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Archive for November, 2013

नरेन्द्र मोदी जब प्रधान मंत्री बन जाय, तब भारतीय जनता उनसे क्या अपेक्षा रखती है? – 3

सूचना आयोग सुधारः (रेफोर्मस इन पब्लिक इन्फोर्मशन)

हालमें सूचना आयोगके चार स्तर है.

() मुख्य सूचना आयुक्त () सूचना आयुक्त () सूचना अधिकारी ()सहायक सूचना अधिकारी,

केन्द्र सरकार संचालित या उसकी अनुसूचित संस्थाएं और राज्य सरकार संचालित या उसकी अनुसूचित संस्थाएं जिनको सरकारसे लोक कोषमेंसे वेतन, दान, अनुदान मिलता हो या सरकारी कर, उपकर, शुल्क में मुक्ति, शिथिलीकरण, राहत, मिलती हो ऐसी संस्थाएं आती है. इन संस्थाओंका मुख्य अधिकारी सूचना अधिकारी होता है. और उसी संस्थाका एक नियुक्त अधिकारी सहायक सूचना अधिकारी होता है.

सहायक सूचना अधिकारी

सहायक सूचना अधिकारी, जनतासे सूचना अनुरोध प्राप्त करता है.

यह अधिकारी, अपनी संस्थाके समुचित अधिकारीसे एक मासकी अवधि अंतर्गत सूचना उपलब्ध करके अनुरोधकको देता है. सूचनाके नीचे वह अपेलेट प्राधिकारी का नाम और पता और अपीलकी समयावधि अनुसूचित करता है.

यदि सूचना अनुरोधकको इसमें कोई क्षति है ऐसा लगता है तो वह अपेलेट प्राधिकारी को अपील कर सकता है. इस प्रकार (), () और (), क्रमानुसार अपेलेट प्राधिकारी है.

प्राधिकारी () और (), संस्थाके खुदके अधिकारी होते है. और संस्था को ही वे जिम्मेवार होते है. उनका वेतन भी संस्था ही करती है. और ये अधिकारी संस्थाके हितमें (संस्थाके अधिकारीयोंकी क्षतियोंको छिपाने का) काम करते दिखाई देते हैं.

जनताका सूचना अनुरोधकके बारेमें अनुभव कैसा है?

सूचना आयुक्त अपनेको हमेशा, और सूचना अधिकारी अपनेको कभी कभी, जैसे वे खुद न्यायालय चला रहे हो.

सूचना अधिकारी और सूचना आयुक्त सुनवाई प्रक्रिया चलाते हैं. सूचना अनुरोध पत्र सरल होता है. और उसका उत्तर भी सरल होना चाहिये. किन्तु सूचना प्रदान करने वाली संस्था और समुचित अधिकारी हमेशा सूचना छिपानेकी कोशिस करता है. असंबद्ध सूचना देता है या तो टीक शके ऐसे आधरपर अनुरोधित सूचना नकार देता है या अनुरोधित सूचना सतर्कता अधिकारीके अन्वेषण के अंतर्गत है, ऐसा उत्तर दे के उसको टाल देता है. अगर आप सूचना अनुरोधक है और अगर आप मिली हुई सूचनासे  संतुष्ट नहीं है और अगर आपको सूचना आयुक्त के स्तर पर जाना पडा तो आपको एक साल लग सकता है.

सूचना अधिकारीयोंके पास स्वतंत्र कर्मचारी गण या कार्यालय नहीं है

सिर्फ सूचना आयुक्त और मुख्य सूचना आयुक्त के पास ही अपना कर्मचारीगण और कार्यालय होता है. बाकी के सब सूचना अधिकारी, उनका कर्मचारी गण और कार्यालय अपने अपने अंतर्गत संस्थाओंका खुदका होता है.

जहां कहां भी अगर कोई अनियमितता, नियमका उल्लंघन, अनादर, कपट आदिका आचरण हुआ है ऐसी आपको शंका है और अगर आपने सूचना अधिकारके अधिनियम के अंतर्गत अनुरोध पत्र दिया तो समझ लो कि आपको सूचना आयुक्त तक जाना ही पडेगा. अगर आप पूर्ण समय के लिये इस कामके लिये प्रबद्ध है तभी आप अंत तक मुकद्दमाबजी करनी पडेगी.

सूचना आयोगका पूनर्गठन क्यों?

हालमें सहायक सूचना अधिकारी और सूचना अधिकारी, संस्थासे संलग्न होते है. वे संस्थाको समर्पित होते है और उसके उपर संस्थाके उच्च अधिकारी के लिखित अलिखित आदेशोंका पालन करना पडता है.

कामकी निविदा (टेन्डर नोटीस), निविदा दस्तावेज (टेन्डर डोक्युमेन्ट), मूल्यांकन (इवेल्युएशन), संविदा (कोन्ट्राक्ट), में कहीं कहीं क्षति रक्खी जाती है ता कि, निवेदक के साथ सौदाबाजी कि जा सके, या ईप्सित निवेदकको  अनुमोदन और स्विकृति दे सकें. याद करो युनीयन कार्बाईड के साथ कि गई संविदा. संविदा ही दूर्घटना के कारण पीडित लोंगोंको हुई हानि का प्रतिकर संपूर्ण क्षतियुक्त था. ऐसा संविदा दस्तावेज बनानेमें गैर कानुनी पैसे की हेराफेरी नकारी नहीं जा सकती. यह तो एक बडी घटना थी. लेकिन ऐसे कई काम होते है जिनमें संस्थाका उच्च अधिकारी अंतिम निर्णय लेता है. इसमें भी गैर कानुनी तरिकेसे पैसे की हेराफेरी होती है. और इस कारण जब सूचना अधिनियम के अंतर्गत आवेदन आता है तो संस्थागत अधिकारी हमेशा सच्चाईको छिपानेकी कोशिस करता है.

ऐसी ही परिस्थिति जनपरिवाद (पब्लीक कंप्लेइन्ट) पर कार्यवाही करनेमें होती है.

परिवाद (कंप्लेईन्ट) पत्रपर कार्यवाही करने वाला संस्थागत अधिकारी ही होता है. और वह अपने क्षतिकरने अधिकारी/कर्मचारीकी प्रतिरक्षा (डीफेन्ड) करनेका प्रयत्न करता है और समुचित कार्यवाही करता नहीं है. एक परिवाद आयोग की रचना आवश्यक है. यह परिवार आयोग संस्थाके सतर्कता अधिकारीसे उत्तर मांगेगा. और जिस प्रकार जन सूचना अभियोगके अंतरर्गत कार्यवाही होती है, वैसी ही कार्यवाही परिवादकके प्रार्थना पत्र पर होगी. जनपरिवादका काम लोकपाल / लोकायुक्त के कार्यक्षेत्रमें आता है.

परिवाद और सूचनाका संमिलन (मर्जर) क्यों

वास्तवमें देखा जाय तो हर एक माहिति/सूचना के अनुरोध आवेदन पत्र की पार्श्व भूमिमें एक प्रच्छन्न परिवाद होता है. लोकपाल और सूचना आयुक्त के अधिकारी, कर्मचारी (अधिकारी) को दंडित कर सकते है

इस प्रकार सूचना आयोगका नाम जन सूचना और जन परिवाद आयोग रहेगा या लोकपाल/लोकाअयुक्त रहेगा. इस आयोगका कुछभी नाम देदो. आवश्यकता के अनुसार अधिकारी संयूक्त कोई स्तर पर संमिलित या भिन्न भिन्न रहेंगें. हम अब इसको सूचना लोक योग कहेंगे.       

जन सूचना और जन परिवाद आयोग (सूचना परिवाद लोकायुक्त अयोग) एक संपूर्ण स्वतंत्र आयोग होना चाहिये.

सूचना लोकायुक्त अयोग अधिकारीसे लेकर मुख्य आयुक्त तक सभी अधिकारी गण, उनके कर्मचारी गण और उनके कार्यालय स्वतंत्र और अलग होना चाहिये.

सूचना लोकायुक्त अधिकार के अंतर्गत सभी अधिकारी गण और कर्मचारी गण को निरपेक्ष और अर्थपूर्ण बनानेके लिये प्रशिक्षण देना चाहिये.

सूचना अधिकारीका कार्यक्षेत्र और लोक आयोग का कार्यक्षेत्र हालमें विभाजित है. सूचना अधिकारीको संस्थासे अलग करके सूचना अधिकारका वह लोक आयोगका कार्य क्षेत्र भौगोलिक क्षेत्रके आधारपर विभाजित होना चाहिये.

कोई भी संस्था जो सूचना अधिकार अधिनियम जो केन्द्र और राज्य सरकारके अंतर्गत क्षेत्रमें आती हैं, उसको अपना वेब साईट रखना पडेगा. उसमें सरकार द्वारा अपेक्षित विवरण रखना बाध्य रहेगा.  

सूचना अनुरोध और परिवाद आवेदन पत्र ग्रहण केन्द्रः

ग्राम सूचना अनुरोध परिवाद पत्र ग्रहण केन्द्रः (ग्राम पंचायतकी सीमा अंतर्गत स्थित केन्द्र) सहायक जन अधिकारीः

यह अधिकारी अपने भौगोलिक सीमाके अंतर्गत आनेवाले निवासीका (और अन्य क्षेत्रके निवासीका भी) सूचनाअनुरोध पत्र और परिवाद पत्र लेगा.

सरकारकी पारदर्शिकाके बारेमें जनताको उत्साहित करना आवश्यक है. इस प्रकारसे जनकोष (पब्लिक एकाऊन्ट)से प्रत्यक्ष या परोक्ष रीतिसे लाभान्वित संस्थाओं पर और सरकारी शासन पर सुचारु और व्यापक अनुश्रवण (मोनीटरींग) होना आवश्यक है.

