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महाविस्फोट को कौन रोक सकता है? भाग-१

महाविस्फोटसे क्या अभिप्रेत है?

हिन्दु और मुस्लिमके बीचमें गृहयुद्ध यानी कि व्यापक दंगा.

MAHA VISFOT

इनको कौन रोक सकता है?

भारतमें सन १९४७से भी अधिक  व्यापक दंगे होनेकी संभावना है. यदि आप सुज्ञ है और तथापि भी न मानने वालोंमेंसे है, तो आप व्यापक दंगा होने पर, अपनी मान्यता पर पश्चाताप करनेवाले है. या तो आपकी संतान आपकी मानसिकता पर थूंकेगी.

दंगा शब्द का हिन्दीमें (संस्कृतमें) पर्यायवाची शब्द नहीं है. उपद्रव शब्द है. किन्तु उपद्रव तो मच्छरोंका भी होता. वहां हम “दंगा” शब्दका प्रयोग नहीं कर सकते. एक शब्द है नरसंहार (जिसमें नारी भी समाविष्ट है). दंगा और नर संहारमें भीन्नता है. नरसंहार शब्द, कर्ता के अभावमें स्पष्ट नहीं होता. नरसंहार किसने किया, यानी कि, कर्ता कौन  है यह प्रश्न उठता है. दंगा शब्द यह प्रदर्शित करता है कि दो जुथोंके बीच परस्पर संहार हुआ.

हमारा ध्येय इन प्रवर्तमान दंगोंके विषयमें चर्चा करनेका है.

हिन्दुओं और मुस्लिमों के बीचमें दंगा भी होता है और मुस्लिमों द्वारा हिन्दुओंका नरसंहार भी होता है. जब पानी सरसे उपर जाता है तो हिन्दु भी क्वचित्‌ मुस्लिमोंका अल्प मात्रामें नरसंहार कर लेते हैं. शत प्रतिशत हिन्दु लोग, संत महात्मा नहीं बन सकते. और ऐसी अपेक्षा भी किसीको रखनी नहीं चाहिये.

भारतीय संस्कृतिका चरित्र

दंगा शब्दके समकक्ष शब्द भारतीय भाषामें न होना हिन्दुओंकी संस्कृतिकी  शालिनता और उच्चता प्रदर्शित करता है. क्यों कि भारतीयोंके इतिहासमें कभी दंगा होता ही नहीं था. समाजकी व्यवस्था ही ऐसी थी कि सनातन धर्म के दो समुदायोंके बीच कभी हिंसक संघर्ष होता ही नहीं.

यदि हमें ऐसी घटना देखना है तो हमें रामके पूर्वकालमें जाना पडेगा, जब परशुरामने क्षत्रिय राजाओंके सामने युद्ध छेडा था. उन युद्धोंमे उन्होंने क्षत्रिय राजाओंको अव्हाहन करके  युद्ध किया था और उनका कत्ल किया था. उनमें भी धार्मिक राजा जनक जैसे राजाओंको छोड दिया था. एक बात और भी है कि ब्राह्मणोंने बादमें अपना राज्य क्षत्रियोंको दे दिया था. भारतके इतिहासमें “दंगा”का पर्यायवाची या समकक्ष  शब्द है ही नहीं.

मुस्लिम आक्रमणकारीयोंके आनेके पश्चात्‌, भारतमें नरसंहार शब्द जनतामें प्रचलित बना. क्यों कि मुस्लिम आक्रमणकारी सेना, अपनी जितके बाद पराजित राजाकी जनताको लूटती थीं और स्त्रीयोंके उपर अत्याचार करती थीं, स्त्रीयोंको गुलाम बनाती थीं और पुरुषोंका धर्म परिवर्तन या तो संहार करती थीं.

इतना सब कुछ होते हुए भी शेरशाह, अकबर, कुछ दाराशिकोह (जैसे विद्वान), बहादुर शाह जफर   जैसे  व्यक्तियोंके कारण १८५७ के अंतर्गत सब हिन्दु-मुस्लिम हिलमिल गये थे और वे दोनों साथ मिलकर अंग्रेजोंके सामने लडे थे. इस घटनाके विषयमें वितंडावाद हो सकता है.

१८५७के पश्चात्‍ अंग्रेजोने मुस्लिम-बिनमुस्लिम, सवर्ण-असवर्ण, आर्य-अनार्य (द्र्विड) और फर्जी इतिहास पढाकर भारतदेशकी जनताको अनेक भागोंमे विभाजित किया. अंग्रेज शासकोंके एजन्डा और एजन्डाके ऐतिहासिक लिखित प्रमाण उपलब्ध भी है. अंग्रेजोंने भारतकी जनतामें विभाजन की एक सुक्ष्म दिवार बनाई और १९४७ आते आते एक कठोर वज्रसी दिवार बना दी गयी.

