कोई पुत्र नहीं था, इसलिये उसने एक और शादी की. दशरथने केकेयकी राजकन्या पसंद की थी. इससे ऐसे निष्कर्ष पर जा सकते है कि, भारतीय संस्कृति उस समय भी गांधार तक विस्तृत थी.

वैसे तो ईशु की पहेली सदी तक हिन्दु राजाएं ईरान तक राज करते थे. रावण का भाई कुबेर पूर्वोत्तर (ईशान) सीमामें राज करता था, मतलब यह हुआ कि, आज हम जिसको अखंड भारत मानते है, उससे भी बडे विस्तारमें भारतीय संस्कृति फैली हुई थी.

कैकेयी के साथ शादी करनेके बाद भी दशरथको कोई संतान नहीं होती है. दशरथ पुत्रेष्टी यज्ञ करता है.

पुत्रेष्टी यज्ञ क्या था?

वास्तवमें यह एक उपचार हो शकता है. आयुर्वेदमें दूध चावल और सर्कराका नीत्य सेवन, पुत्र प्राप्तिका एक उपचार माना गया है. यज्ञ भी हुआ होगा. शायद वह खीरके नीत्य सेवनके उपचारका  आरंभ या पूर्णाहुतिका हो. उपचारकी क्रिया को भी यज्ञ कह सकते है. कोई भी कार्यको यज्ञ कह सकते है.

सभी रानीयां गर्भवती हुई. सुमित्राको लक्ष्मण और शत्रुघ्न हुए. कौशल्याको राम हुए. कैकेयीको भरत हुआ. सबसे बडे राम थे. दुसरे क्रम पर भरत. तीसरे क्रम पर लक्ष्मण और चौथे क्रम पर शत्रुघ्न.

राम-लक्ष्मण और भरत-शत्रुघ्न इस प्रकार जोडी भी बनी थी ऐसा कहा जाता है.

ऐसा क्युं था?

शायद प्रारंभसे ही यह बात निश्चित नहीं थी कि, दशरथका अनुगामी राजा किसको बनने का था?

रामका राज्याभिषेक करनेका था या भरतका राज्याभिषेक करनेका था?

तीनों रानीयोंके मनमें इसमें अनिश्चिंतता थी. कमसे कम सुमित्राके मनमें तो थी ही. क्यों कि सुमित्राने अपने एक पुत्रको रामके साथ लगा दिया था. और दुसरे पुत्रको भरतके साथ लगा दिया था. अगर राम राजा बने तो लक्ष्मणका भावी निश्चिंत बने. और अगर भरत राजा बने तो शत्रुघ्नका भावी निश्चिंत बने. और इससे खुद भी निश्चिंत रहे.

जब दशरथ केकेयके राजाके पास उसकी पुत्रीका हाथ मांगने गये तो हो सकता ही है कि उसने दशरथ से प्रश्न पूछा हो कि तुम्हे दो रानीयां तो है ही, तो तीसरी करने की क्या जरुरत पडी. तो दशरथने कहा होगा कि मुझे कोई संतान नहीं है इसलिये तीसरी शादी करनी है. केकेयके राजाने कहा भी हो, मेरी पुत्रीके पुत्रको तुम्हे राजा बनाना पडेगा. यदि कौशल्या पुत्रको जन्म दे तो भी, मेरी पुत्रीके पुत्रको राज सिंहासन पर बैठाना पडेगा. दशरथने इसका स्विकार किया था. ऐसी भी एक मान्यता है और पाठ भी है.

कैकेयी शूरवीर और मेधावती थी. वह दशरथको ज्यादा प्रिय थी. लेकिन पट्टराणी कौशल्या थी. उस समयकी प्रणालीके अनुसार पट्टराणीका पद एकबार दिया तो उसको विस्थापित किया जा सकता नहीं था.   

चारों पुत्रोंने विश्वामित्र ऋषिसे अस्र शस्त्र की विद्या प्राप्त की. विश्वामित्र कैसे आये और विश्वामित्रका दशरथ और दशरथके, मंत्रीमंडळ से क्या संवाद हुआ इसका विवरण आवश्यक नहीं. क्योंकि यह सब संवाद है. और संवादसे ऐतिहासिकताका निष्कर्ष निकाला नहीं जा सकता. प्रसंगोके क्रमसे ऐतिहासिकता पर अनुमान लगाया जा सकता है.

