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भारतकी विभाजनवादी शक्तिओंको पराजित करनेके लिये बीजेपीकी व्युह रचना

भारतकी विभाजनवादी शक्तिओंको पराजित करनेके लिये बीजेपीकी व्युह रचना

व्युह रचना हमारे उद्देश्य पर निर्भर है.

हमारा उद्देश्य नरेन्द्र मोदी/बीजेपी को निरपेक्ष बहुमतसे जीताना है. इसका अर्थ यह भी है कि हमे विभाजनवादी पक्षोंको पराजित करना है.

हम शर्मिन्दा है

 विभाजनवादी शक्तियां …….. सीक्केकी एक बाजु

भारतमाता, हम शर्मिंदा है ….,  तेरे द्रोही जिन्दा है

हमारी समस्याएं क्या है?

() समाचार माध्यम समस्या है. क्यों कि अधिकतर समाचार माध्यम विभाजनवादी शक्तियोंके पास है. इसलिये विपक्ष के नेताओंके सुनिश्चित उच्चारणोंको अधिकाधिक प्रसिद्धि मिलती है. और बीजेपीके नेताओंकी एवं बीजेपीके समर्थक नेताओंके उच्चारणोंको विकृत करके प्रसारित किया जाता है या तो कम प्रसिद्धि मिलती है या तो प्रसिद्धि ही नहीं मिलती है.

() समस्याओंकी प्राथमिकता

() मुद्दोंका चयन और उनकी संदर्भकी आवश्यकता

() विपक्षकी व्युहरचनाको समज़नेकी या तो उसका विश्लेषण करनेकी अक्षमता.

() विपक्ष पर प्रहार करनेकी बौद्धिक अक्षमता

() अपने ही मतदाताओंको बांटने पर सक्रीय रहेना और अपने ही नेताओंकी आलोचना करना, चाहे विपक्षकी ही क्षति या  उनका ही फरेब क्यूँ न हो,

() सोसीयल मीडीयाकी शक्तिका भरपूर उपयोग करना

() अधिकतर समाचार माध्यम चाहे विपक्षके पास हो, फिर भी हम उसके उपर आक्रमण करके हमारे हस्तगत समाचार माध्यमोंसे मुकाबला कर सकते है. उतना ही नहीं हम विपक्षके समाचार माध्यमोंमें भी प्रतिक्रियाएं दे कर कुछ प्रतिकार तो कर ही सकते हैं. सोसीयल मीडीया भी एक सशक्त शस्त्र है, हम उसका भरपुर उपयोग कर सकते है.

() भारतीय मतदाता, अशिक्षण, सुशिक्षण का अभाव और गरीबीके कारण, धर्म, जाति, विस्तार, भाषा के आधार पर विभाजित है. वास्तवमें, इसके मूलमें नहेरुवीयन कोंग्रेसका लंबा कुशासन और उसके नेताओंकी स्वकेन्द्री वृत्ति और आचार है.

विकास

नरेन्द्र मोदी/बीजेपीने विकासको प्राथमिकता दी है. वह सही है.

विकास हर क्षेत्रमें होना है. इस लिये विकासमें शिक्षणका विकास भी निहित है. प्राकृतिक स्रोतों और मानवीय स्रोतोंका और शिक्षाके समन्वयसे विकास हो ही रहा है. और इस विकासको जनताके समक्ष लाना है और यह काम बीजेपी के प्रचारक कर ही रहे है. राष्ट्रवादीयोंको भी इसमें अपना योगदान देना चाहिये.

प्राचीन इतिहास

दुसरा मुद्दा है इतिहास. इस इतिहासको जो पढाया है उसको विस्मृत करना. खास करके प्राचीन कालका इतिहास. इस इतिहासने भारतको उत्तर और दक्षिणमें विभाजित किया है. यह काम अति कठिन है क्योंकी कई विद्वान लोग इसमें स्थित विरोधाभाष होते होए भी उसको छोडनेमें संकोच रखते है और छोडना नहीं चाहते. और जो विभाजन वादी लोग है वे लोग सच्चा इतिहास पढाने के प्रचारको धर्मके साथ जोड देतें हैं. “इतिहासका भगवाकरणऐसा प्रचार करते है.

मध्ययुगी इतिहासः

जातिवादः

जातिवादकी समस्याका मूल मध्ययुगी इतिहास में है. जातिवाद इस समय में जड बना. किन्तु इसी समयमें कई सवर्ण जातिके लोगोंने जातिवादका विरोध किया उसका इतिहास साक्षी है. इन लोगोंके बारेमें दलितोंको विस्तारसे समज़ाना चाहिये. सोसीयल मीडीया पर भी जिन्होंने जातिवादका विरोध किया उनका सक्षमताके साथ विस्तारसे वर्णन करना चाहिये.

इस्लाम

इसमें भी कई बातें है. किन्तु अधिकतर बातें विवादास्पद है. इसको केवल इतिहासकारों पर ही छोड दो. इसमें खास करके हिन्दु, मुस्लिम के बीचकी बाते है. इन बातोंको इस समय चर्चा करना घातक है.

अर्वाचीन इतिहास

ईसाई धर्मप्रचार की कई हिंसात्मक बातें गुह्य रक्खी गई है. इन बातोंको अकटूता पूर्वक उजागर करना चाहिये.

() विभाजनवादी परिबलमें कौन कौन आते हैं?

OTHER SIDE OF THECOIN

                       सीक्केकी दुसरी बाजु

सभी विपक्षी दल और कोमवादी दल विभाजन वादी ही हैं. वैसे तो विपक्षी दल पूरा कोमवादी है. लेकिन इस जगह पर हम कोमवादी दल उसको ही कहेते हैं जिनमें उस कोमके सिवा अन्य धार्मिक व्यक्तिका प्रवेश निषेध है.  इन सबका चरित्र और संस्कार समान होनेके कारण नहेरुवीयन कोंग्रेस पर किया हुआ प्रहार सबको लागु पडेगा.

सबसे प्रथम है नहेरुवीयन कोंग्रेस. नहेरुवीयन कोंग्रेसको कमजोर करनेवाला सबसे ज्यादा सशक्त मुद्दे क्या है?

देशके लिये विघातक और विभाजनवादी नीति, आतंकवादका समर्थन, वंशवाद, जनतंत्रका हनन, तानाशाही, प्रतिशोधवाली मानसिकता और आचरण, अतिविलंबकारी विकास, यथावत गरीबी, अशिक्षास्वकेन्द्री मानसिकता, ६५ वर्ष लंबा शासन, भ्रष्टाचार, अफवाहें फैलाना और चारित्र हनन करना. इन सभी मुद्दोंको आप उजाकर कर सकते है.

जब भी कोई मुद्दा ये विभाजनवादी एवं कोमवादी घुमाते हुए प्रसारित करते है, उसीके उपर आपको कडा प्रहार करना है. अन्यथा भी हमें कोई मुद्देको उठाके उनके उपर सशक्त प्रहार करना है.

 () विपक्षकी व्युह रचना क्या है?

विपक्षकी व्युह रचनामें लघुमतियोंकी वोट बैंक बनाना है. वोट बेंकका मतलब यह है कि जिस वर्गमें अधिकतर लोग अशिक्षित (समास्याको नहीं समज़ सकनेवाले), अनपढ, गरीब और अल्पबुद्धि है उनको गुमराह करना. यह काम उसी वर्गके स्वकेन्द्री और भ्रष्टनेताओंको ये लोग पथभ्रष्ट करके उनके द्वारा करवाते है. और ये नेता अन्यवर्गके बारेमें धिक्कार फैलाते है.

