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Posts Tagged ‘प्रमाण’

गोब्बेल्स अन्यत्र ही नहीं भारतमें भी जिवित है.

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रामायण में ऐसा उल्लेख है कि रावणने राम के मृत्युकी अफवाह फैलायी थी. किन्तु सभी रामकाथाओंमें ऐसा उलेख नहीं है. रावणने अफवाह फैलायी थी ऐसी भी एक अफवाह मानी जाती है. सर्वप्रथम विश्वसनीयन अफवाहका उल्लेख महाभारतके युद्धके समय मिलता है, जब भीमसेन एक अफवाह फैलाता है किअश्वस्थामा मर गया”. यह बात अश्वस्थामाके पिता द्रोणके पास जाती है. किन्तु द्रोणके मंतव्यके अनुसार, भीमसेन विश्वसनीय नहीं है. द्रोण इस घटनाकी सत्यताके विषय पर सत्यवादी युधिष्ठिरसे प्रूच्छा करते है. युधिष्ठिर उच्चरते हैनरः वा कुंजरः वा (नरो वा कुंजरो वा)”. लेकिन नरः शब्द उंचे स्वरमें बोलते है और कुंजरः (हाथी) धीरेसे बोलते है जो द्रोणके लिये श्रव्य सीमा से बाहर था. तो इस प्रकार पांण्डव पक्ष, अफवाह फैलाके द्रोण जैसे महारथी को मार देता है.

अर्वाचिन युगमें गोब्बेल्स नाम अफवाहें फैलानेवालोंमे अति प्रख्यात है. ऐसा कहा जाता है कि, उसने अफवाहें फैलाके शत्रुसेनाके सेनापतियोंको असमंजसमें डाल दिया था.

अफवाह की परिभाषा क्या है?

अफवाहको संस्कृतभाषामें जनश्रुति कहेते है. जनश्रुति का अर्थ है एक ऐसी घटना जिसके घटनेकी सत्यताका कोई प्रमाण नहीं होता है. इसके अतिरिक्त इस घटनाको सत्यके रुपमें पुरष्कृत किया जाता है या तो उसका अनुमोदन किया जाता है. और इस अनुमोदनमें भी किया गया तर्क शुद्ध नहीं होता है. एक अफवाहकी सत्यताको सिद्ध करने के लिये दुसरी अफवाह फैलायी जाती है. और ऐसी अफवाहोंकी कभी एक लंबी शृंखला बनायी जाती है कभी उसकी माला भी बनायी जाती है.

अफवाह उत्पन्न करो और प्रसार करो

कई बार अफवाह फैलाने वाला दोषित नहीं होता है. वह मंदबुद्धि अवश्य होता है. जिन्होंने अफवाहका जनन किया है वे लोग, ऐसे मंदबुद्धि लोगोंका एक प्रसारण उपकरण (टुल्स), के रुपमें उपयोग करते है. ऐसा भी होता है कि ऐसे प्रसारमाध्यमव्यक्ति अपने स्वार्थके कारण या अहंकारके कारण अफवाह को सत्य मान लेता है और प्रसारके लिये सहायभूत हो जाता है.

अफवाहें फैलानेमें पाश्चात्य संस्कृतियां का कोई उत्तर नहीं.

वास्तवमें तो स्वर्ग, नर्क, सेतान, देवदूत, क्रोधित होनेवाला ईश्वर, प्रसन्न होनेवाला ईश्वर, कुछ लोगोंकोये तो अपनवाले हैऔर दुसरोंकोंपरायेकहेने वाला ईश्वर, यही धर्म श्रेष्ठ है, इसी धर्मका पालन करनेसे ईश्वरकी प्राप्ति हो सकती है, इस धर्मको स्विकारोगे तो तुम्हारा पाप यह देवदूत ले लेगा, ये सभी कथाएं और मान्यताएं भी अफवाह ही तो है.

कामदेव, विष्णु भगवानका पुत्र था. “कामका यदि प्रतिकात्मक अर्थ करें तो नरमादामें परस्पर समागमकी वृत्ति को काम कहा जाता है.

भारतीय संस्कृतिमें तत्वज्ञानको प्रतिकात्मक करके, काव्य के रुपमें उसको लोकभोग्य बनानेकी एक प्रणाली है.  इस तरहसे जन समुदायको तत्वज्ञान अवगत करानेकी परंपरा बनायी है.

काम भी एक देव है. देवसे प्रयोजित है शक्ति या बल.

कामातुर जिवकी कामेच्छा कब मर जाती है?

जब कामातुर व्यक्तिको अग्निकी ज्वालाका स्पर्ष हो जाता है, तब उसकी कामेच्छा मर जाती है. लेकिन काम मरता नहीं है. इस प्राकृतिक घटनाको प्रतिकात्मक रुपमें इस प्रकार अवतरण किया कि रुद्रने (अग्निने) कामको भष्म कर दिया. किन्तु देव तो कभी मर नहीं ता. अब क्या किया जाय? तो तत्पश्चात्इश्वरने उसको सजिवोंमे स्थापित कर दिया. बोध है कि कामदेव सजिवमें विद्यमान है.

जनश्रुतियानीकी अफवाह भी जनसमुदायोंमे जिवित है. हांजी, प्रमाण कितना है वह चर्चा का विषय है.

इतिहासमें जनश्रुति (अफवाहें रुमर);

पाश्चात्य इतिहासकारोंने भारतके पूरे पौराणिक साहित्यको अफवाह घोषित कर दिया. पुराणोमें देवोंकी और ईश्वरकी जो प्रतिकात्मक या मनोरंजनकी कथायें थी उनकी प्रतिकात्मकताको इन पाश्चात्य इतिहासकारोंने समझा नही या तो समझनेकी उनकी ईच्छा नहीं थी क्योंकि उनका ध्येय अन्य था. उनको उनकी ध्येयसूची (एजन्डा)के अनुसार, कुछ अन्य ही सिद्ध करनेका था. उस ध्येय सूचि के अनुसार उन्होंने इन सब प्रतिकात्मक ईश्वरीय कथाओंको मिथ्या घोषित कर दिया. और  उनको आधार बनाके भारतमें भारतवासीयोंके लिखे इस इतिहासको अफवाह घोषित कर दिया.

