Feeds:
Posts
Comments

Posts Tagged ‘साक्षीभाव’

पी.के. ने पीके किया नशा? कथांक – २

विश्वमें एक हिन्दु धर्म ऐसा है कि जिसमें विज्ञान जैसा खुलापन है. यह खुलापन हजारों सालसे है.

हिन्दु धर्ममें वेद प्रमाण है. किन्तु वेदोंको समझना कठिन है. इसलिये उपनिषद है. उपनिषद विशेषज्ञोंके लिये है. इस लिये कृष्ण भगवानने वेदोंके आधारपर उपनिषदोंका दोहन किया और उस दूधका दहीं बनाके तक्रका मंथन करके गीताके स्वरुपमें मक्खन बनाके आम जनताको प्रस्तूत किया. अगर गीतामें वेदोंके साथ कोई विरोधाभाष है तो वेद प्रमाण है. किन्तु वेदप्रमाण और प्रत्यक्ष प्रमाणमें यदि कोई विरोधाभाष है तो जो प्रत्यक्ष है वह प्रमाण है. ऐसा आदि शंकराचार्यने कहा है.

यह हिन्दुओंका खुलापन है. जब ज्ञातिप्रथा अत्यंत जड थी तब भी उसके विरुद्धमें विद्रोह उठाने वाले लोग थे. हिन्दु लोग अपनी प्रणालीयोंमें यदा कदा क्षति पाते है तो वे उन क्षतियोंको सुधारने के लिये सक्षम भी है. उसमें अन्य धर्मीयोंको चंचूपात करनेकी जरुरत नहीं है. अन्य धर्मी स्वयंकी क्षतियों पर आत्मखोज करें वह हि उनके लिये योग्य है.

पी. के. का उद्देश क्या था?
वास्तवमें पी. के. का उद्देश अंधश्रद्धा निर्मूलन है ही नहीं.
हिन्दु धर्ममें एक खुलापन होनेसे वह चर्चाके लिये एक आसान लक्ष्य बनता है. उसके विरोधियोंके लिये यह एक आनंदका विषय बनता है.
हिन्दु धर्म एक भीन्न प्रकारका धर्म है.

अन्य धर्मोंने अपने धर्मोंके आधार पर, धर्मकी जो परिभाषा की है, उस व्याख्या के अनुरुप हिन्दु धर्म नहीं है.

इस लिये अन्य धर्मी लोग हतःप्रभः है.
ये विधर्मी जहां कहीं भी गये उन्होने सौ वर्ष के अंतर्गत उन देशोंके ९५ से १०० प्रतिशतको अपने धर्ममें परिवर्तित कर दिये. किन्तु भारतवर्ष जहां विधर्मी जातियोंनें २०० से ८०० साल तक शासन किया तो भी ८० प्रतिशत भारतवासी हिन्दु धर्मी ही रहे. हिन्दुंओंकी तथा कथित क्षतियों को भरपूर हवा देने पर भी वे हिन्दु ही रहे. यह बात इन लोगोंके लिये आघातजनक है. ये लोग आत्म खोज करने के स्थान पर, बिना सोचे समझे, और बिना हिन्दु धर्मकी गहनताका अभ्यास किये, हिन्दुओंके आचार पर आक्रमण करना पसंद करते है.
सामान्य जनतामें धर्म, ज्ञान के उपर चलता नहीं है किन्तु श्रद्धाके आधार पर चलता है. इन अन्य धर्मीयोंकी व्युह रचना यह है कि अगर सामान्य जनताको हिन्दु धर्मके ज्ञानीयोंसे अलग की जाय तो फिर संख्या के आधार पर इन ज्ञानी लोगोंसे तो निपटा जा सकता है.

मुस्लिमोंने ६०० वर्षतक हिन्दु राजाओंसे संघर्ष किया. ऐसा करते करते वे खुद आधे हिन्दु बन गये. जो मुस्लिम राजा आधे हिन्दु नहीं बने और धर्मांध भी थे उन्होने गरीबोंको और आशितोंको मुस्लिम बनानेके प्रयास किये. कुछ लोगों पर जबरदस्ती भी की, हत्याएं भी की, थोडे सफल भी रहे. किन्तु जितना वे अन्य देशोमें सफल हुए उतना यहां नहीं हो पाये.
इस बातका मुस्लिमोंको अफसोस भी नहीं था. क्यों कि ६०० वर्षके अंतरालमें खुदका राज बचाने की नौबत उनको आगयीं थीं. जब औरंगझेब मृत्युशैया पर था तब मुगल साम्राज्य तहस नहस हो गया था.
अंग्रेजोंने कूट नीति चलायी. भारतीयोंको गलत और विभाजनवादी इतिहास पढाया. अंग्रेजी भाषाको भारतीयों पर ठोक दी. अंग्रेजी भाषाके जाननेवालोंको नौकरीयोंकी सुविधाएं दी. उनका मान बढाया. पाश्चात्य शिक्षाको ही स्विकृति दी. हिन्दुधर्म के पुरस्कर्ताओंको धर्मांध ठहेराया. हिन्दुओंके लिखे पुस्तकोंको सर्वांश नकार दिया.
इतना करने के बावजुद भी, हिन्दुओंके सामने इन लोगोंकी पराजय हर मोड पर निश्चित थी. उन्होने ऐसे हाथोंमें स्वतंत्र भारतका सुकान दिया कि जो संस्कारमें उनकी योजना आगे चलायें.

