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TV Anchor, Parliament Speaker and Nehruvian Congress

शंकास्पद या खराब, अकुशल और घटिया, प्रपंची और दुराचारी = टीवी चेनलका एंकर, संसदका अध्यक्ष और नहेरुवीयन कोंग्र्स

 टीवी चेनलका एंकरः

anchor

टीवी एंकरका काम है कि कोई एक विषय उपरकी  चर्चा के लिये, चर्चाके विषय पर निष्णातोंमें कोई एक या अधिक व्यक्तिको आमंत्रित करना, तथा यदि विषय सियासती है तो सियासती पक्षोंके संबंधित प्रतिनिधिको  अपने सियासती पक्षकी नीतियोंसे अनुसार अपना पक्ष प्रस्तुत करें  और इस प्रकार चर्चा सुचारु रुप से चले.

चर्चाके अंतमें जनताको यदि कुछ निष्कर्ष  निकालना हो तो निकाल सके.

मान लिजिये विषय हैराहुल गांधीका नरेन्द्र मोदीसे गले लगना

इसमें चर्चाके मुद्दे क्या हो सकते हैं?

() क्या राहुल गांधीका नरेन्द्र मोदीसे गले मिलना एक नाटक था.

हाँ या ना

(.) यदि नाटक था तो यह नाटक कितना उचित था?

(.) यदि नाटक नहीं था तो राहुल गांधीका गले मिलनेका हेतु क्या हो सकता है?

(2) क्या राहुल गांधीका गले मिलना अपने पक्षकी परंपराके अनुसार था?

यदि एंकरको चर्चा सुचारु रुपसे चलानी है तोः

() एंकरको चर्चाके नियम सभी वक्ताओंको समज़ा देना चाहिये, जैसे कि प्रारंभमें वक्ताको अपना पक्ष रखनेके लिये मीनट मिलेगी. बादमें प्र्त्युतर के लिये दो मीनट मिलेगी और उपसंहारके लिये ३० सेकंड मीलेगा. अवरोध पैदा करने के लिये एक पूर्व सूचनाका एक पेनल्टी पोईन्ट और माईक पुनरावरोध (बंद करने के लिये)के कारण दो पेनल्टी पोईन्ट मिलेंगे.  

() यदि नियमका भंग किया तो क्या किया जायेगा वह भी वक्ताओंको बता देना चाहिये,

() एंकरको एक एक पोईन्ट पर सुनिश्चित समय देना चाहिये.

() “सुचारु रुप सेसभी व्यक्तियोंको पहेले तो मुद्दा स्पष्ट करवाना चाहिये.

() यह स्पष्टता कर देनेके बाद एंकरको योग्य और समान समय देना चाहिये

() जो व्यक्ति बोलता है वह यदि मुद्देको बाजु पर रख कर अन्य मुद्दे पर बोलने लगे  एक बार उसके ध्यान पर लाना चाहिये कि वह मुद्देसे हट रहा है.

()  वक्ताको सूचित करने पर भी यदि वक्ता बोलता रहेता है, तो उसको आगे बोलने देना चाहिये, लेकिन उसके बोलनेके बाद एंकरको जनताको बताना चाहिये कि उस वक्ताने मुद्देकी बात नहीं की. उसने मुद्देसे हटके बात की है.

() यदि कोई वक्ता अन्य कोई वक्ता बोलता है तब उसके साथ बोलने लगता है, या तो उसके बोलनेमें अवरोध पैदा करता है तो उस अवरोधक वक्ता (व्यक्ति) को चेतावनी (पूर्व सूचना वॉर्नींग) देना चाहिये,

() यदि पूर्वसूचनाके बाद भी वह अवरोध चालु रखता है तो उसका माईक बंद कर देना चाहिये.

() सभी वक्ताओंको कितनी पूर्व सूचना दी गई थी और किसने पूर्व सूचनाके बावजूद अवरोध चालु रखा था तो उसके पेनल्टी पोइन्ट कितने हुए यह बात एंकरको दर्शकोंको अंतमें बताना चाहिये.

अभी तो क्या होता है, कभी कभी एंकर अपनी मनमानी करके कभी वक्ता को अवरोध करने पर  रोकता है या तो नहीं रोकता है. कभी एंकर खुद चिल्लने लगता है. क्या एंकर अवरोध करने वाले वक्ता का माईक बंद नहीं कर सकता? यह काम  उपलब्ध संचालित तकनिकी से हो सकता है, यदि एंकर बिना गतिरोध चर्चा चलाना चाह्ता है तो.