भारत पर आर्योंका आक्रमणः

पराजित देशकी जनताको सांस्कृतिक पराजय देना उनकी ध्येयसूची थी. अत्र तत्र से कुछ प्रकिर्ण वार्ताएं उद्धृत करके उसमें कालगणना. भाषाकी प्रणाली, जन सामान्यकी तत्कालिन प्रणालीयां, प्रक्षेपनकी शक्यताआदि को उपेक्षित कर दिया.   

आर्य, अनार्य, वनवासी, आदि जातियोंमें भारतकी जनताको विभाजित करके भारतीय संस्कृतिको भारतीय लोगोंके लिये गौरवहीन कर दिया. ऐसी तो कई बातें हैं जो हम जानते ही है.

ऐसा करना उनके लिये नाविन्य नहीं था. ऐसी ही अफवाहें फैलाके उन्होने अमेरिकाकी माया संस्कृतिको और इजिप्तकी महान संस्कृतिको नष्ट कर दिया था. पश्चिम एशियाकी संस्कृतियां भी अपवाद नहीं रही है.

आप कहोगे कि इन सब बातोंका आज क्या संदर्भ है?

संदर्भ अवश्य है. भारतीय संस्कृतिकी प्रत्येक प्रणालीयोंमें इसका संदर्भ है और उसका प्रास्तूत्य भी है.

अफवाहें फैलाके दुश्मनोंमें विभाजन करना, दुश्मनोंकी सांस्कृतिक धरोहर को नष्ट करना, दुश्मनोंकी प्रणालीयोंको निम्नस्तरीय सिद्ध करना और उसका आनंद लेना ये सब उनके संस्कार है. आज भी आपको यह दृष्टिगोचर होता है.

भारतमें इन अफवाहोंके कारण क्या हुआ?

भारतकी जनतामें विभाजन हुआ. उत्तर, दक्षिण, पूर्वोत्तर, हिन्दु, मुस्लिम, ख्रीस्ती, भाषा, आर्य, अनार्य, ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, शुद्र, वनवासी, पर्वतवासी, अंग्रेजीके ज्ञाता, अंग्रेजीके अज्ञाता  आदि आदिइनमें सबसे भयंकर भेद धर्म, जाति और ज्ञाति.

मुस्लिमोंमें यह अफवाह फैलायी कि वे तो भारतके शासक थे. उन्होने भारतके उपर ०० साल शासन किया है. उन्होंने ही भारतीयोंको सुसंस्कृत किया है. भारतकी अफलातुन इमारतें आपने ही तो बनायी. भारतके पास तो कुछ नहीं था. भारत तो हमेशा दुश्मनों से २५०० सालोंसे हारता ही आया है. सिकंदरसे लेके बाबर तक भारत हारते ही आया है.

ख्रीस्ती और मुसलमानोंने भारतके निम्न वर्णको यह बताया कि आपके उपर उच्च वर्णके लोगोंने अमानवीय अत्याचार किया है. दक्षिण भारतकी ब्राह्मण जनताको भी ऐसा ही बताया गया. इन कोई भी बातोंमे सत्यका अभाव था.

सबल लोग, निर्बल लोगोंका शोषण करे ऐसी प्रणाली पूरे विश्वमें चली है और आज भी चलती है. केवल सबल और निर्बलके नाम बदल जाते है. भारतमें शोषण, अन्य देशोंके प्रमाणसे अति अल्प था. जो ज्ञातियां थी वे व्यवसाय के आधार पर थी. और पूरा भारतीय समाज सहयोगसे चलता था.

धार्मिक अफवाहेः

धर्मकी परिभाषा जो पाश्च्यात देशोंने बानायी है, वह भारतके सनातन धर्म को लागु नहीं पड सकती. किन्तु यह समझनेकी पाश्चात्य देशोंकी वृत्ति नहीं है या तो उनकी समझसे बाहर है.

भारतके अंग्रेजीज्ञाताओंकी मानसिकता पराधिन है. इतिहास, धरोहर, प्रणालीयां, तत्वज्ञान, वैश्विक भावना, आदिको एक सुत्रमें गुंथन करके भारतीय विद्वानोंने भारतकी संस्कृतिमें सामाजिक लयता स्थापित की है. लयता और सहयोग शाश्वत रहे इस कारण उन्होंने स्थितिस्थापकता भी रक्खी है.

किन्तु तथ्योंको समझना और आत्मसात्करना पाश्चात्य विद्वानोंके मस्तिष्कसे बाहर की बात है. इस लिये उन्होंने ऐसी अफवाहें फैलायी कि, हिन्दु देवदेवीयां तो बिभत्स है. उनके उपासना मंत्र और पुस्तकें भी बिभत्स है. वे लोग जननेन्द्रीयकी पूजा करते है. उनके देव लडते भी रहेते है और मूर्ख भी होते है. भला, देव कभी ऐसे हो सकते हैं? पाश्चात्य भाषी इस प्रकार हिन्दु धर्मकी निंदा करके खुश होते हैं.

वेदोंमे और कुछ मान्य उपनिषदोंमे नीहित तत्वज्ञानका अर्क जो गीतामें है उनको आत्मसात तो क्या किन्तु समझनेकी इन लोगोंमें क्षमता नहीं है.

शास्त्र क्या है? इतिहास क्या है? समाज क्या है? कार्य क्या है? इश्वर क्या है? आत्मा क्या है? शरीर सुरक्षा क्या है? आदि में प्रमाणभूत क्या है, इन बातोंको समझनेकी भी इन विद्वानोंमे क्षमता नहीं है. तो ये लोग इनके तथ्योंको आत्मसात्तो करेंगे ही कैसे?  

