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नरेन्द्र मोदीको क्या बनना चाहिये? कौटिल्य अथवा पृथ्वीराज चौहाण?

कौटिल्यकी विशेषता क्या थी और पृथ्वीराज की विशेषता क्या थी?

Narendra Modi has to decide
कौटिल्यः
कौटिल्यमें दुश्मनको पहेचानने की प्रज्ञा थी.
कौटिल्य दुश्मनको कभी छोटा मानता नहीं था,
पडौसी देश दुश्मन बने ऐसी शक्यता अधिक होती है इस लिये उसकी गतिविधियों दृष्टि रखनी चाहिये क्योंकि वह प्रथम कक्षाका दुश्मन बननेके काबिल होता है.
दुश्मनको कभी माफ करना नहीं चाहिये,
ऐसा क्यों?
क्योंकि राष्ट्रहित सर्वोपरी है.

पृथ्वीराज चौहाण
पृथ्वीराज चौहाण भी एक देशप्रेमी राजा था. लेकिन वह दुश्मनके चरित्रको समझ नहीं पाया. उसने मुहम्मद घोरीको फेली बार तो हरा दिया, किन्तु बिना ही उसके चरित्रकी जांच किये भारतीय प्रणालीको अनुसरा और उसको क्षमा प्रदान की. वही मुहम्मद घोरीने फिरसे आक्रमण किया और पृथ्वीराज चौहानको हराया और उसका कत्ल किया. अगर पृथ्वीराज चौहाणने मुहम्मद घोरीको माफ किया न होता तो भारतका इतिहास अलग होता.
कौटिल्यने क्या किया था.
पोरस राजा देश प्रेमी था. उसने सिकंदरसे युद्ध किया. कुछ लोग ऐसा बताते है कि सिकंदरने पोरस को पराजित किया था. और सिकंदरने पोरसकी वीरताको देखके उसए संधि की थी. लेकिन यह बात तथ्यहीन है. वीरताकोई भारतका एकआधिर नही था. वीर योद्धा हरेक देशमें होते है. सिकंदर अनेकोंको जितता आया था लेकिन जो राजा हारे थे उनके साथ और उनकी जनताके साथ, उसका हमेशा आतंकित व्यवहार रहा था. पोरसने सिकंदरको संधिके लिये विवश किया था.और सिकंदरको हतप्रभः किया था.
सिकंदरके बाद सेल्युकस निकेतर सिकंदरकी तरह ही विश्वविजय करनेको निकला था. उस समय पोरसके बदले उसका भतिजा गद्दी पर था. उसने बीना युद्ध किये सेल्युकसको भारतमें घुसनेका रास्ता दे दिया. सिकंदर तो धननंदकी विशाल सेनासे ही भयभित हो गया था. लेकिन सेल्युकसने मगध पर आक्रमण कर दिया. जो सम्राट विश्वविजयी बनके आया था वह मगधके चन्दगुप्त मौर्यके सामने बुरी तरह पराजित हो गया. किन्तु ये सब बातें छोड देतें है.
कौटिल्यने क्या किया. पोरसके भतीजेको हराया. उसने लाख क्षमाएं मांगी लेकिन कौटिल्यने उसको क्षमा नहीं किया और उसको हाथीके पैरके नीचे कुचलवा दिया. पोरसका भतिजा तो जवान था, वीर था, उसके सामने पूरी जिंदगी पडी थी. वह देशप्रेमी पोरस राजाकी संतानके बराबर था, अगर कौटिल्य चाहता तो उसको क्षमा कर सकता था किन्तु कौटिल्यने उसको क्षमा नहीं किया. क्यो कि जो देशके साथ गद्दारी करता है उसको कभी माफ किया नही जा सकता.

यदि आप इतिहासको भूल जाते है तो उसका पुनरावर्तन होता है.
साम्राट अकबरको आते आते तो भारतके मुस्लिम हिन्दुओंसे हिलमिल गये थे. जैसे हुण, शक, पहलव, गुज्जर हिन्दुओंसे मील गये थे. भारतके मुस्लिम भी उसी स्थितिमें आ गये थे. कोई लाख नकारे तो भी यह एक सत्य है कि मुघलयुग भारतका एक स्वर्णयुग था. इसमें औरंगझेब जैसा कट्टर मुस्लिम भी लंबे समय तक अपनी कट्टरताका असर रख पाया नहीं था.
मुघल बहादुरशाह जफर जिसके राज्यकी सीमा सिर्फ लालकिलेकी दिवारें थी उसके नेतृत्वमें हिन्दुओंने और मुस्लिमोंने १८५७का विप्लव किया. पूरे भारतके हिन्दु और मुस्लिम राजाएं उसका सार्वभौमत्व स्विकारने के लिये कृतनिश्चयी थे.
ऐसा क्यों था?
क्यों कि हिन्दुओंके लिये धर्म तो एक ही था जो मानव धर्म था. आप ईश्वरकी मन चाहे तरिकोंसे उपासना करें या न भी करें तो भी हिन्दुओंको कोई फर्क पडता नहीं था. (हिन्दु यह भी समझते हैं कि ईश्वरको भी कोई फर्क पडता नहीं है).
मुस्लिम लोग भी परधर्म समभाव ऐसा ही समझ रहे थे. आज भी देखो, ओमानका सुल्तान काबुस सच्चे अर्थमें हिन्दुओं जैसा ही धर्म निरपेक्ष है. हां एक बात जरुर है कि वह विदेशीयोंको अपने देशकी नागरिकता नहीं देता है. चाहे वह हिन्दु हो या मुस्लिम. क्यों कि देशका हित तो सर्वोपरी होना ही चाहिये. जो लोग ओमानमें पहेलेसे ही बसे हुए हैं वहांके नागरिक है उसमें हिन्दु भी है और मुस्लिम भी है. इस लिये ऐसा मानना आवश्यक नहीं कि, सारे विश्वकी मुस्लिम जमात अक्षम्य है.