अभी एक आदमी सोसीयल मीडीया पर बोलता हुआ ट्रोल हुआ है किःयदि आपके विस्तारमें कोई भी ब्राह्मण, क्षत्रीय या वैश्य खडा हो तो उसके सामने जो एक दलित खडा है, वह चाहे कैसा भी हो, तो भी उसको ही वोट दो. हमे इसमें दुसरा कुछ भी सोचना नहीं है. इन सवर्णोंने हम पर बहुत अत्याचार किया है हमे बरबाद कर दिया है.” मायावती क्या कहेती है? “तिलक तराजु और तल्वार, इनको मारो जूते चार”. नहेरुवीयन कोंग्रेसकी भाषा भी ऐसा ही संदेश देनेवाली भाषा है. शब्द प्रयोग भीन्न है.

यदि मायावतीकी बात सवर्ण सूनेगा तो उसके मनमें दलितोंके प्रति धिक्कार पैदा होगा. इस कारण यदि कोई दलित जो बीजेपीके पक्षमें खडा है तो वह सवर्ण व्यक्ति मतदानसे अलग रहेगा. लेकिन हमे बीजेपी के ऐसे सवर्ण मतदाताओंको चाहे बीजेपीका प्रत्याषी दलित हो तो भी मतदानके लिये उत्साहित करना है.

हमें दलितोंको अवगत कराना है किभूतकालमें यदि कभी दलितोंके उपर अत्याचार किया गया था तो वे अत्याचार करनेवाले तो मर भी गये. और वे तो आप नहीं थे. अभी ऐसी भूतकालकी बातोंसे क्यों चिपके रहेना?

हम तो सब जानते है कि दलितोंका उद्धार करनेकी बातोंका प्रारंभ तो सवर्णोंने ही किया है. बाबा साहेब आंबेडकरको पढाने वाले और विदेश भेजने वाले भी वडोदराके महाराजा ही थे. सब सवर्णोंने ही तो बाबा साहेब आंबेडकरसे अधिकृत किया हुआ हमारा संविधान मान्य रक्खा है. संविधानके अंतर्गत तो कोई भेद नहीं हैयद्यपि यदि अभी भी दलितके उपर अत्याचार होते है तो वहां राज्य की सरकारका उत्तरदायित्व बनता है. यदि अत्याचार व्यापक है तो केन्द्र सरकारका उत्तरदायित्व बनता है. समस्या दीर्घकलिन है तो जिसने ७० साल तक एक चक्री शासन किया है वह नहेरुवीयन कोंग्रेस ही कारणभूत है.

नहेरुवीयन कोंग्रेसके शासन और यह बीजेपीके शासन में फर्क यह है कि नहेरुवीयन कोंग्रेसके शासनमें जब कभी दलितों पर अत्याचार होता था तो उस समाचारको दबा दिया जाता था, और कार्यवाही भी नहीं होती थी.

बीजेपीके शासनमें यदि कभी अत्याचार होता है तो शिघ्र ही कार्यवाही होती है. और ये नहेरुवीयन कोंग्रेसवाले कार्यवाहीकी बात करने के स्थान पर अत्याचारकी ही बात किया करते है…. आदि.  

विपक्षने देखा है कि यदि हिन्दु सब एक हो गये तो चूनाव जितना अशक्य है. इसलिये हिन्दुओंमे फूट पाडनेकी कोशिस करते है.. फूट पाडने के लिये दलित पर होते यहां तहां की छूट पूट घटनाओंको उजागर करते है और सातत्य पूर्वक उसको प्रसारित किया करते है.. इस बातका साहित्यओन लाईनपर उपलब्ध है. इसका राष्ट्रवादीयोंको भरपूर लाभ लेना चाहिये.

नहेरुवीयन कोंग्रेस, मुस्लिम और ईसाईयोंमें भी हिन्दुओंके प्रति धिक्कार फैला रही है. ख्रीस्ती धर्म की पादरी गेंग तो नहेरुवीयन कोंग्रेसकी तरह अफवाहें फैलाने में कुशल है. मुस्लिम मुल्ला भी कम नहीं. सामान्य मुस्लिम और सामान्य ख्रीस्ती व्यक्ति तो हिलमिलके रहेना चाहता है. किन्तु ये मुल्ला, पादरी और नेतागण उनको बहेकाना चाहता है. इस लिये वे छूटपूट घटनाओंको कोमवादी स्वरुप देता है और उसको लगातार फैलाता रहता है. इनमें बनावटी और विकृति भी अवश्य होती है.

उदाहरण के लिये, आजकी तारिखमें कठुआ की घटना ट्रोल हो रही है.

गेंगके लिये उनके समर्थक महानुभावोंनेहम शरमिन्दा है कि हम हिन्दु हैऐसे प्लेकार्ड ले कर प्रदर्शन किया. यदि वे सत्यके पक्षमें होते तो हिन्दु और शिखोंकी अनेक कत्लेआम के विरोधमें भी प्रदर्शन करते. लेकिन इनकी कार्य सूचिमें प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रुपमें बीजेपीका ही  विरोध करना है.

वै से तो अंतमें हिन्दुविरोधी घटना जूठ साबित होगी लेकिन, इससे जो नुकशान करना था  वह तो कर ही दिया होता है. आम हिन्दु जनता भूल जाति है, किन्तु इससे उत्पन्न हुआ ॠणात्मक वातावरण कायम रहता है, क्यों कि इसके बाद शिघ्र ही नयी घटना का ट्रोल होना प्रारंभ हो जाता है. चाहे आम जनता ऐसी घटनाओंको भूल जाय, किन्तु हम राष्ट्रवादीयोंको ये घटनाएं भूलना नहीं है. हमें अपने लेपटोपमें विभागी करण करके यह सब स्टोर करना है और जब भी मौका मिले तब देशके इन दुश्मनोंके उपर टूट पडना है.

() कपिल सिब्बल, रा.गा., सोनिया, चिदंभरम (चिदु), रणवीर सुरजेवाले, मलिक खर्गे, अभिषेक सींघवी, एहमद पटेल, एमएमएस, गुलाम नबी आज़ाद, फरुख अब्दुल्ला, ओमर अब्दुल्ला, मणीसंकर अय्यर, शशि थरुर, आदि कई नेता अनाप शनाप बोलते रहते है.

इनको हमें छोडना नहीं.

इन सब लोगोंकी ॠणात्मक कथाएंओन लाईनपर उपलब्ध है.

यदि आपको ज्ञात नहीं है तो राष्ट्रवादीयोंमेंसे किसी एक का संपर्क करें. जब भी इनमेंसे कोई भी नेता कुछ भी बोले तो समाचार माध्यम की चेनल उपर, फेस बुक पर, ट्वीटर पर और वर्तमान पत्रकेओनलईनसंस्करण पर अवश्य आघात्मक प्रहार करें. उस प्रहारमें उनके उपर उनकी ॠणात्मक बात/बातो का अवश्य उल्लेख करें.