संसदका अध्यक्षः

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संसदके अध्यक्षका भी उपरोक्त ही उत्तरदायित्व बनता है. उसके अतिरिक्त उसके पास तो विशेष अधिकार भी है कि वह सदस्यको दंडित भी कर सकता है.

संसदमें सामान्यतः माना जाता है कि सदस्योंको अपनी प्रतिक्रिया प्रस्तूत करनेका अधिकार है.

सदस्यको अपनी प्रतिक्रिया प्रकट करनेका सुयोग्य तरिका होना आवश्यक है.

सदस्य जब अपना क्रम आवे तो वह बोल सकता है. किन्तु यदि;

सदस्य अपना स्थान पर खडा होके सूत्रोच्चार करे, या और, अन्य वक्ताकी प्रस्तूति पर अवरोध करे, या और, अपना स्थान   छोडके अध्यक्षके पास जाय, या और, अध्यक्षके सामने  प्रदर्शन करें तो इससे संसदकी कार्यवाही में गति रोध पैदा होता है.

ऐसा होने पर अध्यक्षको चाहिये कि वह एक बार, उस अवरोधक सदस्यको पूर्वसूचना दें और यदि सदस्य माने तो उसको,

बीचमें बोलने के लिये एक दिनके लिये निलंबित करें,

अपना स्थान छोडने के लिये दो दिनके लिये निलंबित करें

सूत्रोच्चार करने के लिये तीन दिनके लिये निलंबित करें

अध्यक्षके पास जाने के लिये एक सप्ताह के लिये निलंबित करें

यदि एक ही सत्रमें वह अपनी हरकतें तीन बार करता है तो उसको पूरे सत्रके लिये निलंबित करें

यदि मत देने की आवश्यकता पडी तो उसको सिर्फ मत देने की अनुमति मिल सकेगी.

जितने दिन सदस्यको निलंबित किया है उन दिनोंका भत्ता एवं वेतन काट दिया जायेगा.

नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेता कहेते हैं कि संसद चलाना सत्तारुढ पार्टीका कर्तव्य है तो  

अध्यक्षका कर्तव्य है कि वह इस प्रकार अपना कर्तव्य अदा करें

संसदके बाहर प्रदर्शन करनाः

कहीं भी प्रदर्शन करना हो तो उसकी एक कार्यवाही है.

आप एक प्रार्थना पत्र में मुद्देका विवरण करो, प्रदर्शन का कारण बताओ, क्या आपने यथा योग्य अंतिम अधिकार क्षेत्रकी व्यक्तिसे वार्तालाप लिया? वार्तालापमें आप किस कारणसे संतुष्ट नहीं है? वार्तालाप अभी चालु है? यदि हाँ तो किस कारणसे प्रदर्शन करना है? क्या आपके उपर हो रहा अन्याय न्यायालयके क्षेत्रमें नहीं आता है? यदि इन सबका उत्तर हकारात्म नहीं है तो प्रदर्शनकी अनुमति नहीं दी जायेगी और सरकारी (जनहितकी कार्यवाहीमें) अवरोध करने कारण आपकी गिरफ्तारी होगी और न्यायिक कार्यवाही होगी.

नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके सांस्कृतिक साथी पक्षः

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रा.गा.ने पहेले ही कहा था कि हम हर हालतमें संसदको चलने ही नहीं देंगे.

नहेरुवीयन कोंगी लोग ऐसा कहेते है कि जब वे शासनमें थे और बीजेपी जब विपक्षमें था तो वह भी ऐसा ही करता था. लेकिन यदि विपक्ष ऐसा करता था तो वह बोलने देने पर करता था. यदि ऐसा नहीं था तो नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंको चाहिये कि वे उसकी चर्चा टीवी चेनलोंके द्वारा समाचार पत्रोंद्वारा  अपना पक्ष, प्रसंगोका संदर्भ देके जनताके सामने रखें.

चालु सत्रमें आपने देखा होगा कि जब प्रधान मंत्री प्रश्नोंका उतार दे रहे थे तब उनको रोकने के लिये नहेरुवीयन कोंगी नेताएं सातत्य पूर्वक अवरोध कर रहे थे. प्रधान मंत्रीका भाषण ज्यादातर सूत्रोचारसे ही अवरुद्ध रहा था. यह संसदकी, नहेरुवीयन कोंगीयों द्वारा लगातार हो रही अवमानना है.

