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Posts Tagged ‘मानसिकता’

why we write

with a curtsy to the cartoonists

हमे परिवर्तन नहीं चाहिये. “जैसे थे” वाली ही परिस्थिति रक्खो” मूर्धन्याः उचुः

(मूर्धन्याः उचुः = विद्वान लोगोंने बोला)

परिवर्तन क्या है? और “जैसे थे” वाली परिस्थिति से क्या अर्थ है?

नरेन्द्र मोदी स्वयं परिवर्तन लाना चाहता है. यह बात तो सिद्ध है क्यों कि उसने जिन क्षेत्रोमें परिवर्तन लानेका संकल्प किया है उनके अनुसंधानमें उसने कई सारे काम किये है.

परिवर्तन क्या है. परिवर्तन तो प्रकृति भी करती है.

वास्तवमें परिवर्तनमें शिघ्रताकी आवश्यकता है. क्यों कि शिघ्रताके अभावमें जो परिवर्तन होता है उसको परिवर्तन नहीं कहा जाता. शिघ्रतासे हुए परिवर्तनको क्रांति भी बोलते है.

“होती है चलती है… पहले अपना हिस्सा सुनिश्चित करो …“

ऐसी मानसिकता रखके जो परिवर्तन होता है उसमें विलंबसे होता है और विलंबसे अनेक समस्या उत्पन्न होती है. वे समस्या प्राकृतिक भी होती है और मानव सर्जित भी होती है. और अति विलंबको परिवर्तन कहा ही नहीं जा सकता. वैसे तो प्रकृति स्वयं परिवर्तन करती है. ऐसे परिवर्तनसे ही मानव, पेडसे उतरकर कर भूमि पर आया था. पेडसे भूमि की यात्रा एक जनरेशन में नहीं होती है.  इस प्रकार अति विलंबसे होने वाले परिवर्तन को उत्क्रांति (ईवोल्युशन) कहा जाता है.

कोंगीयोंने भी परिवर्तन किया है. किन्तु उनका परिवर्तन उत्क्रांति (ईवोल्युशन) जैसा है.

(ईवोल्युशनमे कभी प्रजातियाँ या तत्त्व नष्ट भी हो जाते है.)

उदाहरण के लिये तो कई परिकल्पनाएं है (केवल गुजरातका ही हाल देखें).

(१) जैसे कि नर्मदा योजना (योजनाकी कल्पना वर्ष १९३६. योजनाका निर्धारित समाप्तिकाल २० वर्ष. वास्तविक निर्धारित समाप्ति वर्ष २०२२).

(२) मीटर गेज, नेरो गेज का ब्रोड गेजमें परिवर्तन (परिकल्पना की कल्पना १९५२)

वास्तविकताः महुवा-भावनगर नेरोगेज उखाड दिया, डूंगर – पोर्ट विक्टर उखाड दिया, राजुला रोड राजुला उखाड दिया, गोधरा- लुणावाडा उखाड दिया, चांपानेर रोड पावागढ उखाड दिया, मोटा दहिसरा – नवलखी उखाड दिया, जामनगर (कानालुस)  – सिक्का उखाड दिया. अब यह पता नहीं कि ये सब रेल्वे लाईन ब्रॉडगेजमें कब परिवर्तित होगी.

भावनगर-तारापुर, मशीन टुल्सका कारखाना ये कल्पना तो गत शतकके पंचम दशक की है. जिसमे स्लीपरका टेन्डर भी निकाला है ऐसे समाचार चूनावके समय पर समाचार पत्रोंमे आया था. दोनों इल्ले इल्ले. ममताके रेल मंत्री दिनेश त्रीवेदीने गत दशकमें रेल्वेबजटमें उल्लेख किया था. किन्तु बादमें इल्ले इल्ले.

परिवर्तनके क्षेत्र?

नरेन्द्र मोदीकी सरकारने काम हाथ पर तो लिया है, लेकिन कोंगीके शासकोंने जो ७० वर्षका विलंब किया है वह अक्षम्य है.

चीन १९४९में नया शासन बना. १४ वर्षमें वह भारत देश जैसे बडे देशको हरा सकनेमें सक्षम हो गया. आप कहोगे कि वहां तो सरमुखत्यारी (साम्यवादी) शासान था. वहां जनताके अभिप्रायोंकी गणना नहीं हो सकती. इसलिये वहां सबकुछ हो सकता है.

अरे भाई सुरक्षासे बढकर बडा कोई काम नहीं हो सकता. सुरक्षाका काम भी विकासका काम ही है. विकासके कामोंमे कभी भारतकी जनताने उस समय तो कोई विरोध करती नहीं थी. आज जरुर विकासके कामोंमें जनता टांग अडाती है. लेकिन इसमें सरकारी (कर्मचारीयोंका) भ्रष्टाचार और विपक्षकी सियासत अधिक है. ये सब कोंगीकी देन है. विकासके कामोसे ही रोजगार उत्पन्न होता है.   

मूलभूत संरचना का क्षेत्रः

इसमें मार्ग, यातायात संसाधन, जलसंसाधन,   विद्युत उत्पादन, उद्योग (ग्रामोद्योग भी इनमें समाविष्ट है). नरेन्द्र मोदीने इसमें काफि शिघ्रगतिसे काम किया है. इसके विवरणकी आवश्यकता नहीं है.

उत्पादन क्षेत्रः उद्योगोंके लिये भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया, यातायातकी सुविधा, विद्युतकी सुविधा, जल सुविधा और मानवीय कुशलता आवश्यक है.

कोंगीको तो मानव संसाधनके विषयमें खास ज्ञान ही नहीं था. उसने तो ब्रीटीश शिक्षा प्रणाली के अनुसार ही आगे बढना सोचा था. पीढीयोंकी पीढीयों तक जनताको निरक्षर रखा था. समय बरबाद किया.

नरेन्द्र मोदीने गुजरातमें प्राथमिक शिक्षा अनिवार्य किया था. स्कील डेवेलोप्मेन्टकी संस्थाएं खोली. बेटी बचाओ, बेटी बढाओ अभियान छेडा.

न्याय का क्षेत्रः

कोंगीने तो न्यायिक प्रक्रीया ही इतनी जटील कर दी कि सामान्य स्थितिका आदमी न्याय पा ही न सके. नरेन्द्र मोदीने कई सारे (१५००) नियमोंको रद कर दिया है. इसमें और सुधार की आवश्यकता है.

शासन क्षेत्रः

भारतमें कोंगीका शासन एक ऐसा शासन था कि जिसमें साम्यवाद, परिवारवाद, सरमुखत्यार शाही और जनतंत्रका मिलावट थी. इससे हर वादकी हानि कारक तत्व भारतको मिले. और हर वादके लाभ कारक तत्त्व कोंगीके संबंधीयोंको मिले.

सामाजिक क्षेत्रः

कोंगीने   जाति, धर्म, क्षेत्र, भाषा, आर्थिक स्थिति … आदिके आधार पर विभाजन कायम रक्खा. उतना ही नहीं उसको और गहरा किया. समाजको विभाजित करने वाले तत्त्वोंको महत्त्व दिया. लोगोंकी नैतिक मानसिकता तो इतनी कमजोर कर दी की सामान्य आदमी स्वकेन्द्री बन गया. उसके लिये देशका हित और देशका चारित्र्य का अस्तित्व रहा ही नहीं. आम जनताको गलत इतिहास पढाया और उसीके आधार पर देशकी जनताको और विभाजित किया.

कोंगीने यदि सबसे बडा राष्ट्रीय अपराध किया है तो वह है मूर्धन्योंकी मानसिकताका विनीपात.

मूर्धन्य कौन है?

वैसे तो हमे गुजरातीयोंको प्राथमिक विद्यालयमें पढाया गया था कि जिनका साहित्यमें योगदान होता है वे मूर्धन्य है. अर्वाचीन गुजरातके सभी लेखक गण मूर्धन्य है.

माध्यमिक विद्यालयमें पढाया गया कि जो भी लिखावट है वह साहित्यका हिस्सा है.

हमारे जयेन्द्र भाई त्रीवेदी जो हिन्दीके अध्यापक थे उन्होंने कहा कि जो समाजको प्रतिबिंबित करके बुद्धियुक्त लिखता है  वह मूर्धन्य है. तो इसमें सांप्रत विषयोंके लेखक, विवेचक, विश्लेषक, अन्वेषक, चिंतक, सुचारु संपादक, व्याख्याता … सब लोग मूर्धन्य है….

कोंगीने मूर्धन्योंका ऐसा विनीपात करने में क्या भूमिका अदा की है?

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

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किसी भी नगरको/ग्रामको/विस्तारको बदसूरत और गंदा कैसे किया जाय … 

गत ब्लोगमें हमने गोदरेज गार्डन सीटीकी व्यवस्थाका संक्षेपमें विवरण किया था. और यह प्रश्न चिन्ह लगाया था कि क्या गोदरेज गार्डन सीटी गंदा और अराजकता वाला विस्तार बनने के काबिल है?

हम कुछ गीने चूने परिबलोंका विवरण करेंगे.

