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Posts Tagged ‘स्मृति ईरानी, मानव संसाधन विकास, मंत्रालय, कपडा मंत्रालय, लोटरी कांड, एन्डरश’

स्मृति ईरानीके उपर मीडीयाके प्रहार

smriti irani

भारतीय मीडीया के कुछ लोग अपनेआपको सुज्ञ मानने वाले हैं. और ये लोग स्मृति ईरानीके मंत्रालय परिवर्तन पर उनके उपर तूट पडे हैं.

स्मृति ईरानीके हाथसे मानव संसाधन विकास मंत्रालय ले लिया है, और उनको कपडा मंत्रालय दिया है.

वैसे तो दोंनो मंत्रालय महत्त्वके है, किन्तु जो लोग स्वयंको ज्ञानी समज़ने वाले हैं, और जिनको स्मृति ईरानी पसंद नहीं थीं, वे अब इस विषय पर अपनी प्रज्ञाको कष्ट दे रहे हैं. वे लोग यह अवगत कराने का प्रयत्न कर रहे हैं कि स्मृति ईरानीके हाथसे मानवसंसाधन विकास मंत्रालय छिन लिया है और उसको मानवसंसाधन विकास मंत्रालयसे कम महत्त्ववाला कपडा मंत्रालय दिया गया है.

ये लोग, ऐसा संदेश यह चाहते हैं कि स्मृति ईरानी अपना मंत्रालय सही ढंगसे नहीं चला रही थीं इसलिये उनको कम महत्त्ववाला कपडा मंत्रालय दिया गया है.

जो लोग वास्तवमें सुज्ञ है उनको मालुम है कि महाराष्ट्रके सदाकाल दिग्गज माने जाने वाले नेता शरद पवार भी कपडा मंत्री रह चूके है.

कपिल सीब्बल और अर्जून सिंह मानव संसाधन मंत्री रह चूके है. कपिल सीब्बल और अर्जून सिंह (लॉटरीकांडसे ख्यात और एन्डरशनको भागजाने की सुविधा उपलब्धकरानेवाले) मानव संसाधन मंत्री थे किन्तु ये लोग  जब मानव संसाधन मंत्री थे तब उन्होने कश्मिरके हिन्दुओके उपर हो रहे मानव अधिकार हनन पर कभी भी कुछ भी बोला नहीं था. और कोई भी कदम उठाया नहीं था. उतना ही नहीं उल्लेख भी किया नहीं था. उनके कर्मोंका हिसाब भी कभी किसीने मांगा नहीं था. उनके पूर्वकालमें तो किसीको ज्ञात तक नहीं था कि मानव विकास संसाधन नामका कोई मंत्रालय भी है या नहीं. क्यों कि यदि ऐसा मंत्रालय था तो भी वह किसी ओर मंत्रालय से संलग्न था.

हां एक बात अवश्य ही सबको ज्ञात था कि कपडा मंत्रालय नामका एक मंत्रालय है. यह मंत्रालय पैसे बनानेका बडा मंत्रालय था. कपडा मंत्रालय के नहेरुवीयन कोंग्रेस शासन अंतर्गत अनेक कपडा बनानेवाली मिलें बंद पडी थीं और अनेक श्रमिकोंकी छूट्टी हुई थीं. राजनीति बहुत चली. यह वार्ता अनंत है.

अब यह कपडा उद्योग विकेन्द्रित हो गया है और कपडा मिलका स्थान, पावर लुम्सने ले लिया है. कपास, सूत, वणाट, वणाट तकनिकी, शण उद्योग, सिल्क उद्योग, उन, गरम कपडा, रेडीमेड वस्त्रोद्योग, हेन्डलुम, हस्त उद्योग, आयात निकास आदि कई क्षेत्र इस मंत्रालयके अंतर्गत आते है. यह मंत्रालय भी मानव संसाधन विकास मंत्रालयसे यद्यपि अधिक ही महत्त्वका लगता है. किन्तु मीडीया मूर्धन्योंका काम स्मृति ईरानीको नीचा दिखाना है. इसलिये बार बार यह शब्द प्रयोग किया जाता है कि उनसे मानव संसाधन विकासका मंत्रालय छिन लिया गया है.

इन मूर्धन्योंको लगता है कि यह पर्याप्त नहीं है.

हमारे डी.बी. के महाशय क्या लिखते है?

स्मृति ईरानीके मानव विकास संसाधन मंत्रीके काल को डीबी महाशयने विवादास्पद कार्यकाल घोषित कर दिया. “विवादास्पद” इसलिये कि ऐसा कहनेसे उनको कुछ भी सिद्ध करनेका कष्ट करना नहीं पडता है.