लेकिन भारतमें क्या हुआ?

अंग्रेजोंने खुदके देशके हितके लिये हिन्दु मुस्लिमोंमें भेद किये. सियासती तौर पर जीन्नाको उकसाया. नहेरुका भी कसुर था. नहेरु सियासती चालबाजीमें कुछ अधिक ही माहिर थे.
महात्मा गांधी के पास सबसे ज्यादा जनाधार था.

महात्मा गांधी के पास निम्न लिखित विकल्प थे
(१) अभी स्वतंत्रताको विलंबित करो, पहेले देशको और नेताओंको व्यवस्थित करो.
किन्तु यह किसीको भी स्विकार्य नहीं था. क्यो कि कोमी हिंसा ऐसी भडक उठी थी कि
नजदिकके भविष्यमें वह बीना विभाज किये शक्य ही नहीं थी.
(२) देशको फेडरल युनीयनमें विभाजीत करो जिसमें होगा पाकिस्तान, हिन्दुस्तान. ये दो देश संरक्षण और विदेशी मामलेके सिवा हर क्षेत्रमें स्वतंत्र होंगे. फेडरल युनीयन का हेड कोई भी हो.
नहेरुको यह स्विकार्य नहीं था क्यों कि उनको जीन्नाको चपरासी के स्थान पर रखना भी स्विकार्य नहीं था.
सरदार पटेलको और महात्मा गांधी इसके पक्षमें नहीं थे क्यों कि यह बडा पेचिदा मामला था. बहुत सारे स्थानिक राजाएं अपनी स्वायत्तता एक अलग देश की तरह ही रखना चाहते थे. ऐसी परिस्थितिमें देशमें अनेक जटिल समस्याएं उत्पन्न हो सकती है जो सदीयों तक उलझ नहीं सकती थी.
(३) फेडरल युनीयन हो लेकिन उसका नंबर वन पोस्ट पर जीन्ना हो.
नहेरुको यह स्विकार्य नहीं था. वे इस हालतमें देशके टुकडे टुकडे करने को भी तैयार थे.
(४) एक दुसरेसे बिलकुल स्वतंत्र हो वैसे देशके दो टुकडे स्वतंत्र हो. हिन्दुस्तान और पाकिस्तान. जनता अपनी ईच्छाद्वारा पसंद करें कि अपने प्रदेशको कहां रखना है ! हिन्दुस्तानमें या पाकिस्तान में?

नहेरुको यह चौथा विकल्प पसंद था. नहेरुने अपनी व्युह रचना तैयार रक्खी थी.

चौथे विकल्पको स्विकारनेमें नहेरुको कोई आपत्ति नहीं थी. हिन्दुस्तानमें नंम्बर वन बनना नहेरुके लिये बायें हाथका खेल तो नहीं था लेकिन अशक्य भी नहीं था. उन्होंने कोंग्रेसमें अपना सोसीयालिस्टीक ग्रुप बना ही लिया था.

नहेरुने गांधी और सरदारको प्रच्छन्न रुपसे दो विकल्प दिया.

या तो मुझे नंबर वन पोस्ट दो. नहीं तो मैं कोंग्रेसको विभाजित करके बचे हुए देशमेंसे अपना हिस्सा ले लुंगा और उसके बाद बचे हुए हिस्सेमें भी आग लगाके जाउंगा कि दुसरे नेता जाति आदि लोग अपना हिस्सा भी मांगे.

पक्षके नेताके रुपमें नहेरुका समर्थन किसी भी प्रांतीय समितिने किया नहीं था तो भी नहेरु अपने आवेदन पर अडग रहे.

महात्मा गांधीको नहेरुकी व्युह रचना समझमें आगयी थी.
महात्मा गांधीने कोंग्रेसको विलय करके उसको लोकसेवा संघमें परिवर्तन करने का निश्चय कर लिया. उन्होने सरदार पटेलको विश्वासमें ले लिया कि वे जब तक स्थानिक समस्याएं हल न हो जाय तब तक वे कोंग्रेसको विभाजित होने नहीं देंगे.
गांधीजीको मालुम हो गया था कि खुदकी जान कभी भी जा सकती है.

इसलिये महात्मा गांधीने २७वीं जनवरी १९४८में ही आदेश दे दिया की कोंग्रेसको एक राजकीय पक्षके स्थान पर अपना अस्तित्व समाप्त करना है. उन्होने इस दरम्यान लोकसेवा संघका संविधान भी बना दिय था.

नरेन्द्र मोदीको चाणक्य बनना है या पृथ्वीराज

अगर नरेन्द्र मोदीको चाणक्य बनना है या पृथ्वीराज चौहाण, इस बातकी चर्चा करते समय हमें कोंग्रेस और नहेरु की बातें क्यों करें?
भारतमे हमने और हमारे नेताओंने अंतिम सौ सालमें जो क्षतिपूर्ण व्यवहार किया, या जो क्षतिपूर्ण व्यावहार हो गया या करवाया गया उनको हमें याद रखके आगे बढना है.

यदि हम याद नहीं रक्खेंगे तो वैसी या उससे भी अधिक गंभीर क्षतियोंका पुनरावर्तन होगा, और भावी जनता हमे क्षमा नहीं करेंगी.