किसी भी विस्तारको बदसूरत करनेमें और अराजकतायुक्त करनेमें प्रजाकी मानसिकता भी प्रभावशाली होती है. यदि नियम (बाय लॉज़ – कानून) बनानेमें उसकी उपेक्षा की तो “विस्तार”में अराजकता फैल सकती है. अराजकताकी शक्यताकी हम बादमें चर्चा करेंगे.

विस्तारको बदसूरत करने वाले परिबल, आकृति (डीज़ाईन)बनावटकी गुणवत्ताका चयन (स्पेसीफीकेशन)  और  कामकी कुशलता का मिश्रण है. यदि आकृति ठीक नहीं है तो क्षतिग्रस्त होनेकी क्षमता अधिक होती है. यदि आकृति सहीं हैकिंतु गुणवत्ता कनिष्ठ प्रकारकी है तो भी उसकी क्षतिग्रस्त होने की शक्यता अधिक है. यदि ये दोनों सही है लेकिन कामकी कुशलता (पुअर वर्कमेनशीप) यथा योग्य नहीं है तो भी वह निर्माण क्षतिग्रस्त हो सकता है.

निर्माण परिपूर्ण होनेके बाद ऐसे प्रकारके निर्माणके, रखरखाव में अधिक खर्च आता है. दुरस्त करने की गतिक्षतिग्रस्त होनेकी गति से कम है तो भी निर्माण गंदा बदसूरत हो सकता है.

एक बात ध्यानमें रखना चहिये कि हम जो उदाहरण लेते हैं वह आज तो छूटपूटकी घटनाए हैं. लेकिन यदि रखरखाव शिघ्राति  शिघ्र नहीं किया गया तो क्षतिग्रस्त विस्तारकी घटनाओं वाले स्थल, बढते जायेंगे और अंतमें विस्तार बदसूरत दिखेगा.

यातायात मार्गकी चौडाईः  आंतरिक मार्गकी चौडाई, आज तो जो दो लेन (१+१=२) वाली है वह सही लगती हैलेकिन भविष्यमे पांच सालके बाद) याता यातकी समस्या हो सकती है. मुख्य मार्ग जो चार लेनका (२+२=४) है उसके विषयमें भी ऐसा कहा जा सकता है.

08 good main road

आंतरिक मार्गोंकी और मुख्य्त मार्गोंकी  आकृतिसूचित गुणवत्ता और निर्माणकी गुणवत्ता सही है.

09 good internal street road

सायकल मार्ग (द्विचक्र वाहन यातायात) भी सही ही है.

किंतु पदयात्रीयोंके लिये जो मार्ग है उसकी आकृति और निर्माणकी गुणवत्ता सही नहीं है.

पेड पौधेंकी जो भूमि है वह नीची है और फुटपाथके दाहिने बाजु का स्तर उंचा हैऔर निर्माणकी वर्कमेनशीप पुअर होने से फुटपाथके किनारे के पत्थर निकल जाते है. यदि इनको शिघ्राति शिघ्र रीपेर किया जाय और किनारे वाले पेडपौधोंकी भूमि उंची कि जाय तो फुटपाथको क्षतिग्रस्त बनने की घटनाओंको रोका जा सकता है.

01 can break at any time

क़ोंट्राक्टरोंका अपना काम होनेके बाद सबस्टांडर्ड रीसरफेसींग वर्क.

05 gas agency does not reinstate properly

जैसे कि गेस एजंसी जब अपना लाईन बीठाती है तो जो खोदाई होती है उनको ढंगसे री-सरफेसींगका काम नहीं करती है. ईनमें गोदरेज प्रोपर्टीज़ की तरफसे शायद नीगरानी नहीं रक्खी गई है. तो इनकी क्षतिग्रस्त स्थलोंकी छूटपूट घटनाएं मिलती है.

मानवीय असभ्यताः
06 why to walk on footpath

रहेनेवालोंको भी नियमका पालन करना चाहिये. लेकिन यदि गोदरेज प्रोपर्टीज़वाले उनको दंडित नहीं करेंगे तो उनकी आदतमें सुधार लाना असंभव है.

 

यदि फुटपाथ है तो निवासीयोंको फुटपाथ पर चलने की आदत डलनी चाहिय

स्वच्छता पर आघात

पशुओंके प्रति दया भावना का प्रदर्शन करना भारतीयोंकी आदत है. इस आदतके गुणदोषमें  पडें परंतु यह दयाभावना के कारण गंदकी फैलानी नहीं चाहिये.

07 we want to feed animals at the cost of cleanliness

स्वच्छताके उपकरण और स्वच्छता कर्मचारीयोंकी नासमज़ः

सफाई कामदारोंकी समज़ है कि उनको केवल पेडपौधोंके पत्तेकागज़के टूकडे,प्लास्टिक बेग्ज़ और उसके टूकडे … आदि ही को कचरा समज़ना है. कुत्तोंकी वीष्टागाय भेंसका गोबर आदि को उठाना सफाईके अंतर्गत नहीं आता है. इसके कारण जब वे सुखकर मीट्टी बनजाता है तब वह हवामें उड जाता है.  वैसे तो गायभैंस कम दिखाई देते है इसलिये ऐसी घटनाएं  छूट पूट मिलतीं हैकिंतु भविष्यमें इनमें वृद्धि हो सकती है.

गोदरेज प्रोपर्टीज़का काम व्यापारी और निवासी आवास पैदा करना है  कि अवैध व्यवसाय दिलाना

गोदरेज गार्डन सीटी में कोमर्सीयल केंद्र है. सीटी सेंटरमें कई सारी सुयोग्य तरिकेसे निर्मित दुकाने हैं. इसका निर्माण परिपूर्ण नहीं हुआ होगा.

लेकिन हमारे कुछ व्यवसायी लोगोंको मुफ्त मे व्यवसाय करने की जगह चाहिये. इसकी दो वजह है. एकः यह कि पुलीस या तो सुरक्षा कर्मीको खुश रखना और मुफ्तमें जगहका व्यवसायके लिये उपयोग करना.

हाथ लारी” एक ऐसा ही व्यवसाय है. जिसमें व्यक्ति एक हाथ-लॉरीमें सब्जी-तरकारी फैलाके ग्राहकोंकी प्रतिक्षा करता है. और ग्राहक भी उसकी लॉरीमेंसे सब्ज़ी तरकारी खरीदता है.

प्रारंभमें एक हाथलॉरीवाला, एक हाथलॉरीमे सब्ज़ी लगाके एक मार्गकी फुटपाथ पर पार्ट टाईम खडा रहेता है.

फिर वह अपना खडा रहनेकी समय मर्यादा बढाता रहेता है.

05 hand lorry with spreaded material

फिर वह एक लॉरीमें तीन लॉरीका सामान लाता है. वह सामान फुटपाथ पर फैला देता है. फिर वह और किसमका भी सामान लाता हैजैसे कि नारीयलवॉटरमेलनकेले … आदि.

ऐसा करनेके समयके अंतर्गत उसकी सुरक्षा दलो सें पुख्ता दोस्ती हो जाती है. शायद उपरी स्तरके कर्मचारी/अधिकारीगणके साथ भी परोक्ष प्रत्यक्ष संबंध प्रस्थापित हो जाते है.

तो एक दुसरा हाथ लॉरीवाला भी पैदा हो जाता है. उसका  भी ऐसे ही इतिहासका पुनरावर्तन होता है. 

05b one more larywala

फिर तो क्या कहेनाबलुन वाला आता हैखिलौना वाला आता हैगन्नेका रसवाला  जाता है. फुलवाला आता हैमोची आता हैपंक्चर रीपेरर आता है… ऐसे फुटपाथ पर अतिक्रमण बढता ही रहता है.

इसकालके अंतर्गत कई कर्मचारीगण/अधिकारीगणका तबादला होता रहेता है इस लिये किसीकी जीम्मेवारी फिक्स करना उच्चस्तरीय अधिकारीगण योग्य समज़ते नहीं है.

इस प्रकार समयांतर कालके अंतर्गत अराजकता फैल जाती है. गोदरेज गार्डन सीटीमें अराजकता के बीज बोये है. आज जो छूटपूट घटना है और जिसको निवारा जा सकता हैयदि गोदरेज गार्डन सीटीके अधिकारीयोंकी मानसिकता यही रही तो पांच सालमें अराजकता फैल सकती है.

अग्निशामक तकनिकी सुविधाएं और उसके नियमके अंतर्गत प्रावधान

अग्निप्रतिरोधक उपकरण, अग्निशामक व्यवस्थाएं और आपातकालिन व्यवस्था रखना आदिके बडे कठिन नियम है. उसमें एक नियम है बहु मंज़िला इमारतमें आपातकालमें निवासीयोंको निश्चित जगहसे उठानेका. इस जगहको फायर रेफ्युज खंड (फायर रेस्क्यु रुम) कहेते है. निश्चित मंज़िल पर दो ऐसे खंड आमने सामनेकी दिशामें छोर पर रक्खे जाते है. दो इस लिये कि यदि एक छोरका खंड आगके कारण उस आगकी दिशामें उपलब्ध नहीं होता है तो तो दुसरा छोरवाला खंड काममें  जाता है. निवासीयोंको वहां इकठ्ठा करके क्रॅनकी मददसे बचाया जा सकता है. फायर रेस्क्यु खंड एक स्वतंत्र खंड होता है. उसमें  तो कोई निवासी अपना सामान रख सकता है  तो उसका नीजी उपयोग कर सकता है. इस खंडको बंद करना निषेध है. इस खंडमें प्रवेश होता है पर द्वार नहीं रखा जा सकता. उसी प्रकार उसमें गेलेरी होती है उसमें उसको बंद करनेकी खीडाकीयां नहीं होती. ता कि आपात कालमें आसानीसे निवासीयोंको निकाले जा सके.

