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मुस्लिमोंका कश्मिरी हत्याकांड, आतंक और सीमाहीन दंभः

हिन्दुओंके हत्यारे

यदि आप मनुष्य है तो आपका रक्त उबलना चाहिये

आप मनुष्य है यद्यपि कश्मिरी हिन्दुओंकी दशकोंसे हो रही यातनाओंके विषय पर केन्द्रस्थ शासकोंकी और कश्मिरके शासकोंकी और नेताओंकी मानसिकता और कार्यशैलीसे यदि, आपका रक्त क्वथित (ब्लड बोइलींग) नहीं होता है और आप इस सातत्यपूर्ण आतंकके उपर मौन है तो निश्चित ही आप आततायी है.

इस आततायीओंमें यदि अग्रगण्योंकी सूचि बनानी है तो निम्न लिखित गण महापापी और अघोर दंडके योग्य है.

नहेरुवीयन कोंग्रेसः

हमारे देशके गुप्तचर संस्था सूचना देती रहेती थी कि, आतंकवादीयोंके भीन्न भीन्न समूह अफघानिस्तानमे अमेरिका और सोवीयेत युनीयन के शित युद्धमें क्या कर रहे हैं.

ओसामा बीन लादेन भी कहा करता था कि द्वितीय लक्ष्य भारत है. शित युद्ध अंतर्गत भी एक आतंकी समूह, शिख आतंकवादीयोंके संपर्कमें था. शिख आतंकवादी समुह भी पाकिस्तान हस्तगत कश्मिरमें प्रशिक्षण लेता रहता था. शित युद्ध का एक केन्द्र पाकिस्तान भी था. अमेरिकाकी गुप्तचर संस्था सीआईएपाकिस्तानकी गुप्तचर संस्था आईएसआई, अमेरिका समर्थित आतंकी समूहोंके साथ (उदाहरण = अल कायदा), संवाद और सहयोगमें थे.

खालिस्तानी आतंकवाद का संपर्क पाकिस्तानी गुप्तचर संस्था आई एस आई से था. इस प्रकार पाकिस्तानके शासनको और पाकिस्तानस्थ आतंकी समूहोंके लिये भारतमें आतंकवादी जाल स्थापित करना सुलभ था.

जब शित युद्धका अंत समीप आने लगा (१९८०), तो आतंकवादी संगठनोंने भारतको लक्ष्य बनाया जिसमें खालिस्तानी आतंकवाद मुख्य था. यह एक अति दीर्घ कथा है किन्तु, खालिस्तानी आतंकवाद ने स्वर्णमंदिरपर पूरा कबजा कर लिया था. जब इन्दिरा गांधीको आत्मसात्हुआ कि अब खालिस्तानके आतंकवादी की गतिविधियोंके फलस्वरुप उसकी सत्ता जा सकती है तब उसने १९८४में स्वर्णमंदिर पर आक्रमण करवाया. ४९३ आतंकवादी मारे गये. १९०० व्यक्तियोंका अतापता नहीं. तत्पश्चात्सिख आतंकवाद बलवान हुआ और इन्दिरा गांधीकी आतंकीयोंने हत्या की.

इस प्रकार आतंकवादने अपना जाल फैलाया. १९८८में शितका युद्ध संपूर्ण अंत हुआ और मुस्लिम आतंकी समूहका भारतमें प्रवेश हुआ. वीपी सिंह और चन्दशेखरने सिख आतंकवादका अंत तो किया किन्तु वे मुस्लिम आतंकवादको रोकनेमें असमर्थ बने क्योंकि वीपी सिंहने दलित आरक्षण पर अधिक प्राथमिकता दी, और चन्द्र शेखरने अपना धर्मनिरपेक्ष चित्र बनाने पर अधिक ध्यान दिया. इसका कारण यह था कि भारतीय जनता पक्ष विकसित हो रहा था औरस इन दो महानुभावोंको अपना वोटबेंक बनाना था.

१९८८के अंतर्गत मुस्लिम आतंकवादीयोंने कश्मिर में अपनी जाल प्रसारित कर दी थी. शासन, समाचार पत्र, मुद्रक, मस्जिदें, सभी मुस्लिम संस्थाओंके साथ उनका संपर्क हो गया था.

१९८९ अंतर्गत इन आतंकीयोंने हिन्दुओंको अतिमात्रामें पीडा देना प्रारंभ किया. और १९८९ तक उन्होंने ऐसी स्थिति प्राप्त कर ली कि, वे ध्वनिवर्धक यंत्रोंसे साक्षात रुपसे वाहनोंमें घुम कर, मस्जिदोंसे, स्पष्ट धमकी देने लगे, यदि हिन्दुओंको (सिख सहित), कश्मिरमें रहेना है तो मुस्लिम धर्म अंगिकार करो या तो कश्मिर छोडके पलायन हो. यदि ऐसा नहीं किया तो आपकी अवश्य ही हत्या कर दी जायेगी.

१९ जनवरी, १९९० अन्तिम दिवस

इस घोषणाका अंत यह नहीं था. मुस्लिमोंने १९ जनवरीको अंतिम दिन भी घोषित किया. सार्वजनिक सूचना के विशाल मुद्रित पत्र सार्वजनिक स्थानों पर, भित्तियोंपर (ओन वॉल्स), निश्लेषित (पेस्टेड) किये गये, समाचार पत्रोंमें भी यह सूचना सार्वजनिक की गयी कि  कश्मिरमें रहेना है तो मुस्लिम धर्म अंगिकार करो या तो कश्मिर छोडके पलायन हो. यदि ऐसा नहीं किया तो आपकी अवश्य ही हत्या कर दी जायेगी.

इस समय अंतर्गत क्या हुआ?

पुलिस मौन रहा,

स्वयंको धर्मनिरपेक्ष प्रदर्शित करनेवाले अखिल भारतके नहेरुवीयन कोंगी नेतागण मौन रहा. यह कोंग, उस समय भी कश्मिरके शासक पक्षमंडळका एक अंग था, तो भी मौन और निस्क्रीय रहा.

कश्मिरके स्वयंको धर्मनिरपेक्ष प्रदर्शित करनेवाले मुस्लिम नेता मौन रहे, हाशीम कुरैशी, शब्बीर एहमद, शब्बीर शाह, अब्दुल गनी, मुफ्ती मोहमद, फारुख, ओमर, यासीन मलिक, गुलाम नबी आझाद, सज्जद एहमद किच्लु, सईद एहमद कश्मिरी, हसन नक्वी, आदि असंख्य नेतागण मौन रहे

कश्मिरके मुस्लिम शासनके मंत्रीगण जिनका नेता फरुख अब्दुल्ला जो हमेशा अपने पुर्वजोंके बलिदानोंकी वार्ताएं करके अपनी पीठ थपथपाता है, वह भी अपनी गेंगके साथ सर्व मौन रहा.

इन लोगोंने तो जनकोषसे लाखों रुपयोंका वेतन लिया था. उनका तो धर्म बनता है कि अपने राज्यके नागरिकोंका और उनके अधिकारोंका रक्षण करे. किन्तु यह फारुख तो अपने कबिलेके साथ अंतिम दिन १९ जनवरी १९९०के दिनांकको ही विदेश पलायन हो गया.

आज २५साल के पश्चात्वह कहता है कि हिन्दुओंके उपर हुए अत्याचारके लिये वह उत्तरदायी नहीं है क्यों कि वह तो कश्मिरमें था ही नहीं (पलायनवादी का तर्क देखो. वह समझतता है कि कश्मिरमें आनेके बाद भी और १० साल सत्ता हस्तगत करनेके बाद भी उसका कोई उत्तरदायित्व नहीं है. यह स्वयं आततायी संगठनोंका हिस्सा समझा जाना चाहिये)

कश्मिरके भारतीय नागरिक सुरक्षा सेवा अधिकारी गण (ईन्डीयन पोलीस सर्वीस ओफिसर्स = आई.पी.एस. ओफिसर्स)), नागरिक दंडधराधिपति सेवा अधिकारीगण (ईन्डीयन अड्मीनीस्ट्रटीव सर्वीस ओफीसर्स = आई..एस ओफीसर्स) मौन रहे. इन लोगोंने तो जनकोषसे लाखों रुपयोंका वेतन लिया है. इनका भी धर्म बनता है कि अपने राज्यके नागरिकोंका और उनके अधिकारोंका रक्षण करे.

समाचार प्रसारण माध्यम जिनमें मुद्रित समाचार पत्र, सामायिक, दैनिक आदि आते हैं, और विजाणुं माध्यम जिनमें सरकारी और वैयक्तिक संस्थाके दूरदर्शन वाहिनीयां है और ये सर्व स्वयंको जन समुदायकी भावनाएं एवं परिस्थितियोंको प्रतिबींबित करने वाले निडर कर्मशील मानते हैं वे भी मौन रहे,

यही नहीं पुरे भारतवर्षके ये सर्व कर्मशील मांधाता और मांधात्रीयां मौन रहे, सुनील दत्त, शबाना, जावेद अख्तर, महेश भट्ट, कैफी आझमी, नसरुद्दीन शाह, झाकिर नायक, अमिर खान, शारुख खान, आर रहेमान, अकबरुद्दीन ओवैसी, इरफान हब्बीब, मेधा, तिस्ता, अरुन्धती, आदि असंख्य मौन रहे,

अमेरिका जो अपनेको मानव अधिकारका रक्षक मानता है और मनवाता है, और मानवताके विषय पर वह स्वयंको जगतका पितृव्यज (पेटर्नल अंकल) मनवाता है, वह भी मौन रहा, उसकी संस्थाएं भी मौन रही,

भारतवर्ष के भी सभी अशासकीय कर्मशील, धर्मनिरपेक्षवादी कर्मशील, महानुभाव गण (सेलीब्रीटी), चर्चा चातूर्यमें निपूण महाजन लोग भी मौन रहे.

मौन ही नहीं अकर्मण्य रहे,

अकर्मण्य भी रहे आज पर्यंत, २५ हो गये,

क्या इन महानुभावोंकी प्रकृति है मौन रहेनेकी?

नहीं जी, इन महानुभावोंका किंचिदपि ऐसी प्रकृति नहीं है.

गुजरातके गोधरा नगरके कोंग्रेससे संबंधित मुस्लिमोंने २००२ में हिन्दु रेलयात्रियोंको जीवित अग्निदाह देके भस्म कर दिया तो हिन्दु सांप्रदायिक डिम्ब हिंसा प्रसरित हो गयी और उसमें हिन्दु भी मरे और मुस्लिम भी मरे. इस डिंब हिंसाचारमें मुस्लिम अधिक मरे. कारण था प्रतिक्रिया.

शासनने योग्य प्रतिकारक और दडधरादिक कार्यवाही की, इसमें कई मारे गये. मुस्लिम भी मारे गये और हिन्दु भी मारे गये. हिन्दु अधिक मारे गये.

दोनों संप्रादयके लोगोंके आवासोंको क्षति हुई.

तस्माद्अपि, उपरोक्त दंभी धर्मनिरपेक्ष, प्रत्येक प्रकारकी प्रणालीयोंने और महानुभावोंने अत्यंत, व्यापक, और सुदीर्घ कोलाहल किया, और आज, उसी २००२ के गुजरात डिंब विषय भी कोलाहल चलाते रहेते है.

क्या कश्मिरी मुसलमान लोग और नेतागणकी प्रकृति सांप्रदायिक कोलाहल करने की है?

कश्मिरी मुसलमानोंने ही हत्या करनेवालोंको साथ दिया था और हिन्दुओंको अन्वेषित करनेमें हत्या करनेवालोंको संपूर्ण सहायता की थी.

इतना ही नहीं इन नेताओंने और मुस्लिम जनसामाजने हिन्दुओंको आतंकित करनेमें कोई न्यूनता नहीं रक्खी थी.

अमरनाथ यात्रीयों पर हिंसायुक्त आक्रमण

अमरनाथ एक स्वयंभू शिवलिंग है. हिन्दुओंका यह एक श्रद्धा तीर्थ है. यह तिर्थयात्रा .पूर्व ३०० से भी पूर्व समयसे चली आती है. मई से, २९ अगस्त तक यात्राका समय है.

१९९०में मुस्लिमोंने जो नरसंहार और आततायिता प्रदर्शित की. कश्मिरका शासन और केन्द्रीय भारतीय नहेरुवीयन कोंग्रेसका शासन, निंभर रहा. इससे मुसलमानोंका उपक्रम बढा. उन्होने आतंककी भयसूचना दे डाली. इस कारण दोनों भीरु शासनने १९९०से १९९५ तक अमरनाथ यात्रा स्थगित कर दी.

सन. ९९९६ से शासनने अनुमति देना प्रारंभ किया. प्रत्येक वर्ष कश्मिर के मुस्लिम, हिन्दु यात्रीयोंको धमकी देते हैं. और हमारे जवान यात्रीयोंकी सुरक्षा करते है. कश्मिर शासनका स्थानिक सुरक्षादल कुछ भी सुरक्षा देता नहीं है. अमरनाथ यात्रा पहलगांवसे प्रारंभ होती है और मुस्लिम आतंकी कहींसे भी हमला कर देते हैं. प्रतिवर्ष आक्रमण होता है. कुछ यात्री आहत हो जाते हैं. उनमें शारीरिक पंगुता जाती है. कुछ यात्री हत्यासे बच भी नहीं सकते. सन. २०००मे एक बडा हत्याकांड हुआ था उसमें १५००० का सुरक्षा दल होते हुए भी १०५ हिन्दु मारे गये. इनमें ३० यात्रीयोंको तो पहलगांवमें ही मार दिया.

अमरनाथ श्राईन बोर्डः

सन २००८में अमरनाथ यात्रीयोंकी सुरक्षा और सुविधाओंको ध्यानमें रखते हुए, केन्द्रीय शासन (नहेरुवीयन कोंग्रेस) और कश्मिरके मुस्लिम शासनने एक संमतिपत्र संपन्न किया कि, अमरनाथ श्राईन बोर्डको ९९ एकड वनभूमि उपलब्ध करवाई जाय.

इसका प्रयोजन यह था कि सुरक्षाके उपरांत, यात्रीयोंके लिये श्रेयतर आवासोंका निर्माण किया जा सके. वैसे तो ये सब आवास अल्पकालिन प्रकारके रखने के थे.

तथापि, आप मुसलमानों का तर्क देखिये.

इस प्रकार भूमि अधिग्रहण करनेसे अनुच्छेद ३७०का हनन होता है.

मुस्लिमोंका दुसरा तर्क था कि, आवासोंका निर्माण करनेसे पर्यावरण का असंतुलन होता है.

ये द्नों तर्क निराधार है. अमरनाथ श्राईन बोर्ड स्थानिक शासनका है. इस कारणसे अनुच्छेद ३७० का कोई संबंध नहीं. जो आवास सूचित किये थे वे प्रासंगिक और अल्पकालिन प्रकारके थे. इस कारणसे उनका पर्यावरण के असंतुलनका तर्क भी अप्रस्तुत था.

इस प्रकार कश्मिर के मुस्लिमोंने जो तर्क रक्खा था वह मिथ्या था. “मुसलमान लोग तर्क हीन और केवल दंभी होते हैइस तारतम्यको भारतके मुसलमानोंने पुनःसिद्ध कर दिया.