जिस प्रकारसे मोबाईल के सीमकार्ड का वितरण के लिये ग्रहण केन्द्र निजी अभिकर्ताओंको (प्राईवेट एजन्सीयोंको) रखा जाता है उसी प्रकार सूचना अनुरोध पत्र और परिवाद पत्र ग्रहण के लिये भी निजी अभिकर्ताओंको अनज्ञप्ति (लाईसेन्स) देना चाहिये.

अनुरोध व आवेदन पत्र

सूचना अनुरोध पत्र और परिवाद पत्र विहित प्ररुप (प्रीस्क्राईब्ड फोर्मेट) में होंगे. यह विहित प्ररुप पत्र रू. /- की शुल्क पर इसी कार्यालय से मिलेगा. अगर चाहे तो सूचना अनुरोधक या परिवादक उसी विहित प्ररुपोंमें कद वाले पत्रमें लिखके या मुद्रित करके दे सकता है. सूचना अनुरोधकको अपने अभिज्ञान पत्र (आडेन्टीटी कार्ड) की अधिकृत प्रतिलिपि (सर्टीफाईड कोपी) और उसका क्रम और स्थायी (जहांका वह मतदाता है) पता देना पडेगा. यदि वह अपना अनुरोध पत्र गुप्त रखना चाहता है तो उसको यह शर्त लिखनी पडेगी.

सूचना अनुरोध पत्र और परिवाद पत्र दोनोंका का विहित प्ररुप दो पृष्ठमें होगा. प्रथम पृष्ठ पर सूचना अनुरोधकका, समुचित संस्था का, और सहायक सूचना अधिकारी का विवरण होगा. द्वितीय पृष्ठपर अनुरोधित सूचनाका या परिवादका(कंप्लेईन्टका) विवरण होगा. दोनों पृष्ठपर हस्ताक्षर होगे. दूसरा पृष्ठ ही समुचित संस्थाको भेजा जायेगा.

प्रत्येक पत्र पर एक अनन्य क्रम संख्या लिखी जायेगी, जो दोनों पृष्ठोंको इस क्रम संख्यासे संमिलित होगी.   

सहायक अधिकारी इस पत्रको स्कॅन करके उसकी सोफ्ट प्रतिलिपि बनायेगा. और समुचित संस्थाके उच्च या अनुसूचित अधिकारी को प्रेषण पत्रके साथ ईमेल कर देगा. इसकी एक प्रतिलिपि आवेदकको मुद्रित करके और यदि उसका ईमेल पता है तो एक प्रतिलिपि उसको ईमेल करेगा.

आवेदक अपने पत्रके साथ  रू.१००/- फी, चेकसे या नकद से जमा करेगा. चेक से अगर फीस जमा कि है तो फीस जमा होने पर सहायक अधिकारी दूसरे ही कामके दिन पर उस आवेदन पत्र पर कार्यवाही करेगा.

पुरे भारतमें लोक सूचना आयुक्त के बेंक खाता इस प्रकार रहेंगे.

केन्द्र सरकार आयोग खाता

(राज्य का नाम) सरकार आयोग खाता.

यह राज्य और केन्द्रके आयोगोंकी बेंक खाता की सूचि हरेक अधिकारी के कार्यालयमें प्रमुख स्थान पर स्थायी प्रकारसे प्रदर्शित होगी.

सहायक अधिकारी, आवेदन पत्र को समुचित संस्थाके शिर्ष अधिकारीको या सूचित अधिकारीको भेज देगा. आवेदन पत्र का रेकोर्ड रखेगा.

सूचना खर्च

संस्थासे सूचना प्रदान खर्चका मूल्य के विषय पर उत्तर मिलने पर, सहायक सूचना अधिकारी, सूचना अनुरोधकको १५ दिन के अंतर्गत खर्च रकम सूचना आयुक्त के खाता क्रम संख्यामें जमा करनेका निर्देश देगा. जब सूचना अनुरोधक सूचनाखर्च रकम जमा करेगा, तब सूचना अधिकारी संस्थाको सूचित करेगा. संस्था वह सूचना की सोफ्ट लिपि सहायक सूचना अधिकारीको भेजेगी. और सहायक सूचना अधिकारी उसको मूद्रित करके सूचना अनुरोधकको प्रेषित करेगा. यदि ईमेल पता है तो वह उसके उपर भी प्रेषित करेगा.

संस्था को जो परिवाद पत्र भेजा गया है उसका एक मासके अंदर उत्तर देगी. यदि परिवाद का किस्सा गंभीर अस्तव्यस्तताका या घोर असुविधाका है तो और इस प्रकार की प्रार्थना कि गई है तो सहायक अधिकारी इसको अपेलेट अधिकारीको प्रेषित करेगा और अपेलेट अधिकारी इसके उपर निर्णय करके उत्तरकी कालसीमा पर निर्णय करेगा और समुचित संस्थाके शिर्ष अधिकारीको प्रेषित करेगा

अगर समुचित संस्थाके शिर्ष अधिकारीने एक मासके अंतर्गत या सूचित काल सीमा के अंतर्गत उत्तर नहीं दिया या तो अधिक समयावधि मांगी तो यह बात वह आवेदकको सूचित करेगा. यह भी सूचित करेगा कि, अपेलेट प्राधिकारी कौन है और उसका पता क्या है.

यदि राज्य सरकारके अंतर्गत वह संस्था आती है तो प्रथम अपेलेट प्राधिकारी तेहसिल (या झॉन) विस्तारका सूचना परिवाद सहायक लोक आयुक्त होगा.

यदि केन्द्र सरकारके अंतर्गत वह संस्था आती है तो प्रथम अपेलेट प्राधिकारी जिला विस्तारका सहायक आयुक्त होगा.

बुथ समूह या वॉर्ड सूचना परिवाद सहायक अधिकारीः जहां ग्राम पंचायत नहीं होती है, किन्तु नगर पालिका या वॉर्ड होते है, वहां पर यह कार्यभार के आधार पर बुथ समूह विस्तार में यह अधिकारी होगा. वह ग्राम के सहायक अधिकारी के समान कार्य करेगा.

सूचना व परिवाद आयोग (राज्य)

तहेसिल या झॉनः  (राज्य) सूचना लोक सहायक लोक आयुक्त. यह अधिकारी राज्य सरकार के कार्यक्षेत्रमें आती समुचित संस्थासे संलग्न सूचना परिवाद के आवेदकोंके प्रथम अपेलेट प्राधिकारी है.

जिला विस्तारः  (राज्य) सूचना परिवाद लोक आयुक्तः लिये द्वितीय अपेलेट प्राधिकारी है.

राज्य विस्तारः (राज्य) सूचना परिवाद आयुक्त. यदि (राज्य) सहायक सूचना परिवाद लोकायुक्त  निर्णय पर आवेदक असंतुष्ट है तो वह राज्यके सूचना परिवाद आयुक्त के पास अंतिम अपील करेगा.

उसके बाद भी असंतूष्ट है तो उच्च न्यायलयमें जायेगा.

केन्द्रीय विस्तारः केन्द्रीय सूचना व परिवाद आयोगः

जिला विस्तारः (केन्द्र) सूचना परिवाद सहायक लोक आयुक्त. यह प्राधिकारी केन्द्र सरकारके कार्यक्षेत्रके अंतरर्गत आती संस्थाके विषयके बारेमें प्रथम अपेलेट प्राधिकारी.

राज्य विस्तारः (केन्द्र) सूचना परिवाद लोक आयुक्त. यह प्राधिकारी केन्द्र सरकारके कार्यक्षेत्रके अंतरर्गत आती संस्थाके विषयके बारेमें द्वितीय अपेलेट प्राधिकारी.

राष्ट्र विस्तारः (केन्द्र) सूचना परिवाद मुख्य लोक आयुक्त. यह प्राधिकारी केन्द्र सरकारके कार्यक्षेत्रके अंतरर्गत आती संस्थाके विषयके बारेमें अन्तिम अपेलेट प्राधिकारी.

इनके निर्णयसे यदि आप असंतुष्ट है तो सर्वोच्च अदालतमें जाना होगा.

यह एक रुपरेखा मात्र है. इसको कानुनी भाषामें विधेयक प्रारुपमें शब्द बद्ध करना है और कार्य प्रणालीका विस्तारसे विवरण करना आवश्यक है.

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः सूचना, अनुरोध, सहायक अधिकारी, आयुक्त, आयोग, ग्राम, बुथ समूह, तेहसिल, वॉर्ड, झॉन, जिल्ला, राज्य, राष्ट्र, समयावधि, न्यायालय, उच्च सर्वोच्च, मुख्य,  कामकी निविदा, टेन्डर नोटीस,   संविदा, कोन्ट्राक्ट, जन परिवाद, पब्लीक कंप्लेइन्ट, प्रतिरक्षा, डीफेन्ड, संमिलन, मर्जर, पारदर्शिता, प्रतिलिपि, अपेलेट, प्राधिकारी

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What is expected by the people of India from Narendra Modi – Part – 2

नरेन्द्र मोदी जब प्रधान मंत्री बन जाय, तब भारतीय जनता उनसे क्या अपेक्षा रखती है? – २

जनप्रतिनिधि के चयन, निर्वाचन, नियुक्ति और उसको पदच्यूत करनेवाली प्रक्रियामें संशोधनः

जनप्रतिनिधिके अधिकार, कर्तव्य और उसकी सीमा और परिसीमाके बारेमें हमें स्पष्ट हो जाना पडेगा.

जनप्रतिनिधि कौन है?

जनप्रतिनिधि क्या जनताका कर्मचारी है?

