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कोंगी गेंग की एक और चाल – १

कोंगी गेंग की एक और चाल – १

आप समज़ते होगे कि पुलवमामें एक आतंकी हमला करवानेमें भारतकी कोंगी-गेंग-संगठनने,  [जिसमें विपक्षी संगठनके साथ साथ, टूकडे टूकडॅ गेंग, कश्मिरकी विभाजनवादी गेंग सामिल है उसने, पाकिस्तान, आइ.एस.आइ., पाकिस्तानी सेना …] कुछ बडी गलती कर दी. आप यह भी सोचते होगे कि कोंगी गेंगको लगता होगा कि यह तो पासा उलटा पड गया.

इस घटनामें दो शक्यताएं है. या तो इस गेंग संगठनने विस्तृत आयोजन नहीं किया होगा या तो आतंकी गेंगको आतंकी हमला करना है, इतना ही सिर्फ निर्णय किया होगा. समयके बारेमें सुनिश्चित निर्णय लिया नहीं होगा.

समय को सुनिश्चित करनेमें कोंगी गेंग संगठनकी क्या कठिनाइयां हो सकती है?

कोंगीयोंको पहेलेसे ही मालुम नहीं पडा था कि चूनावकी घोषणा किस तारिखको होने वाली है.

वैसे तो, कोंगीके कई मददगार, सरकारके हर विभागमें डटके बैठे हुए है. यानी कि, प्रशासनमें, न्यायालयमें, चूनाव आयोगमें और सुरक्षा संस्थाओमें. क्यों कि सामान्यतः व्यक्ति सहायकके प्रति कृतज्ञ बना रहेता है. वह कृतघ्न नहीं बनता. कोंगी और उनके बीचमें लेनदेनका संबंध रहेता है. भीन्न भीन्न किस्सेमें कैसी लेन देन होगी, वह संशोधनका विषय है.

तो कोंगी गेंगकी कहाँ चूक हो गई?

ऐसा लगता है कि, नरेन्द्र मोदीके शासन व्यवस्था तंत्रमें, कोंगी अपने पालतु जासुसोंसे पक्की माहिति नहीं निकलवा पाया. या तो कोंगीको गलत माहिति मिली. क्यों कि इमानदार होना भी एक चीज़ है.

मोदी सरकारके पास इन पुट तो थे ही कि, यह कोंगी-गेंग-संगठन कुछ आतंकी हमला तो करवाने वाला है. और चूनावके पहेले कुछ अनहोनी होने वाली है. हो सकता है कश्मिरसे दूर दूर तक जैसे २००८में मुंबई मे ब्लास्ट करवाया था, ऐसा ब्लास्ट फिर एक बार करवा दे, और उससे कौमी-दंगे कमसे कम मुंबईमें/या तो सूचित शहर/शहरोमें तो हो ही जाय. स्थानिक बीजेपी सरकार उसके उपर नियंत्रण तो कर लें, लेकिन इस दरम्यान कोंगी-गेंग-संगठन कई अफवाहें फैला सकता है.

लेकिन हुआ यह कि आतंकवादी गेंगका धैर्य कम पडा या तो भारतके भीतरी भागमें आतंकी हमला करवाना और वह भी बीजेपी शासित राज्य/राज्योंमे  हमला करवाना उसके बसकी बात न रही. कश्मिरमें दो प्रकारके आतंकवादी है. सीमापारके और कोंगी शासन दरम्यान पैदा किये  कश्मिरके भीतरी आतंकवादी और उसके सहायक.

बीजेपीका तो “ओल आउट” अभियान जारी है. धर्मांधताकी और उनको हवा देनेवालोंकी यदि मिसाल चाहिये तो आप कश्मिरके कुछ नेताओंके कथनोंको देख लिजिये. उनको हवा देने वाले कोंगी और उनके सांस्कृतिक कश्मिरी सहयोगीयों के कथनोंको देख लिजिये. कश्मिरीके विभाजवादी और पाकिस्तान परस्त नेताओंके विरुद्ध कुछ नये कदम तो बीजेपीने उठाये है. कश्मिरमें आतंकवाद मरणासन्न किया है. आतंकवादके नाम पर मुस्लिमोंका वोट ईकठ्ठा करना अब कोंगी गेंगके लिये इतना आसान नही है.

अब कोंगी गेंग करेगी क्या?

कोंगी गेंग अपनी लडाई जारी रखेगी. जो पेइड मीडीया (प्रेस्टीट्युट) है उनके लेखकोंके भूगतानमें वृद्धि तो होगी ही. क्यों कि कोंगी-गेंगके सहयोगी इन मूर्धन्योंका काम थोडा और कठिन हो रहा है.

अब इन मूर्धन्योंका लक्ष्य है अर्ध दग्ध जनता और निरक्षर जनताको गुमराह करना.

इन अदाओंपर मीडीयाको आफ्रिन बनना है

निरक्षर जनतामें, जो मोदी शासन दरम्यान लाभान्वित है, वह जनता तो मोदी भक्त हो ही गई है. जो जनताका हिस्सा बच गया है, उनको पैसे, जातिवाद, प्रदेशवाद, भाषा वाद और धर्मके नाम पर बहेकाना है. हो सकता है कि कोंगी गेंग इनको असमंजसमें डालके उनको मतदानसे रोके या तो “नोटा-बटन” दबानेको प्रेरित करें. कोंगी गेंगकी मुराद तो बेलेट पेपर लाना था जिससे बुथ केप्चरींग आसान रहे.

कोंगी गेंग जो नरेन्द्र मोदी/बीजेपी के विरुद्ध हवा (माहोल) बनाना चाहती है, उसमें ये निरक्षर लोग कितने सहयोगी बनेंगे यह बात सुनिश्चित नहीं है.

लेकिन अर्धदग्ध लोगोंको असमंजस अवस्थामें लाना कोंगी गेंगके लिये अधिक आसान है.

वह कैसे?

बेकारीमें वृद्धि, महंगाई और किसानोंकी समस्या, इनके बारेमें जूठ फैलाना कोंगी गेंगके लिये आसान है. वैसे तो हमारे मित्र बंसीभाई पटेल कहेते है कि उनको ₹५००/- प्रतिदिन देने पर भी मज़दुर मिलते नहीं है. नये नये कोंट्राक्टर बने लोग फरियाद करते है कि हम बडी मुश्किलसे डूंगरपुर जाके एडवान्स किराया देके रोजमदार मज़दुर लाते है, वे पैसे लेके भाग जाते है. यह सत्य संबंधित लोगोंके लिये सुविदित है. लेकिन तो भी “बेकारीकी बाते चल जाती. एक समस्या यह भी है कि कुछ बेकार लोग ऐसे भी है जो अपने गाँव/शहरमें ही नौकरी चाहते है. यह समस्या गुजरात महाराष्ट्रमें ज्यादा है. गुजरातमें तो यदि किसी कर्मचारीका  तबादला दुसरे राज्यमें हो जाय तो भी उसको अपनी नानी याद आ जाती है.

बीजेपी के शासन दरम्यान महंगाई का वृद्धिदर कमसे कम है. वेतनवृद्धिका दर अधिक है. खाद्य पदार्थोंमेंसे अधिकतर खाद्य पदार्थ सस्ते हुए है. फिर भी महंगाईके नाम पर, आप जनताको, गुमराह करनेमें थोडे बहूत तो सफल हो ही सकते हो.

किसानोंकी समस्या तो अनिर्वचनीय लगती है. ५५ सालके अंतर्गत यदि किसान स्वयंका उद्धार नहीं कर पाया, तो खराबी उसके दिमागमें है. जो अपनी आदतोंसे टस और मस नहीं होना माँगता, उसको सिर्फ ईश्वर ही बचा सकता है. और ईश्वर भी उनको ही मदद कर सकता है, जो अपनी मदद खूदको करें.

हाँ जी, मोदीकी बुराई करनेमें आपको अरुण शौरी, चेतन भगत, यशवंत सिंहा जैसे भग्नहृदयी और  शशि थरुर (जिसके विरुद्ध एक क्रिमीनल केस चलता है), वैसे तो मिल ही जायेंगे. उनमें कुछ भग्न हृदयी स्थानिक लेखक गण भी तो होगे जो स्वयंको तटस्थ माननेका घमंड रखते है.

कोंगी गेंगके लिये सबसे बडे शस्त्र कौनसे है?

कोंगीवंशका एक और नया, मादा फरजंदको, चूनाव मैदानमें लाया गया है.

“मादा” (फीमेल)शब्दका क्यूँ उपयोग किया है?

उस मादाकी सामाजिक उपलब्धीयां शून्य होनेके कारण  उसका विवरण करना असंभव है. यदि कोई मीडीया मूर्धन्य उसका विवरण करें, तो उसको जूठ ही बोलना पडेगा. आप कहोगे कि कोंगी गेंगके पालतु मीडीयाके लिये तो जूठ बोलना एक शस्त्र के समान है तो फिर एक और परिमाणमें जूठ बोलनेमें क्या आपत्ति है? अरे भाई ये मीडीया वाले समज़ते है कि जूठ तो बोलो ही, लेकिन जूठका चयन ऐसा करो कि उस जूठको अति दीर्घ काल  तक विवादास्पद रख सको. ऐसा होने से आम जनता उस जूठको सत्य मान लेगी या तो असमंजसमे पड जायेगी.

जैसे कि;

बाजपाईने इन्दिरा घांडीको “दुर्गा” कहा था,

 बाजपाईने मोदीको “राजधर्म” निभानेकी बात कही थी,

मोदी ने हर देशवासीकी जेबमें १५लाख रुपये देनेकी बात कही थी,

कथित शब्दोंके भावार्थका स्पष्टीकरण, या इन्कारके बाद भी आप यह जूठ चला सकते है.

हमारा मूल विषय था कि, उस एक और मादा पात्रका, चूनावकी सियासतमें प्रवेश करवाना और उसके गुणगान के लिये, सातत्यसे रागदरबारी छेडना. सिर्फ इसलिये कि, उस मादा की योग्यता यह है कि, वह मादा  नहेरुवंशकी फरजंद है.

नहेरुवंशके फरजंदोंको “कालका बंधन नहीं है”, “ज्ञानका बंधन नहीं है” “तर्कका बंधन नहीं है” “सत्यका बंधन नहीं है”, “नीतिमत्ता”का बंधन नहीं है क्यों कि जबसे इन्दिरा गांधीने नहेरुवीयन कोंग्रेस ओफ ईन्डिया”को इन्दिरा नहेरुवीयन कोंग्रेस (आई.एन.सी) बनाके, कोंगीके लक्ष्मी-भंडारकी चाभी (Key) अपने हस्तक कर दी थी. इन्दिराने देशको बिना किसी भयसे, लूटनेकी आदत बना दी थी, तबसे कोंगीके लक्षी-भंडारके पास, कुबेर भी मूँह छीपा लेता है.

और आप तो जानते है कि

यस्यास्ति वित्तं, स नर कुलिनः स श्रुतवानः स च गुणज्ञः ।

स एव वक्ता स च दर्शनीय, सर्वे गुणाः कांचनं आश्रयन्ते॥

(जिसके पास धन है, वह कुलवान है, वह ज्ञानी है, और वह ही गुणोंको जाननेवाला है, वही अच्छा भाषण देनेवाला है, और वही दर्शन करनेके योग्य है, क्यों कि सभी गुण, धनके गुलाम है.)

 इन्दिरा गांधीने और उसके फरजंदोने देशको अधिकतम लूट लिया है, उनके पास अपार संपत्ति है.  इस लिये सभी गुण ही नहीं, किन्तु धनकी लालसा वाले सभी  नेतागण, कोंगीके बंधवा-दास है. समाचार माध्यमोंमे भी धन लालसा वाले या तो भग्न हृदयी मूर्धन्योंकी कमी नहीं.

अब इस नहेरुवंशी मादाकी भाटाई तो करनी ही पडेगी न?

इस मादाकी पार्श्वभूमिमें यदि कोई कारकीर्दि (रेप्युटेशन) न हो तो क्या हूआ ? उसके हर कथन को हम अतिशोभनीय बना सकते है ही न ? हम क्या कम चमत्कार करनेवाले है?

तो अब, हम समाचार माध्यम वाले, असली और नकली चर्चा चलायेंगे. क्यों कि;

दूसरा शस्त्र है चूनावी चर्चाएं,

चूनावी चर्चामें हमारे लिये निम्न लिखित विषय अछूत है,

(१) गुजरातके डाकू भूपतको पाकिस्तान भागा देना. उसके प्रत्यापर्णकी बात तक नहेरुने नहीं की, तो कार्यवाही तो बात ही भीन्न है.

(२) युद्धमें हारी हुई ७१००० चोरस मील भारतीय भूमिको, वापस लेनेकी हम नहेरुवीयनोंने संसदके समक्ष प्रतिज्ञा ली थी,

(३) हमारी आराध्या इन्दिराने एक करोड बांग्लादेशी बिहारी मुस्लिमसे जाने जानेवाली घुसपैठीयोंको वापस भेजनेकी प्रतिज्ञा ली थी,

(४) हमारी आराध्या इन्सिराने आपात्काल लागु किया था और जनतंत्रकी धज्जीयाँ उडाई थीं.,

(५) हमने भोपाल गेस कांडके आरोपी एन्डरसनको, प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रीकी नीगरानीमें, बेधडक, और खूल्ले आम, देशसे भागजानेकी सुविधा प्राप्त करवाई थी. और उसको वापस लानेमें गुन्हाइत बेदरकारी दिखायी थी,

(६)  ओट्टावीयो क्वाट्रोची को ठीक उसी प्रकार देशसे भगाया था, ताकि उसपर न्यायिक कार्यवाही न हो सके. उसको वापस लाने की कुछ भी कार्यवाही हम वंशवादी कोंगीयोंने नहीं की थी,

(७) कोंगीके सहयोगी पीडीपीके शासनमें,  मंत्रीकी पूत्रीका आतंकवादीयोंने अपहरण (हरण) किया (करवाया) और उसके बदलेमें सात खूंखार आतंकवादीयोंको हम कोंगीयों और हमारे सहयोगीने मूक्त किया था. इसके उपर कोई चर्चा नहीं, कि यह घटना किसकी विफलता थी? या तो यह एक सोची समज़ी चाल थी? आज कोंगी, फारुख, ओमर, महेबुबा मुफ्ति आतंकवादीयों की भाषा बोलते है.

(८) कश्मिरमें खूल्ले आम कश्मिरी हिन्दुओंको धमकी दी कि इस्लाम कबुल करो या मरनेके लिये तयार रहो. फिर ३०००+ हिन्दुओंको कतल किया, १००००+ महिलाओंको रेप किया, ५०००००+ हिन्दुओंको निराश्रित किया. न कोई जाँच बैठी, न कोई एफ.आई.आर. दर्ज हुई, न किसीकी गिरफ्तारी हुई, न न्यायिक कार्यवाही हुई, न कोई समाचार प्रसिद्ध होने दिया, न कोई चर्चा होने दिया, और हम कोंगीयोंने  और हम कोंगीयोंके सहयोगी शासकोंने मौजसे दशकों तक शासन किया.

(९) दाउद को भगाया. हम कोंगीके पास दाउदका कोई भी डेटा उपलब्ध ही नहीं था. क्यों कि हम ऐसा रखनेमें मानते ही नहीं है. हमने कभी भी उसको वापस लानेकी कोई कार्यवाही नहीं की.

(१०) न्यायिक प्रणाली  कोंगीयोंने बनाई, दशकों तक क्षतियों पर ध्यान नहीं दिया, बेंकोने हजारो गफले किये. निषिद्ध फोन बेंकींग द्वारा माल्या, निरव मोदी, चौकसी जैसे फ्रॉड को हमने जन्म दिया.

मोदीने ५ वर्षमें ही प्रणालीयां बदली, कौभान्डोंको पकडा और जो कोंगी स्थापित प्रणालीयोंके कारण देश छोड कर भाग गये थे उनको वापस लानेकी तूरंत कार्यवाही की जो आज रंग ला रही है.

कोंगी लोग और उनका पीला पत्रकारित्व  ये सब चर्चा नहीं करेगा.     

चूनावी चर्चाएं हम वैसी करेंगे जिनमें हम फर्जी और विवादास्पद आधारोंपर मत विश्लेषण कर सकते है. जाति, धर्म आदि विभाजनवादी आधारों पर अपनी मान्यताओंको सत्य मान कर बीजेपीके विरुद्धमें जन मत जा रहा है ऐसी भविष्य वाणी कर सकते है. ऐसा तारतम्य पैदा करके कोंगी गेंगके अनुकुल, निचोड निकालना है. इसी कार्यमें अपना वाक्‌पटूता का प्रदर्शन करते रहेना. यह भी एक उपशस्त्र है.  

कोंगीवंशका नया आगंतुक, मादा फरजंदको, प्रसिद्धि देनेमें सभी मीडीया कर्मीयोंमे तो स्पर्धा चल रही है.

इस मादा फरजंदकी सामान्य उक्ति को भी बडे अक्षरोंमे प्रसिद्धि देने लगे है.

मिसाल के तौर पर,

“५५ साल कोंगीने कुछ नहीं किया ऐसी बातोंसे मोदीको बाज़ आना चाहिये. हरेक मुद्देकी एक एक्सपायरी डेट होती है.”

मीडीया बोला; “वाह क्या तीर छोडा है इस नेत्रीने …. इसकी तो हम समाचार प्रसिद्धिमें बडी शिर्ष रेखा बना सकते है.

अरे भाई जिसका असर, यदि देश भूगत रहा हो, उसकी एक्स्पायरी डेट यानी उसकी मृत्युतीथि तो तब ही आयेगी जब आपके चरित्रमें परिवर्तन आयेगा या तो वह असरकी मृत्यु होगी. आप ५५ साल तक गरीबी हटाओ बोलते रहे लेकिन कोई प्रभावी कदम नहीं उठा पाये, और मोदीने प्रभावी कदम उठाये और साथ साथ समय बद्धताकी सीमा भी सुनिश्चित की, तो आपके पेटमें उबलता हुआ तैल क्यों पडता है?

नहेरु की, चीनके साथ हिमालय जैसी बडी गलतीयां, इन्दिरा गांधीकी उतनी ही बडी गलतीयां, जिनमें सिमला समज़ौता, सेनाकी जीती हूई काश्मिरकी भूमि भी पाकिस्तानको परत करना, आतंकवादको बढावा देना, हिन्दुस्तानके भाषावाद, क्षेत्रवाद, धर्म के नाम पर सियासती विभाजनवादको प्रचूरमात्रामें बढावा देना … आदि बातें बीजेपी ही नहीं,  देश भी भूल नहीं पायेगा.

मीडीया मूर्धन्य पगला गये है …

मिसाल के तौर पर आजके डीबी (दिव्यभास्कर)भाईने एक फर्जी (कल्पित) चर्चा प्रकट की है. ऐसे समाचार माध्यमोंके लिये “तुलनात्म” चर्चा बाध्य है क्यों कि ऐसा करना उनके एजन्डामें आता नहीं है.

अब तक यह डीबीभाई अन्य मीडीया-भाईकी तरह ही “रा.घा. (राहुल घांडी)को, नरेन्द्र मोदीके समकक्ष मानते है. वैसे तो कोई भी मापदंडसे इन दोनोंकी तुलना शक्य है ही नहीं. लेकिन डीबीभाई बोले अरे भाई हम कहाँ महात्मा गांधी सूचित “समाचार माध्यमके चारित्र्यको (आचार संहिताको) मानते है? हमारा एजन्डा तो सिर्फ बीजेपी के विरुद्ध माहोल पैदा करना है. हम तो है कवि. हमें कवियोंकी तरह कोई सीमा, चाहे वह नीतिमत्ताकी ही क्यों न हो, बाध्य नहीं है.

डी.बी.भाई अब इस नहेरुवंशी मादा फरजंदको भी मोदी समकक्ष मानने लगे है. और इस मादाको भी फुल कवरेज दे रहे है.

एक कल्पित चर्चाके कुछ अंश देखो

वैसे तो बीजेपीने कई बार स्पष्ट किया है कि “राम मंदिर” न्यायालय के फैसलेके आधिन है, तब भी इसको इस मादाके मूँहसे बीजेपीको “पंच” मारा गया, कि आपको चूनाव के समय ही राम मंदिरकी याद क्यों आती है? चूनावके समय ही गंगाकी याद  क्यों  आती है?

वैसे तो मोदी इससे भी बडा पंच मार सकता है. लेकिन भाई, इस मादाकी रक्षा करना हमारा एजन्डा है.

इस मादा कहेती है, “मोदी तुमने इस देशकी सभी संस्थाओंको, चाहे वे आर.बी.आई. हो या सीबीआई हो, नष्ट कर दीया है.”

वैसे तो मोदी उत्तर दे सकता है कि “तुम सर्व प्रथम जनतंत्रमें संस्थाकी परिभाषा क्या होती है वह समज़ो. वाणी विलास मत करो.  न्यायालय, चूनाव आयोग, सुरक्षा दलें, शासन व्यवस्था, आर.बी.आई., सीबीआई ये सभी संस्थाएं बंद नहीं की गई है. जनतंत्रकी सभी संस्थाएं संविधानीय प्रावधानोंके अंतर्गत चल रही है. लेकिन जब आपका शासन था तब कमसे आपात्कालको याद करो. शाह पंचने क्या कहा था? अरे आपके गत शासनके कार्यकालमें ही न्यायालयने आपको आदेश दिया था कि कालाधन वापस लानेके लिये विशेष जांच समिति बनाओ लेकिन आपने वर्षों तक बनाया नहीं( यहां तक कि आपकी पराजय भी हो गयी),  जैसे आपको न्यायालयका आदेश बाध्य ही नहीं है. न्यायालयका खूदका कथन था कि आपने सीबीआईको पोपट बना दिया है.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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भारतमें विपक्षकी सभी पार्टीयां सहमत हो गयी हैं कि …

भारतमें विपक्षकी सभी पार्टीयां सहमत हो गयी हैं कि …

इमरान खान पीएम इन्डिया मोदी

जबसे बीजेपी शासन आयी है;

तबसे विपक्षकी पार्टीयां जैसे कि, कोंगी, एस.पी., बी.एस.पी., आर.जे.डी., टी.एम.सी., एन.सी., पीडीपी, डी.एम.के., टी.डी.पी., जे.डी.एस., साम्यवादी की नज़दिकीयां घट रही है.

जबसे बीजेपीकी विदेशनीति, सुरक्षानीति, जनविकास नीति रंग ला रही है तबसे उपरोक्त सभीपार्टीयां परस्पर इतनी हिलमिल गयी है कि उनके सदस्योंको भी मालुम नहीं है कि वे स्वयं किस विपक्षी पार्टीके सदस्यके कथनका समर्थन कर रहे है. इतना ही नहीं लेकिन उन्होने इस ५० मासमें असामाजिक तत्त्वोंसे और नक्षलीयोंसे भी समर्थन और परस्पर  सहकार प्राप्त  लिया है.