कश्मिरके मुसलमानोंने अमरनाथ श्राईन बोर्ड और जम्मुकश्मिर शासनके इस संमतिअभिलेखका प्रचंड विरोध किया. पांच लाख मुस्लिमोंने प्रदर्शन किया और कश्मिरमें व्यापकबंधरक्खा.  भारतका पुरा मुस्लिम जन समाज, हिन्दुओंको कोई भी सुविधा मिले उसके पक्षमें होता ही नही है.             –

आप कहेंगे इसमें कश्मिरके अतिरिक्त भारतके मुसलमानोंके संबंधमें क्यों ऋणात्मक भावना क्यों रखनी चाहिये?

जो मुसलमान स्वयं मानवीय अधिकारोंके पक्षमें है, ऐसा मानते है, जो मुसलमान स्वयंको धर्मनिरपेक्ष मानते हैं, जो मुसलमान स्वयंको भारतवासी मानते हैं, इन मुसलमानोंका क्या यह धर्म नहीं है कि वे अपने हिन्दुओं की सुरक्षा और सुविधा पर अपना तर्क लगावें और कश्मिर के पथभ्रष्ट मुसलमान भाईओंके विरुद्ध अपनी प्रतिक्रिया प्रदर्शित करें, आंदोलन करें, उपवास करें?

नहीं. भारतके मुसलमान ऐसा करेंगे ही नहीं. क्यों कि वे अहिंसामें मानते ही नहीं हैं. समाचार माध्यमके पंडितोंने भी, इस विषयके संबंधमें मुस्लिम और शासकीय नेताओंको आमंत्रित करके कोई चर्चा चलायी नहीं. समाचार माध्यमोंके पंडितोंको केवल कश्मिरके मुसलमानोंने कैसा लाखोंकी संख्यामें एकत्र होके कैसा  अभूतपूर्व आंदोलन किया उसको ही प्रसारण करनेमें रुचि थी. उनको मुस्लिम नेताओंकों और नहेरुवीयन कोंगके नेताओंको आमंत्रित करके उनके प्रमाणहीन तर्कोंको धराशाई करनेमें कोई रुचि नही थी. नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण तो वैसे ही दंभी, असत्यभाषी, ठग, सांप्रदायिक, मतोंके व्यापारी, आततायी, कायर और व्यंढ है. उन्होंने तो मुसलमानोंके चरित्रको, स्वयंके चरित्रके समकक्ष किया है.

कश्मिर पर आयी वर्षा की सद्य प्राकृतिक आपदाएं

इसी वर्षमें कश्मिर पर वर्षाका प्राकृतिक प्रकोप हुआ.

भारतके सैन्यका, कश्मिरी मुसलमान वैसे तो अपमान जनक वर्तन करनेमें सदाकाल सक्रिय रहेते है. क्यों कि, मुसलमानोंकी हिंसात्मक मानसिकताको और उनके आचारोंको, भारतीय सैनिक, यथा शक्ति, नियंत्रित करते है.

भारतीय सैनिकोंका ऐसा व्यावहार, मुसलमानोंकों अप्रिय लगता है. ये मुसलमान लोग स्थानिक सुरक्षाकर्मीयोंकी भी हत्या करते है.

यह मुसलमान लोग हिन्दुओंके लिये और स्वयंके लिये भीन्न भीन्न मापदंड रखते हैं.

नरेन्द्र मोदीने गुजरातमें मुसलमानोंकी सुरक्षा की, और तीन ही दिनोमें परिस्थितिको नियंत्रित कर दिया था तो भी मुसलमानोंने और दंभी जमातोंने अपना जठर फट जाय, उतनी नरेन्द्र मोदीकी निंदा की थी. आज भी करते है. तद्यपि नरेन्द्र मोदी हमेशा अपना राजधर्मका पालन करते रहे, और जिन मुस्लिमोंने ३०००+ कश्मिरी हिन्दुओंका कत्ल किया था और लाखों हिन्दुओंके उपर आतंक फैलाके कश्मिरसे भगा दिया था, उन्ही मुस्लिमोंके प्राणोंकी रक्षाके लिये नरेन्द्र मोदीने भारतीय सैनिकोंको आदेश दिया. और उन्ही भारतीय सैनिकोंने स्वयंके प्राणोंको उपेक्षित करके इन कृतघ्न और आततायी कश्मिरके मुस्लिमोंके प्राण बचाये.

अब आप कश्मिरके घोषित, श्रेष्ठ मानवता वादी,

समाचार माध्यम संमानित वासिम अक्रम की

मानसिकता देखो.

इस वासिम अक्रम कश्मिरका निवासी है. उपरोक्त उल्लेखित प्राकृतिक आपदाके समय इस व्यक्तिने कुछ मुसलमानोंके प्राणोंकी रक्षा की. इस कारणसे प्रसार माध्यम द्वारा उसका बहुमान किया गया. उससे प्र्श्नोत्तरी भी की गयी. इस व्यक्तिने वर्णन किया कि उसके मातापिताके मना करने पर भी वह स्वयंमें रही मानवतावादी वृत्तिके कारण घरसे निकल गया और प्राकृतिक आपदा पीडित कश्मिरीयोंके प्राणोंकी रक्षा की.

इसी व्यक्तिने बीना पूछे ही यह कहा कि, भारतीय सैनिकोंने भी अत्यंत श्रेष्ठ काम किया. लेकिन उनका तो वह धर्म था. उनको तो अपना धर्म निभानेके लिये वेतन मिलता है. (किन्तु मैंने तो मानवधर्म निभानेके लिये वेतनहीन काम किया).

इससे अर्थ निकलता है कि मानवतावादी कर्म तभी कहा जा सकता है कि, आप बिना वेतन काम करो. वासिमने बिना वेतन काम किया इसलिये वह मानवता वादी है.

लेकिन इससे एक प्रश्न उठता है.

उसने हिन्दुओंके लिये क्या किया?

हो सकता है कि १९९०में वह दूधपीता बच्चा हो. लेकिन उसके पिता तो दूध पिता बच्चा नहीं था. और अन्य मुसलमान लोग तो दूधपीते बच्चे नहीं थे. वासिम ! २००५ से तो तू बडा हो ही गया था. तो तभीसे तो तू हिन्दुओंको सुरक्षित रीतिसे कश्मिरमें अपने घरोंमें बसा सकता था. इसमें तुम्हारी मानवता कहां गई? हिन्दुओंके विषयमें तू क्यों अपनी मानवता दिखाता नहीं है?

जिसकी मानवताको माध्यमोंने प्रसारित किया, उसको कभी यह पूछा नहीं गया कि कश्मिरी हिन्दुओंके बारेमें उसने क्या किया? उनके प्रति क्यों मानवता नहीं दिखाता है?

कश्मिरी हिन्दुओंका पुनर्वासः

कश्मिरमें मुफ्तीसे मिलीजुली बीजेपीकी सरकार आयी. उसने कश्मिरके प्रताडित, प्रपीडित, निष्काषित निर्वासित हिन्दुओंके पुनर्वासके लिये एक योजना बनायी.

एक भूखंडको सुनिश्चित करके उसमें आवासें बनाके निर्वासितोंका पुनर्वास किया जाय. ऐसी योजना है. उसमें प्राकृतिक आपदासे विस्थापित मुसलमानोंको भी संमिलित किया जा सकता है.

किन्तु यह योजना पर, मुसलमानोंकी संमति नहीं. संमति नहीं उतना ही नहीं प्रचंड विरोध भी है.

इन मुसलमानोंने पूरे राज्यको बंध रखनेकी घोषणा कर दी.

उनका कुतर्क है कि हिन्दु लोग, कश्मिरकी जनताका एक अतूट सांस्कृतिक अंग है, और ऐसा होने के कारण हम मुसलमान लोग उनको ऐसा भीन्न आवसमें रहेने नहीं देंगे. हम चाहते हैं कि ये कश्मिरी हिन्दु लोग हमारे अगलबगलमें ही रहें. हम इसीको ही अनुमति देंगे कि हिन्दुओंका पुनर्वास उनके मूलभूत आवासमें ही हो. हम संयुक्त आवासमें ही मानते है.

वास्तवमें मुसलमानोंका यह तर्क निराधार है.

क्यों कि इस नूतन आवास योजनामें मुसलमानोंके लिये निषेध नहीं हैं. प्राकृतिक आपदासे विस्थापित या और कोई भी मुसलमानको इस आवासमें संमिलित किया जा सकता है. इतना ही नहीं कोई भी कश्मिरी हिन्दु यदि ईच्छा हो तो उसके लिये अपने मूलभूत आवासमें जानेका भी विकल्प खुल्ला है.

इन मुसलमानोंका एक तर्क और भी है.

हिन्दुओंके लिये भीन्न आवास योजना का अर्थ है, कश्मिरमें इस्राएल स्थापित करना. हम हिन्दुमुस्लिमोंके बीच ऐसी दिवार खडी करना नहीं चाहते.

यह तर्क भी आधारहीन है.

हिन्दुओंने कभी संप्रदायके नाम पर  युद्ध किया नहीं. हिन्दुओंने कभी अन्य संप्रदायका अपमान किया नहीं. इतिहास इसका साक्षी है.

इस्राएल, यहुदीओं की तुलना भारत और हिन्दुओंसे नहीं हो सकती. हां यह बात अवश्य कि मुसलमानोंकी तुलना मुसलमानोंसे हो सकती है. भारतके मुसलमानोंने एक भीन्न भूखंड भी मांगा और अपने भूखंडमें हिन्दुओंकी सातत्यपूर्ण निरंतर हत्याएं की.

मुसलमानोंने अपने भूखंडमें हिन्दुओंके उपर अत्याचार भी किये. इतना ही नहीं उन्होंने खुदने पूरे भारतमें अपनी दिवालोंवाली बस्तियां बनायी उसको विस्तृत भी करते गये और हिन्दुओंके आवासों पर कब्जा करते गयें. हिन्दुओंको भगाते भी गये.

कश्मिरमें तो मुसलमानोंने सभी सीमाओंका उल्लंघन किया, सभी सभ्यता नष्ट करके नम्र, सभ्य और अतिसंस्कृत हिन्दुओंका सहस्रोंमें संहार किया, उनको घरसे निकाला दिया और १९९०से आजकी तारिख तक उनको अपने मानवीय अधिकारोंसे वंचित रक्खा.

और ये हिन्दु कौन थे?

ये ऐसे हिन्दु थे जिन्होंने कभी मुसलमानोंसे असभ्य और हिंसक आचार नहीं किया. ऐसे हिन्दुओंके उपर इन मुसलमानोंने कृतघ्नता दिखाई. और अब ये मुसलमान, हिन्दुओंके उपर अपने प्रेमकी बात कर रहे हैं. कौन कहेगा ये मुसलमान विश्वसनीय है और प्रेमके योग्य है?        

जब १९९०में जब मुसलमानोंने ३०००+ हिन्दुओंकी खुल्ले आम हत्यायें की जाती थीं, तब इनमेंसे एक भी माईका लाल निकला नहीं जो हिन्दुओंके हितके लिये आगे आयें.

इन मुसलमानोंका विरोध इतना तर्कहीन और दंभसे भरपुर होने पर भी इसकी चर्चा योग्य और तर्क बद्ध रीतिसे कोई भी समाचार माध्यमने नहीं की. समाचार माध्यम तो, हिन्दुओंके मानव अधिकारके विषय पर सक्रीय है तो वे उत्सुक है.

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः आई.सी.आई., सी.आई.., मानव अधिकार, हनन, शित युद्ध, पाकिस्तान, अमेरिका, सोवियेत युनीयन, खालिस्तानी, यासीन मलिक, फारुख, ओमर, गुलाम नबी, आई.पी.एस., आई..एस., शासन, महानुभाव, कर्मशील, मांधाता, पंडित

गोब्बेल्स अन्यत्र ही नहीं भारतमें भी जिवित है.

WE SPREAD RUMOR

रामायण में ऐसा उल्लेख है कि रावणने राम के मृत्युकी अफवाह फैलायी थी. किन्तु सभी रामकाथाओंमें ऐसा उलेख नहीं है. रावणने अफवाह फैलायी थी ऐसी भी एक अफवाह मानी जाती है. सर्वप्रथम विश्वसनीयन अफवाहका उल्लेख महाभारतके युद्धके समय मिलता है, जब भीमसेन एक अफवाह फैलाता है किअश्वस्थामा मर गया”. यह बात अश्वस्थामाके पिता द्रोणके पास जाती है. किन्तु द्रोणके मंतव्यके अनुसार, भीमसेन विश्वसनीय नहीं है. द्रोण इस घटनाकी सत्यताके विषय पर सत्यवादी युधिष्ठिरसे प्रूच्छा करते है. युधिष्ठिर उच्चरते हैनरः वा कुंजरः वा (नरो वा कुंजरो वा)”. लेकिन नरः शब्द उंचे स्वरमें बोलते है और कुंजरः (हाथी) धीरेसे बोलते है जो द्रोणके लिये श्रव्य सीमा से बाहर था. तो इस प्रकार पांण्डव पक्ष, अफवाह फैलाके द्रोण जैसे महारथी को मार देता है.

अर्वाचिन युगमें गोब्बेल्स नाम अफवाहें फैलानेवालोंमे अति प्रख्यात है. ऐसा कहा जाता है कि, उसने अफवाहें फैलाके शत्रुसेनाके सेनापतियोंको असमंजसमें डाल दिया था.

अफवाह की परिभाषा क्या है?

अफवाहको संस्कृतभाषामें जनश्रुति कहेते है. जनश्रुति का अर्थ है एक ऐसी घटना जिसके घटनेकी सत्यताका कोई प्रमाण नहीं होता है. इसके अतिरिक्त इस घटनाको सत्यके रुपमें पुरष्कृत किया जाता है या तो उसका अनुमोदन किया जाता है. और इस अनुमोदनमें भी किया गया तर्क शुद्ध नहीं होता है. एक अफवाहकी सत्यताको सिद्ध करने के लिये दुसरी अफवाह फैलायी जाती है. और ऐसी अफवाहोंकी कभी एक लंबी शृंखला बनायी जाती है कभी उसकी माला भी बनायी जाती है.

अफवाह उत्पन्न करो और प्रसार करो

कई बार अफवाह फैलाने वाला दोषित नहीं होता है. वह मंदबुद्धि अवश्य होता है. जिन्होंने अफवाहका जनन किया है वे लोग, ऐसे मंदबुद्धि लोगोंका एक प्रसारण उपकरण (टुल्स), के रुपमें उपयोग करते है. ऐसा भी होता है कि ऐसे प्रसारमाध्यमव्यक्ति अपने स्वार्थके कारण या अहंकारके कारण अफवाह को सत्य मान लेता है और प्रसारके लिये सहायभूत हो जाता है.

अफवाहें फैलानेमें पाश्चात्य संस्कृतियां का कोई उत्तर नहीं.