() १८५७का युद्ध ब्रीटनसे मुक्ति पानेका युद्ध था. उस युद्ध में हिन्दु मुस्लिम एकजूट हो कर लडे थे. मुस्लिमोंने और मुगलोंने जुल्म किया होगा. किन्तु उसका असर १८५० आते आते मीट गया था. उसके कई ऐतिहासिक कारण है. इसकी चर्चा हम नहीं करेंगे. परंतु १८५७में हिन्दु और मुस्लिम एक जूट होकर लडनेको तयार हो गये थे. यदि उस युद्धमें हमारी विजय होती तो मुगल साम्राज्यका पुनरोदय होता. यह एक हिन्दुमुस्लिम एकताका देश बनता और तो हमे पश्चिमाभिमुख एवं गलत इतिहास पढाया जाता, और तो हम विभक्त होते. ब्रह्म देश, इन्डोनेशिया, तीबट, अफघानीस्तान, आदि कई देश हिन्दुस्तानका हिस्सा होता.   हमारा हिन्दुस्तान क्रमशः एक युनाईटेड नेशन्स या तो युनाईटेड स्टेस्टस ओफ हिन्दुस्तान यानी कि जम्बुद्वीप बनता और वह गणतंत्र भी होता. १८५७के कालमें मुगल बादशाह बहादुरशाह जफरके राज्य की सीमा लाल किले तक ही मर्यादित थी इसलिये उस राजाकी आपखुद बननेकी कोई शक्यता थी.

लेकिन वह युद्ध हम हार गये.

इस बात पर ब्रीटन पार्लामेन्टमें चर्चा हुई. ब्रीटन एक लोकशाही देश था. तो हिन्दुस्तानमें धार्मिक बातों पर दखल देना ऐसा प्रस्ताव पास किया. और सियासती तरीकेमें हिन्दु मुस्लिममें विभाजन करवाना एक दीर्घ कालिन ध्येय बनाया. ख्रीस्ती प्रचार के लिये भी घनिष्ठ आयोजन किया गया. इस प्रकार हिन्दुओंमेंसे एक हिस्सा काटनेका प्रपंच किया गया.

इसीलिये राष्ट्रवादीयोंका कर्तव्य है कि इस संकट के समय हिन्दुओंका मत विभाजन हो.

मुस्लिमोंको राष्ट्रवादी विचार धारामें लाना राष्ट्रवादीयोंका दुसरा कर्तव्य है.

ब्रीटीश राजने और उसके बाद नहेरुवीयन कोंग्रेसने मुस्लिमोंको, हिन्दुओंके प्रति धिक्कार फैलाके इतना दूर कर दिया है कि उनको राष्ट्रवादी विचारधारामें लाना कई लोगोंको अशक्य लगता है.

अपनेको राष्ट्रवादी समज़ने वाले कुछ लोग इस बातका घनिष्ठताके प्रचार करते है कि जब मुसलमानोंको पाकिस्तान बनाके दिया है तो उनको अब पाकिस्तान चले जाना चाहिये. यदि नहीं जाते है तो उनको खदेड देना चाहिये. (कैसे? इस बात पर ये लोग मौन है). इन बातोंको छोडो. ये सिर्फ वाणीविलास है. ऐसा वाणी विलास नहेरुवीयन कोंग्रेस पक्ष, उसके सांस्कृतिक सहयोगी पक्षोंकी गेंग और आतंकवादी भी करते है

हिन्दु और मुस्लिम दो राष्ट्र है ऐसी मान्यताको ब्रीटीश राज्यने जन्म दिया है. और नहेरुवीयन कोंग्रेसने उनको अधिक ही मात्रामें आगे बढा दिया है. वास्तविकतासे यह “दो राष्ट्र” वाली मान्यता दूर है.

दुनियामें कहीं भी मुस्लिमफिर चाहे वह बहुमतमें हो या शत प्रतिशत हो, वह हमेशा अपने देशकी धरोहरसे भीन्न नहीं रहा हैमिस्र के मुस्लिम मिस्रकी प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर पर गर्वकी अनुभूति करते हैईरानके मुस्लिमईरान की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर पर गर्वकी अनुभूति करते हैइन्डोनेसिया के मुस्लिम इन्डोनेसिया की प्राचीन सांस्कृतिक धरोहर पर गर्व की अनुभूति करते हैलेकिन भारतके मुस्लिम अपनेको आरब संस्कृतिसे  जोडते है. लेकिन  आरब इनको अपना समज़ते नहीं हैक्यों कि वे वास्तवमें अरब नहीं हैइसका कारण यह है कि हि-न्दुस्तानके मुस्लिम ९० प्रतिशत हिन्दुमेंसे मुस्लिम बने हैऔर कई मुस्लिम यह कबुल भी करते हैवोराजी और खोजाजी इसके उदहरण स्वरुप हैखुद जिन्नाने यह बात कबुल की है.

तोअब ऐसे मुस्लिमोंके प्रति धिक्कार करने कि क्या आवश्यकता हैहिन्दु धर्ममें किसी भी दैवी शक्तिको किसी भी स्वरुपमें पूजो या तो पूजो तो भी उसके उपर प्रतिबंध नहीं हैआप कर्मकांड करो तो भी सही करो तो भी सहीईश्वरमें या वेदोंमे मानो तोभी सही मानो तो भी सहीअनिवार्यता यह है कि आप दुसरोंकी हानि  करो.

मुस्लिम यदि कुछ भी माने, और यदि वे अन्यकी मान्यताओंको नुकशान न करे और अन्यका नुकशान न करें तो हिन्दुओंको मुस्लिमोंसे कोई आपत्ति नहीं. एक बात आवश्यक है कि हमें सच्चा इतिहास पढाया जाय.

मुस्लिमोंमे प्रगतिशील मुस्लिमोंकी कमी नहीं है. लेकिन प्रगतिशील मुस्लिम. किन्तु वे मौन रहेते हैं. वे मुस्लिमोंके अंतर्गत लघुमतिमें है. उनके उपर मुल्लाओंका दबाव रहेता है. और साथ साथ हिन्दुओंका एक कट्टरवादी वर्ग, मुस्लिम मात्रकी विरुद्ध बाते करता है. वैसे तो यह कट्टर हिन्दु अति लघुमतिमें है. लेकिन इस बातका मुस्लिमोंको पता नहीं. या तो उनको इसका अहेसास नहीं. यदि मुस्लिम लोग यह सोचे, कि हिन्दु कट्टरवादी और हिन्दु राष्ट्रवादी लोग भीन्न भीन्न है और वे एक दुसरेके पर्याय नहीं है तो वे लोग राष्ट्रवादी के प्रवाहमें आ सकते है.

किसी भी कोमको यदि अपनी दीशामें खींचना है तो यह काम आप उसको गालीयां देके और उसके उपर विवादास्पद आरोप लगाके नहीं कर सकते.

नरेन्द्र मोदीने एक अच्छा सुत्र दिया है कि सबका साथ सबका विकास. इसमें दलित, सवर्ण, मुस्लिम, ख्रीस्ती आदि सर्वप्रकारके लोग आ जाते है. इस सुत्रको लघुमतियोंको आत्मसात करना चाहिये.

कानूनका ही राज रहेगा. इसमें कोई समाधान नहीं.

कानूनके राज करनेकी जीम्मेवारी सरकारी अफसरोंकी है. जहां बीजेपीका शासन है वहां राष्ट्रवादीयोंको सरकारी अफसरोंके विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिये, नहीं कि बीजेपीके विरुद्ध.

जो लोग कानून हाथमें लेते है उनको, और उनकी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सहायता करनेवालोंको, उन सबके उपर बिना दया बताये न्यायिक कार्यवाही करनेसे मुस्लिम नेता गण, जैसे कि फारुख अब्दुला, ओमर अब्दुल्ला, यासीन मलिक गुलाम नबी आज़ाद, मुस्लिम मुल्ला, उनके असामाजिक तत्त्व और उसी प्रकार ख्रीस्ती पादरी और उनके असामाजिक तत्त्वका दिमाग ठिकाने पर आ जायेगा. और उस धर्म के आम मनुष्यको लगेगा कि, स्वातंत्र्यका अधिकार स्वच्छंदतासे भीन्न है. उनको भी बीजेपीमें ही सुरक्षा दिखायी देगी.    