राजकीय अफवाहेः

दुसरों पर अधिकार जमाना यह पाश्चात्य संस्कृतिकी देन है.

भारतमें गुरु परंपरा रही है. गुरु उपदेश और सूचना देता है. हरेक राजाके गुरु होते थे. राजाका काम सिर्फ गुरुनिर्देशित और सामाजिक मान्यता प्राप्त प्रणालियोंके आधार पर शासन करना था. भारतका जनतंत्र एक निरपेक्ष जनतंत्र था. गणतंत्र राज्य थे. राजाशाही भी थी. तद्यपि जनताकी बात सूनाई देती थी. यह बात केवल महात्मा गांधी ही आत्मसात कर सके थे.

भारतकी यथा कथित जनतंत्रको अधिगत करनेकी नहेरुमें क्षमता नहीं थी. नहेरुको भारतीय संस्कृति और संस्कारसे कोई लेना देना नहीं था. उन्होंनें तो कहा भी था किमैं (केवल) जन्मसे (ही) हिन्दु हूं. मैं कर्मसे मुस्लिम हूं और धर्मसे ख्रीस्ती हूं. नहेरुको महात्मा गांधी ढोंगी लगते थे. किन्तु यह मान्यता  उन्होंने गांधीजीके मरनेके सात वर्षके पश्चात्‍, केनेडाके एक राजद्वारी व्यक्तिके सामने प्रदर्शित की थी.

नहेरुकी अपनी प्राथमिकता थी, हिन्दुओंकी निंदा. नहेरुने हिन्दुओंकी निंदा करनेकी बात, आचारमें तभी लाया, जब वे एक विजयी प्रधान मंत्री बन गये.

हिन्दु महासभा को नष्ट करनेमें नहेरुका भारी योगदान था.

वंदे मातरम्और राष्ट्रध्वजमें चरखाका चिन्ह को हटानेमें उनका भारी योगदान था. गौ रक्षा और संस्कृतभाषाकी अवहेलना करना, मद्य निषेध करना, समाजको अहिंसाकी दिशामें ले जाना, अंग्रेजीको अनियत कालके लिये राष्ट्रभाषा स्थापित करके रखना, समाजवादी (साम्यवादी) समाज रचना आदि सब आचारोंमे नहेरुका सिक्का चला. उन्होंने तथा कथित समाजवाद, हिन्दी चीनी भाई भाई, स्व कथित और स्व परिभाषित धर्म निरपेक्षताकी अफवाहें फैलायी. इन सभी अफवाहोंको अंग्रेजी ज्ञाताजुथोंने स्वकीय स्वार्थके कारण अनुमोदन भी किया.

जनतंत्र पर जो प्रहार नहेरु नहीं कर पाये, वे सब प्रहार इन्दिरा गांधीने किया.

इन्दिरा गांधी, अफवाहें फैलानेमें प्रथम क्रम पर आज भी है.

इन्दिरा गांधीने जितनी अफवाहें फेलायी थी उसका रेकॉर्ड कोई तोड नहीं सकता. क्यों कि अब भारतमें आपात्काल घोषित करना संविधानके प्रावधानोंके अनुसार असंभव है.

सुनो, ऑल इन्डिया रेडियो क्या बोलता था?

एक वयोवृद्ध नेता, सेनाको और कर्मचारीयोंको विद्रोहके लिये उद्युत कर रहा है. (संदर्भः जय प्रकाश नारायणने कहा था कि सभी सरकारी कर्मचारी संविधानके नियमोंसे बद्ध है. इसलिये उनको हमेशा उन नियमोंके अनुसार कार्य करना है. यदि उनका उच्च अधिकारी या मंत्री नियमहीन आज्ञा दें तो उनको वह आदेश लेखित रुपमें मांगना आवश्यक है.) किन्तु उपरोक्त समाचार  ‘एक वयोवृद्ध नेता, सेनाको और कर्मचारीयोंको विद्रोहके लिये उद्युत कर रहा हैसातत्य पूर्वक चलता रहा.

उसी प्रकारआपातकाल अनुशासन हैका अफवाहयुक्त अर्थघटन यह किया गया कि, “आपातकाल एक आवश्यक और निर्दोष कदम है और विनोबा भावे इस कदमसे सहमत है.”

विनोबा भावेने खुदने इस अयोग्य कदमके विषय पर स्पष्टता की थी, “यदि वास्तवमें देशके उपर कठोर आपत्ति है तो यह, एक शासककी समस्या नहीं है, यह तो पुरे देशवासीयोंकी समस्या है. इस लिये देशको कैसे चलाया जाय इस बात पर सिर्फ (सत्ताहीन) आचार्योंकी सूचना अनुसार शासन होना चाहिये. क्योंकि आचार्योंका शासन ही अनुशासन है. “आचार्योंका अनुशासन होता है. सत्ताधारीयोंका शासन होता है.”

विनोबा भावे का स्पष्टीकरण दबा दिया गया. सत्यको दबा देना भी तो अफवाहका हिस्सा है.

एक वयोवृद्ध नेता (मोरारजी देसाई) के लिये प्रतिदिन २० कीलोग्राम फल का खर्च होता है.” यह भी एक अफवाह इन्दिरा गांधीने फैलायी थी. मोरारजी देसाईने कहा कि यदि मैं प्रतिदिन २० कीलोग्राम फल खाउं तो मैं मर ही जाउं.

ऐसी तो सहस्रों अफवायें फैलायी जाती थी. अफवाहोंके अतिरिक्त कुछ चलता ही नहीं था.

समाचार माध्यमों द्वारा प्रसारित अफवाहें

आज दंभी धर्मनिरपेक्षताके पुरस्कर्ताओंने समाचार पत्रों और विजाणुंमाध्यमों द्वारा अफवाहें फैलानेका ठेका नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंके पक्षमें ले लिया है.