वास्तवमें तो स्वर्ग, नर्क, सेतान, देवदूत, क्रोधित होनेवाला ईश्वर, प्रसन्न होनेवाला ईश्वर, कुछ लोगोंकोये तो अपनवाले हैऔर दुसरोंकोंपरायेकहेने वाला ईश्वर, यही धर्म श्रेष्ठ है, इसी धर्मका पालन करनेसे ईश्वरकी प्राप्ति हो सकती है, इस धर्मको स्विकारोगे तो तुम्हारा पाप यह देवदूत ले लेगा, ये सभी कथाएं और मान्यताएं भी अफवाह ही तो है.

कामदेव, विष्णु भगवानका पुत्र था. “कामका यदि प्रतिकात्मक अर्थ करें तो नरमादामें परस्पर समागमकी वृत्ति को काम कहा जाता है.

भारतीय संस्कृतिमें तत्वज्ञानको प्रतिकात्मक करके, काव्य के रुपमें उसको लोकभोग्य बनानेकी एक प्रणाली है.  इस तरहसे जन समुदायको तत्वज्ञान अवगत करानेकी परंपरा बनायी है.

काम भी एक देव है. देवसे प्रयोजित है शक्ति या बल.

कामातुर जिवकी कामेच्छा कब मर जाती है?

जब कामातुर व्यक्तिको अग्निकी ज्वालाका स्पर्ष हो जाता है, तब उसकी कामेच्छा मर जाती है. लेकिन काम मरता नहीं है. इस प्राकृतिक घटनाको प्रतिकात्मक रुपमें इस प्रकार अवतरण किया कि रुद्रने (अग्निने) कामको भष्म कर दिया. किन्तु देव तो कभी मर नहीं ता. अब क्या किया जाय? तो तत्पश्चात्इश्वरने उसको सजिवोंमे स्थापित कर दिया. बोध है कि कामदेव सजिवमें विद्यमान है.

जनश्रुतियानीकी अफवाह भी जनसमुदायोंमे जिवित है. हांजी, प्रमाण कितना है वह चर्चा का विषय है.

इतिहासमें जनश्रुति (अफवाहें रुमर);

पाश्चात्य इतिहासकारोंने भारतके पूरे पौराणिक साहित्यको अफवाह घोषित कर दिया. पुराणोमें देवोंकी और ईश्वरकी जो प्रतिकात्मक या मनोरंजनकी कथायें थी उनकी प्रतिकात्मकताको इन पाश्चात्य इतिहासकारोंने समझा नही या तो समझनेकी उनकी ईच्छा नहीं थी क्योंकि उनका ध्येय अन्य था. उनको उनकी ध्येयसूची (एजन्डा)के अनुसार, कुछ अन्य ही सिद्ध करनेका था. उस ध्येय सूचि के अनुसार उन्होंने इन सब प्रतिकात्मक ईश्वरीय कथाओंको मिथ्या घोषित कर दिया. और  उनको आधार बनाके भारतमें भारतवासीयोंके लिखे इस इतिहासको अफवाह घोषित कर दिया.

भारत पर आर्योंका आक्रमणः

पराजित देशकी जनताको सांस्कृतिक पराजय देना उनकी ध्येयसूची थी. अत्र तत्र से कुछ प्रकिर्ण वार्ताएं उद्धृत करके उसमें कालगणना. भाषाकी प्रणाली, जन सामान्यकी तत्कालिन प्रणालीयां, प्रक्षेपनकी शक्यताआदि को उपेक्षित कर दिया.   

आर्य, अनार्य, वनवासी, आदि जातियोंमें भारतकी जनताको विभाजित करके भारतीय संस्कृतिको भारतीय लोगोंके लिये गौरवहीन कर दिया. ऐसी तो कई बातें हैं जो हम जानते ही है.

ऐसा करना उनके लिये नाविन्य नहीं था. ऐसी ही अफवाहें फैलाके उन्होने अमेरिकाकी माया संस्कृतिको और इजिप्तकी महान संस्कृतिको नष्ट कर दिया था. पश्चिम एशियाकी संस्कृतियां भी अपवाद नहीं रही है.

आप कहोगे कि इन सब बातोंका आज क्या संदर्भ है?

संदर्भ अवश्य है. भारतीय संस्कृतिकी प्रत्येक प्रणालीयोंमें इसका संदर्भ है और उसका प्रास्तूत्य भी है.

अफवाहें फैलाके दुश्मनोंमें विभाजन करना, दुश्मनोंकी सांस्कृतिक धरोहर को नष्ट करना, दुश्मनोंकी प्रणालीयोंको निम्नस्तरीय सिद्ध करना और उसका आनंद लेना ये सब उनके संस्कार है. आज भी आपको यह दृष्टिगोचर होता है.

भारतमें इन अफवाहोंके कारण क्या हुआ?

भारतकी जनतामें विभाजन हुआ. उत्तर, दक्षिण, पूर्वोत्तर, हिन्दु, मुस्लिम, ख्रीस्ती, भाषा, आर्य, अनार्य, ब्राह्मण, क्षत्रीय, वैश्य, शुद्र, वनवासी, पर्वतवासी, अंग्रेजीके ज्ञाता, अंग्रेजीके अज्ञाता  आदि आदिइनमें सबसे भयंकर भेद धर्म, जाति और ज्ञाति.

मुस्लिमोंमें यह अफवाह फैलायी कि वे तो भारतके शासक थे. उन्होने भारतके उपर ०० साल शासन किया है. उन्होंने ही भारतीयोंको सुसंस्कृत किया है. भारतकी अफलातुन इमारतें आपने ही तो बनायी. भारतके पास तो कुछ नहीं था. भारत तो हमेशा दुश्मनों से २५०० सालोंसे हारता ही आया है. सिकंदरसे लेके बाबर तक भारत हारते ही आया है.

ख्रीस्ती और मुसलमानोंने भारतके निम्न वर्णको यह बताया कि आपके उपर उच्च वर्णके लोगोंने अमानवीय अत्याचार किया है. दक्षिण भारतकी ब्राह्मण जनताको भी ऐसा ही बताया गया. इन कोई भी बातोंमे सत्यका अभाव था.

सबल लोग, निर्बल लोगोंका शोषण करे ऐसी प्रणाली पूरे विश्वमें चली है और आज भी चलती है. केवल सबल और निर्बलके नाम बदल जाते है. भारतमें शोषण, अन्य देशोंके प्रमाणसे अति अल्प था. जो ज्ञातियां थी वे व्यवसाय के आधार पर थी. और पूरा भारतीय समाज सहयोगसे चलता था.

धार्मिक अफवाहेः

धर्मकी परिभाषा जो पाश्च्यात देशोंने बानायी है, वह भारतके सनातन धर्म को लागु नहीं पड सकती. किन्तु यह समझनेकी पाश्चात्य देशोंकी वृत्ति नहीं है या तो उनकी समझसे बाहर है.

भारतके अंग्रेजीज्ञाताओंकी मानसिकता पराधिन है. इतिहास, धरोहर, प्रणालीयां, तत्वज्ञान, वैश्विक भावना, आदिको एक सुत्रमें गुंथन करके भारतीय विद्वानोंने भारतकी संस्कृतिमें सामाजिक लयता स्थापित की है. लयता और सहयोग शाश्वत रहे इस कारण उन्होंने स्थितिस्थापकता भी रक्खी है.

किन्तु तथ्योंको समझना और आत्मसात्करना पाश्चात्य विद्वानोंके मस्तिष्कसे बाहर की बात है. इस लिये उन्होंने ऐसी अफवाहें फैलायी कि, हिन्दु देवदेवीयां तो बिभत्स है. उनके उपासना मंत्र और पुस्तकें भी बिभत्स है. वे लोग जननेन्द्रीयकी पूजा करते है. उनके देव लडते भी रहेते है और मूर्ख भी होते है. भला, देव कभी ऐसे हो सकते हैं? पाश्चात्य भाषी इस प्रकार हिन्दु धर्मकी निंदा करके खुश होते हैं.

वेदोंमे और कुछ मान्य उपनिषदोंमे नीहित तत्वज्ञानका अर्क जो गीतामें है उनको आत्मसात तो क्या किन्तु समझनेकी इन लोगोंमें क्षमता नहीं है.

शास्त्र क्या है? इतिहास क्या है? समाज क्या है? कार्य क्या है? इश्वर क्या है? आत्मा क्या है? शरीर सुरक्षा क्या है? आदि में प्रमाणभूत क्या है, इन बातोंको समझनेकी भी इन विद्वानोंमे क्षमता नहीं है. तो ये लोग इनके तथ्योंको आत्मसात्तो करेंगे ही कैसे?  

राजकीय अफवाहेः

दुसरों पर अधिकार जमाना यह पाश्चात्य संस्कृतिकी देन है.

भारतमें गुरु परंपरा रही है. गुरु उपदेश और सूचना देता है. हरेक राजाके गुरु होते थे. राजाका काम सिर्फ गुरुनिर्देशित और सामाजिक मान्यता प्राप्त प्रणालियोंके आधार पर शासन करना था. भारतका जनतंत्र एक निरपेक्ष जनतंत्र था. गणतंत्र राज्य थे. राजाशाही भी थी. तद्यपि जनताकी बात सूनाई देती थी. यह बात केवल महात्मा गांधी ही आत्मसात कर सके थे.

भारतकी यथा कथित जनतंत्रको अधिगत करनेकी नहेरुमें क्षमता नहीं थी. नहेरुको भारतीय संस्कृति और संस्कारसे कोई लेना देना नहीं था. उन्होंनें तो कहा भी था किमैं (केवल) जन्मसे (ही) हिन्दु हूं. मैं कर्मसे मुस्लिम हूं और धर्मसे ख्रीस्ती हूं. नहेरुको महात्मा गांधी ढोंगी लगते थे. किन्तु यह मान्यता  उन्होंने गांधीजीके मरनेके सात वर्षके पश्चात्‍, केनेडाके एक राजद्वारी व्यक्तिके सामने प्रदर्शित की थी.

नहेरुकी अपनी प्राथमिकता थी, हिन्दुओंकी निंदा. नहेरुने हिन्दुओंकी निंदा करनेकी बात, आचारमें तभी लाया, जब वे एक विजयी प्रधान मंत्री बन गये.

हिन्दु महासभा को नष्ट करनेमें नहेरुका भारी योगदान था.

वंदे मातरम्और राष्ट्रध्वजमें चरखाका चिन्ह को हटानेमें उनका भारी योगदान था. गौ रक्षा और संस्कृतभाषाकी अवहेलना करना, मद्य निषेध करना, समाजको अहिंसाकी दिशामें ले जाना, अंग्रेजीको अनियत कालके लिये राष्ट्रभाषा स्थापित करके रखना, समाजवादी (साम्यवादी) समाज रचना आदि सब आचारोंमे नहेरुका सिक्का चला. उन्होंने तथा कथित समाजवाद, हिन्दी चीनी भाई भाई, स्व कथित और स्व परिभाषित धर्म निरपेक्षताकी अफवाहें फैलायी. इन सभी अफवाहोंको अंग्रेजी ज्ञाताजुथोंने स्वकीय स्वार्थके कारण अनुमोदन भी किया.

जनतंत्र पर जो प्रहार नहेरु नहीं कर पाये, वे सब प्रहार इन्दिरा गांधीने किया.

इन्दिरा गांधी, अफवाहें फैलानेमें प्रथम क्रम पर आज भी है.

इन्दिरा गांधीने जितनी अफवाहें फेलायी थी उसका रेकॉर्ड कोई तोड नहीं सकता. क्यों कि अब भारतमें आपात्काल घोषित करना संविधानके प्रावधानोंके अनुसार असंभव है.

सुनो, ऑल इन्डिया रेडियो क्या बोलता था?

एक वयोवृद्ध नेता, सेनाको और कर्मचारीयोंको विद्रोहके लिये उद्युत कर रहा है. (संदर्भः जय प्रकाश नारायणने कहा था कि सभी सरकारी कर्मचारी संविधानके नियमोंसे बद्ध है. इसलिये उनको हमेशा उन नियमोंके अनुसार कार्य करना है. यदि उनका उच्च अधिकारी या मंत्री नियमहीन आज्ञा दें तो उनको वह आदेश लेखित रुपमें मांगना आवश्यक है.) किन्तु उपरोक्त समाचार  ‘एक वयोवृद्ध नेता, सेनाको और कर्मचारीयोंको विद्रोहके लिये उद्युत कर रहा हैसातत्य पूर्वक चलता रहा.

उसी प्रकारआपातकाल अनुशासन हैका अफवाहयुक्त अर्थघटन यह किया गया कि, “आपातकाल एक आवश्यक और निर्दोष कदम है और विनोबा भावे इस कदमसे सहमत है.”

विनोबा भावेने खुदने इस अयोग्य कदमके विषय पर स्पष्टता की थी, “यदि वास्तवमें देशके उपर कठोर आपत्ति है तो यह, एक शासककी समस्या नहीं है, यह तो पुरे देशवासीयोंकी समस्या है. इस लिये देशको कैसे चलाया जाय इस बात पर सिर्फ (सत्ताहीन) आचार्योंकी सूचना अनुसार शासन होना चाहिये. क्योंकि आचार्योंका शासन ही अनुशासन है. “आचार्योंका अनुशासन होता है. सत्ताधारीयोंका शासन होता है.”

विनोबा भावे का स्पष्टीकरण दबा दिया गया. सत्यको दबा देना भी तो अफवाहका हिस्सा है.

एक वयोवृद्ध नेता (मोरारजी देसाई) के लिये प्रतिदिन २० कीलोग्राम फल का खर्च होता है.” यह भी एक अफवाह इन्दिरा गांधीने फैलायी थी. मोरारजी देसाईने कहा कि यदि मैं प्रतिदिन २० कीलोग्राम फल खाउं तो मैं मर ही जाउं.

ऐसी तो सहस्रों अफवायें फैलायी जाती थी. अफवाहोंके अतिरिक्त कुछ चलता ही नहीं था.

समाचार माध्यमों द्वारा प्रसारित अफवाहें

आज दंभी धर्मनिरपेक्षताके पुरस्कर्ताओंने समाचार पत्रों और विजाणुंमाध्यमों द्वारा अफवाहें फैलानेका ठेका नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंके पक्षमें ले लिया है.

मोदीफोबीयासे पीडित नहेरुवीयन कोंग्रेस और उनके साथीयोंके द्वारा कथित उच्चारणोंसे नरेन्द्र मोदी कौनसा जानवर है या वह कौनसा दैत्य है, या वह कौनसा आततायी है, इन बातों को छोड दो. यह तो गाली प्रदान है. ऐसे संस्कारवालोंने (नहेरुवीयनोंने) इन लोगोंका नाम बडा किया है.

किन्तु भूमि अधिग्रहण विधेयक, आतंकवाद विरोधी विधेयक, उद्योग नीति, परिकल्पनाएं, विशेष विनिधान परिक्षेत्र (स्पेश्यल इन्वेस्टमेंट झोन), आदि विकास निर्धारित योजनाओं के विषय पर अनेक अफवाहें ये लोग फैलाते हैं. इसके विषय पर एक पुस्तक लिखा जा सकता है.

उदाहरण के तौर पर, भूमिअधिग्रहणमें वनकी भूमि नहीं है तो भी वनवासीयोंको अपने अधिकार से वंचित किया है, ऐसी अफवाह फैलायी जाती है. कृषकोंको अपनी भूमिसे वंचित करनेका यह एक सडयंत्र है. यह भी एक अफवाह है. क्यों कि उसको चार गुना प्रतिकर मिलता है जिससे वह पहेलेसे भी ज्यादा भूमि कहींसे भी क्रय कर सकते है.