शिव धनुष और उसके उपर पणछ बांधना और शरसंधान करना

दक्षने एक यज्ञ किया था. जिसके यज्ञका ध्वंश शिवने किया था. शिवने वैसे इस यज्ञका ध्वंश किया नहीं था, परंतु, शिवने वीरभद्रको और भद्रकालीको उत्पन्न किया था और इन दोनोंने दक्षके यज्ञका नाश किया था. वीरभद्र का यह धनुष कालांतरे मिथीला के जनक राजाके पास आया था. ऐसी एक कहानी है. इसका विवरण हम छोड देतें है. लेकिन इतना जरुर कि वह एक बडा अदभूत धनुष था. जिसके बारे यह हो सकता है कि, उसको कैसे उठाना और उसके उपर पणछ की रस्सी कैसे बांधना और शरसंधान कैसे करना वह एक समस्या होगी.

जनकराजाकी कोई शर्त थी या नहीं?  सीता स्वयंवर हुआ था या नहीं? कौन कौन राजा आये थे? रावण आया था या नहीं?

क्या रावण सचमुच मान गया था?

एक बातकी पुष्टि होती है कि, राम एक नीपूण बाणावली थे. और उन्होने वह धनुष उठाके, पणछ बांधके सरसंधान कर दिया. अगर रामने यह काम सीता स्वयंवर के अंतर्गत किया था तो उस समय कई और कई राजा भी आये होगे. तो रावण भी होगा. ऐसे पाठ मिलते है कि रावण भी उस धनुषको उठा न पाया था.क पाठ यह भी है कि रावण जब उठा तो उसको समझाया गया कि तुम तो उम्रमें सीताके पिता समान हो इसलिये तुम न उठो तो बहेतर रहेगा. रावण मान गया था.

यदि इस बात पर शका है तो इस पाठको पढे.

१९५५में बृहद्‍ गुजरात संस्कृत विद्यापीठकी संस्कृतकी “मध्यमा” अभ्यासक्रममें एक पाठ था. “कौशल्याहरणम्‌” या तो “रावणस्य कौशल्याहरणम्‌” जिसमें रावण कौशल्याका ही नहीं लेकिन दशरथकी कौशल्याके साथ शादीके बाद कौशल्या और दशरथ, दोनोंका हरण करता है. और लंका ले जाता है. बादमें ऋषि लोग उसको समझाते है कि, अब तो कौशल्या परिणित स्त्री है, उसका हरण करना और परिणित स्त्रीके साथ लग्न करना तुम्हारे लिये वर्जित है. तो रावण मान जाता है. बादमें रावण, दशरथ और कौशल्याको एक लकडीकी टोकरीमें रखके टोकरीको समूद्रमें छोड देता है. अगर रावण, लग्नके बारेमें कौशल्याको छोड दे सकता है तो वह सीताको भी छोड सकता है.

भरतकी अनुपस्थितिमें रामका युवराज पद समारोह.

“युवराजपद समारोह” ऐसी कोई प्रणाली, दुसरी कोई जगह इतिहासमें सुनाई नहीं दी है. क्या दशरथ मुत्सद्दी था?

हमने अभी थोडे समय पहले देखा था कि भारतीय जनता पक्षने लोकसभाकी आगामी चूनावके लिये एक समितिका गठन किया और, इस चूनाव प्रचार समितिके अध्यक्ष के स्थानपर नरेन्द्र मोदीको नियुक्त किया गया. इस बातका बडा प्रचार भी हुआ. जिसको विरोध करना था उन लोगोंने विरोध किया. जिसको रुसवाना था उन लोगोंने रुसवाई की. इन लोंगोंकी शक्तिका नाप हो गया. जनशक्तिका भी पता लग गया.