कोंगी गेंग

कुछ वर्षोंसे कोंगी-पक्षको, देशस्थ आतंकवादीयोंका परोक्ष  समर्थन प्राप्त था. लेकिन कालांतरमें उसको सीमापारके आतंकवादीयोंका  समर्थन भी मिलने लगा था. इसलिये कोंगी पक्ष अपने बलबुते पर चूनाव लडनेमें मुस्ताक था.

लेकिन जबसे बीजेपी/मोदीने उरी आक्रमण और पुलवामा-ब्लास्टका बदला लिया तबसे भारतीय विपक्षगठबंधन सामूहिक सर्वनाशके भयसे कांपने लगा है.

लेकिन पंच तंत्रमें कहा है कि;

जब भी विपत्ति आती है तो उसका निवारण भी उत्पन्न हो जाता है. जैसे कि; आगमिष्यति यत्‌ पत्रम्‌, तत्‌ तारिष्यति अस्मान्‌ [जो पत्ता (पेडका पत्ता) आ रहा है वह हमे तारेगा (नदीके सामनेके छोर पर ले जाएगा)]

भारतीय विपक्षगठबंधनमें काले कोटवाले वकिल प्रचूर मात्रामें है;

सामान्यतः ऐसा माना जाता है कि वकिल महाजन लोगोंका धेय धनप्राप्ति होता है. धनकी तूलनामें सभी चीजे गौण है. उनको प्रधान मंत्री नहीं बनना है. इस लिये, इन वकिलोंका कोंगीको शोभायमान करना स्वाभाविक ही है. एक मंत्री बन जाना, या तो प्रवक्ता बन जाना और अपने तरिकोंसे पैसे कमा लेना. ये बात तो लंबी है. इसका विवरण हम नहीं करेंगे.

लेकिन आप कहोगे कि अब तो कोंगी के नेतृत्ववाला शासन तो रहा नहीं तो ये वकिल लोग पैसे कैसे बना सकते है?

अरे भाई, नहेरुवीयनोंके पास जो पैसे है, उन नहेरुवीयनोंकी स्थावर और जंगम संपत्तिके आगे  कुबेर भी मूँह छिपा लेता है. और कोंगी शासन अंतर्गत जो अन्य हवालावाले धनपति बने थे उनको मोदी-शासनमें, वकिलोंकी आवश्यकता पडने लगी है. इस प्रकार अब तो वकिलोंके दोनों हाथोंमें लड्डु है.

कोंगी कुछ ऐसा कहेती है;

लेकिन भाई, अपना शासन वह अपना शासन है. अपना शासन हो और उसके हम मंत्री, या कमसे कम प्रवक्ता हो तो बस क्या कहेना !!

“हाँ जी, आपकी बात सही है. और इसका मार्ग हमने निश्चित कर दिया है. बस अब थोडीसी मुश्किलें है, उसका समाधान करना है …९

आप कोंगी गेंगसे पूछोगे; “क्या आपने अपना मार्ग निश्चित कर दिया है और वह सुनिश्चित भी हो जायेगा ? क्या बात है? कमाल है? क्या आयोजन है आपका? कुछ बताओ तो सही !!

गेंग बोली; “देखो … मोदीकी सर्जीकल स्ट्राईकके विषय पर तो हमने कई प्र्श्न चिन्ह लगाया है. वैसे तो हमें देशकी मीडीयासे अधिकतर सहयोग नहीं मिला है, किन्तु कुछ विदेशी मीडीया , (जो पहेलेसे ही भारतकी बुराई करनेकी आदत वाले है), उन्होंने कुछ मुद्देकी चर्चा की है उसको हम हमारे अनुकुल अर्थघटन करके, हमारे विवादको अधिक बढावा दे के, आम जनताको असमंजसमें डाल सकते है. यह तो एक बाय प्रोडक्ट है. इससे क्या हुआ है कि पाकिस्तानकी सरकार और पाकिस्तानी मीडीया हमारे उठाये प्रश्नचिन्होंका सहारा लेके पाकिस्तानकी जनतामें विश्वास दिलाते है कि ये सभी सर्जीकल स्ट्राईक फर्जी थीं.

अब हुआ है ऐसा कि;

पाकिस्तानकी सुज्ञ जनता मोदीकी बात मान रही है. पता नहीं आखिरमें इसका नतीजा क्या होगा. वहाँकी जनता यदि मोदी आतंकवादीयोंका सफाया करें तो खुश है. वहाँकी जनता चाहती है मोदी जैसा प्रधान मंत्री पाकिस्तानको मिले.

कोंगी गेंगके लोग कहेते है; “आप यहाँ भारतकी परिस्थिति देखो. यहाँ जो मुसलमान है, उनके तो हम खाविन्द है. उनके मत तो हमे मिलने वाला ही है. हिन्दु आम  जनता है उसको तो हम विभाजित करनेकी भरपूर कोशिस करेंगे. जितनी सफलता मिलेगी उतना ही हमें तो नफा होगा. मीडीयामें और सामाजिक तत्त्वोमें जिनकी दुकान बंद हो गयी है वे भी तो हमारे पक्षमें है. हम सब वंशवादी तो इकठ्ठे हो गये ही है. साम्यवादी और नक्षल वादी भी हमे सहयोग कर रहे है. सीमा पारके आतंकवादी हमें सहाय कर रहे है इस बातको शासकपक्ष उठावे उससे पहेले हमने ही प्रचारका प्रारंभ कर दिया है कि मोदीकी सर्जीकल स्ट्राईक फर्जी है. नरेन्द्रमोदीने और इमरान खानके साथ चूनावमें फायदा उठानेके लिये  फीक्सींग किया है.

कोंगी गेंग आगे कहेती है; “अब देखो. हमारी समस्या थोडी अलग है. हमें डर है कि भारतके कुछ मुसलमान मोदीकी विकासकी बातोंमें और जनकल्याणकी बातोंमें आ सकते है. हमारे पास प्रधान मंत्रीके पदके लिये  कोई सर्वमान्य नेता नहीं है. इस लिये हम सोचते है कि;

क्यूँ न हम इमरान खानको ही विपक्षका प्रधान मंत्री पद पर सर्वमान्य नेता घोषित करें !!

इसमें हमें फायदा ही फायदा है …

(१) सभी मुस्लिम आंखे बंद करके हमें वोट करेंगे …

(२) सर्जीकल स्ट्राईकके बारेमें हमने जो प्रश्नचिन्ह लगाये हैं, उनका फर्स्ट हेन्ड उत्तर इमरान खानको देनेका होगा. और इमरान खान तो हमें अनुरुप हो वैसा ही उत्तर देगा. वह थोडा कहेगा “आ बैल मुज़े मार”. इसलिये भारतकी सामान्य जनता को इमरान खान की बातको मानना पडेगा …

(३) इमरान खान की इमानदारी पर कोई भारतीय शक नहीं करेगा क्यों कि भारतमें एक प्रणाली हमने स्थापित की है कि जिसके उपर कोई आरोप नहीं, वह व्यक्ति यदि हमारा है, तो उसको “मीस्टर क्लीन” ही कहेनेका. जैसे कि, हमने राजिव गांधीको मीस्टर क्लीन का खिताब दे दिया था.

(४) पुरुषके लिये एक से अधिक शादी करना इस्लाममें प्रतिबंधित नहीं है. इस्लाममें बिना तलाक दिये पुरुष चार शादी कर सकता है. जब कि इमरानने तो तलाक दे कर शादियाँ की है. इमरान खान तो पवित्र पुरुष है.

(५) इमरान खान, आम जनताके कल्याण के लिये प्रतिबद्ध है. इस लिये मोदी जो कहा करता है “कि मैं जनसामान्यकी भलाईके लिये प्रतिबद्ध हूँ” उसकी हवा निकल जायेगी. मोदीके काम को हम लोग फुक्का (रबरका बलुन जिसमें हवा भरकर बडा किया जाता है. पटेलोंको भी बलुन कहा जाता है. लेकिन यहां पर बलुन उस अर्थमें नहीं है) कहेते हैं वह भप्प करके फूट जायेगा.

(६) मोदी अपने वस्त्रोंकी और उपहार सौगादोंकी नीलामी करके गरीबोंकी योजनाओंमें दान कर देता है, तो इमरान खान तो सरकारी सामानकी भी नीलामी करके सरकारमें जो कर्मचारी काम करते हैं उनके वेतनका भूगतान करता है. क्या ये कम है?

(७) इमरान खान तो खूबसुरत भी है. हम उसकी खूबसुरतीका सहारा लेंगे. वैसे तो ऐसी बातोंकी तो हमें आदत है. प्रियंका वाईदरा-घांडीके रुप, स्वरुप, सुरुप, अदाएं, वस्त्र परिधान, वस्त्रोंके रंगोंकी उसकी अफलातून पसंद, वस्त्रोंके उपरका डीज़ाईन वर्क, ड्रेस मटीरीयलकी उच्चता,  उसकी बहेतरिन चाल, केशकलाप, आंखे-नज़रें,  उसके कथनोंके गुढार्थ आदि को विवरित करके प्रियंकाको बढावा दिया था और देते भी हैं. इस प्रकार, उसको जनतामें ख्याति, प्रख्याति देनेमें हम सक्रिय हो गये थे ही न? और आप जानते ही है कि प्रियंकाके आनेसे सियासी समीकरण बदल गये थे ऐसा भी हमने प्रसारित करवाया था. अब तो हमारे पास इमरानखान भी आ गया है. महिला वर्ग चाहे वह मुसलमान हो या हिन्दु, इमरान खानके उपर मरेगा. आपको मालुम है,राजिव गांधी की १९८४की जीतमें महिला मतोंका भारी योगदान रहा था. तो समज़ लो इमरानि खान भी दुसरा राजिव गांधी ही है. अरे भाई, इमरान खान को तो लेडी-कीलर माना जाता है.

(८)  इसके अतिरिक्त हम, मोदी जो भी, विकासके बारेमें बोलता रहेता है वह सब जूठ है, इस बातको हम बढावा देंगे. अरे भाई जब युवा लोग ही बेकार है, तो विकास कैसे हो सकता है?  विकासकी सभी बातें जूठ ही है. यदि भारतके युवाओंको काम मिलेगा तभी तो वे बेकार नहीं रहेंगे. यदि युवा लोग ही बेकार है तो काम होता ही कैसे? क्या भूत-प्रेत आके मोदीका विकासका काम करते हैं?

(९) कुछ लोग व्यर्थ और मीथ्या प्रालाप करते हैं कि;

(९.१) इमरान खान तो पाकिस्तानका नागरिक है. भारतका प्रधान मंत्री तो क्या संसदका सदस्य बनने के लिये भी भारतका नागरिकत्व चाहिये.

लेकिन हम कोंगीयोंके हिसाबसे यह सब बकवास है. अरे भाई, हम तो उसको बेक-डेटसे (रीट्रोस्पेक्टीव इफेक्टसे =भूतलक्षी प्रभावसे) भारतका नागरिक बनादेंगे. अरे भाई फर्जी कागजात बनाना हम कोंगीयोंके लिये बायें हाथका खेल है. सरकारी अफसरोंमें हमारी पहूँच अभी भी कम नहीं है.

“आप कहोगे कि यदि बात न्यायालय में जायेगी और भंडा फूट जायेगा तो?

“अरे भाई, समजो जरा … वकिल लोग किसके पास ज्यादा है? तुम्हारे पास कोई भी वकिल हो, हमारे पास राम है. यानी कि राम जेठमलानी है. वे अति अति वरिष्ठ है.उनकी बात तो न्यायालयको माननी ही पडेगी. और तूम्हे ज्ञात नहीं होगा कि हम सेटींगमें सिर्फ “जमानत” ही ले सकते है इतना नहीं है, हम किसी भी केसको दशकों तक ठंडे बक्षोंमे डाल सकते है. तब तक तो हमारा इमरान खान प्रधान मंत्री रहेगा ही न.

(९.२) अरे तुम याद करो. १९६९के चूनावमें हमारी आराध्या इन्दिरा माईने यही तो किया था. उसका चूनाव का केस, उच्च न्यायालयमें चलता था. सालो तक चला. जब निर्णय आया तो पता है निर्णय के क्या शब्द थे? “इन्दिरामाईकी संसद सदस्यता रद हुई और वह ६ वर्षके लिये चूनावी प्रत्याशीके लिये अयोग्य ठहेरी. तो भी वह प्रधान मंत्री पदके लिये चालु रह सकती है” और वह प्रधान मंत्री पद पर चालु रही उतना ही नहीं, उसने आपातकाल भी घोषित किया. और जो तकनीकी वजहसे वह अयोग्य ठहेरी थी उस नियमको रीट्रोस्पेक्टिव इफेक्ट से (भूत लक्षी प्रभावसे) बदल डाला. अब देखो जो संसद सदस्यके लिये योग्य  ६ सालके लिये योग्य नहीं है, और जिसको ६ महिनेमें ही संसदका सदस्य बनना है जो बिलकुल अशक्य है, तो भी वह प्रधान मंत्री पद पर बनी रहेती है. है न, न्यायालयका कमाल? हम कोंगी लोग, जब बात हम नहेरुवीयनोंके उपर आती है, तो हम नामुमकिनको मुमकिनमें बदल देते हैं. खास करके न्यायालयके अनुसंधानमें ऐसा करना हमें खूब आता है.

(९.३) हम शासक नहीं होते है तो भी हम सरकारस्थ अधिकारीयोंको पोपट बना सकते है. परोक्ष तरिकेसे तो हम कर ही सकते है. देखा न आपने राम-जन्म भूमिका मामला?

(९.४) आप कहोगे, कि, तो फिर  रा.घा.का क्या होगा?

अरे भाई, वैसे भी पाकिस्तानमें इमरान खान आर्मी और  आई.एस.आई. के रीमोटसे तो शासन करता है. तो भारतमें भी वह रा.घा., सोनिया, प्रियंका, रोबर्ट इन चारोंका मौना बनके रहेगा क्योंकि उनके पास ही तो रीमोट रहेगा. इमरान खानको क्या फर्क पडेगा. इमरान खान तो मनमोहन सिंघ की तरह अंगूठा मारनेका काम करता रहेगा.

(१०) इस मामले पर पाकिस्तानी जनता खुश है. क्यों कि उनको वैसे भी मोदी जैसा प्रधान मंत्री चाहिये. अब यदि उनको मौदी खुद ही प्रधान मंत्रीके पद पर मिल जाय तब तो बल्ले बल्ले.

शिरीष मोहनलाल दवे

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पाकिस्तानके बुद्धिजीवीयोंको चाहिये एक नरेन्द्र मोदी … और …. – ३

पाकिस्तानके बुद्धिजीवीयोंको चाहिये एक नरेन्द्र मोदीऔर …. –

पाकिस्तान के आतंकवादीयोंने स्थानिक लोगोंकी मददसे भारतकी सेना पर बोम्ब ब्लास्ट किया इससे अस्थायी रुपसे बीजेपी/मोदी विरोधीयोंने हिन्दुओंकी एवं बीजेपी समर्थकोंकी असहिष्णुताके बारेमें बोलना बंद किया है.

पहेले जिन शब्दोंके उच्चारणोंका ये अफज़ल प्रेमी गेंग अपना हक्क और अपने इस हक्कको  लोकशाहीका एक अभिन्न अंग मानते है, और उसकी दुहाई देते थे उन्ही लोगोंने उनके पुनः उच्चारण पर एक अल्पविराम लगा दिया है. वे लोग दिखाना यह चाहते है कि हम भी सिपाईयोंके कुटुंबीयोंके दर्दमें सामील है. क्या यह इन अफज़लप्रेमी गेंगका विचार परिवर्तन है?

जिन शब्दोंको पहेले अभिव्यक्तिकी आज़ादी माना जाता था वे शब्द कौनसे थे?

पाकिस्तान जिंदाबाद,

भारत तेरे टूकडे होंगे

कश्मिरको चाहिये आज़ादी,

छीनके लेंगे आज़ादी,

बंदूकसे लेंगे आज़ादी,

अफज़ल हम शर्मिंदा है, कि तेरे कातिल जिन्दा है,

कितने अफज़ल मारोगे… घर घरसे अफज़ल निकलेगा,

आज इन्ही लोगोंमें इन सबका पुनः उच्चारण करनेकी शौर्य नहीं है.

ऐसा क्यों है?

पाकिस्तानके, आई.एस.आई.के, पाकिस्तानी सेनाके और आतंकवादीयोंके चरित्रमें तो कोई बदलाव आया नहीं है. फिर भी ये लोग अपने विभाजनवादी उच्चारणोंकी पुनरुक्ति क्यों नहीं करते? पहेले तो वे कहेते थे कि उच्चारणोसे गद्दारी सिद्ध नहीं होती है. ये नारे तो जनतंत्रका अभिन्न हिस्सा है. मोदी/बीजेपी वाले तो संविधानका अनादर करते है और यह मोदी/बीजेपी जैसे जनतंत्रके विध्वंशक है और वे हमारी अभिव्यक्तिकी आज़ादी  छीन रहे है.

यदि कोई समज़े कि ये स्वयंप्रमाणित स्वतंत्रताके स्वयंप्रमाणित सेनानीयोंको मोदी/बीजेपीकी विचारधारा समज़में आ गयी है तो आप अनभिज्ञतामें न रहे. पाकिस्तान प्रेरित ये आतंकवादी आक्रमणसे जो पाकिस्तान विरोधी वातावरण बना है इस लिये इन विभाजनवादी गेंगोंमें फिलहाल हिमत नहीं कि वे पाकिस्तान का समर्थन करे. उन्होंने एक अल्प समयका विराम लिया है. अब तो यदि कोई इस हमलेको “पाकिस्तानकी भारतके उपर सर्जिकल स्ट्राईक कहे … इतना ही नहीं पाकिस्तान जिन्दाबाद कहे और भारत सरकार उसके उपर कारवाई करें तो भी ये लोग अभिव्यक्तिकी आज़ादी के समर्थनमें चूँ तक नहीं बोलेंगे. हाँ जी अब आप पाकिस्तान जिंदाबाद तक नहीं बोल सकते.

विभाजनवादी गेंगोंका मौन रहना और सरकारके उच्चारणोंका और कदमोंके विरुद्ध न बोलना और मौन द्वारा समर्थन प्रदर्शित करना ये सब हकिकत क्या है?

हम जानते ही है कि पुरस्कार वापसी, हिन्दुओंकी अन्य धर्मोंके प्रति असहिष्णुता, बीजेपी सरकार द्वारा जनतंत्रका हनन, नारे लगानेसे गद्दारी सिद्ध नहीं होती… आदि वाक्‌चातुर्य दिखाने वालोंका समर्थन, वंशवादी कोंगी नेताओंने, टीवी चेनलओंने, मूर्धन्योंने विवेचकोंने, विश्लेषकोंने, कोंगीके सांस्कृतिक सहयोगीओंने उनके पास चलकर जाके किया था.

क्या ये सब तो कोंगीयोंकी एक बडी गेम का हिस्सा था?

कोंगीयोंकी और उनके सांस्कृतिक साथी पक्षोंकी गेम क्या है?

हम जानते हैं कि जूठ बोलना कोंगीयोंकी पूरानी आदत है. चाहे वह नहेरु हो, इन्दिरा घांडी हो, राजिव घांडी हो, सोनिया घांडी हो या रा.घा. (रा.गा.) हो. अमान्य तरिकोंसे पैसे कमाना यह भी इन्दिराने आत्मसात्‌ की हुई आदत है. इन सबसे सत्ता प्रप्त करना और सत्ता प्रप्तिके बाद भी यह सब चालु रखना यह उनका संस्कार है.

अब हुआ क्या, कि कौभान्डोंके कारण कोंगीकी सत्ता चली गई. और नरेन्द्र मोदीने अवैध तरिकोंसे प्राप्त संपत्तिके लिये जाँच बैठा दी. वैसे तो कई किस्से पहेलेसे ही न्यायालयमें चलते भी थे. इन जाँचोंमेंसे निष्कलंक बाहर आना अब तो मुश्किल हो गया है, क्यों कि अब तो उनके पास सत्ता रही नहीं.

तो अब क्या किया जाय?

सत्ताप्राप्त करना अनिवार्य है. हमारा मोटो सत्ताप्राप्त करना. क्यों कि हमे बचना है. और बचनेके बाद हमारी दुकान चालु करनी है.

सबने मिलकर एक महागठबंधन बनाया. क्योंकि अवैध संपत्ति प्राप्ति करनेमें तो उनके सांस्कृतिक साथी पक्ष और कई मीडीया कर्मी भी थे. अब इस मोदी/बीजेपी हटाओके “गेम प्लान”में सब संमिलित है.

चूनाव उपयुक्त माहोलसे (वातावरण बनानेसे) जिता जाता है. मोदी/बीजेपीके विरुद्ध माहोल बनाओ तो २०१९का चूनाव जिता जा सकता है.

जूठ तो हम बोलते ही रहे है, हमारा रा.घा. (रा.गा.) तो इतना जूठ बोलता है कि वह सुज्ञ जनोंमे अविश्वसनीय हो गया है. लेकिन हमें सुज्ञ जनोंसे तकलिफ नहीं है. उनमेंसे तो कई बिकाउ है और हमने अनेकोंको खरिद भी लिया है. मीडीया भी बिकाउ है, इस लिये इन दोंनोंकी मिलावटसे हम रा.घा. को महापुरुष सिद्ध कर सकते है. अभी अभी जो मध्यप्रदेश, और राजस्थान और छत्तिसगढ में जित हुई है उसको हम मीडीया मूर्धन्योंकी सहायतासे रा.घा.के नाम करवा सकते है. रा.घा.के लगातार किये जा रहे जी.एस.टी., विमुद्रीकरण और राफेल प्रहारोंको हम अपने मीडीया मूर्धन्यों के द्वारा जिन्दा रखेंगे. प्रियंका को भी हम समर भूमिमें उतारेंगे और उसके सौदर्यका और अदाओंका सहारा लेके उसको महामाया बनाएंगे.

कोंगीके सीमा पारके मित्रोंका क्या प्लान है?

मणीशंकर अय्यर ने पाकिस्तान जाके कहा था कि, “मोदी को तो आपको हटाना पडेगा” जब तक आप यह नहीं करोगे तब तक दोनों देशोंके पारस्परिक संबंध और वार्ता शक्य नहीं बनेगी.

इसका सूचितार्थ क्या है?

