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नहेरुवीयन कोंग्रेसके लिये सुनहरा मौका

“जातिवाद आधारित राज्य रचना” की मांग रक्खो

जी हाँ, नहेरुवीयन कोंग्रेसके लिये, प्रवर्तमान समय एक अतिसुनहरा मौका है. सिर्फ नहेरुवीय कोंग्रेस ही नहीं लेकिन उसके सांस्कृतिक साथीयोंके लिये भी यह एक सुनहरा मौका है. इस मुद्देका लाभ उठा के नहेरुवीयन कोंग्रेस सत्ता भी प्राप्त कर सकती है.

आप पूछोगे कि ऐसा कौनसा मुद्दा है जिस मुद्देको उछाल के नहेरुवीयन कोंग्रेस सत्ता प्राप्त कर सकती है?

अब आप एक बात याद रख लो कि जब भी हम “नहेरुवीयन कोंग्रेस” शब्दका प्रयोग करते है आपको इसका निहित अर्थ “नहेरुवीयन कोंग्रेस पक्ष और उसके सांस्कृतिक साथी” ऐसा समज़ना है. क्यों कि समान ध्येय, विचार और आचार ही तो पक्षकी पहेचान है.

तो अब हम बात आगे चलावें

नहेरुवीयन कोंग्रेसका ध्येय

नहेरुवीयन कोंग्रेसका ध्येय नहेरु वंशको आगे बढाना है, नहेरुवीयन वंशज के लिये सत्ता प्राप्त करना है ताकि वे सत्ताकी मौज लेते रहे और अन्य लोग स्वंयंके परिवार और पीढीयोंकी आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा और सुख के लिये पैसा कमा सके.

तो अब क्या किया जाय?

देखो, अविभक्त भारतमें हिन्दु-मुस्लिम संबंधोंकी समस्या थी. तो नहेरुने हिन्दु राष्ट्र और मुस्लिम राष्ट्रके फेडर युनीयनको नकार दिया और पाकिस्तान और भारत बनाया. लेकिन कुछ समय बाद मतोंकी भाषा राष्ट्रभाषा और राज्य भाषाकी समस्याओंका महत्व सामने आया. तो हमने (नहेरुवीयन कोंग्रेसने)  भाषाके आधार पर राज्योंकी रचना की.

अब इसमें क्या हूआ कि हिन्दु-मुस्लिम झगडोंकी समस्या तो वहींकी वहीं रही लेकिन इस समस्या पर आधारित अन्य समस्याएं भी पैदा हूई. उसके साथ साथ भाषा के आधार पर और समस्याएं पैदा होने लगी. भूमि-पुत्र और जातिवाद आधारित समस्याएं भी पैदा होने लगी.

आप कहेंगे कि क्या इन समस्याओंका समाधान करने की नहेरुवीयन कोंग्रेसने कोशिस नहीं की?

अरे वाह !! आप क्या बात कर रहे हो? नहेरुवीयन कोंग्रेसने तो अपने तरीकेसे समस्याका हल करनेका पूरी मात्रामें प्रयत्न किया.

नहेरुवीयन तरीका क्या होता है?

कोई भी समस्या सामने आये तो उसको अनदेखा करो. समस्या कालचक्रमें अपने आप समाप्त हो जायेगी…

अरे वाह !! यह कैसे?

देखो हिन्दु-मुस्लिम समस्याको हल ही नहीं क्या. इसके बदले नहेरुने जीन्नाके साथ झगडा कर दिया. फिर हिन्दुस्तान पाकिस्तान हो गया. और हिन्दु-मुस्लिम झगडा तो कायम रहा.

समस्याका समाधान

तिबट अपनी आझादी बचाने के लिये संघर्ष कर रहा था. हमारी समस्या थी कि तिबटकी सुरक्षा कैसे करें !! तो नहेरुने चीनके साथे दोस्ती करके तिबट पर चीनका प्रभूत्व मान लिया. लेकिन एक और समस्या पैदा हुई कि चीन हमारे देशकी सीमाके पास आ गया और उसने घुसखोरी चालु की. तो नहेरुने पंचशील का करार किया. तो कालक्रममें चीनने भारत पर आक्रमण कर दिया. जरुरतसे ज्या भूमि पर कब्जा कर दिया. तो हमारा पूराना सीमा विवाद तो रहा नहीं. वह तो हल हो गया. नया सीमा विवादका तो देखा जायेगा. तिबटकी समस्या हमारी समस्या रही ही नहीं.

पाकिस्तान हमारा सहोदर है. पाकिस्तानमें आंतरविग्रह हुआ तो पूर्वपाकिस्तानसे घुस खोर लाखोंकी संख्यामें आने लगे. तो हमारे लिये एक समस्या बन गई. इन्दिरा गांधीने यह समस्या प्रलंबित की. तो पाकिस्तानने भारतकी हवाई पट्टीयों पर आक्रमण कर दिया. हमारी सेनाने पाकिस्तानको परास्त किया तो भारतको घुसखोरोंके साथ साथ ९००००+ युद्ध कैदीयोंको खाने पीनेका इंतजाम करना पडा. सिमला करार किया और युद्ध कैदी पश्चिम पाकिस्तानको ही परत कर दिया. तो कालचक्रमें आतंकवाद पैदा हो गया. तो हिन्दु लोग विस्थापित हो गये. उनका पूनर्वसनकी समस्या पैदा गई. होने दो. ऐसी समस्याएं तो आती ही रहती है. विस्थापित हिन्दुओंकी समस्याको नजर अंदाज कर दो. हिन्दु लोग अपने आप निर्वासित कैंपसे कहीं और जगह अपना मार्ग ढूंढ लेगे. नहेरुवीयनोने कुछ किया नहीं. आतंकी मुस्लिम लोग भारतमें घुसखोरी करने लगे और बोंब ब्लास्ट करने लगे. आतंकी मुस्लिम अपना अपना गुट बनाने लगे. स्थानिक मुस्लिमोंका सहारा लेने लगे. उनको गुट बनाने दो हमारा क्या जाता है. एक समस्या को हल नहीं करनेसे कालांतरमें अनेक और समस्याएं पैदा होती है. और मूल समस्याका स्वरुप बदल जाता है. तो उसको नहेरुवीयन लोग समाधान मान लेते है और मनवा लेते है.

जातिवादी समस्या भी ऐसी ही थी. अछूतोंके लिये आरक्षण रक्खा. अछूतोंका उद्धार नहीं किया लेकिन उनके कुछ नेताओंका उद्धार किया. और आरक्षण कायम कर दिया. तो और जातियां कहेने लगी हमें भी आरक्षण दो. नहेरुवीयनोंने एक पंच बैठा दिया और जिनको भी आरक्षण चाहीये वे अपनी जातिका नाम वहां दर्ज करावें. अब आरक्षणका व्याप बढने लगा. जिसने भारत पर दो शतक राज्य किया वे मुस्लिम लोग कहेने लगे हम भी गरीब है हमें भी आरक्षण दो. तो नहेरुवीयनोंने कहा कि तुम्हे अकेलेको आरक्षण देंगे तो हम तुम्हारा तुष्टी करण करते है ऐसा लोग कहेंगे. इस लिये उन्होने “लघुमति”के लिये विशेष प्रावधान किये. रामके वंशज रघुवंशी कहेने लगे हमे भी आरक्षण दो. क्रुष्णके वंशज यादव कहेने लगे हमें भी आरक्षण दो. अब जब भगवानके वंशज आरक्षण मांगने लगे तो और कौन पीछे रह सकता है?

जटने बोला हमें भी आरक्षण दो. महाराष्ट्रके ठाकुरोंने बोला कि हमें भी आरक्षण दो. अब हुआ ऐसा कि कमबख्त सर्वोच्च अदालतने कहा कि ४९ प्रतिशतसे अधिक आरक्षण नहीं दे सकते. तो अब क्या करें?

आरक्षण, हिन्दु-मुस्लिम और हिन्दु-ख्रिस्ती समस्याओंका कोई पिता है तो वह नहेरुवीयन कोंग्रेस है. उसको सहाय करने वाले भी अनेक बुद्धिजीवी है उनका एजंडा भी नहेरुवीयनोंकी तरह “जैसे थे”-वादी है. ये लोग वास्तवमें दुःखी जीवनका कारण पूर्वजन्मके पाप मानते है इसलिये समस्याके समाधान पर ज्यादा चिंता करना आवश्यक नहीं है. सब लोग अपनी अपनी किस्मत लेके पैदा होते है. इसलिये समस्याओंका समाधान ईश्वर पर ही छोड दो. ईश्वरके काममें हस्तक्षेप मत करो.

लेकिन हमसे रहा नहीं जाता है. हम नहेरुवीयन कोंग्रेसका आदर करते है. कटूतासे हम कोसों दूर रहते है. त्याग मूर्ति नहेरुवीयन कोंग्रेसको सत्ता प्राप्त करनेका और वह भी यावतचंद्र दिवाकरौ तक उसीके पास सत्ता रहे ऐसा रास्ता हम दिखाना चाहते है.

यह रास्ता है कि नहेरुवीयन कोंग्रेस ऐसी छूटपूट जातिवादी आधारित आरक्षण और धर्म आधारित आरक्षणके बदले धर्म और जाति आधारित “राज्य रचना”की मांग पर आंदोलन करें. ऐसा आंदोलन करनेसे उसको सत्ताकी प्राप्ति तो होगी ही, उतना ही नहीं, धर्म आधारित और जाति अधारित राज्य रचनासे हिन्दु-मुस्लिम समस्याएं, हिन्दु-ख्रिस्ती समस्याएं, मुस्लिम-ख्रिस्ती समस्याएं, भाषा संबंधित समस्याएं जातिवादी समस्याएं, आरक्षण संबंधी समस्याएं, आर्टीकल “३५-ए” संबंधित समस्या, आर्टीकल ३७० संबंधित समस्या, पाकिस्तान हस्तक काश्मिर समस्या, आतंकी समस्या, पत्थरबाज़ोकी समस्या आदि कई सारी समस्याएं नष्ट हो जायेगी.

आप कहोगे ऐसा कैसे हो सकता है?

आप कहोगे भीन्न भीन्न जातिके, भीन्न भीन्न धर्मके लोग तो बिखरे पडे है और राज्य तो भौगोलिक होगा है. धर्म और जाति आधारित राज्य रचना करनेमें ही अनेक समस्याएं पैदा होगी. और यदि ऐसी राज्य रचना हो भी गई तो इसके बाद भी कई प्रश्न उठेंगे जिनका समाधान असंभव है. यदि आप समास्याओंके समाधानके लिये नहेरुवीयन तरीका अपनावें तो ठीक है लेकिन आपको पता होना चाहिये कि समस्याको हल ही नहीं करना, समस्याका समाधान नहीं है. मान लो कि नहेरुवीयन कोंग्रेसने जाति आधारित और धर्म आधारित राज्य रचनाके मुद्दे पर आंदोलन चलाया और सत्ता प्राप्त भी कर ली, तो वह कैसे जाति और धर्म पर आधारित राज्य रचना करेगी. यदि आप नहेरुवीयन कोंग्रेसकी अकर्मण्यता पर विश्वास करते है तो आप दे सकते है कि नहेरुवीयन कोंग्रेसका क्या हाल हुआ. समस्याका समाधान किये बिना नहेरुवीयन कोंग्रेस अब सत्ता पर नहीं रह सकती.