एक हिन्दुराष्ट्रवादी कट्टरवादी हो सकता है लेकिन हरेक हिन्दुराष्ट्रवादी, कट्टरवादी नहीं है. जो मुस्लिमोंको देश छोडने की बात करते हैं वे हिन्दु कट्टारवादी है. ये लोग अतिअल्पमात्रामें है. तककी उनका तुष्टिकरण करनेके लिये उन्होनें लघुमतिके लिये अलग नागरिक कोड बना दिया है और यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया है कि लघुमतिके हित रक्षक उनके पक्षकी विचार धारा है. ऐसा करनेमें नहेरुवीयन कोंग्रेसने हिन्दुओंको अन्याय भी किया है.

मुस्लिम जनता, हिन्दुओंसे बिलकुल भीन्न है ऐसा भारतके मुस्लिम और कुछ हिन्दु भी मानते है. 

मुस्लिम यदि कुछ भी माने, और यदि वे अन्यकी मान्यताओंको नुकशान करे और अन्यका नुकशान करें तो हिन्दुओंको मुस्लिमोंसे कोई आपत्ति नहीं. एक बात आवश्यक है कि हमें सच्चा इतिहास पढाया जाय.

मुस्लिमोंमे प्रगतिशील मुस्लिमोंकी कमी नहीं है. लेकिन प्रगतिशील मुस्लिम. किन्तु वे मौन रहेते हैं. वे मुस्लिमोंके अंतर्गत लघुमतिमें है. उनके उपर मुल्लाओंका दबाव रहेता है. और साथ साथ हिन्दुओंका एक कट्टरवादी वर्ग, मुस्लिम मात्रकी विरुद्ध बाते करता है. वैसे तो यह कट्टर हिन्दु अति लघुमतिमें है. लेकिन इस बातका मुस्लिमोंको पता नहीं. या तो उनको इसका अहेसास नहीं. यदि मुस्लिम लोग यह सोचे, कि हिन्दु कट्टरवादी और हिन्दु राष्ट्रवादी लोग भीन्न भीन्न है और वे एक दुसरेके पर्याय नहीं है तो वे लोग राष्ट्रवादी के प्रवाहमें सकते है.

 

कानूनके राज करनेकी जीम्मेवारी सरकारी अफसरोंकी है. जहां बीजेपीका शासन है वहां राष्ट्रवादीयोंको सरकारी अफसरोंके विरुद्ध आवाज़ उठानी चाहिये, नहीं कि बीजेपीके विरुद्ध.

जो लोग कानून हाथमें लेते है उनको, और उनकी प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सहायता करनेवालोंको, उन सबके उपर बिना दया बताये न्यायिक कार्यवाही करनेसे मुस्लिम नेता गण, जैसे कि फारुख अब्दुला, ओमर अब्दुल्ला, यासीन मलिक गुलाम नबी आज़ाद, मुस्लिम मुल्ला, उनके असामाजिक तत्त्व और उसी प्रकार ख्रीस्ती पादरी और उनके असामाजिक तत्त्वका दिमाग ठिकाने पर जायेगा. और उस धर्म के आम मनुष्यको लगेगा कि, स्वातंत्र्यका अधिकार स्वच्छंदतासे भीन्न है. उनको भी बीजेपीमें ही सुरक्षा दिखायी देगी.    

एक हिन्दुराष्ट्रवादी कट्टरवादी हो सकता है लेकिन हरेक हिन्दुराष्ट्रवादी, कट्टरवादी नहीं है. जो मुस्लिमोंको देश छोडने की बात करते हैं वे हिन्दु कट्टारवादी है. ये लोग अतिअल्पमात्रामें है.

नहेरुवीयन कोंग्रेसके लिये यह शर्मकी बात है

जो हिन्दु और जो मुस्लिम दो भीन्न भीन्न संस्कृतिमें मानता है वे दोनों कट्टरवादी है. कोंग्रेस (नहेरुवीयन कोंग्रेस नहीं), और कई मुस्लिम नेतागण (जो कोंग्रेसके सदस्य थे) “दो राष्ट्रमें नहीं  मानते थे. पख्तून नेता खान अब्दुल गफारखाँ भी दो राष्ट्रकी विचारधारामें नहीं मानते थे.

महात्मा गांधी भी दो राष्ट्रके सिद्धांतमें मानते नहीं थे. “दो राष्ट्रकी परिकल्पना ब्रीटीश प्रायोजितआर्यन इन्वेज़न परिक्ल्पनाकी तरह एक जूठके आधार पर बनी परिकल्पना थी.

यह विधिकी वक्रता है कि स्वयंको मूल कोंग्रेस मानने वाली नहेरुवीयन कोंग्रेस आज दोराष्ट्रकी परिकल्पनाको सिर्फ सियासती लाभके लिये बढावा देती है. उसको शर्म आनी चाहिये.

जिन्ना नेदो राष्ट्रकी परिकल्पना इसलिये पुरस्कृत की कि, नहेरुने उसका तिरस्कार किया था. नहेरुने स्वयं घोषित किया था कि, वे जिन्ना को अपनी ऑफिसमें चपरासी देखनेको तयार नहीं थे. तो ऐसे हालातमें जिन्नाने अपनी श्रेष्ठता दिखानेके ममतमेंदोराष्ट्रपरिकल्पना आगे की.

ब्रीटीश सरकारने तोबहुराष्ट्रकी परिकल्पना भी की थी. और वे दलितीस्थान, ख्रीस्ती बहुमत वाले उत्तरपूर्वी राज्योंसे बना हुआ नेफा,.  द्रविडीस्तानवाला दक्षिण भारत, पंजाबका खालिस्तान, और कई देशी राज्य. ऐसा भारत, काल्पनिक गज़वाहे हिन्दके करिब था. और इस प्रस्तावमें अशक्त केन्द्र था और कई सारे सशक्त राज्य थे.

लेकिन अब, यह नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके सांकृतिक साथी अपनी सियासती व्युहरचनाके अनुसार वे देशके एक और विभाजनके प्रति गति कर रहे है.

यदि हम राष्ट्रवादी लोग, दलितोंका, मुस्लिमोंका और ईसाईयोंका सहयोग लेना चाहते है तो हमें हिन्दुओंके हितका ध्यान रखना पडेगा. नहेरुवीयन कोंग्रेसके शासनकालमें कश्मिरमें कई मंदिर ध्वस्त हुए है.

हिन्दुओंके मतोंका विभाजन होनेकी शक्यता देखकर वंशवादी और कोमवादी पक्ष इकठ्ठे हो रहे है. इनको पराजित तब ही कर सकते है जब हिन्दु मत का विभाजन हो.

हिन्दु जनता कैसे विभाजित होती है?

राष्ट्रवादीयोंका ध्येय है कि नरेन्द्र मोदी/बीजेपी २०१९का चूनाव निरपेक्ष बहुमतसे जिते. राष्ट्रवादीयोंका कर्तव्य है कि वे आपसमें विवाद करें. आपसके विभीन्न मुद्दोंमे जिनमें विचार विभीन्नता है ऐसे मुद्दोंको प्रकाशित करें और तो उनको उछाले.