अंग्रेजोंने सिखोंको हिन्दुओंसे विभाजित किया. क्यों कि १८५७के संग्राममें सिखोंने अंग्रेजोंकी सहायता की थी. यानी कि वे, अंग्रेजोंकी तरफसे लडे थे. इसलिये अंग्रेजोंने  केवल सिखोंको सेनाकी भरतीमें प्राथमिकता देना प्रारंभ किया. सिखोंको पढाया कि आप तो हिन्दुओंसे भीन्न है. खालिस्तानकी मांगकी कल्पनाका मूल यहां पर है.

ये सब चर्चा लंबी है. इसकी चर्चा अभी हम नहीं करेंगे.

आतंकवादकी उत्पत्ति

वैसे तो आतंकवाद अमेरिकाने चालु करवाया था. मुस्लिमोंको आतंकवादी बनानेका काम  अमेरिकाने किया था. उन मुस्लिम आतंकवादीयोंको  सहाय भी दी थी. और प्रायः अभी भी अमेरिका अपने मनपसंद आतंकवादी जुथोंको सहाय कर रहा है. किन्तु यदि आप सुज्ञ है, तो सुज्ञ होते ही आतंकवादके विरुद्ध हो सकते है. मुस्लिम लोग भी इस वास्तविकताको जानते है. किन्तु इसका नतीजा वे केवल यही निकालते है कि अमेरिका (युएसए) तो कमीना है. मुस्लिमोंके हर प्रकारके और स्तरके लोग, चाहे वे धर्मांध, धार्मिक, सुज्ञ, विद्वान, विश्लेषक … या कोई भी हो, यही मानते है, कि अमेरिकन सरकार कमीनी है. केवल तटस्थ और सुज्ञ लोग ही आतंकवादीयोंका विरोध करते है. ऐसा विरोध भी, वे लोग आवश्यकता और अनिवार्यता लगने पर ही करते है.

तटस्थ एवं सुज्ञ लोगोंमें भी आतंकवादके विरोधमें सक्रिय कितने हैं?

संभवतः आप अपनी अंगुलीयोंसे इन मुस्लिम व्यक्तियों की गणना कर सकते है.

वैसे तो आम जनता जो मध्यम वर्गी है वह मिलजुल कर रहेना चाहती है. तथापि वे आतंकवादीयोंके प्रति संवेदनशील है, यानी कि उनका आतंकवादीयोंके प्रति सोफ्ट कोर्नर रहेता है, उतना ही नहीं यदि इस्लाम सारी दुनियामें विस्तरित हो जाय तो उनसे वे आनंदित है. चाहे हिंसासे फैले तो भी.

हमारे कुछ मूर्धन्य और कई सारे समाचार माध्यमके स्वामी, हमेशा हिन्दुनेताओंके उच्चारणोंके विरुद्ध लिखकर हिन्दुओंको हिंसाके लिये परोक्ष रुपसे प्रेरित करते है. और वे ही लोग मुस्लिम नेताओंके, हिन्दुओंके प्रति तिरस्कार युक्त उच्चारणोंके उपर, मौन धारण करते है. इनको पता नहीं है कि विदेशोमें मुस्लिम लोबी पूराने समयसे सक्रिय है. और यही लोबी हमारे मोदी/बीजेपी –विरोधी नेताओंके उच्चारणोका आधार लेकर विदेशोंमें भारतकी वर्तमान सरकारकी विरुद्ध लिखती है और बीजेपीकी नीतियोंको हिन्दुवादी  सरकार मानते है.

डी.बी. भाई (दिव्यभास्कर दैनिक) क्या लिखता है?

दिल्लीमें जो दंगे या नरसंहारकी घटनाएं हुई उनका कारण डीबीभाईके हिसाबसे निम्न नंबरवाले पेरा है.

कारणोंकी तर्क हीनता भी देख लो.

(१) कपिल मिश्राके ट्वीट द्वारा उच्चारणः “आम आदमी पक्ष” और “कोंगी” ने शाहीन बाग जैसे मीनी पाकिस्तान उत्पन्न किया है,  तो उनके उत्तरमें हिन्दुस्तान खडा होगा.

शाहीनबाग क्या पाकिस्तान बना था? जि हाँ, वहाँ वे प्रदर्शनकारीयोंका कोई अधिकृत सदस्य  अनुमति दे तभी कोई बाहरी व्यक्ति जा सकता था. कहेनेका तात्पर्य यह था कि वह एक भीन्न देशके समान आचरण था. वे सब मुस्लिम थे. पाकिस्तानका भारतके साथ दोघला मापदंड है. इसलिये उस क्षेत्रको पाकिस्तानकी उपमा दे दी. क्या सार्थक उपमा देना भी हिन्दुओका अपराध है? यदि कपिल मिश्राने “… हिन्दुस्थान खडा होगा …” कहा, तो क्या हुआ? यदि आप धर्मके नाम पर अपनी मांगे रखते है और चर्चाके लिये भी सज्ज नहीं तो यदि आप ही के तर्क के आधार पर ऐसा काम हिन्दु भी कर सकते है.  और आप जानते है कि ऐसा करनेसे अराकता ही फैल सकती है. और देशको इससे नुकशान हो सकता है. कहेनेका तात्पर्य यह है कि आप मुस्लिम लोग अराजकता फैलानेमें मानते है क्यों कि आप जनतासे संवाद भी करना नहीं चाहते. और आप असीमित काल तक जनताको कष्टमें रखना चाहते हो.