“विवादास्पद” में वैसे तो तुलनात्मक विश्लेषण करना पडता है. और कुछ न कुछ तो कहेना ही पडता है.

तो क्या करें?

“स्मृति ईरानीकी डीग्री संदेहात्मक थी” इसकी सहायता लो.

वैसे तो सोनिया गांधीके कई प्रमाण पत्र भी संदेहात्मक है. वैसा ही उनके फरजंदके बारेमें है. किन्तु समाचार पत्रोंके तंत्री महाशयोंमें इतनी शूरवीरता कहां कि वे ऐसी बडी विवादास्पद वार्ता की चर्चा करें!! जार बाजरा का सवाल है.

आगे चलकर तंत्रीश्री लिखते है कि ऐसे अनेक विवादास्पद निर्णय स्मृति ईरानीने लिये.

अनेक का मतलब है एक नहीं.

“न एकः इति अनेकः”.

शून्य भी वैसे तो अनेक कहा जा सकता है.

किन्तु हम इतने तो बेवकुफ है नहीं. चलो एक और कुछ उदाहरण दे दो.

रोहित वेमुलाकी आत्महत्या:

वैसे तो रोहित वेमुलाने आतंकवादी याकुब मेमनके मृत्युदंडकी सजाका विरोध किया था. विरोध प्रदर्शन किया था. वैसे तो रोहित वेमुला अगर चाहता तो वह, याकुब मेमन की निर्दोषता के विषयमें न्यायालयमें जा के माहिति दे सकता था. वैसे तो याकुब मेमनका केस तो सालों तक चला था. वैसे तो रोहित वेमुला सालों तक बैठा रहा था.

यदि वेमुलाकी दृष्टिमें याकुब निर्दोष था तो उसका अर्थ यह हुआ कि वेमुलाके पास कुछ ऐसी माहिति थी जो न्यायालयके सामने रक्खी नहीं थी. यदि वेमुला इन माहितियोंको न्यायाधीशके सामने रखता तो न्यायाधीश याकुब मेमन को बा इज्जत बरी कर देता. वेमुला जिसको बचाना चाहता था वह याकुब मेमन वेमुलाकी अघोषित माहितिके अभावके कारण फांसी पर लटक गया.

इसका मतलब क्या हो सकता है?

इसका मतलब यही हो सकता है कि वेमुलाने ही जानबुज़कर याकुब मेमनको मरने दिया. और स्वयंके उपर याकुबकी मृत्युके पापका भार न पडे, इस लिये उसने विरोध किया. यदि ऐसा नहीं है तो वेमुला  नियम और नीतिके (लॉ एन्ड ऑर्डरके) शासनमें मानता नहीं है ऐसा ही सिद्ध होता है.

यदि वेमुलाके विश्वविद्यालयने वेमुलाको अन्याय किया है ऐसा कोई भी मानता है तो वेमुला और उसके हितेच्छु लोग न्यायालयमें जा सकते थे. पैसोंकी कमी कभी भी याकुब मेमन के हितेच्छुओंको पड सकती नहीं है. इस बातको तो पूरी दुनिया जानती है.

स्मृति ईरानी फोबीया पीडित

किन्तु हमारे स्मृति ईरानी फोबीया पीडित इन सर्व विषयों की चर्चा नहीं करेंगे. दिमागी बातें करना उनके लिये मना है ऐसा उनके अन्नदाताओंका आदेश है. खास करके घटना बीजेपीसे संबंधित हो तब तो अन्नदाताका आदेश मानना ही पडेगा.

कन्हैया कुमार ने जो देशविरोधी और पाकिस्तान परस्तीके नारे लगवाये उसके बारेमें डीबी के महाशयने उस घटनाके लिये “कन्हैया कुमारका असंतोष” शब्द प्रयोग किया है. डीबी महाशयने “कन्हैयाने देशविरोधी और पाकिस्तान परस्तीके नारे लगवाये” इसबातका उल्लेख तक नहीं किया है. क्योंकि ऐसा करते तो उनको स्मृति ईरानीके विरुद्ध जो संदेश देना है उसमें चोचला पड जाता.

इन महाशयने लिखा है कि “कन्हैया कुमारके असंतोषके प्रति स्मृति ईरानी असंवेदनशील रही थीं. और स्मृति ईरानीने कन्हैया जैसे विद्यार्थीयोंके असंतोषको भडकाया.”