अंग्रेजोंकी नीतियां और उनका पढाया हुआ क्षतियुक्त इतिहासः
अंग्रेज तो चले गये, किन्तु उनकी विचारधारा के आधारपर उन्होने जो तीकडं बाजी चलायी और हमारे बुद्धिजिवीयोंने जो स्विकार कर लिया, ऐसे तथ्योंको हमे उजागर करना पडेगा. इतिहासके पन्नोंसे उनको निकालना नही है लेकिन उसको एक मान्यताके आधार पर उसके कदके अनुसार काट देना है. हमारे भारतीय शास्त्रोंके आधार पर तर्कपूर्ण रीतिसे इतिहास पढाना है.
इसका एक मानसशास्त्रीय असर यह भी होगा कि भारतमें जो विभाजनवादी तत्व है वे विरोध करने के लिये गालीप्रदानके साथ आगे आजायेंगे. उनको पहेचानना है और उनको सियासती क्षेत्रसे निकालना है. वे तर्क हीन होनेके कारण ध्वस्त ही हो जायेंगें. भारतमें एक हकारात्मक युग का प्रारंभ होगा.
https://www.youtube.com/watch?v=x4Vh0cBVPdU ancient scientific knowledge of India: A lecture delivered by CSIR scientist in IIT Chennai
https://www.youtube.com/watch?v=6YG6pXE8aDs Ancient Indian Scientists were all Rishis with High Spiritual Powers (Technology of Spirituality)
मुहम्मद घोरी क्षमाके पात्र नहीं है, किन्तु मुहम्मद घोरी कौन कौन है? और जयचंद कौन है.
मुहम्मद घोरी है; नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण, उनके साथीगण, कश्मिरके नेतागण और दंभी सेक्युलर समाचार माध्यम के पंडितगण.

यह है कभी न माफ करनेवाली सांस्कृतिक गेंग
इनलोगोमें सामान्य बात यह है कि वे बीजेपीकी एक भी क्षति कभी माफ नहीं करेंगे. उसके उपरांत ये लोग विवादास्पद तथ्यों पर और घटनाओं पर पूर्वग्रह रखकर उनको बीजेपीके और नरेन्द्र मोदीके विरुद्ध उजागर करेगे. इनके लिये समय कि कोई सीमा नहीम है.
(१) १९४२में कोई अन्य बाजपाई नामक व्यक्तिने क्षमा-पत्र देकर पेरोल पर उतर गया था तो इन नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंने २००३-४ के चूनाव अंतर्गत भी इस बातको अटल बिहारी बाजपाई के विरुद्ध उछाला था.
(२) कोई दो पुलीस अफसरोंके बीच, कोई पिताकी प्रार्थना पर उसकी पुत्रीके साथ कोई अनहोनी न हो जाय इसके लिये निगरानी रखनेकी बात हो रही थी और उसमें सफेद दाढीवाले और काली दाढीवाले नेताका संदर्भ बोला गया था तो नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेता मनमोहन और उसके मंत्रीमंडलने स्पेसीयल बैठक बुलाके एक जांच कमिटी बैठा दी थी.
(३) एक लडकी कोई आतंकी संगठन के युवकोंके साथ मिलकर अपने मातापिताको बीना बतायें गुजरातकी और निकल गयी थी और तत्कालिन केन्द्रीय खुफियातंत्रने ही माहिति दी थी कि वे नरेन्द्र मोदीको मारने के अनुसंधानमें आ रहे है तो गुजरातकी पुलीसने उनको सशस्त्र होनेके कारण खतम कर दिया तो इन्ही नहेरुवीयन कोंगी नेतागण और उनके साथीयोंने शोर मचा दिया था.
(४) ऐसे कई पुलिस अफसरोंके खिलाफ ही नहीं किन्तु गुजरातके गृहमंत्री तकको लपेटमें ले के उनको कारवासमें भेज दिया था. मतलब कि, फर्जी केस बनाकर भी इन लोगोंको बीजेपीको लपेटमें लेके अपना उल्लु सीधा करनेमें जरा भी शर्म नहीं आती है. ये लोग तो मुहम्मद घोरीसे भी कमीने है.
(५) नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंके इससे भी बढकर काले करतुतोंसे इतिहास भरा पडा है. इन्दिरा घांडीसे लेकर मनमोहन सोनीया तक. इसमें कोई कमी नहीं.
इन गद्दारोंको कैसे पीटा जाय?
(क्रमशः)
शिरीष मोहनलाल दवे
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Do not fall in the trap of Nehruvian Congress. क्या आप भारतके होतैषी है? और फिर भी क्या आप इनमेंसे कोई एक  वर्गमें भी आते हैं? ()

() ये लोग बीजेपी या/और नरेन्द्रके विरोधी हो सकते है,

Modi is the big threat to Nehruvian Congress

             Terrorists Bomb Blasts in Patana” By UPA !

भारतमें ज्ञातिवाद अभी नामशेष नहीं हुआ. प्रांतवाद भाषावाद भी चलता है. याद करो, जिस नहेरुवीयन कोंग्रेसने जयप्रकाश नारायणके आंदोलनको समर्थन देनेके कारण ममताको भी कारावास दिया था, उसी कोंग्रेसके आपातकालके दिलोजान समर्थक रहे प्रणव मुखर्जी जो ममताके प्रथम दुश्मन होने चाहिये, तो भी केवल और केवल बंगाली होने के कारण, ममताने थोडे नखरे करनेके बाद, उनको ही भारतके राष्ट्रप्रमुख पदके लिये समर्थन दिया. उसी प्रकार शिवसेनाने प्रतिभा पाटिलको समर्थन दिया.