अगर हां, तो उसके उपर सरकारी कर्मचारीगण वाली (पब्लिक सर्वन्ट के लिये निर्धारित और सूचित) आचार संहिताको उपयोजित (एप्लीकेबल) करनी चाहिये. लेकिन भारतीय संविधानके अनुसार जनप्रतिनिधिके लिये अलग, अर्धदग्ध और अस्पष्ट, उपबंधन (प्रोवीझन) और प्रक्रिया है.

जनप्रतिनिधि, वास्तवमें जनताका प्रतिनिधि है जो अपने अपने क्षेत्रकी जनताकी समस्याओंका, विचारोंका, इच्छाओंका, आकांक्षाओंको विधान परिषद [विधि, विधान और उनकी प्रक्रियाओंके विषय पर विधेयकका प्रारुप (ड्राफ्ट) बनानेवाली और उसको स्विकृति देने वाली जनप्रतिनिधियों की सभा)में प्रतिबिंबित करता है. और कर्मचारीगण द्वारा जनहितमें कार्यान्वित करवाता है और उनके उपर अनुश्रवण (मोनीटरींग) करता है.

जनप्रतिनिधिका कार्यकाल ५ वर्ष है या तो विधान परिषद भंग हो जाने पर नष्ट हो जाता है.

क्या जनता, अपने जनप्रतिनिधिको उसके कार्यकालकी निश्चित अवधिके पूर्व उसको पदच्यूत कर सकती है?

उत्तर है; “ना” और “हां.”

“ना” इसलिये कि, भारतीय संविधानमें जनप्रतिनिधिको कार्यकालके पूर्व ही, पदच्यूत करनेकी कोई प्रक्रिया नहीं है.

“हां” अगर विधान परिषदका प्रमुख चाहे तो वैवेकिक शक्ति (डीस्क्रीशनरी पावर) से संविधानमें बोधित प्रक्रियाके अनुसार उसको पदच्यूत कर सकता है.

लेकिन इसमें तत्‍ क्षेत्रीय जनताके अभिप्राय और ईच्छाका प्रतिबिंबन अस्पष्ट है. जनता अपनी ईच्छासे अपने प्रतिनिधिको पदच्यूत नहीं कर सकती. यदि जनता अपने प्रतिनिधि पर कोई भी प्रकारके आंदोलन द्वारा मनोवैज्ञानिक प्रभाव लावे और उसको पदत्याग पत्र देना पडे वह परिस्थिति अलग है.

तो इसमें क्या करना चाहिये?

हम एक जन वसाहतका उदाहरण लेते है.

एक जन वसाहत है. इस वसाहतमें कई प्रकारके आवास है, बडे आवास है, छोटे आवास है, बहुमंजीला आवास है, झुग्गी झोंपडीयां भी है, कार्यालय है, उद्योग है, पैदल मार्ग है, वाहन मार्ग है आदि आदि … .

यहांके आवासीयोंने विचार किया कि, इस वसाहतमें कई सारे काम है. इनकी सफाईका काम, अनुरक्षणका काम, नव सर्जनका काम, काम करनेवालों पर अवलोकन और अनुश्रवणका काम आदि आदि…  इन सब कार्योंको कोई एक व्यक्ति करें  या करवायें ऐसा आयोजन करें.  हम किसीको इन कामोंको करनेका संविदा (कोन्ट्राक्ट) दे दें. यह व्यक्ति हमारे आदेशों और निर्देशोंके अनुसार काम करेगा और करवायेगा.

“फलां” पक्ष नामक एक अभिकर्ता

एक “फलां” पक्ष नामक एक अभिकर्ता (एजन्ट) आ गया. उसने प्रस्ताव दिया कि हम एक संविधान का प्रारुप आपको देंगे और आप जैसी कई वसाहत है. आप आपका प्रतिनिधि हमें दें. आपका यह प्रतिनिधि आपके विचारोंके अनुरुप, प्रारुपको स्विकृति देगा, या विकल्पका प्रस्ताव देगा, उसको हम संमिलित करेंगे और इन प्रतिनिधियों द्वारा जो अंतिम प्रारुप बनेगा वह संविधान बनेगा. इसमें मानवीय अधिकारोंका, शोषण हिनताका, न्याय, प्रतिनिधि के चूनाव आदि आदि सब कर्तव्योंका संमिलन होगा और इस संविधानके आधार पर कर्योंका निष्पादन (एक्झीक्युशन) और अनुश्रवण होगा. यह प्रतिनिधि आपसे कर द्वारा खर्च वसुल करेगा और थोडीसी मझदूरी / वेतन लेगा.

अब हुआ ऐसा कि ऐसा संविधान बन जाने पर और स्विकृत हो जाने पर वह एजन्टने  अपनी तरफसे जनप्रतिनिधिका नाम भी प्रस्तावित किया. जनताने उसको चूनाव द्वारा स्विकृत किया, किंतु यह जनप्रतिनिधि और उसका पक्ष कपट करने लगा और करवाने लगा. कर बढाने लगा, अपने सभ्योंकी मझदूरी, सुख सुविधाओंमें वृद्धि करने लगा. ऐसे विधेयक पसार करने लगा कि जनताकी दीनता बढे और संपत्तिवान ज्यादा संपत्तिवाले बने.

ऐसा कई वसाहतोंमें होने लगा. तो एक वसाहतने पारदर्शिताके लिये सूचनाका अधिकार संमिलित करवाया. प्रयोजन यह था कि जन प्रतिनिधि संविधानके अंतर्गत जो कुछ भी सुधार करे वह पारदर्शितासे करे.

पक्षने कहा ठीक है आप जो माहिती मांगेंगे वह हम देंगे. बात खतम.

ऐसी परिस्थितिमें भी जनप्रतिनिधि अपने वर्तनमें कोई सुधार नहीं लाता है.

जनप्रतिनिधि कहेता है पक्षने मेरे नाम का प्रस्ताव रक्खा था और आपने मुझे पांच वर्षके लिये स्विकृत कर ही लिया है. इसलिये मेरा उत्तरदायित्व पक्षके साथ है. संविधानके अनुसार मेरा कार्यकाल रहेगा.

जनताने कहा तू हमारा प्रतिनिधि है. पक्षने तो तुम्हे सिर्फ प्रस्तावित ही किया है. पक्षने तुम्हारा चयन किया है. हमने तुम्हारा निर्वाचन किया है.

जनप्रतिनिधि और पक्षने कहा, संविधानमें जो प्रावधान है उसके उपर आप जनता लोग नहीं जा सकते. संविधान के उपर कोई नहीं है.

जनता कहेती है संविधानके उपर जनता है. जनता है तो संविधान है.

पक्ष कहेता है, संविधानमें संशोधनके लिये अधिकृत हम ही है. तूम लोग कौन होते हो?

जनता कहेती है कि तो हमारे मूलभूत अधिकारोंका क्या? यदि हमने प्रतिनिधिको चूना है तो उसका प्रतिनिधित्व नष्ट करना हमारा मूलभूत अधिकारा है. यदि वह ढंगसे काम नहीं करता है तो हम उसको पदभ्रष्ट कर ही शकते है.

पक्ष कहेता है, संविधानमें कोई ऐसा प्रावधान और प्रक्रिया नहीं है. हमने आपके सामने हमारा चूनावका घोषणा पत्र रखा था. अगर हमारा व्यवहार ठीक नहीं है तो तुम लोग हमे आगामी चूनावमें निर्वाचित मत करो. तुम लोग हमारे मध्यावधि कार्यकालमें, विरोध प्रदर्शन करके, बहुमत तुम्हारे साथ है ऐसा सिद्ध नहीं कर सकते हो.

जनता कहेती हैः तुम्हारा चूनाव नीति-घोषणा एक कपट है. तुमने घोषणापत्रमें जो वचनबद्धता प्रकट की थी उसका तुमने पालन नहीं किया. जो घोषणा पत्रमें  नहीं था उसका तुम लोग विधेयक लाये. यह एक छलना और विश्वासघात है.

पक्ष कहेता हैः हमने विश्वासघात किया है, ऐसा सिद्ध कौन करेगा? हमने वादा किया था कि, हम लोकपाल विधेयक का प्रस्ताव लायेंगे और हम उस विधेयकको लाये.

जनता कहेती है तुम्हारा लोकपाल विधेयकका प्रारुप अर्थपूर्ण और परिणाम लक्षी नहीं है. यह एक कपट है. तुम्हे तुम्हारे चूनाव नीति-घोषणा पत्रमें ही लोकपाल विधेयकका प्रारुप (लोकपाल बीलका ड्राफ्ट), प्रकट करना चाहिये था. तुमने व्यवहारमें निरपेक्ष पारदर्शिता नहीं प्रदर्शित कि. तुमने अपने नीति-घोषणा पत्रमें यह कभी भी लिखा नहीं था कि, तुम लोग अपना वेतन / मझदुरीमें वृद्धि करोगे और सुख सुविधा बढाओगे, तो भी तुमने अपने खुदके लाभवाला सब कुछ किया. वास्तवमें तुम जो कोई भी विधेयक लाने वाले थे उन सबका प्रारुप हमारे सामने प्रकट स्वरुपमें रखना तुम्हारे लिये आवश्यक था. किंतु तुमने यह कुछ भी किया नहीं. पारदर्शिता रखना तुम्हारा कर्तव्य है. तुम अपने कर्तव्यसे च्यूत हुए हो इसलिये तुम निरर्हित (डीसक्वालीफाईड) बन जाते हो.

पक्ष और जनप्रतिनिधिः लेकिन इस का निर्णय तो न्यायालय ही कर सकता है.

न्यायालय क्या कर सकता है?