वह था नहेरु.

उसने विभाजन वादी प्रक्रियाएं चालु रक्खी. और पाश्चात्य पंडितोंने लिखा हुआ इतिहास भी चालु रक्खा. हिन्दुओंको अपमानित करना चालु रक्खा. मुसलमानोमें यह भावना रक्खी की वे हिन्दुओंसे भीन्न है.

मुसलमान समझने लगे कि उनका इतिहास अधुरा है. ख्रिस्ती भी ऐसा समझने लगे कि उनका इतिहास भी भारतमें अधुरा है. क्यों कि दोनों भारत को ९५-१०० प्रतिशत अ-हिन्दु कर नहीं पाये.

मुसलमानोंका इतिहास क्या है?
जहां भी उनका शासन हुआ वहां उन्होने १०० प्रतिशत जनताका धर्म परिवर्तन किया और सबको मुस्लिम बना दिया. यहां तक कि ईजिप्त, सुमेरु बेबीलोनकी सुसंस्कृत संस्कृतियोंका पतन किया. उनके धर्मस्थानोंको तोड दिया. उन धर्मस्थानोंके उपर अपने धर्मस्थान बनाये. वहांकी जनताका जबरदस्तीसे धर्म परिवर्तन किया. मुस्लिम शासकोंने हर जगह ऐसा ही किया था. भारतमें भी उन्होने हजारों देवस्थानोंको नष्ट किया. नालंदा, तक्षशीला, वलभीपुर जैसे विश्वविद्यालयोंको भी पूरी तरह नष्ट किया था. किन्तु भारतमें कई राजाओंने उनको पराजित किया इस लिये वे अपने ध्येयमें १०० प्रतिशत सफल नहीं रहे.

ख्रिस्ती शासकोंने क्या किया?
उन्होनें वही किया जो मुस्लिमोंने आतंकवादी बनके अन्यत्र किया था. उसके उपरांत ख्रिस्ती शासकोंने वहांके आदिवासीयोंका करोडोंकी संख्यामें कत्ल किया. उनकी भाषा भी नष्ट की. आज अमेरिकाके बचे हुए आदिवासी सब ख्रिस्ती है. उनकी मूल भाषा भी विलुप्त हो गयी है. माया-संस्कृतिका और उस धर्मको माननेवालोंका एक आदमी आपको कहीं भी मिलेगा नहीं. केवल इतिहासके पन्नों पर माया संस्कृति और उसकी भाषा आपको मिलेगी.

THEY ARE ENDED UP

किसी भी संस्कृतिको अगर नष्ट करना है तो उसकी भाषा, प्रणालीयां और धर्मस्थानोंको नष्ट करदो तो वह अपने आप नष्ट हो जायेगी.

भारतमें अब तक नहेरुवीयन कोंग्रेसका शासन था. इन्होने हिन्दु धर्मको धर्म निरपेक्षताके नाम पर कई सारे आघात किये. जो विधर्मी शासकोंने भारत पर शतकों वर्ष तक शासन किया था उनके धर्मको माननेवालोंको रीयायतें दी. वे लोग हिन्दुओंका धर्म परिवर्तन कर सके, उसके लिये भी सुविधायें दी. उनके लिये अलग नागरिक नियम बनायें. बहारसे पैसे लाके ये विधर्मी लोग भारतीय जंगलवासीयोंको, पर्वतवासीयोंको और समूद्रके किनारेके वासीयोंको हिन्दुमेंसे परधर्मी कर सके उसके लिये सुविधायें दी.
अगर कोई विधर्मी, हिन्दु धर्मके विरुद्ध बोलें, तो सरकारका रवैया रहा कि, भारत तो, एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है इसलिये सरकार उसमें दखल नहीं करेगी. वाणीस्वातंत्र्य और अपने धर्मका प्रचार करना विधर्मीयोंका अधिकार माना गया. लेकिन कोइ हिन्दु अगर ऐसा कुछ करें तो उसको धर्मांध कहेना, उसकी हर बातको भगवाकरण मानना, और उसकी निंदा करना एक फेशन मनवायी गयी. भगवाकरण शब्दको गाली के रुपमें प्रस्तूत किया ग्या. आदि आदि
हिन्दुओंको नष्ट करनेका अब यही एक उपाय बचा है कि, सामान्य कक्षाके हिन्दुओंको असंजसमें डालो, अपमानित करो, उनकी यातनाओंकोके प्रति दूर्लक्ष्य दो, विभाजित करो.