जैसे कि

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हिन्दु राष्ट्रकी घोषणा,

वेदिक शिक्षा प्रणाली,

भारतके विभाजनके लिये जिम्मेवार कौन,

महात्मा गांधी फेक महात्मा,

महात्मा गांधीकी भूलें और मुस्लिमोंका तूष्टीकरण,

जीन्नाकी छवी,

हमें स्वतंत्रता किसने दिलायी पर वृथा चर्चा,

महात्मा गांधी और शहिद भगत सिंह आमने सामने,

अहिंसा एक मीथ्या आचार,

महात्मा गांधीने नहेरुको प्रधान मंत्री क्यों बनाया इस बात पर महात्मा गांधीकी भर्त्सना,

महात्मा गांधी और नहेरुके मतभेदको छिपाना,

नहेरुवीयन कोंग्रेसको मूल कोंग्रेस समज़ना,

नहेरुका धर्म क्या था,

फिरोज़ गांधी मुस्लिम था,

हिन्दु धर्मकी व्याख्या,

राम मंदिर, (जो मामला न्यायालयके आधिन है),

इतिहास बदलने की अधीरता,

मुगलोंका और मुसलमानोंका मध्य युगमें हिन्दुओंके उपर अत्याचार,

नहेरुवीयन कोंगीयोंने जिन घटनाओंको ट्रोल किया हो उनका प्रचार.

मुस्लिम मात्रसे और ख्रीस्ती मात्रसे नफरत फैलाना,

नरेन्द्र मोदीको सलाह सूचन,

बीजेपी नेताओंकी कार्यवाही पर असंतोष व्यक्त करना और उनके साथ जो विचार भेद है उसमें वे गलत है ऐसे ब्लोग बनाना,

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राष्ट्रवादीयोंका कर्तव्य है कि वे यह समज़ें कि उपरोक्त मुद्दे विवादास्पद है.

इनमेंसे;

कई मुद्देके विषयमें निर्णय पर आनेके लिये पूर्वाभ्यास करना आवश्यक है,

कई मुद्दे अस्पष्ट है,

कई मुद्दे फिलहाल प्राथमिकतामें लाना वैचारिक संकट पैदा कर सकते है,

कई मुद्दे न्यायालयाधिन है और बीजेपी सरकारके विचाराधिन है,

कई मुद्दे ठीक है तो भी वर्तमान समय उनकी स्विकृतिके लिये परिपक्त नहीं है.

ऐसे मुद्दे निरपेक्ष बहुमत होनेके कारण, देश विरोधी शक्तियां अफवाहें फैलाके जनताको गुमराह कर सकती है, और भारतके जनतंत्रको विदेशोंमे बदनाम कर सकती है. फिलहाल चर्चा करना भी ठीक नहीं.

हम, मुस्लिमोंके वर्तमान (१९४६से शुरु) या प्रवर्तमान कत्लेआम और आतंकको मुस्लिम नेताओंके नाम या और जुथोंको प्रकट करके, उन पर कटू और प्रहारात्मक आलोचना अवश्य कर सकते है. क्यों कि इन बातोंको वे नकार सकते नहीं. हमने इन बातोंसे पूरी मुस्लिम जनताको तो कुछ कहा नहीं है. इसलिये वे इन कत्लेआमको अपने सर पर तो ले सकते नही है.

दलित और सवर्ण एकता कैसे बनायें?

वैसे तो यह समस्या सियासती है. फिर भी विपक्षके फरेबी प्रचारके कारण इसकी चर्चा करनी पडेगी.

विपक्षका प्रयास रहा है. विपक्षी शक्तियां, सवर्ण को भी अनामतके आधार पर क्षत्रीय, जाट, यादव, जैन, बनीया, भाषा और विस्तारके विशिष्ठ दरज्जाके आधार पर लोगोंको विभाजित किया जाय.

इनके विभाजनको रोकनेके लिये बीजेपीको, लेखकों, कवियों, हिन्दु धर्मगुरुओंको और महानुभावोंको (सेलीब्रीटीज़को) भी आगे करना पडेगा. इन लोगोंको समज़ाना पडेगा कि अनामतके लिये विभाजित होना ठीक नहीं है क्यों कि अनामत ४९ प्रतिशतसे अधिक नहीं हो सकता. और वैसे भी अनामतकी आवश्यकता तब पडती है जब आबंटनकी संख्या कम हो और ईच्छुक अधिक हो. यह समस्या वैसे भी विकाससे हल होने वाली ही है.

विपक्ष हिन्दुओंके मतोंको निस्क्रिय करके उनका असर मत विभाजनके समकक्ष बनाता है. विपक्षका यह एक तरिका है, सामान्य कक्षाके हिन्दुओंको निस्क्रिय करना. आम मनुष्य हमेशा हवाकी दीशामें चलता है. यदि विपक्ष, बीजेपी के लिये ॠणात्मक हवा बनानेमें सफल होता है तो सामान्य कक्षाका मनुष्य निराश होकर निस्क्रिय हो जाता है और वह मतदान करनेके लिये जाता नहीं है.

नहेरुवीयन कोंगी की सहयोगी मीडीया बीजेपीका नकारात्मक प्रचार करती है और उसके लिये ॠणात्मक वातावरण पैदा करनेका काम करती है.

 शिरीष मोहनलाल दवे

चमत्कृतिः नहेरुवीयन कोंग्रेसके शासन कालमें बभम बभम ही चलाता था. और बाबा राम देवकी सत्याग्रहकी  छावनी रातको पोलिसने छापा मारा था, नहेरुवीयन कोंग्रेसके शासनकालमें, अभिषेक मनु सिंघवी याद करो जिनके, तथा कथित ड्राइवरने उनकी एक लेडी वकिलके साथ रेपके संबंधित  वीडीयो बनाई थी और वह सोसीयल मीडीया पर  भी चली थी. यह तो “दंड-संहिता” के अंतर्गत वाला मामला था. लेकिन न तो नहेरुवीयन कोंग्रेसकी सरकारने न तो अभिषेक मनु संघवीके उपर कोई कदम उठाया न तो इस महाशयने ड्राईवर के उपर कोई दंड-संहिताका मामला दर्ज़ किया. आपस आपस में सब कुछ जो निश्चित करना था वह कर लिया.

और ऐसा जिसका शासन था, वह अभिषेक मनु सिंघवी इस बीजेपीके शासनकालको अघोषित आपात्‌ काल कहेता है. जिसमें सारा विपक्ष असंस्कारी भाषामें बीजेपीके नेताओंको उछल उछल कर गाली देता है. ये नहेरुवीयन कोंग्रेस नेता गणके शब्द कोषमें शब्दकोषकी परिभाषा  ही अलग है. जयप्रकाश नारायणने १९७४में  इस नहेरुवीयन कोंग्रेसकी आराध्या के बारेमें कहा था कि उसका ही शब्द कोष “हम्टी-डम्टी” का शब्द कोष जैसा है.  और आज भी नहेरुवीयन कोंग्रेसका शब्द कोष वही रहा है. 

रेप चाहे लेडी वकील पर करो या भाषा पर करो, नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताको क्या फर्क है?

abhisek singhvi

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अनीतियोंसे परहेज (त्यागवृत्ति) क्यों? जो जिता वह सिकंदर (नहेरुवीयन कोंग रहस्य)-७
(इस लेखको “अनीतियोंसे परहेज क्यों? जो जिता वह सिकंदर-६” के अनुसंधानमें पढें)

कोंग्रेस और उसके साथीयोंने वोटींग मशीनमें गडबडी की है और बहुत आसानीसे कर सकते है. सावधान.