“हे पाकिस्तानी जनगण, आपके पास मूर्धन्य है, आपके पास आइ.एस.आइ. है, आपके पास सेना है, आपके पास कई आतंकवादी संगठन है. याद करो… आपने उन्नीसौ नब्बे के दशक में कश्मिरके हमारे सहयोगी पक्षके मंत्रीकी पूत्री तकका हरण कर सकनेका सामर्थ्य दिखाया था. तो हमने आपके कई आतंकवादी महानेताओंको रिहा किया था. हमारे शासनके बाद की सरकारने भी कुछ आतंकवादी नेताओंको रिहा किया था. आपके पास हरकत उल जिहाद, लश्करे तोइबा, जैश ए मोहमद, हिजबुल मुज़ाही दीन, हरकत उल मुज़ाहीन, अल बद्र, जे एन्ड के लीबरेशन फ्रन्ट जिसको फुलेफलने हमने ही तो आपको मौका दिया था. आपके समर्थक  

अब्दुल गनी लोन, सैयद अली गीलानी, मिरवाज़ ओमर फारुख, मोहमद अब्बास अन्सारी, यासीन मलिक आदि कई नेताओंको, हमने पालके रक्खा है और हमने उनको जनतंत्रका और संविधानका फर्जी बहाना बनाके श्रेष्ठ सुविधाएं दी है. तो ये सब कब काम आयेंगे? और देखो … आपके खातिर ही हमने तो इज़राएलसे राजद्वारी संबंध नहीं रक्खे थे. आपको तो हम, हर प्रकारकी मदद करते रहे हैं और कश्मिरकी समस्या अमर रहे इस कारणसे हमने आपकी हर बात मान ली है. मुफ्ति मोहमद, फारुख अब्दुल्ला और ओमर अब्दुल्ला आदि तो हमारे भी मित्र है.

“अरे भाई, आपकी सुविधा के लिये आपके लोगोंने जब कश्मिरमें हजारों हिन्दु स्त्रीयों पर बलात्कार किया, ३०००+ हिन्दुओंका कत्ल किया जब ५ लाख हिन्दुओंको कश्मिरसे १९८९-९०मे बेघर किया तो हमारी कानोंमें और हमारे पेईड आदेशोंके प्रभावके कारण हमारी मीडीयाकी कानोंमे जू तक रेंगने नहीं दी थी. क्या ये सब आप भूल जाओगे?

“अरे भाई, ये फारुख और ओमर को तो हमने मुख्य मंत्री भी बना दिया था. और हमने भरपूर कोशिस की थी कि फिरसे ये साले कश्मिरी हिन्दु, कश्मिरमें, फिरसे बस न पाये. ये भी क्या आप भूल गये? हमने आपको मोस्ट फेवर्ड राष्ट्रका दरज्जा दिया है, हमने आपके दाउदको भारतसे भागनेकी सुविधा दी थी. और भारतके बाहर रखकर भी भारतमें अपने संबंधीओ द्वारा अपना कारोबार (हवाला-वाला, तस्करी, हप्ता, बिल्डरोंकी समस्या आदि आदि) चला सके उसके लिये भरपूर सुविधाएं दी है उनको भी क्या आप भूल जाओगे? अरे भाई आपके अर्थतंत्रमें  तो दाउदका गणमान्य प्रभाव है. क्या आप इसको भी भूल जाओगे?

“अरे मेरे अय्यर आका, आपको क्या चाहिये वह बोलो न..!!” पाकिस्तान बोला

मणीशंकर अय्यर बोले; “ देखो, मुज़े तो कुछ नहीं चाहिये. लेकिन आपको पता होगा कि मुज़े भी किसीको जवाब देना है … !!

“हाँ हाँ मुसलमान ख्रीस्ती भाई भाई … यही न !! अरे बंधु, वैसे तो हम मुसलमान, ख्रीस्ती और दलित भाई भाई भाई वैसा प्रचार, आपके यहाँ स्थित हमारे नेताओंसे करवाते है, लेकिन हमसे वह जमता नहीं है, वैसे भी हिन्दुओंको जातिके आधार पर विभाजित करनेका काम तो आप कर ही रहे हो न? जरा और जोर लगाओ तो मुसलमान, ख्रीस्ती दलित, पटेल, जट, यादव सब भाई, भाई, भाई, भाई भाई हो जायेगा ही न?” पाकिस्तान बोला.

“सही कहा आपने” अय्यर आगे बोले; “हमारा काम तो हम कर ही रहे है. हम कुछ दंगे भी करवा रहे है, आपको तो मालुम है कि दंगे करवानेमें तो हमे महारथ हांसिल है, लेकिन यह साला मोदी, बीजेपी शासित राज्योंमें दंगे होने नहीं देता. हम हमारे महागठबंधनवाले राज्योंमें तो दंगे करवाते ही है, लेकिन उसकी भी एक सीमा है. आप कुछ करो न…? कुछ बडे हमले करवाओ न…? हम आपको, जो भी भूमिगत सहाय चाहिये, वह देगें. हम ऐसे आतंकी हमले मोदी/बीजेपी/आरएसएस/वीएचपी ने करवाये वैसी व्युह रचना करवाएंगे. लेकिन यदि आप बोंम्बे ब्लास्ट जैसा, हमला करवायेंगे तो ठीक नहीं होगा. वह साला कसाब पकडा गया, तो इससे हमारा पुरा प्लान फेल हो गया. वह ब्लास्ट आपके नाम पर चढ गया. इसलिये आप हमेशा आत्मघाती आतंकीयोंको ही भेजें. हमने जैसे मालेगाँव बोम्ब ब्लास्ट, हिन्दुओंने करवाया था, ऐसा प्रचार सालों तक हमने किया था और २००९के चूनावमें हमने जित भी हांसिल कर ली थी. आपका आदमी जो पकडा गया था उसको हमने भगा भी दिया था. क्यों कि हमारी सरकार थी न, जनाब.

“तो अभी आप हमसे क्या चाहते है? “ पाकिस्तानने बोला

“आपके पास दो विकल्प है” कोंगीनेताने आगे बोला “आपके पास कई आतंकवादी संगठन है. आप उनको कहो कि वह मोदीकी गेम कर दें. हमने गत चूनावमें बिहारमें मोदीको मारनेका प्लान किया था. मोदीकी पटनाकी रेली में हमने मोदीकी गेमका प्लान बनाया था. लेकिन साला मोदी बच गया. अब आप ऐसा करो कि यदि मोदीकी गेमका फेल हो जाय तो भी दुसरे विकल्पसे हमें मदद मिलें. आप कुछ बडे आतंकवादी हमले करवा दो, कोई और जगह नही तो तो कश्मिरमें ही सही.

“इससे क्या फायदा” पाकिस्तान बोला.

“देखो बडे हमले से भारतमें बडा आक्रोष पैदा होगा. बदले कि भावना जाग उठेगी. समय ऐसा निश्चित करो कि, मोदीके लिये बदला लेनेका मौका ही न रहे. मोदी न तो युद्ध कर सकेगा न तो सर्जीकल स्ट्राईक कर सकेगा. यदि मोदीने सर्जीकल स्ट्राईक कर भी दी तो वह विफल हो जायेगा,  क्यों कि आप तो सुरक्षाके लिये तयार ही होगे. मोदीके फेल होनेसे हमे बहोत ही फायदा मिल जायेगा. कमसे कम एक मुद्दा तो हमारे पास आ जायेगा कि मोदी १००% फेल है. वैसे तो हम, मोदी हरेक क्षेत्रमें फेल है, ऐसी अफवाहें फैलाते ही रहेतें है. लेकिन इस हमले के बाद मोदीकी जो पराजय होगी, इस फेल्योरको तो मोदी समर्थक भी नकार नहीं सकेंगे. हमारी मीडीया-टीम तो तयार ही है.

“बात तो सोचने लायक है” पाकिस्तान बोला.

“अरे भाईजान अब सोचो मत. जल्दी करो. समय कम बचा है. चूनावकी घोषणाका एक मास ही बचा है. जैसे ही एक बडा ब्लास्ट होगा, हमारे कुछ मीडीया मूर्धन्य दो तीन दिन तो सरकारके समर्थनमें और आपके विरुद्ध निवेदन बाजी करेंगे. धीरे धीरे चर्चाको मोदी की विफलताकी ओर ले जायेंगे.

बडा ब्लास्ट करना है तो पूर्व तयारी रुप काम करना ही है.

जम्मु कश्मिर राज मार्ग पर एक आतंकी/आतंकी समर्थक गाडी ले के निकला. रास्तेमें तीन चेक पोस्ट आये. दो चेक पोस्ट वह तोडके निकल गया. लेकिन जब तीसरा चेकपोस्ट उसने तोडा और भागा तो तीसरे चेकपोस्टवाले सुरक्षा कर्मीने गोली छोडी और वह आदमी अल्लाहका प्यारा हो गया. फिर तो कोंगी गेंग वाले मीडीया मूर्धन्य और फारुख, ओमर और महेबुबा आदि तो अपना आक्रोष प्रदर्शित करनेके लिये तयार ही थे. उन्होंने “एक सीटीझन को मार दिया, एक निर्दोष मानवीकी हत्या की, एक बेकसुरको मार दिया, एक मासुम को मार दिया…” मीडीया मूर्धन्योंने इस घटनाकी भर्त्सना करनेमें पूरा साथ दिया और कोंगी शासनकी कृपासे बने हुए नियमों से उस जवान को कारावासमे भेज दिया.  फिर यह सब चेक पोस्ट हटवा लिया. इसका फायदा पुलवामा में ब्लास्ट करनेमें आतंकीयोंने लिया.

अब कोंगीयोंका क्या चाल है?

कोंगीके सहायक दलोंने दो दिन तक तो मगरके आंशुं बहाये. लेकिन उसके कुछ मीडीया मूर्धन्य और मीडीया मालिक अधीर है. गुजरात समाचारकी बात तो छोडो. उसने तो पहेले ही दिन मोदीका ५६” की छातीपर मुक्का मार दिया. यह अखबार हमारी कोमेंट के लिये योग्य स्तर पर नहीं है. वह तो टोईलेट पेपर है

लेकिन तीसरे दिन डीबीभाईने (“दिव्य भास्कर” अखबारने) मैदानमें आगये. उन्होंने मोदीको   प्रश्न किया “अब तो मुठ्ठी खोलो और बताओ कि बदला कब लोगे?

मतलब की किस प्रकारका बदला कब लोगे वह हमें (“हमें” से मतलब है जनता को) कब कहोगे?

डीबीभाईकी बालीशता या अपरिपक्वता?

“आ बैल मुझे मार”

सरकार अपने प्रतिकारात्मक कदम पहेलेसे दुश्मनको बता दें, वह क्या उचित है? कभी नहीं. यदि कोई बेवकुफ सरकारने ऐसा किया तो वह “आ बैल मुज़े मार” जैसा ही कदम बनेगा. क्या ऐसी आसान समज़ भी इस अखबारमें नहीं है? शायद सामान्य कक्षाकी जनता, इस बातको समज़ नहीं सकती, लेकिन यदि एक विशाल वाचक वर्ग वाला अखबार, मोदीके विरुद्ध माहोल बनाने के लिये ऐसी बेतुकी बाते करे वह अक्षम्य है. वास्तवमें अखबार का एजन्डा, आम कक्षाकी जनताको गुमराह करनेका है. ताकि जनता भी मोदी पर दबाव करे कि मोदी तुम अपना प्रतिकारात्म प्लान खुला करो.

डीबीभाई के मीडीया मूर्धन्य कोलमीस्ट भी डीबीभाई से कम नहीं.

शेखर गुप्ताने तो एक परोक्ष मुक्का मार ही दिया. “क्या मोदी ‘इस कलंक’ के साथ चूनाव लड सकता है.?” मतलब कि शे.गु. के हिसाब से यह ब्लास्ट, “मोदीके लिये कलंक है.” याद करो कोंगी के नेतृत्ववाली सरकारमें तो आये दिन आतंक वादी, देशके भीतरी भागोंमें घुस कर बोम्ब ब्लास्ट किया करते थे तो भी इन महानुभावोने कोंगी उपर लगे वास्तविक कलंकको अनदेखा किया था. और प्रमाणभान रक्खे बिना, बीजेपी के विरुद्ध प्रचारको कायम रक्खा था. कोंगी अनगीनत कौभान्डोसे आवरित होने पर भी कोंगी के नेतृत्व वाली सरकारको जितानेमें भरपुर सहयोग दिया था. आज मोदीने आतंकवाद को काश्मिरके कुछ इलाकों तक सीमित कर दिया है और जो हमला हुआ उसके लिये तो, महेबुबा मुफ्ति, ओमर अब्दुल्ला, फारुख और कोंगीके नेतागण उत्तरदेय है. उनके उपर ही कार्यवाही करना चाहिये. इस हकिकतका तो, शे.गु. जिक्र तक नहीं करता है. उनका दिमाग तो जनताको उलज़नमें डालनेका है.

ममताने तो अभी से बोल ही दिया कि बिना सबुत पाकिस्तान स्थित आतंकवादी नेताओं पर कार्यवाही करनेको कहेना सही नहीं है. ममता का माइन्ड-सेट कैस है इस बातको आपको देखना चाहिये. कोंगीके कार्यकालमें और उरी एटेकमें सबुत दिये तो उसपर कार्यवाही क्यों नहीं की? इस तथ्यका ममता जिक्र नहीं करेगी. क्यों कि वह चाहती है कि अधिकतर मुसलमान और नेता आतंकवादी हमलेसे खुश है और उनको मुज़े नाराज करना नही चाहिये. केज्रीवाल और ममता एक ही भाषा बोलते है क्यों कि मुसलमान उनकी वोट-बेंक है.

सुज्ञ मुसलमानोंको ऐसे कोमवादी पक्षोंको वोटदेना नहीं चाहिये.

कोंगी और उसके सांस्कृतिक अहयोगी थोडे ही दिनोंमें “पुलवामा” एपीसोड के बीजेपी पर आक्रमण करने लगेंगे. क्यों कि सब उनके आयोजनके हिसाबसे आगे बढ रहा है.

यदि पाकिस्तान मोदीको हटाने पर तुला हुआ है. तो “पाकिस्तानको एक मोदी चाहिये” उसका मतलब क्या?

वास्तवमें पाकिस्तानकी जनता उनकी भ्रष्ट सियासतसे, सेनासे और आतंकवादीयोंसे तंग आ गई है. पाकिस्तानकी जनताका स्वप्न है उन्हे मोदी जैसा इमानदार, त्यागी, ज्ञानी, काम करनेवाला और होशियार प्रधान मंत्री मिले.

और भारतकी जनताको स्वप्नमें भी खयाल नहीं था कि उसको इमानदार, त्यागी, ज्ञानी, काम करनेवाला और होशियार प्रधान मंत्री मिल सकता है. वास्तवमें ऐसा प्रधान मंत्री भारतकी जनता को मिला, तो भारतके तथा कथित मीडीया मूर्धन्य, भारतकी जनता कैसे मोदी-मूक्त बने उसके बारेमें कारवाईयां कर रही है. यह भी एक विधिकी वक्रता है.

शिरीष मोहनलाल दवे

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पाकिस्तानके बुद्धिजीवीयोंको चाहिये एक नरेन्द्र मोदी … और ….

नरेन्द्र मोदीकी कार्यशैलीके बारेमें अफवाहोंका बाज़ार अत्याधिक गरम है. क्यों कि  अब मोदी विरोधियोंके लिये जूठ बोलना, अफवाहें फैलाना, बातका बतंगड करना और कुछ भी विवादास्पद घटना होती है तो मोदीका नाम उसमें डालना, बस यही बचा है.

लेकिन, ऐसा होते हुए भी …

हाँ साहिब, ऐसा होते हुए भी … पाकिस्तानके (१०० प्रतिशत शुद्ध) बुद्धिजीवीयोंको चाहिये एक नरेन्द्र मोदी जैसा प्रधान मंत्री. बोलो. पाकिस्तान जो मोदीके बारेमें जानता है वह हमारे स्वयं प्रमाणित बुद्धिजीवी नहीं जानते.

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पाकिस्तानके १००% शुद्ध बुद्धि वाले हसन निस्सार साहिबने अपनी इच्छा प्रगट की है कि पाकिस्तानको चाहिये एक नरेन्द्र मोदी. हमारे १०० प्रतिशत शुद्ध बुद्धिजीवी “मोदी चाहिये” इस बात बोलनेसे हिचकिचाते है.

बुद्धिजीवी

हमारे वंशवादी पक्षोंको ही नहीं किन्तु अधिकतर मूर्धन्यों, विश्लेषकों, कोलमीस्टोंको, चेनलोंको तो चाहिये अफज़ल गुरु. एक नहीं लेकिन अनेक. अनेक नहीं असंख्य. क्यों कि इनको तो भारतके हर घरसे चाहिये अफज़ल गुरु.

हाँजी, यह बात बिलकुल सही है. जब जे.एन.यु. के कुछ तथा कथित छात्रोंने (जिनका नेता २८ सालका होनेके बाद भी भारतके करदाताओंके पैसोंसे पलता है तो इसके छात्रत्व पर प्रश्न चिन्ह लग जाता है ही)  भारतके टूकडे करनेका, हर एक घरसे एक अफज़ल पैदा करनेका,  भारतकी बर्बादीके नारे लगाते थे तब उनके समर्थनमें केज्री, रा.गा., दीग्गी, सिब्बल, चिदु, ममता, माया, अखिलेश, अनेकानेक कोलमीस्ट, टीवी चेनलके एंकर और अन्य बुद्धिजीवी उतर आये थे.  तो यह बात बिलकुल साफ हो जाती है कि उनकी मानसिकता अफज़ल के पक्ष में है या तो उनका स्वार्थ पूर्ण करनेमें यदि अफज़ल गुरुका नाम समर्थक बनता है तो इसमें उनको शर्म नहीं.

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जो लोग यु-ट्युब देखते हैं, उन्होने ने पाकिस्तानके हसन निस्सार को अवश्य सूना होगा. जिनलोंगोंने उनको नहीं सूना होगा वे आज “दिव्य भास्कर”में गुणवंतभाई शाहका लेख पढकर अवश्य हसन निस्सार को युट्युब सूनेंगे.

हमारा दुश्मन नंबर वन, यानी कि पाकिस्तान. वैसे ही पाकिस्तानका दुश्मन नंबर वन यानीकी भारत. तो पाकिस्तानके बुद्धिजीवीयोंको भी उनके लिये चाहिये नरेन्द्र मोदी जैसा प्रधान मंत्री. और देखो हमारे तथा कथित बुद्धिजीवी हमारे समाचार माध्यमोंमें विवाद खडा करते है कि नरेन्द्र मोदी आपखुद है, नरेन्द्र मोदी कोमवादी है, नरेन्द्र मोदी जूठ बोलता है, नरेन्द्र मोदीने कुछ किया नहीं ….

पाकिस्तानको जो दिखाई देता है वह इन कृतघ्न को दिखाई देता नहीं.

अब हम देखेंगे ममताका नाटक और उस पर समाचार माध्यमोंका यानी कि कोलमीस्ट्स, मूर्धन्य, विश्लेषक, एंकर, आदि महानुभावोंला प्रतिभाव.

घटनासे समस्या और समस्याकी घटना

ममता स्वयंको क्या समज़ती है?

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उनका खेल देखो कि वह किस हद तक जूठ बोल सकती है. पूरा कोंगी कल्चरको उसने आत्मसात्‍ कर लिया है.

यह वही ममता है. जिस जयप्रकाश नारायणने, भ्रष्टाचारके विरुद्ध इन्दिरा गांधीके सामने, आंदोलन छेडा था उस जयप्रकाश नारायणकी जीपके हुड पर यह ममता नृत्य करती थी. एक स्त्रीके नाते वह लाईम लाईटमें आ गयी. आज वही ममता कोंगीयोंका समर्थन ले रही है जब कि कोंगीके संस्कारमें कोई फर्क नहीं पडा है.

ऐसा कैसे हो गया? क्योंकि ममताने जूठ बोलना ही नहीं निरपेक्ष जूठ बोलना सीख लिया है. सिर्फ जूठ बोलना ही लगाना भी शिख लिया है. निराधार आरोप लगाना ही नहीं जो संविधान की प्रर्कियाओंका अनादर करना भी सीख लिया है. “ चोर कोटवालको दंडे”. अपनेको बचाने कि प्रक्रियामें यह ममता, मोदी पर सविधानका अनादर करनेका आरोप लगा रही है.

ऐसा होना स्वाभाविक था.

गुजरातीभाषामें एक मूँहावरा है कि यदि गाय गधोंके साथ रहे तो वह भोंकेगी तो नहीं, लेकिन लात मारना अवश्य शिख जायेगी. लेकिन यहां पर तो गैया लात मारना और भोंकना दोनों शिख गयी.

ममता गेंगका ओर्गेनाईझ्ड क्राईमका विवरणः

ममताके राजमें दो चीट-फंडके घोटाले हुए. कोंगीने अपने शासनके दरम्यान उसको सामने लाया. ममताने दिखावेके लिये जाँच बैठायी. कोंगी यह बात सर्वोच्च अदालतमें ले गयी. सर्वोच्च अदालतने आदेश दिया कि सीबीआई से जाँच हो. सीबीआईने जाँच शुरु की. जांचमें ऐसा पाया कि टीएमसी विधान सभाके सदस्य, मंत्री, एम. पी. और खूद पूलिसके उच्च अफसरोंकी घोटालेके और जाँचमें मीली भगत है. सीबीआईने पूलिससे उनकी जाँचके कागजात भी मांगे थे जिनमें कुछ काकजात,  पूलिसने गूम कर दिये. इस मामलेमें और अन्य कारणोंसे भी सीबीआई ने कलकत्ताके पूलिस आयुक्तकी पूछताछके लिये नोटीस भी भेजी और समय भी मांगा. पूलिस आयुक्त भी आरोपोंकी संशय-सूचिमें थे.

गुमशुदा पूलिस आयुक्तः

आश्चर्यकी बात तो यह है कि पूलिस आयुक्त खूद अदृष्य हो गया. सीबीआईको पुलिस आयुक्तको “गुमशुदा” घोषित करना पडा. तब तक ममताके कानोंमें जू तक नहीं रेंगी. हार कर सीबीआई, छूट्टीके दिन,  पूलिस आयुक्त के घर गई. तो पुलिस आयुक्तने सीबीआई के अफसरोंको गिरफ्तार कर दिया और वह भी बिना वॉरन्ट गिरफ्तार किया और उनको पूलिस स्टेशन ले गये. किस गुनाहके आधार पर सी.बी.आई.के अफसरोंको गिरफ्तार किया उसका ममताके के पास और उसकी पूलिसके पास उत्तर नही है. यदि गिरफ्तार किया है तो गुनाह का अस्तित्व तो होना ही चाहिये. एफ.आई.आर. भी फाईल करना चाहिये.