नरेन्द्र मोदीको गले मिलना एक नाटक था

नरेन्द्र मोदीको गले मिलना एक नाटक था क्योंकि नहेरुवीयन कोंग्रेसकी यह परंपरा नहीं है. यदि नरेन्द्र मोदीके परिपेक्ष्यमें नहेरुवीयन कोंग्रेसकी बात की जाय, तो, नरेन्द्र मोदी के बारेमें उनके नेताओंके बयान क्या थे वह रेकर्ड पर है. उतना ही नहीं नरेन्द्र मोदी, जब गुजरातके मुख्य मंत्री थे तब गुजरातकी सुरक्षा अधिकारीयोंने, उनके मिलेइनपुटके आधार पर कडी सुरक्षाकी मांग की थी. उसके उपर केन्द्रीय गृह विभाग चपट्ट बैठ गया था और सुरक्षा प्रदान नहीं किया था. केन्द्रके पासभी इनपुट थे, तो भी उसने कुछ नहीं किया था. जब नरेन्द्र मोदी अपने अधिकारिक सुरक्षा वर्तुलसे बाहर आये तो बिहारमें ४५ मीनटके लिये बिलकुल सुरक्षा हीन थे.

इसके अलावा नहेरुवीयन कोंग्रेस, अपने विरोधीयोंपर कैसा अत्याचार करती है उसका इतिहास गवाह है. आपातकालमें मीडीया पर सेन्सरशीप लगाना, जयप्रकाश नारायणको मरणासन्न करना, हजारोंको कारावासमें धकेलना वह भी बिना गुनाह, विरोधीयोंके बारेमें गलत अफवाहें फैलाना जैसे कि, मोरारजी देसाई, वीपी सींग, नरसिंह राव, देव गौडा, अन्ना हजारे, बाबा रामदेव, किरण बेदी ….    

और अंतमें रा.गाने आँख मारके उसके साथीयोंको संदेश दिया कि मैंने कैसा इन लोगोंको बेवकुफ बनाया.

इससे नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण घटिया प्रपंची और दुराचारी सिद्ध होते है.

शिरीष मोहनलाल दवे

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पी.के. ने पीके किया नशा? कथांक – १

कूर्म पुराण और महाभारतमें एक सुसंस्कृत श्लोक है.

(१) आत्मनः प्रतिकुलानी परेषां न समाचरेत.
इसका अर्थ है;

जो वस्तु, स्वयंके लिये (आप) प्रतिकुल (मानते) है, (उसको आप) दुसरोंके उपर मत (लागु) करो.
इसका अर्थ यह भी है, कि जो आचार आप स्वयंके हितमें नही मानते चाहे कोइ भी कारण हो, तो वह आचार आप अन्यको अपनाने के लिये नही कह सकते.
इसका निष्कर्सका गर्भित अर्थ भी है. यदि आपको अन्य या अन्योंको आचारके लिये कहेना है तो सर्व प्रथम आप स्वयं उसका पालन करो और योग्यता प्राप्त करो.

क्या पी.के. में यह योग्यता है?

पी.के.की योग्यता हम बादमें करेंगे.
सर्व प्रथम हम इस वार्तासे अवगत हो जाय कि, फिलममें क्या क्या उपदेश है. किस प्रकारसे उपदेश दिया है और सामाजिक परिस्थिति क्या है.

संस्कृतमें नीतिशतकमें एक बोध है.
(२) सत्यं ब्रुयात्, प्रियं ब्रुयात्, न ब्रुयात् सत्यं अप्रियं.
सच बोलना चाहिये, किन्तु सत्य ऐसे बोलना चाहिये वह प्रिय लगे. अप्रिय लगे ऐसे सत्य नहीं बोलना चाहिये.
यदि आप स्वयंको उपदेश देनेके लिये योग्य समझते है तो आपके पास उपदेश देनेकी कला होनी आवश्यक है. क्या यह कला पी.के. के पास थी?