(२) बीजेपीके मनीष चौधरीने कहा कि, “देशके गद्दारोंको गोली मारो.” यानी कि सरकारको गद्दरोंको गोली मारे ऐसा उनका कहेनेका अर्थ है.

यदि यह भी दंगे प्रेरित करनेका नारा है तो डीबी भाईने महात्मा गांधीको पढा नहीं है. महात्मा गांधीने स्वयं कहा  था कि, यदि भारतमें रहनेवाला कोई मुसलमान, देशको वफादार नहीं रहा, तो भारत  सरकार उसको गोली मारेगी.

(३) भाजपके दिलीप घोषने शाहीन बागके लोगोंको अशिक्षित कहा.

यह भी डीबीभाई को दंगा प्रेरित करनेका उच्चारण लगता है.

अरे भाई डीबी, यदि शाहीन बाग वाले बिना सोचे और बिना अन्योंकी कठीनायोंको लक्ष्यमें लिये मार्गके अवरोधक बन रहे है तो आपने संविधान ही नहीं पढा है.

क्या डीबीभाई भी यही मानते है कि शाहीन बागके प्रदर्शन वालोंका असीमित अधिकार है?

क्या आप ऐसा सोचते है कि दिलीप घोषका वक्तव्य इन लोगोंके अधिकारों पर आक्रमण है? क्या इस कारणसे इनका वक्तव्य भी मुस्लिमोंको दंगेके लिये उत्तेजित करनेवाला है?

डीबीभाई आप तो कमाल है!!

(३) डीबीभाई तो अपनेको तटस्थ मानते है, तो यह सिद्ध करनेके लिये उन्होंने वारिस पठानके कथनका भी उल्लेख किया कि शाहीन बागकी महिलाएं तो शेरनीयां है, और जब शेर आयेंगे तो इन हिन्दुओंका पसीना छूटा जायेगा.

अभी इस कथनका अर्थ डीबीभाई क्या निकालते है? डीबीभाईने इसके उपर विवरण नहीं दिया है.

किन्तु उपरोक्त कथनका संदेश यह है कि अय हिन्दु लोग, अब तो समज़ जाओ. अल्लाह बडा दयालु है.  CAA, NRC और NRP, खतम करो. नही तो कत्लेआम होगा. अल्लहका फरमान है…

(४) कपिल मिश्राने यह कहा कि मुस्लिम लोग यह चाहते है कि दिल्लीमें आग लगी रहे. इसीलिये इन मुस्लिमोंने मार्गका यातायात बंद करवा दिया, ताकि दंगेका माहोल बना रहे. हमारा कहेना है हम तो (देशकी आबरुके खातिर जब तक ट्रम्प है हम शांत है लेकिन) उसके जानेके बाद हम पोलीसकी भी नहीं सूनेंगे.

इस कथनमेंसे यह भी संदेश है कि मुस्लिम लोग, आतायात को लगातार अवरोध करके विरोधकरनेवाला प्रदर्शन न करे. हरेक प्रदर्शन की सीमा होती. देशमें महामुल्यवान  महेमान है इसलिये जनता देशहितके लिये यह सब सहन कर रही है. ऐसे असंवैधानिक प्रदर्शन यदि आप जारी रक्खेंगे तो जनता अपने स्वयंके संवैधानिक सुविधाके अधिकारकी प्राप्तिके लिये पूलीसकी अकर्तव्यताके कारण, जनता स्वयं पूलीसका कर्तव्य अपने हस्तक ले लेगी.

क्या इस संदेशकी संभावना नहीं है?

उत्तर है कि अवश्य यही संभावना है. जो लोग, नासमज़ के कारण या तो किसीके उकसानेके कारण, अन्य लोगोंको कष्ट दे रहे है, वे प्रदर्शनकारी लोग, यह बात जानते भी है. तो भी ये लोग अन्य लोगोंके कष्टको अपना शस्त्र बनाते है. इन लोगोंको उनके कर्मोंके के फलस्वरुप जो संभावनाएं है, उन संभावनाओंकी दीशामें अंगुली निर्देश करना एक सर्वोत्तम मार्ग है.

किन्तु हमारे डीबीभाई अपना दिमाग चलाना नहीं जानते ….

देशमें व्यापक दंगे करवाना और उसके लिये पूर्व निर्धारित रुपके दंगे हो सके, उसके लिये शाहीन बाग एक प्रयोग था. इस प्रयोगके हर परिबल के परिणाम पर अभ्यास करके आगामी महा कार्यकी परिकल्पनाको  (प्रोजेक्टको) अंतीम स्वरुप दे सकेंगे. इससे हमारा हेतु सिद्ध होगा. और हम कारावास जानेसे बच सकेंगे.

हमारे डीबीभाईने आगे चलकर उपरोक्त घटनाके कारणको सशक्त बनानेके लिये कुछ हिंसक घटनाओंके लिये “रमखाण” शब्द का उपयोग किया है.