अरे भाई, हम अब नहेरुवीयन कोंग्रेसका उद्धार करनेके लिये प्रतिबद्ध है और हम उसको एक क्षति-रहित फोर्म्युला वाली सूचना देना चाहते है.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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सोमनाथका मंदिर कैसे तोडा जाय? भाग-२

सोमनाथका मंदिर कैसे तोडा जाय? भाग-२

असत्यवाणी नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंका धर्म है

यह कोई नई बात नहीं है. नहेरुने खुदने चीनी सेनाके भारतीय भूमिके अतिक्रमणको नकारा था. तत्पश्चात्‌ भारतने ९२००० चोरसवार भूमि, चीनको भोजन-पात्र पर देदी थी. ईन्दिरा गांधी, राजिव गांधी आदिकी बातें हम २५ जूनको करेंगे. किन्तु नहेरुवीयन कोंग्रेस अलगतावादी मुस्लिम नेताओंसे पीछे नहीं है.

नहेरुवीयन कोंग्रेस अपने सांस्कृतिक फरजंदोंसे सिखती भी है.

यह कौनसी सिख है?

शिवसेना नहेरुवीयन कोंग्रेसका फरज़ंद है.

जैनोंके पर्युषणके पर्व पर मांसकी विक्री पर कुछ दिनोंके लिये रोक लगाई तो शिवसेनाके कार्यकर सडक पर उतर आये. और उन्होंने इस आदेशके विरोधमें मांसकी विक्री सडक पर की. (यदि वेश्यागमन पर शासन निषेध लाता तो क्या शिवसेनावाले सडक पर आके वेश्यागमन करते?)

गाय-बछडेका चूनाव चिन्हवाली नहेरुवीयन कोंग्रेसने शिवसेनासे क्या सिखा?

नहेरुवीयन कोंग्रेसको शिवसेनासे प्रेरणा मिली.

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यह बात नहेरुवीयन कोंग्रेसके संस्कारके अनुरुप है. नहेरुवीयन कोंग्रेसने चिंतन किया. निष्कर्ष निकाला कि गौवध-बिक्री-नियमन वाला विषय उपर प्रतिकार करना यह मुस्लिमोंको और ख्रीस्तीयोंको आनंदित करनेका अतिसुंदर अवसर है.

केन्द्र सरकारने तो गौ-वंशकी यत्किंचित प्रजातियोंकी विक्रीके नियमोंको सुग्रथित किया और नहेरुवीयन कोंग्रेसकी यथेच्छ रक्खी क्षतियोंको दूर किया ताकि स्वस्थ और  युवापशुओंकी हत्या न हो सके.

अद्यपर्यंत ऐसा होता था कि कतलखाने वाले, पशुबिक्रीके मेलोंमेंसे, बडी मात्रामें  पशुओंका क्रयन करते थे. और स्वयंके निश्चित चिकित्सकोंका प्रमाणपत्र लेके हत्या कर देते थे.

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आदित्यनाथने अवैध कतलखानोंको बंद करवाया तो नहेरुवीयन कोंग्रेसवालोंने और उनके सांस्कृतिक साथीयोंने कोलाहल मचा दिया और न्यायालयमें भी मामला ले गये कि शासक, कौन क्या खाये उसके उपर अपना नियंत्रण रखना चाहता है. अधिकतर समाचार माध्यमोंने भी अपना ऐसा ही सूर निकाला.

बीजेपीने गौ-वंशकी यत्किंचित प्रजातियोंकी विक्रीके नियमोंको सुग्रथित करनेवाला जो अध्यादेश जारी किया तो नहेरुवीयन कोंग्रेसको लगा कि कोमवाद फैलानेका यह अत्याधिक सुंदर अवसर है.

केरलमें नहेरुवीयन कोंग्रेसके कई सदस्य सडक पर आ गये. एक बछडा भी लाये. नहेरुवीयन कोंग्रेसके सदस्योंने बछडेको सरे आम काटा भी. नहेरुवीयन कोंग्रेसके सदस्योंने बछडेके मांसको सडक पर ही एक चूल्हा बनाके अग्निपर पकाया भी. नहेरुवीयन कोंग्रेसके सदस्योंने इस मांसको बडे आनंदपूर्वक खाया भी.

भोजनका भोजन विरोधका विरोध

अपने चरित्रके अनुरुप नहेरुवीयन कोंग्रेस केवल जूठ ही बोलती है और जूठके सिवा और कुछ नहीं बोलती. तो अन्य प्रदेशके नहेरुवीयन नेताओंने तो ऐसा कुछ हुआ ही नहीं है और बीजेपी व्यर्थ ही नहेरुवीयन कोंग्रेसको बदनाम कर रही है ऐसे कथन पर ही अडे रहे. लेकिन जब यह घटनाकी वीडीयो क्लीप सामाजिक माध्यमों पर और समाचार माध्यमों पर चलने लगी तो उन्होंने बडी चतुराईसे शब्द प्रयोग किये कि “केरलमें जो घटना घटी उसकी हम निंदा करते है. ऐसी घटना घटित होना अच्छी बात नहीं है चाहे ऐसी घटना बीजेपीके कारण घटी हो या अन्योंके कारण. हमारे पक्षने ऐसे सदस्योंको निलंबित किया है.” नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण घटनाका विवरण करनेसे वे बचते रहे. एक नेताने कहा कि हमने सदस्योंको निलंबित किया है. अन्य एक नेताने कहा कि हमने निष्कासित किया है. क्या नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण अनपढ है? क्या वे सही शब्दप्रयोग नहीं कर सकते?

मस्जिदमें गयो तो ज कोन

केरलकी सरकार भी तो साम्यवादीयोंकी गठबंधनवाली सरकार है. सरकारने कहा कि “हमने कुछ  व्यक्तियोंपर धार्मिकभावना भडकानेवाला केस दर्ज किया है.

साम्यवादी पक्षके गठबंधनवाली सरकार भी नहेरुवीयन कोंग्रेससे कम नहीं है. वास्तवमें यह किस्सा केवल धार्मिक भावना भडकानेवाला नहीं है. केरलकी सरकारके आचार पर कई प्रश्नचिन्ह उठते है.

कौन व्यक्ति पशुकी हत्या कर सकता है?

क्या कोई भी व्यक्ति पशु की हत्या कर सकता है?

क्या कोई भी व्यक्ति कोई भी स्थान पर पशुकी हत्या कर सकता है?

क्या कोई भी व्यक्ति किसी भी अस्त्रसे पशुकी हत्या कर सकता है?

क्या कोई भी व्यक्ति कहीं भी चुल्हा जला सकता है?

क्या कोई भी व्यक्ति कहीं भी खाना पका सकता है?

वास्तवमें पशुओंको काटनेकी आचार संहिता है. यह आचार संहिता कतलखानोंके नियमोंके अंतर्गत निर्दिष्ट है.

नहेरुवीयन कोंग्रेस एक, ठग-संगठन है. जनतंत्रमें अहिंसक विरोध प्रदर्शित करना एक अधिकार है. किन्तु कानूनभंगका अधिकार नहीं है. सविनय कानूनभंग करना एक रीति है. किन्तु उसमें आपको शासनको एक प्रार्थनापत्र द्वारा अवगत कराना पडता है कि आप निश्चित दिवस पर, निश्चित समयपर, निश्चित व्यक्तिओं द्वारा, निश्चित नियमका, भंग करनेवाले है. नियमभंगका कारणका विवरण भी देना पडता है. और इन सबके पहेले शासनके अधिकृत व्यक्ति/व्यक्तियोंसे चर्चा करनी पडती है. उन विचारविमर्शके अंतर्गत आपने यह अनुभूति हुई कि शासनके पास कोई उत्तर नहीं है, तभी आप सविनय नियमभंग कर सकते है. जब नहेरुवीयन कोंग्रेसके शिर्षनेताओंको भी महात्मागांधीके सविनय कानूनभंगकी प्रक्रिया अवगत नहीं है तो इनके सिपोय-सपरोंको क्या खाक अवगत होगा? केरलकी घटना तो एक उदाहरण है. ऐसे तो अगणित उदाहरण आपको मिल जायेंगे.

नहेरुवीयन कोंग्रेस करनेवाली है मानवभ्रूणका भोजन-समारंभ

नहेरुवीयन कोंग्रेसको मानवभ्रुणके मांसके भोजन के लिये भी आगे आना चाहिये. साम्यवादी लोग, नहेरुवीयन कोंग्रेसको अवश्य सहयोग करेंगे, क्यों कि, चीनमें मानवभ्रुणका मांस खाया जाता है. साम्यवादी लोगोंका कर्तव्य है कि वे लोग चीन जैसे शक्तिशाली देशकी आचार संहिताका पालन करें वह भी मुख्यतः जिन पर भारतमें निषेध है. और नहेरुवीयन कोंग्रेस तो साम्यवादीयोंकी सांस्कृतिक सहयोगी है.

नहेरुवीयन कोंग्रेसके प्रेरणास्रोत

तैमुर, महम्मद गझनवी, महम्मद घोरी, अल्लौदीन खीलजी, आदि मुसलमान राजा तो मुसलमानोंके प्रेरणास्रोत है. ऐसे मुसलमान कोई सामान्य कक्षाके नहीं है. आप यह प्रश्न मत उठाओ कि तैमुर, महम्मद गझनवी, महम्मद घोरी, अल्लौदीन खीलजी, आदि मुसलमान राजाओंने तो हमारे मुसलमान भाईओंके पूर्वजोंका कत्ल किया था. किन्तु यह बात स्वाभाविक है जब आप मुसलमान बनते है तो आपके कोई भारतीय पूर्वज नहीं होते, या तो आप आसमानसे उतरे है या तो आप अरबी है या तो आप अपने पूर्वजोंकी संतान नहीं है. इसी लिये तैमुर, महम्मद गझनवी, महम्मद घोरी, अल्लौदीन खीलजी, आदि मुसलमान राजा आपके प्रेरणास्रोत बनते है. यदि आप सीधे आसमानसे उतरे हैं तो यह तो एक चमत्कार है. किन्तु मोहम्मद साहब तो चमत्कारके विरुद्ध थे. तो आप समज़ लो कि आप कौन है. किन्तु इस विवादको छोड दो. ख्रीस्ती लोग भी मुसलमान है. क्यों कि मुसलमान भी ईसा को मसिहा मानते है. या तो मुसलमान, ख्रीस्ती है, या तो ख्रीस्ती, मुसलमान है. जैसे वैष्णव लोग और स्वामीनारयण लोग हिन्दु है.

नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके सांस्कृतिक साथीयोंको मुसलमानोंका अपूर्ण कार्यको, पूर्ण करना है, इस लिये उनका कर्तव्य बनता है कि जो कार्य मुसलमानोंने भूतकालमें किया उसीको नहेरुवीयन कोंग्रेस आगे बढावे. मुसलमानोंने सोमनाथके मंदिरको बार बार तोडा है. हिन्दुओंने उसको बार बार बनाया है. तो अब नहेरुवीयन कोंग्रेसका धर्म बनता है कि वे पूनर्स्थापित सोमनाथ मंदिरको भी ध्वस्त करें.

देशको तो तैमुर, महम्मद गझनवी, महम्मद घोरी, अल्लौदीन खीलजी, आदि मुसलमानोंने लूटा था. अंग्रेजोने भी लूटा था. नहेरुवीयन कोंग्रेस ६० वर्षों तक लूटती ही रही है, किन्तु नहेरुवीयन कोंग्रेसने अभीतक सोमनाथ मंदिर तोडा नहीं है. तो अब नहेरुवीयन कोंग्रेस वह भी तोडके बता दें कि वह अल्पसंख्यकोंके प्रति कितनी प्रतिबद्ध है.

शिरीष मोहनलाल दवे

 

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सोमनाथका मंदिर कैसे तोडा जाय? भाग-१

सोमनाथका मंदिर कैसे तोडा जाय? भाग-१

यदि आप बछडेकी सरे आम और वह भी सडक पर हत्या कर सकते है और बछडेके मांसको पका सकते है और मांसका वितरण कर सकते है और भोजन समारंभ कर सकते है तो अब तुम कई सारे कार्य कर सकते हो. सोमनाथका मंदिर तोडने के लिये आगे बढो. प्रदर्शन करना, कानुन भंग करना जनतंत्रमें आपका अधिकार है.

लोग पूछेंगे आप किससे बात कर रहे हो? कौन तोडेगा सोमनाथका मंदिर?

नहेरुवीयन कोंग्रेस ही सोमनाथका मंदिर तोड सकती है. सामान्य मुसलमान लोगोंके लिये यह बसकी बात नहीं है. यदि नहेरुवीयन कोंग्रेस द्वारा सोमनाथका मंदिर तोडा जाय तो भारतके अधिकतर मुसलमान अवश्य आनंदित होगे. पाकिस्तान के लोग भी आनंदित होगे. इससे पाकिस्तान और हिंदुस्तानके संबंधोंमे सुधार आयेगा. नहेरुवीयन कोंग्रेसका और उसके सांस्कृतिक साथीयोंका ध्येय मुसलमानोंको आनंदित करना ही तो है.

“दो बैलोंकी जोडी”

गाय के ब्रह्मरंध्रके हिस्सेमें परमेश्वरका वास है. वैसे तो गायमें सभी देवताओंका वास है. किन्तु सबसे वरिष्ठ, ऐसे देवाधिदेव महादेव ब्रह्मरंध्रमें बिराजमान है. देवताओंके अतिरिक्त सप्तर्षियोंका भी वास है. गाय का दूध, गोबर और मूत्र, औषधि माना जाता है. हमारे बंसीभाई पटेल, कुछ वर्षोंसे केवल गायके दूध पर ही जीवन व्यतित कर रहे हैं. वे ९५ वर्षके है और तंदुरस्त है.

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महात्मा गांधीकी कार्य सूचिमें मदिरा-निषेधके पश्चात्‌ गौ-वंश वध निषेध आता था. उसके पश्चात्‌ स्वावलंबन और अहिंसा आदि “मेरे स्वप्नका भारत और हिन्द स्वराज”में लिखी गई कार्य सूचिमें आते थे.

नहेरुको महात्मा गांधीकी यह मानसिकता पसंद नही  थी. किन्तु नहेरुका कार्य सूचिमें प्रथम क्रम पर सत्ता, और उसमें भी सर्वोच्च शक्तिमान प्रधानमंत्री पद था. यदि वे निर्भय होकर सामने आते और “मनकी बात” प्रदर्शित करते तो उनके लिये प्रधानमंत्रीका पद आकाशकुसुमवत बन जाता.

इस कारणसे नहेरुने महात्मा गांधीका कभी भी विरोध नहीं किया.

भारतीय संविधानमें ही मदिरा-निषेध, गौवध-निषेध और अहिंसक समाजकी स्थापना, ऐसे कर्य-विषयोंका समावेश किया जाय ऐसी महात्मा गांधीकी महेच्छा थी. ये बातें महात्मागांधीके “हिन्द-स्वराज्य”में स्पष्ट रुपसे लिखित है. संविधानकी रचनाके कालमें तो कई सारे महात्मा गांधीवादी, विद्यमान थे. नहेरुने तो कोई संविधान लिखा नहीं. हां नहेरुने भारतका इतिहास जो अंग्रेजोने लिखा था उसका “कोपी-पेस्ट” किया था. नाम तो डीस्कवरी ऑफ ईन्डीया लिखा था, किन्तु कोई डीस्कवरी सुक्ष्मदर्शक यंत्रसे भी मिलती नहीं है.

बाबा साहेब आंबेडकरने भारतका संविधान लिखा है. नहेरुने केवल स्वयंको जो विपरित लगा उनको निर्देशात्मक सूचिमें समाविष्ठ करवा दिया. निर्देशात्मक सुचिमें समावेश  करवाया उतना ही नहीं, उनको राज्योंके कार्यक्षेत्रमें रख दिया.

उत्तर प्रदेश सर्वप्रथम राज्य था जिसने गौवध निषेध किया. उस समय नहेरुने आपत्ति प्रदर्शित की थी, और त्याग पत्र देनेकी भी धमकी भी दी थी, किन्तु तत्कालिन पंतप्रधानने उनकी धमकीकी अवगणना की.

नहेरु अपने को धर्म निरपेक्ष मानते थे और वे अपने अल्पसंख्यकोंको अनुभूति करवाना चाहते थे कि वे (स्वयं परिभाषित परिभाषाको, स्वयं द्वारा ही प्रमाणित) धर्मनिरपेक्षता पर प्रतिबद्ध थे.

नहेरुकी यह मानसिकता, नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण और उनसे अभिभूत अनुयायीगणमें भी है. अभिभूत शब्द ही सही है.

एक समय था जब कोंग्रेसका पक्षचिन्ह दो-बैलोकी जोडी था. बैल भी गायकी ही प्रजातिमें आता है. १९६९में नहेरुवीयन कोंग्रेसका, नहेरुकी फरजंद ईदिरा गांधीकी नेतागीरीवाली, और कोंग्रेस संगठनकी सामुहिक नेतागीरीवाली, कोंग्रेसमें विभाजन हुआ. कोंगी [कोंग्रेस (आई)], कोंगो [कोंग्रेस (ओ)].

गाय बछडावाली नहेरुवीयन कोंग्रेस

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ईन्दीरा गांधीमें नहेरुके सभी कुलक्षण प्रचूर मात्रामें थे. अपने पक्षका चिन्ह उसने गाय-बछडा रक्खा जिससे हिन्दुओंको और खास करके कृषक और गोपाल समाजको आकर्षित किया जा सके. ईन्दिरा गांधीने आचारमें भी जनताका विभाजन, धर्म और ज्ञातिके आधार पर किया. जब वह शासन करनेमें प्रत्येक क्षेत्रमें विफल रही तो उसने आपत्‌ काल घोषित किया.

I CAN DEFEAT YOU

इस आपात्‌ काल अंतर्गत विनोबा भावे ने ईन्दिरा गांधीको पत्र लिखा की “गौ-हत्या”का  निषेध किया जाय, नहीं तो वे आमरणांत अनशन पर जायेंगे. आपात्‌कालके अंतर्गत तो समाचार माध्यममें शासनके विरुद्ध लिखना निषेध था. इस लिये विनोबा भावे के पत्रको प्रसिद्धि नहीं मिली. ईन्दिरा गांधीने आश्वासन दिया की वह गौ-हत्या पर निषेध करेगी और उसने समय मांगा. विनोबा भावे तो शतरंजके निपूण खिलाडी थे. उनको तो परीक्षा करनेकी थी कि इन्दिरा गांधी पूरी तरह मनोरोगी हो गई है या नहीं. विनोबा भावेको लगा कि ईन्दिरा गांधी पूर्णतया मनोरोगी नहीं बन गयी है किन्तु रोग अवश्य आगे बढ गया है. इसलिये उन्होने आचार्य संमेलन बुलाया. इसकी बात हम यहां नहीं करेंगे.

विनोबा भावे को यह अनुभूति नहीं हुई कि जब कोई पक्षका नेता स्वकेन्द्री और दंभी बन जाता है तो ऐसी मानसिकता उनके पक्षके अधिकतर सदस्योंमें भी आ जाती है. ये लोग तो अपने नेतासे भी आगे निकल जाते है. और शिर्षनेतागणको यह उचित भी लगता है क्यों कि पक्षके एक सदस्यने यदि कोई अभद्र व्यवहार किया और पकडा गया, तो शिर्ष नेतागण स्वयंको उससे वे सहमत नहीं है ऐस घोषित कर सकते है और आवश्यकता अनुसार स्वयंको वे, उससे असहमत और भीन्न है ऐसा दिखा सकते है.

नियमोंवाला संविधान किन्तु आचारमें मनमानी

नहेरुवीयन कोंग्रेसने नियम तो ऐसे कई बनाये है. किन्तु नियम ऐसे क्षतिपूर्ण बनाये कि वे नियम व्यंढ ही बने रहे. ऐसे नियम बनानेका उसका हेतु अबुध जनता को भ्रमित करनेका था. उनका कहना था कि “देखो, हमने तो नियम बनाये है, किन्तु उसका पालन करवाना शासनका काम है. यदि कोई राज्यमें विपक्ष का शासन है तो नहेरुवीयन कोंग्रेस ऐसा कहेगी कि “यह तो राज्यका विषय है” यदि वहां पर नहेरुवीयन कोंग्रेसका शासन है तो उसका कथन होगा “हमने विवरण मांगा है ….” या तो “अभी तो केस न्यायालयके आधिन है … देखते हैं आगे क्या होता है. … हम प्रतिक्षा कर रहे हैं”. यदि न्यायालयने नियम तोडनेवालेके पक्षमें न्याय दिया तो नहेरुवीयन कोंग्रेस कहेगी कि “हम अध्ययन कर रहे है कि कैसे संशोधन किया जाय.”

नहेरुवीयन कोंग्रेस द्वारा आपने गौ-मांस-भोजन-समारंभ तो देखे ही है.

निर्देशात्मक नियमोंका दिशा सूचन

समाजमें सुधार आवश्यक है. किन्तु समाज अभी पूरी तरह शिक्षित हुआ नहीं है. इसीलिये क्रमशः सुधार लाना है. निर्देशात्मक नियमोंका  यह प्रयोजन है. वे दिशासूचन करते हैं. यदि कोई राज्यका शासन नियम बनानेकी ईच्छा रखता है तो वह निर्देशात्मक नियमकी दिशामें विचारें और नियमका पूर्वालेख, नियमको उसी दिशामें, आचारके प्रति, शासनको प्रतिबद्ध करें. यही अपेक्षा है. निर्देशित दिशासे भीन्न दिशामें या विरुद्ध दिशामें नियम बनाया नहीं जा सकता.