दशरथने रामकी युवराजपदकी घोषणाके लिये अपना समय सुनिश्चित किया. जब भरत अपने नानाके यहां गया था तबका समय उसने युवराजपद समारोह के लिये चूना. दशरथकी धारणा थी कि शायद भरत ही विरोध प्रगट करेगा. कैकेयी कुछ विरोध प्रगट नहीं करेगी. जनता भी कोई विरोध नहीं करेगी इसलिये नानाके घरसे वापस आनेके बाद, भरतको भी जनताकी ईच्छाको मानना पडेगा.

कैकेयीको दशरथने दो वर मांगनेको कोई एक समय कहा था. इसमें दो प्रकारके पाठ है. जब दशरथ राजा असुरोंके सामने सुरोंके युद्धके समय सुरोंको मदद करने के लिये गये थे तब कैकेयी दशरथकी सारथी बनी थी. असुरोंने दशरथ पर जमकर आक्रमण किया, तो कैकेयीने इस आक्रमणसे दशरथको बचानेके लिये रथको भगाकर ले गई थी और दशरथ को बचा लिया था.  दुसरी कथा यह है, दशरथके रथका एक पहिया उसके धरीकी ठेसी निकल जानेकी वजहसे धरीसे निकलजानेवाला था, तब कैकेयीने अपनी उंगली रखके पहियेको निकले नहीं दिया. कैकेयीकी उंगली ईजाग्रस्त हो गई या कट गई थी. दशरथने इस कारण कैकेयीको दो वरदान दिये थे.

केकेय एक सीमावर्ती प्रदेश था. विदेशी आक्रमण का प्रथम भक्ष्य सीमावर्ती प्रदेश बनते है. हो सकता है कि, कैकेयी वीरांगना हो. इसलिये उसके पिताने उसके पुत्रको ही राजगद्दी मीले ऐसा दशरथसे वचन लिया हो. लेकिन एक बात यह भी है कि, प्रणाली ज्येष्ठपुत्रको ही राजगद्दी मिले ऐसी थी.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे,

टेग्झः

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खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग-२)

रामके बारेमें कई पुस्तक लिखे गये है. उत्तर राम चरित्र, रघुवंश, वाल्मिकी रामायण और तुलसी रामायण. कदम्ब रामायण, और कई है जो सब १२वीं सदीके बादमें लिखे गये. इनमें वाल्मिकी रामायण और तुलसी रामायण मुख्य है जिसकी पारायण (सह वाचन श्रवण) की जाती है. महाभारतमें भी रामकथा है.

इसमें विशेष रुपसे रामको विष्णुका अवतार माना गया है. जब एक व्यक्तिको भगवान मानके उनका जीवन लिखा जाता है तो चमत्कार सामेल करने ही पडते है.

अब हम इन चमत्कारोंको छोड कर रामका सच्चा स्वरुप कैसे समझे?

ऐसी कौनसी कौनसी घटनाएं है जिनको हम नकार नहीं सकते. ऐतिहासिकता के निरुपण के लिये घटनाओं का महत्व और घटनाका घटना किस आधार पर हो सकता है उसके उपर ज्यादा सोचना चाहिये. संवाद, मनुष्यके बारेमें किया वर्णन, स्थळोंका वर्णन, प्रसंगका वर्णन इन सब बातोंका संबंध कला-साहित्य और लेखककी खुदकी पसंदगी का है. ऐतिहासिक तथ्योंसे ज्यादा नहीं.

चलो हम घटनाएं क्या घटी, उसका क्या आधार, संदर्भ और तथ्य हो सकता है ये सब देखें और समझे.   

वैवस्वतः वंश और राजाओंकी सूचि और दशरथका स्थान, दशरथ अयोध्याका राजा था.

दशरथको दो रानीयां थी कौशल्या, सुमित्रा

दशरथको कोई पुत्र नहीं था,

दशरथने एक और शादी की. यह तीसरी रानी कैकेयी थी जो गंधारके राजाकी पुत्री थी,

दशरथने पुत्रेष्टी यज्ञ किया,

तीनों रानीयोंने संतानको जन्म दिया,

कौशल्याने राम, कैकेयीने भरत, सुमित्राने लक्ष्मण और शत्रुघ्न को जन्म दिया  

चारों पुत्र विश्वामित्रके आश्रममें पढने गये,

जनक राजाने अपनी पुत्री सीताके लिये स्वयंवर रचा,

जनक के पास एक धनुष्य था. स्वयंवर की शर्त यह थी कि, धनुष्‌के उपर बाणको ठीक तरहसे चढाना था,

स्वयंवरमें कई राजा आये थे.