उन तथा कथित दंगोंकी केवल शिर्ष रेखा ही देख लें.

१९८४ सिख विरोधी तूफानः

(तूफान को आप दंगेका का पर्यायवाची शब्द समज़ सकते है)

उसका कारण था इन्दिराका खून. और फिर डीबीभाईने आरोपीयोंका नाम दिया है. लेकिन इस घटना पर न्यायिक जांच कब प्रारंभ हुई उसके उपर मौन रक्खा है. ऐसा क्यूँ?

अरे भाई, किसका नमक किस स्वरुपमें खाया है?

१९९१ बाबरी ध्वंसः कारण बाबरी मस्जिदका ध्वंस करना.

(यहां कौन मरे, और किसने मारे उसके उपर डीबीभाईका मौन)

जो आरोपी है वे आरोपी तो ध्वंसके आरोपी है. वे तो किसीको मारडालनेवाले है ही नहीं.

२००२ गुजरातके कोमी रमखाण.

डीबीभाई के हिसाबसे इसका कारण था गोधरा रेल्वेस्टेशन पर कुछ “असामाजिक” तत्वो द्वारा कुछ डीब्बे जला दिये. कितने यात्री जला दिये उसके उपर डीबीभाईने मौन रक्खा है.

यदि आप गुजरातकी इस घटनासे ज्ञात नहीं है तो आप ऐसा ही समज़ेंगे कि कुछ असामाजिक तत्त्वोंने रेल्वेको नुकशान करनेके लिये कुछ डीब्बे जला दिये होगे.

यदि आप इस घटनासे अवगत है तो इस घटनामें मुसलमानोंने, बाल, महिला सहित ५९ हिन्दुओंको जिन्दा जला दिया था .

“असामाजिक तत्व” शब्द प्रयोग में एक अप्रच्छन्न हेतु भी है.

क्या हेतु है?…

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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कहीं भी, कुछ भी कहेनेकी सातत्यपूर्ण स्वतंत्रता – २

कहीं भी, कुछ भी कहेनेकी सातत्यपूर्ण स्वतंत्रता – २

नज़ारा ए शाहीन बाग

कोंगी लोग सोच रहे है कि अब हम मर सकते है. अब हमे अंतीम निर्णय लेना पडेगा. इसके सिवा हमारा उद्धार नहीं है. यदि हम ऐसे ही समय व्यतीत करते रहे … नरेन्द्र मोदी और बीजेपी को गालियां देतें रहें तो ये सब प्रर्याप्त नहीं है.

यह तो हमने देख ही लिया कि, जो न्यायिक प्रक्रिया चल रही है उसमें हमारी लगातार हार हो रही है.  हमारे लिये कारावासके अतिरिक्त कोई स्थान नहीं. यदि हम सब नेतागण कारावासमें गये तो कोई हमारा ऐसा नेता नहीं बचा है जो हमारे पक्षको जीवित रख सकें और हमे कारावाससे बाहर निकाल सके. हमने पीछले ७० सालमें जो सेक्युलर, जनतंत्र और भारतीय इतिहास को तो छोडो, किन्तु जो नहेरु और नहेरुवीयनोंके विषयमें जूठ सिखाया है और पढाया है, उसका पर्दा फास हो सकता है.

अब हमारे पास तीन रास्ते है.

नवजोत सिध्धु, मणीशंकर अय्यर और शशि थरुर जैसे लोग यदि भारत में काममें न आये तो वे पाकिस्तानमें तो काममें आ ही सकते है. हमारे मुस्लिम लोगोंके कई रीस्तेदार पाकिस्तानमें है. इस लिये पाकिस्तानके उन रीस्तेदारों द्वारा हम भारतके मुस्लिमोंको उकसा सकते है. बोलीवुडके कई नामी लोग हमारे पक्षमें है और वे तो दाउदके पे रोल पर है. इस लिये ये लोग भी बीजेपीके विरुद्धमें वातावरण बनानेमें काममें आ सकते है. इस परिबल को हमें उपयोगमें लाना पडेगा. अभी तक तो हमने इनका छूटपूट उपयोग किया है लेकिन यह छूटपूट उपयोगसे कुछ होने वाला नहीं हैं.    

(१) मुस्लिम जनतासे हमें कुछ बडे काम करवाना है.

(२) जिन समाचार माध्यमोंने हमारा लुण खाया है उनसे हमे किमत वसुल करना है. यह काम इतना कठिन नहीं है क्यों कि हमारे पास उनकी ब्लेक बुक है. हमने इनको हवाई जहाजमें बहूत घुमाया है … विदेशोंकी सफरोंमे शोपींग करवाया है, फाईवस्टार होटलोंमें आरामसे मजा करवाया है, जो खाना है वो खाओ, जो पीना है वह पीओ, जहां घुमना हैं वहा घुमो … इनकी कल्पनामें न आवे ऐसा मजा हमने उनको करवाया है और इसी कारण वे भी तो नरेन्द्र मोदी से नाराज है तो वैसे भी हम उनका लाभ ले सकते है. और हम देख भी रहे है कि वे बीजेपीकी छोटी छोटी माईक्रोस्कोपिक तथा कथित गलतीयोंको हवा दे रहे है जैसे की पीएम और एच एम विरोधाभाषी कथन बोल रहे है, अर्थतंत्र रसाताल गया है, अभूत पूर्व बेकारी उत्पन्न हो गयी है, जीडीपी खाईमें गीर गया है, किसान आत्म हत्या कर रहा है, देश रेपीस्तान बन गया है …. और न जाने क्या क्या …?