यह नाटकबाजी ममताकी पूलिसने की. और जब सभी टीवी चेनलोंमे ये पूलिसका नाटक चलने लगा तो ममताने भी अपना नाटक शुरु किया. वह मेट्रो पर धरने पर बैठ गयी. उसके साथ उसने अपनी गेंगको भी बुला लिया. सब धरने पर बैठ गये. पूलिस आयुक्त भी क्यों पीछे रहे? यह चीट फंड तो “ओर्गेनाईझ्ड क्राईम था”. तो ममताआकाको तो मदद करना ही पडेगा. तो वह पूलिस आयुक्त भी ममताके साथ उसकी बगलमें ही धरने पर बैठ किया.

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धरना काहेका है भाई?

ममता कौनसे संविधान प्रबोधित प्रावधान की रक्षाके लिये बैठी है?

ममता किसके सामने धरने पर बैठी है?

पूलिस कमिश्नर जो कायदेका रक्षक है वह  कैसे धरने पर बैठा है?

पूलिस आयुक्त ड्युटी पर है या नहीं?

कुछ टीवी चैनलवाले कहेते है कि वह सीवील-ड्रेसमें है, इसलिये ड्युटी पर नहीं?

अरे भाई, वह वर्दीमें नहीं है तो क्या वह छूट्टी पर है?

इन चैनलवालोंको यह भी पता नहीं कि वर्दीमें नहीं है इसका मतलब यह नहीं कि वह ड्युटी पर नहीं है. पूलिओस आयुक्त कोई सामान्य “नियत समयकी ड्युटी” वाला सीपाई नहीं है कि उसके लिये, यदि वह वर्दी न हो तो ड्युटी पर नहीं है ऐसा निस्कर्ष निकाला जाय.

सभी राजपत्रित अफसर (गेझेटेड अफसर) हमेशा २४/७ ड्युटी पर ही होते है ऐसे नियमसे वे बद्ध है. यदि पूलिस आयुक्त केज्युअल लीव पर है तो भी उसको ड्युटी पर ही माना जाता है. यदि वह अर्न्ड लीव (earned leave) पर है तभी ही उनको ड्युटी पर नहीं है ऐसा माना जाता है. लेकिन ऐसा कोई समाचार ही नहीं है, और किसी भी टीएमसीके नेतामें हिमत नहीं है कि वह इस बातका खुलासा करें.

ममता ने एक बडा मोर्चा खोल दिया है. सी.बी.आई. के सामने पूलिस. वैसे तो सर्वोच्च अदालतके आदेश पर ही सी.बी.आई. काम कर रही है तो भी.

इससे ममताके पूलिस अफसरों पर केस बनता है, ममता पर केस बनाता है चाहे ममता कितनी ही फीलसुफी (तत्त्व ज्ञानकी) बातें क्यूँ न कर ले.

कुछ लोग समज़ते है कि प्र्यंका (वाईदरा) खूबसुरत है इसलिये उसकी प्रसंशा होती है. लेकिन ऐसा कुछ नहीं है. प्रशंसाके लिये तो बहाना चाहिये. हम यह बात भी समज़ लेंगे.

अब सर्वोच्च न्यायालयमें मामला पहूँचा है.

लेकिन सर्वोच्च अदालत क्या है?

सर्वोच्च अदालतके न्याय क्या अनिर्वचनीय है?

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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भारतकी विभाजनवादी शक्तिओंको पराजित करनेके लिये बीजेपीकी व्युह रचना

भारतकी विभाजनवादी शक्तिओंको पराजित करनेके लिये बीजेपीकी व्युह रचना

व्युह रचना हमारे उद्देश्य पर निर्भर है.

हमारा उद्देश्य नरेन्द्र मोदी/बीजेपी को निरपेक्ष बहुमतसे जीताना है. इसका अर्थ यह भी है कि हमे विभाजनवादी पक्षोंको पराजित करना है.

हम शर्मिन्दा है

 विभाजनवादी शक्तियां …….. सीक्केकी एक बाजु

भारतमाता, हम शर्मिंदा है ….,  तेरे द्रोही जिन्दा है

हमारी समस्याएं क्या है?

() समाचार माध्यम समस्या है. क्यों कि अधिकतर समाचार माध्यम विभाजनवादी शक्तियोंके पास है. इसलिये विपक्ष के नेताओंके सुनिश्चित उच्चारणोंको अधिकाधिक प्रसिद्धि मिलती है. और बीजेपीके नेताओंकी एवं बीजेपीके समर्थक नेताओंके उच्चारणोंको विकृत करके प्रसारित किया जाता है या तो कम प्रसिद्धि मिलती है या तो प्रसिद्धि ही नहीं मिलती है.

() समस्याओंकी प्राथमिकता

() मुद्दोंका चयन और उनकी संदर्भकी आवश्यकता

() विपक्षकी व्युहरचनाको समज़नेकी या तो उसका विश्लेषण करनेकी अक्षमता.

() विपक्ष पर प्रहार करनेकी बौद्धिक अक्षमता

() अपने ही मतदाताओंको बांटने पर सक्रीय रहेना और अपने ही नेताओंकी आलोचना करना, चाहे विपक्षकी ही क्षति या  उनका ही फरेब क्यूँ न हो,

() सोसीयल मीडीयाकी शक्तिका भरपूर उपयोग करना

() अधिकतर समाचार माध्यम चाहे विपक्षके पास हो, फिर भी हम उसके उपर आक्रमण करके हमारे हस्तगत समाचार माध्यमोंसे मुकाबला कर सकते है. उतना ही नहीं हम विपक्षके समाचार माध्यमोंमें भी प्रतिक्रियाएं दे कर कुछ प्रतिकार तो कर ही सकते हैं. सोसीयल मीडीया भी एक सशक्त शस्त्र है, हम उसका भरपुर उपयोग कर सकते है.

() भारतीय मतदाता, अशिक्षण, सुशिक्षण का अभाव और गरीबीके कारण, धर्म, जाति, विस्तार, भाषा के आधार पर विभाजित है. वास्तवमें, इसके मूलमें नहेरुवीयन कोंग्रेसका लंबा कुशासन और उसके नेताओंकी स्वकेन्द्री वृत्ति और आचार है.

विकास

नरेन्द्र मोदी/बीजेपीने विकासको प्राथमिकता दी है. वह सही है.

विकास हर क्षेत्रमें होना है. इस लिये विकासमें शिक्षणका विकास भी निहित है. प्राकृतिक स्रोतों और मानवीय स्रोतोंका और शिक्षाके समन्वयसे विकास हो ही रहा है. और इस विकासको जनताके समक्ष लाना है और यह काम बीजेपी के प्रचारक कर ही रहे है. राष्ट्रवादीयोंको भी इसमें अपना योगदान देना चाहिये.

प्राचीन इतिहास

दुसरा मुद्दा है इतिहास. इस इतिहासको जो पढाया है उसको विस्मृत करना. खास करके प्राचीन कालका इतिहास. इस इतिहासने भारतको उत्तर और दक्षिणमें विभाजित किया है. यह काम अति कठिन है क्योंकी कई विद्वान लोग इसमें स्थित विरोधाभाष होते होए भी उसको छोडनेमें संकोच रखते है और छोडना नहीं चाहते. और जो विभाजन वादी लोग है वे लोग सच्चा इतिहास पढाने के प्रचारको धर्मके साथ जोड देतें हैं. “इतिहासका भगवाकरणऐसा प्रचार करते है.

मध्ययुगी इतिहासः

जातिवादः

जातिवादकी समस्याका मूल मध्ययुगी इतिहास में है. जातिवाद इस समय में जड बना. किन्तु इसी समयमें कई सवर्ण जातिके लोगोंने जातिवादका विरोध किया उसका इतिहास साक्षी है. इन लोगोंके बारेमें दलितोंको विस्तारसे समज़ाना चाहिये. सोसीयल मीडीया पर भी जिन्होंने जातिवादका विरोध किया उनका सक्षमताके साथ विस्तारसे वर्णन करना चाहिये.

इस्लाम

इसमें भी कई बातें है. किन्तु अधिकतर बातें विवादास्पद है. इसको केवल इतिहासकारों पर ही छोड दो. इसमें खास करके हिन्दु, मुस्लिम के बीचकी बाते है. इन बातोंको इस समय चर्चा करना घातक है.

अर्वाचीन इतिहास

ईसाई धर्मप्रचार की कई हिंसात्मक बातें गुह्य रक्खी गई है. इन बातोंको अकटूता पूर्वक उजागर करना चाहिये.

() विभाजनवादी परिबलमें कौन कौन आते हैं?

OTHER SIDE OF THECOIN

                       सीक्केकी दुसरी बाजु

सभी विपक्षी दल और कोमवादी दल विभाजन वादी ही हैं. वैसे तो विपक्षी दल पूरा कोमवादी है. लेकिन इस जगह पर हम कोमवादी दल उसको ही कहेते हैं जिनमें उस कोमके सिवा अन्य धार्मिक व्यक्तिका प्रवेश निषेध है.  इन सबका चरित्र और संस्कार समान होनेके कारण नहेरुवीयन कोंग्रेस पर किया हुआ प्रहार सबको लागु पडेगा.

सबसे प्रथम है नहेरुवीयन कोंग्रेस. नहेरुवीयन कोंग्रेसको कमजोर करनेवाला सबसे ज्यादा सशक्त मुद्दे क्या है?

देशके लिये विघातक और विभाजनवादी नीति, आतंकवादका समर्थन, वंशवाद, जनतंत्रका हनन, तानाशाही, प्रतिशोधवाली मानसिकता और आचरण, अतिविलंबकारी विकास, यथावत गरीबी, अशिक्षास्वकेन्द्री मानसिकता, ६५ वर्ष लंबा शासन, भ्रष्टाचार, अफवाहें फैलाना और चारित्र हनन करना. इन सभी मुद्दोंको आप उजाकर कर सकते है.

जब भी कोई मुद्दा ये विभाजनवादी एवं कोमवादी घुमाते हुए प्रसारित करते है, उसीके उपर आपको कडा प्रहार करना है. अन्यथा भी हमें कोई मुद्देको उठाके उनके उपर सशक्त प्रहार करना है.

 () विपक्षकी व्युह रचना क्या है?

विपक्षकी व्युह रचनामें लघुमतियोंकी वोट बैंक बनाना है. वोट बेंकका मतलब यह है कि जिस वर्गमें अधिकतर लोग अशिक्षित (समास्याको नहीं समज़ सकनेवाले), अनपढ, गरीब और अल्पबुद्धि है उनको गुमराह करना. यह काम उसी वर्गके स्वकेन्द्री और भ्रष्टनेताओंको ये लोग पथभ्रष्ट करके उनके द्वारा करवाते है. और ये नेता अन्यवर्गके बारेमें धिक्कार फैलाते है.

अभी एक आदमी सोसीयल मीडीया पर बोलता हुआ ट्रोल हुआ है किःयदि आपके विस्तारमें कोई भी ब्राह्मण, क्षत्रीय या वैश्य खडा हो तो उसके सामने जो एक दलित खडा है, वह चाहे कैसा भी हो, तो भी उसको ही वोट दो. हमे इसमें दुसरा कुछ भी सोचना नहीं है. इन सवर्णोंने हम पर बहुत अत्याचार किया है हमे बरबाद कर दिया है.” मायावती क्या कहेती है? “तिलक तराजु और तल्वार, इनको मारो जूते चार”. नहेरुवीयन कोंग्रेसकी भाषा भी ऐसा ही संदेश देनेवाली भाषा है. शब्द प्रयोग भीन्न है.

यदि मायावतीकी बात सवर्ण सूनेगा तो उसके मनमें दलितोंके प्रति धिक्कार पैदा होगा. इस कारण यदि कोई दलित जो बीजेपीके पक्षमें खडा है तो वह सवर्ण व्यक्ति मतदानसे अलग रहेगा. लेकिन हमे बीजेपी के ऐसे सवर्ण मतदाताओंको चाहे बीजेपीका प्रत्याषी दलित हो तो भी मतदानके लिये उत्साहित करना है.

हमें दलितोंको अवगत कराना है किभूतकालमें यदि कभी दलितोंके उपर अत्याचार किया गया था तो वे अत्याचार करनेवाले तो मर भी गये. और वे तो आप नहीं थे. अभी ऐसी भूतकालकी बातोंसे क्यों चिपके रहेना?

हम तो सब जानते है कि दलितोंका उद्धार करनेकी बातोंका प्रारंभ तो सवर्णोंने ही किया है. बाबा साहेब आंबेडकरको पढाने वाले और विदेश भेजने वाले भी वडोदराके महाराजा ही थे. सब सवर्णोंने ही तो बाबा साहेब आंबेडकरसे अधिकृत किया हुआ हमारा संविधान मान्य रक्खा है. संविधानके अंतर्गत तो कोई भेद नहीं हैयद्यपि यदि अभी भी दलितके उपर अत्याचार होते है तो वहां राज्य की सरकारका उत्तरदायित्व बनता है. यदि अत्याचार व्यापक है तो केन्द्र सरकारका उत्तरदायित्व बनता है. समस्या दीर्घकलिन है तो जिसने ७० साल तक एक चक्री शासन किया है वह नहेरुवीयन कोंग्रेस ही कारणभूत है.

नहेरुवीयन कोंग्रेसके शासन और यह बीजेपीके शासन में फर्क यह है कि नहेरुवीयन कोंग्रेसके शासनमें जब कभी दलितों पर अत्याचार होता था तो उस समाचारको दबा दिया जाता था, और कार्यवाही भी नहीं होती थी.

बीजेपीके शासनमें यदि कभी अत्याचार होता है तो शिघ्र ही कार्यवाही होती है. और ये नहेरुवीयन कोंग्रेसवाले कार्यवाहीकी बात करने के स्थान पर अत्याचारकी ही बात किया करते है…. आदि.  

विपक्षने देखा है कि यदि हिन्दु सब एक हो गये तो चूनाव जितना अशक्य है. इसलिये हिन्दुओंमे फूट पाडनेकी कोशिस करते है.. फूट पाडने के लिये दलित पर होते यहां तहां की छूट पूट घटनाओंको उजागर करते है और सातत्य पूर्वक उसको प्रसारित किया करते है.. इस बातका साहित्यओन लाईनपर उपलब्ध है. इसका राष्ट्रवादीयोंको भरपूर लाभ लेना चाहिये.

नहेरुवीयन कोंग्रेस, मुस्लिम और ईसाईयोंमें भी हिन्दुओंके प्रति धिक्कार फैला रही है. ख्रीस्ती धर्म की पादरी गेंग तो नहेरुवीयन कोंग्रेसकी तरह अफवाहें फैलाने में कुशल है. मुस्लिम मुल्ला भी कम नहीं. सामान्य मुस्लिम और सामान्य ख्रीस्ती व्यक्ति तो हिलमिलके रहेना चाहता है. किन्तु ये मुल्ला, पादरी और नेतागण उनको बहेकाना चाहता है. इस लिये वे छूटपूट घटनाओंको कोमवादी स्वरुप देता है और उसको लगातार फैलाता रहता है. इनमें बनावटी और विकृति भी अवश्य होती है.

उदाहरण के लिये, आजकी तारिखमें कठुआ की घटना ट्रोल हो रही है.

गेंगके लिये उनके समर्थक महानुभावोंनेहम शरमिन्दा है कि हम हिन्दु हैऐसे प्लेकार्ड ले कर प्रदर्शन किया. यदि वे सत्यके पक्षमें होते तो हिन्दु और शिखोंकी अनेक कत्लेआम के विरोधमें भी प्रदर्शन करते. लेकिन इनकी कार्य सूचिमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुपमें बीजेपीका ही  विरोध करना है.

वै से तो अंतमें हिन्दुविरोधी घटना जूठ साबित होगी लेकिन, इससे जो नुकशान करना था  वह तो कर ही दिया होता है. आम हिन्दु जनता भूल जाति है, किन्तु इससे उत्पन्न हुआ ॠणात्मक वातावरण कायम रहता है, क्यों कि इसके बाद शिघ्र ही नयी घटना का ट्रोल होना प्रारंभ हो जाता है. चाहे आम जनता ऐसी घटनाओंको भूल जाय, किन्तु हम राष्ट्रवादीयोंको ये घटनाएं भूलना नहीं है. हमें अपने लेपटोपमें विभागी करण करके यह सब स्टोर करना है और जब भी मौका मिले तब देशके इन दुश्मनोंके उपर टूट पडना है.

() कपिल सिब्बल, रा.गा., सोनिया, चिदंभरम (चिदु), रणवीर सुरजेवाले, मलिक खर्गे, अभिषेक सींघवी, एहमद पटेल, एमएमएस, गुलाम नबी आज़ाद, फरुख अब्दुल्ला, ओमर अब्दुल्ला, मणीसंकर अय्यर, शशि थरुर, आदि कई नेता अनाप शनाप बोलते रहते है.

इनको हमें छोडना नहीं.

इन सब लोगोंकी ॠणात्मक कथाएंओन लाईनपर उपलब्ध है.

यदि आपको ज्ञात नहीं है तो राष्ट्रवादीयोंमेंसे किसी एक का संपर्क करें. जब भी इनमेंसे कोई भी नेता कुछ भी बोले तो समाचार माध्यम की चेनल उपर, फेस बुक पर, ट्वीटर पर और वर्तमान पत्रकेओनलईनसंस्करण पर अवश्य आघात्मक प्रहार करें. उस प्रहारमें उनके उपर उनकी ॠणात्मक बात/बातो का अवश्य उल्लेख करें.

() १८५७का युद्ध ब्रीटनसे मुक्ति पानेका युद्ध था. उस युद्ध में हिन्दु मुस्लिम एकजूट हो कर लडे थे. मुस्लिमोंने और मुगलोंने जुल्म किया होगा. किन्तु उसका असर १८५० आते आते मीट गया था. उसके कई ऐतिहासिक कारण है. इसकी चर्चा हम नहीं करेंगे. परंतु १८५७में हिन्दु और मुस्लिम एक जूट होकर लडनेको तयार हो गये थे. यदि उस युद्धमें हमारी विजय होती तो मुगल साम्राज्यका पुनरोदय होता. यह एक हिन्दुमुस्लिम एकताका देश बनता और तो हमे पश्चिमाभिमुख एवं गलत इतिहास पढाया जाता, और तो हम विभक्त होते. ब्रह्म देश, इन्डोनेशिया, तीबट, अफघानीस्तान, आदि कई देश हिन्दुस्तानका हिस्सा होता.   हमारा हिन्दुस्तान क्रमशः एक युनाईटेड नेशन्स या तो युनाईटेड स्टेस्टस ओफ हिन्दुस्तान यानी कि जम्बुद्वीप बनता और वह गणतंत्र भी होता. १८५७के कालमें मुगल बादशाह बहादुरशाह जफरके राज्य की सीमा लाल किले तक ही मर्यादित थी इसलिये उस राजाकी आपखुद बननेकी कोई शक्यता थी.

लेकिन वह युद्ध हम हार गये.

इस बात पर ब्रीटन पार्लामेन्टमें चर्चा हुई. ब्रीटन एक लोकशाही देश था. तो हिन्दुस्तानमें धार्मिक बातों पर दखल देना ऐसा प्रस्ताव पास किया. और सियासती तरीकेमें हिन्दु मुस्लिममें विभाजन करवाना एक दीर्घ कालिन ध्येय बनाया. ख्रीस्ती प्रचार के लिये भी घनिष्ठ आयोजन किया गया. इस प्रकार हिन्दुओंमेंसे एक हिस्सा काटनेका प्रपंच किया गया.

इसीलिये राष्ट्रवादीयोंका कर्तव्य है कि इस संकट के समय हिन्दुओंका मत विभाजन हो.

मुस्लिमोंको राष्ट्रवादी विचार धारामें लाना राष्ट्रवादीयोंका दुसरा कर्तव्य है.

ब्रीटीश राजने और उसके बाद नहेरुवीयन कोंग्रेसने मुस्लिमोंको, हिन्दुओंके प्रति धिक्कार फैलाके इतना दूर कर दिया है कि उनको राष्ट्रवादी विचारधारामें लाना कई लोगोंको अशक्य लगता है.

अपनेको राष्ट्रवादी समज़ने वाले कुछ लोग इस बातका घनिष्ठताके प्रचार करते है कि जब मुसलमानोंको पाकिस्तान बनाके दिया है तो उनको अब पाकिस्तान चले जाना चाहिये. यदि नहीं जाते है तो उनको खदेड देना चाहिये. (कैसे? इस बात पर ये लोग मौन है). इन बातोंको छोडो. ये सिर्फ वाणीविलास है. ऐसा वाणी विलास नहेरुवीयन कोंग्रेस पक्ष, उसके सांस्कृतिक सहयोगी पक्षोंकी गेंग और आतंकवादी भी करते है

हिन्दु और मुस्लिम दो राष्ट्र है ऐसी मान्यताको ब्रीटीश राज्यने जन्म दिया है. और नहेरुवीयन कोंग्रेसने उनको अधिक ही मात्रामें आगे बढा दिया है. वास्तविकतासे यह “दो राष्ट्र” वाली मान्यता दूर है.

दुनियामें कहीं भी मुस्लिमफिर चाहे वह बहुमतमें हो या शत प्रतिशत हो, वह हमेशा अपने देशकी धरोहरसे भीन्न नहीं रहा हैमिस्र के मुस्लिम मिस्रकी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर पर गर्वकी अनुभूति करते हैईरानके मुस्लिमईरान की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर पर गर्वकी अनुभूति करते हैइन्डोनेसिया के मुस्लिम इन्डोनेसिया की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर पर गर्व की अनुभूति करते हैलेकिन भारतके मुस्लिम अपनेको आरब संस्कृतिसे  जोडते है. लेकिन  आरब इनको अपना समज़ते नहीं हैक्यों कि वे वास्तवमें अरब नहीं हैइसका कारण यह है कि हि-न्दुस्तानके मुस्लिम ९० प्रतिशत हिन्दुमेंसे मुस्लिम बने हैऔर कई मुस्लिम यह कबुल भी करते हैवोराजी और खोजाजी इसके उदहरण स्वरुप हैखुद जिन्नाने यह बात कबुल की है.

तोअब ऐसे मुस्लिमोंके प्रति धिक्कार करने कि क्या आवश्यकता हैहिन्दु धर्ममें किसी भी दैवी शक्तिको किसी भी स्वरुपमें पूजो या तो पूजो तो भी उसके उपर प्रतिबंध नहीं हैआप कर्मकांड करो तो भी सही करो तो भी सहीईश्वरमें या वेदोंमे मानो तोभी सही मानो तो भी सहीअनिवार्यता यह है कि आप दुसरोंकी हानि  करो.