दुसरा कारण यह भी है कि स्वकीय सत्तालाभके लिये कुछ नेता अपने ही पक्षके नेता के विरुद्धमें काम करते है. इसमें इन्दीरा गांधीने संजीव रेड्डीके विरुद्ध प्रचार किया, चरण सिंगने अपने ही पक्षके नेता मोरारजी देसाईकी सरकारका पतन किया , यशवंत राव चवाणने १९७७ की नहेरुवीयन सरकारके पराजयके बाद अपनी अलग पार्टी बनाली, शरद पवारने सत्ताके लिये नहेरुवीयन वंशके पक्षको छोडा, पकडा, छोडा, पकडा, छोडा जो क्रिया आज भी चालु है, बाला ठाकरेको नरेन्द्र मोदी का कद बढते हुए डर लगता था और ऐसे निवेदन देते रहेते थे कि बीजेपीकी शक्तिमें घाटा हो. चंद्रबाबु नायडुने अपने श्वसुर एन टी रामारावकी सरकारसे नाता छोडा था, शंकर सिंह वाघेलाने  केशुभाई पटेलकी सरकारका पतन किया था, केशुभाई खुद, नरेन्द्र मोदीका पक्ष चूनाव में हार जाय ऐसे भरपुर प्रयत्न करते रहते है, अडवाणी खुद ने अपने पक्षके जनमान्य नेता नरेन्द्र मोदीको नीचा दिखानेके लिये भरपुर प्रयत्नशील है.

सत्ताके लिये साधनशुद्धिका अभाव. मैं चाहे खतम हो जाउं लेकिन तुम्हे सत्तासे हटाउं;

जिन्होंने सत्ताके लिये साधनशुद्धि नहीं रक्खी है उनसे सावधान रहो. ये लोग बिना ही कोई योग्य विकल्प दिये ही बीजेपीको कमजोर कर सकते है. उनसे सावधान.

और कौन है जिनसे सावधान रहेना है?

 () ये लोग देश द्रोही हो सकते है, जो सिर्फ धारणाओंके आधारपर सरकारको दोष देते हैं;

Double standard alias perverted eyes of media

जिनको भारतकी धरोहर पर गर्व नहीं है और जो लोग, मनोमन, भारतका विकास नहीं चाहते है उनको आप क्या कहोगे? इन लोगोंको यह बात ज्ञात नहीं है कि, एक स्थिर सरकार को केवल नकारात्मक धारणाएं उत्पन्न करके, सरकार और उसके नेताओंके विरुद्धमें हवा फैलाना, कोई देशहितका काम तो है नहीं. एक सरकार को पांच वर्षके लिये नियुक्त की है तो उसको पांच साल पुरा करने दो. उसके पश्चात पूर्व सरकारने जो किया था, उसके साथ इस सरकारकी तुलनात्मक समीक्षा करो. आपको यह अवगत होना आवश्यक है कि, यदि आपने बीजेपीको मत नहीं दिया है तो भी वह पूर्णबहुमतसे भारतीय बंधारणके अनुसार विजयी हुई है. अब आपको उसका सन्मान करना है. धारणाओंके आधारपर उसको दोषी नही मान सकते. बीजेपीकी और खास करके नरेन्द्र मोदीकी कार्यशैली को नीचा दिखानेके लिये आपके पास ऐसा कोई आधार नहीं है कि आप उसको दोषी है ऐसा प्रचार करते रहो.

किन्तु ऐसा देखा जाता है कि जिनको बीजेपी और नरेन्द्र मोदी पसंद नहीं था उनमेंसे अधिकतर लोग नरेन्द्र मोदी और बीजेपीके सुक्ष्मातिसुक्ष्म बातोंको या/और जो चर्चाबिन्दु, वर्तमानमें अस्पष्ट है, संवादके आधिन है, कार्यवाही चल रही है, उसमें विसंवाद करके, उसको उछालते है और व्यर्थ ही नकारात्मक हवा फैलाते है. क्यों कि वे चाहते है कि यह सरकारका पतन हो जाय.

क्या होगा? इनको चिंता नहीं है

अगर इस सरकारका पतन होगा तो देशकी क्या दशा होगी इस बातकी इनको चिंता नहीं है.  १९८९ में चन्द्रशेखरने वीपी सिंगकी सरकार गीरायी. १९८९में क्या हुआ था? शेख अब्दुल्ला भाग गया. कश्मिरमें ३०००+ लोगोंका कत्लेआम हुआ और पांच लाख से उपर हिन्दुओंको सरेआम अपना घर छोडने पर विवश किया. आज तक वे लोग तंबुओंमें रहते हैं. यह एक ऐसा आतंक है जो लगातार २५ सालोंसे चल रहा है. १९९६ से १९९८ तक सरकारोंको गिरानेकी परंपरा चालु रही.

क्या ये आतंकी लोग और आतंकीयोंके इरादोंके पोषक और हिन्दुओंके प्राकृतिक अधिकारकी अवहेलना करनेवाले ये नहेरुवीयन और उनके साथीगण और वे लोग जो इस विषय पर मौन और निष्क्रिय रहे उन लोगोंको आप देश द्रोही नहीं कहोगे तो क्या कहोगे?

कश्मिरसे निष्कासित हिन्दुओंको अपने घरमें २५ सालके बाद भी सुस्थापित न करना, इस परिश्तितिको आप क्या कहोगे? यह उनके उपर सतत हो रहा आतंकवाद ही तो है.

नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके साथी लोग जिनमें फरुख आदि कश्मिरके मुस्लिम नेतागण आते है उन्होने सातत्यतासे कश्मिरी हिन्दुओंके मानवाधिकारका हनन किया. इनको अगर आप आतंकवादी नहीं कहोगे तो क्या कहोगे?