आतंकवाद विरुद्ध हिन्दु और भारत समाज सुरक्षाः

कश्मिरके हिन्दुओंने तो कुछ भी नहीं किया था.

तो भी, १९८९९० में कश्मिरी हिन्दुओंको खुल्ले आम, अखबारोंमें, दिवारों पर, मस्जिदके लाउड स्पीकरों द्वारा धमकियां दी गयी कि, “इस्लाम कबुल करो या तो कश्मिर छोड दो. यदि ऐसा नहीं करना है तो मौतके लिये तयार रहो.” फिर ३००० से भी अधिक हिन्दुओंकी कत्ल कर दी. और उनके उपर हर प्रकारका आतंक फैलाया. लाख हिन्दुओंको अपना घर छोडना पडा. उनको अपने प्रदेशके बाहर, तंबूओंमे आश्रय लेना पडा. उनका जिवन तहस नहस हो गया है.

ऐसे आतंकके विरुद्ध दंभी धर्मनिरपेक्ष जमात मौन रही, नहेरुवीयन कोंग्रेसनेतागण मौन रहा, कश्मिरी नेतागण मौन रहा, समाचार माध्यम मौन रहा, मानव अधिकार सुरक्षा संस्थाएं मौन रहीं, समाचार पत्र मौन रहें, दूरदर्शन चेनलें मौन रहीं, सर्वोदयवादी मौन रहेंये केवल मौन ही नहीं निरपेक्ष रीतिसे निष्क्रीय भी रहे. जिनको मानवोंके अधिकारकी सुरक्षाके लिये करप्रणाली द्वारा दिये जननिधिमेंसे वेतन मिलता है वे भी मौन और निष्क्रीय रहे. यह तो ठंडे कलेजेसे चलता नरसंहार ही था और यह एक सातत्यपूर्वक चलता आतंक ही है जब तक इन आतंकवादग्रस्त हिन्दुओंको सम्मानपूर्वक पुनर्वासित नहीं किया जाता.  

एक नहेरुवीयन कोंग्रेस पदस्थ नेताने आयोजन पूर्वक २००२ में गोधरा रेल्वे स्टेशन पर साबरमती एक्सप्रेसका डीब्बा जलाकर ५९ स्त्री, पुरुष बच्चोंको जिन्दा जला दिया. ऐसा शर्मनाक आतंक, गुजरातमें प्रथम हुआ.

गुजरात भारतका एक भाग है. वह कोई संतोंका मुल्क नहीं है, तो वह भारत में, संतोंका एक टापु बन सकता है. यदि कोई ऐसी अपेक्षा रक्खे तो वह मूर्ख ही है.

५९ हिन्दुओंको जिन्दा जलाया तो हिन्दुओंकी प्रतिक्रिया हुई. दंगे भडक उठे. तीन दिन दंगे चले. शासनने दिनमें नियंत्रण पा लिया. जो निर्वासित हो गये थे उनका पुनर्वसन भी कर दिया. इनमें हिन्दु भी थे और मुसलमान भी थे. मुसलमान अधिक थे. से मासमें, स्थिति पूर्ववत्कर दी गयी.

तो भी गुजरातके शासन और शासककी भरपुर निंदा कर दी गयी और वह आज भी चालु है.

मुस्लिमोंने जो सहन किया उसके उपर जांच आयोग बैठे,

विशेष जांच आयोग बैठे,

सेंकडोंको जेलमें बंद किया,

न्यायालयोंमें केस चले.

सजाएं दी गयी.

इसके अतिरिक्त इसके उपर पुस्तकें लिखी गयीं,

पुस्तकोंके विमोचन समारंभ हुए,

घटनाके विषय को ले के हिन्दुओंके विरुद्ध चलचित्र बने,

अनेक चलचित्रोंमें इन दंगोंका हिन्दुओंके विरुद्ध और शासनके विरुद्ध प्रसार हुआ. इसके वार्षिक दिन मनाये जाने लगें.

२००२ के दंगोमें क्या हुआ था?

२००० से कम हुई मौत/हत्या जिनमें पुलीस गोलीबारीसे हुई मौत भी निहित है.

इसमें हिन्दु अधिक थे. ११४००० लोगोंको तंबुमें जाना पडा जिनमें / से ज्यादा हिन्दु भी थे

से महीनेमें सब लोगोंका पुनर्वसन कर दिया गया.

 

इनके सामने तुलना करो कश्मिरका हत्याकांड १९८९९०

हिन्दुओंने कुछ भी नहीं किया था.

३०००+ मौत हुई केवल हिन्दुओंकी.

५०००००७००००० निर्वासित हुए. सिर्फ हिन्दुओंको निर्वासित किया गया था.

शून्य पोलीस गोलीबारी

शून्य मुस्लिम मौत

शून्य पुलीस या अन्य रीपोर्ट

शून्य न्यायालय केस

शून्य गिरफ्तारी

शून्य दंड विधान

शून्य सरकारी नियंत्रण

शून्य पुस्तक

शून्य चलचित्र

शून्य दूरदर्शन प्रदर्शन

शून्य उल्लेख अन्यत्र माध्यम

शून्य सरकारी कार्यवायी

शून्य मानवाधिकारी संस्थाओंकी कार्यवाही

यदि हिन्दुओंका यही हाल है और फिर भी उनके बारेमें कहा जाता है कि, मुस्लिम आतंकवादकी तुलनामें हिन्दु आतंकवाद से देशको अधिक भय है ऐसा जब नहेरुवीयन कोंग्रेसका अग्रतम नेता एक विदेशीको कहेता है तो इसको अफवाह नहीं कहोगे तो क्या कहोगे?

अघटित को घटित बताना, संदर्भहीन घटनाको अधिक प्रभावशाली दिखाना, असत्य अर्थघटन करना, प्रमाणभान नहीं रखना, संदर्भयुक्त घटनाओंको गोपित रखना, निष्क्रीय रहना, अपना कर्तव्य नहीं निभानाये सब बातें अफवाहोंके समकक्ष है. इनके विरुद्ध दंडका प्रावधान होना आवश्यक है.

और कौन अफवाहें फैलाते हैं?

लोगोंमें भी भीन्न भीन्न फोबिया होता है.

मोदी और बीजेपी या आएसएस फोबीया केवल दंभी धर्मनिरपेक्ष पंडितोमें होता है ऐसा नहीं है, यह फोबीया सामान्य मुस्लिमोंमें और पाश्चात्य संस्कृति से अभिभूत व्यक्तिओमें भी होता है. ऐसा ही फोबीया महात्मा गांधी के लिये भी कुछ लोगोंका होता है. कुछ लोगोंको मुस्लिम फोबिया होता है. कुछ लोगोंको क्रिश्चीयन लोगोंसे फोबीया होता है. कुछ लोगोंको श्वेत लोगोंकी संस्कृतिसे या  श्वेत लोगोंसे फोबिया होता है. वे भी अपनी आत्मतूष्टिके लिये अफवाहें फैलाते है.  ये सब लोग केवल तारतम्य वाले कथनों द्वारा अपना अभिप्राय व्यक्त करके उसके उपर स्थिर रहते हैं.

शिरीष मोहनलाल दवे

GIVE HIM A TIME I have received an email from one of my learned friends, on some points which are generally being used to pass blame on BJP and Narendra Modi by many as a failure of BJP government.

MY RESPONSE TO THE POINTS IS AS UNDER:

1 why no difference appears because of Modi whom we feel connected with the soil of India whereas all formers were Muslim/Communists or Christian/Communists anti nationals ?

(1)What I feel that all the problems and issues arise out of negligence, ignorance and thereby failure of Government in the fields of education and employment.

The Nehruvian Congress has no vision right from Nehru. Its ideas on management of land and productions are not worth to debate. I have watched the making of Modi in Gujarat. He was quite an unknown person to the people of Gujarat till he was made a CM of Gujarat in 2001.

A very well established leader viz. Keshubhai Patel was The CM. He was a failure to the public expectation. BJP was losing ground in Gujarat. Ahmedabad Corp election was lost by the BJP. There was a severe earth quake in Gujarat on 26-01-2001. BJP CM was a failure. Media was making fun of Keshubhai.

Some how, by the grace of God, Narendra Modi was appointed as CM by Bajpai.

Narendra took hold of bureaucracy. He suspended several senior officers and set Gujarat to normalcy.

There was a lot of internal fights within BJP. Most leaders of BJP inclusive of Keshubhai where against Modi. They were trying to let him down. But Modi had achieved mass popularity. Media was also against Modi. Modi had discontinued the special treatment to media. A very senior writer of Gujarati literature, published an advertisement asking people to submit their opinion whether Modi should continue as CM or not. People had to use the advertised form to cast their opinion and to forward the opinion with their own postage charges. Modi got 87% votes in favor. However Keshubhai and others continued their fights. They were failed. Modi also won Ahmedabad Corp.

Then it was 2002 riot case. He handled it successfully despite of all odds. He defeated all his rivals without breaking BJP. How? Simply by encouraging education, cottage productions and infrastructure developments. Development brings employment. Infrastructure development brings developments in other fields. If there is a good governance then all these can happen if one has a will.

The changes would become visible by the time of next election. Because infrastructure projects are in pipe line. During Nehruvian Cong rule a tender used to take 3 years to get finalized. It is not the case with the BJP.

2  Indians have given Modi all supper powers still he has no media which speaks good about him expect Sudarshan who is not much known . NDTV is dead antinational . Others are owned by foreign powers . Why Modi failed to rescue  our media ?

(2) Modi has no super power as per constitution. BJP has no absolute majority in LS, and no majority in RS.

Nehruvian Congress knows how to misguide people and how to degrade those who oppose them. Nehruvian Congress has become expert in dividing people by religion, caste and language.

In 1956 Nehru himself had said that if Maharashtra would get Mumbai, he would be happy. By telling this, he gave a message to Marathi people that Gujaratis are the obstructions for Marathi people in getting Mumbai. In fact Gujarati and Marathi lived together for centuries. Narendra Modi has generated a parallel media of print and TV. This is social media. Hence those who love India have to be active on social media to defeat this paid media.

3 If Modi has power to change constitution why he has not put a ban on cow slaughter and free not guilty saints from prison ? . Now he has lost supports from Sadhus community .

(3) BJP has no absolute majority and has no power to change constitution. Modi might be not in favor to take risk.

If Asharam is falling under Sadhu, then most Sadhus must not fall under that category. Shri Shri Ravishankar, Ramdev, and many others are true Sadhus. They do favor Modi. Rest too, would extend favor when they would generate a sense of proportion and sense of priority.

BJP ruled states are doing progress on the ban on cow slaughter.

4 Modi had promised to get black money back in 100 days and every body will be much better . now when he could not do it was not his responsibility to explain poor Indians who are still eagerly waiting . Now they feel cheated .

(4) We have to think with sense of proportion. Nehruvian Congress willfully failed to constitute SIT, despite of the order of SC for 3 years.

Narendra Modi constituted SIT within 3 days. SIT is headed by SC judge. We should have faith in SC and SIT.

Since BJP has no absolute majority it cannot make drastic changes. If ordinance is issued, it can be challenged in SC. Modi does not want to take a risk to give a chance to the media. Media belongs to the pseudo secular gang. It is always ready to abuse Modi by twisting the matters.

Nehruvian Congress and its allies want to create controversy on every matter. Nehruvian Congress has avoided black money issue for six decades, despite of this, Anti-Modi gangs have become able to confuse the learned people on black money issue. They have become successful to create negative image for Narendra Modi and BJP to some extent. Most learned people have lost the sense of proportion. Should we become a part of it?

Please go through my blog “क्या आप भारतके होतैषी है? और फिर भी क्या आप इनमेंसे कोई एक  वर्गमें भी आते हैं?” at https://treenetram.wordpress.com/2015/01/04/%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE-%E0%A4%86%E0%A4%AA-%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A4%95%E0%A5%87-%E0%A4%B9%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%88%E0%A4%B7%E0%A5%80-%E0%A4%B9%E0%A5%88-%E0%A4%94/

5 Because of these blunders Modi will lose in next election. It is not a blunder at all.

(5) To term it a blunder and to create a negative atmosphere for BJP, is the strategy and trap made by Nehruvian Congress and Anti-Modi (BJP) gangs.

How to tackle this strategy, the way out to it, depends upon us and our sense of proportion to understand and to realize the same.

The pseudo secular gangs are no way better than BJP and Narendra Modi.

We have to remember that Nehruvian Congress has ruled for six decades with majority period of absolute majority.

BJP has never ruled with an absolute majority. Now also, it is ruling with normal majority that too in LS only.

6 So , how India will save herself from wicked Congies and  Muslim/Christian powers to hijack our country ?

(6) As and when Hindus are attacked intellectually, Hindus have to hit them back.

Hindus have good weapons to fight. It is easy for Hindus to hit them back as these Muslim and Christian leaders have basic falsehood and cunningness in their philosophy and actions respectively.

When they attack on us physically, we should take legal action and to expose them, to give wide publicity. We must make such events as  international issue. There is no shortage of weapon to fight intellectually against Nehruvian Congress, pseudo secular, Christian priests and decisive forces of Muslims.

The nationalists should always hit them back repeatedly on their culture, character and their evil actions. They have no defense at all.

e.g. Nehruvian Congress:

Nehru’s Blunders on policy with China, Kashmir, Pakistan, Tibet, Burma, Ceylon etc… no end, including telling lies before parliament.

Indira’s blunders, scams, cunningness for power, negligence on the issue of sending back the Bangadeshi infiltrators, Introduction of Vote bank politics, telling lies before court of law, Simla pact, Union Carbide deal, Emergency, antisocial activities, generating cross border terrorism and what not?

Rajiv Gandhi’s inaction and improper handling of Bhopal gas hazard, making smooth pass for Anderson.

Sonia’s anti-national activities, giving smooth path to Daud to run away, allowing his gang to do all the anti-social activities, unconstitutional actions and a lot scams executed openly. Besides this, her party’s willful failure of reinstatement of Kashmiri Hindus. Denial of natural rights, Human  rights and constitutional rights of Hindus, her negligence on securities of Hindus’ rights everywhere.

Pseudo secular and media: Spreading rumors against Hindus, neglecting Kashmiri Hindus for 25+ years. This is a grave offence of keeping mum on massacre of 3000+ Kashmiri Hindus and keeping them in exile from their own state and houses. They are living in tents from 1990, till date. Hindus should make continuous, wide spread and big noise on this criminal negligence. All the leaders like Nehruvians, Kashmiri leaders like Omar, Farukh, Mufti, separatist leaders IAS officers etc… should be arrested on unbailable warrant, put to jail and convicted for willful negligence of human rights.

Christian priests: An investigation team should be constituted in each state to see as to how the Hindus were converted to Christianity.

Muslim separatists and caste politics: Most Nehruvian Congi leaders and whosoever have played or encouraged vote bank politics to divide India on the basis of caste, religion, so called race and language, should be prosecuted.