जो मूर्धन्य है उनमेंसे अधिकतरोंको तो भ्रष्ट करना आसान है. बाकि जो हिन्दु बचें, उनके विरुद्धमें विवाद खडा करके बदनाम किया जायेगा तो वे तो वैसे ही आम जनताकी नजरोंमेंसे गीर जायेंगे. नरेन्द्र मोदीको क्या किया गया? उसके इतिहास के संदर्भमें दिये गये उदाहरणोंको तोडमोड के प्रदर्शित किया गया, और उनको खुब उछाला. उसकी अंग्रेजी भाषाके उपर बेवजह ही मजाक उडाया. वह अगर किसी बात पर प्राथमिकता दें तो उसके उपर विवाद खडा किया जाता है.

एक बार अगर हिन्दु जनसंख्या ६० प्रतिशत हो जाय तो फिर उनको नष्ट करना आसान है.

सत्तालोलुप विधर्मीयों जिनमें कुछ प्रच्छन्न विधर्मी भी है, उनके लिये यह तो बायें हाथ का खेल है. क्यों कि विधर्मी ख्रिस्ती और मुस्लिम संस्कारमें तो एक समान ही है. दोनों समझते है कि उनका ही धर्म ईश्वरको मंजुर है. और विधर्मीयोंको किसीभी साधनसे नष्ट करना ईश्वरको मंजुर है.

फिलहाल विधर्मीयोंने भारतके कई राज्योंमें अपने बहुमत वाले टापु बना दिये है. ये लोग उनमें बसे हिन्दुओंके उपर आतंक करके उनका धर्म परिवर्तन कर देते हैं. अगर उन्होने धर्म परिवर्तन नहीं किया तो उनको घर छोडके भाग जाने पर मजबुर कर देते हैं. केराला, तामिलनाडु, पश्चिम बंगालके कई कस्बोंका यही हाल है. उत्तरपूर्वी राज्यों पर तो इन्होंनें कबजा जमा ही लिया है.

भारतका सामान्य जन विधर्मीयोंके इस प्रकारके आचारोंसे अज्ञात है. क्यों?

क्यों कि,

समाचार माध्यमों पर इन विधर्मीयोंका कब्जा है.

विधर्मी संचालित समाचार माध्यम अपने धर्मकी आतंकवादकी घटनाओंको प्रसारित करते नहीं है.
कश्मिरके हिन्दुओंके उपर किये गये आतंकको किस चेनलने प्रमाणके आधार पर प्रसारित किया था या किया है? एक भी नही.
विधर्मीयोंका आतंकवाद आज भी चालु है.
लेकिन कौनसी चेनल हिन्दुओंके मानव अधिकारकी रक्षाके लिये जागृत है? प्रमाण भान रखना और विधर्मीयोंके मानव अधिकारको मान्यता देना, इन बातोंमें ये मुस्लिम और ख्रिस्ती लोग मानते ही नहीं है.
एक बात सही है कि सामान्य ख्रिस्ती लोग, हिन्दुओंके विरुद्ध वाचाल नहीं है. वे अलग वसाहत नहीं बनाते है और हमारी ही कोलोनीमें हमारी पडोसमें ही रहेते है और हमसे तदृप होके रहेते है. लेकिन उनके जो मूर्धन्य और धर्मगुरु होते है वे सक्रीय होते है. वे लोग अपनी सामान्य जनताको यही कहेते है कि आप लोग, सिर्फ हम कहें उनको ही, चूनावमें वॉट दो. बाकीका काम हम कर देंगे.

मुस्लिमोंको सही रस्ते पर लाना शायद शक्य हो सकता है. किन्तु ख्रिस्तीयोंको सही मार्ग पर लाना कठिन है. क्यों कि उनको तो समझाया गया है कि आपका उद्धार तो हमने ही किया है. इन भारतवासीयोंने तो आपको हाजारों सालों तक यातनाएं ही दी है. क्यों कि वे हिन्दु है.

आप जरुर कहेंगे कि, पी. के. जिन हिन्दुओंने देखी है उनमेंसे कई हिन्दुओंने उसकी प्रशंसा की है. उसका क्या?

यदि आप प्रशंसा करनेवालोंका वर्गीकाण करेंगे तो उसमें दो प्रकारके लोग है. एक सामान्य कक्षाके लोग, जिनमें कुछ लोगोंका एक स्वभाव होता है कि किसी भी बात को “एक साक्षीभाव”के रुपमें देखें.
जब ऐसा होता है और जब उनको हिन्दु धर्मका शास्त्रीय ज्ञान नहीं होता है तो ये सामान्य लोग, दुसरोंकी व्युह रचनाएं नहीं समझ सकते और व्युहरचना करने वालोंका हेतु भी समझ नहीं सकते. अगर उनमें प्रमाणिक प्रज्ञा और प्राथमिकताती प्रज्ञा होती तो वे व्युह रचना बनानेवालों की व्युह रचना समझ सकते.