मोदीफोबीयासे पीडित नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनके साथीयोंके द्वारा कथित उच्चारणोंसे नरेन्द्र मोदी कौनसा जानवर है या वह कौनसा दैत्य है, या वह कौनसा आततायी है, इन बातों को छोड दो. यह तो गाली प्रदान है. ऐसे संस्कारवालोंने (नहेरुवीयनोंने) इन लोगोंका नाम बडा किया है.

किन्तु भूमि अधिग्रहण विधेयक, आतंकवाद विरोधी विधेयक, उद्योग नीति, परिकल्पनाएं, विशेष विनिधान परिक्षेत्र (स्पेश्यल इन्वेस्टमेंट झोन), आदि विकास निर्धारित योजनाओं के विषय पर अनेक अफवाहें ये लोग फैलाते हैं. इसके विषय पर एक पुस्तक लिखा जा सकता है.

उदाहरण के तौर पर, भूमिअधिग्रहणमें वनकी भूमि नहीं है तो भी वनवासीयोंको अपने अधिकार से वंचित किया है, ऐसी अफवाह फैलायी जाती है. कृषकोंको अपनी भूमिसे वंचित करनेका यह एक सडयंत्र है. यह भी एक अफवाह है. क्यों कि उसको चार गुना प्रतिकर मिलता है जिससे वह पहेलेसे भी ज्यादा भूमि कहींसे भी क्रय कर सकते है.

आतंकवाद विरुद्ध हिन्दु और भारत समाज सुरक्षाः

कश्मिरके हिन्दुओंने तो कुछ भी नहीं किया था.

तो भी, १९८९९० में कश्मिरी हिन्दुओंको खुल्ले आम, अखबारोंमें, दिवारों पर, मस्जिदके लाउड स्पीकरों द्वारा धमकियां दी गयी कि, “इस्लाम कबुल करो या तो कश्मिर छोड दो. यदि ऐसा नहीं करना है तो मौतके लिये तयार रहो.” फिर ३००० से भी अधिक हिन्दुओंकी कत्ल कर दी. और उनके उपर हर प्रकारका आतंक फैलाया. लाख हिन्दुओंको अपना घर छोडना पडा. उनको अपने प्रदेशके बाहर, तंबूओंमे आश्रय लेना पडा. उनका जिवन तहस नहस हो गया है.

ऐसे आतंकके विरुद्ध दंभी धर्मनिरपेक्ष जमात मौन रही, नहेरुवीयन कोंग्रेसनेतागण मौन रहा, कश्मिरी नेतागण मौन रहा, समाचार माध्यम मौन रहा, मानव अधिकार सुरक्षा संस्थाएं मौन रहीं, समाचार पत्र मौन रहें, दूरदर्शन चेनलें मौन रहीं, सर्वोदयवादी मौन रहेंये केवल मौन ही नहीं निरपेक्ष रीतिसे निष्क्रीय भी रहे. जिनको मानवोंके अधिकारकी सुरक्षाके लिये करप्रणाली द्वारा दिये जननिधिमेंसे वेतन मिलता है वे भी मौन और निष्क्रीय रहे. यह तो ठंडे कलेजेसे चलता नरसंहार ही था और यह एक सातत्यपूर्वक चलता आतंक ही है जब तक इन आतंकवादग्रस्त हिन्दुओंको सम्मानपूर्वक पुनर्वासित नहीं किया जाता.  

एक नहेरुवीयन कोंग्रेस पदस्थ नेताने आयोजन पूर्वक २००२ में गोधरा रेल्वे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेसका डीब्बा जलाकर ५९ स्त्री, पुरुष बच्चोंको जिन्दा जला दिया. ऐसा शर्मनाक आतंक, गुजरातमें प्रथम हुआ.

गुजरात भारतका एक भाग है. वह कोई संतोंका मुल्क नहीं है, तो वह भारत में, संतोंका एक टापु बन सकता है. यदि कोई ऐसी अपेक्षा रक्खे तो वह मूर्ख ही है.

५९ हिन्दुओंको जिन्दा जलाया तो हिन्दुओंकी प्रतिक्रिया हुई. दंगे भडक उठे. तीन दिन दंगे चले. शासनने दिनमें नियंत्रण पा लिया. जो निर्वासित हो गये थे उनका पुनर्वसन भी कर दिया. इनमें हिन्दु भी थे और मुसलमान भी थे. मुसलमान अधिक थे. से मासमें, स्थिति पूर्ववत्कर दी गयी.

तो भी गुजरातके शासन और शासककी भरपुर निंदा कर दी गयी और वह आज भी चालु है.

मुस्लिमोंने जो सहन किया उसके उपर जांच आयोग बैठे,

विशेष जांच आयोग बैठे,

सेंकडोंको जेलमें बंद किया,

न्यायालयोंमें केस चले.

सजाएं दी गयी.

इसके अतिरिक्त इसके उपर पुस्तकें लिखी गयीं,

पुस्तकोंके विमोचन समारंभ हुए,

घटनाके विषय को ले के हिन्दुओंके विरुद्ध चलचित्र बने,

अनेक चलचित्रोंमें इन दंगोंका हिन्दुओंके विरुद्ध और शासनके विरुद्ध प्रसार हुआ. इसके वार्षिक दिन मनाये जाने लगें.

२००२ के दंगोमें क्या हुआ था?

२००० से कम हुई मौत/हत्या जिनमें पुलीस गोलीबारीसे हुई मौत भी निहित है.

इसमें हिन्दु अधिक थे. ११४००० लोगोंको तंबुमें जाना पडा जिनमें / से ज्यादा हिन्दु भी थे

से महीनेमें सब लोगोंका पुनर्वसन कर दिया गया.

 

इनके सामने तुलना करो कश्मिरका हत्याकांड १९८९९०

हिन्दुओंने कुछ भी नहीं किया था.