मुस्लिम यदि कुछ भी माने, और यदि वे अन्यकी मान्यताओंको नुकशान न करे और अन्यका नुकशान न करें तो हिन्दुओंको मुस्लिमोंसे कोई आपत्ति नहीं. एक बात आवश्यक है कि हमें सच्चा इतिहास पढाया जाय.

मुस्लिमोंमे प्रगतिशील मुस्लिमोंकी कमी नहीं है. लेकिन प्रगतिशील मुस्लिम. किन्तु वे मौन रहेते हैं. वे मुस्लिमोंके अंतर्गत लघुमतिमें है. उनके उपर मुल्लाओंका दबाव रहेता है. और साथ साथ हिन्दुओंका एक कट्टरवादी वर्ग, मुस्लिम मात्रकी विरुद्ध बाते करता है. वैसे तो यह कट्टर हिन्दु अति लघुमतिमें है. लेकिन इस बातका मुस्लिमोंको पता नहीं. या तो उनको इसका अहेसास नहीं. यदि मुस्लिम लोग यह सोचे, कि हिन्दु कट्टरवादी और हिन्दु राष्ट्रवादी लोग भीन्न भीन्न है और वे एक दुसरेके पर्याय नहीं है तो वे लोग राष्ट्रवादी के प्रवाहमें आ सकते है.

किसी भी कोमको यदि अपनी दीशामें खींचना है तो यह काम आप उसको गालीयां देके और उसके उपर विवादास्पद आरोप लगाके नहीं कर सकते.

नरेन्द्र मोदीने एक अच्छा सुत्र दिया है कि सबका साथ सबका विकास. इसमें दलित, सवर्ण, मुस्लिम, ख्रीस्ती आदि सर्वप्रकारके लोग आ जाते है. इस सुत्रको लघुमतियोंको आत्मसात करना चाहिये.

कानूनका ही राज रहेगा. इसमें कोई समाधान नहीं.

कानूनके राज करनेकी जीम्मेवारी सरकारी अफसरोंकी है. जहां बीजेपीका शासन है वहां राष्ट्रवादीयोंको सरकारी अफसरोंके विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिये, नहीं कि बीजेपीके विरुद्ध.

जो लोग कानून हाथमें लेते है उनको, और उनकी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सहायता करनेवालोंको, उन सबके उपर बिना दया बताये न्यायिक कार्यवाही करनेसे मुस्लिम नेता गण, जैसे कि फारुख अब्दुला, ओमर अब्दुल्ला, यासीन मलिक गुलाम नबी आज़ाद, मुस्लिम मुल्ला, उनके असामाजिक तत्त्व और उसी प्रकार ख्रीस्ती पादरी और उनके असामाजिक तत्त्वका दिमाग ठिकाने पर आ जायेगा. और उस धर्म के आम मनुष्यको लगेगा कि, स्वातंत्र्यका अधिकार स्वच्छंदतासे भीन्न है. उनको भी बीजेपीमें ही सुरक्षा दिखायी देगी.    

एक हिन्दुराष्ट्रवादी कट्टरवादी हो सकता है लेकिन हरेक हिन्दुराष्ट्रवादी, कट्टरवादी नहीं है. जो मुस्लिमोंको देश छोडने की बात करते हैं वे हिन्दु कट्टारवादी है. ये लोग अतिअल्पमात्रामें है. तककी उनका तुष्टिकरण करनेके लिये उन्होनें लघुमतिके लिये अलग नागरिक कोड बना दिया है और यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि लघुमतिके हित रक्षक उनके पक्षकी विचार धारा है. ऐसा करनेमें नहेरुवीयन कोंग्रेसने हिन्दुओंको अन्याय भी किया है.

मुस्लिम जनता, हिन्दुओंसे बिलकुल भीन्न है ऐसा भारतके मुस्लिम और कुछ हिन्दु भी मानते है. 

मुस्लिम यदि कुछ भी माने, और यदि वे अन्यकी मान्यताओंको नुकशान करे और अन्यका नुकशान करें तो हिन्दुओंको मुस्लिमोंसे कोई आपत्ति नहीं. एक बात आवश्यक है कि हमें सच्चा इतिहास पढाया जाय.

मुस्लिमोंमे प्रगतिशील मुस्लिमोंकी कमी नहीं है. लेकिन प्रगतिशील मुस्लिम. किन्तु वे मौन रहेते हैं. वे मुस्लिमोंके अंतर्गत लघुमतिमें है. उनके उपर मुल्लाओंका दबाव रहेता है. और साथ साथ हिन्दुओंका एक कट्टरवादी वर्ग, मुस्लिम मात्रकी विरुद्ध बाते करता है. वैसे तो यह कट्टर हिन्दु अति लघुमतिमें है. लेकिन इस बातका मुस्लिमोंको पता नहीं. या तो उनको इसका अहेसास नहीं. यदि मुस्लिम लोग यह सोचे, कि हिन्दु कट्टरवादी और हिन्दु राष्ट्रवादी लोग भीन्न भीन्न है और वे एक दुसरेके पर्याय नहीं है तो वे लोग राष्ट्रवादी के प्रवाहमें सकते है.

 

कानूनके राज करनेकी जीम्मेवारी सरकारी अफसरोंकी है. जहां बीजेपीका शासन है वहां राष्ट्रवादीयोंको सरकारी अफसरोंके विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिये, नहीं कि बीजेपीके विरुद्ध.

जो लोग कानून हाथमें लेते है उनको, और उनकी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सहायता करनेवालोंको, उन सबके उपर बिना दया बताये न्यायिक कार्यवाही करनेसे मुस्लिम नेता गण, जैसे कि फारुख अब्दुला, ओमर अब्दुल्ला, यासीन मलिक गुलाम नबी आज़ाद, मुस्लिम मुल्ला, उनके असामाजिक तत्त्व और उसी प्रकार ख्रीस्ती पादरी और उनके असामाजिक तत्त्वका दिमाग ठिकाने पर जायेगा. और उस धर्म के आम मनुष्यको लगेगा कि, स्वातंत्र्यका अधिकार स्वच्छंदतासे भीन्न है. उनको भी बीजेपीमें ही सुरक्षा दिखायी देगी.    

एक हिन्दुराष्ट्रवादी कट्टरवादी हो सकता है लेकिन हरेक हिन्दुराष्ट्रवादी, कट्टरवादी नहीं है. जो मुस्लिमोंको देश छोडने की बात करते हैं वे हिन्दु कट्टारवादी है. ये लोग अतिअल्पमात्रामें है.

नहेरुवीयन कोंग्रेसके लिये यह शर्मकी बात है

जो हिन्दु और जो मुस्लिम दो भीन्न भीन्न संस्कृतिमें मानता है वे दोनों कट्टरवादी है. कोंग्रेस (नहेरुवीयन कोंग्रेस नहीं), और कई मुस्लिम नेतागण (जो कोंग्रेसके सदस्य थे) “दो राष्ट्रमें नहीं  मानते थे. पख्तून नेता खान अब्दुल गफारखाँ भी दो राष्ट्रकी विचारधारामें नहीं मानते थे.

महात्मा गांधी भी दो राष्ट्रके सिद्धांतमें मानते नहीं थे. “दो राष्ट्रकी परिकल्पना ब्रीटीश प्रायोजितआर्यन इन्वेज़न परिक्ल्पनाकी तरह एक जूठके आधार पर बनी परिकल्पना थी.

यह विधिकी वक्रता है कि स्वयंको मूल कोंग्रेस मानने वाली नहेरुवीयन कोंग्रेस आज दोराष्ट्रकी परिकल्पनाको सिर्फ सियासती लाभके लिये बढावा देती है. उसको शर्म आनी चाहिये.

जिन्ना नेदो राष्ट्रकी परिकल्पना इसलिये पुरस्कृत की कि, नहेरुने उसका तिरस्कार किया था. नहेरुने स्वयं घोषित किया था कि, वे जिन्ना को अपनी ऑफिसमें चपरासी देखनेको तयार नहीं थे. तो ऐसे हालातमें जिन्नाने अपनी श्रेष्ठता दिखानेके ममतमेंदोराष्ट्रपरिकल्पना आगे की.

ब्रीटीश सरकारने तोबहुराष्ट्रकी परिकल्पना भी की थी. और वे दलितीस्थान, ख्रीस्ती बहुमत वाले उत्तरपूर्वी राज्योंसे बना हुआ नेफा,.  द्रविडीस्तानवाला दक्षिण भारत, पंजाबका खालिस्तान, और कई देशी राज्य. ऐसा भारत, काल्पनिक गज़वाहे हिन्दके करिब था. और इस प्रस्तावमें अशक्त केन्द्र था और कई सारे सशक्त राज्य थे.

लेकिन अब, यह नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके सांकृतिक साथी अपनी सियासती व्युहरचनाके अनुसार वे देशके एक और विभाजनके प्रति गति कर रहे है.

यदि हम राष्ट्रवादी लोग, दलितोंका, मुस्लिमोंका और ईसाईयोंका सहयोग लेना चाहते है तो हमें हिन्दुओंके हितका ध्यान रखना पडेगा. नहेरुवीयन कोंग्रेसके शासनकालमें कश्मिरमें कई मंदिर ध्वस्त हुए है.

हिन्दुओंके मतोंका विभाजन होनेकी शक्यता देखकर वंशवादी और कोमवादी पक्ष इकठ्ठे हो रहे है. इनको पराजित तब ही कर सकते है जब हिन्दु मत का विभाजन हो.

हिन्दु जनता कैसे विभाजित होती है?

राष्ट्रवादीयोंका ध्येय है कि नरेन्द्र मोदी/बीजेपी २०१९का चूनाव निरपेक्ष बहुमतसे जिते. राष्ट्रवादीयोंका कर्तव्य है कि वे आपसमें विवाद करें. आपसके विभीन्न मुद्दोंमे जिनमें विचार विभीन्नता है ऐसे मुद्दोंको प्रकाशित करें और तो उनको उछाले.

जैसे कि

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हिन्दु राष्ट्रकी घोषणा,

वेदिक शिक्षा प्रणाली,

भारतके विभाजनके लिये जिम्मेवार कौन,

महात्मा गांधी फेक महात्मा,

महात्मा गांधीकी भूलें और मुस्लिमोंका तूष्टीकरण,

जीन्नाकी छवी,

हमें स्वतंत्रता किसने दिलायी पर वृथा चर्चा,

महात्मा गांधी और शहिद भगत सिंह आमने सामने,

अहिंसा एक मीथ्या आचार,

महात्मा गांधीने नहेरुको प्रधान मंत्री क्यों बनाया इस बात पर महात्मा गांधीकी भर्त्सना,

महात्मा गांधी और नहेरुके मतभेदको छिपाना,

नहेरुवीयन कोंग्रेसको मूल कोंग्रेस समज़ना,

नहेरुका धर्म क्या था,

फिरोज़ गांधी मुस्लिम था,

हिन्दु धर्मकी व्याख्या,

राम मंदिर, (जो मामला न्यायालयके आधिन है),

इतिहास बदलने की अधीरता,

मुगलोंका और मुसलमानोंका मध्य युगमें हिन्दुओंके उपर अत्याचार,

नहेरुवीयन कोंगीयोंने जिन घटनाओंको ट्रोल किया हो उनका प्रचार.

मुस्लिम मात्रसे और ख्रीस्ती मात्रसे नफरत फैलाना,

नरेन्द्र मोदीको सलाह सूचन,

बीजेपी नेताओंकी कार्यवाही पर असंतोष व्यक्त करना और उनके साथ जो विचार भेद है उसमें वे गलत है ऐसे ब्लोग बनाना,

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राष्ट्रवादीयोंका कर्तव्य है कि वे यह समज़ें कि उपरोक्त मुद्दे विवादास्पद है.

इनमेंसे;

कई मुद्देके विषयमें निर्णय पर आनेके लिये पूर्वाभ्यास करना आवश्यक है,

कई मुद्दे अस्पष्ट है,

कई मुद्दे फिलहाल प्राथमिकतामें लाना वैचारिक संकट पैदा कर सकते है,

कई मुद्दे न्यायालयाधिन है और बीजेपी सरकारके विचाराधिन है,

कई मुद्दे ठीक है तो भी वर्तमान समय उनकी स्विकृतिके लिये परिपक्त नहीं है.

ऐसे मुद्दे निरपेक्ष बहुमत होनेके कारण, देश विरोधी शक्तियां अफवाहें फैलाके जनताको गुमराह कर सकती है, और भारतके जनतंत्रको विदेशोंमे बदनाम कर सकती है. फिलहाल चर्चा करना भी ठीक नहीं.

हम, मुस्लिमोंके वर्तमान (१९४६से शुरु) या प्रवर्तमान कत्लेआम और आतंकको मुस्लिम नेताओंके नाम या और जुथोंको प्रकट करके, उन पर कटू और प्रहारात्मक आलोचना अवश्य कर सकते है. क्यों कि इन बातोंको वे नकार सकते नहीं. हमने इन बातोंसे पूरी मुस्लिम जनताको तो कुछ कहा नहीं है. इसलिये वे इन कत्लेआमको अपने सर पर तो ले सकते नही है.

दलित और सवर्ण एकता कैसे बनायें?

वैसे तो यह समस्या सियासती है. फिर भी विपक्षके फरेबी प्रचारके कारण इसकी चर्चा करनी पडेगी.

विपक्षका प्रयास रहा है. विपक्षी शक्तियां, सवर्ण को भी अनामतके आधार पर क्षत्रीय, जाट, यादव, जैन, बनीया, भाषा और विस्तारके विशिष्ठ दरज्जाके आधार पर लोगोंको विभाजित किया जाय.

इनके विभाजनको रोकनेके लिये बीजेपीको, लेखकों, कवियों, हिन्दु धर्मगुरुओंको और महानुभावोंको (सेलीब्रीटीज़को) भी आगे करना पडेगा. इन लोगोंको समज़ाना पडेगा कि अनामतके लिये विभाजित होना ठीक नहीं है क्यों कि अनामत ४९ प्रतिशतसे अधिक नहीं हो सकता. और वैसे भी अनामतकी आवश्यकता तब पडती है जब आबंटनकी संख्या कम हो और ईच्छुक अधिक हो. यह समस्या वैसे भी विकाससे हल होने वाली ही है.

विपक्ष हिन्दुओंके मतोंको निस्क्रिय करके उनका असर मत विभाजनके समकक्ष बनाता है. विपक्षका यह एक तरिका है, सामान्य कक्षाके हिन्दुओंको निस्क्रिय करना. आम मनुष्य हमेशा हवाकी दीशामें चलता है. यदि विपक्ष, बीजेपी के लिये ॠणात्मक हवा बनानेमें सफल होता है तो सामान्य कक्षाका मनुष्य निराश होकर निस्क्रिय हो जाता है और वह मतदान करनेके लिये जाता नहीं है.

नहेरुवीयन कोंगी की सहयोगी मीडीया बीजेपीका नकारात्मक प्रचार करती है और उसके लिये ॠणात्मक वातावरण पैदा करनेका काम करती है.

 शिरीष मोहनलाल दवे

चमत्कृतिः नहेरुवीयन कोंग्रेसके शासन कालमें बभम बभम ही चलाता था. और बाबा राम देवकी सत्याग्रहकी  छावनी रातको पोलिसने छापा मारा था, नहेरुवीयन कोंग्रेसके शासनकालमें, अभिषेक मनु सिंघवी याद करो जिनके, तथा कथित ड्राइवरने उनकी एक लेडी वकिलके साथ रेपके संबंधित  वीडीयो बनाई थी और वह सोसीयल मीडीया पर  भी चली थी. यह तो “दंड-संहिता” के अंतर्गत वाला मामला था. लेकिन न तो नहेरुवीयन कोंग्रेसकी सरकारने न तो अभिषेक मनु संघवीके उपर कोई कदम उठाया न तो इस महाशयने ड्राईवर के उपर कोई दंड-संहिताका मामला दर्ज़ किया. आपस आपस में सब कुछ जो निश्चित करना था वह कर लिया.

और ऐसा जिसका शासन था, वह अभिषेक मनु सिंघवी इस बीजेपीके शासनकालको अघोषित आपात्‌ काल कहेता है. जिसमें सारा विपक्ष असंस्कारी भाषामें बीजेपीके नेताओंको उछल उछल कर गाली देता है. ये नहेरुवीयन कोंग्रेस नेता गणके शब्द कोषमें शब्दकोषकी परिभाषा  ही अलग है. जयप्रकाश नारायणने १९७४में  इस नहेरुवीयन कोंग्रेसकी आराध्या के बारेमें कहा था कि उसका ही शब्द कोष “हम्टी-डम्टी” का शब्द कोष जैसा है.  और आज भी नहेरुवीयन कोंग्रेसका शब्द कोष वही रहा है. 

रेप चाहे लेडी वकील पर करो या भाषा पर करो, नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताको क्या फर्क है?

abhisek singhvi

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नहेरुवीयन कोंग्रेसके लिये सुनहरा मौका

“जातिवाद आधारित राज्य रचना” की मांग रक्खो

जी हाँ, नहेरुवीयन कोंग्रेसके लिये, प्रवर्तमान समय एक अतिसुनहरा मौका है. सिर्फ नहेरुवीय कोंग्रेस ही नहीं लेकिन उसके सांस्कृतिक साथीयोंके लिये भी यह एक सुनहरा मौका है. इस मुद्देका लाभ उठा के नहेरुवीयन कोंग्रेस सत्ता भी प्राप्त कर सकती है.

आप पूछोगे कि ऐसा कौनसा मुद्दा है जिस मुद्देको उछाल के नहेरुवीयन कोंग्रेस सत्ता प्राप्त कर सकती है?

अब आप एक बात याद रख लो कि जब भी हम “नहेरुवीयन कोंग्रेस” शब्दका प्रयोग करते है आपको इसका निहित अर्थ “नहेरुवीयन कोंग्रेस पक्ष और उसके सांस्कृतिक साथी” ऐसा समज़ना है. क्यों कि समान ध्येय, विचार और आचार ही तो पक्षकी पहेचान है.

तो अब हम बात आगे चलावें

नहेरुवीयन कोंग्रेसका ध्येय

नहेरुवीयन कोंग्रेसका ध्येय नहेरु वंशको आगे बढाना है, नहेरुवीयन वंशज के लिये सत्ता प्राप्त करना है ताकि वे सत्ताकी मौज लेते रहे और अन्य लोग स्वंयंके परिवार और पीढीयोंकी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा और सुख के लिये पैसा कमा सके.

तो अब क्या किया जाय?

देखो, अविभक्त भारतमें हिन्दु-मुस्लिम संबंधोंकी समस्या थी. तो नहेरुने हिन्दु राष्ट्र और मुस्लिम राष्ट्रके फेडर युनीयनको नकार दिया और पाकिस्तान और भारत बनाया. लेकिन कुछ समय बाद मतोंकी भाषा राष्ट्रभाषा और राज्य भाषाकी समस्याओंका महत्व सामने आया. तो हमने (नहेरुवीयन कोंग्रेसने)  भाषाके आधार पर राज्योंकी रचना की.

अब इसमें क्या हूआ कि हिन्दु-मुस्लिम झगडोंकी समस्या तो वहींकी वहीं रही लेकिन इस समस्या पर आधारित अन्य समस्याएं भी पैदा हूई. उसके साथ साथ भाषा के आधार पर और समस्याएं पैदा होने लगी. भूमि-पुत्र और जातिवाद आधारित समस्याएं भी पैदा होने लगी.

आप कहेंगे कि क्या इन समस्याओंका समाधान करने की नहेरुवीयन कोंग्रेसने कोशिस नहीं की?

अरे वाह !! आप क्या बात कर रहे हो? नहेरुवीयन कोंग्रेसने तो अपने तरीकेसे समस्याका हल करनेका पूरी मात्रामें प्रयत्न किया.

नहेरुवीयन तरीका क्या होता है?

कोई भी समस्या सामने आये तो उसको अनदेखा करो. समस्या कालचक्रमें अपने आप समाप्त हो जायेगी…

अरे वाह !! यह कैसे?

देखो हिन्दु-मुस्लिम समस्याको हल ही नहीं क्या. इसके बदले नहेरुने जीन्नाके साथ झगडा कर दिया. फिर हिन्दुस्तान पाकिस्तान हो गया. और हिन्दु-मुस्लिम झगडा तो कायम रहा.

समस्याका समाधान

तिबट अपनी आझादी बचाने के लिये संघर्ष कर रहा था. हमारी समस्या थी कि तिबटकी सुरक्षा कैसे करें !! तो नहेरुने चीनके साथे दोस्ती करके तिबट पर चीनका प्रभूत्व मान लिया. लेकिन एक और समस्या पैदा हुई कि चीन हमारे देशकी सीमाके पास आ गया और उसने घुसखोरी चालु की. तो नहेरुने पंचशील का करार किया. तो कालक्रममें चीनने भारत पर आक्रमण कर दिया. जरुरतसे ज्या भूमि पर कब्जा कर दिया. तो हमारा पूराना सीमा विवाद तो रहा नहीं. वह तो हल हो गया. नया सीमा विवादका तो देखा जायेगा. तिबटकी समस्या हमारी समस्या रही ही नहीं.

पाकिस्तान हमारा सहोदर है. पाकिस्तानमें आंतरविग्रह हुआ तो पूर्वपाकिस्तानसे घुस खोर लाखोंकी संख्यामें आने लगे. तो हमारे लिये एक समस्या बन गई. इन्दिरा गांधीने यह समस्या प्रलंबित की. तो पाकिस्तानने भारतकी हवाई पट्टीयों पर आक्रमण कर दिया. हमारी सेनाने पाकिस्तानको परास्त किया तो भारतको घुसखोरोंके साथ साथ ९००००+ युद्ध कैदीयोंको खाने पीनेका इंतजाम करना पडा. सिमला करार किया और युद्ध कैदी पश्चिम पाकिस्तानको ही परत कर दिया. तो कालचक्रमें आतंकवाद पैदा हो गया. तो हिन्दु लोग विस्थापित हो गये. उनका पूनर्वसनकी समस्या पैदा गई. होने दो. ऐसी समस्याएं तो आती ही रहती है. विस्थापित हिन्दुओंकी समस्याको नजर अंदाज कर दो. हिन्दु लोग अपने आप निर्वासित कैंपसे कहीं और जगह अपना मार्ग ढूंढ लेगे. नहेरुवीयनोने कुछ किया नहीं. आतंकी मुस्लिम लोग भारतमें घुसखोरी करने लगे और बोंब ब्लास्ट करने लगे. आतंकी मुस्लिम अपना अपना गुट बनाने लगे. स्थानिक मुस्लिमोंका सहारा लेने लगे. उनको गुट बनाने दो हमारा क्या जाता है. एक समस्या को हल नहीं करनेसे कालांतरमें अनेक और समस्याएं पैदा होती है. और मूल समस्याका स्वरुप बदल जाता है. तो उसको नहेरुवीयन लोग समाधान मान लेते है और मनवा लेते है.