आप कहेंगे कि, कुछ मूर्धन्योंने भी तो, पी. के. की प्रशंसा की है, जैसे कि एल के अडवाणी. उसका क्या?
आपकी बात सही है. लेकिन आपको ज्ञात होना चाहिये कि दंभी धर्मनिरेक्षता करनेवालोंने एक ऐसी हवा प्रसारित की है कि, अडवाणी एक सोफ्ट और धर्मनिरपेक्ष नेता है. भारतको एक सोफ्ट नेता पसंद है. जैसे कि अटलजी भी एक सोफ्ट नेता था इसलिये वे भारतीय जनतामें स्विकार्य बने…. आदि… आदि..
वास्तवमें यह “सोफ्ट” वाला मामला एक सियासती व्युहरचना है. भारतीय जनताको एक विकल्प चाहिये था. भारतीय जनता नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनके साथीयोंके उनके सीमाहीन भ्रष्टाचार, ठग विद्या, दंभ और कोमवादसे त्रस्त हो गई थी. जब जब भारतीय जनताको विकल्प मिला है, उसने नहेरुवीयन कोंग्रेसको पराजित किया है.

यह बात भी समझ लो कि, नाम बडा हो जानेसे व्यक्ति बडा नहीं हो जाता.

कई बडे व्यक्तिओंमें एक निम्न कक्षाका व्यक्ति होता है.

small people Big name

लालु, माया, मुलायम, जया, करुणा, ममता, नितीश, अडवाणी, केशु, संकरसिंह वाघेला, फारुख, ओमर, मुफ्ती मोहमद, रसिकलाल, जिवराज, हितेन्द्र, ईन्दिरा, राजीव, सोनीया, राहुल …. अगर आप लिखोगे तो एक किताब बन जायेगी.

उपरोक्त लोग दुसरोंके कन्धे पर बैठके बडे नामवाले बने है.

वास्तवमें ये सब निम्न कक्षाके है, और इनलोगोंको नेता मानने वाले तो अति निम्न कक्षाके है.
उसी तरह कई छोटे लोगोंके शरीरमें, एक महान व्यक्ति बैठा हुआ होता है. जैसे नरेन्द्र मोदी, बाबा रामदेव, जोर्ज फर्नाडीस, बाबुभाई जसभाई पटेल, सरदार पटेल, महात्मा गांधी, विवेकानंद, दयानंद सरस्वती … इन नेताओंकी भी एक सूची बन सकती है जो सामान्य होते हुए भी महान बने.
ऐसे भी कई लोग होते है जो महान होते हुए भी, शक्यताके सिद्धांतके अनुसार महान बन नहीं पाये.

आप कहोगे कि पी. के. में कोई व्युह रचना अगर है भी, तो वह कौन कौन सी व्युह रचना हो सकती है? और ऐसी मान्यताका आधार क्या है?

फिल्म उद्योग काले धनको सफेद करनेका एक सडयंत्र है यह बात सबको ज्ञात है.
पी. के. ने सीनेमा टीकीट का मूल्य बढा दिया था. जो सीनेमाघर खाली थे या “हाउसफुल” नहीं थे उनको भी “फाउसफुल” घोषित किये गये थे.
मान लिजिये अगर एक सीनेमा घरकी बैठकें १००० है. और टीकीटका मूल्य १४० रुपया है. और अगर वास्तवमें २०० टीकीट की ही बीक्री हुई किन्तु हाउसफुल घोषित किया गया तो कितना काला धन सफेद हुआ?
१४० में ४० रुपया सरकारी कर है.
(१) सीनेमा घरके मालिकके पास २०००० रुपये आये.
(२) किन्तु सरकारके हिसाबसे उसके पास १००००० आया.
(३) सरकार सीनेमाघरके मालिक की आवक ८००० मानेगी. उसके उपर ३० प्रतिशत आयकर लगायेगी. यह २४०० रुपये हुए. वास्तविक नफा १६०० था. और वास्तवमें उसको ४८० रुपया आयकर ही भरना था. तो भी उसने २४०० रुपया आयकर भरा. १९२० रुपया अधिक आयकर भरा.
(४) निर्माताने क्या किया? उसने ९२००० का ८ प्रतिशत यानी ७३६० नफा दिखाया, जो वास्तवमें १४७२ था. उसने ५८८८ रुपया ज्यादा दिखाया. मान लो की उसने सीनेमाघरके मालिकने जो १९२० ज्याद कर भरा था उसकी पूर्ती की या न की तो भी उसकी आयका नफा करीब ४००० रुपया हुआ. जो वास्तवमें ८०० रुपया था. ३२०० रुपया नफा ज्यादा दिखाया.
(५) यह तो एक शॉ की बात हुई और नफेकी ही बात हुई. खर्च तो इससे १२ गुना ज्यादा है. वह भी तो काले धनमेंसे खर्च किया था.
युपी और बिहार की जनताने टेक्ष फ्री किया. तो उनको भी हिस्सा मिला होगा जो दानके स्वरुपमें या उनके काले धनमें जायेगा.