एक ही मंत्रः “नरेन्द्र मोदीको रोको”

कोंगी को और उसके साथीयोंको नरेन्द्र मोदीके बारेमें प्रतित हो गया है कि, अब वे लोग नरेन्द्र मोदीकी जितको रोक नहीं पायेंगे. इसलिये अब कोंगी और उसके साथी, नरेन्द्र मोदीकी जितको कमसे कम कैसे करें, इस बात पर व्युह रचना करने लगे है.
समाचार माध्यम और कुछ महानुभाव, कोंगी और उनके साथीयोंको हो सके उतनी मदद करने को तैयार है.

कोंगी के साथीमें बोलीवुडके कुछ महानुभाव आते हैं. ये महानुभाव लोग अपनेको विचारक, विश्लेषक और धर्मनिरपेक्ष समझते है.

इन महानुभावोंमें महेश भट्ट जैसे लोग है. कुछ मूर्धन्योंमें गुजरातके कान्ति भट्ट, शीला भट्ट जैसे पत्रकार और प्रकाश शाह, तुषार गांधी जैसे अपनेको गांधीवादी मानने वाले लोग आते हैं. अमर्त्य सेन जैसे अपने को नव्य अर्थशास्त्री माननेवाले लोग आते है.

बेताज बादशाह और बेताज बेगम

“प्रियंका” नहेरुवीयन संस्कारका निम्नतम कक्षाका सेम्पल

कुछ समाचार माध्यमके द्वारा बनाये गये महानुभाव भी आते है जिसमें हालमें प्रियंका वाड्रा है. प्रियंका वाड्रा को प्रियंका गांधीके नामसे, लोगोंको मनाया जाता है. समाचार माध्यमोंकी ऐसी प्रवृत्ति इस लिये है कि वह सोनीया गांधी की पुत्री है. यह सोनीया गांधी, राजीव गांधीकी पत्नी है. राजीव गांधी, इन्दिरा गांधी का पुत्र है. यह इन्दिरा गांधी जो लग्नके समय पर “घांडी” थी जिसको बातमें गांधी करवाया गया. इन्दिरा का लग्नके समय क्या नाम था, और “घान्डी”का “गांधी” कैसे हुआ?. राजीव का नाम, सोनीयाका नाम, और राहुलका असली नाम क्या था और क्या है, इन सबके बारेमें सामाजिक समाचार माध्यमोंमें (ओन लाईन सोसीयल मीडीयामें) चर्चा होती है. लेकिन दृष्य-श्राव्य और मुद्रित माध्यमोंमें इन बातोंको प्रसिद्ध करना नामुमकिन है. इन समाचार माध्यमोंमे निडरता नहीं है. इसके कई प्रयोजन है. मुख्य प्रयोजन पैसेके आदान-प्रदान का विषय है. व्यक्तिगत अंगत गुप्तताका प्रश्न है. ऐसा नहीं है कि यह सब सरकारी और न्यायिक दस्तावेजों पर नहीं है. सुब्रह्मनीयन स्वामीने बताया है कि, राजीव, सोनीया और राहुलने अपने प्रतिज्ञा लेखोंमे अपनी शैक्षणिक योग्यता के प्रमाण पत्रोंके बारेमें असत्य लिखा है. स्वामीने उन बातोंको न्यायालयोमें पडकारा भी है. इन बातोंको सुब्रह्मनीयन स्वामी स्वयं अपनी जनसभाओंमें खुल्ले आम बोलते है, तो भी समाचार माध्यम इन बातोंको प्रकाशित करते नहीं है. इससे आप समझ जाओ कि अंतरगत मामला क्या हो सकता है.

नरेन्द्र मोदीके बालकी खाल निकालो

उपरोक्त सभी व्यक्ति विशेषोंको मालुम है कि बीजेपीकी जो हवा देशमें चल रही है उसका स्रोत नरेन्द्र मोदी है. इसलिये नरेन्द्र मोदीको बदनाम करनेमें, जो कुछ भी हो सकता वह सब करो. नरेन्द्र मोदी जो कुछ भी कहे उसमें बालकी खाल निकालो.

अखबारी फरजंद प्रियंका वाड्रा

प्रियंका वाड्रा को अगर पक्षीय दृष्टिसे देखा जाय तो वह एक शून्य है. लेकिन समाचारी माध्यमने उसको आगे कर दिया है. मानो कि इन्दिरा गांधीकी रुह (भटकते भटकते) उसमें आ गई है. और समाचारके व्यापारी जैसे अखबारोंको अपना आपतकालका धर्म याद आ गया है.
इस औरतने नरेन्द्र मोदीको ताने मारना शुरु कर दिया है. अखबारी व्यापारीयोंने उसके तमाम उच्चारणोंको उछाला. नरेन्द्र मोदीको मालुम है कौन कहां है. इसलिये उसने कहा कि, प्रियंका उसकी बेटी जैसी है.

नरेन्द्र मोदीका बडप्पन

प्रियंकाने इसको ऐसे उछाला मानो नरेन्द्र मोदीने उसको गाली दी. सभी समझदार वयस्क अपने से छोटोंको बेटे-बेटी समान समझना चाहिये ऐसा समझते हैं. और छोटोंको चाहिये कि अपनेसे जो बडे हैं उनको माता-पिता समान माने. यही भारतकी संस्कृति है. नरेन्द्र मोदीने वैसा ही कहा जो भारतके संस्कार के अनुरुप है. दुसरी बात यह है कि उम्रमें छोटा व्यक्ति अगर गलती करें, और असभ्यता दिखावें तो बडा व्यक्ति उसको माफ कर दे. नरेन्द्र मोदीने वही किया.

प्रियंकाका कमीनापन

लेकिन प्रियंकामें न तो वह संस्कार है न तो वह संस्कृति है न तो उसको बडोंका आदर करना कभी शिखाया गया है. उसने अपने चाचा संजय गांधीके पुत्र वरुण गांधीको भी “पथभ्रष्ट” कह चूकी है. नरेन्द्र मोदीके उस उच्चारण “वह मेरी बेटी जैसी है” को भी प्रियंकाने धुत्कार दिया, मानो कि नरेन्द्र मोदी एक अछूत व्यक्ति है और वह बडे होने पर भी आदरके पात्र नहीं है.

नरेन्द्र मोदी एक ऐसा व्यक्ति है जो गरीब के घरमें जन्म ले कर अपने आप अपनी कर्मशीलता, अपना कौशल्य और अपने श्रमसे, जीवनकी हर कक्षाके संकटोंसे लडकर सन्मार्ग पर चलकर इस उच्च पद पर पहूंचा है. वह सबके मानका लायक है. प्रियंकाको उसका आदर करना चाहिये. अगर प्रियंकाका संस्कार ऐसा नहीं है तो उसको मौन रहेना चाहिये.

प्रियंकाने नरेन्द्र मोदीका अपमान किया. उसने कहा कि नरेन्द्र मोदी अपने को मेरे पिताके समान न समझे. मेरे पिताजी राजीव गांधी थे. नरेन्द्र मोदी अपनेको राजीव गांधीके बराबर न समझे. मेरे पिताजी कि तुलनामें वह कुछ नहीं है. ऐसा विकृत अर्थ नहेरुवीयन फरजंद ही ले सकते है.

देखो इन नहेरुवीयनोंका संस्कार

अगर कोई बडा आदमी अपना बडप्पन दिखाता है तो नहेरुवीयन हमेशा अपना पामरपन दिखाते हैं. इन्दिरा गांधी भी, मोरारजी देसाईका अपमान करनेमें पीछे रही नहीं थी. उसने जयप्रकाश नारायणका भी अपमान किया था. उसने अपनेसे उम्रमें बहुत बडी और कर्मशीलतामें भी कई गुना बडी व्यक्तियोंका अपमान किया था उतना ही नहीं उनको बेवजह जेल में अनियतकालके लिये बंद भी कर दिया था. इन्दिराकी इस पोतीसे आप, उच्च संस्कारकी कैसे अपेक्षा रख सकते है?