राम सफल हुए.

रामका सीतासे लग्न हुआ.

दुसरे भाईओंका भी लग्न हुआ,

रामका युवराजपद समारोह घोषित होता है, भरत और शत्रुघ्न उपस्थित नहीं है

कैकेयी विरोध करती है,

राम, सीता और लक्ष्मण वनवास के लिये जाते है,

भरत गांधारसे वापस आता है,

रामके पास जाता है, राम अयोध्या वापस नहीं जाते है,

भरत अयोध्या वापस जाता है,

राम सीता और लक्ष्मण पंचवटीमें समय पसार करते है,

शुर्पणखाका, राम और लक्ष्मण का प्रसंग,

शुर्पणखा ईजाग्रस्त,

रावणका आना और सीता और रावणका लंका जाना,

राम-लक्ष्मण और हनुमान-सुग्रीव का मिलन,

रामका वाली वध,

राम-लक्ष्मण और वानरसेना का लंका प्रयाण,

राम रावण युद्ध,

रावणकी पराजय,

रामका विभीषणका किया राज्याभिषेक,

सीताकी परीक्षा (?)

रामसेनाका अयोध्या जाना,

रामका राज्याभिषेक,

सीता सगर्भा,

रामका सीता त्याग,

सीताका वाल्मिकी आश्रममें पलना,

लवकुशका जन्म,

रामायण का लिखा जाना और जनतामें प्रचार प्रसार,

रामका राजसुय यज्ञ,

अश्वका वाल्मिकीके आश्रममें जाना,

सीताकी परीक्षा,

सीताका धरती प्रवेष,

रामके पास दुर्वासाका आना,

लक्ष्मणका देशत्याग,

रामकी मृत्यु (परलोक गमन)

चलो इन प्रसंगोमेंसे इतिहासका निस्कर्ष करें और रामकी और उनके वंशकी महानता समझें. (क्रमशः)

 राम दरबार

शिरीष मोहनलाल दवे,

टेग्झः

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खो गये है हाड मांसके बने राम (भाग-१)

एक ऐसे राम थे जो रघुवंशी दशरथ राजाके पुत्र थे और हाडमांसके बने हुए मात्र और मात्र मनुष्य थे. वैसे तो वे एक राजपुत्र और काबिल राजा जरुर थे, लेकिन उनकी अद्वितीय महानता और आदर्श के कारण उनको हमने भगवान बना दिया. और भगवान बना दिया तो वे एक वास्तविक और ऐतिहासिक पात्र नष्ट हो कर एक काल्पनिक पात्र बन गये. और इसके कारण राम की बात करना एक धर्मकी बात करना और सफ्रोन (भगवा ब्रीगेड)की बात करना बराबर हो गया है.

अगर आप रामको भगवान मानो तो इसमें रामका क्या अपराध है?

रामको भगवान मानने वाले चमत्कारमें भी मानते है. रामने कई चमत्कार किये जो कोइ भी मनुष्य देहधारी नहीं कर सकता, इसीलिये राम मनुष्य हो ही नहीं सकते, और इसीलिये राम भगवान ही होने चाहिये.हमने उनको भगवान मान लिया इसीलिये राम धर्मका ही विषय बन गये. राम, धर्मका विषय बन गये इसीलिये वे श्रद्धाका विषय बन गये. राम भारतकी भाषाओंमे वर्णित है इसीलिये वे भारतके है. और भारतमें हिन्दु धर्मको माना जाता था और माना जाता है इसीलिये राम हिन्दुओंके भगवान है. और हिन्दुओंके भगवान है इसीलिये हिन्दुओंकी श्रद्धाका विषय है. और हिन्दुओंकी श्रद्धाका विषय है और हिन्दुओंका भगवान है इसीलिये ये सब बातें काल्पनिक है. काल्पनिक बातोंमें विश्वास रखना अंधश्रद्धा है. समाजमें अंधश्रद्धाको बढावा नहीं देना चाहिये. जो लोग खुदको रेशनल मानते है, वे ऐसा सोचते है.