यह काला धन सिर्फ काला ही नहीं है. वह लाल भी है. लाल धनसे मतलब है, असामाजीक तत्वोंकी कमाई, जो सुपारी, आउटओफ कॉर्ट प्रोपर्टी सेटलमेन्ट, ड्रग्झ, हवाला आदि सब है. नहेरुवीयन कोंग्रेसने पैदा की हुई दाउद गेंगका बडा नेटवर्क है.

ईन गद्दरोंसे दूर रहो.

शिरीष मोहनलाल दवे
टेग्झः वेद, उपनिषद, प्रमाण, गीता, प्रत्यक्ष प्रमाण, ज्ञातिप्रथा, भारत, हिन्दु धर्म, गहनता, मुस्लिम, इस्लाम, ख्रिस्ती, आक्रमण, अंग्रेज, माया-संस्कृति, नहेरुवीयन, निम्नकक्षा, धर्म परिवर्तन, भगवाकरण, मूर्धन्य, विधर्मी, मानव अधिकार, साक्षीभाव, कोमवाद, फिल्म, हाउसफुल, कालाधन, लालधन,

Read Full Post »

झिम्बो कम्स टु टाउन यानी केज्रीवाल कम्स  टु गुजरात

झिम्बो कम्स टु टाउन

टीवी चेनल

एक पेईड टीवी चेनल वालेने कहा मोदी गभरा (डर) गया है. अब तक मोदी सवाल पूछता था. अब मोदी गभरा गया है उसको लगा, अरे ये सवाल पूछने वाला और कहांसे पैदा हो गया?

टीवी चेनल पर टीपणी करना व्यर्थ है. उनको अपने पेटके लिये पाप करने पडते है. नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंको और टीवी चेनलोंको अपने अस्तित्वको सिद्ध करनेके लिये या बनाये रखने के लिये कुछ न कुछ व्यर्थ और अर्थहिन बातें करनी पडती है.

नहेरुवीयन कोंग्रेस वाले पैसे देतें है. चेनलवाले अगर पैसे मिलते है तो क्यूं छोड दें? सवाल पूछना कोई बडी बात नहीं है.

अखबारी कटारीया (Columnist)

केजरीवाल जटायु इसलिये नरेन्द्र मोदी रावण

यह कटारीया महाशय वैसे तो नरेन्द्र मोदीको कटारीया, पंच (मुक्का) मारने का मौका ढूंढते ही रहते है, और अगर मौका न मिले तो भी नरेन्द्र मोदीको विशेष्य बनाके एक पंच लगा ही देते है. इस महाशयने केज्रीवालको जटायु का नामाभिकरण करके नरेन्द्र मोदीको रावण घोषित कर दिया. नरेन्द्र मोदीने कौनसी सीताका अपहरण किया है, इस बात पर यह भाईसाब मौन है. ऐसा व्यवहार वैसे तो नहेरुवीयन कोंग्रेसी संस्कार है. नहेरुवीयन कोंग्रेसी कल्चर यह है कि बस कथन करते जाओ और कैसा सुंदर कहा ऐसा गर्व लेते जाओ. इन्दीरा गांधीने भी १९६८में कहा था कि मेरे पिताजी तो बहूत कुछ करना चाहते थे लेकिन ये सब बुढे लोग उनको करने नहीं देते थे. उस समयके समाचार माध्यमोंने और मूर्धन्योंने तालीयां बजायी थी. ईसी कारणसे तो इन्दीर गांधीका होसला बढा था और भारतीय जनताको नहेरुवीयनोंकी आपखुदी देखनी पडी थी और देशको हरेक क्षेत्रमें पायमाली देखनी पडी थी.  

सवाल है थ्री नोट थ्री

खुदको एक गांधी वादी और सर्वोदयी मानने वाला कटारीयाने [कटार लेखकने (प्रकाश शाहने)] दिव्यभास्कर ८, मार्च में अपनी कटारमें (कोलममें) कहा, केजरीवालने नरेन्द्र मोदी को थ्री नोट थ्री टाईप सवाल पूछे.

कटारीया लेखकश्रीको शायद मालुम नहीं है, कि, थ्री नोट थ्री का मतलब क्या होता है. शब्दों पर बलात्कार करना मूर्धन्योंको शोभा नहीं देता. कटारीया लेखकश्रीजीको मालुम होना चाहिये कि थ्री नोट थ्री लगने पर आदमी जिंदा रहेता नहीं है. और जो सवाल केज्रीवालने पूछे वे सब सवाल देशकी सभी सरकारोंको पूछा जा सकता है. अगर सवालोंके पीछे भ्रष्टाचारोंकी सच्चाई है तो केन्द्रमें नहेरुवीयन कोंग्रेसकी सरकार है. उसको पहेले पूछो. अगर वह भी भ्रष्ट है तो पब्लिक ईन्टरेस्ट पीटीशन दाखिल करनेसे किसको कौन रोकता है?    