ऐसा बेतुका प्रतिभाव तो भारतके कोमवादी (जो स्वयंको सेक्युलर मानते हैं और मनवाते हैं) पत्रकारित्व ही दे सकता है. यह पत्रकारित्वकी मानसिक बिमारी है. कन्हैया कुमारने जो प्रदर्शन करवाये वे कोई विद्यार्थी असंतोषके प्रदर्शन नहीं थे. वे प्रदर्शन तो देशद्रोहके ही प्रदर्शन थे. न्यायालयकी भी ऐसी ही टीप्पणी थी. अफज़ल यदि निर्दोष था तो उसके ये प्रेमी लोग (हमारे डीबीके तंत्री सहित जो कन्हैयाके “गद्दारीके नारों”को “विद्यार्थी असंतोष” की परिभाषा में आवृष्ट करते हैं) न्यायालयके पास जाते और जो काम वेमुलाने नहीं किया वह काम वे स्वयं करते. “गद्दारीके नारों”को “विद्यार्थी असंतोष” कहेना या तो गद्दारी है या तो दिमागी बिमारी है.

वर्तमान पत्रोंने और टीवी चेनलोंने, “वेमुला और कन्हैया” घटनाओंको, “वाणी स्वातंत्र्य” के अधिकार और वाणी स्वातंत्र्यकी सुरक्षाके नामको आधार बनाके अधिक उछाली थी. इसमें उत्तरदायित्व और योगदान तो कुछ विकृत सोच वाले समाचार पत्रोंका और टीवी  चेनलोंका ही था.

देशको विभाजित करने वाले मुद्दोंको उछालना स्मृति ईरानीकी आदत नहीं है. यह आदत तो विकृत सोचवाले कुछ वर्तमान पत्रोंकी और कुछ टीवी चेनलोंकी है.

दादरी की घटना, आरएसएस के एक नेताने कहा “आरक्षण पर पुनर्‌ विचारणा होनी चाहिये” जैसी अनेक घटनाएं घटी जिनसे स्मृति ईरानीका कोई संबंध ही नहीं है. और समाचार माध्यम वाले पूछ्ने लगे और महाध्वनि करने लगे कि “मोदी क्यों मौन है?” ऐसी घटनाओंमेंसे विकृत अर्थ निकालने वाले ये निम्न सोचवाले समाचार माध्यम वाले ही तो थे.

स्मृति ईरानीके विरुद्ध मानसिकता रखने वाले इन्दिरा, सोनिया, प्रियंका के विरुद्धमें कभी विवाद खडा नहीं करेंगे. उनको पूछने की तो बात ही भूल जाओ.

स्मृति ईरानीके विरुद्ध क्यों है?

यदि आप किसी व्यक्तिके विरुद्ध हो जाओ तो उसके कई कारण होते हैं. वे क्या हो सकते हैं?

  • कभी ऐसा भी होता है, कि आपका कोई मित्र है, या जाना माना है (या आप ऐसा मानते है या आप ऐसा न भी मानते हो किन्तु आपको वह, कोई भी कारणसे पसंद है), या तो कोई व्यक्ति प्रमाणपत्रधारी है, और ऐसे व्यक्तिके साथ उपरोक्त व्यक्तिने जो व्यवहार किया वह आपके सुनने के आधारपर योग्य नहीं था, तो आप उपरोक्त व्यक्तिके विरुद्ध हो जायेंगे.

  • मानव संसाधन विकास मंत्रालयसे संलग्न कई संस्थाएं है. उनमें कई सारे लोगोंका स्थानांतर (तबादला) और नियुक्तियां होती रहेती है. वैसे तो जब ऐसे स्थानांतर या नियुक्तियां हो रही थीं, उस समय वे चर्चाका विषय बनी नहीं थीं और न तो बनाई गई थीं. किन्तु चूं कि अब स्मृति ईरानीका अन्य मंत्रालयमें स्थानांतरण हुआ है, और आप स्मृति ईरानीके विरुद्ध है, और आपको विवरणका प्रयोजन भी मिला है, तो आप अब क्या करेंगे? आप ऐसा करें, जो घटनाएं कभी चर्चास्पद बनी ही नहीं थी, प्रकाशमें भी आई नहीं थी, वे चर्चास्पद थी, ऐसी अफवाह उत्पन्न कर सकते हैं. और ऐसे अधारपर आप स्मृति ईरानीने अपने मानवसंसाधन विकास मंत्रालयमें विवादास्पद कार्य किया था ऐसा कहकर स्मृति ईरानी की बुराई कर सकते हैं.और ऐसा ही इन कुछ समाचार माध्यमके महाशयोंने किया है.