राम मंदीरके लिये आग्रहीयोंका विरोध करने वालोंकी यही सोच है.

बडे बडे विद्वान और बुद्धिमान लोग भी रामको काल्पनिक पुरुष मानते है.

इसका मूख्य कारण यह है कि प्राचीन और मध्यकालिन भारतीय पुस्तकोंमे चमत्कारकी कई सारी बाते हैं और ये सब कपोलकल्पित है. सब बकवास है ऐसी मान्यता अपनेको ज्ञानी और तटस्थ समझने वाले लोग रखते है.वैसे तो हर धर्मके पुस्तकमें चमत्कारकी बातें लिखी हुई है. लेकिन उन धर्मोंके सभी महापुरुष ऐतिहासिक है. क्यों कि ये सब २६०० वर्षके अंतर्गत हुए. और इनके कुछ कुछ अवशेष मिल जाते हैं ऐसा माना गया है, इसलिये चमत्कारी बातें होते हुए भी वे सब ऐतिहासिक व्यक्ति है.

रामके प्राचीन अवशेष मिलते नहीं है. और जो भी मिलते है वे रामके संबंधित है ऐसा मानना अंधश्रद्धा है ऐसि मानसिकता स्थापित है. रामके प्राग्ऐतिहासिक अवशेष वैसे तो मिलते है, लेकिन उन अवशेषोंको रामके जमानेके या रामके संबंधित माने नहीं जाते हैं. इसके पीछे (आर्यन ईन्वेझन थीयेरी = आर्यजातिका भारत पर आक्रमण और फिर यहांके द्राविड और दस्युजातिकी पराजय और उनका पीछे दक्षिण दीशामें जाना) से अधितर्कका स्विकार है.

वैसे तो यह अधितर्क बिलकुल तर्कहीन और विरोधाभासोंसे भरपूर है, और अब तो यह अधितर्क निराधार और अस्विकृत माना भी जाता है तो भी जो मानसिकता बनी हुई है, वह अभी भी स्थापित है.क्या ऐतिहासिकता का आधार सिर्फ पूरातत्वके अवशेष ही हो सकते है? अगर उत्खनन किया नहीं है तो क्या मानोगे? अगर बाबरी ढांचाके नीचे उत्खनन नहीं हुआ होता और उसके नीचेसे जो विविध स्तर पर विभीन्न अवशेष मीले वह नहीं मिलते तो यही माना जाता कि नीचे कुछ अलग संस्कृति थी ही नहीं. मान लिजीये अगर उन स्तरोंसे भारतीय संस्कृति पर कुछ प्रकाश पडने वाला था, तो क्या होता?

मान लिजीये मोहें जो दडो का उत्खनन नहीं होता तो?

वास्तवमें हमें पुस्तकस्थ विवरणोंको महत्व देना ही पडेगा. उनकी अवगणना नहीं की जा सकती.हमारे पुराणोंको और महाकाव्योंको सिर्फ कपोल कल्पित मानके, उनको भी तिहासका एक हिस्सा मानना पडेगा. यह बात जरुर है कि उनमें कुछ चमत्कारिक बातें है, ईश्वर (रुद्रशिव), भगवान (सूर्यविष्णुब्रह्मा) और देवताओं (ईन्द्र, वायु, आदि)की बातें है. लेकिन ये सब तो तिहासके पुरुषोंकी बातोंको ज्यादा रसप्रद बनानेके लिये संमिलित किया गया है.

जैसे कोई पुस्तकमें वार्तालापोंके शब्दप्रयोगस्थलोंके वर्णनके शब्दप्रयोग, वस्त्रोंके वर्णनके शब्दप्रयोग आदि अक्षरसः वही शब्दोंका प्रयोग हुआ होगा ऐसा नहीं होता है. जैसे मैथिली शरण गुप्तने कोई संवाद लिखा है जिसमें सम्राट अशोक और उसकी पत्नी तिष्यरक्षिताके बीचमें कलिंगके युद्धको ले के संवाद जो वर्णित है, वह भी हुआ हो या अक्षरसः वह भी हो. लेकिन हम अशोककी और उसके कलिंगके युद्धकी ऐतिहासिकताको  नकार नहीं सकते. अशोकके पिताका नाम बहुतेरे पुस्तकोंमें बिंबिसार लिखा हुआ है. तो हम बिंबिसारकी ऐतिहासिकताको नकार नहीं सकते.