लेकिन यहां गोदरेज गार्डन सीटीके बहुमंज़िला इमारतोमें इसका अक्षरसः पालन नहीं किया गया. दोमेंसे एक फायर रेस्क्यु खंडको करीबी निवासीको ऐसे ही व्यक्तिगत उपयोगकी सुविधा दे दी गई है.

01 fire rescue room02 break open wall of Fire rescue room

04 fire rescue room exclisive use

नियम के अनुसार फायर रेस्क्यु खंड को कोई निवासी अपने अंगत स्वार्थ के लिये उपयोगमें ले नहीं सकता. किंतु गोदरेज गार्डन सीटीके अधिकारीयोंने फायर रेस्क्यु खंडमें विशेष वीज सुविधा भी उपलब्ध करवायी है. फायर रेस्क्यु खंडमें वीज सुविधा होती है. और उसमें एक लेंप होल्डरका प्रावधान होता है. सामान्य परिस्थितियोंमे इस लेंप होल्डरमें लेंप    लगाना होता है ताकि असामान्य परिस्थितिमें लेंपका अन्वेशण करना न पडे. रेस्क्यु खंड दो होते है. एक मुख्य और एक विकल्पके लिये अतिरिक्त (स्टेंड बाय). कौन मुख्य और कौन विकल्प केलिये अतिरिक्त यह कोई नामाभिधानका विषय नहीं है. दोनों ही एकदुसरेके परिपेक्ष्यमें विकल्पीय है. जैसे की दो स्टेर केस होते है  तो एक यदि आग की घटनामें उपलब्ध नहीं है तो दुसरा जो सामने के छोर पर है वह उपलब्ध होता ही है. तो यहां गोदरेज गार्डन सीटीमें क्या हुआ कि निवासीको फेसीलीटेट करने के लिये उसके पासवाले रेस्क्यु खंडमे तो दिवारको तोडके प्रवेश द्वार तो लगवाही दिया पर उसके लिये फायर रेस्क्यु खंडमें लेंप भी लगवा दिया और ट्युबलाईटभी लगवा दिया. अब फायर रेस्क्यु खंडकी बीजलीका कंट्रोल किसके पास है और उसका विद्युत का बील किसको आता है यह संशोधन का विषय है.

भारतमें और खास करके उत्तरभारतीयोंकी (खास करके राजस्थान, पंजाब, यु.पी, बिहार और गुजराती भी कम नहीं) आदत है कि गैरकानूनी तरीके से उपलब्ध जगहोंका उपयोग करना. और अधिकारीगण/कर्मचारीगण भी वैसे ही चरित्रवाले होनेसे अवैध तरीकेसे आंखे बंद कर देते है.

इसका समाधान क्या है?

कौटिल्यने कहा है कि, आमजनता तो “दंड” से ही सावधान रहेती है. 

“गोदरेज गार्डन सीटी”में और क्या करने कि आवश्यकता है?

गोदरेज गार्डन सीटी बडी आसानीसे स्मार्ट सीटी विस्तार बन सकता है. अभी तो यह विकसित हो ही रहा है तो इसमें अभीसे जनताको सुव्यवस्थित और सुसंस्कृत की जा सकती है.

(१) प्रत्येक मार्ग पर जैसे कि मुख्य मार्ग पर गति-सीमा ४० कि. आंतरिक मार्ग पर १५ कि. और क्लस्टरके अंदर ५/१० कि. की सीमा रक्खी जा सकती है. गतिसीमा के सूचना बॉर्ड रखना चाहिये.

(२) प्रत्येक प्रवेशद्वार के पास सीसीटीवी केमेराका प्रबंध किया जाना चहिये.

(३) प्रत्येक क्लस्टरमें सदस्यके लिये स्मार्टकार्डसे प्रवेश किया जा सकता है,

(४) प्रत्येक बिल्डींगमे प्रत्येक स्तर (फ्लोर) पर भी सीसीटीवी केमेरा का प्रबंध होना चाहिये. सुरक्षा कर्मचारी निवासीसे बात करके सुनिश्चित करेगा कि आगंतुक को प्रवेश देना है या नहीं, यदि निवासीने अनुमति दी, तो वह आगंतुक वहीं पर ही गया या कहीं और गया.

(५) प्रत्येक मार्ग पर भी सीसीटीवी केमेरा का प्रावधान किया जाना चाहिये ताकि सभी कोई सज्जनता पूर्वकका व्यवहार करें और यातायातके नियमोंका भंग करनेसे बचे.

(६) सीसीटीवी केमेरासे अतिक्रमण पर कडा निरीक्षण रखा जा सकता है.

कर्मचारीको नियमपालनके लिये प्रतिबद्ध होना चाहिये. यदि ऐसा नहीं हुआ तो समज़ लो 

अराजकताका आरंभ है.

 

शिरीष मोहनलाल दवे

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किसी भी नगरको/ग्रामको बदसूरत और गंदा कैसे किया जाय ….

हमने समज़ लिया कि, शास्त्री नगर जो एक ठीक तरहके आयोजनसे बनाया हुआ टाउनशीप था उसको अहमदाबादकी म्युनीसीपल कमीश्नरकी गेंगने एक ही दशकमें कैसे बदसूरत कर दिया.

कौनसे परिबल है जो कोई भी नगरको या क्षेत्रको बदसूरत कर सकते है?

कमीश्नर और उसकी सेनामें निम्न लिखित गुण होते हैं

अभिनव विचारोंका अभाव (ईनोवेटीव आईडीया),

आर्षदृष्टिका अभाव,

कुछ नया करके दिखावेंवाली सोचका अभाव,

नगरके प्रति अपनापन रखनेका अभाव (बीलोंगींगनेसका अभाव),

भविष्यदृष्टिका अभाव,

कनिष्ठ और क्षतिपूर्ण आयोजन,

क्षतिपूर्ण विशेष विवरण और आकृति, (स्पेसीफीकेशन और डीज़ाईन), यानी कि डिज़ाईन ऐसी हो कि रखरखाव कमसे कम हो

काममें क्षतिपूर्ण गुणवत्ता,

मरम्मतमें विलंब, और मरम्मतकी गति, क्षतिग्रस्त बननेकी गति से कम होना,

स्वच्छताका निम्नस्तरवाली मानसिकता,

नीति नियमोंमे क्षतियां, और उनमे सुधार करनेकी मानसिकता अभाव,

संनिर्माणके और रखरखावके कर्मचारीमें प्रशिक्षणका अभाव,

संनिर्माण और रखरखावके अयोग्य उपकरण.

अब हमगोदरेज गार्डन सीटीकी चर्चा करेंगे.

यह एक ऐसा नगरक्षेत्र है जो गोदरेज प्रोपर्टीज़ नामकी कंपनीने आयोजन करके  संनिर्माण  किया है. बीएचके, बीएचके, . बीएचके, बीएचके, . बीएचके (२२ मंजिला) आदि के १२ मज़िला के भवनसमूह (ब्लोक क्लस्टर) है. ये सब मध्यम वर्गकी सुविधाओंके लिये उपयुक्त बनवाया है.

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इसमें सुव्यवस्थित आयोजन है. आंतरिक मार्ग, मुख्य मार्ग और राज मार्ग की रचना का आयोजन, अहमदाबादकी तुलनामें महानगर आयुक्त (म्युनीसीपल कमीश्नर)के आयोजनसे हजार गुना अधिक अच्छा है.

दो भवन समूहके बीच पर्याप्त अंतर है,

प्रत्येक खंडमेंसे आकाश दिखाई देता है,

प्रत्येक खंडमें सूर्यकी प्रकाश आती है,

विद्युतजलप्रबधन और आनुसंगी साधन और उपसाधनक़ी गुणवत्ता सही है और व्यवस्थित है,

हरेक भवनमें पेसेजकी चौडाई सही है,

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सुरक्षाका प्रबंध सुचारु रुपसे है.

सुचारु अग्निशामक व्यवस्था                                   

रखरखाव का कारोबार व्यवस्थित है,

वाहन पार्कींगकी व्यवस्था अव्यवस्थित नहीं है और अभी तो कोई क्षतियां दृष्टिगोचर नहीं होती है.

प्रत्येक प्रकारके भवनके जुथमें प्रर्यप्त वृक्ष और पुष्प पौधे है. उद्यानमें घांस भी है,

मार्गोंके दोनो दिशामें पर्याप्त वृक्ष और पौधे है.