(३) क्या मूर्धन्य लोगोंको हम असंजसमें डाल सकते हैं? जी हाँ. यदि मुसलमान लोग अपना जोर दिखाएंगे और हला गुल्ला करेंगे तो ये लोग अवश्य इस निष्कर्स पर पहोंचेंगे कि यह सब अभी ही क्यों हो रहा है …? पहेले तो ऐसा नहीं होता था …!! कुछ तो गडबड है …!! गुजरातीमें एक कहावत है “हलकुं लोहीं हवालदारनुं” मतलब की हवालदार ही जीम्मेवार है.

शशि थरुर और राजदीप सरदेसाई के वाणी विलासको तो हम समज़ सकते है कि उनका तो एक एजन्डा है कि नरेन्द्र मोदी/बीजेपीके बारेमें अफवाहें फैलाओ और एक ॠणात्मक हवा उत्पन्न करो तो जनता बीजेपीको हटाएगी. इन लोगोंसे जनता तटस्थता की अपेक्षा नहीं रखती.

अब देखो हमारे मूर्धन्य कटारीया लोग [कटारीया = कटार (कोलम) अखबारकी कोलमोंमें लिखने वाला यानी कोलमीस्ट)] क्या लिखते है?

प्रीतीश नंदीः

“घर छोडके विकास तो भाग गया है” “बीजेपी द्वारा हररोज मुश्केलियां उत्पन्न की जाती है”, यह मुश्केलियां हिंसक भी होती है”, “आखिरमें हमने इस सरकारको वोट क्यों दिया?” “हर महत्त्वकी बातको सरकार भूला देती है” “पागलपन, बेवकुफी भरी उत्तेजना सरकार फैला रही है”, “बीजेपीने चूनावमें बडे बडे वचन दिये थे”, “बीजेपीने चूनावमें युपीएके सामने कुछ सही और कुछ काल्पनिक कौभाण्ड  उजागर करके  सत्ता हांसिल की थी,” “प्रजाकी हालत “हिरन जैसी थी” … “नरेन्द्र मोदीके आक्रमक प्रचारमें जनता फंस गई थी”, “नरेन्द्र मोदीने इस फंसी हुई जनताका पूरा फायदा उठाया” और “मनमोहन जैसे सन्मानित और विद्वान व्यक्तिको  ऐसा दिखाय मानो वे दुष्ट और भ्रष्टाचारी …” “ कारोबारीयोंका संचालन कर रहे हो” “छात्रोंके नारोंकी ताकतको कम महत्त्व नहीं देना चाहिए.”

इस प्रीतीश नंदीकी अक्लका देवालीयापन देखो. वे पाकिस्तानके झीया उल हक्कके कालका एक कवि जो झीयाके विरुद्ध था, उसकी एक कविताका  उदाहरण देते है “हम देखेंगे …”. इसका नरेन्द्र मोदीके शासनके कोई संबंध नहीं. फिर भी यह कटारीया [कटारीया = कटार (कोलम) अखबारकी कोलमोंमें लिखने वाला कोलमीस्ट)] उसको उद्धृत करते है और मोदीको भय दिखाता है कि इस कविकी इस कवितासे लाखो लोग खडे हो जाते है.

यह कटारीयाजी इस काव्यका विवरण करते है. और कहेते है कि हे नरेन्द्र मोदी तुम्हारे सामने भी लाखो लोग खडे हो जायेंगे. फिर यह कटारीयाजी ढाकाके युवानोंका उदाहरण देते है. उनका भी लंबा चौडा विवरण देते है.

क्या बेतुकी बात करते है ये कटारीया नंदी. नंदी कटारीया का अंगुली निर्देश जे.एन.यु. के युवाओंके प्रति है. नंदी कटारीया, जे.एन.यु. के किनसूत्रोंको महत्त्व देना चाहते है? क्या ये सूत्र जो अर्बन नक्षल टूकडे टूकडे गेंग वाले थे?  क्या जे.एन.यु. अर्बन नक्षल वाले ही युवा है? बाकिके क्या युवा नहीं है? अरे भाई अर्बन नक्षल वाले तो ५% ही है. और वे भी युवा है या नहीं यह संशोधनका विषय है. ये कौनसी चक्कीका आटा खाते है कि उनको चालीस साल तक डॉक्टरेट की डीग्री नहीं मिल पाती? जरा इसका भी तो जीक्र करो, कटारीयाजी!!! 