महाकाव्योंको अगर छोड दें, तो भी सभी पुराणोंमें रामका उल्लेख है. उसके पिता दशरथका भी उल्लेख है. दशरथके पिताका भी उल्लेख है. उतना भी नहीं पूरे वंशके राजाओंका उल्लेख है. और सभी पुराणोंमें समानरुपसे ही है. ये सब पुराण एक साथ नहीं लिखे गये हैं.पुराण सतत लिखते ही गये थे. अलग अलग जगह और अलग अलग समय पर लिखाते गये थे. कमसे कम ईसा पूर्व चौथे शतकसे ईसा की सातवीं सदी तक अनेकानेक पुराणोंमे लिखना चलता रहा था.

विश्वमें कई ग्रंथोमें ऐसा लिखना चलता रहा है.

सबसे पुराना पुराण वायु पुराण है.

वायु पुराण सबसे ज्यादा पुराना क्युं हैवैसे तो वायुपुराण के छः पाठ मिलते है. सर्वप्रथम पाठकी संस्कृतभाषा पुरी पूर्वपाणीनीकाल की है. बादमें उसमें कई प्रक्षेप होते गये और अध्याय बडे भी होते गये और बढते भी गये.इस पुराणमें बुद्ध भगवानका उल्लेख नहीं है. विष्णुके दशावतारकी बात है. लेकिन रामका नाम वे दश अवतारोंकी सूचीमें नहीं है. रामका एक पराक्रमी राजाके रुपमें उल्लेख है. रामके पिता दशरथका भी उल्लेख है. दशरथको भी पराक्रमी राजाके रुपमें उल्लेख है. पुरे सूर्यवंशके राजाओंकी नामावली है.

रामके बारेमें क्या लिखा है?

रामके बारेमें संक्षिप्तमें लिखा है. बलवान राजा दशरथके पुत्र रामने लंकाके रावणको हराया.

वैसे तो कृष्ण भगवानका भी उल्लेख है. कृष्णको तो विष्णुके अवतार तो माना ही है.

कृष्ण के बारेमें एक अध्यायका हिस्सा है.

लेखकने, श्यामंतक मणी जो खो गया था और कृष्णके उपर इस बातको लेकर जो आरोप लगा था और कृष्णने इस आरोपको कैसे दूर किया था इस  प्रसंगको वर्णित किया है.

एक पन्नेमें यह बताया है कि, वसुदेवके किन किन पुत्रोंको (पुत्रोंके नाम भी दिये है) कंसने मार डाले थे. और इसलिये कृष्ण के जन्मके पश्चात, वसुदेव इस कृष्णको अपने मित्र नंदके यहां छोड आते है. इसमें कोई चमत्कार वर्णित है कोई कारावासकी बात है, न कोई यमुनाके पूरकी कोई बात न और कोई लंबी बात है.

दुसरी विशेषता इसमें यह है कि, बलरामको विष्णुका अवतार बताया गया है.

तीसरी महत्वपूर्णबात यह है कि कई श्लोकोंमें ब्रह्मा विष्णु और रुद्र के बदले ब्रह्मा विष्णु और अग्नि ऐसा लिखा गया है. इसका प्रारंभ भी, महेश ईशान (रुद्र) की स्तूति से होता है.

वेदोमें अग्निका एक नाम ईशान भी है. महो देव (महः देवः अर्थात्महो देवो जैसे कि सो महो देवो मर्त्यां आविवेश) भी अग्निका नाम है. कहेनेआ तात्पर्य यह है कि अग्नि, रुद्र, और शिवकी एक रुपता वायुपुराणमें सिद्ध होती है.ऐसी कई बातें है जिससे वायु पुराणकी प्राचीनता सिद्ध होती है.(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे,

टेग्झः

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