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महामार्ग पर सायकिलके लिये अतिरिक्त लेन है. चलनेके लिये भी पर्याप्त चौडी फुटपाथ है, गेस, विद्युत और पानीके लिये सुनिश्चित मार्ग (रुट) है,

छोटे बच्चोंके लिये क्रीडांगण है, युवाओंके लिये भी अतिरिक्त क्रीडांगण है,

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टहेलने के लिये और जॉगींग़के लिये पर्याप्त मार्ग है,

व्यायाम गृह (जीम) और स्नानागार है,

वाचनालय है,

आराम गृह है,

क्लब है,

कोम्युनीटी ईतर प्रवृत्तियोंके लिये गृह है,

कोम्युनीटी भोज गृह है,

शोपींग सेंटर और डीपार्टमेंटल स्टोर्स है,

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रखरखाव के लिये कार्यालय है जो शिकायतें लेते है और उसका निर्मूलन करते है,

सुव्यवस्थित कर्मचारीगण जो शिष्ट तरिके से संवाद करता है और शिघ्रतासे कार्य करते है.

विद्यालय है,

सीटी बसकी सुविधा है.

ऑटोरीक्षा स्टेंड है.

रास्ते पर दिशा सूचन करने वाले बॉर्ड है,

क्या क्या नहीं है यह बात नगरके आयुक्त (कमिश्नर) के दिमागके उपरकी बात है. यदि नगर आयुक्त (सीटी कमीश्नर) चाहता तो, जो अहमदाबादके जो क्षेत्र १९५२के बाद विकसित हुए, उनको गोदरेज गार्डन सीटी के समकक्ष कर सकता था. लेकिन ऐसी मानसिकता म्युनीसीपल कमीश्नरमे कहां हो सकती है.

स्थित तो ऐसी है कि सर्व प्रथम जनताको अनुभूति होती है किहमें फलाँ फलाँ समस्या है”. तत्पश्चात समाचार पत्रोंको अवगत होता है. ये समाचर पत्र अपने सीयासती एजंडाके आधार पर उसको प्रसिद्धि देते हैं. जब प्रश्न नगरसेवककी सभामें उठता है, तब कहीं नगरके आयुक्तको पता चलता है. कभी कभी तो नगरके आयुक्तको न्यायालय आदेश देता है तब नगर आयुक्त अपनी सेना को आदेश देता है. फिर काम होता है या तो नहीं होता है या तो आंशिक होता है या तो दोषपूर्ण काम होता है जो थोडे ही समयमें पूर्ववत स्थिति उत्पन्न करता है. फिर वही चक्र फिरसे चालु होता है.

तो क्या गोदरेज गार्डन सीटी गंदा और बदसुरत बन सकने के काबिल है?

क्रमशः

शिरीष मोहनलाल दवे

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नहेरुवीयन कोंग्रेसका वानरपन या विकास यज्ञमें हड्डीयां?

जब हम नहेरुवीयन कोंग्रेसका नाम लेते हैं तब हमें उनमें उनके सांस्कृतिक साथी पक्ष, ममता, माया, जया, लालु, करुणा, मुल्लायम, फारुख, आदि सभीको संम्मिलित समझना है. क्यों कि ये सब उनके सांस्कृतिक साथी है, जिनका उद्देश केवल येन केन प्रकारेण पैसा बनाना है, चाहे देशको कितना ही हानि क्यूं न हो. तदुपरांत सत्ताका दुरुपयोग भी करना ताकि अपने देशी विदेशी साथीयोंके साथ जो ठग विद्या द्वारा असामाजिक और सहदुःष्कर्म किये है उनसे उनकी भी रक्षा की जा सके. जैसेकी खुदके नेताओं अतिरिक्त इनकी जैसे कि धरम तेजा, मुंद्रा, सुकर बखीया, युसुफ पटेल, दाउद, एन्डरसन, क्वाट्रोची, वाड्रा आदिकी भी रक्षा करनी होती है.

किन्तु अभी तो हम वार्ता करेंगे भूमि अधिग्रहण विधेयक प्रस्तावकीः

भूमि विषयक और स्थावर संपत्ति विषयक समस्याओंका समाधान हो सकता है.

भूमि विषयक मानसिकता क्या है?

प्रणालीगत मानसिकता क्या है?

१ भारत एक कृषिप्रधान देश है,

२ किसान जगतका तात है,

३ किसान गरीब है,

४ भारत एक ग्राम्य संस्कृति वाला देश है.

५ ग्राम्य संस्कृति भारतकी धरोहर है,

६ भारत अपनी धरोहरका त्याग नहीं कर सकता.

यह ग्राम्य संस्कृति क्या है?

७ ग्राम्यप्रजा सीधे सादे प्राकृतिक वातावरणमें रहेती है,

८ उसकी प्राकृतिकताको हमें नष्ट नहीं करना है,

९ गांवमें बैल, गैया, भैंस, बकरी, गधा आदि मनुष्य समाजके उपर आश्रित पशुधन होता है,

गांवमें बैलगाडीयां होती है,

१० गौचर की भूमि होती है, पेड होते हैं, खेत होते है, गृह उद्योग होते है, आदि आदि

११ अब शासनका धर्म बनता है कि शासन ग्राम्य संस्कृतकी रक्षा करें. हां इतना परिवर्तन जरुर करें कि, उनको विद्युत उर्जा घरमें, ग्राम्य मार्ग पर, खेतमें भी मिलें.

१२ शासनका धर्म यह भी है कि उनको पीनेका शुद्ध पानी और खेतके लिये अदुषित पानी भी मिले, अन्न पकानेके लिये ईंधन वायु भी मिले. आवश्यकता होने पर उसको ऋण भी प्राप्त करवाया जाय.

१३ वैसे तो इनमेंसे कई चिजें ग्राम्य संस्कृतिकी धरोहर नहीं है, फिर भी शासनको सिर्फ नगरोंका ही विकास नहीं करना है, किन्तु ग्राम्यप्रजाका भी विकास करना है. इसके अतिरिक्त हमारी ग्राम्य संस्कृतिकी भी रक्षा करना है. इन सबमें किसानकी भूमिकाको उपेक्षित करना नहीं है.

१४ इसी प्रकार हमारी वन्य संस्कृतिकी भी रक्षा करना है,

यह वन्यसंस्कृति क्या है?

१५ वन्य संस्कृतिमें छोटे बडे वृक्ष है, वनवासी होते है, जो वन्य उपज पर अपना निर्वाह करते है. ये भी हमारी भारतीय संस्कृतिका एक अविभाज्य अंग है. हमें उनकी संस्कृतिकी भी रक्षा करनी है. हमें इन सबको शिक्षित भी करना है.

क्यों कि भारतीय संस्कृति महान है.

अवश्य हम महान है या थे. किन्तु हमे निर्णय करना पडेगा कि

१ हमें किसानोंके और वनवासीयोंके आर्थिक स्तरको उंचे लाना है या नहीं?

२ हमें उनको स्वावलंबी करना है या नहीं?

३ हमें ग्राम्य और वनवासी जनताको सरकार पर ही अवलंबित रहें ऐसा ही करना है या उसको इसमेंसे मूक्त भी करना है?

याद करो.

३०० वर्ष इसा पूर्वसे लेकर इ.सन. १७०० वर्ष तकके विदेशी यात्रीयोंने भारतके बारेमें लिखा है कि, भारतमें कभी अकाल पडता नहीं था.

उसका कारण क्या था?

भारतमें वन संपदा थी. यानी कि पर्वत और समतल भूमि पर वृक्ष थे. खेतोंके आसपास भी वृक्ष थे. नगरमें उपवन थे. इसके कारण नदीयोंमें हमेशा पानी रहता था. प्रत्येक ग्राममें सरोवर थे और इन सबमें पानी रहेनेसे कुओंका जलस्तर उंचा रहता था. वृक्षोंके होनेसे पर्वतों पर वर्षा का पानी अवरोधित रहेता था इसलिये पूर नहीं आते थे. वृक्षोंसे अवरोधित पानी धीरे धीरे नदीयोंमें जाता था. इसलिये नदियां पानीसे भरपूर रहेती थीं. भूमिगत पानीकी स्थिति भी ऐसी ही रहेती थी. कुओंमेसें पानी बैलके द्वारा निकाला जा सकता था.

पशुधन मूख्य माना जाता था. और इसके कारण प्राकृतिक खाद गोबरके रुपमें आसानीसे मिलजाता था. वृक्षकी कटाई घरेलु वपराशके लिये ही होती थी इसलिये वृक्षोंकी दुर्लभता नहीं बनती थीं. गोबरका भी इंधनके रुपमें उपयोग होता था.

सभी ग्राम्यसमाज प्रतिदिनकी आवश्यकताओंके लिये स्वावलंबी थे.

इसलिये आयात निकास की वस्तुंओंका  परिवहन न्यूनतम था. यंत्र और उपकरण संकिर्ण नहीं थे और पशु-शक्तिका उपयोग भी होता था. हम ग्राम्य समाजको एक संकुल के रुपमें समझ सकते हैं. जिनमें भीन्न भीन्न व्यवसायके लोग व्यवसायके अधार पर समूह बनाके रहेते थे. आज भी ऐसी रचना नकारी नहीं जाती. सब्जी मार्केट, कपडा मार्केट, रेडीमेड गार्मेन्ट मार्केट, हीरा बजार, विद्या संकुल, आवास, चिकित्सा संकुल आदि प्रकार विदेशोंमे भी बनाये जाते हैं.   