नंदी कटारीयाजीका पूरा लेख ऐसे ही लुज़ टोकींगसे भरा हुआ है. तर्ककी बात तो अलग ही रही, लेकिन इनके लेखमें किसी भी प्रकारका मटीरीयल भी आपको मिलेगा नहीं.

यदि सही ढंगसे सोचा जाय तो प्रीतीश नंदीके इस लेखमें केवल और केवल वाणी विलास है. अंग्रेजीमें इनको “लुज़ टोकींग”कहा जाता है. कोंगी नेतागण लुज़ टॉकींग करे, इस बातको तो हम समज़ सकते है क्यों कि उनकी तो यह वंशीय आदत है.

शेखर गुप्ता (कटारीया)

शेखर गुप्ता क्या लिखते है?

मोदीने किसी प्रदर्शनकारीयोंके जुथको देखके ऐसा कहा कि “उनके पहेनावासे ही पता लग जाता है कि वे कौन है?”

यदि कोई मूँह ढकके सूत्र बाजी या तो पत्थर बाजी करता है तो;

एक निष्कर्ष तो यह है कि वह अपनी पहेचान छीपाना चाहता है, इससे यह भी फलित होता है कि वह व्यक्ति जो कर रहा है वह काम अच्छा नहीं है किन्तु बूरा काम कर रहा है.

दुसरा निष्कर्ष यह निकलता है कि वह अपराधवाला काम कर रहा है. अपराध करनेवालेको सज़ा मिल सकती है. वह व्यक्ति सज़ासे बचनेके लिये मूँह छीपाता है.

तीसरा निष्कर्ष में पहनावा है.  पहनावेमें तो पायजामा और कूर्ता आम तौर पर होता ही है. यह तो आम जनता या कोई भी अपनेको आम दिखानेके लिये पहेनेगा ही.

लेकिन हमारे शे.गु.ने यह निष्कर्ष  निकाला की नरेन्द्र मोदीने मुस्लिमोंके प्रति अंगूली निर्देश किया है. इस लिये मोदी कोम वादी है और मोदी कोमवादको बढावा देता है. शे.गु. कटारीयाका ऐसा संदेश जाता है.

शे.गु.जी ऐसा तारतम्य निकालनेके लिये, अरुंधती रोय और माओवादी जुथके बीचके डीलका उदाहरण देते है. गांधीवाद और माओवाद का समन्वय किस खूबीसे अरुंधती रोय ने किया है कि शे.गु.जी आफ्रिन हो गये. शे.गु.जी कहेते है कि, क्यूं कि प्रदर्शनकारी पवित्र मस्जिदमेंसे आ रहे है, क्यूँ कि उनके हाथमें त्रीरंगा है, क्यूँ कि वे राष्ट्रगान गा रहे है, क्यूँ कि उनके पास महात्मा गांधीकी फोटो है, क्यूं कि उनके पास आंबेडकर की फोटो है … आदि आदि .. शे.गु. जी यह संदेश भी देना चाहते है कि ये बीजेपी सरकार लोग चाहे कितनी ही बहुमतिसे निर्वाचित सरकार क्यूँ न हो इन (मुस्लिमों)के प्रदर्शनकी उपेक्षा नहीं करना चाहिये.

वास्तवमें शे.गु.जीको धैर्य रखना चाहिये. रा.गा.की तरह, बिना धैर्य रक्खे, शिघ्र ही कुछ भी बोल देना, या तो बालीशता है या तो पूर्वनियोजित एजन्डा है. तीसरा कोई विकल्प शे.गु. कटारीयाके लिये हो ही नहीं सकता.

शे.गु.जी ने आगे चलकर भी वाणी विलास ही किया है.

चेतन भगतः

चेतन भगत भी एक कटारीया है. वे लिखते है कि

“उदार मानसिकतासे ही विकास शक्य है.”

“हम चोकिदार कम और भागीदार अधिक बनें, इससे देश शानदार बनेगा”

श्रीमान चे.भ. जी (चेतन भगत जी), भी एक बावाजी ही है क्या? बावाजी से मतलब है संत रजनीश मल, ओशो आसाराम. बावाजी है तो उदाहरण तो देना ही आवश्यक बनता है न!! वे अपने बाल्यावस्थाका उदाहरण देते है. वे फ्रीज़ और नौकरानीका और बील गेट्सका उदाहरण देते है. परोक्ष में “चे.भ.”जी मोदीजी की मानसिकता अन्यों के प्रति अविश्वासका भाव है. फिर उन्होंने कह दिया कि, नरेन्द्र मोदीने कुछ नियम ऐसे बनाये कि लोग भारतमें निवेश करने से डरते है. कौनसे नियम? इस पर चे.भ.जी मौन है. शायद उनको भी पता नहीं होगा.

चे.भ.जी अपनी कपोल कल्पित तारतम्य को स्वयं सिद्ध मानकर मोदीकी बुराई करते है.

“मुस्लिमोके विरुद्ध हिन्दुओंमें गुस्सा है. इसका कारण हिन्दुओंकी संकुचित मानसिकता है.