नहेरुवीयन कोंग्रेस शासित राज्योंमें, जो नये नियम बने, वे अधिकतर निर्देशित सिद्धांतोसे विपरित दिशामें है. जैसे कि मद्य-निषेध. उन्नीसौसाठके दशकमें महाराष्ट्र स्थित नहेरुवीयन कोंग्रेसने मद्यनिषेधके नियमोंको सौम्य बनया ताकि ज्यादा लोग मद्यपान कर सके.

असहिष्णुताकी वोट बेंक बनाओ

 

धर्म के आधार पर विभाजन इस हद तक कर दो कि लोग अन्य धर्मके प्रति असहिष्णु बन जाय. हिन्दुओंको विभाजित करना तो सरल है.

वेमुला, अखलाक, कन्हैया जैसे प्रसंगोंको कैसे हवा दी गयी इस बातको हम सब जानते है. यदि कोई हिन्दु जरा भी असहिष्णु बने तो पूरे हिन्दुओंकी मानसिकताकी अपकिर्ती फैला दो.

नहेरुवीयन कोंग्रेसने ऐसी परिस्थिति बना दी है कि यदि कोई सुरक्षाकर्मी,  जीपके आगे किसी पत्थरबाज़ को बांध दे और सुरक्षा कर्मीयोंको पत्थरबाज़ोंसे बचायें और परिणाम स्वरुप आतंक वादियोंसे जनताकी भी सुरक्षा करें, तो फारुख और ओमर जैसे मुस्लिम लोग आगबबुला हो जाते हैं.

यदि फारुख और ओमर इस हद तक जा सकते है तो नहेरुवीयन कोंग्रेसको तो फारुख और ओमरसे बढकर ही होना चाहिये न !!

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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मुस्लिमोंका कश्मिरी हत्याकांड, आतंक और सीमाहीन दंभः

हिन्दुओंके हत्यारे

यदि आप मनुष्य है तो आपका रक्त उबलना चाहिये

आप मनुष्य है यद्यपि कश्मिरी हिन्दुओंकी दशकोंसे हो रही यातनाओंके विषय पर केन्द्रस्थ शासकोंकी और कश्मिरके शासकोंकी और नेताओंकी मानसिकता और कार्यशैलीसे यदि, आपका रक्त क्वथित (ब्लड बोइलींग) नहीं होता है और आप इस सातत्यपूर्ण आतंकके उपर मौन है तो निश्चित ही आप आततायी है.

इस आततायीओंमें यदि अग्रगण्योंकी सूचि बनानी है तो निम्न लिखित गण महापापी और अघोर दंडके योग्य है.

नहेरुवीयन कोंग्रेसः

हमारे देशके गुप्तचर संस्था सूचना देती रहेती थी कि, आतंकवादीयोंके भीन्न भीन्न समूह अफघानिस्तानमे अमेरिका और सोवीयेत युनीयन के शित युद्धमें क्या कर रहे हैं.

ओसामा बीन लादेन भी कहा करता था कि द्वितीय लक्ष्य भारत है. शित युद्ध अंतर्गत भी एक आतंकी समूह, शिख आतंकवादीयोंके संपर्कमें था. शिख आतंकवादी समुह भी पाकिस्तान हस्तगत कश्मिरमें प्रशिक्षण लेता रहता था. शित युद्ध का एक केन्द्र पाकिस्तान भी था. अमेरिकाकी गुप्तचर संस्था सीआईएपाकिस्तानकी गुप्तचर संस्था आईएसआई, अमेरिका समर्थित आतंकी समूहोंके साथ (उदाहरण = अल कायदा), संवाद और सहयोगमें थे.

खालिस्तानी आतंकवाद का संपर्क पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था आई एस आई से था. इस प्रकार पाकिस्तानके शासनको और पाकिस्तानस्थ आतंकी समूहोंके लिये भारतमें आतंकवादी जाल स्थापित करना सुलभ था.

जब शित युद्धका अंत समीप आने लगा (१९८०), तो आतंकवादी संगठनोंने भारतको लक्ष्य बनाया जिसमें खालिस्तानी आतंकवाद मुख्य था. यह एक अति दीर्घ कथा है किन्तु, खालिस्तानी आतंकवाद ने स्वर्णमंदिरपर पूरा कबजा कर लिया था. जब इन्दिरा गांधीको आत्मसात्हुआ कि अब खालिस्तानके आतंकवादी की गतिविधियोंके फलस्वरुप उसकी सत्ता जा सकती है तब उसने १९८४में स्वर्णमंदिर पर आक्रमण करवाया. ४९३ आतंकवादी मारे गये. १९०० व्यक्तियोंका अतापता नहीं. तत्पश्चात्सिख आतंकवाद बलवान हुआ और इन्दिरा गांधीकी आतंकीयोंने हत्या की.

इस प्रकार आतंकवादने अपना जाल फैलाया. १९८८में शितका युद्ध संपूर्ण अंत हुआ और मुस्लिम आतंकी समूहका भारतमें प्रवेश हुआ. वीपी सिंह और चन्दशेखरने सिख आतंकवादका अंत तो किया किन्तु वे मुस्लिम आतंकवादको रोकनेमें असमर्थ बने क्योंकि वीपी सिंहने दलित आरक्षण पर अधिक प्राथमिकता दी, और चन्द्र शेखरने अपना धर्मनिरपेक्ष चित्र बनाने पर अधिक ध्यान दिया. इसका कारण यह था कि भारतीय जनता पक्ष विकसित हो रहा था औरस इन दो महानुभावोंको अपना वोटबेंक बनाना था.

१९८८के अंतर्गत मुस्लिम आतंकवादीयोंने कश्मिर में अपनी जाल प्रसारित कर दी थी. शासन, समाचार पत्र, मुद्रक, मस्जिदें, सभी मुस्लिम संस्थाओंके साथ उनका संपर्क हो गया था.

१९८९ अंतर्गत इन आतंकीयोंने हिन्दुओंको अतिमात्रामें पीडा देना प्रारंभ किया. और १९८९ तक उन्होंने ऐसी स्थिति प्राप्त कर ली कि, वे ध्वनिवर्धक यंत्रोंसे साक्षात रुपसे वाहनोंमें घुम कर, मस्जिदोंसे, स्पष्ट धमकी देने लगे, यदि हिन्दुओंको (सिख सहित), कश्मिरमें रहेना है तो मुस्लिम धर्म अंगिकार करो या तो कश्मिर छोडके पलायन हो. यदि ऐसा नहीं किया तो आपकी अवश्य ही हत्या कर दी जायेगी.

१९ जनवरी, १९९० अन्तिम दिवस

इस घोषणाका अंत यह नहीं था. मुस्लिमोंने १९ जनवरीको अंतिम दिन भी घोषित किया. सार्वजनिक सूचना के विशाल मुद्रित पत्र सार्वजनिक स्थानों पर, भित्तियोंपर (ओन वॉल्स), निश्लेषित (पेस्टेड) किये गये, समाचार पत्रोंमें भी यह सूचना सार्वजनिक की गयी कि  कश्मिरमें रहेना है तो मुस्लिम धर्म अंगिकार करो या तो कश्मिर छोडके पलायन हो. यदि ऐसा नहीं किया तो आपकी अवश्य ही हत्या कर दी जायेगी.

इस समय अंतर्गत क्या हुआ?

पुलिस मौन रहा,

स्वयंको धर्मनिरपेक्ष प्रदर्शित करनेवाले अखिल भारतके नहेरुवीयन कोंगी नेतागण मौन रहा. यह कोंग, उस समय भी कश्मिरके शासक पक्षमंडळका एक अंग था, तो भी मौन और निस्क्रीय रहा.

कश्मिरके स्वयंको धर्मनिरपेक्ष प्रदर्शित करनेवाले मुस्लिम नेता मौन रहे, हाशीम कुरैशी, शब्बीर एहमद, शब्बीर शाह, अब्दुल गनी, मुफ्ती मोहमद, फारुख, ओमर, यासीन मलिक, गुलाम नबी आझाद, सज्जद एहमद किच्लु, सईद एहमद कश्मिरी, हसन नक्वी, आदि असंख्य नेतागण मौन रहे

कश्मिरके मुस्लिम शासनके मंत्रीगण जिनका नेता फरुख अब्दुल्ला जो हमेशा अपने पुर्वजोंके बलिदानोंकी वार्ताएं करके अपनी पीठ थपथपाता है, वह भी अपनी गेंगके साथ सर्व मौन रहा.

इन लोगोंने तो जनकोषसे लाखों रुपयोंका वेतन लिया था. उनका तो धर्म बनता है कि अपने राज्यके नागरिकोंका और उनके अधिकारोंका रक्षण करे. किन्तु यह फारुख तो अपने कबिलेके साथ अंतिम दिन १९ जनवरी १९९०के दिनांकको ही विदेश पलायन हो गया.

आज २५साल के पश्चात्वह कहता है कि हिन्दुओंके उपर हुए अत्याचारके लिये वह उत्तरदायी नहीं है क्यों कि वह तो कश्मिरमें था ही नहीं (पलायनवादी का तर्क देखो. वह समझतता है कि कश्मिरमें आनेके बाद भी और १० साल सत्ता हस्तगत करनेके बाद भी उसका कोई उत्तरदायित्व नहीं है. यह स्वयं आततायी संगठनोंका हिस्सा समझा जाना चाहिये)

कश्मिरके भारतीय नागरिक सुरक्षा सेवा अधिकारी गण (ईन्डीयन पोलीस सर्वीस ओफिसर्स = आई.पी.एस. ओफिसर्स)), नागरिक दंडधराधिपति सेवा अधिकारीगण (ईन्डीयन अड्मीनीस्ट्रटीव सर्वीस ओफीसर्स = आई..एस ओफीसर्स) मौन रहे. इन लोगोंने तो जनकोषसे लाखों रुपयोंका वेतन लिया है. इनका भी धर्म बनता है कि अपने राज्यके नागरिकोंका और उनके अधिकारोंका रक्षण करे.

समाचार प्रसारण माध्यम जिनमें मुद्रित समाचार पत्र, सामायिक, दैनिक आदि आते हैं, और विजाणुं माध्यम जिनमें सरकारी और वैयक्तिक संस्थाके दूरदर्शन वाहिनीयां है और ये सर्व स्वयंको जन समुदायकी भावनाएं एवं परिस्थितियोंको प्रतिबींबित करने वाले निडर कर्मशील मानते हैं वे भी मौन रहे,

यही नहीं पुरे भारतवर्षके ये सर्व कर्मशील मांधाता और मांधात्रीयां मौन रहे, सुनील दत्त, शबाना, जावेद अख्तर, महेश भट्ट, कैफी आझमी, नसरुद्दीन शाह, झाकिर नायक, अमिर खान, शारुख खान, आर रहेमान, अकबरुद्दीन ओवैसी, इरफान हब्बीब, मेधा, तिस्ता, अरुन्धती, आदि असंख्य मौन रहे,

अमेरिका जो अपनेको मानव अधिकारका रक्षक मानता है और मनवाता है, और मानवताके विषय पर वह स्वयंको जगतका पितृव्यज (पेटर्नल अंकल) मनवाता है, वह भी मौन रहा, उसकी संस्थाएं भी मौन रही,

भारतवर्ष के भी सभी अशासकीय कर्मशील, धर्मनिरपेक्षवादी कर्मशील, महानुभाव गण (सेलीब्रीटी), चर्चा चातूर्यमें निपूण महाजन लोग भी मौन रहे.