भारत एक विशाल देश था. जनसंख्या कम थी. उत्पादनका निकास हो सकता था. हर वसाहतमें व्यवसायीओंका एक महाजनमंडल रहेता था. जो अपने व्यवसाय की नीतिमत्ता पर निरीक्षण करता था.

किन्तु अठारवीं शताब्दीके अंतर्गत क्या हुआ?

भारतीय कारीगरोंकी उंगुलियां काट दी गई. ताकि हुन्नर मृतप्राय हो गया. भारत कच्चे मालकी निकास करने लगा और बना बनाया माल अयात करने लगा. गरीबी बढ गई. यह वार्ता  सुदीर्घ है. किन्तु इसका तारतम्य यह कि भारतकी अवनति हुई. प्राकृतिक आपत्तियोंमे भी वृद्धि हुई. वर्षा अनियमित होने लगी. अकाल पडने लगे.

नहेरुवीयन कोंग्रेसकी विघातक नीतियां

नहेरुवीयन कोंग्रेसने अंग्रेजोंकी नीति चालु रक्खी. समाजवादके नाम पर नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंने मनमानी की. इतना ही नहीं किन्तु अत्यधिक प्रमाणमें अवैध रुपसे वनोंकी कटाई हुई. वन संपत्ति और उत्पादन नष्टप्राय हो गया. नदियां शुष्क हो गईं. वर्षा चक्र अनियमित हो गया. अकाल पडने लगे. आर्थिक असमानता बढ गई. नियम द्वारा चलने वाला शासन छीन्नभीन्न हो गया. कोतवाल चोरके साथ मिल गया और रक्षक भक्षक बन गया. कोंगीके सर्वोच्च नेताओं द्वारा किये गये भ्रष्ट आचारोंके असंख्य उदाहरण, हमने (१९७७-१९७९ और १९९९-२००४ के कालखंडोंको छोड कर) १९५१से २०१४ तक देखे हैं. हम उन ठगोंकी चर्चा नहीं करेंगे.

ग्राम्य रचनाकी पूरातन शैलीमें परिवर्तन लाना पडेगा.

भूमि अधिकार संबंधित मानसिकतामें परिवर्तन लाना पडेगा

भूमि संबंधित उत्पादनकी प्रणालीमें परिवर्तन लाना पडेगा,

ग्राम्य रचना कैसी होनी चाहिये? आवासोंकी रचना कैसी होनी चाहिये?

१ हमें आवासमें क्या चाहिये?

१.१ आवासमें खुल्लापन होना चाहिये,

१.२ आकाश दिखाई देना चाहिये,

१.३ छोटे बालकोंके लिये खेलनेकी जगह होनी चाहिये,

१.४ बडोंके लिये घुमनेकी जगह होनी चाहिये,

१.५ युवाओंके लिये खेलने की जगह होनी चाहिये,

१.६ अडोशपडोशके साथ संवादिता होनी चाहिये, यानी कि, कोम्युनीटी टाईप घरोंकी रचना होनी चाहिये,

१.७ प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षाका प्रबंध होना चाहिये,

१.८ उच्च शिक्षाके लिये सुदूर जाना न पडे ऐसा होना चाहिये,

१.९ प्रतिदिनकी आवश्यक वस्तुएं सरलतासे उपलब्ध होनी चाहिये,

१.१० शासकीय सेवाएं सरलतासे उपलब्ध होनी चाहिये,

१.११ जनसुरक्षा सेवा उपलब्ध और विश्वसनीय होनी चाहिये,

१.१२ व्यवसाय, सेवा, आवास और शिक्षणमें मानवीय अभिगम होना चाहिये,

१.१३ पर्यावरणमें संतुलन होना चाहिये.

हमें इन सभी आवश्यक बंधनोंसे ठीक तरहसे अवगत होना पडेगा. इस विषयमें अवगत होनेके लिये हमें खुल्लापन रखना पडेगा. यदि  आजकी स्थिति और आजकी मानसिकता चालु रही तो भविष्य कैसा भयानक हो सकता है वह समझना पडेगा.

भारत विभाजित हो गया है. जनसंख्यामें अधिक वृद्धि हुई है. जनसंख्याके उपर नियंत्रण लानेमें कुछ और दशक लग सकते है. कुछ धर्मके लोग स्वयंकी जनसंख्याके नियंत्रणमें मानते नहीं है. उनकी कार्यसूचि भीन्न है. उनकी मानसिकता में परिवर्तन करनेमें दो तीन दशक लग सकते हैं. सभीको साक्षर करना पडेगा और सबको काम देना पडेगा. उत्पादन बढाना पडेगा. असामाजीक तत्वोंको नष्ट करना पडेगा.

भूमिके महत्वसे अवगत होना आवश्यक है

भूमिका व्यय

१.१ पृथ्वीपर भूमिमें वृध्धि नहीं हो सकती. किन्तु भूमिमें सुधार हो सकता है. बंजर, क्षारयुक्त, उबडखाबड भूमिको नवसाध्य कर सकते हैं. मार्गों और रेल्वेकी आसपासकी भूमिको सब्जी भाजी के लिये उपयोगमें ले सकते है. छोटे बडे टापूओं पर बिनवपराश की भूमिको साध्य कर सकते है.

१.२ भूमिका व्यय बंध कर सकते है.

१.३ झोंपडपट्टी भूमिका व्यय है, एकस्तर, द्विस्तर, त्रीस्तर, आदि कमस्तरवाले आवास और संनिर्माण भूमिका व्यय है.

१.४ इतना ही नहीं भूमि पर अन्नपैदा करना भी भूमिका व्यय है.

१.५ अन्न और घांस एक स्तरीय उत्पादन है. जैसे लघुस्तरीय आवास निर्माण और लघुस्तरीय व्यवसाय वाले संकुल निर्माण, भूमिका व्यय है उसी तरह अन्न जैसे एक स्तरीय उत्पादनके लिये भूमिका उपयोग भी, भूमि संपदाका व्यय है.

१.६ आवास और व्यवसाय संकुल निर्माणको बहुस्तरीय बनाओ.

१.७ अन्न और घांस के उत्पादन के लिये बहुस्तरीय कृषि-संकुल बनाओ.

१.८ भूमिका उपयोग केवल वृक्षके लिये करो. वृक्ष हमेशा बहुस्तरीय उत्पादन देता है. तदुपरांत वह प्राणवायु देता है, जलसंचय करता है, भेज-उष्माका नियमन करता है,और उसका समूह् मेघोंको खींचता है. पक्षी, जिव जंतुओंको आश्रय देता है और ये जिव जंतु परागनयन द्वारा फल, सब्जी और अन्नका उत्पादन बढाता है. वृक्ष इसके अतिरिक्त मधु, गुंद, खाद और लकडी देता है.

अन्नका और घांसका उत्पादन कैसे करेः

१ आज कस्बों में और उसके समीपकी भूमिका भाव रु. १००००/- (दश सहस्र) प्रति मीटरसे कम नहीं है. यदि आप सुचारु प्रणालीसे बहुस्तरीय व्यवसायिक और आवासीय संकुलका निर्माण करो तो संनिर्माणका मूल्य (कंस्ट्रक्सन कोस्ट) रु ५०००/- से ६०००/- प्रति चोरस मीटर होता है. इसका अर्थ यह हुआ कि अन्न और घांसके उत्पादन के लिये बहुस्तरीय संनिर्माण लघुतर मुल्यका है.

ऐसे बहुस्तरीय कृषि संनिर्माण बनाना आवश्यक है.

१.२ बहुस्तरीय कृषि संकुल निर्माणके को लघुतर मूल्यका कैसे किया जाय? सुचारु प्रणाली क्या हो सकती है?

पूर्व निर्मित ईकाईयां (प्रीकास्टेड एलीमेन्टस) अनिवार्य है

१.३ पूर्व निर्मित ईकाईयां (प्रीकास्टेड एलीमेन्टस) जैसे कि स्तंभ इकाई (पीलर युनीट), फलक दंड इकाई (बीम युनीट), फलक इकाईयां (स्लेब एलीमेन्टस), असिबंध (आयर्न ग्रील), आदि, यदि निर्माण संसाधन उद्योगिक एकमोंमे पूर्व निर्मित किया जाय और उनका कद और मान शासननिश्चित प्रमाणसे उत्पादन किया जाय तो इन इकाईयोंका मूल्य अल्पतर बनेगा. संनिर्माणका समय, श्रम मूल्य भी कम भी लगेगा.

१.४ भूमि पर अधिकार केवल शासनका रहेगा.

शासन उसके उपयोगका अधिकार देगा. उपयोगके अधिकारका हस्तांतरण, उपयोग कर्ता कर सकेगा. किन्तु शासन के द्वारा वह हस्तांतरण होगा. इस प्रकार भूमिके सारेके सारे न्यायालयस्थ विवाद समाप्त हो जायेंगे.