“अप्रवासीयोंपर हुए हमले भी हिन्दुओंकी संकुचित मानसिकता कारण भूत है,

“मुस्लिमोंको बहुत कुछ दे दिया है, अब वह वापस ले लेना चाहिये,

“मुस्लिमोंका बहुत तुष्टीकरण किया है अब उनको लूट लेना चाहिये

चे.भ.जी इस बातको समज़ना नहीं चाहते कि, किसी भी जनसमुदायमें कुछ लोग तो कट्टर विचारधारा वाले होते ही है. लेकिन किस समुदायमें इस कट्टरतावादी लोगोंका प्रमाण क्या है? इतनी विवेकशीलता तो मूर्धन्य कटारीयाओंमें होना आवश्यक है. लेकिन इन कटारीयाओंमे विवेक हीनता है. तुलनात्मक विश्लेषणके लिये ये कटारीया लोग अक्षम ही नहीं अशक्त है. वे समज़ते है “… वाह हमने क्या सुहाना शब्द प्रयोग किया है. फिलोसोफिकल वाक्य बोलो तो हमारी सत्यता अपने आप सिद्ध हो जाती है…”चे.भ.जी जैसे लोगोंको तुलनात्मक सत्य दिखायी ही नहीं देता है.

कोंगी और उनके सांस्कृतिक साथी

कोंगी और उनके सांस्कृतिक साथी पक्षोंके शिर्ष नेताओंके उच्चारणोंको देख लो. “चोकिदार चोर है, नरेन्द्र मोदी नीच है, नरेन्द्र मोदीको डंडा मारो, नरेन्द्र मोदी फासीस्ट है, नरेन्द्र मोदी हीटलर है, नरेन्द्र मोदी खूनी है, बीजेपी वाले आर.एस.एस.वादी है, वे गोडसे है…” न जाने क्या क्या बोलते है. पक्षके प्रमुख और मंत्री रह चूके और सरकारी  पद पर रहेते हुए भी उन्होंने ऐसे उच्चारण किये है. लेकिन ये उपरोक्त मूर्धन्य कटारीया लोग इन उच्चारणों पर मौन धारण करते है. उनका जीक्र तक नहीं करतें.

आखिर ऐसा क्यूँ वे लोग ऐसा करते हैं?

यदि बीजेपीके या तो आर.एस.एस.के तृतीय कक्षाके लोग उपरोक्त उच्चारणोसे कम भी बोले तो ये लोग बडे बडे निष्कर्ष निकालते है. अपना कोरसगान (सहगान) चालु कर देते हैं.     

अपराध कब सिद्ध होता है?

“आप अपनी धारणाओंके आधार पर किसीको दोषी करार न ही दे सकते. न्यायिक प्रक्रियाके सिद्धांतोसे यह विपरित है. किसीको भी दोषी दिखानेके लिये आप अपनी मनमानी और धारणाओंका उपयोग नहीं कर सकते. किन्तु महान नंदीजी, शे.गु.जी, चे.भ. जी … आदि क्यूँ कि उनका एजन्डा कुछ और ही है, वे ऐसा कर सकते है. कोंगी लोग यही तो चाहते है.

इन कटारीया लोगोंको वास्तवमें पेटमें दुखता है क्या?

वास्तवमें कोंगी लोग और उनके सहयोगी लोग समज़ गये है कि,

नरेन्द्र मोदी, और भी समस्याएं हल कर सकता है. वैसे तो, जी.एस.टी. तो हमारा ही प्रस्ताव था, “विमुद्रीकरण करना” इस बातको तो हम भी सोच रहे थे, पाकिस्तानमें अल्पसंख्यकों की सुरक्षा हो और वे पीडित होके भारतमें आवे तो, हमे उनको नागरिकता देनी है, यह बात भी हमारे नहेरु-लियाकत अली समज़ौताका हिस्सा था, १९७१के युद्धसे संबंधित जो शरणार्थी प्रताडित होकर भारतमें आये उनमें जो पाकिस्तानके अल्पसंख्यक थे उनको नागरिकता देना, और बांग्लादेशके आये बिहारी मुस्लिमोंको वापस भेजना यह तो हमारे पक्षके प्रधान मंत्रीयोंका शपथ था.  किन्तु हममें उतनी हिंमत और प्रज्ञा ही नहीं थी कि हम अपने शपथोंको पुरा करे. मोदीके विमुद्रीकरण और जी.एस.टी.के निर्णयोंको तो हमने विवादास्पद बनाके विरोध किया और जूठ लगातार फैलाते रहे. बीजेपी के हर कदमका हम विरोध करेंगे चाहे वह मुद्दे हमारे शासनसे संलग्न क्यूँ न हो?

कोंगी और उनके साथी लोगोंको अनुभूति हो गई है कि, “अब तो मोदीने उन समस्याओंको हाथ पे ले लिया है जो हमने दशकों और पीढीयों तक अनिर्णित रक्खी”.