उसने यह भी कहा जो सुत्र हमने उससे ही पढा कि, “शीला दिक्षितको हराया है अब मोदीकी बारी है.” प्रासानुप्रास से सत्य तो सिद्ध नहीं होता है लेकिन हमारे कटारीया लेखक इसमें भावी संभावना देखते है और खुश होते है.  कटारिया लेखकश्री लिखते है; “एक (भ्रष्टाचारकी) प्रतिमा (शीला दिक्षित)को खंडित किया है. इसलिये दुसरी प्रतिमा (नरेन्द्र मोदी) भी खंडित हो सकती है.” इति सिद्धम्‌. महात्मा गांधी स्वर्गमें शायद अपने अनुयायी के ऐसे तर्कसे आहें भरतें हो गये होगे.

इमानदारी निश्चित करनेका केज्रीवालके पास यंत्र है

नहेरुवीयन कोंग्रेस तो भ्रष्ट है ही, इसलिये केज्रीवाल नहेरुवीयन कोंग्रेसके नहीं है. केज्रीवाल को बीजेपी का साथ भी नहीं चाहिये क्यों कि, बीजेपी भी भ्रष्ट है. आम आदमी पार्टी भ्रष्टाचार मात्रके विरुद्ध है. इसलिये वह अपने पक्षमें सभी उम्मिदवारोंकी पार्श्व भूमि देखके जांच करके उनका चयन करती है. जब तक सत्ता नहीं होती है, सब लोग इमानदार होते है. बच्चा अपने जन्मके साथ भ्रष्टाचारी होता नहीं होता है. शायद इस बात केज्रीवालको मालुम नहीं होगी.

जे एल नहेरु भी इमानदार थे. भ्रष्टाचार केवल आर्थिक भ्रष्टाचार नहीं हो सकता. अविधेय और अनीतिमान तरिकोंसे सत्ता प्रप्त करना, जूठ बोलना, छूपाना, दूसरोंका हक्क छीन लेना, अपमान करना, भेदभरम करना, वेतन लेना किन्तु काम कम करना, देरसे आना, आदि सब भ्रष्टाचार ही है. भ्रष्टाचारके बारेमें नहेरुवीयन खानदानसे ज्यादा अच्छी मिसाल नहीं मिल सकती.

भ्रष्टाचार एक सापेक्ष होता है. प्रमाणभान की प्रज्ञासे ही ज्ञात हो सकता है कि किसको प्राथमिकता देनी चाहिये. हमारी गति ज्यादासे कम भ्रष्टाचारी की दिशामें होनी चाहिये. क्यों कि निरपेक्षता पूर्ण नीतिमत्ता वाला कोई होता ही नहीं है. जैसे अहिंसा सापेक्ष है वैसे ही भ्रष्टाचार भी सापेक्ष है. लेकिन केज्रीवाल को शायद यह बात मालुम नहीं है.

समय मिलने पर कौन कब भ्रष्टाचारी बन जायेगा इस बातका किसीको भी पता नहीं है. महात्मा गांधी खुद नहेरुको पहेचान नहीं पाये थे कि, वह सत्ताके लोभमें देशके अर्थ तंत्रको और देशकी शासन व्यवस्थाको गर्तमें ले जायेगा. तो यह केज्रीवाल कौन चीज है?

देखो नहेरु, गांधीजीके बारेमें कैसा सोचते थे? पढो निम्न लिखित पैरा.

नहेरु की दृष्टिमें महात्मा गांधीः
कुछ लोग समझते है कि महात्मा गांधी को नहेरु बहुत प्रिय थे. वास्तवमें ऐसा नहीं था. लेकिन गांधी तत्कालिन कोंग्रेसको तूटनेसे बचाना चाहते थे. खण्डित भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने गांधीजीके बारे में कहा था – ” ओह दैट आफुल ओल्ड हिपोक्रेट ” Oh, that awful old hypocrite – ओह ! वह ( गांधी ) भयंकर ढोंगी बुड्ढायह पढकर आप चकित होगे कि क्या यह कथन सत्य हैगांधी जी के अनन्य अनुयायी दाहिना हाथ मानेजाने वाले जवाहर लाल नेहरू ने ऐसा कहा होगाकदापि नहींकिन्तु यह मध्याह्न के सूर्य की भाँति देदीप्यमान सत्य हैनेहरू ने ऐसा ही कहा था प्रसंग लीजियेसन 1955 में कनाडा के प्रधानमंत्री लेस्टर पीयरसन भारत आये थेभारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के साथ उनकी भेंट हुई थी भेंट की चर्चा उन्होंने अपनी पुस्तक इन्टरनेशनल हेयर्समें की है
सन 1955 में दिल्ली यात्रा के दौरान मुझे नेहरू को ठीकठीक समझने का अवसर मिला थामुझे वह रात याद हैजब गार्डन पार्टी में हम दोनों साथ बैठे थेरात के सात बज रहे थे और चाँदनी छिटकी हुई थीउस पार्टी में नाच गाने का कार्यक्रम थानाच शुरू होने से पहले नृत्यकार दौडकर आये और उन्होंने नेहरू के पाँव छुए फिर हम बाते करने लगेउन्होंने गांधी के बारे में चर्चा कीउसे सुनकर मैं स्तब्ध हो गयाउन्होंने बताया कि गांधी कैसे कुशल एक्टर थेउन्होंने अंग्रेजों को अपने व्यवहार में कैसी चालाकी दिखाईअपने इर्दगिर्द ऐसा घेरा बुनाजो अंग्रेजों को अपील करे गांधी के बारे में मेरे सवाल के जबाब में उन्होंने कहा – Oh, that awful old hypocrite नेहरू के कथन का अभिप्राय हुआ – ” ओह ! वह भयंकर ढोंगी बुड्ढा( ग्रन्थ विकास , 37 – राजापार्कआदर्शनगरजयपुर द्वारा प्रकाशित सूर्यनारायण चौधरी की ‘ राजनीति के अधखुले गवाक्ष ‘ पुस्तक से उदधृत अंश )