पी. के. की ईश निंदा

abhiSheka

(३) पूर्व पक्षका ज्ञानः
यदि एक विषय, आपने चर्चाके लिये उपयुक्त समझा, तो स्वयंको ज्ञात होना चाहिये कि चर्चा में दो पक्ष होते है.
एक पूर्व पक्ष होता है. दुसरा प्रतिपक्ष होता है.
पूर्वपक्ष का अगर आप खंडन करना चाहते है और उसके विरोधमें आप अपना प्रतिपक्ष रखना चाहते है, तो आपको क्या करना चाहिये?
पूर्वपक्ष पहेलेसे चला आता है इसलिये उसको पूर्वपक्ष समझा जाता है. और उसके विरुद्ध आपको अपना पक्ष को रखना है. तो आपका यह स्वयंका पक्ष प्रतिपक्ष है.
अगर आप बौद्धिक चर्चा करना चाहते है तो आपको पूर्वपक्षका संपूर्ण ज्ञान होना चाहिये तभी आप तर्क युक्त चर्चा करनेके लिये योग्य माने जायेंगे. अगर आपमें यह योग्यता नहीं है तो आप असंस्कृत और दुराचारी माने जायेंगे.
असंस्कृति और दुराचार समाजके स्वास्थ्य के लिये त्याज्य है.

(४) चर्चा का ध्येय और चर्चा के विषय का चयनः
सामान्यतः चर्चाका ध्येय, समाजको स्वस्थ और स्वास्थ्यपूर्ण रखनेका होता है. किसको आप स्वस्थ समाज कहेंगें? जिस समाजमें संघर्ष, असंवाद और विसंवाद न हो तदुपरांत संवादमें ज्ञान वृद्धि और आनंद हो उसको स्वस्थ समाज माना जायेगा. यदि समाजमें संघर्ष, वितंडावाद, अज्ञान और आनंद न हो तो वह समाज स्वस्थ समाज माना नहीं जायेगा.
आनंदमें यदि असमानता है तो वह वैयक्तिक और जुथ में संघर्षको जन्म देती है. उसका निवारण ज्ञान प्राप्ति है.
ज्ञान प्राप्ति संवादसे होती है.
संवाद भाषासे होता है.
किन्तु यदि भाषा में संवादके बदले विसंवाद हो तो ज्ञान प्राप्ति नहीं होती है.
ज्ञान प्राप्तिमें संवाद होना आवश्यक है. संवाद विचारोंका आदान-प्रदान है. और आदान प्रदान एक कक्षा पर आने से हो सकता है. विचारोंके आदान प्रदान के लिये उसके नियम होने चाहिये. इन नियम को तर्क कहेते है. कोई भी संवाद तर्कयुक्त तभी हो सकता है जब पूर्वपक्षका ज्ञान हो.

पी. के. स्वयंमें क्या योग्यता है?
स्वयंमें विषयके चयन की योग्यता है?
स्वयंमें विषय की चर्चा करनेकी योग्यता है? स्वयं को स्वयंके पक्षका ज्ञान है?
स्वयंमें पूर्वपक्षका ज्ञान है?
स्वयंके विचारोंका प्रदान तर्कपूर्ण है?

पी. के. अन्यको जो बोध देना चाहता है उस बोधका वह क्या स्वयं पालन करता है?
अंधश्रद्धा निर्मूलन यदि किसीका ध्येय है तो प्रथम समझना आवश्यक है कि अंधश्रद्धा क्या है.
अंधश्रद्धा क्या है?
अंध श्रद्धा यह है कि, कोई एक प्रणाली, जो परापूर्वसे चली आती है या कोई प्रणाली अचारमें लायी गई हो और उस प्रणालीकी उपयोगिता सही न हो और तर्कशुद्ध न हो.
क्या प्रणालीयां और उसकी तर्कशुद्धता की अनिवार्यता सिर्फ धर्म को ही लागु करने की होती है?
क्या अंधश्रद्धा धर्मसे ही संबंधित है?
क्या अंधश्रद्धा समाजके अन्य क्षेत्रों पर लागु नहीं होती है?
अंधश्रद्धा हर क्षेत्रमें अत्र तत्र सर्वत्र होती है.
अंद्धश्रद्धा समाजके प्रत्येक क्षेत्रमें होती है.
अगर अंधश्रद्धा हरेक क्षेत्रमें होती है तो प्राथमिकता कहा होनी चाहिये?

जो प्रणालीयां समाजको अधिकतम क्षति पहोंचाती हो वहां पर उस प्राणालीयों पर हमारा लक्ष्य होना होना चाहिये. इसलिये चयन उनका होना चाहिये.

पी. के. ने कौनसी प्रणालीयों को पकडा?
पी. के. ने धार्मिक प्रणालीयोंको पकडा.
पी. के. ने धार्मिक प्रणालीयोंको क्यूं पकडा?
पी. के. समझता है कि वह सभी धर्मोंकी, धार्मिक प्रणालीयोंके विषयोंके बारेमें निष्णात है. हां जी, अगर उपदेशक निष्णात नहीं होगा तो वह योग्य कैसे माना जायेगा?