१.५ आवास संकुल बहुस्तरीय रहेंगे और हरेक कुटूंबको खंडसमूह दिया जायेगा. जिनको मासिक अवक्रय (मोन्थली रेन्ट)के रुपमें या अवक्रय आधारित स्वामित्व (हायर परचेझ स्कीम) के रुपमें दिया जायेगा. स्वामित्वका हस्तांतरण भी शासनके द्वारा ही होगा.

१.६ उसी प्रकार कृषि संकुलके भी खंड समूह (प्रकोष्ठ समूह) होंगे और उसका हस्तांतरण भी उपरोक्त नियमोंसे होगा.

१.७ अद्यतनकालमें जो जर्जरित, या झोंपड पट्टीयां या कम स्तरवाले निर्माण है, उन सबका नवसंरचना करके आवास और व्यावसायिक संकुलोंका मिश्र संकुल बनाना पडेगा ताकि भूमिके व्ययके स्थान पर हमें अधिक भूमि उपलब्ध होगी और उसका हम सुचारु रुपसे वृक्षोंका उत्पादन कर सकेंगे.

१.८ आवास संकुलके निम्न स्तरोंमें व्यावसायिक वाणीज्य, गृहउद्योग, बाल मंदिर, प्राथमिकशाळाएं, माध्यामिक शाळाएं. उच्चमाध्यमिक शाळाएं, चूनाव व नोंधणी व जनगणना व सुरक्षा अधिकारीका कार्यालय रहेगा. हर स्तर पर एकसे अधिक सीसी टीवी केमेरा रहेगा.

१.९ जो अयुक्त (अनएम्प्लोईड बेकार) है, आवससे भी अयुक्त बने क्योंकि वे अपना उपकर नहीं दे पाये उनको सोने की जगह दी जायेगी और उनको कोई न कोई काम देके उनसे सोनेका और नहानेका उपकर प्रत्यावरुध (रीकवरी ओफ रेन्ट) किया जायेगा. यदि वह व्यक्ति विदेशका घुसपैठ है तो वो कारावासमें जायेगा और वहां उसके उपर स्थानिक सुरक्षादल कार्यवाही करेगा. जो अन्य राज्य से आता है उसको यदि वह निराश्रित है तो सोनेकी सुविधा मिलेगी.

१.१० जो कृषि-संकुल है, उसके निम्न स्तरोमें गौशाला रहेगी. उसके उपरके स्तरोमें घांस, अन्न, सब्जी, पुष्प, मधु, आदि का उत्पादन होगा.

१.११ आवस संकुलसे जो भी पानी आता है, उसको योग्य मात्रामें शुद्ध करके उसका भूमिगत उत्पादनमें उपयोग हो सकता है.

स्थावर संपत्ति के नियमोंमें आमूल परिवर्तन ही देशकी ९० प्रतिशत समास्याओंका समाधान है.

उपसंहारः

भूमि पर किसीका स्वामीत्व नहीं.

भूमि के उपर केवल उपयोगका अधिकार. उपयोगका प्रकार, शासन निश्चित करेगा. उपयोगके प्रकारमें परिवर्तनका अधिकार केवल शासनका रहेगा.

भूमिके उपयोगके प्रकारः

वृक्ष लगाना और उत्पादन करना.

वन, उपवन, भूमिगत क्रीडांगण

भूमिगत मार्ग, रेल मार्ग, जलमार्ग

सरोवर,

नहेरें,

विमान पट्टी,

नमक उत्पादन,

खनिज उत्पादन,

नये धार्मिक स्थल बनाने पर निषेध. केवल ऐतिहासिक धर्मस्थलोंका शासकीय अनुमतिके आधार पर विकास.

बहुस्तरीय संकुल जिसमें आवास संकुल, सेवा संकुल, गृह उद्योग संकुल, शैक्षणिक संकुल, लघु उद्योग संकुल, आदि. यदि शक्य है तो एक ही संकुल अनेक प्रकारके संकुलोंका समुच्चय हो सकता है.

बहुस्तरीय कृषि संकुल जिसमें अन्न, घांस, गौशाला, अप्रणालीगत उर्जा, सब्जी, मध, पुष्प, गोपाल आवास, कृषक आवास, कृषि आधारित गृह उद्योग,

बहुस्तरीय कृषि उत्पादन को प्राकृतिक आपदासे सुरक्षा मिलेगी. अन्य संकुलोके निस्कासित जलको शुद्ध करके टपक और फुहार सिंचाई द्वारा कृषि उत्पादन सुगम बनेगा.

एक ग्रामकी जनसंख्याके आधार पर एक ग्राम एक या दो संकुलका बना हुआ होगा. कोई भी संकुल १० स्तरसे कम नहीं होगा.

संकुल पर्यावरण सुरक्षाके आधार पर बना होगा. सभी शासकीय सुविधाएं और आधुनिक सुविधाएं उपलब्ध होगी.

बहुस्तरीय कृषि संकुलके अपने हिस्सेको व्यक्ति हस्तांस्तर कर सकता है. किन्तु हस्तांतरण की प्रक्रिया शासनके द्वारा ही होगी. ठीक उसी प्रकार निवासके अपने हिस्सेको व्यक्ति हस्तांतरण कर सकता है. शासन, संकुलका वेब साईट रखेगा. और संकुलकी संपूर्ण अद्यतन माहिति उसके उपर उपलब्ध रहेगी.

शिरीष मोहनलाल दवे

अनुसंधानः  गुजरातीमें नव्य सर्वोदयवाद भाग १ से ५, एचटीटीपीः//डबल्युडबल्युडबल्यु.त्रीनेत्रं.वर्डप्रेस.कॉम टेग्झः भूमि, आवास, स्वामीत्व, उपयोग, शासन, सुरक्षा, सेवा, चूनाव बुथ विस्तार, संकुल, कृषि, घांस, वृक्ष, वन, स्वावलंबन, मानसिकता, ग्राम्य, पशु, गृह, उद्योग, प्रकोष्ठ, पूर्व निर्मित, इकाईयां, एलीमेन्ट संकुलकी कुछ आकृतियां

पूर्व निर्मित इकाईयां

STRUCTURE 04 village complex 04 AN ALREADY EXISTING SELF SUSTAINABLE COMPLEX VILLAGE Drg03 उपरोक्त व्यवस्था कृषि और आवास संकुलके लिये भी हो सकती है. एक कुटूंब एकसे ज्यादा सुनिश्चित नियमोंके अंतर्गत एक से अधिक प्रकोष्ठ ले सकता है. Drg01

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हिन्दु और लघुमतीयोंको एक दुसरेसे क्या अपेक्षा है और अपेक्षा क्या होनी चाहिये? – १

प्रथम तो हमें यह समझना चाहिये कि हिन्दु और मुस्लिम कौन है?

ALL THE MUGALS WERE NOT COMMUNAL

यदि हम १८५७ के स्वातंत्र्य संग्रामकी मानसिकतामें अवलोकन करे तो हिन्दु और मुस्लिम दोनों हिन्दुस्तानी है. जब भी कोई एक जन समुदाय एक स्थानसे दुसरे स्थान पर जाता है तो वह समुदाय वहांके रहेनेवालोंसे हिलमिल जानेकी कोशिस करता है. यदि जानेवाला समुदाय शासकके रुपमें जाता है तो वह अपनी आदतें मूलनिवासीयों पर लादें ये हमेशा अवश्यक नहीं है. इस बातके उपर हम चर्चा नहीं करेंगे. लेकिन संक्षिप्तमें इतना तो कह सकते है कि तथा कथित संघर्षके बाद भी इ.स. १७०० या उसके पहेले ही हिन्दु और मुस्लिम एक दुसरेसे मिल गये थे. इसका श्रेष्ठ उदाहरण यह है कि, बहादुरशाह जफर के नेतृत्वमें हिन्दु और मुसलमानोंने अंग्रेज सरकारसे विप्लव किया था. और यह भी तय था कि सभी राजा, बहादुर शाह जफरके सार्वभौमत्वके अंतर्गत राज करेंगे.

अब यह बहादुर शाह जफर कौन था?

यह बहादुर शाह जफर मुगलवंशका बादशाह था. उसके राज्य की सीमा लालकिले की दिवारें थीं. और उतनी ही उसके सार्वभौमत्वकी सीमा थी. यह होते हुए भी सभी हिन्दु और मुस्लिम राजाओंने बहादुरशाह जफर का सार्वभौमत्व स्विकार करके मुगल साम्राज्यकी पुनर्स्थापनाका निर्णय किया था. इससे यह तो सिद्ध होता है कि हिन्दुओंकी और मुस्लिमों की मानसिकता एक दुसरेके सामने विरोधकी नहीं थी.

शिवाजीको अधिकृतमान न मिला तो उन्होने दरबारका त्याग किया

आजकी तारिखमें हिन्दुओंके हिसाबसे माना जाता है कि मुस्लिम बादशाहोंने हिन्दु प्रजा पर अति भारी यातनाएं दी है और जिन हिन्दुओंने इस्लामको स्विकारा नहीं उनका अति मात्रामें वध किया था. इस बातमें कुछ अंश तक सच्चाई होगी लेकिन सच्चाई उतनी नहीं कि दोनो मिल न पायें. अगर ऐसा होता तो औरंगझेबके सैन्यमें हिन्दु सैनिक और सरदार न होते और शिवाजीके सैन्यमें मुस्लिम सैनिक और सरदार न होते. शिवाजी मुगल स्टाईल की पगडी न पहेनते, और औरंगझेब शिवाजीके पोते शाहुको उसकी जागीर वापस नहीं करता. मुस्लिम राजाओंने अगर अत्याचार किया है तो विशेषतः शासक होने के नाते किया हो ऐसा भी हो सकता है. जो अत्याचारी शासक होता है उसको या तो उसके अधिकारीयोंको तो अपना उल्लु सिधा करनेके लिये बहाना चाहिये.