नेहरू द्वारा गांधी के प्रति व्यक्त इस कथन से आप क्या समझते है?

महात्मा गांधी जैसा महान आर्षदृष्टा भी नहेरु कभी ऐसा बोल सकते है वह समझ नहीं पाये. यह बात सही है कि शायद नहेरुके पागलपनसे ही उन्होने कोंग्रेसको समाप्त करनेकी सलाह दी थी. लेकिन जो नहेरु क्रीप्स कमीशनका बहिष्कार नही कर सकता था वह सत्ता देनेवाली कोंग्रेसका कैसे विलोप कर सकता है. सरदार पटेल नहेरुके भरोसे कोंग्रेसको और देशको छोडना नहीं चाहते थे. इसलिये जब तक सरदार पटेल थे तब तक न तो तिबत्त पर चीन हमला कर सका न तो भारत सरकारने चीन का सार्वभौमत्व तिबत्त पर स्विकारा, न तो भारत सरकारने पंच शील का करार चीनके साथ किया.       

सवालों के आधार पर केज्रीवालका ग्लोरीफीकेशन?

छोटे बच्चे भी कई सवाल करते है. सवाल करके अपना ज्ञान बढाते है और दुनियाको समझते है. लेकिन जब मनुष्यकी उम्र बढती है तो वह वह सवाल कम पूछता है और जवाब अपने आप ढूंढता है. और जवाब ढूंढनेके लिये दूसरोंसे सलाह मशवरा करता है.

केज्रिवालने क्या किया?

उसने गुजरातमें आनेसे गुजरातकी पोल खोलनेका मनसुबा बना लिया था. केज्रीवाल के एक साथीने तो उद्घोषित भी कर दिया कि, नरेन्द्र मोदी यह बताये कि वह कहांसे चूनाव लडने वाला है. हमारे केज्रीवाल वहांसे ही चूनाव लडेंगे. हमारे उपरोक्त खुदको गांधीवादी मनानेवाले कटारीया लेखश्रीने तो लिख ही दिया जब नरेन्द्र मोदीको पता चला कि अगर वह बनारससे चूनावके लिये खडा रहेगा तो केज्रीवाल उसके सामने खडा रहेगा. तो नरेन्द्र मोदीने अब बनारससे चूनाव लडना रद कर दिया है. वैसे नरेन्द्र मोदीके बारेमें और उसके व्यावहारोंके बारेमें उसके विरोधींयोंने अफवाहें फैलानेका बडा शौक बना रखा है. वे अफवाहोंवाली भविष्यवाणी भी करते हैं और खुदको खुश करते हैं.

अफवाहें फैलाओ और तत्कालिन खुश रहो

गुजरातीमे एक मूंहावरा है. मनमें ही मनमें शादी करो (खुशी मनाओ) और बादमें रंडापा भी भुगतो. क्योंकि वास्तविक शादी तो की ही नहीं है.  [मनमांने मनमां परणो अने मनमांने मनमां पछी रांडो].

वैसे तो सियासतमें ऐसी प्रणाली नहेरुने चालु की थी. ईन्दीराने सरकारी तौरसे अफवाहें फैलानेका बडे पैमाने पर चालु किया था. आपतकाल इन्दीराई सरकारके लिये अफवाहें फैलानेका सुवर्णकाल था. यह तो नहेरुवीयन कोंग्रेसीयों की आदत ही बन गई है. तो उनके साथमें वैचारिक या मानसिकता से साथ रहनेवाले कैसे अलिप्त रहें? “अगर गैया भी गधोंके साथ रहें तो कमसे कम लात मारने की आदत बना ही देती है”. वैसे तो ये नहेरुवीयन कोंग और उसके साथी गैया जैसे नहीं है. वैसे तो ये सब नहेरुवीयन कोंग्रेसकी तरह वृकोदर ही है.

मान न मान मैं तेरा महेमान?

गुजरातकी नहेरुवीयन कोंगीनेता नेताने कहा कि नरेन्द्र मोदीको केजरीवालको मिलना चाहिये था.  केजरीवाल तो गुजरातका महेमान था. महेमानको मिलनेसे इन्कार करना महेमानका अपमान है.  केज्रीवालने भी यह बात दोहराई है.