न्यायालय, सूचना अधिकार की आत्माको केन्द्रमें रखकर पारदर्शिताका निरपेक्ष पारदर्शिताके रुपमें   अर्थघटन कर शकता है. और जो विधेयका प्रारुप चूनावके नीतिघोषणापत्रमें नहीं है उन सबको शून्य, प्रभावहीन और अप्रवर्तनीय घोषित कर सकता है. और पक्षको शासनके लिये और राजकीय पक्ष के स्थान पर भी निरर्हित कर सकता है.

और कोई विकल्प?

यदि जन प्रतिनिधिके क्षेत्रके समग्र मतदातामेंसे २०% मतदाता, चूनाव अधिकारीको आवेदन दें कि इस जनप्रतिनिधिको वापस बुलालो तो चूनाव अधिकारीको उस जनप्रतिनिधिके प्रतिनिधित्वके बारेमें जनताके “हां”, “ना” या “निश्चित नहीं” का बटन दबाके मत लेना पडेगा. यदि ५०+% मत, जनप्रतिनिधिके विरुद्ध गये तो वह पदच्यूत हो जायेगा.

ऐसी प्रक्रियाकी अनुपस्थितिमें, जनप्रतिनिधिको पदच्यूत करनेके लिये ५०+% मतदाताओंको अधिकृत अधिकारी या न्यायाधीशके सामने या क्षेत्रके चूनाव अधिकारीके सामने शपथपत्र बनाना पडेगा कि वह अपने क्षेत्रके जनप्रतिनिधिमें विश्वास रखता नहीं है और वह उसकी पदच्युतिके पक्षमें है. और वह अपने जनप्रतिनिधिको पदच्युत करना चाहताहै. ऐसे सर्व शपथ पत्रकी संख्या ५०+% होती है तो जनप्रतिनिधि पदच्यूत हो जायेगा.

तो हमें क्या न्यायालयके अर्थघटनकी प्रतिक्षा करना है?

क्या हमें जनप्रतिनिधि के चयन, निर्वाचन, नियुक्ति और उसको पदच्यूत करनेवाली प्रक्रियामें संशोधन करना है?

Last supper

(Artist’s curtsy)

(क्रमशः)

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः संविधान, जनप्रतिनिधि, चयन, चुनाव, पक्ष, अभिकर्ता, एजन्ट, विधेयक, प्रारुप, ड्राफ्ट, निष्पादन, एक्झीक्युशन, निरर्हित, डीसक्वालीफाईड, अर्थपूर्ण, निरपेक्ष, पारदर्शिता, कर्तव्य, अधिकार, कालावधि, विश्वासघात, पदच्यूत, नीति, घोषणा, पत्र, वैवेकिक शक्ति, डीस्क्रीशनरी पावर 

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ભગત, બ્રીટીશ અને સુભાષ ના સ્વપ્નનું ભારત બનાવો.

ભગત એટલે કોઈ સંત રજનીશમલ, ઓશો આશારામ, કે નિર્મલ બાબા નહીં. ભગત, એટલે ભગત સિંહ કે જેઓ ભારતની આઝાદી ખાતર શહિદ થયેલ. બ્રીટીશ એટલે જેઓએ આપણને ભારતવાસીઓને કે જેઓ દેડકાની પાંચશેરી જેવા અડૂક દડૂક હતા અને હમેશા ગુલામ રહેવા જ સર્જાયેલા હતા એવું માનનારાઓ છે તેમને  મતે જે શાસને આપણને એક કર્યા. સુભાષ એટલે કે સુભાસ ચંદ્ર બોઝ કે જેમણે આપણને સ્વતંત્ર કરવા માટે આઝાદ સેના રચી. આ ત્રણેયની પાસે આપણા દેશને ક્યાં લઈ જવો કે તેમણે શું કરવું એ માટેના સ્વપ્નો કે વિચારો હતા. આ ત્રણેનો શું સમન્વય ન થઈ શકે?

જો કે વાત થોડી વિચિત્ર લાગે. પણ વિચિત્રતાઓ ક્યાં નથી? અહો વૈચિત્ર્યં કે વિરોધાભાષોમાં એકતા જોવી એ આપણી ભારતીય સંસ્કૃતિનું આગવું લક્ષણ છે. આ લક્ષણને બિરદાવવું જ રહ્યું.

ગાંધી, નહેરુ અને સરદારના સ્વપ્નનું ભારત

GANDHI SARDAR AND NEHRU

હાજી, આમ તો દીપક ભાઈ સોલિયા સારું અને રસપ્રદ લખે છે. ૮ નવેમ્બર ૨૦૧૩, શુક્રવારના દિવ્ય ભાસ્કરમાં એક લેખ લખેલો. ગાંધી, નહેરુ અને સરદારના સ્વપ્નનું ભારત બનાવો. જો દૂધ, ખાંડ અને મીઠું (નમક) ને ભેગા કરી દૂધ પાક બનાવી શકાતો હોય તો ભગત, સુભાષ અને બ્રીટીશ ની ઈચ્છા પૂર્વકનું અથવા ગાંધી, સરદાર અને નહેરુને ભેગા કરી નવભારતનું સર્જન કરી શકાય.

દૂધ અને ખાંડ તો ભેગા થઈ શકે. તેમાં ઉષ્મા રુપી પરિશ્રમ નાખી સુંદર, સ્વાદિષ્ટ અને તૃપ્તીનો આનંદ આપે તેવો દૂધપાક પણ થઈ શકે. પણ જો આ દૂધપાકમાં મીઠું પણ નાખો તો સ્વાદનો તમારો બધો આનંદ ગાયબ થઈ જાય. ભગત સિંહ અને સુભાષ પણ ભેગા થઈ શકે પણ જો તેમાં બ્રીટીશનું રાજકીય તત્વ ઉમેરાય તો કૂતરો તાણે ગામ ભણી અને શિયાળ તાણે સીમ ભણી એવો ઘાટ થાય. આમ તો મીઠું કંઈ ખરાબ વસ્તુ નથી. મીઠાને ગળ્યા સિવાય ની બધી વાનગીઓમાં નખાય. મીઠાનું પ્રમાણ માફકસરનું હોવું જોઇએ. તેવું જ સગવડો વિષેનું છે. સગવડો જરુર પૂરતી હોવી જોઇએ. સગવડો આપણને ગુલામ કરી દે તે હદ સુધીની ન હોવી જોઇએ. ગાંધીજીએ મીઠાનો અને સગવડોનો ત્યાગ કરેલ. બ્રીટીશ લોકોનો સ્વાર્થ હતો. ભગત સિંહ અને સુભાષ બાબુને કશો સ્વાર્થ ન હતો. નહેરુ ને સત્તા રુપી સગવડ અને ખ્યાતિનો સ્વાર્થ હતો.

જો કે આતો સરખામણી છે. અને જ્યારે સરખામણી કરવા બેસીએ ત્યારે કંઈ બધું જ મળતું આવે તે જરુરી નથી. જ્યારે અજ્ઞાન હોય ત્યારે દોરડામાં સર્પનો આભાસ થાય. પણ જ્યારે જ્ઞાન આવે ત્યારે ખબર પડે કે અરે આતો સર્પ નથી, આ તો દોરડું છે. બ્રહ્મ વિષે શંકરાચાર્ય આમ જ કહે છે. તો વિરોધીઓ એમ કહે છે કે જો દોરડાને સર્પમાની લીધું અને પછી ખબર પડી કે આ તો દોરડું છે તો તેનો અર્થ એમ થયો કે ક્યાંક તો સર્પ અસ્તિત્વ ધરાવે જ છે. માટે ભલે અહીં એક જ વસ્તુ છે, પણ બે વસ્તુઓ તો અસ્તિત્વ ધરાવે જ છે. એક દોરડું છે કે જે અહીં છે. અને બીજી વસ્તુ તે સર્પ છે જે બીજે ક્યાંક અસ્તિત્વ ધરાવે છે. માટે આતો અદ્વૈતવાદ ધ્વસ્ત થયો કહેવાય.

શંકરાચાર્યે જવાબ આપ્યો. આ તો અજ્ઞાનતા અને અસત્ય નો સંબંધ દર્શાવવા માટે સરખામણી કરી છે. બધી વસ્તુઓ મળતી આવવી જરુરી નથી. જો તમે એક સ્ત્રીને ચંદ્ર મુખી કહો તો એનો અર્થ એવો નથી કે તેના ગાલ ઉપર ચંદ્ર જેવા ખાડા ટેકરા છે.

ગાંધીજી અને તેમના સ્વપ્નનું ભારત કેવું હતું?

આ માટે ચર્ચાનો અવકાશ નથી. ગાંધીજીનું બધું જ કામ વ્યવસ્થિત હતું. તેમણે તો બધું લખીને જ આપ્યું છે. જેથી કોઈ એમ ન કહી શકે ગાંધીજીએ તો આમ કહ્યું હતું અને ગાંધીજી એ તેમ કહ્યું હતું કે ગાંધીજીએ કંઈ આવું કહ્યું ન હતું. જો કે ગાંધીજીના સિદ્ધાંતો અને સમસ્યાના હલ સ્પષ્ટ હોવાં છતાં તેમની વાતોમાં પ્રાથમિકતા કોને આપવી તેવા વિવાદો તો રહ્યા જ છે. જેમકે ગાંધીજીને માટે દારુબંધી પ્રાથમિકતા હતી. નહેરુમાટે કે નહેરુવીયન કોંગ્રેસ માટે દારુબંધી લીસ્ટમાં જ આવતી નથી.

ગાંધીજીની અહિંસામાં (શોષણ હીનતા), માનવીય અભિગમ, સાક્ષરતા, અને વૈજ્ઞાનિક અભિગમમાં માનતા હતા.