३०००+ मौत हुई केवल हिन्दुओंकी.

५०००००७००००० निर्वासित हुए. सिर्फ हिन्दुओंको निर्वासित किया गया था.

शून्य पोलीस गोलीबारी

शून्य मुस्लिम मौत

शून्य पुलीस या अन्य रीपोर्ट

शून्य न्यायालय केस

शून्य गिरफ्तारी

शून्य दंड विधान

शून्य सरकारी नियंत्रण

शून्य पुस्तक

शून्य चलचित्र

शून्य दूरदर्शन प्रदर्शन

शून्य उल्लेख अन्यत्र माध्यम

शून्य सरकारी कार्यवायी

शून्य मानवाधिकारी संस्थाओंकी कार्यवाही

यदि हिन्दुओंका यही हाल है और फिर भी उनके बारेमें कहा जाता है कि, मुस्लिम आतंकवादकी तुलनामें हिन्दु आतंकवाद से देशको अधिक भय है ऐसा जब नहेरुवीयन कोंग्रेसका अग्रतम नेता एक विदेशीको कहेता है तो इसको अफवाह नहीं कहोगे तो क्या कहोगे?

अघटित को घटित बताना, संदर्भहीन घटनाको अधिक प्रभावशाली दिखाना, असत्य अर्थघटन करना, प्रमाणभान नहीं रखना, संदर्भयुक्त घटनाओंको गोपित रखना, निष्क्रीय रहना, अपना कर्तव्य नहीं निभानाये सब बातें अफवाहोंके समकक्ष है. इनके विरुद्ध दंडका प्रावधान होना आवश्यक है.

और कौन अफवाहें फैलाते हैं?

लोगोंमें भी भीन्न भीन्न फोबिया होता है.

मोदी और बीजेपी या आएसएस फोबीया केवल दंभी धर्मनिरपेक्ष पंडितोमें होता है ऐसा नहीं है, यह फोबीया सामान्य मुस्लिमोंमें और पाश्चात्य संस्कृति से अभिभूत व्यक्तिओमें भी होता है. ऐसा ही फोबीया महात्मा गांधी के लिये भी कुछ लोगोंका होता है. कुछ लोगोंको मुस्लिम फोबिया होता है. कुछ लोगोंको क्रिश्चीयन लोगोंसे फोबीया होता है. कुछ लोगोंको श्वेत लोगोंकी संस्कृतिसे या  श्वेत लोगोंसे फोबिया होता है. वे भी अपनी आत्मतूष्टिके लिये अफवाहें फैलाते है.  ये सब लोग केवल तारतम्य वाले कथनों द्वारा अपना अभिप्राय व्यक्त करके उसके उपर स्थिर रहते हैं.

शिरीष मोहनलाल दवे

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पी.के. ने पीके किया नशा? कथांक – २

विश्वमें एक हिन्दु धर्म ऐसा है कि जिसमें विज्ञान जैसा खुलापन है. यह खुलापन हजारों सालसे है.

हिन्दु धर्ममें वेद प्रमाण है. किन्तु वेदोंको समझना कठिन है. इसलिये उपनिषद है. उपनिषद विशेषज्ञोंके लिये है. इस लिये कृष्ण भगवानने वेदोंके आधारपर उपनिषदोंका दोहन किया और उस दूधका दहीं बनाके तक्रका मंथन करके गीताके स्वरुपमें मक्खन बनाके आम जनताको प्रस्तूत किया. अगर गीतामें वेदोंके साथ कोई विरोधाभाष है तो वेद प्रमाण है. किन्तु वेदप्रमाण और प्रत्यक्ष प्रमाणमें यदि कोई विरोधाभाष है तो जो प्रत्यक्ष है वह प्रमाण है. ऐसा आदि शंकराचार्यने कहा है.

यह हिन्दुओंका खुलापन है. जब ज्ञातिप्रथा अत्यंत जड थी तब भी उसके विरुद्धमें विद्रोह उठाने वाले लोग थे. हिन्दु लोग अपनी प्रणालीयोंमें यदा कदा क्षति पाते है तो वे उन क्षतियोंको सुधारने के लिये सक्षम भी है. उसमें अन्य धर्मीयोंको चंचूपात करनेकी जरुरत नहीं है. अन्य धर्मी स्वयंकी क्षतियों पर आत्मखोज करें वह हि उनके लिये योग्य है.

पी. के. का उद्देश क्या था?
वास्तवमें पी. के. का उद्देश अंधश्रद्धा निर्मूलन है ही नहीं.
हिन्दु धर्ममें एक खुलापन होनेसे वह चर्चाके लिये एक आसान लक्ष्य बनता है. उसके विरोधियोंके लिये यह एक आनंदका विषय बनता है.
हिन्दु धर्म एक भीन्न प्रकारका धर्म है.

अन्य धर्मोंने अपने धर्मोंके आधार पर, धर्मकी जो परिभाषा की है, उस व्याख्या के अनुरुप हिन्दु धर्म नहीं है.

इस लिये अन्य धर्मी लोग हतःप्रभः है.
ये विधर्मी जहां कहीं भी गये उन्होने सौ वर्ष के अंतर्गत उन देशोंके ९५ से १०० प्रतिशतको अपने धर्ममें परिवर्तित कर दिये. किन्तु भारतवर्ष जहां विधर्मी जातियोंनें २०० से ८०० साल तक शासन किया तो भी ८० प्रतिशत भारतवासी हिन्दु धर्मी ही रहे. हिन्दुंओंकी तथा कथित क्षतियों को भरपूर हवा देने पर भी वे हिन्दु ही रहे. यह बात इन लोगोंके लिये आघातजनक है. ये लोग आत्म खोज करने के स्थान पर, बिना सोचे समझे, और बिना हिन्दु धर्मकी गहनताका अभ्यास किये, हिन्दुओंके आचार पर आक्रमण करना पसंद करते है.
सामान्य जनतामें धर्म, ज्ञान के उपर चलता नहीं है किन्तु श्रद्धाके आधार पर चलता है. इन अन्य धर्मीयोंकी व्युह रचना यह है कि अगर सामान्य जनताको हिन्दु धर्मके ज्ञानीयोंसे अलग की जाय तो फिर संख्या के आधार पर इन ज्ञानी लोगोंसे तो निपटा जा सकता है.