मौन ही नहीं अकर्मण्य रहे,

अकर्मण्य भी रहे आज पर्यंत, २५ हो गये,

क्या इन महानुभावोंकी प्रकृति है मौन रहेनेकी?

नहीं जी, इन महानुभावोंका किंचिदपि ऐसी प्रकृति नहीं है.

गुजरातके गोधरा नगरके कोंग्रेससे संबंधित मुस्लिमोंने २००२ में हिन्दु रेलयात्रियोंको जीवित अग्निदाह देके भस्म कर दिया तो हिन्दु सांप्रदायिक डिम्ब हिंसा प्रसरित हो गयी और उसमें हिन्दु भी मरे और मुस्लिम भी मरे. इस डिंब हिंसाचारमें मुस्लिम अधिक मरे. कारण था प्रतिक्रिया.

शासनने योग्य प्रतिकारक और दडधरादिक कार्यवाही की, इसमें कई मारे गये. मुस्लिम भी मारे गये और हिन्दु भी मारे गये. हिन्दु अधिक मारे गये.

दोनों संप्रादयके लोगोंके आवासोंको क्षति हुई.

तस्माद्अपि, उपरोक्त दंभी धर्मनिरपेक्ष, प्रत्येक प्रकारकी प्रणालीयोंने और महानुभावोंने अत्यंत, व्यापक, और सुदीर्घ कोलाहल किया, और आज, उसी २००२ के गुजरात डिंब विषय भी कोलाहल चलाते रहेते है.

क्या कश्मिरी मुसलमान लोग और नेतागणकी प्रकृति सांप्रदायिक कोलाहल करने की है?

कश्मिरी मुसलमानोंने ही हत्या करनेवालोंको साथ दिया था और हिन्दुओंको अन्वेषित करनेमें हत्या करनेवालोंको संपूर्ण सहायता की थी.

इतना ही नहीं इन नेताओंने और मुस्लिम जनसामाजने हिन्दुओंको आतंकित करनेमें कोई न्यूनता नहीं रक्खी थी.

अमरनाथ यात्रीयों पर हिंसायुक्त आक्रमण

अमरनाथ एक स्वयंभू शिवलिंग है. हिन्दुओंका यह एक श्रद्धा तीर्थ है. यह तिर्थयात्रा .पूर्व ३०० से भी पूर्व समयसे चली आती है. मई से, २९ अगस्त तक यात्राका समय है.

१९९०में मुस्लिमोंने जो नरसंहार और आततायिता प्रदर्शित की. कश्मिरका शासन और केन्द्रीय भारतीय नहेरुवीयन कोंग्रेसका शासन, निंभर रहा. इससे मुसलमानोंका उपक्रम बढा. उन्होने आतंककी भयसूचना दे डाली. इस कारण दोनों भीरु शासनने १९९०से १९९५ तक अमरनाथ यात्रा स्थगित कर दी.

सन. ९९९६ से शासनने अनुमति देना प्रारंभ किया. प्रत्येक वर्ष कश्मिर के मुस्लिम, हिन्दु यात्रीयोंको धमकी देते हैं. और हमारे जवान यात्रीयोंकी सुरक्षा करते है. कश्मिर शासनका स्थानिक सुरक्षादल कुछ भी सुरक्षा देता नहीं है. अमरनाथ यात्रा पहलगांवसे प्रारंभ होती है और मुस्लिम आतंकी कहींसे भी हमला कर देते हैं. प्रतिवर्ष आक्रमण होता है. कुछ यात्री आहत हो जाते हैं. उनमें शारीरिक पंगुता जाती है. कुछ यात्री हत्यासे बच भी नहीं सकते. सन. २०००मे एक बडा हत्याकांड हुआ था उसमें १५००० का सुरक्षा दल होते हुए भी १०५ हिन्दु मारे गये. इनमें ३० यात्रीयोंको तो पहलगांवमें ही मार दिया.

अमरनाथ श्राईन बोर्डः

सन २००८में अमरनाथ यात्रीयोंकी सुरक्षा और सुविधाओंको ध्यानमें रखते हुए, केन्द्रीय शासन (नहेरुवीयन कोंग्रेस) और कश्मिरके मुस्लिम शासनने एक संमतिपत्र संपन्न किया कि, अमरनाथ श्राईन बोर्डको ९९ एकड वनभूमि उपलब्ध करवाई जाय.

इसका प्रयोजन यह था कि सुरक्षाके उपरांत, यात्रीयोंके लिये श्रेयतर आवासोंका निर्माण किया जा सके. वैसे तो ये सब आवास अल्पकालिन प्रकारके रखने के थे.

तथापि, आप मुसलमानों का तर्क देखिये.

इस प्रकार भूमि अधिग्रहण करनेसे अनुच्छेद ३७०का हनन होता है.

मुस्लिमोंका दुसरा तर्क था कि, आवासोंका निर्माण करनेसे पर्यावरण का असंतुलन होता है.

ये द्नों तर्क निराधार है. अमरनाथ श्राईन बोर्ड स्थानिक शासनका है. इस कारणसे अनुच्छेद ३७० का कोई संबंध नहीं. जो आवास सूचित किये थे वे प्रासंगिक और अल्पकालिन प्रकारके थे. इस कारणसे उनका पर्यावरण के असंतुलनका तर्क भी अप्रस्तुत था.

इस प्रकार कश्मिर के मुस्लिमोंने जो तर्क रक्खा था वह मिथ्या था. “मुसलमान लोग तर्क हीन और केवल दंभी होते हैइस तारतम्यको भारतके मुसलमानोंने पुनःसिद्ध कर दिया.

कश्मिरके मुसलमानोंने अमरनाथ श्राईन बोर्ड और जम्मुकश्मिर शासनके इस संमतिअभिलेखका प्रचंड विरोध किया. पांच लाख मुस्लिमोंने प्रदर्शन किया और कश्मिरमें व्यापकबंधरक्खा.  भारतका पुरा मुस्लिम जन समाज, हिन्दुओंको कोई भी सुविधा मिले उसके पक्षमें होता ही नही है.             –

आप कहेंगे इसमें कश्मिरके अतिरिक्त भारतके मुसलमानोंके संबंधमें क्यों ऋणात्मक भावना क्यों रखनी चाहिये?

जो मुसलमान स्वयं मानवीय अधिकारोंके पक्षमें है, ऐसा मानते है, जो मुसलमान स्वयंको धर्मनिरपेक्ष मानते हैं, जो मुसलमान स्वयंको भारतवासी मानते हैं, इन मुसलमानोंका क्या यह धर्म नहीं है कि वे अपने हिन्दुओं की सुरक्षा और सुविधा पर अपना तर्क लगावें और कश्मिर के पथभ्रष्ट मुसलमान भाईओंके विरुद्ध अपनी प्रतिक्रिया प्रदर्शित करें, आंदोलन करें, उपवास करें?

नहीं. भारतके मुसलमान ऐसा करेंगे ही नहीं. क्यों कि वे अहिंसामें मानते ही नहीं हैं. समाचार माध्यमके पंडितोंने भी, इस विषयके संबंधमें मुस्लिम और शासकीय नेताओंको आमंत्रित करके कोई चर्चा चलायी नहीं. समाचार माध्यमोंके पंडितोंको केवल कश्मिरके मुसलमानोंने कैसा लाखोंकी संख्यामें एकत्र होके कैसा  अभूतपूर्व आंदोलन किया उसको ही प्रसारण करनेमें रुचि थी. उनको मुस्लिम नेताओंकों और नहेरुवीयन कोंगके नेताओंको आमंत्रित करके उनके प्रमाणहीन तर्कोंको धराशाई करनेमें कोई रुचि नही थी. नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण तो वैसे ही दंभी, असत्यभाषी, ठग, सांप्रदायिक, मतोंके व्यापारी, आततायी, कायर और व्यंढ है. उन्होंने तो मुसलमानोंके चरित्रको, स्वयंके चरित्रके समकक्ष किया है.

कश्मिर पर आयी वर्षा की सद्य प्राकृतिक आपदाएं

इसी वर्षमें कश्मिर पर वर्षाका प्राकृतिक प्रकोप हुआ.

भारतके सैन्यका, कश्मिरी मुसलमान वैसे तो अपमान जनक वर्तन करनेमें सदाकाल सक्रिय रहेते है. क्यों कि, मुसलमानोंकी हिंसात्मक मानसिकताको और उनके आचारोंको, भारतीय सैनिक, यथा शक्ति, नियंत्रित करते है.

भारतीय सैनिकोंका ऐसा व्यावहार, मुसलमानोंकों अप्रिय लगता है. ये मुसलमान लोग स्थानिक सुरक्षाकर्मीयोंकी भी हत्या करते है.

यह मुसलमान लोग हिन्दुओंके लिये और स्वयंके लिये भीन्न भीन्न मापदंड रखते हैं.

नरेन्द्र मोदीने गुजरातमें मुसलमानोंकी सुरक्षा की, और तीन ही दिनोमें परिस्थितिको नियंत्रित कर दिया था तो भी मुसलमानोंने और दंभी जमातोंने अपना जठर फट जाय, उतनी नरेन्द्र मोदीकी निंदा की थी. आज भी करते है. तद्यपि नरेन्द्र मोदी हमेशा अपना राजधर्मका पालन करते रहे, और जिन मुस्लिमोंने ३०००+ कश्मिरी हिन्दुओंका कत्ल किया था और लाखों हिन्दुओंके उपर आतंक फैलाके कश्मिरसे भगा दिया था, उन्ही मुस्लिमोंके प्राणोंकी रक्षाके लिये नरेन्द्र मोदीने भारतीय सैनिकोंको आदेश दिया. और उन्ही भारतीय सैनिकोंने स्वयंके प्राणोंको उपेक्षित करके इन कृतघ्न और आततायी कश्मिरके मुस्लिमोंके प्राण बचाये.

अब आप कश्मिरके घोषित, श्रेष्ठ मानवता वादी,

समाचार माध्यम संमानित वासिम अक्रम की

मानसिकता देखो.

इस वासिम अक्रम कश्मिरका निवासी है. उपरोक्त उल्लेखित प्राकृतिक आपदाके समय इस व्यक्तिने कुछ मुसलमानोंके प्राणोंकी रक्षा की. इस कारणसे प्रसार माध्यम द्वारा उसका बहुमान किया गया. उससे प्र्श्नोत्तरी भी की गयी. इस व्यक्तिने वर्णन किया कि उसके मातापिताके मना करने पर भी वह स्वयंमें रही मानवतावादी वृत्तिके कारण घरसे निकल गया और प्राकृतिक आपदा पीडित कश्मिरीयोंके प्राणोंकी रक्षा की.