कोंगीने उनके सांस्कृतक साथी पक्षके नेतागणको आत्मसात्‌ करवा दिया है कि “मोदी सब कुछ कर सकता है. अब तक हम उसको हलकेमें ले रहे थे. किन्तु मोदी आतंकी गतिविधियोंको अंकूशमें रख सकने के अतिरिक्त और सर्जीकल स्ट्राईकके अतिरिक्त, अनुछेद ३७० और ३५ऍ तकको खतम कर सकता है. वह जम्मु – कश्मिर राज्यश्रेणी भी बदल सकता है. हमे खुलकर ही मुस्लिम नेताओंको और मुस्लिमोंको अधिकसे अधिक बहेकाना पडेगा.”

कोंगीके सांस्कृतिक साथी कौन कौन है?

कोंगी पक्ष कैसा है?

कोंगी वंशवादी है, वंशवादको स्थायी रखने के लिये अवैध मार्गोंसे संपत्तिकी प्राप्त करना पडता है, शठता करनी पडती है,

सातत्यसे जूठ बोलना पडता है,

असामाजिक तत्त्वोंको हाथ पर रखना पडता,

दुश्मनके दुश्मनको मित्र बनाना पडता है,

जनताको मतिभ्रष्ट और पथ भ्रष्ट करना पडता. और कई समस्याओंको अनिर्णायक स्थितिमें रखना पडता है चाहे ये अनिर्णायकता देशके लिये और आम जनताकाके लिये कितनी भी हानिकारक क्यूँ न हो!!

अनीतिमत्ता वंशवादका एक आनुषंगिक उत्पादन है.

कोंगी जैसा सांस्कृतिक चरित्र और किनका है?

 ममताका TMC, शरदका NCP, लालुका RJD, बाल ठकरे का Siv Sena, मुल्लायमका SP, शेख अब्दुल्लाके फरजंद फारुक अब्दुल्लाका N.C. और सबसे नाता जोडने और तोडने वाले साम्यवादी. अब हम इन सभी पक्षोंके समूह को कोंगी ही कहेंगे. क्योंकि इन सभीका काम येन केन प्रकारेण, बिना साधन शुद्धिसे, बिना देशके हितकी परवाह किये नरेन्द्र मोदी/बीजेपी को फिलहाल को बदनाम करो.

संवाद मत करो और तर्कयुक्त चर्चा मत करो केवल शोर मचाओ

संवाद करेंगे तो सामनेवाला तर्क करेगा. इस लिये संवाद मत करो, बार बार जूठ बोलो, असंबद्ध उदाहरण दो, सब नेता सहगान करो.

कहो… मोदी चोर है. अपने अनपढ श्रोताओंसे सूत्रोच्चार करवाओ मोदी चोर है. मोदीको चोरे सिद्ध करनेके लिये सबूत सामग्री की आवश्यकता नहीं.

मोदी हीटलर है.  सिद्ध करनेके लिये सबूत सामग्री की आवश्यकता नहीं.

मोदी खूनी है… सिद्ध करनेके लिये सबूत सामग्री की आवश्यकता नहीं.

बीजेपी लोग गोडसे है. चाहे गोडसे आर.एस.एस. का सदस्य न भी हो तो भी. हमें क्या फर्क पडता है!!!  सिद्ध करनेके लिये सामग्री की आवश्यकता नहीं.

विमूद्रीकरणमें मोदीने सेंकडो लोगोंको लाईनमें खडा करके मार दिया. बोलनेमें क्या हर्ज है? (वचनेषु किं दरिद्रता?). सिद्ध करनेके लिये सामग्री की आवश्यकता नहीं.

जी.एस.टी. गब्बर सींग टेक्ष है. (चाहे वह हमारा ही प्रस्ताव क्यों न हो. किन्तु हममें उतना नैपूण्य कहाँ कि हम उसको लागु करें). यह सब चर्चा करना कहाँ आवश्यक है? सिद्ध करनेके लिये सबूत सामग्री की आवश्यकता नहीं.

“भारतीय संविधान”को हमारे पक्षमें घसीटो, “मानव अधिकार और फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन” को भी हमारे पक्षमें घसीटो, रास्ता रोको, लगातार रास्ता रोको, आग लगाओ, फतवे निकालो, जनताको हो सके उतनी असुविधाओंमें डालो, कुछ भी करो और सब कुछ करो … मेसेज केवल यह देना है कि यह सब मोदीके कारण हो रहा है.

यदि इतना जूठ बोलते है तो “महात्मा गांधी”को भी हमारे पक्षमें घसीटो. गांधीजीका नाम लेके यह सब कुछ करो.

कोंगीयों द्वारा गांधीका एकबार और खून

कोंगीओंको, उनके सांस्कृतिक साथीयों और समाचार माध्यमोंके मालिकोंको भी छोडो, भारतमें विडंबना यह है कि अब मूर्धन्य कटारीया लोग भी ऐसा समज़ने लगे है कि अहिंसक विरोध और महात्मा गांधीके सिद्धांतों द्वारा विरोध ये दोनों समानार्थी है.

महात्मा गांधीके अनुसार विरोध कैसे किया जाता है?

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

https://www.treenetram.wordpress.com 

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