मुस्लिमोंने ६०० वर्षतक हिन्दु राजाओंसे संघर्ष किया. ऐसा करते करते वे खुद आधे हिन्दु बन गये. जो मुस्लिम राजा आधे हिन्दु नहीं बने और धर्मांध भी थे उन्होने गरीबोंको और आशितोंको मुस्लिम बनानेके प्रयास किये. कुछ लोगों पर जबरदस्ती भी की, हत्याएं भी की, थोडे सफल भी रहे. किन्तु जितना वे अन्य देशोमें सफल हुए उतना यहां नहीं हो पाये.
इस बातका मुस्लिमोंको अफसोस भी नहीं था. क्यों कि ६०० वर्षके अंतरालमें खुदका राज बचाने की नौबत उनको आगयीं थीं. जब औरंगझेब मृत्युशैया पर था तब मुगल साम्राज्य तहस नहस हो गया था.
अंग्रेजोंने कूट नीति चलायी. भारतीयोंको गलत और विभाजनवादी इतिहास पढाया. अंग्रेजी भाषाको भारतीयों पर ठोक दी. अंग्रेजी भाषाके जाननेवालोंको नौकरीयोंकी सुविधाएं दी. उनका मान बढाया. पाश्चात्य शिक्षाको ही स्विकृति दी. हिन्दुधर्म के पुरस्कर्ताओंको धर्मांध ठहेराया. हिन्दुओंके लिखे पुस्तकोंको सर्वांश नकार दिया.
इतना करने के बावजुद भी, हिन्दुओंके सामने इन लोगोंकी पराजय हर मोड पर निश्चित थी. उन्होने ऐसे हाथोंमें स्वतंत्र भारतका सुकान दिया कि जो संस्कारमें उनकी योजना आगे चलायें.

वह था नहेरु.

उसने विभाजन वादी प्रक्रियाएं चालु रक्खी. और पाश्चात्य पंडितोंने लिखा हुआ इतिहास भी चालु रक्खा. हिन्दुओंको अपमानित करना चालु रक्खा. मुसलमानोमें यह भावना रक्खी की वे हिन्दुओंसे भीन्न है.

मुसलमान समझने लगे कि उनका इतिहास अधुरा है. ख्रिस्ती भी ऐसा समझने लगे कि उनका इतिहास भी भारतमें अधुरा है. क्यों कि दोनों भारत को ९५-१०० प्रतिशत अ-हिन्दु कर नहीं पाये.

मुसलमानोंका इतिहास क्या है?
जहां भी उनका शासन हुआ वहां उन्होने १०० प्रतिशत जनताका धर्म परिवर्तन किया और सबको मुस्लिम बना दिया. यहां तक कि ईजिप्त, सुमेरु बेबीलोनकी सुसंस्कृत संस्कृतियोंका पतन किया. उनके धर्मस्थानोंको तोड दिया. उन धर्मस्थानोंके उपर अपने धर्मस्थान बनाये. वहांकी जनताका जबरदस्तीसे धर्म परिवर्तन किया. मुस्लिम शासकोंने हर जगह ऐसा ही किया था. भारतमें भी उन्होने हजारों देवस्थानोंको नष्ट किया. नालंदा, तक्षशीला, वलभीपुर जैसे विश्वविद्यालयोंको भी पूरी तरह नष्ट किया था. किन्तु भारतमें कई राजाओंने उनको पराजित किया इस लिये वे अपने ध्येयमें १०० प्रतिशत सफल नहीं रहे.

ख्रिस्ती शासकोंने क्या किया?
उन्होनें वही किया जो मुस्लिमोंने आतंकवादी बनके अन्यत्र किया था. उसके उपरांत ख्रिस्ती शासकोंने वहांके आदिवासीयोंका करोडोंकी संख्यामें कत्ल किया. उनकी भाषा भी नष्ट की. आज अमेरिकाके बचे हुए आदिवासी सब ख्रिस्ती है. उनकी मूल भाषा भी विलुप्त हो गयी है. माया-संस्कृतिका और उस धर्मको माननेवालोंका एक आदमी आपको कहीं भी मिलेगा नहीं. केवल इतिहासके पन्नों पर माया संस्कृति और उसकी भाषा आपको मिलेगी.

THEY ARE ENDED UP

किसी भी संस्कृतिको अगर नष्ट करना है तो उसकी भाषा, प्रणालीयां और धर्मस्थानोंको नष्ट करदो तो वह अपने आप नष्ट हो जायेगी.

भारतमें अब तक नहेरुवीयन कोंग्रेसका शासन था. इन्होने हिन्दु धर्मको धर्म निरपेक्षताके नाम पर कई सारे आघात किये. जो विधर्मी शासकोंने भारत पर शतकों वर्ष तक शासन किया था उनके धर्मको माननेवालोंको रीयायतें दी. वे लोग हिन्दुओंका धर्म परिवर्तन कर सके, उसके लिये भी सुविधायें दी. उनके लिये अलग नागरिक नियम बनायें. बहारसे पैसे लाके ये विधर्मी लोग भारतीय जंगलवासीयोंको, पर्वतवासीयोंको और समूद्रके किनारेके वासीयोंको हिन्दुमेंसे परधर्मी कर सके उसके लिये सुविधायें दी.
अगर कोई विधर्मी, हिन्दु धर्मके विरुद्ध बोलें, तो सरकारका रवैया रहा कि, भारत तो, एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है इसलिये सरकार उसमें दखल नहीं करेगी. वाणीस्वातंत्र्य और अपने धर्मका प्रचार करना विधर्मीयोंका अधिकार माना गया. लेकिन कोइ हिन्दु अगर ऐसा कुछ करें तो उसको धर्मांध कहेना, उसकी हर बातको भगवाकरण मानना, और उसकी निंदा करना एक फेशन मनवायी गयी. भगवाकरण शब्दको गाली के रुपमें प्रस्तूत किया ग्या. आदि आदि
हिन्दुओंको नष्ट करनेका अब यही एक उपाय बचा है कि, सामान्य कक्षाके हिन्दुओंको असंजसमें डालो, अपमानित करो, उनकी यातनाओंकोके प्रति दूर्लक्ष्य दो, विभाजित करो.