શોષણ હીનતામાં વિકેન્દ્રીકરણ આવે, અને વિકેન્દ્રી કરણમાં સત્તા અને ઉત્પાદન પણ આવે. એટલે ગ્રામ સ્વરાજ પણ આવી જાય.

માનવીય અભિગમ

અમાનવીય અભિગમમાં યંત્રો અને વહીવટ દ્વારા થતી માનવોની ગુલામી અને  તેના થકી થતી વધુ પડતી આર્થિક અસામનતા આવી જાય છે. આમ માનવીય અભિગમને માટે બેકારીનો તાત્કાલિક ઉકેલ જોઇએ. તાત્કાલિક ઉકેલ માટે સૌને કામ આપવા માટે સાદાં યંત્રો જેવાં કે રેંટિયો, હાથશાળ, કુંભારનો ચાકડો જોઈએ. કુદરત સાથેની સમજુતી અને સહવાસ આવી જાય. આ રીતે કુદરતી ઉપચારો અને સ્વચ્છતા અને સાદગી પણ આવી જાય.

સાક્ષરતામાં વાચન ક્ષમતા ઉપરાંત સમસ્યાની સમજણ અને સંવાદ પણ આવી જાય.

વૈજ્ઞાનિક અભિગમમાં, વિજ્ઞાનમાંના આવિષ્કારો ઉપરાંત  પોતાને એક બાજુ પર મુકી તટસ્થ રીતે કેવી રીતે વિચારવું તે પણ આવી જાય. ઈશાવાસ્ય વૃત્તિ પણ વૈજ્ઞાનિક અભિગમનો એક ભાગ અથવા આડ પેદાશ છે.

વાંચોઃ

ચોક્ખું ઘી અને હાથી.

https://treenetram.wordpress.com/2010/10/22/%E0%AA%9A%E0%AB%8B%E0%AA%95%E0%AB%8D%E0%AA%96%E0%AB%81%E0%AA%82-%E0%AA%98%E0%AB%80-%E0%AA%85%E0%AA%A8%E0%AB%87-%E0%AA%B9%E0%AA%BE%E0%AA%A5%E0%AB%80/

સરદારના સ્વપ્નનું ભારતઃ

સરદાર પટેલ નું ભારતવિષે કેવું સ્વપ્ન હતું તે વિષે કોઈ ચર્ચા થતી નથી કદાચ આપણે જાણતા પણ નથી. પણ કોંગ્રેસના સંગઠનમાં  સરદારનું વ્યક્તિત્વ જ એવું હતું કે તેમની આર્ષદૃષ્ટિ અને વહીવટી ક્ષમતાને કારણે  એ અદ્વિતીય અને પ્રચંડ હતા. સરદાર પટેલ, સાદગીમાં, વ્યવસ્થિતતામાં અને દૃઢતામાં સંપૂર્ણ રીતે ગાંધીવાદી હતા. તદઉપરાંત તેઓ વાસ્તવવાદી હતા.

નહેરુનું સ્વપ્ન

નહેરુનું સ્વપ્ન શું હતું. જો આપણે ઓગણીસમી સદીના અંતીમ દશકાઓની અને વીસમી સદીના પ્રારંભિક દશકાઓની વાત કરીએ  તો સમાજવાદ એ એક યૌવનની ધૂન હતી. કદાચ ગાંડપણ પણ હોઈ શકે. સૌ યુવાનોને કંઈ કરી નાખવાની તમન્ના હોય. આ તમન્ના ધૂંધળી પણ હોય. નહેરુ પણ આમાંથી બકાત ન હતા. તેથી જ ગાંધીજીએ નહેરુને કહેલ કે તેઓ નહેરુને સમજી શકે છે પણ તેમના સમાજવાદને સમજી શકતા નથી.

જેમ નહેરુવીયન કોંગ્રેસનો ગાંધીવાદ, સાચા ગાંધીવાદ સાથે મેળ ખાઈ ન શકે, તેમ રશીયાનો સમાજવાદ, લેનીનના (કે કાર્લમાર્ક્સના), સમાજવાદ સાથે મેળ ન ખાય. ગાંધીજી સમજતા હતા કે જો ઉત્પાદનના પદ્ધતિઓ અને વહેંચણીઓ સમાજવાદમાં અને મૂડીવાદમાં સમાન હોય તો તેના પરિણામો પણ લગભગ સમાન જ હોય. સમાજવાદ તો વાસ્તવમાં અતિ-મૂડીવાદ છે. નહેરુ વિજ્ઞાનના સ્નાતક હતા. છતાં તેમનામાં તર્ક શક્તિ કેમ ન હતી તે વિસ્મયકારક છે. પણ મનમોહન સિંહના અર્થશાસ્ત્રના પ્રમાણ પત્રો અને તેમની અર્થ નીતિઓને જોઇને એવા વિસ્મય હવે રહેતા નથી. વાચન અને પ્રમાણ પત્રો એક વાત છે, જ્ઞાન અને ચિંતન બીજી વાત છે.

જ્યારે મોરારજી દેસાઈ અર્થમંત્રી હતા ત્યારે નહેરુ અને મોરારજી દેસાઈમાં નહેરુની આગાહીઓ ખોટી પડતી અને મોરારજી દેસાઈની ધારણાઓ સાચી પડતી. દા.ત. કે  નહેરુ આવકનાસ્રોતો વિષે એમ માનતા કે “આટલી” આવક જાહેર ક્ષેત્રના ઉદ્યોગો માંથી થશે. જ્યારે મોરારજી દેસાઈની ધારણા એવી રહેતી કે નહેરુનું લક્ષ્ય ઉંચું છે. જાહેર ક્ષેત્રો ખોટ ન કરે તો સારું. નફાની વાત તો દૂર રહી, પણ જાહેર સાહસો ખોટ બતાવતાં.

આવા નહેરુને, વાસ્તવવાદી સરદાર પસંદ ન પડે તે સ્વાભાવિક હતું.

નહેરુને સરદાર સહિત ઘણા નેતાઓ દંભી માનતા. જ્યારે ગાંધીજી જીવતા હતા ત્યારે પણ એક વખત નહેરુએ રાજીનામાની ધમકી આપી હતી. ત્યારે સરદારે ગાંધીજીને કહેલ કે તેમની ધમકી ઠાલી છે. તે કદી રાજીનામું નહીં આપે.

નહેરુના શાસન વખતે કોંગ્રેસમાં અને કોંગ્રેસની બહાર ઘણા સેવાભાવી નેતાઓ જીવતા હતા. આ નેતાઓને કારણે જુદા જુદા ખાતઓ સુપેરે ચાલતા હતા. જે કંઈ ગોલમાલ થઈ તે નહેરુના ખુદના અને તેમના મિત્રો ખાતાઓમાં થઈ. આ ખાતાઓ વિદેશ નીતિ, યોજના આયોગ અને સંરક્ષણ હતા.

આ ક્ષેત્રોમાં નીવડેલી નિસ્ફળતાના ફળ આપણે હજુ સુધી ભોગવી રહ્યા છીએ. આ હિમાલયન બ્લંડર વિષે મહાભારતથી પણ મોટાં અનેક ગ્રંથો લખી શકાય. આ બ્લંડરોની અનેક આડ પેદાશો છે. આમાંથી ક્યારે છૂટકારો થશે તે વિષે જ્યોતિષ શાસ્ત્રીઓ પણ આગાહી કરતાં ડરે છે. નહેરુએ અનેક વખત સંસદને ગેર માર્ગે દોરી છે. આચાર્ય ક્રિપલાનીએ તેના વિષે વિગતે પોતાની આત્મકથામાં લખ્યું છે.

સ્વતંત્રતા પૂર્વે 

સ્વતંત્રતા પૂર્વે અને સ્વતંત્રતાની ચળવળમાં નહેરુનો હિસ્સો ઠીક ઠીક હતો. તેઓ ખવડાવવા પિવડાવવામાં ઉદાર હતા. તેઓ મહેનતુ હતા. યુવાનોમાં અને ખાસ કરીને યુપી માં લોકપ્રિય હતા. એટલે ગાંધીજીને ડર હતો કે જો નહેરુને નંબર વન નહીં કરીએ તો કોંગ્રેસના ટૂકડા થઈ જશે. અને હાલના તબક્કે એટલે કે સ્વતંત્ર મળે તે સમય અને બધું ઠરીને ઠામ થાય અને ચૂંટણી થાય ત્યાં સુધીના ગાળામાં કોંગ્રેસના ભાગલા (કે જે દેશના વધુ ભાગલા તરફ પણ દોરી જાય) દેશને પોષાય તેમ નથી. આ વાત ગાંધીજીએ સરદાર પટેલને પ્રત્યક્ષ કે પરોક્ષ રીતે કરેલ. અને તેથી જ સરદાર પટેલે ગાંધીજીને ખાત્રી આપેલ કે તેઓ કોંગ્રેસને અકબંધ રાખશે. ન છૂટકે સરદાર પટેલે, નહેરુને ચીન વિષે લખાણ દ્વારા ચેતવેલ. પણ નહેરુ ઉચ્ચ આર્થિક સ્થિતિ અને અથવા બીજા  કોઈપણ કારણ થી આપખુદ હતા. અને કાશ્મિરનો પ્રશ્ન પ્રધાનમંડળની મંજુરી લીધાવગર અને સરદાર પટેલને પૂછ્યા વગર યુનોમાં લઈ જવાની ઓલ ઈન્ડીયા રેડિઓ ઉપર જાહેરાત કરી દીધેલ.