E.g.  Akabaruddin, Azamkhan, Mamata, Nitish, Laloo, Karuna, MMS, Sonia … Even without creating any controversy the Nationalist lot of India can hit these virtually anti-nationals, very hard and continuously.

As and when any of the above leaders speaks against BJP government and otherwise also, they should be bombarded by us through print media and social media. Media should be flooded with our attack.

At this stage, when the anti-national elements are alive and making efforts to derogate BJP to create a negative atmosphere, the people who think themselves nationalists, should not touch any non-issues like as to who was responsible for partition or like that…

We must also know that an enemy is never a small. National enemy can never be pardoned.

BJP has to follow Kautilya. BJP has not to follow Prithviraj Chauhan.

Kautilya has said wisely that it is better to have an intelligent enemy than to have a foolish friend.

Shirish Mohanlal Dave

Tags: Nehruvian Cong, Nehru, Indira, Rajiv, Sonia, blunder, scam, lies, SIT, BJP, Narendra Modi, Negative atmosphere, Anti-Modi gangs, pseudo secular gangs

Supreme Court of India has to interpret laws in true spirit of the human rights

Nehruvian Congress a political party of India had ruled India for more than six decades with small breaks. During these six decades, it has ruled 30 years with absolute majority. 2 years with absolute autocracy, and remaining period with majority.

Despite of this, it has made more than 100 amendments in the Indian Constitution, In the name of public interest.

Was it necessary?
No.

When this Congress party is addressed as Nehruvian Congress, there is a purpose.

You cannot say this Congress as “Indian Nation Congress Party” though on record it is like that.

This name has given, and still it gives, a very wrong message that this is the same Congress Party that gave big contribution, to make India independent from foreign rule.

This matter has been discussed by me in Gujarati language on my website (TreenetramDOTwordpressDOTwwwDOTcom)

If it has to be told in brief, than we can say that a person is identified by its culture. Culture can be identified by its behaviour. The behaviour is experienced or being experienced or it is on record.

WHAT IS EXPECTED FROM A CULTURED PERSON?

Suppose you are A and the other is B.

A and B both had respect for each others.

A is communicating with B.

B suddenly stopped communication with A. A got confused.

It was an insult indirectly but direct. A felt so.

Instead of being emotional, A asked B. B kept mum.

The reason was unknown to A. Even though A is open at  heart, there was no way for A as to how A can correct itself? B has to be transparent.
A cultured society maintains democracy and transparency.

A human is prone to commit mistake and error, knowingly or unknowingly.

The democracy provide scope for correction of individuals. To ask the other person for a clarification is the democratic cultured mindset. If the a behaviour or belief of A or B is not liked to B or A as the case may be. This thing to get clarified is advisable.

Because after all, all of us are here for pleasure and spread pleasure.

One cannot hurt a person and boycott that person without asking that person to clarify.

What applies to person to person (He to She, He to He, She to She or whatsoever) that applies to political parties too.

This is universal. If the cap fits to She or He can review her/his action. This is necessary to give a chance to a person to correct itself. This is called democratic and humanitarian mind set.

Here the subject is the so called Indian National Congress Party.

Let us come to the point of above Congress.

This Congress has always been run by Nehruvians after the independence since 1947. The Congress had been founded by Hume, a British, in nineteenth century. It was a party of white collars. When MK Gandhi came to India and he joined the Congress, he made it open for the whole mass of India irrespective of caste and economical status.

The intention had been changed from “Acting as an agency to be interface between British and people of India” to “Home Rule” and then to “Complete Independence”.

MK Gandhi thought that without involving mass, India cannot achieve proper independence with the tool of Non-violence. This was the culture of Congress at that time. In nineteen thirties, it had also passed a resolution that India would be a democratic country and it will have a written constitution.

The big question is what is democracy?

According to MK Gandhi, the definition of democracy is the political system under which “the truth is heard and the truth is honoured”. MK Gandhi more specifically called “Rama Rajya” means the way Lord Rama ruled India.

Who was Rama?

Rama Rajya

Rama was a king emperor of India walked on this earth, some 6000 years back from now.

What were the main political features of Rama.

(1) The ruler (king) has to rule as per the accepted legal and social traditions prevailing in the society.
(2) The ruler has only executive authority,
(3) Ruler is not authorised to make any change in the rule and traditions,
(4) The authority for making any change in a rule or tradition is the people
The group of preacher (teachers) will decide the method of finding out the way to decide peoples desire to change.
(5) The preachers (Teachers) will have no executive power.

We know the details of life of Rama and his wife Sita.
How did people behave?
How did Rama behave?
How did the group of teachers headed by Vashishtha behave and what was the result?
How did Rama honoured the controversial truth which was against a tradition (which still prevails in the democratic countries of world ) which he could not challenge to prove it as a falsehood?
The challenge had come from a very lower class poor person. But it was honoured by Rama.
Rama has been taken as an incarnation of Sun God (Vishnu), not because he won a lot wars. Rama was taken as an incarnation of Sun God because he discharged his duty very efficiently. He maintained law and order in democratic way.

Now here, in the present period, who has to act as a Rama? Who has to act as the team of teachers? Who has to propose reforms?

The head of the elected representatives are Rama.

We have a method of electing representatives under Indian Constitution. Off course the elections have to be proper and fair.

But the system was no fair enough for four decades. In 1988, VP Singh appointed Shesan as the Chief Election Commissioner, who enforced election provisions provided under law, very firmly. Till then, unless there was a flood against Nehruvian Congress, the Nehruvian Congress had never faced a defeat.

But after the enforcement of law strictly, the Nehruvian Congress could not get clear majority at any time.

This means, rules are there, but the interpretation has either not been made properly by the ruler in execution

or

the Supreme Court has not been asked to interpret the law,

or

the Supreme Court has not intervene of its own, to interpret any rule which could not protect the constitutional rights of citizens.

In fact, if the Supreme Court of India interprets the provisions of the Indian Constitution, in relevance to the human rights and natural rights, there is no need to enact further Acts.

Now let us look at the democratic rights based on and prevailed under the rule of Rama.

(1) The ruler has only executive authority: Why?
It is natural that some body has to take the responsibility of execution of rule.

(2) Ruler is not authorised to make any change in rule and traditions: Why?
Because if ruler is authorized to make changes, then the ruler will make the changes which are beneficial to that ruler only.
This has been very well experienced by India, during the rule of Jawaharlal Nehru, Indira Nehru and Rajiv Gandhi.
As for changes made in laws, by Indira NehruGandhi, one can write a thick Book like epic “Maha Bharata”. We will look into it, on the day of anniversary of “Emergency imposed by Indira in 1975.

(3) The authority for making any change in a tradition is the people: Why?
It is only the people are suffering. They are suffering due to any law or tradition and the rule is defective and required to be modified to meet with the protection of human rights. That is why the proposals should also come up from the mass. the mass includes teachers, experts, leaders of political parties etc… They cn come up through media or/and common platforms. Then political parties will draft a bill in consultation with experts and put it before public through the party’s election manifesto. If that party wins the elections, then the bill can be passed in parliament.

RAMA RAJYA THE POWER OF TEACHER

(4) The group of preacher (teachers) will decide the method of finding out the way to decide peoples’ desire to change the law: Why?

This is in fact drafting a bill. Supreme Court can re-examine or ask an expert committee to review the draft or bill or law.

(5) The preachers (Teachers) will have no executive power. Why?
Executive power has been entrusted with the ruler. And if preachers are entrusted with executive power then they become ruler. In these circumstances the ruler will get the power to change the law. In fact we want to deprive the ruler from using the power of making changes in the law, unless it has been proposed or permitted by the mass.

We want a system which enables the truth to be heard and honoured.
We do not want to promote old type of Rama Rajya. We want Rama Rajya where Sita the wife of Rama too gets justice.

How did Nehruvian Congress fail to provide justice to the mass by not protecting human rights?

In 1950-s, there were some scandals. But the then Prime Minister Javaharlal Nehru told the parliament that “we will not attend the scandals. You put before the public. Public would decide in the next election.”
A poor lot was remaining poor. JL Nehru introduced reservation for lower class, instead of providing employment with dignified salary to all poor mass. This was the foundation of Vote Bank politics.

MK Gandhi had said in his book, written somewhere in 1930-s, to first concentrate on cottage industries and education. But Nehru overlooked.

MK Gandhi had asked complete prohibition of liquor, to prevent the poor and illiterate mass from domestic economical anarchy. But Nehru ignored it.

Contrary to this, the successive government encouraged the relaxation in Prohibition on Liquor enacted under British Rule in Bombay State.

In many other ways, the Congress existed before independence lost its character after independence. That is why person like me address this Congress as Indian Nehruvian Congress Party, in place of Indian National Congress Party.

Why did Supreme Court fail to supervise the human rights?
There was no provision in Indian Constitution to take up the issue before the Court of Law, unless some one is affected adversely by any act or whatsoever.

P. I. L.
The First Non-Congress Congress government headed by Morarji Desai, enacted the provision of “Public Interest Litigation”.

This provision provides, any citizen to go before the High Court of a state or before the Supreme Court to declare specified law as null and void, as it is harmful to human right. Supreme Court would either ask the Government to amend the law suitably or to drop it or to re-frame it.

But why there should be a Public Litigation Act? In fact it is inbuilt in democracy that any law becomes null and void if it harms a human right.

Information Act
Why this act is needed?
You have appointed a servant to whom you pay against the duty you have asked to perform.
Now suppose you gave him some money to purchase some vegetable.
You have the right to tell that person as to what he has to purchase and from where he should purchase, how he has to purchase and how much he has to purchase.
When he comes back, it is your right to ask the person, to tell you the full information. It is the right of the person who gave the earned money for a purpose to a person who has been employed on payment.
Now what did the Congress do?
It restricted the right by enacting the act and provided lot exceptions. The act became nail-less to great extent.

Consumer Protection Act
You have the full liberty to select the item, the amount, the way and the quantity to spend the money you have earned.
The right to selection, the right to quality, the right to know the contents, the right to compare the prices, the right to enjoy options, the right to have the record of your purchase. All these rights are inbuilt rights under human rights.

Right to “call back” the elected representative.
This act yet not been enacted.

But it can be interpreted as inbuilt right to human right.
How?
You are selecting your representative to represent and execute, your view, desire, security and welfare.
You are paying the representative for that duties.
There is a system of payment by Tax. This is called public fund.
There is a system for selecting person. This is called system of elections.
Somehow jointly, you have selected a person of your geographical area for 5 years.
Now suppose this person increases its own monthly payment without your permission,
Suppose this person shows negligence on your security,
Suppose this person hides the facts,
Suppose this person making joint ventures with your recognized enemy,
Suppose you have lost faith in this person and you feel to terminate its services.
Definitely it is your inbuilt human right to terminate the services of this person at any time as soon as you feel that this person is not faithful.
Terminate the services of a person whom you have elected is termed as “Call Him/Her Back”.

This “Right to call back” has not been enacted yet. But such right to call back is inbuilt right in democracy.

How to call a person back if there is no system constituted in the Indian Constitution.

Let us take an example:

In 1971 Nehruvian Congress had won 140 seats out of 163 seats of Gujarat State Assembly.
The said government lost the faith of public. Its governance was full of scandals and frauds. People of Gujarat were highly dissatisfied by the government. It became a hot issue of discussion as to how to call, all the elected members of the state assembly, back.

People had to lodge a wide spread agitation and asked the representatives to resign. But Nehruvian Congress Members did not pay any heed and did not resign.

All the opposition party members had resigned. There was a very big mass movement in Gujarat. This was known as Nava-Nirman-Stir (A movement for Reconstruction of State Assembly). It is a long story as to how it became successful and at what cost.

But how to achieve this success, without loss of blood?

What do we do in a normal housing society?

20 percent members can ask the president of the society to call for an extra-ordinary general meeting with an agenda.

Here, in the “Call them Back” case,  20 percent voters of that area can submit an affidavit before the Election Officer, asking the election officer to conduct a vote of confidence in respect of the elected member.
If the representative secures 50+ percent of the votes polled, he would be continued as the representative, otherwise by-elections would be conducted for that assembly seat.

This means that only interpretation or directives are required for fulfillment of any human right, from the Supreme Court.

Shirish M. Dave

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नरेन्द्र मोदीको क्या बनना चाहिये? कौटिल्य अथवा पृथ्वीराज चौहाण? – २

मुहम्मद घोरीने किसीको भी क्षमा किया नहीं था. ठीक उसी प्रकार नहेरुवीयन कोंग्रेसने भी कभी अपने देशी शत्रुको क्षमा किया नहीं था. उतना ही नहीं फर्जी मामले बनाकर भी उसकी मानहानि करनेकी और न्यायिक कार्यवाही द्वारा उसको हानि करनेके भरपुर प्रयत्न किये है.

नहेरुः
नहेरुने अपने विरोधी मोरारजीके विरुद्ध मोरारजीकी संतानको लेकर फर्जी कथाएं चलाइ थीं. कामराजप्लान के अंतर्गत एक फर्जी प्लान बनाके मोरारजी देसाईको मंत्री मंडलसे निकाला गया था.

Narendra Modi has to decide ०१

ईन्दीरा घाण्डीः

ईन्दिरा घान्डी नहेरुवाली नीति चलाके मोरारजीकी मानहानि करवाती रहती थीं.

इन्दिराने आपातकाल के दौरान कई नेताओंको मरणासन्न कर दिया था.

आपतकाल खुद एक फॉड था.

वीपी सींग के विरुद्ध सेंटकीट्स मे उनके नाम फर्जी एकाउन्टका केस दर्ज किया था.

सर्वोदय संस्थाओंके खिलाफ जांचके आदेश दिये थे और सर्वोदय संस्थाओंको निर्दोष होते हुए भी परेशान किया था.

मोरारजी देसाई सीआईएके वेतन पत्रक (पे रोल) पर है ऐसे आक्षेप करवाये थे.

जयप्रकाश नारायणने सैन्य को विद्रोह करनेका कहा था ऐसे आक्षेप करके उनको कारावसमें बंद किया था. अन्य हजारों नेताओंको भी कारावास में बंद किया था.

तारकेश्वरी सिंहाके उपर असत्य आक्षेप करवाये और उनको आत्म हत्या करनी पडी(!).

ज्योर्ज फर्नान्डीस पर फर्जी केस बनाया था और उनको जेलमें बंद किया था.

सोनीया-एमएमएसः

बाबा राम देव को फर्जी केस बनाके परेशान किया, अन्ना हजारे को भी परेशान किया, किरन बेदीके विरुद्ध आक्षेप करके परेशान किया, बाजपाईका किस्सा और अडवाणीकी घटनाएं तो हमने देख ही ली है.

नरेन्द्र मोदी, अमित शाह, आदि के विरुद्ध फर्जी केस बनवाये.

पुलिसका मोरल डाउन करनेके कई और काम भी किये.

नहेरुवीयन और उनके साथीयोंका संस्कार रहा है कि खुदकी सत्ता और धनके लिये कुछ भी करो, चाहे देशका सामाजिक चारित्र्य कितना ही अधम क्युं न हो जाय.