जो मूर्धन्य है उनमेंसे अधिकतरोंको तो भ्रष्ट करना आसान है. बाकि जो हिन्दु बचें, उनके विरुद्धमें विवाद खडा करके बदनाम किया जायेगा तो वे तो वैसे ही आम जनताकी नजरोंमेंसे गीर जायेंगे. नरेन्द्र मोदीको क्या किया गया? उसके इतिहास के संदर्भमें दिये गये उदाहरणोंको तोडमोड के प्रदर्शित किया गया, और उनको खुब उछाला. उसकी अंग्रेजी भाषाके उपर बेवजह ही मजाक उडाया. वह अगर किसी बात पर प्राथमिकता दें तो उसके उपर विवाद खडा किया जाता है.

एक बार अगर हिन्दु जनसंख्या ६० प्रतिशत हो जाय तो फिर उनको नष्ट करना आसान है.

सत्तालोलुप विधर्मीयों जिनमें कुछ प्रच्छन्न विधर्मी भी है, उनके लिये यह तो बायें हाथ का खेल है. क्यों कि विधर्मी ख्रिस्ती और मुस्लिम संस्कारमें तो एक समान ही है. दोनों समझते है कि उनका ही धर्म ईश्वरको मंजुर है. और विधर्मीयोंको किसीभी साधनसे नष्ट करना ईश्वरको मंजुर है.

फिलहाल विधर्मीयोंने भारतके कई राज्योंमें अपने बहुमत वाले टापु बना दिये है. ये लोग उनमें बसे हिन्दुओंके उपर आतंक करके उनका धर्म परिवर्तन कर देते हैं. अगर उन्होने धर्म परिवर्तन नहीं किया तो उनको घर छोडके भाग जाने पर मजबुर कर देते हैं. केराला, तामिलनाडु, पश्चिम बंगालके कई कस्बोंका यही हाल है. उत्तरपूर्वी राज्यों पर तो इन्होंनें कबजा जमा ही लिया है.

भारतका सामान्य जन विधर्मीयोंके इस प्रकारके आचारोंसे अज्ञात है. क्यों?

क्यों कि,

समाचार माध्यमों पर इन विधर्मीयोंका कब्जा है.

विधर्मी संचालित समाचार माध्यम अपने धर्मकी आतंकवादकी घटनाओंको प्रसारित करते नहीं है.
कश्मिरके हिन्दुओंके उपर किये गये आतंकको किस चेनलने प्रमाणके आधार पर प्रसारित किया था या किया है? एक भी नही.
विधर्मीयोंका आतंकवाद आज भी चालु है.
लेकिन कौनसी चेनल हिन्दुओंके मानव अधिकारकी रक्षाके लिये जागृत है? प्रमाण भान रखना और विधर्मीयोंके मानव अधिकारको मान्यता देना, इन बातोंमें ये मुस्लिम और ख्रिस्ती लोग मानते ही नहीं है.
एक बात सही है कि सामान्य ख्रिस्ती लोग, हिन्दुओंके विरुद्ध वाचाल नहीं है. वे अलग वसाहत नहीं बनाते है और हमारी ही कोलोनीमें हमारी पडोसमें ही रहेते है और हमसे तदृप होके रहेते है. लेकिन उनके जो मूर्धन्य और धर्मगुरु होते है वे सक्रीय होते है. वे लोग अपनी सामान्य जनताको यही कहेते है कि आप लोग, सिर्फ हम कहें उनको ही, चूनावमें वॉट दो. बाकीका काम हम कर देंगे.

मुस्लिमोंको सही रस्ते पर लाना शायद शक्य हो सकता है. किन्तु ख्रिस्तीयोंको सही मार्ग पर लाना कठिन है. क्यों कि उनको तो समझाया गया है कि आपका उद्धार तो हमने ही किया है. इन भारतवासीयोंने तो आपको हाजारों सालों तक यातनाएं ही दी है. क्यों कि वे हिन्दु है.

आप जरुर कहेंगे कि, पी. के. जिन हिन्दुओंने देखी है उनमेंसे कई हिन्दुओंने उसकी प्रशंसा की है. उसका क्या?

यदि आप प्रशंसा करनेवालोंका वर्गीकाण करेंगे तो उसमें दो प्रकारके लोग है. एक सामान्य कक्षाके लोग, जिनमें कुछ लोगोंका एक स्वभाव होता है कि किसी भी बात को “एक साक्षीभाव”के रुपमें देखें.
जब ऐसा होता है और जब उनको हिन्दु धर्मका शास्त्रीय ज्ञान नहीं होता है तो ये सामान्य लोग, दुसरोंकी व्युह रचनाएं नहीं समझ सकते और व्युहरचना करने वालोंका हेतु भी समझ नहीं सकते. अगर उनमें प्रमाणिक प्रज्ञा और प्राथमिकताती प्रज्ञा होती तो वे व्युह रचना बनानेवालों की व्युह रचना समझ सकते.