पी. के. समझता है कि वह भारतीय समाजमें रहेता है, इसलिये वह भारतमें प्रचलित धार्मिक, क्षतिपूर्ण और नुकशानकारक प्रणालीयोंकी अंद्धश्रद्धा (तर्कहीनता) पर आक्रमण करेगा.
अगर ऐसा है तो वह किस धर्मकी अंधश्रद्धाको प्राथमिकता देगा?
वही धर्म को प्राथमिकता देगा जिसने समाजको ज्यादा नुकशान किया है और करता है.

कौनसे कौनसे धर्म है? ख्रीस्ती, इस्लाम और हिन्दु.

हे पी. के. !! आपका कौनसा धर्म है?
मेरा धर्म इस्लाम है.
आपके धर्ममें कौनसी अंधश्रद्धा है जिसको आप सामाजिक बुराईयोंके संदर्भ, प्रमाणभानके आधार पर प्राथमिकता देंगे?
पी. के. समझता है कि मुस्लिमोंकी अंधश्रद्धा वह शराब बंधी है, और वह भी प्रार्थना स्थलपर शराब बंधी है.
अब देखो पी. के. क्या करता है? वह मस्जिदके अंदर तो शराब ले नहीं जाता है. इस्लामके अनुसार शराब पीना मना है. लेकिन उसकी सजा खुदा देगा. शराबसे नुकशान होता है. अपने कुटूंबीजनोंको भी नुकशान होता है. शराब पीनेवालेको तो आनंद मिलता है. लेकिन पीने वालेके आनंदसे जो धनकी कमी होती है उससे उसके कुटुंबीजनोंको पोषणयुक्त आहार नहीं मिलता और जिंदगीकी सुचारु सुवाधाओंमें कमी होती है या/और अभाव रहेता है. शराब कोई आवश्यक चिज नहीं है. शराबके सेवनके आनंदसे शराबको पीनेवालेको तो नुकशान होता ही है. शराब पीना इस्लाम धर्मने मना है. किन्तु क्या इस्लामकी प्राथमिकता शराबबंधी है?

इस्लाममें क्या कहा है? इस्लामने तो यह ही कहा है कि, इस्लामके उसुलोंका प्रचार करो और जिनको मुसलमान बनना है उन सबको मुसलमान बनाओ. जब तक अन्य धर्मी तुमको अपने घरमेंसे निकाल न दें उसका कत्ल मत करो. उसका अदब करो.
क्या मुसलमानोंने यह प्रणाली निभाई है?
भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है. इसका अर्थ यह है कि भारतमें सब लोगोंको अपना अपना धर्म और प्रणालीया मनानेकी स्वतंत्रता है. इस स्वतंत्रताका आनंद लेनेके साथ साथ दुसरोंको नुकशान न हो जाय इस बातका ध्यान रखना है.

इस बातको ध्यानमें रखते है तो मुसलमान अगर शराब पीये या न पीये उससे अन्य धर्मीयोंको नुकशान नहीं होता है. अगर कोई मस्जिदमें जाता है तो वह वहां ईश्वरकी इबादतके बदले वह शराबी नशेमें होनेके कारण दुसरोंको नुकशान कर सकता है. इसलिये पूर्वानुमानके आधार पर इस्लामने शराब बंदी की है. यह बात तार्किक है. किन्तु यदि इसमें किसीको अंधश्रद्धा दिखाई देती है यह बात ही एक जूठ है.

तो पी. के. ने ऐसे जूठको क्यों प्राथमिकता दी?
प्राथमिकता क्या होनी चाहिये थी?
यदि अंधश्रद्धाको भारत तक ही सीमित रखना है तो, मुसलमानोंने किये दंगे और कत्लोंको प्राथमिकता देनी चाहिये थी. आतंकीयों और स्थानिक मुसलमानोंने मिलकर हिन्दुओंकी धर्मके नाम पर कत्लें की, हिन्दुओंको यातनाएं दी और दे भी रहे है वह भी तो अंधश्रद्धा है.

मुस्लिमोंकी अंधश्रद्धा क्या है?
इस्लामको अपनानेसे ही ईश्वर आपपर खुश होता है. अगर आपने इस्लाम कबुल किया तो ही वह आपकी प्रार्थना कबुल करेगा और आपके उपर कृपा करेगा.
ईश्वर निराकार है इस लिये उसकी कोई भी आकारमें प्रतिकृति बनाना ईश्वरका अपमान है. अगर कोई ईश्वरकी प्रतिकृति बनाके उसकी पूजा करगा तो उसके लिये ईश्वरने नर्ककी सजा निश्चित की है.
इस बातको छोड दो.