अब एक बात याद करो. २०वीं सदीमें समाचार और प्रचार माध्यम ठीक ठीक विकसित हुए है. सत्य और असत्य दोनोंका प्रसारण हो सकता है. लेकिन असत्य बात ज्यादा समयके लिये स्थायी नहीं रहेगी. सत्य तो सामने आयेगा ही. तो भी विश्वसनीय बननेमें असत्यको काफि महेनत करनी पडती है. वैसा ही सत्यके बारेमें है.

इन्दिरा गांधीके उच्चारणोंको याद करो.
१९७५में इन्दिरा गांधीने अपनी कुर्सी बचानेके लिये प्रचूर मात्रामें गुन्हाहित काम किये और करवाये. समाचार प्रसार माध्यम भी डरके मारे कुछ भी बोलते नहीं थे. लेकिन जब इन्दिरा गांधीके शासनका पतन हुआ और शाह आयोग ने जब अपना जांचका काम शुरु किया तो अधिकारीयोंने बोला कि उन्होने जो कुछ भी किया वह उपरकी आज्ञाके अनुसार किया. इन्दिराने खुल्ले आम कहा कि उसने ऐसी कोई आज्ञा दी नहीं थी. उसने तो संविधानके अंतर्गत ही आचार करनेका बोला था. अब ये दोनों अर्ध सत्य हैं. इन्दिरा गांधी और अधिकारीयोंने एक दुसरेसे अलग अलग और कभी साथमें भी अपना उल्लु सीधा करने की कोशिस की थी, और उस हिसाबसे काम किया था.

अपना उल्लु सीधा करो

मुगल साम्राट का समय लोकशाहीका और संविधान वाला समय तो था नहीं. ज्यादातर अधिकारी अपना उल्लु सीधा करनेकी सोचते है. मुगलके समयमें समाचार प्रसारके माध्यम इतने त्वरित तो थे नहीं. अफवाहें और बढा चढा कर भी और दबाके भी फैलाई जा सकती है. सुबेदार अपना धार्मिक, सामाजिक, आर्थिक और अंगत स्वार्थ के लिये अपना उल्लु सिधा करते रहे होगे इस बातको नकारा नहीं जा सकता.

औरंगझेब एक नेक बादशाह था वह साम्राटकी संपत्तिको जनता की संपत्ति समजता था. और वह खुद टोपीयां और टोकरीयां बनाके बेचता था और उस पैसे से अपना गुजारा करता था. उसका पूर्वज शाहजहां एक उडाउ शासक था. औरंगझेबको अपने सुबेदारोंकी और अधिकारीयोंकी उडाऊगीरी पसंद न हो यह बात संभव है. सुबेदार और अधिकारी गण भी औरंगझेबसे खुश न हो यह भी संभव है. इस लिये औरंगझेबके नामसे घोषित अत्याचारमें औरंगझेब खुदका कितना हिस्सा था यह संशोधनका विषय है. मान लिजिये औरंगझेब धर्मान्ध था. लेकिन सभी मुघल या मुस्लिम राजा धर्मान्ध नहीं थे. शेरशाह, अकबर और दारा पूर्ण रुपसे सर्वधर्म समभाव रखते थे. अन्य एक बात भी है, कि धर्मभीरु राजा अकेला औरंगझेब ही था यह बात भी सही नहीं है. कई खलिफे हुए जो सादगीमें, सुजनतामें और मानवतामें मानते थे. कमसे कम औरंगझेबके नामके आधार पर हम आजकी तारिखमें इस्लामके विरुद्ध मानसिकता रक्खें वह योग्य नहीं है. शिवाजी के भाग जाने के बाद औरंगझेब धर्मान्ध हो गया. इ.स. १६६६ से १६९० तकके समयमें औरंगझेबने कई सारे प्रमुख मंदिर तोडे थे. खास करके काशी विश्वनाथका मंदिर, सोमनाथ मंदिर और केशव मंदिर उसने तुडवाया थे. दक्षिण भारतके मंदिर जो मजबुत पत्थरके थे और बंद थे वे औरंगझेबके सेनापति तोड नहीं पाये थे. उसके यह एक जघन्य अपराध था. ऐसा पाया गया है कि उसके एक सलाहकारने उसको ऐसी सलाह दी थी कि नास्तिकोंको मुसलमान करना ही चाहिये. दो रुपया प्रति माह से लेकर एक साथ १००० रुपया प्रलोभन इस्लाम कबुल करने पर दिया जाता था. लेकिन जो औरंगझेबके खिलाफ गये थे उनका कत्ल किया जाता था. इस वजहसे उसके साम्राज्यका पतन हुआ था. क्यों कि सेक्युलर मुस्लिम और हिन्दु उसके सामने पड गये थे. औरंगझेबने कुछ मंदिर बनवाये भी थे और हिन्दुओंके (परधर्मीयोंके) उपर हुए अन्यायोंवाली समस्याओंका समाधान न्याय पूर्वक किया था. कोई जगह नहीं भी किया होगा. लेकिन हिन्दुओंके प्रमुख मंदिरोंको तुडवानेके बाद उसके अच्छे काम भूलाये गये. मुस्लिम और हिन्दु दोनों राजाओंने मिलकर उसका साम्राज्यको तहस नहस कर दिया. सबसे ज्यादा महत्व पूर्ण यह बात है कि उस समयके सभी राजाएं मुगल साम्राज्यके प्रति आदर रखते थे. और ऐसा होने के कारण ही औरंगझेबके बाद मुगल साम्राटके सार्वभौमत्वको माननेके लिये तैयार हुए थे. हिन्दु और मुस्लिम दोनों हिन्दुस्तानी थे. अगर हम सेक्युलर है और संविधान भी धर्म और जातिके आधार पर भेद नहीं रखनेका आग्रह रखता है, तो क्यूं हम सब आजकी तारिखमें हिन्दुस्तानी नहीं बन सकते? यह प्रश्न हम सबको अपने आप से पूछना चाहिये.
चलो हम इसमें क्या समस्यायें है वह देखें.

प्रवर्तमान कोमवादी मानसिकता सबसे बडी समस्या है.

कोमवाद धर्मके कारण है ऐसा हम मानते है. अगर यह बात सही है तो हिन्दु, मुस्लिम, जैन, बौद्ध, शिख, इसाई, यहुदियोंके बीचमें समान रुपसे टकराव होता. कमसे कम हिन्दु, मुस्लिम और इसाईयोंके बीच तो टकराव होता ही. किन्तु बीलकुल ऐसा नहीं है. पाकिस्तानमें शियां और सुन्नी के बिचमें टकराव है. शियां और सुन्नीमें टकराव कब होता है या तो कब हो सकता है? अगर शियां और सुन्नी भेदभाव की नीति अपनावे तो ऐसा हो सकता है.

कोई भेदभाव की नीति क्यों अपनायेगा?

अगर अवसर कम है और अवसरका लाभ उठाने वाले ज्यादा है तो मनुष्य खुदको जो व्यक्ति ज्यादा पसंद है उसको लाभ देनेका प्रायः सोचता है.

अवसर क्या होता है?

अवसर होता है उपयुक्त व्यक्तियोंके सामने सहाय, संवर्धन, व्यवसाय, संपत्ति, ज्ञान, सुविधा, धन, वेतन देना दिलानेका प्रमाण (जत्था) होता है. अगर अवसर ज्यादा है तो भेदभाव की समस्या उत्पन्न होती नहीं है. लेकिन अगर अवसर कम है, और उपयुक्त यक्ति ज्यादा है तो, देनेवाला या दिलानेवाला जो मनुष्य है, कोई न कोई आधार बनाकर भेदभाव के लिये प्रवृत्त होता है.
इस समस्याका समाधान है अवसर बढाना.

अवसर कैसे बढाये जा सकते है?

प्राकृतिक स्रोतोंका, ज्ञानके स्रोतोंका और उपभोग्य वस्तुओंका उत्पादन करने वाले स्रोतोंमें विकास करनेसे अवसर बढाये जा सकते है. अगर यह होता है तो भेदभावकी कम और नगण्य शक्यता रहती है.

अवसर रातोंरात पैदा नहीं किये जा सकते है यह एक सत्य है.

अवसर और व्यक्तिओंका असंतुलन दूर करनेके लिये अनियतकाल भी नहीं लगता, यह भी एक सत्य है.

जैसे हमारे देशमें एक ही वंशके शासकोंने ६० साल केन्द्रमें राज किया और नीति-नियम भी उन्होने ही बनाये थे, तो भी शासक की खुदकी तरफसे भेदभावकी नीति चालु रही. अगर नीति नियम सही है, उसका अमल सही है और मानवीय दृष्टि भी रक्खी गई है तो आरक्षण और विशेष अधिकार की १० सालसे ज्यादा समय के लिये आवश्यकता रहेती ही नहीं है.