जातिवादी समस्या भी ऐसी ही थी. अछूतोंके लिये आरक्षण रक्खा. अछूतोंका उद्धार नहीं किया लेकिन उनके कुछ नेताओंका उद्धार किया. और आरक्षण कायम कर दिया. तो और जातियां कहेने लगी हमें भी आरक्षण दो. नहेरुवीयनोंने एक पंच बैठा दिया और जिनको भी आरक्षण चाहीये वे अपनी जातिका नाम वहां दर्ज करावें. अब आरक्षणका व्याप बढने लगा. जिसने भारत पर दो शतक राज्य किया वे मुस्लिम लोग कहेने लगे हम भी गरीब है हमें भी आरक्षण दो. तो नहेरुवीयनोंने कहा कि तुम्हे अकेलेको आरक्षण देंगे तो हम तुम्हारा तुष्टी करण करते है ऐसा लोग कहेंगे. इस लिये उन्होने “लघुमति”के लिये विशेष प्रावधान किये. रामके वंशज रघुवंशी कहेने लगे हमे भी आरक्षण दो. क्रुष्णके वंशज यादव कहेने लगे हमें भी आरक्षण दो. अब जब भगवानके वंशज आरक्षण मांगने लगे तो और कौन पीछे रह सकता है?

जटने बोला हमें भी आरक्षण दो. महाराष्ट्रके ठाकुरोंने बोला कि हमें भी आरक्षण दो. अब हुआ ऐसा कि कमबख्त सर्वोच्च अदालतने कहा कि ४९ प्रतिशतसे अधिक आरक्षण नहीं दे सकते. तो अब क्या करें?

आरक्षण, हिन्दु-मुस्लिम और हिन्दु-ख्रिस्ती समस्याओंका कोई पिता है तो वह नहेरुवीयन कोंग्रेस है. उसको सहाय करने वाले भी अनेक बुद्धिजीवी है उनका एजंडा भी नहेरुवीयनोंकी तरह “जैसे थे”-वादी है. ये लोग वास्तवमें दुःखी जीवनका कारण पूर्वजन्मके पाप मानते है इसलिये समस्याके समाधान पर ज्यादा चिंता करना आवश्यक नहीं है. सब लोग अपनी अपनी किस्मत लेके पैदा होते है. इसलिये समस्याओंका समाधान ईश्वर पर ही छोड दो. ईश्वरके काममें हस्तक्षेप मत करो.

लेकिन हमसे रहा नहीं जाता है. हम नहेरुवीयन कोंग्रेसका आदर करते है. कटूतासे हम कोसों दूर रहते है. त्याग मूर्ति नहेरुवीयन कोंग्रेसको सत्ता प्राप्त करनेका और वह भी यावतचंद्र दिवाकरौ तक उसीके पास सत्ता रहे ऐसा रास्ता हम दिखाना चाहते है.

यह रास्ता है कि नहेरुवीयन कोंग्रेस ऐसी छूटपूट जातिवादी आधारित आरक्षण और धर्म आधारित आरक्षणके बदले धर्म और जाति आधारित “राज्य रचना”की मांग पर आंदोलन करें. ऐसा आंदोलन करनेसे उसको सत्ताकी प्राप्ति तो होगी ही, उतना ही नहीं, धर्म आधारित और जाति अधारित राज्य रचनासे हिन्दु-मुस्लिम समस्याएं, हिन्दु-ख्रिस्ती समस्याएं, मुस्लिम-ख्रिस्ती समस्याएं, भाषा संबंधित समस्याएं जातिवादी समस्याएं, आरक्षण संबंधी समस्याएं, आर्टीकल “३५-ए” संबंधित समस्या, आर्टीकल ३७० संबंधित समस्या, पाकिस्तान हस्तक काश्मिर समस्या, आतंकी समस्या, पत्थरबाज़ोकी समस्या आदि कई सारी समस्याएं नष्ट हो जायेगी.

आप कहोगे ऐसा कैसे हो सकता है?

आप कहोगे भीन्न भीन्न जातिके, भीन्न भीन्न धर्मके लोग तो बिखरे पडे है और राज्य तो भौगोलिक होगा है. धर्म और जाति आधारित राज्य रचना करनेमें ही अनेक समस्याएं पैदा होगी. और यदि ऐसी राज्य रचना हो भी गई तो इसके बाद भी कई प्रश्न उठेंगे जिनका समाधान असंभव है. यदि आप समास्याओंके समाधानके लिये नहेरुवीयन तरीका अपनावें तो ठीक है लेकिन आपको पता होना चाहिये कि समस्याको हल ही नहीं करना, समस्याका समाधान नहीं है. मान लो कि नहेरुवीयन कोंग्रेसने जाति आधारित और धर्म आधारित राज्य रचनाके मुद्दे पर आंदोलन चलाया और सत्ता प्राप्त भी कर ली, तो वह कैसे जाति और धर्म पर आधारित राज्य रचना करेगी. यदि आप नहेरुवीयन कोंग्रेसकी अकर्मण्यता पर विश्वास करते है तो आप दे सकते है कि नहेरुवीयन कोंग्रेसका क्या हाल हुआ. समस्याका समाधान किये बिना नहेरुवीयन कोंग्रेस अब सत्ता पर नहीं रह सकती.

अरे भाई, हम अब नहेरुवीयन कोंग्रेसका उद्धार करनेके लिये प्रतिबद्ध है और हम उसको एक क्षति-रहित फोर्म्युला वाली सूचना देना चाहते है.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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सोमनाथका मंदिर कैसे तोडा जाय? भाग-२

सोमनाथका मंदिर कैसे तोडा जाय? भाग-२

असत्यवाणी नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंका धर्म है

यह कोई नई बात नहीं है. नहेरुने खुदने चीनी सेनाके भारतीय भूमिके अतिक्रमणको नकारा था. तत्पश्चात्‌ भारतने ९२००० चोरसवार भूमि, चीनको भोजन-पात्र पर देदी थी. ईन्दिरा गांधी, राजिव गांधी आदिकी बातें हम २५ जूनको करेंगे. किन्तु नहेरुवीयन कोंग्रेस अलगतावादी मुस्लिम नेताओंसे पीछे नहीं है.

नहेरुवीयन कोंग्रेस अपने सांस्कृतिक फरजंदोंसे सिखती भी है.

यह कौनसी सिख है?

शिवसेना नहेरुवीयन कोंग्रेसका फरज़ंद है.

जैनोंके पर्युषणके पर्व पर मांसकी विक्री पर कुछ दिनोंके लिये रोक लगाई तो शिवसेनाके कार्यकर सडक पर उतर आये. और उन्होंने इस आदेशके विरोधमें मांसकी विक्री सडक पर की. (यदि वेश्यागमन पर शासन निषेध लाता तो क्या शिवसेनावाले सडक पर आके वेश्यागमन करते?)

गाय-बछडेका चूनाव चिन्हवाली नहेरुवीयन कोंग्रेसने शिवसेनासे क्या सिखा?

नहेरुवीयन कोंग्रेसको शिवसेनासे प्रेरणा मिली.

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यह बात नहेरुवीयन कोंग्रेसके संस्कारके अनुरुप है. नहेरुवीयन कोंग्रेसने चिंतन किया. निष्कर्ष निकाला कि गौवध-बिक्री-नियमन वाला विषय उपर प्रतिकार करना यह मुस्लिमोंको और ख्रीस्तीयोंको आनंदित करनेका अतिसुंदर अवसर है.

केन्द्र सरकारने तो गौ-वंशकी यत्किंचित प्रजातियोंकी विक्रीके नियमोंको सुग्रथित किया और नहेरुवीयन कोंग्रेसकी यथेच्छ रक्खी क्षतियोंको दूर किया ताकि स्वस्थ और  युवापशुओंकी हत्या न हो सके.

अद्यपर्यंत ऐसा होता था कि कतलखाने वाले, पशुबिक्रीके मेलोंमेंसे, बडी मात्रामें  पशुओंका क्रयन करते थे. और स्वयंके निश्चित चिकित्सकोंका प्रमाणपत्र लेके हत्या कर देते थे.

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आदित्यनाथने अवैध कतलखानोंको बंद करवाया तो नहेरुवीयन कोंग्रेसवालोंने और उनके सांस्कृतिक साथीयोंने कोलाहल मचा दिया और न्यायालयमें भी मामला ले गये कि शासक, कौन क्या खाये उसके उपर अपना नियंत्रण रखना चाहता है. अधिकतर समाचार माध्यमोंने भी अपना ऐसा ही सूर निकाला.

बीजेपीने गौ-वंशकी यत्किंचित प्रजातियोंकी विक्रीके नियमोंको सुग्रथित करनेवाला जो अध्यादेश जारी किया तो नहेरुवीयन कोंग्रेसको लगा कि कोमवाद फैलानेका यह अत्याधिक सुंदर अवसर है.

केरलमें नहेरुवीयन कोंग्रेसके कई सदस्य सडक पर आ गये. एक बछडा भी लाये. नहेरुवीयन कोंग्रेसके सदस्योंने बछडेको सरे आम काटा भी. नहेरुवीयन कोंग्रेसके सदस्योंने बछडेके मांसको सडक पर ही एक चूल्हा बनाके अग्निपर पकाया भी. नहेरुवीयन कोंग्रेसके सदस्योंने इस मांसको बडे आनंदपूर्वक खाया भी.

भोजनका भोजन विरोधका विरोध

अपने चरित्रके अनुरुप नहेरुवीयन कोंग्रेस केवल जूठ ही बोलती है और जूठके सिवा और कुछ नहीं बोलती. तो अन्य प्रदेशके नहेरुवीयन नेताओंने तो ऐसा कुछ हुआ ही नहीं है और बीजेपी व्यर्थ ही नहेरुवीयन कोंग्रेसको बदनाम कर रही है ऐसे कथन पर ही अडे रहे. लेकिन जब यह घटनाकी वीडीयो क्लीप सामाजिक माध्यमों पर और समाचार माध्यमों पर चलने लगी तो उन्होंने बडी चतुराईसे शब्द प्रयोग किये कि “केरलमें जो घटना घटी उसकी हम निंदा करते है. ऐसी घटना घटित होना अच्छी बात नहीं है चाहे ऐसी घटना बीजेपीके कारण घटी हो या अन्योंके कारण. हमारे पक्षने ऐसे सदस्योंको निलंबित किया है.” नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण घटनाका विवरण करनेसे वे बचते रहे. एक नेताने कहा कि हमने सदस्योंको निलंबित किया है. अन्य एक नेताने कहा कि हमने निष्कासित किया है. क्या नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण अनपढ है? क्या वे सही शब्दप्रयोग नहीं कर सकते?

मस्जिदमें गयो तो ज कोन

केरलकी सरकार भी तो साम्यवादीयोंकी गठबंधनवाली सरकार है. सरकारने कहा कि “हमने कुछ  व्यक्तियोंपर धार्मिकभावना भडकानेवाला केस दर्ज किया है.

साम्यवादी पक्षके गठबंधनवाली सरकार भी नहेरुवीयन कोंग्रेससे कम नहीं है. वास्तवमें यह किस्सा केवल धार्मिक भावना भडकानेवाला नहीं है. केरलकी सरकारके आचार पर कई प्रश्नचिन्ह उठते है.

कौन व्यक्ति पशुकी हत्या कर सकता है?

क्या कोई भी व्यक्ति पशु की हत्या कर सकता है?

क्या कोई भी व्यक्ति कोई भी स्थान पर पशुकी हत्या कर सकता है?

क्या कोई भी व्यक्ति किसी भी अस्त्रसे पशुकी हत्या कर सकता है?

क्या कोई भी व्यक्ति कहीं भी चुल्हा जला सकता है?

क्या कोई भी व्यक्ति कहीं भी खाना पका सकता है?

वास्तवमें पशुओंको काटनेकी आचार संहिता है. यह आचार संहिता कतलखानोंके नियमोंके अंतर्गत निर्दिष्ट है.

नहेरुवीयन कोंग्रेस एक, ठग-संगठन है. जनतंत्रमें अहिंसक विरोध प्रदर्शित करना एक अधिकार है. किन्तु कानूनभंगका अधिकार नहीं है. सविनय कानूनभंग करना एक रीति है. किन्तु उसमें आपको शासनको एक प्रार्थनापत्र द्वारा अवगत कराना पडता है कि आप निश्चित दिवस पर, निश्चित समयपर, निश्चित व्यक्तिओं द्वारा, निश्चित नियमका, भंग करनेवाले है. नियमभंगका कारणका विवरण भी देना पडता है. और इन सबके पहेले शासनके अधिकृत व्यक्ति/व्यक्तियोंसे चर्चा करनी पडती है. उन विचारविमर्शके अंतर्गत आपने यह अनुभूति हुई कि शासनके पास कोई उत्तर नहीं है, तभी आप सविनय नियमभंग कर सकते है. जब नहेरुवीयन कोंग्रेसके शिर्षनेताओंको भी महात्मागांधीके सविनय कानूनभंगकी प्रक्रिया अवगत नहीं है तो इनके सिपोय-सपरोंको क्या खाक अवगत होगा? केरलकी घटना तो एक उदाहरण है. ऐसे तो अगणित उदाहरण आपको मिल जायेंगे.

नहेरुवीयन कोंग्रेस करनेवाली है मानवभ्रूणका भोजन-समारंभ

नहेरुवीयन कोंग्रेसको मानवभ्रुणके मांसके भोजन के लिये भी आगे आना चाहिये. साम्यवादी लोग, नहेरुवीयन कोंग्रेसको अवश्य सहयोग करेंगे, क्यों कि, चीनमें मानवभ्रुणका मांस खाया जाता है. साम्यवादी लोगोंका कर्तव्य है कि वे लोग चीन जैसे शक्तिशाली देशकी आचार संहिताका पालन करें वह भी मुख्यतः जिन पर भारतमें निषेध है. और नहेरुवीयन कोंग्रेस तो साम्यवादीयोंकी सांस्कृतिक सहयोगी है.

नहेरुवीयन कोंग्रेसके प्रेरणास्रोत

तैमुर, महम्मद गझनवी, महम्मद घोरी, अल्लौदीन खीलजी, आदि मुसलमान राजा तो मुसलमानोंके प्रेरणास्रोत है. ऐसे मुसलमान कोई सामान्य कक्षाके नहीं है. आप यह प्रश्न मत उठाओ कि तैमुर, महम्मद गझनवी, महम्मद घोरी, अल्लौदीन खीलजी, आदि मुसलमान राजाओंने तो हमारे मुसलमान भाईओंके पूर्वजोंका कत्ल किया था. किन्तु यह बात स्वाभाविक है जब आप मुसलमान बनते है तो आपके कोई भारतीय पूर्वज नहीं होते, या तो आप आसमानसे उतरे है या तो आप अरबी है या तो आप अपने पूर्वजोंकी संतान नहीं है. इसी लिये तैमुर, महम्मद गझनवी, महम्मद घोरी, अल्लौदीन खीलजी, आदि मुसलमान राजा आपके प्रेरणास्रोत बनते है. यदि आप सीधे आसमानसे उतरे हैं तो यह तो एक चमत्कार है. किन्तु मोहम्मद साहब तो चमत्कारके विरुद्ध थे. तो आप समज़ लो कि आप कौन है. किन्तु इस विवादको छोड दो. ख्रीस्ती लोग भी मुसलमान है. क्यों कि मुसलमान भी ईसा को मसिहा मानते है. या तो मुसलमान, ख्रीस्ती है, या तो ख्रीस्ती, मुसलमान है. जैसे वैष्णव लोग और स्वामीनारयण लोग हिन्दु है.

नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके सांस्कृतिक साथीयोंको मुसलमानोंका अपूर्ण कार्यको, पूर्ण करना है, इस लिये उनका कर्तव्य बनता है कि जो कार्य मुसलमानोंने भूतकालमें किया उसीको नहेरुवीयन कोंग्रेस आगे बढावे. मुसलमानोंने सोमनाथके मंदिरको बार बार तोडा है. हिन्दुओंने उसको बार बार बनाया है. तो अब नहेरुवीयन कोंग्रेसका धर्म बनता है कि वे पूनर्स्थापित सोमनाथ मंदिरको भी ध्वस्त करें.

देशको तो तैमुर, महम्मद गझनवी, महम्मद घोरी, अल्लौदीन खीलजी, आदि मुसलमानोंने लूटा था. अंग्रेजोने भी लूटा था. नहेरुवीयन कोंग्रेस ६० वर्षों तक लूटती ही रही है, किन्तु नहेरुवीयन कोंग्रेसने अभीतक सोमनाथ मंदिर तोडा नहीं है. तो अब नहेरुवीयन कोंग्रेस वह भी तोडके बता दें कि वह अल्पसंख्यकोंके प्रति कितनी प्रतिबद्ध है.

शिरीष मोहनलाल दवे

 

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सोमनाथका मंदिर कैसे तोडा जाय? भाग-१

सोमनाथका मंदिर कैसे तोडा जाय? भाग-१

यदि आप बछडेकी सरे आम और वह भी सडक पर हत्या कर सकते है और बछडेके मांसको पका सकते है और मांसका वितरण कर सकते है और भोजन समारंभ कर सकते है तो अब तुम कई सारे कार्य कर सकते हो. सोमनाथका मंदिर तोडने के लिये आगे बढो. प्रदर्शन करना, कानुन भंग करना जनतंत्रमें आपका अधिकार है.

लोग पूछेंगे आप किससे बात कर रहे हो? कौन तोडेगा सोमनाथका मंदिर?

नहेरुवीयन कोंग्रेस ही सोमनाथका मंदिर तोड सकती है. सामान्य मुसलमान लोगोंके लिये यह बसकी बात नहीं है. यदि नहेरुवीयन कोंग्रेस द्वारा सोमनाथका मंदिर तोडा जाय तो भारतके अधिकतर मुसलमान अवश्य आनंदित होगे. पाकिस्तान के लोग भी आनंदित होगे. इससे पाकिस्तान और हिंदुस्तानके संबंधोंमे सुधार आयेगा. नहेरुवीयन कोंग्रेसका और उसके सांस्कृतिक साथीयोंका ध्येय मुसलमानोंको आनंदित करना ही तो है.

“दो बैलोंकी जोडी”

गाय के ब्रह्मरंध्रके हिस्सेमें परमेश्वरका वास है. वैसे तो गायमें सभी देवताओंका वास है. किन्तु सबसे वरिष्ठ, ऐसे देवाधिदेव महादेव ब्रह्मरंध्रमें बिराजमान है. देवताओंके अतिरिक्त सप्तर्षियोंका भी वास है. गाय का दूध, गोबर और मूत्र, औषधि माना जाता है. हमारे बंसीभाई पटेल, कुछ वर्षोंसे केवल गायके दूध पर ही जीवन व्यतित कर रहे हैं. वे ९५ वर्षके है और तंदुरस्त है.

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महात्मा गांधीकी कार्य सूचिमें मदिरा-निषेधके पश्चात्‌ गौ-वंश वध निषेध आता था. उसके पश्चात्‌ स्वावलंबन और अहिंसा आदि “मेरे स्वप्नका भारत और हिन्द स्वराज”में लिखी गई कार्य सूचिमें आते थे.

नहेरुको महात्मा गांधीकी यह मानसिकता पसंद नही  थी. किन्तु नहेरुका कार्य सूचिमें प्रथम क्रम पर सत्ता, और उसमें भी सर्वोच्च शक्तिमान प्रधानमंत्री पद था. यदि वे निर्भय होकर सामने आते और “मनकी बात” प्रदर्शित करते तो उनके लिये प्रधानमंत्रीका पद आकाशकुसुमवत बन जाता.

इस कारणसे नहेरुने महात्मा गांधीका कभी भी विरोध नहीं किया.

भारतीय संविधानमें ही मदिरा-निषेध, गौवध-निषेध और अहिंसक समाजकी स्थापना, ऐसे कर्य-विषयोंका समावेश किया जाय ऐसी महात्मा गांधीकी महेच्छा थी. ये बातें महात्मागांधीके “हिन्द-स्वराज्य”में स्पष्ट रुपसे लिखित है. संविधानकी रचनाके कालमें तो कई सारे महात्मा गांधीवादी, विद्यमान थे. नहेरुने तो कोई संविधान लिखा नहीं. हां नहेरुने भारतका इतिहास जो अंग्रेजोने लिखा था उसका “कोपी-पेस्ट” किया था. नाम तो डीस्कवरी ऑफ ईन्डीया लिखा था, किन्तु कोई डीस्कवरी सुक्ष्मदर्शक यंत्रसे भी मिलती नहीं है.

बाबा साहेब आंबेडकरने भारतका संविधान लिखा है. नहेरुने केवल स्वयंको जो विपरित लगा उनको निर्देशात्मक सूचिमें समाविष्ठ करवा दिया. निर्देशात्मक सुचिमें समावेश  करवाया उतना ही नहीं, उनको राज्योंके कार्यक्षेत्रमें रख दिया.

उत्तर प्रदेश सर्वप्रथम राज्य था जिसने गौवध निषेध किया. उस समय नहेरुने आपत्ति प्रदर्शित की थी, और त्याग पत्र देनेकी भी धमकी भी दी थी, किन्तु तत्कालिन पंतप्रधानने उनकी धमकीकी अवगणना की.

नहेरु अपने को धर्म निरपेक्ष मानते थे और वे अपने अल्पसंख्यकोंको अनुभूति करवाना चाहते थे कि वे (स्वयं परिभाषित परिभाषाको, स्वयं द्वारा ही प्रमाणित) धर्मनिरपेक्षता पर प्रतिबद्ध थे.

नहेरुकी यह मानसिकता, नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण और उनसे अभिभूत अनुयायीगणमें भी है. अभिभूत शब्द ही सही है.

एक समय था जब कोंग्रेसका पक्षचिन्ह दो-बैलोकी जोडी था. बैल भी गायकी ही प्रजातिमें आता है. १९६९में नहेरुवीयन कोंग्रेसका, नहेरुकी फरजंद ईदिरा गांधीकी नेतागीरीवाली, और कोंग्रेस संगठनकी सामुहिक नेतागीरीवाली, कोंग्रेसमें विभाजन हुआ. कोंगी [कोंग्रेस (आई)], कोंगो [कोंग्रेस (ओ)].

