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O!! LEARNED COLUMNIST, HAVE YOU ANY DREAM FOR YOUR NATION?

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मूर्धन्योंकी तटस्थताकी घेलछा और देशकी पायमाली

आप भारतीय समाचारपत्रके लेखकों के लेख पढते होंगे. वे लोग राजकीय समस्याओं के उपर भी लिखते है. इसमें कोई शक नहीं कि एतत्‌ कालिन परिस्थिति में यह आवश्यक भी है. और श्रेयकर भी होगा.

सांप्रत समयमें अधिकाधिक  लेखक जब राजकीय सांप्रतसमस्याके विषय पर लिखते हैं तब उनका प्राथमिक ध्येय अपना ताटस्थ्य दिखाने का होता है. वे लोग समझते है कि इसके कारण उनकी विश्वसनीयतामें वृद्धि होती है. लेकिन उनको यह ज्ञात नहीं रह्वता कि, मूर्धन्यों का प्राथमिक ध्येय लोक शिक्षा भी है. और समाजका उत्कर्ष भी है. 

इन ध्येयोंकी अवगणना करनेसे ये मूर्धन्य लोग यत्‌ किंचित लिखते हैं उसमें प्रमाणभान और प्राथमिकता की हीनता दृष्टिगोचर होती है.

आप क्या देखेंगे?

उदाहरणके आधारपर उत्तर प्रदेशका चूनाव प्रचारके संबंधित लेखोंका वाचन करें.

इसमें वर्तमानपत्रके लेखकों को विश्लेषण करनेमें लोक-शिक्षा, प्रमाणभान एवं प्राथमिकताके स्थान पर, भविष्यवेत्ता बननेकी और आप कितने कूट प्रगल्भ और तटस्थ विश्लेषक है ऐसा प्रदर्शित करनेकी घेलछा रहती है.

ये मूर्धन्यलोग सर्व प्रथम तो नहेरुवंशीय एतत्‌ कालिन संतान कैसे प्रचार करता है उसका वर्णन करेंगे. और उसको  श्रवण करने के लिये आने वाले श्रोतागण के समुदाय के बारेमें वर्णन करेंगे. यद्यपि यह संतान बिहारमें संपूर्ण विफल रहा है तथापि ये लोग उस विषय पर कोई उल्लेख नहीं करेंगे. इस नहेरुवीय संतानकी क्या उपलब्धीयां है, क्या पढाई है, क्या सत्य है क्या असत्य है, क्या योग्यता है, ईत्यादि कुछ भी उल्लेख नहीं करेंगे.
क्यूं?
ज्ञात नहीं. संभव है कि उनको स्वयं को भी ज्ञात नहीं. नहेरुवंशीय कोंग्रेसने एतत्‌ कालिन अद्यतन समयमें ही अमाप कद और संख्यामें जो क्षतियां और चौर कर्म किये उसकी चर्चा नहीं होंगी और उसके उपर लगी कालिमाकी भी चर्चा नहीं होगी. लेकिन अन्ना हजारेजी का आंदोलन कैसा विफल हो गया और उसमें क्या क्या अपूर्णता थी और उसके सदस्योंके उपर कैसे आरोप लगे है उसकी चर्चा हो सकती है. लोकपालके विषयपर उनके प्रतिभाव पर चर्चा हो सकती है. किन्तु नहेरुवंशी कोंग्रेसकी निस्क्रीयता और छद्मवृत्ति पर कोई चर्चा नहीं होगी. शक्य है कि नहेरुवंशी पक्षने कैसे सफलता पूर्वक व्यूहरचना करके, विपक्षोंकों परास्त करके उनकी खुदकी ईच्छाकी पूर्ति की इन सबकी वार्ता हो सकती है. इसके उपर शक्य है कि इस नहेरुवंशी कोंग्रेसकी प्रशंसा भी की जाय. 

किन्तु जब मायावती जो अपने स्वयं के प्रयत्नोंसे विजय प्राप्त करती हुई आयी है उसका कोई उल्लेख नहीं होगा. उसकी सीमाएं अपूर्ण या दुषित कर्यशैली का जरुर उल्लेख होगा.