इसी व्यक्तिने बीना पूछे ही यह कहा कि, भारतीय सैनिकोंने भी अत्यंत श्रेष्ठ काम किया. लेकिन उनका तो वह धर्म था. उनको तो अपना धर्म निभानेके लिये वेतन मिलता है. (किन्तु मैंने तो मानवधर्म निभानेके लिये वेतनहीन काम किया).

इससे अर्थ निकलता है कि मानवतावादी कर्म तभी कहा जा सकता है कि, आप बिना वेतन काम करो. वासिमने बिना वेतन काम किया इसलिये वह मानवता वादी है.

लेकिन इससे एक प्रश्न उठता है.

उसने हिन्दुओंके लिये क्या किया?

हो सकता है कि १९९०में वह दूधपीता बच्चा हो. लेकिन उसके पिता तो दूध पिता बच्चा नहीं था. और अन्य मुसलमान लोग तो दूधपीते बच्चे नहीं थे. वासिम ! २००५ से तो तू बडा हो ही गया था. तो तभीसे तो तू हिन्दुओंको सुरक्षित रीतिसे कश्मिरमें अपने घरोंमें बसा सकता था. इसमें तुम्हारी मानवता कहां गई? हिन्दुओंके विषयमें तू क्यों अपनी मानवता दिखाता नहीं है?

जिसकी मानवताको माध्यमोंने प्रसारित किया, उसको कभी यह पूछा नहीं गया कि कश्मिरी हिन्दुओंके बारेमें उसने क्या किया? उनके प्रति क्यों मानवता नहीं दिखाता है?

कश्मिरी हिन्दुओंका पुनर्वासः

कश्मिरमें मुफ्तीसे मिलीजुली बीजेपीकी सरकार आयी. उसने कश्मिरके प्रताडित, प्रपीडित, निष्काषित निर्वासित हिन्दुओंके पुनर्वासके लिये एक योजना बनायी.

एक भूखंडको सुनिश्चित करके उसमें आवासें बनाके निर्वासितोंका पुनर्वास किया जाय. ऐसी योजना है. उसमें प्राकृतिक आपदासे विस्थापित मुसलमानोंको भी संमिलित किया जा सकता है.

किन्तु यह योजना पर, मुसलमानोंकी संमति नहीं. संमति नहीं उतना ही नहीं प्रचंड विरोध भी है.

इन मुसलमानोंने पूरे राज्यको बंध रखनेकी घोषणा कर दी.

उनका कुतर्क है कि हिन्दु लोग, कश्मिरकी जनताका एक अतूट सांस्कृतिक अंग है, और ऐसा होने के कारण हम मुसलमान लोग उनको ऐसा भीन्न आवसमें रहेने नहीं देंगे. हम चाहते हैं कि ये कश्मिरी हिन्दु लोग हमारे अगलबगलमें ही रहें. हम इसीको ही अनुमति देंगे कि हिन्दुओंका पुनर्वास उनके मूलभूत आवासमें ही हो. हम संयुक्त आवासमें ही मानते है.

वास्तवमें मुसलमानोंका यह तर्क निराधार है.

क्यों कि इस नूतन आवास योजनामें मुसलमानोंके लिये निषेध नहीं हैं. प्राकृतिक आपदासे विस्थापित या और कोई भी मुसलमानको इस आवासमें संमिलित किया जा सकता है. इतना ही नहीं कोई भी कश्मिरी हिन्दु यदि ईच्छा हो तो उसके लिये अपने मूलभूत आवासमें जानेका भी विकल्प खुल्ला है.

इन मुसलमानोंका एक तर्क और भी है.

हिन्दुओंके लिये भीन्न आवास योजना का अर्थ है, कश्मिरमें इस्राएल स्थापित करना. हम हिन्दुमुस्लिमोंके बीच ऐसी दिवार खडी करना नहीं चाहते.

यह तर्क भी आधारहीन है.

हिन्दुओंने कभी संप्रदायके नाम पर  युद्ध किया नहीं. हिन्दुओंने कभी अन्य संप्रदायका अपमान किया नहीं. इतिहास इसका साक्षी है.

इस्राएल, यहुदीओं की तुलना भारत और हिन्दुओंसे नहीं हो सकती. हां यह बात अवश्य कि मुसलमानोंकी तुलना मुसलमानोंसे हो सकती है. भारतके मुसलमानोंने एक भीन्न भूखंड भी मांगा और अपने भूखंडमें हिन्दुओंकी सातत्यपूर्ण निरंतर हत्याएं की.

मुसलमानोंने अपने भूखंडमें हिन्दुओंके उपर अत्याचार भी किये. इतना ही नहीं उन्होंने खुदने पूरे भारतमें अपनी दिवालोंवाली बस्तियां बनायी उसको विस्तृत भी करते गये और हिन्दुओंके आवासों पर कब्जा करते गयें. हिन्दुओंको भगाते भी गये.

कश्मिरमें तो मुसलमानोंने सभी सीमाओंका उल्लंघन किया, सभी सभ्यता नष्ट करके नम्र, सभ्य और अतिसंस्कृत हिन्दुओंका सहस्रोंमें संहार किया, उनको घरसे निकाला दिया और १९९०से आजकी तारिख तक उनको अपने मानवीय अधिकारोंसे वंचित रक्खा.

और ये हिन्दु कौन थे?

ये ऐसे हिन्दु थे जिन्होंने कभी मुसलमानोंसे असभ्य और हिंसक आचार नहीं किया. ऐसे हिन्दुओंके उपर इन मुसलमानोंने कृतघ्नता दिखाई. और अब ये मुसलमान, हिन्दुओंके उपर अपने प्रेमकी बात कर रहे हैं. कौन कहेगा ये मुसलमान विश्वसनीय है और प्रेमके योग्य है?        

जब १९९०में जब मुसलमानोंने ३०००+ हिन्दुओंकी खुल्ले आम हत्यायें की जाती थीं, तब इनमेंसे एक भी माईका लाल निकला नहीं जो हिन्दुओंके हितके लिये आगे आयें.

इन मुसलमानोंका विरोध इतना तर्कहीन और दंभसे भरपुर होने पर भी इसकी चर्चा योग्य और तर्क बद्ध रीतिसे कोई भी समाचार माध्यमने नहीं की. समाचार माध्यम तो, हिन्दुओंके मानव अधिकारके विषय पर सक्रीय है तो वे उत्सुक है.

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः आई.सी.आई., सी.आई.., मानव अधिकार, हनन, शित युद्ध, पाकिस्तान, अमेरिका, सोवियेत युनीयन, खालिस्तानी, यासीन मलिक, फारुख, ओमर, गुलाम नबी, आई.पी.एस., आई..एस., शासन, महानुभाव, कर्मशील, मांधाता, पंडित

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नरेन्द्र मोदीको क्या बनना चाहिये? कौटिल्य अथवा पृथ्वीराज चौहाण? – २

मुहम्मद घोरीने किसीको भी क्षमा किया नहीं था. ठीक उसी प्रकार नहेरुवीयन कोंग्रेसने भी कभी अपने देशी शत्रुको क्षमा किया नहीं था. उतना ही नहीं फर्जी मामले बनाकर भी उसकी मानहानि करनेकी और न्यायिक कार्यवाही द्वारा उसको हानि करनेके भरपुर प्रयत्न किये है.

नहेरुः
नहेरुने अपने विरोधी मोरारजीके विरुद्ध मोरारजीकी संतानको लेकर फर्जी कथाएं चलाइ थीं. कामराजप्लान के अंतर्गत एक फर्जी प्लान बनाके मोरारजी देसाईको मंत्री मंडलसे निकाला गया था.

Narendra Modi has to decide ०१

ईन्दीरा घाण्डीः

ईन्दिरा घान्डी नहेरुवाली नीति चलाके मोरारजीकी मानहानि करवाती रहती थीं.

इन्दिराने आपातकाल के दौरान कई नेताओंको मरणासन्न कर दिया था.

आपतकाल खुद एक फॉड था.

वीपी सींग के विरुद्ध सेंटकीट्स मे उनके नाम फर्जी एकाउन्टका केस दर्ज किया था.

सर्वोदय संस्थाओंके खिलाफ जांचके आदेश दिये थे और सर्वोदय संस्थाओंको निर्दोष होते हुए भी परेशान किया था.

मोरारजी देसाई सीआईएके वेतन पत्रक (पे रोल) पर है ऐसे आक्षेप करवाये थे.

जयप्रकाश नारायणने सैन्य को विद्रोह करनेका कहा था ऐसे आक्षेप करके उनको कारावसमें बंद किया था. अन्य हजारों नेताओंको भी कारावास में बंद किया था.

तारकेश्वरी सिंहाके उपर असत्य आक्षेप करवाये और उनको आत्म हत्या करनी पडी(!).

ज्योर्ज फर्नान्डीस पर फर्जी केस बनाया था और उनको जेलमें बंद किया था.

सोनीया-एमएमएसः

बाबा राम देव को फर्जी केस बनाके परेशान किया, अन्ना हजारे को भी परेशान किया, किरन बेदीके विरुद्ध आक्षेप करके परेशान किया, बाजपाईका किस्सा और अडवाणीकी घटनाएं तो हमने देख ही ली है.

नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, आदि के विरुद्ध फर्जी केस बनवाये.

पुलिसका मोरल डाउन करनेके कई और काम भी किये.

नहेरुवीयन और उनके साथीयोंका संस्कार रहा है कि खुदकी सत्ता और धनके लिये कुछ भी करो, चाहे देशका सामाजिक चारित्र्य कितना ही अधम क्युं न हो जाय.

जो लोग वोटबेंकी सियासत खेलते है वे हमेशा पुलिस और सीबीआई का यथेच्छ उपयोग करते हैं. सरकारी अधिकारीयोंको भ्रष्ट होने देते हैं फिर उनके भ्रष्टाचारके आधार पर उनसे गलत काम करवाते हैं. अन्य लोगोंकी भी ब्लेक डायरी बनाई जाती है जिनमें लालु, मुलायम, ममता, मायावती, जयललिता, करुणानिधि शरद पवार मुख्य है.

ये सब अर्वाचीन मुहम्मद घोरी है.

इन अर्वाचीन मुहम्मद घोरीयोंको कैसे नष्ट कर सकते है?

अति सरल है. क्युं कि ये लोग अतिभ्रष्ट है, जहां भी हाथ डालो उनका भ्रष्टाचार पकडा जा सकता है.

(१) आपातकालमें जिन्होने ईन्दिरा गांधीकी सहायता की थी और जो लोग अभी भी जीवित है, उनके उपर शाह जांच समितिके सूचनोंके आधार पर कार्यवाही हो सकती है. उनको गिरफ्तार कर लो और जेलमें डाल दो. कार्यवाही होती रहेगी.

(२) एन्डरसनको भगाने वालोंमें सोनिया गांधी एक पक्षकार बन सकती है. उनके उपर भी ऐसी ही कार्यवाही हो सकती है.