गाय बछडावाली नहेरुवीयन कोंग्रेस

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ईन्दीरा गांधीमें नहेरुके सभी कुलक्षण प्रचूर मात्रामें थे. अपने पक्षका चिन्ह उसने गाय-बछडा रक्खा जिससे हिन्दुओंको और खास करके कृषक और गोपाल समाजको आकर्षित किया जा सके. ईन्दिरा गांधीने आचारमें भी जनताका विभाजन, धर्म और ज्ञातिके आधार पर किया. जब वह शासन करनेमें प्रत्येक क्षेत्रमें विफल रही तो उसने आपत्‌ काल घोषित किया.

I CAN DEFEAT YOU

इस आपात्‌ काल अंतर्गत विनोबा भावे ने ईन्दिरा गांधीको पत्र लिखा की “गौ-हत्या”का  निषेध किया जाय, नहीं तो वे आमरणांत अनशन पर जायेंगे. आपात्‌कालके अंतर्गत तो समाचार माध्यममें शासनके विरुद्ध लिखना निषेध था. इस लिये विनोबा भावे के पत्रको प्रसिद्धि नहीं मिली. ईन्दिरा गांधीने आश्वासन दिया की वह गौ-हत्या पर निषेध करेगी और उसने समय मांगा. विनोबा भावे तो शतरंजके निपूण खिलाडी थे. उनको तो परीक्षा करनेकी थी कि इन्दिरा गांधी पूरी तरह मनोरोगी हो गई है या नहीं. विनोबा भावेको लगा कि ईन्दिरा गांधी पूर्णतया मनोरोगी नहीं बन गयी है किन्तु रोग अवश्य आगे बढ गया है. इसलिये उन्होने आचार्य संमेलन बुलाया. इसकी बात हम यहां नहीं करेंगे.

विनोबा भावे को यह अनुभूति नहीं हुई कि जब कोई पक्षका नेता स्वकेन्द्री और दंभी बन जाता है तो ऐसी मानसिकता उनके पक्षके अधिकतर सदस्योंमें भी आ जाती है. ये लोग तो अपने नेतासे भी आगे निकल जाते है. और शिर्षनेतागणको यह उचित भी लगता है क्यों कि पक्षके एक सदस्यने यदि कोई अभद्र व्यवहार किया और पकडा गया, तो शिर्ष नेतागण स्वयंको उससे वे सहमत नहीं है ऐस घोषित कर सकते है और आवश्यकता अनुसार स्वयंको वे, उससे असहमत और भीन्न है ऐसा दिखा सकते है.

नियमोंवाला संविधान किन्तु आचारमें मनमानी

नहेरुवीयन कोंग्रेसने नियम तो ऐसे कई बनाये है. किन्तु नियम ऐसे क्षतिपूर्ण बनाये कि वे नियम व्यंढ ही बने रहे. ऐसे नियम बनानेका उसका हेतु अबुध जनता को भ्रमित करनेका था. उनका कहना था कि “देखो, हमने तो नियम बनाये है, किन्तु उसका पालन करवाना शासनका काम है. यदि कोई राज्यमें विपक्ष का शासन है तो नहेरुवीयन कोंग्रेस ऐसा कहेगी कि “यह तो राज्यका विषय है” यदि वहां पर नहेरुवीयन कोंग्रेसका शासन है तो उसका कथन होगा “हमने विवरण मांगा है ….” या तो “अभी तो केस न्यायालयके आधिन है … देखते हैं आगे क्या होता है. … हम प्रतिक्षा कर रहे हैं”. यदि न्यायालयने नियम तोडनेवालेके पक्षमें न्याय दिया तो नहेरुवीयन कोंग्रेस कहेगी कि “हम अध्ययन कर रहे है कि कैसे संशोधन किया जाय.”

नहेरुवीयन कोंग्रेस द्वारा आपने गौ-मांस-भोजन-समारंभ तो देखे ही है.

निर्देशात्मक नियमोंका दिशा सूचन

समाजमें सुधार आवश्यक है. किन्तु समाज अभी पूरी तरह शिक्षित हुआ नहीं है. इसीलिये क्रमशः सुधार लाना है. निर्देशात्मक नियमोंका  यह प्रयोजन है. वे दिशासूचन करते हैं. यदि कोई राज्यका शासन नियम बनानेकी ईच्छा रखता है तो वह निर्देशात्मक नियमकी दिशामें विचारें और नियमका पूर्वालेख, नियमको उसी दिशामें, आचारके प्रति, शासनको प्रतिबद्ध करें. यही अपेक्षा है. निर्देशित दिशासे भीन्न दिशामें या विरुद्ध दिशामें नियम बनाया नहीं जा सकता.

नहेरुवीयन कोंग्रेस शासित राज्योंमें, जो नये नियम बने, वे अधिकतर निर्देशित सिद्धांतोसे विपरित दिशामें है. जैसे कि मद्य-निषेध. उन्नीसौसाठके दशकमें महाराष्ट्र स्थित नहेरुवीयन कोंग्रेसने मद्यनिषेधके नियमोंको सौम्य बनया ताकि ज्यादा लोग मद्यपान कर सके.

असहिष्णुताकी वोट बेंक बनाओ

 

धर्म के आधार पर विभाजन इस हद तक कर दो कि लोग अन्य धर्मके प्रति असहिष्णु बन जाय. हिन्दुओंको विभाजित करना तो सरल है.

वेमुला, अखलाक, कन्हैया जैसे प्रसंगोंको कैसे हवा दी गयी इस बातको हम सब जानते है. यदि कोई हिन्दु जरा भी असहिष्णु बने तो पूरे हिन्दुओंकी मानसिकताकी अपकिर्ती फैला दो.

नहेरुवीयन कोंग्रेसने ऐसी परिस्थिति बना दी है कि यदि कोई सुरक्षाकर्मी,  जीपके आगे किसी पत्थरबाज़ को बांध दे और सुरक्षा कर्मीयोंको पत्थरबाज़ोंसे बचायें और परिणाम स्वरुप आतंक वादियोंसे जनताकी भी सुरक्षा करें, तो फारुख और ओमर जैसे मुस्लिम लोग आगबबुला हो जाते हैं.

यदि फारुख और ओमर इस हद तक जा सकते है तो नहेरुवीयन कोंग्रेसको तो फारुख और ओमरसे बढकर ही होना चाहिये न !!

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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मुस्लिमोंका कश्मिरी हत्याकांड, आतंक और सीमाहीन दंभः

हिन्दुओंके हत्यारे

यदि आप मनुष्य है तो आपका रक्त उबलना चाहिये

आप मनुष्य है यद्यपि कश्मिरी हिन्दुओंकी दशकोंसे हो रही यातनाओंके विषय पर केन्द्रस्थ शासकोंकी और कश्मिरके शासकोंकी और नेताओंकी मानसिकता और कार्यशैलीसे यदि, आपका रक्त क्वथित (ब्लड बोइलींग) नहीं होता है और आप इस सातत्यपूर्ण आतंकके उपर मौन है तो निश्चित ही आप आततायी है.

इस आततायीओंमें यदि अग्रगण्योंकी सूचि बनानी है तो निम्न लिखित गण महापापी और अघोर दंडके योग्य है.

नहेरुवीयन कोंग्रेसः

हमारे देशके गुप्तचर संस्था सूचना देती रहेती थी कि, आतंकवादीयोंके भीन्न भीन्न समूह अफघानिस्तानमे अमेरिका और सोवीयेत युनीयन के शित युद्धमें क्या कर रहे हैं.

ओसामा बीन लादेन भी कहा करता था कि द्वितीय लक्ष्य भारत है. शित युद्ध अंतर्गत भी एक आतंकी समूह, शिख आतंकवादीयोंके संपर्कमें था. शिख आतंकवादी समुह भी पाकिस्तान हस्तगत कश्मिरमें प्रशिक्षण लेता रहता था. शित युद्ध का एक केन्द्र पाकिस्तान भी था. अमेरिकाकी गुप्तचर संस्था सीआईएपाकिस्तानकी गुप्तचर संस्था आईएसआई, अमेरिका समर्थित आतंकी समूहोंके साथ (उदाहरण = अल कायदा), संवाद और सहयोगमें थे.

खालिस्तानी आतंकवाद का संपर्क पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था आई एस आई से था. इस प्रकार पाकिस्तानके शासनको और पाकिस्तानस्थ आतंकी समूहोंके लिये भारतमें आतंकवादी जाल स्थापित करना सुलभ था.

जब शित युद्धका अंत समीप आने लगा (१९८०), तो आतंकवादी संगठनोंने भारतको लक्ष्य बनाया जिसमें खालिस्तानी आतंकवाद मुख्य था. यह एक अति दीर्घ कथा है किन्तु, खालिस्तानी आतंकवाद ने स्वर्णमंदिरपर पूरा कबजा कर लिया था. जब इन्दिरा गांधीको आत्मसात्हुआ कि अब खालिस्तानके आतंकवादी की गतिविधियोंके फलस्वरुप उसकी सत्ता जा सकती है तब उसने १९८४में स्वर्णमंदिर पर आक्रमण करवाया. ४९३ आतंकवादी मारे गये. १९०० व्यक्तियोंका अतापता नहीं. तत्पश्चात्सिख आतंकवाद बलवान हुआ और इन्दिरा गांधीकी आतंकीयोंने हत्या की.

इस प्रकार आतंकवादने अपना जाल फैलाया. १९८८में शितका युद्ध संपूर्ण अंत हुआ और मुस्लिम आतंकी समूहका भारतमें प्रवेश हुआ. वीपी सिंह और चन्दशेखरने सिख आतंकवादका अंत तो किया किन्तु वे मुस्लिम आतंकवादको रोकनेमें असमर्थ बने क्योंकि वीपी सिंहने दलित आरक्षण पर अधिक प्राथमिकता दी, और चन्द्र शेखरने अपना धर्मनिरपेक्ष चित्र बनाने पर अधिक ध्यान दिया. इसका कारण यह था कि भारतीय जनता पक्ष विकसित हो रहा था औरस इन दो महानुभावोंको अपना वोटबेंक बनाना था.

१९८८के अंतर्गत मुस्लिम आतंकवादीयोंने कश्मिर में अपनी जाल प्रसारित कर दी थी. शासन, समाचार पत्र, मुद्रक, मस्जिदें, सभी मुस्लिम संस्थाओंके साथ उनका संपर्क हो गया था.

१९८९ अंतर्गत इन आतंकीयोंने हिन्दुओंको अतिमात्रामें पीडा देना प्रारंभ किया. और १९८९ तक उन्होंने ऐसी स्थिति प्राप्त कर ली कि, वे ध्वनिवर्धक यंत्रोंसे साक्षात रुपसे वाहनोंमें घुम कर, मस्जिदोंसे, स्पष्ट धमकी देने लगे, यदि हिन्दुओंको (सिख सहित), कश्मिरमें रहेना है तो मुस्लिम धर्म अंगिकार करो या तो कश्मिर छोडके पलायन हो. यदि ऐसा नहीं किया तो आपकी अवश्य ही हत्या कर दी जायेगी.

१९ जनवरी, १९९० अन्तिम दिवस

इस घोषणाका अंत यह नहीं था. मुस्लिमोंने १९ जनवरीको अंतिम दिन भी घोषित किया. सार्वजनिक सूचना के विशाल मुद्रित पत्र सार्वजनिक स्थानों पर, भित्तियोंपर (ओन वॉल्स), निश्लेषित (पेस्टेड) किये गये, समाचार पत्रोंमें भी यह सूचना सार्वजनिक की गयी कि  कश्मिरमें रहेना है तो मुस्लिम धर्म अंगिकार करो या तो कश्मिर छोडके पलायन हो. यदि ऐसा नहीं किया तो आपकी अवश्य ही हत्या कर दी जायेगी.

इस समय अंतर्गत क्या हुआ?

पुलिस मौन रहा,

स्वयंको धर्मनिरपेक्ष प्रदर्शित करनेवाले अखिल भारतके नहेरुवीयन कोंगी नेतागण मौन रहा. यह कोंग, उस समय भी कश्मिरके शासक पक्षमंडळका एक अंग था, तो भी मौन और निस्क्रीय रहा.

कश्मिरके स्वयंको धर्मनिरपेक्ष प्रदर्शित करनेवाले मुस्लिम नेता मौन रहे, हाशीम कुरैशी, शब्बीर एहमद, शब्बीर शाह, अब्दुल गनी, मुफ्ती मोहमद, फारुख, ओमर, यासीन मलिक, गुलाम नबी आझाद, सज्जद एहमद किच्लु, सईद एहमद कश्मिरी, हसन नक्वी, आदि असंख्य नेतागण मौन रहे

कश्मिरके मुस्लिम शासनके मंत्रीगण जिनका नेता फरुख अब्दुल्ला जो हमेशा अपने पुर्वजोंके बलिदानोंकी वार्ताएं करके अपनी पीठ थपथपाता है, वह भी अपनी गेंगके साथ सर्व मौन रहा.

इन लोगोंने तो जनकोषसे लाखों रुपयोंका वेतन लिया था. उनका तो धर्म बनता है कि अपने राज्यके नागरिकोंका और उनके अधिकारोंका रक्षण करे. किन्तु यह फारुख तो अपने कबिलेके साथ अंतिम दिन १९ जनवरी १९९०के दिनांकको ही विदेश पलायन हो गया.

आज २५साल के पश्चात्वह कहता है कि हिन्दुओंके उपर हुए अत्याचारके लिये वह उत्तरदायी नहीं है क्यों कि वह तो कश्मिरमें था ही नहीं (पलायनवादी का तर्क देखो. वह समझतता है कि कश्मिरमें आनेके बाद भी और १० साल सत्ता हस्तगत करनेके बाद भी उसका कोई उत्तरदायित्व नहीं है. यह स्वयं आततायी संगठनोंका हिस्सा समझा जाना चाहिये)

कश्मिरके भारतीय नागरिक सुरक्षा सेवा अधिकारी गण (ईन्डीयन पोलीस सर्वीस ओफिसर्स = आई.पी.एस. ओफिसर्स)), नागरिक दंडधराधिपति सेवा अधिकारीगण (ईन्डीयन अड्मीनीस्ट्रटीव सर्वीस ओफीसर्स = आई..एस ओफीसर्स) मौन रहे. इन लोगोंने तो जनकोषसे लाखों रुपयोंका वेतन लिया है. इनका भी धर्म बनता है कि अपने राज्यके नागरिकोंका और उनके अधिकारोंका रक्षण करे.

समाचार प्रसारण माध्यम जिनमें मुद्रित समाचार पत्र, सामायिक, दैनिक आदि आते हैं, और विजाणुं माध्यम जिनमें सरकारी और वैयक्तिक संस्थाके दूरदर्शन वाहिनीयां है और ये सर्व स्वयंको जन समुदायकी भावनाएं एवं परिस्थितियोंको प्रतिबींबित करने वाले निडर कर्मशील मानते हैं वे भी मौन रहे,

यही नहीं पुरे भारतवर्षके ये सर्व कर्मशील मांधाता और मांधात्रीयां मौन रहे, सुनील दत्त, शबाना, जावेद अख्तर, महेश भट्ट, कैफी आझमी, नसरुद्दीन शाह, झाकिर नायक, अमिर खान, शारुख खान, आर रहेमान, अकबरुद्दीन ओवैसी, इरफान हब्बीब, मेधा, तिस्ता, अरुन्धती, आदि असंख्य मौन रहे,

अमेरिका जो अपनेको मानव अधिकारका रक्षक मानता है और मनवाता है, और मानवताके विषय पर वह स्वयंको जगतका पितृव्यज (पेटर्नल अंकल) मनवाता है, वह भी मौन रहा, उसकी संस्थाएं भी मौन रही,

भारतवर्ष के भी सभी अशासकीय कर्मशील, धर्मनिरपेक्षवादी कर्मशील, महानुभाव गण (सेलीब्रीटी), चर्चा चातूर्यमें निपूण महाजन लोग भी मौन रहे.

मौन ही नहीं अकर्मण्य रहे,

अकर्मण्य भी रहे आज पर्यंत, २५ हो गये,

क्या इन महानुभावोंकी प्रकृति है मौन रहेनेकी?

नहीं जी, इन महानुभावोंका किंचिदपि ऐसी प्रकृति नहीं है.

गुजरातके गोधरा नगरके कोंग्रेससे संबंधित मुस्लिमोंने २००२ में हिन्दु रेलयात्रियोंको जीवित अग्निदाह देके भस्म कर दिया तो हिन्दु सांप्रदायिक डिम्ब हिंसा प्रसरित हो गयी और उसमें हिन्दु भी मरे और मुस्लिम भी मरे. इस डिंब हिंसाचारमें मुस्लिम अधिक मरे. कारण था प्रतिक्रिया.

शासनने योग्य प्रतिकारक और दडधरादिक कार्यवाही की, इसमें कई मारे गये. मुस्लिम भी मारे गये और हिन्दु भी मारे गये. हिन्दु अधिक मारे गये.

दोनों संप्रादयके लोगोंके आवासोंको क्षति हुई.

तस्माद्अपि, उपरोक्त दंभी धर्मनिरपेक्ष, प्रत्येक प्रकारकी प्रणालीयोंने और महानुभावोंने अत्यंत, व्यापक, और सुदीर्घ कोलाहल किया, और आज, उसी २००२ के गुजरात डिंब विषय भी कोलाहल चलाते रहेते है.

क्या कश्मिरी मुसलमान लोग और नेतागणकी प्रकृति सांप्रदायिक कोलाहल करने की है?

कश्मिरी मुसलमानोंने ही हत्या करनेवालोंको साथ दिया था और हिन्दुओंको अन्वेषित करनेमें हत्या करनेवालोंको संपूर्ण सहायता की थी.

इतना ही नहीं इन नेताओंने और मुस्लिम जनसामाजने हिन्दुओंको आतंकित करनेमें कोई न्यूनता नहीं रक्खी थी.

अमरनाथ यात्रीयों पर हिंसायुक्त आक्रमण

अमरनाथ एक स्वयंभू शिवलिंग है. हिन्दुओंका यह एक श्रद्धा तीर्थ है. यह तिर्थयात्रा .पूर्व ३०० से भी पूर्व समयसे चली आती है. मई से, २९ अगस्त तक यात्राका समय है.

१९९०में मुस्लिमोंने जो नरसंहार और आततायिता प्रदर्शित की. कश्मिरका शासन और केन्द्रीय भारतीय नहेरुवीयन कोंग्रेसका शासन, निंभर रहा. इससे मुसलमानोंका उपक्रम बढा. उन्होने आतंककी भयसूचना दे डाली. इस कारण दोनों भीरु शासनने १९९०से १९९५ तक अमरनाथ यात्रा स्थगित कर दी.

सन. ९९९६ से शासनने अनुमति देना प्रारंभ किया. प्रत्येक वर्ष कश्मिर के मुस्लिम, हिन्दु यात्रीयोंको धमकी देते हैं. और हमारे जवान यात्रीयोंकी सुरक्षा करते है. कश्मिर शासनका स्थानिक सुरक्षादल कुछ भी सुरक्षा देता नहीं है. अमरनाथ यात्रा पहलगांवसे प्रारंभ होती है और मुस्लिम आतंकी कहींसे भी हमला कर देते हैं. प्रतिवर्ष आक्रमण होता है. कुछ यात्री आहत हो जाते हैं. उनमें शारीरिक पंगुता जाती है. कुछ यात्री हत्यासे बच भी नहीं सकते. सन. २०००मे एक बडा हत्याकांड हुआ था उसमें १५००० का सुरक्षा दल होते हुए भी १०५ हिन्दु मारे गये. इनमें ३० यात्रीयोंको तो पहलगांवमें ही मार दिया.

अमरनाथ श्राईन बोर्डः

सन २००८में अमरनाथ यात्रीयोंकी सुरक्षा और सुविधाओंको ध्यानमें रखते हुए, केन्द्रीय शासन (नहेरुवीयन कोंग्रेस) और कश्मिरके मुस्लिम शासनने एक संमतिपत्र संपन्न किया कि, अमरनाथ श्राईन बोर्डको ९९ एकड वनभूमि उपलब्ध करवाई जाय.

इसका प्रयोजन यह था कि सुरक्षाके उपरांत, यात्रीयोंके लिये श्रेयतर आवासोंका निर्माण किया जा सके. वैसे तो ये सब आवास अल्पकालिन प्रकारके रखने के थे.

तथापि, आप मुसलमानों का तर्क देखिये.

इस प्रकार भूमि अधिग्रहण करनेसे अनुच्छेद ३७०का हनन होता है.

मुस्लिमोंका दुसरा तर्क था कि, आवासोंका निर्माण करनेसे पर्यावरण का असंतुलन होता है.

ये द्नों तर्क निराधार है. अमरनाथ श्राईन बोर्ड स्थानिक शासनका है. इस कारणसे अनुच्छेद ३७० का कोई संबंध नहीं. जो आवास सूचित किये थे वे प्रासंगिक और अल्पकालिन प्रकारके थे. इस कारणसे उनका पर्यावरण के असंतुलनका तर्क भी अप्रस्तुत था.

इस प्रकार कश्मिर के मुस्लिमोंने जो तर्क रक्खा था वह मिथ्या था. “मुसलमान लोग तर्क हीन और केवल दंभी होते हैइस तारतम्यको भारतके मुसलमानोंने पुनःसिद्ध कर दिया.

कश्मिरके मुसलमानोंने अमरनाथ श्राईन बोर्ड और जम्मुकश्मिर शासनके इस संमतिअभिलेखका प्रचंड विरोध किया. पांच लाख मुस्लिमोंने प्रदर्शन किया और कश्मिरमें व्यापकबंधरक्खा.  भारतका पुरा मुस्लिम जन समाज, हिन्दुओंको कोई भी सुविधा मिले उसके पक्षमें होता ही नही है.             –

आप कहेंगे इसमें कश्मिरके अतिरिक्त भारतके मुसलमानोंके संबंधमें क्यों ऋणात्मक भावना क्यों रखनी चाहिये?

जो मुसलमान स्वयं मानवीय अधिकारोंके पक्षमें है, ऐसा मानते है, जो मुसलमान स्वयंको धर्मनिरपेक्ष मानते हैं, जो मुसलमान स्वयंको भारतवासी मानते हैं, इन मुसलमानोंका क्या यह धर्म नहीं है कि वे अपने हिन्दुओं की सुरक्षा और सुविधा पर अपना तर्क लगावें और कश्मिर के पथभ्रष्ट मुसलमान भाईओंके विरुद्ध अपनी प्रतिक्रिया प्रदर्शित करें, आंदोलन करें, उपवास करें?