  • उन्होने तो ऐसा भी कहा कि स्मृति ईरानीका अपने कार्यालयके अफसरोंसे सुष्ठु व्यवहार नहीं था. वे उनको अपमानित करती थीं और डांटती थीं. एक बात अवगत कर लो. कि ये सब बनी बनाइ बातें हैं. और कुछ मीडीया मूर्धन्योंके लिये अफवाहें फैलाना अपने व्यवसायका हिस्सा है. कन्हैयाकी घटना पर, और कैरवीके घटना क्रम के उपर इन मीडीया मूर्धन्योंका जो प्रतिभाव मिला वह इस तारतम्य को सिद्ध करता है. क्योंकि इन मीडीया मूर्धन्योंका ध्येय, येन केन प्रकारेण, नहेरुवीयन कोंग्रेसको और उसके सांस्कृतिक साथीयोंको सहाय करना है.

  • स्मृति ईरानी अत्याधिक तेज है. जैसा प्रश्नका स्तर और जैसी प्रश्नकी भाषा, उस आधार पर उनके उत्तरका स्तर और उनके उत्तरकी भाषा होती है. यदि प्रश्न शिष्टाचारयुक्त होता है तो उत्तर भी शिष्टाचार युक्त होता है. यदि प्रश्न आक्रमक होता है तो उत्तर भी आक्रमक होता है. जिसको जो भाषा समज़ाई दे उसी भाषामें उसको उत्तर मिलता है. स्मृति ईरानी के उत्तरसे सामनेवाला हतः होकर मौन हो जाता है. यह  कथन एक वास्तविकता है. आप युट्युब पर स्मृति ईरानीकी वीडियो देख लिजीये आपको विश्वास हो जायेगा. प्रमाण प्रस्तूत करनेकी आवश्यकता नहीं है.

  • हमारे नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंको और उनके सांस्कृतिक साथीयोंको स्मृति ईरानी का ऐसा व्यवहार पसंद नहीं पडता है. याद करो नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनके सांस्कृतिक साथी लोग स्वयं, प्रचूर मात्रामें कोमवादी और जातिवादी है, किन्तु ये ही लोग, वास्तवमें जो पक्ष धर्म निरपेक्ष है, ऐसे बीजेपी को ही कोमवादी होनेकाका लेबल लगाते है.

  • स्मृति ईरानीके शिक्षा प्रमाण पत्रका विवरण मीथ्या है. जिसकी विद्वताके उपर पंडिताई का प्रमाण पत्र, विश्व विद्यालय देता है, वह विद्वान व्यक्तिके पास पंडिताईका प्रमाणपत्र होता नहीं है. सोक्रेटीस, प्लेटो, कन्फ्युसीयस, कालीदास, महात्मा गांधी, विनोबा भावे आदि के पास अपने विचारोंकी उत्कृष्टताके विषयके कोई प्रमाण पत्र नहीं थे. धिरुभाई अंबाणीके पास प्रबंधनका कोई प्रमाण पत्र नहीं था.  स्मृति ईरानीके पास, मान लो कोई प्रमाण पत्र नहीं है, तो भी वे विचारशील, अन्वेषणकारी और कार्यकुशल है. तो भी ऐसे व्यक्तिके विरोधमें कुछ लोगोंका होना अशक्य नहीं है. क्यों कि अपनेसे कम उम्रवाली वाली, अपनेसे कम पढी और वह भी एक स्त्री ज्यादा कुशल हो यह स्विकारना कुछ लोगोंके लिये अशक्य है.

  • अन्तिम किन्तु अन्त नहींः एक आकर्षक और तंदुरस्त महिला यदि शर्मीली और अल्पभाषी न हो तो हम उसको कैसे सहन कर सकते है?

स्मृति ईरानीने सभी पाठ्य पुस्तकोंको “ओन लाईन” किया, अभ्यासक्रमोंको ओन लाइन किया, व्याख्यानोंको ओनलाईन किया, आप कोई भी परीक्षा, बाह्य विद्यार्थी बनके दे सकते है. इसके कारण परिश्रम करनेवाले शिक्षार्थीयोंका काम सरल और निशुल्क हो जाता है. स्मृति ईरानीने  छात्रोंको भटक जानेसे रोका, देश द्रोहमें सक्रियता दिखानेवाले छात्रों पर अंकुश रक्खा.  और कई सारे काम पाईप लाईनमें है.

जो व्यक्ति वास्तविकता पूर्वक तटस्थ है, वह सब कुछ देखता है.

शिरीष मोहनलाल दवे

चमत्कृतिः

स्मृति ईरानीने ठीक कहा कि “कुछ तो लोग कहेंगे …. लोगोंका (विकृत मानसिकतावाले समाचार माध्यमोंका) काम है कहेना…”

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