દેશને એક રાખવા માટે સરદાર પટેલને ગૃહ ખાતુ આપ્યા વગર છૂટકો ન હતો. નહેરુએ કશ્મિરનો પ્રશ્ન હાથમાં લઈ તેને ચૂંથી નાખ્યો. જો નહેરુ ગૃહ પ્રધાન થયા હોત તો દેશ આખો અનેક ટૂકડામાં વિભાજિત થઈ જાત. ગાંધીજી જીવતા હતા ત્યારે પણ સરદાર પટેલની તબિયત સારી રહેતી ન હતી. અને ૧૯૫૦ સુધીમાં તો ઘણી નાજુક થઈ ગયેલી. ઘણા અખબારી અને આરએસએસ- બીજેપીના વિદ્વાનોને આ વાતની ખબર નથી એટલે તેઓ દેશના ભાગલા માટે ગાંધીજીને માથે માછલાં ધોવે છે. જોકે એક વાત નોંધનીય છે કે ૧૯૪૨-૧૯૪૭ના કોમી હુલ્લડોએ દેશના ભાગલા નક્કી કરી દીધેલા. જો તે વખતે ભાગલા ન થયા હોત તો કોમી દાવાનળને કોઈ બુઝવી શકે તેમ ન હતું. ગાંધીજી પણ નહીં. એટલે જ ગાંધીજીએ આ ભાગલાની આડે આવ્યા ન હતા. તેમનો વિચાર એવો હતો કે એક વખત જો બધું ઠરીને ઠામ થાય પછી જનતાને જ એકતા માટે તૈયાર કરવી અને નેતાઓની ખાસ કરીને પાકિસ્તાનના નેતાઓની શાન ઠેકાણે લાવવી. કારણ કે ગાંધીજી જાણતા હતા કે પાકિસ્તાનના નેતાઓ વિભાજિત હતા.

અવિભક્ત ભારત માટેનો યોગ્ય પ્રસંગ ૧૯૫૪ પૂર્વેના તૂર્તના એક ગાળામા  બનેલ જેમાં સુહરાવર્દી નુને ભારતની મુલાકાત લીધેલ અને નિર્વાસિતોની સંપત્તિના પ્રશ્નો ના ઉકેલ માટે પણ તૈયારી બતાવેલ. આ મુલાકતનો પ્રારંભ આનંદ પમાડે એવો હતો. નુનના પત્ની એરોપ્લેનમાં ઉતરતા હતાં  ત્યારે તેમના સેન્ડલ નિકળી ગયેલ અને તે સેંડલ નીચે લસરી પડેલ. નહેરુ નીચે સીડી પાસે ઉભેલા. નહેરુએ પોતે સ્ત્રીદાક્ષિણ્યની ભાવનાની રૂએ તે સેંડલને નીચે પકડી લીધેલ. અને નુનનાં પત્નીને હાથોહાથ પરત કરેલ. તેથી નુન અને તેમના પત્ની ભાવ વિભોર બની ગયેલ. ભારત પકિસ્તાનના સંબંધો તદન સુધરી જશે તેવી આશા બંધાયેલ. પણ આ સમય દરમ્યાન ભારત અને યુએસના સંબંધ વણસી ગયેલ. અને કદાચ યુએસએ જ પાકિસ્તાનમાં લશ્કરી બળવો કરાવેલ એ શક્યતા અવગણી ન શકાય. ૧૯૫૪માં પાકિસ્તાનમાં લશ્કરી બળવો થયેલ અને તે વખતના પ્રમુખ ઈસ્કંદર મિરઝાએ નહેરુને સમવાય તંત્ર સ્થાપવા માટે આમંત્રણ આપેલ. આ આમંત્રણ નહેરુએ પ્રધાન મંડળની સલાહ લીધા વગર ધુત્કારી નાખેલ. એટલું જ નહીં લશ્કરી સરમુખત્યારશાહીની વગોવણી કરતી લૂલીને છૂટ્ટો દોર આપી દીધેલ. જોકે આજ નહેરુને સવાઈ બીન લોકશાહીવાળા રશિયા અને ચીન સામે કશો વાંધો ન હતો. એટલું જ નહીં, દિવસરાત પિતાની સાથે જ રહેનારી તેમની પૂત્રી ઈન્દીરાએ લશ્કરી સરમુખત્યારોને પણ અભડાવે એવી કટોકટી લાદેલ. જે નહેરુમાં પ્રચ્છન્ન હતું તે ઈન્દીરામાં ઉઘાડે છોગ હતું.

ટૂંક્માં નહેરુને કોઈ સ્પષ્ટ સિદ્ધાંતો કે સ્વપ્નો ન હતા. ઓળઘોળ કરીને નિસ્પન્ન થતું સ્વપ્ન એ હતું કે નંબર વન રહેવું. ગોલ્ડ કન્ટ્રોલ, કામરાજ યોજના અને સીન્ડીકેટની રચના ની વ્યુહ રચનાઓના પરિણામો જોયા પછી નહેરુને બીજા કોઈ સ્વપ્નો હોય એવું લાગતું નથી. છતાં જેઓ નહેરુના ફિલોસોફી વાળા ઉચ્ચારણોથી અભિભૂત છે તેઓ તેવી જાતના ઉચ્ચારણોથી નહેરુની પ્રશંસા કરશે જ. (નહેરુના ઉચ્ચારણો કેવા હતાં? ભારતની સીમા નિયંત્રણ રેખા કોઈ સ્થૂળ રેખા નથી. સીમા નિયંત્રણ રેખાની કોઈ વ્યાખ્યા નથી. યુનો દ્વારા કોઈ સમસ્યા ઉકેલાતી નથી. તે ભૂમિ તો બંજર ભૂમિ છે.) મેક મોહન લાઈન અને તીબેટને બફર સ્ટેટ નો દરજ્જો અને ચીન સાથેના બ્રીટનના કરાર ને આ પ્રમાણે નહેરુએ નજર અંદાજ કરેલ. અને આથી જ ચીનને ભારત ઉપર આસાન વિજય મળી ગયેલ.

નરેન્દ્ર મોદી પાસે ઘણો દારુગોળો છે.

NARENDRA MODI

નરેન્દ્ર મોદીએ જે નહેરુવીયન કોંગ્રેસદ્વારા થયેલી સરદાર પટેલની અવગણના વિષે ટોણો માર્યો છે તે હકિકત છે. નહેરુવીયન કોંગ્રેસના નેતાઓ અકળાઈને અદ્ધર અદ્ધર રીતે નરેન્દ્ર મોદીની બુરાઈ કરે છે.

નહેરુવીયન કોંગ્રેસ દ્વારા થયેલી સરદાર પટેલની અવગણના તો અનેક ઉદાહરણો છે. અને તેને માટે વાંચો

નહેરુવીયનો દ્વારા થતા ગુજરાત અને ગુજરાતીઓને અન્યાય

https://treenetram.wordpress.com/2012/12/12/%E0%AA%A8%E0%AA%B9%E0%AB%87%E0%AA%B0%E0%AB%81%E0%AA%B5%E0%AB%80%E0%AA%AF%E0%AA%A8%E0%AB%8B-%E0%AA%A6%E0%AB%8D%E0%AA%B5%E0%AA%BE%E0%AA%B0%E0%AA%BE-%E0%AA%A5%E0%AA%A4%E0%AA%BE-%E0%AA%97%E0%AB%81/

નહેરુવીયન કોંગ્રેસ સામે તો અનેક બોંબ ફોડી શકાય તેમ છે. નરેન્દ્ર મોદીએ તો હજુ એક ફટાકડી જ ફોડી છે.

સરદાર પટેલ ગુજરાતના હતા. અહીંના કોંગ્રેસના કાર્યાલયનું નામ ભવન (નહેરુવીયન કોંગ્રેસ કાર્યાલય) શું છે? રાજીવ ગાંધી ભવન. નહેરુવીયન કોંગ્રેસના નેતાઓને સ્વતંત્રતા માટે લડનારી કોંગ્રેસનો વારસો જોઇએ છે પણ તેમને નહેરુવંશીઓ સિવાય કશું દેખાતું નથી. મહાત્મા ગાંધી પણ દેખાતા નથી. દિલ્લીના બધા એરપોર્ટોના નામ શું છે. ગાંધીના ઘાટ પાસે નહેરુ, ઈન્દીરા, સંજય, રાજીવ, બધાના ઘાટ બનાવી દીધા જાણે એ બધા મહાત્મા ગાંધીની સમકક્ષ ન હોય? જે નેતાના અનુયાયીઓ નેતા ભક્તિમાં આટલા બધા અંધ હોય તેઓ દેશનું શું ઉકાળી શકવાના છે?

ત્રિપુટીઃ

દિપકભાઈ સોલીયા લખે છે કે આપણી પાસે તો ભલા ભોળા શંકર ભગવાન હતા. બહાર થી આર્યો આવ્યા અને તેઓ બ્રહ્મા અને વિષ્ણુને લાવ્યા. ભારતે બ્રહ્મા, વિષ્ણુ અને મહાદેવનો સમન્વય કર્યો. તેથી હિન્દુ ધર્મ અખંડ રહ્યો. તેવી જ રીતે આપણે ગાંધી, સરદાર અને નહેરુનો સમન્વય કરવો જોઇએ. જોકે દિપકભાઈએ આ વાત કહેવા ખાતર કહી નાખી લાગે છે. બ્રહ્મા વિષ્ણુ પરદેશી ન હતા. [એવું લાગે છે કે આપણે વિઘાતક અને બનાવટી આર્યન ઈન્વેઝન થીયેરી (આઈએટી) માંથી બહાર નિકળતા પેઢીઓ વીતી જશે. જ્યારે પશ્ચિમી ઈતિહાસ કારો કહેશે કે (જો કે મેક્સ મુલરે તેના અંતિમ મંતવ્યોમાં કહ્યું છે કે આર્યો ભારતના જ હતા) એ.આઈ.ટી  બકવાસ હતી ત્યારે આપણા અમુક મૂર્ધન્યો સ્વિકારશે.]