आप कहेंगे कि, कुछ मूर्धन्योंने भी तो, पी. के. की प्रशंसा की है, जैसे कि एल के अडवाणी. उसका क्या?
आपकी बात सही है. लेकिन आपको ज्ञात होना चाहिये कि दंभी धर्मनिरेक्षता करनेवालोंने एक ऐसी हवा प्रसारित की है कि, अडवाणी एक सोफ्ट और धर्मनिरपेक्ष नेता है. भारतको एक सोफ्ट नेता पसंद है. जैसे कि अटलजी भी एक सोफ्ट नेता था इसलिये वे भारतीय जनतामें स्विकार्य बने…. आदि… आदि..
वास्तवमें यह “सोफ्ट” वाला मामला एक सियासती व्युहरचना है. भारतीय जनताको एक विकल्प चाहिये था. भारतीय जनता नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनके साथीयोंके उनके सीमाहीन भ्रष्टाचार, ठग विद्या, दंभ और कोमवादसे त्रस्त हो गई थी. जब जब भारतीय जनताको विकल्प मिला है, उसने नहेरुवीयन कोंग्रेसको पराजित किया है.

यह बात भी समझ लो कि, नाम बडा हो जानेसे व्यक्ति बडा नहीं हो जाता.

कई बडे व्यक्तिओंमें एक निम्न कक्षाका व्यक्ति होता है.

small people Big name

लालु, माया, मुलायम, जया, करुणा, ममता, नितीश, अडवाणी, केशु, संकरसिंह वाघेला, फारुख, ओमर, मुफ्ती मोहमद, रसिकलाल, जिवराज, हितेन्द्र, ईन्दिरा, राजीव, सोनीया, राहुल …. अगर आप लिखोगे तो एक किताब बन जायेगी.

उपरोक्त लोग दुसरोंके कन्धे पर बैठके बडे नामवाले बने है.

वास्तवमें ये सब निम्न कक्षाके है, और इनलोगोंको नेता मानने वाले तो अति निम्न कक्षाके है.
उसी तरह कई छोटे लोगोंके शरीरमें, एक महान व्यक्ति बैठा हुआ होता है. जैसे नरेन्द्र मोदी, बाबा रामदेव, जोर्ज फर्नाडीस, बाबुभाई जसभाई पटेल, सरदार पटेल, महात्मा गांधी, विवेकानंद, दयानंद सरस्वती … इन नेताओंकी भी एक सूची बन सकती है जो सामान्य होते हुए भी महान बने.
ऐसे भी कई लोग होते है जो महान होते हुए भी, शक्यताके सिद्धांतके अनुसार महान बन नहीं पाये.

आप कहोगे कि पी. के. में कोई व्युह रचना अगर है भी, तो वह कौन कौन सी व्युह रचना हो सकती है? और ऐसी मान्यताका आधार क्या है?

फिल्म उद्योग काले धनको सफेद करनेका एक सडयंत्र है यह बात सबको ज्ञात है.
पी. के. ने सीनेमा टीकीट का मूल्य बढा दिया था. जो सीनेमाघर खाली थे या “हाउसफुल” नहीं थे उनको भी “फाउसफुल” घोषित किये गये थे.
मान लिजिये अगर एक सीनेमा घरकी बैठकें १००० है. और टीकीटका मूल्य १४० रुपया है. और अगर वास्तवमें २०० टीकीट की ही बीक्री हुई किन्तु हाउसफुल घोषित किया गया तो कितना काला धन सफेद हुआ?
१४० में ४० रुपया सरकारी कर है.
(१) सीनेमा घरके मालिकके पास २०००० रुपये आये.
(२) किन्तु सरकारके हिसाबसे उसके पास १००००० आया.
(३) सरकार सीनेमाघरके मालिक की आवक ८००० मानेगी. उसके उपर ३० प्रतिशत आयकर लगायेगी. यह २४०० रुपये हुए. वास्तविक नफा १६०० था. और वास्तवमें उसको ४८० रुपया आयकर ही भरना था. तो भी उसने २४०० रुपया आयकर भरा. १९२० रुपया अधिक आयकर भरा.
(४) निर्माताने क्या किया? उसने ९२००० का ८ प्रतिशत यानी ७३६० नफा दिखाया, जो वास्तवमें १४७२ था. उसने ५८८८ रुपया ज्यादा दिखाया. मान लो की उसने सीनेमाघरके मालिकने जो १९२० ज्याद कर भरा था उसकी पूर्ती की या न की तो भी उसकी आयका नफा करीब ४००० रुपया हुआ. जो वास्तवमें ८०० रुपया था. ३२०० रुपया नफा ज्यादा दिखाया.
(५) यह तो एक शॉ की बात हुई और नफेकी ही बात हुई. खर्च तो इससे १२ गुना ज्यादा है. वह भी तो काले धनमेंसे खर्च किया था.
युपी और बिहार की जनताने टेक्ष फ्री किया. तो उनको भी हिस्सा मिला होगा जो दानके स्वरुपमें या उनके काले धनमें जायेगा.

यह काला धन सिर्फ काला ही नहीं है. वह लाल भी है. लाल धनसे मतलब है, असामाजीक तत्वोंकी कमाई, जो सुपारी, आउटओफ कॉर्ट प्रोपर्टी सेटलमेन्ट, ड्रग्झ, हवाला आदि सब है. नहेरुवीयन कोंग्रेसने पैदा की हुई दाउद गेंगका बडा नेटवर्क है.

ईन गद्दरोंसे दूर रहो.

शिरीष मोहनलाल दवे
टेग्झः वेद, उपनिषद, प्रमाण, गीता, प्रत्यक्ष प्रमाण, ज्ञातिप्रथा, भारत, हिन्दु धर्म, गहनता, मुस्लिम, इस्लाम, ख्रिस्ती, आक्रमण, अंग्रेज, माया-संस्कृति, नहेरुवीयन, निम्नकक्षा, धर्म परिवर्तन, भगवाकरण, मूर्धन्य, विधर्मी, मानव अधिकार, साक्षीभाव, कोमवाद, फिल्म, हाउसफुल, कालाधन, लालधन,

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