नहीं. भारतके मुसलमान ऐसा करेंगे ही नहीं. क्यों कि वे अहिंसामें मानते ही नहीं हैं. समाचार माध्यमके पंडितोंने भी, इस विषयके संबंधमें मुस्लिम और शासकीय नेताओंको आमंत्रित करके कोई चर्चा चलायी नहीं. समाचार माध्यमोंके पंडितोंको केवल कश्मिरके मुसलमानोंने कैसा लाखोंकी संख्यामें एकत्र होके कैसा  अभूतपूर्व आंदोलन किया उसको ही प्रसारण करनेमें रुचि थी. उनको मुस्लिम नेताओंकों और नहेरुवीयन कोंगके नेताओंको आमंत्रित करके उनके प्रमाणहीन तर्कोंको धराशाई करनेमें कोई रुचि नही थी. नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण तो वैसे ही दंभी, असत्यभाषी, ठग, सांप्रदायिक, मतोंके व्यापारी, आततायी, कायर और व्यंढ है. उन्होंने तो मुसलमानोंके चरित्रको, स्वयंके चरित्रके समकक्ष किया है.

कश्मिर पर आयी वर्षा की सद्य प्राकृतिक आपदाएं

इसी वर्षमें कश्मिर पर वर्षाका प्राकृतिक प्रकोप हुआ.

भारतके सैन्यका, कश्मिरी मुसलमान वैसे तो अपमान जनक वर्तन करनेमें सदाकाल सक्रिय रहेते है. क्यों कि, मुसलमानोंकी हिंसात्मक मानसिकताको और उनके आचारोंको, भारतीय सैनिक, यथा शक्ति, नियंत्रित करते है.

भारतीय सैनिकोंका ऐसा व्यावहार, मुसलमानोंकों अप्रिय लगता है. ये मुसलमान लोग स्थानिक सुरक्षाकर्मीयोंकी भी हत्या करते है.

यह मुसलमान लोग हिन्दुओंके लिये और स्वयंके लिये भीन्न भीन्न मापदंड रखते हैं.

नरेन्द्र मोदीने गुजरातमें मुसलमानोंकी सुरक्षा की, और तीन ही दिनोमें परिस्थितिको नियंत्रित कर दिया था तो भी मुसलमानोंने और दंभी जमातोंने अपना जठर फट जाय, उतनी नरेन्द्र मोदीकी निंदा की थी. आज भी करते है. तद्यपि नरेन्द्र मोदी हमेशा अपना राजधर्मका पालन करते रहे, और जिन मुस्लिमोंने ३०००+ कश्मिरी हिन्दुओंका कत्ल किया था और लाखों हिन्दुओंके उपर आतंक फैलाके कश्मिरसे भगा दिया था, उन्ही मुस्लिमोंके प्राणोंकी रक्षाके लिये नरेन्द्र मोदीने भारतीय सैनिकोंको आदेश दिया. और उन्ही भारतीय सैनिकोंने स्वयंके प्राणोंको उपेक्षित करके इन कृतघ्न और आततायी कश्मिरके मुस्लिमोंके प्राण बचाये.

अब आप कश्मिरके घोषित, श्रेष्ठ मानवता वादी,

समाचार माध्यम संमानित वासिम अक्रम की

मानसिकता देखो.

इस वासिम अक्रम कश्मिरका निवासी है. उपरोक्त उल्लेखित प्राकृतिक आपदाके समय इस व्यक्तिने कुछ मुसलमानोंके प्राणोंकी रक्षा की. इस कारणसे प्रसार माध्यम द्वारा उसका बहुमान किया गया. उससे प्र्श्नोत्तरी भी की गयी. इस व्यक्तिने वर्णन किया कि उसके मातापिताके मना करने पर भी वह स्वयंमें रही मानवतावादी वृत्तिके कारण घरसे निकल गया और प्राकृतिक आपदा पीडित कश्मिरीयोंके प्राणोंकी रक्षा की.

इसी व्यक्तिने बीना पूछे ही यह कहा कि, भारतीय सैनिकोंने भी अत्यंत श्रेष्ठ काम किया. लेकिन उनका तो वह धर्म था. उनको तो अपना धर्म निभानेके लिये वेतन मिलता है. (किन्तु मैंने तो मानवधर्म निभानेके लिये वेतनहीन काम किया).

इससे अर्थ निकलता है कि मानवतावादी कर्म तभी कहा जा सकता है कि, आप बिना वेतन काम करो. वासिमने बिना वेतन काम किया इसलिये वह मानवता वादी है.

लेकिन इससे एक प्रश्न उठता है.

उसने हिन्दुओंके लिये क्या किया?

हो सकता है कि १९९०में वह दूधपीता बच्चा हो. लेकिन उसके पिता तो दूध पिता बच्चा नहीं था. और अन्य मुसलमान लोग तो दूधपीते बच्चे नहीं थे. वासिम ! २००५ से तो तू बडा हो ही गया था. तो तभीसे तो तू हिन्दुओंको सुरक्षित रीतिसे कश्मिरमें अपने घरोंमें बसा सकता था. इसमें तुम्हारी मानवता कहां गई? हिन्दुओंके विषयमें तू क्यों अपनी मानवता दिखाता नहीं है?

जिसकी मानवताको माध्यमोंने प्रसारित किया, उसको कभी यह पूछा नहीं गया कि कश्मिरी हिन्दुओंके बारेमें उसने क्या किया? उनके प्रति क्यों मानवता नहीं दिखाता है?

कश्मिरी हिन्दुओंका पुनर्वासः

कश्मिरमें मुफ्तीसे मिलीजुली बीजेपीकी सरकार आयी. उसने कश्मिरके प्रताडित, प्रपीडित, निष्काषित निर्वासित हिन्दुओंके पुनर्वासके लिये एक योजना बनायी.

एक भूखंडको सुनिश्चित करके उसमें आवासें बनाके निर्वासितोंका पुनर्वास किया जाय. ऐसी योजना है. उसमें प्राकृतिक आपदासे विस्थापित मुसलमानोंको भी संमिलित किया जा सकता है.

किन्तु यह योजना पर, मुसलमानोंकी संमति नहीं. संमति नहीं उतना ही नहीं प्रचंड विरोध भी है.

इन मुसलमानोंने पूरे राज्यको बंध रखनेकी घोषणा कर दी.

उनका कुतर्क है कि हिन्दु लोग, कश्मिरकी जनताका एक अतूट सांस्कृतिक अंग है, और ऐसा होने के कारण हम मुसलमान लोग उनको ऐसा भीन्न आवसमें रहेने नहीं देंगे. हम चाहते हैं कि ये कश्मिरी हिन्दु लोग हमारे अगलबगलमें ही रहें. हम इसीको ही अनुमति देंगे कि हिन्दुओंका पुनर्वास उनके मूलभूत आवासमें ही हो. हम संयुक्त आवासमें ही मानते है.

वास्तवमें मुसलमानोंका यह तर्क निराधार है.

क्यों कि इस नूतन आवास योजनामें मुसलमानोंके लिये निषेध नहीं हैं. प्राकृतिक आपदासे विस्थापित या और कोई भी मुसलमानको इस आवासमें संमिलित किया जा सकता है. इतना ही नहीं कोई भी कश्मिरी हिन्दु यदि ईच्छा हो तो उसके लिये अपने मूलभूत आवासमें जानेका भी विकल्प खुल्ला है.

इन मुसलमानोंका एक तर्क और भी है.

हिन्दुओंके लिये भीन्न आवास योजना का अर्थ है, कश्मिरमें इस्राएल स्थापित करना. हम हिन्दुमुस्लिमोंके बीच ऐसी दिवार खडी करना नहीं चाहते.

यह तर्क भी आधारहीन है.

हिन्दुओंने कभी संप्रदायके नाम पर  युद्ध किया नहीं. हिन्दुओंने कभी अन्य संप्रदायका अपमान किया नहीं. इतिहास इसका साक्षी है.

इस्राएल, यहुदीओं की तुलना भारत और हिन्दुओंसे नहीं हो सकती. हां यह बात अवश्य कि मुसलमानोंकी तुलना मुसलमानोंसे हो सकती है. भारतके मुसलमानोंने एक भीन्न भूखंड भी मांगा और अपने भूखंडमें हिन्दुओंकी सातत्यपूर्ण निरंतर हत्याएं की.

मुसलमानोंने अपने भूखंडमें हिन्दुओंके उपर अत्याचार भी किये. इतना ही नहीं उन्होंने खुदने पूरे भारतमें अपनी दिवालोंवाली बस्तियां बनायी उसको विस्तृत भी करते गये और हिन्दुओंके आवासों पर कब्जा करते गयें. हिन्दुओंको भगाते भी गये.

कश्मिरमें तो मुसलमानोंने सभी सीमाओंका उल्लंघन किया, सभी सभ्यता नष्ट करके नम्र, सभ्य और अतिसंस्कृत हिन्दुओंका सहस्रोंमें संहार किया, उनको घरसे निकाला दिया और १९९०से आजकी तारिख तक उनको अपने मानवीय अधिकारोंसे वंचित रक्खा.

और ये हिन्दु कौन थे?

ये ऐसे हिन्दु थे जिन्होंने कभी मुसलमानोंसे असभ्य और हिंसक आचार नहीं किया. ऐसे हिन्दुओंके उपर इन मुसलमानोंने कृतघ्नता दिखाई. और अब ये मुसलमान, हिन्दुओंके उपर अपने प्रेमकी बात कर रहे हैं. कौन कहेगा ये मुसलमान विश्वसनीय है और प्रेमके योग्य है?        

जब १९९०में जब मुसलमानोंने ३०००+ हिन्दुओंकी खुल्ले आम हत्यायें की जाती थीं, तब इनमेंसे एक भी माईका लाल निकला नहीं जो हिन्दुओंके हितके लिये आगे आयें.

इन मुसलमानोंका विरोध इतना तर्कहीन और दंभसे भरपुर होने पर भी इसकी चर्चा योग्य और तर्क बद्ध रीतिसे कोई भी समाचार माध्यमने नहीं की. समाचार माध्यम तो, हिन्दुओंके मानव अधिकारके विषय पर सक्रीय है तो वे उत्सुक है.

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः आई.सी.आई., सी.आई.., मानव अधिकार, हनन, शित युद्ध, पाकिस्तान, अमेरिका, सोवियेत युनीयन, खालिस्तानी, यासीन मलिक, फारुख, ओमर, गुलाम नबी, आई.पी.एस., आई..एस., शासन, महानुभाव, कर्मशील, मांधाता, पंडित

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नरेन्द्र मोदीको क्या बनना चाहिये? कौटिल्य अथवा पृथ्वीराज चौहाण? – २

मुहम्मद घोरीने किसीको भी क्षमा किया नहीं था. ठीक उसी प्रकार नहेरुवीयन कोंग्रेसने भी कभी अपने देशी शत्रुको क्षमा किया नहीं था. उतना ही नहीं फर्जी मामले बनाकर भी उसकी मानहानि करनेकी और न्यायिक कार्यवाही द्वारा उसको हानि करनेके भरपुर प्रयत्न किये है.

नहेरुः
नहेरुने अपने विरोधी मोरारजीके विरुद्ध मोरारजीकी संतानको लेकर फर्जी कथाएं चलाइ थीं. कामराजप्लान के अंतर्गत एक फर्जी प्लान बनाके मोरारजी देसाईको मंत्री मंडलसे निकाला गया था.

Narendra Modi has to decide ०१

ईन्दीरा घाण्डीः

ईन्दिरा घान्डी नहेरुवाली नीति चलाके मोरारजीकी मानहानि करवाती रहती थीं.

इन्दिराने आपातकाल के दौरान कई नेताओंको मरणासन्न कर दिया था.

आपतकाल खुद एक फॉड था.

वीपी सींग के विरुद्ध सेंटकीट्स मे उनके नाम फर्जी एकाउन्टका केस दर्ज किया था.

सर्वोदय संस्थाओंके खिलाफ जांचके आदेश दिये थे और सर्वोदय संस्थाओंको निर्दोष होते हुए भी परेशान किया था.

मोरारजी देसाई सीआईएके वेतन पत्रक (पे रोल) पर है ऐसे आक्षेप करवाये थे.

जयप्रकाश नारायणने सैन्य को विद्रोह करनेका कहा था ऐसे आक्षेप करके उनको कारावसमें बंद किया था. अन्य हजारों नेताओंको भी कारावास में बंद किया था.

तारकेश्वरी सिंहाके उपर असत्य आक्षेप करवाये और उनको आत्म हत्या करनी पडी(!).

ज्योर्ज फर्नान्डीस पर फर्जी केस बनाया था और उनको जेलमें बंद किया था.

सोनीया-एमएमएसः

बाबा राम देव को फर्जी केस बनाके परेशान किया, अन्ना हजारे को भी परेशान किया, किरन बेदीके विरुद्ध आक्षेप करके परेशान किया, बाजपाईका किस्सा और अडवाणीकी घटनाएं तो हमने देख ही ली है.

नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, आदि के विरुद्ध फर्जी केस बनवाये.

पुलिसका मोरल डाउन करनेके कई और काम भी किये.

नहेरुवीयन और उनके साथीयोंका संस्कार रहा है कि खुदकी सत्ता और धनके लिये कुछ भी करो, चाहे देशका सामाजिक चारित्र्य कितना ही अधम क्युं न हो जाय.

जो लोग वोटबेंकी सियासत खेलते है वे हमेशा पुलिस और सीबीआई का यथेच्छ उपयोग करते हैं. सरकारी अधिकारीयोंको भ्रष्ट होने देते हैं फिर उनके भ्रष्टाचारके आधार पर उनसे गलत काम करवाते हैं. अन्य लोगोंकी भी ब्लेक डायरी बनाई जाती है जिनमें लालु, मुलायम, ममता, मायावती, जयललिता, करुणानिधि शरद पवार मुख्य है.

ये सब अर्वाचीन मुहम्मद घोरी है.

इन अर्वाचीन मुहम्मद घोरीयोंको कैसे नष्ट कर सकते है?

अति सरल है. क्युं कि ये लोग अतिभ्रष्ट है, जहां भी हाथ डालो उनका भ्रष्टाचार पकडा जा सकता है.

(१) आपातकालमें जिन्होने ईन्दिरा गांधीकी सहायता की थी और जो लोग अभी भी जीवित है, उनके उपर शाह जांच समितिके सूचनोंके आधार पर कार्यवाही हो सकती है. उनको गिरफ्तार कर लो और जेलमें डाल दो. कार्यवाही होती रहेगी.

(२) एन्डरसनको भगाने वालोंमें सोनिया गांधी एक पक्षकार बन सकती है. उनके उपर भी ऐसी ही कार्यवाही हो सकती है.

(३) कश्मिरी हिन्दुओंके प्राकृतिक अधिकारके हनन और लगातार हो रहे मानवीय अधिकार के हननके मामलेमें, अपना फर्ज न निभानेके कारण, कश्मिरके सभी नेताओंको तथा नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंको शिघ्र ही प्रग्रहित (गिरफ्तार) कर सकते हैं. उनकी संपत्ति जप्त कर सकते है.

(४) नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंने और उनके साथीयोंने विदेशी बेंकोमें बीना रीझर्वबेंककी संमति गैरकानुनी एकाउन्ट खोलके काला-लाल धन जमा किया, इस बात पर उन सबके उपर फौजदारी कार्यवाही कर सकते है. क्यों कि यह देशके साथ गद्दारीका विषय है ये सब एकाउन्ट होल्डर गिरफ्तार हो सकते है. इन एकाउन्टोंका राष्ट्रीयकरण करके सबके नाम प्राप्त किया जा सकता है और जो लोग एकाउन्ट होल्डर न हो किन्तु मनिनीत (नोमीनी) व्यक्ति हो तो भी उसके उपर फौजदारी कार्यवाही हो सकती है.

(५) कोमनवेल्थ गेम, कोयला आबंटन और २-जी के बारेमें कई नेताओंको गिरफ्तार करके जेलमें रखा जा सकता है.

(६) भारतीय करन्सी नोट के मुद्रणका संविदा (ठेका) जिसको दिया था वह आतंकी संगठनोंसे संलग्न होनेके कारण अन्य देशोंमे प्रतिबंधित थी. फिर भी नहेरुवीयन कोंग्रेसने उसको मुद्रणका संविद दिया. कई कर्जी करन्सी नोट सरकारी बेंकके एटीएम यंत्रमेंसे निकली थी. इससे यह निरपेक्ष प्रतिबिंबित होता है कि नहेरुवीयन कोंग्रेसके ही नेतागण इससे संलग्न है. इस मामले पर भी कई नेताओंको गिरफ्तार किया जा सकता है.

(७) कई नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण जातीय मामलेमें विवादित है. उनके उपर कार्यवाही शुरु की जा सकती है.

दुसरे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

कई नहेरुवीयन कोंग्रेसके मुसलमान नेताओंकी संतान अभद्र और विभाजनवादी कोमवादी भाषा प्रयोग करती रहेतीं हैं इतना ही नहीं कई नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके साथी नेताओंने कोमवादी उच्चारण अनेकानेक बार किया है उनको गिरफ्तार करके जेलमें बंद कर सकते है.

तीसरे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

ये है समाचार माध्यमके स्वामि. जिनका काम समाजिक शिक्षाका काम करना है. उसके स्थान पर वे देशको विभाजित करनेका काम करते हैं. इनके पाससे हमेशा उचित अवसरों पर स्पष्टिकरण मांगते रहेना चाहिये और जब वे विफल रहें तो उनका अनुमति पत्र रद करनेका और कानुनी कार्यवाहीका आरंभ कर देना चाहिये.

चौथे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

ख्रिस्ती धर्मके पादरी लोग हैं. ये लोग हिन्दु धर्मकी निंदा करते हैं. तत्कालिन बने इसाईयोंको हिन्दुओंसे संबंध न रखने के लिये प्रभावित करते हैं और विभाजनवादी प्रवृतियां करते हैं. गरीब हिन्दुओंको लालच दे के धर्म परिवर्तन करवाते हैं. ऐसे पादरीयों पर सुक्ष्म दृष्टि रखकर कानुनी कार्यवाही की जा सकती है.

पांचवे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

ये है सरकारी अफसर. इनका काम नियमका पालन करना है और नियमका पालन करवाना है. इस कामके लिये उनको वेतन मिलता है. वे अपनी क्षतियांके लिये और सामाजिक अव्यवस्थाके लिये उत्तरदेय है.

नरेन्द्र मोदीको चाहिये कि इनको सीधा करें. यदि इनको सीधा करेंगे तो सब कुछ सीधा हो जायेगा.

कार्यवाही कैसे की जाय?

जो भी कार्यवाही करनी है, वह किसी भी प्रकारका कोलाहल किये बिना करना है. इसमें कोई निवेदनों की या विज्ञापन देनेकी आवश्यकता नहीं हैं. यदि कोई समाचार माध्यमवाले अनावश्यक प्रश्न करें तो उनके उपर भी जनताको पथभ्रष्ट करनेकी और जनताको भ्रमित करनेके आरोप लगाके कानुनी कार्यवाही हो सकती है.

अन्य कई कार्य है जो विकास, कानुन सुधार और गवर्नन्सके बारेमें हैं वे होते रहेंगे, क्यों कि प्रत्येक विकासकी परिकल्पनाके निदेशकका उत्तरदायित्व है कि वह अपना पूर्ण करें. और वह करेगा ही. उपरोक्त कार्य जिसमें कानुनमें संशोधनकी आवश्यक नहीं है, वे प्रारंभ कर सकते हैं. वास्तवमें नियम तो प्रत्येक उत्तरदायुत्वके लिये है. केवल अर्थघटन नहीं किया जाता है.

ऐसा नहीं करेंगे तो क्या होगा?

इतिहासका पुनरावर्तन होगा.

यदा तदा दुश्मनके कुकर्मोंको क्षमा किया है तब देशको सहन करना पडा है.

(१) नहेरुने प्रेमभाव रखके चीनकी लश्करी घुसपैठकी उपेक्षा की तो चीनने भारतकी ९१००० चोरस मील धरती पर अधिकार जमा लिया. हमारे हजारों जवान बेमौत मरे.

(२) इन्दीरा घान्डीने पाकिस्तानके साथ बेवकुफी बतायी और सिमला करार किया जिससे पाकिस्तानने जो खोया था वह सब पा लिया. बंग्लादेशने अपना देश पा लिया और एक करोड बीन बंगाली मुस्लिमोंसे छूटकारा भी पा लिया जो आज भारतके शिर पर है. १९७१में भारतके सैन्यने पायी हुई विजयके कारण, इन्दिरा इतनी सीमा तक सशक्त बनी थी कि वह पाकिस्तान, बांग्लादेश और कश्मिरके साथ जो चाहे वे शर्तें लागु कर सकती थीं. यदि इन्दिरा चाहती तो पूरे कश्मिर पर भारतका अधिकार स्थापित करके कलम ३७०को खत्म कर सकती थी. सिमला करार एक व्यंढ करार था. आज पाकिस्तान भारत पर आतंकी आक्रमण करता है. इन्दिराकी दुश्मन देशको क्षमा करने के कारण हजारों भारतीय जवानोंकी सहादत पर पानी फिर गया. और दुश्मनके आतंकोंसे भी हजारो बेमौत मरे.

(३) मोरारजी देसाईने पक्ष विरोधी प्रवृत्तिके लिये चरणसिंघको मंत्रीमंडलसे निष्कासित कर दिया था. चरणने क्षमायाचना की. अटल बिहारी बाजपाईने मोरारजी देसाईको कहा कि उनको माफ कर दो. मोरारजी देसाईने, बाजपाईके कहेने पर चरणको माफ किया और उसको फिरसे मंत्री मडलमें लिया.

(४) चरण सिंघने अपना एक गुट बनाया. इन्दिरा के उपरकी शाह कमीशनकी कार्यवाही आगे न बढायी और इन्दिराका सहयोग लेके मोरारजी देसाईकी सरकारका पतन करवाया. उसी इन्दिराने चरण सिंघकी सरकारको दिये हुए समर्थनको प्रत्याहृत करके चरण सिंघकी सरकारका पतन किया.

(५) राहुल गांधी जब जाली पासपोर्ट और नकदके साथ युएसमें पकडा गया तो बाजपायीने उसको मुक्त करवाया. उसीके कारण नहेरुवीयन कोंग्रेसको जिवनदान मिला. देशको १० साल तक लुटनेका एक अधिक अवसर नहेरुवीयन कोंग्रेसको मिला.
जिन्होंने प्रतिस्पर्धीको माफ किया उनको सहन करना पडा. नहेरु और इन्दिराने विदेशी दुश्मनोंको माफ किया, इससे देशको आज भी सहन करना पडता है.

मोरारजी देसाईने चरणसिंहको क्षमा किया तो देशको कोंग्रेस मुक्त शासन मिलनेमें ३५ वर्षकी देरी हो गई. इस अंतर्गत देशके लाखों मनुष्य बेमौत मरे और करोडों मनुष्योंको यातनाएं सहन करनी पडी. खरबों रुपयेकी तस्करी हुई वह वार्ता तो भीन्न ही है.

शिरीष मोहनलाल दवे

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