जो देश गरीब है और जहां अवसर कम है, वहां हमेशा दो या ज्यादा युथों में टकराव रहेता है. युएस में और विकसित देशोंमें युथोंके बीच टकराव कम रहेता है. भारत, पाकिस्तान, बार्मा, श्री लंका, बांग्लादेश, तिबेट, चीन आदि देशोंमें युथोंके बीच टकराव ज्यादा रहेता है. सामाजिक सुरक्षाके प्रति शासकका रवैया भी इसमें काम करता है. यानी की, अगर एक युथ या व्यक्ति के उपर दुसरेकी अपेक्षा भेदभाव पूर्ण रवैया शासक ही बडी निष्ठुरतासे अपनाता है तो जो पीडित है उसको अपना मनोभाव प्रगट करनेका हक्क ही नहीं होता है तो कुछ कम ऐतिहासिक समयके अंतर्गत प्रत्यक्ष शांति दिखाई देती है लेकिन प्रच्छन्न अशांति है. कभी भी योग्य समय आने पर वहां विस्फोट होता है.

अगर शिक्षा-ज्ञान सही है, अवसरकी कमी नहीं तो युथोंकी भीन्नता वैविध्यपूर्ण सुंदरतामें बदल जाती है. और सब उसका आनंद लेते है.

भारतमें अवसर की कमी क्यों है?

भारतमें अवसर की कमीका कारण क्षतियुक्त शिक्षण और अ-शिक्षण के कारण उत्पन्न हुई मानसिकता है. और ईसने उत्पादन और वितरणके तरिके ऐसे लागु किया कि अवसर, व्यक्ति और संवाद असंतुलित हो जाय.

शिक्षणने क्या मानसिकता बनाई?

मेकोलेने एक ऐसी शिक्षण प्रणाली स्थापितकी जिसका सांस्कृतिक अभ्यासक्रम पूर्वनियोजित रुपसे भ्रष्ट था. मेक्स मुलरने अपने अंतिम समयमें स्विकार कर लिया था कि, भारतके लोगोंको कुछ भी शिखानेकी आवश्यक नहीं. उनकी ज्ञान प्रणाली श्रेष्ठ है और वह उनकी खुदकी है. उनकी संस्कृति हमसे कहीं ज्यादा विकसित है और वे कहीं बाहरके प्रदेशसे आये नहीं थे.

लेकिन मेकोलेको लगा कि अगर इन लोगों पर राज करना है तो इनकी मानसिकता भ्रष्ट करनी पडेगी. इस लिये ऐसे पूर्व सिद्धांत बनाओ कि इन लोगोंको लगे कि उनकी कक्षा हमसे निम्न कोटिकी है और हम उच्च कोटी के है. और ऐसा करनेमें ऐसे कुतर्क भी लगाओ की वे लोग खो जाय. उनको पहेले तो उनके खुदके सांस्कृतिक वैचारिक और तार्किक धरोहरसे अलग कर दो. फिर हमारी दी हुई शिक्षा वालोंको ज्यादा अवसर प्रदान करो और उनको सुविधाएं भी ज्यादा दो.

अंग्रेजोंने भारतको दो बातें सिखाई.

भारतमें कई जातियां है. आर्य, द्रविड, आदिवासी. आदिवासी यहां के मूल निवासी है. द्रविड कई हजारों साल पहेले आये. उन्होने देश पर कबजा कर लिया. और एक विकसित संस्कृति की स्थापना की. उसके बाद एक भ्रमण शील, आर्य नामकी जाति आयी. वह पूर्व युरोप या पश्चिम एशियासे निकली. एक शाखा ग्रीसमें गई. एक शाखा इरानमें गयी. उसमेंसे एक प्रशाखा इरानमें थोडा रुक कर भारत गई. उन्होने द्रविड संस्कृतिका ध्वंष किया. उनके नगरोंको तोड दिया. उनको दास बनाया. बादमें यह आर्य जाति भारतमें स्थिर हुई. और दोनों कुछ हद तक मिल गये. ग्रीक राजाएं भारत पर आक्रमण करते रहे. कुछ संस्कृतिका आदान प्रदान भी हुआ. बादमें शक हुण, गुज्जर, पहलव आये. वे मिलगये. अंतमें मुसलमान आये.

मुस्लिम जाति सबसे अलग थी

यह मुस्लिम जाति सबसे अलग थी. आचार विचार और रहन सहनमें भी भीन्न थी. यह भारतके लोगोंसे हर तरहसे भीन्न थी इसलिये वे अलग ही रही. ईन्होने कई अत्याचार किये.

फिर इन अंग्रेजोंने आदिवासीयोंको कहा कि अब हम आये हैं. आप इन लोगोंसे अलग है. आपका इस देश पर ज्यादा अधिकार है. हम भी आर्य है. लेकिन हम भारतीय आर्योंसे अलग है. हम सुसंस्कृत है. हम आपको गुलाम नहीं बनायेंगे. आप हमारा धर्म स्विकार करो. हम आपका उद्धार करेंगे.

दक्षिण भरतीयोंसे कहा. यह आर्य तो आपके परापूर्वके आदि दुश्मन है. उन्होने आपके धर्म को आपकी संस्कृतिको, आपकी कला को आपके नगरोंको ध्वस्त किया है. आप तो उच्चा संस्कृतिकी धरोहर वाले है. आपका सबकुछ अलग है. भाषा और लिपि भी अलग है. आप हमारी शिक्षा ग्रहण करो. और इन आर्योंकी हरबात न मानो. ये लोग तो धुमक्कड, असंस्कृत, तोडफोड करनेवाले और आतंकी थे.

मुसलमानोंसे यह कहा गया कि आप तो विश्व विजयी थे. आपने तो भारत पर १२०० साल शासन किया है. ये भारतके लोग तो गंवार थे. इनके पास तो कहेनेके लिये भी कुछ भी नहीं था. ये लोग तो अग्निसे डर कर अग्निकी पूजा करते है. सूर्य जो आगका गोला है उसकी पूजा करते है. हवा, पानी, नदी जैसे बेजान तत्वोकी पूजा करते है. शिश्न की और अ योनी की पूजा करते हैं. ये लोग पशुओंकी और गंदी चीजोंकी भी पूजा करते है. इनके भगवान भी देखो कितने विचीत्र है? वे अंदर अंदर लडते भी हैं और गंदी आदतों वाले भी है. उनके मंदिरोंके शिल्प देखो उसमें कितनी बिभत्सता है.

इनके पास क्या था? कुछ भी नहीं. आपने भारतमें, ताज महाल, लालकिल्ला, फत्तेहपुर सिक्री, कुतुबमिनार, मकबरा, और क्या क्या कुछ आपने नहीं बनाया!! भारतकी जो भी शोभा है वह आपकी बदैलत तो है. आपने ही तो व्यापारमें भारतका नाम रोशन किया है. लेकिन जब कालके प्रवाहमें आपका शासन चला गया तो इन लोगोंने अपने बहुमतके कारण आपका शोषण किया और आपको गरीब बना दिया. आपके हक्ककी और आपकी सुरक्षा करना हमारा धर्म है.

इस प्रकारका वैचारिक विसंवाद अंग्रेज शासकोंने १८५७के बाद घनिष्ठता पूर्वक चलाया. एक बौधिक रुपसे गुलामी वाला वर्ग उत्पन्न हुआ जो अपने पैर नीचेकी धरतीकी गरिमासे अनभिज्ञ था. और वह कुछ अलग सूननेके लिये तैयार नहीं था.

इस बौधिक वर्गके दो नेताओंके बीच सत्ताके लिये आरपार का युद्ध हुआ. एक था नहेरु और दुसरा था जिन्ना.

जब देशकी जनता गरीब होती है वह किसीभी बात पर झगडा करने के लिये तैयार हो जाती है. और जिनका उद्देश्य सिर्फ सत्ता और पैसा है वह हमेशा दुसरोंकी अज्ञानताका लाभ लेकर देशको और मानव जातको चाहे कितना ही नुकशान क्युं न होजाय, दुसरोंको गुमराह करके मत बटोरके अपना उल्लु सीधा करती है.

लेकिन वास्तवमें ये हिन्दु और मुस्लिम कौन है और कैसे है? और क्यों बेवकुफ बनते रहते है?

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे (smdave1940@yahoo.com)
टेग्झः लघुमती, हिन्दु, मुस्लिम, ईसाई, औरंगझेब, बहादुरशाह, सार्वभौमत्व, १८५७, शिवाजी, शासक, यातना, अत्याचार, वध, सरदार, सुबेदार, अधिकारी, मेक्स मुलर, मेकोले, आर्य, द्रविड, इस्लाम, जाति, प्रजा, सत्य, असत्य, इन्दिरा, अफवाह, सत्ता, शाह आयोग, कोमवाद, शियां सुन्नी, भेदभाव, अवसर, स्रोत, असंतुलन, मानसिकता, न्याय, शिक्षण, विकास

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