इन्दिराकी इस पोतीमें यह समझने कि अक्ल होनी चाहिये कि, राजीव गांधी अपनी कर्मशीलता, कुशलता और श्रमसे प्रधान मंत्री नहीं बने थे. उस समय एक ऐसे राष्ट्रपति थे जो इन्दिरा गांधीके इतने अहेसानमंद थे कि इन्दिरा गांधीके कहेने पर झाडु लगानेके लिये भी तैयार थे.. इस राष्ट्रपतिने इन्दिरा गांधीकी हत्याके बाद तूरंत ही बिना मंत्रीमंडलके अनुरोध ही, राजीवको प्रधान मंत्रीका शपथ ग्रहण करवाया था. यह बात भारतीय संविधान और लोकशाहीके विरुद्ध थी. लेकिन भारतकी लोकशाही और संविधानको नहेरुवीयन फरजंदोने मजाक और मस्ती समझ लिया है. संविधान और लोकशाही मूल्योंकी अवमानना करना नहेरुवीयन फरजंदोंका संस्कार रहा है.

नरेन्द्र मोदी भारतीय संवैधानिक आदरणीय पदस्थ नेता है

नरेन्द्र मोदी भारतीय संविधानसे प्रस्थापित प्रक्रियाओंसे पसार होकर जनता द्वारा निर्वाचित जन प्रतिनिधि है. यह राज्य कोई ऐसा वैसा राज्य नहीं है. यह राज्य एक ऐसा राज्य है जिसकी संस्कृति अति प्राचीन है. इस बातको छोडकर, अगर अर्वाचीन इतिहासको देखें, तो भी इस भूमिने, दयानंद सरस्वती, महात्मा गांधी और सरदार पटेल जैसे युगपुरुषोंको पैदा किया है. नहेरु तो खास करके महात्मा गांधीका और सरदार पटेलका अत्यंत ही ऋणी रहा है. अगर महात्मा गांधी ने हस्तक्षेप न किया होता और सरदार पटेलने त्याग दिखाया न होता तो जवाहरलाल नहेरुका प्रधान मंत्री बनना असंभव था.

कृतघ्न और अनपढ औलाद

नहेरु तो कृतघ्न थे ही लेकिन उनकी संतान भी कृतघ्न निकली. नहेरु और इन्दिरा गांधीने गुजरातीयोंका और गुजरातकी अत्यंत अवमानना की है. प्रियंकाने भी वैसी ही कृतघ्नता दिखाई. नरेन्द्र मोदी की उम्रका, उसके बडप्पनका और उसके संविधानिक पदको जानबुझ करके नजर अंदाज करके नरेन्द्र मोदीको अपमानित किया है. यह बात नहेरुवीयनका निम्न स्तर प्रदर्शित करती है. वास्तविकता देखो तो नरेन्द्र मोदी एक उत्कृष्ट और उच्चस्तरीय नेता है. उसके उच्चारणमें गहनता और नाविन्य होता है. उसके उच्चारणमें माहिती, तर्क और संशोधन होता है. वह अगर कठोर शब्द या मनोरंजन करता है तो भी उसमें गर्भित वैचारिक गहनता होती है. नहेरु, इन्दिरा, सोनीया, राहुल और अब प्रियंका जैसा वाणी विलास और छीछरापन, नरेन्द्र मोदीके वक्तव्यमें नहीं होता है. नरेन्द्र मोदीके सामने ये नहेरुवीयन किसी गिनतीमें नहीं है.

मोदी विरोधी अब क्या करेंगे?

नरेन्द्र मोदी विरोधी सब यह सोचते है कि बीजेपीको पूर्ण बहुमत न मिले उसके लिये जो कुछ भी करना पडे वह करो. युएसका सहारा लो, १९६२में जब चीनने भारत पर आक्रमण किया तो उस सेना को यानी कि, चीनकी सेनाको “मुक्ति सेना का स्वागत करो” ऐसे कहेनेवाले साम्यवादीयोंका सहारा लो, नक्सलवादीयोंका सहारा लो, माओ वादीयोंकासहारा लो, पाकिस्तानी आतंक वादीयोंका सहारा लो, मुलायम, माया, जया, ममता, दाउद, उसके नेटवर्क आदि सबका सहारा लो और मोदीको कैसा भी करके बहुमतसे रोको.

अगर नरेन्द्र मोदीको बहुमत मिल गया तो भी कोंगी नेतागण परास्त होने वाला नहीं है. १९७७ में जनता पार्टीको ३४५ सीटें मिली थीं. इन्दिरा गांधीने समाचार माध्यमोंका सहारा लेके, जनता पार्टीकी छोटी छोटी बातोंको चमका कर उसके विभिन्न नेताओंको उकसाया था. इसमें चरणसिंह मुख्य थे. चरणसिंह और राजनारायणने एक ग्रुप बनाया था, और उन्होने जोर्ज फर्नान्डीस, मधु लिमये, मधुदंडवते को अलग कर दिया था. चरणसिंग बेवकुफ बन गये. यशवंतराव चवाण जो इन्दिरा गांधी से अलग हो गया था और अपना एक पक्ष बना लिया था उसको भी इन्दिराने बेवकुफ बनाया था. चरण सिंग, यशवंतराव चवाण और इन्दिरा गांधी तीनोंने मिलकर जनता पक्षकी काम करती सरकारको तोडी थी.

जब जनता पार्टीकी सरकार तूटी तो जयप्रकाश नारायणने बोला था “पूरा बाग उजड गया”. तब बाजपाईने उनको बोला कि हम फिरसे बाग खीला देंगे.
लेकिन इस बागको खीलानेमें बाजपाईको २० साल लग गये. और वह भी पूरी तरह खील नहीं पाया.

नरेन्द्र मोदी यह सब जानता है. कोंगी भी देशके बागको उजाडनेमें माहिर है. लेकिन हमारे देशमें जो राजकीय विश्लेषक है, समाचार माध्यमोंके मूर्धन्य है वे बेवकुफ ही नहीं स्वकेन्दी और मनमानी तटस्थाके घमंडी है. वे प्रमाणभानहीन और दंभी है. ये लोग आपात कालमें भी समयकी मांग को पहेचान नहीं सकते. जनता इन मूर्धन्योंसे देशको बचानेकी आशा नहीं रख सकती.

बीजेपीके अंदर और उसके सहयोगीयोंके अंदर भी कुछ तत्व ऐसे हैं कि वे आत्म-ख्यातिकी लालचमें बीजेपीको नुकशान पहूंचा सकते है. ऐसे तत्व हमने गुजरातमें देखें है. केशुभाई पटेल, दिलीप पारेख सुरेश महेता, शंकरसिंह वाघेला उनमें मुख्य है. समाचार माध्यमोंने हमेशा नरेन्द्र मोदी के विरुद्धमें इन बेवकुफ और आत्मकेन्द्री नेताओंको ज्यादा प्राधान्य दिया है. और नरेन्द्र मोदीको नीचा दिखानेकी भरपुर कोशिस की है.

१९७७ वाली जनता पार्टी जो ३४५ बैठक जीत गयी थी, उनमें जो सत्ताके लिये भ्रष्ट साधनकी शुद्धिमें मानते थे वे मोरारजी देसाईसे अलग हो गये. जो बेवकुफ थे या बेवकुफ भी थे वे सरकार तूटने पर हतःप्रभ हो गये.