ગાંધી, સરદાર અને નહેરુ પણ દેશી જ હતા. ગાંધી સરદાર તો પોતાને સાવ જ દેશી માનતા હતા. નહેરુ પોતાને વિષે કંઈક જુદુ માનતા. તેઓ કહેતા કે પોતે જન્મે હિન્દુ છે. પણ કર્મે અને વિચારે હિન્દુ નથી પણ અનુક્રમે મુસ્લિમ અને ખ્રીસ્તી છે. ગાંધીજી ગૌવધબંધીના હિમાયતી હતા. પણ નહેરુને ગૌવધ બંધી મંજુર ન હતી. તેઓ તો વડાપ્રધાન પદેથી રાજીનામું આપવા પણ તૈયાર થઈ ગયેલ (નોન- ઓફીસીયલ બીલ ૧૯૫૪). આમ જુઓ તો ગાંધી અને નહેરુ વચ્ચે કોઈ સમાનતા ન હતી.

આ ત્રણેને ભેગા કરવાની કોઈ જરુર પણ નથી. ઐતિહાસિક અફવાઓ ફેલાવા કરતાં તેઓને તેમના ઉચ્ચારણો અને પુસ્તકો દ્વારા તેમના સ્થાને રહેવા દો.

વિનોબા ભાવે એ કંઈક આવું કહ્યું છે. અર્થશાસ્ત્રનો વાદ એ નિરર્થક છે. વિજ્ઞાનના યુગમાં નીચેનું સમીકરણ જ યોગ્ય છે.

(કુદરતી) સ્રોતો+માનવતા+ટેક્નોલોજી=પ્રગતિ+આનંદ

શિરીષ મોહનલાલ દવે.

ટેગ્ઝઃ ગાંધી, સરદાર, પટેલ, નહેરુ, સમાજવાદ, અતિમૂડીવાદ, ઉત્પાદન, યંત્રો, માનવતા, શોષણ, સરમુખત્યારી, દેશી, ઐતિહાસિક, દીપક સોલિયા

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What is expected by the people of India from Narendra Modi

नरेन्द्र मोदी जब प्रधान मंत्री बन जाय, तब भारतीय जनता उनसे क्या अपेक्षा रखती है?

चूनाव आयोग सुधारः (रीफोर्म्स)

कार्यक्षेत्र और भौगोलिक विस्तार

चूनाव आयोग, भूमि और आवास सहयोग विभाग, जनगणना आयोग, स्थावर संपत्ति पंजीकरण (रजीष्ट्रार ओफ को ओपरेटीव सोसाईटीझ, लेन्ड रेकोर्ड), इन सभी कार्यक्षेत्रोंको चूनाव आयोगमें संमिलित किया जायेगा.

इसका नाम रहेगा चूनाव और स्थावर संपत्ति सहयोग आयोग

कृषि सहकारी संस्थाएं और गृह निर्माण सहकारी संस्थाएं, हालमें तो सहयोग संस्था पंजीकर्ता (रजीस्ट्रार ओफ को ओपरेटीव्झ सोसाईटीझ) के कार्य क्षेत्रमें है. न्यायालयके उपर भी जो भार रहेता है इसमें इसके संलग्न किस्से ही ज्यादातर होते है.

चूनाव इन सहयोगी संस्थाओमें भी होते है. सहयोगी संस्था कृषि, और सहयोगी संस्था गृह निर्माणअनुरक्षणमें, कपट (फ्रॉड), अनीति, और अनियमितता ज्यादा ही रहती है. इन कपट, अनीति और अनियमितताका निर्मूलन करनेके लिये ये सहयोगी संस्थाओंका, उसके सदस्योंका पंजीकरण (रजीष्ट्रेशन ऑफ मेम्बरशीप), विकास और अनुरक्षण (मेन्टेनन्स), समिति (कमीटी) के सदस्योंका चूनाव, और सदस्यताका हस्तांतरण (ट्रन्सफर ऑफ मेम्बरशीप) आदि, चूनाव आयोग के कार्यक्षेत्रमें लाना आवश्यक है.

चूनावमें विस्तार की जनगणना और व्यक्तिकी अनन्यता (आईडेन्टीटी), नागरिकता (सीटीझनशीप), आदि अनिवार्य है. इस लिये जनगणना आयोग भी इसमें संमिलित (मर्ज्ड) होना चाहिये.

चूनाव और जन सहयोग के निम्न लिखित स्तर रहेंगे

राष्ट्रीयस्तर (राष्ट्र) (सर्वोच्च आयुक्त)

राज्य स्तर (राज्य विस्तार) (उच्च आयुक्त)

संसद सदस्य स्तर, (संसद बैठक विस्तार) (जिला आयुक्त)

विधान सदस्य, (स्टेट एसेम्ब्ली बैठक विस्तार) (उपायुक्त)

खंडीय स्तर (वॉर्ड) (सहायक आयुक्त)

बुथ या बुथ समूह (विस्तार से १० बुथ विस्तार या ५००० के आसपास मतदाता) (बुथ अधिकारी)

यह एक उच्च से निम्नस्तर तक बिलकुल स्वतंत्र आयोग रहेगा. इसके कार्यालय, जनसभाखंड और कर्मचारीगण स्थायी होगे.

.   हेतुः चूनाव प्रचारमें सुधार, चूनाव खर्च पर पाबंदीः जब तक चूनावी प्रचारमें सुधार नहीं होगा और चूनाव में पैसेका महत्त्व दूर नहीं होगा तब तक नीतिमत्ता वाले और सेवाभावी लोग चूनाव जित पायेंगे नहीं. इसलिये हरेक अभ्यर्थीका (केन्डीडेटका) चूनाव प्रचार खर्च शासन उठायेगा.

. चूनाव आयोग कार्यक्षेत्र सुधारः ५००० मतदाताओंके भौगोलिक विस्तारके आधार पर एक बुथ या बुथ समूह या एक ग्राम्य विस्तार या नगरका एक विभाग में एक राजपत्रित अधिकारी (gazetted officer)  होगा.

इस राजपत्रित अधिकारीके पदका नाम बुथ अधिकारी  रहेगाः

बुथ अधिकारीका अपने भौगोलिक विस्तारमे निम्न लिखित कर्तव्य और उत्तरदायित्व

पंजीकरणः

अपने विस्तारकी स्थावर (जमीन और मकान आदि) मिल्कतोंका पंजीकरण यह अधिकारी करेगा.

जनगणनाः

निवासीयोंकी नोंध यह अधिकारी करेगा. इस के कारण जनगणना का पंजीकरण अपने आप होता रहेगा. ,

सहकारी संस्था पंजीकरण और संचालनः

सहकारी गृह निर्माण और अनुरक्षण संगठन कृषि सहकारी संगठन के कारोबार पर अनुश्रवण (मोनीटरींग) और उसका पंजीकरण और नियमन का काम यह अधिकारी करेगा. हरेक सहकारी संस्थाका प्रमूख यह अधिकारी होगा.

यह अधिकारी उपरोक्त संगठनोंके पंजीकरण और संचालन की कार्यवाही करेगा. तद उपरांत यह अधिकारी, उपरोक्त सहकारी संगठनोके सदस्योंका पंजीकरण, सदस्यता का हस्तांतरण, संशोधन, संस्थाका अनुरक्षणसदस्यसभा सामान्य सभा बुलाना और उसका संचालन और कार्यवाहीका अभिलेखन (रेकोर्ड) रखनेका काम करेगा.

ज्यादातर अनियमितता, अनीति और कपट स्थावर संपत्ति और सहकारी संगठन द्वारा ही होते है. ये सब कपट और अनीति बंद हो जायेगी. क्यों कि किसीभी कपट, अनीति और अनियमितता का उत्तरदायित्व (रीस्पोन्सीबीलीटी) इस अधिकारी पर रहेगा.

चूनाव प्रचार निरीक्षण और सभा संचालनः

जनप्रतिनिधित्व के अभ्यर्थीयोंका चूनाव प्रचार सभाओंका संचालन यह अधिकारी करेगा.

यह अधिकारी अपने द्वारा अपने विस्तारमें स्थित, प्रबोधित (सजेस्टेड), सूचित या सुझाये गये स्थान या सभाखंड में आवेदित (एप्लाईड फोर), जनसभाका संचालन करेगा और वक्तव्योंका और प्रचार साहित्यका रेकोर्ड रखेगा.

यह अधिकारी प्रश्नोत्तरी और समान मंचपर (कोमन प्लेटफोर्म) विभिन्न जनप्रतिनिधित्व के अभ्यर्थीयोंकी या उनके द्वारा सूचित व्यक्तियोंकी चर्चासभाओंका संचालन करेगा.

यह अधिकारी सरकार द्वारा संचालित दूरदर्शन पर, और समान मंच पर, सामूहिक और व्यक्तिगत व्याख्यान कार्यक्रम पक्षके अभ्यर्थी और अपक्षीय अभ्यर्थीयों के साथ चर्चा करके कर्यक्रम की अनुसूचना (शीड्युल ओफ प्रोग्राम) जारी करेगा. यह अनुसूचना सरकार वेब साईट पर पर जारी करेगी. प्रचार की यह अनुसूचना सभाखंड और बुथ कार्यालयमें प्रदर्शित रक्खी जायेगी.

हर अभ्यर्थीके चूनाव क्षेत्रकी एक वेब साईट बनाई जायेगी और जन सूची, मतदाता सूची, सदस्यता, हस्तांतरण, समय समय के अभ्यार्थी, अभ्यार्थी परिचय, चूनाव घोषणा, चूनाव और अनुसुचित प्रचार, प्रचार अभियान माहिति, चूनाव परिणाम, ईत्यादि माहिति वेब साईट पर उपलब्ध रहेगी.

. विधेयकमें पारदर्शिता और जनस्विकृति

भारतीय संविधान अनुसार, राजकीय पक्ष और जनता के बीचमें सीधा संबंध नहीं है. निर्वाचित व्यक्ति को जनप्रतिनिधि कहा जाता है. वैसे तो राजकीय पक्षको कई रियायतें मिलती है. इस लिये उनका उत्तरदायित्व बनता है. लेकिन वास्तवमें ऐसा दिखाई देता नहीं है.

जनप्रतिनिधिके लिये कोई व्यक्ति आवेदन (प्रार्थनापत्र) दें उसके पहले उसकी लोकप्रियता सिद्ध करने लिये एक प्रारंभिक सर्वेक्षण जरुरी है. पक्ष वाले तो अपना व्यक्ति खुद तय करेंगे और इसमें जरुरत पडने पर क्षेत्रीय अधिकारीकी मदद ले सकते है.

जो व्यक्ति अपक्ष है वह कितना लोकप्रिय है यह सुनिश्चित करने के लिये क्षेत्रीय अधिकारी बुथ अधिकारीयोंकी मददसे एक प्राथमिक सर्वेक्षण करवायेगा. और उनमें जो सर्व प्रथम पांच निर्वाचित बनेंगे वे ही अंतीम चूनावमें भाग ले सकते हैं.

. पक्षीय या अपक्षीय अभ्यार्थीका नीतिघोषणा (ईलेक्सन मेनीफेस्टो) पत्रः

जो विषय घोषणा पत्रमें संमिलित नहीं है उस विषय पर कोई जनप्रतिनिधि विधेयक (बील) ला सकता नहीं है. क्यों कि यह जनताके सामने पारदर्शिता नहीं है.

विधेयक का प्रारुप (ड्राफ्ट ओफ थे बील)

जो भी व्यक्ति या पक्ष या पक्षकी व्यक्ति जो जनप्रतिनिधित्व के लिये अभ्यार्थी है, वह अगर चूना गया तो अपने आगामी कार्यकालमें क्या क्या विधेयक लानेवाला है उसका प्रारुप क्षेत्रीय अधिकारी के पास उसको प्रस्तूत करना पडेगा. कोई भी अभ्यार्थीने या अगर उसके पक्षने ऐसा विधेयक का प्रारुप प्रस्तुत (सबमीट) करवाया नहीं है, तो ऐसा विधेयक वह सभामें (संसद, विधानसभा, परिषद, या कोई भी विधेयक पारित करनेका वाली अधिकृत सभा) प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है.

हालमें व्यवस्था ऐसी है कि जनप्रतिनिधि का पक्ष विधेयकका प्रारुप शासन ग्रहण करनेके पश्चात अपने कार्यकाल दरम्यान बनाती है और परिषद में प्रस्तुत करके पारित (पास) करवाती है. वास्तवमें जनताके साथ यह एक बेईमानी है. जनताकी आवाज इसमें प्रतिबिंबित होती नहीं है. इतना ही नहीं इस प्रक्रीयामें पारदर्शिता नहीं है.

आपात स्थितिमें विधेयक

अगर आपात स्थितिमें कोई विधेयक की जरुरत पडी तो, राष्ट्रीय चूनाव आयूक्त ऐसे विधेयकके प्रारुपको जनताके सामने प्रसिद्ध करेगा औरहां”, “नाऔरतटस्थ” (यस, नो, कान्ट से) में जनमत लेगा.

अति आपात स्थितिमें विधेयक

अगर अति आपातकालकी स्थिति है तो राष्ट्रपति इसके उपर अपना अभिप्राय देगा और अध्यादेश (ओर्डीनन्स) जारी करेगा. इसको मासमें जनताके सामने रखना पडेगा. अगर जनताने ५०+ प्रतिशतसे नामंजुर किया तो शासक पक्षको सत्ता त्याग करना पडेगा. अगर ऐसा नहीं है तो सरकार चालु रहेगी.

सरघस, बडे विज्ञापन पट्ट, और दिवारों पर लिखने पर पाबंदीः

पक्षका अभ्यार्थी और अपक्ष अभ्यार्थी सिर्फ अपना चूनाव घोषणापत्र (जिसमें विधेयक का प्रारुप संलग्न होगा), अपना अंगत और व्यावसायिक सेवा विवरण (प्रोफाईल), अपनी कार्यशैली (गवर्नन्स स्टाईल) अपने विचार सिद्धांत (स्कुल ऑफ थोट्स एन्ड प्रीन्सीपल्स),  और वक्तव्य (प्रवचन) का विवरण दे सकता है. इसका मुद्रण (प्रीन्टींग) खर्च चूनाव आयोग उठायेगा. सभा खर्च भी चूनाव आयोग उठायेगा.

गैर सरकारी दूरदर्शन चेनलों पर चूनाव प्रचारका खर्च अभ्यार्थी के खाते में जायेगा. जितना खर्च सरकार अपने सरकारी दूरदर्शन चेनलों पर करेगी उतना खर्च जनतप्रतिनिधित्वका आभ्यार्थी कर पायेगा.

अगर अभ्यर्थी चाहे तो अपने चूनाव प्रचारकी दृष्यश्राव्य (वीडीयो) कृति (क्लीप) सरकारी दूरदर्शन चेनल को प्रस्तूत कर सकता है. चूनाव आयोग, पक्ष के चूनाव पत्र पर सूचित प्रक्रिया में संमिलित कर देगा. जनता उसको अपनी अनुकुलतामें देख लेगी.

कृषि और आवास सह्योग विभाग

ठीक उसी प्रकार कृषि और आवास सह्योग आयोगको चूनाव आयोगमें संमिलित करके संशोधन करना है.   

कृषि और आवास सह्योगी संस्था के विषयमें भी, निविदा (पब्लिक नोटीस), संस्थाका कार्य क्षेत्र, संस्था परिचय, सदस्यताकी पात्रताका मापदंडसंस्था पंजीकरण, सदस्य सूची, सदस्यकी माहिति, विकास और अनुरक्षण की समिति के सदस्यों की के चूनाव प्रक्रीया अनुसूचना और पूरी प्रक्रीया, विकास और अनुरक्षण लेखा (एकाउन्ट) और लेखा परीक्षा (ऑडीट) विवरण, समिति सभा, सामान्य सभा, सभा घोषणा प्रक्रीया (एकोर्डीग टु स्टेच्युटरी प्रोवीझन्स फोर कोलींग फोर मीटींग), वक्तव्य नोंध, आदि सभी व्यवहार बुथ अधिकारी करेगा और सभी प्रक्रिया वेब साईट पर उपलब्ध रहेगी.

प्रकिर्णः

बुथ अधिकारी, व्यक्तिकी अनन्यताका प्रमाणपत्रः

इस क्षेत्रके निवासीकी छबी, कद, जन्म तीथी, आदि और गोपित प्रक्रीयासे रखा हुआ अंगुलीयां छाप, नेत्र छाप, हस्ताक्षर छाप आदि अनन्यताका पंजीकरण क्रमसंख्यावाला अनन्यताका प्रमाणपत्र कार्ड बनायेगा और देगा.

दस्तावेजों का नोटराईझेशन और पंजीकरण

बुथ अधिकारी, स्थानिक दस्तावेजोंका नोटराईझेशन और पंजीकरण करेगा,

बुथ अधिकारी, स्थानिक स्थावर संपत्तिका, सर्वेक्षण, मानचित्र, हस्तांतरण, बंधक विलेख, आदि निष्पादित और पंजीकरण करेगा.  

बुथ अधिकारी, स्थानिक व्यक्तिओंकी प्रतिज्ञा पत्र, और जिम्मेवारी पत्र, आदि दस्तावेज निष्पादित करेगा और पंजीकरण करेगा.

स्थान और कार्योंका पंजीकरण 

उत्पादनबिक्रीवहनसूचनाशिक्षणव्यापारीसेवाअभिकरण आदि संस्था, व्यक्ति, व्यक्ति समूह को अपना कार्यस्थल, स्थानांतरण, हस्तांतरण और कर्मचारीके विवरण का एक सूचित आवेदन पत्र प्रस्तूत करना पडेगा और उसका पंजीकरण करवाना पडेगा. बुथ अधिकारी एक आधारभूत वेब साईट रखेगी और एक मानचित्र के अंतर्गत सभी विवरण जनता देख पायेगी. बुथ अधिकारी इस वेब साईटको अद्यतन रखेगा. जो संस्था व्यक्ति और व्यक्ति समूह, जन लोक के साथ व्यवहार है, उनके बारेमें जनता के प्रति पारदर्शिता होनी चाहिये.   

यह एक रुपरेखा है और इसको नियमबद्ध भाषामें रखकर भारतीय संविधानमें सामेल करना है.

शिरीष मोहनलाल दवे

टेग्झः चूनाव आयोग, संशोधन, सुधार, जन, मतदार, सर्वेक्षण, जनप्रतिनिधि, पंजीकरण, अनन्यता, प्रमाणपत्र, जनगणना, क्षेत्र, विधेयक, अभ्यर्थी, आवेदक, आवेदन, राजपत्रित, अधिकारी, बुथ, खंड, जिला, तहेसील, उच्च, सर्वोच्च, ग्राम, नगर, स्थावर,  संपत्ति, सदस्य, सदस्यता, हस्तांतरण, कृषि, मानचित्र, खर्च, लेखा, विवरण, बंधक विलेख, परीक्षा,

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