इस विषय पर मौन रहेने वाले या तो वितंडावाद करने वाले समाचार माध्यमोंके वक्ताओंसे भी सावधान. क्यों कि ये लोग भी मौन रहे हैं. ऐसे लोगोंके द्वारा किये गये निवेदनोंसे और मंतव्योंसे सावधान. उनके उपर तनिक भी विश्वास मत करो.

दुसरे कौन लोग है?

() ये लोग जोजैसे थेवादी है,

भारतकी आर्थिक प्रगति असंतोषजनक होनेका क्या कारण है? उसका मुख्य कारण भारतीय नेतागण है. मात्राके आधार पर नहेरुवीयन कोंग्रेस है. नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागणसे जुडे हुए अन्य नेतागण और कर्मचारीगण की राक्षसीय वृत्तियां कारणभूत है.

राक्षसी वृत्तिसे अर्थ है अन्यको नुकशान करके खुदका लाभ देखना. इसको अनीतिमत्ता भी कहेते हैं.

अगर ठेकेदार सही काम करेगा तो उसका लाभ कम होगा या तो नुकशान भी हो सकता है. इसलिये वह निम्नकक्षाका काम करता है और सरकारी कर्मचारी/अधिकारीको भ्रष्ट करता है. सरकारी कर्मचारी/अधिकारी भ्रष्ट होनेको उत्सुक है. और इसकी कोई सीमा नहीं है. जहां १००० रुपया खर्च होता है वहां पर कम आयु वाला १००५०० रुपयेका काम होता है. अगर नियमका शासन (रुल ऑफ लॉ) आजाय तो इनके ये लाभ नष्ट हो जायेंगे. इस लिये ये लोगजैसे थे”-वादी बनते है. जो भ्रष्ट है वे सत्ताके पदोंको दयादानका विषय मानते है. इसलिये अपनेवालोंको सत्ताके पदों पर नियुक्त करते है और भ्रष्टाचार बढाते है. इन्दिरा गांधीके समयसे भीन्न भीन्न पदोंकी भीन्न भीन्न मूल्य रक्खा था. यह बात युपीए के शासनमें भी चालु ही थी. इन लोगोंसे सावधान.

और कौन लोग है जिनसे सावधान रहेना है?

() ये लोग नकात्मक मानसिकता वाले हो सकते है,

ये लोग ऐसे है जो या तो नीतिसे भ्रष्ट है या तो निराशावादी है. चाणक्यने कहा है, जो निराशावादी है उनकी बातों पर विश्वास करो. निराशावाद एक रोग है. इस रोगके सांनिध्यमें रहेने वालोंको भी यह रोग ग्रस लेता है. निराशात्मक वातवरण विकासके लिये हानिकारक है. ये लोग नकारात्मक बोलते ही रहेते है कि, नरेन्द्र मोदी कुछ नहीं करता है, उसने यह नहीं किया, उसने वह नहीं किया, देखो टमाटरके भाव बढ गये. देखो सोनेके भाव स्थिर हुए तो जिन किसानोंने अपनी फसलके पैसोंसे सोना खरीदा था उनको इतने अरबका घाटा हुआ. यह सरकार किसानोंको पायमाल करने पर तुली है.

और कौन लोग है जिनसे सावधान रहेना है?

() ये लोग मूर्ख और मूढ हो सकते है,

मूर्ख वे लोग है जो व्यूहरचना समझ नहीं सकते और व्युह रचना बना भी नहीं सकते. उनके पास इतनी माहिति, ज्ञान और अनुभव नहीं होता है कि वे शत्रुओंकी ही नहीं किन्तु खुद अपने नेताकी व्युह रचना समझ शके. तद्यपि ये मूर्ख लोग इस बातका इन्कार करते है और अपनी खूदकी व्यूह रचना बनाते है और अमलमें भी प्रयोजित करते है. इससे वे अपने आप कष्टमें पडे उस शक्यताको तो छोड दो, लेकिन अपने पक्षको भी नुकशान पहोंचता है.

उदाहरणः

धोती धारण करने पर स्टारमें लाभः चरण सिंहने फरमान किया था कि जो धोती पहेनेगा उसको स्टार होटलमें २०% का डीसकाउन्ट मिलेगा.

गौवध पर प्रतिबंधः कोई भारतीय गौमांस नहीं खाता. यह एक सांस्कृतिक प्रणाली है. क्योंकि हम गाय का दूध पीते है, इसलिये वह हमारी माता समान है. इसके अलावा पर्यावरण और धरतीकी फळद्रुपताके लिये गौसृष्टिका हनन करना योग्य नहीं है. लेकिन अंग्रेज सरकारने ऐसे कतलखाने चलवाये थे. नहेरुवीयन कोंग्रेसने उनको चालु रक्खा उतना ही नहीं लेकिन उसमें वृद्धि भी की. देश ऐसी स्थिति पर पहोंचा है कि अगर ये कारखानोंको शिघ्रतासे समाप्त कर दें तो कई और प्रश्न उत्पन्न होते हैं. समस्या के निवारण के लिये कुछ समय की अवधि भी होती है. कुछ व्यूह रचना भी बनानी पडती है. व्यूहरचनाओंको गोपनीय भी रखनी पडती है.

अब तक जनताने क्या किया था?

जनताने यानी कि, आपने इस गौहत्या करने वाले राक्षसको मारने के लिये एक वृकोदरको चूना था. इस वृकोदरने कई दशकोंका समय व्यय किया. उसने राक्षसको मारने के बदले अनेक और राक्षस उत्पन्न किये.