अन्य धर्मीयों की कत्ल करना तो अंधश्र्द्धा ही है.

१९९०में कश्मिरमें ३०००+ हिन्दुओंकी मुसलमानोंने कत्ल की. मुसलमानोंने अखबारोंमें इश्तिहार देके, दिवारों पर पोस्टरें चिपकाके, लाउड स्पीकरकी गाडीयां दौडाके, और मस्जीदोंसे घोषणाए की कि, अगर कश्मिरमें रहेना है तो इस्लाम कबुल करो, या तो इस मुल्कको छोड कर भाग जाओ, नहीं तो कत्लके लिये तयार रहो. इस एलान के बाद मुसलमानोंने ३००० से भी ज्यादा हिन्दुओंकी चून चून कर हत्या की. पांचसे सात लाख हिन्दुओंको अपना घर छोडने पर विवश किया. इस प्रकर मुसलमानोंने हिन्दुओंको अपने प्रदेशसे खदेड दिया.
आज तक कोई मुसलमानने हिन्दुओंको न्याय देनेकी परवाह नहीं की. इसकी वजह सिर्फ और सिर्फ मुसलमानोंकी अंधश्रद्धा ही तो है. लाखोंकी संख्यामें अन्यधमीयोंको २५ सालों तक यातनाग्रस्त स्थितिमें चालु रखना आतंकवाद ही तो है. यह तो सतत चालु रहेनेवाला आतंकवाद है. इससे बडी अंधश्रद्धा क्या हो सकती है?

किन्तु पी. के. ने इस आतंकवादको छूआ तक नहीं. क्यों छूआ तक नहीं?
क्यों कि वह स्वयंके धर्मीयोंसे भयभित है. जो भयभित है वह ज्यादा ही अंधश्रद्धायुक्त होता है. पी. के. खुद डरता है. उसके पास इतनी विद्वत्ता और निडरता नहीं है कि वह सच बोल सके.
कश्मिरके हिन्दुओंको लगातार दी जाने वाली यातनाओंको अनदेखी करना विश्वकी सबसे बडी ठगाई और दंभ है. इस बातको नकारना आतंकवादको मदद करना ही है. उसकी सजा सिर्फ और सिर्फ मौत ही हो सकती है.

तो फिर पी. के. ने किसको निशाना बनाया?

पी. के. ने बुत परस्तीको निशाना बनाया.
लेकिन क्या उसने पूर्व पक्ष को रक्खा? नहीं. उसने पूर्वपक्षको जनताके सामने रक्खा तक नहीं.
क्यों?
क्यों कि, वह अज्ञानी है. अद्वैतवादको समझना उसके दिमागके बाहरका विषय है. अद्वैतवाद क्या है? अद्वैतवाद यह है कि ईश्वर, सर्वज्ञ, सर्वयापी और सर्वस्व है. विश्वमें जो कुछ भी स्थावर जंगम और अदृष्ट है वे सब ईश्वरमें ही है. उसने ब्रह्माण्डको बनाया और आकर्षणका नियम बनाया फिर उसी नियमसे उसको चलाने लगा. उसने मनुष्यको बुद्धि दी और विचार करने की क्षमता दी ताकि वह तर्क कर सके. अगर वह तर्क करेगा तो वह तरक्की करेगा. नहीं तो ज्योंका त्यों रहेगा, या उसका पतन भी होगा और नष्ट भी होगा. ईश्वरने तो कर्मफलका प्रावधान किया और समाजको सामाजिक नियमो बनानेकी प्रेरणा भी रक्खी. जो समाज समझदार था वह प्रणालियोंमें उपयुक्त परिवर्तन करते गया और शाश्वतता की और चलता गया.
हिन्दु समाज क्या कहेता है?
सत्यं, शिवं और सुंदरं
सत्य है उसको सुंदरतासे प्रस्तूत करो तो वह कल्याणकारी बनेगा.
कल्याणकारीसे आनंद मिलता है वह स्थायी है.
आनंद स्थायी तब होता है जब भावना वैश्विक हो. न तो अपने स्वयं तक, न तो अपने कुटुंब तक, न तो अपने समाज तक, न तो अपनी जाति तक, मर्यादित हो, पर वह आनंद विश्व तक विस्तरित हो.
विश्वमेंसे जो कुछ भी तुम्हे मिलता है उसमेंसे विश्वको भी दो (स्वाहा).
यज्ञकी भावना यह है.
शिव तो तत् सत् है. ब्रह्माण्ड स्वरुप अग्निको उन्होने उत्पन्न किया. जो दृश्यमान अग्नि है वह यज्ञ है. अग्नि यज्ञ स्वरुप है. अग्निने आपको जिवन दिया. आप अग्निको भी तुष्ट करें और शांत भी करें. हिन्दुओंके लिये ईश्वरी शक्तियां अपने जिवन प्रणालीका एक भाग है. शिव लिंग एक ज्योति है. उसको जो स्वाहा करेंगे वह धरतीके अन्य जीवोंको मिलेगा. जीनेका और उपभोग करनेका उनका भी हक्क है.
तुम्हे ये सब अपनी शक्तिके अनुसार करना है. तुम अगर शक्तिमान नहीं हो तो मनमें ऐसी भावना रखो. ईश्वर तुम्हारी भावनाओंको पहेचानता है. संदर्भः “शिवमानसपूजा”