गुजरातके महेमान केज्रीवाल

यह एक ऐसा महेमान है, जिसने नरेन्द्र मोदीको कहा ही नहीं कि मुझे तुम्हे मिलना है. केज्रीवालने यह अवश्य कहा कि, मैं गुजरातकी पोल खोलने वाला हुं. चलो इस बातका स्विकार करते है कि, महेमान तिथि बताके आते नहीं है. लेकिन क्या कभी महेमान, पहेले पूरा घुमघामके यजमान की भरपेट बुराई करके यजमानके पास जाते है? 

महेमानने क्या किया?

केज्रीवालने सबसे पहेले तो भरपेट रेलीयां की. वैसे रेलियों की गुजरातमें कमी नहीं. क्यों कि नहेरुवीयन कोंग्रेस यही काम ११ सालोंसे गुजरातमें कर रही है. जब पूरे देशमें आपतकाल था और सभा सरघसकी पाबंदी थी, तब गुजरातमें कुछ समय तक जनता मोरचेकी महात्मा गांधीवादी बाबुभाई जशभाईकी सरकार थी. बाबुभाई जशभाईने लोकशाही मूल्योंको नष्ट किया नहीं था. तब ये नहेरुवीयन कोंग्रेसी बाबुभाई जशभाई पटेलकी सरकारके विरुद्ध प्रदर्शन करते ही रहते थे. इन्दीरा गांधी विपक्षको खुदके विरुद्ध किये गये प्रदर्शन के कारण गालीयां देती रहती थीं, उसका मापदंड अपनोंके लिये अलग ही था. पूरे देशमें आपतकालकी नहेरुवीयन आपखुदी चल रही और लोकशाही मूल्योंका गला घोंट दिया था. तब बाबुभाईने गुजरातमें लोकशाही को जिन्दा रक्खी था.

जनता यह खूब समजती हैं कि रेलियां मुफ्तमें नहीं होती है यह बात रेली करने वाले भी सब लोग जानते है. केज्रीवालकी रेलीयां भी मुफ्तमें होती नहीं है. अगर घीसेपीटे आक्षेप ही करना है और सूत्रोच्चार ही करने है तो अखबार वालोंको और टीवी वालोंको फोटु खींचवाने के लिये बुलाना ही पडेगा. बेनर और प्लेकार्ड भी बनाना पडेगा. रेलीयोंमे इस गुजरातके महेमानने नरेन्द्र मोदीको बिना विवरण वाले आक्षेप किये. और बादमें नरेन्द्र मोदीको मिलने गये. केज्रीवाल वैसे तो खुदको आम आदमी है वैसा समझानेकी भरपूर कोशिस करते है, लेकिन नरेन्द्र मोदीके पास खुदको भूतपूर्व सीएम बताया. अगर केज्रीवाल भूत पूर्व सीएम भी है, तो उनको अपनी मुलाकात पूर्वनिश्चित करने चाहिये थी.

नरेन्द्र मोदीने क्या कहा?

“साक्षीभावसे मिलनेके लिये आये होते तो जरुर मिलता”

यह नरेन्द्र मोदीका उच्च संस्कार है कि उसने केज्रीवाल को यह नहीं बताया कि रेलीयोंमे मुझ पर आक्षेपबाजी करके अब महेमान बनके कैसे आ रहे हो?

नरेन्द्र मोदीने परोक्षरुपसे यह संदेश दिया, कि देखो भाई देशमें कई समस्या है. उसका समाधान निकालना एक शैक्षणिक कार्य है. इसके बारेमें बिना आक्षेप किये, चर्चा हो सकती है. यह चर्चा तटस्थ रुपसे और विवेकपूर्ण होनी चाहिये. ऐसा करना भारतीय संस्कृतिकी परंपरा है. शंकराचार्यने भी तत्वज्ञानकी चर्चा ऐसे ही की थी. उन्होने किसीके उपर आक्षेपबाजी करके चर्चा नहीं की थी. जब हमें सत्यको ढूंढना है तो खुदके मनको समस्यासे अलिप्त रखना चाहिये. इसको गीतामें साक्षीभाव कहा गया है. हे केज्रीवालजी आप अगर   साक्षीभावसे आये होते तो मैं आपको अवश्य मिलता और चर्चा भी करता.

नरेन्द्र मोदीके और केज्रीवालके संस्कारके इस भेदको समझना अखबारी मूर्धन्योंके लिये, और खुद केज्रीवालके लिये बसकी बात नहीं. समस्याके समाधानके लिये साक्षीभाव लानेकी बात इनके दिमागके बाहर की बात है.

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः महेमान, गुजरात, भूतपूर्व, सीएम, आम आदमी, केज्रीवाल, नरेन्द्र मोदी, मुलाकात, नहेरुवीयन संस्कार, प्रदर्शन, बुराई, लोकशाही मूल्य, गलाघोंटना, साक्षीभाव, अखबारी, कटार  लेखक, मूर्धन्य, दिमागके बाहर  

Read Full Post »

%d bloggers like this: