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Archive for April, 2019

कोंगीके सहयोगी कोलमीस्ट कहाँ अपना मूँह छिपाएंगे?

हम, हालकी कोंग्रेसके लिये,  कोंग्रेस शब्दका उपयोग करनेमें मानते नहीं है.

हम कोंगी [ कोंग्रेस (आई) अर्थात्‌  इन्दिराई कोंग्रेस अर्थात लगातार जूठ बोलनेवाली इन्दिराके संस्कारयुक्त कोंग्रेस, जिसको गलतीसे भी स्वातंत्र्यके लिये आंदलन करनेवाली कोंग्रेस कहा नहीं जा सकता वह कोंग्रेस ] ही कहेंगे.

विशेषतः एक कारण अन्य भी है कि, अभी भी कुछ मूर्धन्य लोग विद्यमान है जो इसी कोंग्रेस (आई) को सबसे पूरानी पार्टी मानते है और स्वातंत्र्यका आंदोलन चलाने वाली कोंग्रेस ही मानते है और उसको नष्ट होते देखना नहीं चाहते. वास्तवमें यह उनकी मीथ्या मान्यता है. पार्टी अपने सिद्धांतोसे और आचारोंसे बनती है. जब सिद्धांत और आचारमें ही १८० डीग्रीका परिवर्तन जाता है तो उसको वही पार्टी कैसे कहा जा सकता?

नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकारने अपना प्रगतिपत्रक तो दे ही दिया है. वैसे भी उसका प्रगति पत्रक ओनलाईन उपलब्ध है. जो भी पढना चाहे वह पढ सकता है. राहुल गांधी (जो वास्तवमें घांडी है. घांडी सरनेम आज भी भारतमें प्रचलित है) भी पढ सकता है. उसके उपर एक एक करके सारी उपलब्धियों पर चर्चा हो सकती है.

PM Modi

यदि राहुल घांडी इन उपलब्धियोंको पढना चाहे, तो वह उसके स्वाभावके अनुरुप है. लेकिन जो लोग खास करके स्वयंको मूर्धन्य मानते है, और समाचार पत्र चलाते है या तो उसके कोलमीस्ट (कटार लेखक) है उनका तो कर्तव्य बनता है कि वे नरेन्द्र मोदीके सरकारकी उपब्द्धियां पढे और यदि वे इनको नकारते है तो उसकी चर्चा करे और जनताके सामने तथ्य लानेका प्रयास करें. यही तो सुचारु पत्रकारित्व है.

हमारे डीबी (“दिव्य भास्कर गुजराती प्रकाशन”)भाई ने शेखर गुप्ता, अरुण शौरी, प्रीतीश नंदी, योगेन्द्र यादव (“आपपक्षवाला), वेद प्रताप ऐसे लेखकोंके लेख, जो अन्यत्र प्रकाशित हुए होते है उसका भाषांतर गुजराती प्रकाशनमें लाते है.

लेकिन डी.बी.भाई को यह भी तो दिखाना है कि वे तटस्थ है.

उपरोक्त लेखक गण तो नरेन्द्र मोदीके विरोधी है ही. लेकिन तटस्थ बिन्दुको यदि मध्यमें माना जाय तो कुछ लेखक गण जो, तटस्थ बिन्दुसे कोंगीसे बिलकुल नज़दिक नहीं लेकिन दूर भी नहीं है.  वे वर्नाक्युलर भी हो सकते है.

नरेन्द्र मोदी कैसा है?

नरेन्द्र मोदी खूब परिश्रम करता है, कठोर निर्णय लेके वह अपनी क्षमता दिखाता है, सरकारी संस्थाओंकी कार्यवाहीमें हस्तक्षेप नहीं करता है, अति नीतिमान है, अपने संबंधीयोंको पदोंकी खेरात या तो अन्य तरिकोंसे उनको मालदार नहीं बनाता है, १८ घंटे काम करता है, विदेशोंमें भारतका मान बढाता है, जिन्होंने दशकोंसे देशके अर्थतंत्रके साथ ठगाई की थी और कोंगीस्थापित व्यवस्था अंतर्गत वे देश छोडके भाग गये थे, नरेन्द्र मोदी उनको देशमें ला रहा है, इन तथ्योंके कारण, नरेन्द्र मोदी, विदेश स्थित भारतीयोंमें भी अति लोक प्रिय है, देशमे अंतीम ७० सालमें जो तेज़ीसे विकास नहीं हुआ था वह विकास अब तेज़ीसे होते दिख रहा है, तो भी कई मीडीया मूर्धन्य लोग इस नरेन्द्र मोदीके विरुद्ध क्यूँ  है?

नरेन्द्र मोदीके विरुद्ध होनेके कारण निम्न लिखित हो सकते है.

() नरेन्द्र मोदी वर्नाक्युलर (स्थानिक गुजराती भाषा) माध्यममें पढा है. नरेन्द्र मोदी स्नातक अवश्य है और उनके विषय भी इतिहास और राज्यशास्त्र (पोलिटीक्स) है, लेकिन उन्होंने, ये सब गुजराती माध्यम में ही पढा है. कुछ विद्वान लोगोंको बीनअंग्रेजी माध्यमसे पढे लोगोंके बारेमें पूर्वग्रह होता है.

गुजरातीयोंको अंग्रेजी नहीं आती है ऐसा माहोल १९५७से बनाया गया है. क्यों कि गुजरात विश्वविद्यालयमें १९५७से महाविद्यालयों में प्रथम दो वर्ष गुजराती माध्यमसे पढाया जाना प्रारंभ हुआ था. वैसे तो गुजरातमें बरोडा और विद्यानगर ऐसी दो और भी युनीवर्सीटीयां है, लेकिन तो भी, गुजराती मतलब, गुजराती माध्यम, ऐसी मान्यता दृढ करवा दी गई. ऐसी मान्यता अन्य राज्योंके लिये अनुकुल भी थी. हम इसकी चर्चा नहीं करेंगे लेकिन कमसे कम पश्चिम भारतमें महानुभावोंकी मान्यता थी कि नरेन्द्र मोदीबीलोएवरेजहै.

() नरेन्द्र मोदी, गुजरातका एक अविकसित विस्तारका, एक पछात जातिका, व्यक्ति है. और वह तो ब्राह्मण है, तो बनिया है, तो क्षत्रीय है. नरेन्द्र मोदी पीछडी जातिका है. (याद रहें कि, उसने आरक्षणका लाभ कहीं भी नहीं लिया है). नरेन्द्र मोदीने, चाहे कैसे भी, मुख्य मंत्री पद प्राप्त कर लिया होगा, लेकिन प्रधान मंत्रीके पदके लिये वह योग्य और काबिल नहीं है. प्रधान मंत्रीके पदके लिये तोएरीस्टोक्रेट कक्षाका ही व्यक्ति चाहिये.

याद करो, जो भी बडे बडे नेता थे वे सब या तो बेरीस्टर थे. एफ.आर. (फोरीन रीटर्न्ड) थे और पाश्चात्य रहन सहनसे गुजरे हुए थे. गांधीजी और आंबेडकर, वैसे तो, हमें देशी/दलित लगते है लेकिन वे बेरीस्टर थे और पर्याप्त समय विदेशमें रहे थे. और कई लोग विदेशीयोंसे प्रमाणित थे या तो अंग्रेजी भाषाके भी पंडित थे.

() नरेन्द्र मोदी आर.एस.एस. का सदस्य था. आर.एस.एस.का सदस्य होना एक अपराध है ऐसी मान्यता देशके उच्च पंडित समुदायमें व्यापक है. क्यों कि सामान्यतः आर.एस.एस. वाले, महात्मा गाँधीके विरोधी होते है. ऐसी हवा नहेरुके शासनने प्रसारित की हुई है. आर.एस.एस. वाले हिन्दुत्व वाले होते है और वे मुस्लिमोंके दुश्मन होते है. ऐसी भी हवा उसी शासनकी देन है.

() गुजराती माध्यमसे पढा, कभी बहुश्रुत नहीं हो सकता है. इसलिये नरेन्द्र मोदी भी बहुश्रुत नहीं है.

और भी कई कारण होगे, लेकिन नरेन्द्र मोदीको निम्नकक्षाका माननेमें इन कारणोंका आधार है.

हमारे एक वर्नाक्युलर लेखक कैसे अपना लेख लिखते है;

यह है कान्तिभाई भट्ट. वैसे तो कान्तिभाई अच्छे लेखक है जब तक वे मोदी और बीजेपी के विषयमें नहीं लिखते तब तक वे विश्वसनीय लगते है.

कान्तिभाई लिखते है;

राजकारण (सियासत) का व्यक्ति खुल्ला दिलवाला होना चाहिये, नेक दिल वाला होना चाहिये.”

उपरोक्त कथन किसके लिये लिखा गया है, मालुम है?

प्रायंका वाईदरा (उर्फ प्रियंका गांधी) के लिये.

हमारे कान्तिभाई प्रियंका पर औरोंकी तरह ही आफ्रिन है.

वह आगे लिखते है; “कोंग्रेसमें एक नयी शक्ति पैदा हो रही है. अब मोदीको नये तिकडम शोधना पडेगा

कहेनेका तात्पर्य यह है कि नरेन्द्र मोदी तिकडम चलाता है. मतलब की नरेन्द्र मोदीने ठोस काम किया ही नहीं है. नरेन्द्र मोदी जो कुछ भी बोलता है वह सब फरेब है.

कान्तिभाई, आगे चलकर लिखते है कि जनताको कम होंशियार, लेकिन प्रबळ और निर्दोष हृदयवाला राजकर्ता चाहिये.

यानी कि, कान्तिभाईने मान ही लिया है कि भूमि कौभाण्डवाले रोबर्ट वाईदरा (वाड्रा)की पत्नी, प्रियंकामें वाईदरामें ये गुण है. और प्रियंका अब उभर रही है.

क्यों? क्यों कि;

उसका हृदय स्त्री हृदय है, इस लिये वह सक्षम है. चाहे कोंगी भक्त, कान्तिभाई इन्दिरा गांधी, जिस इन्दिरा गांधीने, जयप्रकाश नारायणको कारवासमें डालके मरणासन्न कर दिया हो, और लोग प्रियंकामें इन्दिराई चहेरा आत्मसात करके उसकी क्वालीटी देखते हो, लेकिन उन्ही की विचार राह पर चलनेवाले कान्तिभाईने अपने आपको तर्कसे संतुष्ट कर दिया है कि, प्रियंका योग्य है.

वह आगे लिखते हैविधाताने आदेश दिया है किगांधीअटकको सार्थक करो.” “अरुण जेटलीकी कीडनी खराब हो गयी वह इस आदेशका संकेत है.

क्या बात है कान्तिभाई !! गधेको भी बुखार जाय. ऐसी बात है आपकी.

एक गलत मान्यता बनाओ फिर वह गलत मान्यताको ही आधार बनाओ और एक और गलत निष्कर्ष निकालो. आम जनताको भ्रमित करनेका यह एक तरिका है.

कान्तिभाई भट्ट कहेते है कि;”नरेन्द्र मोदीकी सर्वोपरितासे बीजेपीका खून दुषित हुआ है. बीजेपीकी सिर्फ किडनी ही शुद्ध करना पर्याप्त नहीं है, उसका समग्र स्वास्थ्य सुधारना है. अब तक कोंग्रेसके कुकर्मोंकी फलश्रुति आपने देखी अब जनताको उनके कुकर्मोंका शुभ परिणाम देखनेका आवसर आया है.”

अरे कान्तिभाई, नहेरु भी तो सर्वोपरी थे और वे तो १७ साल प्रधान मंत्री रहे थे. जबजीपस्केन्डलमें उन्होनें तो विपक्षको कहा था कि मैं इसके लिये जाँच बैठाने वाला नहीं हूँ. आप चूनावमें इसको मुद्दा बनावो और चाहे वह कर लो

नहेरुने तो स्वतंत्र्यके बाद कई हिमालयन ब्लन्डर्स की. आपने तो कहीं भी लिखा नहीं कि कोंगी दुषित हो गयी? नरेन्द्र मोदीने तो ऐसा कुछ भी किया नहीं है.

हाँ. नरेन्द्र मोदी लोकप्रिय अवश्य है. और आम जनता उसका भारी आदर करती है. यह क्या नरेन्द्र मोदीका गुनाह है? वह लोक प्रिय है, लेकिन वह सबको साथ ले के चलता है. वह कहेता भी है किसबका साथ सबका विकास”. श्रेष्ठ उदाहरण उसकाजीएसटीहै

वास्तवमें देखा जाय तो कान्तिभाईके सब कथन अर्थहीन ही नहीं तर्कहीन ही नहीं, किन्तु साथ साथ वाणीविलास भी है. संदेश तो यही निकलता है.

कटारीया भाई, प्रियंका गांधीके उपर आफ्रिन

प्रियंका गांधीकी योग्यता कैसे सिद्ध करें? यह समस्या कान्तिभाई के लिये है ऐसा लगता है. तो कान्तिभाईने सोचा कि चलो कुछ ऐसे गुण प्रियंकामें स्थापित करें.

कान्तिभाई प्रियंका गांधीकी योग्यताकी बात करें, उसके पूर्व, हम प्रधान मंत्री में कैसे गुण होने चाहिये और कैसे नहीं होने चाहिये उसका अव्यवस्थित विवरण दे देंगे.

कान्तिभाईकी मानसिकताकी बात करें उसके पहेले १९६५में मीडीया कर्मी मूर्धन्य लोग कैसा लिखते थे उसका एक सिंहावलोकन कर लें.

प्रधान मंत्री कैसा होना चाहिये?

क्या प्रधान मंत्री ज्ञानी होना चाहिये? “नहीं तोज्ञान तो हमेशा अपर्याप्त ही होता है. क्यों कि ज्ञानके विषय तो अगणित है. उसमें कोई भी व्यक्ति, सभी विषयोंमें विशारद हो ही नहीं सकता. प्रधान मंत्री विभिन्न, क्षेत्रोंके ज्ञाताओंको सलाहकार रख सकता है. स्वयंको विशारद बनने की आवश्यकता नहीं

क्या प्रधान मंत्री डीग्रीधारी होना चहिये? “नहीं तोरावण तो रामसे भी अधिक पढा लिखा था ही … “

क्या प्रधान मंत्री अनुभवी होना चाहिये? “नहीं तोअनुभव होने से क्या होता है. वह अनुभवी लोगोंकी सलाह भी ले सकता है …”

क्या प्रधान मंत्री वयस्क होना चाहिये? “नहिं तोअरे तुम देखोविदेशमें बडी बडी संस्थाओंमे युवान लोग होते है…”

क्या प्रधान मंत्री वरिष्ठता क्रममें आगे होना चाहिये? “नहीं तोऐसी वरिष्ठता देखते रहोगे तो सियासतमें एक स्थगितता जायेगीहमें आगे बढना है या नहीं …?

 इसमें, नहेरु वंशके समर्पित होने की दुर्गंध नहीं आती है क्या?

कान्तिभाई आगे चल कर कहेते है कि देशको भलाभोला राजकर्ता चाहिये.

भोली भाली प्रधान मंत्री

वाह क्या अदा है !!

क्यों भाई? भला भोला क्यूँ?

कान्तिभाई उसका विवरण नहीं देंगे. जब तर्क हीन तारतम्य निकालने हो तो विवरण देना आवश्यक नहीं है.

व्यक्ति कहीं कहीं तो अज्ञानी होता है. अज्ञानी औरभला भोलामें कोई अधिक फर्क नहीं है.

नहेरुने चीनके साथ भला बनके अच्छी मैत्री निभाई. सुरक्षा समितिमें जगह दिलाई. और चीन ने भोले नहेरुको अपनी दुश्मनी दिखाई. भोले नहेरुने कहा, हमें दुश्मनने दगा दिया. अरे भाई दुश्मन दगा नहीं देगा तो कौन देगा?

भारतीय सेनाने १९७१ के युद्ध अंतर्गत अभूतपूर्व विजय दिलाई.

इन्दिराने भोले बनके सिमला करार के अंतर्गत सेनाकी जीती हुई भूमि वापस कर दी और कई सारे भलाभोलापन दिखाके भारतीय सेनाकी जीतको घोर पराजयमें परिवर्तित कर दी. आज भी हम उसके फल भूगत रहे है. कान्तिभाईको देखते हुए भी यह सब दिखाई नहीं देता. और वे भलाभोला की इमोशन बाते करकें मोदी ही नहीं चाणक्यकी उपलब्धियों को मीथ्या बना देते है. इसको हम क्या समज़ेंगे?

कान्तिभाईका मीथ्यासियासती काव्य”, या भारत देशकीविडंबना”?

नरेन्द्र मोदी जो परिवर्तन कर रहे है, उनमें इस कटारीयाभाई(कोलमीस्ट) को परिवर्तन दिखाई देता नहीं  है. भूमिगत विकास, सबको घर, नैपुण्यताकी शिक्षा, स्त्रीयोंको शिक्षा और बहुमान, पर्यावरण सुरक्षा, सफाई, हर घर संडास, उत्पादनमें वृद्धि, आर्थिक अपराधीयों पर कार्यवाही, भ्रष्टाचार मुक्त समाज करने के लिये प्रणालीयोंमें सुधार, और पारदर्शिताके लिये सभी सेवाएं ऑनलाईन पर उपलब्ध करानाये सब कान्तिभाईको परिवर्तन नहीं लेकिन गढ्ढेका पानी दिखाई देता है.

कटारीयाभाईको, जो कोंगी [इन्दिरा नहेरु (पारिवारिक)  कोंग्रेस (आई.एन.सी.)] जिसके लिये खुलेमें शौच, गंदकी, भ्रष्ट प्रणालीयां, भ्रष्टाचार, स्त्रीपर अत्याचारआदि कोई समस्या है वैसा उनके दिमागमें भी नहीं था.  वैसी पार्टीका परिवर्तनके नाम पर गुणगान सूनाते है.

कटारीयाभाईको लगता है कि, जो नेक दिल वाला मोदी कर रहा है वह स्थगितता है और जो ५५ सालमें इन्दिरा नहेरु कोंग्रेसने किया वह परिवर्तन था?

लेखके अंतमें लेखक स्वयं निश्चित कर पा नहीं रहे है क्या लिखा जाय.

मोदीने जो कालेधनके जत्थेका अनुमान लगाके कहा था कि काला धन इतना है कि यदि उसको बांटा जाय तो हरेककी जेबमें १५ लाख आवें. लेकिन कुछ मूर्धन्य लोग इसको मोदीका १५ लाख देनेका वचन माना और, ऐसा अर्थघटन करते रहे है मोदीने १५ लाख देनेका वादा किया है. लेकिन यही लोग राहुल के आलुमेंसे सोना बनानेकी मशीनकी बात पर चूप है.

प्रीतीश नंदी चौकीदारकी परिभाषा करते है. शब्दार्थ पर जाते है. उसका विवरण करते है. फालतु बातें करते है. जो बातें विवादास्पद है, उनको सत्य मानके तारतम्य निकालते है. उनको एक मोदी विरुद्ध माहोल बनाना है. प्रीतीश नांदी बोलते हैमोदी एक पंथहै. और उसने साल बिगाड दिया.

बिगाड दिया मतलब क्या?

इस बातकी तार्किकता पर वे मौन है. क्यों कि ऐसे कोलमीस्ट, तर्कमें नहीं मानते है. उनको तो सिर्फ अपन जो मानते है उसको ही प्रगट करना है और उनके दिमागमें जो आया वह स्वयंसिद्ध है.

वे आगे लिखते हैं सब निर्णय मोदी ही करते थे. वृद्धोंको एक बाजु पर कर दिया. शाहको आगे किया. मोदीने विरोधीयोंको देशद्रोही कहेना चालु कर दिया.

देश द्रोही कौन है?

मोदीने तो कभी कुछ कहा नहीं. हाँ अवश्य ही, सोस्यल मीडीयामें मोदी समर्थकोंने कुछ लोगोंको देशद्रोही कहेना शुरु किया ही है.

अभी आप देखो. जे.एन.यु.में राष्ट्रविरोधी नारे लगे थे. वे नारे क्या थे?

भारत तेरे टूकडे होगे, कश्मिरको चाहिये आज़ादी, नोर्थ इस्टको चाहिये आज़ादी,

लडके लेंगे आज़ादी, तल्वारसे लेंगे आज़ादी,

अफज़ल हम शर्मींदा है कि तेरे कातिल जिन्दा है,

कितने अफज़ल मारो गे, हर घरसे अफज़ल निकलेगा

इस प्रकारके नारोंका विरोध होना ही थाऔर विरोध हुआ ही

तो फिर क्या हुआ?

JNU Row: Students Protest Against The Arrest Of JNU Students : News Photo

इन्दिरा नहेरु कोंग्रेसके राहुल, केज्रीवालअदि कई सारे नेताएं, मीडीया कर्मी, सेंकडो लोग जे.एन.यु. पहूंच गये और उन तथा कथित विद्यार्थीयोंको कहेने लगे कि हे युवागण तुम आगे बढोहम तुम्हारे साथ है. यही लोग तो आतंकवादीयोंके मानव अधिकार और सुरक्षाकी बात पर शासनको लताड रहे है. इन्ही लोगोंके कारण नारे बाजी और अलगतावाद अन्य जगह भी होने लगा.

Protest in Kolkata, India : News Photo

जिन्होंने ऐसे नारोंका विरोध किया और उनके समकक्ष या उससे बदतर विधानोंका विरोध किया, उन सबको इन नेताओंने और मीडीया कर्मीयोंने एकलेबललगा दिया. और वह लेबल थाअतिराष्ट्रवाद”.

मतलब कि देशविरोधी नारे लगाना, नारे लगानेवालोंका वाणीस्वातंत्र्य का हक बनता है. लेकिन इन नारोंका विरोध करनेवालोंका कोई वाणी स्वातंत्र्यका हक नहीं है.

ऐसी अवस्थामें आप देशद्रोहीयों की परिभाषा क्या करोगे?

शेखर गुप्ता और प्रीतीश नंदीका एजन्डा एक ही लगता है. शे.गु. समज़ते है कि मोदी समज़ता है कि सीमा पारका जो है वह दुश्मन है. ये बात शे.गु.ने बिना अभ्यास किये मान ही ली. वास्तवमें पाकिस्तानके सिवा मोदीने किसीको दुश्मन नहीं माना. “पाकिस्तानसे मतलब है पाकिस्तानी सेना, आतंकवादी, आई.एस.आई. और इनसे मजबुर पाकिस्तानकी सरकार, और इनका गठबंधन. पाकिस्तानकी जनताको दुश्मन  नहीं माना. लेकिन यदि गठबंधन दुराचारी है तो पाकिस्तानकी जनताको सहन करना ही पडता है.

इन्दिरानहेरुकोंग्रेस (आई.एन.सी.) जो स्वयं भ्रष्ट है और भ्रष्टताके कारण न्यायालयने प्रारंभिक जाँचके अनुसार उनको गुनाहगार होनेके सबूत पाये और न्यायालयके आदेशसे जमानत पर है (जो महात्मा गांधीके सिद्धांतोसे विपरित है. महात्मा गांधीने कभी भी जमानत पर जानेका आवेदन नहीं दिया), गफलाबाज है, नोटबंदीके कारण उनका कैश मनी पस्ती हो गया इससे पीडित है, वे लोग चौकीदार चोर है ऐसे नारे लगाते है.

ये कोंगी लोग कौन है जो कहेते है

हम दिलायेंगे न्याय

हम दिलायेंगे अधिकार  

यदि मूर्धन्य लोग देशको इन कोंगी ठगोंसे और उनके सांस्कृतिक साथीयोंसे बचा सकें तो आम जनताको ही आगे आना पडेगा.

इन्दिरानहेरुकोंग्रेसने सर्वप्रथम देशकी आम जनताको किस सीमा तक स्वकेन्द्री बना दिया है उसका पता २२ मई २०१९को पड ही जायेगा.

शिरीष मोहन लाल दवे

https://www.treenetram.wordpress.com

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कोंगी का नया दाव -३

“हमने कभी हमसे विरुद्ध अभिप्राय रखनेवालोंको देश द्रोही नहीं समज़े” अडवाणी उवाच.

अडवाणीके इस कथनको एन्टी-मोदी-गेंग उछालेगी.

“हमसे विरुद्ध अभिप्राय” इस कथनका कोई मूल्य नहीं है, जब तक आप इस कथनके संदर्भको गुप्त रखें. सिर्फ इस कथन पर चर्चा चलाना एक बेवकुफी है, जब आप इसका संदर्भ नहीं देतें.

Tometo and couliflower

मुज़े टमाटर पसंद है और आपको फुलगोभी. मेरे अभिप्रायसे टमाटर खाना अच्छा है. आपके अभिप्रायसे फुलगोभी अच्छी है. इसका समाधान हो सकता है. आरोग्यशास्त्रीको और कृषिवैज्ञानिकको बुलाओ और सुनिश्चित करो कि एक सुनिश्चित विस्तारकी भूमिमें सुनिश्चित धनसे और सुनिश्चित पानीकी उपलब्धतामें जो उत्पादन हुआ उसका आरोग्यको कितना लाभ-हानि है. यदि वैज्ञानिक ढंगसे देखा जाय तो इसका आकलन हो सकता है. मान लो कि फुलगोभीने मैदान मार लिया.

कोई कहेगा, आपने तो वैज्ञानिक ढंगसे तुलना की. लेकिन आपने दो परिबलों पर ध्यान नहीं दिया. एक परिबल है टमाटरसे मिलनेवाला आनंद और दुसरा परिबल है आरोग्यप्रदतामें जो कमी रही उसकी आपूर्ति करनेकी मेरी क्षमता. यदि मैं आपूर्ति करनेमें सक्षम हूँ तो?

अब आप यह सोचिये कि टमाटर पर पसंदगीका अभिप्राय रखने वाला कहे कि फुलगोभी वाला देशद्रोही है. तो आपको क्या कहेना है?

वास्तवमें अभिप्रायका संबंध तर्क से है. और दो विभिन्न अभिप्राय वालोंमे एक सत्यसे नजदिक होता है और दुसरा दूर. जो  दूर है वह भी शायद तीसरे अभिप्राय वाली व्यक्तिकी सापेक्षतासे सत्यसे समीप है.

तो समस्या क्या है?

उपरोक्त उदाहरणमें, मान लो कि, प्रथम व्यक्ति सत्यसे समीप है, दूसरा व्यक्ति सत्यसे प्रथम व्यक्तिकी सापेक्षतासे थोडा दूर है. लेकिन दुसरा व्यक्ति कहेता है कि यह जो दूरी है उसकी आपूर्तिके लिये मैं सक्षम हूँ. अब यदि तुलना करें तो तो दूसरा  व्यक्ति भी सत्यसे उतना ही समीप हो गया. और उसके पास रहा “आनंद” भी.

य.टमाटर+क्ष१.खर्च+य१.आरोग्य+झ.आनंद+आपूर्तिकी क्षमता = र.फुलगोभी+क्ष१.खर्च+य२.आरोग्य+झ.आनंद जहाँ  आनंद समान है बनाता है जब य१.आरोग्य +आपूर्तिकी क्षमता=  य२.आरोग्य होता है.

जब आपूर्तिकी क्षमता होती है तो दोनों सत्य है. या तो कहो कि दोनों श्रेय है.

लेकिन विद्वान लोग गफला कहाँ करते है?

आपूर्तिकी क्षमताको और आनंदकी अवगणनाको समज़नेमें गफला करते है.

कई कोंगी-गेंगोंके प्रेमीयोंने जे.एन.यु. के नारोंसे देशको क्या हानि होती है (हानि = ऋणात्मक आनंद) उसकी अवगणना की है. और उस क्षतिकी आपूर्तिकी क्षमताकी अवगणना की है. क्यों कि उनकी समज़से यह कोई अवयव है ही नहीं. उनकी प्रज्ञाकी सीमासे बाहर है.

जब दो भीन्न अभिप्रायोंका संदर्भ दिया तो पता चल गया कि इसको देश द्रोहसे कोई संबंध नहीं. और ऐसे कथनको यदि कोई अपने मनमाने और अकथित संदर्भमें ले ले तो यह सिर्फ सियासती कथन बन जाता है.

जे.एन.यु. के कुछ “तथा कथित विद्यार्थीयों”के नारोंसे देशका हित होता है क्या?

“मुज़से अलग मान्यता रखनेवालोंको मैंने देश द्रोही नही समज़ा” अडवाणीका यह कथन अन्योक्ति है, या अनावश्यक है या मीथ्या है.

कुछ लोग जे.एन.यु. कल्चरकी दुहाई क्यों देते हैं?

राहुल घांडी और केजरीवाल खुद उनके पास गये थे और उन्होंने जे.एन.यु.की टूकडे टूकडे गेंगको सहयोग देके बोला था कि, आप आगे बढो, हम आप लोगोंके साथ है. विद्वानोंने इस गेंगके  नारोंको बिना दुहराये इसके उपर तात्विक चर्चा की कि नारोंसे देशके टूकडे नहीं होते. नारे लगाना अभिव्यक्तिके स्वातंत्र्यके अंतर्गत आता है.

यदि अभिव्यक्तिकी स्वतंत्रताकी ही बात करें तो,  तो बीजेपी या अन्य लोग भी अपनी अभिव्यक्तिकी स्वतंत्रताके कारण इसकी टीका कर सकते हैं. यदि आप समज़ते है कि ऐसे प्रतिभाव देने वाले असहिष्णु है तो,  संविधानके अनुसार आप दोनों एक दुसरेके उपर कार्यवाही करनेके लिये मूक्त है.

क्या टूकडे टूकडे गेंग वालोंने और उनके समर्थकोंने इस असहिष्णुता पर केस दर्ज़ किया?  नारोंके विरोधीयोंके विरुद्ध नारे लगानेवालों  पर भी आप केस दर्ज करो न.

जिनको उपरोक्त  गेंगके नारे, देशद्रोही लगे वे तो न्यायालयमें गये. गेंगवाले भी अपनेसे विरुद्ध अभिप्राय रखनेवालोंके विरुद्ध न्यायालयमें जा सकते है. न्यायालयने तो, देशविरोधी नारे लगानेवाली गेंगके नेताओं पर प्रारंभिक फटकार लगाई.

जब देशके टूकडे टूकडे करनेके नारे वालोंको विपक्षोंका और समाचार माध्यमोंका खूलकर समर्थन मिला तो ऐसे नारे वाली घटनाएं अनेक जगह बनीं.

फिर भी एक चर्चा चल पडी कि अपने अभिप्रायसे भीन्न अधिकार रखनेवालोंको देश द्रोही समज़ना चाहिये या नहीं. बस हमारे आडवाणीने और मोदी विरोधियोंने यही शब्द पकड लिये. जनताको परोक्ष तरिकेसे गलत संदेश मिला.   

सेनाने सर्जीकल स्ट्राईक किया, सेनाने एर स्ट्राईक किया और उन्होंने ही उसकी घोषणा की. पाकिस्तानने तो अपनी आदतके अनुसार नकार दिया. कुछ विदेशी अखबारोंने अपने व्यापारिक हितोंकी रक्षाके लिये इनको अपने तरिकोंसे नकारा. लेकिन हमारी कोंगी-गेंगोंने भी नकारा.

यह क्या देशके हितमें है?

क्या इससे जो अबुध जनताके मानसको यानी कि देशको, जो नुकशान होता है उसकी आपूर्ति हो सकती है?

इसके पहेले विमुद्रीकरण वाले कदमके विरुद्ध भी यही लोग लगातार टीका करते रहे. “ फर्जी करन्सी नोटें राष्ट्रीयकृत बेंकोंके ए.टी.एम.मेंसे निकले, इस हद तक फर्जी करन्सी नोटोंकी व्यापकता हो” ऐसी स्थितिमें फर्जी करन्सी नोटोंको रोकनेका एक ही तरिका था और वह तरिका, विमुद्रीकरण ही था. और इसके पूर्व मोदीने पर्याप्त कदम भी उठाये थे. विमुद्रीकरण पर गरीबोंके नाम पर काले धनवालोंने अभूत पूर्व शोर मचाया था. लेकिन कोई माईका लाल, ऐसा मूर्धन्य, महानुभाव, प्रकान्ड अर्थशास्त्री निकला नहीं जो विकल्प बता सकें. विमुद्रीकरणकी टीका करनेवाले  सबके सब बडे नामके अंतर्गत छोटे व्यक्ति निकले.

 “चौकीदार चोर है” राहुल के सामने बीजेपीका “मैं भी चौकीदार हूँ”

यह भी समाचार पत्रोमें चला. मूर्धन्य कटारिया (कोलमीस्ट्स) लोग “चौकीदार” शब्दार्थकी, व्युत्पत्तिकी, समानार्थी शब्दोंकी, उन शब्दोंके अर्थकी,   चर्चा करनेमें अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन करने लगे. प्रीतीश नंदी उसमें एक है. यह एक मीथ्या चर्चा है हम उसका विवरण नहीं करेंगे.

राहुलका अमेठीसे केरलके वायनाड जाना.

समाचार माध्यम इस मुद्देको भी उछाल रहे है. इसकी तुलना कोंगी-गेंगोंके सहायक लोग, २०१४में मोदीने दो बेठकोंके उपर चूनाव लडा था, उसके साथ कर रहे है.

वास्तवमें इसमें तो राहुल घांडी, अपने कोमवादी मानसको ही प्रदर्शित कर रहे है. जिस बैठक पर राहुल और उसके पूर्वज लगातार चूनाव लडते आये हैं और जितते आये हैं, उस बैठक पर भरोसा न होना या न रखना, और चूंकि, वायनाडमें  मुस्लिम और ख्रीस्ती समुदाय बहुमतमें है और चूं कि आपने (कोंगी वंशवादी फरजंदोंने) उनको आपका मतबेंक बनाया है, इसलिये आप (राहुल घांडी)ने वायनाड चूना, उसका मतलब क्या हो सकता है? कोंगी लोगोंको और उनको अनुमोदन करनेवालोंको या तो उनकी अघटित तुलना करनेवालोंको कमसे कम सत्यका आदर करना चाहिये. कोमवादीयोंको सहयोग देना नहीं चाहिये.

सत्य और श्रेय का आदर ही जनतंत्रकी परिभाषा है.

मोदीकी कार्यशैली पारदर्शी है. मोदीने अपने पदका गैरकानूनी लाभ नहीं लिया, मोदीने अपने संबंधीयोंको भी लाभ लेने नहीं दिया है, मोदीका मंत्री मंडल साफ सुथरा है, मोदीने संपत्तिसे जूडे नियमोंमें पर्याप्त सुधार किया है, मोदीने अक्षम लोगोंकी पर्याप्त सहायता की है, मोदीने अक्षम लोगोंको सक्षम बनानेके लिये पर्याप्त कदम उठाये है, मोदीने विकासके लिये अधिकतर काम किया है.

इसके कारण मोदीके सामने कोई टीक सकता, और कोई उसके काबिल नहीं है, तो भी कुछ मूर्धन्य लोग मोदी/बीजेपीके विरुद्ध क्यों पडे है?

मोदीने पत्रकारोंकी सुविधाएं खतम कर दी. कुछ मूर्धन्योंको महत्व देना बंद कर दिया. इससे इन मूर्धन्य कोलमीस्टोंके अहंकार को आघात हुआ है. सत्य यही है. जो सुविधाओंके गुलाम है, उनका असली चहेरा सामने आ गया. ये लोग स्वकेन्द्री थे और अपने व्यवसायको “देशके हितमें कामकरनेवाला दिखाते थे” ये लोग एक मुखौटा पहनके घुमते थे. यह बात अब सामने आ गयी. लेकिन  इन महानुभावोंको इस बातका पता नहीं है !

ये लोग समज़ते है कि वे शब्दोंकी जालमें किसीभी घटनाको और किसी भी मुद्देको, अपने शब्द-वाक्य-चातुर्यसे मोदीके विरुद्ध प्रस्तूत कर सकते है.

समाचार पत्रोंके मालिकोंका “चातूर्य” देखो. चातूर्य शब्द वैसे तो हास्यास्पद है, लेकिन कुछ उदाहरण देख लो.

अमित शाहने गांधीनगरसे चूनावमें प्रत्याषीके रुपमें आवेदन दिया.

इसके उपर दो पन्नेका मसाला दिया. निशान दो व्यक्ति है. एक है अडवाणी. दुसरे है राजनाथ सिंघ. अभी इसके उपर टीप्पणीयोंकी वर्षा  हो रही है. और अधिक होती रहेगी.

अडवाणीको बिना पूछे उनकी संसदीय क्षेत्रके उपर अमित शाहको टीकट दी. “यह अडवाणीका अपमान हुआ.”

हमारे राहुलबाबाने बोला कि “मोदीने जूते मारके अडवाणीको नीचे उतारा. क्या यह हिन्दु धर्म है?”-राहुल.

तो हमारे “डी.बी. (दिव्य भास्कर गुजराती प्रकाशन)भाईने सबसे विशाल अक्षरोमें प्रथम पृष्ठ पर, यह कथन छापा. और फिर स्वयं (डी.बी.भाई) तो तटस्थ है, वह दिखानेके लिये, छोटे अक्षरोंमें  लिखा कि “मोदीको मर्यादा सिखानेके चक्करमें खुद मर्यादा भूले”.

डी.बी. भाईको “मोदीने अडवाणीको जूते मारके नीची उतारा … क्या यह हिन्दु धर्म है? “ कथन अधिक प्रभावशाली बनानेका था. इस लिये इस कथनको अतिविशाल अक्षरोंमें छापा. राहुल तो केवल मर्यादा भूले. राहुलका “अपनी मर्यादा भूलना” महत्वका नहीं है. “जूता मारना” वास्तविक नहीं है. लेकिन राहुलने कहा है, और वैसे भी “जूता मारना” एक रोमांचक प्रक्रिया है न. इस कल्पनाका सहारा वाचकगण लें, तो ठीक रहेगा. यदि डी.बी.भाईने इससे उल्टा किया होता तो?

डी.बी. भाई यदि सबसे विशाल अक्षरोंमें छापते कि “मोदीको मर्यादा की दूहाई देनेवाले राहुल खुद मर्यादा भूले” और जो शाब्दिक असत्य है उसको छापते तो …? तो पूरा प्रकाशन राहुलके विरुद्ध जाता. जो राहुल के विरुद्ध है उसका विवरण अधिक देना पडता. मजेकी बात यही है कि डी.बी.भाई ने राहुलकी मर्यादा लुप्तताका कोई विवरण नहीं दिया. राहुलका “अडवाणीका टीकट और हिन्दु धर्मको जोडना” उसकी मानसिकता प्रकट करता है कि वह हर बातमें धर्मको लाना चाहता है. डी.बी. भाईने इस बातका भी विवरण नहीं किया.   

अडवाणीको टीकट न देना कोई मुद्दा ही नहीं है. जो व्यक्ति ९२ वर्ष होते हुए भी अपनी अनिच्छा प्रकट करने के बदले  मौन धारण करता है. फिर पक्षका एक वरिष्ठ होद्देदार उसके पास जा कर उसकी अनुमति लेता है कि उनको टीकट नहीं चाहिये. फिर भी, बातका बतंगड बनानेकी क्या आवश्यकता?

यही पत्राकार, मूर्धन्य, कोलमीस्ट लोग जब १९६८में इन्दिरा गांधीने कहा “मेरे पिताजीको तो बहूत कुछ करना था लेकिन ये बुढ्ढे लोग मेरे पिताजीको करने नहीं देते थे”. तब इन्ही लोंगोंने उछल उछल कर इन्दिराका समर्थन किया था. किसी भी माईके लालने इन्दिराको एक प्रश्न तक नहीं किया कि, “कौनसे काम आपके पिताजी करना चाहते थे जो इन बुढ्ढे लोगोंने नहीं करने दिया”.

यशवंत राव चवाणने खुल कर कहा था कि हम युवानोंके लिये सबकुछ करेंगे लेकिन बुढोंके लिये कुछ नहीं करेंगे. और इन्ही लोगोंने तालिया बजायी थीं. आज यही लोग बुढ्ढे हो गये या चल बसे, और भी “गरीबी रही”.

जिन समाचार पत्रोंको बातका बतंगड बनाना है और उसमें भी बीजेपीके विरुद्ध तो खासम खास ही, उनको कौन रोक सकता है?

पत्रकारित्व पहेलेसे ही अपना एजन्डा रखते आया है. ये लोग महात्मा गांधीकी बाते करेंगे लेकिन महात्मा गांधीका “सीधा समाचार”देनेके व्यवहारसे दूर ही रहेंगे. महात्मा गांधीकी ऐसी तैसी.

देश दो हिस्सेमें विभाजित हो गया है;

एक तरफ है विकास. जिसका रीपोर्ट कार्ड “ओन-लाईन” पर भी उपलब्ध है,

सबका साथ सबका विकास,

सुशासन, सुविधा और पारदर्शिता,

दुसरी तरफ है

वंशवादी, स्वकेन्द्री, भ्रष्टताके आरोपवाले नेतागण जिनके उपर न्यायालयमें केस चल रहे हैं और वे जमानत पर है, जूठ बोलनेवाले, “वदतः व्याघात्” वाले (अपनके खुदके कथनो पर विरोधाभाषी हो), जातिवाद, कोमवाद, क्षेत्रवाद आदि देशको विभाजित करने वाले पक्ष और उनके समर्थक, “जैसे थे परिस्थिति” को चाहने वाले. ये लोग देशके नुकशानकी आपूर्ति करनेमें बिलकुल असमर्थ है. इनका नारा है “मोदी हटाओ” और देशको सुरक्षा देनेवाले कानूनोंको हटाओ.

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इसमें क्या निहित है इसकी चर्चा कोई समाचार पत्र या टीवी चेनल नहीं करेगा क्यों कि वैसे भी यही लोग स्वस्थ चर्चामें मानते ही नहीं है.

 

स्वयं लूटो और अपनवालोंको भी लूटने  दो. जन तंत्रकी ऐसी तैसी… समाचार माध्यम भी यह सिद्ध करनेमें व्यस्त है कि बीजेपी को स्पष्ट बहुमत मिलनेवाला नहीं है और एक मजबुर सरकार बनने वाली है. यदि वह कोंगी-गेंगवाली सरकार बनती है, तो वेल एन्ड गुड. और यदि वह बीजेपीकी गठजोड वाली सरकार हो तो हमें तो उनकी बुराई करनेका मौका ही मौका है.

शिरीष मोहनलाल दवे

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कोंगी गेंग की एक और चाल

गरीबोंकों एक और खेरात

कोंगी के अध्यक्षने मध्यप्रदेशके चूनाव के समय किये गये ॠणमाफीके शस्त्रकी सफलताको देख कर, उसके ही एक और बडे स्वरुपके शस्त्रका आविष्कार किया और उसको नाम दिया है, “न्यूनतम आय योजना”. इसके उपर पूरे कोंगीलोग अति उत्तेजित और आनंदित है. लेकिन कुछ समय पश्चात्‌, उनको पता चला कि कुछ गडबड हुई है. उन्होंने अपने घोषणापत्रमें उसके विवरणमें शब्दोंकी चालाकीसे उस शस्त्रको पतला और असंपृक्त (डाईल्युट) किया. असंपृक्त इसलिये किया कि कुछ विद्वान लोग, उसका मजाक न बना दे.

७२००० हजार हरेक गरीबके खातेमें डाल देनेका है.

लेकिन गरीबको पहेचानना एक मुश्किल समस्या है. खास करके, कोंगी गेंगके लिये, यह अत्यंत दुष्कर है. कोंगी शासनमें “महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार योजना” में और गेस सीलीन्डर सहायक योजनामें, राशन कार्ड पर सस्ता अनाज देनेकी योजनाओंमें और ऐसे कई कार्योंमें जब, नरेन्द्र मोदीने, आधारकार्ड को जोडा, तब कोंगीके शासनका, अरबों खरबों रुपयोंका भ्रष्टाचार सामने आया. इस कारणसे कोंगी गरीबोंकी सही पहेचान कर सके, वह असंभव है.

ऐसी खेराती योजनाओंका एक प्रभावक अवयव यह भी है, कि जो गरीब है, वह तो इन पैसोंका व्यवहार नकदसे ही करेगा. और यदि चार लाख करोडका नकद अर्थतंत्रमें आ जाय, तो वह अर्थतंत्रका क्या हाल कर कर सकता है!! इसके अतिरिक्त  वस्तुओंके मूल्यों  पर इसका क्या प्रभाव पडेगा वह भी एक संशोधनका विषय ही  नहीं, परंतु चिंताका विषय भी बन सकता है.  भारतमें तो जनतंत्र है. कोंगी स्थापित शासन व्यवस्थामें और वह भी अर्थतंत्रकी प्रणालीगत व्यवहारमें  बाबुमोशायोंका करिश्मा तो सर्व विदित है. बहेतीगंगामें कोंगीके खूदके सर्वोच्च महानुभाव कितने लिप्त है वह हमने ही नहीं किन्तु समग्र देशने देख लिया है.

याद करो १४ वरिष्ठ बेंकोका राष्ट्रीयकरणः

इन्दिरा गांधीने १४ वरिष्ठ बेंकोका राष्ट्रीयकरण १९६८में किया था. युवा पीढीको मालुम नहीं होगा, और जो उस समय युवान थे वे अब इतने वृद्ध हो गये है कि उनकी स्मृति कमजोर पड गई है. वे समज़ते है कि इन्दिरा गांधीने कोंग्रेसको तोडनेके पश्चात्‌ यह काम किया था. जैसे कि वे समज़ते है कि इन्दिरा गांधीने १९७७में आपातकाल हटाके चूनाव घोषित किया था. वास्तवमें इन्दिरा गांधीने आपातकालके चलते ही चूनाव किया था. जब उसका कोंगी पक्ष हार गया तो उसने आपातकाल को हटा लिया. क्यों कि उसको डर था कि आपातकालके सहारे नयी सरकार उसको गिरफ्तार कर लेगी.

इन्दिरा गांधीने बेंकोके राष्ट्रीयकरणका हेतु, यह बताया था कि, गरीबको व्यवसायके लिये छोटा ऋण दिया जा सकें. वैसे तो रीज़र्व बेंक ऐसा आदेश दे सकती थीं कि, हर बेंकको सुनिश्चित ऋण,  गरीबोंको देना ही पडेगा. लेकिन इन्दिराको इसका सियासती लाभ लेना था, और सरकारके पैसे से चूनाव जितना था.

“इन्दिरा जिसका नाम … वह सीधा काम भी टेढे प्रकारोंसे करती है” जयप्रकाश नारायण

ऋणके लिये सिफारिस चाहिये. और सिफारसी एजन्टके लिये तो कोंगी नेतासे अधिक श्रेय कौन हो सकता है!!

बस ऐसे ही ऋण दिया गया मानो उस ऋणको वापस  ही नहीं करना है. बेंकोंके राष्ट्रीयकरणका एक दुष्परिणाम यह भी था कि बेंकोके मेनेजमेन्ट पर युनीयनबाजी हामी हो गयी. बेंकोंके बाबुलोग बे-लगाम हो गये थे. फर्जी डीमान्डड्राफका व्यवहार ऐसा हो गया था कि हररोज एक करोडके फर्जी डीमान्डड्राफ्ट बनते थे और पैसा उठा लिया जाता था.

कोंगीका शासन हो और गफला न हो, यह बात ही असंभव है.

गफले न हो सके ऐसे नियम बनानेमें इन्दिरा मानती ही नहीं थी. सियासती नीतिमत्ताको धराशायी करनेमें इन्दिरा गांधीको कोई पराजित नहीं कर सकता. नहेरु भी दंभी और असत्यभाषी थे, लेकिन उन्होंने स्वातंत्र्य संग्राममें जनतंत्रकी दुहाईके हीरे खाये थे. इसलिये वे चाहते हुए भी सरमुखत्यारीके कोयले नहीं खा सकते थे.

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लेकिन इन्दिराका स्वातंत्र्यके संग्राममें कोई योगदान ही नहीं था. गुजरातीमें एक कहावत है कि नंगा नहायेगा क्या और नीचोडेगा क्या? इन्दिरा खूले आम आपखुद बनती थीं.

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राहुल घांडी क्या इन्दिरा फिरोज़ घांडीको हरा सकते है?

राहुल सचमुच इन्दिराको जूठ बोलनेमें हरा सकते है. सभी क्षेत्रोंमे हरा सकते है. ईश्वरकी कृपा है कि राहुल प्रधान मंत्री बन नहीं सकते. क्यों कि, उनका इटलीकी नागरिकता पर धारणाधिकार (लीन = lien) है. विदेशकी नागरिकता पर, ऐसा धारणाधिकार रखने वाला व्यक्ति, मंत्री पदके लिये योग्य नहीं है. भारतीय संविधानमें ऐसा प्रावधान है.

आप देख सकते है कि अब तक कोई समचार माध्यमने इसके उपर चर्चा नहीं की है. इसका कारण क्या है?

गुजरातीमें एक मूँहावर है कि “जिसको कोई न पहूँचे उसको पेट पहूँचे. “डीनर डीप्लोमसी”, “मैंने आपका नमक खाया है”, “मैंने आपकी मदीरा पी है”. ये सब समानार्थी है और समान असरकारक है.

२००१के पूर्व गुजरातमें केशुभाई पटेलका शासन था.

उस शासनमें और उसके पूर्वके शासनमें यह प्रणाली थी कि हररोज एक वातानुकुलित बस केवल और केवल पत्रकारोंके लिये अहमदाबादसे गांधी नगर प्रतिदिन जाती थी. और देर सामको उनको वापस लाती थी. सरकार द्वारा पत्रकारोंकी महेमान नवाज़ी ऐसी होती थी सौराष्ट्रवासी भी उससे सिख ले सकें. सौराष्ट्रके लोग महेमान नवाज़ीमें अतुल्य है.

पत्रकारों सब मौज करो

सरकार द्वारा,  ब्रेकफास्ट, लंच, डीनर मे स्वादिष्ट व्यंजन, चिकन-बिर्यानी और व्हीस्कीकी बोलबाला रहेती थी. लेकिन जब ऐसी परिस्थिति स्थायी बन जाती है तो फिर पत्रकारोंको सरकारकी दो आँखोंकी शर्म नडती नहीं है.

२००१के भूकंपकमें जब केशुभाई पटेलकी सरकार विफल रही तो पत्रकार लोग उनके पीछे पड गये.

नरेन्द्र मोदी आये.

उन्होंने असरकारक कदम उठाये. कुछ अधिकारीयोंको सस्पेन्ड किया. इसके अंतर्गत साबरमती एक्सप्रेसके रेल्वे कोच एस-६ को जलाके ५९ हिन्दुओंकी हत्या की. इसके कारण प्रत्याघात हुआ और कोमी दंगे हुए. अधिकतर समाचार माध्यमोंने इसको मोदीके विरुद्ध की घटना के रुपमें प्रस्तूत किया. इसकी एक यह वजह भी थी कि, मोदीने, सरकार द्वारा होती रही, पत्रकारोंकी वाहन और भोजन-नास्तेकी सुविधा बंद कर दी थी. अब सभी समाचार केशुभाईकी प्रशस्ति करने लगे और केशुभाईको मोदीके विरुद्ध उकसाने लगे. और केशुभाई पटेल समाचार माध्यमोंकी जालमें फंस भी गये. ऐसा होते हुए भी नरेन्द्र मोदी की बीजेपी २००२का चूनाव जीत गयी. लेकिन समाचार माध्यमोंने इस अप्राकृतिक युद्धको २०१२ के चूनाव तक पूरजोशमें चालु रक्खा.

इसी प्रकार समाचार माध्यमोंने अडवाणीको भी २०१४में उकसाया था. अडवाणी भी इन दंभी धर्मनिरपेक्षोंकी जालमें फंसनेको तयार थे. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री एक सौम्य और शांत व्यक्ति होना चाहिये. मध्य प्रदेशके शिवराज सिंह चौहाण एक सौम्य और शांत प्रकृतिवाले व्यक्ति है. अडवाणीका ईशारा स्पष्ट था कि उसको नरेन्द्र मोदी पसंद नहीं थे. लेकिन शिवराज सिंह चौहाण इस विभाजनवादी जालमें फंसे नहीं.

अडवाणीको २००४ और २००९ में दो दफा चान्स दिया गया था. वे विफल रहे. देशकी आम जनता भी चाहती थी कि नरेन्द्र मोदी ही प्रधान मंत्री बने. अडवाणीके इस प्रकारके परोक्ष विरोध का असर नहीं हुआ. उन्होंने बीजेपीके कॉटमें और अपनी गरीमाके विरुद्ध के कोटमें सेल्फ गोल कर दिया. समाचार माध्यम वाले तथा कथित मूर्धन्य लोग नरेन्द्र मोदीके विरुद्ध पडनेके लिये असभ्य तरिकोंका भी उपयोग करना न भूले.

आज अडवाणीके कथन पर मीडीया वाले, कैसा भ्रामक और मीथ्या अर्थघटन कर रहे है वह जरा देखें.

“हमने कभी हमसे विरुद्ध अभिप्राय रखनेवालोंको देश द्रोही नहीं समज़े” अडवाणी उवाच.

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

 

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