यदी पी. के. ने “अद्वैत” पढा होता तो वह शिव को मजाकके रुपमें प्रस्तूत न करता.

मनुष्य एक ऐसी जाति है कि इस जातिमें हरेक के भीन्न भीन्न स्वभाव होते है. यह स्वाभाव आनुवंशी, ज्ञान, विचार और कर्मके आधार पर होते है. इसलिये उनके आनंद पानेके मार्ग भी भीन्न भीन्न होते है. ध्यान योग, ज्ञान योग, कर्मयोग और भक्तियोग इस प्रकार चार योग माने गये है. अपने शरीरस्थ रासायणोंके अनुसार आप अपना मार्ग पसंद करें. हिन्दुओंके लिये ईश्वरकी उपासना एक प्रकृति उपासनाका काव्य है. काव्य एक कला है जिनके द्वारा तत्त्वज्ञान विस्मृतिमें नही चला जाता है. मूर्त्ति भी ईश्वरका काव्य है.

तो क्या पी. के.ने विषयके चयनमें सही प्राथमिकता रक्खी है?
नहीं. पी. के. को प्राथमिकताका चयन करने की या तो क्षमता ही नहीं थी या तो उसका ध्येय ही अंधश्रद्धाका निर्मूलन करना नहीं था. उसका ध्येय कुछ भीन्न ही था.

प्राथमिकता की प्रज्ञाः
अगर आपके घरमें चार चूहे और एक भेडिया घुस गये है तो किसको निकालनेकी प्राथमिकता आप देंगे?
चूहे चार है. भेडिया एक है. चार संख्या, संख्या एकसे ज्यादा है. तो भी जो ज्यादा नुकशानकारक है वह भेडिया है. इसलिये यहां पर प्रमाणभान स्वरुप संख्या नहीं है. किन्तु नुकशानका प्रमाणभान रखना है.
एक अरब हिन्दु है. २० करोड मुस्लिम है. लेकिन दंगे मुस्लिमोंने ज्यादा किया. अत्याचार भी मुस्लिमोंने ज्यादा किया. इसलिये समाजको होने वाले नुकशानके प्रमाणभानके अधारपर मुस्लिम अंधश्रद्धाको हिन्दुओंकी तथा कथित अंधश्रद्धाके विषयोंकी अपेक्षा ज्यादा प्राथमिकता देनी चाहिये.
किन्तु पी. के. ने ऐसा नहीं किया.

प्रमाणभानकी प्रज्ञाः
शिवलिंग पर दूध चढाना दूधका व्यय है. वह दूध गरीबोंके बच्चोंके मूंहमें जाना चाहिये.