जो लोग वोटबेंकी सियासत खेलते है वे हमेशा पुलिस और सीबीआई का यथेच्छ उपयोग करते हैं. सरकारी अधिकारीयोंको भ्रष्ट होने देते हैं फिर उनके भ्रष्टाचारके आधार पर उनसे गलत काम करवाते हैं. अन्य लोगोंकी भी ब्लेक डायरी बनाई जाती है जिनमें लालु, मुलायम, ममता, मायावती, जयललिता, करुणानिधि शरद पवार मुख्य है.

ये सब अर्वाचीन मुहम्मद घोरी है.

इन अर्वाचीन मुहम्मद घोरीयोंको कैसे नष्ट कर सकते है?

अति सरल है. क्युं कि ये लोग अतिभ्रष्ट है, जहां भी हाथ डालो उनका भ्रष्टाचार पकडा जा सकता है.

(१) आपातकालमें जिन्होने ईन्दिरा गांधीकी सहायता की थी और जो लोग अभी भी जीवित है, उनके उपर शाह जांच समितिके सूचनोंके आधार पर कार्यवाही हो सकती है. उनको गिरफ्तार कर लो और जेलमें डाल दो. कार्यवाही होती रहेगी.

(२) एन्डरसनको भगाने वालोंमें सोनिया गांधी एक पक्षकार बन सकती है. उनके उपर भी ऐसी ही कार्यवाही हो सकती है.

(३) कश्मिरी हिन्दुओंके प्राकृतिक अधिकारके हनन और लगातार हो रहे मानवीय अधिकार के हननके मामलेमें, अपना फर्ज न निभानेके कारण, कश्मिरके सभी नेताओंको तथा नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंको शिघ्र ही प्रग्रहित (गिरफ्तार) कर सकते हैं. उनकी संपत्ति जप्त कर सकते है.

(४) नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंने और उनके साथीयोंने विदेशी बेंकोमें बीना रीझर्वबेंककी संमति गैरकानुनी एकाउन्ट खोलके काला-लाल धन जमा किया, इस बात पर उन सबके उपर फौजदारी कार्यवाही कर सकते है. क्यों कि यह देशके साथ गद्दारीका विषय है ये सब एकाउन्ट होल्डर गिरफ्तार हो सकते है. इन एकाउन्टोंका राष्ट्रीयकरण करके सबके नाम प्राप्त किया जा सकता है और जो लोग एकाउन्ट होल्डर न हो किन्तु मनिनीत (नोमीनी) व्यक्ति हो तो भी उसके उपर फौजदारी कार्यवाही हो सकती है.

(५) कोमनवेल्थ गेम, कोयला आबंटन और २-जी के बारेमें कई नेताओंको गिरफ्तार करके जेलमें रखा जा सकता है.

(६) भारतीय करन्सी नोट के मुद्रणका संविदा (ठेका) जिसको दिया था वह आतंकी संगठनोंसे संलग्न होनेके कारण अन्य देशोंमे प्रतिबंधित थी. फिर भी नहेरुवीयन कोंग्रेसने उसको मुद्रणका संविद दिया. कई कर्जी करन्सी नोट सरकारी बेंकके एटीएम यंत्रमेंसे निकली थी. इससे यह निरपेक्ष प्रतिबिंबित होता है कि नहेरुवीयन कोंग्रेसके ही नेतागण इससे संलग्न है. इस मामले पर भी कई नेताओंको गिरफ्तार किया जा सकता है.

(७) कई नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण जातीय मामलेमें विवादित है. उनके उपर कार्यवाही शुरु की जा सकती है.

दुसरे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

कई नहेरुवीयन कोंग्रेसके मुसलमान नेताओंकी संतान अभद्र और विभाजनवादी कोमवादी भाषा प्रयोग करती रहेतीं हैं इतना ही नहीं कई नहेरुवीयन कोंग्रेस और उसके साथी नेताओंने कोमवादी उच्चारण अनेकानेक बार किया है उनको गिरफ्तार करके जेलमें बंद कर सकते है.

तीसरे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

ये है समाचार माध्यमके स्वामि. जिनका काम समाजिक शिक्षाका काम करना है. उसके स्थान पर वे देशको विभाजित करनेका काम करते हैं. इनके पाससे हमेशा उचित अवसरों पर स्पष्टिकरण मांगते रहेना चाहिये और जब वे विफल रहें तो उनका अनुमति पत्र रद करनेका और कानुनी कार्यवाहीका आरंभ कर देना चाहिये.

चौथे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

ख्रिस्ती धर्मके पादरी लोग हैं. ये लोग हिन्दु धर्मकी निंदा करते हैं. तत्कालिन बने इसाईयोंको हिन्दुओंसे संबंध न रखने के लिये प्रभावित करते हैं और विभाजनवादी प्रवृतियां करते हैं. गरीब हिन्दुओंको लालच दे के धर्म परिवर्तन करवाते हैं. ऐसे पादरीयों पर सुक्ष्म दृष्टि रखकर कानुनी कार्यवाही की जा सकती है.

पांचवे किस प्रकारके मुहम्मद घोरी है?

ये है सरकारी अफसर. इनका काम नियमका पालन करना है और नियमका पालन करवाना है. इस कामके लिये उनको वेतन मिलता है. वे अपनी क्षतियांके लिये और सामाजिक अव्यवस्थाके लिये उत्तरदेय है.

नरेन्द्र मोदीको चाहिये कि इनको सीधा करें. यदि इनको सीधा करेंगे तो सब कुछ सीधा हो जायेगा.

कार्यवाही कैसे की जाय?

जो भी कार्यवाही करनी है, वह किसी भी प्रकारका कोलाहल किये बिना करना है. इसमें कोई निवेदनों की या विज्ञापन देनेकी आवश्यकता नहीं हैं. यदि कोई समाचार माध्यमवाले अनावश्यक प्रश्न करें तो उनके उपर भी जनताको पथभ्रष्ट करनेकी और जनताको भ्रमित करनेके आरोप लगाके कानुनी कार्यवाही हो सकती है.

अन्य कई कार्य है जो विकास, कानुन सुधार और गवर्नन्सके बारेमें हैं वे होते रहेंगे, क्यों कि प्रत्येक विकासकी परिकल्पनाके निदेशकका उत्तरदायित्व है कि वह अपना पूर्ण करें. और वह करेगा ही. उपरोक्त कार्य जिसमें कानुनमें संशोधनकी आवश्यक नहीं है, वे प्रारंभ कर सकते हैं. वास्तवमें नियम तो प्रत्येक उत्तरदायुत्वके लिये है. केवल अर्थघटन नहीं किया जाता है.

ऐसा नहीं करेंगे तो क्या होगा?

इतिहासका पुनरावर्तन होगा.

यदा तदा दुश्मनके कुकर्मोंको क्षमा किया है तब देशको सहन करना पडा है.

(१) नहेरुने प्रेमभाव रखके चीनकी लश्करी घुसपैठकी उपेक्षा की तो चीनने भारतकी ९१००० चोरस मील धरती पर अधिकार जमा लिया. हमारे हजारों जवान बेमौत मरे.

(२) इन्दीरा घान्डीने पाकिस्तानके साथ बेवकुफी बतायी और सिमला करार किया जिससे पाकिस्तानने जो खोया था वह सब पा लिया. बंग्लादेशने अपना देश पा लिया और एक करोड बीन बंगाली मुस्लिमोंसे छूटकारा भी पा लिया जो आज भारतके शिर पर है. १९७१में भारतके सैन्यने पायी हुई विजयके कारण, इन्दिरा इतनी सीमा तक सशक्त बनी थी कि वह पाकिस्तान, बांग्लादेश और कश्मिरके साथ जो चाहे वे शर्तें लागु कर सकती थीं. यदि इन्दिरा चाहती तो पूरे कश्मिर पर भारतका अधिकार स्थापित करके कलम ३७०को खत्म कर सकती थी. सिमला करार एक व्यंढ करार था. आज पाकिस्तान भारत पर आतंकी आक्रमण करता है. इन्दिराकी दुश्मन देशको क्षमा करने के कारण हजारों भारतीय जवानोंकी सहादत पर पानी फिर गया. और दुश्मनके आतंकोंसे भी हजारो बेमौत मरे.

(३) मोरारजी देसाईने पक्ष विरोधी प्रवृत्तिके लिये चरणसिंघको मंत्रीमंडलसे निष्कासित कर दिया था. चरणने क्षमायाचना की. अटल बिहारी बाजपाईने मोरारजी देसाईको कहा कि उनको माफ कर दो. मोरारजी देसाईने, बाजपाईके कहेने पर चरणको माफ किया और उसको फिरसे मंत्री मडलमें लिया.

(४) चरण सिंघने अपना एक गुट बनाया. इन्दिरा के उपरकी शाह कमीशनकी कार्यवाही आगे न बढायी और इन्दिराका सहयोग लेके मोरारजी देसाईकी सरकारका पतन करवाया. उसी इन्दिराने चरण सिंघकी सरकारको दिये हुए समर्थनको प्रत्याहृत करके चरण सिंघकी सरकारका पतन किया.

(५) राहुल गांधी जब जाली पासपोर्ट और नकदके साथ युएसमें पकडा गया तो बाजपायीने उसको मुक्त करवाया. उसीके कारण नहेरुवीयन कोंग्रेसको जिवनदान मिला. देशको १० साल तक लुटनेका एक अधिक अवसर नहेरुवीयन कोंग्रेसको मिला.
जिन्होंने प्रतिस्पर्धीको माफ किया उनको सहन करना पडा. नहेरु और इन्दिराने विदेशी दुश्मनोंको माफ किया, इससे देशको आज भी सहन करना पडता है.

मोरारजी देसाईने चरणसिंहको क्षमा किया तो देशको कोंग्रेस मुक्त शासन मिलनेमें ३५ वर्षकी देरी हो गई. इस अंतर्गत देशके लाखों मनुष्य बेमौत मरे और करोडों मनुष्योंको यातनाएं सहन करनी पडी. खरबों रुपयेकी तस्करी हुई वह वार्ता तो भीन्न ही है.

शिरीष मोहनलाल दवे

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नरेन्द्र मोदीको क्या बनना चाहिये? कौटिल्य अथवा पृथ्वीराज चौहाण?

कौटिल्यकी विशेषता क्या थी और पृथ्वीराज की विशेषता क्या थी?

Narendra Modi has to decide
कौटिल्यः
कौटिल्यमें दुश्मनको पहेचानने की प्रज्ञा थी.
कौटिल्य दुश्मनको कभी छोटा मानता नहीं था,
पडौसी देश दुश्मन बने ऐसी शक्यता अधिक होती है इस लिये उसकी गतिविधियों दृष्टि रखनी चाहिये क्योंकि वह प्रथम कक्षाका दुश्मन बननेके काबिल होता है.
दुश्मनको कभी माफ करना नहीं चाहिये,
ऐसा क्यों?
क्योंकि राष्ट्रहित सर्वोपरी है.

पृथ्वीराज चौहाण
पृथ्वीराज चौहाण भी एक देशप्रेमी राजा था. लेकिन वह दुश्मनके चरित्रको समझ नहीं पाया. उसने मुहम्मद घोरीको फेली बार तो हरा दिया, किन्तु बिना ही उसके चरित्रकी जांच किये भारतीय प्रणालीको अनुसरा और उसको क्षमा प्रदान की. वही मुहम्मद घोरीने फिरसे आक्रमण किया और पृथ्वीराज चौहानको हराया और उसका कत्ल किया. अगर पृथ्वीराज चौहाणने मुहम्मद घोरीको माफ किया न होता तो भारतका इतिहास अलग होता.
कौटिल्यने क्या किया था.
पोरस राजा देश प्रेमी था. उसने सिकंदरसे युद्ध किया. कुछ लोग ऐसा बताते है कि सिकंदरने पोरस को पराजित किया था. और सिकंदरने पोरसकी वीरताको देखके उसए संधि की थी. लेकिन यह बात तथ्यहीन है. वीरताकोई भारतका एकआधिर नही था. वीर योद्धा हरेक देशमें होते है. सिकंदर अनेकोंको जितता आया था लेकिन जो राजा हारे थे उनके साथ और उनकी जनताके साथ, उसका हमेशा आतंकित व्यवहार रहा था. पोरसने सिकंदरको संधिके लिये विवश किया था.और सिकंदरको हतप्रभः किया था.
सिकंदरके बाद सेल्युकस निकेतर सिकंदरकी तरह ही विश्वविजय करनेको निकला था. उस समय पोरसके बदले उसका भतिजा गद्दी पर था. उसने बीना युद्ध किये सेल्युकसको भारतमें घुसनेका रास्ता दे दिया. सिकंदर तो धननंदकी विशाल सेनासे ही भयभित हो गया था. लेकिन सेल्युकसने मगध पर आक्रमण कर दिया. जो सम्राट विश्वविजयी बनके आया था वह मगधके चन्दगुप्त मौर्यके सामने बुरी तरह पराजित हो गया. किन्तु ये सब बातें छोड देतें है.
कौटिल्यने क्या किया. पोरसके भतीजेको हराया. उसने लाख क्षमाएं मांगी लेकिन कौटिल्यने उसको क्षमा नहीं किया और उसको हाथीके पैरके नीचे कुचलवा दिया. पोरसका भतिजा तो जवान था, वीर था, उसके सामने पूरी जिंदगी पडी थी. वह देशप्रेमी पोरस राजाकी संतानके बराबर था, अगर कौटिल्य चाहता तो उसको क्षमा कर सकता था किन्तु कौटिल्यने उसको क्षमा नहीं किया. क्यो कि जो देशके साथ गद्दारी करता है उसको कभी माफ किया नही जा सकता.

यदि आप इतिहासको भूल जाते है तो उसका पुनरावर्तन होता है.
साम्राट अकबरको आते आते तो भारतके मुस्लिम हिन्दुओंसे हिलमिल गये थे. जैसे हुण, शक, पहलव, गुज्जर हिन्दुओंसे मील गये थे. भारतके मुस्लिम भी उसी स्थितिमें आ गये थे. कोई लाख नकारे तो भी यह एक सत्य है कि मुघलयुग भारतका एक स्वर्णयुग था. इसमें औरंगझेब जैसा कट्टर मुस्लिम भी लंबे समय तक अपनी कट्टरताका असर रख पाया नहीं था.
मुघल बहादुरशाह जफर जिसके राज्यकी सीमा सिर्फ लालकिलेकी दिवारें थी उसके नेतृत्वमें हिन्दुओंने और मुस्लिमोंने १८५७का विप्लव किया. पूरे भारतके हिन्दु और मुस्लिम राजाएं उसका सार्वभौमत्व स्विकारने के लिये कृतनिश्चयी थे.
ऐसा क्यों था?
क्यों कि हिन्दुओंके लिये धर्म तो एक ही था जो मानव धर्म था. आप ईश्वरकी मन चाहे तरिकोंसे उपासना करें या न भी करें तो भी हिन्दुओंको कोई फर्क पडता नहीं था. (हिन्दु यह भी समझते हैं कि ईश्वरको भी कोई फर्क पडता नहीं है).
मुस्लिम लोग भी परधर्म समभाव ऐसा ही समझ रहे थे. आज भी देखो, ओमानका सुल्तान काबुस सच्चे अर्थमें हिन्दुओं जैसा ही धर्म निरपेक्ष है. हां एक बात जरुर है कि वह विदेशीयोंको अपने देशकी नागरिकता नहीं देता है. चाहे वह हिन्दु हो या मुस्लिम. क्यों कि देशका हित तो सर्वोपरी होना ही चाहिये. जो लोग ओमानमें पहेलेसे ही बसे हुए हैं वहांके नागरिक है उसमें हिन्दु भी है और मुस्लिम भी है. इस लिये ऐसा मानना आवश्यक नहीं कि, सारे विश्वकी मुस्लिम जमात अक्षम्य है.