अब आपने एक शेरको चूना है. अगर यह राक्षस मरेगा तो इस शेरसे ही मरेगा. अतः उसको पर्याप्त समय दो. आप धैर्य रक्खो. यदि आप शासक को पर्याप्त समय नहीं देते हैं, और यदि आप इस विषय पर धैर्यहीन बन जाते हैं तो समझ लो कि आप वृकोदरको ही मदद करते हैं.

विदेशी बेंकोंमे जमा काले धनकी वापसीः यह एक आंतर्राष्ट्रीय नियमोंसे युक्त समस्या है इस बातको अगर छोड भी दे सकते हैं. किन्तु नहेरुवीयन कोंग्रेसने इस समस्याको अपने फायदेके लिये ऐसे दस्तावेज बनाये हैं कि उन कुकर्मोकों सही मात्रामें अवगत करना है, यह एक ऐसे अन्वेषणका विषय है कि उसके उपर सावधानीसे गोपनीय रीतसे व्युह रचना बनानी पडती है. विशेष निरीक्षण अन्वेषण जुथ तो बनाया गया है ही. इसके नेता सर्वोच्च न्यायालयके एक न्यायाधीश है. ये लोग अपना काम कर रहे है. समस्या कमसे कम ३५/४० साल पुरानी है. अतः उसको पर्याप्त समय दो. आप धैर्य रक्खो.

() ये लोग नहेरुवंशके चाहक या/और उनकी विचार/आचार धाराके चाहक हो सकते है,

कुछ लोग ऐसा समझते है कि वे लोग, ईश्वरकी क्षतिसे भारतमें जन्मे हैं. वे ऐसा समझते हैं कि पाश्चात्य विचारधाराके प्रति आचार विचार रखना और भारतीय धरोहरकी निंदा करना ही प्रगतिशीलता है. भारतका जो कुछ भी है वह निम्न कक्षाका है. भारतकी प्रणालीया, तत्वज्ञान भाषा आदि सब निम्न है.

शौक भी कोई चिज है”. नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनके साथीयोंकी क्षतियोंका ये लोग सामान्यीकरण करके उसको निरस और शुष्क कर देते है. लेकिन ये ही लोग नरेन्द्र मोदीकी छोटी छोटी असांदर्भिक बातों पर मजाक करते है. जैसे कि प्रधान मंत्री नरेन्द्र मोदी को ये लोग परिधान मंत्री नरेन्द्र मोदी. क्या जवाहर लाल नहेरु और उनकी संतान नंगा घुमती थीं?

(१०) ये लोग महात्मा गांधीके विरोधी, या/और उनकी विचारधारा के विरोधी हो सकते है,

ये लोग मुढ की कक्षामें आते है. उनको ज्ञात नहीं है कि वे क्या कर रहे है? उनको ज्ञात नहीं कि, उनके मन्तव्योंसे जनताको क्या संदेश जाता है? उनको यह अवगत नहीं कि, देशकी और विदेशकी जनता उनके बारेमें क्या सोचेगी? जिनका ये लोग विरोध करते है उनकी विश्वमें क्या कक्षा है? उनको यह मालुम नहीं कि, जिनकी तटस्थता विश्व मान्य है उनका प्रतिभाव, बीजेपी के बारेमें कैसा सकता है?

उनको यह अवगत होना चाहिये कि, महात्मा गांधी एक विचार भी है. व्यक्तिसे ज्यादा एक विचारधारा है. गांधीजीकी विचारधारा एक विस्वस्त विचारधारा है. गांधीने अपनी क्षतियां खुद बताई थी. वे क्षतियां महात्मा गांधीने तो छोड ही दी थी. और उसने कभी उसका पुनरावर्तन किया नहीं. तो भी कुछ लोग उसी क्षतियोंको आधार बनाके गांधीकी निंदा करते है.

गांधीके कर्मके सिद्धांत विश्व मान्य है और विश्वने गांधीजीके आचारमें विश्वसनीयता पायी है. जिन्होने गांधीको पढा है उन्होने गांधीको कलंक रहित समझा है. अगर आपने गांधी के बारेमें पढा नहीं है तो आपमें गांधीके बारेमें चर्चा करनेकी योग्यता ही नहीं है. फिर भी अगर आप, अपनी अल्पज्ञतासे गांधी की निंदा करते हैं तो विश्वमें आप ही नहीं आपका पक्ष भी अविश्वसनीय बनता है. और आपका दुश्मन पक्ष इसका भरपुर लाभ उठा सकता है. अगर आप मुढ नहीं है तो आप गांधीके विषय पर मौन रहोगे. क्यों कि जिस विषय की चर्चा आपके पक्षके लिये हानिकारक है उसमें अगर आप मौन रहे तो आपका यह लक्षण एक सन्मित्रका लक्षण बनेगा. ऐसा भर्तृहरिने कहा है.  

(११) ये लोग गोडसेके चाहक या/और उसकी आचार धाराके चाहक हो सकते है.

गोडसे एक सामान्य व्यक्ति था. सामान्य व्यक्ति भी देश प्रेमी हो सकता है. अज्ञान और परिस्थितिसे अवगत होनेकी अक्षमता और असंवाद की मानसिकता के कारणसे यदि एक देशप्रेमी, दुसरी एक व्यक्ति, जो निःशस्त्र, सत्ताहीन और निर्दोष, मानवता वादी, करुणापूर्ण और युगपुरुष मानी जाती है उस व्यक्तिका खून करता है तो यह पाप ही तो है.