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दूधका व्यय है या नहीं? अगर व्यय है तो भी कितना व्यह है? किसका व्यय है? किसका पैसा है? किसकी कमाई है? क्या ईश्वरके उपर दूध चढाना अनिवार्य बनाया गया है? ऐसा कोई आदेश भी है?
दूधके पैसे तो पी. के.के या औरोंके है ही नहीं. दूधके पैसे तो दूध डालनेवालेके अधिकृत पैसे है. उसको कोई “लेन्ड ओफ लॉ” या और किसीकी सत्तका भी आदेश नहीं है, कि वह दूध डाले. किसी “लॉ ऑफ ध लेन्ड”ने उसे विवश भी नहीं किया है, कि वह दूध डाले. अगर वह दूध न डाले को उसको कोई दंड देनेवाला भी नहीं है. दूधका प्रमाण भी निश्चित नहीं है. वह अपनी ईच्छाके अनुसार दूध डाल सकता है या न भी डाले. वह अपनी मान्यताके अनुसार समझता है कि उसने कोई व्यय नहीं किया. क्यों कि विश्वने उसको दिया है वह उसमेंसे थोडा विश्वको वापस देता है. जो गाय है उससे वह आभारवश है और उसको भी वह सब देवोंका निवास समझता है और वह गायके प्रति आभारवश है (थेन्क फुल है. थेंकलेस नहीं है) वह गायको माता समझता है.
वह यह समझता है कि दूध चढाना कोई पाप नहीं है. खुदके पैसे है. अपने पैसे का कैसे उपयोग करना वह उसकी पसंद है. खुदकी पसंदका निर्णयकरना उसका अधिकार है.

आप कहोगे, वह जो कुछ भी हो, दूधका तो व्यय हुआ ही न? उसका क्या?
वह हिन्दु कहेता है; अगर आप गायको, भैंषको खाते है तो क्या आनेवाले दूधका घाटा नहीं हुआ?
वह आगे कहता है कि हम तो दूधसे अपनी भावना ईश्वरके प्रति प्रकट करते है. और इससे धरतीके जिवजंतुओंकी पुष्टि करते हैं ताकि धरतीकी फलद्रुपता बढे. हम गायका या ऐसे पशुका बली तो नहीं चढाते है ताकि विश्वमें दूधका स्थायी घाटा हो जाय.

वह आगे कहेता है, कि हमारा पावभर दूध ही क्यों आपकी नजरमें आता है?
हम जो टेक्ष भरते है, उनमेंसे एक बडा हिस्सा गवर्नर और राष्ट्रप्रमुखके और उसकी सुविधाओंके और मकानके रखरखावमें जाता है. टेक्ष द्वारा पैसा देना तो हमारे लिये अनिवार्य है और उसके लिये हम विवश भी है. हमारे पैसे का यह व्यय ही तो है. इसका प्रमाण भी तो बहुत बडा है. यह भी तो एक अंधश्रद्धा मात्र है. आपकी प्राथमिकता तो इस व्यय के विषय पर होनी चाहिये. क्यों आपकी प्रमाणभानकी प्रज्ञा इस बातको नहीं देख सकती?

आप खुद करोडों रुपये कमाते हो. आपको खानेके लिये कितना चाहिये? आपको कितना बडा मकान चाहिये? आप दाल चावल रोटी खाके आनंद पूर्वक जिन्दा रह सकते है, और बाकीके पैसोंसे हजारों कीलो दूध गरीबोंको बांट सकते है. लेकिन आप ऐसा नहीं करते है, क्यों कि दूसरे आप जैसे कई लोग ऐसा नहीं करते हैं. आप उन्हीकी प्रणालीको अनुसरते है. तो यह आपकी भी तो अंधश्रद्धा है. आपकी अंधश्रद्धा तो हमसे भी बडी है. आपकी प्राथमिकतामें वह क्यों नही आयी? अगर आप स्वयंकी कमाईको कैसे खर्च करें उसमें अपनी मुनसफ्फी चलाते हैं तो हमारे लिये क्यों अलग मापदंड?
ऐसी तो कई बातें लिखी जा सकती है.
(क्रमशः)
शिरीष मोहनलाल दवे
टेग्झः पी. के. , योग्यता, नीति शतक, सत्य, प्रिय, उपदेश, पूर्वपक्ष, प्रतिपक्ष, खंडन, बौद्धिक चर्चा, तर्क, शुद्ध, संस्कृति, संस्कृत, दुराचारी, शराब बंधी, विषय चयन, प्राथमिकता, संवाद, विसंवाद, वितंडावाद, ध्येय, हेतु, संघर्ष, ज्ञान, अंधश्रद्धा, प्रणाली, आतंक, धर्म, मुस्लिम, इस्लाम, ख्रिस्ती, धर्म निरपेक्ष, मस्जिद, धर्मस्थान, धर्मगुरु, दंगा, कत्ल, ईश्वर निराकार, प्रतिकृति, काव्य, कश्मिर, ओमर, फारुख, अद्वैतवाद, कर्मफल, सत्यं, शिवं, सुंदरं, कल्याणकारी, वैश्विक, प्रमाणभान, प्रज्ञा, लॉ ऑफ ध लेन्ड

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