लेकिन भारतमें क्या हुआ?

अंग्रेजोंने खुदके देशके हितके लिये हिन्दु मुस्लिमोंमें भेद किये. सियासती तौर पर जीन्नाको उकसाया. नहेरुका भी कसुर था. नहेरु सियासती चालबाजीमें कुछ अधिक ही माहिर थे.
महात्मा गांधी के पास सबसे ज्यादा जनाधार था.

महात्मा गांधी के पास निम्न लिखित विकल्प थे
(१) अभी स्वतंत्रताको विलंबित करो, पहेले देशको और नेताओंको व्यवस्थित करो.
किन्तु यह किसीको भी स्विकार्य नहीं था. क्यो कि कोमी हिंसा ऐसी भडक उठी थी कि
नजदिकके भविष्यमें वह बीना विभाज किये शक्य ही नहीं थी.
(२) देशको फेडरल युनीयनमें विभाजीत करो जिसमें होगा पाकिस्तान, हिन्दुस्तान. ये दो देश संरक्षण और विदेशी मामलेके सिवा हर क्षेत्रमें स्वतंत्र होंगे. फेडरल युनीयन का हेड कोई भी हो.
नहेरुको यह स्विकार्य नहीं था क्यों कि उनको जीन्नाको चपरासी के स्थान पर रखना भी स्विकार्य नहीं था.
सरदार पटेलको और महात्मा गांधी इसके पक्षमें नहीं थे क्यों कि यह बडा पेचिदा मामला था. बहुत सारे स्थानिक राजाएं अपनी स्वायत्तता एक अलग देश की तरह ही रखना चाहते थे. ऐसी परिस्थितिमें देशमें अनेक जटिल समस्याएं उत्पन्न हो सकती है जो सदीयों तक उलझ नहीं सकती थी.
(३) फेडरल युनीयन हो लेकिन उसका नंबर वन पोस्ट पर जीन्ना हो.
नहेरुको यह स्विकार्य नहीं था. वे इस हालतमें देशके टुकडे टुकडे करने को भी तैयार थे.
(४) एक दुसरेसे बिलकुल स्वतंत्र हो वैसे देशके दो टुकडे स्वतंत्र हो. हिन्दुस्तान और पाकिस्तान. जनता अपनी ईच्छाद्वारा पसंद करें कि अपने प्रदेशको कहां रखना है ! हिन्दुस्तानमें या पाकिस्तान में?

नहेरुको यह चौथा विकल्प पसंद था. नहेरुने अपनी व्युह रचना तैयार रक्खी थी.

चौथे विकल्पको स्विकारनेमें नहेरुको कोई आपत्ति नहीं थी. हिन्दुस्तानमें नंम्बर वन बनना नहेरुके लिये बायें हाथका खेल तो नहीं था लेकिन अशक्य भी नहीं था. उन्होंने कोंग्रेसमें अपना सोसीयालिस्टीक ग्रुप बना ही लिया था.

नहेरुने गांधी और सरदारको प्रच्छन्न रुपसे दो विकल्प दिया.

या तो मुझे नंबर वन पोस्ट दो. नहीं तो मैं कोंग्रेसको विभाजित करके बचे हुए देशमेंसे अपना हिस्सा ले लुंगा और उसके बाद बचे हुए हिस्सेमें भी आग लगाके जाउंगा कि दुसरे नेता जाति आदि लोग अपना हिस्सा भी मांगे.

पक्षके नेताके रुपमें नहेरुका समर्थन किसी भी प्रांतीय समितिने किया नहीं था तो भी नहेरु अपने आवेदन पर अडग रहे.

महात्मा गांधीको नहेरुकी व्युह रचना समझमें आगयी थी.
महात्मा गांधीने कोंग्रेसको विलय करके उसको लोकसेवा संघमें परिवर्तन करने का निश्चय कर लिया. उन्होने सरदार पटेलको विश्वासमें ले लिया कि वे जब तक स्थानिक समस्याएं हल न हो जाय तब तक वे कोंग्रेसको विभाजित होने नहीं देंगे.
गांधीजीको मालुम हो गया था कि खुदकी जान कभी भी जा सकती है.

इसलिये महात्मा गांधीने २७वीं जनवरी १९४८में ही आदेश दे दिया की कोंग्रेसको एक राजकीय पक्षके स्थान पर अपना अस्तित्व समाप्त करना है. उन्होने इस दरम्यान लोकसेवा संघका संविधान भी बना दिय था.

नरेन्द्र मोदीको चाणक्य बनना है या पृथ्वीराज

अगर नरेन्द्र मोदीको चाणक्य बनना है या पृथ्वीराज चौहाण, इस बातकी चर्चा करते समय हमें कोंग्रेस और नहेरु की बातें क्यों करें?
भारतमे हमने और हमारे नेताओंने अंतिम सौ सालमें जो क्षतिपूर्ण व्यवहार किया, या जो क्षतिपूर्ण व्यावहार हो गया या करवाया गया उनको हमें याद रखके आगे बढना है.

यदि हम याद नहीं रक्खेंगे तो वैसी या उससे भी अधिक गंभीर क्षतियोंका पुनरावर्तन होगा, और भावी जनता हमे क्षमा नहीं करेंगी.

अंग्रेजोंकी नीतियां और उनका पढाया हुआ क्षतियुक्त इतिहासः
अंग्रेज तो चले गये, किन्तु उनकी विचारधारा के आधारपर उन्होने जो तीकडं बाजी चलायी और हमारे बुद्धिजिवीयोंने जो स्विकार कर लिया, ऐसे तथ्योंको हमे उजागर करना पडेगा. इतिहासके पन्नोंसे उनको निकालना नही है लेकिन उसको एक मान्यताके आधार पर उसके कदके अनुसार काट देना है. हमारे भारतीय शास्त्रोंके आधार पर तर्कपूर्ण रीतिसे इतिहास पढाना है.
इसका एक मानसशास्त्रीय असर यह भी होगा कि भारतमें जो विभाजनवादी तत्व है वे विरोध करने के लिये गालीप्रदानके साथ आगे आजायेंगे. उनको पहेचानना है और उनको सियासती क्षेत्रसे निकालना है. वे तर्क हीन होनेके कारण ध्वस्त ही हो जायेंगें. भारतमें एक हकारात्मक युग का प्रारंभ होगा.
https://www.youtube.com/watch?v=x4Vh0cBVPdU ancient scientific knowledge of India: A lecture delivered by CSIR scientist in IIT Chennai
https://www.youtube.com/watch?v=6YG6pXE8aDs Ancient Indian Scientists were all Rishis with High Spiritual Powers (Technology of Spirituality)
मुहम्मद घोरी क्षमाके पात्र नहीं है, किन्तु मुहम्मद घोरी कौन कौन है? और जयचंद कौन है.
मुहम्मद घोरी है; नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेतागण, उनके साथीगण, कश्मिरके नेतागण और दंभी सेक्युलर समाचार माध्यम के पंडितगण.

यह है कभी न माफ करनेवाली सांस्कृतिक गेंग
इनलोगोमें सामान्य बात यह है कि वे बीजेपीकी एक भी क्षति कभी माफ नहीं करेंगे. उसके उपरांत ये लोग विवादास्पद तथ्यों पर और घटनाओं पर पूर्वग्रह रखकर उनको बीजेपीके और नरेन्द्र मोदीके विरुद्ध उजागर करेगे. इनके लिये समय कि कोई सीमा नहीम है.
(१) १९४२में कोई अन्य बाजपाई नामक व्यक्तिने क्षमा-पत्र देकर पेरोल पर उतर गया था तो इन नहेरुवीयन कोंग्रेसीयोंने २००३-४ के चूनाव अंतर्गत भी इस बातको अटल बिहारी बाजपाई के विरुद्ध उछाला था.
(२) कोई दो पुलीस अफसरोंके बीच, कोई पिताकी प्रार्थना पर उसकी पुत्रीके साथ कोई अनहोनी न हो जाय इसके लिये निगरानी रखनेकी बात हो रही थी और उसमें सफेद दाढीवाले और काली दाढीवाले नेताका संदर्भ बोला गया था तो नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेता मनमोहन और उसके मंत्रीमंडलने स्पेसीयल बैठक बुलाके एक जांच कमिटी बैठा दी थी.
(३) एक लडकी कोई आतंकी संगठन के युवकोंके साथ मिलकर अपने मातापिताको बीना बतायें गुजरातकी और निकल गयी थी और तत्कालिन केन्द्रीय खुफियातंत्रने ही माहिति दी थी कि वे नरेन्द्र मोदीको मारने के अनुसंधानमें आ रहे है तो गुजरातकी पुलीसने उनको सशस्त्र होनेके कारण खतम कर दिया तो इन्ही नहेरुवीयन कोंगी नेतागण और उनके साथीयोंने शोर मचा दिया था.
(४) ऐसे कई पुलिस अफसरोंके खिलाफ ही नहीं किन्तु गुजरातके गृहमंत्री तकको लपेटमें ले के उनको कारवासमें भेज दिया था. मतलब कि, फर्जी केस बनाकर भी इन लोगोंको बीजेपीको लपेटमें लेके अपना उल्लु सीधा करनेमें जरा भी शर्म नहीं आती है. ये लोग तो मुहम्मद घोरीसे भी कमीने है.
(५) नहेरुवीयन कोंग्रेसके नेताओंके इससे भी बढकर काले करतुतोंसे इतिहास भरा पडा है. इन्दिरा घांडीसे लेकर मनमोहन सोनीया तक. इसमें कोई कमी नहीं.
इन गद्दारोंको कैसे पीटा जाय?
(क्रमशः)
शिरीष मोहनलाल दवे
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હિન્દુઓ ૧૦ સંતાનો ઉત્પન્ન કરે: એક ચર્ચા

હિન્દુઓ ૧૦ સંતાનો ઉત્પન્ન કરે
જ્યારે ભારતની વાત કરીયે અને તેમાં પણ ભારતમાં હિન્દુ, મુસ્લિમ અને ખ્રિસ્તિ એ ત્રણ ધર્મને સાંકળતી અને વસ્તી વધારાના સંદર્ભમાં વાત કરીએ ત્યારે તેને એકાંગી રીતે ન વિચારી શકાય. આ બાબતને તેની સમગ્રતા જોવી જોઇએ.

હિન્દુધર્મના નેતાઓ

જો ભારતમાં મુસ્લિમ વસ્તીવધારાની વાત કરીએ અને મુસ્લિમ આક્રમણની વાત કરીએ તો આ મુસ્લિમ આક્રમણને પણ વસ્તીવધારાના સંદર્ભ પુરતું મર્યાદિત રાખવું જોઇએ. લવ જેહાદને વસ્તીવધારા સાથે સાંકળી ન શકાય. લવ જેહાદ અલગ વિષય છે.
જે હિન્દુ નેતાઓ મુસ્લિમ વસ્તીવધારા રુપી આક્રમણની વાત કરે છે અને તેઓને આપણે ખોટા પાડવા છે તો તેમની પ્રત્યે પૂર્વગ્રહ રાખીને અને પરોક્ષ રીતે નિમ્ન દર્શાવીને ચર્ચા ન ચલાવવી જોઇએ.
આપણે સહુ જાણીએ જ છીએ કે કે જેને આપણે પ્રણાલીગત રીતે હિન્દુ ધર્મ કહીએ છીએ તેને એવા કોઈ ધર્મગુરુ નથી કે તેઓશ્રી જે કંઈ કહે તે હિન્દુ ધર્મનું ફરમાન છે એવું સ્વિકારવામાં આવે. વળી આ નેતાઓને “હિન્દુઓના કહેવાતા નેતાઓ” એમ કહીને ઉલ્લેખવા તે પણ તેમની પ્રત્યેની અવમાનના જ સૂચવે છે. વિવેચકની એક પૂર્વગ્રહવાળું તારણ કાઢવાની મનોવૃત્તિ હોય તેવું પણ ફલિત થાય છે. વિવેચકની અવિશ્વસનીયતા પણ ઉભી થાય છે. આ હિન્દુ નેતાઓ તેઓ જે કંઈ છે અને જેવા છે તેવા રાખીને ઉપરોક્ત જેવું કશું કહ્યા વગર તેમના વક્તવ્યની ગુણદોષના આધાર ઉપર ચર્ચા કરીએ તો તે યોગ્ય ગણાશે.

ખ્રિસ્તીઓ અને મુસલમાનો

ખ્રિસ્તીઓએ અને મુસલમાનોના શાસકોએ મધ્યકાલિન અને તાજેતરના ભૂતકાળમાં શું કર્યું તે પેઢીઓને ભૂલી જઈએ તો તે સાવ અયોગ્ય નહીં ગણાય. છેલ્લા સો વર્ષની તવારિખ જ ને જ ધ્યાનમાં રાખીશું. અને શો બદલાવ આવ્યો છે અને તે બદલાવની ઝડપ શું છે. ભવિષ્યમાં આ બદલાવની ઝડપ શું અંદાજી શકાય તે વિષે વિચારવું પડશે.

ખ્રિસ્તીઓમાં ફક્ત ધર્મ ગુરુઓ જ પછાત રહ્યા છે કે જેઓ એમ માને છે કે વિશ્વને આખાને ખ્રિસ્તી કરી દેવું જોઇએ એ ઈશ્વરનો આદેશ છે. ખ્રિસ્તી ધર્મ એક સુગ્રથિત બંધારણવાળો ધર્મ છે અને પૉપ જે કહે તેને અંતિમ કહેવાય. વળી તેની પાસે મોટું ફંડ છે. સરકારોનું તેને પીઠબળ હોય છે. એટલે જે ખ્રિસ્તી સરકારો પોતાને ધર્મનિરપેક્ષ માને છે અને વિશ્વને મનાવે છે, પણ જ્યારે તેમને જરુર પડે તેમના ધર્મસંસ્થાઓ દ્વારા બીજા દેશોમાં થતી બળજબરી બાબતે આંખ મિંચામણા કરે છે. સમાચાર માધ્યમો આવી બાબતોને ચગાવવામાં માનતા નથી.

ખ્રિસ્તી અને મુસ્લિમ આતંકવાદ
ઇસ્લામ અને ખ્રિસ્તી ધર્મના સિદ્ધાંતો એક જ છે. મુસ્લિમોમાં એક વધારાનું તત્વ છે તે એ કે તેનો વિસ્તીર્ણ આતંકવાદ. આમ તો ખ્રિસ્તીઓનો પણ ખ્રિસ્તિ ધર્મગુરુઓના પ્રત્યક્ષ અને પરોક્ષ સહાકર દ્વારા પોષાતો આતંકવાદ છે પણ તે છૂટક છૂટક છે. ખ્રિસ્તીઓનો આ આતંકવાદ તમે ઉત્તર-પૂર્વી રાજ્યોમાં મોટા પાયે અને કેરાલા, તામિલનાડુ અને ઓરિસ્સામાં છૂટો છવાયો જોઈ શકો છે. પણ આની નોંધ લેવાતી નથી આના ઘણા કારણો છે. પણ તેની ચર્ચા નહીં કરીએ કારણ કે તેની ચર્ચા એક વિષયાંતર થઈ જશે.