ऐसे पापीकर्मको आप पूण्य कर्म सिध्ध करना चाहते हैं तो विश्वमें कोई भी आपकी बात मान्य नहीं रखेगा. आप अपात्रको, महान सिद्ध करते रहोगे तो विश्वमें आपका पक्ष ही बदनाम और अविश्वसनीय होगा. भारत एक बडा देश है. और अगर कहीं चूनाव प्रक्रिया चल रही है तो आप, बीजेपी के मतोंको हानि पहोंचा सकते हो. क्यों कि आपका दुश्मन पक्ष, आपके इस आचारका भरपुर लाभ लेता है और आगेचलकर भी लेगा. इस बातको समझनेमें यदि आप अक्षम है तो यह बात आपके मुढत्वको सिद्ध करती है.

(१२) ये लोग अहिंसा उचित है और हिंसा कहां उचित है और कहां उचित नहीं है इसको अवगत करनेकी वैचारिक शक्ति नहीं रखते है,

GANDHI SARDAR AND NEHRU

अहिंसा एक सापेक्ष आचार है.

दुर्योधन के साथ युद्धका निर्णय श्री कृष्णने तभी लिया जब दुर्योधनने कहा कि मैं धर्म जानता हूं और अधर्म भी जानता हूं. परंतु, धर्ममें मैं प्रवृत नहीं हूंगा और अधर्मसे मैं निवृत नहीं हूंगा.

शेर अगर सामने गया तो आप क्या करोगे? या तो खुद भाग जाओ या तो उसको भगा दो. जहां संवादकी कोई शक्यता ही नहीं है वहां कमसे कम हिंसा, अहिंसा बनती है. अहिंसा और सुरक्षाके अधिकार विश्वमान्य है. उसमें विसंवाद उत्पन्न करना खुदकी असंस्कृत विचारधारा और अज्ञानताका प्रदर्शन है.

पाकिस्तानने जब कश्मिर पर आक्रमण किया और जब कश्मिरके राजाने भारतकी मदद मांगी तो नहेरु और सरदार, गांधीजी की सलाह लेनेके लिये उनके पास गये थे. गांधीने कश्मिरके राज्यकी सुरक्षाके लिये भारतीय लश्करको भेजना यह अपना धर्म बताया था. गांधीजीने ऐसा नहीं कहा था किजाओ जाके सत्याग्रह करो”. क्यों कि आक्रमणकारी संवाद और अहिंसाको मान्य नही करते. वे केवल और केवल हिंसासे ही कश्मिर पर अधिकार प्राप्त करना चाहते थे. ऐसे लोगोंको हिंसाकी भाषामें उत्तर देना ही योग्य था.

(१३) ये लोग या तो अपने धर्मके विषयमें अंध है, परधर्मके बारेमें या/और परधर्मीयोंके विषयमें सतत धिक्कारकी मानसिकता या/और आचार रखते है,

धर्ममें यदि मानवधर्म नहीं मिला हो तो वह धर्म ही नहीं होता है. ऐसा धर्म, एक समूह (मॉब) मात्र होता है. ऐसे धर्मके कोईएक नेताने जो कुछ भी लिखा हो उसको परम सत्य मानके चलनेवालोंका एक पशु समूह ही बन जाता है. और उस समुहका व्यवहार भी हिंसक पशु जैसा ही होता है.

अपने धार्मिक पुस्तकका हेतु क्या था? वह कब, कहां कैसी स्थितिमें लिखा गया, और क्यों लिखा गया उसके उपर निरंतर चिंतन विचार करने के स्थान पर, ये लोग क्या करते हैं? ये लोग, युगोंके पश्चात भी, उसी लिखावट के अनुसार ही अनुसरण करना चाहते है. वे तो यह भी मानते है कि सारी दुनियाके लोगोंको हमारा धर्म ही स्विकारना करना चाहिये.  ऐसी मानसिकता वाले धर्मान्ध होते है. ऐसे लोग जो प्रत्यक्ष दिखाई देता है उसकी अनदेखी करके जो नहीं दिखाई देता है, और जो तर्कसे कोषों दूर है उस परलोकको पानेके लिये परधर्मको माननेवालोंको यातना देते हैं और कत्ल करते है. इन लोगोंसे सावधान.

(१४) ये लोग स्वयंको धर्मनिरपेक्षके रुपमें प्रस्तूत करते हैं, किंतु उनके रोम रोममें, नरेन्द्र मोदी या/और बीजेपी या/और सनातन धर्म या/और भारतीय प्राचीन धरोहर के प्रति अस्विकृतिकी मानसिकता या/और घृणा है,

प्रोनहेरुवीयन पक्षके लोग नरेन्द्र मोदी और बीजेपी को कोमवादी कहेते है. क्यों कि नरेन्द्र मोदी आरएसएस का सदस्य है.

आर एसएस की गलती क्या है?

वैसे तो कुछ भी गलती नहीं है. किन्तु नथुराम गोडसे नामके एक आदमीने गांधीजीका खून किया था. नथुराम गोडसे आरएसएसका सदस्य था इसलिये आरएसएसका हर सभ्य खूनी है. आरएसएसने कभी अपनी कारोबारी में या किसीभी हालतमें गांधीजीको मारनेका प्रस्ताव पास नहीं किया था. तो भी ये दंभी धर्मनिरपेक्ष लोग कि, आरएसएस और उसके कारण बीजेपी भी कोमवादी है. साध्यम इति सिद्धम्‌.

यह इन दंभी धर्मनिरपेक्षोंका तर्क है जो तर्कके शास्त्रसे हजारों कोस दूर है. वे लोग इस तर्कको आरएसएस और बीजेपी के उपर चलाना चाहते है. वास्तवमें गांधीजीका खून करने वाली तो नहेरुवीयन कोंग्रेस ही है. गांधीजी अगर महान थे तो वे अपने विचारोंसे और अपने आचारोंसे महान थे. किन्तु नहेरुवीयन कोंग्रेसने तो गांधीके विचारोंका खून किया है.