समाचार माध्यम व्यापारका एक क्षेत्र

बीजेपीको ऐसे बेवकुफ, स्वार्थी और स्वकेन्द्री नेताओंसे बचना होगा. नरेन्द्र मोदी वैसे तो मोरारजी देसाईकी अपेक्षा सियासतमें ज्यादा कुशल है. लेकिन जो समाचार माध्यम है वह एक व्यापारका क्षेत्र बन गया है. समाचार माध्यम वाले अब बिल्डींग कंस्ट्रक्सन कंपनीया बनाने लगे है. इससे पता चल जाना चाहिये कि अब यह वर्तमान पत्र और टीवी चेनल वाले काले धंधेमें कितने डूबे हुए है. समाचार माध्यम की अब सामान्य कक्षाके आदमी पर ज्यादा असर पड सकती है. समाचार माध्यम अब जनताको सुशिक्षित करे ऐसा नहीं है. उनका ध्येय हरहालतमें पैसा कमाना है. वे जनताको सुशिक्षित करनेके स्थान पर जनताको गुमराह करने पर तुले हुए है.

तो अब जनताको क्या करना होगा?

जनताको समज लेना पडेगा कि, नरेन्द्र मोदी पर अभी कई मुसीबतें आने वाली है. उसमें आतंकी हमले के अतिरिक्त सियासती हमले भी होंगे. वे बडे जोरदार होंगे. अगर नरेन्द्र मोदी उसके विरोधीयों पर कार्यवाही नहीं करेगा तो ये विरोधीगण चूप बैठने वाला नहीं है. इन लोगोंको जेल भेजना इतना मुश्किल नहीं है. उनके कई काले धंधे है. जिसमें उनकी आर्थिक आय और संपत्ति जो प्रमाणसे कहीं ज्यादा ही है वह मुख्य है. दुसरे उनके असामाजिक तत्वोंके साथके संबंध है. इनके उपर कार्यवाही की जा सकती है. लेकिन इसके बारेमें बडी गुप्ततासे कदम उठाने पडेंगे. और ऐसा पूर्ण और मजबुत बहुमत आने पर ही यह सब संभव हो सकता है.

जो लोग आज नरेन्द्र मोदीके पक्षमें है उनको धिरज पूर्वक नरेन्द्र मोदीके पक्षमें ही रहेना होगा. चाहे नरेन्द्र मोदी पर कितने ही विवाद क्यूं न किया जाय.

एक लडकीके उपर तथा कथित जसुसी,
नरेन्द्र मोदीने जो अपनी पत्नीका नाम आवेदन पत्रमें लिखा,
गीने चूने उद्योगपतियोंको मुफ्तके दाम जमीन आबंटन … इत्यादि कई अर्थहीन विवाद, समाचार माध्यम द्वारा बडे चावसे नरेन्द्र मोदीके विरुद्ध चमकाया जाता है. और भी कई विवाद उछाले जायेंगे. तब जो जनता आज नरेन्द्र मोदीके साथ है, उसको अपने आप पर विश्वास रखकर मोदीके पक्षमें ही रहेना पडेगा. नरेन्द्र मोदीके चमत्कार देखनेके लिये जनताको धिरज और विश्वास रखना पडेगा. समाचार माध्यमोंके समाचारसे मतिभ्रष्ट नहीं होना है.

क्या जनता और जो मूर्धन्य लोग आज मोदीके साथ है वे ये सब समझ पायेंगें?

दंगे करवाना और बोम्ब ब्लास्ट करवाना कोंगका पेशा है

एक बात याद रक्खो कि फारुख और ओमर नया मोरचा खोल रहे है. कोंगी और उसके साथी लोग नया गेम खेल रहे है. वे नरेन्द्र मोदीके प्रधान मंत्रीकी शपथ के बाद कई जगह पर बोम्ब ब्लास्ट करवाने कि योजना बना सकते है. इस शक्यताको कतई नकारा नहीं जा सकता.

नहेरुवीयन कोंग और उनके कश्मिरके साथी फारुख और फरजंदका ट्रेक रेकार्ड देखोः

http://www.satp.org/satporgtp/countries/india/states/jandk/data_sheets/index.html

२००१ को भी याद करो. गुजरात के तत्कालिन मूख्य मंत्री केशुभाई पटेल गुजरातमें बीजेपीको सम्हाल नहीं सके, भूकंप ग्रस्त गुजरातको नवनिर्मित करनेमें वे अशक्त रहे थे. जनतामें केशुभाई और बीजेपी मजाकका विषय बनने लगे थे.

नरेन्द्र मोदी ने सख्त कदम उठाके गुजरातको और बीजेपी को और भूकंपग्रस्त गुजरातको विकासके रास्ते पर ला दिया. एक दफा नरेन्द्र मोदीने बोला कि बीजेपीके ५ सालके शासनमें कोमी दंगे बंद हो गये है. तो इससे नहेरुवीयन कोंगीयोंके पेटमें उबला हुआ तेल पडा और उन्होने की गई साजीशके अनुसार गोधराके एक स्थानीय नेता द्वारा साबरमती एक्सप्रेसका डीब्बा जलाया गया जिसमें अयोध्यासे आनेवाले सभी यात्री जला दिया गया. यह एक ठंडे दिमागसे की गई साजीश थी. एक नहेरुवीयन कोंगीने तो बोला भी था कि नरेन्द्र मोदीने “बीजेपीके शासनमें कोमी दंगे बंद हो गये है ऐसा निवेदन करके लघुमति कोमको दंगे करनेके लिये उकसाया है. कोंग चाहती है कि नरेन्द्र मोदी को मुस्लिमोंकी भावनाको ऐसे निवेदनो द्वारा भडकाना नहीं चाहिये था.

कोंग, दंगा करवानेमें और बोम्ब ब्लास्ट करवानेमें माहिर है. जब भी कोंग और उसके समसंस्कृति साथी मुसिबतमें होते हैं या तो वोटबेंक की राज नीतिको बडे पैमाने पर उजागर करनी होती है, तब वह दंगा करवाती है.

१९६९में मोरारजी देसाईकी कोंग्रेस, जो कोंग्रेस (ओ) नामसे जानी जाती थी वह इन्दिरा कोंगके लिये गुजरातमें एक चूनौति थी. उस समय केन्द्रमें इन्दिराका शासन था. कोंगीने ९९६९में अहमदाबादमें बडे पैमाने पर दंगे करवाये थे.

https://www.youtube.com/watch?v=-u92rWqUhaY

असममें बंग्लादेशी घुसपैठीयोंके कारण स्थानिक प्रजा के साथ दंगे करवाये. पूर्वोत्तर राजको आतंकवादीयों द्वारा पीडित ही रक्खा. युपी बिहारमें तो कई प्रकारके सियासती दंगे करवाते ही रहते है. अब वहां बीजेपी शक्ति बढी तो आजमगढमें दंगे करवाये. आतंकवाद की जड कोंग ही है. दाउदका नेटवर्क कोंगकी कृपासे ही बढा है. दाउदका नेटवर्क बोम्ब ब्लास्टमें सामेल है.

समझ लिजीये कि, जब नरेन्द्र मोदी प्रधान मंत्री बन जायेगा तब कोंग के पैसोंका मुख्य उपयोग दंगा करवाना ही होगा. और इन सभी दंगोंका कारण नरेन्द्र मोदीका शासन ही बताया जायेगा.

कोंग और उसके साथीयोंको दंगे करनेमेंसे रोकने के लिये उनके उपर जांच आयोग बैठा देना पडेगा.

शिरीष मोहनलाल दवे

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