મુસ્લિમો પુરતી ચર્ચા મર્યાદિત રાખીએ તો હિન્દુ નેતાઓની વાત સાવ નાખી દેવા જેવી નથી. હિન્દુઓ નેતાઓ જે વાત કરે છે તે કંઈ તેમનું આગવું સંશોધન નથી. ભારત સહિત આખા વિશ્વમાં મુસ્લિમ વસ્તી વધારા સામે એક સમસ્યા રુપી પ્રશ્નચિન્હ ઉત્પન્ન થયું છે. આપણા કેટલાક સુજ્ઞ લોકો કદાચ આનાથી માહિતગાર ન પણ હોય અને કદાચ હોય તો પણ તેમને કોઈપણ કારણસર તે વાતને લિપ્ત ન પણ કરવી હોય.

DO NOT DEMAND HUMAN RIGHTS

સાંપ્રત સામાજીક અને રાજકીય માનસિકતા

ભારતની સાંપ્રત સામાજીક અને રાજકીય માનસિકતાના સંદર્ભને અવગણીને આપણે જો કોઈ તારતમ્ય ઉપર આવીશું તો તે યોગ્ય ગણાશે નહીં. એટલું જ નહી પણ સાંપ્રત વિશ્વ આખાની સામાજીક અને રાજકીય માનસિકતાના સંદર્ભોને પણ લક્ષમાં લેવા પડશે. જાપાન, ચીન અને ઓસ્ટ્રેલીયા આ બાબતમાં શું વિચારે છે? અને શા માટે વિચારે છે? તેમના નાગરિક કાયદાઓ શું છે, અને આપણા કેવા છે તે બધું પણ લક્ષમાં લેવું પડશે. મુસ્લિમ દેશો કે જ્યાં મુસ્લિમો બહુમતિમાં છે ત્યાં વિધર્મ અને વિધર્મીઓની સ્થિતિ શું હતી અને શું છે? આ બધું એટલા માટે સંદર્ભમાં લેવું પડે કારણ કે પ્રસાર માધ્યમના કારણે વિશ્વ નાનું ને નાનું બનતું જાય છે. આવે સમયે આપણે છૂટક આંકડાઓ દ્વારા ભ્રમ ઉત્પન્ન કરીએ તે યોગ્ય નહીં ગણાય. જે પ્રત્યક્ષ છે તે સત્ય છે. કશ્મિરી હિન્દુઓ તંબુઓમાં છે તે સત્ય છે. ઉત્તર-પૂર્વ રાજ્યોમાં હિન્દુઓ નામશેષ છે તે સત્ય છે.
હિન્દુ નેતાઓ, સર્વમાન્ય હિન્દુ નેતા હોય કે ન હોય તે ચર્ચાનો વિષય નથી. વાસ્તવમાં તેઓ પણ ભારતના નાગરિક છે અને નાગરિક તરીકે તેઓ પોતે પોતાનો અભિપ્રાય વ્યક્ત કરવાનો અધિકાર ભોગવી શકે છે. આ સંદર્ભમાં તેમને મુલવવા જોઇએ.

આપણા હિન્દુ નેતાઓએ તો મુસ્લિમવસ્તી વિસ્ફોટને જીરવવા માટે એક રસ્તો પ્રસ્તુત કર્યો. પણ તેમનો હેતુ શું છે અને શા માટે આવો રસ્તો બતાવ્યો તે તેમણે છૂપાવ્યું નથી અને આપણે તેમની આ વાત છૂપાવવી ન જોઇએ. ચર્ચા કરવી હોય તો સમસ્યાને સમગ્રતામાં મુલવવી જોઇએ.

મુસ્લિમો તરફ થી આપણને શો ભય છે?
જ્યાં મુસ્લિમો તદન અલ્પમતમાં છે ત્યાં તેઓ તાબે થાય છે. જ્યાં તેઓ નગણ્ય નથી ત્યાં તેઓ વિશેષ અધિકારો માગ્યા કરે છે. જ્યાં તેઓ બહુમતિમાં છે ત્યાં તેઓ બળજબરી કરે છે અને પરધર્મીઓને કાં તો ધર્મ પરિવર્તન કરાવે છે અથવા તો તેમને નષ્ટ કરે છે. આના તાજા ઉદાહરણો મોટી માત્રામાં ઉપલબ્ધ છે. પાકિસ્તાન, બંગ્લાદેશ અને કશ્મિરમાં હિન્દુઓ કેટલા હતા? હવે કેટલા છે? જો આ સંદર્ભને તમે અવગણશો તો તમે માનવધર્મની જ અવગણના જ કરી ગણાશે.

ગરીબી અને નિરક્ષરતા બચાવ નથી
મુસ્લિમોની ધાર્મિક કટ્ટરતાવાળી માનસિકતા શું નિરક્ષરતા અને ગરીબી છે? જો આપણે એમ માનતા હોઇએ કે મુસ્લિમોની ધાર્મિક કટ્ટરતા અને વસ્તીવધારાનું મૂળ મુસ્લિમોની નિરક્ષરતા અને ગરીબી છે તો તે આપણી જાત સાથેની એક છેતરપીંડી ગણાશે. જો આમ હોત તો યુરોપના દેશો પોતાના દેશોમાં મુસ્લિમોના વસ્તીવિસ્ફોટને સમસ્યા ન માનતા હોત. અને સાઉદી અરેબિયામાં કે બીજા વિકસિત અને સુશિક્ષિત દેશોમાં ધર્મનિરપેક્ષતા પ્રસરી ગઈ હોત. પણ તેમ થયું નથી.

પ્રત્યાઘાતને સમજો
હિન્દુ નેતાઓએ ૧૦ બાળકો પેદા કરવાની જે વાત કરી તે વાતને પકડીને તે વાતને બીજા સંદર્ભોથી અલિપ્ત રાખીને ૧૦ બાળકોની વાતને જ આપણે નિશાન બનાવીએ તે બરાબર નથી. મુસ્લિમ વસ્તી બે રીતે વધે છે. એક છે મોટા પાયે થતી વિદેશી ઘુસણખોરી અને બીજી છે તેમનો સ્થાનિક વસ્તી વિસ્ફોટ. ત્રીજું પણ એક કારણ છે તે છે તેમનો અલગ નાગરિક કાયદો. આ નાગરિક કાયદા હેઠળ તમે તેમને લાભ આપી શકો પણ તેમને નાગરિક લાભોથી વંચિત ન કરી શકો. એટલે જો તેમની વસ્તી વધે તો દેખીતી રીતે જ ગરીબી પણ વધે અને ગરીબી વધે એટલે સરકાર મુસ્લિમોની અવગણના કરે છે તેમ પણ આંકડાઓ દ્વારા ફલિત થાય. તમારે તમારી મુસ્લિમ નાગરિક કૂટનીતિઓ દ્વારા ઉભી કરેલી ગરીબી રાહતો જાહેર કરવી પડે. આ રાહતોના નાણાં તમારે સામાન્ય નાગરિક નિધિ (પબ્લીકફંડ)માંથી ફાળવવા પડે. વિકાસના કામોમાં એટલો ઘાટો પહોંચે અને એટલે ગરીબી વધે. આમ એક વિષચક્ર ચાલ્યા કરે.

તો શું હિન્દુઓ ૧૦ બાળકો ઉત્પન્ન કરે તે યોગ્ય છે?
વાસ્તવમાં હિન્દુઓની આ એક પ્રતિક્રિયા છે.
પશ્ચિમ પાકિસ્તાને પૂર્વ પાકિસ્તાનને અન્યાય કર્યો એટલે બંગાળીભાષી મુસ્લિમોએ પ્રતિકાર કર્યો. તેના પ્રતિકાર રુપે પાકિસ્તાની સરકારે હિન્દુઓને અને અ-બંગાળી મુસ્લિમોને બંગાળમાંથી ખદેડ્યા. પાડાને વાંકે પખાલીને ડામ દેવાયો. પૂર્વ ભારતમાં અરાજકતા ફેલાઈ એટલે જનાક્રોષ થયો અને ભારત ઉપર યુદ્ધ લદાયું. આ યુદ્ધ ભારત જીત્યું એટલે કે પાકિસ્તાન ૧૯૭૧નું યુદ્ધ હાર્યું. ભારતીય લશ્કર ગમે તેવું મજબુત હોય. પણ ભારતીય અને ખાસ કરીને નહેરુવીયન કોંગ્રેસી નેતાઓ સ્વકેન્દ્રી હોય છે. તેઓ પાકિસ્તાન માટે સોફ્ટ ટાર્જેટ હોય છે. એટલે સિમલા કરાર દ્વારા ઈન્દીરા ગાંધીને મૂર્ખ બનાવી, ગુમાવેલું બધું પાછું મેળવી લીધું. પણ લશ્કરી હાર તો હાર હતી અને પાકિસ્તાની લશ્કર તે હાર જીરવી ન શક્યું. એટલે પાકિસ્તાની લશ્કરે તેની ગુપ્તચર સંસ્થા અને રશીયા-અમેરિકાના ઠંડાયુદ્ધની સમાપ્તિએ ફાજલ પડેલા આતંકી સંગઠનોની મીલી ભગતે પ્રત્યાઘાત તરીકે આતંકવાદ ચાલુ કર્યો. પહેલું ભક્ષ્ય કશ્મિરને બનાવ્યું. ત્યાં હિન્દુઓને ખુલ્લે આમ ધમકીઓ આપી ૩૦૦૦ હિન્દુઓને મોતને ઘાટ ઉતાર્યા. સાતલાખ હિન્દુઓને ભગાડ્યા. કશ્મિરની સરકારે અને ભારતની દંભી સેક્યુલર સરકારે પણ આંખ મીંચામણા કર્યા. હિન્દુઓ માટે આ અન્યાય થયો. એક મસ્જીદ તૂટી. એની સામે હજાર મંદીરો તૂટ્યા અને આતંકવાદીઓએ હજારોને મરણને શરણ કર્યા. એક રેલ્વે કોચને ઘેરીને સળગાવ્યો અને હિન્દુઓને જીવતા સળગાવ્યા. ગુજરાતમાં દંગાઓ થયા. મુસ્લિમો વધુ મર્યા. પછી તો મુસ્લિમોએ અનેક જગ્યાએ બોંબબ્લાસ્ટ કર્યા અને હ્જારો માણસ મર્યા.
મૂળ વાત જે હતી તે બંગ્લાભાષીઓને ૧૯૫૬થી કે તે પહેલાંથી થયેલા અન્યાયની હતી. તેમાં પાકિસ્તાનોના હિન્દુઓનો અને બીનબાંગ્લાભાષી મુસ્લિમોની ઉપરાંત પડોશી દેશ ભારતનો પણ ખૂડદો બોલી ગયો. આ વાત ભારતના દંભી ધર્મ નિરપેક્ષીઓને સમજવી નથી.

આ વાત ફક્ત પાકિસ્તાનના અને બંગ્લાદેશના મુસ્લિમોની માનસિકતાની જ નથી. સમગ્ર વિશ્વના મુસ્લિમોની માનસિકતા આવી છે અને આ માનસિકતાને સાક્ષરતા કે ગરીબી સાથે સ્નાનસૂતકનો પણ સંબંધ નથી.

હિન્દુઓએ ૧૦ બાળકો ઉત્પન કરવા એવી વાત શા માટે કરી?
ભારતની સરકારો દંભી ધર્મનિરપેક્ષતામાંથી બહાર આવી શકતી નથી. એટલે મુસ્લિમો અને ખ્રિસ્તી લોકો મનમાની કરે છે. તેઓ જે વિસ્તારોમાં પોતે બહુમતિમાં છે ત્યાં બળજબરી કરે છે, અને સમગ્ર ભારતમાં તેઓ લઘુમતિમાં છે તે ધોરણે તેઓ લઘુમતિના નામે અને ધાર્મિક સ્વતંત્રતાને નામે વિશેષાધિકારો ભોગવે છે.
હિન્દુઓ બહુમતિમાં છે. આ બહુમતિ તેમનો ગુનો બને છે. સરકાર જો ભેદભાવ વાળા વલણમાંથી બહાર ન નિકળી શકતી હોય તો હિન્દુઓએ શું કરે? આ સંદર્ભમાં હિન્દુઓએ પણ પોતાની બહુમતિ જાળવી રાખવા ૧૦ સંતાનો ઉભા કરવા જોઇએ એમ હિન્દુ નેતાઓએ કહ્યું.

મુસ્લિમ બનો અથવા ખતમ થાઓ
ટૂંકમાં એમ કહી શકાય કે હિન્દુઓ કુટૂંબ નિયોજન કરે આર્થિક રીતે સક્ષમ થાય પણ તે પછી મુસ્લિમો બહુમતિમાં આવે ત્યારે કાંતો તેઓ મુસ્લિમ થાય અથવા ખતમ થાય. કારણ કે કશ્મિરી હિન્દુઓ તો ભાગીને ભારતમાં આવી જાય. પણ ભારતના હિન્દુઓને ભાગી જવા માટે બીજો કોઈ દેશ નથી, એટલે તેમણે તો કાંતો મુસ્લિમ થવું પડે અથવા ખતમ થવું પડે.

હજી આગળ વિચારો.

જો હિન્દુઓ ખતમ થશે તો બે જ પ્રજા બચશે. એક ખ્રિસ્તી અને બીજી મુસ્લિમ.

ખ્રિસ્તીઓ અત્યાર સુધી ભલે અજેય રહ્યા હોય પણ મુસ્લિમો, ખ્રિસ્તીઓને ખતમ કરી દેશે. અપાર સંખ્યાના બળ આગળ શસ્ત્રોનું કશું ચાલ્યું નથી. અને મુસ્લિમો પણ કંઈ શસ્ત્ર વિહીન નથી. આખી પૃથ્વી મુસ્લિમ થશે પછી શું થશે. પછી મુસ્લિમો અંદર અંદર લડશે અને માનવ જાતનો નાશ થશે.
૧૦૦ અબજ વર્ષ પછીના બીજા બીગબેંગની રાહ જુઓ. તે દરમ્યાન મુસ્લિમોને અને ખ્રિસ્તીઓને સમજાઈ ગયું હશે કે જે અદૃષ્ટ સ્વર્ગની આશામાટે અને નર્કના ભયને કારણે, જે ખૂન ખરાબા કરેલ તે સ્વર્ગ અને નર્ક તો વાસ્તવમાં હતા જ નહીં. માટે હવે તો જો કોઈ ઇશ્વરના પુત્રના નામે કે પયગંબરના નામે આવે તો તેની ખેર નથી.

શું આ શક્ય છે?

હિન્દુ પુરાણો કહે છે કે એક બીગ બેંગ પછીના બીજા બેંગમાં ઐતિહાસિક સંસ્કૃતિમાં ૨૦% જેટલો બદલાવ આવે છે.

શિરીષ મોહનલાલ દવે
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