इसी कोंग्रेसने प्रस्ताब पास करके दारुबंधीमें सातत्यसे छूट दी और कभी लागु नहीं की,

इसी कोंग्रेसने प्रस्ताब पास करके गौवध बंधी कभी लागु नहीं की,

इसी कोंग्रेसने प्रस्ताब पास करके कतल खानोंको रियायतें दी,

इसी कोंग्रेसने प्रस्ताब पास करके विभाजनवादी प्रवृत्तियां की,

इसी कोंग्रेसने प्रस्ताब पास करके अपनी सुविधाएं बढाई,

इसी कोंग्रेसने प्रस्ताब पास करके सीमा रेखाको असुरक्षा दी,

इसी कोंग्रेसने प्रस्ताब पास करके मंत्रीयोंको मनमानी करनेका अधिकार दिये,

इसी कोंग्रेसने प्रस्ताब पास करके जनतंत्रका खून किया था,

इसी कोंग्रेसने प्रस्ताब पास करके गांधीवादी जयप्रकाश नारायण तकको कारावासमें डाल दिया था,

और इन्ही लोंगोने असामाजीक तत्वोकों सहारा लिया और सहारा दिया.

साबरमती एक्सप्रेसके डीब्बेको जलानेकी योजना, गोधराके एक स्थानिक नहेरुवीयन कोंग्रेसी नेताने बनाई थी और लागु की थी. वह नहेरुवीयन कोंग्रेसी नेता पाकिस्तान भाग गया है. आप इन दंभी धर्मनिरपेक्षकी पूरी जमातको दस्तावेजोंके आधारपर कारावासकी सजा दे सकतो हो.

ऐसे दंभी धर्म निरपेक्ष लोगोंसे सावधान रहो.

इन लोगोंसे सावधान जो हिन्दुधर्ममें सुधारकी वार्ताएं करते हैं.

इन लोगोंको समाजसुधारकी बातें करते समय उनको सिर्फ हिन्दु समाज ही दिखाई देता है.

इनकी जमातके एक बिरादरने राजस्थान जाके एक हिरनका शिकार किया. हिरनको जलाके अपने यारोंके साथ खा भी लिया. अब यह हिरन तो विलुप्त जातिका था और उसको शासनने सुरक्षित घोषित किया था. तो भी इस बिरादरने नियमकी अवहेलना करके उसका शिकार किया. इसी बिरादरनेसत्यमेव जयतेभी चलाया. उसमें इन्होंनें केवल गुन्हाहोंका सामान्यीकरण किया लेकिन शासनका क्या फर्ज बनता है और शासनस्थ किस व्यक्तिका फर्ज बनता है उसका नाम भी नहीं लिया. “मैं तुमसे ज्यादा पवित्र हूं, मैंने तुम्हें सुधारने के लिये कैसा अच्छा सिरीयल बनाया, अब जनताको जागना पडेगा, जनता को ही आगे आना पडेगाइत्यादि इत्यादि.

DOUBLE STANDARDS OF CENSOR BOARD

अभी अभी इस बिरादरनेपी केनामकी फिलम बनायी. उसमें वे खुदपी केहै. और अंधश्रद्धा को उजागर करनेमें वे कैसे मचे रहेते है वह दिखाया है. उनको अपनी जमातकी पहाड जैसी भी अंधश्रद्धा दिखाई देती नहीं है. लेकिन हिन्दु धर्मकी तिलके बराबरकी बुराई, यह महाशय पहाड जैसी प्रदर्शित करते हैइस बातकी चर्चा हम अलग लेखसे करेंगे. लेकिन ऐसे दंभी ठगलोगोंसे सावधान.  

(१५) ये लोग एक विवादास्पद वार्ताकी सत्यताको सिद्ध करनेके लिये दुसरी विवादास्पद वार्ताका आधार लेते है और अपने निर्णय को तर्कयुक्त मानते है और मनवाते है,

एक व्यक्ति जो महानुभाव है. कोई क्षेत्रका विद्वान माना जाता है. किन्तु समझ लो. कार्ल मार्क्स के समाजवादका सिद्धांत विवादास्पद है. एक अमर्त्यसेन था उसने नरेन्द्र मोदी के आर्थिक कदमोंको बिना नरेन्द्र मोदीसे चर्चा किये नकार दिया. ये लोग ऐसा तारतम्य निकालते है कि नरेन्द्र मोदीके आर्थिक कदम खोटे है.

वास्तवमें एक विवादास्पद बातसे दुसरी बातको गलत नहीं कह सकते.

(१६) ये लोग पाश्चात्य साहित्य, इतिहास लेखन, दृष्टिकोण, प्रणालियां या/और व्यक्तिओंसे अभिभूत है.

भारतके कई लोग जो अपनेको मूर्ध्न्य मानते है और साथमें महानुभाव भी है, उनमें एक फेशन है कि पाश्चात्य विद्द्वानोंके कथन उद्धृत करके बीजेपी और उसके नेताओंको बदनाम करो.

वास्तवमें हरेक कथन पर समस्या पर संदर्भके साथ रख कर गुणवत्ता, प्रमाणिक और प्राथमिकता को लक्षमें रख कर विचार करना चाहिये. किसीका कथन मात्र कुछभी सिद्ध करता नहीं है.

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः नरेन्द्र मोदी, बीजेपी, आर एस एस, नहेरुवीयन कोंग्रेस, नेतागण, सत्तालाभ, साधनशुद्धि, नकारात्मक, आतंकवाद, निष्कासित, जातिवाद, प्रांतवाद, विकल्प

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