मुलायम सिंगको स्पर्धामें प्रथम क्रम या द्वितीय क्रम दें या नदें लेकिन तृतीय क्रम तो नहीं ही देंगे.उसके पक्षकी कार्यशैली और उपलब्धियोंके उपर गुणदोषकी कोई चर्चा नहीं.

ये मूर्धन्य लोग, सबसे बूरा हाल भारतीय जनता पार्टीका करेंगे. वैसे तो नहेरुवंशी पक्षके अतिरिक्त यह एक ही पक्ष है जिसको पांचसालके लिये गठबंधनवाला शासन करनेका अवसर मिला था और उसने श्रेष्ठ शासन करके भी दिखाय था. तथापि उसकी उपलब्धियों का कोई उल्लेख किया नहीं जयेगा. उसके स्थान पर, “लोकपाल” विषय पर उसका प्रतिभाव शंकास्पद था ऐसा प्रतिपादिन करनेका प्रयत्न किया जायेगा. अरुण जेटली ने वक्तव्य दिया और प्रत्येक भ्रमका निःरसन किया उसका कोई उल्लेख नहीं कीया जायेगा. उसके स्थान पर, अडवाणी जी की यात्रा के उपर तथाकथित असाफल्य का वितंडावाद उत्पन्न किया जायेगा. भारतीय जनता पार्टीके नेतागणके अंतर्गत क्या क्या तथाकथित असंवाद अथवा विसंवाद है उसकी चर्चा की जायेगी या हो सकती है. नरेन्द्र मोदीको किस प्रयोजनसे या किस आधार पर चूनाव प्रचारमें आमंत्रण नहीं दिया गया, उसकी चर्चा हो सकती है. अगर आमंत्रण दिया तो सबसे पहेले क्यों नहीं दिया उसका प्रयोजन या रहस्य क्या हो सकता है ऐसी चर्चा उत्पन्न की जायेगी.किन्तु भारतीय जनता पार्टीके शासन वाले अन्य राज्योंमें नहेरुवंशी पक्षके शासनसे श्रेयकर शासन कैसे है उसकी चर्चा नहीं होगी.

ये मूर्धन्य लोग, नीतिहीनता सभी पक्षोंमें है, ऐसी चर्चा जरुर करंगे. इस तरह वे नितिहीनताका सामान्यीकरण करके नहेरुवंशी कोंग्रेस पक्षके कुशासनके उपर प्रहार नहीं करेंगे.
 
इस प्रकार प्रमाणात्मक दोषापरोणकी वार्ता त्याज्य ही रहेगी.

यदि मूर्धन्योंकी ऐसी ही प्रणाली और प्रतिभाव रहे तो प्रमाणभान और प्राथमिकताकी चर्चा कब होगी? अगर ६० वर्षके कुशासनके बाद और देशका सर्व क्षेत्रोंमें विनीपात होनेके बाद भी अगर मूर्धन्य लोग प्रजाजनोंको दीशासूचन नहीं कर सकतें और व्यंढ तत्वज्ञान विश्लेषण और तटस्थाका आडंबर प्रदर्शित करते रहेंगे तो देश कैसे प्रगतिके पंथ पर जायेगा? विनीपात चालु ही रहेगा. ऐसा ही देखा गया है. ऐसा क्यूं होता है? मूर्धन्योंकी क्या विडंबना है?

उपनिषद में कहा गया है, हिरण्मयेन पात्रेण सत्यसापिहितं मुखम्‌””””

हिरण्य का अर्थ सुवर्ण (तृष्णा, धनकी तृष्णा) भी होता है. जब (धनकी) तृष्णा होती है तो सत्य आवृत (अप्रकट रखा जायेगा) रहेगा.

नहेरुवंशी पक्षके उपर असीमित और अवैध साधनोंसे प्राप्त क्या हुआ धन और उसको विदेशी बेंकोमें रखनेके विषयमें अगणित आरोप हैं. यदि, मूर्धन्य लोग  अपना भाग लेनेका प्रयत्न करते हो तो इस शक्यताको कौन नकार सकता है? भाग लेनेके अनेक प्रकार होते है. जरुरी नहीं कि पुरस्कार नकदमें ही ग्रहण करें. 

शिरीष दवे  

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