(३) कश्मिरी हिन्दुओंके प्राकृतिक अधिकारके हनन और लगातार हो रहे मानवीय अधिकार के हननके मामलेमें, अपना फर्ज न निभानेके कारण, कश्मिरके सभी नेताओंको तथा नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंको शिघ्र ही प्रग्रहित (गिरफ्तार) कर सकते हैं. उनकी संपत्ति जप्त कर सकते है.

(४) नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंने और उनके साथीयोंने विदेशी बेंकोमें बीना रीझर्वबेंककी संमति गैरकानुनी एकाउन्ट खोलके काला-लाल धन जमा किया, इस बात पर उन सबके उपर फौजदारी कार्यवाही कर सकते है. क्यों कि यह देशके साथ गद्दारीका विषय है ये सब एकाउन्ट होल्डर गिरफ्तार हो सकते है. इन एकाउन्टोंका राष्ट्रीयकरण करके सबके नाम प्राप्त किया जा सकता है और जो लोग एकाउन्ट होल्डर न हो किन्तु मनिनीत (नोमीनी) व्यक्ति हो तो भी उसके उपर फौजदारी कार्यवाही हो सकती है.

(५) कोमनवेल्थ गेम, कोयला आबंटन और २-जी के बारेमें कई नेताओंको गिरफ्तार करके जेलमें रखा जा सकता है.

(६) भारतीय करन्सी नोट के मुद्रणका संविदा (ठेका) जिसको दिया था वह आतंकी संगठनोंसे संलग्न होनेके कारण अन्य देशोंमे प्रतिबंधित थी. फिर भी नहेरुवीयन कोंग्रेसने उसको मुद्रणका संविद दिया. कई कर्जी करन्सी नोट सरकारी बेंकके एटीएम यंत्रमेंसे निकली थी. इससे यह निरपेक्ष प्रतिबिंबित होता है कि नहेरुवीयन कोंग्रेसके ही नेतागण इससे संलग्न है. इस मामले पर भी कई नेताओंको गिरफ्तार किया जा सकता है.

(७) कई नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण जातीय मामलेमें विवादित है. उनके उपर कार्यवाही शुरु की जा सकती है.

दुसरे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

कई नहेरुवीयन कोंग्रेसके मुसलमान नेताओंकी संतान अभद्र और विभाजनवादी कोमवादी भाषा प्रयोग करती रहेतीं हैं इतना ही नहीं कई नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके साथी नेताओंने कोमवादी उच्चारण अनेकानेक बार किया है उनको गिरफ्तार करके जेलमें बंद कर सकते है.

तीसरे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

ये है समाचार माध्यमके स्वामि. जिनका काम समाजिक शिक्षाका काम करना है. उसके स्थान पर वे देशको विभाजित करनेका काम करते हैं. इनके पाससे हमेशा उचित अवसरों पर स्पष्टिकरण मांगते रहेना चाहिये और जब वे विफल रहें तो उनका अनुमति पत्र रद करनेका और कानुनी कार्यवाहीका आरंभ कर देना चाहिये.

चौथे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

ख्रिस्ती धर्मके पादरी लोग हैं. ये लोग हिन्दु धर्मकी निंदा करते हैं. तत्कालिन बने इसाईयोंको हिन्दुओंसे संबंध न रखने के लिये प्रभावित करते हैं और विभाजनवादी प्रवृतियां करते हैं. गरीब हिन्दुओंको लालच दे के धर्म परिवर्तन करवाते हैं. ऐसे पादरीयों पर सुक्ष्म दृष्टि रखकर कानुनी कार्यवाही की जा सकती है.

पांचवे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

ये है सरकारी अफसर. इनका काम नियमका पालन करना है और नियमका पालन करवाना है. इस कामके लिये उनको वेतन मिलता है. वे अपनी क्षतियांके लिये और सामाजिक अव्यवस्थाके लिये उत्तरदेय है.

नरेन्द्र मोदीको चाहिये कि इनको सीधा करें. यदि इनको सीधा करेंगे तो सब कुछ सीधा हो जायेगा.

कार्यवाही कैसे की जाय?

जो भी कार्यवाही करनी है, वह किसी भी प्रकारका कोलाहल किये बिना करना है. इसमें कोई निवेदनों की या विज्ञापन देनेकी आवश्यकता नहीं हैं. यदि कोई समाचार माध्यमवाले अनावश्यक प्रश्न करें तो उनके उपर भी जनताको पथभ्रष्ट करनेकी और जनताको भ्रमित करनेके आरोप लगाके कानुनी कार्यवाही हो सकती है.

अन्य कई कार्य है जो विकास, कानुन सुधार और गवर्नन्सके बारेमें हैं वे होते रहेंगे, क्यों कि प्रत्येक विकासकी परिकल्पनाके निदेशकका उत्तरदायित्व है कि वह अपना पूर्ण करें. और वह करेगा ही. उपरोक्त कार्य जिसमें कानुनमें संशोधनकी आवश्यक नहीं है, वे प्रारंभ कर सकते हैं. वास्तवमें नियम तो प्रत्येक उत्तरदायुत्वके लिये है. केवल अर्थघटन नहीं किया जाता है.

ऐसा नहीं करेंगे तो क्या होगा?

इतिहासका पुनरावर्तन होगा.

यदा तदा दुश्मनके कुकर्मोंको क्षमा किया है तब देशको सहन करना पडा है.

(१) नहेरुने प्रेमभाव रखके चीनकी लश्करी घुसपैठकी उपेक्षा की तो चीनने भारतकी ९१००० चोरस मील धरती पर अधिकार जमा लिया. हमारे हजारों जवान बेमौत मरे.

(२) इन्दीरा घान्डीने पाकिस्तानके साथ बेवकुफी बतायी और सिमला करार किया जिससे पाकिस्तानने जो खोया था वह सब पा लिया. बंग्लादेशने अपना देश पा लिया और एक करोड बीन बंगाली मुस्लिमोंसे छूटकारा भी पा लिया जो आज भारतके शिर पर है. १९७१में भारतके सैन्यने पायी हुई विजयके कारण, इन्दिरा इतनी सीमा तक सशक्त बनी थी कि वह पाकिस्तान, बांग्लादेश और कश्मिरके साथ जो चाहे वे शर्तें लागु कर सकती थीं. यदि इन्दिरा चाहती तो पूरे कश्मिर पर भारतका अधिकार स्थापित करके कलम ३७०को खत्म कर सकती थी. सिमला करार एक व्यंढ करार था. आज पाकिस्तान भारत पर आतंकी आक्रमण करता है. इन्दिराकी दुश्मन देशको क्षमा करने के कारण हजारों भारतीय जवानोंकी सहादत पर पानी फिर गया. और दुश्मनके आतंकोंसे भी हजारो बेमौत मरे.

(३) मोरारजी देसाईने पक्ष विरोधी प्रवृत्तिके लिये चरणसिंघको मंत्रीमंडलसे निष्कासित कर दिया था. चरणने क्षमायाचना की. अटल बिहारी बाजपाईने मोरारजी देसाईको कहा कि उनको माफ कर दो. मोरारजी देसाईने, बाजपाईके कहेने पर चरणको माफ किया और उसको फिरसे मंत्री मडलमें लिया.

(४) चरण सिंघने अपना एक गुट बनाया. इन्दिरा के उपरकी शाह कमीशनकी कार्यवाही आगे न बढायी और इन्दिराका सहयोग लेके मोरारजी देसाईकी सरकारका पतन करवाया. उसी इन्दिराने चरण सिंघकी सरकारको दिये हुए समर्थनको प्रत्याहृत करके चरण सिंघकी सरकारका पतन किया.

(५) राहुल गांधी जब जाली पासपोर्ट और नकदके साथ युएसमें पकडा गया तो बाजपायीने उसको मुक्त करवाया. उसीके कारण नहेरुवीयन कोंग्रेसको जिवनदान मिला. देशको १० साल तक लुटनेका एक अधिक अवसर नहेरुवीयन कोंग्रेसको मिला.
जिन्होंने प्रतिस्पर्धीको माफ किया उनको सहन करना पडा. नहेरु और इन्दिराने विदेशी दुश्मनोंको माफ किया, इससे देशको आज भी सहन करना पडता है.

मोरारजी देसाईने चरणसिंहको क्षमा किया तो देशको कोंग्रेस मुक्त शासन मिलनेमें ३५ वर्षकी देरी हो गई. इस अंतर्गत देशके लाखों मनुष्य बेमौत मरे और करोडों मनुष्योंको यातनाएं सहन करनी पडी. खरबों रुपयेकी तस्करी हुई वह वार्ता तो भीन्न ही है.

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः अर्वाचीन मुहम्मद घोरी, नहेरु, इन्दिरा, एन्डरसन, पाकिस्तान, बांग्लादेश, मोरारजी देसाई, आपातकाल, फ्रॉड, मरणासन्न, जयप्रकाश, मानहानि, कर्जी नोट, एटीएम यंत्र, सेन्ट कीट्स, सर्वोदय संस्था, सीआईए, पे-रोल, तारकेश्वरी सिंहा, ज्योर्ज फर्नान्डीस, सोनीया-एमएमएस, कारावास, गिरफ्तार, बाबा रामदेव, अन्ना हजारे, किरन बेदी, नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, कश्मिरी हिन्दु, विदेशी बेंक, काला-लाल धन

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अनीतियोंसे परहेज (त्यागवृत्ति) क्यों? जो जिता वह सिकंदर (नहेरुवीयन कोंग रहस्य)-४
(इसको अनीतियोंसे परहेज क्यों? जो जिता वह सिकंदर-३ के अनुसंधानमें पढें)

आतंकवादका जन्म और उसका सीमापार संबंध

इन्दिरा गांधीने करवाया आतंकवादका जन्म और उसका सीमापार संबंध हो गया.
निजी सीयासतीय स्वार्थके लिये असामाजिक तत्वोंको बढावा देनेमें नहेरुवीयन कोंग्रेस और खासकरके इन्दिरा गांधीका अति विशेष योगदान रहा. १९६९में जब कोंग्रेसका विभाजन हुआ तो इन्दिरा गांधीने घोषित किया कि सबके लिये उसकी कोंग्रेसके द्वार खूले है. विनोबा भावेने इन्दिराकी इस घोषणाकी मजाक उडाके कहा था कि अगर संख्या ही बनानी है तो बंदरोंको भी कोंग्रेसमें सामेल करो.

मूर्धन्योंका बौद्धिक प्रमादः
१९८०के चूनावमें समाचार माध्यमोंकी इन्दिरा परस्त नीति और सुज्ञ मूर्धन्योंके बौद्धिक प्रमादके कारण इन्दिरा कोंग्रेसको भारी बहुमत मिला. इस बहुमतसे अगर इन्दिरा गांधी चाहती तो देशमें चूनाव और सरकारी कामकाजमें भ्रष्टाचारको रोकने लिये बंधारणीय सुधार बहुत आसानीसे कर सकती थीं. वैसे तो ऐसा मोका तो नहेरुके पास भी था. किन्तु इन दोंनोंने ऐसा नहीं किया, और उसके बदले अपनेको और अपने पक्षको मजबुत करनेके ही कदम उठाये.

खुदके पक्षकी राजकीय सत्ता बढानेके लिये, भींदरानवालेको बढावा देना एक कदम था. असमको तोडके उसके ६ छोटेछोटे राज्य बनाना भी एक दूसरा कदम था. इसके कारण अलगाववादी शक्तियोंको बढावा मिला. सीमापारसे भी इन अलगाववादी शक्तियोंको मदद मिलने लगी. खालिस्तानके आतंकवादको, पाकिस्तानसे बौद्धिक, अस्त्र-शस्त्र और प्रशिक्षण मिलता था. इससे पाकिस्तानी आतंकवादी संगठन जो अमेरिकाके इशारे पर अफघानिस्तानमें व्यस्त थे, उनको खालिस्तानके आतंकवादके आधार पर भारतमें भी अपना नेटवर्क स्थापित करनेमें आसान रहा. १९७३का सिमला करार एक व्यर्थ और व्यंढ करार सिद्ध हो गया था. इन्दिरा गांधीने या तो भूट्टोसे सिमलामें अंडरटेबल डील किया था या तो इन्दिरा गांधी महामूर्ख और अज्ञानी थी.

रानीके मरने पर शाहजादेका राज्याभिषेकः
१९८४ में अराजकता स्पष्ट रुपसे दिखाई देने लगी थी. पंजाबका जिवन अस्तव्यस्त हो गया था. इन्दिराका खून हो गया. उसके बाद भी खालिस्तानी आतंकवाद बढ गया. इन्दिरा गांधीने झैल सींग को राष्ट्रप्रमुख बनाया था. झैल सिंह, इन्दिरा गांधी चाहे तो झाडू लगानेको भी तैयार था. तो इन्दिराकी मौतके बाद बिना मंत्रीमंडल या लोकसभासे प्रस्ताव पास किये इन्दिराके पूत्रका प्रधान मंत्रिपदका शपथ करवाना क्या चीज है? इसलिये तो नहेरुवीयन संतानको शाहजादे कहे जाते है.
चूनाव जितनेके लिये एक कार्यपद्धति नहेरुवीयन कोंग्रेसमें एक स्वभावगत हो गई थी. वह थी
१ ज्यादातर जनताको गरीब ही रक्खो,
२ जितना हो सके उतने बुद्धिजिवीयोंको खरीद लो,
३ जो भ्रष्ट है उनको अपने साथ मिला दो और उनको भ्रष्टाचार करने दो और जब जरुर पडे तो उनको उनके भ्रष्टाचार पर ब्लेकमेल करके काबुमें रक्खो,
४ न्यायिक प्रक्रियाओंको विलंबित करो ताकि जिन साथीयोंको बचाना है उनको बचा शको,
५ जब निस्फलताएं उजागर हो जाये तब चर्चाको ऐसे मोडपर ले जाओ कि सामान्य जन द्विधामें या असमंजतामें पड जाय और नहेरुवीयन कोंग्रेसके शासनकी कमियां और दुराचार अधिकतर मात्रामें अप्रभावकारक हो जाय,
६ अन्य पक्षोंके तथाकथित कमीयांको बारबार प्रसिद्ध करो और चर्चा उसीकी दिशामें चलाओ कि जनता प्रामाणिकतासे निर्णय ही कर न पाये और उस कारणसे वह ऐसा सोचने लगे कि “सभी पक्ष भ्रष्ट और एक समान ही है”
७ जनता को धर्म, जाति, ज्ञाति और भाषाके आधार पर विभाजित करो और जहां जाओ वहांकी प्रभावशाली जातिके पक्षमें बोलो.

१९८९का चूनावः

राजिव गांधीने एक और नारा दिया कि देशको २१वीं सदीमें ले जाना है. भारतकी देहातोंकी जनता १८ वीं सदीमें जीती थी. और नहेरुवीयन कोंग्रेसने ही प्रगति रोकके रक्खी थी.
नहेरुवीयन कोंग्रेसने राजिव गांधीके नया नाराके आधार पर और इन्दिरा गांधीके मृतदेहको बार बार दूरदर्शन पर दिखाकर और इन्दिरा गांधीकी तथा कथित शहादतके आधार पर १९८४का चूनाव जित लिया था.
लेकिन राजिवगांधीकी वहीवटी निस्फलताके कारण और दिर्घ दृष्टिके अभावके कारण खालिस्तानी आतंकवाद बलवत्तर हो गया था. कश्मिरमें सीमा पारका आतंकवाद भी जोर पकडने लगा था. राजिव गांधी बोफोर्स रिश्वत केसमें फंस गये थे. इन कारणोंसे लोकसभाका जनादेश खंडित मिला.
वीपी सिंघने एक मिलीजुली सरकार बनायी. वीपी सिंघ काबिल थे लेकिन चंद्रशेखरको भी प्रधानमंत्री बनना था. एक फायदा यह हुआ कि दोनोंने मिलकर खालिस्तानी आतंकवाद खतम किया. लेकिन पाकिस्तानने काश्मिरमें आतंकवाद पैदा कर दिया था. पूर्वोत्तर राज्योंमें भी हर जगह अलगतावाद बढ गया था.
एक और चूनाव आ पडा क्योंकि फिर एक बार गैर कोंगी मिली जुली सरकार टीक नहीं पायी.

ATAL AND NARSINHA RAO
१९९१में फिरसे संसदका चूनाव हुआ. जनादेश खंडित था. लेकिन कोंग्रेसका चहेरा बदला हुआ था. नरसिंह राव नहेरुवीयन वंशके नहीं थे न तो वे नहेरुवीयनोंकी पद्धतियोंसे उनका तालमेल था. उन्होने देखा कि नहेरुवियनोनें विकास को रोकके रक्खा था. इसलिये उन्होने उदारीकरण और निजीकरणकी नीतियां अपनाई.
इन्दिरा गांधीकी नीतियां इससे बिलकुल उलटी थी. गरीबोंको और आम जनताको आसानीसे ऋण मिले इस कारण इन्दिराने बडी बेंकोका राष्ट्रीय करण किया था. जिसके कारण निम्न स्तरमें खास करके कोंग्रेसमें निम्नस्तरतक भ्रष्टाचार फैल गया था.
नरसिंह रावने बिना राष्ट्रीय करण किये, निजी बेंकोको बढावा दिया. निजी बेंकोने अपना धंधा बढा दिया. वैसे भी सरकारी बेंको के वहीवटसे जनता संतुष्ट नहीं थी. अब उनको निजी बेंकोसे स्पर्धा करनेका समय आ गया था. नरसिंह रावके सलाहकार सुब्रह्मनीयन स्वामी थे. आर्थिक मामलोंमे जो सुधार हुए वे सुब्रह्मनीअन स्वामीके सुझावोंके कारण था. लेकिन चूंकि मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे इस लिये उनको सुज्ञलोगोंमें व्यापक मानपान मिला.
चूंकि, नहेरुवीयन कोंग्रेसकी निम्न स्तरीय नेतागीरीका सरकारी तौरपर छूटपुट ऋणमें खुदका लागा खतम हो गया था, वे लोग नरसिंह रावको हटाना चाहते थे. नरसिंहराव नहेरुवीयनोंकी बातोंको ज्यादा महत्व देते नहीं थे. इस लिये नहेरुवीयन के प्रति बंधवाजुथ कमजोर हो रहा था. चूं कि नहेरुवीयनोंके पास पक्षकी जमा राशी रहती थी उन्होनें एक एक करके अवांच्छिंत नेताओंको दूर किया. नरसिंहराव को लालुभाई पाठकके केसमें बदनाम कर दिया. सिताराम केसरीको भौतिक रुपसे उठाके फैंक दिया. सोनिया गांधीको पक्ष प्रमुख बना दिया. लेकिन इन सब हल्लागुलामें कोंगी बहुत बदनाम हो गई.

१९९६ का चूनावः

कोंग बदनाम हो गई थी लेकिन उसका संगठन ध्वस्त नहीं हुआ था. जनता दल का एलायन्स एक बडे दलके रुपमें उभरा. बीजेपी मजबुत हुआ था लेकिन बीजेपी को कोमवादी पक्ष कहेनेका सीलसिला चालु था. कई प्रधान मंत्री बने. और सरकारें तोडी गई.

१९९८ का चूनावः

फिरसे खंडित जनमत वाली संसद बनी. बीजेपी की सरकार बनी और सब अन्य पक्षोंने मिलकर उसको तोड दिया.

१९९९ का चूनावः

बीजेपीके जुथको बहुमत मिला और एक अच्छी सरकार बनी जिसने कई सारे विकासके काम किये.

राष्ट्रीय मार्ग आंतर्राष्ट्रीय कक्षाके बने. हिमालयमें जलश्रोतोंसे विद्युत पावर हाउस बने. उसकी और कई योजनायें बनी. गुजरातमें पवन उर्जाकी कई वीन्ड-मीलें बनी, बंदरोंका विकास किया गया. बीजेपी के नेतागण अत्यधिक आत्मविश्वासमें रहे.

नहेरुवीयन कोंग्रेसने और अन्य पक्षोंने एक शिख लेली की अगर चूनावमें बैठकोंके बारेमें समाझौता नहीं करेंगे और बीजेपीको कोमवादका नारा लगाके खतम करनेकी व्यूह रचना नहीं अपनायेंगे तो हम खतम हो जायेंगे.

कोंगीने और उसके अन्य साथी पक्षोंने इस व्युहरचनाको अपनायाः

मुस्लिमोंको बीजेपीसे भडकाओ.

बीजेपीके हरेक कदमको कोमवादका नाम दो.

बीजेपी अगर राम मंदिरकी बात न करे तो आप इसके उपर बीजेपीको प्रश्न करो कि वह क्यों राममंदिर को भूल गई? क्या उसके लिये यह एक चूनावी मुद्दा ही था? अगर वह राम मंदिरके बारेमें कुछ बोले, तो कहो कि बीजेपी कोमवादी है.

अगर बीजेपी हिन्दुत्वकी या सांस्कृतिक विरासतकी कोई भी बात करें तो कहो कि, वह देशमें भगवाकरण करता है.

बीजेपीके तथा कथिक भ्रष्टाचारको शतशत बार दोहराओ.

देहातोंमें जाके उनको महेसुस कराओ कि विकास तो सिर्फ शहेरोंका हुआ है और वह भी आपकी कमाईसे हुआ है. आपके हित को तो नजर अंदाज ही किया है.

बीजेपी की चूनावी टिकटोंके बारेमें ज्ञातिवादी और धार्मिक भेदभावकी अफवाहें फैलावो.

जातिवादी आंदोलनोंको बढावा दो.

कोमी दंगे करवाओ और मुस्लिमोंको महेसुस करवाओ कि वे बीजेपीके राजमें सुरक्षित नहीं है.

बीजेपी शासित राज्योंमे हुए दंगोंको हजार बार दोहराओ और कोंगके शासनके दंगोंके बारेमें वितंडावाद फैलाओ.

२००४ का चूनाव कोंग्रेसने कैसे जिता?

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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